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Title : Need to dissuade the use of offending words against the revered saint ‘Valmiki’.
श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल): मैं आपके माध्यम से इस सदन का ध्यान महर्षि वाल्मीकि जी की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। पीर, पैगम्बरों एवं अनेक अध्यात्मिक संत, महात्माओं की गरिमा से सुशोभित इस धरा पर अनेकों महान आत्माओं का प्रादुर्भाव हुआ है, उनमें से सबसे अधिक वन्दनीय एवं चिरस्मरणीय तथा ब्रह्म ऋषि की उपाधि से सम्मानित महर्षि वाल्मीकि हैं, जिन्होंने “आत्म-ज्ञान” को जानकर न केवल अपने जीवन-यापन के तुच्छ साधनों का परित्याग किया। अपितु अलौकिक दृष्टि को विकसित कर “रामायण” जैसे महान ग्रंथ की रचना की। परन्तु, खेद का विषय है कि इतने महान पुरूष को, जिन्होंने साधारण मानव से ब्रह्म ऋषि का पद प्राप्त किया, उन्हें आज भी कुछ लोग अनेक पूर्व नाम “रत्नाकर” या जाति सूचक शब्द का प्रयोग कर संबोधित व प्रस्तुत करते हैं।
महोदया, वाल्मीकि जी ने तो “उल्टा नाम जपा जग जाना। वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना।” का उपदेश दे जनमानस को मुक्ति के मार्ग की ओर प्रेरित किया। मानव से महामानव एवं महामानव से ब्रह्म ऋषि तक का सफर जिन वाल्मीकि जी ने किया, उनका जीवन जनमानस के लिए प्रेरणा का स्रोत एवं वन्दनीय है। ऐसे में उनके लिए किसी अनुचित या अशोभनीय शब्द का प्रयोग उनके संबंध में सर्वथा गलत है व इससे वाल्मीकि समुदाय में रोष व्याप्त है।
अतः मैं आपके माध्यम से यह कहना चाहता हूं कि हमें उनके विषय में केवल महान संत, महर्षि या आध्यात्मिक पुरूष के रूप में याद कर व प्रस्तुत कर, उन्हें सम्मान देना चाहिए और केन्द्र सरकार कानून बनाकर यह सुनिश्चित करे कि किसी भी समुदाय द्वारा उनकी अवमानना नहीं होनी चाहिए और उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाना चाहिए।