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Title : Combined discussion on Budget and demands for grants on Account for the state of Bihar for 2005-06
12.29 hrs. BIHAR BUDGET, 2005-06
DEMANDS FOR GRANTS ON ACCOUNT ( BIHAR ) – 2005-06
MR. SPEAKER: Now, the House takes up item Nos.8 and 9 together.
THE MINISTER OF FINANCE (SHRI P. CHIDAMBARAM): Sir, I have already placed the Annual Finance Statement for the State of Bihar for 2005-06. Very briefly, the revised statement reflects the following[R6] .
On the Revenue Account, the receipts are estimated at Rs.19,128.97 crore and expenditure is likely to be Rs.19,134.82 crore resulting in a small revenue deficit. On the Capital Account, the receipts are estimated at Rs.7,100.88 crore while the expenditure is likely to be Rs.7,193.85 crore resulting in a deficit of Rs.92.97 crore. Taking into consideration the opening cash balance, the Revenue Account, the Capital Account and the transactions in the Public Account, the year is expected to close with a surplus of Rs.923.59 crore.
I commend this Budget to the House and request the House to pass it.
“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the third column of the Order Paper, be granted to the President, out of the Consolidated Fund of the State of Bihar, on account, for or towards defraying the charges during the year ending on the 31st day of March, 2006, in respect of heads of demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 1 to 4, 6 to 12, 15 to 27, 29 to 33 and 35 to 52.”
Shri Nikhil Kumar Choudhary to speak.
श्री नखिल कुमार चौधरी (कटिहार) : अध्यक्ष महोदय, माननीय वित्तमंत्री जी द्वारा बिहार के लिए वर्ष २००५-०६ के लिए जो बजट प्रस्तुत किया गया है और उसके लिए उन्हें वोट ऑन एकाउण्ट्स की डिमाण्ड की है, मैं उस पर चर्चा करने के लिए खड़ा हुआ हूँ। हम सभी को पता है कि बिहार कि वित्तीय स्थिति कैसी है, बिहार आज किस राह पर है। आज बिहार एक वचित्रता के दौर से गुजर रहा है। बिहार में अभी हाल ही में फरवरी में चुनाव हुए थे और इसी सदन ने ७ मार्च, २००५ को वहां राष्ट्रपति शासन लगाया है। हम उनकी परिस्थितियों को समझते हैं, लेकिन एक वचित्रता की स्थिति और पैदा हो गयी है। जब जनप्रतनधि लोग वहां एक कल्याणकारी और जनप्रतनधियों के द्वारा शासन चलाने की दिशा में प्रयासरत थे, वहां की विधानसभा को २३ मई, २००५ को भंग कर दिया गया। इस स्थिति में वित्तमंत्री जी ने पहले ७ मार्च, २००५ को पांच महीने के लिए वोट ऑन एकाउण्ट्स पर इस सदन की अनुमति ली थी, जो आवश्यक भी थी, लेकिन अब वह पुन: चार महीने के लिए इसका विस्तार करने के लिए वोट ऑन एकाउण्ट्स का प्रस्ताव यहां लाए हैं। परिस्थितियां ऐसी हैं कि हम उसका समर्थन करेंगे लेकिन कुछ ऑब्जर्वेशन्स के साथ, इस विषय पर मैं अपनी बात सदन के सामने रखना चाहता हूँ। वित्तमंत्री जी और बिहार के प्रति रूचि रखने वाले जो लोग हैं, उन्हें बिहार की आर्थिक बदहाली की भी पूरी जानकारी है। हम सभी को यह भरोसा हुआ था कि महामहिम राज्यपाल जी वहां जा रहे हैं और अब बिहार की स्थिति सुधरेगी। बिहार, जो आजादी के पूर्व और आजादी के बाद भी, विकास, शिक्षा और अपनी सदाशयता के लिए प्रसिद्ध रहा है, वह वर्ष १९७० के बाद से गिरता जा रहा है, पिछड़ता जा रहा है।वहां जो पिछले १५ वर्षों का शासन था जिसमें हमारे लालू प्रसाद जी और श्रीमती राबड़ी देवी जी बिहार के मुख्यमंत्री रहे, उससे बिहार को बड़ा नुकसान हुआ है। बिहार की सड़कों की हालत अच्छी नहीं है, शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है, बिजली नहीं है, कल-कारखाने बन्द हो गए हैं।[cmc7]
सबसे बढ़कर वहां की जी स्थिति है, वह है वहां की बिगड़ी हुई वधि व्यवस्था। बिहार की वधि व्यवस्था पर यहां मुकम्मल चर्चा हुई है। मुझ उस पर ज्यादा नहीं कहना है। मुझे इतना कहना है कि राष्ट्रपति शासन के प्रति हम लोगों को भी विश्वास था कि वहां जो बिगड़ी हुई हालत है, उसमें सुधार होगा। बिहार का जो गौरवशाली इतिहास रहा है, उसकी पुनस्र्थापना होगी। बिहार उसमें एक-एक कदम बढ़ने का काम धीरे-धीरे करेगा। लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि राष्ट्रपति शासन के बाद वहां की हालत और बिगड़ी है। हत्याओं का दौर शुरू है, अपहरण का दौर शुरू है। आज बिहार ऊहापोह की स्थिति में है। न ही शासन की प्रशासन पर कोई लगाम है। इस स्थिति में मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि बिहार को कैसे आप आगे बढ़ाएंगे। इस सम्बन्ध में आपका एक पत्र हमें मिला है। मौटे तौर पर तो हम जैसे साधारण ज्ञान रखने वाले लोगों के लिए बजट का मतलब होता है कि जो पैसा यहां से एलोकेट होता है, उससे गरीब-गुरबे लोगों को, पिछड़े हुए इलाकों को, जरूरतमंद लोगों को जरूरत की चीजें चाहिए, वहां इस बजट के द्वारा राज्य सरकार उसे पूरा करेगी। बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि हमारे राज्यपाल ने बिहार जाकर जो बातें मीडिया और अपने अधिकारियों के सामने रखीं थीं, उसकी चर्चा कुछ शब्दों में मैं आपके सामने करना चाहता हूं। हो सकता है मेरी बातों से कुछ लोगों को कष्ट हो, चाहे इधर बैठने वाले हों या उधर बैठने वाले हों। बिहार को बनाने की आवश्यकता है। बिहार में पोटेंशिएलिटी है। बिहार के अंदर वे सारी चीजें विद्यमान हैं, जिससे बिहार को बनाया जा सकता है। बिहार ने पूर्व में भी दिशा देने का काम किया है। मैं समझता हूं आज के दिन भी बिहार में जो टैलेंट है, लोगों में जो ऊर्जा है, काम करने की क्षमता है, उस आधार पर बिहार को बनाया जा सकता है। उसके लिए दिशा चाहिए और धन चाहिए।
मैं राज्यपाल महोदय के उन वक्तव्यों का उल्लेख यहां करना चाहता हूं जो उन्होंने अखबारों के माध्यम से जनता और अधिकारियों के सामने कहे थे। वह लगातार कहते हैं कि वह बिहार को बनाना चाहते हैं। उसके लिए जो संसाधन आप दे रहे हैं, उसका भरपूर सदुपयोग करके बिहार को तरक्की की राह पर ले जाएंगे। लेकिन मुझे कहते हुए अफसोस होता है। जहां उन्होंने कहा था,
“अपराध नियंत्रण और वधि व्यवस्था हेतु हर सम्भव कार्रवाई की जाएगी ”
यह कोई हम लोगों के द्वारा कहा हुआ बयान नहीं है, महामहिम राज्यपाल के द्वारा कहा गया बयान है। इसका मतलब है बिहार के अंदर अपराध बढ़े हैं, वधि व्यवस्था चौपट हुई है। उसे सुधारने की मंशा रखने वाले राज्यपाल महोदय का यह बयान है। मैं उनकी कुछ पंक्तियों को पढ़ना चाहता हूं। राज्यपाल सरदार बूटा सिंह ने कहा,
“अपराध नियंत्रण और राज्य में वधिय व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस प्रशासन प्रत्येक सम्भव कार्रवाई करे। ”
राज्यपाल महोदय सचिवालय के सभा कक्ष में विभागीय सचिवों की बैठक के दौरान उपस्थित पुलिस महानिदेशक तथा अन्य पदाधिकारियों को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने जो कहा पूरा तो नहीं, लेकिन संक्षेपवार कहना चाहता हूं। राज्यपाल महोदय ने कहा,
“बिहार को आधुनिक राज्य बनाने का संकल्प लें तथा इस दिशा में समर्पित भाव से जीजान लगाकर ईमानदारीपूर्वक कार्य करें। ”
लेकिन हुआ क्या, यह सब जानते हैं, कि कुछ दिन पहले ही वहां के मुख्य सचिव ने किस ढंग से छुट्टी पर जाने का अपना इरादा व्यक्त किय्ाा[R8] ।
[r9]
वहां के डीजीपी ने अपनी जो उक्तियां प्रकट की हैं वह वहां की प्रशासनिक क्षमता को दर्शाती हैं।
अध्यक्ष महोदय : आप जानते हैं कि इस पर पूरा डिस्कशन हो चुका है।
श्री नखिल कुमार चौधरी : जी, मैं जानता हूं। मैं इसे अभी भूमिका में रख रहा था। राज्यपाल महोदय ने सुरक्षा के बारे में अपने जो उद्गार रखे हैं वह बताना चाहता हूं। उन्होंने कहा है क “बच्चों, महिलाओं और वृद्धों की रक्षा के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है और इससे संबंधित अधिकारियों को उन्होंने निर्देश दिया है”। राज्यपाल महोदय ने कहा कि “उग्रवादियों, असामाजिक तत्वों व आतंकवादियों द्वारा आम लोगों को प्रताड़ित करने का मार्ग अवरुद्ध किया गया है, जिस पर नियंत्रण करने के लिए विशेष उपाय किये जाने चाहिए” । मेरा कहना है कि इन सारी घोषणाओं के बाद भी वहां कुछ नहीं हुआ है, इसलिए मैंने इन बातों का उल्लेख किया है। मैं माननीय वित्त मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि राष्ट्रपति शासन के पांच महीनों में विकास का काम लड़खड़ा गया है। विकास की योजनाओं के लिए खर्च का हाल बेहाल है। राष्ट्रपति शासन में इस वित्तीय वर्ष की ६ प्रतिशत राशि ही खर्च हो सकी है जबकि २५ प्रतिशत समय गुजर चुका है। वर्तमान वित्तीय वर्ष की ५३०० करोड़ रुपये की योजना के विरुद्ध ३०० करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए हैं। माना जा रहा है कि यह खर्चा भी नॉन-प्लॉन में हुआ है। संसाधनों की कमी के कारण १०वीं पंचवर्षीय योजना के २४ हजार करोड़ रुपये के निर्धारित आकार के १९६१० करोड़ पर ही ठहर जाने का अनुमान है। माननीय वित्त मंत्री जी जब अपनी बात कहेंगे तो इसका उल्लेख करेंगे कि इस बारे में क्या स्थिति है। आपने जो बजट पेश किया है, उसमें आपने राजकोषीय घाटा का भी उल्लेख किया है तथा और विषयों पर भी चर्चा की है। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि संसाधनों की कमी के कारण २००२ और २००७ के लिए निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं किया जा सका है। इसका कारण राज्य सरकार द्वारा अपने संसाधनों को न जुटाना और केन्द्रीय सहायता का न मिलना है। इस दौरान गैर-योजना राजस्व व्यय ५०० करोड़ रुपये बढ़ जाना भी योजना पर गहरा असर डालेगा। यह भी एक विचारणीय विषय है।
सूत्रों के अनुसार, एक तरफ तो संसाधनों की कमी का रोना और दूसरी तरफ क्रियान्वयन की गति का धीमा होना बताया जाता है। जून की रिपोर्ट के अनुसार लगभग ३०० करोड़ रुपये खर्च हुए हैं और जो पैसा खर्च हुआ है उसमें अधिकांशत: स्थापना से संबंधित खर्च है। कई विभागों से अभी तक खर्च की रिपोर्ट नहीं मिली है।
ग्रामीण विकास में ५८५८३ लाख रुपये की योजना के विरुद्ध अब तक मात्र १०३६८ लाख रुपये, प्राथमिक शिक्षा विभाग में ४६ हजार १८९ लाख की योजना के विरुद्ध ३७७९ लाख रुपये ही खर्च किये जाने की सूचना है और वभिन्न विभागों से रिपोट्र्स भी प्राप्त नहीं हुई हैं। योजना विभाग ने इस संबंध में पत्र लिखा है और खर्चे के बारे में जानकारी प्राप्त करने पर अधिकारियों का कहना है कि जब तक रिपोर्ट नहीं आती है तब तक कैसे पता चलेगा कि कितना खर्च हुआ है। बिहार में एक मानसिकता है कि इस समय वे खर्चे का ब्यौरा नहीं लेते हैं और यह मानकर चलते हैं क अक्टूबर से काम शुरु होगा और अक्टूबर में जब वे अपना कार्य योजना शुरू करते हैं तो बरसात का मौसम व अन्य बाधाओं को झेलना पड़ता है[r10] ।
पहले तो मुझे बोलने का मौका नहीं मिलता है। अब आप मुझे बोलने का समय नहीं दे रहे हैं।
अध्यक्ष महोदय: क्या आप अनलमटिड टाइम तक बोलेंगे?
श्री नखिल कुमार चौधरी : हमारे दल की ओर से जो समय निर्धारित है, मुझे उतना समय मिलना चाहिए।
MR. SPEAKER: The BAC has agreed to have a two-hour debate on this. And I have allowed you also.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: It is the rules of the game. We cannot allow unlimited time.
श्री नखिल कुमार चौधरी : वर्तमान मूल्य के लक्ष्य की तुलना में राज्य सरकार ८०२० करोड़ रुपए ही खर्च कर सकी है। वित्त विभाग के अनुसार राज्य सरकार को अगले दो वित्तीय वर्षों में कुल मिला कर ११५९० करोड़ रुपए खर्च करने हैं। २००५-०६ का योजना आकार ५३०० करोड़ रुपए का निर्धारित किया गया है। विकास योजनाओं के खर्च की गति काफी धीमी है। वित्त विभाग के सूत्रों ने बताया कि दसवीं योजना के दौरान बिहार बिजली बोर्ड के लिए राज्य योजना में २३७६ करोड़ रुपया मुहैया नहीं कराया गया जो बिहार के साथ अन्याय है। स्थानीय निकायों के उन्नयन के लिए ६१६ करोड़ रुपए नहीं मिले। पंचायत चुनाव के पहले इस मसले पर भारी विवाद हुआ था। योजना आयोग की अनुशंसा के बावजूद केन्द्र से धन मुहैया नहीं हो सका। इसी तरह राज्य को केन्द्रीय करों में मिलने वाले हिस्सा मद में १०२० करोड़ रुपए अनुमान से कम मिले।
महोदय, आपने सभा पटल पर स्टेटमैंट रखा है। बिहार की सड़कों की हालत बहुत खराब है। बिहार में शिक्षा का स्तर बहुत गिरा हुआ है। वहां स्कूल भवन नहीं हैं। अभी-अभी कुछ अस्पतालों का दौरा करने के बाद यह देखने को मिला और मैं बराबर देखता हूं कि अस्पतालों के भवन नहीं हैं, जहां दवा नहीं है। हमारा क्षेत्र बाढ़ग्रस्त है। बिहार के लगभग २८ जिले ऐसे हैं जो बाढ़ से प्रभावित होते हैं। इन जिलों की स्थिति यह है कि वहां डायरिया की बीमारी होती है लेकिन एंटी डायरियल दवा कम मात्रा में मिलती है। मैं आग्रह करना चाहता हूं कि इन विषयों पर आपका ध्यान जाना चाहिए। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर बिहार को आगे ले जाना है तो आपको बिजली की मद पर ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे। आज बिहार में बिजली का उत्पादन ठप्प हो गया है। पुराने संयंत्रों को आधुनिक और रिन्यूवल करने की जरूरत है।
MR. SPEAKER: Please conclude. Thank you for your cooperation.
श्री नखिल कुमार चौधरी : महोदय, बिहार की जो दुव्र्यवस्था हुई है, उसे सुधारने के लिए केन्द्र की तरफ से जो पैसा जा रहा है, उसका वहां सदुपयोग नहीं हो रहा है। बिहार पिछड़ रहा है। इसे सुधारने की जरूरत है। कहना तो और भी था। यदि आप मुझे बोलने का पांच मिनट और मौका दें तो मैं इस पर अपने विचार रख सकूं।
अध्यक्ष महोदय: क्या आप जानते नहीं कि इस पर बहुत अच्छी डिबेट हो गई है? You have covered everything. Bihar should be obliged to you. Thank you.
Now, Shri Nikhil Kumar.
SHRI NIKHIL KUMAR: Sir, I am the only speaker from my Party.
MR. SPEAKER: It does not mean that there is unlimited time available to you. Time is according to your Party’s entitlement. At least start your speech now.
SHRI NIKHIL KUMAR : Sir, we are discussing the Revised Estimate of the Bihar Budget for the current financial year.
We had, last time, approved in this very House, an amount of Rs.26,000 and odd crore, for this financial year’s budget. Now, the State of Bihar has come up with an additional demand of Rs.500 crore. Actually, the budget calculations show that Bihar State needs an amount of Rs.900 crore for its development and other works. Out of this, it will be in a position to mobilise its own funds to the extent of about Rs.400 crore. So, it means that it needs nearly an additional requirement of about Rs.500 crore.
Sir, I rise to support this demand of the Bihar Government, which is in the Revised Estimate of the current year’s budget. Bihar is an unusual State; there are areas which are inundated by floods, and as a result, the crops are washed away; people are displaced and we do not know how long this condition will last. This is the situation which is repeated year after year. Again, in the same State, there are areas, which have suffered a failure of monsoon and thus, there is drought. In these areas, there is no crop and there is lack of employment; there is poverty and above all, the whole State is now gradually going towards the path of Left-wing extremism[R11] .
My own constituency, the area that I come from, and its neighbouring areas are deeply plagued by Left wing extremism in a very grave degree. As a result, that area needs a lot of attention. In fact, Bihar needs special attention. It is not a Special Category State but I do realise that if the Government of India has some yardstick based on backwardness, unemployment, lack of development and opportunities which are plagued by the threat of Left wing extremism, Bihar is an excellent instant where it should be covered by a Special Category State. That is not there. I make a plea to the Government of India that it should consider very seriously including the State as a Special category State.
Apart from that, as I said, it is because of all this that Bihar needs special attention and we need to take a serious stock of the situation there. There is shortage of power. There is abundance of water on one hand and there is lack of water on the other leading to scarcity and drought. This condition of drought would have been prevented had the State of Jharkhand being cooperative and agreed to the construction of Suez Gate on two rivers that originate in that State and flow into the South Bihar. These are the two rivers that lead to a network of irrigation canals, distributories, feeders, etc.
For sometime now there is a dispute going on between Bihar and Jharkhand. I must compliment the Ministry of Water Resources, Government of India, to have taken the initiative to summon the people in the Bihar and Jharkhand Governments and brokered some kind of an agreement between them which meant that while the Bihar Government will provide funds, the Government of Jharkhand will construct the Suez Gate. When they went back, Jharkhand officials back-tracked and as a result we are suffering the brunt of it. There is no water in our canals because there is no reservoir on the two rivers that feed us. These two rivers are rainfed and if there is a failure of rain, there will be no water in our reservoirs. As a result, our irrigation canals are denuded of water. I would, therefore, appeal to the State of Jharkhand and to the Ministry of Water Resources that together they should sit down and bring about some kind of a compromise, agreement to release water and to construct the Suez Gate on these two rivers so that it becomes a permanent solution for future.
I would say that this whole area, in fact the entire State of Bihar has been very seriously studied and it is found that out of 38 districts, 37 have been designated as backward districts. I am definite that South Bihar districts are backward. They are backward in terms of lack of employment, crop production, road connectivity and above all in power. It is in these areas and, especially in my Constituency Aurangabad, that we need to implement the National Food for Work Programme. I would like to say a word about the National Food for Work Programme.
A total mount of Rs.5,000 crore has been set apart for this programme throughout the country. This will cover 150 districts. A good deal of this amount is unspent, as a result there is saving. If only the number of districts covered by this National Food for Work Programme is increased from 150 to 170, without increasing the overall allocation of fund, that is over Rs.5,000 crore, it will help many districts in Bihar being included in the list of districts to be covered by this programme. It will be a great boon at least to my district because it is on the border line. I would very strongly appeal to the Government of India to consider this suggestion, that is, while retaining the limit of Rs.5,000 crore as fund allocation for the entire country for this programme, the number of districts to be so covered may please be increased from 150 to 170[R12] .
The next point is about the fact that it has become some kind of a fashion to describe Bihar as backward, lacking in administrative infrastructure and so on. We must take note of the fact that in the revised estimates that we have received here, nearly Rs.1315 crore have been provided for under the Rashtriya Shram Vikas Yojana. Of these, as much as Rs.300 crore have been set apart for power and the energy sector. This is all very nice and I recommend that this should be expedited. But at the same time, the point is how do you spend this money. Bihar is suffering from an acute shortage of power. After the creation of the State of Jharkhand, there are just two major power plants in the State, namely, Barauni and Kati. Unfortunately, Kati, which has a total production potential of 220 megawatt, has been lying dormant and non-functional for the past almost 15 years. As regards Barauni, which has been feeding Bihar with good deal of power requirement, it is also working only to about one-third of its capacity.
We have recently heard that the Bihar Government and the Governor of Bihar has managed to enter into an agreement with the BHEL and the NTPC to firstly re-start Kati and bring it to its full functional form and secondly to examine what can be done to upgrade the functioning of Barauni and to modernise it. It is here that I wish to make a small submission that we have laid down certain procedures. These procedures are time consuming, especially in a State like Bihar. Like we pay attention to the North-East and to Kashmir, there is a need to give special attention to Bihar and to see that the procedures are streamlined so that there is no red tapism. For instance, projects under the RSVY have to be approved by the Planning Commission. No mater how big the financial implication is, they all have to go to Planning Commission. As a result, the Planning Commission takes its own time and an overall delay of six months to something like a year takes places. This can be reduced if there is a view taken that not all projects should go to the Planning Commission but up to a certain limit say up to Rs.1000 crore or Rs.500 crore or something like that would go to Planning Commission. I do not wish to make a suggestion about the exact limit but some such decision should be taken to facilitate quick decision making at the State level.
I would also invite the attention of the Government of India to the fact that this kind of procedure affects also the projects that are being considered by the NABARD. No doubt, NABARD is doing very useful work. But every project that is referred to NABARD has to be first assessed for its viability. This viability assessment is done not in Bihar but elsewhere. If only NABARD or the Government of India could kindly consider placing in Patna or anywhere in Bihar its own expert staff which could examine the technical feasibility of any project, it will cut delays and it will be able to hasten development work.
So my second appeal is that, in addition to what I have suggested earlier about the Planning Commission, NABARD should be directed to place its expert staff at Patna to make its expertise available in seeing that every project that is referred to it is analysed and assessed for its viability as quickly as possible without any avoidable loss of time. The adequate strength of appraisal staff should be placed at Patna.
The third point is that there is a very large population of the Scheduled Castes in the State. I think it is unusually large and the Government of India has an excellent programme of the Indira Avas Yojana which is calculated to offer a great deal of relief and succour to this section of the society[r13] .
13.00 [snb14] hrs.
Unfortunately, a sum of Rs. 468 crore has been earmarked in the current year’s Budget with the result that less than 29,000 dwelling units will be constructed. This is mere chicken feed; this is mere pittance. I appeal for an increase in the allocation under the Indira Awas Yojana by at least 50 per cent, if not more. It would, even then, not be adequate, but at least it will meet the demands of the deprived sections and we would be able to see as to how much relief we have been able to provide to them.
Sir, road connectivity is an important contributory factor to the progress of any country. I do not have to cite instances. These instances are very well-known. The latest one being that of Malaysia. The State of Bihar, particularly, needs a great deal of road connectivity. We have an excellent selection of schemes to construct roads. I would like to invite attention to only two of the schemes. One is the Prime Minister’s Golden Quadrilateral Road Project. Two hundred and fifty kilometres of National Highway II passes through Bihar. The progress on this has been stopped of late and as a result there is much inconvenience to the people who travel along this road. I have often found that because of the delay in road construction, there is a very long queue of heavy vehicles blocking the traffic there because a two-way traffic is not possible on this road. This is particularly so between Dehri-on-Sone and Dobi. The National Highway Authority of India must be requested to give special attention to this part to see that the construction is speeded up this stretch.
The second part is the Prime Minister’s Gram Sadak Yojana (PMSGY). Some central agency has been given the task to construct the roads under this scheme. In my area itself there are three major roads. It is now quite some time that work order in respect of only one of them has been issued. There are two other important roads, both running into something like 50 kilometres each, which have been left out and the concerned authorities, particularly IRCON, needs to be told to pay special attention to expedite the work of construction on these very important roads that have been selected under the PMSGY.
MR. SPEAKER: You have raised many issues. Please conclude now.
SHRI NIKHIL KUMAR : Sir, I am into my last point. I mentioned something about power. Power shortage is endemic and it is well-known.
MR. SPEAKER: It is very unfortunate that the State of Bihar is under President’s Rule, but that does not mean that this House becomes Bihar Assembly. The entire debate cannot take place here.
SHRI NIKHIL KUMAR : I am asking for central assistance. In the past five years, the Government of India, meaning thereby the previous Government had released as much as Rs. 10,000 crore for rural electrification. But it is very surprising that the State of Bihar did not get its share at all. It is for this now that I would like to appeal to the Central Government that the share of Bihar for electrification must be given. Unless this is done, we would continue to have a classic case of the State of Bihar being criticised as being this and that and so on. So, something meaningful needs to be done to see that the Administration in Bihar is spruced up.
MR. SPEAKER: The next speaker is Shri Mahboob Zahedi. You will have five minutes. You can complete even before that as well.
श्री महबूब ज़ाहेदी (कटवा) : माननीय अध्यक्ष महोदय, मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे बिहार के बजट पर बोलने का मौका दिया। मैं कोशिश करूंगा कि मैं पांच मिनट में अपनी बात समाप्त कर लूं। मुझसे पहले जिन मैम्बरों ने बिहार के बजट के बारे में जो अपने विचार यहां रखें हैं, उन्हें मैं दोहराना नहीं चाहता हूं। मैं उनसे अलग हटकर कुछ नई बात बोलना चाहता हूं। मैं कहना चाहता हूं कि अभी केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी चली आ रही है, सात मार्च को प्रोक्लेमेशन होने के बाद से यह सवाल चला आ रहा है। अभी जो बजट बन रहा है उसका यूटिलाइजेशन उन्हीं को करना है और यदि जरूरत होगी तो इस रकम को और बढ़ाया जा सकता है। मैं शिक्षा, स्वास्थ्य, इंडस्ट्रीज तथा दूसरी चीजों में नहीं जाना चाहता हूं[R15] .
बिहार में सबसे बड़ा मुद्दा किसानों का मुद्दा है, किसान द्वारा बोया हुआ अनाज सबसे बड़ा मुद्दा है। इस संबंध में मैंने देखा कि पिछले बजट में इसके लिए जो एलोकेशन था, उसके मुकाबले में इस बार जो एलोकेट किया गया है, उससे किसान को फायदा होने वाला नहीं है। मैं वित्त मंत्री जी से अर्ज़ करूंगा कि इसके बारे में ज़रा ध्यान दें।
अध्यक्ष महोदय, आप जानते हैं कि दो चीजों से बिहार की बरबादी सबसे ज्यादा होती है – बाढ़ और सुखाड़। वहां पर तीन-चार नदियां नेपाल से आती हैं, जो हर साल बाढ़ की विभीषिका को अपने साथ लाती हैं। बिहार के बारे में जब चर्चा हुई थी तो हमने सुना था कि इस बाढ़ को रोकने के संबंध में नेपाल के साथ भारत की एक कमेटी बनी हुई थी। बहुत अफसोस है कि अभी तक उस पर क्या चर्चा हुई, क्या निर्णय हुआ, उसके बारे में सदन को कोई सूचना तक नहीं दी गई। मंत्री जी इस संबंध में सदन को बताएं कि नेपाल के साथ बात न होने से हमारी क्या हालत हो रही है। यह तो बाहर से आने वाली बाढ़ की बात है। जब हम अपने राज्य की बात करते हैं तो बिहार में जो बांध हैं, झीलें हैं, जो-जो बांध टूट गए हैं, उनकी मरम्मत कैसे होगी? जो पैसा सैंक्शन किया गया है, उससे मरम्मत हो रही है या नहीं, यह देखना जरूरी है।
सुखाड़ के संबंध में मैं कुछ कहना चाहता हूं। जब बाढ़ आई थी तो हमने देखा कि एक तरफ तो बहुत सा पानी था और दूसरी तरफ सूखा पड़ा हुआ है। हमारे यहां नदियां हैं, बहुत से बांध आपने उन पर बना दिये हैं। उन नदियों के पानी को क्या हम सूखे क्षेत्रों में नहीं ले जा सकते? क्या ग्राउंड वाटर का सही उपयोग हम कर सकते हैं? तीन-चार चीजें बहुत जरूरी हैं। आज किसान कामर्शियल क्राप्स पर जोर देते हैं। इनमें गन्ना, धान, गेहूं और दालें आती हैं। पहले तो किसान सूखे से बरबाद हो जाते हैं और फिर बाढ़ आ जाती है। उसके बाद जो कुछ उनके पास उपज बचती है, उसको बेचने के लिए बाज़ार नहीं है। वे लोग कहां जाएं? उनके लिए रेम्यूनरेटिव प्राइस कहां है? इस कारण किसान की जिन्दगी बहुत मुश्किल हो गई है। वहां बिजली की व्यवस्था नहीं है। मुजफ्फरपुर और बरौनी में तक बिजली नहीं है।
मैं नेशनल हाइवेज़ के संबंध में कहना चाहता हूं। मैं भीतरी रास्तों की बात नहीं कर रहा हूँ। हम वहां गए थे। उन सड़कों पर जाने के बाद हमारी स्पाइन में थोड़ी गड़बड़ हो गयी थी।
अध्यक्ष महोदय : सबकी हो जाती है।
श्री महबूब ज़ाहेदी : अध्यक्ष जी, बिहार से माइग्रेशन हो रहा है। शुगर मिलें बंद हैं। I cannot say about the exact number of sugar mills, पर हमें जो मालूम होता है, ७५ में से करीब-करीब २४ मिलें चल रही हैं और बाकी सब बंद हैं। उससे किसान और मजदूर बुरी तरह से प्रभावित हैं। मैं आपके द्वारा वित्त मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि माइग्रेशन को रोकने के उपाय ढूंढ़ें। अगर बेरोजगारी रहेगी, गरीबी रहेगी तो समाज विरोधी ताकतें बढ़ेंगी और माइग्रेशन भी बढ़ेगा। इसमें उनका पूरा कसूर नहीं माना जा सकता। There is heavy migration from Bihar to other States and even outside the country also. इसके बारे में हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। इसकी पूरी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार पर है[h16] ।
जब चुनाव होगा और नई सरकार बनेगी, इसे उन पर छोड़ दीजिए। जब होगा तब केंद्रीय सरकार को उसके बारे में सोचना है। यह बोल कर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री गणेश प्रसाद सिंह (जहानाबाद) : अध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभार प्रकट करता हूं कि आपने मुझे बिहार के बजट पर बोलने का अवसर प्रदान किया है। मैं कहना चाहता हूं कि बिहार के बजट का जो अनुमान रखा गया, वह १९१२८.९७ करोड़ रूपये है और उसके साथ-साथ अन्य मदों में व्यय के अलावा जो परियोजना व्यय पर खर्च रखा गया, वह मात्र ६८७.४७ करोड़ रुपयों का रखा गया है। मैं बताना चाहता हूं कि बिहार प्रदेश काफी गरीब प्रदेश है। यहां बेरोजगारी, बेकारी, किसानों की फटेहाली, अशिक्षा ये सभी चीजें हैं। आज बजट में जो प्रावधान होना चाहिए और जितना खर्च और व्यय होना चाहिए, आज तक इन चीजों पर यह व्यय नहीं किया गया है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि बिहार में अधिकांश किसान लोग बसते हैं। किसान जीवन यापन के लिए खेती करते हैं। बिहार को दो भागों में बांटा जा सकता है। गंगा नदी का दक्षिणी इलाका दक्षिण बिहार के नाम से जाना जाता है। बिहार के बंटवारे के पूर्व इसे मध्य बिहार के नाम से जाना जाता था। यह जान कर आपको आश्चर्य होगा कि वहां सोन, पुनपुन, फालगू, दर्धा, मोरहर, लोकायिन, कररूआ अनेक दर्जनों नदियां बहती हैं, लेकिन अभिशाप है हमेशा इस इलाके में सूखाड़ पड़ता है और इस सूखाड़ का सामना करने के लिए मैं समझता हूं कि यदि नदियों पर पक्का बांध बना दिया जाए और नहरें बना कर किसानों के खेत तक पानी पहुंचा दिया जाए तो बिहार के किसानों की समस्या हल हो जाएगी और दक्षिण बिहार से गरीबी और बेकारी निश्चित रूप से मिट जाएगी।
महोदय, इसी प्रकार से उत्तर बिहार में ये नदियां कोई फायदे का काम नहीं करती हैं बल्कि नेपाल की तराई से, ऊपर पहाड़ से जो नदियां निकलती हैं वे खड़ी फसलों को नेस्तोनाबूद कर देती हैं। मैं कहना चाहता हूं कि जब बाढ़ और सूखाड़ आता है तो चाहे राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार हो, दोनों अपनी चिंता व्यक्त करती हैं कि बाढ़ से कैसे मुकाबला किया जाए, कैसे सूखाड़ खत्म किया जाए? भूमि के बचाव के लिए, किसानों की फसलों के बचाव के लिए नदियों पर पक्का बांध बना कर नहरों के माध्यम से पानी को पहुंचाया जाए तो इससे सूखाढ़ भी नहीं होगा और बाढ़ भी नहीं आएगी।
महोदय, बिहार में शिक्षा का प्रबंध भी अच्छा नहीं है। हाई स्कूल बने हुए हैं। बहुत सारे हाईस्कूलों को वित्त रहित शिक्षा का नाम दिया जाता है। वित्त रहित शिक्षा के नाम से कालेजों को जाना जाता है। शिक्षा पर ज्यादा व्यय करने की आवश्यकता है। गावों में प्राइमरी स्कूल हैं, उनमें कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है, स्कूल के लिए भवन और शिक्षक नहीं है। डेढ़-दो सौ बच्चों पर एक शिक्षक है। वहां पर कैसे संभव है कि शिक्षा का विकास हो। प्राथमिक शिक्षा, शिक्षा की रीढ़ है। आर्थिक विकास की भी रीढ़ है। इन्फ्रास्ट्रक्चर बदलने की जरूरत है।
मैं बताना चाहता हूँ कि वहां की ग्रामीण सड़कें भी बहुत खराब हैं, चाहे जिला परिषद की सड़कें हों या ग्राम अभियन्त्रण संगठन विभाग की सड़कें हों। ये तमाम सड़कें टूटी-फूटी और जर्जर हैं।इसलिए उनकी मरम्मत के लिए धन की आवश्यकता है। इसलिए मैं कहना चाहता हूँ कि हमें इंफ्रास्ट्रक्चर को बदलने की जरूरत है। बिजली वहां नहीं मिलती है। बिहार का बंटवारा होने के बाद बिजली का उत्पादन न के बराबर है। इसी प्रकार से आप जानते हैं और सारे सदन के माननीय सदस्य भी जानते हैं कि बिहार में उग्रवादी गतवधियां भी तेजी से बढ़ रही हैं, आखिर इसका क्या कारण है?…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : श्री गणेश प्रसाद सिंह जी, आप कितना समय और लेंगे ?
श्री गणेश प्रसाद सिंह : सर, मैं थोड़ा समय और लूंगा।
MR. SPEAKER: Then, continue after recess.
13.15 hrs. The Lok Sabha then adjourned for Lunch till
Fourteen of the Clock.
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14.07 hrs.
The Lok Sabha re-assembled after Lunch at seven minutes past Fourteen of the Clock.
(Mr. Deputy-Speaker in the Chair)
BIHAR BUDGET, 2005-06
DEMANDS FOR GRANTS ON ACCOUNT ( BIHAR )- 2005-06
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Ganesh Prasad Singh will continue. Now, I would request you to please conclude.
श्री गणेश प्रसाद सिंह (जहानाबाद) : उपाध्यक्ष महोदय, अभी मैं बिहार बजट पर अपनी बात रख रहा था। मैं अपनी बात को आगे बढ़ाना चाहता हूं। इसके पूर्व मैंने कहा था कि सिंचाई का समुचित प्रबन्ध न होने के कारण भी बिहार में गरीबी है। इस बजट में सिंचाई के ऊपर व्यय का उतना प्रावधान नहीं है, जितना होना चाहिए था। दूसरी बात मैंने यह कही थी कि बिहार में पिछड़ेपन का एक कारण प्राइमरी स्कूल से लेकर हाई स्कूल तक की शिक्षा में कुव्यवस्था है। प्राइमरी स्कूलों में डेढ-दो सौ बच्चों पर एक शिक्षक है। कई वर्षों से बिहार में शिक्षक यूनिट्स को स्वीकृति नहीं मिली है, जिसके कारण अभी भी कई गांव विद्यालयविहीन हैं। इसके लिए भी सरकार को बजट में प्रावधान करना चाहिए। जितने लड़के हों, जितनी क्लास हों, उतने ही कमरों का भी प्रावधान करना चाहिए। वहां कई स्कूल और कालेज निजी हाथों में चल रहे हैं, उन स्कूल और कालेजो का सरकारीकरण करने के लिए बजट में प्रावधान होना चाहिए।
महोदय, इन सारी बातों के अलावा मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि बिहार में कोई उद्योग नहीं है। जो पुराने उद्योग थे, वे सारे के सारे बंद हो चुके हैं, चाहे वह चीनी उद्योग हो या कल-कारखाने हों, सभी उद्योग बंद हो चुके हैं[MSOffice17] ।झारखंड का बंटवारा होने के बाद वहां ऐसी कोई इंडस्ट्री नहीं बची है जिसमें लोगों को रोजगार मिल सके।
एक बात और कहना चाहता हूं कि पूरे हिन्दुस्तान में खादी ग्रामोद्योग का अपना स्थान है। बिहार में भी खादी ग्रामोद्योग से लाखों लोगों को रोजगार मिलता था, लेकिन आज उसकी स्थिति बद से बदतर हो गई है। सारे खादी ग्रामोद्योग केन्द्र बंद हो गए हैं। मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि अगर वाकई बेरोजगारी को मिटाना है और लोगों को रोजगार देना है, तो खादी ग्रामोद्योग पर भी पैसा व्यय करना होगा। वहां के जो खादी ग्रामोद्योग केन्द्र मर गए हैं, उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए विशेष प्रावधान करना होगा। छोटे-छोटे उद्योगों को वित्त निगम द्वारा पैसा दिया गया था, लेकिन आज कहीं बिजली के अभाव में तो कहीं फाइनैंस के अभाव में वे उद्योग चल नहीं रहे हैं।
बिहार का जो बजट आया है, मैं उसका समर्थन करता हूं, लेकिन आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि बजट में और राशि का प्रावधान किया जाए। अगर बिहार से बेरोजगारी और गरीबी मिटाना चाहते हैं तो शिक्षा, सिंचाई और आवागमन आदि पर व्यय करना पड़ेगा। आप जितना पैसा इस्टैबलिशमैंट और दूसरी मदों पर खर्च करते हैं, उसके अनुपात में योजनाओं पर व्यय कम होता है। इसे बढ़ाने की आवश्यकता है।
मैं अंत में कहना चाहता हूं कि वहां उग्रवाद से मुकाबला करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।उग्रवादी जैसी घटना करना चाहते हैं, कर देते हैं। पुलिस को घटनास्थल पर पहुंचने में काफी समय लग जाता है। पुलिस के बड़े पदाधिकारी कहते हैं कि यहां फोर्स की कमी है, हम उन्हें कहां-कहां भेजें, किन-किन लोगों की रक्षा कर सकते हैं। बिहार की स्थिति को देखते हुए, वहां के आतंकवाद के प्रकोप को रोकने के लिए, पुलिस को सारी सुविधाओं से लैस करने के लिए आवश्यक राशि की व्यवस्था की जाए।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
MR. DEPUTY-SPEAKER: I will give you only five minutes.
श्री शैलेन्द्र कुमार (चायल) : उपाध्यक्ष जी, आपने मुझे बिहार के बजट पर बोलने का मौका दिया, मैं आपका आभारी हूं। यहां पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ के सम्मानित सदस्यों के विचार आए हैं।हम लोगों का हमेशा प्रयास रहा है और राज्यों की भी हमेशा यह अवधारणा रही है कि अगर राज्य विकास करेगा तभी देश विकास करेगा। बिहार और उत्तर प्रदेश, ये दो ऐसे राज्य हैं जो हिन्दुस्तान का दय प्रदेश कहलाते हैं। यदि इन राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सिंचाई और रोजगार आदि की व्यवस्था नहीं होती और हम कहते हैं क हिन्दुस्तान बहुत विकास कर रहा है, तो यह अतिश्योक्ति होगी।
मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि बिहार में हमारा काफी आवागमन हुआ है। कुछ महीने पहले वहां हमारी पार्टी का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। हमने देखा कि वहां खासकर सड़कों की स्थिति बहुत खराब हैं। यदि प्रदेश की राजधानी की सड़कें अच्छी नहीं हैं तो किसी भी राज्य या केन्द्र के अधिकारी या बाहर से आने वाले लोग, जो दूसरे राज्यों में पैसा इन्वैस्ट करना चाहते हैं, वे क्या धारणा लेकर जाएंगे – यह सोचने की बात है। मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि आपने बिहार के लिए बजट का जो प्रावधान किया है, उसमें कुछ और बढ़ोत्तरी करें[R18] ।
आप बिहार के लिए कुछ स्पेशल पैकेज दें ताकि वहां जो गरीबी है, गुरबत है, जैसे अभी हमारे सम्मानित सदस्य ने कहा कि वहां पर उग्रवाद ज्यादा है चाहे वह रणबीर सेना के नाम पर हो या तमाम ऐसे उग्रवादी छात्र हों, वे गरीब हैं, पिछड़े तबके के हैं, अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोग हैं। उनके हाथों में रोजगार नहीं है। उनमें शिक्षा की कमी है। उनके सामने रोटी कपड़ा और मकान की समस्या है। जब उनको ये सुविधायें नहीं मिलती, सरकार उनको नहीं दे पाती तभी वह उग्रवादी हो जाता है और जब उसके अंदर उग्रवाद आ जाता है तो वह तमाम तरह की हरकतें करता है। अभी रिसेन्टली मणिपुर के बारे में यहां चर्चा हुई थी। उसमेंछात्र लोग शामिल हैं। वे अपने राज्य की स्वायत्तता चाहते हैं। इसी प्रकार आप बिहार पर विशेष ध्यान दें ताकि वहां जो गरीबी है, गुरबत है, वह दूर हो सके। अगर बिहार की तरक्की, विकास होगा तो मेरे ख्याल से पूरे देश का विकास होगा।
इन्हीं बातों के साथ आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
डॉ. रामेश्वर उरांव (लोहरदगा) : आपने मुझे बिहार के बजट पर बोलने का मौका दिया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं इस बजट के पक्ष में बोलूंगा। मेरे साथी श्री शैलेन्द्र कुमार ने कहा कि बिहार एक महत्वपूर्ण राज्य है और जब तक उसका विकास नहीं होगा, देश के विकास के साथ उसका विकास नहीं होगा तब तक वह देश के साथ नहीं चल पायेगा। हम राष्ट्र के आर्थिक विकास की बात सोच सकते हैं लेकिन अपने देश में एक कमजोर कड़ी रखकर आगे नहीं बढ़ सकते, पूरे देश को विकसित नहीं कर सकते। किसी राज्य का बजट उस राज्य की असेम्बली में पास होता है लेकिन विशेष परिस्थितियों में उस पर यहां चर्चा हो रही है। पहली बात हमको समझनी होगी कि बिहार को हमें आर्थिक ढंग से विकसित करना है। बिहार की आर्थिक व्यवस्था क्या है ? वह कृषि प्रधान राज्य है इसलिए वहां कृषि को ही विकसित करना होगा क्योंकि वहां इडस्ट्री नहीं है। वहां कुछ एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री थी, शुगर मिल्स थीं लेकिन वे बीमार पङी हुई हैं। वहां मिनरल्स नहीं हैं, फॉरेस्ट नहीं है इसलिये एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री को ही आगे बढ़ाना होगा।
सभापति महोदय, समय कम है इसलिए मैं ज्यादा न बोलकर सिर्फ प्वाइंट्स टच करूंग्ग। वहां एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री और एग्रीकल्चर को आगे बढ़ाना होगा। एग्रीकल्चर को आगे बढ़ाने के लिए सिंचाई की जरूरत होती है। मैं पूछना चाहता हूं कि आज बिहार में सिंचाई की क्या स्थिति है ? देश में ४० प्रतिशत सींचित लैंड है लेकिन बिहार में वह २० परसेंट है। इसे बढ़ाना होगा। सींचित जमीन की संख्या को, औसत को बढ़ाना होगा तभी वहां खेती हो पायेगी। इसके लिए अनेक नदियां हैं। आपको कुछ करना नहीं है केवल उन नदियों पर डैम बनाना पड़ेगा। डैम बनाने से सिंचाई की भी व्यवस्था हो सकती है और पनबिजली भी बन सकती है। बिजली की बात नखिल बाबू कह रहे थे। उनके अलावा दूसरे लोग भी कह रहे थे कि बिहार में बिजली नहीं है। मेरा कहना है कि वहां पर इसके अवसर हैं, लेकिन हमें उन्हें आगे बढ़ाना है, देश को आगे बढ़ाना है। सिर्फ हम यह नहीं कह सकते कि बिहार गरीब है, उसे खुद करना है। उसे आगे बढ़ाना देश का भी कर्त्तव्य होता है।
जब खेती की बात होती है, कृषि की बात होती है तो भूमि सुधार बहुत महत्वपूर्ण चीज है। सबसे पहले जमींदारी उन्मूलन एक्ट १९४८ में बिहार में ही पास हुआ। लेकिन हुआ क्या ? आप वहां के गांव में जायें, खासकर मघ्य बिहार में जायें। गांव में ८५ परसेंट जमीन १५ प्रतिशत लोगों के पास है, और ८५ परसेंट लोग भूमिहीन हैं। अभी सम्मानित सदस्य कह रहे थे कि नक्सलवाद को रोकने में खर्चा हो रहा है, इसलिए वहां विकास नहीं हो रहा है। वह क्यों पनपा, इसका मैं गवाह हूं। नक्सलवाद बिहार में इसलिए पनपा क्योंकि भूमि सुधार कानून को लागू नहीं किया गया। अभी भी समय है कि वहां भूमि सुधार कानून को लागू किया जाये। आज वहां जमींदारों के कुत्ते, बिल्ली, गाय, भैंस के नाम जमीन है, टाइगर, सिंह के नाम पर जमीन है। अगर हम भूमि सुधार को ठीक से लागू करें तो नक्सलवाद की समस्या आधी कम हो जाय्ोगी[r19] । इसलिए बिहार के जितने हमारे साथी हैं, उनसे मैं अनुरोध करूंगा कि जब चुनाव के बाद सरकार बने तो भूमि सुधार को आगे बढ़ाएं तभी हम बिहार को आगे बढ़ा सकते हैं।
महोदय, चर्चा चलती है और मैं मानता हूं कि मैं झारखंड का हूं। बिहार में पढ़ा-लिखा, नौकरी भी की लेकिन झारखंड का था, तो झारखंड में आ गया। झारखंड बनने के बाद आर्थिक मामले में बिहार की स्थिति खराब हो गई है। वहां कुछ बचा नहीं है। जितनी इंडस्ट्री थी, वे सब झारखंड में चली गईं हैं। बिजली का जितना सब कुछ था, वह भी झारखंड में चला गया है। इसलिए अब वहां कुछ नहीं है। इसलिए मैं मांग करता हूं कि भारत सरकार की ओर से बिहार की अर्थ-व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए विशेष प्रबन्ध होना चाहिए। इसलिए मैं उनका समर्थन करता हूं क्योंकि तभी बिहार आगे बढ़ पाएगा। खासकर झारखंड बनने के बाद भारत सरकार की ओर से इस दिशा में विशेष प्रबन्ध किया जाए तभी बिहार तरक्की कर सकता है। लेकिन मैं एक बात की ओर आगाह करना चाहता हूं कि सिर्फ धनराशि देने से ही किसी राज्य का विकास नहीं हो सकता। वहां की मानसिकता, वहां के वर्क-कल्चर में भी सुधार लाना आवश्यक है। मैं एक बात औऱ कहना चाहता हूं तथा अनुरोध करना चाहता हूं कि मेरे बिहार के साथी मेरी इस बात का बुरा नहीं मानेंगे कि बिहार का वर्क-कल्चर क्या है। बिहार में एक कहावत है। मैं बिहार से १२वीं पढ़ा हूं। लोग हंसते थे, कहते थे कि बिहार के हो, हम कहते थे कि हां। तो कहते थे कि बिहारी हो, हम कहते थे कि हां तो बोलते थे कि बिहारी तीन समय काम नहीं कर सकता। एक तो खाने के पहले, दूसरे खाने के समय में और तीसरे खाने के बाद। इसके बाद समय ही कहां बचता है। खाने के पहले तो पेट पकड़े रहता है, खाने के समय में कोई काम नहीं कर सकता और खाने के बाद सो जाता है। इसलिए वर्क-कल्चर को बदलना होगा। केवल पैसे जाने से क्या होगा ? पैसे तो जाते हैं लेकिन कहां खर्च होता है ? बजट का ३५ प्रतिशत भी खर्च नहीं कर पाते हैं। इनएफशिएंसी इतनी है कि …( व्यवधान) मैं बिहार का हूं। मैं बिहार के खिलाफ नहीं बोल रहा हूं। मैं खुद बिहारी हूं।…( व्यवधान)
मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्रीमती कान्ति सिंह) : आप क्या कह रहे हैं ? …( व्यवधान) बिहार के बारे में क्या कह रहे हैं ?…( व्यवधान)
डॉ. रामेश्वर उरांव : बिहार से बाहर जो लोग काम करते हैं, मैंने कौन से ऐसे शब्द का प्रयोग किया ? बिहार के बिहारी…( व्यवधान) मैंने यह कहा कि बिहार के बिहारी। बिहार के बाहर तो उनकी बात अलग है। बिहार के बाहर वे बहुत अच्छा काम करते हैं। …( व्यवधान) बिहार के बजट का जो एमाउंट होता है, उसमें वेस्टेज अधिक होता है। इसलिए इस वेस्टेज को रोकने से ही बिहार के विकास पर हम ज्यादा खर्च कर सकते हैं।…( व्यवधान)
शिक्षा में बिहार का पहले इतना नाम था, पुराना जमाना छोड़ दीजिए। नालंदा औऱ तक्षशिला विश्वविद्यालय का काफी नाम था। लोग बाहर से वहां पढ़ने आते थे। हमारे इतने साथी सब पटना यूनिवर्सिटी के पढ़े हुए हैं। हम खुद पटना यूनिवर्सिटी के प्रोडक्ट हैं। अपना घरबार छोड़कर झारखंड से पटना पढ़ने के लिए आए थे क्योंकि काफी नामी विश्वविद्यालय था। आज स्थिति खराब हो गई है। शिक्षा पर ज्यादा पैसा बाहर दिल्ली और दूसरी जगह में जा रहा है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि बिहार में शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जाए तभी बिहार का विकास होगा।
श्री राजीव रंजन सिंह ‘ललन’ (बेगूसराय) : उपाध्यक्ष महोदय, किसी भी साधारण बजट का जो दस्तावेज होता है, वह कोई साधारण दस्तावेज नहीं होता बल्कि आने वाले समय के लिए जनहित में जो योजनाएं ली जाने वाली हैं, उनका दस्तावेज होता है, उनको रिफलैक्ट करता है लेकिन बिहार का एक दुर्भाग्य है कि किसी कारण से ६ महीने के अंदर दूसरी बार हम लोक सभा में एप्रोप्रिएशन विधेयक पर चर्चा कर रहे हैं। जैसा मैंने कहा कि बजट दस्तावेज कोई साधारण दस्तावेज नहीं होता है बल्कि यह ऐसी आने वाली योजनाओं को दर्शाने वाला एक दस्तावेज होता है जिसके माध्यम से राज्य में खुशहाली आती है, जीवन स्तर मे सुधार होता है, समृद्धि आती है और राज्य की आर्थिक उन्नति होती है[R20] ।
इन सबके लिए यह चीज सबसे जरूरी है कि उस राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरे और व्यक्ति की स्थिति सुधरे, प्रति व्यक्ति आय बढ़े।जब तक प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ेगी तब तक हम स्थिति में सुधार नहीं ला सकते हैं।आज बिहार में प्रति व्यक्ति आय बहुत कम है, वित्तमंत्री जी के पास इसके दस्तावेज होंगे।आज बिहार में प्रति व्यक्ति आय ३,७५७ रूपए है। पड़ोसी देश उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय ६,६३५ रूपए, उङीसा में प्रति व्यक्ति आय ७०३९ रूपए, बंगाल में ११,३८९ रूपए प्रति व्यक्ति आय है। अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो प्रति व्यक्ति आय १२,२२६ रूपए है जिसमें सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय १७,३२६ रूपए पंजाब की है। अगर किसी राज्य की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय ३,७५७ रूपए है तो आप उस राज्य की आर्थिक उन्नति की बात नहीं सोच सकते हैं। २३ मई, २००५ को बिहार विधानसभा भंग हुई। इस साल का यह जो बजट माननीय वित्तमंत्री जी ने पेश किया है वह १९,१२८.९७ करोड़ रूपए का है, जिसमें १९१३४.८२ करोड़ रूपए अर्थात लगभग पांच करोड़ रूपए का अन्तर या घाटा दिखाया गया है। अब यह घाटा आप कैसे पूरा करेंगे? इसके अलावा गैर-योजना मद में जो एक्सपेंडिचर है, वह योजना मद से तीन गुना अधिक है। किसी भी राज्य के विकास के लिए, जब तक आप उसके खर्च की गैर-योजना मदों में कटौती नहीं करेंगे, तब तक आप योजना मद को लागू नहीं कर सकते हैं।इसलिए मैं चाहूंगा कि वित्तमंत्री जी अपने जवाब में इसकी जानकारी दें।वित्तमंत्री जी इसको बताएं क्योंकि व राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद से यह केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है, वित्तमंत्री जी की जिम्मेदारी है। वित्तमंत्री जी यह बताएं कि बिहार में गैर-योजना मद में कैसे कटौती करेंगे?
किसी भी बजट का पूरा आधार उस राज्य का विकास होता है और विकास के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर आवश्यक है।इंफ्रास्ट्रक्चर में रोड्स, बिजली, विद्यालय, शिक्षा और कानून-व्यवस्था शामिल है और इन सभी के अभाव के कारण बिहार की आज यह स्थिति है।अभी हमारे सम्मानित साथी श्री गणेश प्रसाद सिंह जी बोल रहे थे कि वहां विद्यालय नहीं हैं, सड़कें नहीं हैं, अस्पताल नहीं हैं, लेकिन उनकी पार्टी ने वहां जो १५ साल तक शासन किया उसका लेखा-जोखा उन्हें बताना चाहिए था कि आपने इन १५ सालों में क्या किया? बिहार की इस बदहाली के लिए उनकी पार्टी का १५ साल का कुशासन जिम्मेदार है।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया चेयर को सम्बोधित करके बोलिए।
श्री राजीव रंजन सिंह ‘ललन’ : एनडीए के शासनकाल में जितना पैसा बिहार को दिया गया, उतना पिछले ५० सालों में नहीं दिया गया। इस पर अलग से चर्चा हो सकती है। बिहार में जहां १५ साल पहले सड़क थी, अब वहां गढ्ढे हैं, वह सड़क अब गढ्ढे में तब्दील हो चुकी है। वहां जो विद्यालय भवन थे, अब वह ढह चुके हैं। आज बिहार के ९५ प्रतिशत से अधिक हाईस्कूल भवनविहीन हो चुके हैं। १५ साल पहले जो भवन था, वह आज खण्डहर में बदल चुका है।
आज बिहार में बिजली का उत्पादन मात्र ३० मेगावाट है। बिजली किसी राज्य के विकास के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।आप इससे उस राज्य के विकास की कल्पना कर सकते हैं कि वहां कितना विकास होगा।बिहार में आज जो कानून-व्यवस्था की बदतर स्थिति बन रही है, उसका कारण इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। माननीय सदस्य श्री रामेश्वर ओरांव जी बिहार में पुलिस अधिकारी रह चुके हैं, अभी-अभी उन्होंने नक्सलवाद की चर्चा की है।आज बिहार में नक्सलवाद कानून-व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। आज बिहार में अनेक जिले ऐसे हैं जहां पुलिस का प्रशासन तंत्र नहीं है। वहां कोई पुलिस प्रशासन नहीं चलता है। गृहमंत्री जी यहां बैठे हुए हैं। इन क्षेत्रों में समानान्तर प्रशासन चल रहा है, इसका कारण यह है कि वहां विकास नहीं है। वहां जो गरीबी है, वह बढ़ती ही जा रही है। इसलिए आज बजट में वित्तमंत्री जी को यह चाहिए कि वे बताएं कि बिहार में सुधार कैसे आएगा? केन्द्र प्रायोजित योजना है। पिछली बार बजट के समय उत्तर देते हुए वित्तमंत्री जी ने कहा था कि राज्य में हम इतनी योजनाएं ला रहे हैं। माननीय ग्रामीण विकास मंत्री जी यहां बैठे हुए हैं। अभी आधे घण्टे पहले मैं उनसे चर्चा कर रहा था। मैंने कहा कि केन्द्र की जितनी भी योजनाएं हैं चाहे वह राष्ट्रीय समविकास योजना हो, इन्दिरा आवास योजना हो या सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना हो, उसका केवल २५ से ३० प्रतिशत बजट ही खर्च हो रहा है।[cmc21]
हर एक हफ्ते के बाद हम वहां के अखबारों में पढ़ते हैं कि केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने बिहार के प्रशासन को एक चिट्ठी लिखी कि खर्चा गोल है, लेकिन उससे क्या होगा। वहां पर प्रशासनिक तंत्र इतना बिगड़ चुका है कि पैसा खर्च नहीं हो रहा है इसलिए केन्द्र के पैस का उपयोग नहीं हो रहा है। वहां की सरजमीं पर उस पैसा को जो सदुपयोग होना चाहिए, जो विकास होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। यह हाल वहां पर केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं का है।
वित्त मंत्री जी आवश्यकता इस बात की है कि इन सभी चीजों पर गौर किया जाए। बिहार में सूखे का यह तीसरा साल है। यह ठीक है कि महाराष्ट्र में, खासकर मुम्बई में काफी बारिश हुई है और लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। इसलिए वहां मदद की जरूरत है, क्योंकि मुम्बई आर्थिक राजधानी होने के कारण देश को काफी राजस्व देती है। लेकिन बिहार तीन साल से सुखाड़ की स्थिति में है। वहां पर बारिश नहीं हो रही है। आप सुखाड़ से निपटने के लिए कौन सी तैयारी कर रहे हैं? यहां पर गृह मंत्री जी बैठे हैं, जो प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के विभाग के भी प्रभारी हैं। हम सरकार से जानना चाहते हैं कि वह स्पष्ट करे कि बिहार की जनता को इस सुखाड़ की विभीषिका से निजात दिलाने के लिए वह क्या कर रही है?
यूपीए की सरकार और कांग्रेस पार्टी लगातार कहती है कि हम अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए वचनबद्ध हैं। बिहार जिस पार्टी का पिछले १५ साल शासन रहा, उसने कहा कि वह अल्पसंख्यकों की रक्षा करती है। यहां शकील साहब बैठे हुए हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि वह बताएं कि बिहार में मदरसों की क्या हालत है? अगर उन्हें इसका एहसास है तो बताएं कि वहां अल्पसंख्यकों की स्थिति कैसी है और वह उनकी माली हालत सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं? जब तक उन लोगों में शिक्षा का स्तर नहीं सुधारेंगे, उनके जीवन स्तर को नहीं सुधारेंगे, तब तक उन लोगों को तरक्की के रास्ते पर नहीं लाया जा सकेगा। भले ही आप सेक्युलर और कम्युनलिज्म का नारा देकर अल्पसंख्यकों के वोट लेने का प्रयास करते रहें, लेकिन इससे उनका विकास नहीं हो सकेगा। गृह मंत्री जी को मालूम है कि बिहार में कानून व्यवस्था की क्या स्थिति है। वहां उसका दुरुपयोग हो रहा है, जबकि वहां राष्ट्रपति शासन है। मैं बताना चाहता हूं कि वहां की कानून व्यवस्था का पूरी तरह से इस्तेमाल अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ किया जा रहा है। बिहार में श्रीमती लेसी सिंह, जो भंग विधान सभा की सदस्या हैं और पहले भी विधान सभा की सदस्या रह चुकी हैं, उनके पति की हत्या कर दी गई। लेकिन हत्या की जांच निष्पक्ष रूप से नहीं हुई। जब हम लोगों ने काफी हल्ला किया, तब सीबीआई से जांच कराई गई। जो लोग अपराधी पाए गए, वे अब जमानत पर हैं। वे अपराधी किस राजनीतिक दल से सम्बन्धित हैं, मैं उसका यहां जिक्र नहीं करना चाहता, क्योंकि पुरा बिहार इस बात को जानता है। लेकिन उनके पकड़े जाने के बाद नतीजा यह हुआ कि पूरा पुलिस प्रशासन श्रीमती लेसी सिंह को हर पांच दिन के बाद किसी न किसी केस में फंसाकर एफआईआर दर्ज कराने में जुटा हुआ है। गृह मंत्री जी चाहें तो इसका पूरा विवरण पूर्णिया के एस.पी. से और प्रशासन से ले सकते हैं। इससे उन्हें भी मालूम हो जाएगा कि बिहार में किस तरह से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ कानून व्यवस्था का इस्तेमाल हो रहा है। बजट तो पास होना ही है। वहां पर राष्ट्रपति शासन हम सभी की मजबूरी है, लेकिन वित्त मंत्री जी जब अपना जवाब दें, तो वह बिहार की जनता को आश्वस्त करें कि जो कुछ भी वहां राष्ट्रपति शासन के नाम पर पिछले चार महीने से चल रहा है, जो लूटपाट और अंधेरगर्दी चल रही है, उस पर नियंत्रण पाएंगे, उस पर केन्द्र की नजर रहेगी, तब यह बजट यहां पास किया जाए।
SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Hon. Deputy-Speaker, Sir, I stand to support broadly the Budget for the State of Bihar for 2005-06 and the Demands for Grants in respect of the Budget.
Now, Bihar is under the President’s Rule and this august House also endorsed the extension of the President’s Rule. So, the situation existing in Bihar, the present problem of Bihar and the socio-economic condition of Bihar have been dealt with at length during the discussion. I am not going into that. But, Sir, while I am standing to support the Budget, I must express some reservations and some dissatisfactions in some aspects[R22] .
Bihar is a State of immense potentiality but still Bihar is a backward State in terms of irrigation, in terms of poverty alleviation, in terms of employment, electricity, road connectivity and so on. Bihar is now facing the problem of extremism. It is agreed by all, it is accepted by all, that poverty and backwardness are the breeding grounds of extremism. So far as the UPA Government is concerned, they have a concrete commitment for implementation of the social programmes. But to my mind, what is missing in this Budget is the priority. What has been taken as priority for development of the State of Bihar is missing at this present juncture.
Irrigation is the main problem. It is known to all that Bihar is a State of diversity in climate. In the northern part of Bihar, around 18 districts are prone to flood and the rest of Bihar, especially the southern part of Bihar is a drought-prone area. Most of the rivers in the northern area of Bihar are coming from Nepal. So some sort of initiatives should be taken by the Union Government at the time of flood so that Bihar can be saved from the problem of flood, and this problem can be solved. So, my appeal to the Union Government is to give thrust to the social aspects. While the Minister is going to reply, he should clarify what is the main priority that has been taken for preparing this Budget and the Demands for Grants.
Once again I thank and I support the Demands for Grants on Account in respect of Budget for the State of Bihar.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, Shri Vijoy Krishna. You have only two minutes.
श्री विजय कृष्ण (बाढ़) : उपाध्यक्ष महोदय, बिहार बहुत बड़ा है और बिहार के बारे में बहुत सारी बातें माननीय मित्रों ने कही हैं। हमारे मित्र श्री ललन जी यहां बोल रहे थे और सबसे ज्यादा डाटा लेकर खड़े थे। इन्हीं लोगों ने सबसे ज्यादा बिहार का बंटाधार करने का काम किया, बिहार को विभाजित करने का काम किया। एनडीए की सरकार ने उसमें पहल की और बिहार को जो विशेष पैकेज दिया जाना था, उसको देने का काम नहीं किया। उस दल की रहनुमाई में काम करने वाले माननीय सदस्य उग्रवादी इलाकें में जो सामंतवादी शक्तियां हैं उनका प्रतनधित्व करते हैं। उनको संरक्षण देने वाले ही जब उग्रवाद पर बोलते हैं तब बड़ा आश्चर्य होता है और पता चलता है कि किस ओर ये देश को ले जाना चाहते हैं। … (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down. You have already spoken.
श्री विजय कृष्ण : ये उस बिहार को नहीं जानते हैं जो चाणक्य का बिहार है, पाटलिपुत्र का ऐतिहासिक बिहार है और जिस बिहार ने गांधी को महात्मा गांधी बनाया। ये उस बिहार की बात नहीं करते हैं जिसके लोगों ने मारीशस से लेकर सुदूर देशों तक हिंदी को बढ़ाया। ये उस बिहार को जानते हैं जिसमें जाति-प्रथा और उग्रवाद है क्योंकि ये उन्हीं शक्तियों का प्रतनधित्व करते हैं। मैं आरोप-प्रत्यारोप में जाना नहीं चाहता हूं।
बिहार में आज बाढ़ की स्थिति बहुत भयानक है। बिहार कभी बाढ़ और कभी सुखाड़ से ग्रसित होता है। नेपाल की नदियों से जो पानी आता है, उससे बिहार में बाढ़ आती है जो भयंकर कहर ढहाती है। बराबर चर्चा चलती है कि केन्द्र सरकार बिहार और उत्तर प्रदेश को मिलाकर इसका कोई रास्ता निकाले जिससे बाढ़ की स्थिति से निपटा जा सके। इसे जल्दी किया जाना चाहिये।
बिहार का बड़ा हिस्सा जो सुखाड़ से ग्रसित है, जिसमें टाल-चौर, विशेषकर मोकामा, बडहिया, फतुआ का टाल क्षेत्र शामिल है, वहां पर ४-६ महीने तक जाना मुश्किल होता है। मैं जानना चाहता हूं कि उस इलाके के लिए कोई विशेष योजना है या नहीं ?
दियारा की पुरानी समस्या है और अनेक दियारा क्षेत्र हैं। बक्सर से पटना, पटना से दानापुर, दानापुर से बाढ, बाढ से भागलपुर, भागलपुर से फरक्का के कई दियारा खंडों को अलग-अलग खंडों में बांटकर दियारा विकास बोर्ड का गठन किया जाना चाहिए। बिहार की समस्याओं में एग्रीकल्चर और सिंचाई के विषय में अगर आप कारगर उपाय कर सकेंगे, तभी हम आगे बढ़ सकते हैं। बिहार के विद्युत संकट से उबरने के लिए बिहार में कांटी और बरौनी जैसे विद्युत उत्पादन की इकाइयों का विस्तार किया जाना चाहिए[r23]
महोदय, जो मरणासन्न बरौनी विद्युत इकाई उसे बढ़ावा मिलना चाहिए। जो बाढ़ की एनटीपीसी है, उसे शीघ्र आगे बनना चाहिए।नवीनगर का मामलाठीक होना चाहिए, तभी हम बिजली के इन्फ्रास्ट्रक्चर को आगे बढ़ा सकते हैं। आज पूरा बिहार बिजली के संकट से जूझ रहा है।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं यह भी कहना चाहता हूं कि बिहार में जो थोड़े-बहुत केंद्रीय उपक्रम हैं, वे सभी बर्बादी के कगार पर पहुंच चुके हैं। ये किस कारण से बर्बादी के कगार पर पहुचे, यह आज चर्चा का विषय नहीं है। भारत वैगन ओकामा के बारे में आप जानते हैं, जो भारी उद्योग मंत्रालय का उपक्रम है। आज वह वनिवेश के कगार पर है। मैं रेल मंत्री जी को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने रेल डिब्बे बनाने का उसको आर्डर दिया और वहां के कर्मचारियों को वेतन भुगतान कराने का काम किया। इसी तरह के अनेक उपक्रम बिहार में हैं, उनको बचाने की कोशिश होनी चाहिए। बहुत सी बाते हैं, मैं समझता हूं क पड़ाव पर पड़ा हुआ उनके बिहार का सवाल है। इस सवाल को आरोप-प्रत्यारोप में नहीं लिया जाना चाहिए और बिहार का जो दर्द और पीड़ा है, उस दर्द और पीड़ा के साथ हमको और आप सभी को एक रास्ता बनाकर आगे बढ़ना चाहिए।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, the hon. Finance Minister.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Silence please.
THE MINISTER OF FINANCE (SHRI P. CHIDAMBARAM): Sir, I am grateful to the hon. Members for this brief but a useful debate on the Bihar Budget.
Sir, it was not our intention to come back to this House again when we first presented the Budget and asked for a Vote on Account in May. But for reasons explained by the hon. Home Minister in the earlier debate, since elections cannot be held in the next couple of months, we have to come back to this House and ask for another Vote on Account. The problems of Bihar cannot be solved in this House. The problems of Bihar can be solved only by the people of Bihar, their elected representatives in their elected House. Therefore, while I sympathize with what hon. Members have said, for the present all that I can say is that we are doing our best to ensure that in the interim, development does not suffer in Bihar.
Sir, what are we spending the money on? What have we outlayed the money on? The bulk of Plan expenditure, which according to the Annual Plan is Rs. 5,230 crore, the bulk of it is for energy, primary and adult education, rural development, road construction, water resources, urban development and social welfare. In the Budget for 2005-06, there are some positive features. Firstly, the Annual Plan outlay has increased from Rs. 5,531 crore to Rs.6,087 crore. The State’s share in Central taxes will increase from Rs. 9,116 crore last year to Rs.10,479 crore this year. Likewise, grants from the Central Government to the State Government will increase from Rs.3,889 crore to Rs. 4,359 crore.
As you are all aware, only some States got specific grants for health and education, Bihar in a way that is not very complimentary, has got a Special Grant both for health and education[t24] .
Money [e25] is not a constraint for the development of Bihar. In fact, I regret to say that some of the criticism is valid. In the first three months, the expenditure has been very low. The reason could partly be that the Budget and the Vote on Account were approved only in May and there was an uncertainty about whether the elections would be held immediately or elections would be held only in October-November. But I shall certainly request the Governor and advise the Bihar Administration that they must step up the expenditure. In the first three months, the expenditure is only a little over five per cent and that is unacceptable. I would certainly advise the Governor and I would certainly request the Governor and his Administration to step up the outlay and the expenditure.
14.46 hrs. (Shri Giridhar Gamang in the Chair)
Sir, I am told that some good programmes are underway, some initiatives have been taken and that the results of these initiatives would be visible in the next few months. Under the Indira Awas Yojana, against a target of 1,65,062 houses, up to June, 28,792 houses have been constructed.
SHRI RAJIV RANJAN SINGH ‘LALAN’ : But it is a very low percentage.
SHRI P. CHIDAMBARAM: I said so. I said, it is low.
I am giving a few examples. Under the NABARD Schemes, under RIDF, funds have been provided for rural roads: Rs. 5.89 crore for an RCC bridge on Falgu river in Gaya district; Rs. 2.13 crore for an RCC bridge on Mohu river in Gaya district; and Rs. 2.13 crore for an RCC bridge on Bhutahi river. Rs.70 crore have been allotted for 625 kilometres of roads.
In the energy and power sector, 18 grid sub-stations have been taken up for upgradation under the Rashtriya Sam Vikas Yojana. The Power Grid Corporation is implementing 1,100 kilometres of transmission lines. Under the APDRP, Rs. 866 crore have been allotted for projects for upgradation and strengthening of the distribution sector. This is being implemented by the Power Grid Corporation. Under rural electrification, 36 districts have been taken up for 100 per cent electrification on turnkey basis by the Power Grid Corporation. There are therefore some initiatives which have been taken up. While I could see that the utilisation is low, I sincerely hope that the pace would pick up and I would advise the Governor to do that.
The constraint in Bihar is not money, as I said, but we must aim to improve governance. I have no doubt that the people of Bihar would vote their representatives, would constitute an Assembly as early as possible, and the new Government would provide good governance. As far as the Centre is concerned, we are extremely sympathetic to Bihar. As you would find, under every head of expenditure, Bihar gets its share; in fact, in the eyes of some of the States, Bihar sometimes gets more than its share. The Twelfth Finance Commission has been generous to Bihar[e26] .
Money is not a constraint and I am aware that Bihar today has adequate cash balances to spend. They should spend the money. They should quicken the pace of implementation and I shall certainly convey the sentiments of this House to the Governor and his administration.
SHRI RAJIV RANJAN SINGH ‘LALAN’ : Sir, do you want to constitute a monitoring cell here, in your Ministry, to monitor the expenditure in Bihar?
SHRI P. CHIDAMBARAM : Well, all I can say is that I will ask for periodic reports from the Government of Bihar on the pace of expenditure and if it is possible I shall try to visit Bihar once to see which are the Departments which need to be galvanised in order to quicken the pace of the expenditure.
SHRI RAJIV RANJAN SINGH ‘LALAN’ : Very good. Thanks.
SHRI P. CHIDAMBARAM : Sir, there is an additional Demand and you will find that more money is being sought in order to enhance the allocation under certain heads. When I will come to that, I will explain that.
While I am grateful to the hon. Members, I urge and request all of them to pass the Vote on Account. Thank you.
SHRI KHARABELA SWAIN(BALASORE) : Mr. Minister, thank you very much for your excellent comment.
MR. CHAIRMAN : I shall now put the Demands for Grants on Account (Bihar) for the year 2005-2006 to vote.
“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the third column of the Order Paper, be granted to the President, out of the Consolidated Fund of the State of Bihar, on account, for or towards defraying the charges during the year ending on the 31st day of March, 2006, in respect of heads of demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 1 to 4, 6 to 12, 15 to 27, 29 to 33 and 35 to 52.”
The motion was adopted.
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