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Discussion On The Salary Allowances And Pension Of Members Of … on 27 August, 2001

Lok Sabha Debates
Discussion On The Salary Allowances And Pension Of Members Of … on 27 August, 2001

14.17 hrs.

Title: Discussion on the Salary Allowances and Pension of Members of Parliament (Amendment) Bill, 2001. (Bill Passed).

MR. SPEAKER: Now, let us take up legislative business. Item no. 11: Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament Amendment Bill, 2001.

Hon. Minister of Parliamentary Affairs.

संसदीय कार्य मंत्री तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री (श्री प्रमोद महाजन):अध्यक्ष महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं:

“कि संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधनियम, १९५४ में और संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए। “अध्यक्ष महोदय, मैं आपकी अनुमति से संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन (संशोधन) विधेयक, २००१ बहस और पारित करने के लिए सदन के सामने रख रहा हूं। प्रारंभ में मैं संक्षेप में कुछ कहना चाहूंगा। सबसे पहली बात यह है कि सदस्यों के वेतन, भत्ता तथा पैंशन बढ़ाने का यह प्रस्ताव मैं किसी अपराध बोध के साथ नहीं कर रहा हूं। मैं मानता हूं कि यह आवश्यक है और आवश्यक होने के कारण पूर्ण विश्वास के साथ इस प्रस्ताव को मैं सदन के सामने रख रहा हूं, इसके पीछे किसी प्रकार का अपराध बोध हमें नहीं है कि हम कोई गलत बात कर रहे हैं। दूसरी बात मैं कहना चाहूंगा कि हमेशा जब यह विधेयक पिछले कुछ समय में सदन में आता था, तो सबसे पहली शिकायत होती थी कि यह अंतिम दिन आता है, देर रात को आता है, बिना बहस चुपके से पास किया जाता है। मैं समझता हूं कि इस विधेयक के द्वारा हम ऐसी कोई चीज नहीं कर रहे हैं जो हमें नहीं करनी चाहिए और इसलिए हम सदन में इसे इस सप्ताह के पहले दिन लाए हैं। आज जबकि अधिक महत्वपूर्ण काम सप्लीमैंट्री डिमांड का होने के बाद भी, हमने इसे जान-बूझ कर प्रथम क्रमांक पर रखा है ताकि जो बहस करना चाहें, समर्थन करना चाहें, विरोध करना चाहें, उसकी बहस हो और सोच-समझ कर पास हो। बिना बहस, जल्दबाजी में फैसला करने की आवश्यकता नहीं है, कोई गलत फैसला करना हो तब करना चाहिए, अगर सही फैसला कर रहे हैं तो इस प्रकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा यह कर्तव्य है जबकि सब जानते हैं कि विधेयक में क्या है फिर भी पद्धति के अनुसार मुझे यह बताना आवश्यक है कि विधेयक में क्या है। सबसे पहले कानून का परिवर्तन केवल तीन मुद्दों पर हो रहा है और एक संशोधन आ रहा है। एक, वेतन को ४,००० रुपये से १२,००० रुपये कर रहे हैं। प्रतदिन भत्ता जो ४०० रुपये मिलता है, उसे ५०० रुपये कर रहे हैं और जो ६.०० रुपये प्रति किलोमीटर माइलेज मिलता है, उसकी जगह ८.०० रुपये प्रति किलोमीटर कर रहे हैं। वैसे कानून के अन्तर्गत इतना ही संशोधन कर रहे हैं। मैं एक संशोधन बाद में सदन की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं जिसमें ढाई हजार रुपये जो मूल पेंशन है, उसे ३,००० रुपये तक बढ़ा रहे हैं और प्रति वर्ष जो ५०० रुपये बढ़ती है, उसकी जगह ६०० रुपये कर रहे हैं। लेकिन उसके साथ जिन चीजों में, जैसे मैंने कहा, संशोधन आवश्यक नहीं है लेकिन जानकारी आवश्यक है कि निर्वाचन क्षेत्र का भत्ता ८००० रुपये से १०,००० रुपये, कार्यालय भत्ता ९,५०० रुपये से १४,००० रुपये, मुफ्त बिजली यूनिट २५००० से ५००००।

उनको जो जल मिलता है, उसे दो हजार किलोलीटर से चार हजार किलोलीटर कर रहे हैं। टेलीफोन के लिए हम एक छोटी सी सुविधा दे रहे हैं कि जिनके चुनाव क्षेत्र एक हजार किलोमीटर से अधिक दूर हैं, उनको हम २० हजार अतरिक्त मुफ्त स्थानीय टेलीफोन कॉल्स दे रहे हैं। हालांकि इसका मेरे आई.टी. मनिस्टर होने से कोई सम्बन्ध नहीं है लेकिन इसके साथ-साथ हम सदस्यों को मोबाइल फोन उपलब्ध करा रहे हैं। बहुत सारे अखबारों में चर्चा में यह लिखा गया है कि इस मोबाइल फोन पर हम एक लाख कॉल्स ज्यादा दे रहे हैं, इसको सब ने ग्राहय मानकर चर्चा शुरू की। हमने कोई कॉल नहीं बढ़ाई, जो हमें एक लाख कॉल मिलते हैं, जो संसद भवन से एक हजार किलोमीटर के अन्दर रहते हैं, उनको एक लाख कॉल ही मिलेंगी। वे एक लाख कॉल जो आज हमारे घर के और यहां के टेलीफोन पर विभाजित हैं, उसमें एक और विभाजन हो जायेगा। उसमें मोबाइल फोन और आ जायेगा। इसलिए २५-३० हजार रुपये खर्च किया गया, तो वह एक्स्ट्रा नहीं कर रहे हैं। लेकिन बहुत सारे समाचार-पत्रों ने बिना पढ़े ही लिख दिया और उसकी आलोचना भी की कि एक लाख नई क़ॉल्स दे रहे हैं तो मुझे लगा कि सबसे पहले मैं बताऊं कि एक लाख नई कॉल्स हम नहीं कर रहे हैं।

सबसे पहली बात जो मुझे लगती है और शायद समाचार पत्रों की आलोचना में छूट गई है कि पहली बार इस बार संसद अपने आपको बांध रही है कि अगली बढ़ोतरी पांच साल के अन्दर नहीं होगी और इसलिए पहली बार हमने ऐसा किया है। इसके पहले कभी भी जब संशोधन इस विधेयक में हुए तो यह नहीं कहा गया कि हम कभी नहीं करेंगे या कोई तथि तय नहीं की और जैसे जब मन में आता था, होता था। हमने यह कहा है कि लोक सभा में केवल एक बार होना चाहिए और एक बार का अर्थ यह है कि पांच साल में एक बार ऐसा होनी चाहिए और इसलिए पहली बार हम इसमें अपने आपको पांच साल के लिए बांधे दे रहे हैं। वैसे यह टर्म पांच साल चलेगी, इसलिए हमने उसको १९९९ से २००४ तक बांध लिया है। वैसे लिखा तो इसमें पांच वर्ष है।

इसकी सबसे बड़ी जो आलोचना होती है और मुझे लगता है कि शायद उसमें थोड़ा सा वजन आता है कि लोगों को यह शिकायत होती है कि यह कौन सा तरीका है कि संसद सदस्य अपना वेतन भत्ता खुद ही बढ़ाते हैं। अब आलोचना ठीक है कि किसी आदमी को खुद ही तनख्वाह बढ़ाने का अधिकार हो, लेकिन बहुत से विद्वान लोग भी इस बात को नहीं जानते हैं कि यह संविधान में व्यवस्था है। यह व्यवस्था कोई इस सरकार ने या उस सरकार ने नहीं की है। संविधान निर्माताओं ने संविधान लिखते समय अनुच्छेद १०६ बनाया और जिसके अन्तर्गत संविधान निर्माताओं ने यह कहा कि संसद सदस्यों को समय समय पर जो वेतन या भत्ता देना पड़ेगा, उसका फैसला संसद करेगी और हो सकता है कि संविधान के निर्माताओं को लगा कि संसद सार्वभौम होने के कारण और संसद सदस्य उस सार्वभौमत्व के प्रतीक होने के कारण उनका फैसला कोई और बाहर से करे, यह कम से कम उस समय संविधान निर्माताओं को उचित नहीं लगा। उसके कारण यदि किसी को यह पद्धति बदलनी है तो पहले तो हमें संविधान के अनुच्छेद १०६ को हटाना पड़ेगा। संविधान से पूरी की पूरी धारा हटाने का, संविधान संशोधन का यह शायद पहला अवसर होगा, क्योंकि संविधान में संशोधन तो होते रहे हैं, मैं उसका विशेषज्ञ तो नहीं हूं, लेकिन पूरा का पूरा अनुच्छेद ही हट जाये, यह करने की जरूरत नहीं है। इसको किसी और प्रक्रिया से किया जाये, यह पहला अवसर होगा। लेकिन मैं उसके साथ-साथ यह कहना चाहता हूं कि यदि कोई और पद्धति बनानी है तो सरकार को इस पद्धति पर कोई आपत्ति नहीं है। क्योंकि अभी तो पांच साल का समय अपने पास है, यदि कोई पद्धति आम सहमति से बने तो उस पद्धति पर हमें कोई आपत्ति नहीं है, उसके द्वारा हम सदस्यों के वेतन और भत्ते को तय कर सकते हैं, लेकिन आज हमको इस बात का अपराधबोध होने की आवश्यकता नहीं है, इस बात के लिए शर्मिन्दगी महसूस करने की आवश्यकता नहीं है कि हम अपना वेतन खुद ही क्यों बढ़ा रहे हैं, क्योंकि संविधान निर्माताओ ने यही व्यवस्था की है। संसद में २४ बार से यही हो रहा है और अब २५वीं बार होगा। अगर आगे चलकर यह व्यवस्था बने, जिसमें आम सहमति बने, क्योंकि संविधान संशोधन तो दो तिहाई बहुमत से होगा और अगर सभी राजनैतिक दल मिलकर कोई एक और पद्धति बताते हैं, जो सब को मंजूर हो तो पद्धति बदलने में हमें कोई गलती नहीं लगती, हम उसके लिए तैयार हैं।

लेकिन जब तक हम कर रहे हैं, मुझे लगता है कि इसमें गलत कुछ भी नहीं है। यह सब कानून के अंतर्गत जो पद्धति है, उसकी मदद करने के लिए संसद की एक सर्वदलीय समति होती है। इस बार उसके अध्यक्ष मेरे मित्र श्री के.पी. सिंह देव हैं। उनकी अध्यक्षता में इस समति ने यह रिपोर्ट बनाई थी। उन्होंने भी श्री प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में एक छोटी सी उपसमति बनाकर इस पर चर्चा की। उसने जो सिफारिशें दी हैं, मुझे राजनीति नहीं करनी है, लेकिन यह एकमत से दी हैं। इसलिए सदन में आकर किसी का मत परिवर्तन हो सकता है। लेकिन इस समति में सभी दलों के सदस्य थे। जहां तक मुझे जानकारी है, गलती करूं तो मैं क्षमा चाहूंगा, किसी भी दल के किसी भी सदस्य ने वहां कम से कम किसी प्रकार का यह विरोध नहीं जताया कि यह नहीं करना चाहिए। इसलिए .यह एकमत से रिपोर्ट आई है।

अध्यक्ष जी, दो-तीन छोटे-छोटे मुद्दे और हैं, जिनकी यहां मैं चर्चा करना चाहूंगा। कई बार समाचार पत्रों ने लिखा है कि १२ हजार रुपए तनख्वाह कर दी। जैसा मैंने कहा कि हम पहली बार अपने आप को पांच साल के लिए बांध भी रहे हैं। इसके अलावा पहली बार संसद सदस्य अपने वेतन पर आयकर देंगे। अगर हम चाहते या के.पी. सिंह देव जी चाहते तो हम पुराना रास्ता अपना सकते थे कि अपने भत्ते बढ़ा लेते और तनख्वाह वही चार हजार रुपए ही रहती और उस पर आयकर भी नहीं लगता। लेकिन हमने कहा कि यह जरूरी नहीं है। अगर तनख्वाह बढ़ानी है, सारी दुनिया आयकर देती है, संसद सदस्य भी दें, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है। अगर दोनों सदनों में यह विधेयक मंजूर हो जाता है तो पहली बार ऐसा होगा कि हर संसद सदस्य अपने वेतन पर आयकर देगा। पहले हो सकता है कुछ सांसद देते हों या न देते हैं। हमें लगेगा कि चार हजार रुपए से १२ हजार रुपए एकदम कैसे हो गए। मैं कहना चाहता हूं कि १२ हजार रुपए अपने आप में कोई ज्यादा रकम नहीं है। हम लोगों से एक और शिकायत होती है कि हम तनख्वाह तो बढ़ा लेते हैं, लेकिन काम नहीं करते हैं। अभी संसद का वर्षाकालीन सत्र चल रहा है। अध्यक्ष जी, आपने अभी निर्णय लिया है लक्ष्मण रेखा का, कि कोई भी सांसद वैल में नहीं आएगा। लेकिन कभी-कभी लक्ष्मण रेखा उसको भी कहते हैं, जिसके अंदर जाने से रामायण होती है। इसलिए यह बालयोगी रेखा है या लक्ष्मण रेखा है, यह तो बाद में तय करना पड़ेगा। लेकिन यहां आपने जो निर्णय लिया है, वह सही और अच्छा निर्णय है। सदन का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाए, मैं इस मत का हूं, लेकिन काफी समय एडजोर्नमेंट में गया है। मैं उन लोगों को बताना चाहता हूं कि इस सत्र में २७-२८ घंटे एडजोर्नमेंट में गए, इसका हमें दुख है। इसके कारण अगर हम वेतन वृद्धि करते हैं तो जनता को शिकायत होती है। लेकिन जनता को या पत्रकारों को इस बात का पता नहीं है कि जैसे २८ घंटे एडजोर्नमेंट में गए, वैसे ही हमने कल तक छ: बजे के बाद बैठकर करीब साढ़े २७ घंटे अधिक काम भी किया है, लेकिन यह किसी के ध्यान में नहीं है। मैं किसी एडजोर्नमेंट का समर्थन नहीं करूंगा, वह नहीं होना चाहिए। हमें ज्यादा देर तक बैठना चाहिए। अगर हिसाब की बात करें तो जहां २७ घंटे एडजोर्नमेंट में गए, वहीं हम छ: बजे के बाद रात को दस-दस बजे तक बैठे हैं और काम किया है।

दूसरी बात मैं यह कहना चाहूंगा कि आज किस तरह से मीडिया के बंधु संसद सदस्यों के काम की व्याख्या कर रहे हैं। मेरी राय में यह सही नहीं है। सासंद का काम दिन भर यहां बैठकर दूसरों के भाषण सुनना ही नहीं है। यह नहीं है कि हम स्कूल के बच्चे की तरह ११ बजे आएं और छ: बजे चले जाएं। हम इसके अलावा भी काम करते हैं। आप देखें हमेशा हमारे अखिलेश सिंह जी सुबह दस बजे आकर यहां सबसे पहले नोटिस देते हैं। इसका मतलब है कि वे सबसे पहले उठते होंगे और सबसे पहले अखबार पढ़ते होंगे, कागज तैयार करते होंगे। उनकी डयूटी तो सुबह ११ बजे से कहीं पहले शुरू हो जाती है।

श्री सोमनाथ चटर्जी (बोलपुर): सबसे पहले गले की भी तैयारी करते होंगे।

श्री प्रमोद महाजन : सही है कि गले की भी तैयारी सबसे पहले करते होंगे। संसद सदस्य ११ बजे के पहले भी काम करता है और छ: बजे के बाद भी करता है। सिर्फ यहां आकर बैठना और भाषण सुनना ही काम नहीं है। वह यहां लोगों से मिलवाता है। अपने चुनाव क्षेत्र में जाता है तो लोगों से मिलता है। ये भी ऐसे काम हैं जिनकी हमें तनख्वाह मिलती है। ऐसा नहीं सोचें तो मैं समझता हूं यह संसद सदस्यों के साथ अन्याय होगा। मैं बहुत ज्यादा समय नहीं लूंगा। हर मिनट का यहां खर्चा होता है।

इसलिए मैं पैसा देते समय खर्चा नहीं करूंगा लेकिन यह ४००० रुपये से १२००० कैसे हुआ, इस पर मैं थोड़ा सा विश्लेषण करना चाहूंगा। जैसा मैंने कहा कि तनख्वाह हमारी कितनी बार बढ़ी?मैं जब यह बिल कर रहा था तो मैंने पढ़ा कि १ जून १९५४ को जब पहली बार संसद सदस्यों की तनख्वाह तय हुई तो उस समय ४०० रुपये महीना तनख्वाह थी और भत्ता २१ रुपये था। उस समय २१ रुपये भत्ता था। मैंने पूछा उस समय रुपये की कीमत क्या थी तो हमारे अधिकारी ने बताया कि उस समय ४०० रुपये तनख्वाह थी और तब ८० रुपये सोवरन सोना था। मैंने कहा कि यह सोवरन सोना क्या होता है तो उन्होंने बताया कि जो ८ ग्राम सोना होता है, उसे सोवरन सोना कहते हैं और आज ३६०० रुपये सोना है। जो लोग १९५४ में लोक सभा के सदस्य थे, उन पर हम जैसा आरोप भी नहीं लगाया जा सकता कि वे सुविधा भोगी थे। हम पर पत्रकार आरोप लगा सकते हैं कि हम सुविधा भोगी हैं लेकिन १९५४ में जब ४०० रुपये की तनख्वाह तय हुई होगी तो वे सारे स्वतंत्रता के आंदोलन से निकलकर आये हुए लोग थे। अब यह १२००० रुपये कैसे हुई और मैं के,पी,सिंह देव जी की कमेटी को बधाई देना चाहूंगा कि १२००० का आंकड़ा कैसे रहा क्योंकि आज तक जो तनख्वाह बढ़ी है, उसका कोई नियम नहीं है। दस साल के बाद ५०० रुपये तनख्वाह कर दी, फिर ७-८ साल के बाद ७५० रुपये कर दी, उसके चार साल के बाद १००० हो गई, फिर १५०० हो गई और १५०० रुपये के ४००० कैसे हो रहे हैं, कुछ नियम नहीं है। जिसको जो लगा और जितना हो सके, इनकम टैक्स के अन्तर्गत रख दिया। पहली बार के.पी.सिंह देव जी और प्रणव मुखर्जी की समति ने इनको इंडेक्स के साथ जोड़ने का काम किया। उन्होंने कहा कि ४०० रुपये मूल तनख्वाह मानी जाये तो इस तनख्वाह को उस समय जो इंडेक्स था, वह आज के इंडेक्स से अगर हम तुलना करें तो नयी तनख्वाह ११९०० रुपये बैठती है। अगर ४०० रुपये को १९५४ के निर्णय को मूल निर्णय माना जाये तो वह ११९०० रुपये बनती है। फैसले में भी देर हुई औऱ ९०० रुपये अटपटा लगा तो इसलिए हमने १२००० तनख्वाह की है। इसलिए तीन गुना तनख्वाह हुई है, यह कहना भी एक तरह से पूर्ण सत्य नहीं है। पहली बार इंडेक्स के आधार पर तनख्वाह बढ़ाने की कोशिश हुई है और मुझे पूर्ण विश्वास है कि पाचं वर्ष के बाद फिर से बढायी जाएगी। इस १२००० को मूल तनख्वाह मानकर आज से पांच साल में जितना भी फर्क बढ़ेगा, इंडेक्स के अनुसार तनख्वाह बढ़ाई जाएगी। पहले यह शिकायत आने लगी कि तनख्वाह इस प्रकार क्यों बढ़ी और इसलिए तनख्वाह १२००० बढ़ाने का यही मूल कारण है। जहां तक भत्ता और कांस्टीटयूएंसी एलॉउंस का संबंध है, १९९८ में तब ४०० रुपये भत्ता मिलता था और २००१ में तीन साल के बाद हम पुनर्विचार कर रहे हैं तो १०० रुपये बढ़ाना मेरी द्ृष्टि से कोई बहुत बड़ा आंकड़ा हुआ है, ऐसा नहीं है।

अंत में छोटी सी बात मैं सदन के सामने रखता हूं। तनख्वाह के साथ जो सुविधाएं मिलती हैं, तो वे सुविधाएं हैं, वे एमनिटीज हैं। अब किसी पत्रकार ने लिखा कि प्रमोद महाजन जिस घर में रहता है, उसको अगर किराये पर लिया जाये तो दो लाख रुपया महीना देना पड़ेगा। अरे भई, अगर मैं सांसद चुनकर नहीं आता तो इस घर में रहने के लिए क्यों आता? मुझे क्या कोई काम बन पड़ा है कि मैं नॉर्थ एवेन्यू में भाड़े से घर लेकर रहूं?२००० कि.मी. से दिल्ली में रहने के लिए कोई आता है, हम कोई खुशी से रहने के लिए नहीं आते हैं। कोई कह सकता है कि आप जनता के सेवक हैं, आप फुटपाथ पर रहिए, आप किसी रिश्तेदार के यहां रहिए लेकिन घर मत रहिये। घर का कॉमर्शियल कितना बनता है, अगर कोई कंपनी किराये से लेती है तो कितना देती? उतना उसको मिलता है। नहीं मिलता है। किसी ने कहा कि बिजली का बढ़ गया। बिजली का पैसा क्या कोई हमारे हाथ में मिलता है? कि.मी. करने से पैसा हाथ में मिलता है क्या? जैसे टेलीफोन की बात होती है, किसी ने यह भी कह दिया कि उसमें एक टेलीफोन एक्सचेंज चलेगा। एक लाख टेलीफोन। मैंने हिसाब करने की कोशिश की, अध्यक्ष जी, मैं थोड़ा समय लेकर बात कह दूं ताकि इसके बारे में अगर कोई भ्रम हो तो दूर हो जाये। मैं मुम्बई से आता हूं।

मुम्बई से मैंने इसकी गणना की। एक लाख टेलीफोन का अर्थ क्या होता है। यदि मैं मुम्बई टेलीफोन करता हूं, तो दो सैकेंड की एक काल होती है। दो सैकेंड की काल के हिसाब से यदि मुम्ब्ई बातचीत करूं, एक लाख टेलीफोन सुविधा से मुम्बई नान-स्टाप बात करूं,, तो ६७ घन्टे बात कर सकता हूं। पूरे साल में ८,७५६ घन्टे होते हैं, तो उसकी एक परसेंट भी टेलीफोन सुविधा नहीं मिल रही है। टेलीफोन काल कोई पैसा नहीं है कि ७५ हजार कर दिया, तो पैसा दे रहे हैं। टेलीफोन काल एक सुविधा है। टेलीफोन काल तब की सुविधा है, जब एसटीडी नहीं थी। आज एसटीडी और आईएसटी की सुविधा है, कोई इस बात को मानें या न माने, यह जरूरी नहीं है कि टेलीफोन का उपयोग सिर्फ हम ही करते हैं। प्रियरंजन दासजी टेलिफोन का बिल लेकर आते हैं, कोई विवाद हो, तो अलग बात है। सब को मालूम है, आधे से ज्यादा टेलिफोन हम नहीं करते हैं। जो वोट देता है, उसको फोन न करने दे, तो क्या होगा, सबको मालूम है। रघुनाथ जी ने इसलिए वोट मांगा था कि एक काल भी करने नहीं देता है. फिर वह एक बार बात करना शुरु करता है, तो १०-१५ मिनट बोलता है। दो-चार हजार काल तो उसी में ही चली जाती है और इस प्रकार २०-२५ लोग सांसद के घर पर आ जायें और पांच-सात मिनट बात करें, तो एक लाख कब पूरा हो गया, पता नहीं लगता है। मुझे नहीं मालूम, कोई एक लाख में से सेविंग भी करता है। कोई सेविंग करने वाला हो, तो अलग बात है कि एक लाख काल के बजाये ७५ हजार काल हुई हैं।

अंत में, अध्यक्ष महोदय, मैं केवल इतना ही कह रहा हूं कि मैं कोई हमारी आत्मस्तुति नहीं करना चाहता हूं। वह मूर्खों का लक्षण है, लेकिन आत्म-निन्दा भी इतनी मत करिए कि बात आत्म-हत्या तक चली जाए कि हम कोई बहुत बड़ा पाप कर रहे हैं। मैंने एक बात शुरु से कही है, मैं यह विधेयक इस सदन के सामने विनम्रतापूर्वक लाया हूं, किसी अपराध बोध से नहीं लाया हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इतनी जरूरत सासंदों को है और इसी द्ृष्टि से यह विधेयक आपके समक्ष रखता हूं। आशा है, यह विधेयक सर्वसम्मति से पास हो जाएगा।

MR. SPEAKER: Motion moved:

“That the Bill further to amend the Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament Act, 1954, be taken into consideration.”

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI (RAIGANJ): Sir, on my behalf and on behalf of my party, we have gone through this Bill. We have gone through the recommendations of the Joint Committee and the time has now come to express our views regarding the Bill.

We are not opposing the Bill but I would like to tell as to why the media criticises us. For the last few years, or I should say over the years, the general perception among the people, not by a particular party, is that politicians are not honest, whether they are in power or whether we are in power. Till we cannot get rid of this stigma, whether we are sitting on this side or that side of the House, whether we increase our salary or not, we cannot be free from the overall observation of the media and the people. Therefore, Sir, while supporting the initiative of the hon. Minister, I should only request through you to the Government and, of course, to the entire House that the time has come in this new millennium to justify our commitment to the nation and our day-to-day performance. It is because the people, who are our watchdogs, are watching what we are doing for our country and constituency. I, therefore, feel that if you can raise the standard of our own living not in terms of luxury but in terms of our commitment to the people, who elect us and send us here, I think this kind of a criticism will not go long for years to come.

One fact remains to be discussed which nobody has discussed and I have not seen any editorial in any newspaper about the difference between the Members of Parliament in India and the Members of Parliament in the rest of the world. Is there any country where Members of Parliament represent an electorate of more than one million? Whether it is right or wrong, the other day, we have freezed the increase of seats in Lok Sabha because of population and many other issues. I can give you my example. I cannot interfere with other constituencies. The radius of my constituency is 310 kilometres.

The distance from one point to another is 310 kilometres and it takes three and a half days to travel, and not one day. In the earlier days, there were not many telephone connections. Thanks to our late Prime Minister, Shri Rajiv Gandhi, his C-DoT Mission and the work of DoT, now telephone is available in almost every village. These days — whether it is Chamber of Commerce or sabzi mandi or teaching community – they negotiate with us over the phone and they expect us to return the call, when they call us at home and we are not at home at that time. When I go back to my house, I find that thirty people rang me up to convey some problem or the other. As a responsible M.P. of the constituency, the minimum that I should do is that I should talk to them and tell them what I have done for them. If I calculate that, I find that these one lakh calls are just nothing. Yet, if we increase it, people will question us. I will give you a few other examples. We people come from places which are one thousand kilometres away from Delhi. This is true for Members coming from Bihar, Kerala, etc. People from our constituencies come to Delhi even without intimating us. They send the patients without intimating us. They tell us, `We have sent the patient, please make necessary arrangements’. They come with the patients in the midnight or in the early morning. They want us to provide them train fare also. Which clause is allowing you to do that? The M.Ps, in their own capacity and through their contacts, somehow manage these situations. In Indian democracy, you cannot wish away these problems and say, `No, no. Nobody should come so long as I am in Parliament. Do not come to Delhi’. We cannot say that. While touring my constituency, I found that before the jeep, people start crying, saying `Day before yesterday our village was burned down and please make some arrangements’. I request the nearby shops to give them rice, wheat, atta etc. and tell them that within two days I will give them the money. Can anybody deny that these problems do not occur for those who are representing the people in their constituencies? These hazards are never noticed. Suppose, in a particular constituency somebody is burned, whether it is dalit or upper caste people, the M.P. of that area cannot move, if he cannot take care of their problems for a month or so or till they are rehabilitated. If he does not do that, he cannot go to his constituency. It happens to almost all the M.Ps. An impression is created that M.Ps do not have any problems and that they are the top people of this country. This impression is gaining ground and it is a wrong one. This impression is not correct at all. The more you encourage such an impression, the more difficult it would be for us. It is not a fact.

If you desire to have a competent Personal Secretary who knows stenography and computer, even after giving advertisement in the newspaper, can you get him for less than Rs. 12,000 or Rs. 15,000 or Rs. 10,000? You cannot get it, whereas people want us to deliver goods, properly communicate and address the issue. When M.Ps go to their constituencies during the inter-Session period, to see the development in the M.P. Area Development Work, hardly any Collector provides him any vehicle to move freely. He has to go in his own vehicle or hire a vehicle and he has to spend for the fuel also to complete the work.

श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज):हम लोगों को कभी नहीं देते हैं।…( व्यवधान )

श्री प्रियरंजन दासमुंशी:वही मैं कह रहा हूं।

To supervise the work, we have to request our friends to give their vehicle. They will give us for a day or two, but not everyday. These problems are not noted by anybody. I will give you two more examples and conclude. There are at least 200 M.Ps whose constituencies are either drought-prone or flood-prone. There are chronically flood-prone areas and chronically drought-prone areas. The M.P of that area cannot take his food, unless he takes care of the people of the constituency.

I have seen the situation in many areas. During the flood season, it comes to my area at least occasionally. I have seen that. The people watch us minutely what we eat in our house during the flood situation. They publish it in the newspapers. If you do not share food with them in the kitchen where gruel is prepared, it is published. It is a fact. In public life, whether we like it or not, it happens. It is the media which conveys our feelings to the people. What we speak here, the media will write about it.

Shri Pramod Mahajan said that the House should not be adjourned. I agree with him that the House should not be adjourned for uncalled for reasons. But it is also a fact that on any issue which we do not like to agitate in the House in that manner, it will become the headlines in the media. The people in our constituency will feel like this.कुछ नहीं होता है, आप लोग सोते रहते हैं, कभी आवाज़ नहीं है, इसका क्या तरीका है? Whether it is the Akilesh model or the Pappu model or any other model, it is different. It may be a matter of dispute also. मीडिया के लोग कहते हैं कि आप लोग आवाज़ नहीं करते हैं। Then, where do you go? We are prisoners in the constituency where people say that we do not talk and shout. We are prisoners in the hands of the media. They say that all of us have become saints and we do not speak. आप लोग बोलते नहीं हैं। You are deep and down. At the same time, if we shout, they will write that decorum is not maintained. So, all these things are there. We work in a difficult situation in the Indian democracy. Therefore, let us not be fussy about it. We must serve the people with good intention and integrity. But, at the same time, if we tell them that we get Rs.4,000/- and take care of everything, that is all right. There are professionals like the former Law Minister, Shri Ashok Sen or like one of the leading legal luminaries, Shri Somnath Chatterjee. His one day’s appearance in the Supreme Court will take care of his six months cost in the constituency. … (Interruptions)

THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF INFORMATION TECHNOLOGY (SHRI PRAMOD MAHAJAN): If he gives up his seat and appears in the court, he will take care of 150 MPs!… (Interruptions)

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : If I say that I can manage with Rs.4,000 or Rs.6,000, then there is no problem. … (Interruptions) I think he is deceiving himself. I do not know how he manages himself. The Government has brought forward this Bill after due consideration in the Joint Committee. The Committee has gone through the process in detail. There should not be any such impression that we are taking extra advantage of being Members of Parliament. It is not that. We are justified in what we are doing. If we are doing something wrong, people will not elect us again. I know about it. But to tell the people of our constituency that we can carry on with Rs.2,000 is very difficult. मैं किसी को बताकर आपका काम कर दूंगा, डैमोक्रेसी में ठीक नहीं है, ऑनैस्ट नहीं है।

We feel very sincerely that the Bill which has been brought forward is correct. The Government has considered something for the pensioners also. I thank the Government for that. I think more of the ex-Members of Parliament than the sitting Members. I say this because that is our permanent seat and this is our temporary seat.

With these words, I support the Bill.