Discussion On The Demand For Grant No. 59 Under The Control Of The … on 24 April, 2008

Lok Sabha Debates
Discussion On The Demand For Grant No. 59 Under The Control Of The … on 24 April, 2008


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Title: Discussion on the Demand for Grant No. 59 under the Control of the Ministry of Information and Broadcasting for 2008-09 and submission of outstanding demands to vote of the House.

 

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, we will come to Item No.16.

The House will now take up discussion and voting on the Demand No.59 relating to the Ministry of Information and Broadcasting.

          Shri Haribhau Jawale has tabled a cut motion to the Demand for Grant relating to the Ministry of Information and Broadcasting. If the hon. Member wants to move his cut motion, he may send a slip at the Table within 15 minutes.

          The Demand for Grant in respect of the Ministry of Information and Broadcasting and, if time permits, in respect of the Ministry of Youth Affairs and Sports will be discussed till 6 p.m.  As the Members are already aware, guillotine will take place at 6 p.m.

 

Motion moved:

“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the Fourth column of the Order paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2009, in respect of the head of Demand entered in the Second column thereof against Demand Nos. 59 relating to the Ministry of Information and Broadcasting.”

 

 

 

 

 

         

 

     

श्रीमती सुमित्रा महाजन (इन्दौर): माननीय उपाध्यक्ष जी, आज जिस मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर हम चर्चा प्रारम्भ कर रहे हैं, देखा जाए तो बाकी मंत्रालय भी महत्वपूर्ण होते हैं, जैसे देश की रक्षा के लिए डिफेंस और गृह मंत्रालय हैं, लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी एक महत्वपूर्ण मंत्रालय है। यह एक ऐसा मंत्रालय है, जो अनेकानेक अंगों से मनुष्य के ऊपर या समाज में प्रभाव डालता है। रेडियो, फिल्म, टीवी, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, डांस, कला और संस्कृति न जाने कितनी ऐसे कितने साधन हैं, जो मनुष्य की बुद्धि और मनोरंजन को साधने वाले हैं यह मंत्रालय उसका मूल है। मनुष्य अगर सुव्यवस्थित नहीं रहेगा, समाज अगर ठीक तरीके से सुरक्षित नहीं रहेगा, तो बाकी की चीजें उसके लिए कोई मायने नहीं रखती हैं। इसलिए इस दृष्टि से यह मंत्रालय बहुत महत्वपूर्ण है।

          मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि इस मंत्रालय का जिस तरह से बजट सिस्टम होता जा रहा है, उससे ऐसा लगता है कि मंत्रालय की कार्य पद्धति बहुत ही ढीली है। कहीं न कहीं मंत्रालय अपनी कार्य पद्धति के प्रति पूरी तरह से नॉन-सीरियस है। मैं यह केवल आरोप लगाने के लिए ही नहीं कह रही हूं। हमारे सामने इस मंत्रालय के बजट के जो आंकड़े आए हैं, उससे भी यह पता चलता है। मैं आपको बताना चाहती हूं कि यह मंत्रालय मांग कुछ करता है और बजट एस्टीमेट कुछ बनता है। दसवीं पंचवर्षीय योजना में इन्होंने 6067.40 करोड़ रुपए मांगे थे, उस समय इनका बजट एस्टीमेट  एलोकेशन 4381 करोड़ रुपए हुआ था। उसके बाद रिवाइज्ड एस्टीमेट की स्टेज पर हम देखें तो वह 3328.70 करोड़ रुपए आता है और वास्तविक खर्च 2808 करोड़ रुपए हुआ, यानि किसी भी प्लान में यह मंत्रालय गम्भीर नहीं है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में भी जब हम देखते हैं तो जो बजट एलोकेशन था, उससे दोगुना-चौगुना की मांग की गई है। वास्तविक खर्च में तो छः गुना डिमांड की गई थी। जब इनकी योजना आयोग से चर्चा हुई, दासमुंशी जी आप मेरी बातों की तरफ ध्यान दें, लगता है कि आप जब संसदीय कार्य मंत्री थे तो हो सकता है कि आपकी गम्भीरता इस मंत्रालय की तरफ न रही हो। आपने इस मंत्रालय के लिए 101 योजनाएं प्रोडय़ूस की थीं, उनमें से 43 विदड्रा हो गईं। इसमें कहीं न कहीं जैसे हम मराठी में कहते हैं कि – खिराफत बांटनी है, देना है, इसलिए थोड़ी-थोड़ी स्कीम्स दे दो, लगता है कि इस बारे में गम्भीरता से नहीं सोचा गया कि क्या ये योजनाएं वायबल हैं या नहीं हैं। इसलिए 43 स्कीम्स को ड्रॉप करना पड़ा है। उन पर जो खर्च हुआ होगा, उसका क्या हुआ, यह मंत्री जी अपने जवाब में बताएं तो उपयुक्त होगा।

          मंत्रालय ने 16829 करोड़ प्रपोज किए थे, इन्हें 5529 करोड़ रुपए मिले। मैं यह बात 11वीं पंचवर्षीय योजना की कर रही हूं। मैं इनकी नॉन-सीरियसनेस के बारे में आंकड़े देकर कहना चाहती हूं। पहले साल मंत्रालय का बजट एस्टीमेट 475 करोड़ रुपए था, रिवाइज्ड एस्टीमेट 400 करोड़ रुपए का बना और एक्चुअल एस्टीमेट 372 करोड़ रुपए का बना। [R3]  यानी कम से कम होता जा रहा है। इस साल आपको 700 करोड़ रुपया मिला है जिसमें से 99 करोड़ रुपया कॉमनवैल्थ गेम्स के लिए मिला है। उसके लिए आपने जो प्रपोजल बनाये हैं उन पर अगर मैं बोलने लगूंगी तो बहुत लम्बी-चौड़ी बात हो जाएगी। इन आंकड़ों से, कहीं-न-कहीं हमारी नॉन-सीरियसनैस दिखती है। आपके प्रभाग में जो छोटे-छोटे काम चलते हैं, मैं उनकी बात भी करुंगी, क्योंकि मैं एक मां और दादी-मां भी हूं और मुझे बच्चों से लगाव है। मुझे लगता है कि बच्चों के लिए कुछ न कुछ होते रहना चाहिए। आपके यहां चिल्ड्रन-फिल्म-सोसाइटी है। इस चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी के लिए आपने हैदराबाद में एक बड़ा निर्माण करने की योजना बनाई थी, जिसमें कहा गया था कि बहुत सारी चीजें बच्चों के लिए होंगी। लेकिन नॉन-सीरियसनैस ऐसी रही कि उस पर ध्यान नहीं दिया गया। उसके लिए 2.71 करोड़ रुपये रखे भी गये और पूरे साल में 41 लाख रुपये खर्च भी हो गये, लेकिन हुआ यह कि एक फरवरी से 15 मार्च के बीच, आखिरी 15 दिनों में रुपये जल्दी में बांटे, क्योंकि उन्हें लगा कि हैदराबाद में तो कुछ बन नहीं सकता, मुम्बई में बनाएं, क्या करें, मुम्बई में जगह नहीं मिल रही, इस तरह की बातें रहीं। लेकिन ये आखिरी 15 दिनों में एक दम से 1 करोड़ 95 लाख रुपये धड़ाधड़ बांट दिये। क्या उससे बनेगा, क्या उसमें आपने क्वालिटी देखी होगी, इस तरह कि नॉन-सीरियसनैस उसमें आपने दिखाई।

          दूसरी बात यह कि फिल्म इंस्टीटय़ूट, पूना में, पहले ग्लोबल फिल्म स्कूल बनाने की बात थी, लेकिन पांच साल में कुछ नहीं किया।  करीब 2.56 करोड़ रुपये भी रखे गये लेकिन होते-होते ऐसा हुआ कि इसको स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टेंडिंग बना देते हैं। मेरी समझ में नहीं आता है कि अगर आप योजना के लिए सीरियस नहीं हैं तो योजना बनाते क्यों हो? अगर आप कुछ करना नहीं चाहते हैं तो योजना बनाते क्यों हो। प्रियरंजन जी आप करते क्या रहे हो, यह मेरी समझ में नहीं आया। मुझे लगता है कि आपने इन पांच सालों में, इन सारी बातों की तरफ गंभीरता से देखा ही नहीं है। नेशनल फिल्म डेवलेपमेंट कोरपोरेशन थोड़ा-बहुत ठीक-ठाक चल रहा है।

          जैसा मैंने शुरू में कहा कि यह मंत्रालय कहीं न कहीं मनुष्य के जीवन के हर कोण को स्पर्श कर रहा है। जीवन के हर कोण की अगर अलग-अलग बातें ली जाएं तो जो आपका एफएम रेडियो है, जिसमें आप प्राइवेट लोगों के साथ मिलकर, अलग-अलग प्रभाग खोल रहे है, इसके बारे में मैं थोड़ा कहना चाहूंगी। निजी भागीदारी में आप नये चैनलों की स्थापना कर रहे हैं और आप इनमें रुचि भी ले रहे हैं। पहले रेडियो गांव-गांव तक लोगों के पास पहुंचने का एक प्रभावी माध्यम था और उसमें गाने-बजाने के साथ-साथ हमारी सरकार की उपलब्धियां, सरकार की योजनाओं की चर्चा और लोगों तक सरकार की सूचनाएं अच्छे ढंग से पहुंचे, इसके लिए रेडियो एक अच्छा साधन था। रेडियो सिलोन पर बिनाका गीत माला पॉपुलर होने लगी तो हमने अपनी तरफ से विविध भारती शुरू करके, इसको उसी तरह से पॉपुलर रखने के प्रयास भी शुरू किये, जिससे लोगों में इसके प्रति रुचि बनी रहे। छाया-गीत और हवा-महल प्रोग्राम इस पर अच्छे आते थे, मैं उस पर नहीं जाऊंगी। लेकिन इसमें जो आपका एफएम रेडियो है इसकी बात आप देखें तो खबरें चटपटी बनाने के लिए जिस भाषा का उपयोग होता है वह कुछ अखरती है। मैं उसे बंद करने की बात नहीं कह रही हूं, लेकिन मेरा कहना यह है कि there should be some control.[r4] 

          उपाध्यक्ष महोदय, इनके लिए भी कोई न कोई कोड आफ कंडक्ट होना चाहिए, क्योंकि इसे आकर्षक बनाने के लिए चाहे कैसी भी भाषा का प्रयोग करना पड़े, मैं उदाहरण नहीं चाहती, क्योंकि मैं उसका उदाहरण दे ही नहीं सकती हूं। कुछ ऐसी भाषाएं यूज की जाती हैं, जिन्हें चटपटी कहा जाता है या रेडियो मिर्ची टाइप कहा जाता है। मेरा इतना ही निवेदन है कि आप देश में अलग-अलग चैनल्स की स्थापना कर रहे हैं, इसके लिए भी कोड आफ कंडक्ट हो, इसके लिए हम सोचें। थोड़ा सा कंट्रोल इन चीजों पर होना चाहिए, क्योंकि रेडियो आज भी गांव के दूर-दराज क्षेत्रों में सुना जाता है। मुझे पहले लगता था कि अब टीवी आ गया है, तो रेडियो को कौन सुनेगा। लेकिन ऐसी स्थिति नहीं है। आज भी गांवों के दूर दराज क्षेत्रों में रेडियो का उपयोग किया जाता है। इन चैनल्स को भी लोग सुनते हैं। इस कारण इस पर हमें ध्यान देने की जरूरत है।

          मैं एक दूसरी बात प्रेस के बारे में कहना चाहती हूं। आप इलेक्ट्रोनिक मीडिया मोनिटरिंग सैंटर की भी बात कह रहे हैं। मुझे लगता है कि अभी आपने उसके लिए किसी प्रकार का कार्य प्रारम्भ नहीं किया है। यह बनना भी चाहिए। इलेक्ट्रानिक मीडिया दो प्रकार की है। मैं पत्रकारिता के बारे में कहना चाहती हूं। पत्रकार बंधु मुझसे नाराज भी हो जाएं, पत्रकारिता और प्रिंट मीडिया, इनकी भी अपनी एक भूमिका है। हम इन्हें प्रजातंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं और यह स्तम्भ के रूप में रहना भी चाहिए। वास्तव में आज दोनों प्रकार के मीडिया में गलत पूंजी यूज की जा रही है। मेरा अपना अनुभव है कि आज कल जमीनों के भाव बहुत बढ़ रहे है, भूमाफिया सक्रिय हैं और फिर उस पैसे को कहां लगाना है, तो अच्छा साधन है कि हम प्रेस में पैसा लगाएं। निकृष्ट पैसा किसी न किसी प्रकार से प्रिंट मीडिया में भी लग रहा है। प्रिंट मीडिया में विदेशियों के प्रवेश की चर्चाएं हो रही हैं। इस बारे में भी गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है, अगर हम ऐसा नहीं करेंगे, तो इन सभी चीजों का मौलिकता से कोई सरोकार नहीं रहेगा। विदेशी पूंजी का भी अगर इसमें प्रवेश हो गया, तो हमारा देश, हमारी संस्कृति, हमारा प्रजातंत्र इससे अछूता नहीं रह पाएगा। इस बारे में गहरी सोच की जरूरत है।

          इसके साथ-साथ मैं यह भी कहना चाहती हूं कि इलैक्ट्रानिक मीडिया मोनिटरिंग सैंटर तो है, लेकिन लगता है कि न्यूज चैनल्स की तरफ हम इतना ध्यान नहीं दे रहे हैं कि इन्हें भी जिम्मेदार बनाना बहुत आवश्यक है। प्रेस काउंसिल है। प्रेस काउंसिल को कैसे ताकतवर बनाएं, उसमें इलैक्ट्रानिक मीडिया भी शामिल है या नहीं है, मुझे पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन क्या उसे शामिल कर सकते हैं? विशेष कर न्यूज चैनल्स के लिए भी क्या कोड आफ कंडेक्ट हो सकता है। यह तरीका बताया जा सकता है कि किस तरीके से हम उन पर निगरानी रख सकते हैं। निगरानी का यह मतलब नहीं है कि उन्हें क्या दिखाना चाहिए या क्या नहीं दिखाना चाहिए, यह तो उन्हें भी समझना चाहिए। आज कल लगता है कि जिस तरीके से न्यूज चैनल्स चलते हैं, उनका न्यूज से कोई मतलब ही नहीं रहा है। जो ब्रेकिंग न्यूज अगर हम देखेंगे, तो आपको पता चलेगा कि पहले ब्रेकिंग न्यूज का मतलब होता था कि यानी इस देश में बहुत बड़ी घटना हुई है या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी घटना हुई है। उसे हम ब्रेकिंग न्यूज कहते थे। आज कल ब्रेकिंग न्यूज बनती है कि किसी शिक्षिका को पीटा, वह भी झूठे स्टिंग आपरेशन के कारण तथा ऐसे ही दूसरे न्यूज को ब्रेकिंग न्यूज बना देते हैं, उनका उल्लेख करना मैं उचित नहीं मानती।[R5]  न्यूज चैनल्स में न्यूज से ज्यादा शोज आने लगे हैं। हम 21वीं सदी में जा रहे हैं। कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि 21 वीं सदी में जादू टोना, भूत-प्रेत, ग्रहों की परिस्थिति और फलां अंगूठी पहनें, ये सब चलता है। What are all these things happening? क्या इसमें हमारी भूमिका एक प्रेक्षक की रहेगी? हम इतने हैल्पलैस हो गए हैं। कहीं न कहीं इन बातों पर सोचना बहुत आवश्यक है। यूथ एंड स्पोर्ट्स पर हमारे बाकी साथी चर्चा करेंगे। स्पोर्ट्स की  दुर्दशा हो रही है। प्लेयर्स को खरीदने के बाद उनके भी फैशन शोज होने  लगे हैं और वे रैम्प पर चलते हैं। यह किस तरीके से चल रहा है और क्या हो रहा है? समझ नहीं आता। क्रिकेट के खिलाड़ी मैदान में खेलने की बजाय फैशन शो करते हैं। खिलाड़ियों को किसी ने खरीद लिया क्या इसलिए वे इन चीजों के लिए मजबूर हो जाएं? न्यूज चैनल्स पर बार-बार वही चीज दिखायी जाती है। किसी का थोड़ा कपड़ा सरक गया, हालांकि समझ नहीं आता कि यह कौन सा फैशन है, कपड़ों के लिए फैशन शो होते हैं लेकिन वे कपड़े पहनते नहीं हैं। समझ नहीं आता कि यह कौन सा फैशन शो है और इन्हीं के कपड़े कैसे फिसलते हैं। हमारे बच्चे दिन भर वही फिसले कपड़े  देखते रहते हैं।

कुँवर मानवेन्द्र सिंह (मथुरा)  :  …( व्यवधान)   *

MR. DEPUTY-SPEAKER : Kunwar Manvendra Singhji, please sit down.

… (Interruptions)

श्री सुभाष महरिया (सीकर): यह ऐसा कह कर सदन को गुमराह कर रहे हैं।

MR. DEPUTY-SPEAKER : The observations of whosoever speaks without my permission should not be recorded.

(Interruptions) … *

श्रीमती सुमित्रा महाजन   : आपबात को डाइवर्ट न करें। I am not against fashion shows.

हम भी फैशन करते हैं, हम भी अच्छी दिखने की कोशिश करते हैं, हम यूं ही बड़े नहीं हो गए, हम एबले नहीं रहना चाहते और मैं भी नहीं चाहूंगी कि कोई भी महिला या पुरुष एबले तरीके से रहे, हम इसे अपने यहां एबले कहते हैं, अच्छा रहना चाहिए और अच्छा दिखना भी चाहिए। अगर वसुन्धरा जी ने अपने यहां के बने कुछ वस्त्र अच्छे तरीके से प्रदर्शित किए तो मैं उसका विरोध नहीं कर रही हूं। मैं कह रही हूं कि कहते हैं वस्त्रों का फैशन शो लेकिन वस्त्र ही नहीं होते हैं। मैं उस बात पर ऑब्जैक्ट कर रही हूं। जो भी थोड़ा वस्त्र होता है, वह फिसलता जाता है और फिर उसी को बार-बार दिखाया जाता है। क्या हम इतने हैल्पलैस हो गए हैं, हम इस बात को भी थोड़ा सोचें और मैं इसको ज्यादा नहीं बढ़ाऊंगी।

          मैं दूसरी बात और कहना चाहूंगी। आप मॉनिटरिंग की बात कर रहे हैं। क्या प्राइवेट चैनलों पर कोई मॉनिटरिंग हो सकती है? जिस प्रकार शो होते हैं, एक रियलिटी शो है, इंडियन आइडल है, इन पर जिस तरीके से कमाई की जा रही है, एसएमएस करो, यानी जो तीन जजेस बुलाए हैं, वे कुछ नहीं हैं और उनके जजमैंट का कोई महत्व नहीं है। एक तरह से यह शोषण हो रहा है। मैंने सुना है कि 13 साल की लड़कियों का मिस इंडिया कॉटैस्ट होगा। यह उम्र बच्चियों के खेलने-कूदने की है। हम उन्हें घर में शिक्षा देते हैं कि

कपड़े मत देखो, खेलो, मस्ती करो। हम एक बार बाल इकट्ठे बांध देते हैं और कहते हैं कि जाओ खेलो, आराम करो लेकिन यहां 13-14 साल की लड़कियों के लिए शो आयोजित होते हैं और उनको सुन्दर दिखायी देने के नुस्खे बताए जाते हैं। देश को कहां ले जा रहे है? क्या पूरा सदन इसके लिए हैल्पलैस बना रहेगा, जाने दो, जिस तरह बह रहे हैं, बहने दो। हमें इस पर कुछ सोचना चाहिए। चैनल्स पर जो सीरियल्स आते हैं, उनकी क्या बात कहूं, आप खुद समझ रहे हैं। इन सब बातों की कहीं न कहीं मॉनिटरिंग करने की आवश्यकता है।

 

* Not recorded

आपके मंत्रालय द्वारा कहीं न कहीं इन सभी बातों पर थोड़ी सोच बनाने की आवश्यकता है, इस दृष्टि से आप क्या करना चाहेंगे? जैसा मैंने शुरू में कहा कि आप स्कीम्स बनाने में रुचि नहीं ले रहे हैं, आपकी मंत्रालय का पैसा खर्च करने में रुचि नहीं है, आप चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी को आगे बढ़ाने के लिए रुचि नहीं ले रहे हैं, फिल्म इंस्टीटय़ूट को जो दर्जा देना चाहिए, वे नहीं दे रहे हैं जहां से दर्जे वाले कलाकार निकल सकें जैसे पूना का इंस्टीटय़ूट इसके लिए फेमस रहा है, लेकिन इसके लिए कोई प्रपोजल कहीं डिमांड्स में दिखा नहीं है। मै चाहती हूं कि आप इन सब चीजों पर ध्यान दें। मैं कन्कलूड कर रही हूं, क्योंकि बहुत से सदस्य इस पर बोलेंगे ही और वही बात बार-बार बोलने की कोई आवश्यकता नहीं है।

          अंत में मैं चार लाइनें कहना चाहती हूं – प्रियरंजन जी आपका महकमा है मनोरंजन, मेरा कहना है कि होना भी चाहिए लेकिन यह होना चाहिए सर्वप्रियरंजन, मैं कहना चाहती हूं यह केवल मनोरंजन नहीं सर्वप्रियरंजन होना चाहिए, चाहे टीवी हो या एफएम हो या अलग चैनल्स हों, ये सभी कर रहे हैं संस्कारों का अवमर्दन और भंजन, प्रियरंजन हो रहा है संस्कारों का भंजन। हम आपको सपोर्ट करेंगे, हमने सुना था कि कुछ दिन पहले आप छोटा सा बिल लाए थे, हमें लगा उसमें कुछ अच्छी बात होगी लेकिन किसी व्यक्ति के लिए आयु कम करना या बढ़ाना, I just do not know about it. मैं आरोप नहीं लगा रही हूं। आप छोटा सा बिल लेकर आए लेकिन किसी की आयु कम या ज्यादा करने से प्रसार भारती या कोई और महकमा सॉलिड बनेगा, ऐसा नहीं है इसके लिए और भी कुछ करना पड़ेगा। लेकिन जो भंजन हो रहा है इसके लिए क्या करेंगे? इसके साथ मैं कहना चाहती हूं – सख्त कानून और सख्त नियमों का डालो आंख में अंजन, कहने का मतलब है कि कोलकाता में आंख में अंजन डालते हैं, वह डालो। इसे आगे बढ़ाते हुए मैं कहना चाहती हूं – ताकि हो जाए अच्छे आचार-विचार और कल्पनाओं का सृजन, अगर वास्तविक रूप से इन्फार्मेशन और ब्रॉडकॉस्टिंग मिनिस्ट्री चाहेगी कि अच्छे आचार-विचारों का सृजन और प्रचार-प्रसार, कल्पनाओं का प्रचार-प्रचार, अच्छी योजनाओं का चाहे वे सरकारी हों या गैर सरकारी का प्रचार-प्रसार, अच्छे कलाकारों के गुणों का प्रोत्साहन देना, इन सब चीजों के लिए आपको स्ट्रंग होना पड़ेगा। आपको अपनी आंखें खुली रखकर, अपनी बुद्धि की धार तेज करके सबके सहयोग से इस मिनिस्ट्री को ताकतवर बनाना पड़ेगा। केवल बजट के घटने या बढ़ने से बात नहीं बनेगी, हर चीज बजट से नहीं होती लेकिन बजट घट भी न जाए, जो बजट और स्कीम्स हैं, भले ही चार स्कीम्स हों, वे ठीक तरीके से, मजबूती से लागू हो जाएं, यही मेरा निवेदन है।

 

उपाध्यक्ष महोदय : हम चाहते हैं कि माननीय मंत्री जी का पांच बजे रिप्लाई हो जाए इसलिए जो माननीय सदस्य रिटन स्पीच सभापटल पर रखना चाहें वे रख सकते हैं। It will save some of our time also.

SHRI RUPCHAND PAL (HOOGHLY): How much time does the hon. Minister want for the reply? I am asking this because at 6 o’clock Guillotine is there. Does he require one hour for replying to the debate?

MR. DEPUTY-SPEAKER: I think that one hour will be sufficient for him.

SHRI RUPCHAND PAL : Sir, he may start his reply at 1730 hours.

SHRI AJOY CHAKRABORTY (BASIRHAT): I do not know whether the discussion on the Ministry of Youth Affairs and Sports will he held or not.

उपाध्यक्ष महोदय : हम सवा पांच बजे का कप्रोमाइज कर लेते हैं। हम मंत्री जी से रिक्वेस्ट कर लेते हैं कि वे 45 मिनट में अपनी बात कह दें।

श्री देवव्रत सिंह (राजनंदगांव): मैं आपके माध्यम से सदन के समक्ष माननीय मंत्री श्री प्रियरंजन दास मुंशी द्वारा अनुदान की जो मांगें रखी गई हैं, उनका समर्थन करता हूं। मैं सदन से निवेदन करता हूं कि अनुदान मांगों का समर्थन व्यक्त करके इन्हें पारित कराने की कृपा करें।[r6] 

          उपाध्यक्ष महोदय, बीसवीं शताब्दी में सूचना की शक्ति सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है और अगर देखा जाए तो एक आम आदमी को जो सूचनाएं प्राप्त होती हैं, वही उसका संसार होता है और सूचना की शक्ति से एक आम आदमी अपनी लड़ाई स्वयं लड़ सकता है। मेरा ऐसा मानना है कि जो देश और समाज सूचना शक्ति सम्पन्न होगा और जिस देश में सूचना शक्ति का जितना अधिक प्रसार होगा, हमारे जनसम्पर्क और जनसंचार के माध्यम जितने सशक्त होंगे और जितने अधिक आम व्यक्ति तक पहुंच पायेंगे, वह देश उतना ही सुदृढ़ होगा। मेरा यह भी मानना है कि जनसंचार माध्यमों के माध्यम से एक आम आदमी की सजग और सक्रिय सहभागिता बनती है। इसलिए आज जो हमारी श्रेष्ठतम जनशक्ति तैयार होगी, वह जनसंचार माध्यमों की मजबूती के आधार पर होगी। माननीय मंत्री जी और प्रसार भारती के माध्यम से यूपीए की सरकार ने जो नये कार्यक्रम दिये हैं और जिस प्रकार से दूरदर्शन और आकाशवाणी को एक नया आयाम दिया है, उससे निश्चित रूप से हमारे देश का आम व्यक्ति प्रभावित होता है और हमारे जनसंचार के माध्यम, विशेषकर आकाशवाणी और दूरदर्शन ने बहुत अच्छा कार्य हमारे देश के अंतिम व्यक्ति के लिए किया है। क्योंकि आज व्यावसायिकता की एक अंधी होड़ मची है, जिसमें निजी चैनल, एफ.एम. चैनल आदि व्यावसायिकता के माध्यम से ऐसी चीजें हमारे समाज को परोस रहे हैं, जो कहीं न कहीं हमें तकलीफ और नुकसान पहुंचाती हैं।

          महोदय, यह एक राष्ट्रीय बहस और चिंता का विषय हो सकता है कि हमारे दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम निजी चैनलों के सामने प्रतिस्पर्धा में कमजोर होते हैं। ये बातें लोक सभा में, समाचार पत्रों और अन्य माध्यम के द्वारा उठती हैं और यह सुनने में आता है कि दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम कमजोर हैं। जबकि निजी टी.वी. चैनल ज्यादा अच्छी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर निजी चैनलों के माध्यम से जो चीजें हमारे समाज को दिखाई जा रही हैं, वे कहीं न कहीं हमारे समाज और राष्ट्र की विरोधी होती हैं और हम सदन के माध्यम से इन बातों पर आपत्ति कर सकते हैं कि हमारे दूरदर्शन की फंक्शनिंग अच्छी नहीं है, इसमें तकनीकी रूप से कहीं न कहीं कमजोरी है। आकाशवाणी पर भी हम आरोप लगा सकते हैं। लेकिन दूसरी बात यह है कि आज इस देश मे संस्कृति का, साहित्य का, जो हमारी अपनी लोक कलाएं हैं, जो हमारी बाल प्रतिभाएं हैं, जो हमारी ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिभाएं हैं, जो हमारी कृषि और पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं हैं, जो हमारे समाज की छोटी-छोटी बातें हैं, उन सभी चीजों को, हमारे विचारों को, हमारे स्थानीय और रूरल लैवल पर जितने भी विचार होते हैं, जिन्हें संरक्षण देने का काम होता है, जो हमारे छोटे-छोटे कलाकार, लोक कलाकार होते हैं, उन्हें संरक्षण देने का काम केवल दूरदर्शन और आकाशवाणी ही करता है और कोई निजी चैनल इस बात के लिए सामने नहीं आता।

          उपाध्यक्ष महोदय, सदन के सारे सदस्य इस बात से सहमत होंगे कि आज दूरदर्शन के कार्यक्रमों में जो लोग भाग लेते हैं, जो प्रतिभाएं सामने आती हैं, कोई भी निजी चैनल उन समाचारों को उन प्रतिभाओं को कभी सामने नहीं लाता। चूंकि वे बहुत छोटी-छोटी प्रतिभाएं होती हैं। जो हमारे देश की मिट्टी से जुड़ी हुई समस्याएं हैं, उन्हें ये राष्ट्रीय चैनल और बड़े-बड़े चैनल कभी सामने नहीं लाते, केवल दूरदर्शन और आकाशवाणी, ग्रामों में और समाज के बिल्कुल अंतिम छोर पर जाकर इन समस्याओं को सामने लाते हैं।

          महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी को बधाई देना चाहूंगा कि इस देश में जो जनसंचार क्रंति आई है, उसमें काफी बड़ा कार्य माननीय मंत्री जी के नेतृत्व में हो रहा है। पिछले चार वर्षों में यह निश्चित रूप से अच्छा संकेत है कि इस विशाल राष्ट्र को सेवा प्रदान करने वाला जो दूरदर्शन और आकाशवाणी है, उसकी सेवा में लगातार विस्तार हो रहा है। मैं समझता हूं कि जो बजट माननीय मंत्री जी के मंत्रालय को दिया गया है, वह बहुत कम है। आज अगर दूरदर्शन और आकाशवाणी की जो अपनी समस्याएं हैं, वे केवल वित्तीय आधार पर हैं। लेकिन उसके बाद भी लगातार नये चैनल और सेवाओं का जाल बिछाने का काम माननीय मंत्री जी के नेतृत्व में पिछले चार वर्षों में हुआ है। विगत चार वर्षों में 142 नये हाई लो और वैरी लो ट्रंसमीटर्स स्थापित किये गये, लगभग 160 केबल हैडएंड्स और आठ नये स्टूडियों स्थापित करने का कार्य किया गया है। यदि माननीय मंत्री जी को बजट के माध्यम से और वित्तीय सहयता उपलब्ध होती तो इन सेवाओं का और अधिक विस्तार किया जा सकता था।

          महोदय, आज एक नया प्रश्न उठता है कि जो दूरदर्शन के कार्यक्रम होते हैं, उनकी गुणवत्ता और उनके प्रसारण व्यवस्था पर कई बातें सामने आती हैं। माननीय मंत्री जी के नेतृत्व में 17 स्टूडियोज और 30 छोटे स्टूडियोज को डिटीजल करने का प्रयास किया गया है, जिससे उनका एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारण हो सके, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसके कार्यक्रम बनाये जा सकें। निश्चित रूप से हमारे दूरदर्शन के लिए यह बड़ा उत्साहवर्धक है। दूरदर्शन ने जो उर्दू का चैनल चालू किया, जो राज्य सभा का चैनल चालू किया, वह निश्चित रूप से एक बड़ी अच्छी शुरूआत है और मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी और इस शासन को बधाई देना चाहूंगा कि आज भारत विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए खड़ा हुआ है[b7] ।

 

वैश्वीकरण के इस युग में भारत को लोग जानना चाहते हैं और समझना चाहते हैं और ऐसी स्थिति में जो एक नया चैनल शुरु करने की बात दूरदर्शन ने की है जिसका अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारण होगा, वह निश्चित रूप से बड़ा स्वागत योग्य कदम है।

          दूरदर्शन पर जो डाइरेक्ट चैनल हैं,  इसकी सबसे अधिक लोगों में मांग रहती है। उसमें जो 30 चैनल्स थे, उनको बढ़ाकर मंत्री जी ने 50 चैनल्स किये हैं, वह एक स्वागत योग्य कदम है। उसके साथ-साथ जो हमारी  एफएम के 31 नये ट्रंसमीटर स्थापित किये गये, जो 36 नये ऑल इंडिया रेडियो के ट्रंसमीटर स्थापित किये गये और जो 17 नये ऑल इंडिया रेडियो आकाशवाणी के रिले केन्द्र प्रारम्भ किये गये, वह निश्चित रूप से एक स्वागत योग्य कदम है।

           मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि हमारा देश क्रिकेट के पीछे पागल है। लेकिन अभी हाल में ही बीसीसीआई ने एक निर्णय लिया और देश के आम नागरिकों को एक अच्छी क्रिकेट देखने से वंचित कर दिया। जो प्रसार भारती के अधिकार थे, उनको समाप्त करके निजी चैनल्स को आय के आधार पर लिया गया, उससे कहीं न कहीं तो प्रसार भारती की आय प्रभावित हुई है। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि भारत सरकार को उसमें निर्णय लेना चाहिए। माननीय मंत्री जी इस बात को आगे बढ़ाएं ताकि बीसीसीआई पर इस बात का दवाब डलना चाहिए कि जिस भी क्रिकेट मैच में या किसी भी खेल के मैदान में जो मैच होते हैं जिसमें भारत एक राष्ट्रीय टीम के रूप में पार्टिसिपेट कर रहा है, उसका प्रसारण देखने का अधिकार हरेक व्यक्ति को है। वह तभी संभव हो पाएगा जब दूरदर्शन के पास उसके अधिकार होंगे। इस बात का प्रमाण होना चाहिए कि भारत में या देश के बाहर कहीं पर भी अगर किसी भी प्रकार का राष्ट्रीय टीम का कोई खेल हो रहा है तो उसको देखने का अधिकार देश की जनता को है और निजी चैनल कभी कभी इसको बाधित करते हैं। टेलीविजन चैनल यदि बाधित होता है तो इसके पुनर्प्रसारण का अधिकार प्रसार भारती के पास होना चाहिए।

          मैं मंत्री जी तथा इस सरकार को इस बात के लिए बधाई दूंगा कि दूरदर्शन और प्रसार भारती के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में चाहे कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से हो, चाहे कृषि विश्वविद्यालय के माध्यम से हो, जो चौपाल कार्यक्रम होते हैं, उनको और अधिक बढ़ाकर गांवों तक पहुंचाने की जरूरत है। वर्तमान में जो दूरदर्शन केन्द्र जो प्राइवेट एजेंसी स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, जिसमें प्राइवेट  संस्थाओं को सामने लाएंगे, वह एक अच्छा कदम है। लेकिन मैं चाहूंगा कि इसके बाद किसानों को इस बात का भी प्रशिक्षण दिया जाए और किसानों तक यह बात पहुंचे कि किस प्रकार की बीमारी लग रही है और किस प्रकार की कीटनाशक दवाओं की आवश्यकता है और इसके माध्यम से यदि दूरदर्शन अपनी अभिव्यक्ति देगा तो किसानों के लिए आकाशवाणी दूरदर्शन बड़ा सार्थक हो पाएगा क्योंकि आज हमारे बहुत सारे किसान ऐसे हैं जो जलवायु परिवर्तन के बाद नयी बीमारियों को नहीं जान पाते। इसलिए दूरदर्शन के माध्यम से यदि इन सब बीमारियों के बारे में बताया जाएगा तो किसानों को काफी लाभ होगा। यहां पर मैं मंत्री जी को बधाई देना चाहूंगा कि जो अद्भुत रेल प्रदर्शनी प्रारम्भ की गई जिसे कि आजादी एक्सप्रैस का नाम दिया गया और देश की आजादी के जो महत्वपूर्ण क्षण हैं, उनको हम लोगों ने इस रेल के माध्यम से देखा  और समझा और पूरे देश ने देखा और उसका एक बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा है।

          महोदय, हमारी जो फिल्म इंडस्ट्री है, वह आज बहुत तकलीफ में है। साल में लगभग 400-500 फिल्में बनती हैं। आप देखेंगे कि उनमें बहुत सारी फिल्में फ्लॉप हो जाती हैं, अपनी कॉस्ट नहीं निकाल पातीं। जो नेशनल फिल्म डैवलपमेंट कॉरपोरेशन की राशि बढ़ाई गई है, वह भी एक स्वागत योग्य कदम है। साथ ही फिल्म इंडस्ट्री को जो पहली बार बजट में प्रावधान किया गया कि कुछ राशि उसके लिए दी जाएगी ताकि अच्छी फिल्में बन सकें। जो अच्छे फिल्मकार हैं, जो अच्छे निर्देशक हैं, जिन्हें फिल्म बनाने के लिए राशि नहीं मिल पाती, उनके लिए धनराशि का प्रावधान किया गया है। उसके लिए मैं मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि जो हमारी कला और आर्ट फिल्में हैं, वे बंद हो रही हैं क्योंकि जो कला और फिल्म बनाने वाले निर्देशक हैं, उनको धनराशि नहीं मिल पाती। इसलिए इस धनराशि को बढ़ाने की आवश्यकता है, एक कॉरपस फंड बनाने की आवश्यकता है ताकि लोग और जो अच्छे फिल्मकार हैं, वे वहा से पैसा लेकर अच्छी फिल्में बना सकें क्योंकि फिल्म बनाना बहुत मुश्किल हो गया है। मंत्री जी, आपके नेतृत्व में जो विश्व की प्रतिस्पर्धा है, जिसमें आपने तय किया है कि राष्ट्रीय स्तर पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करेंगे और एनीमेशन और विजुअल इफैक्ट्स पर जो राष्ट्रीय केन्द्र स्थापित करने जा रहे हैं, वह निश्चित रूप से बहुत अच्छी बात [r8]है।।     आपके विभाग में जो प्रचार प्रसार निदेशालय है और भारत निर्माण के जिन कार्यक्रमों की आप प्रदर्शनी लगाते हैं, मैं कहना चाहूंगा कि सभी लोक सभा क्षेत्रों में फील्ड पब्लिसिटी विभाग के माध्यम से यह प्रदर्शनी लगायी जानी चाहिए ताकि लोग जान सकें कि भारत निर्माण योजना में केन्द्र सरकार कौन कौन से कार्य कर रही है। मैं आपके माध्यम से कुछ सुझाव माननीय मंत्री जी को देना चाहूंगा।

          वर्तमान में आकाशवाणी और दूरदर्शन के कर्मचारी हड़ताल पर हैं। एक बात यह भी आती है कि जो कलाकार मेहनत करके जन संचार माध्यमों से हमें अपनी कला दिखाते हैं, उनकी अपनी समस्याओं को अगर हम हल नहीं कर पाएंगे तो हम अपनी समस्याओं तक कैसे पहुंचेंगे? इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि एक समिति का तत्काल निर्माण किया जाए जो आकाशवाणी और दूरदर्शन के कर्मचारियों की बातों को सुन-समझ सके, उनकी समस्याओं की देख-रेख कर सके। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर तकनीकी और कलाकार वाले पद  रिक्त पड़े हुए हैं। बड़े पैमाने पर हमारे राष्ट्रीय स्तर के कलाकार हैं। उनको मौका मिलना चाहिए, उनको शासकीय नौकरी में लेकर दूरदर्शन और आकाशवाणी के सभी पदों के भरे जाने की आवश्यकता है। माननीय मंत्री जी ने जो डिजिटल कैमरा के लिए एक्साइज़ और कस्टम्स डय़ूटी कम की है, उससे निश्चित रूप से प्रसारण व्यवस्था अच्छी हो पाएगी, निजी क्षेत्र में लोग अच्छे कैमरे लाकर अच्छी शूटिंग और टैलीकास्ट कर पाएंगे। श्रेष्ठ उपकरण तथा तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए दूरदर्शन और प्रसार भारती दोनों पर रख-रखाव के लिए बजट की आवश्यकता है क्योंकि रख-रखाव के अभाव में बहुत सारे उपकरण खराब पड़े हुए हैं।

          महोदय, जो हमारे संगीतकार हैं, साहित्यकार हैं, बाल-प्रतिभाएं हैं, उनको प्रोत्साहित करने के लिए कई निजी चैनल्स ने बहुत सारे कार्यक्रम चालू कर रखे हैं। इन निजी चैनल्स के जो कार्यक्रम हैं, इनकी कोई स्पष्ट नीति नहीं है। वे जिनको बुलाना चाहते हैं, वही लोग कार्यक्रम में आ जाते हैं। इसके लिए कोई मापदंड नहीं हैं। न ही वे कलाकार जो वहां से बनकर निकलते हैं, उनके बारे में कुछ कहा जा सकता है। मैं आपको उदाहरण देना चाहूंगा कि  ज़ी टीवी ने एक कार्यक्रम सा रे गा मा किया था। उसमें मेरे गृह निवास की एक लड़की सुनीता ने चौथा स्थान प्राप्त किया था। वह ज़ीटीवी के द्वारा अनुबंधित है। अब होता यह है कि जो प्रतिभा उस कार्यक्रम में पार्टिसिपेट करती है, वहां से जीतकर आती है, वह उन सेवाओं के लिए उस चैनल का बंधक हो जाता है। तीन वर्ष के लिए वह विजेता लड़की कोई कार्यक्रम नहीं कर सकती। वह जितने कार्यक्रम करेगी, उसकी आधी राशि उसको ज़ी चैनल को देनी पड़ती है। मेरा कहना है कि यदि राष्ट्रीय प्रतिभाओं को हम आगे लाना चाहते हैं, वे प्रतिभाएं जब सा रे गा मा या इंडियन आइडल जैसे प्रोग्राम्स में जीतकर चले जाते हैं, तो उनके व्यावसायिक उपयोग के लिए उनको बंधक बनाकर रखा जाता है। यह राष्ट्रीय प्रतिभाओं का एक प्रकार से अपमान है। इस पर रोक लगनी चाहिए। यदि ये निजी टीवी चैनल किसी कलाकार को उठाएंगे, देश के सामने लाएंगे और फिर उसको तीन-चार साल के लिए अपने पास बंधक बनाकर रख लेंगे तो यह निश्चित रूप से अभिव्यक्ति पर भी रोक है और उसकी कला की जो क्षमता है, उस पर भी बड़ा उपबंध है। मैं एक सुझाव और देना चाहूँगा कि आकाशवाणी और दूरदर्शन के जो स्थानीय कार्यक्रम हैं, जो स्थानीय संस्थाएं हैं, सांसदों को पत्र आ जाता है कि हमारे ये-ये कार्यक्रम प्रसारित होंगे, ये कलाकार पार्टिसिपेट करेंगे। मेरा निवेदन है कि सांसदों और जनप्रतिनिधियों के साथ जो अन्य विषय-विशेषज्ञ हैं, साहित्यकार हैं, कलाकार हैं, संगीतकार हैं, इनकी एक समिति हर दूरदर्शन और आकाशवाणी केन्द्र में होनी चाहिए जो तय करे कि किस प्रकार के कार्यक्रम हो रहे हैं, ताकि उससे गुणवत्ता अच्छी हो सके। जैसे माननीया सुमित्रा महाजन जी ने कहा कि बहुत सारे जो कार्यक्रम होते हैं, उनमें नग्नता परोसी जाती है, उसमें व्यावसायिकता परोसी जाती है। उसमें ऐसे दृश्य दिखाये जाते हैं जो समाज में और बच्चों पर बड़ा गहरा और घटिया प्रभाव छोड़ते हैं। इस पर रोक लगाने की आवश्यकता है।

          अंत में मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि इस बात की भी आवश्यकता है कि जो निजी चैनल हैं और आज टीवी में जो कार्यक्रम आ रहे हैं, उन सभी कार्यक्रमों में कहीं न कहीं नकेल डालने की ज़रूरत है। यदि आप शाम को सात बजे से रात के ग्यारह बजे तक व्यावसायिक चैनल्स में कार्यक्रम देखेंगे तो आप देखेंगे कि बड़ा बुरा प्रभाव हमारे समाज पर पड़ रहा है। विशेषकर जो सास-बहू के सीरियल्स आते हैं, जो सामाजिक सीरियल्स आते हैं, वे कहीं न कहीं गलत प्रभाव डाल रहे हैं। इस पर भी शासन को एक कड़ा नियम बनाने की आवश्यकता है ताकि इस प्रकार के चैनल्स को हमारी संस्कृति और हमारे पारिवारिक जीवन के अनुरूप बनाया जा सके। मैं माननीय मंत्री जी को कहना चाहूंगा कि निश्चित रूप से उनकी इस विषय में बड़ी गहरी पैठ है।

          अंत में एक बात और कहना चाहूंगा कि इस पूरे विषय को सूचना प्रसारण एवं प्रसार भारती के विषय को, संस्कृति और साहित्य के विषय को लगातार आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि यह हमारी धरोहर है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी बनती है और दृढ़ता से माननीय मंत्री जी इसको कर रहे हैं। अंत में मैं एक पंक्ति कहना चाहूंगा।

          पानी और तमन्नाओं की एक तासीर होती है आगे बढ़ना। हमको भी आगे बढ़ना है लेकिन यह सोचकर आगे बढ़ना है कि हमारा देश और हमारी संस्कृति एक जगह स्थापित रहे।

                                                                                               

         

SHRI P. KARUNAKARAN (KASARGOD): Sir, I am glad to speak on the Demands for Grants of the Ministry of Information and Broadcasting for the year 2008-09.

          I think the main objective of the Ministry, especially of the Department of Information and Broadcasting is to create good environment, set up policy framework for the healthy development of mass media, to keep the people informed about the Government policy and the programmes, to educate and motivate people for greater participative involvement, to serve as a constant link between the Government and the press. 

The Ministry is assisted in its activities by 14 attached and subordinate offices. The most important among them are the Central Board of Film Certification; the Children Film Society; Director, Filed Publicity; Director, Advertising and Visual Publicity; and Director, Film Festival.  The Films Division is another major Department in the Ministry.  Their main objective is to provide and distribute documentaries, animation films, short cartoon films, etc.  It means that the Ministry has a vital role as far as education, information and cultural activity of our country are concerned. Besides that, cinema, radio, TV channels and short films are all strong instruments in the mass media.  So, here comes the importance of the Prasar Bharti. 

The Prasar Bharti had come into existence ten years back.  A lot of changes have taken place since then.  We should not forget that we live in an era of globalisation, privatisation and new liberal policy.   There may be positive and negative effects of this policy. So, we cannot underestimate its negative effects, especially in the mass media.  So, there should be some changes or amendments in the Prasar Bharti Act, especially in view of growing challenge from the private operators. When we are discussing this Ministry, it is our duty, especially the Parliament, to see how far our functions have gone.  We have to see whether it has positive or negative effect and whether we succeeded in spending the money properly that the Parliament has sanctioned.

I fully agree with hon. Shrimati Sumitra Mahajan.  In 2002-03, the sanctioned amount was Rs.823 crore and the expenditure was Rs.674 crore.  In 2004, the sanctioned amount was Rs.841 crore and the expenditure was Rs.495 crore. In 2005, the sanctioned amount was Rs.895 crore and the expenditure was Rs.390 crore only.  In 2005-06, the sanctioned amount was Rs.1037 but the expenditure was Rs.807 crore only.  In 2006-07, the sanctioned amount was Rs. 844 crore and the expenditure was only Rs.701 crore.  Last year, that is in 2007, the expenditure was only Rs.252 crore and the sanctioned amount was Rs.390 crore. I think only Rs.390 crore were sanctioned because of less expenditure in the earlier years.  The budget estimate for the year 2008-09 was Rs.1497.74 crore. In this connection, we want to get a clarification from the Ministry why the Prasar Bharti or the Ministry has failed miserably to achieve the targets.  On the one hand, the budget estimates are high and on the other hand, the expenditure is very low.  It is the situation when a large number of projects are waiting for the funds.  You see the Satyajeet Film Institute in Kolkata or the Pune Film Institute, Pune.  When the hon. Minister, Shri Pallam Raju was the Chairman of the Standing Committee on Information Technology, we had the occasion to visit these institutes.[R9] 

          When we visited the institute we were told that they had no teachers and no infrastructure, though students from different parts of the country were there to study. The position still is very bad. When the Department has the funds, they are not able to spend it. With regard to the Satyajit Ray Film Institute, a comment has been made by the C&AG. It says that the activities of the institute had to suffer and remain limited to running one Post-Graduate course with 40 students. The plans for short-term courses will never be implemented. Even when there are funds available with the Ministry, they are not able to implement them. In one of the Reports that I have read about the Ministry says that the Ministry had to bring in foreign experts to assist them. At the same time, the private persons run it in a better way. But the Department has to get the assistance from abroad to run cinemas, or cover the news and such other things. Some introspection is essential as to why such a situation has arisen in case of the Prasar Bharati and this Department. There should be an amendment brought about to the Prasar Bharati Act, otherwise the objectives of this organisation would not be fulfilled. It so far could not evolve its own style that was expected of it and also it is not yet financially viable yet. The employees are unhappy. There is no realisation of the real spirit of autonomy. It has shortage of programmes. There is lack of imagination and there is no quality. In some cases the Board has not been fully constituted yet. When I make these criticisms about the Department, I would also like to mention that the Azad Train Exhibition is really a very fine achievement of the Department. It has already visited 70 stations all over the country. The Kranti Yatra is also a very good programme. The exhibition on the 100 years of Satyagraha is also an important exhibition. These of course are landmarks. But I would like to simultaneously add that the goal with regard to the Prasar Bharati has not yet been achieved, especially keeping in view the challenges from the private persons and all that.

          Sir, it has been ten years since Prasar Bharati has come into existence. Around 40,000 employees now want to go back to the main Ministry. In the Report of the Ministry it has been said that the Ministry is lacking in staff and that around 8,450 posts are vacant. We understand that this is a very strong mass media which is entrusted with the task of projecting Government policies and also highlighting and focussing on social issues, educational issues and various other informative issues without taking a partisan view. But many of the posts are vacant. The work load has increased. There are now about 30 channels, 60 production facilities, but funds for the software production has decreased. They need funds to develop better broadcasting systems. On the one hand they complain about non-availability of funds, on the other hand, they are unable to use the funds that are available for their daily use.

          Sir, casual staff and artists of the AIR are discriminated against the DD casual staff. When I was a Member of the Parliamentary Standing Committee on Information Technology, I used to receive a number of complaints from these workers who worked on a casual basis. They work day and night, but they are not accorded the same status as that of the DD casual staff. The Group of Ministers was supposed to take up this issue, but nothing so far has been done. In this connection I would like to point out some of the issues of the Akashvani and Doordarshan. There have been a number of demonstrations by the employees of these two organisations and a negotiation was assured by the Ministry and the Prasar Bharati saying that their issues would be fully looked into. After convergence, the Engineering and the Programme employees only were granted upgraded pay scales.[R10]  At the same time, the performance of the administrative employees is really vital and they are working in the administrative set-up.  But they were not granted the upgraded pay scales. There is no justification for that. They are all working in the same institution but when they came to the Prasar Bharti, what is the justification for not giving the same status for them?  I will ask the Minister concerned about it and I do not know whether he knows about it or not. … (Interruptions) The concerned Minister assured, within these two years, that the Government is going to look into the matter and the Group of Ministers will be taking it into account. There was an agenda for it but it was not discussed… (Interruptions)  I take it seriously because from 22nd April onwards, the Akashvani employees are on indefinite hunger strike.  So, I request the Government to take up this issue because they have been demanding on this issue for a long time.

          Either it is Prasar Bharti or Doordarshan, we should take an independent stand because it is the Government which is giving funds and it is deciding on policy issues .  It is really unfortunate to say that, in West Bengal, there was a feeling or panorama that it was related to Nandigram issue.  We know that regarding Nandigram, there are different views by the Congress or the CPI(M) or the Left Parties.  But as far as Doordarshan or Prasar Bharti is concerned, how is it possible to give such things to the people?  That is also against the Government.  I do not take it that it is the case of West Bengal or the Central Government or Prasar Bharti.  But when we take up the issue, as stated by the hon. Member, they have the freedom. At the same time, that should be utilized.  Their main objective or issue should be national integration or the status of the nation.   In some cases, we say that there is the right of expression or the freedom of expression.   Of course, I do not underestimate the freedom of expression. But these unrealistic views that we project, wrong information that we give may really lead to communal feelings or clashes sometimes and other unwanted incidents.  The Government should  take that matter seriously. 

          There is the electronic monitoring system brought out by the Government.  But I do not think it is possible for the system to manage because the electronic media, national media, the State media and the local media are mushrooming. There  is no control at all, as stated by the hon. Minister.  There are many indecent telecasting women like the fashion parade or the propaganda.  As far as private owners of channels are concerned, they have no social obligations. What they need is the profit or the money.  Nowadays, we watch the advertisements during the serials in the television.  There is 50 per cent of news and 50 per cent of advertisements.  I fear that after some years, the news items may be 25 per cent and advertisement will be 75 per cent.  That is the trend that we see especially in the private channels.  So, the Government has to take strong steps in this regard.   There are about ten million viewers everyday, be it the case of Prasar Bharti or the All India Radio. So, their importance is very clear. The Government has to take strong steps to control the media and it is on this basis that I said it in the initial st[MSOffice11] age. … (Interruptions)

15.00 hrs. [MSOffice12] 

Compared to other television channels, Doordarshan is doing a better job.  So, we have to praise and protect the Prasar Bharati and the Doordarshan.  I do not under-estimate their importance because it is only the Doordarshan and the Prasar Bharati which are playing a vital role. I have pointed out the shortcomings. Now, we can watch Lok Sabha Channel because it takes up very serious issues, though it also shows films and serials.  But that is not the case as far as private television channels are concerned. 

          We have to think about globalisation and liberalisation.  Of course, the Government supports globalisation and privatisation to a great extent.  As stated by other hon. Members also, we have to see its effects on our mass media, culture, education, etc.  So, the Government has to take that issue into consideration.

          Initially I said that there is a big gap between the expenditure incurred and the Budget sanctioned.  We have allotted Rs. 1,497.74 crore for the next year.  How is the Ministry going to spend it? I would like to know whether there are any good plans or not. 

I would request that all these issues have to be considered. 

 

 

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (चायल) : माननीय उपाध्यक्ष महोदय, मैं वर्ष 2008-09 के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय के निर्माणाधीन अनुदान की मांगों के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। जैसे अभी माननीय सदस्यों के विचार आए हैं, इसमें कोई असत्य बात नहीं है, लेकिन जहां तक विचार करने की जरूरत है, आज देखा गया है कि लोक सभा में लोक सभा टीवी चैनल की शुरुआत हुई है। मंत्री जी उस कमेटी में उपाध्यक्ष हैं। मुझे सौभाग्य प्राप्त है कि मैं उस कमेटी में मैम्बर हूं। उस बैठक में कई बार ऐसी चर्चा हुई। माननीय मंत्री जी के विचारों और भाव से ऐसा प्रतीत हुआ कि वाकई वे इस चैनल को आगे बढ़ाने के लिए, चाहे वह दूरदर्शन हो, कुछ करना चाहते हैं। सूचना और प्रसारण मंत्री और संसदीय कार्य मंत्री के रूप में हम लोगों ने उन्हें बहुत नजदीक से देखा है। यह बात सत्य है कि संसदीय कार्य मंत्री होने के नाते आपने ज्यादातर वक्त सदन को चलाने में दिया। हो सकता है कि आपने कुछ वक्त नहीं दिया हो, प्रसार भारती के लिए, लेकिन काफी सुधार किया है। कार्मिक लोक शिकायत और विधि न्याय मंत्रालय में भी हमने प्रसार भारती के विषय में काफी विस्तार से चर्चा की थी और उसमें तमाम सुझाव दिए हैं। आज यदि इस विभाग को सही मायने में देखा जाए, तो यह विभाग समाज की संस्कृति और सभ्यता का दर्पण है। यदि उस रूप में देखें तो तमाम बातें यहां चर्चा में आई हैं, जैसे बच्चों के बारे में कहा गया, चाहे दूरदर्शन के कार्यक्रम हों, आकाशवाणी के कार्यक्रम हों या तमाम इलैक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े हुए प्रचार-प्रसार के जो माध्यम हैं, यदि देखा जाए कि बच्चों पर उसका क्या प्रभाव और कुप्रभाव पड़ा, इस बारे में विस्तार से चर्चा हुई है। लेकिन सोचने वाली बात है और मेरे ख्याल से इस सदन में जीरो आवर में भी चर्चा हुई है और समय-समय पर बराबर चर्चाएं हुई हैं कि यदि हम किसी भी चैनल पर समाचार भी देखना चाहें, तो जो विज्ञापन आते हैं, वे इतने भद्दे हैं कि हम अपने बच्चों और परिवार के साथ समाचार नहीं देख सकते।[N13]   आज यह स्थिति है।  मंत्री जी को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि कम से कम भद्दे विज्ञापन हैं उन पर रोक लगनी चाहिए। दूसरी बात मैं यह कहना चाहूंगा कि फैशन शो के बारे में बहन सुमित्रा महाजन जी ने बड़े विस्तार से कहा है, यह होना चाहिए। लेकिन हमारी जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता है, उसके अनुरूप अगर यह हो तो किसी को उससे गुरेज़ नहीं होगा।  हम उसका स्वागत करते हैं।

          मैं माननीय मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में उत्तर मध्य सांस्कृतिक केन्द्र है जो केन्द्र सरकार द्वारा संचालित है, जिसमें एक आईएएस अधिकारी मुख्य पदाधिकारी हैं।  उसके लिए करोड़ों रूपए जाते हैं, लेकिन वह पैसा कहां और कितना खर्च होता है, उसका कोई लेखा-जोखा नहीं है। वहां के स्थानीय जनप्रतिनिधियों को किसी कार्यक्रम की जानकारी नहीं दी जाती है।  इस विभाग में जिन कार्यक्रमों का प्रस्तुतिकरण होता है, उनमें बहुत अच्छे कलाकारों आते हैं, लेकिन वहां की जनता और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को बिल्कुल नजरअंदाज करके, इसे स्थानीय अधिकारियों की मौज-मस्ती का विभाग बना दिया गया है।  पूरी तरह से उन अधिकारियों के घर-परिवारों के लोग वहां जाते हैं, वहां जो कलाकार चाहते हैं, हायर करते हैं और उसका लुत्फ लेते हैं।  उत्तर प्रदेश में यह ऐसा एकमात्र केन्द्र है, इसमें समाज के लोगों और जनता से जुड़े हुए लोगों को कम से कम ऐसे कार्यक्रम दिखाने चाहिए जिससे हमारी संस्कृति और सभ्यता मजबूत हो, अच्छी बन सके। दूसरी तरफ आज एफएम और एफएम बैण्ड के बारे में यहां कहा गया है।  लेकिन हम लोग जब अपने क्षेत्रों में जाते हैं तो अक्सर देखा गया है कि हम लोगों ने गाड़ियों में समाचार वगैरह सुनने के लिए जो रेडिया लगा रखा होता है, उस पर जब कोई गाना आता है तो वह जिस प्रकार टेप रिकॉर्डर में कैसेट की रील फंस जाती है, उसी तरह वह पांच-पांच मिनट के लिए फंस जाता है और इससे उस कार्यक्रम का आनन्द खत्म हो जाता है।  इसकी ओर भी आपको ध्यान देना चाहिए कि दूरदर्शन में अगर इस प्रकार के इक्विपमेंट हैं जो खराब और पुराने हो गए हैं तो उनको बदलना चाहिए।

          आजकल आप सेटेलाइट के माध्यम से कार्यक्रम प्रसारित करते हैं लेकिन कई जगहों पर, ग्रामीण इलाकों में उसका सिगनल वीक होने के कारण कार्यक्रम नहीं पहुंचते हैं।  ऐसे एरियाज में विदेशी चैनल  तो बहुत साफ आते हैं, लेकिन आपके दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रम बिल्कुल कमजोर सिगनल होने के कारण वहां नहीं पहुंचते हैं।  इसकी ओर ध्यान देने की जरूरत है। कार्यक्रम ऐसे होने चाहिए जो देशभक्ति से जुड़े हों, सामाजिक गाने हों।  पुरानी फिल्मों के गाने बहुत अच्छे लगते हैं क्योंकि उन गानों में एक राग, साज और लय होती है जिसका एक मतलब होता है।  उसका समाज पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।  टीवी पर आजकल बहुत से ऐसे सीरियल आ रहे हैं जो वाकई घर-परिवार को लड़ाने और बर्बाद करने वाले सीरियल हैं। ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगनी चाहिए।  इसके लिए आपने सेंसर बोर्ड बनाया है।  सेंसर बोर्ड को कम से कम यह देख लेना चाहिए कि उस कार्यक्रम का समाज पर क्या कुप्रभाव होगा।  इसको अच्छी तरह देखकर ही प्रसारण कराना चाहिए। अभी जब बीच में रामायण का प्रसारण हुआ था, उस समय जब रामायण शुरू होता था, सड़कें खाली हो जाती थीं, लोग अपने काम-काज छोड़कर रामायण देखने के लिए बैठ जाते थे।  इस प्रकार के कार्यक्रम अगर बनें तो बहुत अच्छा होगा।  

          मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि  आज हमें सूचनाएं देर से मिलती हैं। इसके लिए में निवेदन करूंगा  कि चाहे आकाशवाणी हो या दूरदर्शन हो, इस पर कम से कम हर आधे घंटे पर राष्ट्रीय और प्रादेशिक समाचार प्रसारित होनी चाहिए जिससे लोगों को पता चल सके कि हमारे देश या प्रदेश में क्या हो रहा है।  न्युज प्रसारण में विज्ञापन बिल्कुल नहीं होने चाहिए, तभी जाकर उसका आनंद आता है।  इसी प्रकार ब्रेकिंग न्युज की बात कही गयी है।  अगर किसी जगह कोई घटना घटित हुई है तो सभी कार्यक्रम रोककर उसे पहले देना चाहिए।  आजकल अनेक टीवी चैनल्स पर ग्रहों और राशियों के बारे में अनेक कार्यक्रम आते हैं।  पता नहीं टीवी चैनल्स को क्या हो गया है कि हमेशा ऐसा कार्यक्रम आते हैं कि आज आपके ग्रहों की दशा कैसी है, आपका राशिफल क्या है।[r14]  क्या भविष्य है। दूसरी तरफ क्राइम के बारे में इतना ज्यादा डरावना चित्रण दिखाया जाता है और भूत-प्रेतों के बारे में दिखाया जाता है, जिससे अपराध को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि ऐसे की कार्यक्रम देखकर हमारे कई नौजवानों ने इस प्रकार की घटनाएं की हैं इसलिए इससे भी अपराधों में वृद्धि हो रही है। हमें देखना चाहिए कि इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। एक चैनल दवाओं के बारे में बताता है। उसमें बताया जाता है कि अमुक दवा से बाल झड़ने बंद हो जाएंगे और लम्बे हो जाएंगे। इसी तरह उसमें कहा जाता है कि इस दवा से काले लोग गोरे हो जाएंगे और छोटे कद वाले लम्बे हो जाएंगे। यह फिजूल का प्रचार हो रहा है, इस पर रोक लगनी चाहिए।

          ग्रामीण क्षेत्रों में लोक गीत बहुत प्रचलित हैं। इसलिए लोक गीतों का कार्यक्रम प्रसारित होना चाहिए और उसका समय भी बढ़ाना चाहिए। भोजपुरी लोक गीत बहुत प्रचलित हैं, उनके लिए समय देना चाहिए। हमारा देश कृषि प्रधान देश है। हमारे दूरदर्शन पर कृषि दर्शन कार्यक्रम आता है। चाहे वह दूरदर्शन पर आए या रेडियो पर आए, उसका समय जरूर बढ़ाएं। इससे सम्बन्धित कार्यक्रमों में वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को बुलाकर मौसम के हिसाब से फसलों को उपजाने की जानकारी किसानों को देनी चाहिए। मेरा तो आपसे अनुरोध है कि कृषि के लिए आप एक अलग चैनल बनाएं तो बहुत अच्छा होगा, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसलिए मैं इस पर जोर देकर कहना चाहता हूं।

उपाध्यक्ष महोदय: अब आप अपनी बात समाप्त करें, क्योंकि आपकी पार्टी से और सदस्य भी बोलेंगे।

श्री शैलेन्द्र कुमार :  मैं एक बात और कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा। आज आदरणीय मोहन सिंह जी ने सदन में कहा था कि जन्तर-मन्तर पर आपके विभाग के लोग धरने पर बैठे हुए हैं। उनकी हालत बहुत दयनीय हो गई है। हो सकता है कि उनकी मृत्यु हो जाए। आप अपने अधिकारियों को निर्देश कि वे वहां जाकर उनकी जो जायज मांगें हैं और जो आपके अधिकार क्षेत्र में आती हैं, उन्हें मानें और उनका अनशन समाप्त कराएं, तो ठीक रहेगा।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस मंत्रालय की अनुदानों की मांगों का समर्थन करता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं।                                                                                             

*SHRI E.G. SUGAVANAM (KRISHNAGIRI) : Hon. Deputy Speaker, at the outset let me thank the chair for giving me an opportunity to speak on the Demands for Grants pertaining to the Ministry of Information and Broadcasting. I extend my support to this Demand for Grants on behalf of our party, Dravida Munnetra Kazhagam.

          Broadcasting in India has witnessed vast improvement and expansion ever after the introduction of cable TV in India in 1992.  There used to be collective viewing of TV in the villages where the villagers gathered in a common place in the village to watch the community TV sets.  When compared to that the changes we now witness are manifold.  It is astonishing but true that even villagers can keep pace with city dwellers in TV viewing with the advent of cable TV.

          Introduction of DTH is a milestone in cable TV transmission.  Even people in the rural areas can receive quality picture now. It is found to be more clear than even cable TV.

          Entertainment is given priority  in many of the TV channels. Only few among them give importance to informative and special programmes.  Still there is a need to expand educational programmes.  It is necessary to keep the masses informed of the social changes brought about through development activities.  Hence I urge upon the Union Government to strengthen educational broadcasts.

          In Tamil Nadu the Governemnt led by our leader Dr. Kalaignar Karunanidhi has started distributing colour TV sets from 2006 free of cost to families living under below poverty line.  Now the Government of Tamil Nadu headed by our leader Kalaignar has extended this benefit to all the families that have got family ration cards. Wide spread availability of TV set has brought about a revolutionary change. Hence I urge upon the Union Government to take this scheme to all other states in the country and bring about a revolution in the spread of Information and Broadcasting.

 

*English translation of the speech originally delivered in Tamil.

          Cable TV operators charge exorbitantly and they threaten the public who raise objection to heavy charges.  To obviate this problem Hon. Chair Minister  Tamil Nadu has nationalized cable net work transmission.  The Government cable TV can now few cable connections at economical rates.  Hence I urge upon the Union Government to consider expanding it to all the states.

          Film Industry contributes to tax revenue of the Government in a big way.  In the last two years alone more than 50,000 crores of the rupees have been earned in this filed.   But the living condition of the workers in the film production units must improve.  Hence I urge upon the Union Government to set up a Fund to ensure social security for the workers and artists in the Film Industry.

          The guidelines given to the Censor Board must be streamlined.  Excessive violence and public display of obscenity must be restricted.  Depiction of national leaders and physically challenged people in a poor light must be avoided in our films and TV programmes.

          The quality of broadcasting and telecasting must improve.  State owned Radio and Television Organisations must overcome shortage of staff and must go in for increasing staff strength and enhancing programme quality.  Ever after setting up of Prasar Bharathi the service conditions of staff have become uncertain and even those who have been recruited as Government servants are left in the lurch.  As the employees of Doordarshan and Akashwani are like a link between the state and its people, they must be extended with all the pay and perks on a par with Government servants.  The grievances of these employees must be redreased.  For more than 20 years Programme Executives have not got even a single promotion because of the wrong policies of the Government especially the Information and Broadcasting Minsitry. 

          It is a welcome move that more and more FM Broadcast services are permitted in the private sector. In between the entertainment programmes they must relay news bulletins also.  Community radio must be encouraged.  Television must pervade  through all the villages cent percent.

          Cinema Industry is investment oriented and film making calls for huge investment. But unscrupulous elements are bringing out illegal VCDs and make money causing huge loss to the original movie makers.  I urge upon the Government to take severe action to prevent the menace of illegal CDs.

          Film festivals and Film Award functions must be organized in different parts of the country. There must be Film Festivals in all the four regions of the country every year.

          I also urge upon the Information and Broadcasting Ministry to modernize our broadcasting stations. Old gadgets are used still resulting in poor quality transmissions.  Hence Information and Broadcasting Ministry must step up measures to go in for modern equipment and state of the art technology.

          The state owned media appears to promote just one or two sport events.  This must be changed.  All the disciplines of sports must find place in TV broadcasts.  Even our national game, Hockey gets a step motherly treatment.  Hence Information and Broadcasting Ministry must promote all the important sports events. 

          Chennai city is emerging as a hub of information and communication technology and also as a centre of multi media.  A film institute or a communication institute of international standard must be set up in Chennai.  Hence I urge upon the Union Government to set up a Mass Communication Institute there.

          Dharmapuri and Krishnagiri in my constituency may be provided with broadcasting stations and ensure fulfledged broadcasting from those towns that may benefit the backward rural areas surrounding them.

          Film Industry must be recognized and accorded the status of a fulfledged industrial sector.  Liberal credit facility through Nationalised Banks must be extended at reduced rates. I also urge upon the Union Government to look into the long felt demands of the doyens of the Film Industry.  I also urge upon the National Pothigai Tamil TV Channel as a full fledged 24 hours channel.

          The Government of Tamil Nadu is encouraging the film makers who promote Tamil in our state.  Similarly every state must be encouraged to promote their language and culture.

          In metropolitan cities like Delhi, Cineplex and multiplex have emerged and charge exhorbitantly Rs.300 or 400 per ticket.  The Government must take care to see that public viewing and collective viewing of films are encouraged and they are not beyond the reach of the poor people.  Films that promote places of tourism importance must get incentives.  Wild and pet animals used to be star attractions in films earlier.  Now animals can not be cast in movies that easily.  Even mere showing of animals like pets call for permission from Central Animal Welfare Board.  This unnecessary restriction must be lifted.

Extending my support to the Demands for Grants to the Information and Broadcasting Ministry, let me conclude. 

 

 

 

 

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