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Lok Sabha Debates
Discussion On The Motion Of Thanks On The President Address To The Both … on 15 March, 1999

Title: Discussion on the motion of thanks on the President address to the both Houses of Parliament assembled together on the 22nd February, 1999, moved by Smt. Sushma Swaraj and seconded by Shri Ajit Kumar Panja on the 11th March, 1999.

13.21 hrs.

  प्रधान मंत्री (श्री अटल बिहारी वाजपेयी): अध्यक्ष जी, इससे पहले कि मैं महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर हुई बहस का उत्तर दूं, मैं कहना चाहता हूं कि उत्तर मुझे नहीं देना है, सुषमा स्वराज को उत्तर देना है। मैं तो बहस में हस्तक्षेप कर रहा हूं। लेकिन भाषण से पहले मैं यह कहना चाहता हूं कि हम महामहिम राष्ट्रपति जी को धन्यवाद देने जा रहे हैं इसके साथ ही हम उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना भी करते हैं। उनका कैटेरेकट का ऑपरेशन हुआ है जो सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ है, थोड़े दिनों में वे दिल्ली वापस आ जाएंगे। हम उनके लम्बे जीवन की भी कामना करते हैं। हमारे दो पूर्व प्रधान मंत्री जी भी इस समय इलाज के लिए विदेश गये हुए हैं। वे जल्दी स्वस्थ होकर हमारे बीच में आएं, यह मेरी कामना है और मैं समझता हूं कि सारा सदन इसमें सहयोग देगा।

  इस चर्चा में लगभग ४० सदस्यों ने भाग लिया और सभी विषयों का समावेश हुआ, विस्तार से चर्चा हुई। मुझे दुख है कि मैं चर्चा के दौरान पूरे समय सदन में उपस्िथत नहीं हो सका। मैं मानता हूं कि मुझे यहां रहना चाहिए था।

  श्री पी. शिव शंकर (तेनाली): आपके मनिस्टर आ गये।

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी: इससे यह गलत साबित हो गया कि उन्होंने वॉक-आउट किया था। अध्यक्ष जी, राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में यथार्थ का चित्रण किया गया है। उसमें न तो सरकार की उपलब्िधयों का बढ़ा-चढ़ाकर बखान किया गया है और न ही हवाई वायदे किये गये हैं। हमारी सरकार का एक साल पूरा होने जा रहा है और इस एक साल में हमने स्िथति को सुधारने की कोशिश की है और स्िथति में सुधार हुआ भी है। हमारे कट्टर से कट्टर आलोचक भी यह मानते हैं कि सरकार के बारे में जो भविष्यवाणियां की जाती थीं, कि सरकार टूट जाएगी, अपने आप बिखर जाएगी, वे भविष्यवाणियां सच साबित नहीं हुईं। सरकार का बहुमत हमने सदन में सिद्ध किया है, आर्िथक स्िथति को सुधारने में सफलता पाई है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस देश में मिलीजुली सरकारों का प्रयोग अभी तक सफल नहीं हुआ है और हम इसे सफल करने में लगे हैं। अब आसेतु हिमाचल एक पार्टी का वर्चस्व होगा, ऐसा दिखाई नहीं देता है। अखिल भारतीय दलों को क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर काम करना होगा। क्षेत्रीय दल सचमुच में अखिल भारतीय दलों की कुछ कमियों के कारण इतने प्रभावशाली हुए हैं। प्रदेशों की भावनाओं को प्रतबम्िबत करना उनकी आशाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप आचरण करना राष्ट्रीय दलों के लिए कठिन होता है। क्षेत्रीय दल त्ृाणमूल से जुड़े होते हैं।

और वे उस क्षेत्र की भावनाओं का प्रतनधित्व करते हैं। यह देश वविधता से भरा है। इसकी वविधता वभिन्नता के रूप में राजनीतिक क्षेत्र में भी प्रकट होती है, होनी चाहिए। जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो हमने सरकार बनाने का निश्चय किया। मिली-जुली सरकार चलाना एक कठिन काम है, लेकिन लोकतंत्र में यह कठिन काम भी करना पड़ता है। हम जिन के साथ मिल कर चुनाव लड़े थे, उनको साथ लेकर चल रहे हैं। प्रश्न केवल सत्ता के बंटवारे का नहीं है। पंजाब में अकाली दल के साथ हमारा सहयोग केवल सत्ता के लिए नहीं है। वहां भाईचारा बना रहे, इस दृष्िट से वह बड़ा उपयोगी है। यह बात और क्षेत्रों पर भी लागू होती है। हम इस प्रयोग को सफल बनाना चाहते हैं। आशा है कि हम इसमें सफलता प्राप्त करेंगे।

  अध्यक्ष महोदय, साल भर पहले जो स्िथति थी, वह स्िथति बदल गई है। मौसम में परिवर्तन हो गया है। पोखरण के परीक्षण के बाद यह प्रयत्न किया गया था कि भारत को अलग-थलग कर दिया जाए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  डा. शकील अहमद (मधुबनी) : लेकिन इसके बाद आपकी चुनावों में हार हुई। … (व्यवधान)

MR. SPEAKER: Dr. Shakeel Ahmad, please do not disturb. What is this? (Interruptions)

MR. SPEAKER: Dr. Shakeel Ahmad, you are unnecessarily disturbing the House, wasting its time.

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी : अध्यक्ष जी, हमें विश्व में अकेला करने का प्रयास हुआ था। आर्िथक प्रतिबन्ध लगाए गए थे। यह उम्मीद की जाती थी कि भारत इस चुनौती का सामना नहीं कर सकेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हमने भारत की सुरक्षा की आवश्यकताओं को अनुभव करके पोखरण का विस्फोट किया। आज जो भी विदेशी भारत आता है और जो विदेशी मेहमान हम से दूर-दूर रहते थे, आज वे आने के बाद यह नहीं पूछते कि आपने पोखरण में परमाणु परीक्षण कयों किया? वह हमारे साथ व्यापार की बातें करना चाहते हैं, आर्िथक सहयोग को बढ़ाने की बातें करना चाहते हैं। हमारे सुरक्षा के तकाजों के बारे में उनमें एक नई समझ-बूझ पैदा हुई है। हमारा परमाणु परीक्षण केवल शौर्य प्रदर्शन के लिए नहीं था। हमारी सुरक्षा की आवश्यकता उसके साथ जुड़ी हुई थीं। आज इस बात को अच्छे से अच्छे ढंग से समझा जा रहा है और ज्यादा से ज्यादा देश समझ रहे हैं।

  अध्यक्ष महोदय, मुझे एक माननीय सदस्य के भाषण को पढ़ कर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि अब अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की आवाज नहीं सुनी जाती। उन्होंने यह भी कहा कि सार्क देशों के साथ हमारे सम्बन्ध अच्छे नहीं हैं।

यह अनावश्यक आलोचना है। हम आलोचना का स्वागत करते हैं। निंन्दका पे घर असावे-शेजारी- यह मराठी में एक कहावत है। “निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय।” आलोचना करने वाले को अपने पास रखो कयोंकि हां में हां मिलाने वाले आपका फायदा नहीं करेंगे। लेकिन आलोचना तथ्यपरक होनी चाहिये। सार्क के सभी देशों के साथ हमारे संबंधों में मजबूती आई है। श्रीलंका के साथ हमने एक समझौता किया जिसे अंतिम रूप दिया जा रहा है। हम तामिलनाडु और केरल के हितों की पूरी रक्षा करेंगे, हम यह आश्वासन देना चाहते हैं। नेपाल के साथ एक ट्रांज़िट ट्रीटी हुई है जिससे कि भविष्य में इस संबंध में अनश्िचतता नहीं होगी। बांगला देश के साथ हमारे संबंध घनिष्ठ हुये हैं। अब ढाका और कलकत्ता के बीच में बस सेवा शुरु करने का फैसला हो गया है। मुझे पाकिस्तान जाने का अवसर मिला। मैं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के निमंत्रण पर गया। मैंने चलने वाली बस का लाभ उठाया। मुझे संतोष है कि हमारी अच्छी बातचीत हुई। वहां जो लाहौर डैकलेरेशन हुआ तथा विदेश सचिवों के बीच में एक मैंमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग तैयार हुआ, उसमें कुछ नये कदम उठाने की घोषणा की गई है। अब हम और पाकिस्तान दोनों अणु अस्त्रों से लैस देश हैं। अब मिलकर रहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं। परमाणु हथियार, हमले का हथियार नहीं है, यह बचाव का हथियार है। यह ऐसा हथियार है जो शान्ित बनाये रखने में सहायक हुआ है। अगर शीत युद्ध के दिनों में शकित का संतुलन नहीं होता- बैलेंस ऑफ टैरेर तो एक पलड़ा एक तरफ झुक सकता था, एक पक्ष ज्यादती कर सकता था। ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जी मुझसे पूछते थे कि आपने परमाणु परीक्षण उस वकत कयों किया, कया सूझ-बूझ से तारीख तय की थी। हमने कहा हमने सूझ-बूझ से कदम उठाया लेकिन आप बतायें कि यह सब कयों पूछ रहे हैं। हंस कर कहने लगे कि आपने ऐसा वकत चुना जब हमारा फारेन एकसचेंज रिजर्व सबसे कम था, पाकिस्तान इसके कारण संकट में फंसा। हम भी संकट में फंसे। लेकिन जनता के सहयोग से, सदन की शुभकामना से हमने उस दबाव का सामना किया। यह इस बात का सबूत है कि हमारी अर्थ-व्यवस्था सुदृढ़ है, हम किसी भी संकट का सामने करने में समर्थ हैं। हम पाकिस्तान के साथ सब विषयों पर वार्ता करके मामले हल करना चाहते हैं। पचास साल में तीन बार लड़ाइयां हो चुकी हैं। अब लड़ाई को हमेशा के लिये रोकने का उपाय करना होगा। इसके लिये संवाद के अलावा और कोई चारा नहीं है। कोई भी मसला हो, हम वार्ता के लिये तैयार हैं।

  जब मैं पाकिस्तान में लाहौर में था तो उसी दिन राजौरी में हत्याकंड की खबर आई। मैंने पाकिस्तान के प्रधान मंत्री से उसी समय कहा कि ठअगर निदर्ोष लोगों की हत्या का सिलसिला जारी रहा तो यह मित्रता की जो बस है, वह उनकी लाशों के ढेर के आगे रुक जाएगी। ये हत्याएं बंद होनी चाहिए। मैं उम्मीद करता हूं कि जब दोनों देशों के संबंध सुधर रहे हैं तो किसी तरह के आतंकवादी और विदेशी आतंकवादी आजकल ज्यादा आ रहे हैं सीमा पार से, हमारे यहां न आएं यह बात हमें ध्यान में रखनी चाहिए। यह कहना कि दोनों देशों में जो घटनाएं होती हैं उसके लिये एक दूसरे को दोष देने का सिलसिला चल पडा है, ठीक नहीं है, अपने लोगों को हम तो नहीं मार सकते! वे आपसी दुश्मनी के भी शिकार नहीं हुए, तो उन्हें मारने वाला कौन है? सीमा आपसे लगी है, आप रोकिये।”

  जो डिकलेयरेशन हुआ है, उसमें दोनों देशों ने आतंकवाद से उसके सभी स्वरूपों में लड़ने का निश्चय व्यकत किया है। शिमला समझौते में फिर से निष्ठा प्रकट की गई है। यह कहा गया है कि शिमला समझौते का हम लैटर और स्िपरिट दोनों में पालन करेंगे। इस शिकायत का अर्थ नहीं है कि हमने शिमला समझौते का महत्व घटा दिया। सचमुच में हमने शिमला समझौते का महत्व बढ़ा दिया। दोनों देशों के बीच विश्वास जमाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। हम वीज़ा प्रणाली में परिवर्तन करना चाहते हैं। बंदियों की रिहाई होनी चाहिए। मछुआरे पकड़ लिये जाते हैं। मछुआरे जाते हैं मछली पकड़ने के लिए, खुद पकड़ में आ जाते हैं और महीनों तक जेल में पड़े रहते हैं। दोनों तरफ ऐसा होता है। लड़ाई के ज़माने के लोग भी कैदी हैं। उनके सारे मामलों पर विचार करके रिहाई होनी चाहिए। आना-जाना बढ़े, व्यापार के रास्ते खुलें, एक दूसरे के साथ सहयोग करें और साथ-साथ सारी समस्याओं को हल करने के लिए भी कदम उठाएं, इस बात की आवश्यकता है और मुझे विश्वास है कि इसी तरफ दोनों देश आगे बढ़ेंगे।

  अध्यक्ष महोदय, इस चर्चा में बहुत से मुद्दे उठाए गए हैं। सभी मुद्दों का एक-एक करके जवाब देना तो संभव नहीं होगा लेकिन कुछ मुद्दे मैं सदन के सामने रखना चाहता हूं। कुछ माननीय सदस्यों ने कहा कि राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में परिवार नियोजन के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। मैं मानता हूं। परिवार नियोजन के संबंध में हमारी मिली-जुली सरकार की एक नीति है और हमारे नेशनल ऐजेण्डा में भी उसका उल्लेख किया गया है। जो कुछ हमने ऐजेण्डा में कहा है, मैं उसको यहां उद्धृत करना चाहता हूं। हमारे शब्द इस प्रकार के हैं —

  “जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहनों एवं निरुत्साहनों

-incentives and disincentives का उपयुकत एवं समझदारी पूर्वक सम्िमश्रण शीघ्र प्रस्तुत किया जाएगा ताकि इस अति महत्वपूर्ण मुद्दे पर राष्ट्रीय प्रतिबद्धता स्थापित की जा सके।”

  सरकार ने एक दस्तावेज तैयार किया है परिवार नियोजन के बारे में।

उस पर मंत्रिमंडल में थोड़ी सी चर्चा हुई हैं। हमने उसे मंत्रियों के एक छोटे से दल को विचार के लिए सौंप दिया है। प्रश्न नाजुक है और इस पर एक आम राय बनाना बहुत जरूरी है। वैसे जो विदेशी आते हैं वे सुनकर ताज्जुब करते हैं कि भारत में परिवार नियोजन सफलता के साथ चल रहा है और व्ृाद्धि की दर जो २.१ परसेंट थी, वह अब घटकर १.८५ परसेंट रह गई है। लेकिन घटने के बाद भी प्रति वर्ष हम एक करोड़ ७० लाख की संख्या में बढ़ रहे हैं। यहां चीन से हमारी भिन्नता है। कुछ प्रदेशों में परिवार नियोजन और भी सफलता के साथ चला है, कुछ प्रदेश ऐसे है जो इस मामले में पिछड़ रहे हैं। लेकिन यह ताज्जुब की बात है और ऐसा नहीं होना चाहिए कि जिन प्रदेशों में परिवार नियोजन है, जो अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण कर रहे हैं, उनकी लोक सभा की सीटें कम हो जाएं, लेकिन सीटें कम हो रही हैं। इस स्िथति को बदलना पड़ेगा। सीटों की संख्या नश्िचत होनी चाहिए, हर प्रदेश के साथ वह जुड़ी हुई होनी चाहिए और परिवार नियोजन के लिए कदम उठाये जाने चाहिए। मुझे सोज़ साहब के भाषण को पढ़कर खुशी हुई, उन्होंने इस बात का खंडन किया कि जम्मू-कश्मीर में आबादी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि हम परिवार नियोजन में विश्वास करते हैं और जम्मू-कश्मीर में आबादी बढ़ नहीं रही है, गलत प्रचार हो रहा है। परिवार नियोजन के सवाल पर सब दलों को मिलकर बैठना होगा। यह राष्ट्रीय प्रश्न है। कोई दल अकेले या कोई सरकार अपने में इसका हल नहीं खोज सकती है। प्रश्न नीति के निर्धारण का है, प्रश्न कार्यान्वयन का भी है और इस दृष्िट से सभी दलों को विचार करना चाहिए कि किस तरह के कदम उठायें।

  अध्यक्ष महोदय, कृषि नीति का दस्तावेज तैयार है। विशेषज्ञों की राय ली जा रही है और थोड़े ही समय में कृषि नीति के संबंध में वह दस्तावेज सदन के सामने पेश कर दिया जायेगा। अनेक सदस्यों ने नई फसल बीमा योजना के लागू किये जाने में विलम्ब का प्रश्न उठाया है। अभी जो फसल बीमा योजना चल रही है, वह सारे किसानों का समावेश नहीं करती, वह सारी फसलों का भी समावेश नहीं करती। जो ऋण लेते हैं उन्हीं तक वह सीमित हैं। इन सारी कमियों को हम दूर करने जा रहे हैं और एक संशोधित बीमा योजना तैयार कर रहे हैं जो किसानों के हितों का संवर्धन करेगी। योजना लगभग तैयार है और इसे १९९९ की खरीफ फसल से लागू करने का इरादा है। मंत्रिमंडल ने संशोधित योजना को लागू करना सिद्धांतत: स्वीकार कर लिया है। नई योजना के अंतर्गत किसानों को अधिक लाभ मिलेगा, जैसा मैंने कहा उसमें नई फसलें शामिल की जायेंगी और सभी किसानों को उसमें भागीदार बनाने का प्रयास होगा। जिन्होंने ऋण लिया है वे तो उसमें शामिल होंगे ही, मगर जिन्होंने ऋण नहीं लिया है, लेकिन जो प्राकृतिक आपदाओं बाढ़ या सूखे के शिकार हो जाते हैं, योजना उनका भी विचार करेगी। छ: लाख किसानों को अभी तक क़ेडिट कार्ड दिये जा चुके हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से कहा जा रहा है कि अगले साल यह संख्या २० लाख हो जानी चाहिए।

अध्यक्ष महोदय, प्रतिपक्ष के नेता श्री शरद पवार ने अपने भाषण में डा. बाबा साहब अम्बेडकर का दिल्ली में स्मारक का मामला उठाया। डा. अम्बेडकर २६, अलीपुर रोड पर रहते थे। उस जगह को हस्तगत करके उसे स्मारक बनाने की बात है। यह कहना कि स्मारक के लिए अभी तक कोई धन खर्च नहीं किया गया है, ठीक नहीं है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने २६ मार्च, १९९७ को ही हमारे आने से पहले, कयोंकि बाबा साहब अम्बेडकर स्मारक, कोई पार्टी का मुद्दा नहीं है, उसी समय १९९७ में ७.१२ करोड़ रुपए भवन हस्तगत करने के लिए पेशगी के रूप में दे दिए गए थे, लेकिन हस्तगत करने, एकवायर करने की जो नीति थी, उसको चुनौती दी गई। एक अन्तरिम आदेश में लैंड एकवीजीशन कलैकटर को निर्देश दिया गया कि जब तक रिट याचिकाओं का फैसला नहीं होता, तब तक क्षतिपूर्ित के एवार्ड की घोषणा न की जाए। तब से यह मामला अदालत में लटका हुआ है। हम इसे अदालत से जल्दी हल कराने का प्रयास कर रहे हैं। वभिन्न मंत्रालय एक-दूसरे से संपर्क में हैं। सम्पत्ित के मालिकों से भी बातचीत हो रही है। अगर पवार साहब का उनके ऊपर प्रभाव चले, तो वे उसको जरूर काम में लाएं। हम उसका स्वागत करेंगे।

  यह कथन भी सही नहीं है कि दलितों के कल्याण के लिए नर्िमत वभिन्न संस्थाओं के लिए धन आबंटित नहीं किया गया। १९९७-९८ में दलितों के लिए जो धनराशि रखी गई थी वह ६११.७७ करोड़ रुपए थी। इसमें से ६१०.२४ करोड़ रुपए खर्च हुई। १९९८-९९ में यह धनराशि बढ़ाकर ७३३.७० करोड़ रुपए रखी गई जिसमें से १२ मार्च, १९९९ तक ६०९.५६ करोड रुपए खर्च हुए हैं। प्रतिपक्ष के माननीय नेता ने डा. अम्बेडकर ओवरसीज फैलोशिप का भी उल्लेख किया था। जांच के बाद पता लगा है कि फाउंडेशन की गवर्िनंग बाडी ने इस योजना को हमारी सरकार के आने से पहले ही १९९७ में समाप्त कर दिया था, किन्तु अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए नैशनल ओवरसीज स्कालरशिप स्कीम चल रही है और इसमें अनुसंधान करने वालों का वजीफा ६६०० डालर से बढ़ाकर ७७०० डालर कर दिया गया है। पहले यह प्रतिबन्ध था कि एक परिवार से दो लड़कों को पोस्ट मैटि्रक स्कालरशिप स्कीम के अन्तर्गत वजीफा मिले, अब इसको हटा दिया गया है। उत्तर पूर्व के राज्यों में इस संबंध में अनेक सुविधाएं दी जा रही हैं। अनुसूचित जाति की लड़कियों के लिए जिनमें साक्षरता का प्रचार बहुत कम हुआ था, एक विशेष कार्यक़म लागू किया गया है। ऐसे ४८ जिले छांटे गए हैं जिनमें अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों में साक्षरता का अनुपात केवल दो प्रतिशत है। इसके लिए अलग से धन आबंटित किया गया है और खर्चा भी किया जा रहा है। यह कहना भी सही नहीं है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए काम करने वाले एन.जी.ओज. को कोई धन आबंटित नहीं किया गया है। सच यह है कि १९९७-९८ में १० करोड़ ६४ लाख रुपए सहायता के रूप में दिए गए थे। हम इस राशि को आवश्यकता पड़ने पर और भी बढ़ा सकते हैं। अध्यक्ष महोदय, एक मामला सार्वजनिक उद्योगों से संबंधित है। जब सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योग स्थापित किए गए, तो उनका स्वागत करने वालों में मैं भी था। जब पंडित जी ने इन उद्योगों की बड़ी प्रशंसा की और सरकार द्वारा पूंजी लगाने का एक अभियान शुरू हुआ, तो देश को यह आशा थी कि यह राष्ट्रीय संपत्ित होगी और यह राष्ट्र के कल्याण में सहायक बनेगी। लेकिन आज जो तस्वीर है, उसे देखकर चिन्ता होनी स्वाभाविक है। कया कारण है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग इतनी बड़ी संख्या में बीमार पड़ते हैं, बन्द करने की नौबत आती है, घाटे में जाते हैं।

कुछ आंकड़ें मेरे पास हैं। उनके अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बीमार उद्योगों का आज तक का घाटा ४१,२६४.५५ करोड़ रुपये है। कुल २३६ सार्वजनिक उद्योग हैं जिनमें से १०४ घाटे में चल रहे हैं। सबसे अधिक घाटा फर्िटलाइजर कापर्ोरेशन ऑफ इंडिया का है। फर्िटलाइजर के अलावा टैकसटाइल, कोयला और इस्पात उद्योगों में घाटा हो रहा है।

  यदि तेल क्षेत्र के सार्वजनिक उद्योग के मुनाफे को अलग कर दिया जाये तो सम्पूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र का शुद्ध लाभ बहुत ही कम बचता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम घट गये इसलिए हमारा लाभ बढ़ गया है। इन उद्योगों के बारे में गहराई से विचार करना होगा।

  एक नीति हमें उत्तराधिकार में मिली थी और हम उस पर चलने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि सब दलों के प्रमुख नेता और विशेषकर जो सार्वजनिक उद्योग से संबधित हैं, मजदूर क्षेत्र में काम करते हैं, वे मिलकर बैठें और इस बात की मीमांसा करें कि सार्वजनिक उद्योग इस तरह से घाटे का सौदा कैसे बन गया।

  इस बात का भी विचार होना चाहिए कि अगर कोई सार्वजनिक उद्योग बचाया जा सकता है, अगर उसको पुनर्जीवित किया जा सकता है, मजदूर काम पर लगे हैं, उन्हें किस तरह से अवकाश दिया जाये, यह विचार का एक अलग प्रश्न है। लेकिन कहीं ऐसा न हो कि जो उद्योग चल सकते हैं, वे भी बीमारी पकड़ लें और उन्हें फिर अस्पताल में भर्ती करना पड़े। यह मुद्दा ऐसा है जिस पर सर्वानुमति की आवश्यकता है। हम किसी पूर्वाग्रह से बंधे हुए नहीं हैं। आर्िथक क्षेत्र में हम व्यवहारवादी नीतियों को अपनाना चाहते हैं। आर्िथक विकास में मतवाद के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता है। न वह देश के हित में है, न आम आदमी के हित में है। राष्ट्रहित सबसे बड़ी कसौटी है इसलिए जब कभी मैं देखता हूं कि आर्िथक विकास में कोई कदम उठाने पर कहा जाता है कि यह देश को बेचने का कदम है तो मुझे दुख होता है। भारत जैसे महान देश को कौन बेच सकता है और कौन खरीद सकता है?

  नीति के संबंध में मतभेद हो सकते हैं, प्रमाणिक मतभेद हो सकते हैं। ई.एम.आर. हो या प्रोडकट पेटैंट हो, अभी-अभी उस पर बहस हुई है। जब हमारे वामपंथी मित्र केवल हमें इशारा करके

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री सोमनाथ चटर्जी (बोलपुर) : हमने दोनों तरफ इशारा किया है।

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी : दोनों तरफ इशारा करने की जरूरत नहीं है।

SHRI SOMNATH CHATTERJEE : You have been faithfully following all their bad policies. … (Interruptions)

SHRI MURLI DEORA (MUMBAI SOUTH): In fact, they were opposing… (Interruptions)

SHRI BASU DEB ACHARIA :When they were in the opposition. … (Interruptions)

  श्री सोमनाथ चटर्जी : लॉ कमीशन के बारे में कया हुआ है

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी : लॉ कमीशन की रिपोर्ट अपनी जगह है और संसद का फैसला अपनी जगह है।

  श्री बसुदेव आचार्य (बांकुरा) : आप उस पर चर्चा करवाइए।

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी: चर्चा तो कर ही रहे हैं। आप जानते हैं कि हम सार्वजनिक उद्योगों को चलाने के पक्ष में हैं। आई.डी.पी.एल. को किस तरह खड़ा किया जाए, इस संबंध में हम गंभीरता से विचार कर रहे हैं, कदम उठा रहे हैं। लेकिन मैं आपसे भी आग्रह करूंगा कि अधिक मतवाद मत रखिए। जो नीति अव्यवहारिक सिद्ध हो गई है, जो वाद संसार में पिट गए, यदि आप उसके बल पर चलेंगे तो देश की मुख्य धारा से … (व्यवधान)

  श्री सोमनाथ चटर्जी : आप सब यूनिटस ठीक से चलायेंगे तो हम नहीं बोलेंगे। … (व्यवधान)

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी : आप मुख्य धारा से कट जाएंगे।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री सोमनाथ चटर्जी : हम उसमें मदद करेंगे।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

We will support you; please run them properly.

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी :पिछले कुछ महीनों में ईसाई बंधुओं पर, उनकी संस्थाओं पर हमले हुए हैं। यह बड़े खेद का विषय है, बड़ी चिन्ता की बात है। यह ठीक है कि ऐसी घटनाओं की संख्या ज्यादा नहीं है लेकिन इस देश में ऐसी घटनाएं कयों होनी चाहिए? मीडिया का भी कर्तव्य है कि वह बढ़ा-चढ़ाकर इस तरह की घटनाएं, जो लोगों को उत्तेजित करती हैं, उन्हें पेश नहीं किया जाना चाहिए। कभी-कभी घटनाओं की रिपोर्ट गलत साबित होती है। इलाहाबाद के एक दम्पत्ित पर हमले का समाचार एक विश्व एजेंसी ने दिया था और बाद में उसी दम्पत्ित ने उस हमले का खंडन किया और कहा कि हमारे साथ इस तरह की कोई घटना नहीं हुई। मैं नहीं जानता कि उस संवाद समति ने कोई स्पष्टीकरण प्रकाशित किया या नहीं किया लेकिन सब ओर संयम से काम लेने की आवश्यकता है। इस देश में हर नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेदारी, जो संख्या में कम हैं, उनकी विशेष चिंता करने की जरूरत है। देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता, खतरे की घंटी है। हमारी संस्कृति सहिष्णुता पर कायम है। हमारी सभ्यता सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध है। सारे विश्व की चिंता करने वाले, सारे ब्रहमाण्ड की चिंता करने वाले भारत में अगर सम्प्रदाय के आधार पर लोग अनुभव करें कि उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है या वे अपने को असुरक्षित अनुभव करें तो यह चिंता का विषय है और एक चुनौती भी है। जहां कहीं घटनाएं हुई हैं, वहां अपराधी पकड़े गए हैं, उन पर मुकदमे चल रहे हैं। इसमें गुजरात भी शामिल है। लेकिन उड़ीसा में जिस प्रमुख अभियुकत का नाम लिया जा रहा है जिस पर सबसे ज्यादा संदेह किया जा रहा है, वह अभी तक गिरफतार नहीं हुआ है। उसकी गिरफतारी के सारे देश में प्रयत्न हो रहे हैं, उसे कटघरे में खड़ा करने की आवश्यकता है। आस्ट्रेलियाई नागरिक को उनके बच्चों के साथ जिंदा जला दिया गया, यह एक जघन्य कृत्य है। सारी दुनिया में अगर इसे लेकर हमारे विरुद्ध बातें कही जाती हैं तो हमें अपना घर ठीक करना चाहिए। दुनिया में ऐसे तत्व हैं जो इसका भी राजनीतिक लाभ उठाना चाहेंगे, उन्हें मौका नहीं दिया जाना चाहिए। हमारी सरकार का निश्चय है कि हरेक नागरिक की सुरक्षा, अल्पसंख्यकों में विश्वास पैदा करना, वधि और व्यवस्था की स्िथति को मजबूत बनाना, इस मामले में कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए। कोई व्यकित कितना भी प्रभावशाली हो और कोई संगठन कितना भी बलशाली हो, अगर वह कानून का उल्लंघन करता है तो फिर उसके खिलाफ कानून के अन्तर्गत ही व्यवहार होना चाहिए। इस तरह का व्यवहार हो, यह हम देखेंगे।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)ªÉ½þ Eò½þxÉÉ `öÒEò xɽþÒÆ ½þè ÊEò EòÉä<Ç EòÉ®úÇ´ÉÉ<Ç xɽþÒÆ ½þÉäiÉÒ ½þè, EòÉ®úÇ´ÉÉ<Ç ½þÉäiÉÒ ½þè*

14.00 hrs.

  आखिर हमने भारत और पाकिस्तान की क़िकेट टीम के बीच मैच करके दिखा दिया है। दस साल पहले कांग्रेस की सरकार के जमाने में भी इसी तरह का संकट खड़ा हो गया था, मैच हो या न हो, मैच होगा तो उसमें बाधायें डाली जायेंगी और कांग्रेस सरकार ने पूरे मैंच की श्रृंखला रद्द कर दी थी, लेकिन हमने मैच कराया।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)VÉÉä Eò±ÉEòiiÉÉ EòÒ PÉ]õxÉÉ ½þè, ´É½þ +±ÉMÉ ½þè* ½þ¨É =ºÉEòä ʱÉB ´ÉɨɨÉÉMÉÒÇ ºÉnùºªÉÉäÆ EòÉä nùÉä¹É xɽþÒÆ nùäiÉä ½þèÆ, ±ÉäÊEòxÉ lÉÉäc÷ä ºÉä nùÉä¹É Eòä ´Éä ¦ÉÉMÉÒnùÉ®ú VÉ°ü®ú ½þè* Eò¦ÉÒ-Eò¦ÉÒ +SÉÉxÉEò BäºÉÒ PÉ]õxÉɪÉäÆ ½þÉä VÉÉiÉÒ ½þèÆ, ÊVÉxÉEòÉä ®úÉäEòxÉä EòÒ +ɴɶªÉEòiÉÉ ½þè*

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री मोहन सिंह (देवरिया): वे वाममार्गी और ये दाममार्गी।

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी: अरे, दोनों के बीच में आप कहां हैं मोहनसिंह जी? आप बिलावजह पिछलग्गू हो रहे हैं। हम भी हैं, हम भी हैं – कहां हैं आप ?

  श्री मोहन सिंह :आपके सामने।

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी: आमने-सामने के लिए हम तैयार हैं।

  अध्यक्ष महोदय, मैं सदन का अधिक समय नहीं लेना चाहता हूं। मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने के लिए अवसर दिया। मैं सभी सदस्यों से अपील करूंगा … (व्यवधान)

  कुमारी ममता बनर्जी : मैच के बारे में कलकत्ता में जो कुछ हुआ, उसका लाहौर में कया इम्पैकट हुआ?

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी : हम कलकत्ता में आकर बोलेगा।

  धन्यवाद।

> श्रीमती सुषमा स्वराज (दक्षिण दिल्ली): अध्यक्ष महोदय, यह अटलजी का बड़प्पन है, उन्होंने कहा कि चर्चा का जवाब मैं दूंगी और वे केवल हस्तक्षेप कर रहे हैं। हमारे नियमों ने न तो इसकी व्यवस्था है और न अदब इसकी इजाजत देता है। हमारे नियम २०, उपनियम(२) के तहत यह व्यवस्था की गई है कि प्राइम मनिस्टर के जवाब के बाद राइट-आफ-रिप्लाई न मूवर को होगा और न सैकेंडर को होगा। लेकिन मैं एक कदम और आगे जाकर कहती हूं कि अगर नियमों में यह व्यवस्था होती, तो भी अदब का तकाजा है कि प्रधान मंत्री जी के जवाब के बाद कोई न बोले। उन्होंने जिस खूबसूरती से इस पूरी चर्चा का समारूप किया है, उसका उत्तर दिया है, इसके बाद किसी को बोलने की आवश्यकता नहीं है।

MR. SPEAKER: A number of amendments have been moved by hon. Members to the Motion of Thanks. Shall I put all the amendments together to the vote of the House?

  श्री मोहन सिंह : एक-एक करके नाम से सैप्रेट लीजिए। … (

Interruptions)

MR. SPEAKER: Shri Basu Deb Acharia, shall I put all the amendments together?

SHRI BASU DEB ACHARIA : Not together, Sir.

  जब अलग अलग हैं, तो एक साथ कैसे हो सकता है।

MR. SPEAKER: Shri Mohan Singh, are you moving the amendment or not?

> श्री मोहन सिंह : श्रीमन्, बिहार के राष्ट्रपति शासन के संबंध में इस अभिभाषण में उल्लेख किया गया है। अब वहां स्िथति बदल गई है। मेरा संशोधन बिहार में राष्ट्रपति शासन को लागू करने के बारे में है। मैं सरकार से आग्रह करूंगा कि यह बहुत ही अनुचित होगा, जब वहां राष्ट्रपति शासन को रिवोक कर दिया गया है, तो उसका उल्लेख राष्ट्रपति जी से अभिभाषण में रहे। यह उनकी भी गरिमा के खिलाफ है और इस परम्परा के भी खिलाफ है। मैं आग्रह करूंगा कि कम से कम उस पोर्शन को निकालने के संशोधन को स्वीकार कर ले, तो मैं अपने संशोधन पर बल नहीं दूंगा।

MR. SPEAKER: Now, I shall put amendment Nos. 1 to 8, moved by Shri Mohan Singh, to the vote of the House.

The amendments were put and negatived.

MR. SPEAKER: I shall put amendment nos. 33 to 41 and 328 and 329 moved by Shrimati Geetaa Mukherjee to the vote of the House.

The amendments were put and negatived.

MR. SPEAKER: I shall now put amendment Nos. 63 to 81 moved by Shri Basu Deb Acharia to the vote of the House.

The amendments were put and negatived.

MR. SPEAKER: Now, I shall put amendment nos. 104 to 113 moved by Shri C. Kuppusami to the vote of the House.

The amendments were put and negatived.

SHRI S. JAIPAL REDDY (MAHABUBNAGAR): Mr. Speaker, Sir, now you can put the remaining amendments together to the vote of the House.

MR. SPEAKER: I shall now put all the other amendments moved to the Motion to the vote of the House.

The amendments were put and negatived.

MR. SPEAKER: The question is:

“That an Address be presented to the President in the following terms:-

`That the Members of Lok Sabha assembled in this Session are deeply grateful to the President for the Address which he has been pleased to deliver to both Houses of Parliament assembled together on the 22nd February, 1999.'”

The motion was adopted.

MR. SPEAKER: Now, the House will take up Matters under Rule 377. Hon. Members, today, you have to forego the lunch. Is it the sense of the House to forego the lunch?

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

1409 hours (Mr. Deputy-Speaker in the Chair)

MR. DEPUTY-SPEAKER: If any hon. Member wants to go out of the House, he may quietly do so. Let them not stand here.


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