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Lok Sabha Debates
Further Discussion On General Budget And Demands For Excess Grants … on 11 June, 1998


Title: Further discussion on General Budget and Demands for Excess Grants Nos. 13,14,17,65 and 81 in respect of the Budget (General) for 1995-96. (Not Concluded)
15.40 hrs.

MR. CHAIRMAN : We have a list of 60 Members who wish to participate in the General Discussion on the Budget. Earlier it was decided that the House shall sit up to 9 p.m. If the Minister of Parliamentary Affairs wishes to say something in this regard, he may do so now.

  संसदीय कार्य मंत्री तथा पर्यटन मंत्री (श्री मदन लाल खुराना): सभापति जी, मैं यह कहना चाहता हूं कि अध्यक्ष महोदय से बात हुई है, करीब ६० सदस्यों के नाम हैं सबको मौका मिले इसलिए अगर नौ बजे के बाद लेट नाइट तक बैठना पड़े तो आपकी आज्ञा से डिनर की व्यवस्था कर दें?

  कुछ माननीय सदस्य: ठीक है।

  प्रो. पी.जे. कुरियन (मवेलीकारा) : मंत्री जी को डिनर अरेंज करना चाहिए।

  सभापति महोदय: खुराना जी ने पहले ही कह दिया है कि डिनर अरेंज कर देंगे।

  प्रो. पी.जे. कुरियन : मेरा निवेदन है कि थोड़ा समय कम करके सभी को मौका दें।

  सभापति महोदय: खुराना जी ने कहा है कि सभी को समय मिलेगा इसलिए देर तक बैठना पड़ेगा।

 

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय: मंत्री जी जवाब कब देंगे, इसका उत्तर तो अध्यक्ष महोदय देंगे।

  श्री भजनलाल (करनाल): सभापति जी, मेरा एक सुझाव है कि इस सरकार को जल्दी कया है। रोज रात तक बैठे रहते हैं। एक-दो दिन के लिए और सदन का समय बढ़ा दें। यह मुनासिब बात नहीं है कि रोज रात को देर तक बैठे रहें, इसमें मजबूरी कया है? हम कोई सरकार गिराने वाले नहीं हैं। रोज यही हो रहा है।

  श्री मदन लाल खुराना: पहले भी हाउस देर रात तक बैठा है।

MR. CHAIRMAN: The House has already decided to sit late.

  श्री मदन लाल खुराना: सभी नेताओं से बात करके फैसला किया गया है। बी.ए.सी. की मीटिंग में तय हुआ था, उसमें सारे बड़े नेता शामिल थे।

  श्री भजनलाल : उन नेताओं में भजनलाल जी भी शामिल है, वह भी किसी से कम नहीं है।

MR. CHAIRMAN: It was decided in consultation with the leaders of all Parties. It is the sense of the House also that we should sit late and finish the debate.

SHRI P.C. CHACKO (IDUKKI): We agreed to what the hon. Minister of Parliamentary Affairs has said. But it does not mean that merely because leaders have decided, everything can be done. We all accept this with a protest. The number of sittings is coming down but we are sitting late in the night more frequently. This is not a good practice. Instead of meeting on more days we are meeting for less number of days and for urgent purposes we are sitting late. Today we agree to it but we mark our protest against this unhealthy practice. श्री मोतीलाल वोरा (राजनांदगांव): माननीय सभापति जी, माननीय मंत्री जी ने कहा कि रात देर तक बैठेंगे उसके लिए डिनर की व्यवस्था होगी। सरकार इतनी जल्दी में कयों है? हमने आपके डिनर के अनुरोध को अस्वीकार नहीं किया है। प्रश्न यह उठता है कि आखिर सरकार इतनी भागमभाग में कयों है। रेल बजट को भी पूरी रात बैठ कर पास कराया, अब फिर ऐसा करना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि सरकार के दिन गिनती के रह गए हैं इसलिए वह जल्दी-जल्दी कर रही है।

MR. CHAIRMAN: Voraji, please take your seat.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: It will not go on record.

(Interruptions)*

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* Not recorded

श्री चेतन चौहान (अमरोहा) : सभापति महोदय, १९९८-९९ का बजट जो यहां पेश हुआ है, मैं उसका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं समर्थन इसलिए कर रहा हूं,कयोंकि यह बजट सरल है, यह सम्मानजनक है और इससे सब लोगों का समाधान होगा। पिछले साल भी बजट आया था और उस बजट को लोगों ने कहा कि यह ड़ीम बजट है। १९९७-९८, पूरे सालभर हम लोग ख्वाब ही देखते रहे। लेकिन जो सपने थे वे साकार नहीं हुए। नतीजा इतना खराब हुआ कि जो हमारी ग्रोथ रेट एस्टीमेट की गई थी, वहां तक नहीं पहुंच पाए। बहुत से सैकटरों में निगेटिव ग्रोथ हो गई। जो वादे कए गए थे, चाहे वह बेरोजगारी दूर करने का था, वे वादे पूरे नहीं हुए। औद्योगिक उत्पादन बहुत सारे सैकटरों में बढ़ने के बजाए निगेटिव हो गया। पिछली सरकार के ड़ीम बजट की बहुत सराहना की गई थी, लेकिन उसका कुछ नहीं हुआ। इस बार जो बजट आया है, मैं माननीय वित्त मंत्री जी को बधाई देता हूं, कयोंकि यह बजट बहुत ही बोल्ड है, इनोवेटिव है और ग्रोथ ओरिएंटिड बजट है। लोग सोच रहे थे कि पोखरण में जो परीक्षण हुआ था, उसके बाद बहुत ही कड़ा बजट आएगा, बहुत सारी चीजों पर टैकस लगाए जाएंगे, दाम बढ़ेंगे। सरकार जहां से भी सम्भव हो पैसा इकट्ठा करेगी। कयोंकि अमेरिका और अन्य देशों द्वारा हमारे ऊपर बहुत सारी सेंकशन लगाई जाएंगी। लेकिन वे सेंकशन नहीं लगीं। वित्त मंत्री जी जो बजट लेकर आए हैं, उससे ऐसा नहीं लग रहा है कि कहीं पर कोई परेशानी है। हमारा पड़ौसी देश पाकिस्तान है। उन्होंने भी परीक्षण किया, लेकिन परीक्षण करने केबाद उन लोगों ने इमर्जेंसी लगा दी। हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस बात से साफ जाहिर होता है कि सरकार बहुत ही सावधान तो है ही, उसको कोई परेशानी भी नहीं है। मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देता हूं कि उन्होंने इस बजट में फिस्कल डैफसिट को ५.६ कम कर दिया है और ग्रोथ रेट लगभग ८ प्रतिशत रखी है। भारत के लगभग ७५ प्रतिशत लोग देहात में रहते हैं। यह बड़ी खुशी की और अच्छी बात है कि एग्रीकल्चर के ऊपर सेंटर प्लान को बढ़ा दिया गया है और २९६९ करोड़ रुपये से बढ़ाकर ३८६४ करोड़ रुपये तक कर दिया गया है। मुझे पूरा विश्वास है कि जो बढ़ी हुई धनराशि है, इससे देहात में रहने वाले जो गरीब और पिछड़े लोग हैं, जहां पर सड़क नहीं है, बिजली नहीं है, उनको लाभ होगा। जैसा कि सदन जानता है मैं हिन्दुस्तान के लिए क़िकेट खेलता था। १९९१ में पहली बार राजनीति में आया। मुझे खुद अंदाजा नहीं था कि यह देश इतना पिछड़ा है और देश के अंदर कया हो रहा है। मैं १९९१ का चुनाव लड़ा। जब मैं अपने क्षेत्र में घूमने के लिए गया तो पता चला कि देश में कितनी गरीबी है और कितना पिछड़ापन है। ५० साल की आजादी के बाद भी अभी तक गांव के अंदर पककी सड़कें नहीं हैं, बिजली नहीं है, पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। जहां कहीं भी बिजली की व्यवस्था है, वहां पांच-पांच, सात-सात घंटे बिजली नहीं आती।

  चोतन चौहान जारी मुझे पूरा विश्वास है कि अब देहातों के विकास पर धन खर्च किया जाएगा, जिससे देहातों को फायदा होगा और जो देहातों में रहते हैं, खास कर जो लोग बेरोजगार हैं, शहर की तरफ भाग रहे हैं, कयोंकि वहां किसी प्रकार के रोजगार के साधन नहीं है, कोई सुविधा नहीं है और जो सुविधाएं हैं भी, वो बहुत कम हैं। मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देता हूं कि रूरल डैवलपमेंट के लिए उन्होंने प्रोविजन बढ़ाया है, एस्टीमेट बढ़ाए हैं जिसे ७६९१ करोड़ रुपए से बढ़ा कर ८१८२ करोड़ रुपए कर दिया गया है। इंदिरा आवास के लिए १६०० करोड़ रुपए रखे गए हैं, जिससे १३ लाख नये घर इस साल बनाए जाएंगे, इसके लिए मैं प्रधानमंत्री जी को भी बधाई दूंगा। हम सब लोग जानते हैं कि देश में गरीब लोगों के पास घर नहीं है। पिछले सप्ताह सदन में हम चर्चा कर रहे थे कि लूं से मरने वालों की संख्या लगभग ढाई हजार हो गई है और अब तीन हजार हो गई होगी। चूंकि जो लोग गांवों में रहते हैं, उनके पास घर नहीं है, यही कारण है कि इतने सारे लोग लू से मरे हैं। जब १३ लाख नये घर एक साल में बनेंगे तो गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को नश्िचत रूप से लाभ पहुंचेगा।

  महोदय, वित्त मंत्री जी ने बजट में १६२७ करोड़ रुपए पीने के पानी के लिए रखे हैं। जैसा मैं कह रहा था कि ५० साल आजादी के बाद भी लोगो को पीने का पानी नहीं मिल पाया। राजस्थान, कुछ हिस्से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के हैं, इनके अलावा और भी बहुत से पिछड़े राज्य हैं, पहाड़ों पर भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जहां पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है। जब इतना धन इन इलाकों में जाएगा तो मुझे पूरा विश्वास है कि सभी के लिए पीने के पानी की व्यवस्था हो पाएगी । सरकार का यह दावा है कि इस साल, यानी एक साल के अंदर एक लाख नई बस्ितयों में पानी पहुंचे- चाहे वे देहात की हों या शहरों की हों। सरकार ने किसानों को ऋण देने के लिए और दूसरी सुविधाएं देने के लिए किसान क़ेडिट कार्ड की व्यवस्था की है। यहां जाखड़ जी बैठे हैं, वह गांव से आते हैं और हमेशा गांव की बात कहते हैं। अगर किसान के पास क़ेडिट कार्ड होगा तो उसको इधर-उधर नहीं जाना पड़ेगा, उसकी लमिट तय हो जाएगी कि वह कितना ऋण ले सकता है। इस प्रकार की सुविधा जब किसान को देहात में मिल जाएगी तो प्राइवेट मनी लैंडर्स के ऊपर भी रोक लगेगी।

  सरकार ने इंडस्ट्रीज को बढ़ावा देने के लिए बहुत कुछ किया है लेकिन उससे कुछ लाभ नहीं हुआ। जैसा मैंने कहा कि १९९७-९८ में जो इंडस्टि्रयल ग्रोथ प्रोजेकट किया गया था लेकिन उतना पहुंचा नहीं और बहुत से सैकटरों में नेगेटिव ग्रोथ रहा। मैं समझता हूं कि पिछले डेढ़ साल इस देश ने सबसे बड़ी मंदी उद्योग के क्षेत्र में देखी है –

This has been the worst recession during the last two years.

  मुझे विश्वास है कि वर्तमान बजट जो धन आबंटन किया गया है, जो सुविधाएं इंडस्ट्रीज को दी जा रही हैं, इस बार बहुत सी नई सुविधाएं दी गई हैं, कयोंकि आज इंडस्ट्रीज को सहानुभूति की, विशेष अनुदान देने की, एनक़ेज करने की आवश्यकता है। सरकार ने एकसाइज़ डयूटी का काफी हद तक एडजस्टमेंट किया है, इससे इंडस्ट्रीज को लाभ होगा। आठ प्रतिशत स्पेशल इम्पोर्ट डयूटी का प्रस्ताव सरकार ने रखा है। बहुत दिनों से उद्योगों की मांग थी की उन्हें लेवल प्लेन फील्ड मिलना चाहिए, कयोंकि विदेशी चीजें देश के अंदर सस्ती आ रही थीं और अपने देश की चीजें महंगी होती जा रही थीं। उनका सामान बिक नहीं रहा था। आठ प्रतिशत, जो स्पेशल इम्पोर्ट डयूटी लगाई गई है इससे हमारी इंडस्ट्रीज को लाभ होगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) VÉÉä Ê´Énùä¶ÉÒ ºÉɨÉÉxÉ +É ®ú½þÉ ½þè, VÉÉä b÷ÆÊ{ÉÆMÉ +Éì¡ò MÉÖbºÉ ½þÉä ®ú½þÉ ½þè, +{ÉxÉä nùä¶É ¨ÉäÆ Ê{ÉUô±Éä b÷ägø ºÉÉ±É ¨ÉäÆ EòÉ¡òÒ ¨ÉÉ±É b÷Æ{É ½þÖ+É ½þè VÉÉä BEò ¤É½þÖiÉ ¤Éc÷É EòÉ®úhÉ ®ú½þÉ ÊVɺɺÉä ½þ¨ÉÉ®úä nùä¶É Eòä =tÉäMÉ ÊºÉEò ½þÖB ½þèÆ* यहां पर मंदी आई है, इसके लिए सरकार ने एंटी डंपिंग आथोरिटी बनाई है। मैं मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि यह जो आथोरिटी बनी है, यह जल्दी से जल्दी कार्य करना शुरु कर दे। केपिटल एकसपेंडिचर बढ़ा दिया है, ३५ प्रतिशत से बढ़ा दिया है:

It has been increased from Rs.45,250 crore to Rs.61,150 crore.

  लगभग १६०० करोड़ रुपए की व्ृाद्धि हुई है और यह जो प्लान आउट ले है, जो एनर्जी के ऊपर खर्च किया जा रहा है, कम्युनिकेशन में, हिन्दुस्तान में रोडस के ऊपर, इससे इंडस्ट्रीस को बढ़ावा मिलेगा। यह मैं ही नहीं कह रहा हूं बल्िक जितने भी उद्योग से जुड़े हुए लोग हैं उनका भी यह कहना है। यहां पर मैं चेम्बर ऑफ कामर्स की भी बात बताना चाहूंगा, कयोंकि यहां पर कहा गया था, मुरली देवड़ा जी ने कुछ नाम रखे थे, जिन लोगों ने कहा था कि इस बजट से ग्रोथ नहीं होने वाला है, मैं यहां पर कोट कर रहा हूं:

“Reacting to the 1998-99 Union Budget, CII President Rajiv V. Shah stated that the Budget would help in restoring the investors confidence and lend the economy a status of a strategic value-adding partner in the region.

Shah said that the Union Finance Minister has initiated a number of bold decisions to bail out the economy from the current slow down.

He said that the increased outlay in infrastructure plan outlay on energy, transportation, communication, housing and roads would vastly improve the situation and get up the economy on a seven per cent GDP.

Shah felt that the increased outlay of these sectors should help in improving the employment situation by kick-starting steel, cement and other downstream sectors.”

  महोदय, मैं समझता हूं कि बजट से काफी एम्प्लायमेंट जेनरेशन हमारे देश में होगा। जैसे कल कहा जा रहा था कि लगभग पांच करोड़ लोग बेरोजगार हैं। कल एक माननीय सदस्य कह रहे थे कि इस बजट से कोई भी एम्प्लायमेंट जेनरेशन नहीं होगी, उसके लिए उनको मैं बताना चाहूंगा कि इस बजट में जो प्रावधान किया गया है- रूरल एम्प्लायमेंट एंड पावर्टी एलिवेशन, लगभग ७२८० करोड़ रुपए रखे गए हैं। इसमें से १९९० एलिवेशन प्रोग्राम के लिए रखे हैं:

This amount of Rs.1,990 crore has been kept for providing assured and skilled wage employment of hundred days to those seeking such employment in lean agricultural season.

  इंदिरा आवास योजना के बारे में मैं बता चुका हूं, रूरल डेवलपमेंट के लिए भी बता चुका हूं। एनिमल हसबेंड़ी और जो चीजें हैं, जिनसे नौजवान बेरोजगार लोगों काम मिलेगा, खादी और विलेज इंडस्ट्री के लिए लगभग १००० करोड़ रुपए रखे गए हैं। इसके अलावा स्माल स्केल इंडस्ट्री के लिए लगभग ११० करोड़ रुपए रखे गए हैं और यह जो पैसा है यह इस्तेमाल किया जाएगा,

Prime Minister’s Rozgar Yojana to assist two lakh educated unemployment youth. सरफेस ट्रांसपोर्ट के लिए भी लगभग ५०० करोड़ रुपए रखे गए हैं। इस बजट में जो एनआरआई के लिए इंसेंटिव दिया जा रहा है- ऑल पीपल ऑफ इंडियन आरिजन, इसमें बहुत सारा पैसा विदेश से अपने देश में आएगा और जो यहां खोफ पैदा किया जा रहा है कि अगर सैंकशन भी लगते हैं तो यह जो पैसा विदेश से आएगा इससे हमें काफी लाभ होगा। जो बात फ्रीडम फ्रोम इंस्पेकटर राज के लिए है, इसमें बहुत ही परेशानी है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ºÉÊ´ÉÇºÉ ]õèEºÉ, VÉÉä ]ÅÉƺÉ{ÉÉä]õÇ Eòä >ð{É®ú ºÉä ½þ]õɪÉÉ ½þè, <ºÉEòÒ ¤É½þÖiÉ ÊnùxÉÉäÆ ºÉä ¨ÉÉÆMÉ lÉÒ, <ºÉEòÉä ½þ]õÉxÉä ºÉä EòÉ¡òÒ ¡òɪÉnùÉ ½þÉäMÉÉ* º¨ÉÉ±É ºEòä±É <Æb÷º]ÅÒ EòÉä ¤ÉgøÉ´ÉÉ nùäxÉä Eòä ʱÉB 50 ±ÉÉJÉ iÉEò EòÒ bªÉÚ]õÒ ¨ÉÉ¡ò Eò®ú nùÒ MÉ<Ç ½þè, Eò¨{ɱÉÒ]õ BMVÉÆ{ɶÉxÉ Eò®ú ÊnùªÉÉ MɪÉÉ ½þè +Éè®ú BEò Eò®úÉäc÷ iÉEò EòÉ ¡±Éä]õ ®úä]õ {ÉÉÆSÉ |ÉÊiɶÉiÉ ®úJÉÉ MɪÉÉ ½þè* º¨ÉÉ±É ºEòä±É <Æb÷º]ÅÒ Eòä ʱÉB ´ÉÊEòÇÆMÉ EòäÊ{É]õ±É ʱÉʨÉ]õ b÷¤É±É Eò®ú nùÒ VÉÉBMÉÒ +Éè®ú ¤ªÉÉVÉ ¨ÉäÆ ¦ÉÒ, VÉÉä +SUôÒ ªÉÖÊxÉ]õ SÉ±É ®ú½þÒ ½þèÆ =xɨÉäÆ ®úɽþiÉ nùÒ VÉÉBMÉÒ*

16.00 hrs. अध्यक्ष जी, जो नौकरी करने वाले लोग हैं उनकी इन्कम-टैकस एग्जम्पशन लमिट को बढ़ाने की मांग थी। इसलिए ४० हजार रुपये की लमिट को बढ़ाकर ५० हजार रुपये कर दिया गया है। स्टैंडर्ड डिडकशन को २० हजार रुपये से बढ़ाकर २५ हजार रुपये कर दिया गया है। जो सैळ्ाीड कलॉस और मडिल कलॉस के लोग हैं उनको भी इस बजट में लाभ दिया गया है।

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

SHRI CHETAN CHAUHAN (AMROHA): Sir, I am concluding.

  सभापति जी, बैंकों को मजबूत करने के लिए कदम उठाए गए हैं। बैंकों के पास बहुत पैसा है और सी.आर.आर. कम कर दिया गया है। लगभग ६० हजार करोड़ रुपये बैंकों के पास हैं।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) EªÉÉäÆÊEò <Æb÷º]ÅÒ ºÉä lÉÉäc÷É Ê´É¶´ÉÉºÉ Eò¨É ½þÉä MɪÉÉ ½þè*

MR. CHAIRMAN: I am calling another Member. Shri Rupchand Pal, please.

  श्री चेतन चौहान (अमरोहा) : यहां पर मैं यह कहूंगा कि रीजनल रूरल बैंकों को भी मजबूत करने की आवश्यकता है। खासकर जो रुरल क़ैडिट है वहां पर रीजनल रूरल बैंकस बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

  एक बात यहां पर कही गयी कि डिफेंस के अंदर आउट-ले कम किया गया है। इसके लिए मैं कहना चाहूंगा कि लगभग ४२ हजार करोड़ रुपया डिफेंस के लिए रखा गया है। मंत्री जी ने यह भी कहा कि जो पैसा कम होगा उसको भी माना जाएगा।

MR. CHAIRMAN: This is too much. Please conclude. You have already taken 17 minutes. There are 60 Members to speak. Nothing goes on record. Please conclude.

(Interruptions) *

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* Not recorded

“>SHRI RUPCHAND PAL (HOOGLY): Mr. Chairman, Sir, I rise to oppose the Budget. I have risen to oppose it on several grounds, but because of constraint of time, I shall mention only a few major points.

The first thing is that the hon. Finance Minister has failed to make any attempt to reverse the industrial slow down that has been a major cause of concern to everyone of us. He has miserably failed to address that area.

Secondly, he has also failed to learn from the negative developments of LPG, that is, liberalisation, privatisation and globalization. We initiated the so-called economic reforms.

Thirdly, he has also failed to learn from the experience of the so-called Asian tigers. What has happened in East Asia and in South East Asian countries must provide a lesson to us because we had put before us the Asian tigers as models which have failed miserably today. They are reeling under acute crisis on several fronts.

The major factors for the industrial slow down are; firstly, there is a failure in the export front. I am not going into the details. The Minister is also silent on that question. He owes an explanation about his silence on this particular question. It is because the opening up of OGL by the Commerce Ministry, how to comply with WTO rules and all other things have not been covered in the Budget itself. But he proposes to do with regard to export. But my major concern is about the demand depression. Why is this demand depression? It is because there has been a continuous erosion in the purchasing power of the common people and the people who are living below the poverty line, of India.

 

Then again the stagnation in agriculture has contributed to that erosion. Furthermore, there have been more than four lakhs of units, large, medium and small scale, which are closed or sick. Only during the last two years or so more than two lakhs of people have been losing their jobs from the PSUs and several more are waiting to get out of the units.

I expected that this Government is different. They have been always claiming to be having an able Prime Minister, with a stable Government, with a different programme, different from others, who are more swadeshi and many more things. But I do not find anything different in the Budget which is a reflection upon the opportunist alliance of the BJP-led Government.

I am not going into the manifesto of their own party. I am going into the National Agenda for Governance only. They had promised certain things, `Remove unemployment’, `one crore employment’ and so on. But what has been proposed is more joblessness, more retrenchment in the form of more disinvestment. That is the only way they thought to come out of the debt trap. More than 46 per cent of the Central revenues and more than 80 per cent of our fiscal deposits are accounted by interest payment and debt servicing. And we are very much in the midst of a debt trap and the only way being thought out is disinvestment even of the Navaratnas and many of the ratnas just like selling the household silver to get out of the debt.

I do not know whether he will be able to mobilise as a result of the proposals of this disinvestment to mobilise the amount or not because the timing, the sequencing and many more things have to be conceded. Had he given a right thought to all these things, had he consulted the concerned Public Sector Undertakings it would have been better. Because they always say that out of 243 central PSUs, many of them have been taken over from the private industries who have made them sick. It has become the responsibility of the Government to run them. Now they are making profits. Even profit-making units are trying to disinvest. Major shares are going to be sold out. I do not know the modalities. There is no sure thinking about how the proceeds are going to be used. There is a demand from the PSUs that it should only be used for strengthening them, for promoting the PSUs. But there are a large number of units which have grown sick. They have been referred to BIFR. Will it be taken that once a patient is sent to a hospital it is considered that he is dead? That is the approach of the Government. Nothing is said about the revival of the sick units. Only Rs.l400 crore has been provided for the non-Plan expenditure to make payment most of which will be required for the payment in the coming two or three or four months.

Then again, there is a claim that it is more than what was done in the earlier Budget. It is not so. There should be provision for statutory dues also. This Rs.l400 crore is far too less and there is no revival package, nothing to help the sick industry.

Then many more industries are being made sick. For example, I remember once an NRI had come to India in connection with taking something and when he was asked, he said that there was no private industry in India, that all of them are run by public money, by financial institutions and he had given some arithmetic also. We find that the financial institutions do have a major stake in private industry. I can mention one, Dunlop India Limited. There is 33 per cent stake in the financial institutions and surreptitiously they have been siphoning off large amounts of money.

Surreptitiously, on the 12th January, when this company in their Board meeting decided to refer it to the BIFR, our financial nominee had been attending some social ceremony, some birthday or something like that. He did not attend the meeting. This is the way the financial institutions are helping the private industries to loot public money. So, I would suggest that the Government should come out with the meaningful package for the revival of the sick industry.

Now, I will come to public debt. The Comptroller and Auditor General’s latest report was tabled by the hon. Minister of Finance on the 5th June. It is a telling commentary about our indebtedness, but the Government has miserably failed to address to that very important serious question.

Now, I am coming to certain specifics. This Government had promised in its National Agenda “Education for all and commitment to eradication of illiteracy”. I shall mention only a few illustrations because of constraint of time.

As far as Education is concerned, the allocation was Rs. 5,231.63 crore in 1997-98 and in 1998-99 it has been increased to Rs. 7,046.82 crore. Apparently, it is a substantial increase. Out of this, Rs. 2,300 crore step up in outlay is for Education, Rs. 1,600 crore will go for higher education because of the UGC’s pay scales and Fifth Pay Commission’s recommendations, etc. What will come to Elementary Education? In the last Budget, that is, 1997-98, the outlay was Rs. 2,543.08 crore and now the increase is Rs. 236.95 crore. This Government has assured Education for all. They are committed to total eradication of illiteracy.

I will now touch the District Primary Education. In the last Budget, that is, 1997-98, the outlay was Rs. 650 crore and now the increase is Rs. 1,400 crore although, through their review, they have themselves admitted that it is a very successful project.

Now, I come to the nutritional support, that is, the Mid-Day Meal. It is a great incentive to the children belonging to the poorest sections to attend the school. Here, the increase is Rs. 132.15 crore only. I am told that a large amount of money is unutilised because of failures at certain levels. The Government propose to achieve the universalisation of compulsory education. Now, they are withdrawing from that commitment, as it is reflected in the Budget.

I am not going to other things. I have got a lot of examples. But I will touch upon only one example. As far as Adult Education is concerned, the outlay in 1997-98 was Rs. 129.81 crore and now it has been reduced to Rs. 97.35 crore. So, this shows that they are committed to eradication of illiteracy after substantial reduction. (Interruptions).

As far as health aspect is concerned, the hon. Minister has spoken a lot about infrastructure. So far, as I understand, the funding is not a major problem. There are so many other problems. I am not going into that. But what about the other part of the social infrastructure? I am referring to only three aspects because these three are important in the light of the post-Pokhran scenario. The hon. Minister has not addressed about the sanctions, what it might be and how it can harm our economy, etc.

The first is Malaria Eradication Programme. It is a project with World Bank support. The second is the T.B. Control programme. We do have soft loan from the World Bank for three years.

They have provided just Rs. 290.37 crore for Malaria Control Programme. The increase is of Rs. 97 crore plus only. But there is a resurgence of Malaria throughout different parts of the country. Several times, questions have been asked on the floor of this House about the resurgence of Tuberculosis. Now, there is a provision of only Rs. 35 crore plus for Tuberculosis Control Programme.

The Government has not addressed to the possible impact of sanctions. Just now, I would mention about the news item which had come out yesterday and in which the Core Group of FIPB said that there was a slight concern in the Government over the imposition of sanctions on India by certain countries and their likely fall out, especially in areas like health, education, telecom and power. About Power Grid Corporation, the problems are very well known. I am not going into that.

Sir, this Government has decided to sell out public sector industries, the navaratnas.

MR. CHAIRMAN : Shri Pal, how much more time will you take? Other Members from your party also want to speak.

SHRI RUPCHAND PAL : I shall be very reasonable to this House and also to my colleagues.

MR. CHAIRMAN: I am not saying that you are not reasonable.

SHRI RUPCHAND PAL : Sir, why should this Government disinvest VSNL, IOC, GAIL and CONCOR? What is the purpose? What are the modalities? The Government has not learnt from the experience of the last seven or eight years. What is happening? I got a memorandum from the SCOPE. The SCOPE has come out in a telling manner about the demands of the public sector undertakings. They want more autonomy. In one sentence `before reforming these PUCs, the Government should reform itself’, they have made a very significant comment. Because of the political intervention from the Government side, they have been suffering. They should be strengthened, they should be patronised and they should be promoted so that they can stand up on their own. You should not repeat the story of BHEL. Even after the limitations were imposed by the Government, it had repeatedly struggled and stood up and now, they can face any competition in the world today. So, we should help others also, instead of disinvesting these navaratnas, the miniratnas. The Government should rather strengthen them, help them and provide them more autonomy.

Now, let us come to the insurance sector. Last year, we had opposed a Bill for establishing Insurance Regulatory Authority. This time also, we shall oppose it. Insurance is a sector which the Government have been hesitating to open up because of the experience of the outside world, because of the social obligations being fulfilled by these insurance companies, how they are contributing to our infrastructure, housing, roads and many other areas. The Minister says – it has come out in an interview – that it will be opened up to the Indian companies, swadeshi companies. Is there any Indian company today? More than a dozen companies, who intend to enter into the insurance market, are already having some memorandum of understanding with foreign insurance companies.

16.19 hrs (Mr. Speaker in the Chair)

Yesterday I found that there were six foreign consultancy firms – Arthur Anderson, Anderson Consultancy, Coopers & Lybrand, Ernst & Young, Deloitte and touche and KPMG & Peat Marwick. All these companies are on the prowl and they are out to set up turnkey insurance operations for Indian players. We know that about five years from now, the WTO is going to impose it on us because we have agreed to open up financial services and our cutoff year is 2003.

Sir, this Government has failed to honour its own commitment given in the National Agenda for Governance. This Government has failed to address the burning problems ailing this country like the industrial scenario, agriculture, etc. On agriculture, the hon. Minister was waxing eloquent and said that he has done a lot and he has raised the allocation. Maybe, with elections in mind he must have done that. I do not know whether they are getting ready for a mid-term poll or not, with a new constituency in the rural areas. It will not happen, because in agriculture they had promised 60 per cent allocation. But now it is a meagre 3.5 per cent of the total Central Outlay.

Sir, I oppose this Government because they have failed to learn; I oppose this Government because they are leading this country to disaster; I oppose this Government because it is reckless and desperate to dismantle whatever be the self-reliance which has been achieved by this countrymen through their hard labour; I oppose this Budget and I shall continue to oppose any such measure which the Government may undertake in future.

“> श्री रतिलाल कालीदास वर्मा (धन्धुका): अध्यक्ष महोदय, माननीय वित्त मंत्री श्री यशवंत सिंहा जी और लोक हृदय सम्राट प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेत्ृात्व में जो स्वदेशी बजट पेश किया गया है, मैं उसके समर्थन में खड़ा हुआ हूं। मेरे साथी मित्रों, पिछली लोक सभा में एक विशेष सत्र चलाया गया था जिसमें भारत की आजादी के ५०वे साल हम सब लोगों ने तीन-चार दिन तक चिंतन किया था। उन दिनों सभी सांसदों ने अपनी पार्टी से ऊपर उठकर इस बात को महसूस किया था कि ५० साल पहले आजादी मिलने के बाद भी इस देश मे अपेक्षित तरककी नहीं हुई है। ५० साल की आजादी के बाद भी इस देश की स्िथति सुधरने की बजाए दिन-प्रतदिन बिगड़ती गई है। न हम किसानों को सुखी कर पाये, न गरीबों की गरीबी मिटा सके, न युवा लोगों को रोजगार दे सके, न गावों में खेतों को पानी दे सके, न स्वच्छ पेयजल दे सके। इतने सालों तक देश की जो स्िथति रही उसके हम सब लोग साक्षी थे। सभी लोगों ने महसूस किया था कि हमारे पूर्व नेतागण इस देश के दुख-दर्द को समझ नहीं सके, इस देश की वास्तविकता को समझ नहीं सके।

  अध्यक्ष महोदय, जापान के शहर हिरोशिमा, नागासाकी पर अणु बम फेकें गये जिससे वे शहर बिल्कुल बरबाद हो गये थे। लेकिन जापान उसके बाद धीरे-धीरे प्रगति करता गया और आज दुनिया के राष्ट्रों में उसे नम्बर एक स्थान प्राप्त है। उन्हीं दिनों हमारे देश को भी आजादी मिली थी, लेकिन हम दिन-प्रतदिन और गरीब होते गये, दिन-प्रतदिन हमारे देश की स्िथति बिगड़ती गई – इसके लिए कौन जवाबदार है? यह चिंतन उन दिनों हम सभी ने किया था कि देश की हालत खराब करने के लिए राजकीय लोग और हम सब जिम्मेदार हैं कयोंकि देश के प्रति हमारी जो भावना, प्रेम और जैसी नीतियां होनी चाहिए, उन्हें हमने लागू नहीं किया। देश के बदले हमारी निगाह कहीं और रही जिससे देश की हालत खराब होती गई।

  भारतीय जनता पार्टी की सरकार इस वकत सहयोगी पार्िटयों के साथ मिलकर शासन चला रही है। ऐसे वकत दरअसल हमें कया मिला – बेकारी मिली, भुखमरी मिली, किसान परेशान, युवा परेशान, व्यापारी परेशान, विद्यार्थीगण परेशान। इन सबके अलावा आर्िथक स्िथति भी कैसी मिली? आर्िथक स्िथति इतनी अच्छी नहीं थी, यह आप सब जानते हैं। मैं आपको बताना चाहता हूं कि इस बार जो बजट पेश किया गया है वह प्रोत्साहन देने वाला, क़ांतिकारी और आकर्षक बजट है। इसलिए मूल रूप से यह स्वदेशी बजट है। माननीय वित्त मंत्री जी ने स्वदेशी बजट पेश किया है इसलिए मैं हृदय से उनका अभिनंदन करता हूं।

  अध्यक्ष महोदय, वर्ष १९९७-९८ में हमारा समग्र आर्िथक विकास कम होकर पांच प्रतिशत रह गया था, इसके आप सब लोग साक्षी हैं, अर्थात जितना विकास होना चाहिए था उतना नहीं हुआ। इस नकारात्मक स्िथति में देखने पर मिला कि पिछले वर्ष के १९९ मलियन टन खाद्यान्न की तुलना में इस वर्ष उत्पादन घटकर १९४ मलियन टन रह गया। हमें खाद्यान्न की स्िथति भी अच्छी नहीं मिली। औद्योगिक उत्पादन मंदी के कारण ४.२ प्रतिशत रह गया। लगातार दूसरे वर्ष निर्यात निष्पादन कमजोर रहा। यदि निर्यात निष्पादन कमजोर रहेगा तो देश कैसे आगे बढ़ सकता है। हम देश से कया उम्मीद रख सकते हैं। प्रतदिन देश की आर्िथक स्िथति बिगड़ती गई और इस तरह से एक टूटा हुआ अर्थतंत्र भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी दलों की नई सरकार को मिला है।

  कल हमारे वरिष्ठ कांग्रेसी मित्र बोल रहे थे, दूसरे साथी भी बोल रहे थे और नये बजट की आलोचना कर रहे थे। मैं कहता हूं कि हें आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है। पिछले ४०-५० सालों तक इस देश में किसका शासन रहा। अलग-अलग रूप में, अलग-अलग चेहरे लेकर कांग्रेस का ही राज इस देश के अंदर रहा है। आप ४०-५० सालों में कुछ नहीं कर सके। भारतीय जनता पार्टी का यह प्रथम बजट है। आप कुछ दिन, कुछ साल बीत जाने दो। कल हमारे साथी मित्र ने कहा था कि यह हमारा पहला बजट है, हमारा अगले साल का बजट इससे अच्छा होगा। इस साल के बजट के संबंध में, मैं खुशी से कह सकता हूं कि जिस दिन माननीय वित्त मंत्री जी ने बजट पेश किया था, परम्परा के अनुसार बजट पर जैसी प्रतक़ियाएं दी गईं, जो कि हर बजट में मैंने देखी हैं, मैं ९वीं लोक सभा से इस सदन में आ रहा हूं, हर बजट के समय मेन गेट पर आधा घंटे तक रश रहता है, लोग इंटरव्यू देते हैं, लेकिन इस बार कुछ महानुभाव इंटरव्यू देने में कतरा रहे थे। पांच मिनट में मेन गेट खाली हो गया चूंकि इस बजट पर कुछ कहने लायक नहीं था, प्रतक़िया देने लायक कुछ नहीं था। सभी लोग जा रहे थे, ब्रड़ी मुश्िकल से चिदम्बरम साहब को रोके रखा, मेन गेट के बाहर उनका इंटरव्यू हुआ। इस बजट से सभी लोग खुश थे। इस बजट से व्यापारी, किसान तथा देश के शैडयूल्ड ट्राइब्स और शेडयूल्ड कास्टस सभी लोग खुश थे। इस बजट से देश का व्यापारी वर्ग तथा आम जनता भी खुश थी

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री रामदास आठवले (मुम्बई उत्तर-मध्य) : इस बार हम खुश नहीं हैं।

  श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : फिर भी माननीय वित्त मंत्री जी ने इस बजट के द्वारा अर्थतंत्र को मजबूत करने का सराहनीय प्रयास किया है। इसलिए सर्वप्रथम इसके लिए मैं उनका अभिनंदन करता हूं।

  ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्िथति और उसकी गतिशीलता देश की रीढ़ की हड्डी हैं। अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो देश कभी मजबूत नहीं हो सकता है। यह देश किसानों का देश है। यदि गांव आबाद रहेगा तो देश आबाद रहेगा, यदि गांव टूटेगा तो देश भी टूटेगा। इसलिए गांवों के प्रति माननीय वित्त मंत्री जी ने अधिक ध्यान दिया है, जिसके बारे में मैं आगे कहूंगा। पानी खेतों के लिए आवश्यक है। पानी खेती का मुख्य साधन है। देश में इतनी बरसात होती है लेकिन कया कभी बरसात के पानी को रोकने का प्रयत्न किया गया, पानी को बचाने का प्रयत्न किया गया। आज जीरो ऑवर में एक मित्र बोल रहे थे कि बरसात में जितना पानी आता है वह समुद्र में चला जाता है। बरसात के बाद, अगले महीने से किसानों को खेती के लिए पानी नहीं मिलता। पीने के लिए पानी नहीं मिलता। यदि यह पानी रोकने का प्रयत्न किया गया होता, नदियों पर बांध बांधे गये होते, हर गावों में तालाबों को गहरा किया गया होता, हर नाले का पानी रोकने का प्रयत्न किया गया होता तो पचास साल के बाद आज इस देश का किसान पानी के लिए नहीं तरसता, गावों में रहने वाला नौजवान आज तालाबों का पानी पीने को मजबूर नहीं होता। लेकिन पचास सालो में सरकारों ने कुछ काम नहीं किया जिसके कारण आज लोगों को तालाबों का गंदा पानी पीना पड़ता है। लेकिन माननीय वित्त मंत्री जी ने इस बार अपने बजट में गावों की चिंता की है जिसके लिए मैं उनको धन्यवाद देता हूं। मैंने आपको बताया कि पचास सालों के बाद आज ३७ प्रतिशत उपजाऊ जमीन को ही सिंचाई की सुविधा मिल रही है। शेष जमीन पर किसान को आज भी बरसात पर आधारित जीवन निर्वाह करना पड़ता है। देश के कई भागों में बार-बार अकाल पड़ता है जिसके कारण किसान परेशान है। अभी एक-दो दिन पहले चर्चा हो रही थी कि इस देश किसानों को आत्महत्या कयों करनी पड़ी? उसके लिए आज भारतीय जनता पार्टी को जिम्मेदार ठहराया जाता है जबकि आप लोगों ने पानी की उचित व्यवस्था नहीं की। अगर किसान की फसल एक बार खराब हो जाए लेकिन पानी की व्यवस्था हो तो वह दोबारा फसल ले सकता है। लेकिन अगर एक बार उसकी फसल इंश्योर्ड नहीं रही तो वह पूरा देनदार बन जाता है। इन बातों पर पिछली सरकारों ने ध्यान नहीं दिया।

  अध्यक्ष महोदय, इस बजट में खेती पर अधिक ध्यान दिया गया है। इसके लिए भी मैं वित्त मंत्री महोदय को बधाई देना चाहता हूं। भारत सरकार द्वारा सिंचाई की सुविधाओं को बढ़ाकर बरसाती पानी को संग्रहीत करने का जो विशेष प्रावधान किया गया है और किसानों प्राथमिकता दी गई है। मैं उसकी भी सराहना करता हूं। इसके लिए १९९७-९८ के बजट में ५१७ करोड़ रुपए रखे गए थे जिनको इस बजट में बढ़ाकर ६७७ करोड़ रुपए किया गया है। इसके अतरिकत सिंचाई की सुविधाएं प्रदान करने के लिए बजट में ५८ प्रतिशत बढ़ोत्तरी की गई है जो किसानों को उत्साह दिलाने वाली है।

  अध्यक्ष महोदय, हमारे देश में बहुत सारी कृषि मंडियां चल रही हैं, लेकिन वे ठीक प्रकार से काम नहीं कर रही हैं। उनमें सरकारी अधिकारी और राजनेता हस्तक्षेप करते हैं। मंत्री जी ने ये मंडियां स्वतंत्रता पूर्वक काम कर सकें और कोई हस्तक्षेप न करे इसके लिए मंत्री जी ने बहुराज्यीय सहकारी सोसायटी कानून १९०४ के स्थान पर आदर्श सहकारी कानून लाने की बात कही है। उसके द्वारा राज्य सहकारी मंडियां अपने कानूनों में संशोधन कर सकती हैं और राजनेताओं तथा अधिकारियों का हस्तक्षेप रोक सकती हैं। इस प्रकार से वे स्वतंत्ररूप से काम कर सकेंगी और किसी के प्रभाव और दबाव में नहीं रहेंगी।

  अध्यक्ष महोदय, वित्त मंत्री जी ने तिल उत्पादन करने वाले किसानों की भी चिन्ता की है। तिल के तेल की कीमत बहुत ज्यादा होती जा रही है। इसका लाभ किसानों को न मिलकर जिनको हमारे यहां तेल का राजा करहते हैं, उनको हो रहा है। किसानों को अपने तिल का सही दाम दिलानो के लिए भी वित्त मंत्री महोदय ने व्यवस्था की है।

  अध्यक्ष महोदय, यूरिया की बात बहुत कही गई। वित्त मंत्री महोदय ने यूरिया के दाम एक रुपया प्रति किलो बढ़ाए हैं, लेकिन हमारे सभी माननीय सदस्यों द्वारा किसानों की बात उनके सामने रखे जाने पर उन्होंने पचास पैसे प्रति किलो यूरिया के दाम में कमी की है, लेकिन उनका प्रयास यह रहा है कि यूरिया से जो जमीन खराब हो रही है, किसान का ध्यान उस तरफ आकर्िषत किया जाए और अधिक यूरिया के प्रयोग को रोका जाए। मंत्री महोदय ने इसमें भी अपनी सहृदयता दिखाई है।

  सभापति महोदय, पिछले ५० सालों में पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा पीने के पानी की व्यवस्था करने का सिर्फ नारा ही दिया गया। मैं छोटा था, तब से मुझे याद है जब भी बजट आता था, तो कहा जाता था कि इस बार सभी गांवों में पीने का पानी पहुंचा दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैं जिस क्षेत्र से आता हूं वहां आसपास पानी का कोई साधन नहीं है और हमारी मां तथा बहनों को तीन-तीन किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है। नदियां सूख गई हैं, कुओं में पानी बहुत नीचे चला गया है। पूरे क्षेत्र में जो भूमिगत जल है उसका स्तर बहुत नीचे चला गया है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  अध्यक्ष महोदय, ये सरकार सूखने की बात कर रहे हैं। मैं तो कह रहा हूं कि सरकार कया इन्होंने तो पूरे देश को ही सुखा दिया। हमारी भारतीय जनता पार्टी इस देश को हरा बनाएगी।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  अध्यक्ष महोदय : मिस्टर वर्मा, कृपया आप चेयर को एड़ैस करिए।

  श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : अध्यक्ष महोदय, जो वास्तविकता है, मैं उसे सदन के समक्ष प्रकट कर रहा हूं।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

SHRI RAM NARAIN MEENA (KOTA): Sir, I am on a point of order. ये जो फैकटस दे रहे हैं मैं इनके आधार पर तो नहीं जा रहा हूं, लेकिन वास्तविकता यह है कि आपकी सरकार के आने के बाद राजस्थान में हैंड पंपों की दुरुस्ती भी नहीं हो रही है। उनकी मरम्मत भी नहीं कराई जा रही है और उनमें नट-बोल्ट भी नहीं लगाए जा रहे हैं।

  आप चाहें तो सांसदों की एक समति बना दें जो वहां जाकर इसकी जांच करे। मैं उस समति के साथ जाकर आपको राजस्थान की वास्तविक स्िथति से अवगत कराने को तैयार हूं। आज भी ऐसे ग्राम है ,जिनमें ७ किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाया जाता है।… (व्यवधान)

MR. SPEAKER: Shri Ram Narain Meena, there is no point of order. Please take your seat.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: This is not a point of order. Please take your seat.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: This will not go on record. Please take your seat.

(Interruptions) *

  श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : अध्यक्ष महोदय, यह हैंड पंप की बात तो हम नौवीं लोक सभा से कहते आ रहे हैं। यह तो हमारा मुद्दा है। आप कयों बोल रहे हैं। वित्त मंत्री जी ने १६२७ करोड़ रुपए गरीबों के लिए एक लाख आवास बनाने हेतु रखे हैं और जो पानी के लिए तरस रहे हैं उन्हें सुविधा मिलेगी।

_________________________________________________________________________

* Not recorded

  अध्यक्ष महोदय, वषर्ों से कांग्रेस पार्टी एक ही नारा लगाती रही “गरीबी हटाओ” हमने इतने वषर्ों में देखा है कि गरीबी नहीं हटी, लेकिन गरीब हट गए। इसलिए गरीबों ने सोचा कि हमें अपनी सरकार चाहिए जो हमारे बारे में सोच सके। हमारे दुख-दर्द को समझ सके। उन्होंने सोचा हमें एक ऐसा प्रधान मंत्री चाहिए जो हमारी कठिनाइयों को जाने। सब गरीबों का आज वह स्वप्न साकार हुआ और आज देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है। आज गरीबों को महसूस हुआ है कि आज उसकी सरकार है और इस सरकार के माध्यम से वह अपने सुखी भविष्य को देख रहा है।

  अध्यक्ष महोदय, माननीय वित्त मंत्री जी ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वगर्ों के उत्थान के लिए बजट में पर्याप्त साधन जुटाने का प्रयास किया है। कांग्रेस सरकार केवल योजना बनाती थी और दिन में तारे दिखाने वाली बात करती थी, लेकिन इन वगर्ों के उत्थान के लिए विशेष कुछ नहीं हुआ। इस बात को लोग समझ गए और उन्होंने कांग्रेस को हरा दिया। कांग्रेस सरकार केवल मीठ-मीठी बातें करती थी काम कुछ नहीं करती थी। इन वगर्ों के उत्थान के लिए वर्ष १९९०-९१ में २५३ करोड़ रखे, वर्ष १९९१-९२ में २६१ करोड़ रखे, १९९२-९३ में २८८ करोड़ रुपए, १९९३-९४ में ३७३ करोड़ रुपए, १९९४-९५ में ४८२ करोड़ रुपए रखे। फिर बढ़ाया नहीं बल्िक घटा दिया और १९९४-९५ में ४३३ करोड़ रुपए १९९६-९७ में ४९५ करोड़ का प्रावधान किया, हमारे वित्त मंत्री ने इस वर्ष के बजट में ६३४ करोड़ रुपए की व्यवस्था की है। अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों ने हमारी सरकार पर विश्वास किया है। हमा चाहते हैं कि उनको इसका फायदा मिलना चाहिए। अब तक किसी सरकार ने इन वगर्ों के कल्याण के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं की।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री रामदास आठवले : बजट का प्रावधान तो हर साल बढ़ता है।

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: Shri Ramdas Athawale, it is not good. You are standing like that.

  श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : अध्यक्ष महोदय, जनजाति के छात्रों के लिए ६५ करोड़ रुपए का प्रावधान किया है जिससे अनुसूचित जनजाति के छात्रों को लाभ पहुंचेगा। अनुसूचित जनजाति के लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए ३६१ करोड़ रुपए का प्रावधान किया है जिससे २४.८० लाख लोग लाभान्िवत होंगे।

  अध्यक्ष महोदय, हमारे वित्त मंत्री जी ने प्राधान्य शिक्षा को दिया है। शिक्षा के बिना किसी अच्छे समाज की कल्पनी भी नहीं की जा सकती है। हमारे देश की बहुत बड़ी आबादी अभी भी निरक्षर है जिसके कारण इस देश का उद्धार नहीं हुआ है।

  श्री रतिलाल कालीदास वर्मा जारी इस बजट में शिक्षा को प्राथमिकता दी गई है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

MR. SPEAKER: You have taken more than ten minutes. Please conclude now.

  श्री रतिलाल कालीदास वर्मा: अध्यक्ष महोदय, मुझे दस मिनट भी नहीं मिले हैं। मैं अभी थोड़ी देर और बोलूंगा। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष शिक्षा में ५० प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की है यानी पिछले ४७१६ करोड़ रुपए के प्रावधान को बढ़ाकर ७०४७ करोड़ रुपए किये गये हैं। इस तरह बालिकाओं के लिए कालेज तक की मुफत शिक्षा करने का प्रावधान किया है, जिसके लिए भी मैं इनकी सराहना करता हूं। … (व्यवधान) माननीय मंत्री जी ने युवकों के प्रति भी गहरी चिन्ता की है। अगर इस देश का युवा बेरोजगार होगा तो वह गलत रास्ते पर चला जायेगा। इस देश के युवा को अगर रोजी-रोटी नहीं मिलेगी तो वह गलत रास्ते पर जाकर देश का बहुत बड़ा नुकसान कर सकता है इसलिए माननीय वित्त मंत्री जी ने प्रधान मंत्री रोजगार योजना के अन्तर्गत १४० करोड़ रुपए की व्यवस्था की है। यह शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के लिए की गई है। इसमें ११० करोड़ की व्यवस्था उनके लिए की गई है जिसके अधीन दो लाख शक्षित बेरोजगार युवकों को अपना व्यवसाय करने का मौका मिलेगा ताकि समाज में वे शान से जी सकें। इसी तरह गांव में रहने वाले युवकों के लिए १४० करोड़ रुपए की व्यवस्था की है। आज तक गांवों में रहने वाले युवकों की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया था लेकिन माननीय वित्त मंत्री जी ने उनकी तरफ ध्यान देकर बहुत बड़ा काम किया है।

  अध्यक्ष महोदय, माननीय मंत्री जी आशावादी हैं और आशावादी होने के कारण उन्होंने देश को दुनिया के सामने नम्बर वन बनाने की कोशिश की है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

MR. SPEAKER: There are other Members who also want to participate in the discussion. Please conclude now.

  श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : आने वाले १० साल में सॉफटवेयर के अंदर भारत प्रथम स्थान हासिल करे, इसके लिए उन्होंने राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी की कार्यबद्ध योजना तैयार की है। माननीय मंत्री जी ने अपने स्वदेशी बजट में घरेलू उद्योग धंधों को स्थापित करने के लिए कस्टम डयूटी के मामले में कुछ राहत देने का प्रयत्न किया है, इसलिए भी वह प्रशंसनीय है। अंतिम दो-तीन साल में, सारे देश में हर तंत्र में नरमाई देखने को मिलती थी उसमें चेतना लाने के लिए राष्ट्रीय एजेंडा को … (व्यवधान) कांग्रेस वाले यह बोलते थे कि पहनने को नहीं कपड़ा, रहने को नहीं मकान फिर भी हमारा भारत देश महान। लेकिन इस सरकार ने मकान देने की बात कही है और उसके लिए बजट में १६०० करोड़ रुपए की व्यवस्था की है। हुडको को ११० करोड़ रुपए देने की बात की गई है और इसके अंतर्गत २० लाख मकान बनाने का लक्षय रखा गया है जिससे १३ लाख ग्रामीण क्षेत्रो के और ७ लाख शहरी क्षेत्र में रहने वाले लोग लाभान्िवत होंगे। अब लोगों को रास्ते पर नहीं रहना पड़ेगा, वे अपने मकानों में रह सकेंगे। मंत्री जी ने अनेक रियायतें भी दी हैं, हर तरह का ध्यान रखा है जैसे फिल्म उद्योग, समाचार पत्र आदि को रियायतें दी गई हैं। स्वास्थ्य की तरफ भी उन्होंने ध्यान दिया है। देश का नवयुवक स्वस्थ होना चाहिए, इसके लिए उन्होंने ध्रूमपान पर डयूटी बढ़ाई है अर्थात् वे ध्रूमपान कम करेंगे तो उनका स्वास्थ्य बढ़ेगा। वित्त मंत्री जी स्वयं स्वस्थ हैं इसलिए देश भी स्वस्थ होना चाहिए, ऐसी उनकी भावना है। इसके साथ उन्होंने गरीबों का भी ध्यान रखा है। उनके घरों में सुबह शाम जलने वाली दियासलाई, माचिस का भाव नहीं बढ़ाया है। देश के गरीब लोगों के पास समाचार प्राप्त करने का कोई साधन नहीं है जबकि आप लोग तो टेलीफोन से, फैकस से सम्पर्क कर लेते हैं लेकिन गरीब इंसान अपना समाचार कैसे भेजे? उनको समाचार भेजने के लिए एकमात्र पोस्टकार्ड ही है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  लघु उद्योगों को ध्यान में रखकर

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) nùÉä Eò®úÉäc÷ ¯û{ÉB ºÉä ¤ÉgøÉEò®ú SÉÉ®ú Eò®úÉäc÷ ¯û{ÉB ÊEòªÉÉ ½þè* ªÉÊnù ±ÉPÉÖ =tÉäMÉ xɽþÒÆ ½þÉäÆMÉä iÉÉä nùä¶É +ÉMÉä xɽþÒÆ ¤Égø ºÉEòäMÉÉ* … (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ªÉ½þ º´Énùä¶ÉÒ ¤ÉVÉ]õ ½þè* ±ÉPÉÖ =tÉäMÉÉäÆ Eòä ʱÉB <ºÉ¨ÉäÆ ¯û{ɪÉÉ ¤ÉgøÉEò®ú =xÉEòÉä ¨É½þi´É ÊnùªÉÉ MɪÉÉ ½þè ÊVɺɺÉä ´Éä +{ÉxÉÉ EòÉ¨É `öÒEò ºÉä Eò®ú ºÉEòäÆ*

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ®úɹ]ÅÒªÉ JÉä±É-EòÚnù

  को भी महत्व दिया गया है ताकि देश के नौजवान खेल-कूद में भाग ले सकें। … (व्यवधान) इसमें जो लोग दान देने वाले हैं उनको भी रियायतें दी गई हैं। … (व्यवधान) इससे इस देश के गांव में रहने वाला नौजवान अपनी शकित बना सकेगा। … (व्यवधान) आगे बढ़ सकेगा। स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती पर देश की वास्तविक गतिशीलता बढ़े।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) Ê´ÉEòɺÉ{ÉIÉÒ ¤ÉVÉ]õ ½þè* {ÉÉ´É®ú, ªÉÉiÉɪÉÉiÉ, Eò¨ªÉÖÊxÉEòä¶ÉxÉ, <x¡òɨÉÇä¶ÉxÉ, ]õäExÉÉä±ÉÉìVÉÒ, ʶÉIÉÉ, <x£òɺ]ÅESÉ®ú, ½þÉ=ʺÉÆMÉ +Éè®ú EÞòÊ¹É ¨ÉäÆ =`öɪÉä MɪÉä |ÉMÉÊiÉEòÉ®úÒ Eònù¨É |ɶÉƺÉxÉÒªÉ ½þèÆ* <ºÉÒ iÉ®ú½þ º¨ÉÉì±É ºEòä±É <Æb÷º]ÅÒ Eòä ʱÉB =`öɪÉä MɪÉä Eònù¨É EòÉä nùä¶É EòÉä +ÉÊlÉÇEò ¨ÉÆnùÒ ºÉä ¤Éɽþ®ú ÊxÉEòɱÉEò®ú +Éi¨ÉÊxɦÉÇ®ú ¤ÉxÉɪÉäMÉÉ* ºÉÉlÉ ½þÒ Ê´Énùä¶ÉÒ {ÉÚÆVÉÒ EòÉä +ÉEòʹÉÇiÉ Eò®úxÉä Eòä ʱÉB VÉÉä Eònù¨É =`öɪÉä MɪÉä ½þèÆ, ´Éä |ɶÉƺÉxÉÒªÉ ½þèÆ*

  अंत में मैं कहना चाहता हूं – मेरा जूता है जापानी पतलून इंगलिशस्तानी, सर पर लाल टोपी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ½þ¨É ÊEòºÉÒ ¦ÉÒ SÉÖxÉÉèiÉÒ EòÉ ºÉɨÉxÉÉ Eò®úäÆMÉä, ½þ¨É ÊEòºÉÒ ºÉä {ÉÒUôä ®ú½þxÉä ´ÉɱÉä xɽþÒÆ ½þèÆ* +ÉvÉÒ ®úÉä]õÒ JÉÉEò®ú ¦ÉÒ nùä¶É EòÒ +ÉxÉ +Éè®ú ¶ÉÉxÉ ¤ÉxÉɪÉäÆMÉä*

MR. SPEAKER: Nothing will go on record except the speech of Shri Murasoli Maran.

(Interruptions) *

  अध्यक्ष महोदय : मिस्टर वर्मा, यह अच्छा नहीं है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

_____________________________________________________________________________

* Not Recorded

SHRI ANIL BASU (ARAMBAGH): Sir, I am on a point of order. This is something very serious. Yesterday, around this time, the Minister of State for Agriculture had announced about the minimum support price for copra and jute. There was a lot of protest in this House. All sections of the House joined together protesting against the minimum support price. Then, there was a direction from the Chair saying that the Minister of State for Agriculture would convene a meeting of all the concerned MPs and would discuss with them. But we have not received any information up-till now from the Minister of State for Agriculture. This way, the direction from the Chair has been ignored by the Minister…(Interruptions)

MR. SPEAKER: There is no point of order. Shri Maran to speak.

… (Interruptions)

SHRI MANORANJAN BHAKTA (ANDAMAN AND NICOBAR ISLANDS): This is a very serious matter. The Chair had directed that the Minister would call the concerned MPs and discuss with them. So far, he has not done so. We want the direction from you in this regard…(Interruptions)

SHRI ANIL BASU : You please direct the Member of the Cabinet in this regard…(Interruptions) How is the right of the Member going to be protected? How is the honour and dignity of the House going to be protected?…(Interruptions)

MR. SPEAKER: Is there anything from the Government’s side?

THE MINISTER OF FINANCE (SHRI YASHWANT SINHA): Sir, the day is far from over. I assure the Members that I am sending a word to the Minister of State for Agriculture in this regard…(Interruptions)

SHRI ANIL BASU He should first apologise for this.

“>SHRI MURASOLI MARAN (MADRAS CENTRAL): Mr. Speaker, Sir, at the outset, I want to thank the hon. Finance Minister for implementing some of the programmes and proposals which were in the pipeline during the time of the United Front Government like, delicensing of coal and petroleum, repealing of Urban Land Ceiling Act, implementing the recommendations of the Tenth Finance Commission, replacement of FERA with FEMA and others. Therefore, I congratulate you for implementing these measures.

In this Budget, the hon. Finance Minister has increased the allocation for agriculture as also on the social sectors. But the pity is, whatever has been the increase, generally speaking, it has become usual for us to see that the amount has not been spent at the end of the year. For example, on education, the lion’s share goes towards the salary of the teachers. Similarly, whatever is allocated to the social sectors, at the end of the year, we see that that is not realised.

I have to congratulate him also for simplifying the income-tax application. I think, he calls it `Saral’. I am told, it is going to be of one page. Very good. But if you want the common man to understand and if you want more tax-payers to come, then it should be printed in the concerned State’s language also. One page can be printed in the concerned State’s language also. In Tamil Nadu, you cannot expect people to know the English language. It should be printed in the concerned State’s language also so that it may facilitate tax-payers not going to an English knowing person for help. Your aim is to abolish the third man, the entry man or the chartered accountant. It can be fulfilled if you print the form in the State’s language also.

At the same time, I have to say that this Budget is a great disappointment to me. As Shri Chidambaram has pointed out, it does not contain any big idea. It has no mission or vision.

There are only two policy announcements. One is regarding Insurance. He says, “Insurance will be opened up.” But at the same time, there is no description, there is no explanation as to what is the role of the foreigners, how much percentage of equity they can own and whether they will be allowed or not. These things remain a question mark. The second policy statement is regarding public sector undertakings. It has created a lot of confusion because he says, “The Government share holdings in public sector enterprises will be brought down to 26 per cent.” Does the Government think to dismantle all the public sector undertakings except the so-called involving strategic considerations? I think, the Finance Minister should give us an explanation regarding the privatisation of these kinds of public sector undertakings. It is because, the word `privatisation’ has been used for the first time because we have been avoiding the word and using `disinvestment’. Now, we have come forward without the jugglery of words and straightaway call it `privatisation’. All right. What is your proposal? How are you going to do it? It seems you are willing strike but afraid to wounds.

So, we could not see the colour whether you are red or saffron or something like that. At the same time, I have to congratulate you also for other purposes. You wanted to reform the reforms. In your manifesto, you have stated like that. You say that you will go for calibrated globalisation but at the same time, I am very happy to note that you are going to double the inflow of foreign direct investment within two years. You have also mentioned “Pay the tribute to Foreign Investment Promotion Board for having increased inflow to 3.1 billion in the year 1997-98.” In fact, well, the FIPB comes under the Industry Ministry. So, this credit should come to me. I think, the hon. Minister will give the credit to me.

At the same time, there is a mention that all foreign investment proposals will be disposed of within a period of 90 days. I am sorry to note that. In fact, during our regime, we had been disposing it of within three to four weeks. There was no delay. I think, the hon. Finance Minister was not properly briefed in this matter.

Regarding the Direct Tax Schedule, the hon. Finance Minister has not touched it. I think, in my opinion, nobody can touch that Direct Tax Schedule created by Shri P. Chidambaram. It is going to be the bedrock of our Direct Tax system for many years to come unless there is an emergency. I do not think, it will happen because it requires a lot of courage to change the system, in the sense, there will be public opposition. I think, to use this words, it should rest there for some more time.

Before coming to the Indirect Taxes, I have got another point to make. The hon. Finance Minister is given credit for reducing the fiscal balance from 6.1 per cent to 5.6 per cent, that is, he has reduced the fiscal deficit by half a per cent. Sir, if you go into it, it will be seen that the reduction of 0.5 per cent has been done in a very magical way. It is a game of numbers and he has played it very well. According to Mr. Haseeb A. Drabu, who has made the analysis of all the figures, has said that the Finance Minister has reduced the transfers to the States. The transfers to the States have been reduced to the extent of 0.6 per cent. That is why, he could show in the Budget that he has reduced the fiscal deficit by 0.5 per cent. I want to quote from the article “Squeezing the States” of Mr. Drabu. He says:

“The gross transfers to States have been reduced from 5.6 per cent of GDP in 1997-98 to 5 per cent in 1998-99 — a drop of 0.6 per cent, which is equal to the reduction in the fiscal deficit.”

This is the magic Shri Sinha has adopted to reduce the fiscal deficit.

Since 1991 the transfers to the State Governments and Union Territories have started going down. I think Dr. Manmohan Singh has started it. Only during Shri Chidambaram’s period the transfers have been restored or the transfers have been increased. During Dr. Manmohan Singh’s tenure, the total transfers to States dropped from 6.30 per cent to 5.26 per cent GDP . Shri Chidambaram reversed this trend primarily because our Government was based on the principle of cooperative federalism. So, transfer to the States is at the lowest level. I think hon. Finance Minister should look into it. Now it is only 5.02 per cent gross transfer to States. Last year it was 5.63 per cent. Before that it was 5.92 per cent. So, it has been reduced. But what is the use? It is only an accounting procedure. You have reduced 0.5 per cent here as fiscal deficit. Now you have passed back to the states. You have reduced it from the State Governments. But, finally when the consolidated deficit of the Centre and the States are taken,the total deficit will be the same. Therefore, next year all the State Governments will come for Grants-in-Aid with a begging bowl. That is your intention. This kind of accountancy is not good. Therefore, I would request the hon. Finance Minister to look into it and increase the transfers to the State Governments. According to GDP it is now less. Last year it was 5.63 per cent; this year it is 5.02 per cent. It wants him to explain this point.

Regarding indirect taxes what you have done is disappointing. I think it will affect the economy and fuel inflation. You have raised about Rs.9000 crore. I am not criticising the taxes, but the nature of the tax system. You have stated that it is a defining moment in history. That is how you have started your Budget. But within 24 hours you had to go back and withdraw the tax on petrol and urea. So, the defining moment has become a mortifying moment. All these things are politically ill-conceived. You could have consulted your Petroleum colleague or you could have consulted your political colleagues. I think that exercise has not been done.

Look at these indirect taxes. Because there is no vision I could see a regressive trend everywhere. The tax system generally should be as simple as possible. That is the aim of all Finance Ministers. But what have you done? You have made 23 changes in Customs Duty and 13 changes in Excise Duty. What we were expecting was that you would curb the deficit. But there is nothing to stimulate the demand, there is nothing to attract foreign direct investment, there is no big policy change or initiative. It is our complaint. That is why I used to say I am not criticising this Budget because there is nothing in the Budget. It is a lacklustre Budget.

It looks as if all changes are due to responses to specific demands. I want to give one example. On the dry grapes Duties have been reduced from 125 per cent to 120 per cent. Is it so important? I do not know what is that. You have stated that on dry grapes raisins the rate is reduced from 115 per cent to 110 per cent. It seems generally the Finance Minister used to get many representations from the public. So, you have accommodated all these things.

17.00 hrs. I am not saying this but The Indian Express which is a friendly newspaper to the Government says this and I quote:

“The past several governments had given the impression that they were striving to deliver broader economic goals for large sections of people: consumers and taxpayers. That sense is fast evaporating and, concomitantly, lobbies which had lain low for some time are coming out of the woodwork.”

That is the criticism of the Budget by no less a paper than The Indian Express.

Let me come to `SAD’the sad point, that is, the special additional duty. You have imposed a special additional duty of eight per cent. It has been called `SAD’ by the newspapers and not by me. I will call it a `level playing-field duty’ or a `swadeshi duty’. Is it going to serve your purpose? No. If you want it to help the swadeshi local production, it is not possible in the sense that it comes on top of a fifteen per cent depreciation of the rupee. This eight per cent special additional duty means that you are giving more protection to the ever-infant indigenous industries. Our industries claim that they are infants every time, all the time. So, you are going to give them more protection. Even though it is well meaning, it is not going to serve your purpose. It will only give an impetus to inflation.

For example, I know, in the BHEL 47 per cent of the total raw materials are imported. So, they have to pay the SAD or `swadeshi’ or `level playing-field’ duty of eight per cent on 47 per cent of the raw materials. Now, if somebody imports a transformer from General Electric of the USA instead of buying it from the BHEL, they will not have to pay this eight per cent special additional duty as capital goods are exempt from this duty. So, how can the BHEL fight with General Electric of the USA? This is simply an illustration. Our own domestic industries are at a disadvantage. It is better to import than to buy from indigenous industry according to my illustration. If I import a transformer from GE of the USA, it will be less expensive whereas the local make of the BHEL will not be because they are indirectly paying the `swadeshi duty’ or the `level playing-field duty’ or the SAD. So, it is going to be eight per cent costlier. This will not help. Rather, this will increase the prices. This will make them less competitive. I want the hon. Minister of Finance to look into this.

Again, on the misuse of the MODVAT credit scheme, he says that he proposes to restrict the availability of the MODVAT credit by five per cent of the duty. I think that this will create a lot of confusion because it is going to be five per cent as against a peak of thirteen per cent. It will also contribute to a rise in the prices of manufactured goods. There is a lot of confusion regarding this. Is it five per cent plus thirteen per cent? Or, is it thirteen per cent minus five per cent? Naturally, the hon. Minister of Finance will have to explain the position.

I agree that there is abuse of MODVAT. There is no doubt about it. But should he not prevent it? Why should he adopt this method thereby increasing the prices and the inflation? It should be better contained regulation and not by arbitrary limitation. So, I want the hon. Minister to consider this also.

It has been said that there is going to be an increase of excise duty of eight per cent on certain commodities. What are the goods subjected to this eight per cent increase? Let us have a look at it. They are butter, cheese, ghee, milk powder and packaged tea. The poor people buy packaged tea alone as loose, unbranded tea is very expensive. But Hindustan Lever has already raised the price of tea by Rs.10 per kilogram.

So, package tea comes under it which is a poor man’s drink. The duty for spices (branded) has been raised from 0 per cent to 8 per cent and for preparations of meat-fish (branded), it is 0 per cent to 8 per cent. Regarding writing inks, you want to help the students and improve education! It has been raised from 0 per cent to 18 per cent. Who uses the specified types of tubes used for animal-run vehicles and by hand carts? They are used only in the villages. Why should they be increased from 0 per cent to 13 per cent? I think you should have a second look at this. I think it is a retrograde step. These prices will push up – in fact, it has already pushed up – the cost of manufacture of both import-intensive and domestic goods. It will damage the industrial revival. Therefore, I am afraid that double digit inflation is a possible gift of this Budget.

We are getting shocking news everyday. If you look at the newspaper, you will find that our credit rating is going down. Recently, Duff and Phelps has lowered our rating of India from stable to negative. Then Standard and Poors, Moody’s and everybody have reduced. Why? Our rating is reduced not by one but by all agencies. Why? It is because of our nuclear explosions. This is one of the reasons. We have exploded but what did we do later? We did not get the confidence of the world. We did not get enough support which we ought to have got. Another reason is the Temple issue. You are still going ahead with the construction of Temple. A kind of fear complex is there among the people. Moreover, a jingoism and a war-like hysteria have been aroused. That is why, the rating is coming down. I would like to quote what Duff and Phelps has said.

“The rating agency has revised its outlook on India on account of the significant fiscal slippage and the potential for balance of payment deterioration in the coming years.”

The coming days are going to be worse. Take the issue of rupee into consideration. It has sunk to Rs. 42.45. By now, it would have further come down by now. I do not know the latest position. There is a downhill slide.

About net disinvestment, in less than two-and-a-half months, it had been equivalent to 400 million dollars. In these two-and-a-half months after you took over, 400 million dollars have gone out of the country. Probably, this is the highest ever fall in a single week after the presentation of any Budget. There was an avalanche of selling on Monday and Tuesday and circuit breakers were at work at the National and Mumbai Stock Exchanges. There is a fear that the balance of payments position would disclose a net deficit. The FIIs are fleeing. Actually, one newspaper has said that they are forming a `Quit India Movement’. In such a way, they are fleeing the country. Under these circumstances, what should we do? The Prime Minister and the Finance Minister should give confidence to the people.

Yesterday, the leaders of the Left Parties met the Prime Minister. What did he say? I would quote from the Economic Times.

“Prime Minister, Atal Bihari Vajpayee today said his Government was yet to make up its mind on the nature of intervention to check the sliding value of the rupee. “Any strong intervention by the Government can deplete the country’s forex reserves.” Is it the reply we expect from the Prime Minister? I think he was not briefed properly because this statement itself will be a fillip for the FIIs and others to flee the country. He should have given confidence to the country.

SHRI YASHWANT SINHA: That is not the Prime Minister’s statement. The Prime Minister issued no statement after his meeting yesterday.

SHRI MURASOLI MARAN (MADRAS CENTRAL): Then he should have denied it. This has come in the first page of the Economic Times.

SHRI YASHWANT SINHA: He cannot go on denying everything.

SHRI P. CHIDAMBARAM (SIVAGANGA): It appears as the lead story in The Economic Times. Please reflect on that now. What will be the impact on the investors?

SHRI YASHWANT SINHA: I had answered in a detailed manner to a question on this subject just a day before in the other House. I have answered a detailed question on this.

I have set out the policy of the Government very very clear.

SHRI MURASOLI MARAN : `Day before yesterday’ is the past period. The things are changing every hour.

SHRI YASHWANT SINHA: So, you wait for the next morning’s paper.

SHRI MURASOLI MARAN : Next morning, it may be different also because the overall confidence of industry, business, FIIs, foreign investors, stock-markets evaporates every hour, every minute, every second. So, you also seem to be depending on NRIs. I am happy about it. But our NRIs are not like, what they call, the overseas Chinese. The overseas Chinese have their economy. They are the third biggest economy in the world. But our NRIs, barring a few, are only professionals. They will act like our foreign entities. We have seen it during the year 1990-91. During the crisis, they all ran away. They are coming here not because of patriotism. I am not talking about big NRIs.

Generally, there is a trend all over the world. There is a difference in interests. If you pay more interest, they come. Otherwise, our black money goes there and comes back. So, there is a fear. A crisis similar to the East Asian crisis is brewing. This is for the Government to dispel that out. Dr. Arjun Sengupta, former Member of the Planning Commission said that there was a possibility of a Thailand like crisis. So, it is for that. That means, the people have no faith in this Government. I am not meaning Indian people. Not only the Indian people, but also the world at large are looking at us with doubt. … (Interruptions)

Shri P.A. Sangma said that you may have the confidence of this House but you do not have the confidence of the people. It looks as if it is true. Therefore, it is your duty to dispel the doubts. What is happening? Instead of your coalition partners strengthening you, they are making impossible and illegal demands. Therefore, I would request the hon. Minister of Finance to tell us what he is going to do about this crisis. I am told that there are rumours. I think, it is an open secret that China also may devalue its currency. In that case, our rupee will go down the drain. So, what are we going to do? In common man’s language, if rupee depreciates, it means that it is inviting inflation. So, we will again be facing a crisis. If there is a crisis, I think, if we go to the World Bank or the IMF, you know what kind of demands will be there. Therefore, I want the hon. Minister of Finance to make a declaration about policy regarding the falling rupee. Shri P. Chidambaram’s Budget was held as dream Budget. Of course, that dream could not be made true. But yours, Sir, is a nightmare Budget.

“>SHRI UTTAMSINGH PAWAR (JALNA): Mr. Speaker, Sir, I congratulate Shri Yashwant Sinha and the Prime Minister for the nice Budget. In fact, I have seen 25 Budgets right from Shri C.D. Deshmukh’s Budget till the last Budget. … (Interruptions) I saw every Budget like a toothpaste. You use Colgate, Prudent or any other toothpaste. The essence is the same. It is the same thing with the Budget. But I do not know why or how my tendency becomes to oppose it.

  सिन्हा जी, आपके साथ डफिकल्टी यह हुई है कि हम लड़के की शादी तो करते हैं और शादी करके ये विरोध पक्ष वाले कह रहे हैं कि हमें दो-ढाई महीने में पोते का मुंह देखना है। अब आप बताएं कि जब शादी करेंगे तो कम से कम सालभर का समय तो दें। इसी तरह से सरकार बने हुए अभी दो-ढाई महीने ही हुए हैं और ये बजट को क़िटीसाइज़ कर रहे हैं। शिवराज जी बैठे हुए हैं, आपकी सरकार को भी पांच साल मिले थे। हमें कयों नहीं देना चाहते। चिदम्बरम जी का बजट देखा, हम ड़ीम में ही रहे कि चाको जी आपने समर्थन वापस ले लिया, दूसरा ड़ीम हमें देखने का मौका ही नहीं मिला।

The entire House is expecting from Shri Yashwant Sinha that he should bat like Sachin Tendulkar. He should score runs and keep his wicket safe as well. अब मैं यही कहूंगा कि बिना सींग की, कम चारा खाने वाली और ज्यादा दूध देने वाली भैंस हमें ढूंढ़नी है। कैसे ढूंढ़ेंगे, हमारे विरोध वाले तो ऐसे ही रहेंगे। … (व्यवधान) इसके बारे में भी सोचेंगे पर कुछ न कुछ तो भला ही होगा।

  मैं कहना चाहता हूं कि दुर्भाग्य से हिन्दुस्तान के किसान की हालत सबसे ज्यादा खराब है। आपने बजट में ५८ प्रतिशत राइज किया है, उसके लिए मैं आपको बधाई देना चाहूंगा। मैं उन बातों में नहीं जाना चाहूंगा जिनको मेरी पार्टी और अन्य पार्िटयों के लोगों ने कहा है। यह बात सच है कि आज भी दुर्भाग्य से हमारे देश के किसान की बेटी की जब शादी होती है तो उसको अच्छा दामाद चाहिए, तो उसकी कीमत तय है। वह चार-पांच लाख रुपया देकर कोई आई.ए.एस. नहीं खरीद सकता। अपनी बेटी की शादी करने के लिए उसे अपनी जमीन गिरवी रखनी पड़ती है या बेचनी पड़ती है, इतनी बुरी हालत किसान की है। यह पिछले ४०-४५ साल में हुआ है, केवल इन्होंने ही नहीं किया। अभी मारन जी कह रहे थे। यह सच है कि रुपये का अवमूल्यन होगा। लेकिन कभी रुपये का भाव डालर के अगेंस्ट चार रुपये भी था। पूरी दुनिया में आप देखें सिंगापुर में १५-१६ साल पहले वहां की मुद्रा डबल-टि्रपल थी, लेकिन आज वहा कहां से कहां चली गई है। इटली जिसे हम बुरी इकोनोमी कहा करते थे, आज हमसे डबल हो गई है, २०० लीरा के करीब एक डालर का भाव हो गया है। आज दुनिया का हर मुल्क अपनी इकोनोमी स्ट्रॉंग करने में लगा हुआ है। मुरली जी इस बारे में काफी माहिर हैं। रुपये की जो हालत इस देश में हुई है, उसमें कुछ दोष ब्यूरोक़ेटस का है और कुछ पोलटिकस का है। मैं मानता हूं कि आज भी हमारा सिस्टम ब्रटिश सिस्टम से चल रहा है। पहले के बजट से आज तक के बजट को देखें, बजट के लिहाज से हमारा देश ऐसा है जो ऊष्ण देश कहा जाता है। इस देश में आज भी वकील धूप में टाई और काला कोट पहनकर जाता है, कभी-कभी बड़ा बुरा लगता है। इस सिस्टम को चेंज करना चाहिए। सिन्हा जी ने इसमें कुछ प्रयास किया है। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि इंस्पैकटर राज हटाने का आपका प्रयास अच्छा है, लेकिन यह मुश्िकल काम है। आप कभी नौकरशाह थे, अब राजनीति में आए हैं। मैं कहना चाहता हूं कि नौकरशाह एक घोड़ा है, उसको चलाने की आदत हमें होनी चाहिए, पर पता नहीं आप कयों नहीं चला सके। अगर ढंग से चलाए होते तो आज यह हालत नहीं होती। मैं हकीकत कह रहा हूं। हम ढंग से चला सकते थे।

  श्री तारिक अनवर (कटिहार): सिन्हा जी तो दोनों हैं।

  श्री उत्तमसिंह पवार (जालना) : मैं जानता हूं।

  श्री यशवन्त सिन्हा: घोड़ा घोड़े की सवारी कैसे कर सकता है।

  श्री उत्तमसिंह पवार: इन सब बातों से ऊपर उठकर हमें सोचना है। सी.डी. देशमुख के बजट के बारे में मैंने जिक़ किया था। मैं सारे सदस्यों से अपील करूंगा कि वे इन सब बातों से ऊपर उठकर इसको देखें। अर्थशास्त्रियों की नजर में आइडियल बजट कैसा होता है, यह कहा नहीं जा सकता। आज भी मैं मानता हूं कि हमारे देश में इतने बजट पेश हुए, सबमें इनको किसी न किसी रूप में निराशा हुई है। मैंने सिन्हा जी को कहा था कि यह बहुत मुश्िकल काम है, कयोंकि देश की चादर ही इतनी बुरी तरह से फटी हुई है कि उसे सीना बड़ा मुश्िकल है। हम आलोचना पर आलोचना करते जाएंगे, कल हम उधर होंगे तो हमारा वह रवैया होगा।

  अब मैं कृषि के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। हम सब कहते हैं कि देश में कृषि की हालत सुधरनी चाहिए। इसमें दो चीजों की जरूरत है, एक तो वाटर मैनेजमेंट की और दूसरी सीड मैनेजमैंट की। मैंने बजट में देखा वाटर मैनेजमैंट के लिए अच्छा प्रावधान है। वाटर मैनेजमैंट का मतलब पानी से ही नहीं, पीने के पानी से भी है। मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि हमारे देश में पीने का पानी भी ११-१२ रुपये प्रति लीटर मिलता है। आज देश में मिनरल वाटर पीने की जरूरत महसूस की जा रही है। यह भी हम लोगों का ४५ साल का कुछ पाप है, ऐसा मैं समझता हूं, वरना इस देश के लोगों में से .०५ प्रतिशत भी मिनरल वाटर एफोर्ड नहीं कर सकते।

  हमारे बंद करने से नहीं होगा। जैसे हर चीज को समय देना पड़ता है। मैंने शुरु में ही आपको कहा है, आपको कुछ तो समझना पड़ेगा। वाटर मैनेजमैंट और सीड मैनेजमैंट, ये दो चीजें बहुत जरूरी हैं। मैं सीड मैनेजमैंट के बारे में जरूर कहूंगा कयोंकि मैं उस क्षेत्र से आता हूं जो हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा सीड सैंटर है। हम विदेश में घूमे हुए हैं। अगर हिन्दुस्तान का केला देखेंगे तो उसमें काले दाग देखेंगे आप किसान हैं, आप इस बात को भली-भांति जानते हैं। लेकिन अप्रैल के महीने में आपको केले में कोई भी दाग नहीं दिखेगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) +É{É ºÉÉ=lÉ +£òÒEòÉ, ºÉÉ=lÉ +¨ÉäÊ®úEòÉ +Éè®ú ¥ÉÉVÉÒ±É EòÉä nùäÊJÉB, xÉÉMÉ{ÉÖ®ú EòÉ ºÉÆiÉ®úÉ ¨É¶É½þÚ®ú ½þè EªÉÉäÆÊEò =xÉEòä {ÉÉºÉ VÉÉä <xÉ£òɺ]ÅESÉ®ú, ]ÅÉƺÉ{ÉÉä]õÇ, {ÉÉäº]õ ½þÉ®ú´Éèʺ]õÆMÉ ½þè, =ºÉEòä ʱÉB ¤ÉVÉ]õ ¨ÉäÆ ¤É½þÖiÉ VªÉÉnùÉ |ÉÉ´ÉvÉÉxÉ Eò®úxÉä EòÒ VÉ°ü®úiÉ ½þè* ÊEòºÉÉxÉ Eòä ¤ÉÉ®úä ¨ÉäÆ +É{É ªÉÚÊ®úªÉÉ-ªÉÚÊ®úªÉÉ ±ÉäEò®ú ¤Éè`öä ½þèÆ ±ÉäÊEòxÉ ªÉÚÊ®úªÉÉ Eòä +±ÉÉ´ÉÉ ¦ÉÒ ¤É½þÖiÉ ºÉÒ SÉÒVÉäÆ ½þèÆ VÉÉä ½þ¨ÉäÆ ÊEòºÉÉxÉ Eòä ʱÉB ºÉSɨÉÖSÉ Eò®úxÉÒ ½þèÆ, xɽþÒÆ iÉÉä VÉèºÉÉ ÊEò ¨ÉèÆxÉä Eò½þÉ ½þè ÊEò +É{ÉxÉä ÊEòºÉÉxÉ EòÒ BäºÉÒ ½þɱÉiÉ Eò®ú nùÒ ÊEò =ºÉEòÉä +{ÉxÉÒ ¤Éä]õÒ EòÒ ¶ÉÉnùÒ Eò®úxÉä Eòä ʱÉB VɨÉÒxÉ ¤ÉäSÉxÉÒ {Éc÷iÉÒ ½þè* +MÉ®ú ½þ¨ÉäÆ ºÉSɨÉÖSÉ ÊEòºÉÉxÉ Eòä |ÉÊiÉ nùnùÇ ½þè iÉÉä <ºÉ ¤ÉVÉ]õ ¨ÉäÆ ½þ¨ÉxÉä BEò ¤ÉÉiÉ VÉ°ü®ú nùäJÉÒ ÊEò ºÉÒb÷ ¨ÉèxÉäVɨÉèÆ]õ +Éè®ú BäºÉÒ ¤É½þÖiÉ ºÉÒ SÉÒVÉäÆ nùäxÉä EòÉ |ɪÉÉºÉ ÊEòªÉÉ ½þè*

  मैं इंडस्ट्री के बारे में जरूर कहना चाहूंगा। पिछले कई सालों से हम देख रहे हैं। आज दुर्भाग्य से हमारे पास इनफ्रास्ट्रकचर की कमी है। अगर हमारे पास अच्छा इनफ्रास्ट्रकचर होता तो हम कारें नहीं मंगवाते, जो हमारे पास कारें आई हैं: जैसे मर्िसडीज हैं, सिएलो है और भी कई हैं। चिदम्बरम जी, ये सब न्यू टैकनॉलोजी की हैं। सिएलो की कितनी कारें रोड पर नजर आ रही हैं, कभी इनकी कोई फैकट्री नजर आई। सेम केस वाशिंग मशीन का है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) +É{É nùºÉ-{Éxpù½þ ºÉÉ±É {ÉÖ®úÉxÉÉ Eò±É®ú ]õä±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ±Éä VÉÉ<B +Éè®ú =ºÉEòä +É{ÉEòÉä nùºÉ ½þVÉÉ®ú ¯û{ÉB nùäÆMÉä* VÉÉä SÉÒVÉ +É{ÉxÉä nùºÉ ºÉÉ±É {ɽþ±Éä nùºÉ ½þVÉÉ®ú ¯û{ÉB ¨ÉäÆ JÉ®úÒnùÒ, EòÉä<Ç =ºÉEòÉ nùºÉ ½þVÉÉ®ú ¯û{ÉB nùäiÉÉ ½þè ±ÉäÊEòxÉ VÉÉä ¨É±]õÒ xÉè¶ÉxÉ±É iÉEò¨{ÉÊxɪÉÉÆ ½þèÆ, VÉèºÉä- ºÉè¨ÉºÉÆMÉ, iÉÉäʶɤÉÉ, ´É{ÉÇÖ±É ½þè, <xÉEòÉ VÉÉä BxÉFòÉäSɨÉèÆ]õ ½þÖ+É ½þè =ºÉEòä ¤ÉÉ®úä ¨ÉäÆ <ºÉ ¤ÉVÉ]õ ¨ÉäÆ ºÉÉäSÉÉ VÉÉB*

I must congratulate you.

  हमारा इनफ्रास्ट्रकचर बढ़ेगा। जब तक हम नो हाउ टैकनॉलोजी नहीं लाएंगे तब तक हम नश्िचत रूप से प्रगति नहीं कर सकते। कुछ चीजें अगर करनी हैं तो टैकस बढ़ेगा ही।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

I must congratulate the Minister. In his Budget he has tried to cater to the needs of almost every section of the society, right from the persons below the poverty line to NRIs; from farmers to industrialists and from middle-man to the service class.

  मुझे कभी-कभी दुख होता है, इंसपैकटर राज में सेल्स टैकस वाला आकर अच्छे ट्रेडर को परेशान करता है। करप्शन ने इस देश का सत्यानाश किया है। बजट में ऐसा कोई प्रावीजन होना चाहिए जिससे एकाउंटेबिल्टी हो। यहां कहा गया कि पब्िलक सैकटर बहुत लॉस में जा रहा है। यह कयों लॉस में है? जैसे इंडियन एयरलाइंस और दूसरी बहुत सी कम्पनियां हैं। मैंने सब-कमेटी में भी काम किया है। मुझे उनके सिस्टम को देख कर दुख होता है। जब तक हम ब्यूरोक़ेसी को जिम्मेदारी नहीं सौंपेगे तब तक मुझे नहीं लगता कि हम आगे कोई प्रगति कर पाएंगे। जब तक कृषि तक पहुंचने के लिए ५८ परसैंट से २८ परसैंट पैसा रहेगा और अगर आप ऐसा ही करते रहेंगे कयोंकि इन्होंने ही आदत डाली है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

A Chief Secretary’s expenses are more than a Minister’s expenses. You can go through it and verify. I am saying it with confidence.

SHRI P. CHIDAMBARAM :You should control it. What are you doing?

  श्री उत्तमसिंह पवार : अगर आप प्रोटोकोल में देखेंगे

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

The bureaucrats’ expenses are more than a Minister’s expenses whereas, in protocol the Members of Parliament are one step above them. This is happening. The reason being though we all are accountable, unfortunately we do not behave like accountable persons.

… (Interruptions)

  एक माननीय सदस्य : आप चेयर को एड़ेस करिए।

  श्री उत्तमसिंह पवार : मैं चेयर को ही एड़स कर रहा हूं।

I am talking about everyone. It is not like that. I have clearly told you. … (Interruptions) I am addressing the Chair only.

  आपने कहा कि इनके बजट का रंग आपको समझ में नहीं आ रहा। मैं कहता हूं कि इनके बजट का रंग पानी जैसा है। “पानी रे पानी तेरा रंग रंग कैसा, जिस में मिला दो लगे उस जैसा” ऐसी कोशिश इन्होंने की है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

SHRI P. CHIDAMBARAM : He is saying that it is a colourless Budget. … (Interruptions)

SHRI YASHWANT SINHA: You have not got the meaning of what he said. … (Interruptions)

  श्री उत्तमसिंह पवार : मैं यही कहूंगा कि क़ीम बजट की बजाए हमें आईडियल बजट की जरूरत है जिसे देने की कोशिश की गई है। हिन्दुस्तान डम्िपंग ग्राउंड बना दिया गया है।

We have one-third of consumption and one-third of population of the world. I will say this with proud that we have the maximum manpower; maximum minerals are in our land; maximum oil is in our ocean; we have the maximum brains. Even then, what is our status today? The per capita income and expenditure is very less.

  आज आप देखेंगे तो कि पाएंगे पर-कैपिटा इनकम और एकसपैंडिचर बहुत कम है। मैं आप सब से कह रहा हूं कि आज किस के पास पैसा है? सरकारी कर्मचारी के पास ८० परसैंट मनी है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ½þɱÉÉiÉ BäºÉä {ÉènùÉ ½þÖB ÊEò +ÉVÉ ½þ¨É Eò¨{ÉÒ]õ Eò®ú ®ú½þä ½þèÆ*

While having competition, we have neglected one thing. We are always comparing those who are availing facilities at the rate of four per cent which is 18 per cent for others. It cannot be done. There is no doubt about it. … (Interruptions)

MR. SPEAKER: Will you please conclude?

  श्री उत्तमसिंह पवार : मैं तो ऐसी कोई बात नहीं कह रहा हूं। मैं ऑपोजिशन का कहा मान कर बात कह रहा हूं।

I again congratulate Shri Yashwant Sinha. It is an ideal Budget which he has given and I wish him success. Thank you.

“>SHRI NADENDLA BHASKARA RAO (KHAMMAM): Sir, through you, I only would like to add a few points to what is already told by Shri Murli Deora when he initiated the debate. He pointed out certain lapses in the Budget. I would say that there is nothing new in this Budget.

As a matter of fact, it is a routine ritual document which the officers had prepared and the Finance Minister read. We had also done the same thing in our Assemblies. There is nothing new in this Budget. Important things are missing in this Budget. I myself was a Finance Minister in the State Government and so, I know how we prepare the Budget. It is only the officers who prepare and we just read it out. … (Interruptions) Many important things are missing in this Budget and the real things are not brought forward. … (Interruptions)

SHRI YASHWANT SINHA: I think that this self-praise is confined only to Shri Bhaskara Rao himself!

SHRI NADENDLA BHASKARA RAO : Why is it so? It applies to all.

Though we read it out, naturally we take information from them and prepare the Budget. It is my humble submission – with great respect to the hon. Finance Minister – that this is an anti-people’s Budget and it is a highly inflationary one. An eight per cent hike in import duty and an increase in various excise duties will definitely lead to a highly inflationary budgetary system.

Till yesterday it was only about five per cent. All of a sudden, it shot up to seven per cent or so. The other day I saw the Finance Minister say on television that it is about 6.5 per cent or so. I say that it will definitely reach 10 per cent. The housewife has already started to feel the pinch of the Budget; she is cursing the Finance Minister. Going by the economic situation that has been portrayed, it will definitely go beyond 10 per cent. It is said:

“Overall economic growth slowed to 5 per cent. Agriculture was negative with foodgrain production dropping to 194 million tonnes from 199 million tonnes in the previous year. Growth of industrial production slackened to 4.2 per cent. Export growth was weak for a second successive year regarding growth in dollar terms not less than 3 per cent. The fiscal deficit worsened to 6.5 per cent.”

If that is the economic situation, what attempt has been made for encouraging the industry? Only a little attempt is made on agriculture side by introducing the `Kisan Credit Card’. I welcome that measure. Every kisan welcomes it. Except that small green patch, what is there in the Budget for agriculture?

We saw the Bill for repeal of Urban Land (Ceiling and Regulation) Act, being introduced. Urban economy is growing while rural economy is coming down. The gap between urban and rural economies has further widened. No attempt has been made by the Finance Minister and this Government to narrow down the gap. In the rural sector, an agriculturist is not supposed to own more than 10 to 20 acres of land — the number varies from State to State — whereas in urban areas, one can possess a hundred complexes, a hundred cinema theatres, 200 buildings and there is nobody to question him. What attempt has been made in the Budget to correct this anomaly? The promised 60 per cent allocation that they wanted to give to agriculture has also not found a place in the Budget. It was stated by the hon. President, in his address to both Houses this year that 60 per cent allocation will be made to agriculture. That allocation cannot be seen in the Budget.

As stated by the Minister himself, the economic situation in the country is very serious. Agriculture is showing signs of decline and industry is in doldrums. How is the Minister going to fill these gaps? No concrete policy has been enunciated in this Budget. Dr. Manmohan Singh tried to introduce new policies in his Budgets. I find a remarkable difference between those Budgets and this Budget. This Budget conceives a revenue loss of Rs.950 crore and yet the Minister aims at mobilising Rs.8000 crore and odd. Where is he going to get it from? How is it possible for him unless he imposes taxes which will result in a severe price hike?

The Finance Minister expects the overall fiscal deficit to be Rs.91000 crore. In fact, it will be more than Rs.1 lakh crore. Even experts are saying this. Developed countries including America do not prefer to go in for deficit budgets but we preferred a deficit budget. This deficit Budget will adversely affect the weaker sections and the common man. It will adversely affect all sectors, particularly the rural sector.

This Budget is silent on economic sanctions imposed on India. Here, the expected inflow of about Rs.2500 crore will be stopped. There is no answer for it. The expected inflow would be in the form of industry or bank loans to the extent of Rs.2500 crore or Rs.3000 crore. That is what the experts are saying. How do we link up all these things? In the field of rural employment, an increase of Rs.100 crore is paltry if you compare it with the past where it was Rs.3900 crore to Rs.4000 crore. Your Budget is silent on transfer of Central Rural Development funds of about Rs.10,000 crore. In the earlier Budget, they expected rural development and they tried to provide about Rs.10,000 crore from Centre directly to the Panchayat and the Municipalities so that they will develop themselves. Your Budget is absolutely silent on this.

There is nothing new about your Samadhan. It is not a new thing. The VDIS which was introduced by Shri Chidambaram is another way for the dishonest people to come and deposit money. Except that, there is nothing new. What is new in Samadhan? There is nothing new except the VDIS. You tried to show that there is an increase in the Plan outlay to the extent of Rs.24,000 crore. Actually, it is not so. I have gone through the details a number of times. You have compared the Budget Estimates with the Revised Estimates of the previous year where the Central Plan expenditure was reduced by Rs.10,000 crore. That is why, your estimats have shown an increase of Rs.24,000 crore. Actually it is not so. The over-stated receipts and under-stated expenditure perhaps made to think that he is presenting a rosy picture. Actually, when we have through the details, we found that it is not so.

Having created tensions in the Sub-continent, the allocation that you have given to Defence is paltry. You have increased the allocation to the extent of Rs.500 crore, which is nothing.

Coming to the GDP, your National Agenda expressed to achieve a growth rate of seven or eight per cent. To achieve a growth rate of seven per cent, the investment rate should be 28.3 per cent of GDP at market price, which is also not correctly shown in your Budget.

In these circumstances, the Government has to sincerely think about the economic sanctions. The Budget has promised opening up the insurance sector for the private industries. We welcome it. The Congress party, in fact, welcomed it. But it should not result in mushrooming of chit fund agencies or new financial companies. They will spread and ruin the people. They will spoil the people and get away with the money one fine morning. The Government should be very careful about the insurance companies.

Your borrowings incidentally show that the fiscal deficit is equivalent to Rs.91,000 crore. You proposed to borrow Rs.91,000 and odd crore but the fiscal deficit is Rs.90,000 and odd crore.

It is good to know that you have increased the number of houses under Indira Awas Yojana. I expect the hon. Minister of Finance to spell out in his reply that MPs will also have a say in this. Under this programme, 80 per cent of funds are going from the Central pool and all MLAs are deriving the benefit whereas the MPs have not been given any chance at all. The other day, the hon. Speaker was kind enough to give at least 50 telephones and 150 gas connections to each MP so that the MP should also have the benefit….. (Interruptions)

SHRI P.C. CHACKO (IDUKKI): It is a very big disadvantage.

SHRI NADENDLA BHASKARA RAO :It is a disadvantage and at the same time, an advantage to satisfy our leaders and workers at the grassroot level.

When we visit the place where the houses are burnt, we cannot give any houses while the MLA gives ten houses immediately with our money and with the Central funds. So, you please think of it.

I forgot one more factor that the Budget does not mention about National Water Policy which we often think of and talk about. There is no allocation on account of this and because of this linkage of rivers is suffering. As far as Andhra Pradesh is concerned, we expected Godavri to be linked up with river Krishna, since it is drying up on account of breaches in Karnataka. So, we expected the Budget to have allocated certain funds for linkage of rivers. The hon. Finance Minister was telling us that 58 per cent was allocated to irrigation. But there is no specific mention about that.

Further, the Budget is silent about population control. No allocations are made at all. If the population is allowed to grow like this then all the projects that we thought of or are thinking would be a waste. We cannot give the real results to the people. Looking from any angle, my submission is that this Budget is a lackluster Budget and as our friend just now said, it is a colourless Budget.

With these few words, I take leave of you. Thank you Sir.

“>DR. S. VENUGOPALACHARY (ADILABAD): Thank you Sir, for giving me an opportunity to speak.

Hon. Speaker Sir, this Budget is rooted in Swadeshi, but Swadeshi does not mean isolation. Many fluent speakers have spoken before me about lot of things. The hon. Finance Minister has been ambitious about the current economic growth prospects because the GDP growth has been projected to 8 per cent only. If we see the figures, the nominal GDP for year 1998-99 works out to Rs.16,25,440 crore. The corresponding figure for the year 1997-98 is Rs.14,15,190 crore. This yields a nominal GDP growth of 15 per cent for the year 1998-99.

However, if the GDP fails to grow at the projected level, the fiscal target will automatically come down, the hon. Finance Minister knows this. Shri N.K. Singh, Revenue Secretary has gone on record to say that with regard to indirect tax in the year 1997-98, the allocation fell short by over Rs.15,000 crore because industry did not grow as project, i.e. at the rate of 10 per cent. It is not clear as to what would be the industrial growth rate for the year 1998-99 because the bulk of revenue mobilisation in the current fiscal year depends on the indirect taxes.

In fact, the excise is expected to grow over 20 per cent in the year 1998-99, i.e. Rs.5769 crore as against Rs.7770 crore in the year 1997-98. In customs, as per the figures mentioned, the growth rate of collection is projected at about 18 per cent, i.e. from Rs.41,000 crore in the year 1997-98 to Rs.48,148 crore in the year 1998-99. It shows the hon. Finance Minister is heavily depending upon the indirect taxes to boost revenue collection.

On direct taxes, the hon. Finance Minister projected a lower target for the year 1998-99 as compared to 1997-98. Both corporate tax and income tax together are expected to yield Rs.3,000 crore, which is less than that of the previous year, 1997-98.

Corporate tax during 1997-98 was Rs.21,360 crore and the estimate for the year 1998-99 is Rs.26,550 crore. There is a clear variation. However, income tax collection for the year 1998-99 is expected to be Rs.27,930 crore as against the last year’s revised estimate of Rs.28,750 crore.

On expenditure side, the hon. Finance Minister has not kept his promise in correcting the balance in favour of the capital expenditure as against the revenue expenditure. In the year 1998-99, the capital expenditure is expected to grow by eight per cent, which means that there is virtually no growth in real terms. The capital expenditure has increased from Rs.53,045 crore in the year 1997-98 to Rs.57,865 crore in 1998-99 but the revenue expenditure has increased from Rs.1,82,200 crore in the year 1997-98 to Rs.2,10,062 crore in the year 1998-99. It shows that there is a clear increase of revenue when compared to the capital expenditure.

I appreciate the hon. Finance Minister for allocating more funds for agriculture. In India, more than 60 per cent of the population depends on agriculture. Still the funds provided for agriculture are not sufficient. Unless public investment increases, private investment would not increase substantially.

In regard to comprehensive crop insurance, I appreciate the hon. Prime Minister and his Government for giving the credit card. Experimental crop insurance schemes are not really serving the interests of the farmers, who are affected by the natural calamities. Especially in Andhra Pradesh, continuously for the last five to six years, the farmers were affected by the natural calamities and suffered so much of loss. Recently, in Rajasthan and Gujarat also, the farmers have suffered on account of cyclones and other natural calamities.

There is an urgent need to modify the Crop Insurance Scheme to cover all the farmers including non-loanee farmers. I request the hon. Prime Minister to consider village as a unit. Since the farmers are not sound in their financial condition, there is a need to subsidise a part of the premium. Also more funds should be allocated for opening the Krishi Vigyan Kendras. As per my information, in 292 places, KVKs have still to be opened. Especially in Andhra Pradesh, seven more KVKs have to be established, for which the State Government has provided land and the Andhra Pradesh Government is ready to contribute half of the funds.

The farmers especially in Andhra Pradesh and in other places where natural calamities take place are getting much lower support price than the minimum support price. Recently, the Government of Andhra Pradesh and the hon. Chief Minister of Andhra Pradesh, Shri Chandrababu Naidu suggested to the Union Government to give bonus of Rs.60 per quintal for paddy and rice procured by the Food Corporation of India and other agencies as is being given for wheat in the northern States.

Sir, Cooperative banks and commercial banks are not properly giving loans to the farmers. As you know, Sir, agriculture is contributing 30 per cent to our GDP. I want the Government of India to relax the norms fixed by RBI and NABARD so that more credit is made available through the District Central Cooperative banks and other agencies, which are functioning in the State.

I also congratulate the hon. Prime Minister for giving top priority to the development of infrastructure, especially to power industry. The plan outlay for power rose from Rs.6,738 crore to Rs.9,500 crore. It is in the right direction. The earlier Finance Minister, Shri P. Chidambaram had also given more funds to development of infrastructure.

Like this, this Government has also provided more funds for the power sector. But how much is the net budgetary support? That is not mentioned. I would request the hon. Finance Minister to make it clear when he replies.

Also, priority should be given to non-conventional energy. It is because, earlier the UF Government was committed to improve the energy sector, especially the solar energy, there is no mention of solar energy in this Budget. Also, hydroelectricity projects were given top priority. Recently the Government have removed the subsidy given to the bio-gas plants. You are aware that chimneyless chulhas are famous in rural India. For this, even though the budgetary support has been increased, the Government have removed the subsidy. With this, all the local units which were depending on this industry, are suffering. That is why, I would request the hon. Finance Minister to see that the subsidy is increased. If you remove the subsidy, almost all the local units will be closed.

I am happy that tax holiday for power sector has been extended up to 2003. The appointment of monitoring officer may not solve the problem because there is already an Investor Promotion Cell in the Ministry of Power. Through that, many projects are finalised. Therefore, I would request the hon. Prime Minister to review this.

Further, the Budget is absolutely silent on the impact of sanctions on our economy and how the Government of India is preparing to face the economic sanctions imposed by the United States and other Western nations. In the Budget, they have not mentioned how the Government is going to solve the problem. The Government is going to rely on borrowed finance. This is a growing expenditure without additional resource mobilization. How about the additional protection given to the Indian industry? This is also not mentioned. The Economic Survey has put the import duty collection rate for 1996-97 at 31 per cent. The domestic market cannot compete with this level of production.

The Minister of Finance did not use the opportunity of cutting unwarranted subsidies against the backdrop of economic sanctions and security issues.

In Andhra Pradesh, so many projects are pending. I would request the Minister of Finance to waive Rs.663 crore of interest to be paid by Singareni Colliery. Both the State and the Centre hold 50 per cent of shares in the Colliery. Lakhs of people are depending on this industry. It is a hundred year old project. It has to pay Rs.663 crore towards interest. I would request the Finance Minister to look into the matter and waive the interest because Singareni Colliery is already incurring losses. If you see the record of production of coal for 1997-98, it is 28.9 million tonnes. In spite of that, it is incurring losses. Therefore, I would request the Finance Minister to waive the interest of Rs.66.30 crore.

Anyhow, I congratulate the hon. Finance Minister, because in this financial indiscipline, he has dared to simplify the tax returns. For simplification of the tax returns, he has introduced a simple one page income tax returns like the saral and samadhan which will apply both to the direct and indirect taxes. With this, I support the Budget.

MR. SPEAKER: Now I will call Shri Bhajan Lal. He will take only five minutes. He is having some urgent work.

“> श्री भजनलाल (करनाल) : आदरणीय अध्यक्ष जी, वित्त मंत्री जी ने जो बजट पेश किया है, उसकी कुछ खामियों, कमियों के बारे में मैं चर्चा करूंगा। यह बजट किसान, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पूरी तरह से खिलाफ है। इस देश की गाड़ी के दो चकके हैं प्रथम – किसान, मजदूर जो गांव में निवास करता है या कारखानों में काम करता है और दूसरा उद्योग। किसान और उद्योग इस देश की गाड़ी के दो चकके हैं। इस बजट में न तो कृषि के बारे में कोई प्रोत्साहन देने की बात की गई है, न ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उत्थान की कोई बात की गई है और न उद्योगों के बारे में कुछ किया गया है। दो साल में देश के उद्योग की हालत खराब हो गई है। किस तरह इस देश में उद्योग पनप सकते हैं, जब उद्योग देश में डूब रहे हैं, उनकी बुरी हालत हो गई है। उनको किस तरह से ठीक किया जा सकता है, उसकी कोई चर्चा नहीं की गई है।

  इन्होंने यूरिया खाद के दाम अपने बजट में बढ़ा दिये हैं। मैंने भी किसान के घर में जन्म लिया है। मैं पहली बार देख रहा हूं कि खाद के भाव एक रूपया प्रति किलो के हिसाब से बढ़ाये हैं। सिन्हा साहब, खाद किलों में नहीं बिकती, यूरिया खाद का पचास किलो का एक कट्टा होता है। एक कट्टे पर आपने एक रूपया प्रति किलों के हिसाब से दाम बढ़ा दिया। आपने लोगों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की है, ताकि लोग कहें कि एक रूपया किलों तो कोई खास बात नहीं है जबकि आपने एक कट्टे पर पचास रूपये बढ़ा दिये। यूरिया खाद किलों के हिसाब से नहीं बिकती, कट्टे के हिसाब से बिकती है। मैं इस बात को समझ नहीं सका। आप भी पुराने सीजंड आदमी हैं, सब जानते हैं यूरिया खाद में किलों के तो कोई मायने ही नहीं है। यह बात मुनासिब नहीं है।

  अध्यक्ष महोदय, मैं एक दूसरी बात कहना चाहता हूं कि इससे मुद्रास्फीति हर हालत में बढ़ जायेगी। आपने परमाणु परीक्षण किया, अच्छी बात है, देश का गौरव बढ़ा। लेकिन यह सारी योजना, सारा प्रोग्राम पंडित जवाहर लाल नेहरू ने शुरू किया था। जब चाइना से हमारी लड़ाई हुई थी यह उसी वकत शुरू हुआ था।

  श्री चन्द्रशेखर साहू (महासुमन्द): कया पंडित जी की नीतियों को बिल्कुल उलट दिया गया, नरसिंहराव जी के जमाने में आप लोगों ने उन नीतियों को दफना दिया। … (व्यवधान)

  श्री भजनलाल :मैं जो कहता हूं वह आप सुनिये।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) +É{ÉxÉä EªÉÉ iÉÒxÉ ¨É½þÒxÉä ¨ÉäÆ {É®ú¨ÉÉhÉÖ ¤É¨É ¤ÉxÉÉ Ê±ÉªÉÉ? ªÉ½þ EòÉÆOÉäºÉ EòÒ xÉÒÊiɪÉÉäÆ EòÒ ´ÉVɽþ ºÉä ½þÖ+É ½þè* ½þ¨ÉxÉä <ºÉÒʱÉB xɽþÒÆ ÊEòªÉÉ ÊEò +MÉ®ú {É®ú¨ÉÉhÉÖ ¶ÉÊEiÉ EòÉ {É®úÒIÉhÉ nùÖÊxɪÉÉ EòÉä ÊnùJÉÉ nùäÆMÉä iÉÉä nùÖÊxɪÉÉ ´ÉɱÉä ½þ¨ÉºÉä VªÉÉnùÉ iÉÉEòiÉ´É®ú {É®ú¨ÉÉhÉÖ¤É¨É ¤ÉxÉÉ ±ÉäÆMÉä* <ºÉÒʱÉB ½þ¨ÉxÉä <ºÉEòÉä ºÉÒFòä]õ ®úJÉÉ* ±ÉäÊEòxÉ +¤É EªÉÉ ½þÉäMÉÉ, ¤É½þÖiÉ ºÉä nùä¶ÉÉäÆ ºÉä VÉÉä ºÉ½þɪÉiÉÉ Ê¨É±ÉiÉÒ lÉÒ ´É½þ ºÉ½þɪÉiÉÉ Ê¨É±ÉxÉÒ ¤ÉÆnù ½þÉä VÉɪÉäMÉÒ +Éè®ú <ºÉ nùä¶É EòÒ ½þɱÉiÉ ¤ÉÖ®úÒ ½þÉä VÉɪÉäMÉÒ, VÉÉä +ÉʽþºiÉÉ-+ÉʽþºiÉÉ ¶ÉÖ°ü ½þÉä MÉ<Ç ½þè* ʺÉx½þÉ ºÉɽþ¤É +É{É +ÉMÉä SɱÉEò®ú nùäÆJÉäÆMÉä ÊEò nùä¶É EòÒ +lÉÇ´ªÉ´ÉºlÉÉ, nùä¶É EòÒ <EòÉäxÉÉä¨ÉÒ JÉiÉ®úä ¨ÉäÆ {Éc÷ VÉɪÉäMÉÒ, ÊVÉºÉ iÉ®ú½þ ºÉä +É{ÉxÉä ªÉ½þ ÊEòªÉÉ ½þè* +É{ÉxÉä ªÉÚÊ®úªÉÉ JÉÉnù Eòä ®úä]õ |ÉÊiÉ Eò^ä {ÉSÉÉºÉ °ü{ɪÉä ¤ÉgøÉ ÊnùªÉä ½þèÆ ÊVɺɺÉä <ºÉ nùä¶É ¨ÉäÆ <ºÉEòÉ =i{ÉÉnùxÉ Eò¨É ½þÉä VÉɪÉäMÉÉ, VÉÉä +SUôÉ xɽþÒÆ ½þÉäMÉÉ* UôÉä]õä +Éè®ú ¨ÉZÉÉä±Éä ÊEòºÉÉxÉ <ºÉEòÉä EòèºÉä ¤ÉnùÉǶiÉ Eò®úäÆMÉä* ¤ÉÉäxÉä ºÉä {ɽþ±Éä +MÉ®ú ªÉÚÊ®úªÉÉ xɽþÒÆ b÷±ÉiÉÒ ½þè iÉÉä =i{ÉÉnùxÉ xɽþÒÆ ½þÉä ºÉEòiÉÉ, <ºÉʱÉB VÉ°ü®úÒ ½þè ÊEò +É{ÉxÉä VÉÉä BEò °ü{ɪÉÉ ¤ÉgøɪÉÉ ½þè <ºÉä +É{É ´ÉÉ{ÉºÉ ±Éä ±ÉÒÊVÉB, xɽþÒÆ iÉÉä ªÉ½þ `öÒEò xɽþÒÆ ½þÉäMÉÉ* <ºÉEòä ºÉÉlÉ-ºÉÉlÉ … (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री चमन लाल गुप्त (ऊधमपुर): पच्चीस रूपये पहले ही वापस ले चुके हैं।

  श्री भजनलाल : आप जानते हैं कि एक रूपये का मतलब पचास रूपये कट्टा बढ़ा दिया गया है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) {ÉSSÉÒºÉ °ü{ɪÉä ¦ÉÒ VªÉÉnùÉ ½þèÆ, ´É½þ ¦ÉÒ `öÒEò xɽþÒÆ ½þè, ¤ÉʱEò Eò¨É Eò®úxÉÉ SÉÉʽþB* EÞòÊ¹É Eòä ¤ÉÉ®úä ¨ÉäÆ ÊEòºÉÉxÉÉä EòÉä +SUôÉ ¦ÉÉ´É nùäxÉä EòÒ ¤ÉÉiÉ +ÉxÉÒ SÉÉʽþB* nùä¶É ¨ÉäÆ ÊEòºÉÉxÉÉä EòÒ VÉÉä ½þɱÉiÉ ½þÉä MÉ<Ç ½þè, =ºÉä +É{É VÉÉxÉiÉä ½þèÆ* +ÉVÉ nùä¶É ¨ÉäÆ ÊEòiÉxÉä ±ÉÉäMÉ VɱÉEò®ú ¨É®úiÉä ½þèÆ, ÊEòiÉxÉä ±ÉÉäMÉÉäÆ xÉä JÉÖnùEòÖ¶ÉÒ EòÒ ½þè* {ÉÆVÉÉ¤É +Éè®ú ½þÊ®úªÉÉhÉÉ Eòä ÊEòºÉÉxÉÉäÆ EòÒ ¦ÉÒ ªÉ½þÒ ½þɱÉiÉ ½þÉäxÉä ´ÉɱÉÒ ½þè* +ÉVÉ xÉ®ú¨ÉäÆ EòÒ ZÉÉc÷, VÉÒ®úÒ EòÉ ZÉÉc÷ +ÉvÉä ½þÉä MɪÉä ½þèÆ* +É{É {ÉiÉÉ Eò®ú ±ÉäÆ {ÉÆVÉÉ¤É +Éè®ú ½þÊ®úªÉÉhÉÉ nùÉä |Énùä¶ÉÉäÆ ¨ÉäÆ BäºÉÉ ½þÖ+É ½þè* ¨ÉèÆ ½þÊ®úªÉÉhÉÉ ºÉä JÉÉºÉ iÉɱ±ÉÖEò ®úJÉiÉÉ ½þÚÆ ´É½þÉÆ VÉÒ®úÒ +Éè®ú Eò{ÉÉºÉ EòÉ =i{ÉÉnùxÉ +ÉvÉÉ ½þÉä MɪÉÉ ½þè* BäºÉÒ ¤ÉÒ¨ÉÉ®úÒ <ºÉ nùä¶É Eòä +Ænù®ú +É MÉ<Ç ½þè VÉÉä VÉÉ xɽþÒÆ ºÉEòiÉÒ ½þè* VÉ¤É ºÉä EòÉÆOÉäºÉ EòÉ ®úÉVÉ MɪÉÉ ½þè iÉ¤É ºÉä <ºÉ ¤ÉÒ¨ÉÉ®úÒ EòÉ ®úÉVÉ +É MɪÉÉ ½þè*

  श्री सत्य पाल जैन (चंडीगढ़): आप जाते हुए छोड़ गये हैं।

  श्री भजनलाल : हम ठीक करके गये थे, आप लोग ले आये

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) <ºÉʱÉB ¨Éä½þ®ú¤ÉÉxÉÒ Eò®úEòä +É{É <ºÉ +Éä®ú nùäÊJɪÉä

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ¨ÉèÆxÉä +¦ÉÒ ®úÉVÉxÉÒÊiÉ EòÒ ¤ÉÉiÉ xɽþÒÆ EòÒ ½þè, +¦ÉÒ +ÉMÉä SɱÉEò®ú =ºÉEòÒ ¦ÉÒ ¤ÉÉiÉ Eò°üÆMÉÉ, iÉ¤É +É{É VÉ´ÉÉ¤É nùäxÉÉ, ¨ÉèÆ ¦ÉÒ VÉ´ÉÉ¤É nùÚÆMÉÉ* ¨ÉèÆxÉä ¤ÉVÉ]õ EòÒ ¤ÉÉiÉ Eò½þÒ ½þè +Éè®ú ¨ÉÖxÉÉÊºÉ¤É ¤ÉÉiÉ Eò½þÒ ½þè*

18.00 hrs.

  अध्यक्ष महोदय, जहां तक उद्योगों का सवाल है, मैंने एक सवाल पूछा था जिसका उत्तर मुझे राज्य सभा में दिया गया, दो साल में ६०० बड़े उद्योग बंद हो गए हैं। मेरे अंदाजे के मुताबिक ज्यादा इंडस्ट्रीज बंद हो गई हैं कयोंकि आपकी पालिसी यह है कि बाहर की कंपनियों को इस देश में बुलाया जाए और घर वालों को यानी जो यहां के उद्योग हैं उनको बंद किया जाए जिससे विदेशी यहां आएं और यहां से धन कमाकर विदेशों को ले जाएं। यह बात ठीक नहीं है। आप जातने हैं कि चाहे यू.एस.ए. और चाहे यू.के. हो, अपनी इंडस्ट्रीज को प्रोटैकट करते हैं और एंटी डंपिंग डयूटी लगाते हैं, लेकिन आपने अपने बजट में ऐसी कोई बात नहीं कही है। आपने इशारा किया है, लेकिन आपने यह नहीं कहा है कि हम एंटी-डंपिंग डयूटी लगाएंगे। जब तक आप ऐसा नहीं करेंगे तब तक देश के उद्योग प्रभावित होंगे। आई.डी.बी.आई. और बैंकों से उद्योगों ने लोन लिए हुए हैं, लेकिन वे वापस नहीं कर पा रहे हैं जिसके कारण आप कहीं ५० प्रतिशत और कहीं ६० प्रतिशत में सौदा कर रहे हैं। इसलिए मेरा कहना है कि आप जिस स्वदेशी की बात करते थे, जो स्वदेशी का नारा देते थे, वह अब कहां गया? कया आपका अब विदेशी नारा हो गया। आप अपने उसी स्वदेशी के नारे को लगाइए और स्वदेशी कंपनियों को जो हानि हो रही है, वे बंद हो रही हैं, उससे उन्हें रोकिए और उन्हें बंद नहीं होने दीजिए। हमारे देश में जो कृषक, ग्रामीण लोग हैं, जो खेतीहर मजदूर हैं, कारखानों में काम करने वाले लोग हैं, मजदूर हैं, उनकी हालत में सुधार लाना चाहिए और वह तभी आएगा जब देश के उद्योग और कृषि ठीक होगी।

  अध्यक्ष महोदय, माननीय वित्त मंत्री जी, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि किसान के लिए सबसे ज्यादा जरूरी चीज है सिंचाई, पीने का पानी और कैनाल, लेकिन आपने एस.वाई.एल. कैनाल के लिए कोई प्रावधान नहीं किया है। यह कैनाल पंजाब और हरियाणा की जीवन रेखा है। इसे आप कब बनाएंगे, कितना पैसा रखेंगे। कैनाल जैसा मसला, जिसके लिए बजट में पैसा न रखा जाए, यह बात ठीक नहीं है। इसके बाद सबसे जरूरी चीज इन्फ्रास्ट्रकचर है जिसमें बिजली, पानी, पीने का पानी और सड़कें आती हैं। अगर ये सब चीजें ठीक नहीं होंगी, तो देश आगे नहीं बढ़ सकता है। देश का इन्फ्रास्ट्रकचर बहुत बढ़िया होना चाहिए। उसके लिए भी आपने इस बजट में कोई खास प्रावधान नहीं किया है। देश के अंदर जो नेशनल हाइवे हैं उनकी कया हालत है, यह बात आपसे छिपी नहीं है। राष्ट्रीय हाइवे नं.१ जो पाकिस्तान के बार्डर तक जाता है। इसको चार लेन का बनाना बहुत जरूरी था, लेकिन आपने उसका इसमें कोई जक़ि नहीं किया है। इसी प्रकार से नैशनल हाइवे नं. १० है जो हिसार और सिरसा से होता हुआ पाकिस्तान के बार्डर तक जाता है, उसको चार लेन का बनाने के लिए आपने कोई प्रावधान नहीं किया है। इसी तरह से बहुत सी डिफेंस रोड ऐसी हैं जिनकी बहुत खराब हालत है। हिसार में जहां मैं रहता हूं वहां भी एक डिफेंस रोड है। अगर आपको उस पर पांच किलोमीटर भी जाना पड़े तो आधा घंटा लग जाता है। मैं समझता हूं कि डिफेंस रोड की ऐसी बुरी हालत आपको कहीं भी देखने को नहीं मिलेगी। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि इसको ठीक करना चाहिए। अध्यक्ष महोदय, मैं माननीय वित्त मंत्री को दो-तीन सुझाव देना चाहता हूं। आपने हरियाणा के बारे में ज्यादती की है। रेलवे के मामले में आपने हरियाणा में एक भी नई रेल गाड़ी चलाने या नई रेल लाइन बिछाने का कोई प्रावधान बजट में नहीं किया है। बहुत रेल लाइनों का सर्वे हो चुका है। लेकिन उनके लिए कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। मिसाल के तौर पर मेवात का इलाका है। वहां बहुत गुरवत है। वहां कोई रेल लाइन नहीं है। फिरोजपुर जिले में फिरोजपुर झिरका से लेकर गुड़गांव जिले तक, आगे तक, पलवल तक कोई रेल नहीं है। मैं चाहूंगा कि इस ओर ध्यान दिया जाए। मैं यह कहना चाहता हूं कि पिछले दो साल में जितने रेलवे में विस्फोट और एकसीडेंट हुए हैं, आप रिकार्ड निकलवाकर देख लें, इतने विस्फोट और एकसीडेंट पिछले २० वर्ष में भी नहीं हुए। इनमें कितनी महत्वपूर्ण जानें गई हैं उस ओर ध्यान दिया जाए। सिन्हा साहब हरियाणा में रेलवे के लिए खास पैसा रखिए। बजट में प्रावधान करिए। हरबाड़ तक रेल जानी चाहिए, उसका सर्वे हो चुका है, लेकिन इसमें कोई प्रावधान नहीं किया गया है। आदमपुर से फतेहाबाद और दुहाड़ा होते हुए जाखड़ तक रेल जाने की बात है। सर्वे हो चुका है। पैसा नहीं रखा गया है। हम आपकी ज्यादा बुराई नहीं करना चाहते हैं, बल्िक हम चाहते हैं कि यह सरकार चले। आपको काम करने का मौका मिलना चाहिए। आपने लोगों से जो वायदे किए हैं उनको पूरा भी करना चाहिए। देश के किसान, मजदूर और उद्योगों की ओर पूरा ध्यान देना चाहिए ताकि देश का जो उद्योग मर रहा है वह वापस ठीक हो सके और देश के किसानों का हाल ठीक हो सके। इतनी ही बात कहकर मैं अपना भाषण समाप्त करता हूं।

“>SHRI P. CHIDAMBARAM (SIVAGANGA): Mr. Speaker, as I rise to speak on the general discussion on the Budget, I am conscious that I am the immediate predecessor of the hon. Finance Minister and, therefore, in a sense I am the target of paragraph six of Part A of his speech. But I want to assure this House that we on this side wish to be helpful. We sincerely believe, I believe with a great degree of passion, that this country need not remain poor. In the last 50 years, we have lost several opportunities, but this is not the time to apportion blame. Poverty of any nation is not given and no nation need remain poor at this point of time in man’s history. Three hundred years ago, the United States was poor, poorer than India was. Two hundred years ago, Europe was poor. Even 40 years ago, many South-East Asian countries, which appear that they are going through some difficulty today but who are not poorer than India today, were poorer than India. Nations smaller than India, nations poorer than India have overtaken India.

As someone in the BJP benches pointed out, we do not lack resources. We do not lack the instruments to fight poverty and pull ourselves up to the front rank of world’s nations. What we lack, I believe, is an understanding of the forces that shape a nation’s economy and a willingness to change as the world changes. So, I want to assure the hon. Finance Minister that I want to be helpful, the Opposition wishes to be helpful, and we hope that he will respond in such a manner that we can help him achieve the goals he has set for himself in the opening para of Part A of his speech.

Sir, thousands of words have been written and spoken and I plead guilty that I have contributed to the spoken words and the written words since the Budget was presented. The general impression is that the Press has been extremely harsh on the Finance Minister. But I want him to take comfort. It is much better to receive criticism now and praise later rather than high praise now and criticism later. But this criticism is not misdirected.

While I will have many things to say, if time permits or at the time of the discussion on the Finance Bill, today I wish to focus on the philosophy behind this Budget and whether the Finance Minister will be able to achieve the goals that he has set for himself. First, let me quickly run through the aspects of the Budget which I welcome and for which I congratulate the hon. Finance Minister. I have already said so through the Press. I welcome the initiative that he has taken on housing. I welcome the bold statement on public sector reform. I welcome the continuance of Rural Infrastructure Development Fund which was started by Dr. Manmohan Singh. I welcome the initiatives taken by me and my Government, the Accelerated Irrigation Benefit Programme, the Swarna Jayanti Housing Scheme, the Kasturba Gandhi Shiksha Yojana, the Basic Minimum Services, the Experimental Crop Insurance Scheme and the Accelerated Rural Water Supply Programme. I welcome the Finance Minister’s maintaining the direct taxes rate. I welcome the expansion of MRP in excise. I welcome the extension of the service tax net.

In a sense, I seem to have indirectly contributed several paragraphs of his Budget speech. All these clearly are a testimony to the fact that reforms have come to say and notwithstanding what some hon. Members may speak, there is no way any Finance Minister of any Government in the future, including the present Finance Minister, can reverse these. This is why, many people still believe that reforms are irreversible, reforms are deeply entrenched in this country reforms have their constituency, both within the country and abroad, and reforms have a great deal of intellectual support. I, therefore, would humbly appeal to the Treasury Benches not to speak of reforming the reforms, not to speak of a Jurassic age which does not exist, not to speak about a throw-back to a romantic idea of India which does not exist in this country and it will not exist even in the next Century. These things have come to stay. This is the direction in which we should go and I am happy that the Finance Minister, after paying formal obeisance to

Swadeshi, has continued many of the reforms that we started in 1991 and thank God for that.

I also congratulate him for the Watershed Development Programme and for raising the allocation from Rs.517 crore to Rs.677 crore. I congratulate him for raising the allocation on education from Rs.4,716 crore to Rs.7,047 crore.

I have said all these things in order to prepare the Finance Minister for the criticism that will follow. I criticise him, not because I want to criticise him. I criticise him because I believe that the Budget has misdirected itself. I believe that the Budget rests on a very wrong philosophy and I believe that, however well meaning he may be, he will not achieve the targets that he has set for himself, particularly the target of price stability, the target of raising domestic savings and the target of macro-economic stability and target of faster growth. I will explain myself presently and as briefly as possible.

Before that, I want to recall what the Finance Minister told Reuters immediately after he attended the first meeting of the Board of Governors of the Reserve Bank to which he is invited customarily.

I also recall what he said at Washington while addressing the Press Conference after his visit to the World Bank and IMF meeting. I believe that is what the Finance Minister really believes and not what he has said in Paragraph 6 here. Paragraph 6 paints a gloomy picture. But that is not the true picture. For the first time, we have had for three years of single digit inflation which was under five per cent in March, 1998. Reserves touched an all time high of about 27 billion dollars. The economy grew at 7.5 per cent in the first year of the UF Government. It slipped to what is now reported as five per cent. But it will improve after the improvement in the industrial growth rate. Paragraph 6 refers to an industrial growth rate of 4.2. But only day before yesterday, the Government put out that the industrial growth rate is 6.6. Therefore, the year will end with the GDP growth closer to six per cent rather than five per cent. What does that mean? It means that in the two years of the UF Government we have delivered an average growth of about 6.75 per cent. If you take the last two years of the Congress Government and two years of the UF Government, the last four years’ growth average is close to seven per cent. Therefore, the Finance Minister has the task of maintaining growth at seven per cent. What did he tell the Reuters and what did he tell to Washington correspondents? He said and I quote:

“The macro economic fundamentals of this country are strong. Inflation is under control. We have had a set back to industrial growth last year but all other indicators point to a strong economy.”

If any further testimony is required I would urge the Treasury Benches to read the `Status Report – India’s External Debt’ put out in May, 1998 after my dear friend, Shri Sinha took over. What does it show? The total debt has come down to 92.8 billion US dollars. The Short Term Debt one of the lowest for all countries is at 6.3 per cent. The Debt Service Ratio has come down to an all time low at 22.6 per cent. It was 35.3 per cent in the year of crisis. Debt-GDP ratio again in at all time low at 25.9 per cent. It was 41 per cent when Dr. Manmohan Singh took over. Interest as a proportion of current receipts is 8.1 per cent which was 15.5 per cent in the year of crisis when the Congress Government took over and ushered in reforms. So, let us not paint a gloomy picture of India’s economy. India’s economy is fundamentally strong.

But there are serious structural defects. There remain serious structural weaknesses. There are some areas which are weak, for example, exports. Another area which is weak is industry. It is not recession. Recession means negative growth in two successive quarters. Nobody can say that even six per cent GDP growth is recession. Nobody will say that 6.6 per cent industrial growth is recession. It is inadequate growth, decline in export growth and therefore there are serious structural defects. The question is, how does the Finance Minister address these concerns?

Sir, he believes – let him correct me if I am wrong – that spending is the key to stimulate growth. Dr. Manmohan Singh, for whom I have a great respect, and I believe that investment is the key to growth and not spending. This is the line which divides this House. This House finds itself divided on many issues. What the commentators have said in the last two weeks is that the change in the paradigm is that the Congress Government and the UF Government believed that investment is the stimulus to growth and the B.J.P. — rightly or wrongly, wittingly or unwittingly — believes that spending is the key to growth. I want the Finance Minister to please seriously consider whether he is right and if he is right, explain to us how he is right and convince us that what we did in the last seven years is wrong and what he intends to do this year is right. Then I will explain.

What is the key to the Budget? The key to the Budget is Plan outlay. Naturally, he is proud. I remember, Shri C. Subramaniam, as the Finance Minister of Tamil Nadu, proudly stood up and said: “I am the first Finance Minister of Tamil Nadu to present a hundred crore Budget.” This is way back in 1961. Shri Sinha is the first Finance Minister to present to this country a Central Plan outlay of Rs. 1,05,187 crore. He has crossed the Rs.1,00,000 crore mark. It is like Sachin Tendulkar scoring a century.

But let us now examine this figure more closely. Rs. 1,05,187 crore is the Central Plan outlay. How does he propose to finance it? Rs. 42,464 crore is the budgetary support and Rs. 62,723 crore is what is popularly called IEBR (Internal and Extra Budgetary Resources). Now, as a proportion of total Central Plan outlay, the budgetary support is 40.37 per cent. Last year, it was 41.5 per cent.

The Budget is, therefore, contributing a smaller percentage to the total outlay. Nothing unusual about it. Even the Ninth Plan Document talks about a budgetary support of about 40 per cent. I am not finding fault with 40 per cent. But what I want the hon. Members to understand is that this so-called expenditure of Rs. 1,05,187 crore is not coming out of the Budget. Rs. 42,464 crore will be the real money. The remaining Rs. 62,723 crore will be real money if the Ministries and Departments perform. Otherwise, it will be a big question mark at the end of the year. Why do I say that it will be a big question mark? Take, Sir, last year, the year before, the year of the Congress Government, three years before that and five years before that. But let me talk about last year. Last year, we started with an IEBR of Rs. 55,709 crore. Ministries and Departments of the Government of India were able to achieve only an IEBR of Rs. 47,404 crore — a straight decline of Rs. 8,300 crore. They were not able to raise this money. If they do not raise this money, they are not able to spend the money. This is what is called shortfall in the Plan. What is shortfall in the Plan? Shortfall in the Plan is not because the Finance Minister does not give money. He will give his share, but that is only 40 per cent. The remainder will have to be raised by the Ministries and Departments.

Now, I ask the hon. Finance Minister to please convince the House, how does he hope that the Ministries and Departments of the Government of India in the remaining period of this financial year will be able to raise last year’s level of Rs. 47,400 crore to Rs. 62,723 crore? How does he hope to have an increase of 33 per cent in one year? By the time this Budget is passed, by the time the Finance Bill is passed, and by the time the allocations are made, the month of August would have come. How does he hope to have the Ministries and Departments to raise this phenomenal amount of Rs. 62,723 crore?

The answer is obvious to anyone who has sat in North Block even for a shortwhile. This is not possible. He will not have a Plan outlay of Rs.1,05,187 crore. The Plan outlay will fall far short and as the Plan outlay falls far short, he will not be able to stimulate growth to spend. This is the whole philosophy. Dr. Manmohan Singh used to say that you cannot spend your way to prosperity. You cannot spend your way to fine growth. In fact, spending will bring about inflation. It will not bring about growth. I will come to inflation in a moment. The alternative route is to spur investment. Where did I fail last year? I failed last year because I could not assure political stability. Investment is a function of confidence, of stability. I could not provide stability. Thirty days after the Budget was presented, the Government fell. Seven months thereafter, that Government also fell. Shri Yashwant Sinha is the Finance Minister of a Government which is a coalition of parties about which they say “We are a stable Government, led by an able Prime Minister.” I accept those statements. Why should I criticise them? I accept that you are a far more stable Government than what I was last year. I accept that you have an able Prime Minister. But where you have an able Prime Minister and a stable Government, you should put your faith in investment, not in expenditure. What have you done about investment? What have you done to promote investment, both domestic and foreign? My criticism of this Budget is, it does nothing. It does not reassure the foreign investor. As my friend Shri Murasoli Maran pointed out, in the last 15 days all that we have seen is negative signals coming from the foreign investor. You may yet come to the conclusion that you do not need foreign investment. You may say “I do not need foreign institutional investment. I do not need foreign direct investment. I do not need external grants, external assistance, multilateral aid and concessional aid. You can say that. But you would not say that. You cannot say that because once you say that, a bulk of your investment dries up. You have said nothing to reassure the foreign investor. You have done nothing to inspire confidence of the foreign investor. If Shri Yashwant Sinha will still consider what he can do between now and the reply, I believe he should take dramatic steps to open up the economy and dramatic signals must be sent to inspire confidence in the foreign direct investor and the foreign institutional investor. What have you done for the domestic investor? What does the domestic investor want? The domestic investor wants political stability. Let me assume for the sake of argument that there is political stability. Let me assume so although deadlines are set for various things. Let me assume that there is political stability. But with political stability, what you should have done? With political stability, you should have created conditions where people will invest in the hope that additional capacity was created, producing goods and services which would be consumed by the people. That requires price stability, tax stability, leaving more money in the pockets of consumers. All that this Budget has done is exactly the contrary. Why does newspaper after newspaper, magazine after magazine — I do not own any of them and none of them was a particular friend of my Government — why do they call this Budget inflationary? Shri Yashwant Sinha knows it as well as I do even better, in fact. He has been both an administrator and a Minister. What has he done? First, he has raised the levels of protection. According to the “Economic Survey”, the collection rate is already 31 per cent of the Customs duty. It is a simple arithmetic. Everybody can understand it. Suppose goods were imported at Rs.100, tax was Rs.20/-. What is the protection? It is Rs.20/-. In the meanwhile, the rupee depreciates. It depreciated 11 per cent from 35.37 to 39.40. It has since depreciated another 6 per cent or 7 per cent. If a hundred rupee import is already depreciated, say 10 per cent, it has already become 110. On that if you impose a tax of 20 per cent, the effective protection is no longer Rs.20/-. The effective protection is 20 + 10 + 20 per cent of 10. The effective protection has already become Rs.32/-. To that Shri Yashwant Sinha has added another 8 per cent which is really not 8 per cent. anybody can shown you the calculation which is 14 per cent because it is post-Customs duty. With one stroke of the pen, you have raised the level of protection to something like 40 or maybe 45 per cent. Is that the degree of protection under which an industry can become efficient? Is that not a tax on exporters? If you create such a profitable domestic economy, who will export? Why should anyone export? Every Customs duty is a tax on exports. That is an axiom of economics. Everybody understands that. You have created now a huge tariff wall behind which industry will continue to remain inefficient. If there is tax on exporters, there will be no export at all. Added to that savage taxation. I deliberately use the word ‘savage’. In recent years, there has been no Budget and I want the BJP Members to please understand. In recent years, there has been be no Budget which mobilises Rs.9,000 crore worth of additional taxation.

This is savage taxation. We are going back to the bad old days of savage taxation. Rupees three thousand and odd crore of excise; Rs.3304 crore of customs; Rs.5009 crore of excise duty; Rs.220 crore of service tax; postal rates hike by Rs.270 crore and railway passenger tariff bringing in Rs.450 crore all this is savage taxation. This will leave little money in the hands of the consumers. All this will add to inflation. All this is inflationary. This is textbook economics. It does not require political argument. The higher taxes, higher customs duties, higher excise duties, higher postal rates and higher railway rates will all lead to inflation. Magazine after magazine, author after author, writer after writer have said that inflation will touch the double-digit.

 

Here is a seminar hosted by the Business World. The Finance Secretary attended it. He participated in it. Everybody has given his benchmark on inflation. In fact, I find that I have been the most conservative. I have been the one most on your side. I did not go to this seminar. But, in my view, I have said inflation will touch eight per cent. Everybody believes that inflation will be over eight per cent. In fact, if inflation touches ten per cent, you are doing a great disservice to what we have been doing in this country for the last three years. We not only controlled inflation but we broke the back of inflationary expectation. Inflation in this country has been fed by inflationary expectations. What Dr. Manmohan Singh started in the fifth year of his Government was to break inflationary expectations. We continued it with the U.F. Government. Inflationary expectations were broken in this country. But what this Budget has done unfortunately is to revive inflationary expectations. If inflation touches ten per cent, my dear Finance Minister, you will have a howl of protest. Your friends who are praising you today will be the first to ask for your scalp.

Your friends were saying that this is a growth-oriented Budget. I say this growth is totally illusive. What is the use of six or seven per cent growth with ten per cent inflation? What I believe this Budget does is the temptation to which every Finance Minister is exposed by his officers. You allow inflation to grow a bit today. Why? Inflation is very good for the Government. Who does inflation benefit? Please consider this point. Inflation is a cruel tax, inflation is a harsh tax. It taxes the rich and the poor alike. The rich man with rupees ten lakhs, if it is an inflation of ten per cent, is taxed at ten per cent. The poor man with a fixed income of Rs.1000, if the inflation is ten per cent, is also taxed at ten per cent. Who benefits? Inflation benefits the borrower because his debt gets reduced. Who is the biggest borrower in this country? It is the Central Government. Inflation benefits the tax collector. The Revenue Department can always come and say: “I have reached my revenue target.” It is because inflation will take you to revenue target. Inflation is also very good for the planner because his plan targets can be met. Inflation will take you to your plan targets. Since the Government is the biggest planner, since the Government is the biggest borrower and since the Government is the biggest tax collector, every Finance Minister is exposed to this temptation and thinks: “Let us allow inflation to rise a couple of points. What does it matter as long as we achieve our targets?”

I would urge my dear friend Shri Yashwant Sinha that your first target must be inflation. If you sincerely believe in what you said – I think you believe in what you said – ensure macro-economic stability and control over inflation. You must assure this House when you reply that you will target inflation, you will keep inflation under control and you will not yield to the temptation, the tempting alternative to buy a bit of growth by allowing the inflation to go up. The duty every Finance Minister owes to the people of this country, the duty every Government owes to the people of this country especially in a country where 40 per cent are poor is to keep inflation under control, is to keep price stability.

I would, therefore, respectfully urge you to moderate your taxes. I will give you a way out. The CII was the one which asked you for this Special Additional Duty, the SAD duty. The CII has turned turtle now. The CII has issued a statement asking you to roll it back to four per cent. Those who praise you to the skies, those who give you these tempting alternatives today

will be the first to pull you down from the pedestal.

The CII was so vocal when it said, “we must have a tax.” Now they have turned turtle yesterday because sector after sector represented and said, “we cannot bear this tax.” When I imposed two per cent duty in 1996, the target date fixed was 31st March, 1999. When I added three per cent after the Pay Commission in November 1997, I set the same target date of March 1999. I would urge you, my dear friend, to please stand up when you reply and say, “two per cent and three per cent will surely go on 31st March, 1999”. I would urge you to roll back the eight per cent that you have levied to at least four per cent and also declare that that also will go on 31st March, 1999. If you allow the additional duties that were imposed to go away on 31st March, 1999, even if you make the statement when you reply to this debate, you will send a powerful signal that industry has to become efficient, that industry has to become competitive and you are targetting inflation. I would also urge you – I am trying to help you – to roll back on many of these excise duties. These excise duties are completely counterproductive. I believe that for every rupee that is collected by way of excise, at least excise of one rupee is evaded. Tighten your enforcement machinery. We gave money to the excise officers last year. We created circles. We gave them extra money; we gave them money for office, for transport and for stationery. You go by that route and tell them that they will have to achieve their targets. What is it that you have done? We looked at the whole chapter and said that the whole chapter must have a single rate.

As my friend Shri Maran pointed out, you are looking at tariff line. Please do not do that. Look at the whole chapter. Within a chapter, do not have different rates. Look at the things that you have done. Shri Maran read a few. I want to read a few more. What happens when you impose a tax on tyres and tubes used on animal-drawn vehicles and handcarts etc? They will not use tyres. They will run their handcarts on the tar road, on the metal road and break the road. The idea is that they must use tyres and not run the old handcart. Now you are imposing a tax on tyres. The handcart man will simply discard tyres; the bullockcart will run as a bullockcart, the bullcart will run as a bullcart and the road will break up.

  श्री चन्द्रशेखर साहू : बैलगाड़ी में पुराने टायर लगते हैं।

SHRI P. CHIDAMBARAM (SIVAGANGA): Now look at the next one. Excise on grey cotton fabrics captively consumed by multi-locational composite mills is 0 to 5 per cent; excise on grey fabrics is 0 to 12 per cent. We went through this exercise in a great deal and said, “multi-locational mills should have the freedom to move their goods from one unit to another at zero duty.” Why have you imposed this five per cent and 12 per cent duty? Look at what you have done. Excise on milking machinery is 0 to 8 per cent; on dairy machinery it is 0 to 8 per cent; and on sewing machines it is 0 to 8 per cent. Why are women Members not protesting? Why are you doing these things?

Further come to tractors of 1600 cc capacity. I know who persuaded you to do that. It is the very charming, young lady in Chennai who runs the TAFE. She would come and plead with you and say, “you make it eight per cent, I will not raise the prices.” She tried to charm me also. I said: “I know you will raise prices”. Take it from me, my dear Finance Minister, prices of these tractors will go up now. They will tell you that there is over-flow of MODVAT, we will absorb this. They will tell you that. But it will be raised now, tractor prices will be raised.

SHRI MURLI DEORA : Who is that charming lady?

SHRI P. CHIDAMBARAM : Then excise on medical equipment is 0-8 per cent. On spectacle lenses it is 0-8 per cent. Why? Why should these lenses suffer a duty? These are goods of mass consumption. Please roll back many of these excises. This is not the way to raise revenues. This only creates distortion. This only creates protected lobbies. Please do not raise these taxes. Roll back these taxes. Tighten up enforcement. I am glad you believe in the laffer cruve. I have made some back of the envelope calculation. You expect corporation taxes to rise by 24 per cent, so do I. I share your belief. You expect income tax to rise by 12 per cent, so do I. You expect customs and excise to rise by 20 per cent because of your new levies. I do not believe that. I do not believe that that will happen. In fact, there will be consumer resistance to these products. If they have high excise, there will be great degree of evasion. I would urge you to moderate your taxes. I would urge you to roll back many of your taxes; tighten enforcement and get your revenues. I would urge you to target taxes and revenues. I would urge you to target expenditure control. I think, the whole philosophy that you can spend your way to growth, spend your way to prosperity is wrong. You must stimulate investment. `Spending’ by definition is not necessarily good. There is nothing which says, “planned spending is good, non-plan spending is bad.” I am glad that you are abolishing that distinction.

Spending is good only if it yields a return. What is the use of spending when it gives you a return of two to three per cent? That is inefficient spending. Therefore, spending is not going to take you to your target. Spending is not going to help you achieve your targets. I would urge you to concentrate on investments, concentrate on inflation control, concentrate on revenue realisation. Sir, having said this, I have a few quick points to make in a telegraphic language. I will wind up in two to three minutes.

You have not factored the cost of sanctions and I say so with a sense of responsibility. The last two meetings of the World Bank that were held for consideration of the Agenda were adjourned not because there were `no’ votes but they were adjourned because there were not enough `yes’ votes. You know what I mean. A large number of Member countries who did not want to vote `no’ also did not want to vote `yes’. They wanted to stay away. That is why the two meetings of the World Bank Board were adjourned to a date not yet determined. On the same day, IFC which finances private sector projects also adjourned its Board meeting to a date not yet determined. It may not affect the Central Government immediately but it will surely affect the State Governments. There are three projects of Tamil Nadu crucially dependent upon the World Bank approval.

There are projects in Orissa. There are projects in Bengal. There are projects in Maharashtra. Take, for example, the most important project, the project which I take pride in the one you referred to in your Budget Speech i.e., `Community-based Rural Water Supply Programme’ which is being implemented in Uttar Pradesh. Rajasthan wanted one. Punjab wanted one. Sitting in the Finance Minister’s chair, I promised that `yes, you send me the proposal. I will send it to the World Bank. “Now None of them will take off.’ The World Bank aid has reached a level of three billion dollars from July to June. ADB reached a level of 850 million dollars which is expected to reach a billion dollars. President Sato of the ADB has said, `no more loans will be considered’. It will not affect you in 1998-99 but it will surely affect you in 1999-2000 and in 2000-2001. There will be no disbursal and since I want you to remain in office in 1999-2000 and 2000-2001, you will have to answer that 1999-2000 and 2000-2001. Why is it that disbursal is not taking place. So, please do not imagine that there are no cost of sanctions. The sanctions have already begun to hurt.

Point number two. Exim Bank Guaranties are being suspended, which means private sector projects will not reach financial closure. What happens to Enron II? What happens to Cogentrix? What happens to the petroleum exploration projects? What happens to the Telecom project? None of them will reach financial closure. We may be able to tide over in the next two-three months but when they begin to bite, who will answer the people of this country? So, I urge you to please consider it. This is not political rhetoric. Please consider, what is the cost of sanctions and how do you factor the cost of sanctions?

Another quick point about the IDFC. I am glad that you have taken the initiative forward. IDFC’s headquarters is at Chennai. Mumbai already has the headquarters of IDBI and ICICI. Delhi has the headquarters of IFCI. We gave the headquarters of IIBI to Calcutta. They are doing very well. You see their last balance-sheet. Dr. Goswamy is very proud of what he has achieved. We deliberately gave IDFC to Chennai and they promised that they will really function out of Chennai. What I hear is, all their Board meetings are being held in Mumbai. Please correct this. This is a slap on the face of the previous Government. This is a slap on the face of the people of Tamil Nadu. IDFC has been given to Chennai as headquarters. They must function out of Chennai. They must hold their Board meetings in Chennai. They cannot convert Chennai into an outpost and have a real functioning in Mumbai… (Interruptions)… He will answer that.

Point number three. Securitisation of SEB debts. I do not know who conned you to believe that this conclusion that good. This is bad. You are giving comfort to the State Electricity Boards which are notorious in not being able to pay their debts. If you securitise it, what does it mean? It eventually means that you will have to eventually pay the debts. The guarantee is yours and if they do not pay the debts, you will have to pay it. They will raise money. You are securitising it so that they can leverage it. But if the debts are not paid, eventually, who will pay? In the same category falls this idea, Asset Reconstruction Company. I know, the Narasimhan Committee recommended it in its first Report. It did so in the second Report. But both Dr. Manmohan Singh and I believed that creating an Asset Reconstruction Company will only encouraging poor performing banks to increase their NPAs.

Because there is an Asset Reconstruction Company which will take it over. I would urge you to please re-examine the securitisation of SEB debt and the Asset Reconstruction Company.

Finally, I want to point out that you have not done enough for Science and Technology and that is unfair. I have done very detailed calculations. There are six Departments of Government of India dealing with R&D in science; Department of Atomic Energy, Ocean Development, Science and Technology, Bio-technology, Scientific and Industrial Research and Space. The rest are all small ones. In BE last year we promised Rs.2093 crore, we ended up spending Rs.1920 crore. In BE this year you are promising Rs.2610 crore. It looks like an impressive jump. But where is the jump? This is only Rs.133 crore in Atomic Energy and in Space Rs.531 crore. Out of Rs.694 crore increase, Rs.662 crore are accounted by two Departments, Space and Atomic Energy. But what about Ocean Development? What about the basic Science and Technology? What about Bio-technology, the key to agricultural revolution? What about Scientific and Industrial Research? You have kept the allocation at Rs.88, Rs.107 crore and Rs.230 crore. This is not enough for Science and Technology. I would urge you to please consider it. You must give greater allocation to the Department of Ocean Development, to the Department of Science and Technology, to the Department of Bio-technology and to the Department of Scientific and Industrial Research. The bulk of our scientists are working in these Departments. They deserve greater support.

Lastly I want to point out about village and small industries. Again all of you believe that something remarkable has been done for village and small industries. I am afraid, you are not looking into the documents. Demand No.55 and Demand No.82 concern village and small industries. Last year we started with a BE of Rs.657 crore and Rs.220 crore. That is a total of Rs.877 crore. We ended the year with Rs.659 crore and Rs.210 crore. That is a total of Rs.869 crore. As against Rs.869 crore in RE last year, on the Demand No.55 and the Demand No.82 you have provided only Rs.877 crore. Where is the money for village and small industries? What is the point of devoting chapters in this speech to promoting small industries? When it comes to the real money, you have allocated only Rs.877 crore as against last year’s RE of Rs.869 crore.

Within the village and small industries I want you to consider the plight of handlooms. I know there are my friends who will speak up for NTC mills and I do not blame them. But who will speak up for handlooms? There are 28 lakh families, Mr. Finance Minister, who are dependent on handlooms, many in your State. People commit suicide. Not only farmers, handloom weavers also committed suicide five years ago. There are 28 lakh families dependent on looms. Assume three people work on a loom. What does it make? It makes 84 lakh people. NTC mills have a lakh and a half people. They are also our brothers and sisters. They need our help. But 84 lakh people are engaged in handlooms. What does the Government of India – and I include myself, my Government and the previous Congress Government – do for handlooms? For handlooms Plan and Non-Plan allocation last year, BE was Rs.203 crore and RE was Rs.174 crore. This year it is Rs.151 crore. Is this the way you want to treat handlooms? This has nothing to do with Swadeshi or Videshi. 84 lakh people are working in these handlooms. I have always told the Minister of Textiles to please increase the allocation to handlooms. This is the third largest industry in the country after farming and after the organised textile industry.

Please consider these things. Put your money where your mouth is. If you have devoted passages in the speech to promoting village and small industries and the handloom industry, this is where the money should go. I am not saying that the NTC mills should not be given relief. They are asking for a Rs.2,500 crore plant. Give it to them, by all means, if you have the money. But out of Rs.2,500 crore should you not give at least half of it to the handloom industry where 84 lakh people are involved? I would urge you to look at that.

Finally, I am grateful to you, Mr. Speaker, Sir, as you have been extremely kind to me. I have already taken a lot of time. I would urge the hon. Minister of Finance to reconsider the various aspects: target inflation, target revenues and roll back these protectionist tariffs to more moderate levels. If there are selected industries which require protection, that is a different matter. But across the board, please roll them back. The CII has shown you a way – allow them to have a sunset clause, say, 31st March, 1999. Say and do a few things to promote foreign investment and domestic investment; create a climate of confidence. Then, you will achieve growth.

I see your figures. Take the fiscal deficit as a proportion of the GDP. You are planning a nominal growth of about 14 per cent to 14.8 per cent. If inflation is 8 per cent, your growth will not exceed six per cent. If inflation is ten per cent, growth will fall down to below five per cent. You are not planning a normal growth of more than 14.8 per cent. The key, therefore, is inflation control and I think a reasonable growth of about seven per cent.

Finally, I want to state a word about the rupee. I do not want to say anything which will create more difficulties for you. I have been very careful both in office and out of office. I share your statement that all that the Government can ensure is an orderly and a stable market in which the law of supply and demand will determine the value of the rupee. That is good. There is no difficulty about that and if you have stated it, you should state it again.

There was already an eleven per cent depreciation at the time you took over. In terms of real effective exchange rate, there was really no erosion of value. I sincerely hope that one of your colleagues who wanted an exchange rate of Rs.17 to a dollar has changed her views. I hope she has changed her views. Well, that day will not come. That is again a Jurassic age. But the 11 per cent depreciation was equal to the decline based on real effective exchange rate. You do not have to tell us what you are doing. What Dr. Bimal Jalan and you are doing is a matter between the Minister of Finance and the Governor of the Reserve Bank of India. But if you are targeting the real effective exchange rate, you should send a clear signal. The Governor of the Reserve Bank of India and the Minister of Finance must send a clear signal that we are targeting the real effective exchange rate and we will not allow the rupee to be either over-valued or under-valued.

There is a feeling today in the country even among knowledgeable persons that you are allowing the rupee to be under-valued. The criticism last year was that the rupee was over-valued. The feeling is that you are allowing the rupee to be under-valued. But you know the consequences of a depreciating rupee. It will lead to higher exchange rates. A depreciating rupee will lead to a balance of payments crisis. I do not think that this country deserves another balance of payments crisis. We have come out of that crisis. We are a much stronger economy today than what we were in 1991. We are growing at about six and a half per cent a year. We have the potential to grow at over eight per cent a year. But we should not fall into another financial crisis. I would urge you, therefore, to consider making whatever statement is appropriate. But please make a statement which will send a clear signal to the market that you will not allow the rupee to be either over-valued or under-valued, that you will ensure that there is an orderly and a stable exchange market in which the law of supply and demand will work.

Mr. Speaker, Sir, I thank you very much. I sincerely wish that the hon. Minister of Finance succeeds in some of the goals that he has set himself. For that he has to take a number of steps. I am not saying that he can do that between today and tomorrow when he is to reply. But at least when he comes back to us in July he would have had three weeks of reflection. Come back to us in July and please tell us whether you accept some of our suggestions. If you accept some of our suggestions, you are willing to revise your philosophy, you are able to convince your colleagues that a revised philosophy based on investment is much better than spending, I think, there is a fair chance that you will succeed. Otherwise, I am afraid, you will fail and the country will criticise you for missing another great opportunity to take this country on to another plane of growth.

Thank you very much.

MR. SPEAKER: Thank you for the nice speech.

“> श्री भगवान शंकर रावत (आगरा) : मान्यवर, अभी मेरे मित्र चिदम्बरम साहब ने बड़े भावनात्मक ढंग से सारी चीजों को रखने की कोशिश की है। उन्होंने एक ऐसी तस्वीर पेश करने की कोशिश की, जिससे भय और आतंक का ही वातावरण पैदा हो। मैं उनकी नीयत पर शक नहीं कर रहा हूं, लेकिन जहां वे बैठे हैं और उनके कन्धों पर जो दबाव और प्रभाव हैं, उसके आधार पर मुझे लगता है कि पोखरन ब्लास्ट और उसके बाद जो विदेशी शकितयां भारत को काउडाउन कर रही हैं या करना चाहती हैं, आर्िथक दृष्िट से जलील करना चाहती हूं, संकट में डालना चाहती हैं, उनके द्वारा दिखाए भूत, उनके द्वारा बताई गईं शंकाओं के षडयन्त्र के वे शिकार हो रहे हैं। मैं मंत्री जी को दिल से बधाई देना चाहता हूं और वित्त मंत्री जी का अभिनन्दन सिर्फ मैं ही नहीं कर रहा हूं, बल्िक

18.56 hrs. (Shri Raguvansh Prasad Singh in the chair)

  सारे देश के राष्ट्रवादी राष्ट्रप्रेमी लोग, जो देश के स्वाभिमान के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो भारत की प्रतिष्ठा और अर्थ व्यवस्था के स्वाभिमान को स्थापित करना चाहते हैं, वे सभी इसके लिए अभिनन्दन कर रहे हैं कि उन्होंने स्वदेशी भारत की स्वदेशी आर्िथक नीतियों की आधारशिला रखी है।

  महोदय सन् १९९१ के बाद पहली बार स्वदेशी अर्थ व्यवस्था को अक्षुण्ण रखने की बात कही गई है। उन्होंने एक परसेंट टैकस को बढ़ाए जाने की बात कही है, शायद उन्होंने १९९१ से लेकर अब तक के आर्िथक संस्तुतियों के आंकड़े नहीं देखे हैं। विरासत में उन्हें जो अर्थ व्यवस्था मिली, जो आर्िथक परिदृश्य मिला, वह बड़ा ही कंटकाकीर्ण और उलझा हुआ था। आर्िथक स्िथति के विकास की गति धीमी हो रही थी और उससे भी ज्यादा दुखद स्िथति यह थी कि देश की कृषि और औद्योंगिक प्रगति, जो तेज थी, उसकी गति में गिरावट आ गई थी। कोई भी देश तब तक अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता है, उसकी आर्िथक स्िथति मजबूत नहीं हो सकती है, जब तक कि उसके कृषि और औद्योगिक विकास की गति में तेजी न आए। अगर बाहर से विटामिन-बी के कैप्सूल को खिलाया जाएगा, तो बाहर के विटामिन-बी के कैप्सूल से उतनी ताकत नहीं आती जितनी कि अन्न खाने से आती है। इसलिए मैं वित्त मंत्री जी को बधाई दे रहा हूं कि उन्होंने उस चुनौती को स्वीकार किया है।

  एक परिदृश्य हमें ऐसा भी मिला था, जिसमें परिकल्पना की थी कि हम इतना एकपोर्ट करेंगे लेकिन हम उस टारगेट को पूरा नहीं कर सके। भारत की एकसपोर्ट पालिसी पूरी तरह से फेल हो गई, ऐसी व्यवस्था हमें विरासत में मिली थी। राजकोषीय घाटा बढ़ रहा था। इन्फ्रास्ट्रकचर, आधारभूत ढ़ाचे को मजबूत करने के लिए हमारी कोई तैयारियां नहीं थीं, चाहे वह पावर का क्षेत्र हो, ऊर्जा का क्षेत्र हो, ट्रांसपोर्ट का क्षेत्र हो, जल-संसाधन का क्षेत्र हो या अन्य कोई क्षेत्र हो। ऐसी विषम परस्िथतियों के बीच वे अभिमन्यु बनकर नहीं अर्जुन बनकर निकले और उसका परिचय भी दिया, इसलिए मैं उनको बधाई देता हूं।

  चिदम्बरम साहब ने डॉलर की बात भी की और कहा कि एक वर्ष के बाद संकट आएगा। मैं उन्हें बताना चाहता हूं, स्वदेशी अर्थ व्यवस्था को मजबूत करने के लिए और इकोनोमिक सैंकशन्स के कारण आने वाली भावी कठिनाइयों से निपटने की दिशा इस बजट में दी हुई है।

19.00 hrs.

  अगर वह देखने का प्रयास करेंगे तो उन्हें वह मिल जाएगा। जैसा मैंने अभी कहा कि कृषि व्यवस्था और उद्योगो में प्रगति, ये दो आधारभूत ढांचे हैं जिनके आधार पर देश का आर्िथक ढांचा खड़ा होता है। अभी तक हम कृषि तथा औद्योगिक प्रगति दोनो में पिछड़े हुए थे लेकिन पहली बार इनको ताकत देने की कोशिश की गई है, जिसके माध्यम से हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

  अभी मैं बजट के आंकड़े देख रहा था। हमारे बजट का २४ प्रतिशत रुपया कर्जे का ब्जाज चुकाने में चला जाता है। मैं इस बजट में देख रहा हूं और अगली बार जब बजट पेश होगा, मैं चिदम्बरम जी को बधाई देता हूं, उन्होंने तीन साल की बात तो कह दी लेकिन अगले दो वषर्ों में जो बजट पेश होगा उसमें बहुत कुछ सुधार होगा। मैं डालर ऑफ टर्मस की बात कह रहा हूं। अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की हर कोशिश इसमें की गई है। सोशल सैकटर पर विशेष बल दिया गया है। अब तक जितनी पंचवर्षीय योजना बनी, उनके समापन के बाद एजुकेटेड और अनएजुकेटेड, दोनों तरह के नौजवानों में बेरोजगारी का प्रतिशत बढ़ा है, यह एक विडम्बना है। यह हमारे नियोजन के ऊपर तमाचा है। हम नियोजन कर रहे हैं, प्रगति की बात कहते हैं लेकिन बेरोजगारों की संख्या हर बार बढ़ रही है।

  इस बजट में अर्थव्यवस्था को मजबूत कर, बेरोजगारों की बढ़ती हुई फौज को नियंत्रित करने की कोशिश की गई है, जिसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूं। अगर देश सम्ृाद्धि भी कर ले, लेकिन अगर लोगों की क़यशकित नहीं बढ़ेगी, नौजवानों को काम नहीं मिलेगा तो फिर यह देश तरककी नहीं कर सकेगा। फिर लूट-पाट हो जाएगी । हर पेट की आग को बुझाने के लिए जब तक रोटी नहीं मिलेगी, रोजगार नहीं मिलेगा, तब तक देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक संरचना ठीक प्रकार से नहीं चल सकती। इस बजट में बेरोजगार नौजवान को कुछ आशा जगी है कि अब हमें भी कुछ काम मिलेगा, हमें सम्मान के साथ जीने का एक अवसर मिलेगा।

  महोदय, शिक्षा एक बुनियादी चीज है। मुझे मालूम है कि केरल में पढ़ाई पर बल दिया जाता है, इसलिए आज वहां फैमिली प्लानिंग की समस्या नहीं है। अगर शिक्षा को समूचे देश में बल दिया गया होता तो आज देश में ये समस्याएं न होतीं। शिक्षा के अभाव में हम जनसंख्या व्ृाद्धि को रोक नहीं सके। आज तक जब भी जनसंख्या को रोकने की बात हुई है तो कहीं धर्म, कहीं ईमान आड़े आता है तथा भी कई चीजें भी बीच में आती हैं जब कि वास्तविकता यह है कि केरल में सभी धमर्ों के लोग रहते हैं लेकिन वहां धार्िमक उन्माद नहीं है। वहां महिलाएं सब कुछ जानती हैं कयोंकि वे शक्षित हैं, उन्हें पता है कि अगर सुखी परिवार बनाना है तो जनसंख्या को नियंत्रित करना पड़ेगा। इसलिए बजट में शिक्षा पर जो बल दिया गया है, वह बहुत अच्छी बात है।

  बजट में स्वास्थ्य के लिए भी प्रावधान किया गया है। आज देश में मलेरिया दोबारा आ गया, टीबी आ गई और बहुत तेजी से बढ़ रही है। अगर ऐसे समय में स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया गया तो भारत की जवानी बर्बाद हो जाएगी। अगर एक बार किसी देश की जवानी बर्बाद हो गई तो उसके बाद उस देश की, कौम की कोई रक्षा नहीं कर सकता।

  इसलिए स्वास्थ्य के ऊपर ध्यान देकर स्वस्थ और नौजवान बनाने की बात कही गई है, उनका मैं अभिनंदन करता हूं। ग्रामीण विकास और कृषि की जो बात है, इनके ऊपर इस बजट में इतना बल दिया गया है कि इसके बाद नश्िचत रूप से जो गिरती हुई कृषि उत्पादन की स्िथति है, बेरोजगार ग्रमीण नौजवान की स्िथति है उसको रोजगार मिलेगा और कानून-व्यवस्था भी ठीक होगी और घर में सम्ृाद्धि आएगी तथा देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। उसके बाद हमारा निर्यात भी बढ़ेगा, उसे कोई रोक नहीं पाएगा। कृषि पदाथर्ों का निर्यात करने के लिए हमारे पास असीमित संभावना है और इस पर अगर कोई सैंकशन देने की कोशिश करे या कुछ और करने की कोशिश करे। लेकिन जिस देश में अपनी जनता का पेट भरने का साहस होगा वह हमारे अन्न को खरीदेगा और उसके बाद वह मजबूरी में काम करेगा। इसमें जनरल वेलफेयर के लिए बजट बढ़ाया गया है। इस बजट के माध्यम से सामाजिक कल्याण की बात कही गई है, उस पर बल दिया गया है, धन लगाया गया है। न्यू क़ाप इंश्योरेंस स्कीम प्रारम्भ की गई है। इसके लिए हम चिल्लाते रहे। जब से हिन्दुस्तान आजाद हुआ तब से किसान का ईश्वर मालिक है। आसमान पर ईश्वर और नीचे भगवान, बीच में कोई है ही नहीं। इस तरह किसान लूटना है, पीटता है। अगर ओले आ गए, आंधी आ गई तो किसान लूट जाता है, ऐसी स्िथति में अगर किसान की रक्षा करनी है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है तो क़ाप इंश्योरेंस स्कीम को मजबूती से लागू करना होगा। मैं बधाई देता हूं कि वाजपेयी जी के नेत्ृात्व में एक नई शुरुआत हुई है, मार्गदर्शन हुआ है। अभी एक माननीय सदस्य कह रहे थे कि लूम पर बल नहीं दिया गया। मुझे लगता है कि शायद उनकी निगाहों से कोई चीज ओझल हो गई है। कॉटन के लिए टैकनोलॉजी मिशन, इसमें व्यवस्था की गई कि किस प्रकार से कपास का उत्पादन और उसकी गुणवत्ता बढ़े और वह कहते हैं कि लूम्स के ऊपर ध्यान नहीं दिया गया। अगर रूई और कपास नहीं होगा तो लूम काम नहीं कर पाएगा। इसलिए इसके काम करने के लिए आवश्यक है कि उसकी जो बेसिक आवश्यकता है उस पर बल दिया जाए। इस समस्या के हल के लिए यह किया गया है।

  महोदय, अभी तक तो हम जय श्रीराम का नारा बोलते थे। उधर बैठे मेरे मित्र कहते थे कि बंदरों की बात कर रहे हें, लेकिन हनुमान जी जैसे महापुरुष को मेरे मित्रों ने बंदर बना दिया। वह वन नर थे, वानर नहीं थे और वन नर का मतलब है कि वनों के अंदर रहने वाले नर हैं। वनों के अंदर रहने वाले नर इस देश की एकता, अखंडता और संस्कृति के प्रतीक हैं। वह वास्तव में इस देश की सबसे बड़ी धरोहर हैं, शकित हैं और इन्होंने ही जब भी देश के अंदर अन्याय, अत्याचार हुआ है, तभी देश की रक्षा की है। इसलिए उनके पुनर्वास के लिए भी योजना लाई गई है। नॉन प्लान एकसपेंडीचर ७० परसैंट का है, सब्िसडी का मामला है। सब्िसडी इस देश का एक अंग बन गई है। मेरे जो मित्र इधर बैठते थे तो उनको लगता था कि सब्िसडी पर जब चाहे ब्रेक लगा दो, जब चाहे यूरिया के पैसे बढ़ा दो, पेट्रोल और डीजल के पैसे बढ़ा दो, उसके लिए मेनुपलेशन कर लिया लेकिन जब इस बार कुछ पैसे बढ़े तो उन्हें ऐसा लगने लगा। सब्िसडी इस देश की व्यवस्था का एक अंग बन गई है इसलिए सब्िसडी को इन्होंने मेनटेन किया है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) =x½þÉäÆxÉä <Æ]õ®úxÉ±É Ê®úºÉÉäǺÉäºÉ ¤ÉgøÉxÉä EòÒ EòÉäÊ¶É¶É EòÒ ½þè <ºÉʱÉB ÊEò ´É½þÉÆ ºÉä ºÉèÆE¶ÉxÉ Ê¨É±ÉäMÉÒ, {ÉèºÉÉ SÉÉʽþB* b÷Éä¨Éäʺ]õEò ºÉäÊ´ÉÆMÉ EòÒ ´ªÉ´ÉºlÉÉ EòÒ ½þè, =ºÉ {É®ú ¤É±É ÊnùªÉÉ ½þè* ]õèEºÉäºÉ Eòä ¤ÉÉ®úä ¨ÉäÆ ´Éä Eò½þiÉä ½þèÆ ÊEò xÉÉè ½þVÉÉ®ú Eò®úÉä, ½þ±±ÉÉ iÉÉä <ºÉʱÉB lÉÉ, ¨Éä®úä ʨÉjÉÉäÆ xÉä |ÉÒ ¤ÉVÉ]õ Eò®úxÉä ¨ÉäÆ Eò½þÉ lÉÉ ÊEò <ºÉ ¤ÉÉ®ú BäºÉÉ c÷Éʺ]õEò ¤ÉVÉ]õ +ÉBMÉÉ ÊEò ʽþxnùÖºiÉÉxÉ Eòä ¨ÉiÉnùÉiÉÉ EòÒ Eò¨É®ú ]õÚ]õ VÉÉBMÉÉ, ±ÉäÊEòxÉ Eò¨É®ú xÉ ]õÚ]õÒ, xÉ ZÉÖEòÒ ¤ÉʱEò ´É½þ ®úä¶ÉxÉ±É ¤ÉxÉ MɪÉÉ* <ºÉʱÉB {Éʤ±ÉEò Eòä ºÉ½þªÉÉäMÉ EòÒ +ɴɶªÉEòiÉÉ ½þè iÉÉä Eò®únùÉiÉÉ +{ÉxÉÉ ºÉ½þªÉÉäMÉ nùä nùäÆ, ½þ¨ÉäÆ Ê´ÉnùäʶɪÉÉäÆ ºÉä SÉÖxÉÉèiÉÒ Ê¨É±É ®ú½þÒ ½þè* ºÉÒ¨ÉÉ+ÉäÆ {É®ú ¦ÉÒ Ê¨É±É ®ú½þÒ ½þè +Éè®ú ºÉÒ¨ÉÉ+ÉäÆ ºÉä {ÉÉ®ú ºÉÉiÉ ºÉ¨ÉÖpù {ÉÉ®ú ®ú½þxÉä ´ÉɱÉä ±ÉÉäMÉ ¦ÉÒ =ºÉºÉä ´ÉÆÊSÉiÉ ½þèÆ, ´Éä ¶ÉÉÊ¨É±É ½þÉä ®ú½þä ½þèÆ ÊEò ½þ¨ÉäÆ xÉÒSÉÉ ÊnùJÉÉxÉÉ SÉɽþiÉä ½þèÆ* +¤É iÉEò ]õèEºÉ nùäxÉä ´ÉɱÉä EòÉä SÉÉä®ú ºÉ¨ÉZÉÉ MɪÉÉ* <ÆEò¨É ]õèEºÉ +ÉÊ¡òºÉ®ú +Éè®ú <ƺ{ÉäE]õ®ú {ÉèºÉÉ ¦ÉÒ ½þ¨ÉºÉä ±ÉäiÉä ½þèÆ +Éè®ú =ºÉÒ Eòä ¤ÉÉnù =ºÉÒ EòÉä SÉÉä®ú Eò½þiÉÉ ½þè* {ɽþ±ÉÒ ¤ÉÉ®ú EòɱÉävÉxÉ EòÉä ÊxÉEòɱÉxÉä Eòä ʱÉB ªÉÉäVÉxÉÉ ¤ÉxÉÉ<Ç MÉ<Ç ½þè +Éè®ú BäºÉÒ ªÉÉäVÉxÉÉ ¤ÉxÉÉ<Ç MÉ<Ç ½þè VÉÉä ®úä¶ÉxÉ±É ½þè +Éè®ú VÉÉä ºÉ¡ò±É ½þÉäMÉÒ* ºÉ¨¨ÉÉxÉ +Éè®ú ºÉ¨ÉÉvÉÉxÉ, nùÉäxÉÉäÆ ªÉÉäVÉxÉÉBÆ <ºÉÒ ¤ÉÉiÉ Eòä ʱÉB ½þèÆ, ±ÉäÊEòxÉ <x½þÉäÆxÉä <xÉ nùÉäxÉÉäÆ EòÉä ºÉ®úÆb÷®ú Eò®úxÉä EòÒ ¤ÉÉiÉ Eò½þÒ ½þè* ¨ÉèÆ ¦ÉÒ ´ÉEòɱÉiÉ Eòä {Éä¶Éä ºÉä +ÉiÉÉ ½þÚÆ,, BäºÉÉ ±ÉMÉiÉÉ ½þè ÊEò {ɽþ±ÉÒ ¤ÉÉ®ú +ÉªÉ Eò®ú ¨ÉiÉnùÉiÉÉ "ºÉ®ú±É" Eòä ¨ÉÉvªÉ¨É ºÉä +{ÉxÉÒ Ê®ú]õxÉÇ ¦É®ú ºÉEòäMÉÉ +Éè®ú =ºÉEòä ¤ÉÉnù `öÒEò |ÉEòÉ®ú ºÉä EòÉ¨É Eò®ú ºÉEòäMÉÉ* लॉयर्स की आवश्यकता नहीं होगी। दो बातें और कहकर मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। पेट्रोल पर जो पैसे बढ़ाए गये हैं, उसके अंदर भी लालफीताशाही ने सरकार को बदनाम और असफल करने की कोशिश की। चिदम्बरम साहब अभी शिकायत कर रहे थे कि वित्त मंत्री को नौकरशाही बहकाती रहती है, वह बहकाती रहती है या नहीं बहकाती रहती है, मैं नहीं जानता, लेकिन इस मामले में नौकरशाही ने अपना करिश्मा करके दिखा दिया। लेकिन जब कलेरफिकेशन दे दिया तो चीज़ साफ हो गयी। पेट्रोलियम मूल्य सरकारी कोष को बढ़ाने के लिए नहीं बल्िक सड़कें बनाने के लिए बढ़ाए गए हैं, जिससे गाड़ी और बैलगाड़ी के पहियों को दिककत न आए, वे गड्डों में न फंस जाएं – प्रतिबंधों के खतरे को देखते हुए यह किया गया है। सिकयोरिटाइजेशन की बात उन्होंने कही। जहां तक बिजली का मामला है, उसमें सिकयोरिटाइजेशन की आवश्यकता है। जब तक गांव-गांव बिजली नहीं पहुंचेगी, जब तक हमारे पास बिजली नहीं पहुंचेगी, तब तक देश की प्रगति नहीं हो सकती। यह एक आधारभूत ढांचा है। इसलिए मैं यह बात कहकर अपनी बात को विराम देना चाहूंगा कि यह एक अच्छा बजट है।

  एक सुझाव मेरा माननीय वित्त मंत्री जी से है, वे यहां बैठे हैं । यूरिया के दाम जो उन्होंने बढ़ाएं हैं उनको घटाया जाए। यह मैं उनसे कहना चाहूंगा। … (व्यवधान) उन्हें वापिस ले लें।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  दूसरा सुझाव मेरा यह है कि एस.एस.आईज की जो लमिट है, जो अभी एक करोड़ घोषित की गयी है,उस पर भी पुनर्िवचार करें और इसको तीन करोड़ करने का विचार करें। इसके साथ मैं पुन: वित्त मंत्री जी को बधाई देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

“>SHRIMATI GEETA MUKHERJEE (PANSKURA): Mr. Chairman, Sir, one of the disturbing features of this Budget is that it is highly inflationary in character. Though the fiscal deficit is calculated to be at 5.6 per cent, yet many economists find it to be totally illusory and stated that it would go beyond 10 per cent. In the background of falling agricultural and industrial production, this will definitely lead to a situation of long term stagflation and result in a big increase in the prices of articles used by common man.

I darw the attention of Shri Chidambaram, on top of all this, a hike of eight per cent in the excise duty on articles like package tea, branded ghee, sewing machine, branded spike, skimmed milk, spectacle lens/frames, branded edible preparations etc. will surely hit the common man. Shri Chidambaram mentioned about women Members not protesting and thus I drew his attention.

 

SHRI MURLI DEORA : Shri Chidambaram has now become a Communist.

SHRI P. CHIDAMBARAM : What has communism has got to do with this?

SHRIMATI GEETA MUKHERJEE : Above all this, there is no mention about what the Government intends to do in regard to the Public Distribution System which is not only one of the mechanisms to contain inflation to some extent but also is an outlet for giving some relief to the common man.

Sir, I had collected many figures. But due to constraint of time I would try not to give all the figures and be brief. But I would also beg your kind indulgence to allow me to give some of the figures. Apart from that I would also speak on the general aspects of the Budget as well. I beg to be excused for that.

Sir, the proportion of Direct Tax to Indirect tax or the percentage of Direct Tax in total revenue is coming down every year. It is the same this time also. This is harmful for development. In regard to the widening of the tax net, I would like to submit that there are some sections of the society who are being consistently left out. As for example, the sector of big farm houses. This time also they have been left out.

While I am against excise duty on agricultural machines, I am for taxing the big farm houses. But, it has not taken place. For an underdeveloped country like ours, the expenditure ratio between developmental and non-developmental sector is important for development. This Budget has failed to raise the proportion of expenditure in developed sector. It is seen in the Budget, the proportion of revenue expenditure is increasing at the rate of 15 per cent while that of capital expenditure is increasing only at the rate of 9 per cent. This ratio will adversely affect the country’s industrial development and all other developments. So, these things should be changed.

Now, who is happy with the Budget? The simple illustration of the Budget is seen from the opinion poll conducted by the Economic Times which revealed that 76 per cent of the MNCs and 63 per cent of the Indian companies express their happiness over the Budget. As far as common man is concerned, he generally does not approve the fall out of this Budget.

Now, I must deal with the point with which Shri Chidambaram may not agree with me, perhaps Shri Deora also may not agree to it. It is about the disinvestment sector. We are firmly against it. In the disinvestment scenario, the shares of highly profit-making companies, like GAIL, IOC, VSNL, CONCOR, etc. have been proposed which will definitely make the public sector more week. Yielding to the pressure of big business houses, it is proposed that the Government’s equity shares shall be brought down only to 26 per cent in non-strategic sector. The worst is, in the public sector banks, it has been proposed to change the bad debt amount as equity share and this will be shown as recovered. It means that those who have taken loans from the banks and have not returned will now become the shareholders of the bank without giving anything from their pocket. This is not only unethical but is a ploy to privatise the nationalised banks through backdoor.

Regarding the possible difficulties of resource mobilisation, the Finance Minister’s casual attitude towards sanctions following nuclear explosion is not shared by his own colleagues, leave aside others. We have our own apprehensions. Added to this is the external borrowing from the international commercial market whose rate of interest is very high. As a result, the PSUs will face tremendous difficulties if not extinction. Though, the Finance Minister propounded the idea of swadeshi, the small scale sector has been allocated only Rs.772 crore, same as last year’s Budget, but in real term it will be less because of the inflation. So, this is the real meaning of swadeshi of the ruling party. Not only that, how MNCs have been favoured in comparison to the small scale industries can be found by the fact that while excise duty on pesticides producer MNCs will be 8 per cent, the SSIs who are producing pesticides will have to pay 18 per cent. Where is swadeshi here and where is all the love for the SSIs? This can definitely be done away with.

The class bias of this Budget in favour of big business is very much pronounced in line with BJP’s policy. In the name of liberalisation, the entry of foreign capital and their investment without any check has been ensured.

The wholesale concessions that have been given to NRIs will also particularly benefit their counterparts, the co-sharers of MNCs. This is actually the policy that is being followed.

The highest increase made this year is in Defence Budget, particularly in the field of defence research, along with the overall increase of 14 per cent. There is around 60 per cent increase in atomic energy research. Obviously, this is intended for further nuclear weaponisation. A poor country like ours can ill afford such a situation. We should give a serious thought to this. I agree with Shri Chidambaram when he says that except atomic energy no other field of scientific research has been catered to in this manner.

Many things have been said about peasants. Some good things have been said. But I do not understand as to how is it that irrigation which is so important for the peasantry has not been given its due share. It is seen that the total expenditure in 1997-98 for irrigation of all kinds — small, medium and minor — was Rs.1762.21 crore. But this year’s Budget provides Rs.396 crore for Plan expenditure and Rs.166.37 crore for non-Plan expenditure totalling up to only Rs.562.37 crore. Compared to last year, it has come down very much. This is going to hit the rural economy as a whole.

Regarding assistance to the States and the Union Territories, the Budget proposals envisage a total expenditure of Rs.29,538.01 crore under Plan expenditure and Rs.21,045.75 crore under non-Plan expenditure which makes a tall claim of Rs.50,583.76 crore. But when we turn to receipts budget, the real picture emerges and that is not at all a rosy one as claimed by the hon. Finance Minister. According to the receipts budget the total recoveries of loans and interest from the States come to Rs.29,189.69 crore which make a net transfer to the States and the Union Territories of Rs.31,394.20 crore only. Due to higher rate of inflation this amount will come down further. On this score I demand an increase in States’ share of devolution from the combined pool of relevant Central taxes — Income Tax and Corporate Tax etc., — to at least 33-1/3 per cent in the first phase and then further. I believe most of the State Governments, including the States ruled by the party in Government at the Centre now, will support me on this score.

The Budget speech of the Finance Minister has declared new scheme `Samadhan’ which, for all practical purposes, is a new VDIS.

But this time the concessions are more and this is available even on those cases also where litigations are on. This facility includes waiving of penalty, interest etc. Moreover, there is no mention about how this money is going to be realised, and how it is going to be utilised. Therefore, I propose for introduction of a scheme so that whatever money is realised from these schemes is compulsorily invested in PSUs to strengthen them.

I would have been really positive if the Central Government had taken into confidence the State Governments to unearth blackmoney through coordination with the State Governments and sharing the proceeds with the State Governments appropriately. By not doing so, the class bias in favour of the rich class is very much pronounced. Not only that, the tendency to centralise power and resources is also once again reflected through these figures. I think, that should be given up.

In his Budget, the hon. Finance Minister talked about his concern about working class and proposed a new VRS package for which a Restructuring Fund would be started. This fund will advance the losing PSUs to meet out the cost of implementing the VRS and after paying the dues of the workers’ and others, the assets will be sold, and the proceeds will go to the budgetary expenditure. But through this scheme, not only a huge amount of money will go out of State coffers but a large number of workers will become unemployed belying hon. Prime Minister’s claim to provide jobs to a million a year. Through this, the share of public sector in the economic activity of our country will come down substantially. Therefore, this scheme is totally anti-working class and will serve the purpose of the big industries only. Only a paltry sum of Rs.1400 crore have been allocated for the sick PSUs which is actually meant for payment of wages only and not for revival. This needs to be definitely changed.

In the Human Resource Ministry, though the hon. Finance Minister claimed to have proposed a larger amount this time, but in reality almost 90 per cent of this will be eaten up by the recent pay hike. Of course, he has said that women will be provided with concessions. I am thankful to that. But that also will not be very much because 95 per cent will go.

Another disturbing element in this educational sphere is the declaration of creation of National Reconstruction Corps to mobilise youth for community-based-nation-building activities. But as the details of the scheme have not yet been announced, there is a big apprehension in the minds of many that it will result in greater penetration of RSS at the cost of the Government.

With a substantial increase in Defence expenditure, a large outgo in respect of interest charges, etc. the total expenditure will be rising to Rs.2,67,927 crore from Rs.2,35,245 crore. This huge outgo will necessarily result in the increase in revenue deficit to Rs.48,068 crore from Rs.43,686 crore in 1997-98 (Revised).

The net receipts are expected to rise to Rs.1,16,857 crore. Non-tax receipts are placed higher at Rs.45,137 crore.

It is not true that there is no alternative. The basic premises of that alternative are land reforms, irrigation, credit and material support for small and middle peasantry. In this respect, I would like to remind the House that in West Bengal we have been able to do all this not to the extent that we wanted to, even then whatever we have done has resulted in regular increase in agricultural productivity at five per cent per annum in the last decade, whereas in Punjab and Haryana this has not been so. Therefore, these alternatives are fundamental.

But as there is no indication of reversal of deceleration in industrial growth so far, there is hardly any reason to believe that this will be accomplished. Instead this will result in larger inflation and the poor will be hard hit. Therefore, I oppose this Budget.

SHRI MURLI DEORA : Is the hon. Finance Minister announcing these remedial measures, which Shri Khurana has promised, tomorrow?

SHRI YASHWANT SINHA: Shri Khurana has only promised dinner for all of us.

  संसदीय कार्य मंत्री तथा पर्यटन मंत्री (श्री मदन लाल खुराना): सभापति महोदय, मेरा एक सुझाव है कि जो महिला सदस्य हैं अगर आप इनको पहले बोलने का मौका दे दें तो अच्छा होगा कयोंकि हाउस काफी देर तक चलेगा। मेल मान. सदस्य तो देर तक बैठ सकते हैं, महिलाओं के सामने समस्या है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री शैलेन्द्र कुमार (चैल) : जो पहली बार चुनकर आई हैं, उनको पहले मौका दे दें।

  सभापति महोदय : मैं श्रीमती गीता मुखर्जी से पहले ही शुरू कर चुका हूं।

  श्री मदन लाल खुराना : सभापति महोदय, मेरी एक प्रार्थना है कि जैसे श्रीमती भावना दवे, श्रीमती आभा महतो या जो भी मान. सदस्या उधर बैठी हैं, दोनों तरफ से एक-एक मान. सदस्या को बोलने का मौका दें

  डा. शकील अहमद (मधुबनी) : सभापति महोदय, यह गलत इम्प्रेशन नही होना चाहिए कि वे खाना पकाती हैं इसलिए उनको पहले बोलने दिया जाए। वे सभी लोक सभा की मान. सदस्य है। गलत इम्प्रेशन आप दे रहे हैं। यहां कोई शादी-ब्याह नहीं हो रहा है जो उनको खाना खिला दीजिए और भेज दीजिए। वे जब तक चाहे रह सकती हैं।

  श्री मदन लाल खुराना : सभापति महोदय, हमारी बी.जे.पी. की पद्धति है कि उन महिलाओं को जो लिस्ट में नीचे हैं, ऊपर करके पहले बोलने का मौका दिया जाए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

“> श्रीमती भावना कर्दम दवे (सुरेन्द्रनगर): सभापति महोदय, मैं आपकी बहुत आभारी हूं तथा मैं विपक्ष के साथियों की भी आभारी हूं कि उन्होंने मुझे पहले बोलने का मौका दिया। आज मैं आपके जरिये माननीय वित्त मंत्री श्री यशवन्त सिन्हा जी का अभिनन्दन करती हूं। सरल, समाधान, सम्मान तीनों योजनाओं का दर्शन इस बजट में एक साथ होता है। इस देश से अंग्रेजों को गये ५० साल हुए किन्तु उनकी छाया अभी बच गयी। गुलामी की मानसिकता को दूर करके हमारे वित्त मंत्री जी ने देश की जनता के लिए सही अर्थ में यह बजट प्रस्तुत किया है। सचमुच में इस बजट को स्वर्ण जयंती बजट कहा जा सकता है । १९९१ से १९९७ तक के सभी बजट विदेशी मल्टी नैशनल कम्पनियों, विदेशी वित्त संस्थाओं, जैसे एफ.आई.आई. और विदेशी ब्रोकर्स को ध्यान में रखकर बनाये गये थे। मैकाले की शिक्षण प्रथा से प्रभावित लोगों ने एडम स्िमथ को इकोनोमिकस का फादर कहा। आज उन लोगों को हमारे वित्त मंत्री जी ने इस बजट के जरिये बता दिया है कि यह देश चाणकय का देश है।

  चाणकय सिर्फ राजनीतिज्ञ नहीं था, चाणकय अर्थशास्त्री भी था। हिन्दुस्तान गांवों का देश है, कृषि हमारा मुख्य व्यवसाय है। इस बजट में देश के सभी लोगों का ख्याल रखा गया है इसलिए मैं माननीय वित्त मंत्री जी का अभिनंदन करती हूं।

  सभापति महोदय, इस बजट में स्वरोजगारी बढ़ाने के लिए लघु उद्योंगों को प्रोत्साहन दिया गया है। सरकार ने उत्पाद शुल्क की सीमा को ३० लाख रूपये से बढ़ाकर ५० लाख रूपये कर दिया है। आज तक कई उद्योग वाले मेरे पास आये हैं और वे कह रहे थे कि कई सालों से इसमें कोई फेरबदल नहीं हुआ है किंतु हमारे वित्त मंत्री जी ने लघु उद्योंगों को प्रोत्साहन देने के लिए उत्पाद शुल्क की सीमा को ३० लाख से बढ़ाकर ५० लाख कर दिया है, ताकि गांवों में लोगों को रोजगार मिले।

  वित्त मंत्री जी मैं एक बात विशेष रूप से कहना चाहती हूं कि हमारे यहां सिरामिक जैसे उद्योग हैं जिनका माल हम विदेशों को भी निर्यात कर सकते हैं। इससे हमारा निर्यात बढ़ेगा, और विदेशी पूंजी भी ज्यादा मिलेगी। मेरा एक नम्र निवेदन है कि फयूल के लिए और ऊर्जा के लिए ऐसी इंडस्ट्रीज को गैस सप्लाई मिले जिससे उन उद्योंगों की विकास की गति तेज हो सके। वित्त मंत्री जी ने एक और सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने अपने बजट में इंस्पेकटर राज को हटाने के लिए प्रशासन तंत्र के कानून और वनियमों की पुनरीक्षा और आवश्यक परिवर्तन की घोषणा की है। इस घोषणा से, आज तक जो बेरोजगारी चल रही थी उस बेरोजगारी और इंस्पेकटर राज पर पूरा नियंत्रण होगा और लघु उद्योगों को पूरा प्रोत्साहन मिलेगा।

  हम जानते हैं कि देश के युवा जन देश की पूंजी होते है, उनका अपना स्वाभिमान होता है। उनके शकितशाली हाथों को काम दिया जाए। किंतु आज पर्यन्त प्रत्येक पंचवर्षीय योजना के बाद रोजगारी नहीं बढ़ी बल्िक प्रत्येक योजना के बाद बेरोजगारों की फौज बढ़ती चली गई। कई बेरोजगार लोग बेरोजगारी से पीड़ित होकर आत्महत्या करने लगे और कई असामाजिक प्रव्ृात्ित की ओर प्रोत्साहित हुए। मैं वित्त मंत्री जी की प्रशंसा करती हूं कि उन्होंने गांवों और शहरों में रहने वाले नौजवानों, छोटे-छोटे काम करने वाले देश के दस्तकारों, कारीगरों, बुनकरों, सब्जी बेचने वालो, छोटा-मोटा धंधा करने वालो और सभी उद्यमियों को जो स्वयं का कारोबार करना चाहते हैं, उन्हें ध्यान मे रखकर प्रावधान किया है ताकि वे स्वरोजगार प्राप्त कर सकें। इस दिशा में नाबार्ड के जरिये उद्यमियों को नधियां उपलब्ध करवाने, सैल्फ हैल्प ग्रुप को बढ़ावा देने की जो सीमित स्कीम थी, उसके कार्यक्षेत्र को बढ़ा दिया गया है। उस कार्यक्षेत्र का अगले पांच साल में विस्तार करके दो लाख लोगों को स्वयं सहाय समूहों के रूप में मदद दी जायेगी जिससे ४० लाख परिवार लाभान्िवत होंगे। इस बजट में इसी साल दस हजार स्वयं सहाय समूहों को मदद दी जायेगी, जिससे दो लाख परिवारों को लाभ होगा जो बहुत ही प्रशंसनीय बात है।

  जितनी जरूरत बच्चे को माता-पिता की होती है उतनी ही जरूरत इंसान को घर की होती है। हमारे देश में बहुत से लोगों के सिर पर छत नहीं है। उन लोगों की चिंता करते हुए इस बजट में बीस लाख अतरिकत मकानों का लक्षय रखा गया है जिनमें १३ लाख मकान ग्रामीण क्षेत्र में और सात लाख मकान शहरी क्षेत्र में बनाने का निर्णय किया गया है।

  सभापति महोदय, सचमुच में आज तक गांवों की ओर देखा नही गया है। आज इस बजट में गांवों में डेढ़ लाख आवास बनाने की योजना प्रस्तुत की गई है यह प्रशंसनीय कार्य है। हुडको को ११० करोड़ रुपए की पूंजी दी गई है ताकि इस देश का जो मध्यम वर्ग है उसका इसके जरिए ख्याल किया गया है।

  सभापति महोदय, कृषि और किसानों के लिए जो प्रावधान किए हैं उनको देखने से सरकार की किसानों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई देती है। थोड़े दिन वहले इसी सदन में कृषकों द्वारा आत्महत्या किए जाने के मामले पर बहस हुई थी। मैं पूछना चाहती हूं किसानों को आत्महत्या करने के लिए विवश कयों होना पड़ा। हमारे वित्त मंत्री ने ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से चन्ितत होने और उनकी पुनराव्ृात्ित को रोकने के लिए कदम उठाए हैं। अब किसान को कर्जा वापस न करने की हालत में जेल में नहीं जाना पड़ेगा और आत्महत्या करने के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा। इस बात को ध्यान में रखकर बैंकों को निर्देश जारी किए गए हैं और बैंकों के जरिए राहत प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। बजट में किसानों के लिए किसान क़ेडिट कार्ड की व्यवस्था की गई है। यह अत्यन्त प्रशंसनीय है। अब किसानों को खाद के लिए, बीज के लिए, कीट नाशक के लिए लाचारी नहीं भुगतनी पड़ेगी। वह उस कार्ड के आधार पर बैंक से पैसा लेकर खरीद सकेगा। नाबार्ड की शेयर पूंजी में ५०० करोड़ रुपए तक की व्ृाद्धि करके कृषि की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया गया है। सभापति महोदय, जल स्ृाष्िट का प्राण होता है। देश के गांवों में अभी तक कृषि कार्य के लिए जल नहीं पहुंच सका है। कृषि के लिए पर्याप्त मात्रा में अभी तक जल उपलब्ध नहीं कराया गया है। मैं जानती हूं कि हमारे देश की जो जमीन है, उसके सिर्फ ३६ प्रतिशत में ही सिंचाई की सुविधा मिली है। इस बजट में कृषि के लिए पर्याप्त प्रबन्ध करने का प्रयास किया गया है जिसमें जल भंडारण सुविधा और सिंचित क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई है। त्वरित सिंचाई लाभ के लिए वर्ष १९९७-९८ के संशोधित अनुमान की तुलना में इस वर्ष के प्रावधान में ५८ प्रतिशत तक की व्ृाद्धि की गई है, जो प्रशंसनीय कदम है।

  सभापति महोदय : मैडम अब कन्कलूड किया जाए।

  श्रीमती भावना कर्दम दवे : सभापति महोदय, शक्षित नागरिक राष्ट्र की धरोहर होता है। इस बजट में शिक्षा के लिए ५० प्रतिशत बढ़ौत्तरी की गई। इतना ही नहीं, मैं मंत्री जी का बहुत ही आभार व्यकत करना चाहती हूं कि उन्होंने लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के लिए १०० करोड़ रुपए खर्च करना तय किया है। मैं इस देश की सब महिलाओं की ओर से मंत्री महोदय का आभार व्यकत करती हूं।

  सभापति महोदय, राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा बहुत जरूरी होती है। १९९७-९८ के संशोधित अनुमान ३६०९९ करोड़ रुपए से काफी धन बढ़ाकर इस बजट में ४१२०० करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है जो सचमुच में ही अच्छी बात है। राष्ट्र की सुरक्षा से बढ़कर कोई चीज नहीं होती है। हम किसी को सताते तो नहीं हैं, लेकिन सताने वाले को छोड़ते भी नहीं हैं। एक कहावत है- काटो मत, लेकिन फुफकारो। हमारी सुरक्षा के लिए यह बहुत जरूरी है। हमारे विपक्षी दल के भाइयों ने अभी तक बहुत कुछ कहा है हमने वह सब बैठकर सुना है। हमने देखा है कि इस काम में विपक्ष को हमारा साथ देना चाहिए लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और एक ओर विदेशी पूंजी को आने देने की बात कही है तो दूसरी ओर हैंडलूम वालों की चिन्ता व्यकत की है। मैं आपसे कहती हूं कि यह तो ऐसी बात हुई कि एक साथ आटा भी खाओ और हंसो भी। हमें इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि यह जो काम हुआ है वह ठीक है या नहीं। सिर्फ विरोध करने के लिए टीका-टिप्पणी करना ठीक नहीं है।

  सभापति महोदय, बहुत सालों के बाद इस देश को बहुत अच्छा बजट मिला है। हमारे वित्त मंत्री जी का जो नाम है उसी के अनुरूप हमारे देश का जनमानस प्रभावित होगा और हमारे देश के ऊपर इस बजट का प्रभाव ऐसा पड़ेगा जिसका यश वित्त मंत्री सिन्हा जी को जरूर मिलेगा। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करती हूं। धन्यवाद।

“>PROF. A.K. PREMAJAM (BADAGARA): Hon. Chairman, Hon. Minister of Finance, I thank the honourable Chairman for having given me this opportunity and for giving me this opportunity earlier, being a lady. I also thank the hon. Member, Prof. Ajit Kumar Mehta, who has already been called, for having offered the opportunity to me.

I rise to oppose the Budget presented by the hon. Miniuster of Finance, Shri Yashwant Sinha on 1-6-l998 for the year l998-99. In his Budget Speech he has said that a new India is going to be built. Of course, we welcome that. But we are having an apprehension what kind of new India it is going to be with this kind of a Budget! We are fraught with an apprehension that the national security, economic sanctions and above all, the agony and suffering for the ordinary man, a Budget extinguishes the aspirations and expectations of the man in the field, the worker in the factory and the millions of toiling Indians.

The Finance Minister has stated in the Budget Speech that this Budget is rooted in Swadeshi and he has also recalled the memory of the Father of the Nation and he has reminded that the faces of the poorest and the weakest came before him when he was preparing the Budget.

The talisman of Gandhiji is being recollected and he has also quoted the hon. Prime Minister’s words, ‘The flag we hold shall never bow, marching steps shall never halt.”

Here I have a prayer to make: “While you march, your steps without halting, my prayer is that your steps will not be trampling upon the ordinary man, the toiling masses of this country, with this sort of a Budget.”

Sir, let us look at the key objectives and, of course, while looking at the key objectives there is nothing wrong; they are all very good objectives and one of the most important objectives is to reverse the decline in agriculture and strengthen the rural economy. But what I have to say about this is that while the aspiration is to build a new India and reverse the decline in agricultural area and strengthen rural economy, I would like to remind the Treasury Benches about the Exim Policy announced by the Minister of Commerce on the 13th April. With this Exim Policy 340 items were included in the Open General Licence. Most of these items are things which are required by everyone in our day to day life.

As far as my State is concerned, this Exim Policy has actually broken the backbone of our economy, especially the economy which is very heavily dependant on rubber and coconut.

This Government has pronounced its love for the farmers, but I do not find any love for the farmers in the policy already announced by this Government. The coconut and rubber farmers of Kerala and also the rest of India are suffering very much. Yesterday, the support price was announced for coconut at Rs. 2,900/- for mill coconut and Rs. 3,000/- for ball coconut. This, in fact, is much below the cost of production. If the support price of ball coconut is Rs. 2,900/- per quintal, it is Rs. 4.20 per nut and if the support price of ball coconut is Rs. 3,000/- per quintal, it is Rs. 4.21 per nut. So, the cost of production of one nut actually is Rs. 5.53. In fact, this is revealing the love of this Government for the farmers. On top of everything, there is a five per cent excise duty on agro-based rubberised industry. It was in 1960 as part of diversification programme that small scale industries had been opened in 1960. At present 92 units are functioning in different parts of India. Along with these 92 units, there are other small units which are processing latex and also coconut brown fibre. Seventy per cent brown fibre and 30 per cent latex are used for the agro-based rubberised industries. These units are income and employment generating units and thousands of families are dependent on these units. Now, these units are constrained to close down because they will not be able to manage the cost of production. So, I would humbly request the hon. Minister of Finance to abolish the five per cent of excise duty.

This Budget has pronounced everything for the small scale industries. This is the phrase used by the hon. Minister of Finance in his Budget Speech. This is the total commitment or interest in the small scale industries and that would help the small, medium and big farmers and that would also generate employment. But this is just one example which I am quoting. There are several examples where the small scale industries are the hard hit. So, I do not think that there is any love for small, medium and large farmers. I would very humbly request the hon. Minister of Finance to consider the withdrawal of five per cent excise duty on agro-based industries, that is, rubberised fibre. (Interruptions).

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

PROF. A.K. PREMAJAM : Sir, I have just started. My senior colleague has limited his speech to give me more time. So, please allow me a few more minutes.

I may now refer to Kisan Credit Card. The banking institutions are not in favour of the small and marginal farmers. Here, I am reminded of the saying of Louis, the XIVth. He said and I quote:

“To borrow high, one has to appear to be rich.”

Our small and marginal farmers appear to be very poor. They cannot appear to be rich. So, naturally, they are completely disregarded by the banking institutions. I would humbly request the hon. Minister of Finance to give proper directions and guidance so that the small and medium farmers should be given their due consideration while credit is given to them.

The other objective is about the social sector.

Of course, 50 per cent of increase is made for education. That is very good. There is a commitment by this Government that it will be raised to six per cent of GDP in a phased manner. This is very good, but I wonder whether this goal will be reached with such inflationary tendency in the country. Already, the value of dollar has been Rs. 42.45. This Budget was announced only last week and within one week, the inflation rate has gone up. With this inflationary tendency, I do not think that 50 per cent increase in the Budget is actually going to have 50 per cent effect. Some hon. Members have already pointed out that a major chunk of this would go to increase in salary of staff due to scale revision by UGC. The result of this will be total neglect of the primary education and also other literacy programmes. I would request the hon. Finance Minister to look into this matter and do something constructive about this area.

In a recent Press Conference, the hon. Minister for Human Resource Development has expressed his apprehension in the light of the nuclear explosion that the economic sanctions are in the way and these economic sanctions will definitely affect every area. So, my opinion is that the effect of this 50 per cent increase will be much below 50 per cent.

Not much has been said about Public Distribution System and just Rs. 400 crore have been meant subsidy for sugar and very limited share is given for other foodgrains. In fact, this is why I call this Budget an anti-people Budget because subsidy actually goes to the common man, the poor man, the needy in the country. If the Public Distribution System is strengthened, it means that the foodgrains would be going to them.

I would like to mention about health, water schemes etc., but because of constraint of time, I am not touching them. But I must say something about disinvestment. There are certain sick and ailing public sector undertakings. I do admit that. But I cannot understand why insurance sector is going to be opened to private enterprise. This insurance business was started under public sector. It was started with a moderate beginning, but it has grown like a vast shady tree. It is not only giving employment, but also earns crores and crores of rupees worth profit. It is serving the social sector. Many important social security measures are undertaken by insurance sector. We cannot understand why this sector is being opened up to private sector in India. It is said that it is being opened to private Indian companies, but these private companies in India would be actually opening the back-door to the foreign companies. We have seen this.

Today, there was a lot of hubbub about Maruti-Suzuki. Swadeshi is pronounced to be the policy of this Government. Where is the swadeshi feeling or the swadeshi as they pronounce it to be? I think, they have something else in their mind when they say swadeshi. Do they want to say that it is just the contrary of the word swadeshi? When they use the word swadeshi, do they mean that they have love for videshi and not swadeshi? I think that we have to take it like that. The Budget proposal is that IOC, GAIL, VSNL and CONCOR are going to be disinvested and the Government’s share is being brought down to 26 per cent. This will be the fate of the insurance sector also, and in the course of time, it will be opened to the foreign investment. Then, there is a threat that disinvestment is going to adversely affect FACT also.

I would like to give more details but because of the time constraint, I am not able to do it. Now, I must say something about tax proposals.

20.00 hrs.

Sir, as Shri Chidambaram has very rightly pointed out, it is a very rigorous tax policy. Instead of broadening the tax base through direct taxes and taxing the really rich who can afford to pay income tax, the hon. Finance Minister has resorted to a very regressive indirect tax.

As far as the excise duty is concerned, I have already mentioned about the agro-based industry. There are many other items which are effective branded items and which are used by the ordinary man like, for example, tea, sewing machine etc. The indirect tax on the sewing machine is a taxation on women, especially on those who depend on self-employment. This will adversely affect them.

Sir, in the Budget speech the hon. Finance Minister has increased the price of petrol only by Re.1/- per litre. It was in the speech, but only after getting out of this House we came to know about a steep increase in the price of petrol. The hon. Finance Minister may humbly say that he has taken the House for a ride on that day. On that day, the House was taken for a ride by the hon. Finance Minister, because there was an increase of excise duty from 20 per cent to 35 per cent on motor spirit.

Sir, with these words, I conclude my speech with a long protest and I oppose this Budget.

“> श्रीमती आभा महतो (जमशेदपुर) : सभापति महोदय, वर्ष १९९८-९९ के आम बजट पर आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, उसके लिए सर्वप्रथम मैं आपकी आभारी हूं।

  माननीय वित्त मंत्री जी ने जो १९९८-९९ का बजट पेश किया है, यह एक अच्छा बजट है, इसके लिए मैं उन्हें बधाई देती हूं। इस बजट में हमारे वित्त मंत्री जी ने सभी क्षेत्रों को आवश्यक धनराशि उपलब्ध कराने की व्यवस्था की है। जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं।

  सभापति जी, मैं बिहार राज्य के जमशेदपुर संसदीय क्षेत्र से प्रथम बार जीतकर आई हूं एवं अभी तक जो हमने अपने संसदीय क्षेत्र का अध्ययन किया है, उसके तहत मेरे संसदीय क्षेत्र के विकास के लिए कुछ बजटीय सहायता आवश्यक प्रतीत होती है। सार्वजनिक क्षेत्र के दो प्रमुख उद्योग मेरे संसदीय क्षेत्र से संबंधित हैं:-

  १. हिन्दुस्तान कॉपर लमिटेड मेरे संसदीय क्षेत्र के गाटशिला मुसाबनी स्िथत “बानालोपा खदान” बंद हो चुकी है जिसके कारण हजारों मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। मेरा आपसे आग्रह है कि ऐसे बेकार श्रमिकों के लिए अलग बजटीय सहायता केन्द्रीय सरकार द्वारा कराई जाए। साथ ही “बानालोपा खदान” को वित्त पोषित कर जीणर्ोधार किया जाए।

  २. सभापति महोदय, हिन्दुस्तान कॉपर लि. उद्योग घाटे की स्िथति में चल रहा है। हमारे इस उद्योग में देश का चालीस प्रतिशत तांबा पाया जाता है। कुछ मात्रा में सोना और चांदी भी पाई जाती है। मैं आपके माध्यम से आग्रह करना चाहूंगी कि इस उद्योग में अत्याधुनिक उपकरणों का उपयोग कर तथा इसके घाटे के अन्य कारणों का अध्ययन कर इसे बचाया जाये ताकि आने वाले भविष्य में हिन्दुस्तान कॉपर उद्योग से संबंधित मजदूरों एवं उसके परिवारों को बेकारी से बचाया जा सके और राष्ट्रीय महत्व के इस उद्योग को राष्ट्र को लाभ हो सके।

  हमारा संसदीय क्षेत्र वनांचल क्षेत्र में आता है जहां पूरा वनांचल, राष्ट्र की स्वर्ण जयंती वर्ष के उपलक्षय में भी पेयजल की समस्या से ग्रसित है और इसका एकमात्र कारण यह है कि प्रत्येक वर्ष जो नलकूप पेयजल के लिए लगाए जाते है, पहाड़ी इलाका होने के कारण वे उपयोगी नहीं रह पाते हैं। मैं इस संबंध में निवेदन करूंगी कि पूरे वनांचल क्षेत्र के लोगों को पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराने हेतु नलकूप के स्थान पर कुएं से पानी निकालने की व्यवस्था सुनश्िचत की जाए तथा त्वरित जलापूर्ित कार्यक़म पर १६२७ करोड़ रुपये को बढ़ाकर २००० करोड़ रुपए का प्रावधान किया जाये।

  सभापति महोदय, संपूर्ण भारतवर्ष में जो डाकघर की शाखा खोलने के लिए जनसंख्या का मापदंड रखा गया है, हमारे वनांचल प्रदेश की जनसंख्या मापदंडों के तहत नहीं आ पाती। फलस्वरूप आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में जिस अनुपात में डाकघर की सेवाएं प्रदान की जानी चाहिएं, आम लोगों को वे नहीं मिल पाती हैं। इस संबंध में अनुरोध करना चाहूंगी कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में डाकघर की अतरिकत शाखाएं खोलकर पिछड़े आदिवासियों को संचार सुविधा उपलब्ध कराने का प्रावधान किया जाए साथ ही बजट में जो ५०० विभागेत्तर शाखा डाकघर खोले जाने का प्रावधान किया गया है, उसे ७५० किया जाये।

  अध्यक्ष महोदय, काफी दिनों से शिक्षा के क्षेत्र में अथक प्रयास के बावजूद लड़कियों को दी जाने वाली शिक्षा पर अलग से प्रावधान नहीं किया गया था किन्तु इस वर्ष हमारे माननीय वित्त मंत्री जी ने लड़कियों की नि:शुल्क शिक्षा के लिए १०० करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। मैं आपके माध्यम से अनुरोध करना चाहूंगी कि हमारे वनांचल क्षेत्र में लड़कियों के लिए विशेष तकनीकी शिक्षण संस्थान की स्थापना कराई जाए। इसके साथ ही साथ केन्द्रीय महाविद्यालय की स्थापना भी की जाये।

  सभापति महोदय, वनांचल क्षेत्र में कोयला प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, बिजली की समस्या को देखते हुए एक बड़ा प्रोजेकटर विद्युत उत्पादन के लिए सरकारी क्षेत्र में लगाने की व्यवस्था सुनश्िचत कराई जाए एवं वरीयता के आधार पर वनांचल के ग्रामों का विद्युतीकरण कराया जाए।

  सभापति महोदय, वनांचल क्षेत्र में कुछ ऐसे इलाके हैं जहां के लोगों के पास आज भी रहने के लिए मकान नहीं है। वर्ष १९९८-९९ के बजट में जो लक्षय इंदिरा आवास योजना के लिए रखा गया है वह काफी कम समझ में आता है। इसे १६०० करोड़ रुपए तक बढ़ाया जाना चाहिए तथा वनांचल के लिए अलग से प्रावधान किया जाना चाहिए।

  हमारा संसदीय क्षेत्र जमशेदपुर एक औद्योगिक नगरी है किन्तु यहां से हवाई सुविधायें लोगों को अभी तक उपलब्ध नहीं कराई जा सकी हैं। मैं इस संबंध में भी निवेदन करना चाहूंगी कि बजट में प्रावधान कर जमशेदपुर से दिल्ली और मुंबई के लिए डायरेकट वायुयान की व्यवस्था कराने का प्रावधान किया जाए। साथ ही इस जमशेदपुर औद्योगिक नगरी में एक स्टॉक एकसचेंज की स्थापना करने का प्रावधान किया जाना चाहिए जिससे वनांचल क्षेत्र के निवेशकों को स्टॉक एकसचेंज के माध्यम से अपनी धनराशि का निवेश करने की व्यवस्था की जा सके।

  अंत में वनांचल क्षेत्र का सर्वेक्षण कराकर, गरीबी रेखा से नीचे जी रहे आदिवासियों, पिछड़े लोगों की पहचान सुनश्िचत कर उनके जीवन स्तर को सुधारने हेतु उन्हें एक अलग तरह का राशनकार्ड मुहैया कराया जाए जिसके तहत उन्हें दैनिक जीवन की खाद्य वस्तुओं को सस्ती दर पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो। इन्हीं शब्दों के साथ मैं फिर एक बार माननीय वित्त मंत्री जी का आभार प्रकट करती हूं तथा अच्छे बजट की सफलता की कामना करती हूं। धन्यवाद।

“> डॉ. प्रभा ठाकुर (अजमेर): सभापति महोदय, मैं सबसे पहले आपका आभार प्रदर्िशत करती हूं कि आपने मुझे यहां बोलने का अवसर दिया। मैं बताना चाहती हूं कि लोक सभा में चुनकर आने का यह मेरा पहला अवसर है और पहली बार सदन में बोलने का मौका मिला है। लेकिन इस सदन से बाहर जो इस देश की जनता है, वह इस सदन में जो कुछ भी घटित हो रहा है या राष्ट्र से संबंधित जो भी समस्याएं हैं, उनके बारे में अपने विचार रखती है, चिंतन करती है। आज देश की जनता इस बजट को लेकर जैसा महसूस कर रही है, सोच रही है, बातचीत कर रही है और महिलाओं में जो चर्चा बनी है, उन कुछ बिन्दुओं को ही मैं बहुत कम समय में विशेष रूप से इस सदन में रखना चाहूंगी। माननीय वित्त मंत्री जी ने इस बजट को स्वदेशी बजट कहा है हालांकि स्िथति यह है कि स्वदेशी बजट आने के साथ ही इस देश की जो स्वदेशी जनता है, वह काफी चिंतित और त्रस्त हो गई है। जनता संभावित मंहगाई के बारे में सोचकर चिंतित हो गई है। इस बजट के कारण विशेष रूप से महिलाएं परेशान हैं। यदि इस बजट को कोई शीर्षक दिया जाए तो वह – “जय जवान जय किसान” बनता है। इस शीर्षक में कितनी सच्चाई और वास्तविकता है, इसे मैं यहां कुछ बातों से स्पष्ट करना चाहती हूं। पहले हम “जय किसान” शीर्षक लेते हैं जिसके अंतर्गत माननीय वित्त मंत्री जी की ओर से कई बड़े लुभावने वायदे किए गए हैं, बड़े सब्जबाग दिखाए गए हैं और किसानों के प्रति बजट के माध्यम से बड़ा प्रेम भाव प्रकट किया गया है।

  लेकिन इन वायदों को लागू करने के इरादे कितने मजबूत हैं, उनमें कितनी सच्चाई है, यह तो वकत ही बताएगा। लेकिन जो कुछ हम इन दिनों पढ़ते हैं, उसके अनुसार, अमेरिकी अर्थशास्त्रियों का विश्लेषण इस बजट का अध्ययन करने के बाद जो मत बना है, वह यह कहता है कि इस बजट के मूल में किसानों और राष्ट्र की सुरक्षा के चिन्तन के मूल में कहीं राजनैतिक चिन्तन ही अधिक प्रमुख है, गम्भीर इच्छाशकित के बजाय वही ज्यादा नजर आता है। कहने को तो इस बजट में कहा गया है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही देश की असली धुरी है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की धुरी है, लेकिन ग्रामीण विकास के लिए जो धनराशि बजट में आबंटित की गई है, वह कुल बजट के ६० प्रतिशत के घोषित लक्षय से काफी नीचे है। वैसे इस बजट के आते ही जो पहली गाज गिरी, किसान प्रमुख बजट जिसे कहा गया, उसमें पहली गाज किसानों पर ही गिरी। आप जानते हैं और सभी जानते हैं कि यूरिया के दामों में जिस तरह अप्रत्याशित घनघोर व्ृाद्धि की गई, जिसे बाद में सदन में भारी विरोध और असहमति प्रकट करने पर कृपा करके मंत्री महोदय ने वापस लेने का निर्णय लिया, वैसा मन बनाया, लेकिन उस समय पहली गाज किसानों पर ही गिरी थी, जिसके फलस्वरूप सैंकड़ों-हजारों किसान दिल्ली में, राजधानी में एकत्रित हो गये थे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के तहत जो कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने की बात है, उसका हम स्वागत करते हैं, लेकिन इससे सचमुच में जो वाकई ग्रामीण हैं, वही लाभान्िवत होंगे, यह देखे जाने की विशेष बात है। इसके अलावा किसानों को जो ऋण दिया जाता है, उसकी वसूली में उस तरह की थानेदारी किस्म की तत्परता न बरती जाये और किसानों से ऋण वसूली करने की एक अच्छी संस्कृति बने ताकि वह आराम से ऋण दे सकें और उन पर इतना तनाव न बढ़ जाये, उनके दिमाग पर इतना बोझ न बढ़ जाये कि उन्हे आत्महत्या करने जैसी स्िथतियों के लिए विवश होना पड़े। इस बात पर ध्यान देने की बहुत जरूरत है।

  इस बजट में लघु उद्यमों को बढ़ावा देने की बात है, लेकिन सभी जानते हैं कि लघु उद्योगों के उद्यमी ऋण प्राप्ित के लिए जिस तरह चककर काटते रहते हैं, हर जगह चढ़ावे के बिना उनका काम नहीं होता है, उनकी गाड़ी नहीं चलती है, उससे मुकित का उपाय होना चाहिए।

  आवास के बारे में बजट में जो घोषणा है कि बढ़ोतरी की गई है, वह स्वागतयोग्य है, लेकिन यह कितनी कारगर होती है और वस्तुतः जो आवास के लिए जरूरतमंद लोग हैं, उन्हें ही आवास मिले और इसका कोई राजनैतिक दृष्िट से वितरण नहीं हो तो सचमुच हम कहेंगे कि यह आवास की व्यवस्था सार्थक हो गई।

  बजट में एक बात महिलाओं की निशुल्क शिक्षा के लिए कही गई है, जिसके लिए १०० करोड़ रुपये की व्यवस्था है। महिलाओं को शक्षित करने के लिए इस बजट में उदारता दिखाई गई है, लेकिन मैं एक बात जानना चाहती हूं। यह स्िथति राजस्थान में तो है, हो सकता है कि और भी कई प्रदेशों में हो कि वहां १० साल से, १२ साल से जो मडिल स्कूल हैं, वे मडिल हैं, प्राइमरी स्कूल हैं तो प्राइमरी हैं, सैकेण्डरी स्कूल हैं तो सैकेण्डरी हैं। उन्हें क़मोन्नत नहीं किया जा रहा है। आप जानते हैं कि आजकल जैसा वातावरण है, जैसे हादसे घटित हो रहे हैं, उस स्िथति में कहीं भी माता और पिता अपनी बच्िचयों को पढ़ने के लिए अपने गांव से दूर भेजने के लिए मानसिक रूप से कतई तैयार नहीं हैं। ऐसी स्िथति में उन्हें अपने गांव में ही शिक्षा की पूरी व्यवस्था मिल सके या ऐसी कोई व्यवस्था हो ताकि वे शिक्षा प्राप्त करने के लिए पड़ौस के एकदम गांव तक जायें, इस तरह की कोई व्यवस्था हो सके और स्कूल समय पर क़मोन्नत हो सकें, कयोंकि लड़कियों की जो इच्छा है, वे अपनी इच्छा के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर सकें, इसके लिए बहुत जरूरी है कि जहां वे रह रही हैं, वहां के स्कूल क़मोन्नत हों। इस संबंध में सरकारी बजट का उपयोग हो तो मेरे विचार में अधिक सार्थक होगा और वह वस्तुतः महिलाओं के हित में होगा।

  आज इस बजट की व्ृाद्धि से मुझे यह लगता है कि बजट बनाते समय माननीय वित्त मंत्री जी ने इस देश के महिला वर्ग के प्रति शायद कोई सोच नहीं रखी। इस समय ग्ृाहणियां जिस कदर परेशान हैं, जिस तरह हर चीज पर आठ प्रतिशत की व्ृाद्धि हुई है, चाहे चाय हो, दूध हो, घी हो, मकखन हो, पनीर हो, सब पर जो एकसाइज डयूटी लगा दी गई है, चाहे वह विदेश से आयातित कोई कम्पोनेंटस हों, कलपुर्जे हों, चाहे स्थानीय रोजमर्रा की उपयोग की चीजें हों, घर का घी, दूध, दही, पनीर जैसी चीजें, जिनसे ग्ृाहणियां घर चलाती हैं, वे ही जानती हैं कि कैसे अपने बच्चों को दूध मुहैया कराएंगी, कैसे वे अपने बच्चों को चुपड़ी हुई रोटी खिलाएंगी, किस तरह आये हुए अतथियों के सत्कार में चाय बनाने के लिए भी गरीब घर की ग्ृाहणियों को विचार करना पड़ेगा। नमकीन और मिठाई जैसी चीजें, जो हर अवसर पर काम में आती हैं, हर परिवार के काम में आती हैं, हर मौके पर काम में आती हैं, उन पर भी एकसाइज़ लगाकर जिस तरह से व्ृाद्धि कर दी गई है आठ प्रतिशत की तर्ज पर कि हर माल मिलेगा आठ आना, उसी तरह आठ गुना की दर से एकसाइज़ में जो व्ृाद्धि की गई है उसका भार आखिर तो स्वदेशी जनता पर ही पड़ने वाला है, स्वदेशी ग्ृाहणी की जेब पर ही १६ प्रतिशत के रूप में पड़ने वाला है। उस संभावना पर अगर माननीय वित्त मंत्री जी उदारतापूर्वक पुनर्िवचार करने की कृपा करें तो इस देश की ग्ृाहणियों के ऊपर और इस देश के गरीब नागरिकों के ऊपर उनकी बड़ी कृपा होगी। मैं चाहूंगी कि इस विषय में जो रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ काम में आते हैं, उनके बारे में विचार करने की जरूरत है।

  डाक सामग्री पर भी जिस तरह शुल्क बढ़ा दिया गया है, बजट में बढ़ोतरी हुई है, कहीं-कहीं डेढ़ गुना ब्ृाद्धि हुई है, इससे लोगों को हतोत्साहित किया जा रहा है। आजकल रेल के किरायों में व्ृाद्धि हो ही गई है और बसों का किराया भी काफी लगने लगा है, अब लोगों के पास, इस देश की जनता के पास यही विकल्प रहता है, यही सहारा रहता है कि चिट्ठी पत्री के द्वारा एक दूसरे के समाचार जान लें, एक दूसरे के दुख-दर्द में शरीक हो सकें। इस तरह की पोस्टेज में व्ृाद्धि गरीब लोगों को बहुत हतोत्साहित करेगी। अब उन्हें पोस्ट कार्ड लिखने के लिए, लिफाफा और अन्तर्देशीय लिखने के लिए भी सोचना पड़ेगा कि वे लिखें या न लिखें।

  अन्त में मैं यह कहना चाहूंगी कि जो इनके बजट का दूसरा नारा है, जय जवान, उसके मद्देनजर जो १४ प्रतिशत से कुछ अधिक की व्ृाद्धि राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर हुई है, मैं यह जानना चाहूंगी कि इस देश में दो माह पहले तक ऐसी कोई स्िथति नहीं दिखाई देती थी कि राष्ट्र को कोई खतरा है, किसी तरह की ऐसी कोई स्िथति नहीं हुई थी। यह स्िथति कहां से अचानक पैदा हुई? राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर हमने बड़ा अणु परीक्षण किया, उसके बाद हमने पड़ौसी देशों को चुनौतियां दीं, हमारे सत्ता पक्ष के माननीय सदस्यों, सरकार के मंत्रियों, ग्ृाह मंत्री जी, प्रधान मंत्री जी के वकतव्यों द्वारा पाकिस्तान को चुनौतियां दी गईं, उसे इस अंदाज में ललकारा गया कि-आ बैल मुझे मार। देश में एक माहौल गर्माया गया, ऐसा वातावरण बना दिया गया कि जैसे कभी भी युद्ध हो सकता है। युद्ध की संभावना से लोगों को डरा दिया गया। उसके बाद देश की सुरक्षा के नाम पर १४ प्रतिशत का जो इजाफा किया गया है, मैं कहना चाहती हूं कि यह देश की भूखी और प्यासी जनता के मुंह से जैसे निवाला छीना गया है।

  आज हमें इस देश में ही कई मोचर्ों पर युद्ध करना है-हमें बेरोजगारी से युद्ध करना है, हमें भ्रष्टाचार से युद्ध करना है। कहीं पीने के पानी की इतनी कठिनाई है, कई जगह तो फलोराइडयुकत पानी हम पी रहे हैं, जहरीला पानी पीने को विवश हैं। जिस देश में ऐसी स्िथति है कि पीने का पानी उपलब्ध हो रहा है, खाने के लिए रोटी नहीं मिल रही है, गरीब आदमी को रोजी नहीं मिल रही है, कोई रोजगार नहीं मिल रहा है और इतने मोचर्ों पर हमें जहां युद्ध करना है, अपनी ही समस्याओं से, साम्प्रदायिकता से, अपने आपसी कई तनावों से, जो इस समय विद्यमान हैं, बजट में राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर जो १४ प्रतिशत की हमने व्ृाद्धि की है, मैं यह कहना चाहती हूं कि हम राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर पीछे हटने वाले नहीं हैं। यह नहीं है कि हम इससे कोई समझौता करना चाहते हैं। इस देश की महिलाओं ने राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर पहले भी गहने दिये हैं और आगे भी देने के लिए तैयार हैं, लेकिन सुरक्षा के नाम पर युद्ध का वातावरण बनाया जाये, यह कदापि समीचीन नहीं है। इससे राजनैतिक दृष्िटकोण ही ज्यादा नजर आता है। मैं यह कहना चाहूंगी कि बजट के अलावा और कुछ चीजों में कटौती करके यदि धन बचाया जाये तो ज्यादा उपयुकत होगा। बेहतर होगा कि यदि हम पड़ौसी देशों से मैत्री के रास्ते तलाशें, युद्ध की संभावनाएं न तलाशें। हम मैत्री के रास्ते तलाशें, यह ग्लोबल विलेज का जमाना है, विश्व बन्धुत्व का जमाना है, इसलिए हम मैत्री के रास्ते तलाशें।

 

  दोस्ती के रास्ते खोजें तो ज्यादा उपयुकत होगा। अंत में मैं देश की समूची जनता की ओर से माननीय वित्त मंत्री से एक शेर के रुप में अपनी बात कहना चाहूंगी-

  वफा करो न करो, वफा की बात तो करो

  हमारे दर्द को देखो, दवा की बात करो।

  श्री मदन लाल खुराना: मैं माननीय सदस्यों को सूचित करना चाहता हूं कि साढ़े आठ बजे से रूम नम्बर ७० में सदस्यों के लिए और प्रैस के लिए डिनर की व्यवस्था उपलब्ध है। स्टाफ के लिए रूम नम्बर ७३ में व्यवस्था की गई है।

“>KUMARI MAMATA BANERJEE (CALCUTTA SOUTH): Mr. Chairman, Sir, I rise to support this Budget. I welcome the decision taken by the Finance Minister and especially the Government for intrucing the free education to the girl child up to the college level. Moreover, maximum funds are allocated to rural development, power sector and other sectors. Though I was not prepared to speak today because I was busy with other business, yet I have to speak as I heard that today we have to speak and tomorrow the Minister’s reply only will be there. That is why I will concentrate on particular subjects which are very necessary to be touched upon.

I support this Budget fully. Thanks to our Prime Minister Shri Atal Bihari Vajpayee, within three or four months after assuming charge, the Government has taken some concrete actions in certain areas. I do not want to disclose all these things because time is very short and our colleagues also want to speak. But I have to make some observations about this Budget.

Firstly, you will appreciate that unemployment is a great problem nowadays. It is increasing just like a cancer. That is why our National Agenda for Governance has laid stress on “Berozgari Hatao”. Of course, in this Budget, this Government has kept the option of providing jobs to two-lakh youth. For the last three or four years, because of the ban on recruitment, though there is a scope for providing five lakh jobs in the Government sector itself, the unemployed youth are not getting any opportunities even for applying for jobs. I would like to request the Government to do something in this direction. While the Government is taking so many concrete steps, I would request the Government to lift the ban on recruitment so that the unemployed youth can get employment. At present, in the Army also, there is a ban on recruitment, so also, in the communication sector and in other sectors. I have collected the information. If you can increase the employment potential in the Army, the North-Eastern people, the people of hill areas and others will benefit. If we have to strengthen our Army, we have to induct young people into the Army. They also want to dedicate their lives to the country. This is my first suggestion.

Secondly, I come to the Insurance sector. This is a very important area. I know that privatisation of this sector is the joint venture of the ex-Finance Minister Shri P. Chidambaram of the United Front Government and the present Minister Shri Yashwant Sinha. It is their aim to privatise the public sector and the insurance sector. May I submit to you one thing? You will appreciate that in the GIC, LIC and the other insurance companies, common people keep their money. Even some companies, house-wives, the rickshaw-pullers etc. depend on the insurance companies because they think that these companies are protective places for them to invest.

You talked about Samadhan, Saral, Samman. I welcome those things. But can you not give Vishesh Samman to the common people of this country? I am telling you this because I have seen them with my own eyes. There are so many investment companies. They just come, take the money from the people, throw them out and thus cheat the people of their funds. There is no guarantee. There is no security of the Government. There must be control on the insurance companies. I am supporting this Budget but I am talking whatever I have heard from the people. If you allow privatisation, then people will be scared to keep their money in these companies. That is why, instead of taking a decision immediately, can you not set up an expert Committee? Can you not take up this matter with the experts also? You can involve common people also. You can have one person from among the farmers, one from among the workers, and one from the other side also who can deliver the goods and then decide about this thing. I think, it will be better if you can give a thought on this matter.

Regarding the PSUs, I know there are some public and private sector units in which some people are mis-utilising these units. This is not a fact that these public sectors are facing acute crisis day by day because of the negligence on the part of the Government or the financial institutions. Now you have set up the BIFR. Do you know, how the BIFR is functioning? I know, there was a proposal to have an alternative instead of the BIFR having authority so that some of the industries can survive. I know right from the inception of the BIFR in 1987, that no financial authority is there with the BIFR. Cases are pending and pending and ultimately it recommends closing down of a unit. Closing down will not solve the problem. I know about the paucity of funds with the Government. We have to encourage the spirit of Swadeshi like anything. Therefore, the need of the hour is to close down some of the units instead of going in for disinvestment by the Government. My appeal to you is not to take it otherwise because the maximum number of industries are there in the Eastern part like MAMC, Hindustan Fertilizer Corporation, Wagon Industry, Metal Box, Burn & Standard and so on. We are proud of public sectors. But if you allow this disinvestment, ultimately it will go in favour of the multinationals because both private and public sectors will then have to compete with the multinationals. I know the Government is willing to give oxygen to the private and public sector units. I think, instead of taking a decision on this insurance sector, the Government can set up a Joint Parliamentary Committee or a Task Force so that instead of taking a decision on closing down these units or allowing disinvestment, a decision can be taken formally by all parties. We want this. Let all political parties set up a Committee and give them a time bound programme within three months or within six months. Let them give an opinion and then you decide. I am telling you this because I know due to paucity of funds you will not be able to control all those things. But please remember, crores and crores of people are involved in these sectors.

But please remember that crores and crores of people are involved in these two sectors. Whatever I am saying, I am supporting this Budget. I say, Mr. Finance Minister, you have got good areas. If you want, I can tell all this in details also. But I do not want to waste the precious time of the House. These two sectors are very important sectors. Take for example, jute sector. Can you ignore jute sector? No. Jute is swadeshi. You have to encourage jute. Similarly, NTC mills. You know about the NTC mills. They are there in Maharashtra, Gujarat, Tamil Nadu, Karnataka, Kerala, Bihar and West Bengal. Crores of people are involved in this industry. But the fact is that they are not getting even their salaries and dues. So, instead of closing down these units, you please set up an all-party Joint Parliamentary Committee to take a decision in this regard. Do not take their fate in your hands, because you are doing so many good works. Only for a particular point, why should this Government take all sorts of responsibility? Let the Parliament decide about it. Let all the political parties decide about it. So, please give vishesh samman on this particular area.

 

Now, I come to the North-Eastern Region. Of course, every time, the Government gives money for that region. But the problem is that this money is not reaching them properly and it is not being even utilised properly.

SHRI BHUBANESWAR KALITA (GUWAHATI): Only promises are being made. Thousands of crores of rupees are announced but nothing is implemented.

SHRI SATYA PAL JAIN (CHANDIGARH): That is what your Government was doing… (Interruptions)

SHRI BHUBANESWAR KALITA : Is it necessary that on everything you should comment? You should not comment like this… (Interruptions)

KUMARI MAMATA BANERJEE : We have to look after the North-East. They have got some insurgency problem and other problems also. So, the Government should treat the entire North-East as a child. This time, I must congratulate the hon. Finance Minister because Sikkim has also been included there. Earlier, it was Seven-Sister State and now, it has become a State with seven sisters and one brother, the brother being Sikkim. That is good. It is all because of the hon. Finance Minister. We will also make him take his promises.

Now, I come to the headquarters of the financial institutions. Some financial institutions are situated in Mumbai. Some are situated in Calcutta. Some are situated in Bihar. Some are situated in Kerala or Tamil Nadu or Madhya Pradesh. They are there in all parts of the country. My point is, do not try to withdraw those headquarters of the financial institutions. The status quo should be maintained. Why am I telling this? Similar is the case about Bengal. Sir, Bengal is the gateway of North-Eastern region. At the same time, Bangal is the gateway of Eastern region also. Bengal does not combine only Bengal, but it combines Orissa and eight other States.

  सभापति महोदय : आप कन्कलयुड कीजिए। बहुत माननीय सदस्यों ने बोलना है।

  कुमारी ममता बनर्जी : अब तो हम आपके बारे में बात कर रहा है।

MR. CHAIRMAN: Please conclude, now.

KUMARI MAMATA BANERJEE : My request is that please do not shift these headquarters. What have I heard about the State Bank of India? The Government is proposing to withdraw all the headquarters of the SBI, Coal India and Eastern Bank from Calcutta. I have already stated this in the Bengal Package. हमारा हैड नहीं रहेगा, खाली पांव रहेगा, तो काम नहीं चलेगा, लेकिन हमें काम चाहिए।

This is for your information. You may correct me, if I am wrong. So, again I am requesting that the status quo should be maintained. No State should feel that it is being deprived of.

Now, I come to the rural economy. Of course, the Government provides money but this money is not being properly utilised. Why is the Government not asking for production of Utilisation Certificate? Even in the MP Funds programme, we have seen that they are not being utilised properly. You are sending the money but they are not utilising it. While giving the money, the Government has the responsibility to monitor whether it is being utilised for the purpose or it is being utilised politically. You have to see to it. About my State, the Central Government has given crores of rupees. But where is that money? For Jawahar Rozgar Yojna, IRDP, NREP, RLEGP, etc., where is the money? No money is there. I do not know how this money has been spent. It is being mishandled. About the PL Account Scam, everybody is aware. I want full investigation to be done about it. What does the audit report say? Mr. Finance Minister, when you reply, please let us know the position of the Audit Report of the CAG about the West Bengal financial situation. We want thorough investigation in this matter. Thousands of crores of rupees are involved here and this is a very big scam. It is my demand that you should take stern action on it.

That is also my demand. We should not see this as a special case.

  सभापति महोदय :अब आप कन्कल्युड कीजिए।

  कुमारी ममता बनर्जी :अब हम बिहार के बारे में बोलता है। आप गांवों के लिए चिल्लाता है, हम

PLA यानि प्याला के लिए चिल्लाता है।

  सभापति महोदय : बहुत से माननीय सदस्यों ने बोलना है।

KUMARI MAMATA BANERJEE :Regarding PL Account, you must have received the Audit Report. We want investigation into it. Regarding foreign tours also, time and again Ministers, including the Chief Minister, are going abroad. Who are spending money for their board and lodging? Instead of FERA you have started FEMA. So, FEMA should be famous for this. अगर कोई छुपाकर रुपया रखने के लिए स्िवटजरलैंड गया है और

NRI लेने के लिए जाता है, इन्डस्टि्रयलिस्ट लेने के लिए जाता है, तो काम नहीं होता है।

I know that the Chief Minister of my State has gone abroad more than a hundred times. I have got the reply given in the State Assembly. Our MLA had asked as to what was the expenditure involved in all these tours. They said Rs.2 lakh and odd. While in foreign countries, they do not eat, they do not stay anywhere; they just move in the sky. That is the situation. That is why I want an investigation into this matter also.

Regarding BIFR you have to do something. It is actually Board for Industrial Reconstruction; but now it has become “Board for Industrial Closing Down”. The BIFR is not delivering the goods. It was the Government proposal to set up an alternative body, so that some important sick industries in the public sector or private sector can be revived. Therefore, the Government has to take an immediate decision with regard to BIFR.

Regarding modernisation of IISCO, it is lying pending in the BIFR. IISCO is a potential unit in the eastern region. BIFR does not have anything for themselves; how will they revive others? That is why I think there must be some alternative.

Regarding price rise, you have the Essential Commodities Act. In every State you have the Essential Commodities Act. But have you asked any State Government at any point of time about this? I asked about it so many times in this House. Why is the Central Government not asking the State Government to apply this Act against hoarders and blackmarketeers. No. They do not apply this Act. That is why prices are going high. You should ask the price of potatoes in the market at least in my State. In the recent Panchayat elections they were saying that because of Mamata Banerjee and the BJP Government the price of potato has gone up. ममता के नाम से आलू नहीं है, पोटैटो नहीं है,

  लेकिन ज्योति बसु के नाम से हैं। हमारे यहां दो किस्म का आलू होता है – एक चन्द्रमुखी और दूसरी ज्योति के नाम से है। मुझे इस बात को वहां जाकर कहना पड़ा।

SHRI RUPCHAND PAL (HOOGLY): When an hon. Member is speaking on the Budget, whether he or she is going into the provisions of the Budget or not is a different matter. But some sort of courtesy should be shown to people like the elected Chief Minister of West Bengal or for that matter of any other State. She is ridiculing him in a manner which is in bad taste, that too after she has got the reply from the people of West Bengal. Even after indulging in all sorts of canards that she is repeating here, she has just gone about showing how much bad taste she can have.

  सभापति महोदय : आप केवल बजट पर बोलिए।

  कुमारी ममता बनर्जी : मैं जो बात कहती हूं, दिल से कहती हूं। मैं सीखने के लिए नहीं जाती हूं। मेरा बैड-टेस्ट है या गुड टेस्ट है, यह कया इनसे सीखना पड़ेगा। इनका कया टेस्ट है, यह मुझे मालूम है। इसीलिए हम लोगों को जाकर बोलते हैं। … (व्यवधान)

  सभापति महोदय : अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

KUMARI MAMATA BANERJEE: I am speaking only about the needs of my State as well as other States. What wrong am I speaking? देखिए, अगर मेरी

  बात झूठ है, तो काट दीजिए। आप मेहरबानी करके पूछिए। हुगली से आलू आता है या नहीं और कया बंगाल दो प्रकार का आलू नहीं होता है। अगर मैं गलत बोलती हूं, तो बताइए।

  ममता बनर्जी जारी अगर हम ठीक नहीं बोल रहे हैं तो आप इसको इसमें से निकाल सकते हैं।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ½þ¨ÉÉ®úÒ iÉ®ú¡ò nùÉä +ɱÉÚ ½þÉäiÉä ½þèÆ- BEò EòÉ xÉÉ¨É VªÉÉäÊiÉ +ɱÉÚ ½þè +Éè®ú nùںɮúä EòÉ SÉxpù¨ÉÖJÉÒ +ɱÉÚ ½þè* ¨ÉèÆxÉä xÉÉ¨É xɽþÒÆ ÊnùªÉÉ*

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : कुफरी, सिंधरी आलू भी होता है।

KUMARI MAMATA BANERJEE : I am not mentioning the name of the Chief Minister of West Bengal because he is involved. (Interruptions)

  सभापति महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।

KUMARI MAMATA BANERJEE (CALCUTTA SOUTH): Why have I given this example? These are facts. I have not given the name; the name has been given by the people in the rural areas many many years ago. I am saying this because the prices are going upn sky high and the State Government is not implementing the Essential Commodities Act. Wherever the prices are going up sky high, the Central Government has to monitor them. Though it is a State subject, the Central Government has to monitor why the prices are going up sky high, which States are implementing the Essential Commodities Act and which are not. The Government has to take care of the interests of the people.

I hope, I will not be interrupted if I speak on urea. It is a matter relating to our farmers. My request to you is this. इसको नहीं बढ़ाना चाहिए। इन्हीं शब्दों के साथ प्राइवेट सैकटर वाले में और इंश्योरेंस वाले में मदद देने के लिए मंत्री जी से रिकवेस्ट करती हूं।

“> श्री सुशील कुमार शिंदे (शोलापुर): सभापति महोदय, धन्यवाद। वित्त मंत्री जी तो बड़े सरल हैं और वह देश की परस्िथति देख कर एक समाधान का बजट इस देश में देना चाहते हैं लेकिन उनकी सरकार ने उन्हें देश की जनता से सम्मान नहीं मिलने दिया है और इसलिए नहीं मिलने दिया है, जब बजट की तौयारियां होती हैं तो इसमें दो-तीन महीने लगते हैं और बजट देश को दिशा देने वाला होता है और वह किस तरह से देता है, हमारा देश लेफटिस्ट, राइटिस्ट विचार करने से जा रहा है या हमारा देश मिकसड इकोनोमी से जा रहा है। वैसे तो वित्त मंत्री जी बहुत होशियार हैं, अनुभवी हैं लेकिन इस सरकार ने उनको धोखा दे दिया है और ऐसा धोखा दे दिया है कि जब यह बजट बनाते हैं उस वकत कल कया इनफलेशन बढ़ेगा, कल हमें देश की बढ़ोतरी में कया व्ृाद्धि प्राप्त करनी है और कितनी एम्प्लायमेंट जेनरेट करनी है, यंग जेनरेशन को नौकरी देने के लिए, ऐसी चीजें ध्यान में रख कर बजट पेश करना पड़ता है लेकिन भारतीय जनता पार्टी की एक नीति अनुदान की है। इसलिए केवल प्रधान मंत्री जी और उनके सहयोगियों में यह विचार चल रहा था कि इस देश में परमाणु का परीक्षण किया जाए, लेकिन यह परीक्षण के बारे में मेरा दावा है कि वित्त मंत्री जी को कुछ नहीं बताया, यदि बताया होगा तो परमाणु परीक्षण करने से पहले दो-तीन घंटे पहले या आधे घंटे पहले बताया होगा, नहीं तो वित्त मंत्री जी इंटरनेशनल सिचुएशन और इंटरनेशनल मोनिटरिंग फंड की सिचुएशन जानते हैं। वर्लड बैंक की सिचुएशन जानते हैं। यदि यह आगे आने वाला है और हमारे ऊपर सैंकशन आने वाली है, कयोंकि उससे तो कोई बचा नहीं सकता है। अमेरिका का मेंडेटरी लॉ है, उसे कोई रोक नहीं सकता वह तो सैंकशन लगाने वाले ही हैं और सैंकशन लगाने के बाद इस देश में जो पूंजी है उस पर एक ऐसा दबाव आ जाएगा कि जो हमारे पास है उसमें ही देश चलाना होगा। ये धोखा उनको हो गया है और उसके लिए समाधान नहीं है। मैंने आपसे इसलिए अनएम्प्लायमेंट की बात की, पावर मनिस्टर ने यहां अनएम्प्लायमेंट के बारे में रिप्लाई दिया।

“The Government expect to achieve zero level employment by the year 2007. The Power Minister, Shri P.R. Kumaramangalam said in a reply that the Eighth Plan target fell short by 28 million jobs; the target was to generate 58 million jobs.”

  जब ५८ मलियन जॉब्स क़ियेट करनी है, रोजी देनी है, वित्त मंत्री जी को मालूम था कि १९९७-९८ में जो बजट एस्टीमेट था और जब उसका रिवाइज़ एस्टीमेट कर रहे थे, उनका डिपार्टमेंट कर रहा था तो उनको पता था कि इनफलेशन ५ प्रतिशत से ६.१ प्रतिशत तक जाने वाला है। फजिकल डेफसिट २.१ ले ३.१ पर जाने वाला है, यह इनको पता था और यह भी इनको पता था कि हमारी जो मुद्रास्फीति है यह १०-११ प्रतिशत के ऊपर चली जाएगी। मैं इस सदन को याद दिलाना चाहता हूं और थोड़ी सी मालुमात देना चाहता हूं। मैं १९९२ में चाइना गया था। चाइना में भी १९७२ से इकोनोमिक रिफार्म शुरु हो गए। मैं उस वकत कांग्रेस पार्टी का जनरल सैक़ट्री था और उस देश के प्रेसीडेंट को मैं अपने एक डेलीगेशन को लेकर मिला। उन्होंने एक सवाल पूछा, मैं १९९४ में भी गया था। उस समय उन्होंने पूछा कि आपका इकोनोमिक रिफार्म ९० से शुरु हो गया और आपने इतनी जल्दी इनफलेशन कैसे कंट्रोल किया, जब कि हमारा रिफार्म ७८ में डैंग के नेत्ृात्व में शुरु हो गया था और हम अभी तक इनफलेशन कंट्रोल नहीं कर पाए हैं। जैसे कि पूर्व वित्त मंत्री जी ने कहा कि जितनी इनवेस्टमेंट आ जाएगी उतनी ही व्ृाद्धि हो जाएगी, ग्रोथ रेट बढ़ जाएगी। इन्होंने कहा कि एकसपेंडीचर होने से हमारी व्ृाद्धि में बढ़ोतरी नहीं हो सकती, हमारे मंत्री जी एकसप्लेन करेंगे। जब मैं बजट को देख रहा था तो मुझे खुशी हो रही थी कि इनफ्रास्ट्रकचर सैस्टर में, जैसे कि एनर्जी, ट्रांसपोर्ट और कम्युनिकेशन में ३५ परसैंट बढ़ोतरी होगी, ऐसा आपने कहा। मुझे पता नहीं है १९९७-९८ में आपने ५२,६१२ करोड़ बताया है और १९९८-९९ में बजट एस्टीमेट ६१,१४६ करोड़ बताया है। यदि इसका केलकुलेशन करें, मुझे पता नहीं है कि आपने बजट एस्टीमेट का किया है या रिवाइज़ड एस्टीमेट से ३५ प्रतिशत किया है, यदि बजट एस्टीमेट से किया है तो ३५ प्रतिशत बढ़ोतरी नहीं होती है बल्िक १६.२ प्रतिशत बढ़ोतरी होती है। यदि आप रिप्लाई दे दें तो हमें खुशी हो जाएगी। … (व्यवधान)

  श्री यशवंत सिन्हा: रिवाइज़ड में किया है।

  श्री सुशील कुमार शिंदे : जो फिगर्स आ गए हैं तो वे बजट एस्टीमेट पर लगते हैं, उसी के लिए हम कहते हैं कि यदि इस तरह का बजट होगा तो उसमें भी अगर कुछ करेकशन करना हो तो कर लीजिए।

  इससे ज्यादा मैं नहीं बोलूंगा। प्लान-आउट-ले सरफेस ट्रांसपोर्ट में पैसा शूट-अप किया है – ऐसा उनका कहना है। पन्द्रह सौ करोड़ से सत्ताइस सौ करोड़ रुपये किया है, लेकिन बजट सुपोर्ट १५० करोड़ रुपये से ५० करोड़ रुपये ही ज्यादा किया है। इसके सिवाए मुझे नहीं लगता है कि आपने बजट में सपोर्ट किया है।

  सभापति महोदय, मैं मेजर इश्यू पर आना चाहता हूं। जो हमारी जवाहर लाल नेहरु रोजगार योजना है उसमें ३९०० करोड़ रुपये से आपने ४००० करोड़ रुपये किया, कितनी बढ़ोत्तरी की, १०० करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी की और यह एम्पलाएमेंट जेनरेशन का कार्यक़म है। इसमें सबसे ज्यादा किसान, गरीब लोग, अनपढ़ लोग, जिनको रोजगारी नहीं है, जो दसवीं कक्षा से नीचे की शिक्षा पाए हैं, जो एम्पलाएमेंट गारंटी स्कीम है, वैसे ही यह जवाहर लाल नेहरू रोजगार योजना है। जो लोग देहात में, कलस्टर में काम करते हैं, उनके लिए कितना बढ़ा है, केवल १०० करोड़। अध्यक्ष जी, मैं फिजीकल परफोर्मेंस के साथ टार्गेट बताना चाहता हूं। १९९२-९३ में टोटल फंड अवेलेबल था ३५९४.६३ करोड़ रुपये और फंड यूटिलाइज हुआ २७०९.५९ और प्रतिशत यूटिलाइजेशन कितना हो गया ७५.३८ प्रतिशत। १९९३-९४ में फंड अवेलेबल था ४९२३.०३ और यूटिलाइज हुआ ३८७८.७१ करोड़ रुपये। १९९४-९५ में टोटल फंड था ५४१८.२२ और यूटिलाइज ४२६८.३३ हुआ। यह दिसम्बर १९९६-९७ तक की फिगर्स हैं। टोटल फंड अवेलेबल है २२२१.४२, यूटिलाइज हुआ १०३३.२९ और ५१.८७ इसका प्रतिशत है। मैं अभी थोड़ा फजिकल परफोर्मेंस पर आना चाहता हूं। १९९९२ में टार्गेट था ७५३७.९५ और अचीवमेंट है ७८२१.०२। मैं मैनडेज बता रहा हूं कि इतने मैनडेज हमें मिले। इस हिसाब से परसेंटेज अचीवमेंट १०३.७६ है। सभापति जी, १९९५-९६ में १०४ प्रतिशत परफोर्मेंस है, इतना अच्छा परफोर्मेंस है और मैनडेज का अचीवमेंट ३८३५३ है, इससे हम बेरोजगारी नष्ट करते हैं, मैनडेज के जरिये हम बेरोजगारी नष्ट करते हैं। देहात के लिए जो प्रोग्राम है उसके लिए केवल १०० करोड़ रुपयों की बढ़ोत्तरी। पता नहीं इसका अर्थ कया है? लेकिन यदि इससे भी ज्यादा आप कुछ करना चाहते हैं या आपके दिल में है कि किस तरह से इनको आप पैसा देना चाहते हैं, वह मंत्री जी बताएं।

  सभापति जी, मैं पूछना चाहता हूं कि रूरल डैवलपमेंट के लिए फंड १० हजार करोड़ तक दिया है। हम सब लोग देहात से आते हैं, देहात के आदमी को इस लोकशाही का बढ़ोत्तरी का हम मार्ग बनाना चाहते हैं। भारत सरकार का कानून हो गया कि यहां के ग्राम तक पैसा जाना चाहिए। लेकिन यह पैसा जिला-परिषद, ग्राम पंचायत और ग्राम सभा तक नहीं पहुंचता है। इसकी मोनिटीरिंग की जरूरत है। मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे वित्त मंत्री जी इसको करेंगे। मैं वित्त मंत्री जी को किसानों के लिए क़ैडिट-कार्ड स्कीम पेश करने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं। यह आपने एक बहुत अच्छा कार्य किया है और अच्छे काम को अच्छा ही कहना चाहिए। आप भी राज्य सभा में थे और मैं भी राज्य सभा में था। यह कार्य आपने बहुत अच्छा किया है। सभापति जी, आप भी बिहार से आते हैं और बिहार किसानों का प्रांत है। वहां पर गरीब और पिछड़े वर्ग के लोग रहते हैं। वहां पर दलित और पिछड़ा वर्ग काफी बड़ा है। वहां गरीबों के पास जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। इसके करने के कारण आपको बिहार, यू.पी. और महाराष्ट्र के किसान धन्यवाद देंगे। वैको साहब चले गये हैं, तामिलनाडु के किसान भी आपको धन्यवाद देंगे। मैं बड़े लोगों की बात नहीं कर रहा हूं, मैं किसानों की बात कर रहा हूं।

  मैंने १९९३ में क़ैडिट-कार्ड के बारे में राज्य सभा में एक बिल पेश किया था। मुझे खुशी है कि हमारे यहां रबी और खरीफ के दो सीज़न होते हैं। उसमें हमारे किसानों को कोई लोन नहीं मिलता है। वह देश का मालिक है लेकिन बैंक उसकी क़ैडीबलिटी नहीं मानता है। वह जमानती मांगता है या सम्पत्ित को जमानत के तौर पर रखने पर उसको लोन देता है। आप कोई ऐसी स्कीम बनाएं कि एक लाख रुपये तक उसको जमानत देने की जरूरत न पड़े और अपने क़ैडिट-कार्ड पर ही वह लोन ले सके। मेरा जो विधेयक है, वह उसी तरह का विधेयक है। मैं अपने विधेयक की कॉपी देना चाहूंगा, कोई भी चाहे तो ले सकता है, मुझे कोई एतराज नहीं है। मेरा नाम आए या न आए, लेकिन १९९३ में मैंने यह बिल दे दिया था।

  किसान की बात जब हम करते हैं तो हमें दिल से करनी चाहिए और वह आपने की है और आप इसके लिए बधाई के पात्र हैं। आपकी सरकार तो बधाई की पात्र है ही, लेकिन आप वित्त मंत्री जी ज्यादा बधाई के पात्र हैं। वित्त मंत्री के दिल में अगर यह बात नहीं आती है तो यह काम नहीं हो सकता है। यह सरकार के ध्यान में आने वाली बात नहीं है। सरकार तो बड़े-बड़े अणु-परमाणुओं की बात करती है। अणु-परमाणु में हमारा गरीब किसान कहां मिलेगा? इसलिए किसान को ढूंढने का काम जो आपने किया है उसके लिए मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देता हूं।

  वित्त मंत्री जी, मैं एक बात और कहना चाहता हूं। हमारे देश के गरीब और अनपढ़ बच्चों के लिए मिड-डे-मील स्कीम नरसिंह राव जी ने चलाई थी। जो बच्चे गरीबी के कारण स्कूल छोड़ देते थे, उनके लिए यह स्कीम थी। सभापति जी, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से अपील करना चाहता हूं कि यह जो चाइल्ड लेबर हैं, इनका दुरूपयोग होता है, वह स्कूल नहीं जा पाते हैं, इसीलिए यह मिड-डे-मील स्कीम चलाई गयी थी जिससे उनको खाना मिले और उनके माता-पिता उनको स्कूल भेज दें। इसके लिए पिछले वर्ष १०७२ करोड़ का नियोजन था, अभी आपने १०९२ करोड़ का कर दिया है। आपने केवल २० करोड़ रुपये की व्ृाद्धि की है। यह गरीब बच्चों के उत्थान का एक अच्छा कार्यक़म है, इसमें और व्ृाद्धि करनी चाहिए।

  सभापति जी, मैं यह नहीं समझ पाया कि जो ब्लैक-बोर्ड स्कीम है, उसमें भी आपने केवल तीन करोड़ की व्ृाद्धि की है। पिछले वर्ष का नियोजन ३०१ करोड़ का था, आपने उसे ३०४ करोड़ कर दिया है। तीन करोड़ में आप कया कर पाएंगे, यह मैं नहीं समझ पाया हूं।

  पिछले वर्ष वैलफेयर मनिस्टरी में १३८९ करोड़ का बजट था।

  रिवाइज्ड एस्िटमेट ८०४ करोड़ है, शॉर्ट फॉल ६०० करोड़ है। वैलफेयर के बजट में कौन लोग आते हैं? मैं इस सरकार को इस बात के लिए दोष नहीं देना चाहूंगा। यह पिछली सरकार द्वारा की गई कार्यवाही है। हम बार-बार कहते हैं कि दलितों को न्याय नहीं मिलता है॥ वैलफेयर की स्कीम में स्कॉलरशिप की स्कीम है, एजुकेशन की स्कीम है, अनुसूचित जाति, जन जाति के कल्याण की स्कीम है, स्पैशल कम्पोनैंट की स्कीम और ट्राइबल सब-प्लान की स्कीम है। मुझे आज ही पायलट एसोसिएशन के एक सज्जन कह रहे थे कि इंडियन एयरलाइन्स और एअर इंडिया में ६० पायलटस का बैकलॉग है। आप शेडयूल्ड कास्टस और शेडयूल्ड ट्राइब्स के लोगों को नहीं लेते हैं। वैलफेयर स्कीम में इन लोगों को ट्रेनिग देने का प्रोग्राम है। वित्त मंत्री इस तरफ ध्यान दें। एक-दो हजार और चार-पांच हजार की जो स्कीम्स होती हैं, वे अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों के लिए होती हैं। आपने इन लोगों के लिए मुर्गी पालन की स्कीम चलायी है लेकिन आप इसके लिए उन्हें जगह नहीं देते हैं। मैं जब महाराष्ट्र में मंत्री था तो मैंने एक सुझाव दिया था कि कम्पोनैंट प्लान में एक-दो हजार या पांच-दस हजार की जो स्कीम्स हैं, उनको इकट्ठा किया जाए। अनुसूचित जाति के लोगों की कोआपरेटिव में एक स्पीनिंग मिल थी। हम चाहते थे कि इस देश के हर स्टेट में स्पीनिंग मिल या शूगर मिल हो जाए और उसमें कम्पोनैंट प्लान का पैसा लगे।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ¶ÉÉä±ÉÉ{ÉÖ®ú ¨ÉäÆ BEò º{ÉÒÊxÉÆMÉ Ê¨É±É EòÒ ºEòÒ¨É lÉÒ* ªÉ½þ BEºÉ{ÉÉä]õÇ +ÉìÊ®úªÉÆÊ]õb÷ ºEòÒ¨É ½þè +Éè®ú +SUôÒ SÉ±É ®ú½þÒ ½þè ±ÉäÊEòxÉ +É{ÉxÉä BEºÉÉ<VÉ ¨ÉäÆ BMVɨ¶ÉxÉ xɽþÒÆ ÊnùªÉÉ ½þè* b÷ɪɨÉÆb÷ Eòä BEºÉ{ÉÉä]õÇ Eòä ʱÉB BMVɨ¶ÉxÉ Ê¨É±ÉiÉÉ ½þè ±ÉäÊEòxÉ ªÉÉxÉÇ Eòä BEºÉ{ÉÉä]õÇ Eòä ʱÉB BMVɨ¶ÉxÉ xɽþÒÆ ÊnùªÉÉ VÉÉiÉÉ* ªÉ½þ Êb÷ºÉÊFòʨÉxÉä¶ÉxÉ xɽþÒÆ ½þÉäxÉÉ SÉÉʽþB* ¨ÉèÆ <xÉ Ê¨É±ÉÉäÆ Eòä ¤ÉÉ®úä ¨ÉäÆ <iÉxÉÉ ½þÒ Eò½þÚÆMÉÉ*

  चाहे शोलापुर हो, मुम्बई हो, कलकत्ता हो, वहां पर कॉटन मिलें बंद हो रही हैं। ऐसे में बेरोजगार मजदूर कहां जाएंगे? ऐसे बेरोजगार मजदूरों ने कोआपरेटिव के माध्यम से हैंडलूम और पावरलूम का बिजनस किया। उन्होंने दो-चार पावरलूम लेकर बिजनस शुरु किया। वे जेकॉर्ड की चादरें बनाते थे और टर्िकश टेरी टावल बनाते थे। वे मॉडवेट योजना में नहीं आती हैं लेकिन उन्हें कस्टम कलैकटर का सर्िटफिकेट लेना पड़ता है। शोलापुर के आदमी को पुणे और मुम्बई जाना पड़ता है। उसकी लमिट ३० हजार की है। वह लमिट ७५ हजार तक बढ़ाई जाए। कस्टम कलैकटर का सर्िटफिकेट लेने की बजाय आप दूसरा रास्ता निकालिए। वे कोई चोरी नहीं करना चाहते हैं। जिस को रोजी नहीं मिलती वह कोई तो काम करेगा। वह आप लोगों को बचा रहा है। हम तो डंडे लेकर बैठ जाते हैं। वह खूब काम करना चाहता है और स्वाभिमान से काम करना चाहता है। मैंने इस बारे में वित्त मंत्री को लिखा था। मैं उसकी कापी उन्हें देना चाहूंगा।

  प्लास्िटक के बर्तनों में बाल्टी हो या या टंबलर हो, ये सब गरीब लोग इस्तेमाल करते हैं। अभी उस पर ५-१० परसैंट टैकस लगता था लेकिन पौलिमर जो रॉ-मैटरियल है, उस पर इस बजट में २५ परसैंट टैकस लगाया गया है और फनिश गुडस पर पांच परसैंट टैकस लगाया गया है। एकसाइज डयूटी मिला कर आज यह स्िथति पैदा हो गई है कि वह टैकस ज्यादा हो गया है। यह टैकस आपने अभी तक नहीं बढ़ाया था।

  आज हम देख रहे हैं कि जर्मन सिलवर और स्टील पर १० परसैंट टैकस है। गरीबों के प्रयोग में आने वाले प्लास्िटक पर ३० परसैंट टैकस लगाया गया है। वित्त मंत्री ने रिसोर्स मोबिलाइजेशन के कुछ सुझाव दिए लेकिन मैं वित्त मंत्री से पूछना चाहता हूं कि वह अपने यहां अनुशासन लाना चाहते हैं या नहीं? मैं सोचता था कि इकोनमिक रिस्टि्रकशन्स आने के बाद आप जीरो बेस्ड टैकस लगाएंगे। जो व्यर्थ खर्चा हो रहा है, उसको भी रोकने की जरूरत है। वहां भी अनुशासन लाने की जरूरत है। आज सुबह एक साथी कह रहे थे कि तनख्वाह कम होने पर भी लोग आराम से रहते हैं। जब हमारा देश विशेष रूप में आगे बढ़ रहा है तो हमें इस क्षेत्र में कुछ अनुशासन लाना होगा। हम सब इस काम में आपके साथ हैं। हम देश की तरककी और उसके स्वाभिमान की रक्षा के लिए आपका साथ देने को तैयार हैं। जब तक आप अपने घर में अनुशासन नहीं लाएंगे तब तक देश की जनता भी इसको फॉलो नहीं करेगी और आपको अच्छी आंखों से नहीं देखेगी।

  यह बजट मुझे पहले दिन अच्छा लगा, लेकिन मैंने जब इसे विस्तार से देखा तो पाया कि आपने गरीबों के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया। मैं आशा करता हूं कि आप किसानों, दलितों, पिछड़े वगर्ों, अनुसूचित जातियों और जन जातियों की तरफ विशेष रूप से ध्यान देंगे।

  आपने यूरिया के दामों में बढ़ोत्तरी की। बाद में उसके दाम ५० पैसे कम किए। आप इसके प्राइस और कम करें। मैं पूर्ण आशा करता हूं कि आप किसानों को और सहूलियत देंगे। आपने एक परसैंट ट्रैकटर के टायर पर टैकस लगाया है। अगर किसान स्टील की पट्टी लगी बैलगाड़ी पर गन्ना लाद कर ले जाएगा तो रास्ते खराब होंगे, बैल को तकलीफ होगी और गाड़ी की स्पीड कम होगी। मैं विनती करूंगा कि टायर टयूब पर जो एक परसैंट टैकस लगाया गया है, उसको वापस लिया जाए। मैं सरकार से अपेक्षा रखता हूं कि वह और अनुशासन लाएगी। देहात में शादी में आने वाले लोगों पर गुलाब का पानी डाला जाता है। गुलाब का पानी डालने वाला यह बजट है। उसकी सुगन्ध न निकल जाए और पानी ही न रह जाए, इसका आप ध्यान रखें। आप देश को दिशा देने वाला काम करें।

  सभापति महोदय :बजट पर बोलने वाले माननीय सदस्यों की सूची में ६४ लोगों के और नाम हैं। माननीय सदस्य बजट पर रुचि ज्यादा ले रहे हैं और इस पर ज्यादा लोग बोलना चाहते हैं इसलिए हमने यह निश्चय किया है कि अगर वह अपना लखित भाषण सदन की मेज पर रख देंगे तो वह प्रोसडिंग्स का पार्ट माना जाएगा।

SHRI N.K. PREMCHANDRAN (QUILON): Sir, those Parties which have not been given an opportunity so far should be given sufficient time. … (Interruptions)

  श्री मदन लाल खुराना: सभापति महोदय, मेरा निवेदन यह है कि सभी सदस्य पांच-पांच मिनट बोल लें

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) +É{É ¨Éä®úÒ ¤ÉÉiÉ iÉÉä ºÉÖÊxɪÉä, +MÉ®ú =ºÉ¨ÉäÆ EòÉä<Ç +¨ÉäÆb÷¨ÉäÆ]õ Eò®úxÉÉ ½þÉä iÉÉä ¤ÉiÉÉ<ªÉä

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

PROF. SAIFUDDIN SOZ (BARAMULLA): Each Member should be allowed to speak for five minutes. … (Interruptions)

  श्री मदन लाल खुराना : जैसे अभी एक सदस्य २५ मिनट बोले, अगर सभी मैम्बर इसी तरह से बोलेंगे तो ६४ माननीय सदस्य तो कल रात तक भी खत्म नहीं होंगे। अगर सभी प्वाइंट बोलेंगे

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

SHRI VAIKO (SIVAKASI): If only five minutes’ time is allowed, what is the point in our speaking here. … (Interruptions)

  श्री मदन लाल खुराना : सभापति महोदय, यह आप तय करें कि एक माननीय सदस्य कितने मिनट बोलेंगे। दस, साढ़े दस या ग्यारह बजे जो भी आप तय करें, उसमें दो-तीन मैम्बर्स इधर से और दो-तीन मैम्बर्स उधर से बोल लें। अगले एक घंटे में इस तरह आठ से दस लोग एडजस्ट हो सकते हैं। उसके बाद जैसा कहा गया कि आप लखित स्पीच कल सुबह १२ बजे तक ले कर दें, यह सुझाव मान लिया जाए।

  डा. शकील अहमद (मधुबनी) : अगर ऐसा है तो यहां आने की कया आवश्यकता थी, हम लोग घर पर ही रहते

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री मदन लाल खुराना : आप लोग रात भर बैठिये।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  प्रो.जोगेन्द्र कवाडे (चिमूर) : सभापति महोदय, हर पार्टी का एक प्रतनधि बोलना चाहिए

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री मोतीलाल वोरा (राजनांदगांव): सभापति महोदय, खुराना जी ने रिटन स्पीच का जो सुझाव दिया है

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  एक माननीय सदस्य: सभापति महोदय, कया तय हुआ?

  सभापति महोदय : हर पार्टी ने अपने सदस्यों के नाम दिये हुए हैं। पार्टी की सूची लम्बी है। इसमें ६४ व्यकितयों के नाम हैं।

21.14 hrs (Dr. Laxminarayan Pandey in the Chair)

“>*SHRI GINGEE N. RAMACHANDRAN (TINDIVANAM) : Mr. Chairman, at the outset let me heartily thank the electorate of my Tindivanam Parliamentary constituency who have elected me to be their representative and also the General Secretary of our Marumalarchi Dravida Munnetra Kazhagam (MDMK) Puratchi Puyal (Revolutionary Storm) Vaiko who had nominated me to be a victorious candidate from Tindivanam constituency.

Let me welcome the Union Budget for the year 1997-98 presented in this august House by this coalition Government led by the Bharatiya Janata Party. I would like to congratulate the Hon’ble Finance Minister Shri Yashwant Sinha on behalf of Marumalarchi Dravida Munnetra Kazhagam for having presented a very good Budget despite several hardships our economy is passing through at this juncture. At a time when several problems are staring at us and our economy in the form of unemployment, poverty, illiteracy, problems faced by the agricultural sector, inability to provide basic needs and inadequate basic amenities, a viable and good Budget has been prepared by our finance Minister and I would like to record my appreciation and that of my party.

I hail from a rural background. I understand the problems faced by the villiage communities better. More particularly I know the problems the farmers have to undergo in our rural areas. I welcome the kind gesture made by the Hon. Finance Minister in increasing the budgetary allocation for the agro and rural sector by about 50%. But at the same time the urea price was increased by Re. 1/- per kilo. It has been reduced by 50 paise. You have made an announcement in this regard. Agriculture is the backbone of the this country. We must come forward to redress the grievances and solve the problems faced by the poor farmers. We must attend to their needs and encourage them through incentives to augment agricultural production. Hence I would like to urge upon the Finance Minister to consider withdrawing the 50 paise hike too. The intended hike in urea price may be rescinded totally.

The problems faced by the farmers are one too many. Many of our farmers are often worst hit by natural calamities and disasters. You have identified 26 districts which are found to be prone to natural calamities and disasters like cyclone, floods, heavy rains and drought conditions. An amount of Rs. 100 crores have been earmarked for crop insurance in these districts. I feel it is still inadequate and hence you may increase the allocation to Rs. 500 crores. In a vast country like ours the amount you have apportioned is less and it needs to be enhanced.

I come from Tamil Nadu’s Villuppuram-Cuddalore districts which are prone to nature’s fury. Hence I request you to extend your crop insurance scheme further and I want you to include our districts also.

At the same time I want to impress upon the Government to come out with its agricultural policy. While determining the remunerative prices or levy prices, it would be better to involve those who are involved in agricultural production. As far as paddy and sugar is concerned a suitable and satisfactory remunerative price could not be evolved or introduced. when the Government are to draft the agricultural policy you may kindly consider to involve the agriculturists enabling the farmers to have a say in determining the prices. Particularly in Tamil Nadu, paddy price has come down drastically. Sugarcane is also not getting adequately matching procurement price. You may ensure that paddy fetches Rs. 600 and sugarcane gets Rs. 1000 per tonne.

You have introduced a welcome scheme called ‘Farmer’s Credit Card system’. I welcome that scheme that allows farmers to get loans from the banks to go in for fertilisers, Resticides etc. the inputs required for cultivation. This scheme must be extended to farmers living in areas prone to natural disasters.

As far as irrigation is concerned, you have allocated Rs. 677 crores. I am afraid it is not sufficient. There are several areas in Tamil Nadu which require to have the irrigation facilities augmented. The west-flowing rivers have got to be diverted from flowing wastefully into the sea. If the west-flowing rivers of Kerala are directed to flow towards the east the southern districts of Tamil Nadu would be greatly benefitted. Both the Governments of Kerala and Tamil Nadu may have talks and then with the active participation of the Centre such irrigation schemes could be implemented. Those viable projects could also facilitate hydel power generation. There is a need to improve the reservoir height og Mullai-Periyar Dam. More water flowing away from that area could be thereby stored. This would enable irrigation to improve further.

Likewise in Dharamapuri District, a project across river Cauvery in Hoganekal is pending for long. A dam that could come up there would solve both irrigation and drinking water problems faced by several villages over there. I urge upon the Union Government to attend to such long pending irrigation schemes. It is significant that a sum of about Rs. 3000 crores have been earmarked for providing basic minimum needs to the rural people. It is a welcome move. IRDP, RLEGP, Jevan Dhara, Indira Vikas Yojana, Jawahar Rozgar Yojana are the programmes and schemes meant for the upliftment of rural poor and several thousand crores of rupees have been earmarked for the same. All these schemes for which thousands of crores of rupees are spent are being implemented through the State Government. there should be a monitoring mechanism to ensure that these allocated funds are spent only on those schemes for which they are meant. About 80% of the funds for these various schemes are provided by the Union Government to State Governments. But what happens in the States ? They do not publicise that the funds were provided by the Central Government. Only those identified and recommended by the local MLAs become the beneficiaries of these various schemes. The identification of areas for implementation and the beneficiaries of these rural poverty alleviation programmes are decided by those local MLAs. Common people are misled to believe that such schemes are implemented by the respective State Governments. They do not mention the name of central Government though money flows from the Centre. Does this not amount to misleading the people? Hence I request the Union Government to ensure that MPs are involved in such committees that would consider and decide on various programmes at the local level. MPs should be invited to such meetings that would deliberate about the implementation of these Centrally sponsored schemes. In this regard, a directive should go to the State Governments from the Centre. I urge upon the Union Government to attend to this at the earliest.

Tindivanam constituency is a most backward area. There are no industrial units. It is industrially backward in area. As far as for Tamil Nadu is concerned, several rich mineral deposits that will go for several chemicals are there in our area. You have a vast potential to make use of them and to set up chemical industries in Marakkanam and Vanur areas. I urge upon the Union Government to evolve a policy to make use of the natural mineral resources in every State to the maximum. I wish the Government of India to industrialise the really backward areas in a big way.

 

It is pertinent to mention about the long pending Sethu Samudram project. It could be a viable project that would earn revenue and could save several crores of rupees benefitting both the Government of Tamil Nadu and the Government of India. I would like to appeal to this coalition Government led by the Bharatiya Janata Party that enjoys our support to implement this Sethu Samudram project. I appeal to you that you may considera and accept this proposal in toto. Several crores of rupees could be saved. Instead of taking a round-about-route off Sri Lanka, cargo vessels can take a short route via Rameswaram. If the Sethu strait is deepened and Rameswaram Port is improved we would be saving several crores of rupees. We would be earning foreign exchange through this viable short route to reach the By of Bengal and our eastern coast from the western ports. As far as Tamil Nadu Electricity Board is concerned, through the implementation of this project the money spent on imported coal shipping which shall be to the tune of about Rs. 10 crores every year.

I come from a backward area which would require attention in many possible ways. Ginjee Fort, an anciant archeological monument is there in my constituency. That Fort is now a preserved monement under the authority of Archeological Survey of India. It has been declared a tourist spot but adequate amenities to give a facelift are not there. In order to attract more tourists and thereby to promote this tourist spot appropriate facilities should be there. Now they are wanting in many respects. A winch can be erected to go to the Fort. The Akazhi that is the moat around the Fort needs to be dredged and joy-boat-ride facilities could be introduced there. Union Government may also provide the needed funds to carry out certain excavation work in the Fort and its surrounding area to dig out priceless ancient sculptures that are reported to be lying buried under the earth.

Our coalition Government has proposed to give thrust to the promotion of Swadeshi ventures. But what is happening now? There are about seven and a half-lakh people involved in the hand-made match industry which has been carried out as a cottage industry for many years now in the southern districts. Hand-made-matches-industry provides job to these seven and half lakhs of people of whom many are women. They are the worst hit due to a new budget proposal now. The proposed duty will be affecting them severely. Cottage industry especially hand made matches industry require kind gestures from the Government as they cannot compete with mechanised match work industry. In this regard, our MDMK Party’s General Secretary Vaiko met our Hon. finance Minister and impressed upon him the need to do way with the proposed duty hike that will drastically affect the hand made match industry workers. He has also suggested a viable revised duty structure for various categories of manufacturers. I urge upon the Hon. Finance Minister to consider this and make a positive announcement during your reply to this Budget discussion.

I would like to draw your attention particularly on to the plight of the people of hand-made-match-industry which has to be deemed to be in the cottage industry sector. The duty structure has been narrowed down detrimental to the interests of the cottage industry sector. I wish the amends can be made this way. the duty structure can be modified and revised on production basis. Duty ofr mechanised (WIMCO) with the existing production ceiling of 5,000 million boxes can be Rs. 7.20 per unit. Duty for semi mechanised with a production limit of 4,000 million sticks per year Rs. 6/- per unit. Duty for non-mechanised with a production above 1,000 million sticks Rs. 4/- per unit. Duty for semi mechanised with a production limit of 4,000 million sticks per year Rs. 6/- per unit. Duty for non-mechanised with a production above 1,000 million sticks Rs. 4/- per unit. duty for non-mechanised with a production limit of above 180 million but below 1,000 million sticks Rs. 3/- per unit. Duty for non-mechanised production of 180 million sticks per year in the cottage sector Re 1/- per unit. I wish these necessary amendments are made immediately. We must save this cottage industry and the people who depend on it. This will not hamper with Government’s revenue collection.

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

SHRI VAIKO (SIVAKASI) : Sir, it is his maiden speech. He will take only two or three minutes more.

SHRI GENGEE N. RAMACHANDRAN : Sir, this cottage industry is in doldrums. Mostly women in the southern districts are affected by this new levy of duty. At a time when the production is far beyond the demand, some industrialists have imported foreign machines worth several crores. The State Government has also recommended the closure of machine-made match industry units. But still they have started producing machine-made matches. They have simply applied CDB with the previous Government. This will affect around 7.5 lakhs of workers in the hand-made match industry. The 1952 Act that sought to give protection through regulation has been diluted by the previous Government.

This budget has also proposed to levy an 8% tax on butter and cheese. The proposal shall be rolled back and rescinded. Tamil Nadu Government has levied a tax of 8% and 4% on ghee and cancelled tax on butter. At the same time our Government is going for a tax on butter. I feel it is not a good proposal. Hence I urge upon the Government to withdraw this tax proposal to levy tax on butter. Because this is something connected with Swadeshi economy.

As far as spinning mills are concerned, 50% of the yarn are manufactured in Tamil Nadu. About a thousand small spinning mill units are in Tamil Nadu. There are about 30 lakh spindles. Cotton scarcity is also looming large over them causing concern giving rise to problems. Price rise is also hitting them hard.

MR. CHAIMAN Please conclude.

SHRI GINGEE N. RAMACHANDRAN : I also urge upon the Government to speedily implement the policy to provide jobs to the heirs of those who have parted with their lands when Neyveli Lignite Corporation acquired land for its mining activity.

It is significant that you have announced compulsory free education upto class V. I request you to raise it upto class X.

Steel re-rolling mills were given a facility to make delayed payments alongwith 18% penalty at any time. But this has been stopped all of a sudden. The mills are being asked to pay the taxes immediately that too with 100% penalty on tax arrears. I request the Government to look into this to ease the burden suddenly heaped on the steel re-rolling mills.

With this I conclude, thank you.

  सभापति महोदय : श्री एन.के प्रेमचन्द्रन।

  प्रो. अजित कुमार मेहता (समस्तीपुर) : सभापति महोदय, मेरा नाम कब पुकारेंगे। मैं बहुत देर से बैठा हूं। मेरा नाम तो बहुत पहले ही आ गया था, किन्तु माननीय महिला सदस्यों को पहले बोलने देने के कारण मैं नहीं बोल सका।

  सभापति महोदय : ठीक है मेहता जी, आपको भी बुलाऊंगा।

  प्रो. अजित कुमार मेहता : लेकिन कब, कया रात को १२ बजे बुलाएंगे।

  सभापति महोदय : ठीक है। प्रेमचन्द्रन जी, पहले मेहता जी को बोल लेने दें। प्रो. अजित कुमार मेहता।

“> प्रो. अजित कुमार मेहता: सभापति महोदय, मुझे अपने बोलने के लिए लड़ाई करनी पड़ी, इसके लिए मुझे बड़ा अफसोस है। बजट के सपोर्ट में जाना सरकार की बाध्यता है और विपक्ष का काम आलोचना करना है, लेकिन मैं अभी न आलोचना करूंगा और न समर्थन। मैं तो सिर्फ यह देखूंगा कि बजट के कया नतीजे निकले हैं। जैसे अंधे आदमी के खाने में घी डाल दिया जाए और कहा जाए कि तुम्हारे खाने में घी डाल दिया गया है, तो वह कहेगा कि जब तक गड़गड़ाएगा नहीं, हमें कैसे पता चलेगा। इसलिए जब तक इस बजट के परिणाम हमारे सामने नहीं आते हैं, तब तक हम कया आलोचना और समर्थन करें।

  उसकी आलोचना न करूं तो कया करूं। अभी आपने देखा कि १९ तारीख के बाद हमारे रुपए की कीमत घटनी शुरू हो गयी है। पिछले १० दिनों में जिस तरह से रुपए की कीमत घटी है उससे हमें यही लगता है कि हमारे रुपये की कीमत घटती जायेगी। उसका नतीजा यह होगा कि हमारा आर्िथक ढांचा चरमरा जायेगा। १९ मई को एक डालर ४० रुपए ५० पैसे में मिलता था और १० तारीख को ४२ रुपए २४ पैसे में मिलने लगा। मुझे आशंका है कि अगले कुछ दिनों में यह ४५ रुपया पार कर जायेगा और जब वह ५० रु. के नजदीक पहुंचेगा तो हमारा आर्िथक ढांचा बिल्कुल चरमरा जायेगा। हमें जो ऋण वापिस करना है, वह अधिक करना पड़ेगा, सूद अधिक वापिस करना पड़ेगा और मुझे शक है कि हमारी जितनी परियोजनायें चल रही हैं, वे सभी की सभी ठप्प हो जायेंगी। इससे जब हमारे यहां बेरोजगारी बढ़ेगी तो हम नये रोजगार कया पैदा करेंगे? हमारे पास रोजगार पैदा करने के जो साधन हैं, वे भी समाप्त हो जायेंगे।

  सभापति जी, हमारे यहां महंगाई तो बढ़ेगी ही। जब रुपए की कीमत घटेगी तो महंगाई बढ़ेगी। इसी प्रकार सर्वसाधारण के रोजमर्रा की वस्तुओं पर भी आपने आठ प्रतिशत उत्पाद शुल्क लगा दिया है। इससे भी महंगाई बढ़ेगी। ग्रामीण क्षेत्र में ऋण की सुविधाओं को उपलब्ध कराने के लिए बडी ऊंची योजनाओं की घोषणा की गई है परन्तु उनसे किसानों को ऋण उपलब्ध नहीं होगा। ऋण तभी उपलब्ध होगा जब उनको अपनी सभी चीजों पर मालिकाना हक मिल जायेगा। मैं अपने पूर्ववकता से बिल्कुल सहमत हूं जब उन्होंने कहा कि एक लाख रुपए तक के ऋण उनकी अपनी जमानत पर मिल जाये तभी किसानों का भला होगा। इसके लिए आवश्यक है कि भूमि सुधार करके मालिकाना हक किसानों को दिया जाये। परन्तु भूमि सुधार के लिए जो कानूनी बाधाएं उत्पन्न होती हैं, उससे इनको अलग कर दिया जाये जिससे कि भूमि सुधार राज्यों के लिए सुविधाजनक हो।

  सभापति जी, बजट में ९० हजार करोड़ रुपए यानी बजट का ५.६ प्रतिशत राजकोषीय घाटा दिखाया गया है, इसका साफ मतलब होगा कि यह घाटा नोट छापकर पूरा किया जायेगा। इससे मुद्रा स्फीति बढ़ेगी, रुपए की कीमत घटेगी और लोन प्राप्त होने की पूंजी कम होती जायेगी। इसी प्रकार अप्रत्यक्ष कर में ९० हजार करोड़ रुपए का घाटा दिखाकर सबके ऊपर यह बराबर बांट दिया गया है परन्तु प्रत्यक्ष कर में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। इसका साफ मतलब है कि गरीबों को ही इसमें ज्यादा पिसना पड़ेगा। आर्िथक विकास धीमा होने की वजह से मंदी का प्रव्ृात्ित बढ़ी है। लोगों की आय घटने से घरेलू उत्पाद की मांग में कमी आई है जिसका परिणाम मंदी के रूप में है। इसका मतलब यह है कि उत्पादन की जिनको जरूरत है उनके पास पैसा नहीं है, उनके पास कीमत अदा करने की ताकत नहीं है और जिनके पास पैसा है, उनको उस उत्पादन की उपलब्धता पहले से ही है। वे अधिकतर आयातित सामान जो कि लग्जरी होगा, उसकी उपलब्िध के लिए होहल्ला करेंगे।

  सभापति जी, सेवा कर का भी कोई प्रावधान नहीं है। पिछले बजट में जो उसका प्रावधान किया गया था, वह भी यहां नदारद है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  कयों समाप्त करूं? अभी मेरे पास समय है। इस बजट में बड़ी सिंचाई योजनाओं को पूरा करने के लिए कोई अच्छा प्रावधान नहीं है। अभी आपने सुना कि में हमारा बंगला देश के साथ पानी का समझौता हुआ था। लीन पीरियड में गंगा नदी में पानी बहुत कम हो जाता है जिससे समझौते के हिसाब से हमें १० दिन बिना पानी के ही रहना पड़ता है। ऐसी स्िथति में मेरा एक सुझाव यह है कि कोसी में बराह क्षेत्र में मल्टी

  परपज हाई डैम बनाकर पानी को जमा किया जाये और जो पानी बरसात में यूं ही गंगा में बह जाता है, उसे उपयोग में लाया जाए।

  मैं मानता हूं कि ग्रामीण विकास के लिए जो आबंटन दिया गया है, उसकी उपयोगिता नहीं होगी। उसका कोई लाभ नहीं होगा कयोंकि महंगाई बहुत बढ़े जाएगी और जो आबंटन बढ़ाया गया है, वह उसी में खप जायेगा। इसी प्रकार रक्षा बजट में १४ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है लेकिन जो परम्परागत हथियार हैं, उनकी कीमतें तब तक दुगुनी और तिगुनी हो चुकी होगी। इसलिए रक्षा बजट में १४ प्रतिशत की व्ृाद्धि हमारे ख्याल से काफी नहीं है। कृषि उत्पादन की दर में पिछले ११ वषर्ों में १०२ प्रतिशत वर्षा होने के बावजूद भी उत्पादन और विकास की दर में निरन्तर गिरावट आई है। इसको उलटने से हमें फायदा होता लेकिन सरकार ने इसका कोई प्रबन्ध नहीं किया है।

  आप जानते हैं कि कृषि का योगदान सकल उत्पाद में ८४ प्रतिशत है, फिर भी यूरिया की कीमत बढ़ा दी गयी है। इस पर हमें उतना एतराज नहीं है जितना एतराज इस बात पर है कि बढ़ी हुई कीमत में भी यूरिया किसानों को समय पर उपलब्ध नहीं होगा। अभी तक भी नहीं होता रहा है इसलिए मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि अगर यूरिया की कीमत बढ़ानी आवश्यक है तो आप बढ़ाइये लेकिन किसानों को इतनी गारंटी जरूर दीजिए कि यूरिया उन्हें समय पर उपलब्ध होगा। किसानों के लिए एक सुझाव और है। आप बजट में जो भी प्रावधान करते हैं उसका लाभ बिचौलिये को चला जाता है। उसके लिए किसानों को यह सुविधा मिले। उसके लिए आवश्यक है कि उनका उत्पादन ऐसी जगहों पर जाये जहां उसकी कीमत

  अधिक हो ताकि सीधा फायदा उन्हें मिले। अपने प्रदेश के लिए, अपने इलाके के लिए हमारा एक सुझाव है कि पटना को अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन बना दिया जाये जिससे उत्तर बिहार में हरी सब्जी का जो उत्पादन होता है, उसका निर्यात किया जा सके और पर्याप्त मात्रा में शीत भंडार ग्ृाह का निर्माण हो। वैसे दो-तीन शीत भंडार ग्ृाह का निर्माण हुआ है लेकिन वे काफी नहीं है।

  सभापति महोदय : आप समाप्त करिये।

  प्रो. अजित कुमार मेहता : उसका नतीजा यह हुआ कि पिछले साल आलू और प्याज की काफी उपज हुई लेकिन वह सड़कर बर्बाद हो गयी।

  सभापति महोदय : मेहता जी, अब आप समाप्त करिये।

  प्रो. अजित कुमार मेहता : मैं एक मिनट और लूंगा।

  सभापति महोदय : आपने स्वयं ही कहा था कि मैं बहुत संक्षेप में बोलने जा रहा हूं। अब कृपया समाप्त कीजिए।

  प्रो. अजित कुमार मेहता : हमारे यहां पहाड़ी इलाके में बागवानी को प्रोत्साहित करने के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। हमारा छोटा नागपुर का इलाका पहाड़ी है। वहां अगर बागवानी को प्रोत्साहन दिया जाये तो इससे वहां के किसानों को लाभ होगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  प्रो. मेहता – जारी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए हमने सारी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी है लेकिन उसके लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : कृपया समाप्त कीजिए। मैने आपसे पहले श्री प्रेमचंद्रन को बुलाया था, इसलिए अब मैं फिर उनको बुला रहा हूं।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

PROF. SAIFUDDIN SOZ (BARAMULLA): Sir, I raise a procedural point. First, how are you calling him before me?…(Interruptions)

SHRI N.K. PREMCHANDRAN: My Party is having five Members in this House…(Interruptions)

  सभापति महोदय : आप कृपया बैठिए।

I know that. I have called him. I am calling you also.

  प्रो. अजित कुमार मेहता : बजट में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए प्रावधान होना चाहिए।

  इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका धन्यवाद करता हूं और बजट का समर्थन न करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

  सभापति महोदय : मेरा माननीय सदस्यों से निवेदन है कि संक्षेप में भाषण करें ताकि अधिक से अधिक सदस्य बोल सकें। जैसा पार्िलयामैंट्री अफेअर्स मनिस्टर ने भी कहा है, कृपया उसका उपयोग कीजिए तभी हमारे देर तक बैठने का लाभ होगा।

“>SHRI N.K. PREMCHANDRAN (QUILON): Sir, I am the only speaker from my Party.

At the outset, I thank you for giving me the opportunity to express my views on behalf of my Party. I rise to oppose the Budget for the year 1998-99 presented by the hon. Finance Minister. This is the first Budget of the BJP-led Government. I would like to say that the main slogan of the BJP in the last election was a stable Government, able Prime Minister and good governance of this country. I would like to say that within a short span of two months, they themselves have proved that they are not able to provide stability, ability and good governance to this country. The latest example is the Budget and the Finance Bill which is commended to this House by the hon. Finance Minister.

In the Budget speech, he has announced that the petrol price hike will be by only one ruee. But on the same night, the Petroleum Ministry enhanced it up to rupees four and four point something. Even before starting the discussion on the Budget the price of urea has been decreased. What does it show? Is it good governance of the country? It is not. I would like to say that even the sanctity of the Budget and the Finance Bill is lost from the inception of the Budget, from the time of commending the Budget to this House. Hence I oppose the Budget.

 

I also oppose this Budget because it is lacking a proper direction and vision. This is also a continuation of the policy of globalisation pursued by the previous Governments. All those Governments pursued the policy of globalisation. But there is a slight difference in this Budget. It is having the mask of swadeshi. Just like that of the National Agenda for Governance of the BJP alliance, some issues are being hidden in the hidden agenda. When you remove the mask, you can really see the face of globalisation. That is seen in the Maruti Udyog Limited in the latest issue.

I would also like to say that it is very pertinent to note that for the last so many years when we were formulating the proposals, the people living below the poverty line were absolutely ignored. India is a country having 40 per cent of people who are living below the poverty line. The interest of the downtrodden masses of the country, the toiling masses of the country has not been taken into account in formulating the Budget. The Budgets all these years were oriented towards the big business houses and the corporate houses. That is followed in this Budget also. In this Budget, there is nothing new. Perhaps it may be the first Budget since Independence which does not have any new projects, proposals and schemes. What are the schemes which are enunciated? I do agree that there is an excess plan allocation. There is an increase in the total plan allocation. The Accelerated Irrigation Programme, the RIDF, the Swarna Jayanti Housing Scheme, the Kasturba Gandhi Shikshana Yojana, the Basic Minimum Service programmes etc. were there in the previous Budget also.

There is only an enhancement in the total Plan allocation of each and every subject. What is new in the Budget is the three ‘S’ of the hon. Finance Minister, Shri Yashwant Sinha, that is, Saral, Samman and Samadhan. There is nothing new in this Budget and hence I oppose it. As regards the present economic scenario which has already been enunciated here, we are very proud of saying that we have completed Eight Five Year Plans and 1997-98 was the last year of the Eighth Plan. In 1996-97, the economic growth was 7.5 per cent and in 1997-98, it had declined by one-third, that is, to five per cent. The drop in the GDP growth was mainly due to two reasons. One is the decline of agricultural and industrial production. My question is whether this Budget is able to cover these defects or deficiencies. The statistics or the figures which are shown in the Budget very clearly convince that this Government is not able to overcome the deficiencies in agricultural production and industrial growth also. The Budget anticipated a revenue receipt of Rs.1,76,900 crore, an expenditure of Rs.2,67,000 crore and a fiscal deficit of Rs.91,225 crore. This fiscal deficit would be overcome or will be reduced by direct taxes or indirect taxes also. The Finance Minister is anticipating Rs.5000 crore from the disinvestment of the public sector undertakings. According to me, the Finance Minister will fulfil his dreams about all these things if he is able to achieve all these targets. Then three per cent of the GDP will be the revenue deficit and 5.6 per cent will be the fiscal deficit. What does it show? I would like to say that these dreams are not going to be fulfilled. One reason for this is, last year’s total tax collection was Rs.14,736 crore. Now we anticipate a very low amount than the Budget estimates. We anticipate Rs.16,055 crore. That is the tax collection anticipated. It is not going to be fulfilled.

The second reason is disinvestment. The former Finance Ministers, Shri P. Chidambaram and Dr. Manmohan Singh tried their level best to disinvest the public sector undertakings. They could not succeed in that matter. Now, the Defence expenditure is Rs.41,200 crore. If these will be the circumstances, it will also enhance in future. Therefore, fiscal deficit would go beyond six per cent. The Finance Minister cannot restrict the fiscal deficit target upto 5.6 per cent.

I would conclude my speech with a very important point regarding disinvestment and privatisation. The resultant effect of these is inflation. There is no doubt about it. The fiscal deficit and all these things would result in high inflation and the country would go into a crisis as far as balance of payments is concerned. It has been discussed elaborately by eminent personalities.

Coming to disinvestment, I strongly oppose disinvestment and privatisation of the public sector undertakings. If these are the prides of our country and national assets of our country and if you kill our public sector undertakings, that is, the national assets, then you will be destructing the national assets. I would like to refer to one document and with that point, I would conclude my speech.

It is about National Conference and Annual Session of the Confederation of Indian Industry. What do they say about the public sector undertakings? I would quote from page 6: “Similarly, how do we ensure higher returns from the public sector units?” I would like to underline one sentence here, that is: “There is no need for privatisation as such.” They are not the words and sentences of the United Front or the Communist Parties. It is said like this.

“There is no need for privatisation as such. But nothing should hold back the much needed autonomy for the PSUs. There is need for bold initiatives for rejuvenating the PSUs and bringing out their best potential. It is time to act. They have much greater potential to generate savings and, needless to say, higher PSU savings would reduce the need for government borrowing.”

I would like to say that disinvestment as well as privatisation of our main industry, that is, insurance industry will adversely affect the economic situation in our country. It is adverse to the national interest. Therefore, the Government should withdraw and go back from these two proposals.

As far as unemployment is concerned, there is not even a single word about it except in the place of rural development, self-employment scheme and all these things. The Government has offered one crore of job opportunities in one year. It still remains a dream. Therefore, this Budget is lacking in direction and vision.

There are no innovative project schemes and proposals in order to rectify the decline in industrial and agricultural growth. It is not a growth-oriented Budget. On the other hand, it will result in high inflation. So, I strongly oppose this Budget. With these words, I conclude my speech.

  श्री चन्द्रशेखर साहू : बी.जे.पी. की तरफ भी आप थोड़ी मेहरबानी रखियेगा। … (व्यवधान)

“> श्री मनोरंजन भकत (अंडमान और निकोबार द्वीप समूह) : सभापति जी, मैं इस बजट के ऊपर चर्चा में

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) +É{É ¤ÉÉä±ÉxÉä nùÉä xÉ, +É{É ºÉ¨ÉªÉ EªÉÉäÆ JÉ®úÉ¤É Eò®ú ®ú½þä ½þèÆ* <ºÉ¨ÉäÆ Ê½þººÉÉ ±ÉäiÉä ½þÖB ¨ÉèÆ +É{ɺÉä ÊxÉ´ÉänùxÉ Eò®úxÉÉ SÉɽþiÉÉ ½þÚÆ ÊEò ¤É½þÖiÉ ºÉÉ®úÒ ¤ÉÉiÉäÆ ð{É®ú, ð{É®ú VÉÉä Eò½þÉ MɪÉÉ ½þè, =ºÉEòÉä ¨ÉèÆ nùÉä½þ®úÉxÉÉ xɽþÒÆ SÉɽþiÉÉ ½þÚÆ, EªÉÉäÆÊEò ºÉ¨ÉªÉ Eòä +¦ÉÉ´É Eòä EòÉ®úhÉ ¨ÉèÆ b÷ɪɮúèE]õ±ÉÒ 2-4 ¤ÉÉiÉÉäÆ Eòä >ð{É®ú Ê´ÉiiÉ ¨ÉÆjÉÒ VÉÒ EòÉ vªÉÉxÉ +ÉEò¹ÉÇhÉ Eò®úxÉÉ SÉɽþiÉÉ ½þÚÆ*

  उन्होंने इस बजट के अन्दर जो गिफट टैकस था, वह आपने रिपील कर दिया, विदड़ा कर दिया और गिफट लेने वाला जो रिसीवर है, उसको इन्कम टैकस के अन्दर टैकस का पेमेण्ट करना पड़ेगा। इतने दिनों तक इस देश में कुछ छूट रहा करती थी, जो माता-पिता हैं, उनको अपने बच्चों को, अपने परिवार के लोगों को गिफट देने में छूट रहा करती थी, आपने वन स्ट्रोक ऑफ पेन आपने उसको उठा लिया। इसके ऊपर आपको सोच विचार करना चाहिए और छूट देनी चाहिए।

  दूसरी बात इसके अन्दर जो आपने रखी है, कुछ नये एरिया के बारे में आपने इनीशिएट लेने की बात कही है, आपके बजट में जो सेल प्रोसीड का मैं बता रहा हूं कि आपने कया कहा है, जैसे ठ

purchase and sale of immovable property’.

  इसके अन्दर आपने किलयरली नहीं बताया। आपका यह जो प्रस्ताव है, यह तो सराहनीय है, हम इसको स्वीकार करते हैं, लेकिन इसको किलयरली आपको बताना चाहिए। देश में ४० फीसदी लोग दरिद्रता रेखा के नीचे हैं और उसके बाद हर आदमी जिसके पास एक, दो या चार एकड़ जमीन है, यदि वह अपने बच्चों की शादी के लिए, ब्याह के लिए रजिस्ट्रेशन करने के लिए जायेगा तो वह कहां से परमानेंट एकाउण्ट नम्बर लेकर जायेगा। जो इसकी डिटेल है वह आपने इसमें बताई है : ठ

high-value transaction’.

  इसका कलैरीफिकेशन होना चाहिए कि हाई वैल्यू कंजम्पशन का मतलब कया है। कौन सी बात है, कया बात आप करना चाहते हैं? इसके बाद ओपनिंग ऑफ न्यू बैंक एकाउण्ट के बारे में भी आपने बताया कि न्यू बैंक एकाउण्ट कोई गरीब आदमी, गांव का आदमी गांव में जाकर बैंक में १०० रुपये देकर एकाउण्ट खोलने जायेगा तो उस जगह वह किससे परमानेंट एकाउण्ट नम्बर लेने जायेगा? लेकिन आपके भाषण के अन्दर इसमें जो बात है, वह बहुत साफ नहीं है। इसके ऊपर आपको किलयरली बताना पड़ेगा।

  स्माल सेविंग्स के लिए जो प्रोत्साहन होना चाहिए, वह आपने नहीं दिया। इससे लगता है कि बैंकिंग सैकटर का जो बिजनेस है, उनके जो डिपाजिटस हैं, उसको आप कम करना चाहते हैं, कया करना चाहते हैं, समझ में नहीं आता है। आपके उत्तर के समय आप इस बात का थोड़ा खुलासा करके बताएंगे तो अच्छा रहेगा। आज हमारी प्राइवेट पर आपको गौर से देखने की जरूरत है। खासकर जैसे कि नये-नये एरियाज़ हैं, रबर वुड का इस्तेमाल होता है, उसके ऊपर जो एकसाइज डयूटी है, उसके अन्दर छूट होनी चाहिए। इसके लिए इसके ऊपर थोड़ा ध्यान से अच्छा होगा।

  मैं एक दूसरी बात आपके सामने लाना चाहता हूं, जो आपके इस बजट के प्रस्ताव में नहीं है। वह यह है कि आपने तो स्वदेशी की बात कह दी, लेकिन आपका स्वदेश कौन सा है? स्वदेश की पूरी सीमा आप जानते होंगे, जरूर जानते होंगे, लेकिन अंडमान निकोबार आईलैंड जिस जगह है, वह यूनियन टैरीटरी है, केन्द्रशासित प्रदेश है, उसके बारे में आपके बजट में कुछ बात नहीं है। आपने नोर्थ ईस्टर्न रीजन के लिए कुछ बात कही है। मैं आपका समर्थन करता हूं, आपने अच्छी बात की है, कुछ पैकेज की बात रखी है और अगर वह इम्प्लीमेंट होगी तो बहुत अच्छी बात होगी। लेकिन जहां दूरदराज इलाके में इस प्रकार की जगह है, उस सारे एरिया की कया हालत है, इसके बारे में आपने कुछ जानकारी लेने की कोशिश नहीं की। अभी सिकयोरिटी की हालत ऐसी है, जिसमें रक्षा मंत्री ने एक कवश्चन के उत्तर में यह बताया है क

the details regarding the vessels and crew apprehended year-wise are indicated below:

  १९९५ में नम्बर ऑफ वैसल्स छह पोचर्स, नम्बर ऑफ क़ू ४८, १९९६ में १५ और १४०, १९९७ में ३९ और १५०, टिल मई १९९८ १२ और १५४ नम्बर ऑफ क़ू। इससे आप समझ सकते हैं कि नियमित रूप से वहां जो बाहर से पोचर्स में उन द्वीपों के अन्दर भिन्न-भिन्न देशों के लोग के आते हैं, उनकी रोकथाम करने के लिए नेवी की या डिफेंस प्रमसिस के लिए बात नहीं है, इसके लिए अण्डमान निकोबार प्रशासन ने मैरीन पुलिस फोर्स का प्रावधान करने के लिए प्रस्ताव भेजा है। तीन साल से वह प्रस्ताव घूम रहा है और आज तक उसके ऊपर कोई निर्णय नहीं हुआ। यह ऐसा मसला है, जिसमें देश की सुरक्षा की बात है। इसके ऊपर आपको ध्यान देना होगा।

  हमारे यहां के जो सरकारी कर्मचारी हैं, आपने फिफथ पे कमीशन का जो इम्प्लीमेंटेशन शुरू किया है, लेकिन जहां तक अंडमान निकोबार आईलैंड है, उसमें

The Fifth Pay Commission has recommended that this grant of special compensatory allowance for our employees be paid at double the existing rates. Further, this has also been approved by the Ministry of Finance, Department of expenditure by a Resolution dated 30th September, 1997.

  लेकिन अभी तक उसके ऊपर कोई नोटफिकेशन नहीं निकला, उसके लिए आज तक वहां एम्पलाइज एजीटेट कर रहे हैं। मैं समझता हूं कि यह तो कुछ ऐसा मसला है जो मसला आपके थोड़ा सा ध्यान देने से और थोड़ी सी यूनियन टैरीटरी के ऊपर बात कहने से उसका कुछ हो सकता है। अभी जैसे हमारे एक कैम्बल निकोबार में एकदम भारत की आखिरी सीमा है, जो पर कोई दिशा नहीं है। निकोबार का वहां जो डिस्टि्रकट है, वह पूरा ही आदिवासी क्षेत्र है, उनके यहां कोई व्यवस्था नहीं है। पंचायती राज व्यवस्था भी उनके पास नहीं है। आज उनके ऊपर सिकस्थ शैडयूल के मुताबिक जो ऑटोनोमस कौंसिल बनाने के लिए भी मांग आती रही है, लेकिन उसकी कोई व्यवस्था नहीं हुई है। हम तो दूरदराज के इलाके के लोग हैं

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) ¨ÉèÆ VÉÉxÉiÉÉ ½þÚÆ, +É{É ¤É½þÖiÉ ¨É½þÉxÉÖ¦ÉÉ´É ½þèÆ*

  सभापति महोदय : मैं जानता हूं।

I have visited his place.

  श्री मनोरंजन भकत :इसीलिए मैं ज्यादा बात आपसे नहीं कहना चाहता हूं। वहां अनएम्पलायमेंट इतना है, वहां पी.एम.आर.वाई. का जब सिद्धान्त हो जाता है, लेकिन बैंक एक को एम्पलायमेंट करने के लिए तैयार नहीं है, लीड बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया है, कितनी ही बार बात करके, रिव्यू मीटिंग में बैठकर हमने पर्सनली एक-एक जगह बात की, लेकिन कोई सिद्धान्त नहीं होता। अगर दूरदराज इलाके में इस प्रकार की बात होगी, वहां के लोगों की भावना को नहीं देखा जायेगा, वहां जो एम्पलायमेंट प्राब्लम है, उसको नहीं देखा जायेगा, वहां आने-जाने की, आवागमन की जो असुविधा है, जो पर कोई सिद्धान्त तय नहीं हुआ। अभी पिछले दिनों में होम मनिस्टर के साथ हम लोगों ने मीटिंग की। उन्होंने भी इस बात को कहा है कि यह बात होनी चाहिए, लेकिन यह फाइनेंस विभाग के आफिसर भी उसके अन्दर मौजूद थे, मैं चाहता हूं कि ये जो दूरदराज के इलाके हैं, केन्द्र शासित इलाके हैं, इस प्रकार की छह टैरीटरी हैं, इनको देखना चाहिए।

  उनके लिँए भी आपका कोई चिंतन होना चाहिए। मैं यह भी चाहता हूं कि आपने उत्तर-पूर्वांचल के लिए जो भी पैकेज स्वीकार किया है, सकिकम को भी उसमें शामिल किया है, अगर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह जैसी पिछड़ी टैरिटरी को भी जोड़ दें तो इन सुविधाओं का फायदा हमारे लोगों को भी हो सकेगा। ऐसा करने में आपको कोई दिककत भी नहीं है। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि आप जब उत्तर देंगे तो इस पर भी ध्यान रखेंगे।

  आपने भर्ती पर से रोक हटा ली है। दो साल तक अगर पोस्ट नहीं भरी जाती है, तो वह पोस्ट एबोलिश हो जाती है। अभी तो काफी दिन तक बैन लगा हुआ था। इसको भी आप देखें, कयोंकि अगर ऐसा नहीं करेंगे तो हमारे क्षेत्र के लोगों को, जिनका दूर का इलाका है, सबसे ज्यादा दिककत का सामना करना होगा। आयरलैंड के लोगों के लिए अगर हम कुछ नहीं करेंगे तो इससे हमारी एम्प्लायमेंट पोटेंशलिटी खत्म हो जाएगी, हमारे नौजवान कहीं के नहीं रहेंगे। आपके समर्थकों ने आपका गुण गाया है, मैं उससे भी ज्यादा गाने के लिए तैयार हूं, अगर आप अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के लिए जो पोस्ट एबोलिश हुई हैं, उनको पुनर्जीवित करके भरने के निर्देश दे दें।

  दूसरी बात मैं भूमि सुधार के सम्बन्ध में निवेदन करना चाहता हूं। हमारा देश कृषि प्रधान देश है। जब तक इस देश में लैंड रिफार्म सही ढंग से नहीं होगा, जब तक किसानों को पट्टा नहीं मिलेगा, किसानों की साख को नहीं बचाएंगे, तब तक देश का बुनियादी ढांचा ठीक नहीं होगा। आपके बजट में फिस्कल डैफसिट, रेवेन्यू डैफसिट और अन्य डैफसिटों की बात कही गई है। इनको सही करने के लिए अब वकत आ गया है। केन्द्र सरकार को सभी राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय आर्िथक एजेंडा बनाना चाहिए। इससे देश को सहमति के रास्ते पर लाया जा सकता है। ऐसा करने की कोशिश करेंगे, तभी मौजूदा खराब आर्िथक हालत से देश बच सकता है। सभापति जी, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे समय दिया। वैसे कहने के लिए तो बहुत कुछ था, लेकिन समय कम था इसलिए संक्षेप में मैंने अपनी बात को यहां रखने का काम किया है।

PROF. SAIFUDDIN SOZ :Mr. Chairman, I want to seek a clarification.

  जो बड़ी पार्िटयां हैं, उनको जरूर बुलाएं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि उनके सारे लोग दूसरी पार्िटयों से पहले बोलें।

  सभापति महोदय : मैं आपको भी बुलाऊंगा। अभी मैं शिवराज सिंह चौहान को बुला रहा हूं।

  प्रो. सैफ़ुद्दीन सोज़ : कांग्रेस बड़ी पार्टी है उसके सारे लोग बोलेंगे। ठीक है मनोरंजन भकत जी सीनियर और इंटैलिजैंट आदमी हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि इनके सब लोगों को बुलाएं, आपको छोटी-छोटी पार्िटयों को भी बुलाना चाहिए।

You cannot measure all the time and then ask us to speak. This is not correct. This is unfair. I want the procedure to be set on scientific basis.

  श्री शैलेन्द्र कुमार (चैल) : माननीय सभापति महोदय, जैसा अभी संसदीय कार्य मंत्री जी ने कहा कि समय बहुत कम है और ६० लोग बोलने वाले हैं, डिबेट काफी देर तक चल सकती है इसलिए उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि जिन माननीय सदस्यों को अपनी स्पीच ले करनी है वे कर सकते हैं।

  सभापति महोदय: ठीक है आप सभा पटल पर अपनी स्पीच रख दें।

  श्री शैलेन्द्र कुमार : मैं लखितरूप से अपने सुझाव और विचार सदन के पटल पर रखता हूं। मेरे सुझाव और विचार सदन की कार्यवाही में नोट करते हुए स्वीकार किए जाएं।

“> लखित स्पीच श्री शिवराज सिंह चौहान (वदिशा): माननीय सभापति जी, माननीय वित्तम मंत्री जी ने जो बजट प्रस्तुत किया है मैं उसका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं।

SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): I am the next speaker. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Your name is in the list. Already two hon. Members have spoken from your party.

… (Interruptions)

SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : When am I going to be called? … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please take your seat. I have called Shri Chauhan.

… (Interruptions)

श्री शिवराज सिंह चौहान : वित्त मंत्री जी संवेदनशील हैं, कल्पनाशील मस्ितष्क के और दृढ़ संकल्प के धनी हैं। इसलिए इन परस्िथतियों में उन्होंने जो बजट प्रस्तुत किया है, उससे बेहतर कोई बजट नहीं हो सकता था। भले ही विरोध पक्ष वाले उसका विरोध करें, लेकिन व्यकितगतरूप से वे भी स्वीकार करते हैं कि इससे बेहतर बजट इन परस्िथतियों में नहीं हो सकता था। यह बजट अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का बजट है। यह बजट एक स्वाभिमानी और सम्पन्न भारत के निर्माण की दिशा में एक कदम है।

  भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां पर ७० फीसदी लोग खेती करते हैं या खेती पर आधारित कामों में मजदूरी करते हैं। हमने अपनी स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगांठ मनाई, लेकिन कृषि नीति नहीं बना सके। वित्त मंत्री जी ने कृषि नीति बनाने की बात कही है, उसका मैं स्वागत करता हूं। किसानों की हालत इस देश में वैसे भी अच्छी नहीं है। किसान कर्ज के साये में पैदा होता है, कर्ज से पलता है और कर्ज के बोझ तले ही मरता है। किसानों की स्िथति का विस्तार से वर्णन करने की जरूरत नहीं है, वह हम सब जानते हैं। मैं अपने क्षेत्र में अपनी जीप पर दौरा करने गया। लोग जीप देखकर इधर-उधर भागने लगे। मैंने सोचा कि पता नहीं कयों भाग रहे हैं। जब मैं जीप से उतरा तो उन्होंने कहा ति यह तो अपना सांसद है। मैंने कहा कि तुम लोग भाग कयों रहे थे, तो उन्होंने जवाब दिया कि हम यह समझें कि शायद बैंक वाले कर्जा वसूल करने के लिए आए हैं। यह स्िथति उनकी है।

  आज किसानों द्वारा आत्महत्या करने के प्रकरण भी हमारे सामने आए हैं। वित्त मंत्री जी ने जो बात कही है कि किसानों को ऐसी परस्िथतियों से बचाया जा सकता है, वह स्वागतयोग्य है। किसान के वश में ये परस्िथतियां नहीं हैं। कभी ओलाव्ृाष्िट हो जाती है, कभी बाढ़ आ जाती है, कभी अकाल पड़ जाता है, तो इसमें किसान का कोई दोष नहीं है। एक साल के लिए उसकी फसल नष्ट हो जाए तो उसके पांच साल बर्बाद हो जाते हैं। वह लिया हुआ कर्ज नहीं चुका सकता, खर्चा चलाने के लिए फिर ऋण लेना पड़ता है। इस कारण वह कर्ज के जाल में मजबूरी में ही फंसता है और फिर उबर नहीं पाता। कर्ज वापसी की संस्कृति में सुधार लाने के लिए वित्त मंत्री जी ने जो कहा है, मैं उसका स्वागत करता हूं।

  मैं इस बारे में दो सुझाव देना चाहता हूं। किसान ने अगर पांच हजार रुपये कर्ज लिए तो उसने दस हजार रुपये वापस कर दिए, अभी पांच हजार रुपये उस पर और बाकी रह जाते हैं। अगर वह पांच हजार रुपये कर्ज लेता है तो उससे १५ हजार रुपये वसूल किए जाते हैं। मेरा कहना है कि अगर उसने पांच हजार रुपये कर्ज लिया है तो उससे दस हजार रुपये से ज्यादा वसूल नहीं किए जाएं यानी दोगुने से ज्यादा वसूल नहीं किए जाएं। आपने प्रायौगिक तौर पर प्रभावी फसल बीमा योजना के बारे में कहा है। माननीय प्रधान मंत्री जी ने भी घोषणा की थी कि हम प्रभावी फसल बीमा योजना लागू करेंगे, तो उसको समस्त देश में लागू करना चाहिए। आपने किसानों को किसान क़ेडिट कार्ड देने की बात कही है, उसका मैं हृदय से स्वागत करता हूं। हमारे देश में ३७ प्रतिश कृषि योग्य सिंचित भूमि है। उसके बारे में भी आपने जो प्रावधान किया है, उसका मैं स्वागत करता हूं।

  इसी तरह से आपने दस्तकारी और कारीगरी के बारे में कहा है। आज से लगभग २० साल पहले गांवों में हमारे लोगों को कुम्हार का, बढ़ई का, लुहार का रोजगार मिलता था। ये जो छोटे-छोटे कुटीर और ग्रामीण उद्योग थे, धीरे-धीरे समाप्त हो गए। अगर हम ग्रामीण बेरोजगारी को दूर करना चाहते हैं तो इन ग्रामीण दस्तकारी को, कारीगरी को फिर से अमल में लाना होगा और उनको सामूहिक सहायता देने की स्कीम लागू करने की जो बात आपने कही है, मैं उसका हृदय से स्वागत करता हूं। मेरा अनुरोध है कि इसे और व्यापक किया जाए। वैसे तो ग्रामीण बेरोजगारी को दूर करने की अनेक योजनाएं हैं। इसमें आई.आर.डी.पी. जैसी योजना भी है, जिसके माध्यम से हम ग्रामीण बेरोजगारी को दूर करना चाहते हैं।

  लोगों को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाना चाहते हैं। लेकिन मैं वित्त मंत्री जी का ध्यान आकर्िषत करना चाहता हूं कि इन योजनाओं का कार्यान्वयन ठीक नहीं होता है। गरीब लोग

IRDP के तहत लोन लेने के लिए जाते हैं, लेकिन स्िथति यह है कि उनको पूरा ऋण नहीं मिलता है। योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार है। इम्पलीमेंटेशन ठीक नहीं होता है। मैं आपको बताना चाहता हूं, एक नौजवान को १२ हजार रुपए का ऋण स्वीकृत हुआ। मैंने उस नौजवान से कहा – १२ हजार का रूपए स्वीकृत हुआ है, तो अच्छा काम करना चाहिए। उसने कहा – १२ हजार मन्जूर हुआ, लेकिन मिला ६ हजार रूपए ही है। मैंने कहा – ६ हजार कयों मिला? उसने कहा – ६हजार बैंक वाले खा गए। मैने कहा – तुमको कहना चाहिए था कि १२ मन्जूर हुआ है, तो १२ मिलना चाहिए। उसने कहा – बैंक वाले कहते हैं, यह ले जाना है, तो ले जाओ, नहीं यह भी यहीं रख जाओ। फिर मैने सोचा भागते भूत की लंगोटी भली। मंत्री जी यह वास्तविकता है। भले ही बजट में आप कितनी ही राशि का प्रावधान कर दें, लेकिन ठीक कार्यान्वयन जमीन पर नहीं होगा, तो वास्तव में लाभ जिसको मिलना चाहिए, उसको नहीं मिलेगा। मेरा मंत्री जी से निवेदन है कि वे इस दिशा में उचित कदम उठायें।

  शिक्षा के बारे में ५८ प्रतिशत मंत्री जी ने बजट में व्ृाद्धि की है और यह स्वागत योग्य कदम है। हमारे देश में ३३-३४ प्रतिशत निरक्षर लोग हैं। आपने शिक्षा की दृष्िट से हमें आश्वस्त किया है कि धीरे-धीरे बजट में प्रावधान बढ़ाते जायेंगे और इसको ६ प्रतिशत तक ले जायेंगे। मैं इस व्यवस्ता का स्वागत करता हूं। महोदय, विशेष रूप से मंत्री जी ने एक राष्ट्रीय कोर बनाने की बात कही है। नौजवानों के मन में देशभकित की भावना है। उनमें ऊर्जा है और वे देश के लिए काम करना चाहते हैं। लेकिन उनके सामने कोई दिशा नहीं है। मुझे आशा है कि इस योजना के माध्यम से उन नौजवानों के अन्दर एक नई दिशा देने का प्रयास किया जाएगा।

  महोदय, पेयजल की समस्या को हमारे राष्ट्रीय एजेंडे में शामिल किया गया है कि पांच साल में हम हर गांव में शुद्ध पेयजल उपलब्ध करा देंगे। यह देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के पचास सालों के बाद भी हम देश के गांवों में और गांवों में ही नहीं बल्िक शहरों में भी पेयजल उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। मैं आपको बताना चाहता हूं, जब मैं अपने क्षेत्र का दौरा करने के लिए गया, तो लोगों ने मुझसे कहा कि हमारे गांव में लड़कों की शादी नहीं होती है। मैंने कहा – इसमें सांसद कया कर सकता है। उन्होंने कहा कि हमारे गांव में पाने का पानी नहीं मिलता है और पानी लेने के लिए तीन-चार किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, इसलिए आसपास के गांव के लोग अपनी लड़की की शादी यहां नहीं करते हैं। उन्हें यह लगता है कि पानी भर-भरकर हमारी लड़की मर जाएगी। यही वजह है कि हमारे लड़के कुवांरे रह जाते हैं। आप कोई ऐसी व्यवस्था करें जिससे उनका विवाह हो सके। मुझे विश्वास है, माननीय वित्त मंत्री जी नश्िचत रूप से पांस साल के अन्दर कार्यवाही कर नश्िचत रूप से शुद्ध पीने का पानी हर गांव में उपलब्ध करा सकेंगे।

  महोदय, आप घन्टी बजाकर मुझे अपना भाषण समाप्त करने के लिए कह रहे हैं और मैं माननीय सदस्यों की भावभंगिमा को भी समझ रहा हूं। उनकी भावनाओं का आदर करते हुए मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि आप जिस दृढ़ता के साथ यह बजट पेश किया है, मुझे विश्वास है कि पांच साल में आप इस देश का कायाकल्प करेंगे, देश की तस्वीर और तकदीर बदलने में हम आपके साथ खड़े हैं। धन्यवाद ।

  प्रो. सैफ़ुद्दीन सोज़ :महोदय, मुझे आपकी रूलिंग चाहिए। यह सही है क

CPI के बड़ी पार्टी है। मगर यह जरूरी नहीं है कि तीसरा आदमी भी उसी दल का बोले।

It is because you have to give a sense of participation to parties. I represent Jammu and Kashmir State.

MR. CHAIRMAN : I will allow you.

PROF. SAIFUDDIN SOZ : He can speak after that. You give time to CPI(M). You give enough time to Congress but why cannot give you us time that we deserie.

MR. CHAIRMAN: I am calling you after Shri Radhakrishnan.

PROF. SAIFUDDIN SOZ :This is the procedure that is being misrepresented. Suppose Congress Party has seven Members to speak, it is not necessary that all the seven will speak and then you will invite smaller parties. I have told you that I can finish within five minutes.

  मैं दरिया को कूंजे में बन्द कर सकता हूं।

I am very sorry because the seniority is not being considered. I will put this into the Business Advisory Committee. Mr. Chairman, Sir, I do not want to lower the level of debates in this august House.

MR. CHAIRMAN: Shri Radhakrishnan, I would request you to please allow him.

… (Interruptions)

SHRI R.S. GAVAI (AMRAVATI): My name is there. I am keeping silence and giving cooperation to the Chair does not mean that I should be called late. I am the leader of the Republican Party of India and that too, I am a senior Member. … (Interruptions)I am speaking on behalf of my party.

MR. CHAIRMAN: I will call you.

SHRI R.S. GAVAI : My name is there. Is it because I am not catching your eyes, you are not calling me? I am keeping silence in spite of my name being there. .. (Interruptions) It does not mean that we are ignored.

MR. CHAIRMAN: Many Members are sitting here from 11 o’ clock. They also want to speak. I am calling you. You please cooperate.

… (Interruptions)

PROF. SAIFUDDIN SOZ (BARAMULLA): I want to speak only for four to five minutes.

MR. CHAIRMAN: All right.

MR. CHAIRMAN : Many Members are sitting from eleven o’clock. They also want to speak.

“>PROF. SAIFUDDIN SOZ : Mr. Chairman, I was very glad that Shri Chidambaram gave some praise to the Finance Minister for the good points. But he also made some valid points of criticism. I will request, through you, that the Finance Minister would take notice of the part of the criticism that Shri Chidambaram offered. But even before he spoke I had a couple of points for the General Budget.

I feel that I have to bring in Jammu and Kashmir,but before that I want to say something in the Budget I feel that this Budget will generate some information. But the Finance Minister knows better than myself how he will control inflation and maintain exchange value of the rupee. In my mind I have some apprehension that the value of the rupee will come down. On the question of sanctions, I do not want to say anything in an elaborate manner. But it is my request to the hon. Finance Minister that when we meet in July he should express a definite opinion on this question of costs. If he is confident that this country will not have any cost on account of sanctions, we shall go the whole hog with him. But in July it will be the right time for him to take this august House into confidence at that point of time.

Now I come to Jammu and Kashmir. There are other points. I cannot repeat the points that have already been mentioned before. This Budget should have some concern for Jammu and Kashmir State. I feel like saying in Urdu, “Mujhe Gila Hai, Shikayat Hai”.

We passed through a spell of eight to nine years of armed militancy, sponsored terrorism by the neighbouring country. There is no doubt on that. There is no need of proof that the neighbouring country has been sponsoring terrorism in Jammu and Kashmir State. But there are some inner factors like unemployment. We have free education from Primary to Ph.D. There is lot of educated unemployment. In fact, there should have been a special package, economic package offered to the state. That was missing. Even now there is time for an intelligent Finance Minister like Shri Sinha to offer some package to the State and a package on employment is the first thing that should have attracted his attention.

Then, infrastructure, we lost our infrastructure and there is nothing in the Budget to show that he will re-build the infrastructure in Jammu and Kashmir.

Then, I come to the security concern.

MR. CHAIRMAN: Your four minutes are over.

PROF. SAIFUDDIN SOZ : I am looking at my watch.

On the security, there was a meeting on the l8th of May. The hon. Chief Minister of Jammu and Kashmir held a meeting with the hon. Home Minister, the Defence Minister and the Governor of the State were also there. The Home Minister had committed — it was decided — that Rs.326 crore would be offered to augment security in certain areas. Now it has been slashed down to Rs.l75 crore. I would request the hon. Finance Minister to look into this.

As for other things tourism is there. You can promote tourism because of the climate now, the climate of normally You can see tourists now going to Jammu and Kashmir State. By promoting tourism in Jammu and Kashmir which has a very vast potential, you can help it for gain to the whole country. You can have a special funding for that. As against that, there is nothing for promoting tourism in Kashmir particularly and even on a project like Dal Lake, the previous Government committed Rs.29l crore. This Government should not drag its feet because the Dal Lake can attract tourists from all over the world. That should be done.

I am completing in one minute. On the industrial development side we are not on the map. I cannot mention Railways as Shri Bhajan Lal mentioned because that is a different subject. But the Finance Minister has to have an overall view on that. But I will not drag the question of railways here. But on industry say that I raise a question with the Industry Minister. Whether he was prepare to set up eco-friendly electronic industries there?

In a reply to an Unstarred Question, the Minister admitted that they did not have any proposal. Why do they not have a proposal? Because we have only HMT unit there. In 1984 that constituted 0.03 per cent of the national investment. While the hon. Finance Minister answers these queries he should clarify. He will have to say whether in Kashmir he will provide some funding for the development of eco-friendly industries.

Instead of doing that, the Minister of Industries has shifted the showroom of HMT outside the State. I have raised objection to that. I would request him to kindly look into that because we are not on the industrial map of India.

I have many more points which I am not raising them, but I would request that the hon. Finance Minister should answer my points specifically when he rises to give the reply.

I thank you, Mr. Chairman.

“>SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): Thank you for giving me this opportunity. Now, I am constrained to oppose the Budget proposals of the hon. Finance Minister. Every Budget is the reflection of the political will of the party in power. This Budget is also a political reflection of the party in power. In another sense, the economic stability of a country is related to the political stability. Without political stability, there cannot be economic stability. Now, I must congratulate the Finance Minister for skillfully playing the role of a circus master. He must be congratulated because a circus can be filled with infight.

When he was presenting this Budget for financial stability, was there any stability in his camp? One of the major constituents of the ruling combine had suspended their support until further orders. So, he started from there. Now, he is ending at a place where another major party is boycotting this House everyday. Does he not feel ashamed about parliamentary manners and decency? Has he ever heard in the history of the whole world of a situation like the one which is everyday enacted here. ….(Interruptions) How can he say that there will be economic stability? This is what we see in the House. When he started, there was suspension of support and when he is completing, there is a boycott. This is the position of his Government. How can he claim that his Budget will bring economic stability? ….(Interruptions) Now, I am not going into the details of this case.

I must stress on one or two points. The first point is about the recommendations of the Tenth Finance Commission regarding sharing of taxes. Our State is a Federal State. So, there must be complete unanimity and complete understanding between the States and the Centre regarding sharing of taxes. The Tenth Finance Commission has recommended that it must be on the basis of 15 years taken together, that is, the gross proceeds of the Central taxes must be determined on the basis of taking into account 15 years together. Nothing is mentioned in the Budget about this proposal. There is another proposal, I do agree, that it must be decided on the basis of successive five years because the Constitution provides for appointment of a Finance Commission once in five years. So, the constitutional impediment is there. Apart from that, what action have they taken with regard to strong recommendations of the Tenth Finance Commission for bringing some federal nature in the matter of sharing taxes? Since he has not spoken anything about it, how can we say that we represent a Federal State? The sharing of taxes is one of the major issues. He is quite silent about it.

 

Now, I am coming to the other aspect. He is trying to speak about education. That is good and he has given certain concessions also. But what about national literacy? The United Nations has declared that by the turn of the century, the world should be free from illiteracy. But I tell you that by the turn of the century, India will be the only country, the largest country having the largest number of illiterates. We will feel ashamed. What has he to say in this matter?

Did you even utter a word in your statement, in your speech, about this aspect, about the national literacy programme? We have to be proud of our nation and we must be able to say with pride that we represent a country having cent per cent literacy. I represent a State having total literacy.

There is much criticism and much talk that we have implemented 73rd and 74th Constitutional amendments instituting panchayati raj system. We have implemented that provision. Panchayats have been constituted. Boards have been constituted and district panchayats are also constituted. We have not mentioned anything about their growth. What is your role in developing the three-tier system in panchayati raj institutions? Many States have implemented the decision. So, about decentralisation of powers, a Committee has been appointed. Nothing more than that. These institutions will be strengthened. What is the role of the Central Government? India is for proper functioning of the panchayati raj system. You had not said anything about it. What is the crucial point in Indian economy? Unemployment is the most important problem. Did you even mention about unemployment?

As per the Economic Survey given to me, in 1994-95 we had 3,204 lakh people below the poverty line. What is the remedy? Did you make any suggestion either in your speech or in your statement about unemployment problem? You know specifically about Rozgar Yojana. Those schemes have not proceeded further. Unemployment is the crucial issue so far as India is concerned. But my friend, the Finance Minister did not say anything about that. Without solving unemployment problem, without bringing the people above the poverty line, how can you say that a new India is rising? Your India is full of illiterates. Rising India is full of illiterates. Your India is full of unemployed youth. That is your India you have visualised. What is that new India? By the turn of the century, India will be having the largest number of illiterate people and unemployed youth. Shri Yashwant Sinha, you are visualising that India. You have not suggested any measure, any programme, to get rid of these social evils.

With these words, I strongly oppose the Budget proposals of the Finance Minister.

“>SHRI R. S. GAVAI : At the outset, I extend my thanks to you for allowing me to speak.

I will be very brief keeping in view the time constraint. The Budget is not a routine phenomenon but I do expect that Budget should be inspiring, dynamic and imaginary. Hon. Yashwant Sinha is a dynamic man, but the Budget submitted by him is disappointing.

I will raise a few issues. I want to seek your cooperation to express my view, being the single speaker on behalf of my political party. I know about the transaction of the Business. As a matter of fact, the first round is to be completed by the major political parties. I was presiding over the Upper House of Maharashtra. I know about transaction of business. Here, we are giving three or four chances to each of the various major political parties which have expressed their views. But it does not mean that a party which has lesser representation does not have a say on the floor of the House.

As far as employment guarantee programme is concerned, there is no imagination. Fortunately, I had an opportunity to have a discussion with the hon. Finance Minister at Mumbai. What is the achievement in this field? I discussed with him saying that the Government of India has an Employment Assurance Scheme and it is not guaranteed. The Government of India has a partial guarantee, not a permanent guarantee, that too it provides employment for hundred days in a year. Why should I lay stress on imagination? If providing work is a slogan, then we must be in a position to provide jobs to the skilled and the unskilled workers. In Maharashtra, I had my little contribution in the formation of the Employment Guarantee Scheme. Myself being the Chairman of the Upper House and the Chief Minister Shri Vasantrao Naik doctored the Employment Guarantee Scheme. It is guaranteed. It has a Budget.

While speaking on the unemployment problem and not the scheme here, I would request the hon. Finance Minister to have the imagination and think on the pattern of Maharashtra by providing employment guarantee at least to the agricultural labourers.

As far as the skilled unemployed is concerned, any scheme which deals with skilled employment such as cottage industries, small-scale industries aside the self-employment generating schemes, should be encouraged and supported. Regarding removal of poverty, there is no mention in the Budget. As far as providing due share to the weaker sections of the nation, particularly the people belonging to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes etc. is concerned, they have a constitutional safeguard. It is a moral and bounden duty of all of us to provide certain safeguards to them.

As far as the scheme which deals with the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes, the Special Component Plan and the Tribal Sub-Plan, is concerned, I have gone through the performance of both the schemes. The result I find is that a downward growth is there. The performance indicates that the reservation in jobs is decreasing instead of increasing which is a matter of great concern. The plan allocation to the Special Component Plan and the Tribal Sub-Plan is not in keeping with the proportion of population of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes.

Regarding extension of social services, some of my friends said that malaria and TB had not gone but have created a fatal situation nowadays. So, what is the amount that has been rendered for social security? The Ministry of Social Welfare has allocated, as Plan outlay, a sum of Rs.13,089 crore for 1997-98. The revised estimates is Rs.600 crore. It is a scheme under the purview of Ministry of Social Welfare. So, the cut in the Budget of the Ministry of Welfare and Scheduled Castes and Tribes is to the tune of Rs.7089 crore in one year. It rather indicates the apathy towards the weaker sections of our people.

Regarding reservation policy, for the first time in the history of India since Independence, the then Chairman of Scheduled Castes and Tribes Commission had ultimately submitted a report directly to the President and the Prime Minister of the country. It is a sorry state of affairs that all these reports are kept under cold storage. As a matter of fact, it is a constitutional obligation of this House to discuss this report. I would like to draw your kind attention knowing your social aspect fully well. Perhaps, you may not be aware of these things. I would request you to look into the matter.

I would like that maximum thrust should be given to agriculture, agriculture being the key and basic industry. It is being neglected. Unfortunately, this must be the first time in the history of the nation since Independence that the present Budget has sought to bring the food processing industry within the purview of taxes. It had never happened. For the first time, it is the reversal of the long-standing policies of the various Governments till today.

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

SHRI R.S. GAVAI : I am raising only a few points. And I am a single Member speaking on behalf of the Republican Party of India. You are a thorough gentleman. You will understand me. I will take a few minutes more.

MR. CHAIRMAN: Please try to understand.

SHRI R.S. GAVAI : I do understand. But you have to regulate the debate. It is none of my job. You are supposed to regulate the debate. It is the job of the Speaker or the Presiding Officer. That does not mean that I will defy your direction.

The food processing industry in the rural sector is hampering and suffering. Probably, there had been a long debate on this. You may be kind enough to take back the increase in the price of urea. I hope you will do so. I could read the psychology of your face.

The Report of Gupta Committee of the Reserve Bank of India recommends that the routine approach towards the agricultural sector should be discouraged. Credit flows to the agricultural sector should be doubled. If we believe that agriculture is the key and basic industry, what is wrong in that? You have earmarked a certain amount for funding the farmers who grow paddy.

The disbursement of credit should be simplified. Now, it is a complicated process. The funding should be extended to activities, such as, dairying, poultry, piggery, sericulture, etc.

The agricultural produce should be kept in godowns. And funding for this purpose should be extended to the farmer to the tune of 90 per cent. These are the recommendations of the Gupta Committee constituted by the Reserve Bank of India. In order to avoid distress sale, the storage facilities should be in an area where the agricultural products exist and not in the urban areas. It should be in an area inhabited by the rural people. We have storage facilities in the urban areas. It does smell of corruption.

There should be a target to raise the production of foodgrains to the extent of 50 per cent in order to meet any eventuality like growth in population.

Cutting across the party lines, the hon. Members of this House have expressed grave concerns over the present spate of suicidal deaths among the farmers in the country. The Members strongly attacked the Government for its failure to take remedial measures to prevent the recurrence of suicidal deaths of farmers in the country. The statement made by the Prime Minister on 27th of May in reply to Starred Question No. 2 indicates inefficiency on the part of the Government. It was stated that the deaths of farmers were: 236 in Andhra Pradesh, 29 in Karnataka and 51 in Maharashtra. These suicidal deaths occurred as a result of damage to the crops and due to natural calamities. I want to narrate a tragic and befitting story of one Shri Sham Kanare from village `Dharti’. `Dharti’ means `earth’. We call:

  “धरती के लाल, देखो उनके हाल”

He committed suicide. He made a dying declaration stating therein the first cause as failure of the crop. The other cause was that there was no hope to have further cultivation and the third one was: how to have livelihood of his family. There was no other alternative than to force him to commit suicide. This is the dying declaration made by the farmer. That indicates the condition of the farmers in the country.

Taking into consideration and to have imagination, I will request you to have a comprehensive and perspective planning and long-term policy regarding agriculture, agricultural products, funding facilities, irrigation, improved seeds, insecticides, water management, computer management, watershed, underground water and so on.

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

SHRI R.S. GAVAI : I will conclude in a minute. As far as irrigation is concerned, there has been a long-pending scheme suggested by learned persons, like Shri Vishvesvaraya and Dr. B.R. Ambedkar, for linking up the northern rivers with the southern rivers to have irrigation and drinking water facilities and also to control the floods. I would like you to come forward with a comprehensive scheme and a long-term policy regarding agriculture and farmers.

“> श्री पारसनाथ यादव (जौनपुर): माननीय सभापति जी, मैं आपका आभारी हूं कि आपने १९९८-९९ के बजट पर चर्चा करने का अवसर दिया। मैं बजट का विरोध करने के लिए खड़ा नहीं हुआ हूं। मैं कुछ आलोचना और सुझाव देना चाहता हूं। वित्त मंत्री द्वारा रखा गया बजट किसान विरोधी, गरीब विरोधी एवं दिशाहीन बजट है। इतना ही नहीं, नई थाली में बासी खाने जैसा बजट है।

  सभापति महोदय, बजट प्रत्येक वर्ष रखा जाता है। बजट के माध्यम से देश का विकास, देश की समस्याओं का निदान और देश की भावी रण नीति तय होती है। यह देश कृषि प्रधान देश है। यहां पर आज भी ७६ परसैंट जनता खेती पर निर्भर है। इतना ही नहीं, आज भी ८० परसैंट लोग गांवों में निवास करते हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि ५० साल की आजादी के बाद भी हम गांवों के लोगों का जीवन स्तर ऊपर नहीं उठा सके। सभी का यह कहना था कि जब तक हिन्दुस्तान के गांव विकसित नहीं होंगे तब तक देश का सर्वागीण विकास नहीं होगा। सब का यह सपना था कि जब तक हम हर हाथ को काम और हर पेट को खाना नहीं देंगे तब तक देश विकसित नहीं होगा। ५० साल की आजादी के बाद लम्बे-चौड़े भाषण हुए, नीतियां बनी, गरीबी हटाओ की बात कही गई, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को ऊपर उठाने की बात कही गई लेकिन गरीब मिट गए, गरीबी नहीं मिटी। इसलिए मैं इस बजट का विरोध तो नहीं, आलोचना जरूर करूंगा।

  माननीय वित्त मंत्री जी ने इस बजट में ५.६ परसैंट का घाटा दिखाया है। इसका भार गरीबों और अमीरों पर समान रूप से पड़ेगा। इस बजट में गरीबों को राहत देने के लिए दो पैसे का भी इंतजाम नहीं किया गया है और न ही अमीरों से दो पैसे अतरिकत वसूलने का काम किया गया है। यह बजट गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों और पिछड़े व कमजोर लोगों के हित का बजट नहीं है। इसलिए हम इसकी आलोचना करते हैं।

  माननीय वित्त मंत्री जी ने यह बात जरूर प्रदर्िशत करने की कोशिश की है कि शिक्षा और ग्रामीण विकास के लिए बजट में व्ृाद्धि की गई है। हम ग्रामीण विकास की बात जरूर करते हैं – चाहे वह जवाहर रोजगार योजना हो, चाहे सुनश्िचत रोजगार योजना हो, चाहे ग्रामीण अभियंत्रण सेवा के माध्यम से विकास करने की बात हो, लेकिन ग्रामीण विकास के नाम पर पैसे की जो लूट हो रही है, उसकी तरफ जब तक मजबूती से नहीं देखा जाएगा तब तक चाहे आप चाहे कितना बजट बढ़ा लें, उसका कोई लाभ नहीं मिल पाएगा।

  आवास आवंटित करने की बात में चाहे इन्िदरा आवास योजना की बात हो या सामान्य आवास की बात हो, जिस तरीके से आवास आवंटन के लिए पैसा लेकर काम किया जाता है, उससे कभी विकास सम्भव नहीं हो सकता। मेरा यह कहना है कि बजट में वभिन्न योजनाओं के लिए जो राशि रखी गई है, उनका यदि सही ढ़ंग से सदुपयोग होगा तभी विकास होगा और समस्याएं दूर होंगी।

  वरना इस ५० साल की आजादी में जिस तरह से विकास के नाम पर लूट हुई है उससे गांव का स्तर, गांवों में किसानों का स्तर जहां का तहां रह गया है। आज भी शिक्षा के नाम पर जब हम देखते हैं, लेखा-जोखा लेते हैं तो आज भी ३३ करोड़ लोग इस देश में निरक्षर हैं। वे ३३ करोड़ लोग और भी निरक्षर होते अगर हमारी स्वावलम्बी संस्थाएं काम नहीं करती होतीं। हम अगर सरकारी माध्यमों से आंकड़े निकालें तो हमारी प्राइमरी एजूकेशन, हमारी बुनियादी शिक्षा की बड़ी दुर्गति है। आज नर्सरी स्कूलों या प्राइवेट स्कूलों को बढ़ावा मिल रहा है। हम सरकारी स्तर पर प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए आज भी किसान की कृषि योग्य ३७ प्रतिशत से ज्यादा सिंचित नहीं है। यह देश नदियों, पहाड़ों और वनों का देश है। जो हमारी ऊबड़-खाबड़ भूमि है उसे कृषि योग्य बनाने की इस बजट में कोई योजना नहीं है। उत्तर प्रदेश में जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी जिसके मुख्य मंत्री श्री मुलायम सिंह यादव थे,

  सभापति महोदय : कृपया समाप्त कीजिए, मैं अन्य माननीय सदस्य को बुला रहा हूं।

  श्री पारसनाथ यादव : उन्होंने ऊबड़-खाबड़ भूमि में सुधार के लिए भूमि सेना का गठन किया था और जो हमारी ऊबड़-खाबड़ जमीन पड़ी थी उसमें भूमि सेना के माध्यम से सुधार करके गांवों के गरीब लोगों को पट्टा देने की बात कही गई। लेकिन वह स्कीम समाप्त कर दी गई। इसलिए मान्यवर मैं आपके माध्यम से माननीय वित्त मंत्री जी से अनुरोध करना चाहता हूं कि जो हमारी शिक्षा की व्यवस्था है, जो कृषि योग्य भूमि है यदि वह सिंचित नहीं होती तो हमारा किसान प्रकृति के भरोसे अपने भाग्य की आजमाइश करेगा। अगर हमारी सिंचाई की व्यवस्था ठीक नहीं होगी, हमारी कृषि उत्पादन नहीं बढ़ेगा तो हम देश को सम्ृाद्धिशाली नहीं बना सकते हैं, हमारे देश की अर्थव्यवस्था नहीं सुधर सकती है। इसलिए मैं अनुरोध करना चाहता हूं कि जो पूर्वी उत्तर प्रदेश है, जहां कम जोत के किसान रहते हैं, हमारा जनपद जौनपुर है, जहां से मैं चुनकर आया हूं, वह एक शून्य उद्योग जिला है। उद्योग न होने के कारण रोजी रोटी के लिए लोगो को मुम्बई,कलकत्ता एवं अन्य स्थानो पर जाना पड़ता है । मेरी वित्त मंत्रीजी से माँग है कि कोई कालीन उद्योग का बड़ा कारखाना खुलवाने की कृपा करें । (व्यवधान)। …

_____________________________________________________________________________ * Not Recorded

“> श्री मोतीलाल वोरा (राजनांदगांव): माननीय सभापति जी, वित्त मंत्री माननीय श्री यशवंत सिन्हा जी वर्ष १९९८-९९ का बजट पेश किया है। जिस दिन बजट पेश किया था आज उसको लगभग ११ दिन बीतने को आये हैं। उस दिन देश में कुछ आभा लगी थी और अब हम देख रहे हैं लोगों को निराशा कयों नजर आ रही है। पहले दिन ही मक्षीपात वाली बात सिद्ध हुई। बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया कि अबकी बारी, अटल बिहारी

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  आये, मैं तो यही कह रहा हूं कि आये, देश के लोगों को आशा जगी थी। लेकिन १९९८-९९ का बजट देखने के बाद हिंदुस्तान के आम आदमी की जेब पर पहले दिन ही पेट्रोल की कीमत में एक रूपया लीटर बढ़ाने की बात करके बोझ डाल दिया गया। माननीय वित्त मंत्री जी आप पूरे देश का आंकड़ा निकाल लें, लगभग पांच हजार करोड़ रूपये बैठता है। आप देश के सुयोग्य वित्त मंत्री में से हैं। यह आपका दूसरा बजट है, एक बजट आपने पहले पेश किया था, लेकिन उसे पेश करने का आपको मौका नहीं मिला, आपने वोट ऑन एकाउंट लिया। हिंदुस्तान के आम आदमी की नजर मैं आपका यह बजट पांच हजार करोड़ की लोगों की जेब काट गया। बजट की जहां प्रशंसा करनी है वहां की जायेगी। इसलिए मैं कहता हूं कि आपके प्रशंसक कम होने चाहिए – “निंदक नियरे राखिये आंगन कुटि छवाय।

  बहुत लोग आपकी प्रशंसा करेंगे, बहुत अच्छा बजट है। लेकिन हिंदुस्तान की जनता को बजट से कया मिला है। हिंदुस्तान का किसान जिस पर हमारी सारी अर्थ नीति टिकी हुई है, वह नाराज है, जब उस दिन, आपने यूरिया पर एक रूपया दाम बढ़ा दिया।

  श्री चन्द्रशेखर साहू : आप बजट पर बोल रहे हैं या भाषण कर रहे हैं?

  श्री मोतीलाल वोरा : यह भाषण नहीं है, मैं बजट पर ही बोल रहा हूं। माननीय सदस्य हमारे मध्य प्रदेश के हैं मैं इनका बहुत सम्मान करता हूं। बजट पर इन्होंने मेरे पूरे शासनकाल में बहुत भाषण दिये हैं, भाजपा के शासन काल में यह मेरा पहला भाषण है, मैं उसे अतिरंजित तरीके से कहना नहीं चाहता, लेकिन यथार्थ की स्िथति से हम हटे नहीं । यथार्थ के धरातल पर उतरकर जब हम सोचेंगे कि यह बजट हमारे देश में किस प्रकार का रहा है, हिंदुस्तान का किसान आपके द्वारा यूरिया के दाम बढ़ाने पर बहुत अप्रसन्न हुआ है। आपने तर्क दिया कि दुनिया के बहुत से देशों में कैमिकल्स का उपयोग कम हो रहा है। अमरीका ने भी इसका उपयोग कम कर दिया है। हम भी चाहते हैं कि कैसे इस फर्टीलाइजर का उपयोग कम करते जाएं। लेकिन हमने कया वायदा किया था। मैं कहना चाहता हूं कि वित्त मंत्री जी ने यह बजट पेश करते समय कहा था – गांधी जी के प्रसिद्ध जन्तर से मैंने मार्गदर्शन लिया है, निर्धनतम और निर्बलतम व्यकित के चेहरे का स्मरण किया है, बजट की जड़े स्वदेशी की भावना से नहित हैं। उत्साही प्रधान मंत्री के शब्दों में उन्होंने कहा, मुझे खुशी हुई कि उत्साही प्रधान मंत्री के शब्दों में आपने कहा – लेकर हाथ में ध्वज, कौन सा ध्वज, यह आप जानें, कभी नहीं झुकेगा, कदम आगे बढ़ रहा है, कभी नहीं रुकेगा, मुझे बहुत अच्छा लगा था। लेकिन आपने इस देश में परमाणु परीक्षण करने का महत्व बहुत कम समझा है। देश की सीमाएं किस प्रकार असुरिक्षत हैं,आपने कितना प्रावधान किया। मैं नहीं कहता कि आप ज्यादा प्रावधान करते, लेकिन आपने परमाणु परीक्षण को इतना नजरअंदाज कर दिया कि आपने १४ प्रतिशत का प्रावधान रक्षा बजट में कर दिया।

  सभापति महोदय, दूसरी बात मैं देश की आबादी के बारे में कहना चाहता हूं। आपने स्वास्थ्य कार्यक़मों के अंतर्गत जिस प्रकार का प्रावधान किया है, वह कम है आज देश की आबादी सौ करोड़ के आसपास पहुंच रही है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के मामले में आपकी सरकार पूरी तरह से बेसुध है। बहुत से स्वास्थ्य कार्यक़मो में जैसे राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक़म है, फिर से इस देश में मलेरिया प्रकट हो रहा है, राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन का कार्यक़म देखें, जितने भी स्वास्थ्य संबंधी कार्यक़म हैं उन कार्यक़मों को अगर आप सही ढंग से देखेंगे तो अंदाजा लग जायेगा कि आपने स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में कया किया है। कयोंकि यह कहा गया कि हम सन् दो हजार में इस देश को शिक्षा देंगे और हर आदमी को स्वास्थ्य की सुविधा उपलब्ध करायेंगे। आज से बहुत साल पहले अलमा आटा डिकलेरेशन साइन किया गया था, मुझे भी जिनेवा में जाने का मौका मिला था। दुनिया के ११२ देशों ने इस बात को कहा था। मैंने कहा था कि हिंदुस्तान की आबादी बहुत ज्यादा है, हिंदुस्तान इस सुविधा को उपलब्ध नहीं करा सकता है। बजट भाषण के पैरा-४ में वित्त मंत्री जी ने दस मुख्य उद्देश्य गिनाये हैं, मैं उन उद्देश्यों पर विशेष रूप से नहीं जाना चाहता, लेकिन इतना कहना चाहता हूं कि वित्त मंत्री जी कया आप इन उद्देश्यों की पूर्ित कर पायेंगे। आप लोगों को इस प्रकार का सब्ज-बाग कयों दिखा रहे हैं। देश की जनता इस बात को समझने लगी है। इस प्रकार के सब्ज-बाग दिखाने से आपका काम चलने वाला नहीं है। यह बजट किसान विरोधी है। आपने ट्रैकटर पर कर बढ़ा दिया, कैमिकल्स और एग्रो के उपकरणों पर आपने कर बढ़ा दिया। हिंदुस्तान का किसान कराहने लगा है कि आखिर यह बजट कैसा है। जिस किसान के ऊपर सारा दारोमदार है। हमारा अनाज का उत्पादन चार करोड़ लाख मीटरिक टन था उसे बढ़ाकर बीस करोड़ लाख मीटरिक टन किसान ने किया है। किसान की कमर आपने तोड़ी नहीं, झुका दी है, अगर मैं कहूंगा कि तोड़ दी तो किसान उत्पादन नहीं कर पायेंगे। किसान की कमर को आपने झुकाया है।

23.00 hrs.

  माननीय सभापति जी, लघु कृषि विकास एवं छोटे जो उद्योग हैं, उनमें १०१६ करोड़ रुपए रखे हैं। उस मद में कोई राशि नहीं बढ़ाई है। मध्याहन भोजन का कार्यक़म जिन सरकारों ने शुरू किया, इंदिरा जी ने शुरू किया, उसमें कितनी कोताही बरती गई है कि १०९२ करोड़ रुपए आपने रखे हैं। उसमें भी कोई राशि की बढ़ोत्तरी नहीं की है। राज्यों और केन्द्रों के संबंध के बारे में हम बहुत बखान करते हैं कि हमारे संबंध बहुत अच्छे होने चाहिए। राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान की राशि ८९३०० करोड़ रुपए से बढ़ाकर ९०३०० करोड़ रुपए की गई है। यह बात सभापति जी मैं इसलिए कहना चाहता हूं कि आप भी म.प्र. के हैं और आपको मालूम है कि म.प्र. में पिछले साल २२२ लाख एकड़ जमीन में अतिव्ृाष्िट के कारण फसल की बर्बादी हुई और करीब २ हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। आप भी जानते हैं और साहू जी भी जानते हैं और सब लोग जानते हैं कि आज म.प्र. का किसान कराह रहा है। मैंने बहुत पत्र लिखे। हालांकि मैं उस समय सांसद तो नहीं बना था, लेकिन मैंने पत्र लिखे। सांसद बनने के बाद भी पत्र लिखे। माननीय कृषि मंत्री जी ने जवाब दिया है कि मात्र १० करोड़ रुपए इस वर्ष में आपको मिलेंगे। जहां २०२२ करोड़ रुपए का नुकसान हुआ वहां १० करोड़ रुपए से कया होगा। ऐसा कभी नहीं हुआ। मैं सरकार की आलोचना तंग नजरिये से नहीं करना चाहता। यह आपकी आलोचना या समालोचना का समय नहीं है। आज जिस स्िथति से देश गुजर रहा है, आज जिस स्िथति से किसान गुजर रहा है, उस स्िथति से आप कैसे इंकार कर सकते हैं और उस प्रदेश को १० करोड़ रुपए देने से कैसे काम चलेगा। आपदा राशि इस वर्ष म.प्र. के लिए ४६ करोड़ रखी है उसमें से १० करोड़ रुपए की राशि आपको दी जाएगी। ऐसा लिखने से कैसे काम चलेगा।

  माननीय सभापति जी, यदि आपकी अनुमति हो, तो एक-दो मिनट और ले लूं। सरल, समाधान और सम्मान जैसे शब्दों का इन्होंने प्रयोग किया है। समाधान के बारे में मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि माननीय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था कि यह समाधान भी तो कहीं वालंट्री डिस्कलोजर के आसपास नहीं है। उन्होंने कहा था कि काले धन की जड़ पर कुठाराघात करना होगा। जब उदारीकरण हो गया है और कंट्रोल रैगुलेशन घट गए हैं, तो फिर काला धन इतनी मात्रा में बन रहा है कि इस पर गहराई से विचार करने की छूट देकर हम समझें कि हमारा कार्य पूरा हो गया, यह पूरा होने वाला नहीं है। वित्त मंत्री जी, कभी-कभी ऐसा लगता है कि वालेंट्री डिस्कलोजर स्कीम ईमानदारी का मजाक है। वाजपेयी जी ने कहा है और यह समाधान कया होगा। जो अधिकारी होंगे और जो व्यापारी होंगे या जो बड़े-बड़े उद्योगपति, करोड़पति और अरबपति होंगे, वे इकट्ठे बैठ कर फैसला करेंगे। मैं उनके फैसले पर शंका नहीं करना चाहता, लेकिन लोगों के मन में शंका होगी कि उन्होंने बैठकर जाने कया किया है। यह वाजपेयी जी ने कहा था कि इस देश के ५० करोड़ लोग इस बजट के महत्व को नहीं जानते हैं। आज देश की जनता ९८ करोड़ के आसपास है। उन्होंने कहा था कि लगभग ५० करोड़ लोग इस बात को नहीं जानते हैं कि बजट कया है और हम बजट के माध्यम से लोगों को भरमा रहे हैं।

  सभापति महोदय, ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर अगर आप देखें जो हमें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है उसमें १९९७-९८ में ९०९६ करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था उसे इस वर्ष घटाकर ८३५६ करोड़ कर दिया गया। मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि आपका बजट इस विभाग में पिछले वर्ष के मुकाबले घट गया है। आपने कुछ अच्छे काम भी किए हैं कयोंकि हमारे वित्त मंत्री, इस देश के विद्वान मंत्रियों में से हैं। मुझे इस बात को कहने में गर्व है। मुझे इसमें कोई शंका नहीं है, लेकिन आप जिन लोगों के बीच में बैठे हैं, जिन लोगों से घिरे हुए हैं, मैं पार्टी की बात नहीं कहता हूं, बजट बनाते समय जिन लोगों से आप सलाह लेते हैं, जो आपके सलाहकार हैं, कम से कम आप उनसे बचकर रहिए। ऐसा बजट तो मत बनाइए कि जो बजट किसान-विरोधी हो, मजदूर विरोधी हो।

  सभापति महोदय, इस देश में २३३ कपड़ा मिलें बन्द हो गई हैं।

  हम रोजगार का अवसर उपलब्ध कराने का कोई अवसर देना चाहते हैं या नहीं। इस बजट को देखकर ऐसा प्रतीत नहीं होता कि हम रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना चाहते हैं। आखिर यह बजट कोई आइना तो नहीं है जिसे देखा जाए और कया आइना देखने काम चल जाएगा। मेरा कहना है कि आइना देखने से काम नहीं चलेगा। कहने को तो बहुत था, लेकिन समय नहीं है, इसलिए मैं अपनी बात समाप्त करते हुए कहना चाहता हूं कि यह बजट महंगाई को बढ़ाने वाला, किसानों की पूर्ण उपेक्षा करने वाला और छोटे उद्यमों को १० प्रतिशत कच्चे माल के आयात पर ८ प्रतिशत उत्पाद शुल्क लगाकर आम आदमी पर बोझ डालने वाला बजट है जो वास्तव में आंकड़ों की बाजीगरी है।

It is only a jugglery of only accounts. That has been shown in the Budget. Now the hon. Finance Minister will look into all those things because many things are to be told, but the time is not there.

“> प्रो. रीता वर्मा (धनबाद): माननीय सभापति जी, मैं सबसे पहले अपने वित्त मंत्री माननीय यशवन्त सिन्हा जी को बधाई देती हूं कि उन्होंने ऐसा सुन्दर और संपूर्ण बजट प्रस्तुत किया है जिसकी आलोचना करने के लिए विपक्ष को ढूंढने से भी कोई तथ्य नहीं मिल रहे हैं और इसीलिए वे कुछ इस तरह की बातें कह रहे हैं कि आप अकेले बजट नहीं बना पा रहे हैं आपके साथ कोई और बजट बना रहे हैं।

  श्री मोतीलाल वोरा :तभी तो मैं कह रहा हूं कि निंदक नियरे राखिए। प्रशंसकों से कहीं आप घबड़ा न जाएं।

  प्रो. रीता वर्मा :सभापति महोदय, मैं माननीय मोती लाल वोहरा जी का बहुत सम्मान करती हूं। वे हमारे बुजुर्ग हैं, लेकिन जब वे कहते हैं कि यह बजट किसान विरोधी है और मजदूर विरोधी है, तो मुझे ऐसा लगता है कि आदरणीय मोती लाल वोहरा जी जैसे सम्माननीय व्यकित कैसे इस तरह से बोल सकते हैं जो तथ्य से इतने परे और किसान विरोधी बात हो। चूंकि यूरिया का ५० पैसे प्रति किलो दाम बढ़ा दिया गया है इसलिए हम किसान विरोधी हो गए, बजट किसान विरोधी हो गया। जबकि इस देश में लगभग ५० साल से कांग्रेस की सरकार शासन कर रही थी और हमारा भारत देश कृषि प्रधान देश है। उसकी आत्मा हमारे गांवों में बसती है, लेकिन उस गांव में बसने वाले कृषक की वेदना, उसके दर्द को उसने कभी नहीं सुना। आज तक कभी कृषि पर इतना धन नहीं दिया गया जिससे किसान की आंख के आंसू पुंछ सकें। इस बार हमारे वित्त मंत्री जी ने इतिहास रचा है। बजट का ५८ प्रतिशत एलोकेशन कृषि क्षेत्र में है और चूंकि ५८ प्रतिशत एलोकेशन इन्होंने किया है इसलिए ये किसानों के दुश्मन हो गए, और जो किसानों की बात नहीं सुनते, या जिन्होंने ५० साल तक किसानों की बात नहीं सुनी वे किसानों के परम मित्र हो गए। अब इस विडंबना को कया कहा जाए।

  सभापति महोदय, मैं कल माननीय मुरली देवड़ा जी का भाषण सुन रही थी आज माननीय भजन लाल जी का भाषण भी सुना। भजन लाल जी ने कहा कि यूरिया तो बोरों में आता है लेकिन दाम किलो के हिसाब से बढ़ाया है, तो भइया जब आपकी सरकार के समय में १७०० रुपए प्रति टन दाम बढ़ा दिया था, तो तब वे किसानों के मित्र हो गए और अगर हमने २० रुपया प्रति मन बढ़ा दिया, तो हम किसानों के सबसे बड़े दुश्मन हो गए। गेहूं का समर्थन मूल्य भी हमने बढ़ा दिया, तो हमसे बड़ा दुश्मन और कौन हो सकता है।

  सभापति महोदय, विपक्षी दल के सदस्य इस क़ांतिकारी बजट का जिस तरह से विरोध कर रहे हैं, उससे यह समझना मुश्िकल हो गया है कि वे वास्तव में किसानों के हितैषी हैं या दुश्मन। यह बात मैं नहीं कहती, यह कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस तरह से हमारे देश में यूरिया का मिसयूज हो रहा है, ओवर यूज हो रहा है उससे हमारी कृषि योग्य भूमि बंजर होती जा रही है। उस भूमि में नाइट्रोजन, फास्फेट और पोटाश का अनुपात गड़बड़ा रहा है। इसीलिए यूरिया की खपत को कम करके फास्फेट और पोटाश की खपत को और बढ़ाया जाना चाहिए यदि हमें अपनी खेती की गुणवत्ता को बनाए रखना है और इसीलिए बजट बनाते समय कृषि वैज्ञानिकों की बात को ध्यान में रख कर यूरिया का इस्तेमाल थोड़ा कम हो और दूसरी रासायनिक खादों का इस्तेमाल बढ़े, इसलिए यूरिया पर सबसिडी ६६०० करोड़ रुपए से घटा कर ६००० करोड़ रुपए कर दी गई थी। वहीं पर वनियंत्रित फास्फेट और पोटाश उर्वरकों पर सबसिडी १९९७-९८ के संशोधित अनुमानों में जो २६०० करोड़ रुपए थी, उसको बढ़ा कर ३००० करोड़ रुपए कर दिया गया।

  यानी एक तरफ यूरिया पर सबसिडी ६०० घटायी गयी तो फास्फेट और पोटाश पर ४०० करोड़ रुपए बढ़ा दी गई, उसका ये कोई जिक़ नहीं कर रहे हैं। यहां किसानों के जो हमदर्द हैं, वे उसका कोई जिक़ नहीं कर रहे हैं कयोंकि इनको अपने क्षुद्र

  राजनैतिक स्वार्थ पूरे करने हैं। इनको किसानों के हितों से कोई मतलब नहीं है। इसलिए इस सबसिडी की

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) +MÉ®ú ¨ÉèÆ <iÉxÉä ´ÉÉä]õÉäÆ ºÉä VÉÒiÉEò®ú +ÉiÉÒ ½þÆ iÉÉä ¨ÉèÆ VÉ°ü®ú ʽþiÉè¹ÉÒ ½þèÆ iɦÉÒ ªÉ½þÉÆ +É ®ú½þÒ ½þÚÆ*

  सभापति महोदय : कृपया आप उन्हें बोलने दीजिए।

  प्रो. रीता वर्मा : हम लोगों को कब मौका मिलता है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) +É{ÉEòÒ ¤ÉÉiÉäÆ iÉÉä ½þ¨É ºÉÖxÉ ®ú½þä lÉä*

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आने से आप जवाब दे देना।

… (व्यवधान) आप समय मत बर्बाद करिये।  

  एक बात और है जो यह नहीं बोल रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यूरिया पर ५० पैसे प्रति किलो व्ृाद्धि पर पंजाब में धान की उत्पादन लागत पर सिर्फ २.८० रुपए प्रति किवंटल बढ़ेगी। पश्िचम बंगाल में १.१० रुपए प्रति किवंटल और आंध्र प्रदेश में २.८५ रुपए प्रति किवंटल बढ़ेगी। कितनी बड़ी राशि बढ़ी है लेकिन इस मामूली राशि पर, इस नगण्य राशि पर हमारे कृषि मंत्री ने यह घोषणा कर रखी है कि इस बढ़ोतरी को अगले साल के गेहूं के समर्थन मूल्य में समायोजित कर लिया जायेगा यानी किसान पर इसका एक पैसा भी बोझ नहीं पड़ने वाला है। हम किसानों के इतने बड़े दुश्मन हैं, कया कहा जायेगा? यह कह रहे हैं कि छोटे ट्रैकटरों के टायर पर कुछ मामूली उत्पाद शुल्क लगा दिया जायेगा तो छोटा किसान मारा जायेगा। मैंने तो बिहार में ऐसा कोई छोटा किसान नहीं देखा जो गरीब किसान हो और उसके पास ट्रैकटर भी हो। ऐसा किसान हमारे बिहार में तो नहीं होता। अब हमारे एक भूतपूर्व प्रधान मंत्री हमेशा पुअर फार्मर की बातें करते थे। वैसे पुअर फार्मर होते हों जो कि ट्रैकटर भी रखेंगे, ट्रक भी रखेंगे, मैं नहीं जानती परन्तु हमारे बिहार में तो कोई पुअर फार्मर न ट्रैकटर रखता है और न टायर गाड़ी रखता है। यह अजीब बात है कि उद्योग वाली सुविधायें तो चाहिए लेकिन एक पैसा टैकस नहीं देंगे। यह बड़ी अजीब बात है लेकिन मैं फिर भी माननीय वित्त मंत्री जी से अनुरोध करूंगी कि जब जनता की इतनी मांग है और जिसको बोलते हैं कि व्यर्थ की बदनामी मोल लेना, तो यूरिया पर ५० पैसे प्रति किलोग्राम बढ़ाया है, उसको वापिस कर लें। मैं यह भी कहूंगी कि किसान की जमीन की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए फर्िटलाईजर में फिर से एक नया पैकेज बनाए कि इस तरह की व्ृाद्धि किये बिना किस तरह हम पोटाश और फास्फेट के उपयोग को बढ़ावा दे सकते हैं।

  इस पर ध्यान देकर फर्िटलाइजर की एक नीति बनाये, यह मैं उनसे अनुरोध करूंगी कयोंकि इनका इरादा नेक है और उस इरादे को पूरा होना चाहिए। इनको शोर करना है तो करते रहें, कोई खास बात नहीं है। माननीय चिदम्बरम जी की स्पीच भी मैं सुन रही थी और उनके कुछ उदगार भी मैंने सुने थे कि इस बजट का कया दोष है। नो विजन, नो बिग न्यू आईडियाज, जिसको कहते हैं कि पैडेस्टि्रयन बजट है। अब किया कया जाये। हम लोग तो पैडेस्टि्रयन लोग हैं तो पैडेस्टि्रयन ही बजट बनायेंगे जो गरीब आदमी के ही लायक होगा। कल्पनाओं के आकाश में उड़ना हमें नहीं आता। हमारे पांव तो यथार्थ की खुदरी जमीन पर खड़े हैं इसलिए हम चिदम्बरम जी को जवाब देना चाहते हैं कि हम तो आपके जैसे विजनरी नहीं, हम बादलों और कल्पनाओं की दुनिया में नहीं उड़ते। लेकिन हम जो कहेंगे उसका फालोअप अच्छा करेंगे। आपने बहुत बड़े-बड़े सपने देखे और आपका बजट तो ड़ीम बजट था लेकिन अंत में कया हासिल हुआ – शून्य।

  सभापति जी, मैं सी.ए.जी. की रिपोर्ट के कुछ अंश पढ़कर सुनाना चाहता हूं कि किस हद तक इन्होंने अर्थव्यवस्था को बिगाड़कर छोड़ा था। माननीय यशवन्त सिन्हा जी के पल्ले में जैसे इन्होंने कहा कि रातों की स्याही के सिवाय कुछ नहीं था और उस रातों की स्याही को इस तरह वह संवार रहे हैं कि सुबह की लालिमा अभी से दिखाई पढ़ रही है। मैं सी.ए.जी. की रिपोर्ट के कुछ अंश आपको सुनाना चाहता हूं। यह रिपोर्ट ३१ मार्च १९९७ तक की है। इसके हिसाब से हमारा ज्यादातर पैसा डैब्ट सर्िवसिंग में चला जाता है। इस तरह के इंटरनल डैब्ट ट्रेप में हम लोग फंस गये हैं।

It is stated in the 30th CAG report dated 31st March, 1997 as follows: –

“According to the report, as much as 60 per cent of the total disbursement of the Government go towards debt servicing.”

  यह तो सी.ए.जी. का कहना है और वह कहते हैं कि पिछले ५ सालों में गवर्नमैंट की टोटल लायबलिटी १ लाख ४५ हजार ३७५ करोड़ सिर्फ इंटरनल डैब्ट के नाम पर हो गई। इसी तरह १ लाख २ हजार २४० करोड़ स्माल सेंविंग ऑफ प्रोविडेंट फंड के नाम पर सरकार पर डेट है। इसका परिणाम यह है कि विकास के लिए राशि हर साल नगण्य होती जा रही है। रेवन्यू एकसपेंडीचर टोटल एकसपेंडीचर का ८३.५ है और विकास के लिए कैपिटल एकसपेंडीचर होता है जो कि प्रोडेकिटव एसेटस बनाने के काम में लाया जाता है , वह ५.७९ परसेंट है। मोती लाल जी आपकी सरकार इतने वषर्ों तक शासन कर रही थी तब यह था। इसके अलावा सी.ए.जी. की रिपोर्ट यह भी कहती है कि १० वर्ष पहले रेवन्यू एकसपेंडीचर सिर्फ ७० परसेंट होता था। ७०.३४ परसेंट ऑफ दी टोटल एकसपेंडीचर और कैपिटल एकसपेंडीचर १३.३५ परसेंट है। १३.३५ परसेंट से ५.७९ परसेंट ले आये। यह तो कांग्रेस सरकार का ही करिश्मा है कि वह इतना बड़ा काम करते गये हैं।

  सभापति जी, खुद तो इकनोमी को इतना मैस किया और अब दोष हमारे ऊपर दे रहे हैं और कह रहे हैं कि १९९७-९८ में विकास दर ५ फीसदी थी तो इस साल ६.५ परसेंट कैसे हो सकती है यानी खुद तो नहीं कर सके। यदि खुद इतने नालायक हैं तो हम भी उतने ही नालायक हैं कि हम भला कैसे ६.५ परसेंट कर सकते हैं। यह भी सवाल उठता है कि इतना रेवन्यू कहां से जनरेट होगा।

  सभापति महोदय : कृपया समाप्त करिये।

  प्रो. रीता वर्मा : सभापति जी, मुझे थोड़ा सा समय और दीजिए तो मैं समाप्त कर देती हूं।

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  पिछली सरकारों को इससे कुछ मतलब नहीं था कि देश की अर्थव्यवस्था कैसे सुधरे, वे तो सस्ती लोकप्रियता के लिए काम करती रही। मंदी से गुजर रही अर्थव्यवस्था के मद्देनजर राजस्व पर पड़ रहे दबावों को देखते हुए यह अपेक्षा करना कहां तक उचित है कि सत्ता में आते ही, अभी लोग हमसे पचास साल का हिसाब मांगने लगे, भाजपा गठबंधन की सरकार को देश में दूध की नदियां बहा देनी चाहिए। हर कोई कहता है रोल बैक- रोल बैक, हर जगह से टैकस वापिस कर लो लेकिन ऐलोकेशन हर जगह बढ़ा दो, यहां भी कुछ बढ़ा दो, वहां भी कुछ बढ़ा दो। ऐसा असंभव कार्य कैसे होगा। इसके बावजूद वित्त मंत्री जी ने जैसा बजट प्रस्तुत किया है, उनसे उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था सुधरेगी। पैसा कहां से आएगा, जैसा कि माननीय वित्त मंत्री जी ने कहा है, छ: मानकों में से किसी एक को पूरा करने वालों के लिए भी आयकर रिटर्न भरना जरूरी है। इसलिए इसी चालू वित्तीय वर्ष में ४० से ५० प्रतिशत उनकी संख्या यानी १.६ करोड़ तक बढ़ जाएगी।

  प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के लिए इन्होंने जो ठोस कदम उठाए हैं, उसमें प्रत्यक्ष कर के १.७ लाख मामलों में ४०,००० करोड़ की राशि अटकी हुई है और १२०० करोड़ रुपये की राशि अप्रत्यक्ष करों के पांच लाख मामलों में अटकी हुई है। इन मामलों के निपटने से राजस्व में भारी बढ़ोतरी होगी। कुल राजस्व वसूली का ३४ प्रतिशत भाग कारपोरेट टैकस के रूप में और २२ प्रतिशत भाग व्यकितगत आय के रूप में संग्रह करने का लक्षय है। समाधान योजना के तहत ५२०० करोड़ रुपये का राजस्व संग्रह होगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  मैं यह भी कहना चाहती हूं कि हर समय इसका रटन लगाया जा रहा है कि वित्त मंत्री जी ने इसका आकलन ही नहीं किया कि अमरीकी सैंकशन से हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर कया असर पड़ेगा। इनको तो इस बात की चिन्ता होगी ही कयोंकि ये तो “ऋणम कृत्वा घ्ृातम् स्वदेशी” की फिलॉस्फी में विश्वास रखते थे। पिछले पांच-छ: सालों से लगातार ऋण लिए जा रहे थे, घी पिए जा रहे थे, इनको मालूम था कि सत्ता इनके हाथों में नहीं आनी है, वह ऋण तो हमको ही चुकता करना पड़ेगा, इसलिए आराम से बैठकर ऋण लेते गए। इसलिए ये बहुत चन्ितत हैं कि अब यदि आर्िथक प्रतिबंध लग जाएंगे तो पैसा कहां से आएगा। इनको अपने देश के पौरूष पर, उसके पुरुषार्थ पर विश्वास तो है नहीं। मुझे सबसे मजेदार बात यह लगती है कि जिस समय सैंकशन की घोषणा हुई थी, मैं अमरीका में थी। मैंने वहां के न्यूज़पेपर में पढ़ा कि खुद अमरीकी सरकार को इस बात का आकलन नहीं है कि सैंकशन से भारत पर कया असर पड़ेगा और अमरीका पर कया असर पड़ेगा। अमरीका में अमरीका को पता नहीं था, स्टेट डिपार्टमैंट को पता नहीं था और उन्होंने इस बात को ऐडमिट किया था कि उनको इसका आकलन करते-करते तीन महीने लग जाएंगे कयोंकि आज तक उन्होंने किसी देश पर सैंकशन नहीं लगाया था और हमारे यहां सब लोग यह रट रटे जा रहे हैं कि आपने आकलन नहीं किया। अमरीका उसका आकलन करे, उसके पहले ही हम हाय-हाय करके छाती पीटकर उसका रोना रोने लगें, यही ये चाहते हैं। अब हम जब नहीं रो रहे हैं, हमको अपने देश के पौरूष पर विश्वास है कि हम किसी भी मुसीबत का सामना हंसकर कर लेंगे, तो फिर इनके पास कोई मुद्दा नहीं बचा है। ये कया अगले चुनाव में जाएंगे, कया ये हम लोगों को बोलेंगे, कैसे निंदा करेंगे, वहीं इनको चिन्ता हो गई है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  आप बार-बार टोक रहे हैं इसलिए मैं बाकी बातें न बोलकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कहना चाहती हूं कि जितनी पूर्ववर्ती सरकारें है, विकास के नाम पर विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे-दरवाजे जाकर चाहे जितना भी हाथ फैलाएं, कटोरा लेकर घूमें लेकिन सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि देश में आर्िथक सुधारों की शुरुआत के बाद यानी १९९१ के बाद विदेशी प्रत्यक्ष निवेश कुल पूंजी निवेश के दो फीसदी से भी कम रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि आर्िथक उदारीकरण के दौर में भी देश में विकास लगभग आंतरिक संसाधनों से ही हुआ। तो फिर किस बात का डर है।

  मैं सिर्फ एक बात और कहना चाहती हूं और वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहती हूं। इतनी मेहनत से देश में जो इस्पात का उद्योग खड़ा किया गया था, कोयले का उद्योग खड़ा किया गया था, जो विद्युत क्षेत्र है उसमें इन्होंने जिस तरह अपने बजट से उनको रिलीफ दिया है और मुरझाते हुए इस्पात उद्योग को आधारभूत संरचना के क्षेत्र में जिस तरह इन्वैस्टमैंट बढ़ाया है, जिस तरह ऐलोकेशन बढ़ाया है, उससे इस देश की म्ृातप्राय: सांसों में फिर से नई जान आ गई है।

  मैं एक-दो सुझाव माननीय वित्त मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहती हूं। मैंने पहले भी जिक़ किया कि फर्िटलाईजर के प्राइस की नई पैकेजिंग की जाए। आपने इन्कम टैकस भरने के लिए जो छ: क़ाईटेरिया बनाए हैं, उसमें कृपा करके टेलीफोन को हटा दीजिए, टेलीफोन तो आजकल बिल्कुल ही निम्न मध्यम वर्ग की जरूरत हो गया है, यदि आप उसकी जगह सैलुलर और पेजर को आधार बनाए जाएं।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  बैंक ऐकाउंट खोलने के लिए पैन को अनिवार्य न कीजिए। हमारे बच्चे होस्टल में पढ़ते हैं, वे इन्कम टैकस का नम्बर कहां से लाएंगे। इस तरह से कई लोग होंगे जो बहुत कम कमाते होंगे, वे भी बैंक में ऐकाउंट खोलते हैं, मेरे जैसी ग्ृाहणियां पति से बचाकर भी कुछ पैसे जमा किया करती थीं। कहां से इन्कम टैकस का ऐकाउंट लाएंगे। उनको प्रोत्साहन देने के लिए इसके लिए इन्कम टैकस का नम्बर देना अनिवार्य न करें।

  पूंजी बाजार में नई-नई कई धोखेबाज कम्पनियां जैसे बिहार में एक हेलियस कम्पनी है, एक जे.वी.जी. कम्पनी है, ऐसी नॉन-इन्वैस्टमैंट कम्पनीज की आप कड़ाई से जांच करवाएं।

  इतना कहकर मैं फिर से आपको हार्िदक बधाई देती हूं कि आपने देश को इतना बढ़िया बजट दिया।

“>SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY (KOKRAJHAR): Hon. Chairman, Union Finance Minister and learned Members of this House, I am really thankful to the hon. Chairman for giving me this opportunity to speak on the General Budget for 1998-99.

I am extremely sorry to share before all of you the multi-faceted tragedies, particularly the socio-economic tragedies of the down-trodden Bodo people, other tribal as well as many cross-sections within the proposed Bodoland. Today, I cannot find a precise language to describe before you all you about the degree and seriousness of our tragedy and the way we people have been suffering ever since the time of Independence in very many areas and spheres of life.

23.29 hrs (Prof. Rita Verma in the Chair.)

I have seen the Budget that has been tabled by the hon. Union Finance Minister in this august House. What measures have been taken in this Budget, particularly for the well-being, protection and development of the tribals and Scheduled Castes of the entire country? Adequate amount of money has been earmarked for the welfare and development of the Tribels and other down-troddle people. Because of the non-friendly fiscal policies for the tribal people and Scheduled Castes adopted by all the successive Governments since the time of our Independence.Those people could not have developed. That is how, these vulnerable groups of people in the country became victims of a lot of unwarranted tragedies?

I do not like to prolong my speech. But I would like to mention certain points which are very important for our people. In regard to backwardness of Bodoland, I would like to mention certain things specifically. Our Bodoland has been deprived of even the very minimum basic needs, like safe drinking water health and medical services, electricity,irrigation etc. There is inadequate infrastructure for electrification. There is no irrigation system, no housing facilities for the downtrodden people, no well-established college, not a single medical college, not a single engineering college, not a single university within the proposed Bodoland. All universities are located out side Bodolaud Territory and on the southern bank of the River Brahmaputra. All medical colleges, all engineering colleges, all airports and all sorts of other infrastructure are also located only in the non-tribal dominated areas.

Our Bodoland, is very fertile area. During is long period 50 years, we have been discriminated against in many fields. We have been exploited and neglected in many ways. That is why we had been compelled to launch a vigorous movement a few decades beack achieve to have a separate State of Bodoland. Whenever we are given a separate State of Bodoland, we can claim that our Bodoland State will be like the Punjab and Haryana of in the field of advice their and development in the North-Eastern (Interruptions) I become would like to appeal to the Government of India through this august House to take up the Bodoland issue very seriously, with great sincerity and to take a very clear-cut decision to create a separate State of Bodoland without any further delay. Otherwise, you can never rescue protect people. Our people from the on going denger and prevent the race from extiriction.

I would like to appeal to the Government of India through the hon. Chairman and through the Union Minister of Finance to set up a Central university within the Bodoland area, to set up a Central agricultural university, to set up a medical college, to set up an engineering college, to set up a technological institute and a computer science centre.

I would also like to appeal to the hon. Minister of Finance to bifurcate the existing National Scheduled Castes and Scheduled Tribes. Finance and Development corporation.

There should be a separate National Scheduled Tribes Finance and Development Corporation. The National Commission for Scheduled Castes and Scheduled Tribes also has to be bifurcated. There should be a separate National Scheduled Tribes Commission. At the same time, I would like to appeal to the Government of India to set up a separate Ministry for Tribal Affairs to look after development,welfare and security of the tribals along with power relating to the Home Ministry should be handed to the new Ministry . These things have to be done by the Government of India immediately. I would like to appeal to the Government of India to have a clear cut, positive and meaningful dialogue with all the major militant sections of the North-Easte Otherwise, the Government cannot bring permanent peace and stability in the region, and funds allocated by the The Government can also cannot be put to use.We all know that the Government of India has already announced a special economic package, amounting to Rs.6100 crore for the North-Eastern region. How can the Government expect an all round development of that area, if peace, stability and normalcy do not come back to that area? I, therefore, would again like to request the Government of India to announce a very very specific and special economic package for the North-Eastern region and resdue all the burning problems of the region politically so that we can convince our estranged militant section to come overground and to join the national mainstream.

I would like to appeal to the hon. Union Finance Minister to authorise the CBI to inquire into a very serious crime committed by a fake financial company, by the name Favourite Small Investment Company. It is a Calcutta-based company. It has collected several crores of rupees from the Bodo Tribal people from Bodoland area. Those who had deposited their money with this company, could not get back their deposits. It is a very very serious crime. That crime has to be dug investigated.

 

Over and above, I would like to appeal to the Government of India to induct all the North-Eastern Members of Parliament in the North-Eastern Council. Perhaps, a Bill is coming up in this regard very shortally, to induct only the Chief Ministers of the North-Eastern region. All the Members of Parliament from the North-Eastern region have to be inducted in the North-Eastern Council.

I would like to request the hon. Finance Minister, not to apply any sort of disinvestment policy on BRPL, Bongaigaon Refinery and Petrochemicals Limited (BRPL). The previous Government wanted to apply the disinvestment policy on that refinery which is located within Bololand. We strongly object to this idea. I would again like to request the Government of India not to allow the Assam Government to lease out , Bongaigaon Thermal Power Station (BTPS) which is located at Salakati. The BTPS has been set up on the tribal land. Now, the Assam Government is trying to lease it out to an American company. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : It is enough. You have already spoken for 13 minutes.

SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY : With these few words, I would like to reiterate my first point, that is the Government of India should immediately take concrete policy decision to create a separate State of Bodoland for the well being and protection of the Bodo people in the best interest of the nation as well as to ensure the security and integrity of the entire country. With these words, I conclude my speech.

  सभापति महोदय : आप स्पीच ले करना चाहते हैं तो ठीक है। पहले इनको ले करने दें। आप खड़े होकर ले कर दीजिए।

  श्री जनार्दन प्रसाद मिश्र (सीतापुर) : मैं अपनी स्पीच ले करता हूं।

“> डा. मदन प्रसाद जायसवाल (बेतिया): सभापति महोदय, मैं वर्ष १९९८-९९ के बजट को, जो माननीय वित्त मंत्री जसवन्त सिन्हा जी ने इस सदन में एक जून, १९९८ को प्रस्तुत किया है, मैं उसके समर्थन के लिए खड़ा हुआ हूं।

  सभापति महोदय, मैं माननीय प्रधान मंत्री जी के प्रति भी आभार व्यकत करना चाहूंगा कि उन्होंने बिहार से, जो हमारे प्राचीन भारत में शिक्षा का उदगम रही है, वहां नालंदा जैसा विश्वविद्यालय स्थापित हुआ और चन्द्रगुप्त के समय में चाणकय की कौटिल्य नीति जो अर्थव्यवस्था का महान ग्रंथ है, उस बिहार के हमारे नए कौटिल्य यशवंत सिन्हा जी को भारत का वित्त मंत्री बनाया। वित्त मंत्री जी ने जो बजट प्रस्तुत किया है उसकी पहली उपलब्िध के बारे में मैं चर्चा करना चाहूंगा। बजट में पहली बार स्वदेशी चेहरा नजर आया है। कृषि के क्षेत्र के विकास के लिए ५८ प्रतिशत राशि की बढ़ोत्तरी की गई है। सिंचाई को भी उचित स्थान दिया गया है, जिसकी अभी तक अनदेखी की जाती रही है। कृषि और ग्रामीण विकास तथा लघु और ग्रामीण सेवा के लिए भी काफी प्रावधान किया गया है। नाबार्ड के जरिए किसानों को क़ैडिट कार्ट देने की उल्लेखनीय बात कही गई है कि जिसकी जितनी जमीन होगी, उसको उसी हिसाब से बैंकों के द्वारा कर्ज के रूप में राशि प्राप्त होगी। उस कर्ज का दोगुना से ज्यादा सूद नहीं लिया जाएगा, इस बारे में भी चर्चा की गई है। शिक्षा के क्षेत्र में ५० प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, उसके लिए भी मैं वित्त मंत्री जी को आभार व्यकत करना चाहूंगा। उन्होंने जो संकल्प लिया है कि जी.डी.पी. का छः प्रतिशत शिक्षा की मद में खर्च किया जाएगा, विशेषकर महिलाओं को बी.ए. तक की शिक्षा मुफत में देने का जो प्रावधान है, उसके लिए मैं वित्त मंत्री जी का आभार व्यकत करना चाहूंगा। बजट में घरेलू कम्पनीज को संरक्षण देने का वादा किया गया है और उसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बनी रहे, इसकी भी व्यवस्था करने का संकल्प दोहराया है।

  सभापति महोदय, एक विशेष बात जो आपने अपने भाषण में उठाई थी, मैं भी उसकी चर्चा करना चाहूंगा। इसी देश में एक व्यकित ब्रिटानिया के मालिक राजन पिल्लै थे, जो पहले सिंगापुर में थे। वहां उनके ऊपर आर्िथक अपराध के तहत मुकदमा चला और उन्हें सजा मिलने जा रही थी कि वह भागकर भारत आ गए। यहां उनकी गिरफतारी हुई और दुर्भाग्य से किसी बीमारी की वजह से जेल में उनकी म्ृात्यु हो गई। मैं मांग करना चाहूंगा कि आज देश में जितनी भी नॉन-बैंकिंग कम्पनी आई हैं, उन्होंने देश की गरीब जनता को जबर्दस्त तरीके से लूटा है। मैं यहां पर नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन उल्लेख करना चाहता हूं। हमारे बिहार के एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री के रिश्तेदार थे, जो जे.बी.जी. के मैनेजिंग डायरेकटर कम चेयरमैन थे। वे पूरे बिहार के शहरों में हैलीकॉप्टर लेकर घूमते रहे और उन्होंने लोगों से कहा कि आप जितनी राशि मुझे देंगे, मैं २५ महीने में उसकी दोगुनी राशि आपको वापस दूंगा। मैं नहीं जानता कि ऐसी कौन सी व्यवस्था है, व्यापार है, जिसमें रुपया दो साल के अंदर दोगुना या तिगुना हो जाता है। इस तरह से उन्होंने बिहार की गरीब जनता का बीस हजार करोड़ रुपया लूट लिया। ऐसे आर्िथक अपराध करने वाले लोगों के प्रति ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए जिससे उन्हें कैपिटल पनिशमैंट दिया जाए। मैं वित्त मंत्री जी से आग्रह करना चाहूंगा कि इस सम्बन्ध में ऐसा कानून बनाएं जिससे गरीब जनता को लूटने वाले जो शेयर होल्डर हैं, इस तरह की नॉन-बैंकिंग कम्पनीज हैं, उनको कैपिटल पनिशमैंट मिले। आपने प्रश्न उठाया, मैं भी उठाना चाहता हूं कि आजकल टैलीफोन सभी की आवश्यकता है। उसके लिए यह व्यवस्था कर दें कि अगर किसी का ५०० या १०० रुपये तक बिल आएगा, उसको इनकम टैकस नहीं भरना पड़ेगा। जिनको १०००० या २०००० रुपये तक का बिल आता हो, उनकी बात अलग है। हम सांसदों को भी अब एक लाख रुपये तक के टैलीफोन के बिल की छूट है।

  हमें भी इस पर इनकम टैकस नहीं देना पड़ता। हम लोग इनकम टैकस में छूट की मांग कर रहे थे। मैं अभी बजट प्रस्तुत होने के बाद इनकम टैकस पेयर्स की एसोसिएशन की सभा में गया था, तो वहां सारे टैकस देने वालों ने आपकी जो प्रशंसा की, उसकी कोई सीमा नहीं, इसके लिए मैं भी आपका आभार व्यकत करना चाहूंगा। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि आज जो मुद्रास्फीति की हालत है, उसको उसी से जोड़ा जाना चाहिए। जैसे एक बार एक जजमैंट आया था कि सरकारी कर्मचारियों को वेतन का भुगतान उनके महंगाई भत्ते के रूप में उस समय जो रुपये की स्िथति हो, उसके अनुसार दिया जाना चाहिए। जैसे मुद्रस्फीति बढ़ती है उसके आधार पर इनकम टैकस की हायर लमिट आपने चालीस हजार रुपये से बढ़ाकर पचास हजार रुपये की है, यह कोई बहुत बड़ी राशि नहीं है। पांचवे वेतन आयोग से लोगों के वेतन बढ़े हैं, उससे कर्मचारियों को कोई लाभ नहीं होने वाला है। इसलिए जो बढ़ती हुई महंगाई है, रुपये का अवमूल्यन हो रहा है, उसके आधार पर इसको लागू किया जाए और इसे पचास हजार रुपये से बढ़ाया जाए और तय कीजिए कि कितनी राशि होनी चाहिए। इस देश के लोगों को ईमानदार बनना चाहिए और टैकस देना चाहिए। लोग टैकस की चोरी करते हैं, चाहे कोई भी हों। मैं यह नहीं कहता कि सब बइमान हैं, ईमानदार लोग भी हैं। आपने ईमानदार लोगों के लिए ठसम्मान” के रूप में सम्मानित करने की जो व्यवस्था की है, उसके प्रति मैं आपका आभार व्यकत करना चाहूंगा। अंग्रेजों के समय भी ऐसी ही व्यवस्था थी। जो टैकस देने वाले ईमानदार लोग हैं, उनको सम्मानित किया जाना चाहिए। इसलिए मैं सभी टैकस देने वालों की तरफ से आपको आभार व्यकत करना चाहूंगा।

  पिछले वर्ष जो हमारा रक्षा बजट करीब ३६०९९ करोड़ रुपये था, उसको बढ़ाकर आपने ४१२०० करोड़ रुपये कर दिया है। यह बढ़ोत्तरी तो जरूर हुई है, लेकिन यदि हमें विदेशों से नए टैंक खरीदने हैं, हमारे पास वायुयान वाहक युद्धपोत नहीं हैं, उनको खरीदने के लिए काफी पैसा चाहिए, तो जिस तरह से रुपये का अवमूल्यन हुआ है, कया बढ़ोत्तरी हमारी सेना की बढ़ती हुई मांग को पूरा कर पाएगी? यदि रुपये के अवमूल्यन के हिसाब से इस राशि को देखें तो पिछले वर्ष जो करीब १० अरब डालर के बराबर रकम थी, वह अब साढ़े नौ अरब डालर के बराबर होती है। इसलिए मैं अनुरोध करूंगा कि रक्षा बजट में और बढ़ोत्तरी की जाए। रक्षा में जितना आधुनिकीकरण करना हो, उसके लिए वित्त मंत्री जी को व्यवस्था करनी चाहिए।

  रेल हमारा महत्वपूर्ण साधन है। मैं चाहूंगा कि केन्द्रीय कोष से भी रेल्वे को नई लाइनें बनाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

  कल मुरली देवड़ा जी बोल रहे थे। उन्होंने अपने भाषण में बहुत से अखबारों में छपी खबरों और लेखों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि अखबारों ने वित्त मंत्री के बारे में यह लिखा है, वह लिखा है। आप जानते हैं कि कुछ अखबार भारतीय जनता पार्टी के इतने विरोधी हैं कि वह कुछ भी करे, उसके विरोध में लिखेंगे। वे वैसे अखबारों की चर्चा कर रहे थे। लेकिन जिन अखबारों ने बजट की प्रशंसा की है, उनका जिक़ नहीं किया। मैं यहां उन अखबारों में से कुछ का जिक़ करना चाहूंगा कि उन्होंने हमारे बारे में कया लिखा है। मेरे पास ५.६.९८ का इकोनोमिक टाइम्स है।

Madam, I quote: “A fine balancing act by Sinha”, says DSP Merrill Lynch. I quote from The Economic Times dated 5-6-1998: “Income Tax Act reworked to curb misuse”. This is again from the same paper, “Kar Samadhan Scheme to rake in more than VDIS”. It will bring more money to the Government than the VDIS. I am quoting from The Hindu. It says, “Move to accord priority to rural development hailed by everybody” and “Samadhan aims to garner Rs.5,200 crore”. The Economic Times says, “Customs & Excise Dispute Settlement Body set up”. This will increase the tax structure. “Insurance open-up leap for health care”. It is useful for the medical profession. I belong to the medical profession.

  सभापति महोदय, लाइफ इंश्योरेंस पालिसी के द्वारा अब मैडिकल प्रोफैशन में भी हैल्थ केयर के बारे में स्कीम्स आयेंगी, यह एक सराहनीय कदम होगा। मैं मैडिकल प्रोफैश्न में होने के नाते माननीय वित्त मंत्री जी से अनुरोध करना चाहूंगा कि इस मद में

GDP का जो १.९ प्रतिशत राशि रखी गई है, इसको बढ़ाया जाना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य इस देश के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। यदि उद्योग जरूरी है, यदि सड़के जरूरी हैं तथा अन्य चीजें जरूरी हैं, तो चकित्सा भी इस देश के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हैं। बहुत सारी बीमारियां बढ़ गई हैं और इसके अलावा मलेरिया, जब हम मैडिकल प्रोफैशन में थे, अब फिर फैलने लगा है। यह बीमारी पहले समाप्त हो गई थी और देखने को नहीं मिलती थी, लेकिन आज इनकी संख्या बढ़ गई है। एडस तथा अन्य बीमारियां भी बढ़ गई हैं। इसलिए मैं माननीय वित्त मंत्रीजी से निवेदन करना चाहूंगा क

GDP में नश्िचत रूप से राशि को बढ़ाया जाना चाहिए।

  अंत में, इस बजट का समर्थन करते हुए, मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

“> श्री के.डी.सुल्तानपुरी (शिमला): सभापति महोदय, माननीय वित्त मंत्री जी द्वारा जो बजट सदन में प्रस्तुत किया गया है, मैं उसका विरोध करने के लिए खड़ा हुआ हूं।

  महोदय, मैं समझता हूं कि जिस प्रकार आपने ईस्टर्न स्टेस्ट से पैकेज दिया है, उसी तरह का पैकेज आप हिमाचल प्रदेश को भी देंगे। समस्या यह है कि हिमाचल प्रदेश में आपकी सरकार आ गई है और यहां भी आपकी सरकार है, इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि हिमाचल प्रदेश की सरकार का काफी पैसा यहां पर आया हुआ है, चाहे वह बिजली का हो या अन्य किसी क्षेत्र का हो, वह हिमाचल प्रदेश की सरकार को वापिस करना चाहिए। पंजाब का भी हिमाचल प्रदेश की योजनाओं का पैसा यहां पड़ा हुआ है, लेकिन वह पैसा हमको अभी तक नहीं दिया गया है। न पंजाब से और न हरियाणा से रिआर्गेनिजेशन एकट में बिजली की हमको रायल्टी मिलनी चाहिए थी, वह अभी तक हमारी वैसी की वैसी पड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट में मामला गया, लेकिन सरकार कहती है कि हम केन्द्र से लायेंगे। वहां पर भी आपकी सरकार बन गई है, तो वह पैसा आपको देना चाहिए।

  मुझे खुशी है कि आपने पंजाब राज्य को ८ हजार करोड़ रुपए की मदद की और काश्मीर को भी आप मदद कर रहे हैं, लेकिन जिस राज्य को लोग शांतप्रिय है, उनका ाप ख्याल नहीं करते हैं। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आप इस राज्य के विकास के लिए खास तौर से ध्यान देना चाहिए।

  महोदय, मैं कृषि के बारे में कहना चाहता हूं। हिमाचल प्रदेश में सबसे बड़ा कोई साधन है, तो वह है – फल, लेकिन वहां के लिए कोई समर्थन मूल्य नहीं दिया जाता है। न ही भारत सरकार ने महसूस किया कि उनको समर्थन मूल्य मिलना चाहिए, जबकि अन्य चीजों के लिए समर्थन मूल्य दिया जाता है। महाराष्ट्र में तो प्याज के लिए समर्थन मूल्य दिया जाता है। मैं सदन को बताना चाहता हूं कि हिमाचल प्रदेश रक्षा की दृष्िट से जल के रूझान को रोकता है। हिमाचल प्रदेश मिट्टी के कटाव को रोकता है। जिस तरह से सकिकम में बारिश हुई, यदि उसी प्रकार से हिमाचल में भी हो जाए, तो पंजाब में फल्ड आ जायेंगे। उत्तर प्रदेश में फल्ड आ जायेंगे। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि जितने भी बिजली के प्रोजौकट बनें, वे इन बातों का ख्याल करके बनें। बारिश की वजह से जो मिट्टी बहकर आ रही है, उससे सल्िटंग की समस्या पैदा हो जाएगी और डैम्स की मियाद खत्म हो जाएगी। हमारे यहां नागपा-जाखड़ योजना है, जो १५०० मेगावाट का बिजली का प्रोजैकट है। यह राष्ट्र का सबसे बड़ा प्रोजैकट है। इस प्रोजैकट का काम ९० प्रतिशत पूरा हो गया है। अभी जितना भी पैसा वर्लड बैंक से मिलता है, पहले उस पैसे पर लो-इन्टरैस्ट था, लेकिन अब इन्टरैस्ट ज्यादा हो गया है। पैसे की कीमत कम हो गई है। इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करना चाहता हूं कि वहां की परियोजनाओं के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसा सरकार को देना चाहिए। हिमाचल प्रदेश पनबिजली योजनाओं द्वारा बीस हजार मेगावाट बिजली पैदा करता है। हमें कहा गया है कि कोयले से भी बिजली पैदा करने का प्रोजैकट लगाया जाए। यह योजना मंहगी हैं, कयोंकि वन हमारी सम्पत्ित है। हाइडल द्वारा जो बिजली पैदा की जाती है, वह सस्ती पड़ती है। इसलिए मैं चाहता हूं कि भारत सरकार इस ओर ध्यान दें, ताकि हमारा राष्ट्र आगे बढ़ सके।

  मैं एक बात अब उद्योग के बारे में कहना चाहता हूं। इस राज्य में हरियाणा से लोग आते हैं, वे वहां की सरकार से भी लोन ले लेते हैं और यहां की सरकार से भी लोन ले लेते हैं और काम कुछ नहीं होता है। वे लोन यहां भी चाट जाते हैं और यहां का भी चाट जाते हैं। इस प्रकार कुछ ही लोग हैं, जिनकी जांच होनी चाहिए। मैं यह भी देख रहा हूं कि कुछ लोग बैंकों से पैसा लेकर काम को कार्यान्िवत नहीं करते हैं। ऐसे लोगों को ही आगे से आगे पैसे मिल जाते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ आपको जांच करनी चाहिए और जो इस तरह के धन का प्रयोग करते हैं, उसके साथ सख्त से सख्त सरकार को कदम उठाने चाहिए।

  इसी प्रकार कर की अदायगी भी जिन लोगों ने नहीं की है और करोड़ो रुपया उनके पास बकाया पड़ा हुआ है, उनके बारे में भी सरकार को सोचना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ सरकार नए लोगों की कर की सीमा में लाने का प्रयास कर रही है। जिन लोगों से पुराना कर वसूल करना है, चाहे वे उद्योगपति हों या कोई अन्य, उन लोगों के खिलाफ सरकार कोई कार्यवाही नहीं करती है। मेरे विचार से सरकार को इस दिशा में भी कदम उठाना चाहिए।

  मैं एक बात और कहना चाहता हूं। सरकार ने पैट्रोल की कीमत एक रुपए बढ़ाई है और कहा है कि इस राशि को नेशनल हाईवे के विकास के काम में लगाया जाएगा। आप ऐसी व्यवस्था कयों नहीं करते हैं कि जो पैट्रोल पम्प इस क्षेत्र में आगे आना चाहे वे आयें, इससे ब्लैक मार्केटिंग खत्म होगा और लोगों को सुविधा होगी। इस प्रकार जिन लोगों ने नाजायज फायदा उठाया हुआ है, वे किनारे हो जायेंगे।

24.00 hrs.

  आप सब को दे दीजिए। जब आपने फलोर मिल के लाइसेंस ओपन कर दिये, शुगर केन के कर दिए, आप इस तरह से कयों करते हैं कि पेट्रोल पम्प उनको ही मिलेंगे। मैं यह कहना चाहता हूं कि पेट्रोल पम्प पर टैकस भी ले लो और इसको सब को बांट दो।

  बेरोजगारों को रोजगार देने के लिए आपने कुछ प्रयत्न किए हैं, वे पूरे होने चाहिए और आपने किसानों के साथ जो-जो वायदा किया है, आपने जितने भी वायदे किए हो, चाहे हमारी आर्मी के लिए किए हो या जो भी किए हैं वे सारे के सारे पूरे हों ताकि राष्ट्र आगे बढ़ सके। अभी हमारे एक साथी कह रहे थे कि यह तो कांग्रेस की वजह से हुआ तो कया अब भी कांग्रेस की वजह से ही हुआ? आज कांग्रेस की वजह से मुल्क में भाखड़ा डेम है और भी बहुत से डेम हैं, ये सारे हिन्दुस्तान के लोगों की मेहनत से बने हैं। आप जो ये कहते हैं कि कांग्रेस ने तो कुछ किया ही नहीं। आपको नजर ही नहीं आता, सौ करोड़ की आबादी होने जा रही है और जब तक इस आबादी पर कंट्रोल नहीं होता है तब तक कुछ नहीं होने वाला है। आबादी को कंट्रोल करने के लिए भी हमें प्रयत्न करने चाहिए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) मैं यह कहना चाहता हूं कि आपके यहां तो सारे घोटाले होते हैं लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं होता है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) +É{ɺÉä ¨Éä®úÒ ªÉ½þÒ |ÉÉlÉÉÇxÉÉ ½þè ÊEò +MÉ®ú ºÉ®úEòÉ®ú `öÒEò EòÉ¨É Eò®úiÉÒ ½þè iÉÉä ½þ¨ÉäÆ EªÉÉ iÉEò±ÉÒ¡ò ½þè* ½þ¨ÉxÉä iÉÉä <iÉxÉä ºÉÉ±É ®úÉVÉ ÊEòªÉÉ, +É{É iÉÉä lÉÉäc÷ä ÊnùxÉ ¨ÉäÆ ½þÒ Ê½þxnùÖºiÉÉxÉ Eòä ½þÒ®úÉä ¤ÉxÉxÉä ±ÉMÉä*

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  जब परिवार के १८-२० आदमी खाने वाले हों तो वे इधर से भी खाएंगे और उधर से भी खाएंगे, अगर एक ही आदमी होता तो सब ठीक चलता। आज आप कहते हैं कि हमने बड़ा अच्छा देश बनाना है, जैसे हमने तो कुछ किया ही नहीं, तो यही बात आप गलत बोलते हैं, यह अच्छी बात नहीं है। मेरी सभी साथियों से प्रार्थना है कि अगर हमें राष्ट्र को आगे बढ़ाने की बात करनी है तो हमें अपने मुंह पर लगाम देनी चाहिए और जो कोई बात कहता है उसको आराम से सुनना चाहिए और जो माननीय सदस्य को एक करोड़ रुपया देते हैं उसको दो करोड़ करने का मैंने सुना है, यह अच्छी बात है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

“>SHRI C.P. RADHAKRISHNAN (COIMBATORE): Sarva Sakthi Padaitha Bharatha Annaiyin Punitha Pathangalukku En Vanakkatthai Therivithu Kolkiren:

Respected Madam, through you, I thank the people of my constituency Coimbatore who, in spite of the fraudulent act of DMK and ISI-sponsored friends, elected me to this august House. Iu salute those 60 Hindus, the school going children, men and women who have been blown into pieces on that fateful 14th February, 1998.

I congratulate our Finance Minister for having presented the best Budget of the post-Independence period. Today, morning when I was going in the autorickshaw, I asked the driver about what he felt about the Budget. By seeing my dhoti and shawl, he thought that I was a friend of Shri P. Chidambaram and I was from his party.

He said very clearly that it is a good Budget. I asked him how. He told me “Your man Shri P. Chidambaram has said that this Budget has no vision.” His vision is always for helping the multinationals and the big houses. He has no vision for the poor. So, Shri P. Chidambaram has said that this Budget has no vision. But definitely it must be a good Budget as far as poor people are concerned.

So, I congratulate our Finance Minister for presenting a poor man’s Budget and for caring for the agriculturists. For the first time after Independence, the Plan allocation for agriculture has been increased by 58 per cent, from Rs.1,807 crore to Rs.2,854 crore. This is a great achievement and I appreciate his bold step on removing the export curbs on farm sector. This is a big boost to agriculturists. Agriculturists are committing suicide mostly because they are not getting remunerative price which is equal to the imports they are making. Their hard labour never gave good results for them. You have given a very good chance to the farmers for getting a better price through exports. I congratulate you on your bold steps.

You have increased the capital of NABARD by another Rs.500 crore and Rs.3,000 crore is with NABARD for its rural infrastructure development plan. So, NABARD Credit Scheme is more mass-based as well as more popular among rural people. Innovative steps like Kisan Credit Card System and crop insurance would help the farming community which had suffered due to the successive crop failures and mounting indebtedness. The farmers can learn more financial discipline once they are habituated to use the Credit Card System. I appreciate you for this new invention. This will release the farmers slowly from the clutches of private blood-sucking moneylenders. I appreciate you for safeguarding the farmers.

The second myth that BJP is pro-capitalist and pro-industrial houses, is broken into pieces. By this measure, you have given lot of hope that there is a new Government emerging in the Centre in New Delhi which cares for the small and self-made indigenous entrepreneurs.

I thank you for increasing the excise duty exemption for small scale industry up to Rs.50 lakh and you have saved the indigenous industries like paper and steel by increasing the Customs duty by 10 per cent for the paper industry and 5 per cent for the cold rolled steel. As a proof of the fact that BJP is upholding its commitments, it is mentioned in the National Agenda that there will be no village in Hindustan without potable water in another five years. You have allocated Rs.1,627 crore for rural water supply, a 25 per cent increase. It will create a new situation in India and there will be no need for womenfolk of the rural areas to walk kilometres together to fetch a pot of water. This is what in Tamil we used to say that we will do what we have said and we will say only what we can do. We are always for fulfilling our commitments.

The price of urea has been increased by the Congress Government and the subsequent United Front Government. In 1991, it was only Rs.2,350/- per tonne, but just before United Front Government came to power, the price was increased to Rs.3,664/-. The price of the most essential requirement of the farmer, fertiliser, is increased by only one rupee and even then, the Opposition is raising a hue and cry over that.

Whatever opposition is there in the House against BJP, that is not going to help them in any way. People will never think that BJP is an anti-farmer party.

Since there are a lot of measures which you have taken for the farmers, you have proved, after Shri Charan Singh, that this Budget is the best pro-agriculture Budget of free India.

MR. CHAIRMAN : Please conclude now.

SHRI C.P. RADHAKRISHNAN (COIMBATORE): This is my maiden speech. You have to give me another five minutes.

MR. CHAIRMAN: There are 15 more Members to speak. Please conclude.

SHRI C.P. RADHAKRISHNAN : I thank the Finance Minister for allocating Rs.7047 crore to education. It is a right step towards achieving the goal of six per cent GDP in respect of education. For the first time, the Man Making Mission gets its priority attention…(Interruptions)

MR. CHAIRMAN Please conclude now. All right, you get one more minute.

SHRI C.P. RADHAKRISHNAN : I welcome the National Reconstruction Corps. Mr. Minister, as you have rightly quoted Swami Vivekananda in your Budget speech, the right thinking youth force will be fully utilised in reconstructing the nation. Through you, Madam, I assure the hon. Prime Minister that the entire patriotic youth saffron brigade will be at his command in rebuilding a strong Hindustan. Hon. Finance Minister, Sir, I welcome your new move – the Technology Mission on Cotton.

I strongly believe that with cotton only we can repay all our foreign borrowings. With your high vision, you have launched the Technology Mission on Cotton. I welcome it.

Madam, there are three more pages. With your permission I hand over by tabling them.

MR. CHAIRMAN: Yes, you can.

SHRI C.P. RADHAKRISHNAN : I congratulate the hon. Finance Minister. I want to say that Tamil Nadu is not at all away from the mainland. The Tamils are Hindus. Shri Murasoli Maran has once said that he is a Tamil born and not a Hindu born one. The Tamils are Hindus. Their contribution to Hinduism is very high. All the Alwars, the Nayanmars and Thiruvalluvar contributed much to Hinduism. We were never away from the mainland.

With your permission, I lay on the Table the following matter:

The allocation for the Department of Atomic Energy has been raised by 68 per cent. It has been increased from Rs.828 crore to Rs.1391 crore. The Department of Space will also get 62 per cent more – from Rs.850 crore to Rs.1381 crore.

On the 11th and 13th May, India tested nuclear devices in Pokhran which is referred to as Pokhran-II. Some of my friends sitting on the other side of the House criticised this noble Government that a war atmosphere is created and Bharat is becoming aggressive.

Here, I want to caution my friends sitting on the opposite side that India has never invaded any country so far. Thsi fact has been appreciated by the great scholar Megasthanis also. Do you want to degrade the name of a nation which has got the highest credit in the world for not invading any country? India has never exhibited aggression against any country so far. On the contrary, this holy Bharat had been invaded by so many people. One among them was your most favourite invader Babar. This Government is determined to protect the sovereignty of this country. In order to do that, this country has exploded the nuclear devices.

I would like to congratulate the Finance Minister for having allocated an increased amount to the Department of Atomic Energy and Space. This has encouraged the scientists of this country to go ahead with further research and development. Our country is always ahead of our enemies as far as the security aspects of this country are concerned.

After showering praises on the Finance Minister, I now make a genuine request to the hon. Finance Minister to do certain things. I would kindly request him to reduce the price of urea to zero level. He is aware of the problems of our kisans than anybody else sitting opposite. I have seen and read so many Uttar Bharat leaders who always make a loud cry in espousing the cause of kisans when they are not in power. But once they are in power, they show their concern only through their speeches. They are more money minded and they forget the farmers. They call themselves as kisan leaders and Yadav leaders. They took the money, allocated by the Government for cattle feed, for themselves. Even Kamsa had not done this type of a sin. For such a Bihar, Mr. Minister, you have taken care of the kisans.

I would further like to request the hon. Minister that excise duty on spices, ghee and rubberised coir mattress should be removed. Though Kerala has not elected any Member of Parliament belonging to the BSP on behalf of it, I request you to lift the excise duty on rubberised coir mattress because coconut husk fibre is the bread winning tool for many of the poor people of Kerala.

Sir, our Finance Minister has taken every care of the poor kisans, the middle class people, the NRIs, the SSI units of this country, the domestic

industrial growth and liberalised imports wherever necessary especially on the capital goods for further modernisation.

With this I thank all of you for giving this opportunity to me and hearing me patiently.

“>SHRI P.C. CHACKO (IDUKKI): Madam, I thank the hon. Finance Minister for his patience. Throughout the midnight, he is very patiently listening to all the Members. I hope when he is replying to this debate, he will give proper attention to at least some of the thoughts expressed by the Members. In that light, I would like to make some brief suggestions.

I am afraid whether I will be able to complete my speech within the time. Merely because it is presented by a Finance Minister of BJP, I do not think that it is my political responsibility or duty to oppose this Budget. Shri Yashwant Sinha is a very respected friend and I always regard him as a very senior, seasoned politician. I really want to support this Budget. But I have been asking my conscience whether, without any political bias, I can support this Budget. When sitting very late and listening to the debates – of course, the level of discussion has gone down – I am afraid whether I can dwell on a subject like this.

I was expecting one thing from him. Because of his experience and acumen, I was thinking that the backdrop of this Budget, which this country is expecting from him, is declining industrial production and probably there is the slow down of the GDP. The industrial growth is 4.2 per cent and the agricultural growth rate is 3.7 per cent for which you are not responsible, your Government is not responsible. This slow down of the GDP is one major problem for which this country was expecting an answer from your Budget. The export growth which is a mere 2.6 per cent is a distressing figure. For this, this country was expecting an answer from your Government.

If you take into consideration the last five years, you may find that the smallest number of public issues and the rights issues have come up in the primary market during the last five months. That shows the sentiments of the market and the Government’s fiscal situation is going from bad to worse. This kind of a scenario is the backdrop of this Budget. Honestly-speaking, above all political considerations, this was the scenario for which this country was expecting an answer through your Budget. I have to say with great reluctance that we could not get an answer or we could not get a guidance from your Budget for these worries and problems of the Indian economy. I hope corrective measures will be announced for this at least to boost the market sentiments. You can still introduce some measures in a limited way to boost the economy.

India stands isolated in the world community. Whatever one may say, after the Pokhran, whatever may be the claim from various political angles, India stands totally isolated in the world community today. I am afraid this Budget may take us to an economic isolation. I am sure you are to reflect the political ideology of the party which you represent. I know Shri Yashwant Sinha for many years as a person, and I can appreciate you. As a representative of the party, you are bound to reflect the ideology of the party which you are representing. I see, at one time, a stamp of Swadeshi, that is, eight per cent duty which you have imposed uniformly on all imports. How is it going to affect? I do not want to take much time of the House. But we sincerely expect an answer from you for what Shri Chidambaram was explaining today.

You have presented the Economic Survey before the House and according to that Survey, 31 per cent is the import duty collection rate in 1996-97. If any industry is not getting protection when there is 31 per cent import duty collection, then can we be competitive? When you are giving protection, we are happy. But you are making Indian industry uncompetitive in the world. We are living in a world where communications, science and development are making the world into a small village. So, we will have to be competitive. From 1991 onwards, there had been a constant attempt – one may or may not share that perception – to make the Indian industry competitive, whether it is small scale or medium scale or large scale industry. Indian industry should be able to survive in the world competition. Are we making the Indian industry competitive? Over and above all protection, the Indian industry is enjoying 8 per cent duty now. I can understand the BJP slogan and I can appreciate that but at the same time, when you are building a big wall, a protectionist wall around the Indian business men, it is going to be counter-productive? I am sure that you will definitely apply your mind on this question. Many people will be happy about it. I have gone through the post-Budget analysis very carefully. A slogan caught my attention. I want to present it for the benefit of this House. A very interesting headline was given by a very famous newspaper. The good news about this Budget is that there is no bad news and the bad news about this Budget is that there is no good news. When you are presenting a Budget, we expect that it comes with your personality and your ability. I am afraid that this Budget, with the 8 per cent protection which you have given to the Indian industry, is going to be counter-productive.

I want to make one point on the public sector. From 1991 onwards, there had been disinvestment, whether one calls it privatisation or disinvestment. Disinvestment was the policy of the Government or the party which was running the Government in which I was also a Member.

I endorse the view that privatisation or to an extend this dilution is necessary. But you have made a very sweeping announcement in the Budget that wherever it is non-strategic sector, the Government holding will be limited to 26 per cent. You know very well – better than me – that 67 per cent of the capital and 85 per cent of the people employed are in the non-strategic sector. What does it mean? The Indian public sector was built over a period of time with the people’s money and with the commitment of the successive Governments. Eighty-five per cent people are employed in that sector and 67 per cent of the capital employed in that sector are in non-strategic sector.

You have made an announcement that Government will hold only 26 per cent. It is as good as liquidating the public sector in this country. The Mumbai Club people may be happy but not at the cost of the public sector in the country. I feel that wherever dilution is necessary, wherever selling of the shares to the Indian public is necessary, as a matter of policy, I do not find much difference between Shri Manmohan Singh’s Budget or Shri P. Chidambaram’s Budget or your Budget because the basic thrust is the same. The basic approach may be the same. But when you take a decision, how is it going to affect the public sector industry in this country? How is the South-East Asian economy reaching the crisis? We know about that. We should not go to that debt-trap. But that kind of situation should not happen to India. So, we have to be extremely cautious and careful.

Are we going to liquidate at one stroke what we have built up over a period of time? I would like you to rethink on that. As I told you, I would like to support the Budget. But I hope you will give us answers to three or four questions while you reply.

You, at least, consider that the weakness of this Budget is the GDP, which is calculated on the basis of fiscal deficit which is going to be much more than that. That apprehension was expressed by many hon. Members in this House. The facts and figures are with you. You can definitely convince us that it is otherwise.

The inflation is one factor. The deficit is going to be much more than what is predicted. Both by inflation and by the deficit itself, the GDP rate is going to be far below your expectations.

Another fear is that the increase in fuel prices which is going to have a multiplier effect. When we oppose that, maybe somebody may say: why are you opposing it? In the past, they have increased the taxes. One rupee per litre of petrol is not the only amount which is collected on this. It would have a multiplier effect. It is definitely going to be inflationary. In that kind of situation, the cost of living index will go up. Inflation will go up. Some people said, it is eight per cent. Some people said, it is ten per cent. I will consider that Shri Yashwant Sinha is lucky if it is going to remain at ten per cent. But this definitely is going to contribute greatly to this inflationary pressure.

The capital expenditure as a percentage of GDP declined to 3.6 per cent from 3.8 per cent in the year 1996-97 despite all kinds of investments. We have made further allocations. Sectorwise allocations have been increased. We have made so many claims. The figures speak for themselves. It is very clear that capital expenditure as a percentage of GDP has declined from 3.81 per cent to 3.6 per cent. You have presented it before the House in the Economic Survey.

 

Regarding borrowings of the Government of India, I am not putting any blame on this Government. Nobody may think it like that. But the fact is that borrowings of the Government through securities will rise to 59.2 per cent to a huge Rs. 707 billion. That is going to the Government debts. So, when debt servicing and other things are being discussed, somebody was blaming the Congress Party. But what is going to be the ultimate result? There is not enough attention to export growth. You know our export growth was only 2.4 per cent.

I know, my time is running out. I have given to you representations before the Budget also, as usual as people’s representative, on many issues. When raw material is imported, when semi-finished goods are imported, when finished goods are imported, it is always a practice that the Government applies a different tariff rates. In this country, many import substitution industries are coming up in the small-scale sector. I have brought one such industry to your notice. You were kind enough to listen to that and reduce the import duty on that. You are giving with one hand and taking away with another hand when you are applying your eight per cent duty. You are reducing duty from 15 per cent to five per cent – maybe eight. When you are applying another eight per cent, what you have sanctioned to them, is taken away by the other hand.

I come from a State where industry is practically nil or minimum. Copper is in short supply in India and it is being imported. The Minister has to consider its end use also. The hon. Minister wants the Budget to be a farmer-friendly Budget. Copper is used for making pesticides also, which are used by the farmers. So, I would request him to take into consideration the end use of copper which is imported. The Government has decided that the import duty will not apply to it. For the manufacture of Copper-Sulphate, copper rings are used. So, copper also should be exempted from the import duty. The hon. Minister has proposed that when the agricultural residue is used for making goods, it will be exempted from duty. One such agricultural residue is coir fibre. I come from Kerala where lakhs and lakhs of workers, mainly women, work in the coir industry. By mixing coir and latex we make fibre rope. But it just cannot stand the burden of this 8 per cent duty. PUF is imported at a considerably high rate of tax. PUF is now encroaching into rubber. We in Kerala grow 99 per cent of the rubber in the country. Both rubber and latex are giving employment to a number of people and thus are helping the economy of our country. In the fibre form we cannot sustain tax. Many other raw materials which are imported cannot sustain the 8 per cent duty imposed in the Budget.

The hon. Minister must have received representations from us listing out a number of points. Our humble request is to correct the mistakes and make this Budget as acceptable as possible. It is a fact that we do not want the present Government to go tomorrow. This country needs a stable Government whether it is a minority or a majority Government. So, any step that the Government takes should be acceptable to the people of this country. I know that the Minister has the wisdom to make this Budget acceptable to most people of this country. With these words I conclude. Thank you.

“>* SHRI S.MALLIKARJUAIAH (TUMKUR) : Madam Chairman, I am in the opposition for the last 24 years. All these years I used to oppose the budget. Of course, I have always whole heartedly praised good work. I have opposed and argued against injustice. Now I am sitting in the treasury bench and this is the 25th year of my political career. I have the opportunity to welcome and support the Budget.

The for the year 1998-99 has given a new direction and a new life to the plans and programmes of our country.

The Budget has tried to enable the common man self reliant. it has inspired and enthuse the people of our country. There is sufficient encouragement for savings. It has stressed the importance of hard work. It has reflected that dedication and sacrifice are very essential for building a modern and progressive India.

Poverty is rampant in our country. Ignorance is also rampant in the country and this has to be wiped out. Spreading of knowledge is the need of the hour. There is an urgent need for the Government to accelerate the administration. The funds which are meant for the people should reach them. There should not be any leakage. There is laxity among administrators. This has to be rectified immediately by the new Government. In my opinion the required change has not taken place in the attitude of administrator and other officials. I am making this statement on the basis of my experience for the last two months. The officials like ______________________________________________________________

* Translation of the speech originally delivered in Kannada

Sub-Inspectors of Police, Revenue Inspectors or District Officers and others have to be sympathetic and cooperative with the common people.

The scene in the rural area is really pathetic. There are no schools and roads. The villagers cannot dream of television and telephones. it is these poor people who pay for the country. They pay tax on so many commoities like beedi,cigarette,medicine,etc. we utilise these funds for all the developmental activities. We are fortunate to receive food education. Many of us have become Parliamentarians. We have the power and at the same time who should not forget to help these common people at all levels. There are a number of Central Schools, Navodaya Vidyalayas and Kendriya Vidyalayas throughout the country. Many of these schools particularly in my State, karnataka, are not functioning properly. Teachers have not been appointed in the existing vacancies. Other facilities like laboratories, playing grounds, etc. are also not available in these schools.

The Hon. Minister has presented a well balanced budget for the year 1998-99. It is the budget of the common people. The opposition parties should not indulge in criticising the budget for the sake of opposing. They have to give constructive suggestion to the Government. In fact, my suggestion to them is to prepare an unofficial budget and compare it with the Budget of the Government. Also it is very essential to inform the people about all these events such that they can appreciate the plus points of the Budget. Such a Budget has not been prepared by the opposition this year. I request them to prepare an unofficial budget at least next year.

The urea price has been increased by 50 paise per kilogram. I request the Hon. Minister not to increase the tax on urea. In fact, I strongly feel that there should not be any tax on urea. I am also a farmer. The use of excess urea affects the fertility of the agricultural land. I have stopped using urea to my land four years ago. We store the manure and use it to the crops according to their requirements. We get very good crop by using manure. We can also retain the fertility of the soil by using manure instead of using excess fertilizers.

It is wrong to presume that only rich people use petrol for their vehicles. Common people and farmers also use petrol for their vehicles like motorbike, scooter. TVS and other mopeds. The price of the pertol has been increased by Re 1/- per litre. I request the Hon. Minister not to increase the price of petrol as it is very essential for the common also.

My constituency Tumkur is popular for the production of coconuts. recently the Government has fixed the price for copra. The price that the Government has ficed is not at all remunerative. Cost of cultivation has increased by several times. I have calculative all these details. Therefore, I urge upon the Hon. Minister to fix the price of copra at Rs.5500/- per quintal and the price of coconuts at Rs. 4,000/-. These prices would be remunerative and the farmers can get some profit. The ripe cocounts have to be kept in godowns for more than nine months. Then only the nuts can become copra. it is tedious work. They should get something in return for their hard work. I hope the Hon. Minister would fix the support price as suggested above by me.

The agriculturists face many problems. First of all there is no sufficient rain. Sometimes the wires in the motors are burnt. Electricity is also not supplied to the farmers regularly. There will be other problems due to low voltage. The Hon. Minister should take into consideration all these problems of farmers while making Budget allocations for them.

The amount for the Members’ Constituency development has been increased from 1 crore to 2 crores of rupees. I welcome this step. I was a member of 10th Lok Sabha. I have fully utilised this amount for the development of my constituency. In fact, all the members have utilised this amount for the development of their respective constituencies.

The National Highway No. 4 between Bangalore and Tumkar is only a single line. A large number of accidents are taking place on this route everyday. Hence I request the Hon. Minister to allocate more funds to double this very important and high traffic density route. Similarly the railway line between Bangalore and Tumkar. I have sent several representations to the Government of India requesting them to double this railway line. I trust the Hon. Minister will issue necessary orders to double this vital route without any further delay.

ONE HON. MEMBER : You can lay it on the Table of the House.

SHRI S. MALLIKARJUNAIAH : Yes I am going to lay it on the Table of the House. I will take only two minutes. i do not want to lest your patience. I fully understand your problem.

There are five tributaries at somavatapet and four tributaries at Sakaleshpura. These two join and it is called as Kumaradhara. Here about 60 TMC of water can be obtained. This flows towards west. This has to be diverted to flow towards east. This can be donw withoit any difficulty according to the revealings of latest engineering technology.

The centre should do something for the unemployed educated youths to provide jobs. The late Chief Minister Shri Devaraj Urs had introduced a novel stipendary scheme. On the lines of that scheme medical graduates can be paid Rs. 4,000/- per month as stipend. Engineering graduates may be given Rs. 3,500/- and graduates can get Rs. 2,500/- under-graduates may be paid Rs. 2,000/- per month. All these persons should be asked to serve rural areas complusorily for two years. Then finally then can go in search of jobs according to their education and experience. madam I am grateful to you for giving me a change to speak on this vital subject.

*A sustained programme for inproving the quality of public servants has to be made Explicit standards should be evolved. adopted and published and also prominently displayed at the point of delivery. These standards should invariably include courtesy and helpfulness from staff, accuaracy in _____________________________________________________________

* This Portion of the speech was laid on the Table.

accordance with statutory entitlements and commitment to prompt action. There should be a clear presumption that standards will be progressively improved as services become more efficient.

Choice, wherever possible, between competing value providers is the best spur to quality improvement. The public sector should provide choice wherever practicable, the people affected by services should be consulted. Their view about the services they use should be sought regularly and systematically to inform decisions about what services should be provided.

The citizen as a tax payer has a right to expect that public services must give value for money within a tax bill the nation can afford.

At present the system of fixing responsibility for lapses both in the case of individuals and organisations is far from satisfactory. The general impression is that neither responsibility is fixed nor appropriate punishment meted out. This is perhaps the single most important factor contributing to the indifferent attitude to complaints lodged by citizens. The citizens should therefore have the right to expect that not only will their complaints be acted upon and responsibility fixed for lapses, but also they should have the right to be informed of the action taken on their complaints. Only then can there by accountability and transparency in the Government machinery.

Services should be run to suit the convenience of information customers, not the staff. This means flexible opening hours and telephone enquiry points that direct callers quickly to someone who hope them.

Full accurate information should be readily available in plain language, about what services are being provided. Targets should be published together with full and audited information about the results achieved.

Wherever possible, information should be in comparable form so that there is a pressure to emulate the best.

There should be no secrecy about how public services are run what rules and procedures they follow in making available such services, how much they cost, who is in charge, and whether or not they are meting their standards. Public servants should not be anonymous. Save only where there is a real threat to their safety, all those who deal directly with public should wear name badges and give their names on the telephone and in letters.

Not only by making available relevant information to the public, but also providing easy access to such information especially in regard to rules and procedures and redressal of grievances.

“> श्री भेरूलाल मीणा (सलूम्बर) : सभापति महोदय, मैं इस बजट का विरोध करने के लिए खड़ा हुआ हूं। कयोंकि आप ज्यादा समय नहीं देंगी, इसलिए मैं खास करके मजदूरों के संबंध में कुछ बात कहूंगा।

  सभापति महोदय : मीणा जी, एक मिनट रुकिये। जो माननीय सदस्य अपनी स्पीच टेबल पर ले करना चाहते हैं वे अपनी स्पीच ले कर सकते हैं।

  श्री भेरूलाल मीणा : सभापति महोदय, वित्त मंत्री जी के भाषण में यह कहा गया है कि सरकारी उपक़मों में काम करने वाले श्रमिकों को छंटनी कर दी जायेगी, उसका कारण यह बताया गया है कि सरकारी उपक़म घाटे में जाते हैं और यह कहा गया कि उनको बंद कर दिया जायेगा और मजदूरों की छंटनी कर दी जायेगी। आपने इसके साथ ही थोड़ा लालच देने की बात कही है कि हम उनको थोड़ा पैसा देकर उनकी छंटनी कर देंगे और यह भी कहा कि मजदूरों के कारण ही घाटे के कारखानों को चलाना पड़ता है, आपने अपने भाषण में यह नहीं कहा लेकिन यह जरूर कहा था कि मजदूर ही कारखानों को घाटे में ले जाने के जिम्मेदार हैं। मैं स्वयं हिंदुस्तान जिंक में काम करता था और आज भी हिंदुस्तान जिंक में मजदूरों का प्रतनधित्व करता हूं। हिंदुस्तान जिंक में जितने भी मजदूर हैं वे यह जिम्मेदारी समझते हैं कि यह कारखाना हमारा है और हम इसको ठीक ढंग से चलायेंगे। उसी प्रकार से जो वहां का मैनेजमैंट है वह भी इस बात को समझता है कि मजदूरों की समस्या का समाधान किया जाए और इस कारखाने के उत्पादन को बढ़ाया जाए। हिंदुस्तान जिंक में कभी भी ऐसा मौका नहीं आया जिससे कि कभी उनको घाटा हुआ हो। यह हमेशा लाभ कमाता रहा है।

  सभापति महोदय : मीणा जी, यह डिस्कशन बजट पर हो रहा है, पब्िलक सिस्टम पर नहीं हो रहा है।

  श्री भेरूलाल मीणा : सभापति महोदय, मैं वही कह रहा हूं कि जब इन्होंने कहा है कि उपक़मों को बंद करके मजदूरों को छंटनी कर दी जाएगी। जब सरकार यह चाहती है कि मजदूरों को ज्यादा रोजगार मिले, बेरोजगारी कम हो।

  सभापति महोदय, जो मजदूर पहले से नौकरी कर रहे हैं, उनको भी निकाल रहे हैं, तो फिर बेरोजगारी कैसे दूर होगी। सरकारी उपक़मों में काम करने वाले मजदूरों और अधिकारियों, दोनों में समन्वय होना चाहिए। यह बात यदि दोनों तरफ से हो तो सरकारी उपक़म में घाटे का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसलिए मेरा निवेदन है कि मजदूरों के ऊपर दोषारोपण करके उपक़मों को आप बंद करेंगे, तो यह अच्छी बात नहीं है।

  सभापति महोदय, मैं खास तौर से राजस्थान के पिछड़े इलाके से आता हूं। मैंने एक प्रश्न पूछा था कि राजस्थान का जो दक्षिणी इलाका है, वहां जमीन है ही नहीं, जहां छोटी-छोटी जमानें हैं वहां पानी नहीं है, उन पहाड़ों का पानी छोटे-छोटे तालाब बनाकर या बांध बनाकर उनमें इकट्ठा किया जाए ताकि सिंचाई के काम आ सके, तो जवाब आया कि भारत सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है। मेरा निवेदन यह है कि एक तरफ गरीब लोगों को, आदिवासी, वनवासी और पिछड़े लोगों को कोई सुविधा देने की बात कही जाती है, तो उसका सीधा-सीधा उत्तर आ जाता है कि यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है, राज्य सरकार की जिम्मेदारी है और जब हम राज्य सरकार से पूछते हैं, तो वह कहती है कि भारत सरकार पैसा देगी, तो हम काम करेंगे। मेरा निवेदन है कि हमारे दक्षिणी राजस्थान में पहाड़ हैं, पश्िचमी राजस्थान में रेगिस्तान है और उत्तर दक्षिणी राजस्थान में थोड़ा सा मैदानी भाग है। वहां कोई बड़े उद्योग भी नहीं हैं। इसलिए मेरा निवेदन है कि राजस्थान को अधिक से अधिक धनराशि दी जाए ताकि उन गरीब लोगों को लाभ मिल सके कयोंकि वहां न तो कारखाने हैं और न वहां कोई और सुविधा है। इसलिए मैं इस मौके पर एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि हमारे यहां पहाड़ी इलाका है वहां वनों की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाई जाती है। एक क्षेत्र में जब बाड़ लगाई जाती है, तो उसे पांच साल तक लगाकर पुन: हटा दिया जाता है और आम जनता को उसे उसके यूज के लिए खोल दिया जाता है। इससे कया होता है कि पांच साल में जो थोड़ा बहुत वन लगा होता है वह फिर खराब कर दिया जाता है। इसलिए मेरा आग्रह है कि जब एक बार बाड़ लगाकर किसी वन क्षेत्र को सुरक्षित किया जाए, तो फिर उसे आम जनता के लिए खोला न जाए। उसमें जो घास-फूस हो, उसे जनता को लेने देना चाहिए। इससे स्थानीय जनता को लाभ होगा और वन की रक्षा भी हो सकेगी। सभापति महोदय (प्रो. रीता वर्मा): माननीय सदस्य, कृपया एक मिनट में कन्कलूड कीजिए। श्री भेरूलाल मीणा : सभापति महोदया, यदि आप मुझसे बैठने की कह रही हैं, तो मैं बैठ ही जाता हूं।

  श्री एस. मल्िलकार्जुनय्या : सभापति महोदया, माननीय मीणा जी, राजस्थान के पिछड़े इलाके से आते हैं। उन्होंने अपनी स्पीच समाप्त नहीं की है। इसलिए मेरा आग्रह है कि कृपया उन्हें अपनी स्पीच समाप्त करने का मौका दें।

  सभापति महोदय : मैंने तो माननीय सदस्य को एक मिनट में कन्कलूड करने के लिए कहा था। मैंने उन्हें बैठने के लिए नहीं कहा था। यदि वे अब भी चाहें तो अपनी बात समाप्त कर सकते हैं।

  श्री भेरूलाल मीणा : सभापति महोदया, मेरा एक निवेदन यह है कि बी.जे.पी. की सरकार कहती है कि हम अच्छा काम करेंगे। मैं खुद सांसद हूं। हम अपने सांसद कोटे का पैसा

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : मीणी जी, कृपया एक मिनट में समाप्त करें। आप यह समझें कि आपको पांच मिनट और मिल गए हैं, ऐसी बात नहीं है। कृपया एक मिनट में समाप्त करें।

  श्री भेरूलाल मीणा : ठीक है, सभापति महोदया, मैं बैठ जाता हूं।

 

“>SHRI B.M. MENSINKI

(DHARWARD SOUTH) : Madam Chair, at the outset I would like to thank you for permitting me to speak on the General Budget, 1998-99. I congratulate the Hon. Finance Minister for abolishing the Gift Tax. There are many other such acts. They should be abolished.

Last year the Government of India had introduced VDIS, Voluntary Disclosure of Income Scheme and about 40,000 crores of rupees had been disclosed as income. Government got about 10,000 crores of rupees as tax.

Wanchoo Committee gave its report on income tax in the year 1984. I too wish that 44AB and 44AF of the Income Tax Act have to be deleted because these have affected more than 3 lakh self employed advocates. 44AB and 44 AF have to be deleted or the tax advocates having an experience of 5 to 10 years may be permitted to do the practice and audit.

Recently some farmers have committed suicide in Karnataka. They could not get the yield according to their investment. In the absence of support price and other assistance farmers had no other alternative but to commit suicide.

Government has increased the support price by one hundred rupees per quintal very recently. I request the Hon. Minister to give such support price to paddy, jowar, govina jowar and ragi. Petrol price has been increased by one rupee per litre. About 50% of the petrol consumption is by the Government vehicles and hence there need not be any panic in this regard.

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*Translation of the speech originally delivered in Kannada.

There was a proposal to set up Southern Railway Zone at Hubli. Now it appears that efforts are being made to set up this zone in Bangalore. I urge upon the Hon. Minister to set up this Southern Railway Zoe only in Hubli.

I request the Government of India to set up a bench of High Court of Hubli. Hubli is a far off place from Bangalore and common man finds it very difficult to come to Bangalore. Hence a bench of High Court is very essential in the northern region. The best place for this purpose is Hubli. Corruption is spreading in our society like cancer. Corruption is rampant particularly at higher levels. This has to be curbed at the earliest. For example I declared my assets and liabilities to the election officers while filing my papers for the MP election. I wish all others would do the same and help the Government to check corruption. Some people do the job without saying anything. So others say and do the job. There is the third category where people say but they never do the job. I was reminded of this Kannada saying when I talk about sincerity and promptness.

As my learned colleague has said the opposition should prepare an unofficial budget and compare it with the Budget of the Government. They should not criticise the Government unnecessarily.

Upper Thunga project in long pending demand of the people of Karnataka. It can provide water to 3.35 lakh areas of land for irrigation at the first stage. This project covers Rani Bennur, Haveri, Here Kerur and Hanagal. I request the Hon. Minister of Finance to release sufficient funds for this project during this year 1998-99 and make the dream of the people of my constituency a reality.

Madam Chairman, thank you and with these words I conclude my speech.

  सभापति महोदय : समय बहुत हो गया है इसलिए मैं अनुरोध करूंगी कि बाकी जो माननीय सदस्य बोलने वाले हैं, वे अपनी बातें पांच मिनट में समाप्त करें वर्ना सुबह हो जायेगी।

“>SHRI TAPAN SIKDAR (DUMDUM): Madam, I support this Budget because I consider this Budget as a milestone towards self-reliance, I consider this Budget as the golden Budget in the Golden Jubilee Year of Indian Independence, I consider this Budget practically free from dictation of a foreign country, I consider this Budget pro-farmer, I consider this Budget pro-people. This Budget will make the country enter into an era of high and sustainable growth in agriculture and industry.

There were two challenges before our Finance Minister. The first challenge was to kickstart the economy which had been passing through a sluggish growth of industry, agriculture and exports. The second challenge was to face the economic sanctions announced by several rich countries. I congratulate our Finance Minister for his bold step to combat these challenges and to practically counter the challenges. He has increased the Central Plan outlay by Rs. 2,400 crore which is more than 30 per cent. He has also increased the agricultural sector outlay by 58 per cent. I am interested to tell those who consider this Budget as anti-farmer that this 58 per cent increase to agriculture sector, I think, is the highest ever increase. He has also increased the outlay for infrastructure by 35 per cent. This Budget also provides a scheme for small-scale sector. I think that all these increases in the public investment will increase the purchasing power of the rural people.

It will help create economic growth in the rural areas.

I would like to mention that our Finance Minister has proposed to build 20 lakh houses for the homeless. Out of these twenty lakh houses, thirteen lakhs will be in rural areas and seven lakhs in urban areas. Those who are trying to describe this Budget as anti-poor should realise that for the last one decade, no such project was taken up by any other Government.

The Special Bond Scheme for NRIs shall encourage Indians living abroad and I think this will help our farming sector. Speedy disposal of foreign investment proposal within 90 days shall also increase the flow of foreign direct investment pending since long in the core sector.

I would like to mention that even though import of foreign newsprint has been tax-free, the Budget has imposed tax on the import of waste paper which is considered as the raw material for paper industry. My request is to remove tax on waste paper and to help the paper industry.

“>SHRI BIJOY KRISHNA HANDIQUE (JORHAT): Since you have rationed my time, I will mention the points only.

As regards industry, the Swadeshi mantra boils down to protectionism. We have to bear in mind that a steady reduction in the peak level of import tariffs has been the legacy of the past four years. Tariffs had declined to 40 per cent, exposing Indian industry to the bracing winds of overseas competition. Since then industrialists have been pressurising the Government to raise tariffs to enable themselves to adjust to globalisation. However, the actual incidence of this eight per cent hike is closer to 12 per cent of the pre-tax price since it is levied over and above the existing basic and special Customs duty. For a range of items, the peak level of tariffs will thus rise to 57 per cent – a roll back of the declining trend over the past four years. To this must be added the 15 per cent depreciation of the rupee over the year. Thus the level protection for Indian industry takes a quantum jump. It may be, no doubt, argued that this import duty hike is permissible under WTO rules. But the significant point we must not lose sight of is that higher domestic walls do not make Indian industry competitive.

1.00 hrs. (12.6.98)

They only provide a bonanza of additional profits to domestic industrialists. The result is higher cost push inflation.

Besides, protectionism and higher tariffs always tend to serve importers at the cost of exporters. As a matter of fact, the focus should be on increased competitiveness.

It is however strange to observe that barring a veiled reference to Pokhran-II, there is not much about it in the Budget. Is it because the Finance Minister does want to conceal something significant? For, the Finance Minister showed so little concern about the economic fall out of our latest nuclear tests. Surely, he cannot seriously believe that the sanctions imposed the U.S.A. and followed up by some other major industrial countries would

have no impact on the economy. The net effect would be very large, at least surely not of the order that can be easily trifled. We should bear in mind that even a temporary halt of exports may upset our structure of foreign trade.

The hon. Finance Minister tends to play down the fear of sanctions on the ground that the U.S.A. has yet to define the depth and spread of its sanctions. That means he anticipates the sanctions though unaware of their depth and spread. Only he is not aware of the depth and spread of this exercise. That is why, I do not know how I should take it. Shall I take it as a studied non-chalance waiting on the prowl for the unwary taxpayers Because one has reasons to believe that there may be a Supplementary Budget with harsh realities? I do not know which is true.

Before I conclude, I would like to refer to the development of the North East which has been a quite also for a few years in all the Budgets.In all the Budget, it has appeared. The North-Eastern Development Financial Institutions (NEFDI) was incorporated in 1995 by the then Finance Minister Dr. Manmohan Singh. One of the basic problems in the region is the lack of infrastructure. That is why there were no takers in a significant way for the Five Year Tax Holiday announced earlier. The emphasis should be not on mega projects alone. Our objectives should be promoting medium and small projects initially. This will ensure quick results. Along with the manufacturing units, the infrastructure for increased trading activities is much needed. We have to explore the possibility of opening trade route with the neighbouring countries. That is, in a way, internationalising the economy. Goods from across the border will flow in and goods from the North-East will go out.

Improvement of bilateral relations with Bangladesh in early 1997 in the wake of the Ganga Water Treaty held out a promise of great possibilities in this respect. Unfortunately, this is not being followed up very seriously. In particular, I give one instance. For a landlocked State like Mizoram, a route through Bangladesh alone holds the key to its development. Similarly, the proposed road linking between Myanmar and India will give a big thrust in the promotion of trade between Assam and Myanmar, and Assam and Bangladesh.

There are also immense possibilities for river transport particularly along the river Brahmaputra as it cuts down the transportation costs for goods to reach Calcutta by 30 to 40 per cent. To achieve this objective, young entrepreneurs need to be motivated and trained. Above all, we need a sizeable fund allocation. The best way is to improve the financial position of the NEFDI. At the same time, the nationalised banks should be asked to involve themselves in these entrepreneurial activity. But let us not encourage as was done by the Government of Assam, that is, to encourage and back up a travel agency like Thomas cook asking for who took a licence to engage in banking activities in the North-East in parallel with NEFDI. It is a travel agency owned by the family of a sacked Director of the Tatas.

While concluding, I must say that in a climate when the rupee is crashing to an all time low and when the stock market is crashing, I doubt whether the Finance Minister can depend much on the second line of defence, that is, the NRIs fund. The NRIs one expeced to invest in the country in a significant way. Our past experience shows that NRIs are proverbially shy of investing in India. The drop of a hat puts them off. It is again the lure of profits and more profits that dictate their decisions. The Government must create a climate of credibility which alone can encourage investment national as well as foreign in the country and that can only give the much needed help to the country and to make its economy improve and stabilise.

I have however, a word of praise for the hon. Finance Minister. I must admit that there is a great boost to the farm sector in the Budget. Why I admit this is because when we discuss the Budget, we have both bouquets and brickbats to offer. Bouquets for the farm sector. It is a great thing that the hon. Minister has done but there are few things to which I draw hisa attention. He has started saying that water is a critical input for agriculture. But he did not make enough allocation for irrigation.It is just an increase of Rs.300 crore. I hope you will look into it and will increase the allocation..

Besides agriculture is largely a State subject, But the net resources transferred to the State has increased only marginally from Rs.89200 crore to Rs.90300 crore. It is an increase of only Rs.1000 crore which would have an adverse impact on the implementation on social development, development of irrigation and agricultural developmental programme. It is only an increase of Rs.300 crore for each such a large development programme.

When we were in Govt, we had initiated a step towards JRY or the rural employment programme but the hon. Finance Minister has increased it by only Rs.100 crore. That is only a chicken feed. I hope he will allocate more so that we can make it perfect and more perfect than when it was during the Congress rule.

With these words, I again thank the hon. Finance Minister, particularly for the farm sector.

“> श्री मित्रसेन यादव (फैजाबाद): सभापति जी, बड़ी प्रतीक्षा के बाद आपने समय दिया, आपका आभारी हूं।

  वैसे तो बजट पर लम्बी चर्चा हो चुकी है, बहुत से साथियों ने अपने बहुत से बिन्दुओं को रख दिया है, मैं उसकी पुनराव्ृात्ित करना नहीं चाहता। माननीय वित्त मंत्री जी ने जो बजट रखा है और वभिन्न विभागों के लिए जो मदें रखी हैं, उनपर जब हम नजर डालते हैं, वैसे आपके जरिये भी जो चर्चा हुई, उसको भी सुनने का मौका मिला। कृषि विभाग की बड़ी तारीफ की गई कि वित्त मंत्री जी ने हिन्दुस्तान में कृषि क्षेत्र में सबसे पहले इतनी अधिक धनराशि देकर उसको और सुदृढ़ किया है। हम समझते हैं कि जितनी कृषि विभाग को छूट दी गई है, कर्जे के मद में और दूसरी मदों में, उससे ज्यादा किसानों से लिया भी गया है, चाहे यूरिया का रेट बढ़ा दिया गया हो, चाहे ट्रैकटर का दाम बढ़ाया गया हो और चाहे कीटनाशक दवाओं पर टैकस लगाया गया हो। जितनी छूट नहीं दी गई है, उनसे कहीं ज्यादा उनसे वसूलने का प्रयास भी किया गया है तो इसमें बराबर है कि एक कूड़े का बालू दूसरे कूड़े में डालकर वह काम करना और उसके पीछे तारीफ कराना कोई बड़ी बात नहीं हुआ करती। वैसे तो कृषि क्षेत्र में हमारी जो सबसे बड़ी आवश्यकता है, वह सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हमारी जो इर्रीगेशन की योजनाएं हैं, उनको पूरी तरह से सुदृढ़ किया जाना चाहिए और कृषि क्षेत्र में आप जानते हैं कि कृषि उत्पादन की जो कीमत होती है, उसमें और औद्योगिक उत्पादन के बीच में बड़ा फर्क होता है। अगर कृषकों को फायदा पहुंचाने की सरकार की नीति है तो कृषि उत्पादन के मूल्यों और औद्योगिक उत्पादन के मूल्यों में समानुपातिक मूल्यांकन होना चाहिए। जब कृषि उत्पादन के मूल्य और औद्योगिक उत्पादन के मूल्यों में समानुपातिक व्ृाद्धि होगी, तभी किसान औद्योगिक उत्पादनों को खरीद सकेगा। इसलिए आज जो कृषि उत्पादन में हमें जरूरत है तो सबसे ज्यादा बिजली की जरूरत है, सबसे ज्यादा हमें उसके दाम की जरूरत है। कभी-कभी देखने को मिलता है, जैसी आप चर्चा कर रही थीं, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जब हम लोग ट्रेनों में चलते हैं तो १०० ग्राम के आलू के चिप्स का दाम हम लोगों को १२ रुपया लिया जाता है। एक प्लास्िटक के डिब्बे में उसको अंकल चिप्स बोलते हैं। १०० ग्राम आलू के चिप्स का दाम १२ रुपया वे लोग वसूल लेते हैं। जो नई टैकनोलोजी के साथ इस चीज को बनाते हैं। जो किसान पैदा करता है, वह एक किलो आलू का दाम भी १२ रुपये नहीं पाता है, इतना बड़ा अन्तर है। ऐसे ही हमारे दूसरे भी प्रोडकट हैं, हम यू.पी. निवास में ठहरे हैं, मैंने उनसे किसी दिन सवेरे नाश्ते में कोर्न फलेक मांगा कि हमको कोर्न फलेक दे दीजिए तो मालूम हुआ कि २५० ग्राम कोर्न फलेक १८ रुपये का है। किसान १८ रुपये चार किलो मककी का दाम भी नहीं पाता है तो किसान की लूट किस प्रकार की है, इसे हमारे वित्त मंत्री जी को देखना चाहिए।

  सरकार में बैठने वाले लोग जो उनकी तारीफ कर रहे हैं, किसान की लूट के बारे में भी उनको सोचना चाहिए। किसान की लूट और प्राकृतिक आपदाएं जितनी उसको झेलनी पड़ती हैं, वे शायद ही किसी और वर्ग को झेलनी पड़ती होंगी। जितनी उसको बाढ़, सूखा और तमाम दिककतों से निपटना पड़ता है। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि बरसात का पानी बड़ी तेजी से आता है और बह जाता है। हम सूखे कि शिकार भी होते हैं और हमारा पानी का स्टेटा भी नीचे चला जाता है। आज पीने के पानी की भी दिककत है, लेकिन बरसात के पानी की उपयोगिता को हम रोकते नहीं। कहीं भी हम पानी को रोककर वाटर लेविल को ऊपर उठाने और इर्रीगेशन के सोर्स को बढ़ाने का काम नहीं करते। शायद हमारे बजट में कहीं ऐसा प्रावधान नहीं किया गया है। मैं माननीय वित्त मंत्री जी से चाहूंगा कि किसान की दिककतों को हल करने का जो हमारे पास सोर्स है, उनपर भी आपको विचार करना चाहिए, इसलिए किसान के बारे में जो कहा गया है कि बड़ी रियायतें सरकार कर रही है, हम इससे सहमत नहीं हैं, बल्िक किसान के सामने और भी बड़ी दिककतें हैं, जिनमें इस सरकार को रियायतें करने की और उनकी योजनाओं को, सिंचाई की योजनाओं को, पानी को रोकने की योजनाओं को, पानी के स्टेटा को उठाने की योजनाओं को और दैवी आपदा से बचने की योजनाएं सरकार को बनानी चाहिए। दूसरी बात है कि जो आपने ग्रामीण विकास की बात कही है, चाहे जे.आर.वाई. हो, चाहे एस.आर.वाई. हो, चाहे दूसरी योजनाएं हों, जो केन्द्र पोषित योजनाएं हैं और चाहे वह इन्िदरा आवास योजना हो। इन्िदरा आवास योजना में आपने पिछली निवर्तमान सरकार ने उसमें रुपया बढ़ाकर २० हजार किया। इसके पहले १२ हजार रुपया था। अब इस २० हजार में तीन हजार रुपये का उसके साथ लैट्रीन बाथरूम जोड़ दिया गया है, इसकी कोई जरूरत नहीं है। उसका दुरुपयोग होता है, इसीलिए हम चाहेंगे कि जो केन्द्र पोषित योजनाएं हैं, उनमें से जो परसेंटेज लगा देते हैं कि २० परसेण्ट भूमि सुधार पर लागू होगा, भूमि संरक्षण पर लोगा, व्ृाक्षारोपन पर होगा, नाली पर होगा, नापदान पर होगा। यह जो परसेण्टेज आप लगा देते हैं, इस परसेण्टेज की कहीं-कहीं, किसी-किसी प्रदेश में और किसी-किसी जिले में जरूरत नहीं है, लेकिन इस परसेण्टेज के लिहाज से पैसे की कटौती होकर उसका दुरुपयोग होता है। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि इस बजट में जो आप ग्रामीण विकास की योजनाओं में वित्त पोषित योजनाएं आप देते हैं, उन योजनाओं में आप इन चीजों को सोचकर डी.आर.डी.ए. की मीटिंग, जो ग्रामीण विकास अभिकरण की जिले की मीटिंग होती हैं, उनको छोड़ दीजिए कि वे उसका प्रयोग कैसे करेंगे।

  दूसरी बात, मुझे आपसे निवेदन करनी है कि ग्रामीण विकास अभिकरण की जो बैठकें होती हैं, आपके जिलाधिकारी उसके पूरे-पूरे मालिक होते हैं। हमारे सुझाव के मुताबिक, प्रस्ताव के मुताबिक कोई जरूरी नहीं, उसको मानें। जैसा चाहते हैं, वैसा बजट को एलोकेट कर देते हैं। हमारी आपसे गुजारिश है कि अगर इस लोकतंत्र में आप स्वतंत्र संस्थाओं को अधिकार देना चाहते हैं

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : अब आप समाप्त करें।

  श्री मित्रसेन यादव : जहां तक इसका सवाल है कि हमारे जो उत्पादन के स्रोत हैं, उन उत्पादन के स्रोतों को अगर आप प्राइवेट हाथों में रकेंगे तो नश्िचत रूप से उसकी आमदनी के पैसे या उसकी कमाई व्यकितगत हाथों में जायेगी, जिससे राष्ट्र का विकास नहीं होगा।

  सभापति महोदय : अब आप एक मिनट में खत्म करें।

  श्री मित्रसेन यादव : इस बजट में ग्रामीण विकास की, स्वास्थ्य सेवाओं की, सिंचाई की, कृषि की, बेरोजगारी की जो तमाम योजनाएं हैं, उनमें एक प्रश्न मैं और आपसे चाहूंगा कि ये सर्िवसेज में आपने जो दो साल बढ़ा दिये हैं, ५८ साल से ६० साल रिटायरमेंट की एज कर दी है, इसमें एक साजिश है। अगर कर्मचारियों को ५८ साल में रिटायर कर दिया जाये तो हजारों लाखों लोगों को सेवा करने का मौका मिल जाता है, इसलिए आपको चाहिए कि उसको वापस ले लें। जैसे यूरिया के दाम को वापस लिया है, वैसे इन सेवाओं में जो बढ़ोतरी कर दी है, उसको भी वापस ले लें, जिससे बेरोजगारी को खत्म करने में आपको मदद मिल सके। उससे अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के आरक्षण की जो सूची है, उसमें भी उनको मौका मिले।

  इन शब्दों के साथ मैं आपसे चाहूंगा कि आप कृषि के क्षेत्र में और सभी क्षेत्रों में बजट को लागू करने के लिए काम करें।

“> डा.रमेश चन्द तोमर (हापुड़): माननीय सभापति जी, मैं वर्ष १९९८-९९ के बजट का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। प्राथमिकता तथा उद्देश्य की दृष्िट से यह बजट पूर्व सरकारों से भिन्न है। मैं इस बजट का समर्थन इसलिए कर रहा हूं, कयोंकि इस बजट से देश को नई दिशा देने की कोशिश की गई है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केन्द्रबिन्दु मानकर यह बजट बनाया गया है।

  मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने यह बजट जमीनी हकीकत को ध्यान में रखकर बनाया है। यह एक साहसिक बजट है। इस बजट के द्वारा माननीय वित्त मंत्री जी ने मंदी के दौर से गुजर रही अर्थव्यवस्था को लाइन पर लाने का प्रयास किया है। फिस्कल डैफीसिट को ५-६ परसेंट तक लाने तथा ग्रोथ रेट को ६.५ परसेंट तक ले जाने के प्रयास इसका जीता जागता उदाहरण हैं। यह विकासोन्मुखी बजट है। यही कारण है कि इस बजट में कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, रोजगार एवं कल्याण के क्षेत्र पर अधिक जोर दिया गया है।

  आजादी के ५० साल बाद भी देश की ७० प्रतिशत आबादी गांव में रहती है। गांव में रहने वाले लोगों की आजीविका मुख्य साधन कृषि है। यह कहना कोई अतिश्योकित नहीं होगी कि गांव और कृषि एक दूसरे के पर्याय हैं। लेकिन बड़े खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि इस क्षेत्र के विकास के लिए जो ध्यान दिया जाना चाहिए था, वह नहीं दिया गया। पूर्व में बजट में भी इसकी उपेक्षा की गई थी। इस बात का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि आजादी के ५० साल बाद भी कृषि योग्य जमीन का ३७ प्रतिशत ही आश्वस्त सिंचाई के अन्तर्गत है। भारत का किसान मौसम के साथ जुआ आज भी खेलने को मजबूर है।

  जब तक कृषि और गांव का विकास नहीं होगा, तब तक देश का विकास सम्भव नहीं है। इस बात को वित्त मंत्री जी ने समझा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारत की अर्थव्यवस्था मानकर बजट बनाया, मैं उसके लिए इन्हें बधाई देता हूं।

  यह बजट स्वदेशी की भावना से ओतप्रोत है। बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री जी ने यह सुनश्िचत करने का प्रयास किया है कि इसका लाभ निर्धनतम एवम् निर्बलतम व्यकित को मिले।

  कृषि विकास दर में गिरावट दूर करने के लिए व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए बजट में कृषि और ग्रामीण क्षेत्र पर अधिक जोर दिया गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारतीय अर्थव्यवस्था को भारतीय अर्थव्यवस्था तथा समाज की धुरी बताते हुए सिंचाई के लिए ५० प्रतिशत बढ़ोत्तरी की गई है। उसका मैं स्वागत करता हूं। नाबार्ड के द्वारा किसानों की होल्िडंग के आधार पर किसान क़ेडिट कार्ड की सुविधा दिलाए जाने का भी मैं स्वागत करता हूं। उसके द्वारा किसान अपनी आवश्यकता के अनुसार खाद, बीज, कीटनाशक दवाइयां और नगदी प्राप्त कर सकेंगे। किसानों की चिरकालीन कठिन ऋण समस्या के समाधान के लिए आर.बी.आई. को बकाया कजर्ों के पुराने मामलों को समस्या रहित निरस्तारण के लिए जो निर्देश दिए गए हैं, उसके लिए मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देता हूं। किसानों को जो कर्ज दिया जाता है उसका ब्याज मूल से दोगुना नहीं वसूल करने के लिए आर.बी.आई. को जो कहा गया है, उसके लिए भी मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देता हूं। आजादी के पचास साल पूरे हो रहे हैं, लेकिन अभी तक हमारी कोई राष्ट्रीय कृषि नीति नहीं बनी है। आपने अपने बजट में राष्ट्रीय कृषि नीति का दस्तावेज सदन के पटल पर रखने का वादा किया है, मैं उसका भी स्वागत करता हूं। ग्रामीण विकास पर ८१८२ करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है, जबकि पिछले वर्ष के बजट के संशोधित अनुमान से १२३३ करोड़ रुपये ज्यादा है। सिंचाई एवम् बाढ़ नियंत्रण पर भी आबंटन २६८ करोड़ से बढ़ाकर ३७४ करोड़ रुपये कर दिया गया है। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के अवसर अधिक मिलें उसके लिए बजट में पिछली बार की तुलना में १५५६ करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी की गई है, इसका भी मैं स्वागत करता हूं। बजट में शिक्षा की मद में ५० प्रतिशत की व्ृाद्धि की गई है और बजट प्रस्तुत करते समय माननीय वित्त मंत्री जी ने शिक्षा पर घरेलू सकल उत्पाद का छः प्रतिशत खर्च करने का अपना संकल्प भी दोहराया है, मैं उसका स्वागत करता हूं। १९९७-९८ में शिक्षा का संशोधित बजट ४७१५.८५ करोड़ रुपये था, इस बार १९९८-९९ में यह बजट ७०७६.८२ करोड़ रुपये कर दिया गया है। लड़कियों को स्नातक तक की शिक्षा मुफत देने के लिए बजट में १०० करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

  युवावर्ग तथा खेल कूद विभाग का १९९७-९८ का संशोधित बजट १५८.३९ करोड़ रुपये था, उसकी अपेक्षा इस बार २१४.७६ करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। युवाओं को राष्ट्रीय निर्माण में लगाने के लिए राष्ट्रीय पुनर्िनर्माण कोष की स्थापना की गई है, उसका भी मैं स्वागत करता हूं।

  बजट में आवासीय समस्या को पूरा करने पर अधिक बल दिया गया है। इस बात का मैं स्वागत करता हूं। इस साल में २० लाख आवासीय मकान जिनमें १३ लाख ग्रामीण क्षेत्र में और सात लाख शहरी क्षेत्र में बनाए जाएंगे। आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने के लिए अनेक प्रोत्साहनों का प्रस्ताव किया गया है। इसका भी मैं स्वागत करता हूं।

  बजट में वेतन भोगी कर्मचारियों को राहत दी है, मैं उसका स्वागत करता हूं। मैंने बजट के हर पहलू का स्वागत किया है, लेकिन मैं कुछेक बातें उनसे कहना चाहूंगा। वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए आयकर की छूट सीमा को आपने चालीस हजार रुपये से बढ़ाकर पचास हजार रुपये किया है। इसी तरह से आपने मानक कटौती की सीमा जो पहले बीस हजार रुपये थी उसको बढ़ाकर पच्चीस हजार रुपये की है, चकित्सा व्यय को कर मुकत प्रतिपूर्ित की उच्चतम सीमा दर दस हजार से बढ़ाकर पन्द्रह हजार रुपये की है तथा करों को सरल बनाने के लिए तीन नई योजनाएं सरल, समाधान और सम्मान शुरू करने का प्रस्ताव किया है, मैं उसका स्वागत करता हूं।

  लघु उद्योगों के लिए भी बजट में बहुत सी रियायतों की घोषणा की है। लघु उद्योगों को ऋण के लिए बड़ी मारामारी करनी पड़ती थी, लेकिन वित्त मंत्री जी ने उसे सरल बनाने के लिए अधिकतर ऋण प्रस्तावों को मंजूरी देने के लिए संबद्ध बैंक के शाखा प्रबंधकों को अधिकार दिए हैं। इससे उद्योगों में ऋण का प्रवाह तेजी से बढ़ेगा। इंस्पैकटर राज हटाने के लिए उत्पाद शुल्क प्रशासन, प्रशासन तंत्र में परिवर्तन की भी उद्योग जगत ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

  अंत में मैं वित्त मंत्री जी को दो-तीन सुझाव देना चाहता हूं। आपने यूरिया के दाम में पचास पैसे प्रति किलो की जो व्ृाद्धि की है, आप उसे वापस लेने की कृपा करें। इस देश का किसान आपको धन्यवाद देगा। इसी तरह से आपने आयकर में छः मानकों को लिया है, उसमें टैलीफोन को भी शामिल किया है। मेरा सुझाव है कि टैलीफोन कि उससे अलग रखने का कष्ट करें।

  पांचवें वेतन आयोग ने सरकारी कर्मचारियों के लिए वाहन भत्ते की तीन स्लैब का प्रावधान किया है। इसमें त्ृातीय श्रेणी और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के लिए १०० रुपये महीना, द्वितीय कर्मचारियों के लिए ४०० रुपये और प्रथम श्रेणी के कर्मचारियों के लिए ८०० रुपये महीना देने का प्रावधान है। एक कर्मचारी चाहे वह चतुर्थ श्रेणी का हो या प्रथम श्रेणी का, जब बस से यात्रा करता है तो बराबर का टिकट लेता है। छः रुपये आने के और छः रुपये जाने के उसे रोज देने पड़ते हैं। एक महीने में उसे ३६० रुपये देने पड़ते हैं। इसलिए मेरा अनुरोध है कि इस स्लैब को तीन श्रेणी से हटाकर केवल दो श्रेणी तक ही सीमित रखें और इसे ४०० रुपये और ८०० रुपये कर दें।

  अंत में मैं विपक्ष के माननीय सदस्यों से प्रार्थना करूंगा कि इतना अच्छा बजट माननीय वित्त मंत्री जी ने पेश किया है, आप इसे सर्वसम्मति से पास करने की कृपा करें।

  श्री चन्द्रशेखर साहू : हमारी पार्टी अन्त्योदय पर विश्वास करती है, मेरा नाम अंतिम है, उस पर भी विचार करें।

  सभापति महोदय : करेंगे।

“> श्री रामदास आठवले (मुम्बई उत्तर-मध्य) : अर्थ मंत्री ने जो इस साल का बजट सदन में पेश किया है, उससे देश में कोई आर्िथक परिवर्तन नहीं होगा। गरीबों की गरीबी हटाने केलिए इस बजट का उपयोग होने वाला नहीं है। कयोंकि हमारे देश में इतना भ्रष्टाचार नौकरशाहों में है कि वह बढ़ता ही जा रहा है। उसको कम करने के लिए हमें पहल करनी होगी। बजट से लोगों की प्रतक़िया है कि अमेरिका से, जापान से हम अभी भी बहुत पीछे हैं। इसके लिए वित्त मंत्री जो लोगों की आय बढ़ाने की तरफ ध्यान देना चाहिए। इस पर हम लोग चर्चा भी करते हैं। आप लोग जब इधर थे तब आप भी बोलते थे, अब उधर आ गए हैं तो आपको भी इसमें दिककत आ रही है।

  हम कोई रोने वाले नहीं हैं, आप जाने वाले हैं।

  हम आने वाले हैं, आप रोने वाले हैं।

  मैं भाषण नहीं करूंगा, कयोंकि भाषण करूंगा तो आधा घंटा चला जाएगा। इस वकत सबसे ज्यादा जरूरत देश की आबादी पर कंट्रोल करने की है। हम डेढ़ करोड़ होने जा रहे हैं। इसको नियंत्रण में करने के लिए सरकार को कोई कानून बनाने का प्रयास करना चाहिए। उसमें यह प्रावधान होना चाहिए कि एक परिवार – एक बच्चा। अभी तो यही होता है कि एक परिवार – तीन बच्चे। इस कारण हम एक सौ करोड़ तक पहुंच रहे हैं। इसलिए सरकार को एक परिवार – एक बच्चा का नारा देना चाहिए। आबादी कम करने की जिम्मेदारी केवल सरकार की ही नहीं है। इसके लिए समाज में परिवर्तन करने की भी जरूरत है। सामाजिक परिवर्तन करने के सम्बन्ध में भी विचार होना चाहिए। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए केन्द्र सरकार, योजना आयोग की गाइडलाइंस होनी चाहिए।

  सभापति महोदय : आप बजट में परिवर्तन का सुझाव दें और देकर खत्म करें, कयोंकि आपको सिर्फ दो मिनट मिले हैं और वह भी पूरे हो गए हैं।

  श्री रामदास आठवले (मुम्बई उत्तर-मध्य) : खत्म तो करूंगा, लेकिन इतनी जल्दी नहीं होगा।

  देश में शेडयुल्ड कास्टस और शैडयुल्ड ट्राइब्स की पोपुलेशन २३ प्रतिशत है, इसलिए बजट में २३ प्रतिशत का एलोकेशन होना चाहिए। प्लानिंग कमीशन द्वारा इस तरह की गाइडलाइन्स दी जानी चाहिए। वित्त मंत्री जी को इस बारे में विचार करना चाहिए।

  महोदय, इसके अलावा शैडयुल्ड कास्टस और शैडयुल्ड ट्राइब्स स्टूडेंटस की स्कालरशिप्स को महंगाई के मुताबिक होना चाहिए। यह भी हमारी मांग है। इसके अलावा जो बेरोजगार लोग हैं, उनको तीन साल के अन्दर नौकरी मिलनी चाहिए। अगर हम उनको तीन साल के अन्दर नौकरी देने में कामयाब नहीं होते हैं, तो उनको १५०० रूपए का बेरोजगारी भत्ता देना चाहिए।

  एक बात में मुम्बई शहर के बारे में कहना चाहता हूं। मुम्बई अपने देश की इकोनोमिक कैपिटल है, इसलिए इस शहर के विकास के लिए भारत सरकार को अपने बजट में ज्यादा से ज्यादा पैसे देने चाहिए। मुम्बई में धारावी योजना के विकास के लिए १०० करोड़ दिया गया था, वह अभी तक पूरी नहीं हुआ है। वित्त मंत्री जी से निवेदन है कि धारावी के विकास के लिए बजट में ज्यादा से ज्यादा बजट में प्रावधान करना चाहिए। माननीय वित्त मंत्री जी डायनेमिक मनिस्टर हैं, मुझे आशा थी कि उनका बजट डायनेमिक बजट होगा, लेकिन बजट उतना डायनेमिक नहीं है, जितना डायनेमिक होना चाहिए। आप वहां है, जहां आप निर्णय नहीं ले सकते हैं। किसानों के बारे में भी उधर से बोलने वाले नहीं हैं। मैं कहना चाहता हूं कि आपको इस बारे में विचार करना चाहिए।

“> ०१३२ बजे

  श्री चन्द्रशेखर साहू (महासुमन्द): सभापति महोदय, इस सदन में जिस बजट पर चर्चा हो रही है, साधारणतया यह मानकर चल रहे हैं कि इस देश के आर्िथक, सामाजिक सोच का यह सालाना प्रतबिम्ब है। मैं पं. दीनदयाल उपाध्याय के शब्दों को याद कर रहा हूं, जिसमें उन्होंने इस देश के सामाजिक, आर्िथक व्यवस्था के लिए कहा था कि अर्थ का प्रभाव और अर्थ का अभाव, दोनों इस देश के लिए खरतनाक है –

affluence of money and scarcity of money. उन्होंने एक और बात भी कही थी –

production by masses and not by machineries. इसको इस बजट में साबित करने का प्रयास हुआ है। मैं इस पवित्र सदन में और इस महान सदन में, १९६४ में दिए गए डा. लोहिया के उस भाषण को याद करना चाहता हूं, जिसमें उन्होंने कहा था – २७ करोड़ ादमी यहां तीन आने रोज में जिन्दगी बिताते हैं, साढ़े सोलह करोड़ आदमी १ रु. रोज में जिन्दगी बिताते हैं और ५० लाख आदमी ३५ रुपए में रोज अपनी जिन्दगी बिताते हैं। डा. राम मनोहर लोहिया जी ने आगे कहा था – अर्थ के हिसाब से और जाति के हिसाब से यह बजट आज तैयार नहीं हो रहा है। कया समाजवाद है, कया पूंजीवाद है, कया एकाधिपत्यवाद है और उसके बारे में बड़ी रंगीन-रंगीन बातें करना कोई विशेष अर्थ नहीं रखता। उन्होंने आगे कहा था, ५० लाख लोग मेरे हिसाब से करीब ५० अरब रुपए हजम कर जाते हैं। कया यह बजट उन लोगों के लिए बनाया गया है, जिनकी ओर इंगित किया गया है, माननीय चिदम्बरम जी के द्वारा, विश्व बैंक के द्वारा,

IMF के द्वारा, इंडियन एशियन डवेलपमेंट एसोसिशऩ के द्वारा। यह बजट ग्रामीण अर्थ व्यवस्था के लिए है, उन करोड़ो सर्वाहार लोगों के लिए है, जिनके मुंह में वाणी नहीं है। ऐसे लोग जो रोज काम करते हैं, रोज मेहनत करते हैं और उनको जिन्दगी में एक जून की रोटी भी नसीब नहीं होती है। ऐसे लोगों के लिए यह बजट है।

  मैं आपका ध्यान यू.एन.विश्व निवेश की रिपोर्ट की ओर आकर्िषत करना चाहता हूं। इसी सदन में आर्िथक समीक्षा स्पष्ट दिया है कि भारत में विश्व निवेश अमरीका के १७५० मलियन डालर का है। १९९५-९६ की समीक्षा में इस देश की अर्थ व्यवस्था के साथ ऐसी कोई बात नहीं कही है, यह कतई स्पष्ट नहीं है। मैं आपका ध्यान माननीय सांसद द्वारा प्रकाशित “इंडिया सम-फैकटस” की ओर आकर्िषत करना चाहता हूं। इसमें पर-कैपिटा इनकम को भी दर्शाया गया है। पर-कैपिटा इनकम दो महीने के कैसे घट जाये, कैसे कम हो जाए, न कभी ऐसा संभव हुआ है और न कभी ऐसा संभव होगा। यह बजट वास्तव में जिस प्रकार का है, वह इन बातों से स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी का जो घोषणा पत्र है, उसमें जो स्पष्ट है कि हम आर्िथक राष्ट्रवाद की बात करना चाहते हैं। हम ऐसा राष्ट्र बनाना चाहते हैं, जिसकी धूरि राष्ट्रवात पर खड़ी हो। जिसमें सबसे अंतिम व्यकित के आंसू पोछने केलिए अर्थतन्त्र आए। अर्थतन्त्र न केवल पटरी पर आए, बल्िक गरीब से गरीब आदमी भी अपने आपको मुख्य धारा में शामिल माने। भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में है कि भारत तब तक शकितशाली, समर्थ और स्वाभिमानी नहीं होगा, जब तक हमारी ग्रामीण व्यवस्था और किसानों की स्िथति में गुणात्मक विकास नहीं हो जाता। इसलिए इस बजट को आप सैन्सैकट का बजट नहीं कह सकते हैं। कहा जाता है, सैन्सैकट नीचे गिर रहा है और पूंजी बाजार के लिए आपने कुछ नहीं किया। कैपिटल मार्केट की आपको कोई चिन्ता नहीं है। ऐसे कितने प्रतिशत लोग हैं, जो भावी बाजार से संबंधित हैं। यदि आप देखें, देश में सौ करोड़ आबादी होने जा रही है। हम २०पी सदी के आखिरी पायदान पर हैं और २१वीं सदी के दहलीज पर खड़े हैं। इस बजट में भय, भूख और भ्रष्टाचार से लड़ने की बात है। हमारे माननीय वित्त मंत्री जी सबकी बात बड़े ध्यान से सुन रहे हैं, चाहे कोई आलोचना कर रहा हो, चाहे कोई प्रशंसा कर रहा हो, वे बड़ी ही शान्त और नलिप्त भाव से सब की बात सुन रहे हैं। चरैवेति-चरैवेति के सिंद्धात पर चल रहे है । मुझे विश्वास है, यदि सदन ने गम्भीरता से वास्तविक स्िथति को लिया, तो भारत अपने पुरुषार्थ पर खड़ा होगा। इसका उल्लेख आपने आपने भाषण में भी किया है। अंत में, राबर्ट फास्ट ने जो पंकितयां कही थी, वह मैं कह रहा हूं

  सघन है, गहन है, विजन है सुहाना

  कहीं रुक न जायें, कहीं सो न जायें

  हमें उसके पहले बहुत दूर है जाना, बहुत दूर है जाना।

श्री सुरेन्द्र सिंह बरवाला (हिसार) : माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने केलिए समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। माननीय वित्त मंत्री जी ने जो बजट सदन में प्रस्तुत किया है, उसका मैं समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। वित्त मंत्री जी ने हर वर्ग का ध्यान इस बजट में रखा है और उनको ऊपर उठाने की बात कही है। यह एक सराहनीय कदम है।

  पिछले पचास सालों के इतिहास में बजट तो हर साल सदन में प्रस्तुत किए गए, लेकिन उनसे देश में गरीबी बढ़ी है।

  बेरोजगारी बढ़ी है, हर चीज की दिककत आई है। मगर वित्त मंत्री जी ने इस बजट में विशेष ध्यान रखा है, उसके लिए मैं इनको धन्यवाद करता हूं। मैं उनका ध्यान कृषि की तरफ भी दौड़ाना चाहूंगा, कयोंकि ७६ फीसदी इस देश के लोग कृषि पर निर्भर करते हैं। पिछले दिनों जो आत्महत्याएं हुईं वह आर्िथक तंगी की वजह से हुईं, उसकी तरफ ध्यान देना चाहिए। कृषि में जो खर्चा होता है- चाहे वह बीज है, खाद है या और कुछ है उस पर भी सब्िसडी देनी चाहिए, इस बात का ध्यान रखना चाहिए, जिससे किसानों को आर्िथक तंगी न आए, आत्महत्याएं न हों। इस देश के अंदर कुछ जमीन ऐसी है जो वाटर लोगिंग की वजह से खराब हो गई है। हरियाणा में तो लाखो एकड़ जमीन खराब हुई है। उसको सुधारने के लिए प्रदेश के पास कोई बजट नहीं है। मैं चाहूंगा कि केन्द्र की तरफ से बजट में प्रावधान होना चाहिए, जिससे कि वह जमीन ठीक हो सके और किसान उसको फिर से कृषि के लिए योग्य बना सके। उद्योगों के लिए भी मैं कहना चाहूंगा, वित्त मंत्री जी ने जो बजट रूपया में रखा है वह अच्छा रखा है, मगर कृषि उद्योग की तरफ मैं ध्यान दिलाना चाहूंगा। छोटे-छोटे उद्योग, जो कृषि पर निर्भर हों, उनकी तरफ भी विशेष ध्यान देना चाहिए।

  वित्त मंत्री ने शिक्षा के लिए, खास कर लड़कियों के लिए सौ करोड़ रुपए का प्रावधान रख कर एक अच्छा कदम उठाया है, जिससे कि हमारी लड़कियां शक्षित होकर समाज में बराबरी पा सकें, इसके लिए मैं मंत्री जी को धन्यवाद करना चाहूंगा। मैं हरियाणा प्रदेश के एसवाईएल नहर की तरफ भी आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा। आदरणीय चौधरी देवी लाल जी ने इस नहर को बनाने के लिए १९८६ में संघर्ष किया था और हरियाणा प्रदेश में १९८७ में चुनाव हुए, ८५ सीटें जीता कर उनको मुख्य मंत्री बनाने का काम किया था। इस बात से अंदाजा लगा लें कि एसवाईएल नहर हरियाणा प्रदेश के लिए बहुत महत्व रखती है, खास कर किसान के लिए प्यासी जमीन के लिए, पीने के पानी के लिए महत्व रखती है। जब चौधरी देवी लाल जी देश के उप प्रधानमंत्री जी थे तब पूर्व प्रधानमंत्री, श्री चन्द्र शेखर जी से इसको बीआरओ के अंदर इस काम को कराने का कार्य किया था और उस समय यह बीआरओ के सुपुर्द सौंप दिया गया था। मगर सात साल से इसके ऊपर एक पैसा भी बजट में नहीं रखा गया।

  मैं वित्त मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि एसवाईएल नहर को पूरा करने के लिए बजट में इसका पैसा रखा जाए, जिससे कि हरियाणा प्रदेश की प्यासी धरती को पानी मिल सके और गांव-गांव में पीने का पानी मिल सके। कृषि के ऊपर खाद की बात है, यूरिया का खाद ५० रुपए बढ़ाने का काम किया है, मैं अनुरोध करूंगा कि यह रुपए

  वापस लिए जाएं, जिससे कि किसान पर जो बोझ पड़ा है वह कम हो सके। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना स्थान ग्रहण करता हूं।

“>* SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): Madam Chairman, the Hon’ble Finance Minister has tried to bring a well balanced Budget for the year 1998-99. In this Budget he has also tried to help the poor farmers of this country. But in my opinion these efforts are not sufficient for the amelioration of the poor masses of this country.

In our country more than 75% people are farmers. Naturally, I feel that 75% of the Budget allocation should go to farmers. According to the father of our nation, Mahatma Gandhi, real freedom means food, clothing and sheiter to the poorest of the poor. If this is not done then even democracy will have no meaning. Ramarajya can be realised only through the upliftment of the weaker sections of the country.

There are three categories of farmers, Farmers who irrigate their land with the help of river water, canals and other related sources of water. The second category of farmers cultivate their land using water drawn from bore wells, as other sources of water are not available to them. In my constituency these farmers have to dig the earth about 400 to 500 feet deep to get ground water. The third category of farmers are those who are completely dependent upon rain god. The cost of cultivation of these farmers differs as their methods vary from category to category. But, unfortunately the Government while giving their assistance to these farmers treat all of them alike. This is great injustice. This problem has to be found.

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*Translation of the speech originally delivered in kannada.

There is no drinking water in many parts of the country particularly in Karnataka. There is great demand not only for drinking water but also for irrigation purposes. The only solution for this perennial problem is to link various rivers of the country. Ganga river has to be linkef with Cauvery river. Similarly Mahanadi can be linked with Cauvery. It may take 10 to 20 years to complete the linking of the above said rivers. Also it may require hundreds of crores of rupees for these projects. But there are no other alternatives. If we keen in the establishment of Ramarajya in our country, then linking the above mentioned rivers is the only solution, a permanent solution.

I have demanded these matters several times in the past when our Congress Government was in power. Hence I continue to urge upon the present Finance Minister to take up the linking of these rivers immediately.

In karnataka there are 8 districts which are drought prone areas. My constituency Kolar is one among them. There is servere scarcity of water in Kolar and agriculture has become very difficult in the entire district.

Thew Centre spends thousands of crores of rupees every year on the following: (i) to provide bore wells; (ii) water shed programme; and (iii) to tackle the flood and drought situation in the country.

Instead of spending huge a mount of money every year it is high time for the Government of India to find out a permanent soulution for all these problems. In our district we have prepared a model plan. According to this plan the ground water which is available at 500 feet deep will come up and it would be available at 100 or 150 feet deep. In addition to this the water whichis one kilometre away can be recharged and it would come to the surface. I believe that the Hon. Minister would give a serious though to this vital suggestion.

Many of the public undertakings are running under huge losses whereas private sectors are making profits. In karnataka we have BEML,HMT, HAL, ITI, BGML and many public undertakings. The losses in these undertakings should be avoided at any cost.

Bharat Gold Mines is also incurring huge losses. Maladministration is the main reason for this. it had incurred about 600 corres of rupees of loss while marketing the gold. They could have avoided this loss if they had gone for open market. Once upon a time there were 30,000 employees in BGML. Now there are only about 4 to 5 thousand emplyees. Nearly three lakh people were depending upon these employees. At present the condition of these people is really miserable. BGML mines can be revived even now. Gold is availabel in the mines. The need of the hour is `will power’. The Government and the administration of BGML should make up their mind to revive these historical gold mines. Gold can be obtained in these mines for another 100 years if modern techniques are adopted for mining.

Regarding education the same story continues. There is no uniformity in our education system. Some students attend convents whereas some others to go Navodaya Vidyalayas. But majority (above 90%) of the children are compelled to go to Government schools. These children score very less percentage of marks in the examinations. They do not get admissions in engineering colleges, medical colleges and other technical institutions. On the whole their future is affected. This disparity has to be checked immediately.

Madam, 25% of our country’s population consists of Scheduled Castes and Scheduled Tribes. But what is the budget allocation you have made for these hapless people. it is only about 2-3% you have to increase the budget allocation immediately for the welfare of Scheduled Castes and Scheduled Tribes. I urge upon the Hon’ble Finance Minister to increase the budget allocation for the welfare of Scheduled Castes and Scheduled Tribes by at least ten percent for the year 1998-99.

Madam, thank you for giving me an opportunity to speak.

SHRI BIKRAM DEO KESHARI (KALHANDI): Madam, at the outset of my first Budget speech, I would like to congratulate the hon. Finance Minister for having given us a Budget with a direction

to revamp the already tottering economy left to us by the previous Government. So, during 1998-99, the total expenditure estimated is put at Rs.2,68,107 crore. Of this, Rs.72,002 crore is budgetary support for the Central, State and Union Territory plans and the balance of Rs.1,96,105 crore is for non-Plan expenditure.

As you know, this Budget is giving a direction to the rural sector development. It is clearly evident from the fact that for the agriculture sector, the budget provision is 58 per cent more. Then, for the health sector, it is 34 per cent. For the welfare sector, it is 91 per cent more. For the atomic energy sector it is 68 per cent. For the Department of Space, it is 62 per cent and for the forest and environment sector, it is 60 per cent. In the case of food subsidy, as far as sugar subsidy goes, it has been enhanced. Further, the Defence Expenditure has been enhanced. So, it is evident that this Budget is a progressive Budget to make India improve in all fields.

It has been seen that the previous Governments had left their economy tottering and to save this tottering economy, our Finance Minister has given a Budget with a direction which will take us to the 21st century. Therefore, I congratulate the Finance Minister for taking the bold steps to revamp the economy.

I would like to say that the Finance Minister has laid emphasis on the rural sector. It is clearly evident from the fact that he has allocated sufficient funds to the rural sector to serve places like Kalahandi which I represent.

Kalahandi is one of the most backward districts of the country. Koraput, Phulbani and Bolangir are also backwards districts of Orissa. People are migrating from there due to lack of work. People are dying due to hunger. This has what the previous Congress Governments had given us. There are instances of people selling their children for want of money. There are instances of people dying of hunger. The district of Kalahandi which had supplied 50,000 tonnes of rice in 1942-43 famine in Bengal is completely ruined today. The farmers are reduced to object poverty, dut to frequent droughts. The projects which are coming up there are languishing like the Upper Indira Project and other projects. I would like to recall that when the former Prime Minister, Shri P.V. Narasimha Rao visited Kalahandi, he had announced a grandeus programme for Kalahandi, Koraput and Bolangir. He announced a long-term action plan which was supposed to cost an amount of Rs.4700 crore so that poverty of that area could be reversed. But it was not taken up. It was just in words and speeches. But today, I would like to thank the Finance Minister for he has earmarked certain allocations for backward regions which will definitely change the economy of such regions. For instance, the North-East was completely neglected but he has formed a separate cell for the development of the North-East so that development there can take place in a very systematic and coordinated way which had never taken place in the past.

I would like to speak on some other points. I would like to stress on the agricultural front. The Congress Party which is now ruling in Orissa has siphoned off crores of rupees. In Orissa, there is a massive scam in the Department of Agriculture. I am sure the hon. Finance Minister is aware of it. I hope he will initiate a CBI inquiry into it. It has been clearly proved that there was misappropriation of funds in the purchase of hybrid seeds which were supplied to farmers. It is under the Department of Agriculture which is under the charge of the Chief Minister. This should come to limelight and the corruption unearthed. On this matter, I have given a notice of Calling Attention so that it could be discussed in this House. I hope it is admitted for tomorrow so that things can be discussed in more detail….(interruptions)…In the education front, you may find that the allocations have gone up from Rs.3351 crore to Rs.4245 crore. It clearly shows that the promises where were announced in the National Agenda for Governance have been attended to in this Budget. It has given a direction that education for women will be given top priority and adequate allocations will be made.

Then the nuclear tests have shown our strength and our capability. We have proved our might in the world today. You will see that the allocations for atomic energy and space have gone up by 68 per cent and th4e ;atter by 62 per cent respectively. This clearly shows that India wants to go ahead show the world and wants to be at the level of the progressive countries which have gone for space research and technology, for satellite development and other things related to look into the future.

2.00 hrs.

Before concluding, I would like to stress that as per the Report of the Lakhadawala Committee, Orissa is one of the poorest State. The per capita income is the lowest in the country. So, I would request the hon. Minister of Finance that the projects, which are going on there, like irrigation projects and various power projects, should be completed at the earliest.

Lastly, for the energy sector and non-conventional energy sector, the hon. Minister has doubled the allocation. This is clearly evident that it has gone up from Rs. 190 crore to Rs. 404 crore and it showns that the Government wants to create a healthy environment for the country. This shows that in the Ninth Plan, the projection to generate 60,000 MW can be achieved. Let us hope that is done.

MR. CHAIRMAN : Now, it is two o’clock. There are still four or five speakers. May I request you to take only two minutes each? एक माननीय सदस्य : हमें कल सुबह बोलने का मौका दे दिया जाए।

  सभापति महोदय : सुबह कुछ नहीं होगा। जो कुछ बोलना है, अभी बोलिए। अभी जितने बोलने वाले लोग हाउस में बैठे हैं, मैं उन्हें दो-दो मिनट का समय दूंगी।

“> श्री प्रभाष चन्द्र तिवारी (भागलपुर): सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए धन्यवाद। मैं वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने भारत को ऐसा बजट दिया, जो कि अच्छा, संवेदनशील, स्वदेशी सिद्धांतों पर आधारित है। वह सभी ग्रामों में रहने वाले गरीब किसानों, मजदूरों और आयकर भुगतान करने वाले सभी नागरिकों को ध्यान में रख कर बनाया गया है। बजट भारत को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के दृष्िटकोण से बनाया गया है। बजट में भारत के नागरिकों की सभी बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। सभी मदों में पिछले वषर्ों की अपेक्षा अधिक रुपया रखा गया है – चाहे वह रोड हो, पेयजल हो, सिंचाई हो

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : आप चाहें तो इसे टेबल पर ले सकते हैं।

  श्री प्रभाष चन्द्र तिवारी:चाहे छोटे-छोटे उद्योग हों. स्वरोजगार योजना हो, सभी को आगे बढ़ाने की ओर ध्यान दिया गया है। सुबह से दो हमारे मित्र बोले, मैं उनकी तरह आंकड़ों में अधिक नहीं जाऊंगा, लेकिन मैं अपने क्षेत्र की कुछ बातें यहां रखना चाहूंगा।

  हमारे वित्त मंत्री ने कृषि को आगे बढ़ाने के लिए काफी अधिक सिंचाई के क्षेत्र में

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : आपको दो मिनट समय मिला है। आपके दो मिनट खत्म हो गए। आप टेबल पर ले कर दीजिए। रात के दो बजे दो मिनट ही मिलेंगे।

  श्री प्रभाष चन्द्र तिवारी : दो मिनट में कैसे होगा? मेरा भाषण लिखा हुआ नहीं है।

  सभापति महोदय : आप अपना भाषण ले कर दीजिए। वह सारा रिकॉर्ड में चला जाएगा।

  श्री प्रभाष चन्द्र तिवारी : ठीक है। धन्यवाद।

  सभापति महोदय : रघुनाथ चौधरी जी, आपको दो मिनट का समय मिला है।

श्री रामरघुनाथ चौधरी (नागौर) : सभापति महोदय, दो मिनट में कुछ भी नहीं होता है। आपने किसानों की इतनी बातें कही हैं और मुझे भी वे कहनी पड़ेंगी। सभापति महोदय : दो बजे के बाद दो मिनट ही मिलते हैं। आप अपना भाषण शुरु करें और ले कर दें।

“> श्री रामरघुनाथ चौधरी : महोदय, मैं लम्बी-चौड़ी बात करके बजट के आंकड़ों में नहीं जाना चाहता। मैं किसानों की बात कहना चाहता हूं कयोंकि मैं खुद किसान हूं और किसानी करता हूं। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि आपने यूरिया की जो कीमतें बढ़ाईं हैं, हो सकता है आपने बहुत सोच समझ कर बढ़ाई हों। खाद यूज हों या न हों लेकिन यूरिया, फास्फेट और पोटाश खाद के अलग-अलग कार्य हैं। किस फसल के लिए कौन सी खाद की जरूरत है, यह अलग बात है। किसान बहुत समझदार है। जिस चीज से उसका उत्पादन बढ़ेगा, वह उसी को यूज करेगा। वह आयल सीड में पोटाश और फास्फेट खाद यूज कर सकता है। किस भूमि का टैस्ट कैसा है, उसमें कौन सी चीज की कमी है और किस की नहीं है, यह उस पर निर्भर करता है। अगर हमने यह कह दिया कि यूरिया बहुत यूज हो रही है और इससे जमीनें बहुत खराब हो रही हैं तो यह सही बात नहीं है। पंजाब में पानी ज्यादा आने से जमीनें खराब हो रही हैं। उसमें आपको जिप्सम चाहिए। जमीन खराब होने के अलग-अलग कारण हैं। आपने यूरिया के जो दाम बढ़ाए हैं वह उस समय बढ़ाए हैं जब किसानों की माली हालत बहुत खराब है। पिछली बार जब बरसात हुई और फसल में कीड़ा लगा, उसमें आपका कृषि विभाग कुछ नहीं कर सका। रुई में कीड़ा लगने से किसानों ने आत्महत्या कर ली कयोंकि वह दवाई की कीमत चुका नही पाए। इसका एक कारण यह था कि कृषि विभाग में जितने लोग लगे थे, वे इतना नहीं बता सके कि ये कौन से कीड़े हैं, कहां से आ गए हैं और ये कौन सी दवा से मरेंगे? इसके साथ दवाइयां इतनी खराब थी कि उनका असर नहीं हुआ। यही चीज कपास में हुई। इसके साथ ही मूंग में, दूसरी दालों और दूसरी फसलों पर भी इसका असर पड़ा। इससे किसानों की सारी फसलें खराब हो गईं। आप किसानों के लिए कया कर सकते हैं कया नहीं कर सकते हैं, आपका कृषि विभाग कया कर रहा है, भूमि की जांच करता है या नहीं करता है, ये सारी बातें इस परिपेक्षय में देखनी पड़ेंगी। जितनी स्कीम्स बनें, वे इसके साथ बनें। किसान को आप किसानी के लिए जो कुछ दे रहे हैं, उसके दाम नहीं बढ़ाएं। आप यूरिया की कीमत कम करें।

  आपने क़ैडिट कार्ड की जो घोषणा की है, वह एक सराहनीय कदम है। अभी इसकी रूपरेखा नहीं बनी है कि उसको कितना पैसा मिल सकेगा? वह केवल खाद, बीज ही लेगा या उसके साथ उसको छोटे-छोटे औजार, बैलगाड़ी, ऊंट या छोटा-मोटा ट्रैकटर खरीदने की क्षमता होगी या नहीं? मेरा निवेदन है कि कम से कम इसको एक-डेढ़ लाख की सीमा तक पहुंचाया जाए ताकि उसे जो छोटे-मोटे औजार खेत में किसानी के लिए चाहिए, वह भी उसे खरीद सके।

  अगर यूरिया के लिए आपके वैज्ञानिक यह कहते हैं कि जमीन के लिए ठीक नहीं है तो आप लकिवड यूरिया कयों इस्तेमाल नहीं करते हैं? इससे स्प्रे हो जाएगा और सीधे फसल को यूरिया मिलेगी। वह जमीन को टच ही न करेगा। इससे जमीन खराब ही नहीं होगी कयोंकि लेटेस्ट वैज्ञानिकों की यह राय है कि यूरिया यदि सीधे पत्तों को मिलें तो फसल को लाभ मिल जाता है।

  व्यापारी अपना सामान गोदाम या घर में ताला लगा कर रखता है। उसका ज्यादातर सामान घर में पड़ा रहता है। जब उसे अपना सामान गोदाम या घर से निकालना होता है तो वह ताला खोल कर उसे निकाल लेता है। अगर किसान अपने उत्पादन को बाजार में जाकर तुरन्त बेचता है तो उसे पूरे पैसे नहीं मिलते। अगर उसे गोदामों में रखता है तो ट्रांसपोटेशन का खर्चा हो जाता है। कया ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हो सकती कि किसान अपना पैदा किया गया अनाज अपने घर में रखे और चाबी बैंक में जाकर दे दे। इससे उसे ७०-८० परसैंट पैसा एडवांस मिल जाएगा और वह जब फसल बेचेगा उसका रिम्बर्समैंट हो जाएगा। इससे उसे फायदा होगा और उसे अपनी फसल अपने घर में रखने पर ८० परसैंट पैसा लेने की सुविधा हो जाएगी। इससे किसान मजबूत होगा। इस दृष्िटकोण से इसको देखा जाए और इसको लागू करने की कोशिश की जाए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  मैंने कोई लम्बी-चौड़ी बात नहीं कही है।

  यहां फसल बीमा योजना के बारे में बहुत कुछ कहा गया। आपने कहा है कि कुछ प्रदेशों में इसको लागू किया जाएगा। यह बहुत जरूरी है। किसान की फसल तूफान, ओलाव्ृाष्िट और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं के आने से खराब हो जाती है। इससे किसानों का बहुत नुकसान होता है। अगर बीमे की गुंजाइश होती तो किसानों की यह हालत नहीं होती। इससे उसे कुछ पैसा मिल जाता और वह जमीन पर खड़े होने लायक हो जाता। फसल बीमा योजना को सभी प्रदेशों में लागू किया जाए और जहां किसान इसको करने को इच्छुक है, वहां फसल बीमा योजना शुरु की जाए।

  सभापति महोदय :अब आप अपना भाषण ले कर दीजिए।

  श्री रामरघुनाथ चौधरी :मैंने इतना लिखा नहीं है। मैं कया ले करूंगा? मैं थोड़ा-थोड़ा निवेदन करना चाहता हूं। आपने ऊर्जा, परिवहन, संचार की आधारभूत संरचना के लिए बहुत कुछ बातें कही हैं लेकिन राजस्थान में बिजली का यह हाल है कि किसानों को एक-डेढ़ घंटा बिजली नहीं मिल पा रही है। ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे बिजली सभी स्टेटस को बराबर मिल सके। अभी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

  मेरा निवेदन यह है कि अगर किसान को २४ घंटे में सिर्फ एक-डेढ़ घंटे बिजली मिलती हो तो किसान कया करेगा। किसान के लिए तो कपास बोने का समय आ गया, कहीं मूंगफली की फसलें बोने का समय आ गया और बिजली एक घंटे मिलती है। वह अपनी फसल नहीं बो सकेगा चूंकि उसके पास बोने का समय ही नहीं है। इसलिए कोई ऐसी व्यवस्था कीजिए कि जो राजस्थान जैसे पिछड़े प्रदेश हैं, उसमें बिजली की व्यवस्था ऐसी हो कि किसान को कम से कम छ: घंटे बिजली मिले। इस बारे में आपकी कोई घोषित योजना होनी चाहिए कि किसान को बिजली छ: घंटे मिलेगी तो वह छ: घंटे ही मिलनी चाहिए। मेरा कहने का मतलब यह है कि चाहे आप पांच घंटे ही बिजली दें, बिजली की कमी है तो उसकी व्यवस्था आप उस हिसाब से कीजिए। लेकिन जो आपकी घोषित नीति है उतनी बिजली तो हर प्रदेश में किसान को मिलनी ही चाहिए।

  इसके साथ ही मैं पीने के पानी की व्यवस्था के बारे में कुछ कहना चाहता हूं। आपके यहां से बहुत सी घोषणाएं हैं, पहाड़ी इलाकों के लिए एक अलग से स्कीम बनती है, पूर्वांचल में अलग स्कीम बनती है। सभापति महोदय, राजस्थान बहुत पिछड़ा इलाका ही नहीं बल्िक रेगिस्तानी इलाका भी है। वहां पीने के पानी की समस्याएं बिल्कुल अलग तरह की है। कहीं पर पानी तीन सौ, चार सौ या पांच सौ फीट तक पानी ही नहीं है। उसके बाद आपके वैज्ञानिक कहते हैं कि नीचे कोई टयूबवैल बनाने की आवश्यकता ही नहीं है, चूंकि नीचे पानी ही नहीं है। कई जगहों पर इतना खारा पानी है कि इंसान उसको पी नहीं सकता है बल्िक उसको मवेशी भी पीये तो मर जायेगा। कहीं पानी में इतना अधिक फलोराइड है कि वहां के लोग टेढ़े हो जाते हैं। राजस्थान और राजस्थान जैसे जो और इलाके हैं उनके लिए आप डी.आर.डी.ए. से देते हैं वह पैसा पूरा नहीं पड़ता है। इसलिए आपको अलग से एक स्कीम बनानी पड़ेगी, जिस तरह से आप पहाड़ी इलाकों या पूर्वांचल में पानी की स्कीम बनाते हैं उस तरह से एक अलग से सर्वे कराकर, उसके लिए अलग पैसे का प्रावधान करके इन इलाकों में पानी पहुंचाने की कोशिश करें। हमारे यहां एक सिंचाई योजना बनी थी, सिंचाई योजना का कई बार सर्वे हो चुका है, इसी प्रकार से एक लिफट योजना बनी थी कि इंदिरा गांधी कैनाल से गंगा का पानी राजस्थान में लाया जायेगा और विशेषकर नागौर जिले में लाया जायेगा। मैं तो कहता हूं कि भले ही उससे सिंचाई कम हो लेकिन जैसे जोधपुर को लिफट से पीने का पानी दिया है, इस तरह से राजस्थान के कुछ इलाकों को और विशेषकर नागौर जिले के पूरे इलाके को, जहां से मैं आता हूं वहां पीने का पानी मुहैया कराकर वहां की समस्या को हल करें। मैं कल नवलगढ़ और झुंझुनू इलाके में गया था, वहां के लोग पानी के लिए चिल्लाते हैं। लेकिन वहां के मुकाबले नागौर जिले की हालत बहुत बदतर है, कयोंकि वहां तीन सौ, चार सौ फीट से पहले पानी नहीं आता है। हालांकि पानी के मामले में आपने विश्वास दिलाया है, लेकिन यह विश्वास इसलिए नहीं होने वाला है कयोंकि आप उसको जिलेवार बराबर-बराबर बांटने वाले हैं। जब तक पश्िचमी राजस्थान या जो रेगिस्तानी इलाका है या फलोराइड वाला इलाका है, उसके लिए अलग से स्कीम बनाकर अलग से पैसा नहीं देंगे तब तक इस समस्या का हल होने वाला नहीं है।

  मैं एक और बात कहना चाहता हूं कि आपने नेशनल हाइवे के लिए सदन में घोषणा की थी कि बीकानेर से जाने वाला हाइवे नागौर से अजमेर लाया जायेगा। लेकिन उसके बाद शांति कायम हो गई, मैंने उसको कहीं पढ़ा-लिखा नहीं और न ही वह बात फिर से मेरे सामने आई। मैं आपसे पुन: निवेदन करना चाहता हूं कि नेशनल हाइवे की जो घोषणा हुई थी कि बीकानेर से नागौर, जोधपुर तक है, नागौर से उसको अजमेर में लाया जायेगा, उसके लिए आपसे प्रार्थना है कि उस नेशनल हाइवे की आप स्वीकृति दें, ताकि यह कार्य शीघ्र हो सके। धन्यवाद।

 “> ॥ श्री रामरघुनाथ चौधरी (नागौर) : माननीय सभापति महोदय, आशा थी कि सरकार बजट बनाते समय ग्रामीण क्षेत्र व किसानों का ध्यान रखेगी। भारतवर्ष की ८० प्रतिशत जनता किसानी करती है एवं ग्रामीण क्षेत्र में रहती है। इस बजट में इस समुदाय की पूरी उपेक्षा की गई है। न गांवों में सड़कें हैं, न पीने का पानी है और बिजली तो गांवों में नहीं के बराबर है। आशा तो यह थी कि छोटे किसानों को ट्रैकटर कम कीमत पर मिलेगा, पर टायरों वगैरह पर टैकस लगने से वह और महंगा हो जायेगा। काश्तकारों की पैदावार अच्छी कीमत पर बिके, इस बात की चिन्ता तो नहीं है और यूरिया जो किसान के लिए महत्वपूर्ण खाद है, उसकी कीमतें बढ़ा दी गई हैं। कहने को तो ५० पैसे किलो दाम बढ़ाया गया है पर प्रति थैले पर २५ रुपये की लागत बढ़ गई है। एक काश्तकार पांच से १० थैले कम से कम काम में लेता है। इससे किसान की फसल कितनी महंगी होगी। आपने कहने को तो कह दिया कि गेहूं की सरकारी खरीद की कीमतों में कुछ बढ़ोतरी कर देंगे, पर सरकारी खरीद इतनी कम है कि किसान को वास्तविक खर्चा भी नहीं मिलता। आपसे प्रार्थना है कि यूरिया में बढ़ी कीमतों को वापस लिया जाये।

  आपने किसानों के लिए क़ेडिट कार्ड की घोषणा की है, पर अभी तक आपने यह स्पष्ट नहीं किया कि आप किस प्रकार इसे लागू करेंगे, इसका कया रूप रहेगा? आपने इतना जरूर बताने का प्रयास किया कि इसका आधार किसान की सम्पत्ित व उसकी भूमि होगी पर मेरा इसपर निवेदन है कि इसकी कम से कम सीमा दो लाख रुपये होनी चाहिए, ताकि अपने बीज, खाद व आवश्यक फसलों की दवाओं के साथ आवश्यक मशीनें खरीद सकें। बैल व बैलगाड़ी अथवा ऊंट व ऊंटगाड़ी का प्रबन्ध कर सकें। कुछ डेयरी के लिए मवेशी भी खरीद सकें।

  मेरा एक सुझाव यह भी है कि किसान को उसकी फसल को सरकार खरीदने का प्रबन्ध करे, पर अगर किसान फसल निकलते ही नहीं बेचना चाहता हो तो उसका अनाज सरकार अपने पास रखकर उसकी फसल की ७५ प्रतिशत कीमत किसान को एडवांस करे तथा जब भी किसान उसे बेचना चाहे, तब बोचकर बाकी की धनराशि किसान को भुगतान करें। मैं इस अवसर पर आपका ध्यान आकर्िषत करना चाहता हूं कि जिस प्रकार व्यापारी अपने मकान पर सामान रखकर बैंक को गिरवी रखकर रुपया ले लेता है, ठीक उसी प्रकार किसान अपने गांव व अपने मकान में अनाज रखकर बैंक में गिरवी रख दे तो बैंक वालों को चाहिए कि अनाज की ७५

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* This portion of the Speech was laid on the Table.

  प्रतिशत कीमत किसान को एडवांस कर दे। इससे किसान बिचौलियों से बच सकेगा एवं उसको सीधी पैसा मिल सकेगा।

  किसान को बिजली नहीं के बराबर मिल रही है तथा जिस प्रकार बिजली की उपभोकता कीमतें बढ़ती जा रही हैं। इससे किसान की कमर टूटती ही जायेगी, इसलिए आपसे निवेदन है कि किसान को दी जाने वाली बिजली की कीमतें न बढ़ाई जायें एवं इस देश के हर प्रदेश के किसान को बराबर बिजली मिले, उसके समय का निर्धारण हो और उसका सख्ती से पालन किया जाये। अकसर गांवों में देखा गया है कि सायंकाल जब घरों को बिजली चाहिए, पूरा ग्रामीण क्षेत्र अंधेरे में होता है। जब सब सो जाते हैं तब बिजली दी जाती है, जिसका कोई मतलब नहीं होता।

  जब बिजली नहीं होती तो पीने का पानी भी नहीं होता। राजस्थान गर्मी के मौसम में काफी गर्म होता है तथा पानी की अधिकतम आवश्यकता होती है, पर मुसीबत है कि पीने का पानी लोगों को नहीं मिलता। बजट में पीने के पानी की चिन्ता अवश्य की गई है पर समस्या का समाधान नजर नहीं आता। मेरे जिले में पानी की बड़ी कमी है, जहां से मैं आता हूं। आधे जिले में पानी खारा है या फलोराइड मिकस है अथवा ५००, ६०० फीट की गहराई तक भी पानी नहीं है। इन इलाकों को, जिसमें ७०० गांवों से अधिक की जनसंख्या आती है, के लिए अलग से सर्वे कर स्कीम बनाने की आवश्यकता है। यह सारा इलाका रेगिस्तान का इलाका है। अतः जैसे पूर्वांचल व पहाड़ी क्षेत्र के लिए अलग से स्कीम बनती है, ठीक उसी प्रकार अलग से स्कीम बनाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इस समस्या का समाधान किया जाये। इसके लिए मेरा आपको सुझाव है कि इन्िदरा गांधी नहर से एक लिफट योजना बनी थी। नागौर जिले में पानी लाया जाये, ताकि सदा के लिए पानी की कमी की पूर्ित की जा सके। आज आजादी के ५० वषर्ों के बाद भी पीने के पानी के लिए तड़पता इन्सान और कया आशा करेगा।

  इसी प्रकार शिक्षा का हाल है। गांवों में स्कूल नहीं के बराबर हैं। बच्चे चाहते हुए भी पांचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाते हैं। लड़कियों के लिए अलग से पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं है। राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी ने शिक्षा को बेचना आरम्भ कर दिया है। मडिल से हाई स्कूल क़मोन्नत करने के लिए तीन लाख रुपये चाहिए, इसी प्रकार सीनियर सैकेण्डरी स्कूल के लिए पांच लाख रुपये चाहिए, ऐसी स्िथति में ग्रामीण क्षेत्र के लोग इस शिक्षा को खरीदने में असमर्थ हैं। जो प्राइवेट स्कूल चल रहे हैं, उन्होंने इस बोझ को ढो रखा है, वरना गांवों में शिक्षा होती ही नहीं या नहीं के बराबर होती। शिक्षा को इतने रूप दे रखे हैं कि लोग समझ ही नहीं पाते, इसलिए आपसे निवेदन है कि इसका कुछ इस प्रकार स्वरूप बनाया जाये या आमूल चूल परिवर्तन किया जाये ताकि शिक्षा का एक रूप हो। आज भी पूरे भारत में एक भाषा सब स्कूलों में नहीं हो पाई है। मेरा सुझाव है कि पूरे भारत के सभी स्कूलों में पहली कक्षा में हिन्दी अनिवार्य कर दी जाये तथा प्रतिवर्ष एक-एक कक्षा बढ़ाई जाये तो कुछ वषर्ों में हिन्दी अपने आप सब जगह अनिवार्य तौर से हो जायेगी।

  मैं पंचायत राज के सम्बन्ध में भी कुछ निवेदन करना चाहूंगा। भारत के संविधान में संशोधन कर पंचायती राज को तीन स्तरीय व्यवस्था में बांटा गया, पर खेद की बात है कि इन तीनों स्तरों का अपने आपमें कोई समन्वय नहीं रहा। पूर्व व्यवस्था में ग्राम पंचायत का सरपंच पंचायत समति का सदस्य होता था, पंचायत समति का प्रधान जिला परिषद का सदस्य होता था तथा सभी स्तर पर योजनाओं से जुड़े होते थे, पर अब ऐसी व्यवस्था नहीं होने से इन स्तरों पर कोई समन्वय नहीं रहा है। ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच व जिला परिषद स्तर पर सरपंच व प्रधान की कोई भूमिका नहीं रह गई है। ग्राम सेवक व विकास अधिकारी ही सब कुछ रह गये हैं एवं एक प्रकार से सरकारीकरण रह गया है, जनप्रतनधियों की कोई भागीदारी नहीं रह गई है। राजस्थान प्रदेश की सरकार ने सारा कार्य बजाय जिला परिषद के जिला कलैकटर को दे रखा है, जिला अभिकरण का अध्यक्ष प्रमुख को होना चाहिए पर कलैकटर को बना रखा है। स्वीकृतियों में अधिकारीगण मनमानी करते हैं, इससे भ्रष्टाचार पनपता है। अगर इस ढांचे पर पुनः ध्यान देकर सुधार नहीं किया गया तो जिला परिषदों व पंचायत समतियों का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। मेरा आपसे सुझाव है कि पंचायत राज के इन तीनों स्तरों को जोड़ा जाये एवं इनको पूरा अधिकार दिया जाये ताकि जनता से सम्बन्िधत विकास कार्य इन संस्थानों के द्वारा कराये जा सकें एवं जनप्रतनधि इन कायर्ों से जुड़ सकें।

  आपने कहीं टैकस हटाये हैं, कहीं लगाये हैं। और तो और, हजामत बनाने के ब्लेड पर भी आपने टैकस बढ़ाया है। रेडियो एक साधारण मनोरंजन का सस्ता साधन है, उसको भी आपने नहीं बख्शा है, जबकि कई अमीरों के काम आने वाले साधनों पर कर हटाया है या कम किया है।

  राजस्थान मार्बल पत्थर के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां के मकराना के पत्थर से बना ताजमहल आज भी पत्थर की खूबसूरती एवं कारीगरी की जीती जागती तस्वीर है। उस पत्थर पर आपने बड़ी मेहरबानी की है और यह की कि ३० प्रतिशत से डयूटी बढ़ाकर ४० प्रतिशत कर दी है। हम आशा तो यह करते थे कि आप इसे घटाकर १० प्रतिशत करेंगे। मैं आपका ध्यान उन लिफट योजनाओं की तरफ दिलाना चाहता हूं, जिनके बारे में पूर्व में कई बार इस सदन में वार्ता की गई परन्तु किया कुछ भी नहीं गया। मैं एक बार फिर आपका ध्यान राजस्थान के नागौर जिले को लाभान्िवत करने वाली लिफट योजना की तरफ दिलाना चाहता हूं। पूर्व में इन्िदरा गांधी नहर से एक लिफट योजना बनाई गई थी। एक योजना गंगा के पानी को लिफट कर राजस्थान के नागौर जिले में लाने की थी, जिससे सिंचाई के साथ ही साथ पीने के पानी की उपलब्धता हो सके एवं एक बड़ी समस्या का निवारण हो सके।

  फसल बीमा के लिए हर बार बात की जाती है पर अब कुछ जिलों में भी प्रदेशों लागू करने का मन बनाया है। आपसे निवेदन है कि अगर यह फसल बीमा योजना लागू होती तो वभिन्न प्रदेशो के लोग आत्महत्या नही करते। अत: सभी प्रदेशो में इसे लागू किया जाये । इसी प्रकार पशु बीमा योजना भी लागू की जाये ।

  पूर्व में इस सदन में घोषणा की गई थी कि नागौर से अजमेर को नेशनल हाईवे से जोडा जाये पर यह बात फाइलों में सीमित हो गई है । अत: प्रार्थना है कि इस हाईवे को बनाने की स्वीकृति प्रदान करें।

“> श्री फग्गन सिंह कुलस्ते (मण्डला) : सभापति महोदय, सबसे पहले मैं माननीय वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि जब हमारे देश का बजट पेश हुआ था तो इस बजट को पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई। चूंकि हम ग्रामीण क्षेत्र से आये हैं, हमारा अधिकांश देश गांवों में बसता है। इस बजट का जो भी हिस्सा मैंने देखा है मैं उसका ज्यादा उल्लेख नहीं करूंगा। लेकिन इसमें एक आवास की स्कीम है जिसको माननीय वित्त मंत्री जी ने प्राथमिकता के आधार पर लागू किया है। आज तक जो भी योजनाएं चली हैं, आवास की नीति चली है, परंतु गांवों में रहने वाले छोटे किसानों की जो पात्रता है, जो गरीबी की रेखा से नीचे आते हैं, उन गरीबों को मकान नहीं मिला।

  आदरणीय वित्त मंत्री जी ने इसमें यह प्रयास किया है कि अधिक से अधिक गांवों में रहने वाली गरीब जनता को हम आवास मुहैया करायेंगे और इसके लिए मैं आप सबकी तरफ से माननीय वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं। बजट में उन्होंने इस मद में सबसे ज्यादा १६०० करोड़ रूपये का प्रावधान गरीब परिवारों के लिए किया है।

  दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण योजना के बारे में आप भी जानते हैं कि अधिकांश लोग यहां शिक्षा प्राप्त करते हैं। परंतु मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने प्रोविजन किया है। हमारे देश का अधिकांश हिस्सा गांवों में बसता है। मैं स्वयं एक शिक्षक की हैसियत से स्वयं गावों में अध्ययन कराने के लिए जाता था। गांवों में कोई अध्यापक नहीं जाता। हमारे बहुत से गरीब बच्चे नहीं पढ़ सकते। परंतु इस मामले में एक महत्वपूर्ण योजना अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की लागू की गई है। अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ निशुल्क शिक्षा और महिलाओं के लिए स्नातक स्तर तक की निशुल्क शिक्षा देने की व्यवस्था सरकार की ओर से पहली बार की गई है। इसके लिए मैं माननीय प्रधान मंत्री जी और वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं। अभी तक किसी भी सरकार ने इस बारे में विचार नहीं किया था। परंतु भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दलों की सरकार ने इस संबंध में विचार किया है।

  सभापति महोदय, एक विशेष बात मैंने सदन में बार-बार कही है, पिछली बार भी मैंने कहा था कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए विशेष केन्द्रीय सहायता की योजना भारत सरकार के पास है, जो गांवों के विकास के लिए करोड़ो-अरबों रूपये की धनराशि राज्य सरकारों को यहां से देती है, परंतु उसके बारे में कोई सिस्टम कोई कार्यक़म अभी तक निर्धारित नहीं किया गया है। हम पैसा यहां से अलोकेट करते हैं। मैं इस पर वित्त मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि यहां से जो धनराशि हम राज्य सरकारों को देते हैं वह धनराशि सीधे प्रदेश सरकार के पूल में जमा हो जाती है और जहां आदिवासी हरिजनों की आबादी है, उस आबादी के आधार पर उन क्षेत्रों में उनके विकास पर इस धनराशि का उपयोग होना चाहिए। मैंने बहुत से आंकड़े देखें है, लेकिन उसके बारे में कभी चिंता नहीं की गई। प्रदेश सरकारें यहां से पैसा प्राप्त करती हैं लेकिन उसका हिसाब भारत सरकार को नहीं भेजती हैं जिसके बारे में हमारे मन में चिंता होती है। मैं मंडला जिले से निर्वाचित होकर आया हूं। मंडला जिला मध्य प्रदेश का शायद सबसे पिछड़ा जिला माना जाता है। वहां एक कान्हा राष्ट्रीय नेशनल पार्क है। जिसके बारे में मैंने कई बार कहा है। उसके विकास के लिए जंगल काटे गये परंतु किसी ने इस बारे में चिंता नहीं की। ऐसे बहुत सारे मामलें हैं, लेकिन मैं उनका उल्लेख नहीं करना चाहता। लेकिन जहां तक विकास की बात है, हमारे यहां वैगा आदिवासी जनजाति है उनके लिए एक विशेष कार्य योजना बनी, उस जनजाति के नाम से करोड़ों रूपये की राशि यहां से रिलीज की गई, लेकिन वह वैगा जनजाति के लोग आज भी लंगोटी लगाते हैं, हिंदुस्तान में आप देखें वैगा जनजाति ऐसी जनजाति है जिनके पास पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं, दो समय के भोजन की व्यवस्था नहीं है, जंगलों में रहते हैं, जंगलों से जो कांदा निकलता है, उसे खाते हैं। परंतु सरकार ने करोड़ों रूपये की राशि खर्च करने के बाद भी उनकी कभी चिंता नहीं की। पिछली बार मैंने प्रयास किया था और एक विशेष योजना के अंतर्गत वैगा जनजाति के लिए वैगा प्राधिकरण की स्थापना मध्य प्रदेश में और मंडला जिले में हुई थी। इतनी धनराशि उनको दी गई, लेकिन उन गरीबों को चाहे शिक्षा हो, चाहे पीने का पानी हो और चाहे कोई अन्य कार्यक़म हो, उनका आज तक कल्याण नहीं हो पाया है। मैं विस्तार में नहीं जाना चाहता मैं माननीय वित्त मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि जो मामले विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं, जिनके बारे में हम चिंतित हैं, सरकार ने भी यह कहा है कि ऐसे क्षेत्रो को हम चहिनत करेंगे, उनके बारे में विशेष प्रयास करके वह ऐसी योजना आने वाले समय में लागू करे, जिनसे उनका कल्याण हो सके। मैंने पिछले वषर्ों के भी बजट देखे थे, आज जो बजट सदन में आया है या जो स्िथति सामने आई है उसमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अधिकतर प्रयास किये गये हैं, उनको पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराई गई है, इसके लिए मैं वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं और इसके साथ ही अपनी बात समाप्त करता हूं।

“> श्री जुआल उराम (सुन्दरगढ़) : सभापति महोदया, हम लोगों को बहुत देर बाद मौका मिला। हम नए सांसद हैं। इसलिए बोलने के लिए टाइम देना तो जरूरी था, लेकिन फिर भी चूंकि समय कम है इसलिए मैं आपका ज्यादा टाइम नहीं लूंगा। जो बजट आया है उसके आंकड़ों में मैं नहीं जाना चाहता हूं कयोंकि बहुत सारे सदस्य इस बारे में बोल चुके हैं। यह बजट एक क़ांतिकारी बजट है। इसमें प्रैकटीकल एप्रोच बहुत बढ़िया है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं यातायात के लिए व्यवस्था बहुत अच्छी है। मैं पूरे डिटेल में नहीं जाना चाहता हूं, लेकिन विरोधी दलों ने दो बातें यूरिया की कीमत और पेट्रोल की कीमत में बढ़ोत्तरी के बारे में कही हैं। मेरा वित्त मंत्री जी से अनुरोध है कि जब वे सदन में अपना उत्तर दें तो यह अवश्य बताएं कि विरोधी दलों की सरकारें जब इस देश में रहीं तब कितनी बार और कितने-कितने दाम इन चीजों के इन्होंने बढ़ाए। ज्यादा पुराने नहीं बल्िक पिछले १० साल में कितनी बार और कितने-कितने दाम यूरिया और पेट्रोल के बढ़ाए हैं, यह जरूर बताएं।

  सभापति महोदया, मुझे महाभारत का एक प्रसंग याद आ रहा है। महाभारत का जब युद्ध खत्म हो गया। जीते हुए पांडव जब सरशैय्या पर पड़े भीष्मपितामह के पास गए उनमें द्रौपदी भी थीं। पांडव जब उनसे शिक्षा लेने लगे कि लोकाचार कैसे करना चाहिए और महिलाओं के ऊपर अत्याचार होने पर अस्त्र उठाना चाहिए, जब भीष्मपितामह इस बात को बोले, तो द्रौपदी हंस दीं। इससे अर्जुन और कृष्ण को भी गुस्सा आया कयोंकि भीष्मपितामह का अपमान हुआ। उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन जब वहां से शिक्षा लेकर आ गए, तो रास्ते में द्रौपदी से अर्जुन ने पूछा कि तुम हंसी कयों? वे बोलीं कि दुनिया में तीन तरह के आदमी होते हैं- एक वे जो ज्यादा बोलते हैं, दूसरे वे जितना बोलते हैं उतना काम करते हैं और तीसरे वे जो कुछ नहीं बोलते हैं, लेकिन काम ज्यादा करते हैं। कल जब मैं अपने माननीय सदस्य श्री मुरली देवड़ा का भाषण सुन रहा था, तो वह ऐसा ही था कि करते कुछ नहीं हैं और बोलते ज्यादा है।

  सभापति महोदया, हमारे वित्त मंत्री बहुत कम बोलते हैं, लेकिन मैं समझता हूं कि द्रौपदी ने जो तीन बातें बताईं उनमें से वे तीसरी में आते हैं, जो कम बोलते हैं, लेकिन बहुत काम करते हैं। मुझे उम्मीद है, वे बहुत ज्यादा और अच्छा काम करेंगे। मैं दो-तीन साइटेशन देकर अपनी बात समाप्त करता हूं।

Reacting to the Union Budget, the CII President, Shri Rajesh V. Shah stated that the Budget would help in restoring the investors’ confidence and lend the economy a status of a strategic value-adding partner in the region”.

  मैं यहां राष्ट्रीय सहारा को भी कोट करना चाहता हूं, लेकिन उससे पहले मैं एक दूसरे अखबार से कोट कर रहा हूं-

“Leading overseas investors including non-resident Indians while labelling the new Budget as “growth oriented” have lamented at the lack of boldness in the Budget to ensure greater foreign capital inflow to ride off threats posed by sanctions in the aftermath of the nuclear tests.”

  सभापति महोदय, इसी प्रकार से “हिन्दुस्तान” लिखता है कि “अर्थ व्यवस्था में प्राण फूंकने का प्रयास” मैं पूरा समाचार, समय की कमी के कारण नहीं पढ़ रहा हूं सिर्फ हैडलाइन ही बोल रहा हूं। राष्ट्रीय सहारा ने कया लिखा है वह मैं बताना चाह रहा हूं-“एक साहसिक बजट” इसको थोड़ा सा मैं पढ़ कर सुनाना चाहता हूं-“केन्द्रीय वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा द्वारा वर्ष १९९८-९९ के लिए संसद में पेश बजट के बारे में कोई भी आकलन प्रस्तुत करने के पहले यह कहना उचित होगा कि यह साहसिक बजट है।” मैं ज्यादा नहीं बोलना चाहता हूं। आप स्वंय सोच सकते हैं कि विपक्ष की तकलीफ कया है कयोंकि दो मुद्दों, यूरिया और पेट्रोल, को छोड़ कर उनके पास बजट के बारे में बोलने के लिए कुछ नहीं है। इसलिए मैं बजट का समर्थन कर रहा हूं।

  (इति)

“> श्री भानु प्रताप सिंह वर्मा (जालौन): माननीय सभापति महोदया, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण बजट पर बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यकत करता हूं। आज हमारे देश में स्वतंत्रता की स्वर्ण जयन्ती मनाई जा रही है। इस स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर माननीय वित्त मंत्री जी ने जो स्वर्णमय बजट पेश किया है, उसके लिए मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देता हूं। इस स्वर्णमय बजट के द्वारा हमारा देश स्वर्णमय कैसे बने उसका चित्रण इसमें किया गया है। इस बजट में ऐसी-ऐसी योजनाएं हैं जो हमारे देश के लिए बहुत लाभकारी हैं। जैसे शिक्षा के क्षेत्र में हमारी बहनों को निशुल्क बी.ए. तक की शिक्षा देने का प्रस्ताव किया गया है। आज हमारे समाज में जो कुरीतियां फैली हैं उसका कारण हमारे समाज में ज्यादा लोगों का अनपढ़ रहना है। यदि हमारी बहनें पढ़ कर आगे आएंगी, तो नश्िचत रूप से हमारे देश की जो आबादी आज अशक्षित है, वह शक्षित होकर इस देश को आगे बढ़ाएगी।

  सभापति महोदय, माननीय वित्त मंत्री जी ने ग्रामीण रोजगार और गरीबी उन्मूलन हेतु धन का जितना प्रावधान किया है वह स्वागत योग्य कदम है। इंदिरा आवास योजना में १६०० करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। जो हमारी आवास योजना है उससे भी हमारे देश के निर्धन व्यकितयों को लाभ मिलेगा। जिनके पास रहने के लिए कोई आवास नहीं है उनको आवास मिल सकेगा।

  सभापति महोदय :यदि आप चाहें, तो अपनी स्पीच ले भी कर सकते हैं।

  श्री भानु प्रताप सिंह वर्मा:सभापति महोदया, सामाजिक सहायता कार्यक़म में ७०० करोड़ रुपए रखे गए हैं। इसके माध्यम से हमारे जो व्ृाद्ध माता-पिता हैं या हमारे समाज के कुछ ऐसे लोग हैं जो अपने माता-पिता को ठुकरा देते हैं, उनको व्ृाद्धावस्था पेंशन देने के लिए मंत्री महोदय ने प्रावधान किया है जिसके माध्यम से लगभग ५० लाख व्यकितयों को पेंशन देने का प्रस्ताव किया गया है। ग्रामीण सफाई योजना के अंतर्गत १०० करोड़ रुपए रखे गए हैं। मैं कहना चाहता हूं कि ये १०० करोड़ रुपए एक तरफ हैं और सारा बजट दूसरी तरफ है। हमारे गांवों में जो माता और बहनें हैं, गरीब परिवार के लोग हैं, उन्हें अपने यहां परिवार में कोई जगह शौचालय के लिए नहीं मिलती है जहां वे शौचालय जा सकें।

  वह कोसों दूर शौचालय के लिए जाते हैं। वित्त मंत्री जी ने इसमें १०० करोड़ का प्रावधान किया है। इससे स्वच्छ शौचालय बनेंगे।

  सभापति महोदय :अब आप समाप्त करिये।

  श्री भानु प्रताप सिंह वर्मा :मैं इस बजट का समर्थन करता हूं।

  सभापति महोदय : कृपया आप दो मिनट में समाप्त करने की कोशिश करिये।

  श्रीमती उषा मीणा (सवाई माधोपुर) : सभापति जी, सबसे पहले मैं यह कहना चाहती हूं कि दो मिनट में कोई बोल ही नहीं पाता है।

  सभापति महोदय : आपके अन्य साथी भी दो-दो मिनट बोले हैं।

“> श्रीमती उषा मीणा : मैं वर्ष १९९८-९९ के बजट का पुरजोर शब्दों में विरोध करती हूं कयोंकि यह बजट किसानों एवं गरीबों के हित का नहीं है। हमारे सामने वाले पक्ष से बार-बार यही सुनने को मिला है कि वित्त मंत्री जी ने किसानों के लिए इस बजट में बहुत पैसा दिया है परन्तु जब हम देखते हैं तो खाद, यूरिया, ट्रैकटर और किसान की अन्य इस्तेमाल की जो आवश्यक चीजें हैं, उनका पैसा बढ़ाया गया है। आज हम जब कहीं भी निकलते हैं चाहे बाजार में जाये, बस में जायें, ट्रेन में जायें तो हमें हर जगह यही सुनने को मिलता है कि यह बजट आम आदमी का बजट नहीं है। किसानों के हित का नहीं है और यह किसान विरोधी है। वैसे इसमें किसान के बारे में बहुत सी योजनायें हैं लेकिन किसानों पर हर साल जो प्राकृतिक विपदा आती है, उससे उनका लाखों करोड़ों रुपये का नुकसान हो जाता है। अगर बड़े-बड़े उद्योगों में नुकसान होता है तो बीमा के माध्यम से उनको पूरा पैसा मिल जाता है परन्तु किसानों को चाहे उसके ऊपर ओलाव्ृाष्िट हो, अनाव्ृाष्िट हो या अग्िन से कुछ नुकसान हुआ हो तो उनको नाममात्र ही पैसा मिलता है। किसानों के लिए जो बीमा योजना है उसमें मंत्री जी ने स्पष्ट कहा है कि किस-किस क्षेत्र में बीमा होगा, कितनी राशि मिलेगी और उसका दायरा कया होगा? हम किसान हैं, आदिवासी हैं और हमारे राजस्थान में जैसे मेरे पूर्ववकता श्री रामानंद सिंह चौधरी ने किसानों के बारे में कहा है कि चाहे ओला गिरे, बारिश आये या बाढ़ आये, किसानों को कुछ नहीं मिलता है। अभी कुछ दिन पहले की बात है जिसके लिए सदन में भी काफी हंगामा हुआ था कि किसानों ने आत्महत्या कर ली। परन्तु आत्महत्या कयों की, इसके बारे में आप सबको मालूम है कि किसान बड़ा मजबूर हो गया था। उसकी स्िथति बहुत दयनीय हो गयी थी जिसकी वजह से उसको आत्महत्या करनी पड़ी। चाहे उसकी फसल नष्ट हो गयी हो, अपनी बेटी की शादी करनी है या कर्जा देना है तो उसके लिए उसने आत्महत्या करनी पड़ी है।

  सभापति जी, माननीय वित्त मंत्री आई.ए.एस. अधिकारी रहे हैं और वे ब्यूरोक़ेटस में से आते हैं तो किसानों के हित की बात को न समझकर अधिकारियों की बात को अधिक समझा है।

  सभापति महोदय : आप समाप्त करिये।

  श्रीमती उषा मीणा : मैं भाषण नहीं दे रही हूं। मैं केवल दो-चार बातें आपके सामने रखना चाहती हूं। माननीय मंत्री जी ने लड़कियों की बी.ए. तक की शिक्षा को बढ़ावा दिया है, उसके लिए हम इनका स्वागत करते हैं परन्तु अगर ग्रामीण क्षेत्र में जहां भारतवर्ष की ८० प्रतिशत जनसंख्या रहती है वहां प्राईमरी, मडिल या १०वीं तक की शिक्षा फ्री कर देते, किसानों के बच्चों को पढ़ने की सुविधा मुहैया करा देते, तो अच्छा होता। इसी तरह जो गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोग हैं उनके बच्चों के लिए अलग से सहायता दे देते, तो ज्यादा अच्छा होता। बहनों की शिक्षा का मामला है इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हैं कयोंकि आपने यह अच्छा काम किया है।

  सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिये।

  श्रीमती उषा मीणा :सभापति जी, मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई है।

  सभापति महोदय : आप एक मिनट में अपनी बात समाप्त करिये।

  श्रीमती उषा मीणा : शक्षित बेरोजगार के लिए जो भत्ता मिलता है, उसमें आपने कोई अतरिकत सहायता नहीं दी है। हमारी आपसे यह मांग है कि अभी तक यह भत्ता ५०० रुपए है, इसको आप एक या डेढ़ हजार रुपए कर दें तो अच्छा रहता।

  श्रीमती मीणा जारी इसी तरह अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लोगों को जो वजीफा या स्कॉलरशिप मिलता है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) सभापति महोदय : आप कन्कलूड कीजिए।

  श्रीमती उषा मीणा : सभापति जी, वह नाममात्र के लिए है। अगर उसमें भी व्ृाद्धि कर दी जाये तो हम अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का कल्याण होगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : बहुत हो गया, इसलिए अब आप समाप्त करिये।

  श्रीमती उषा मीणा : मैं ज्यादा कुछ नहीं बोल रही हूं। मेरा एक प्वाइंट और रह गया है। मैं राजस्थान से आती हूं और राजस्थान में मार्बल बहुत है। मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहती हूं कि आपने मार्बल पर ३० परसेंट से बढ़ाकर ४० परसेंट डयूटी की है। इससे वहां पर जो मजदूर काम करते हैं उनको नुकसान होगा। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि आप इसे कम कर दें तो अच्छा होगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिये। धन्यवाद।

  श्रीमती उषा मीणा : मैं ज्यादा नहीं बोल रही हैं। मैं केवल इतना ही कहना चाहती हूं कि हमें जो विदेशी ऋण मिलता था, वह बंद हो गया है। उसके बारे में आपने कया सोचा है? कया आप महंगाई बढ़ाकर उस ऋण को पूरा करने जा रहे हैं? अंत में मै यही कहूंगी कि यह बजट किसान और गरीबों के लिए हितकर नहीं है। धन्यवाद।

“> वैद्य विष्णु दत्त (जम्मू): सभापति जी, ५० साल की स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा बजट पेश हुआ है जो भारत की आत्मा, समाज और जीवन के साथ सटा हुआ है। ऐसा बजट उपस्िथत करने पर मैं वित्त मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं। इसके साथ मुझे यह कहना है कि यह बजट इतना सर्वपक्षीय है कि हमारे समाज का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जिसकी समुन्नति और सुधार के लिए इसमें प्रावधान न हो। इसके बावजूद भी कुछ लोग नुकताचीनी करते हैं और भविष्यवाणियां करते हैं कि शायद रुपये का मूल्य गिरेगा, इनफलेशन बढ़ेगा। इसी तरह से जो फॉरन एकसचेंज है, उसका भी भंडार कम होगा। मैं समझता हूं कि अगर वह इतने अच्छे भविष्यवकता हैं, ज्योतिषी हैं तो पिछले ५० सालों में कया करते रहे? कयोंकि जब हम स्वतंत्र हुए थे तो जिन लोगों को इतिहास की जानकारी है, वह जानते होंगे कि भारत ने इंग्लैंड से करोड़ों रुपये का कर्जा लेना था। उस वकत हम साहूकार थे और दुख इस बात का है कि लगातार ५० वषर्ों में ५० ही बजट आये होंगे। आज हमारी दुर्दशा यह है कि हमारा फॉरन एकसचेंज भी माइनस है, हमारा उत्पाद भी घट गया और हमारे रुपये की कीमत भी लगातार घटती जा रही है।

  हमारी ६० प्रतिशत अवाम गरीबी की रेखा से नीचे बसती है और दुनिया में सबसे कर्जदार मुल्कों में भारत की गणना है।

  आज हमारी हालत यह है कि दुनिया का छोटा बड़ा कोई देश ऐसा नहीं है जिसके हम मकरूज़ नहीं हैं। ऐसे हालात में हमारे देश की स्िथति यह है कि यहां निर्धनता का नंगा न्ृात्य हो रहा है और मेरे गांव का किसान खुदकुशी करने पर मजबूर हो रहा है। दुनिया के लोग बोलते हैं कि दुनिया में सबसे अनपढ़ किस मुल्क में हैं तो हम कहते हैं भारत में हैं। दुनिया में कहां अंधे बसते हैं तो हम कहते हैं कि भारत में बसते हैं। दुनिया में सबसे अधिक तपेदिक की बीमारी से मरने वाले लोगों की संख्या किस देश में है तो हम कहते हैं कि भारत में है। मलेरिया कहां सबसे ज्यादा होता है तो कहते हैं कि भारत में है। कोढ़ी कहां बसते हैं तो कहते हैं कि भारत में और बेरोजगारी किस मुल्क में सबसे ज्यादा है तो कहते हैं कि भारत में है। यह गरीबी, यह बेकारी, यह लाचारी और भुखमरी पैदा करने वाले लोग ५० साल तक शासन करते रहे, यह उसी का परिणाम है।

  ये दो महीने में हमसे उम्मीद करते हैं। इनकी पचास साल की कारीगरी पर हम कैसे लीपापोती कर सकते हैं। हमें कुछ समय चाहिए। हमें इस बात से आनंद होता है कि पहली बार भारतीय विचारधारा, भारतीय समाज के साथ जुड़ी हुई आत्मा से संबंधित बजट आया है और हमारे वित्त मंत्री जी ने बड़ी दृढ़ता से इसे पेश किया है। हमारे विरोधियों को नुकताचीनी करने का कोई अवसर नहीं मिला। लेकिन ये कहते हैं कि बेरोजगारी दूर नहीं हुई। सरकारी नौकरी तो कोई भी सरकार नहीं दे सकती लेकिन बेरोजगारी दूर करने के लिए साधन उपलब्ध किए जाते हैं। बेरोजगारी दूर करने की जो योजना इस बजट में है, मैं उसकी मोटी-मोटी बातें बताना चाहता हूं। इसमें बीस लाख घर बनाने की योजना है, भिन्न-भिन्न बस्ितयों में दस लाख स्वच्छ शौचालय बनाए जाएंगे, और भी कई कार्य किए जाएंगे जिससे भट्टे पर काम करने वाले मजदूरों को रोजगार मिलेगा, लोहे के कारखाने चलेंगे, सीमेंट के कई कारखाने जो बंद पड़े हैं, वे चलेंगे। इसी तरह से लकड़ी के कारखाने चलेंगे, शीशे की डिमांड बढ़ेगी। इसके अलावा एक लाख सैल्फ हैल्प ग्रुप, जिसमें गावों में रहने वाले दस्तकारों को ट्रेनिंग दी जाएगी जिससे वे अपने पांव पर खड़े हो सकें। ऐसे दस लाख लोगों के साथ चालीस लाख परिवार जुड़े होंगे। इस तरह से गांव के लोगों का आर्िथक सुधार होगा। खेती में काम करने वाले मजदूर जब बेकार होते हैं, उस समय उनको सौ दिन का रोजगार दिया जाएगा। इसके अलावा ६० करोड़ रुपये कपास की उपज बढ़ाने के लिए लगाए हैं और जब कपास बढ़ेगी तो उससे संबंधित सारे कलकारखाने चलेंगे और इंडस्ट्रीज आगे बढ़ेंगी। ९० करोड़ रुपये चीनी के कारखाने और उसके सुधार के लिए खर्च किए हैं, आज चीनी के कई कारखाने बंद पड़े हैं। यदि वे चल पड़ेंगे तो बहुत से मजदूरों को रोजगार मिलेगा, ढुलाई करने वाले लोगों को रोजगार मिलेगा। इसी तरह इन्फ्रास्ट्रकचर खड़ा करने के लिए ऊर्जा, रोड और कम्युनिकेशन सैंटर्स को बढ़ावा देने के लिए बजट में बहुत कुछ किया गया है। ५० प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की योजना है। इससे कई अध्यापक, अध्यापिकाओं और विद्यार्िथयों को लाभ होगा। इस तरह से कोई ऐसा क्षेत्र नहीं छोड़ा जहां से रोजगार नहीं मिलेगा।

  यह बजट रोजगार की दृष्िट से काफी सुंदर है, इससे देश की डैवलपमैंट होगी, यह ग्रोथ ओरिएन्टेड बजट है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  हमारे यहां आणविक विस्फोट हुए। यह दूसरे देशों को फूटी आंख नहीं भाया, वे यह कहते रहे कि आपने ऐसा कयों किया। लेकिन हमने अपनी सुरक्षा के लिए, अपने आत्मबल के लिए ऐसा किया। विरोधी पक्ष के कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिए यह बजट भी विस्फोट साबित हुआ। यह बजट देखकर हमारे विरोधी हताश होकर बैठ गए। जब उनको नुकताचीनी का कोई अवसर नहीं मिला तो कभी रोजगार के बारे में, कभी कीमत के बारे में बात करने लगे। जिस गाय को चारा खिलाया जाता है, उससे दूध की भी आशा की जाती है, हम दूध दोहन का अधिकार रखते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

“> । श्री शैलेन्द्र कुमार (चैल): सभापति जी, आपने सामान्य बजट पर बोलने का अवसर दिया आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। रोटी, कपड़ा और मकान, हर खेत को पानी, हर हाथ को काम यही लक्षय, उद्देश्य हर सरकार का होना चाहिए।

  यह बजट आम आदमी पर बोझ तथा नौकरी वालों को थोड़ी राहत दिया है। आम जनता की प्रयोग में आने वाली सभी वस्तुओं को आपने महंगा किया है जैसे डाक सामग्री, सोना, पेट्रोल, यूरिया, मिट्टी का तेल, सिगरेट, चाय, मसाले, मकखन, घी, पनीर, मिठाइयां, नमकीन, पान मसाला, स्याही, टायर, सिलाई मशीन, चकित्सा उपकरण, चश्में के फ्रेम, शस्त्रों के दाम।

  बड़े लोगों के प्रयोग में आने वाले सामानों को माननीय मंत्री जी ने सस्ता किया है जैसे टेलीविजन, इलेकट्रॉनिक कैलकुटेर, पेजर, मोबाइल फोन, दस हार्स पावर वाले डीजल इंजन, कम्प्यूटर, न्यूजप्रिंट, बिना तराशे हीरे, सौर ऊर्जा उपकरण, रिकार्डेड आडियो कैसे आदि।

  कल्याण के क्षेत्र में ९१ प्रतिशत की व्ृाद्धि की है जो बहुत कम है, कयोंकि पूरे देश में सबसे बड़ी समस्या दलित शोषित समाज की है, जिससे जुड़ी हुई यह रकम है। अनुसूचित जाति, जनजाति के उत्थान के लिए ६५ करोड़ रुपये में २२.६६ लाख छात्रों के लिए छात्रव्ृात्ित बहुत कम है। यह धनराशि प्रत्यक्ष रूप से लोगों को मिले, कयोंकि बहुत घपला होता है। इस पैसे को दलाल आदि खाए जा रहे हैं। विशेष केन्द्रीय सहायता के अंतर्गत अनुसूचित जाति और जनजाति के घटकों को३६१ करोड़ रुपये दिए हैं। जिससे २४.८० लाख लोग लाभान्िवत होंगे। उनको इसका प्रत्यक्ष लाभ मिले इसलिए यह संसद सदस्यों की देखरेख में व्यय होना चाहिए।

  नाबार्ड में दो लाख परिवारों के लिए दस हजार रुपये प्रति व्यकित को स्व-सहायता लघु ऋण देने की बात कही गई है। मंत्री जी से मैं मांग करता हूं कि कम सेकम ब्याज में प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त व्यकित को पूरा पैसा मिलना चाहिए।

  सरकारी क्षेत्र के उद्यमों से सम्बन्िधत सुधार में घाटे या पुनर्जीवित नहीं होने वाले सभी सरकारी उपक़मों के कामगारों को उदार प्रति पूर्ित पैकेज की बात कही है, वह प्राइवेट सेकटर के उद्यमों के लिए भी होनी चाहिए। हमारे यहां रेल विभाग द्वारा संचालित संस्थान सुबेदार गंज स्लीपर प्लांट फैकट्री बंद होने के

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*Speech was laid on the Table

  कगार पर है। वी.पी.स. नैनी इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, आई.टी.आई. नैनी और पूरे प्रदेश के आई.टी.आई. यूनिट घाटे पर हैं। त्रिवेणी इंजी. नैनी इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश के ३५० मजदूर भुखमरी की कगार पर हैं। मंत्री जी उकत संस्थानों, जिनमें सरकारी, गैर सरकारी सभी हैं, उनके सभी मजदूरों और कामगारों के लिए उदार प्रति पूर्ित पैकेज देने का कष्ट करें।

  टेलीविजन सीरियल, सामाजिक, धार्िमक, ऐतिहासिक फिल्मों को बढ़ावा दिया जाए और टैकस फ्री रखा जाए। बड़ी तथा अश्लील फिल्मों पर रोक लगाई जाए। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक़म, व्ृाद्धावस्था पेंशन पचास लाख व्ृाद्ध व्यकितयों को फायदा दिया गया है, जबकि एक अरब की आबादी में करोड़ों लोग व्ृाद्ध हैं।

  इंदिरा आवास योजना में १६०० करोड़ रुपये आबंटित किए हैं। यह पैसा पात्र व्यकितयों को पूरा प्रत्यक्ष रूप में मिले। पैसे का दुरुपयोग रोका जाए, जिससे १३ लाख लोगों को फायदा होगा, यह भी बहुत कम है। २० लाख अतरिकत मकानों का लक्षय है, जिसमें १३ लाख ग्रामीण क्षेत्र में और सात लाख शहरी क्षेत्र में बनाए जाएंगे। उकत पैसों में दलाल व अधिकारी, कर्मचारियों को पैसे खाने से रोका जाए। हुडको में ११० करोड़ रुपये निवेश का प्लान है, जबकि आम जनता को इससे कोई फायदा नहीं है। पैसे का दुरुपयोग है, बड़े लोगों के लिए है, राष्ट्रीय आवास बैंकों से वित्तीय सहायता एक लाख आवास की व्यवस्था है, जो बड़े लोगों के फायदे में है तथा कमजोर वर्ग के लोगों को इसका पता ही नहीं चल पाएगा।

  १०० करोड़ रुपये १० लाख शौचालयों की व्यवस्था के लिए रखे हैं। इसे ग्रामीण स्तर पर ले जाना चाहिए। १६२७ करोड़ रुपये से एक लाख लोग कृषि ग्रामीण विकास के अंतर्गत लाभांवित होंगे। इस पैसे का भी दुरुपयोग रोका जाए। ४५० करोड़ रुपये में दस लाख कूप बनेंदे, यह पैसा प्रत्यक्ष रूप से जनप्रतनधियों के माध्यम से खर्च होना चाहिए। पांच वर्ष में सभी ग्रामीण बस्ितयों में पेयजल की पूर्ित होगी, जबकि पूरा देश पेयजल के संकट से गुजर रहा है। अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की बस्ितयों में पेयजल का घोर संकट है। मेरा सुझाव है कि छोटे नलकूप, स्टोर टंकी के साथ हर गांव में बनाए जाएं।

  यूरिया के दामों में बढ़ोत्तरी पूरे देश के ७६ प्रतिशत कृषकों को कंगाल करने की योजना है। मंत्री जी का वकतव्य निराधार है कि मिट्टी की दीर्घावधिक उर्वरता संरक्षित करने के लिए यूरिया के दामों में बढ़ोत्तरी की गई है। यह एक बहाना है और दाम बढ़ाने का सहारा लिया गया है।

  शिक्षा, युवावर्ग और लड़कियों की शिक्षा पर १०० करोड़ रुपये दिये गए हैं। जबकि ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की शिक्षा की समस्या है। ब्लाक स्तर पर एक इंटर कालेज खोला जाए। १०९२ करोड़ रुपये प्राथमिक शिक्षा और पोषाहार सहायता के लिए दिए गए हैं, जो उपयोगी नहीं हैं, इसका दुरुपयोग हो रहा है।

  राष्ट्रीय खेल कोष के गठन के अंतर्गत ग्रामीण स्तर के खेलों को बढ़ावा दिया जाए। ज्योति यादव क़िकेटर जो इलाहाबाद के हैं, उनको भारतीय क़िकेट टीम में शामिल किया जाए। आधारभूत संरचना पर ५०० करोड़ रुपये खर्च करने जा रहे हैं। जिसमें भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में इलाहाबाद में ६४ पार एवम् पुल बनाए जाएं, जिससे हैवी ट्रकों का आवागमन बाहर से हो जाए और शहर स्वच्छ एवम् दर्घटना रहित बन सके।

  इस बजट में स्वास्थ्य मद की रकम में कमी की गई है। पिछले वर्ष १.८ प्रतिशत रकम थी, इस वर्ष १.३ प्रतिशत ही रह गई है। सरकार ३६०० करोड़ रुपये की रकम बताकर जनता को गुमराह कर रही है। गांवों में पी.एच.सी. की व्यवस्था की जाए, प्राइवेट प्रैकिटस पर रोक लगाई जाए और आम जनता का उचित इलाज एवम् दवाएं दिलाई जाएं।

  सांसद नधि का पैसा बढ़ाया जाए। एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये किया जाए। जिला पंचाय, ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत को आर्िथक तौर पर मजबूत करें तभी देश में खुशहाली होगी।

  अंत में मैं माननीय वित्त मंत्री जी द्वारा रखे इस बजट का विरोध करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

“> । श्री जनार्दन प्रसाद मिश्र (सीतापुर) : देश के संक़मण काल में माननीय वित्त मंत्री जी ने एक साहसिक कार्य किया है, उसके लिए मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देता हूं। प्राथमिकता एवं उद्देश्य – दोनों दृष्िट से यह बजट पूर्ववर्ती सभी सरकारों के बजट से भिन्न है। बजट में पहली बार कृषि एवं ग्रामीण विकास शिक्षा, रोजगार एवं कल्याण क्षेत्र पर विशेष वरीयता दी है। विश्व मंच में भारत के वैशिष्टय को कायम करने के लिए यह आवश्यक है कि कृषि एवं ग्रामों को प्राथमिकता दी जाए।

  १९९७-९८ में आर्िथक विकास की दर गिर कर पांच प्रतिशत रह गई। कृषि उत्पादन१९९ मीटरिक टन से १९४ मीटरिक टन रह गया। औद्योगिक उत्पादन भी गिर गया। राजकोषीय घाटा ६.१ऽ तक रहा। ऐसी आर्िथक स्िथति वित्त मंत्री को मिली। यह बजट बिगड़ी अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने वाला बजट है। इसलिए वित्त मंत्री जी बधाई के पात्र हैं।

  इस बजट में बहुत सी सकारात्मक एवं स्वागत योग्य विशेषताएं हैं।

  १. कृषि के विकास पर विशेष बल देकर बजटीय आबंटन ९० प्रतिशत की व्ृाद्धि कर साबित कर दिया कि उन्हें देश की ७० प्रतिशत जनता की चिंता है।

  २. ग्रामीण विकास को प्राथमिकताएं –

  ३. ग्रामीण आवास को महत्व – २० लाख मकान बनाने की बात की गई – १३ लाख ग्रामीण क्षेत्र, ७ लाख शहरी क्षेत्र (रोजगार का स्ृाजन)

  ४. बस्ितयों में पीने के पानी की आपूर्ित का प्रयास।

  ५. महिलाओं को निचले स्तर से उच्च स्तर तक निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था।

  ६. इंफ्रास्ट्रकचर के विकास पर बहुत जोर दिया गया।

  ७. ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी दूर करने की मात्र स्वरोजगार योजना ही पर्याप्त नहीं है, रोजगार का स्ृाजन करने वाले कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने वाली योजनाओं की आवश्यकता है।

  बजट का उद्देश्य कृषि में गिरावट को खत्म करना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना, सिंचाई केवल ३७ प्रतिशत कृषि भूमि की होती है इसलिए सिंचाई पर जोर दिये जाने की जरूरत है। भारत कृषि आधारित देश होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था की नीति कृषि है – इससे पूरी अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

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* Speech was laid on the Table.

  सरकार ने बीज,खाद आदि की आसान खरीद के लिए जरूरी नकदी प्राप्ित के लिए किसानों को क़ेडिट कार्ड योजना का प्रस्ताव स्वागत योग्य है।

  ग्रामीण ढांचागत विकास के लिए तीन हजार करोड़ रूपये की व्यवस्था कर यह बता दिया है कि ग्रामीण क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे नहीं रहेंगे।

  सिंचाई के जल भंडारण और बंजर भूमि विकास पर मंत्री जी ने ध्यान दिया है।

  १६२७ करोड़ रूपये की व्यवस्था जल आपूर्ित के लिए की गई है।

  ग्रामीण क्षेत्र में ऋण उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण बैंको को सुदृढ़ करने की योजना है तथा नाबार्ड की शेयर पूंजी बढ़ाकर सहायता का प्रयास किया गया है।

  लघु उद्योग रोजगार पैदा करते हैं – लघु उद्यमियों को प्रोत्साहन देने व विकास पर विशेष ध्यान रखा गया है, जो ८० प्रतिशत रोजगार उपलब्ध कराते हैं।

  इस बजट में ऊर्जा, परिवहन एवं संचार के लिए योजनागत परिव्यय में ३५ प्रतिशत की व्ृाद्धि की गई। धनराशि ३५,२५२ करोड़ रूपये से बढ़ाकर ६१ करोड़ १,१४६ करोड़ की गई।

  राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण पर पांच सौ करोड़ रूपये की राशि रखी गई।

  बजट में शिक्षा के लिए ५० प्रतिशत आबंटन की राशि रखी गई है।

  लड़कियों की निशुल्क शिक्षा के लिए सौ करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।

  बीमा क्षेत्र को घरेलू निजी कंपनियों के लिए खोला गया – विदेशी कंपनियों को लिए नहीं। देश के आर्िथक विकास के लिए आंतरिक पूंजी व विदेशी पूंजी दोनों की आवश्यकता है।

  अनिवासी भारतीयों को पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया है। उसके लिए पी.आई.ओ. कार्ड योजना रखी गई है।

  विदेशी निवेशकों को निवेश प्रस्तावों को ९० दिन में निर्णय करना, विदेशी पूंजी को आकर्िषत करने का सही कदम है।

  आयकर की सीमा ४० हजार से बढ़ाकर ५० हजार की गई – यह ६० हजार होनी चाहिए।

  समाधान, सरल, सम्मान – तीन स्कीमें

  एग्रीकल्चरल प्रोसेसिंग उद्योग को अधिक राशि उपलब्ध।

  स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक प्रावधान की जरूरत है।

  १९४८ के आम बजट में सकल घरेलू आय का ५.७ प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य के लिए था – आबादी के बढ़ने के साथ स्वास्थ्य मद में रकम कम होती गई। वर्ष १९९७-९८ में दर १.८ परसेंट थी जबकि इस वर्ष १.३ परसेंट रह गई है। जबकि बजट में ३६०० करोड़ रूपये बता रहे हैं। माननीय वित्त मंत्री जी से अनुरोध है कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बजट का प्रावधान बढ़ायें तथा सकल घरेलू आय का ५.७ प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य मद में आबंटित किया जाए।

  केन्द्रीय रक्षा बजट में १९९८-९९ में ४१.२०० करोड़ रूपये का प्रावधान किया है जो पिछले साल के संशोधित बजट से मात्र ५,१०१ करोड़ रूपया ज्यादा है। रूपये का अवमूल्यन एवं एक बड़ा हिस्सा पांचवे वेतन आयोग की सिफारिशों पर खर्च होगा जो नगण्य है। हालांकि माननीय वित्त मंत्री जी ने कहा है कि सुरक्षा के मामले में कोई ढील नहीं दी जायेगी।

  देशी उद्योग जगत – आयात संबंधी उदारता से काफी परेशान है। न बिक़ीकर न उत्पाद कर, न स्थानीय कर लगते थे, जबकि पूंजी तकनीक और गुणवत्ता कौशल के मामले में पिछड़े होने पर भी ऊंची दर पर उत्पाद शुल्क देता था। जिस कारण वह टिक नहीं पा रहे थे। आयात शुल्क पर आठ फीसदी लेवी लगाकर देशी उद्योग को बराबरी पर लाने का प्रयास किया, वह देशी उद्योग के लिए स्वागत योग्य फैसला है।

  ब्रांडेड – पैकेज पर आठ प्रतिशत एडवांस उत्पाद कर लगाने से पिसे मसाले तथा चाय आम व्यकित के लिए महंगे होंगे, कृपया इस पर अवश्य विचार कर इसे वापस लेने की कृपा करें।

“> । श्री चन्द्रमणि त्रिपाठी (रीवा): माननीय सभापति जी, मैं आम बजट का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं वित्त मंत्री जी को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने माननीय प्रधानमंत्री, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्होंने देश को आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और सम्ृाद्ध राष्ट्र बनाने का संकल्प व्यकत किया है उनके अनुरूप ग्राम और किसान अभिमुख स्वदेशी बजट प्रस्तुत किया है।

  मैं अभी प्रतिपक्ष के नेताओं के विचारों को सुन रहा था। वे अपनी बात कहने के पहले यह तो देखते कि उन्होंने पिछले ५० वषर्ों में देश की कया हालत पैदा कर दी है? माननीय वित्त मंत्री जी ने कुछ दिनों पहले ही १९९७-९८ की आर्िथक समीक्षा सदन के सभा पटल पर रखी थी। उसमें स्पष्ट है कि वर्ष १९९७-९८ में समग्र आर्िथक विकास कम होकर पांच प्रतिशत रह गया था। कृषि विकास नकारात्मक था जिसमें पिछले १९९ मलियन टन की तुलना में खाद्यान्न उत्पादन घट कर १९४ मलियन टन रह गया था। औद्योगिक उत्पादन मंदी के कारण ४.२ प्रतिशत रह गया था। लगातार दूसरे वर्ष के लिए भी निर्यात निष्पादन कमजोर था और डालर के संदर्भ में व्ृाद्धि सकल घरेलू उत्पाद का ६.१ प्रतिशत हो गई थी। पूंजी बाजार की स्िथति निराशाजनक रही और आधारभूत बुनियादी सुविधाओं की कठिनाइयों के कारण अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। ऐसी चरमराई अर्थव्यवस्था जो माननीय वित्त मंत्री जी को विरासत में मिली है, उसमें इससे बढ़िया बजट प्रस्तुत ही नहीं किया जा सकता था।

  प्रस्तुत बजट में कृषि की गिरावट को दूर कर तेजी लाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने का जो साहसिक कदम उठाया गया है, वह प्रशंसनीय है। औद्योगिक क्षेत्र में लघु उद्योगों के विकास के लिए जो प्रावधान किया गया है उससे देश के विकास की दिशा और दशा दोनों बदलेंगी। आयोजना आबंटन हमारी प्रमुख प्राथमिकताओं को प्रदर्िशत करता है। कृषि मंत्रालय के लिए आयोजना आबंटन में ५८ प्रतिशत की व्ृाद्धि की गई है और १९९७-९८ के १८०७ करोड़ रुपए से बढ़ा कर २८५४ करोड़ रुपए कर दिए गए हैं। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्र और रोजगार मंत्रालय के लिए आयोजना आबंटन की राशि बढ़ा कर ९९१२ करोड़ रुपए कर दी गई है जो ९२९८ की संशोधित अनुमान की ८३५६ करोड़ रुपए की राशि से १५५६ करोड़ रुपए अधिक है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के लिए ३४ प्रतिशत की व्ृाद्धि की है। शिक्षा विभाग में ८९४ करोड़

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* Speech was laid on the Table.

  रुपए की व्ृाद्धि की है। कल्याण मंत्रालय के लिए ९१ प्रतिशत की व्ृाद्धि हमारे इरादे को दर्शाती है।

  यह गांधी जी ने तावीज की कि हमारे काम से सबसे दरिद्र अंतिम छोर में खड़े आदमी को लाभ पहुंचे। पंडित दीनदयाल जी के अंत्योदय की दिशा में यह उपयुकत कदम है। पहली बार ग्रामीणों, दस्तकारों और किसानों की बेहतरी का यह बजट पेश हुआ है, अभी तक गांव का लोहार का धंधा चोपट होता रहा और सबसे बड़ा लोहार टाटा फलता-फूलता रहा। गांव के मोची का धंधा चौपट होता रहा और सबसे बड़ा मोची बाटा बढ़ता गया। गांव के लोहार, गांव के मोची और बढ़ई का धंधा बढ़ाने वाला, इस बजट से वे लोग चन्ितत ठहो उठे हैं जो गांवों के विकास की ओर ध्यान न देकर दिल्ली के कनाट प्लेस, बम्बई की चोपाटी और कलकत्ता की चौरंगी को सजाने में व्यस्त रहे हैं।

  इस बजट में २० लाख लोगों के लिए आवास देने का प्रावधान है। ग्रामीण क्षेत्र में १३ लाख मकान और शहरी क्षेत्र के लिए ७ लाख मकान। सिंचाई का रकबा बढ़ाने की बात आगामी पांच वषर्ों में सभी बस्ितयों में पीने के पानी की व्यस्था। बंजर भूमि विकास कार्यक़मों में आयोजन आबंटन वर्ष १९९७-९८ में संधोधित अनुमान को ५१७ करोड़ रुपए से बढ़ा कर ६७७ रुपए किए जाने से देश की खेती का विकास होगा और किसानों के चेहरे खिल उठेंगे।

  त्वरित सिंचाई कार्यक़म के लिए १९९७-९८ में संशोधित अनुमान की तुलना में ५८ प्रतिशत की व्ृाद्धि का समर्थन करते हुए मांग करता हूं कि बाणसागर परियोजना को यथाशीघ्र पूरा करने के लिए और अधिक राशि आबंटित करें। अंत में मैं मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि यूरिया के दाम में जहां कमी की, यूरिया अभी सहकारी दुकानों से ही मिलती है, उससे किसानों को खाद नहीं मिल पाती। यूरिया की बिक़ी खुले बाजार में करने का प्रावधान किया जाए।

  इसी के साथ मैं अंतिम निवेदन करके अपनी बात समाप्त करूंगा। केन्द्र सरकार की जो योजनाएं हैं और जिनके क़ियान्वयन के लिए राज्य सरकारों को पैसा दिया जाता है उसका सही-सही उपयोग हो। इसको भी केन्द्र सरकार सुनश्िचत करे। हमारे निर्वाचन क्षेत्र रीवा में राजीव गांधी मिशन के नाम से संचालित सातों योजनाओं का पैसा सत्तारूढ़ कांग्रेस दल अपने नहित संकीर्ण हितों में कर रही है। उसमें भारी भ्रष्टाचार हुआ है। इसी प्रकार व्ृाद्धावस्था पेंशन में भी भारी गड़बड़ी हो रही है। वित्त मंत्री जी इसको भी रोकने का प्रयास करेंगे, इसी आशा और अपेक्षा के साथ मैं मंत्री जी द्वारा प्रस्तुत बजट का समर्थन करता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

  सभापति महोदय : सामान्य बजट पर माननीय वकताओ की सूची समाप्त हो गई । माननीय वित्त मंत्री जी का उत्तर अपराहन २.०० बजे होगा । आज की सभा प्रात : ११.०० बजे तक के लिये स्थागित होती है ।

2.46 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the clock

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