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Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Budget (General) For 2010-2011; Demands … on 12 March, 2010


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Title: Further discussion on the Budget (General) for 2010-2011; Demands for Grants on Account (General) for 2010-11 and Supplementary Demands for Grants in respect of Budget (General) for 2009-2010 (Discussion concluded).

 

श्री निशिकांत दुबे (गोड्डा): अध्यक्ष महोदया, कल जब मैंने अपना भाषण शुरू किया था, मैंने यह कहा था कि यह बजट पिछड़े क्षेत्र का विरोधी है, विद्यार्थियों का विरोधी है, युवा का विरोधी है और इस बजट में ट्रंसपेरेंसी नहीं है। जब मैं यह बात कह रहा था, हमारे यहां दो घटनाएं हुईं। पहली घटना यह हुई कि डायरेक्टर इंवेस्टीगेशन रांची में बदले गए हैं और दूसरी घटना हुई है कि डायरेक्टर इंवेस्टीगेशन दिल्ली के अंदर बदले गए हैं। वित्त मंत्री जी यहां हैं, वे इसका ज्यादा अच्छे से खुलासा करेंगे, अखबारों में निकला है कि किसी के दबाव में हुआ, किसी को बचाने के लिए हुआ और मुझे लगता था कि केन्द्र सरकार किसी के दबाव में नहीं आ सकती है, किसी को बचाने की बात नहीं कर सकती है चाहे वह मधु कौड़ा हों, चाहे इस देश के बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट्स हों। मैंने दो घटनाओं का जिक्र किया है, लेकिन जब मैंने वित्त मंत्री जी की बजट स्पीच देखी तो मुझे लगा कि कहीं न कहीं एक बहुत बड़ी कांस्पिरेसी है और जो डायरेक्टर, इंवेस्टीगेशन बदले गए हैं, वह किसी न किसी को बचाने की साजिश है। वित्त मंत्री जी जब अपनी बजट स्पीच के 123 प्वाइंट को कहते हैं: “To expeditiously resolve disputes with tax payers, I propose to expand the scope of cases which may be admitted by the Settlement Commission to include proceedings related to search and seizure cases pending for assessment.”

          यदि अर्थशास्त्र की एक भी बात किसी को पता हो, वित्त मंत्री जी इसका सहज तौर पर जवाब दे सकते हैं कि जो पेंडिंग फॉर एसेसमेंट केसेज हैं, उनका एससमेंट ऑफिसर तय करता है, न कि सेटलमेंट कमीशन तय करता है। सेटलमेंट कमीशन में वे अफसर नियुक्त किए जाते हैं जो आपके कृपापात्र होते हैं। …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अजनाला जी, आप अपनी सीट पर बैठ जाइए।

श्री निशिकांत दुबे : रिटायरमेंट के बाद जिन अफसरों को आपको ऑब्लाइज करना होता है, पोस्टिंग देनी पड़ती है, वे लोग सेटलमेंट कमीशन में अफसर नियुक्त होते हैं। इसका मतलब यह है कि जो बड़े-बड़े केसेज चल रहे हैं, चाहे झारखण्ड में चल रहे हैं या दिल्ली में चल रहे हैं।…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Hon. Member, please take your seat.

श्री निशिकांत दुबे : एक टेप आया है एक पीआर एजेंसी का, जिसमें इस देश के बड़े इंडस्टियलिस्ट्स से लेकर आपकी सरकार तक का जिक्र है कि आपके यहां मंत्री प्रधानमंत्री तय नहीं कर रहे हैं, आपके यहां मंत्री बाहर के लॉबिस्ट तय कर रहे हैं। उसी टेप के आधार पर डायरेक्टर, इंवेस्टीगेशन, दिल्ली को जब वह पेपर जाता है, वह पेपर लीक होता है और आप डायरेक्टर, इंवेस्टीगेशन को बदलते हैं। उसके बाद आप तय करते हैं कि जो एसेसमेंट अफसर है, वह तय नहीं करेगा इन केसेज को, बल्कि सेटलमेंट कमीशन तय करेगा। यशवंत सिन्हा जी यहां बैठे हैं, वह वित्त मंत्री रहे हैं, वह यह बताएंगे कि यह सही है या गलत।

          जब मैंने ट्रंसपेरेंसी की बात कही कि इसमें कहीं कोई ट्रंसपेरेंसी नहीं है, तो मैं टैक्स प्रपोजल की बात करता हूं। माननीय यशवतं जी कल बात करते-करते बोल गए कि तीन लाख रूपए से अधिक आय पर, आठ लाख रूपए तक आपने 50,000 रूपए एग्जम्पशन दे दिया, लेकिन एक लाख 60 हजार रूपए से लेकर तीन लाख रूपए तक की आय वाले एक करोड़ एसेसी हैं। उन आम आदमियों को आपने कुछ दिया। आपने 10 प्रतिशत कारपोरेट सरचार्ज को घटाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया। यदि आप इंडस्ट्रियलिस्ट्स को 2.5 प्रतिशत का फायदा दे रहे हैं, तो इसमें कौन सी ट्रंसपेरेंसी नजर आती है, यह आपको देश के सामने बताना चाहिए।

          आपने मैट की बात कही है। यदि कोई अर्थशास्त्र का विद्यार्थी हो, तो यह समझ में आता है कि मैट में आप इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को परेशान करना चाहते हैं, इसलिए आपने इसे 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दिया।  इससे कोई बड़ी कंपनी प्रभावित नहीं होने वाली है। उसी तरह से आप हाउसिंग की बात करें, आपने हाउसिंग में दो चीजों पर सर्विस टैक्स लगा दिया है – एक्सटर्नल डेवलपमेंट चार्जेज और दूसरा प्रिफ्रेंशियल लोकेशन चार्जेज। इस पर यदि टैक्स पड़ेगा तो हाउसिंग सेक्टर का बहुत बुरा हाल होना है। आप इससे किसे फायदा पहुंचाना चाहते हैं, किसको नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, किसका इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना चाहते हैं, यह आपको खुलासा करना चाहिए। दूसरा सवाल यह है कि  आपका बजट यह कहता है कि आपने 2,000 करोड़ रूपए इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए दे दिया, नेशनल हाइवेज के लिए दे दिया। आज आपका बजट आने के बाद स्टील और सीमेंट के दामों में कितनी वृद्धि हो गयी है?       

 जब आप पीएलएल, एसएसएस लगा रहे हैं, ईडीसी लगा रहे हैं, इसका क्या फायदा हो रहा है और आप कहते हैं कि सात से 20 किलोमीटर सड़क प्रतिदिन बनाएंगे, इंफ्लेशन कितनी बढ़ रही है, यदि आप यह सब देखेंगे तो आंकड़ों की जगलरी के अलावा कुछ नजर नहीं आएगा।

SHRI YASHWANT SINHA (HAZARIBAGH): Madam, I am on a point of order.

         The Budget of the Government of India is being discussed in this House. This is the Budget Session and this is the most serious discussion that takes place in Lok Sabha on Budget. Not only are the Treasury Benches completely empty, I do not see any Cabinet Minister present. … (Interruptions)

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): Madam, Bansalji is coming. … (Interruptions)

SHRI YASHWANT SINHA : Madam, this is the importance that they are giving to the Budget. … (Interruptions) This is why they were very happy when the House was not functioning. … (Interruptions)

MADAM SPEAKER : You just call him.

… (Interruptions)

SHRI V. NARAYANASAMY : Madam, Bansalji is coming. … (Interruptions) In two minutes, Bansalji will be coming,. … (Interruptions)

SHRI YASHWANT SINHA : Shri Narayanasamy, you were in the other House. Is it allowed to happen ever? … (Interruptions)

SHRI V. NARAYANASAMY : Not ever. You raised a point. Madam, definitely hon. Minister will be coming now. … (Interruptions)

MADAM SPEAKER : He is coming.

… (Interruptions)

SHRI V. NARAYANASAMY : Yashwant Sinhaji, I agree with you. … (Interruptions)

 

श्रीमती सुषमा स्वराज (विदिशा): नारायणसामी जी कह रहे हैं संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल जी आ जाएंगे, कोई बात नहीं है आ जाएं। मैं कह रही हूं कि आप एक बार खड़े होकर पीछे की तरफ देखिए। सवाल पवन बंसल जी का नहीं है, पूरा का पूरा सत्ता पक्ष का बैंच खाली है। उसके बारे में आपका क्या कहना है। पवन बंसल जी आ जाएंगे, लेकिन जरा घूमिए और देखिए पूरा का पूरा सत्ता पक्ष का बैंच खाली है। The total Treasury Benches are empty. … (Interruptions)

MADAM SPEAKER : Shri Nishikant Dubey to continue.

श्री निशिकांत दुबे : धन्यवाद, अध्यक्ष महोदया, मैं यह कह रहा था कि यह केवल आंकड़ों की जगलरी है। पिछले बजट में वित्त मंत्री जी ने कहा कि सोशल सेक्टर में पैसा देने वाले हैं, उसमें स्पेक्ट्रम को बेचेंगे और 35,000 करोड़ रुपए लाएंगे। आज तक तो कोई स्पेक्ट्रम नहीं बेचा है। इस तरह आपने संसद को गुमराह किया, आपने इस बजट के द्वारा लोगों को गुमराह किया, उसका जवाब आपके पास क्या है। आप जो विनिवेश कर रहे हैं और कह रहे हैं कि सोशल सेक्टर के लिए पैसा देंगे, तो आरएसी में आपका अकाउंट फज हो रहा है। आप उसे स्टाक एक्सचेंज में गलत तरीके से  दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। चाहे वह आरएसी का विनिवेश हो रहा हो या एनएमडीसी का विनिवेश हो रहा हो। मेरा यह कहना है कि कम से कम सरकार एक प्राइवेट कम्पनी की तरह बिहेव नहीं करे। उसका एक ट्रंसपेरेंट सिस्टम होना चाहिए। जब आप विनिवेश कर रहे हैं सोशल सेक्टर के लिए पैसा ला रहे हैं तो आप जब संसद में यह कह रहे हैं, तो उस पर कम से कम आपको अडिग रहना चाहिए। आपको कहीं से भी करप्शन को बढ़ावा देने की बात नहीं करनी चाहिए।

          सरकार का फ्लैगशिप प्रोग्राम नरेगा है। उसमें वित्त मंत्री जी कह रहे हैं कि साढ़े चार करोड़ लोगों को 100 दिन का रोजगार देंगे। अगर 100 रुपए रोज प्रति व्यक्ति देंगे। यदि बहुत ज्यादा हिसाब-किताब में नहीं पड़ा जाए, तो साढ़े चार करोड़ का मतलब यह होता है कि 450 करोड़ रुपया रोज, यदि उसे 100 रुपया रोज देंगे तो न्यूनतम 45,000 करोड़ रुपया चाहिए। लेकिन आपने इस बजट के माध्यम से इस योजना में 40,000 करोड़ रुपया रखा है। उसमें भी तीन प्रतिशत सर्विस चार्ज काटते हैं, तो इसका मतलब हुआ 40,000 करोड़ का 37,000 करोड़ रुपया। इस तरह से यह जो 8000 करोड़ या 10,000 करोड़ रुपए का डेफिसिट है, यह पैसा कहां से लाएंगे?

          अध्यक्ष महोदया, मैं रूरल डवलपमेंट के डेटा में फिर से जाना चाहता हूं। प्रधान मंत्री सड़क योजना में क्या हो रहा है, आपके रूरल डवलपमेंट के प्रोग्राम में क्या हो रहा है, उसके लिए नरेगा में आप जितनी वाहवाही लूटने की कोशिश कर रहे हैं, उसका हिसाब-किताब यदि मुझे वित्त मंत्री जी बता दें तो मेरे लिए ज्यादा बढ़िया होगा।

          इसके बाद मैं एयर इंडिया के बारे में कहना चाहता हूं। जब वित्त मंत्री जी पिछली बार एडीशनल बजट ग्रांट लेकर आए थे, उस समय एयर इंडिया के लिए 800 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। माननीय यशवंत सिन्हा जी ने कहा था कि आप 800 करोड़ रुपया क्यों दे रहे हैं। आपने उसके बाद इस बजट में 1200 करोड़ रुपए एयर इंडिया के लिए प्रोवाइड किए हैं। अगर देखा जाए तो एयर इंडिया का घाटा कितना है, साढ़े पांच हजार करोड़ रुपए। मैं कहना चाहता हूं कि एयर इंडिया पर 2000 करोड़ रुपए ऑयल कम्पनीज के बाकी थे। जो आपने पिछली बार 800 करोड़ रुपए दिए, वे सारे पैसे उन ऑयल कम्पनीज को चले गए। मुझे लगता है वह घाटा 2500 करोड़ रुपए का हो गया होगा। अब यह 1200 करोड़ रुपया भी उसी ऑयल कम्पनी को चला जाएगा। यह केवल आईओसी का है। मैं यह कह रहा हूं कि साढ़े पांच हजार करोड़ रुपए का घाटा है, यह गोबर में घी डालने का काम कर रहे हैं। यह करप्शन नहीं तो क्या है। एयर इंडिया के बारे में आपको एक श्वेत पत्र लाना चाहिए कि किस परिस्थिति में 65 फ्लाइट्स बंद हो गईं, किस परिस्थिति में जैसे ही आपकी कोई फ्लाइट बंद होती है, प्राइवेट एयरलाइंस उसका फायदा उठाती हैं। आपकी यहां से लेह-लद्दाख फ्लाइट जाती है। मैं उसके बारे में उदाहरण देना चाहता हूं।

 वह फ्लाइट एयर-इंडिया बंद करती है, 100 परसेंट आकूपेंसी है उसकी और वह आज 2 बजे बंद होती है, तीन बजे प्राइवेट एयरलाइन्स शुरू हो जाती है। उससे सारे के सारे सैनिक जाते हैं। जिन परिस्थितियों में एयर इंडिया और इंडियन एयर लाइंस का मर्जर हुआ, आप उसकी तह तक नहीं जा रहे हैं। साढ़े पांच हजार करोड़ रुपये चाहिए, आप 800 करोड़ रुपये ले लीजिए, 1000 करोड़ ले लीजिए, यह करप्शन नहीं है तो क्या है? इसका जवाब आपको देना चाहिए।

          इसके बाद नेशनल सिक्योरिटी की बात आती है। यह देश बार-बार कहता है कि नेशनल सिक्योरिटी होनी चाहिए और हमारे जो नये होम-मिनिस्टर हैं वे नेशनल सिक्योरिटी पर सबसे ज्यादा दबाव डाले हुए हैं कि नेशनल सिक्योरिटी नहीं होगी तो बम फूटेगा, आप अलर्ट हो जाएये, मुम्बई में बम-विस्फोट होने वाला है, दिल्ली में, पटना में और रांची में बम विस्फोट होने वाला है।  इस बजट की ग्रांट्स को मैं देख रहा था। आपने आईबी के लिए 100 करोड़ रुपया घटा दिया है, आपने सीआरपीएफ के लिए पैसा घटा दिया है, बीएसएफ के लिए पैसा घटा दिया है, केवल एनएसजी के लिए पैसा बढ़ाया है। आप अपने बजट प्रपोजल को देखिये और होम-मिनिस्टरी की ग्रांट को देखिये, आईबी का पैसा घटाकर एनआईए आपने बनाया है। सीबीआई के रहते हुए आपने एनआईए बना दिया और एनआईए में 14 करोड़ रुपया पिछले साल था, इस साल 15 करोड़ रुपया दे दिया। आप कहते हैं कि हम सारी टैरेरिस्ट एक्टिविजी को इससे कंट्रोल कर लेंगे। इंडो-नेपाल बार्डर पर आपने पैसा घटा दिया है, इंडो-भुटान, इंडो-बंगला देश बार्डर पर आपने पैसा घटा दिया है और हमारे यहां, मैं झारखंड से आता हूं हम और आसाम के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। बंगला देश से इंफिल्ट्रेटर्स हमारे यहां करोड़ों की संख्या में हैं और हमारे यहां के रोजगार को खा रहे हैं और वही बंगलादेसी इंफिल्ट्रेटर्स जब दिल्ली और मुम्बई में नौकरी करते हैं तो बिहारी समझकर उनके साथ मारपीट हो रही है, भाषा के नाम पर लड़ाई हो रही है। वे कोई बिहार के लोग नहीं हैं, बिहार के लोग मालिक हैं, झारखंड के लोग मालिक हैं। हम स्टील प्रोडय़ूस कर रहे हैं, हम आपको कोयला दे रहे हैं, हम देश को चला रहे हैं और आप मालिक को मार पड़वा रहे हैं क्योंकि आप बंगलादेसी इंफिल्ट्रेटर्स को रोकने के लिए कोशिश नहीं कर रहे हैं। वह कोई कम्युनल मुद्दा नहीं है, वह रोजगार का मुद्दा है और आप उस मुद्दे के लिए कितने चिंतित हैं, मैं यही बता रहा हूं।

          आपने कहा है कि 11 हजार बैंक्स हम खोलेंगे, आपने घोषण की है कि रुरल एरियाज में बैंक खोले जाएंगे, प्राइवेट बैंक खोले जाएंगे। हमारे देवधर का जो डीसी है, उसने 15 दिन पहले आदेश दिया कि आप लोग प्राइवेट बैंक में पैसा जमा मत कीजिए। वह आईएएस है, मैंने पूछा कि क्या कारण है, क्यों आप कह रहे हैं कि प्राइवेट बैंक बंद कर दीजिए। उसने कहा कि इसमें से कोई भी आदमी किसान को पैसा नहीं दे रहा है। हमारा डिपोजिट ले रहा है लेकिन किसान को, विद्यार्थी, रिक्शा वाले को, ठेले वाले को और छोटे दुकानदार को एक भी पैसा देने के लिए तैयार नहीं है। जब ये इन्हें पैसा देने के लिए तैयार नहीं है तो हम बैंक कैसे खोलने देंगे? सी.रंगराजन कमेटी की जो रिपोर्ट है वह भी यही बात कहती है कि सरकारी बैंक तक पैसा नहीं दे रहा है तो प्राइवेट बैंक कहां से पैसा देगा और आप कह रहे हैं कि हम 11 हजार प्राइवेट सेक्टर में बैंक खोल रहे हैं। आप किस तरह का वातावरण पैदा करने जा रहे हैं?

          इसके बाद आप कहते हैं कि यह यूवा के लिए, आम आदमी के लिए बजट है और जो बजट का सार है उसमें दो चीजों को देखा तो मुझे लगा कि इस पर जाना चाहिए। राष्ट्रपति जी कहती हैं कि –

 “The service of India means the service of the millions who suffer. It means ending poverty and ignorance and disease and inequality of opportunity.”

           उसी तरह  से उस दिन माननीया मीनाक्षी नटराजन जी बहुत अच्छा बोल रही थीं और वह अवसरों की बात कह रही थीं और स्किल डिवेलपमेंट की बात कर रही थीं। मैं जब बजट पढ़ रहा था कि युवाओं और आम आदमियों को स्किल्ड डिवेलपमेंट होना चाहिए। आपने महात्मा गांधी को कोट किया है। आप कहती हैं कि –

 “Just as the universe is contained in the self, so is India contained in the villages.”

आपने कहा है कि हम स्किल्ड डिवेलपमेंट पर बहुत खर्चा करना चाहते हैं। आपने कहा है कि –

Prime Minister’s Council on National Skill Development has laid down the core governing principles for operating strategies for skill development. The Council has a mission of creating 50 crore skilled people by 2022. Of these, the target for the National Skill Development Corporation, which has started functioning from October, 2009, is 15 crore.”

15 करोड़ में आप क्या कह रहे हैं कि 10 लाख स्किल्ड मैनपावर एट दि रेट आफ एक लाख पर एनम। यदि वर्ष 2022 को भी माना जाए, तो बारह साल में कितने लोग आएंगे? यदि आपके आंकड़े ही माने जाएं तो एक साल में 12 लाख और 12 साल में एक करोड़, लेकिन आपका टार्गेट 15 करोड़ का है। यह आंकड़ों की जगलरी नहीं है, तो क्या है इसका आप खुलासा करें और इसमें यूथ को कौन सी ओपोरचुनिटी मिलने वाली है? हमने आपके बजट में एजुकेशन का बजट भी देखा है, हमें कोई आईआईटी नहीं खोलनी है, कोई नया आईआईएम नहीं खोलना है। उसके लिए कोई स्कोप नहीं है। आप जिस सर्व शिक्षा अभियान की बात कर रहे हैं, उसमें 80 परसेंट पैसा केवल टीचर की सैलरी और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दे रहे हैं। उनकी पढ़ाई के लिए, उनके घूमने के लिए, उनके आर एंड डी के लिए एक भी फैसिलिटी क्रिएट नहीं की है। यदि 80 परसेंट पैसा आप उसी में इवेस्ट कर रहे हैं, तो वे किताब कहां से पढ़ें। आप कौन से यूथ की बात कर रहे हैं? किस युवा वर्ग को आगे बढ़ाने की बात कह रहे हैं? इस सबके बाद युवा को जॉब चाहिए और मैंने कहा कि स्किल डवलपमेंट में किसी को जॉब नहीं मिलने वाला है। आप नरेगा में केवल लेबर की बात कहते हैं। पढ़े-लिखे लोगों को क्या जॉब मिलेगी, अर्बन लोगों के लिए आपको कोई मतलब नहीं है। यदि आपके शब्द कोष को देखा जाए, तो अर्बन पुअर शायद पुअर नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के लिए चाहे वह शहर का गरीब है या गांव का गरीब है, दोनों बराबर हैं। यदि आप उन्हें अलग-अलग करना चाहते हैं, तो उसके लिए आपके पास क्या स्कीम है? इसके बाद मान लीजिए कि कहीं से जॉब आ जाए, तो युवा को क्या चाहिए? अर्बन युवा को लगता है कि सबसे पहले गाड़ी खरीद लें। इस बजट में गाड़ी का दाम सबसे पहले बढ़ जाता है। हाउसिंग सैक्टर में वह इतना अफोर्ड ही नहीं कर पा रहा है, क्योंकि उसके पास इतना पैसा ही नहीं है कि वह हाउस खरीदे। मान लीजिए उसने घर खरीदना भी था, तो आपने उसका ऐसा टैक्स प्रपोजल बनाया कि उसका रेट बढ़ गया। युवा के लिए आपने इस बजट में क्या दिया, यह आपको सोचने की बात है।

          इसके बाद आप कहते हैं कि इस देश का विकास तब होगा, जब देश में कोल होगा। कोल में माननीय यशवंत जी ने कहा कि आपने 50 रुपए टैक्स लगा दिया। कोल का ई-आक्शन हो रहा है और सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि बहुत पारदर्शी सिस्टम हो रहा है। लेकिन जब आप नोमिनेशन बेसिस पर कोल देते थे, तो वह 13 परसेंट फ्री पावर देता था। 35 परसेंट पावर वह किस रेट पर बेचेगा, यह स्टेट तय करती थी। आज आपने मार्केट को यह तय करने का चांस दे दिया। यदि मार्केट तय करेगी, तो इस देश में 15, 20, 25 रुपए प्रति युनिट बिजली होगी और कौन सा आम आदमी है, जो राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत बिजली ले सकेगा। आप गांव के लोगों को खुशहाल बनाना चाहते हैं, लेकिन क्या वे अपने घरों में बिजली जला पाएंगे, इस बात का उत्तर सरकार को देना चाहिए। ई-आक्शन से आम आदमी को क्या फायदा होने वाला है, इसे सरकार को बताना चाहिए? हमारा राज्य एक सोशल, रिस्पोंसिबल, डवलपमेंटल राज्य है। सोशल रिस्पोंसिबिलिटी इसका एक बहुत बड़ा फैक्टर है। हम बिजनेस करने के लिए सरकार नहीं चलाते हैं। हम आम आदमी को खुश करने के लिए सरकार चलाते हैं। यह सरकार को सोचना चाहिए। यह सरकार आम आदमी की सरकार है, तो आपको आम आदमी के लिए और ज्यादा सोचने की जरूरत है।

          आपने अपनी बजट स्पीच में दो चीजें कही हैं। एक एफिलिएंट ट्रीटमेंट प्लांट, त्रिपुर और दूसरी बात आपने कही कि हम गंगा पदमा के लिए मुर्शीदाबाद में सैंट्रली सपोंसर्ड फ्लड मैनेजमेंट प्रोग्राम लाएंगे। इससे हमें कोई परेशानी नहीं है। माननीय शाहनवाज जी सामने बैठे हैं, उस दिन चर्चा कर रहे थे, ये भागलपुर से आते हैं और भागलपुर सिल्क इंडस्ट्री का केंद्र है और मैं गोड्डा से आता हूं। भगइया में सबसे ज्यादा रॉ सिल्क प्रोडय़ूज होता है। माननीय कीर्ति जी बैठे हैं, उनका जिला गोड्डा है। हम एक साल से लगातार लिख रहे हैं, झारखंड का साहबगंज क्षेत्र सबसे ज्यादा गंगा के कटाव से प्रभावित होता है और कटाव के कारण वह गांव कभी झारखंड में मिल जाता है और कभी वह गांव बिहार में मिल जाता है। उस क्षेत्र को न तो दयानिधि मारन पैदा कर रहे हैं और न ही प्रणब मुखर्जी पैदा कर रहे हैं। हम छोटे-छोटे लोग उस क्षेत्र के लिए क्या कर सकते हैं? गरीब आदमी की यही परेशानी है कि वह एक बड़ा नेता पैदा नहीं कर पा रहा है, जो आपके शब्द कोष के लिए सूट करता हो।

इसलिए भागलपुर और भगैय्या में सिल्क के लिए कोई कलस्टर नहीं बन सकता, मार्केटिंग की कोई सुविधा नहीं हो सकती, रिवर के लिए कोई फायदा नहीं हो सकता। गंगा के कटाव के साहबगंज जिले के सांसद देवीधन बेसरा जी हैं,  वे कभी मुंह नहीं खोल सकते इसलिए वहां कोई गंगा का कटाव नहीं हो रहा है। मेरा कहना है कि वित्त मंत्री होने के नाते समग्र सोच की बात कीजिए और जहां जो परेशानी है उसे देखने की कोशिश कीजिए।, गोड्डा से मैं आता हूं, शाहनवाज जी भागलपुर से हैं और झारखंड में दबे, पिछड़े, दलित, आदिवासी, मुसलमान लोग हैं, अक्लियत के लोग हैं, आपके लोग हैं। आप उनके बारे में सोचिए क्योंकि सिल्क इंडस्ट्री में कोई हिंदू नहीं है। इसमें जितने वीवर हैं वे सब मुसलमान हैं। आपको इसकी राजनीति बंद करके इसके बारे में कहना चाहिए। बजट में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आप अपनी ही बातों को बार-बार कहते हैं। आप बजट में कहते हैं कि आप फिस्कल कन्सॉलिडेशन करेंगे। इसका मतलब है कि ऑयल बांड पहले जारी कर रहे थे, फर्टीलाइजर बांड जारी कर रहे थे, कहीं न कहीं करप्शन को जन्म दे रहा था और कहीं न कहीं उसके मैनेजमेंट में परेशानी थी। आप अपनी ही सरकार के बारे में बोलते हैं, यह मेरा सबसे पहला सवाल है। जब यशवंत जी बोल रहे थे तो कुछ बातें कही गई और के.एस. राव जी और माननीय गिरिजा जी ने कहा कि आप जीएसटी के बारे में बोल रहे हैं, आप डायरेक्ट टैक्स कोड के बारे में बोल रहे हैं, आप एफबीआई के बारे में बोल रहे हैं, आप आम जनता की बात नहीं बोल रहे हैं। यदि आम जनता की बातों पर जाएं तो सबसे पहला फ्लेक्सिबल प्रोग्राम फूड सिक्योरिटी का है। इसका इनफ्लेशन क्या है? यह 17 परसेंट है। कुछ फूड के दामों का 40 परसेंट तक इनफ्लेशन होता है। माननीय पूर्व वित्त मंत्री बैठे हैं और हमारे यहां कहा गया है कि बजट को आंकिए तो जीडीपी रेश्यो से आंकिए। यशसंत जी, फूड सिक्योरिटी में जो फूड देना है, उसके लिए 2004-05 में जीडीपी रेश्यो 0.9 प्रतिशत था। आज भी 2010-11 में 0.9 प्रतिशत ही है। पापुलेशन बढ़ गई है। हम कह रहे हैं कि जहां 25 किलो चावल दे रहे थे अब वहां 35 किलो देंगे लेकिन जीडीपी रेट 0.9 परसेंट ही है। यह गरीबों के खिलाफ नहीं है तो और क्या है? एग्रीकल्चर में इस बार का एलोकेशन दो परसेंट है। आप एग्रीकल्चर को बढ़ाने की बात कह रहे हैं कि यदि एग्रीकल्चर सैक्टर में इन्वेस्टमेंट नहीं किया, हरित क्रंति नहीं आई, उत्पादन नहीं बढ़ा तो इस देश में कुछ नहीं होना है और आप उसका एलोकेशन दो परसेंट बढ़ा रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि पूरे देश को माइनर इरीगेशन में 200 करोड़ रुपया दे रहे हैं, मेजर इरीगेशन में 300 करोड़ रुपया दे रहे हैं और फ्लड मैनेजमेंट के नाम पर 100 करोड़ रुपया दे रहे हैं। यह देश आपसे इरीगेशन के नाम पर केवल 600 करोड़ ले रहा है और आप कह रहे हैं कि हम दूसरी हरित क्रंति लाएंगे। इसमें भी बड़ा सवाल है, कहा गया कि 400 करोड़ रुपया ईस्टर्न स्टेट्स झारखंड, बिहार, बंगाल को दिया और वहां हरित क्रंति होगी। आप 500 करोड़ रुपए केवल एक जिले लद्दाख को सोलर पावर के लिए दे रहे हैं। एक जिले में सोलर पावर के लिए दे रहे हैं क्योंकि यहां फारुख अब्दुला साहब हैं। इसलिए मैंने यह बात कही कि हमारी बात सुनने और समझने के लिए सरकार तैयार नहीं है। इतने जिलों के लिए 400 करोड़ रुपया दे रहे हैं और कह रहे हैं कि हरित क्रंति आएगी, देश को अन्न मिलेगा, आम आदमी और गरीबों के पेट में भोजन जाएगा। लेकिन लद्दाख में बिजली जलनी चाहिए। मैं लद्दाख का विरोधी नहीं हूं, आप 500 करोड़ रुपया नहीं 1000 करोड़ रुपया दीजिए। लेकिन जब आप हमारे यहां एलोकेशन की बात कहते हैं तो 400 करोड़ तक सीमित नहीं होना चाहिए। हरित क्रंति कैसे आएगी, आपको इसके बारे में निर्णय करना चाहिए। आपने कहा है कि पल्स और ऑयल सीड प्रोडक्शन को बढ़ाने के लिए पूरे देश को 300 करोड़ रुपया दे रहे हैं। कितने जिले हैं? आप 50,000 रुपया एक जिले को दे रहे हैं। यदि साइकिल से भी आदमी सर्वे करने जाए कि किस खेत में क्या होना चाहिए तो भी यह काफी नहीं है। यहां कई लोग खेती से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि एक ही गांव में कहीं पठार होता है, कहीं नदी-नाला चलता है, कहीं बांस पैदा होता है, कहीं ज्वार पैदा होता है, कहीं बाजरा पैदा होता है, कहीं अरंडी पैदा होता है।  आप किस तरह से किसानों के लिए यह सब 50 हजार करोड़ रुपये में करेंगे, इसका निर्णय आप खुद ही कर सकते हैं।

          महोदया, इसके बाद हैल्थ सैक्टर आता है। अभी माननीय गुलाम नबी आजाद साहब काफी तालियां बजवा कर गये हैं। मुझे यह कहा गया, वित्त मंत्री जी कहते हैं कि इसे भी जीडीपी रेश्यो में देखिये। हैल्थ सैक्टर में इस बारे में आपने .1 परसैन्ट रुपये कम दिये हैं। पिछली बार यह जीडीपी रेश्यो का 1.37 था, इस बार 1.36 है। मैं जिस एरिया से आता हूं, वहां एक भी हास्पिटल नहीं है। आप एनआरएचएम की बात करते हैं, आप डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल की बात करते हैं, आप मातृ-शिशु सम्मान की बात करते हैं, उनके लिए एक अच्छा प्राइमरी हैल्थ सैन्टर, सब-सैन्टर बनाने की बात करते हैं। मेरे पूरे एरिया में, यदि वहां शाहनवाज जी का जिला भागलपुर न हो तो हमारे संथाल परगना में जो दो करोड़ लोग हैं, वे केवल आदिवासी, गरीब और दलित लोग हैं, उनके पास एक हास्पिटल भी नहीं है और आप अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि हमने हैल्थ सैक्टर बढ़ा दिया। अभी जब महिला रिजर्वेशन बिल पर बात हो रही थी, जिसका हमारी पार्टी सम्मान करती है और हम चाहते हैं कि यह बिल जल्दी से जल्दी पास हो जाए तो यहां रवांडा की बात हो रही थी, युगांडा की बात हो रही थी। रवांडा और युगांडा की बात करते-करते मैं आपको बताऊं कि हैल्थ सैक्टर में जीडीपी रेश्यो में क्यूबा में 5.3 परसैन्ट पैसा खर्चा हो रहा है। नामीबिया  में 4.7 परसैन्ट खर्च हो रहा है। हमारे बराबर श्रीलंका में 2 परसैन्ट हो रहा है। लेकिन भारत में 1.36 परसैन्ट पैसा खर्च हो रहा है और हम अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि हम बहुत पैसा खर्च कर रहे हैं। इसलिए हैल्थ सैक्टर में जो आपकी बाजीगरी है, इसके बारे में भी आपको देश को बताना चाहिए।

          हमारे जैसे पिछड़े राज्य झारखंड में शिक्षा का क्या हाल है? आप जो पैसा दे रहे हैं, उसका मात्र पचास से साठ परसैन्ट रुपया खर्चा हो रहा है, चाहे वह झारखंड हो, मध्य प्रदेश हो, वह बिहार हो और चाहे वह बंगाल हो। क्या आपने कभी इसके बारे में असैसमैन्ट किया है कि आप जो पैसा दे रहे हैं, वह पैसा जा रहा है या नहीं जा रहा है, खर्च हो रहा है या नहीं हो रहा है? अपने फिस्कल डेफिसिट को कम करने के लिए जो पैसा बच जाता है, उसी को आप कहते हैं कि पैसा खर्चा नहीं हुआ, यह पैसा हमारे पास बचा ही रह गया।

          मिड डे मील में बीस परसैन्ट आपका रुपया बच रहा है। प्रत्येक साल मिड डे मील में बीस परसैन्ट पैसा खर्च नहीं हो रहा है। रुरल डैवलपमैन्ट में 25 परसैन्ट पैसा अनस्पैन्ट है। यह वर्ष 2004-2005 से लेकर 2010-2011 तक का है। आपका सबसे ज्यादा पैसा कहां खर्च हो रहा है, 96 परसैन्ट पैसा लोग ‘नरेगा’ में ले रहे हैं। क्योंकि ‘नरेगा’ जो करेगा, वह मरेगा और केवल लोगों का पेट भरेगा।

श्री वी.नारायणसामी : 2010 और 2011 अभी तक शुरू नहीं किया।

श्री निशिकांत दुबे : मैं वर्ष 2009-2010 की बात कर रहा हूं। मैंने वर्ष 2004-2005 से शुरू किया है। 25 परसैन्ट पैसा रुरल डैवलपमैन्ट में अनस्पैन्ट है। इसके बारे में सरकार को सोचना चाहिए।

          अब मैं ड्रिंकिंग वाटर पर आता हूं। आज सुबह जब मैं अखबार पढ़ रहा था तो उसमें आया है कि इस देश में 254 ऐसे जिले हैं, जहां पीने के लिए अच्छा पानी उपलब्ध नहीं है, वहां पानी गंदा है, जिसके कारण लोग मर रहे हैं। पूरे देश भर में ऐसे 254 जिले हैं। हमारे यहां क्या हो रहा है, हम कितने रुपये दे रहे हैं, पूरे देश के लिए 1200 करोड़ रुपये सैनिटेशन के लिए दे रहे हैं और एक यूनिट के लिए 1200,1300 रुपये दे रहे हैं। मैं समझता हूं कि 1200, 1300 रुपये में यदि एक दीवार भी बन जाए तो बड़ा आश्चर्य होगा, क्योंकि सीमेंट के दाम बढ़ गये, छर्रे के दाम बढ़ गये और आप कह रहे हैं कि हम पूरे गांवों को सेनिटेशन की सुविधा दे रहे हैं। ड्रिंकिंग वाटर की सुविधा दे रहे हैं। मैं एक साल से लगातार प्रधान मंत्री जी को लिख रहा हूं कि मैं जिस एरिया से आता हूं, वह एक ऐसा टैरेन है, जहां ड्रिंकिंग वाटर नहीं है। देवघर द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक बड़ा ज्योतिर्लिंग है और वहां के लोग पानी के लिए तरस रहे हैं। आज सुबह जब मैं आ रहा था तो टी.वी. पर इंटरव्यू देकर आया कि वर्ष 2010 तक पानी दे देंगे। वहां वाटर लैवल नीचे चला गया है। वहां सात सौ, आठ सौ और हजार फीट तक भी पानी नहीं है और आप कह रहे हैं कि ड्रिंकिंग वाटर देंगे। क्या आपने अपने इस फ्लैगशिप प्रोग्राम के बारे में रिव्यू किया है?

          अर्बन डैवलपमैन्ट में इस बार आपने तीन परसैन्ट इनक्रीज किया। आप बड़ी पीठ थपथपा रहे हैं। क्या आपने इसका डाटा देखा है? माननीय जयपाल रेड्डी साहब बैठे हुए हैं और इसका जवाब वह ज्यादा अच्छी तरह से देंगे कि तीन परसैन्ट कैसे इनक्रीज कर दिया। जयपाल रेड्डी जी, आप केवल सात स्टेट्स में 80 परसैन्ट पैसा खर्चा कर रहे हैं। आप सार लिये हुए हैं, रांची, धनबाद, जमशेदपुर, पटना तथा और भी शहरों को लिए हुए हैं। लेकिन पैसा कहां खर्चा हो रहा है –  दिल्ली, मुम्बई और चेन्नई में।

 

आपने हमारे यहां कितना पैसा दिया है? अरबन डेवलेपमेंट में JNNURM  का 80 परसेंट पैसा केवल इन्हीं शहरों में खर्च हो रहा है। क्या आपने छोटे शहरों की सुध ली, क्या कभी आपने उनके बारे में सोचा, क्य़ा कभी रिव्यु किया है? वित्त मंत्री जी को इसके  बारे में देश को जवाब देना चाहिये।

          अध्यक्षा जी,  रूरल रोड्स की क्या स्थिति है? हमने देखा है। मैं अपनी स्टेट में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना की बात कर रहा हूं। यशवंत जी, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि वर्ष 2005-2006 और  2008-2009 में झारखंड के लिये एक पैसा भी नहीं दिया गया है।  प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का 50 परसेंट पैसा पूरे देश के लिये अनस्पैंट है यानी खर्च नहीं हो रहा है। आप कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में रोड्स बना रहे हैं, भारत निर्माण हो रहा है, आरईसी में विद्युतीकरण हो रहा है। इसके बारे में सरकार के लिये सोचने की बात है। इसके बाद हमारे कुछ कमैंट्स है जो आपका आर्थिक सर्वेक्षण कह रहा है। यह कहता है कि कहीं न कहीं  मूल्य वृद्धि हो रही है, उसमें एग्रीकल्चरल टॉपिक है, उसमें आप कह रहे हैं कि डिसैंट्रलाइज्ड प्रक्योरमेंट स्कीम होनी चाहिये। हम सहमत हैं जो आर्थिक सर्वेक्षण कह रहा है। इतना बड़ा देश है जिसमें एक श्री शरद पवार कैसे जिम्मेवार हो सकते हैं कि इस देश में लोग क्या खायेंगे, क्या पीयेंगे, क्या मंगाया जायेगा? क्या सरकार ने कभी इस बात का विश्लेषण किया है कि यदि हमें ऑयल चाहिये तो मलेशिया की मार्किट में आज रेट कितना है और यदि यह तय हो जाये कि भारत कल मार्किट में जायेगा तो 24 घंटे में उसका रेट कितना बढ़ जाता है, उसके लिये कौन लोग जिम्मेदार हैं? बिहार के लोग गेहूं पैदा करते हैं, झारखंड दालें पैदा करता है, कहीं तेल मध्य प्रदेश के लोग पैदा करते हैं तो आप जब कह रहे हैं कि पीडीएस सिस्टम हमने राज्य को दे दिया, आज जब आप कह रहे हैं कि खेती की जिम्मेदारी भी स्टेट को दे दी, लेकिन जब हम इरिगेशन प्रोजैक्ट के लिये  आपके पास जाते हैं  तो कहते हैं कि स्टेट से प्रपोज़ल आना चाहिये।  जब  आप  फैडरल सिस्टम क्रिएट करना चाहते हैं  तो  आप यह जिम्मेदारी क्यों नहीं दे देते हैं कि इस साल जो मसाला पैदा होगा, वह केरल का मुख्यमंत्री तय़ करेगा। इस साल कितना गेहूं पैदा होगा और यदि घाटा होगा तो  उतना उसे सैंट्रल पूल में देना है, वह करेगा। जब हम मार्किट में जायेंगे तो एक स्टेट के नाते जायेंगे न कि भारत के नाते जायेंगे क्योंकि जब भी मार्किट में भारत जाता है तो कहते हैं कि टाईगर आ गया क्योंकि  इंटरनेशनल मार्किट में इसका एक कोडवर्ड है कि शेर आ गया। इसका मतलब यह है कि यदि एक रुपये का काम है तो  आप 20 रुपये में बेच सकते हो। आप इस तरह    का ट्रंसफौर्मेशन क्यों नहीं कर सकते? इस देश में प्रत्येक साल जो इस तरह का टैंशन हो रहा है, उसे खत्म  करने के लिये आप उस तरह का कदम क्यों नहीं उठाना चाहते हैं?

          दूसरा सवाल यह है कि  हाऊसिंग सैक्टर में जो अरबन पौपूलेशन बढ़ रही है, आज  वहां बड़े बड़े बिल्डर्ज आ रहे हैं, जिन्होंने बड़ी बड़ी बिल्डिंग्स बनाई हुई हैं, उनके इक्विपमेंट्स नहीं हैं, इसका जो डैफिसिट है, वहां पैसा फंसा हुआ  है, इसके बारे में सरकार क्या सोच रही है? सरकार को  इस बारे में कहीं न कहीं सोचना चाहिये।

          अध्यक्ष महोदया,  कल लालजी टंडन साहब बार बार एक बात कह रहे थे कि अंधों की बस्ती में आईना बेच रहा हूं। इतनी बातें कहने के बावजूद, हमें लगता है कि सरकार की सारी चीजें गोल-गोल कर के बराबर हो जायेगी। आपको न  गरीब की चिन्ता है, न युवा की चिन्ता है, न शिक्षा की चिन्ता है, न  हैल्थ की चिन्ता है और न अरबन डैवलेपमेंट की चिन्ता है। आपको किसी चीज की चिन्ता नहीं है।  मैं केवल इतनी बातें कह सकता हूं कि आपको येन-केन-प्रकारेण सरकार चलानी है,  आपको महंगाई बढ़ाना है, या प्राइस राइज़ पर ये लोग उठकर चले गये, इसके बारे में भी कोई चिन्ता नहीं करनी है क्योंकि इसके बारे में इतना डिसकशन हो गया। मैं केवल उपनिषद् का एक श्लोक कहकर अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं :

                    अजस्य गृहथो: जन्म निरहस्त हथोदिश:

                    सुप्तौ जागरुकस्य यथार्थम्  वेद कस्तब।

जो जगा हुआ है, उसे जगाने की आवश्यकता नहीं है। जो ज्ञानी है, जिसे वेद का ज्ञान है, उसे वेद बताने की आवश्यकता नहीं है। ये जितनी बातें मैंने बतायी हैं, वे सब आपकी जानकारी में हैं, आपको उन सबकी जानकारी है। मैंने कल अपनी स्पीच शुरू करते हुए कहा था कि मैंने पहली स्पीच माननीय वित्त मंत्री प्रणव जी की ही रेडियो पर सुनी थी। उस समय पांच बजे भा­ाण होता था। जिनकी बजट स्पीच सुनकर मैं बड़ा हुआ हूं, आज वही वित्त मंत्री हैं और मुझे यहां बोलना पड़ रहा है। आप सब कुछ जानते हैं, आप देश के बारे में कुछ करना चाहते हैं। देश के लिए हम आपके साथ कंधा से कंधा मिलाकर सहयोग करने के लिए तैयार हैं। इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा, देश का निर्माण कीजिए।  

 

*श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर)ःलोकतंत्र में बजट जैसा राजनीति शास्त्र में मान्यता है कि यह जिन्दा शरीर का हिस्सा है।  यह सिर्फ एक कोरा कागज जिसमें काले अक्षरों से कुछ लिखा नहीं है।  

देश के बजट को तीन हिस्से में बाँटा जा सकता है।

1.   उद्देश्य Aim and Objective

2.   समस्या का ऑकलन और  उसकी पहचान

3.   समसया का उपाय बजट द्वारा

4.   समय बद्धता

भारत का संविधान Socialist Secular Democratic Republic  जिसमें सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्यया मिले और सामान्य तरक्की का मौका नागरिक को मिले।  यह हमारा संविधान कहता है।  

मा0 प्रणव मुखर्जी ने 26 फरवरी 2010 के 189 पैराग्र्राफ के बजट भाषण में पहले तीन बिन्दु में 9 प्रतिशत बढ़ोत्तरी और 12 मिलियन कुल नया काम और गरीबी रेखा के जीवन यापन करने वाले को कम से आधे लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर करने की योजना बनायी और चौथे बिन्दु में कहा है कि कृषि 4 प्रतिशत ही बढ़ोत्तरी करने का इरादा है।  

मैं अपने समय का अभाव देखते हहुए अपनी प्रतिक्रिया कृषि के सुधारों और जो गाँव मे  रहने वाले कृषक और कृषि से सम्बंधित कार्यों में लगे रहने वाले 72 प्रतिशत जनता जो गाँव में रहती है इस बजट में उन्हैं क्या मिला और क्या खोया है में अपनी प्रतिक्रिया केन्द्रित करना चाहता हूँ।

सबसे पहले मा0 वित्त मंत्री जी की कहनी और कथनी का अन्तर इससे साफ समझ में आता है कि पूरे बजट भाषण में सिर्फ आधे पेज में कृषि के बारे में सिर्फ किसानों को लोन देने के बारे में और लोन माफी के बारे में चर्चा किया है और जो खेती की जानी होती है। वह सिंचाई और पानी उसके बारे में पूरे भारत में एक हजार करोड़ रुपए भारत के छह सो जिलों में साढ़े पन्द्रह करोड़ आता है इससे सिंचाई की समस्या में एक प्रतिशत भी सुधार नही हो सकता है इस एक हजार करोड़ में किचन गार्डेन और साग सब्जी के बारे में भी संचाई नहीं हो सकती है यह किसानों की समस्या में एक गहरा और दुर्भाग्यपूर्ण मजाक है।

72 प्रतिशत जनता जो गाँव में  रहती है और जो कृषि से जुड़ी हुई है उसके प्रति इतना सौतेला व्यवहार जो 63 साल से हो रहा है उसी का प्रभाव है जो जुलाई में प्रधानमंत्री ने कहा है कि पिछले एक साल से कृषि में उत्पादन नहीं बढ़ा है आकड़े कहते हैं कि भारत में सबसे किसानों में आत्महत्याओं का प्रतिशत बढ़ा है।  जब तक पानी की समस्या को यूपीए सरकार युद्धस्तर से नहीं लेती तब तक भारत की 75 प्रतिशत जनता की दुर्दशा में सुधार  नहीं हो सकता है।  यह एक कटु शब्द है।

मैं आंकड़ों के मकड़जाल में नहीं फँसना चाहता हूँ क्योंकि आकड़ों के खेल में यूपीए सरकार बहुत ही निपुण है।  परन्तु इहस समय भी 18 से 20 प्रतिशत महंगाई बढ़ी हुई है/  दालल का दाम 90 रुपए किलो है और जिसतरह से पेट्रोल तेलों में वृद्धि हुई है आम आदमी का मानना है कि महंगाई और बढ़ेगी और दुख की बात है कि यूपीए सरकार के दिग्गज मा0 प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री, मा0 वित्त मंत्री अर्थशास्त्री, मा0 पी. चिदम्बरम गृह मंत्री अर्थशास्त्री को यह महंगाई  नहीं समझ आ रही है।   देश की गरीब जनता का दुर्भाग्य है।  

यूपीए सरकार कहती है कि वह 7.2 और 9 प्रतिशत के बीच में विकास दर 2009-10-11 में प्राप्त कर लेंगे।  पर यह मामूली अंक गणित भूल गए है कि जब कृषि में एक प्रतिशत भी विकास नहीं हो रहा है।  जहाँ 70 और 75 प्रतिशत जनता कृषि पर निर्भर है।  यह 7.2 और 9 प्रतिशत विकास दर कैसे हांसिल हो सकती है।  क्या भारत की जनता विकास दर का भोजन करेगी।  यह वित्त मंत्रालय द्वारा कृत्रिम आंकड़ों का भोजन करेगी या मुम्बई के Stock exchange census का नाश्ता करेगी।  मैं वित्त मंत्री से उत्तर पूछना चाहता हूँ।

Physical deficit को कम देखाना आमदनी को बढ़ाकर आंकड़ों की मोहक तस्वीर बनाने की वित्त मंत्री को निपुण पेन्टर माना जा सकता है।

संक्षेप में गरीब आदमी मारा जा रहा है और अमीर की मदद हो रही है।  इसके बारे में मैं श्री मुखर्जी दादा को मुबारकबाद देता हूँ कि उन्होंने कांग्रेस की पूंजीवाद बढ़ावा देने की परम्परा को बहुत खूबसूरती से पुनः अन्जाम दिया।  भारत की जनता जो 22 करोड़ से ज्यादा बीपीएल रेखा के नीचे हैं वह मारूती और अन्य गाड़ियों के मोटर पार्टस नहीं खायेंगी और न सेन्सस और विकास के आँकड़ों से उसका पेट भरेगा। उसे उचित दाम पर खाने की व्यवस्था करनी होगी।  

इस बजट में मा0 वित्त मंत्री की एक बात से सदन और पूरा देश सहमत है।  सिंचाई की समस्या को भगवान इन्द्र के अलावा और कोई नहीं सुधार सकता है।  तो मैं स्वयं और देशवासियों की ओर से भगवान इन्द्र से प्रार्थना करूंगा कि वह दया दृष्टि करें तो समस्या का निदान हो सकता है।  

मैं तो यहाँ तक भगवान से प्रार्थना करूंगा कि यदि हो सके तो खुद वह अवतार लें और एक अपने साथ अवतरित वित्त मंत्री और कृषि मंत्री को ले आयें तो तभी देश की 72 प्रतिशत जनता की परेशानी दूर होगी अन्यथा हमारे यूपीए सरकार और वित्तमंत्री ने सरण्डर करके हाथ खड़े कर  दिए हैं।  

यूपीए सरकार की मानसिकता की एक झलक और इनकी पूंजीवादिता का प्रेम साफ समझ में आता है कि भारत सरकार दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेलों के लिए 15 हजार करोड़ का प्रावधान किया है।   पर वित्त मंत्री ने सिंचाई के लिए सिर्फ एक हजार करोड़ रुपए दिए हैं।  कॉमनवेल्थ गेम से दिल्ली में 2 से 4 पाँच सितारा होटल बन जायेंगे।  सड़कें चौड़ी हो जायेंगी और फ्लाई ओवर बन जायेंगे और जैसा लोग कहते हैं दिल्ली दुल्हन की तरह सज जायेगी।  परन्तु भारत माता की शक्ल बूढ़ी और जर्जर हो जायेगी। यक एक कटु सत्य है।  विकास और जनता का आर्थिक सामाजिक स्तर यह जनता के लिए है।  यह विदेश को दिखाने वाला Sample नहीं है।  यूपीए सरकार कहती है कि कॉमनवेल्थ गेम कराने से  पूरे विश्व में और विदेश में हमारा सम्मान बढ़ जायेगा पर यह नहीं जानती कि पूरे संसार को मालूम है कि भारत में 20 करोड़ जनता सिर्फ एक समय खाना खाती है और 21 करोड़ जनता गरीबी रेखा के नीचे है।  यह बात कम्प्यूटर के द्वारा पूरे विश्व में जग जाहिर है।  पूरा विश्व जानता है कि भारत के किसान की दुर्दशा है और यह अपने खाने के लिए भी व्यवस्था नहीं कर पाता है।  

कृषि के विकास की योजना दो भागों में बांटी जा सकती है।  

1.   लॉग टर्म प्लानिंग

2.   शार्ट टर्म प्लानिंग

कृषि के उत्पादन की वृद्धि निम्नलिखित भागों में जरूरत है

1.   सिंचाई

2.   बिजली

3.   अनाज की कीमत

4.   Infrastructure बिजली सड़क स्टोरेज मशीनीकरण बैंकिंग

यूपीए सरकार संक्षेप में यह संदेश देना चाहती है कि सिंचाई के लिए भगवान इन्द्र पर भी भरोसा किया जा सकता है और अनाज और खाने-पीने के लिए मोटर पार्टस खांए और 7 और 9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी से देशवासियों का पेट भर जायेगा।  यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है और यह महंगाई आने वाले दस साल तक नहीं काबू में आ सकती है। ग्राम में कृषि उत्पाद में न बढ़ाया जाए 90 रुपए प्रतिकिलो यदि दाल बिक रही है तो भारत का किसान फसल के समय अपनी दाल 15 और 20 रुपए बेची है और जो 70 रुपए का फायदा हो रहा है वह सीधे विचौलिया, अढ़तियों व्यापारियों और जमाखोरों के जेब में जा रहा है ओर जिसतरह इस गम्भीर समस्या को देखते हुए जो बजट आया है उसे प्रतीत होता है कि मा0 कृषि मंत्री को उपरोक्त व्यक्तियों का आर्शीवाद प्राप्त है।   

मैं संक्षेप में यह कहना चाहता हँ कि बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्षा उत्तर प्रदेश की सर्वसम्मति और बहुमति से चुनी हुई 18 साल के उत्तर प्रदेश सरकार के गठबंधन का रिकार्ड तोड़कर मा0 बहन कु0 मायावती जी ने 80 हजार करोड़ का उत्तर प्रदेश के लिए जो वित्तीय पैकेज मांगा था उसमें 9 हजार करोड़ बुंदेलखंड के लिए कहा था।  उसमें एक रू0 तक भी न दिया गया।  सिर्फ 1200 करोड़ रू0 26.02.2010 को घोषणा किया है।  वह भी बुन्देलखंड के सूखा से निपटने के लिए बहुत ही कम है।  यह 1200 करोड़ रू0 में बुन्देलखंड में पाँच जिले में यदि मध्य प्रदेश के जिले भी जोड़ लिये जाये तो यह धन राशि एक हास्यास्पद राशि है और यदि कहा जाए तो यह ऊँट के मुँह में जीरा के सामान है।  

यूपीए सरकार चाहती है कि भारत के किसान परेशान और गरीब से तड़पते रहे और चुनाव के समय यह लोन माफी आदि जैसे प्रलोभन देकर वोट को खरीद लें और जनता इसीतरह परेशान रहें। यह पूंजीवादी मानसिकता का एक नग्न रूप है जिसको बहुजन समाज पार्टी और देश की जनप्रिया मा0 बहन कु0 मायावती ही ठीक कर सकती हैं और इसलिए यूपीए सरकार यदि किसी से डर रही है तो सिर्फ बसपा से घबड़ा रही है।  क्योंकि बसपा भारत के अनुसूचित, दलित, पिछड़े दब कुचले गरीबों एवं समजा की आस्था और विश्वास है और आज भारत को दो भागों में जो बाँआ गया है एक अमीरों का भारत और एक गरीबों का भारत इसको मिआना होगा तभी भारत माता की आत्मा को सुख और शान्ति मिलेगी और डा0 भीमराव अम्बेडकर का सपना साकार होगा।

संक्षेप में यह बजट 1. पूंजीवादी हैं और गरीब विरोधी और इससे महंगाई बढ़ेगी अनाज की उत्पादिकता घटेगी और देश की 75 प्रतिशत जनता के लिए एक विनाशकारी बजट है।  इसमें गरीब और किसान जिसे अन्नदाता कहते हैं, उसकी भ्ख का  न एहसास, न इलाज और  निदान है और जो अंतिम पैरा 188 पेज 29 में वित्त मंत्री ने कहा है- यह बजट आम आदमी का है।  मेरा प्रस्ताव है कि इसमें आम आदमी की जगह खास आदमी लिख दिया जाये।  मैं इन्हीं सब बातों से अपनी बात को समाप्त कर रहा हूँ।  

 

* SHRIMATI DARSHANA JARDOSH (SURAT):  I request you to kindly  suggest the honourable Finance Minister to look into the suggestions made below on the 2010 Budget.  The impact of the Budget 2010 has had many adverse effects on Surat city. I would therefore ask the Honourable Finance Minister to look in through the matter seriously.

           

     The budget has rescheduled the tax structure.  However, failed to increase the exemption limit of 1.60 lacs for individual.  There is no tax benefit proposed for the individual having home incoming up to Rs. 3 lacs.

     The tax benefit is given to only 2 lacs assesses.  Thus the income tax relief is not mass based but it gives relief to only meager section of the society.

     Rate of minimum alternate tax (MAT) increased from 15 to 18% of the book profit in case of companies due to this provision even if the company is at loss as per the provision of Income Tax Act, they will have to pay tax at the rate of 18% of the book profit.  This will discourage the capital market.

     The Excise duty is increased from 8% to 10% in case of all products.  This will increase the cost of products.  The major problem of  today is the inflation and sky rocketing prices.  The Finance Minister’s proposal to enhance the excise duty will boost up the price rise of all the products.

     The Excise duty rate applicable to cement is also increased.  This will adversely affect the housing sector.

     Excise duty on petrol and diesel enhanced by Rs. 1 per liter each.  The actual effect of the price rise is almost 2.50 in case of petrol and diesel.  This increases the transportation cost of all the products which will in turn also enhance the prices of the product.

 

     The two major industries of Surat namely Textile and Diamonds are totally ignored. No incentive is given to them.

     In case of Textile Industries the excise duty has been increased from 8% to 10%. The Textile Industries was expecting the reduction of 4% excise duty.  Instead of that there is a increment of 2%.  This will adversely affect the textile industries. Moreover, TUF scheme under the textile industries has not been given any further incentive.  This has disappointed the art of silk industries.

     Surat is a Diamond city.  The Finance Minister has totally ignored this high profile Diamond Industry which enhanced the export of the country.  The Diamond Industries was expecting the reduction of duty on import of machinery, and training institute for jewellery making.  However, this budget has not encouraged the Diamond Industry.  On the contrary the custom duty on Gold Biscuits has been increased from Rs. 200 to Rs. 300 and custom duty for silver is increased from Rs. 1000 to Rs. 1500 and custom duty on platinum has been increased from Rs. 200 to Rs. 300. This will adversely affect the jewellery making business.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

*श्री सोनवाणे प्रताप नारायणराव (धुले)ः

2010-11 का यह बजट एक विशिष्ठ पार्श्वभूमि पर संसद में पेश हुआ है। इस बजट के पहले दिन संसद में महंगाई पर चर्चा हुई।  बढ़ती महंगाई के बारे में बहुत सारे सांसदों ने चिंता व्यक्त की थी।  इस पाश्वभूमि पर इस बजट में आम आदमी को राहत देने के लिए सरकार द्वारा निश्चित कदम उठाए जायेंगे ऐसी अपेक्षा व्यक्त की जा रही थी।  पर महोदया, इस बजट से आम आदमी की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुई हैं ऐसी प्रतिक्रियाएं प्राप्त हो रही हैं।

          इस बजट से जो अपेक्षाएं जनता जनार्दन की थ् उन अपेक्षाओं को मैं आपके माध्यम से वित्त मंत्री के सामने रखता हूं।

आयकर से छूट लेने की मर्यादा बढ़ाने के बारे में ः महोदया, बढ़ती महंगाई के कारण जीवनावश्यक चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं।  वर्तमान परिस्थितयों में यह आवश्यक था की आयकर की मर्यादा बढ़ते हुए आम आदमी के लिए यह मर्यादा 3,00,000/-तथा महिलओं के लिए यह मर्यादा 3,50,000/- और जेष्ठ नागरिकों के लिए यह मर्यादा 4,00,000/- करने की अपेक्षा थी इस बारे में दुरुस्ती करने की बिनती आपके माध्यम से वित्त मंत्री से करता हूं।  

आयकर अधिनियम 80 सी के तहत दी जाने वाली छूट में बढ़ोतरी महोदया, आयकर अधिनियम के कलम 80 सी के तहत दी जाने वाली राहत को बढ़ाने की आवश्यकता थी।  मैं इस बढ़ोतरी की भी मांग आपके माध्यम से करता हूं।

आम आदमी के मकान की कीमतें कम करने के बारे महोदया, मा. वित्त मंत्री जी ने एक तरफ तो 10,00,000/- के होमलोन पर 1 प्रतिशत सब्सिडी देकर आम आदमी को मकान की आस लगाई और दूसरी तरफ सीमेंट तथा स्टील पर टॉवस लगाकर तथा नया घर बुक करने वाले आदमी को सर्विस टैक्स के दायरे में लाकर उसकी कमर ही तोड़ दी है।  महोदया, आम आदमी का घर एक सपना होता है।  इस घर के लिए वह परीश्रम करता है। इसलिए यह आवश्यक है कि यह घर खरीदने के लिए सरकार द्वारा सहकार्य करना आवश्यक है।  इसलिए मैं आपके माध्यम से वित्त मंत्री से मांग करता हूं कि सीमेंट तथ स्टील पर बढ़ाया गया हुआ टैक्स कम करने के लिए तथा नये मकान की बुकींग को सर्विस टैक्स के दायरे से दूर रखने के लिए उचित कार्यवाही करने की कृपा करें।

आयकर में सहुलियत पाने के लिए जेष्ठ नागरिकों की उमर की सीमा घटाकर 60 वर्ष करने के बारे में ः महोदया, देशभर में सरकार द्वारा चलायी जा रही सभी योजनाओं में जेष्ठ नागरिक की व्याख्या में 60 साल से ज्यादा उमर होने वाला व्यक्ति यही निकश है।  यह तक की सभी सरकारी विभागों में निवृत्ती की उमर 60 साल है।  मगर आयकर विभाग द्वारा यह सीमा 65 साल की लगायी जाती है, यह अन्याय है।  इसलिए जेष्ठ नागरिकों की उमर के बारे में लगाया गया निकश बदल कर 60 साल करने की कृपा करें।  

एनआरआई लोगों की तरफ ध्यान देनाः एनआरआई लोग भारत के नागरिक हैं।  वह देश पर प्रेम करने वाले हैं।  उनका सहयोग बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा प्रयास करना जरूरी था।  इस बजट में सरकार ने एनआरआई लोगों की तरफ ध्यान न देते हुए उन्हें Non Required Indian बना दिया है। इसमें सुधार करना जरूरी है।

आयकर धारा 40 (a) (1a)-

आयकर धारा 40 (a)(1a) के तहत जिन भुगतानों  पर कर का संग्रहण नहीं किया जाता, उन भुगतानों को कर दाता के आय में जोड़कर, उस पर कर वसूल करने का प्रावधान है।  करदाता जब संप्रहित कर का भुगतान कर देता है, उस वर्ष में इस रक्कम को करदाता के आय से घआकर, वसूल किये गये कर को वापस देने का प्रावधान है।

इसके परिणामस्वरूप सरकार के पास जिस वर्ष में यह रक्कम करदाता के आय में जोड़ी जाती है, उस वर्ष में केवल, आयकर धारा 234अ और 234ब के अंतर्गत व्याज बच जाता है।  संग्रहित कर न भुगतान किये जाने पर आयकर अधिनियम खंड- VXII के अंतर्गत इस प्रकार के मामले में मुकदमा चलाने तक के सख्त प्रावधान उपलब्ध है।

कई करदाताओं के आय में इस धारा के अंतर्गत प्रावधानों के वजह से करदाता के आय के कई गुना अधिक रक्कम जोड़ दी जाती है जो की जब संग्रहित कर का भुगतान हो जाता है।  उस वर्ष के उसकी आय से घटाकर, कर वापस करने का प्रावधान है।  इस परिस्थिती में जब करदाता की आय उस वर्ष में यह रक्कम को घटाने के लिए पर्याप्त नहीं होती, उसे वह उसे यह रक्कम अनिश्चितकाल के लिए आगे ले जाना होता है और उसे अनावश्यक काल के लिए कर का बड़ा भुगतान करना पड़ता है।  

इस कठिनाई को दूर करने के लिए आयकर कर गणना करनेवाली संगणक प्रणाली में बदलाव करके जिस वर्ष में कर दाता संग्रहित कर का भुगतान कर देता है, उसी वर्ष धारा 40 (a)(1a) के तहत किए गए अधिक कर वसूली की वापसी का प्रावधान करना उचित है।

आयकर धारा U/s 80 1B(10)-

गत 2-3 वर्षों में व्यापारी मंदी होने के कारण इस धारा के अंतर्गत आवास परियोजनाएं बंद हो चूकि हैं या धीमी पड़ चुकी है।  मौजूदा वित्त विधेयक के इस धारा की निर्धारित समय सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव के कारण अनेक विकास के इन आवास परियोजनाएं फिर से कार्यान्वित करने की उम्मीद है।  यह सारी परियोजनाएं कम से कम 1 एकड़ की होने की वजह से उनका विस्तार बढ़ा है।  इस स्थिति में विकास का बाकी कार्यकाल (24 माह) में परियोजना पूर्ण करना जटिल हो सकता है।  इस व्यावसायिक क्षेत्र को किसी भी आर्थिक उत्तेजना का लाभ नहीं मिल पाया है।  स्थानीय प्राधिकारी कार्यालय से आवास परियोजना को पूर्ण होने का प्रमाण पत्र की प्रक्रिया भारी जटील होने की वजह से धारा U/s 80 1B(10) का कार्य काल कम से कम 3 वर्षों से बढ़ाने की आवश्यकता है।  

आयकर धारा 143 (2)

आयकर अधिनियम 143 (2) के अधीन सुनवाई कि प्रक्रिया करदाताओं या उसके प्राधिकृत प्रतिनिधि को स्वयं उपस्थित होना आवश्यक है।  यह करदाता और कर निर्धारण अधिकारी के समय की भारी अपव्यय के बराबर है।  यह प्रक्रिया आयकर विवरण पत्र और संग्रहित कर विवरण पत्र की तर्ज पर दे सकता है।  यह संपूर्ण प्रक्रिया पारदर्शी व कुशल कर देगा। आवश्यकता के अनुसार अंतिम सुनवाई भौतिक सबूत व अंतिम कार्यवाही तय करने हेतु करदाताओं या उसके प्राधिकृत प्रतिनिधियों को स्वयं उपस्थित किया जा सकता है।  इसके लिए आवश्यक संगणकिए बुनियादी सुविधा उपलब्ध है-जैसे की करदाता का आयकर वेब साइट पर खाता, Log in, Password, वगैरा

आयकर धारा 56(2)(vii)

अचल संपत्ती के मामले में साफ बाजार मूल्य और वास्तविक बिक्री कीमत के अंतर होने में समझा उपहार (deemed gift) FMV के लिए स्टांप मूल्यांकन प्रयोजन के लिए माना गया मूल्य लिया जाता है।  अधिकांश मामलों में स्टांप मूल्यांकन बाजार के वास्तविक मूल्यांकनों से भिन्न है।  FMV के लिए स्टांप मूल्यांकन प्रयोजन के लिए माना गया मूल्य लेने के बजाय धन कर अधिनियम (Wealth tax act)ks  तहत अधीकृत मूल्यों द्वारा आकलीत मूल्य पर विचार किया जाना चाहिए।  

यह एक यथार्थवाद के आधार पर समझा उपहार (deemed gift) की गणना कर देगा। स्टांप डय़ूटी मूल्यांकन राज्य सरकार के तहत अधिकार में किया जाता है।  सभी राज्यों की स्टांप डय़ूटी मूल्यांकन पद्यति एक जैसी न होने के कारण समझा उपहार (deemed gift) का मूल्यांकन एक जैसा  नहीं होता।

 बैंकों को लगने वाले टॅवस को बंद करनाः महोदया, सहकारी तत्वपर चलने वाली सभी बैंक यह सभी के सहयोग से चलती है।  इसमें सभी को साथ लेकर सभी का एकसाथ विकास करना होता है। इस लिए इन बैंकों पर लगाई जा रही है।  आयकर गलत है।  इसलिए इस विषय में मैंने बजट पूर्वखत भी भेजा था।  इस खत की एक प्रत मैं आपके इसके साथ देता हूं।

 डीटीसी की ना लगाने के बारे में ः मा. वित्त मंत्री जी ने डीटीसी को अगले साल से लागू करने मनशा व्यक्त की है। महोदया, डीटीसी में काफी खामियां हैं।  इस बारे में जानकारों से चर्चा करने बाद काफी विरोधी स्वर सामने आ रहे हैं।  इसलिए मैं मा. वित्त मंत्री जी को बताना चाहता हूं कि  केवल यूरोपीयन देशों का अनुकरण ना करते हुए अपने देश के लिए आवश्यक टैक्स प्रणाली देश में चलाने की बिनती करता हूं।  

          डीटीसी में होने वाली खामियां निम्नलिखित हैं।

अ) डीटीसी यह पश्चिमी देशों का किया हुआ अंधानुकरण है।  यह भारत देश तथा यहां की जनता के लिए व्यवहार्य नहीं है।

ब) डीटीसी की वजह से सामाजिक तथा धार्मिक संस्थाओं का अनन्य साधारण नुकसान होगा तथ इन संस्थाओं को कार्य करना मुश्किल हो जाएगा।

क) 10 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या होने वाले जेष्ठ नागरिकों को डीटीसी के वजह से नुकसान उठाना  पड़ेगा तथा ज्यादा टैक्स देना पड़ेगा।  

ड) डीटीसी की वजह से टैक्स अधिकारियों को जो ज्यादा शक्तियां प्रदान होंगी उसका वह गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।

इ) आम आदमी जो टैक्स दे रहा है तथा जिनकी तादात टैक्स देने वालों में 90 प्रतिशत से ज्यादा है उन्हें ज्यादा टैक्स का बोझ उठाना पड़ेगा।

 

 

 I would like to bring your kind attention to problem being faced by the Urban Cooperative Banking sector and I am submitting following four points for your kind consideration as these four issues are directly connected with the Finance Department, Government of India.

 

1.  Status quo in Income Tax on Urban Co-operative Banks.

You are aware that concessions U/s 80 of Income Tax Act, 1961 were given to co-op. sector when the Government wanted to provide support base to the then fledging co-operative movement.  The intent and purpose of inserting Section 80p(2)(a)(i) in the Income Tax Act 1961 is to grant deduction to income which has a direct and proximate nexus to the activity of banking or providing credit facility carried by a co-operative society. That if both the terms “banking business” and “providing facilities” are read together the intention of the legislature becomes clear and that is to provide benefit of deduction to a co-operative society which actually provides credit/finance to its members in furtherance of the co-operative movement and not for the purpose of profit making.

 

          Till now Co-operative Banks were enjoying a tax-free status Under Section 80PA(I) of the Income Tax Act.  From last year, urban co-operative banks have been subjected to tax.  This concession to co-op. Banks has been withdrawn means the Government is taxing on the income earned by a co-operative entity.  This has resulted in reducing their amount of Net Profit available for appropriation towards statutory Reserve, Building fund, dividend, donations and ex-gratia to the staff etc.  Also expansion plans of our banks are affected.  Moreover, unlike commercial banks which have current accounts and enjoy float funds, co-operative banks depend on term deposits, and have a higher fund cost.  Taxing profits of Urban Co-operative Banks has affected the capital adequacy as surplus is ploughed back because of restrictions on dividend payout.  Sir, you are aware except for a couple of co-operative banks, there is restriction on foreign exchange dealing and co-operative banks have to depend largely on interest income.

 

          It will be relevant to mention that Urban Banking Sector is the self-sustaining sector and earn profit.  Out of available surpluses, certain portion is credited to the Charity Fund, every year to meet various social obligations. UCBs have a local clientele and they normally expose their activities to the social development of their area by encouraging educational and charitable institutions.

          Consequent upon, liberalized policy of Government of India, number of UCBs have been promoted in different parts of our country particularly after 1993 and made  substantial development in the remote part of the country.  UCBs since helping the lower strata of the society have successfully brought out these people from the usurious clutches of money lenders by granting loan to these people at very concessional rate out of the profit they earned, they made social educational help to these people. We fear that if the co-op. banks are made to pay income tax then progress of the poor people will retard.

          You will appreciate achievements of UCBs which are quite admirable.  The UCBs have become an outstanding example for other sectors.  The success of UCBs can be attributed to variety of factors like concession U/s 80P etc.

          At present with the various economic reforms and privatization, co-op banks are low in the profitability, already burdened with NPA and further refinements.

          The clientele of these banks consists of small-scale tiny industries, small business enterprises, small borrowers and generally people who are not economically very strong.  Such stringent norms if made applicable to these banks will not do any good to the sector and with regulatory restrictions becoming progressively stricter at lower grades, it is felt that banks that slip to the lower level might find it difficult to overcome the hurdles and move up once again.

          I feel that tax on co-operative banks obstruct the process of capital formulation, since the co-op.  Banks have been recognized as an agency for socioeconomic development particularly that of weaker sections percentage and as such there may ultimately be hardly any income that would qualify for being taxed.  I therefore, feel that under the circumstances it is not good economic to contemplate taxing of the co-op. banks’ income.  It is a measure not likely to provide much gain to the central treasury but, most likely to cause a huge damage to a sector which is respected as peoples’ movement of this country.

 

2)       Calling of information under CIB code No. 181-189 Under section 133(6) of the Income Tax Act, 1960 by the Income Tax Authorities from Maharashtra State

 

Income Tax Authorities issued notices to Urban Co-op. Banks directing them to furnish information under CIB code No. 181-189 in respect of interest credited above Rs. 10,000/- and aggregate cash deposit made in cash above Rs. 5 lakhs during 2007-08 in each case of one person.  Banks have expressed operational/practical difficulties faced by them while submitting this information and requested us to intervene in the matter. 

          You will appreciate that calling of information as above would put tremendous pressure on Urban Co-op. Banks and their branches.  It is difficult to furnish the above data records by the banks and at their branches.  Where such transactions are much in large numbers and many entries of cash transaction in a day of Rs. 5 lacs and above specially in metro and urban branches.

          Reserve Bank of India, regulatory authority of UCBs, have time and again made ample clear that the banks are bound to maintain secrecy towards customers resulting out of contractual obligations and that the enquires of this nature can be responded to if they are “area specific” or “case specific”. The enquires of this type can also be responded if they are in the “public interest” or in the interest of Banks themselves or in even such enquires emanate with the oncurrence of the customers themselves. I apprehend no such circumstances exist in the enquiry sought  for by Income Tax Department.  You will certainly appreciate; furnishing the data in response to the enquiry made by Income TAX Department would render Bank liable for violating obligations of secrecy on the part of the Bank.

          In view of the above facts and looking at the difficulties of the banks, this issue is most urgent and requires to be attended on war-footing, and your CBDT’s decision may please be conveyed to us urgently as banks are facing difficulties in complying with demands from the Income Tax Authorities at local level for furnishing the voluminous data/information.  Meantime, we request you to advise CBDT to inform the concerned Income Tax Commissioners not to press for submission of such information till the CBDT decides on the aforesaid request made by the Federation.

 

3. The Banking Regulation Act, 1949 (AACS) Section 56 Application of the Act to Co-op. Bank

          Recently Reserve bank of India has issued notification depicting the measure for Monetary and Liquidity Management, like change, positive or negative, in Repo rate, CRR, SLR etc. for scheduled banks.

Recently, the RBI has announced following such measures.

1.             Reduction in Repo rate by 0.5% to 7.5%

2.             Reduction in CRP by 0.5% to 5.5%

3.             Reduction in SLR by 1% to 24%

4.             All such banks (except PRBs) to be provided refinance RBI equivalent upto 1% of the bank’s NDTL as on 28th Oct. 2008 for 90 days.

I would like to bring to your kind attention that the benefits at Sr. 3 & 4 are not made available to scheduled UCBs by RBI.

 

          I failed to understand this bias towards schedules Co-op. Banks.  Since all the prudential norms of commercial banks, have been made applicable to co-op. Banks since the co-op banks carry the equal risk as commercial banks and RBI itself, after careful study and analysis of banks financials, have granted scheduled status to co-op. banks, it was felt that all scheduled commercial as also scheduled co-op Banks should get equal and fair treatment from the regulators, the RBI and the Co-op. Department of the State. Hence as an equal level playing field the scheduled co-op. banks also should be allowed to take advantage of all financial relaxations.  We may state that UCBs operate in the same market segment as other commercial banks and face severe competition from major public/private sector and foreign banks. The retail and small business which was the exclusive domain of the co-operative banks is now taken over by the commercial banks.  While business opportunities for the co-op. banks are decreasing day by day, the regulatory prescriptions; the prudential norms for income recognition and provisioning; the Capital Adequacy requirements etc. are getting tighter and are more or less or par with the other banks.  Co-op. Banks which were exempt from payment of Income Tax till recently have also been brought under the tax net.  Because of all these factors, there is huge pressure on the financials of these co-op. Banks, therefore, not immune to the pressures developing in the macro economic environment and thus should be treated at par with other commercial banks in respect of such relaxations.

          The Banking Regulation Act, 1949 was made applicable to co-op. banks by provision of Section 56 of the Act, ibid by certain modifications to the provisions of the Act.

          Hence, I feel that controlling measures, as also relaxation measures issued by RBI should be equally made applicable to all banks including Co-op. Banks by amending provisions of RBI Act/BR Act wherever necessary so that scheduled Co-op. banks also will get level playing field, mentioned earlier, along with other scheduled banks.

 

4. The Banking Regulation Act, 1949 (AACS)- Section 56- Application of the Act to Co-op. Bank

 

The Banking Regulation Act, 1949 which is application to Commercial Banks was also made applicable to Co-operative Banks by provision of Section 56 of the Act ibid, by certain modification to the provision of the Act.

          Since all the prudential norms of commercial banks, have been made applicable to co-op. Banks, as the co-op. banks carry the equal risk as commercial banks, it is felt that all commercial as also co-op Banks should get equal and fair treatment from the regulators, the RBI and the Co-op. Department of the State.  Hence as an equal level playing field the co-op. banks also should be allowed to take advantage of all financial relaxations.  We may state the UCBs operate in the same market segment as other commercial banks and face severe competition from major public/private sector and foreign banks.  The retail and small business which was the exclusive domain of the co-operative banks is now taken over by the commercial banks.  While business opportunities for the co-op. banks are decreasing day by day, the regulatory prescriptions; the prudential norms for income recognition and provisioning; the Capital Adequacy requirements etc. are getting tighter and are more or less at par with the other banks.  Co-ops. Banks which were exempt from payment of Income Tax till recently have also been brought under the tax net.  Because of all these factors, there is huge pressure on the financial of these co-op. Banks.  The Co-op. Banks are not immune to the pressures developing in the macro economic environment and thus should be treated at par with other commercial banks and while extending any regulatory comforts to commercial banks, the co-operative banks must also be treated at par.

          Recently Reserve Bank of India has issued notification depicting the measure for Monetary and Liquidity Management, like change, positive or negative, in Repo rate, CRR, SLR etc. for scheduled banks.

          Recently, the RBI had announced following such measures

a)                                                     Reduction in Repo rate by 0.5% to 7.5%

b)                                                     Reduction in CRR by 0.55% to 5.5%

c)                                                     Reduction in SLR by 1% to 24%

d)                                                     All such banks (except PRBs) to be provided refinance by RBI equivalent upto 1% of the bank’s NDTL as on 28th Oct. 2008 for 90 days

e)                                                     “Relaxation to RRBs to classify entire SLR investments under “Held to Maturity” with valuation on book-value basis and immortization of premium, if any, over the remaining life of securities.’

 

I would also like to bring to your kind attention that the benefits at Sr. cd & e are not  made available to urban co-operative banks by RBI.  Thus discriminating co-operative banks from commercial banks.

          I feel that controlling measures, as also relaxation measures issued by RBI should be equally made applicable to all banks including Co-op. Banks by amending provisions of RBI Act/BR Act wherever necessary so that Co-op. banks also will get level playing field along with commercial banks.

          I strongly believe that you have always played a supportive and decisive role in helping the UCBs in past and we, therefore, look forward to your positive response to our request as we know that you are a person to hold progressive and reformative views on the policy of Cubs. Your infinite administrative capacity coupled with the broad sense of understanding will definitely take care of the issues afresh.

          In view of the tremendous importance attached to the above issues, we are confident that you will definitely redress these issues.

          I therefore request you to intervene in the matter and prevail upon Income Tax Department and RBI to offer relief/concessions to Urban Co-operative Banks.

         

*श्री सतपाल महाराजः आर्थिक गतिविधियों पर चर्चा सदैव अच्छी ही होती है।  मैं देखता हूं कि माननीय वित्त मंत्री जी ने जो बजट पेश किया वह जनसाधारण, ग्रामीण क्षेत्रों के विकास व देश के कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए प्रतिबद्धता दर्शाता है।  मुझे आशा है कि गांवों में हमारे जो किसान है इस बजट से उनका विकास होगा, हमारे गांवों का विकास होगा।  प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि होगी तथ साथ ही सकल घरेलू उत्पाद भी बढ़ेगा।

          कई विषम चुनौतियों का सामना करने के लिए इस प्रस्तावित बजट में बहुत सारी पहल की गई हैं।

          बजट 2010-11 में कुल व्यय रू. 11,08749 करोड़ है जो पिछले वर्ष 2009-10 से 8.6 प्रतिशत अधिक है।  योजनागत आवंटन भी विगत वर्ष से 15 प्रतिशत अधिक है जो स्वागत योग्य है।

          केन्द्र सरकार ने व्यक्तिगत अधिकारों को कानूनी गारंटी देते हुए सूचना का अधिकार तथा काम के अधिकार को हक का स्वरूप प्रदान किया है जो भविष्य के लिए अच्छा संकेत है।  बच्चों के लिए मुफ्त एवं सुनिश्चित शिक्षा के अधिकार अधिनियम में वर्ष 2010-11 में 31,036 करोड़ का योजनागत आवंटन सभी बालकों के लिए उपलब्ध करवाया गया है।  

“मिशन स्वच्छ गांगा 2020 ” के लिए वर्ष 2010-11 में आवंटन दुगुना कर 500 करोड़ रुपए करने के प्रस्ताव के लिए मैं माननीया श्रीमती सोनिया गांधी जी, माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी एवं वित्त मंत्री माननीय श्री प्रणव मुखर्जी जी को हार्दिक बधाई देता हूं।

          सभी जिलों की जिला स्वास्थ्य रूपरेखा तैयार करने हेतु एक वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2010-11 मे करने का प्रस्ताव है।  स्वास्थ्य कार्यक्रमों विशेषकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का देश की जनता को अधिक से अधिक फायदा मिलना चाहिए।  असंगठित क्षेत्र के कामगारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए 1000 करोड़ रुपए के प्रारम्भिक आवंटन के साथ एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा निधि की स्थापना करने का निर्णय स्वागत योग्य है।  महिला विकास, साक्षरता तथा बाल विकास के लिए आवंटन एवं प्रस्ताव निश्चित ही भविष्य के लिए लाभप्रद होंगे।  महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना की शुरूआत एवं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के उपसंघटक के रूप में इस परियोजना के लिए 100 करोड़ का आवंटन महिला सशक्तिकरण के लिए एक सराहनीय कदम है।  माननीय वित्त मंत्री जी द्वारा रेल नेटवर्क के आधुनिकीकरण एवं विस्तारण हेतु बजट 2010-11 में रेलवे की सहायता हेतु 16,752 करोड़ के ऋण का प्रावधान किया गया है।  यह देश एवं रेलवे के विकास के  लिए एक अच्छा प्रयास है।  इसी के साथ मैं यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, युवा सांसद श्री राहुल गांधी, माननीय वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी तथा रेल मंत्री माननीया कु. ममता बनर्जी जी का हार्दिक धन्यवाद देता हूं।  जिन्होंने देश को इतना सुविचारित एवं भविष्योन्मुखी बजट 2010-11 प्रदान किया जो भविष्य में देश के विकास में एक मील का पत्थर साबित होगा।

          रेल बजट में रेल भाड़े तथा माल भाड़े में वृद्धि न करके रेल मंत्री जी ने अपनी राजनीतिक परपक्वता का परिचय तो दिया ही है साथ ही उन्होंने पिछले बजट में जनता से किए गए अपने वायदे को भी पूरा किया है।  सभी वर्गों का  समुचित ध्यान रखा कर इस बजट को बिना किसी अमीर-गरीब के भेदभाव के बनाया गया है। 

          मुझे पूर्ण विश्वास है कि यूपीए अध्यक्षा माननीया श्रीमती सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं देश के युवा नेता श्री राहुल गांधी के नेतृत्व में देश मे रेलवे का चहुंमुखी विकास होगा और भारतवर्ष के हर नागरिक तक इसका लाभ पहुंचेगा।  इनके सक्षम नेतृत्व में भारतीय रेल देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपनी ख्याति फैलाएगी।  

          माननीया रेल मंत्री जी ने यह स्पष्ट कहा है कि उनके द्वारा तैयार परियोजनाएं सामाजिक उत्तरदायित्व को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं।  

          ऋषिकेश-कर्णप्रयार रेल लाइन के निर्माण को बजट में सम्मिलित करने पर मैं यूपीए अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जी, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी,  रेल मंत्री माननीया कु. ममता बनर्जी जी एवं युवा सांसद श्री राहुल गांधी जी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं।  ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेल लाइन के निर्माण को बजट में सम्मिलित कर माननीया रेल मंत्री जी ने श्री बदरी नाथ धाम, श्री केदार नाथ धाम, श्री हेमकुण्ड साहिब के दरवाजे जन साधारण के लिए खोल दिए हैं।  देवभूमि होने के कारण उत्तराखंड को स्वर्ग भी कहा जाता है तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि यूपीए सरकार ने सभी के लिए स्वर्ग के दरवाजे खोल दिए हैं।  सम्पूर्ण भारत की जनता से जुड़ा होने के कारण ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन के निर्माण को राष्ट्रीय प्रोजेक्ट के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। इस लाइन के शुरू होने पर श्री बदरीनाथ धाम, श्री केदारनाथ धाम एवं हेमकुण्ड साहिब जाने वाले देशभर के तीर्थयात्री एवं पर्यटक समय व किराये की बचत लाभान्वित होंगे।

          टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन के सर्वे की स्वीकृति के लिए भी मैं माननीया रेल मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं।  इस लाइन का सर्वे अंग्रेजी शासन काल में हुआ था।  परन्तु आज स्थिति काफी बदल गई है।  इस मार्ग पर अब कई डैम, बिजली की लाइनें, टेलीफोन की लाइनें, तालाब इत्यादि अस्तित्व में आ गए हैं।   जिसके लिए सर्वे आज अत्यंत आवश्यक है।  मेरा आग्रह है कि यह सर्वे शीघ्र ही पूरा किया जाना चाहिए।  ऋषिकेश में बाह्य रोगी विभाग व डायगनोस्टिक सेंटर खोलने के प्रस्ताव पर भी मेरी ओर से धन्यवाद स्वीकार करें।

          सामाजिक रूप से वांछनीय रेल संपर्कता संबंधी प्रस्ताव में निम्नलिखित स्थानों को सम्मिलित करने पर भी रेल मंत्री माननीया कु. ममता बनर्जी जी को हार्दिक धन्यवाद देता हूं।

(1)      चण्डीगढ़-देहरादून वाया जगाधरी

(2)      देहरादून-कलसी

(3)      हरिद्वार-कोटद्वार-रामनगर

(4)      रामनगर-चौखुटिया

(5)      ऋषिकेश-डोईवाला

(6)      रूड़की-हरिद्वार

          यात्रियों की मांग को देखते हुए लंबी दूरी की निम्नलिखित नई सेवाओं को सम्मिलित करने के लिए मैं माननीया रेल मंत्री का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं।  जिन्होंने उत्तराखंड की जनभावना के अनुरूप बजट में प्रावधान कियाः-

(1)      ऊना-हरिद्वार लिंक एक्सप्रेस (सप्ताह में तीन दिन)

(2)      हरिद्वार-मुम्बई सीएसटीएसी एक्सप्रेस (सप्ताह में 2 दिन)

(3)      वलसाड़ऱ-हरिद्वार (सप्ताह में एक दिन)

          कोटद्वार एवं रामनगर शहर व्यवसाय व प्रशासनिक रूप से बहुत ही महत्व के शहर हैं, वहां के स्टेशनों को आदर्श स्टेशन (मॉडल स्टेशन) के रूप में विकसित करने के प्रस्ताव के लिए भी मैं माननीया रेल मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं।

          उत्तराखंड में अनेक तीर्थ हैं, इसलिए इसे देवभूमि कहा जाता है।  भारत तीर्थ गाड़ियों के प्रस्ताव में निम्नलिखित गाड़ियों को पर्यटक महत्व के अनुसार सम्मिलित करने एवं उत्तराखंड के तीर्थों को देश के विभिन्न तीर्थों से जोड़ने पर मैं उत्तराखंड की जनता की ओर से यूपीए अध्यक्षा माननीया श्रीमती सोनिया गांधी जी, माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी, रेल मंत्र माननीया कु. ममता बनर्जी जी एवं युवा सांसद श्री राहुल गांधी जी को हार्दिक धन्यवाद देता हूं।  

(1)      हावड़ा-गया-आगरा-मथुरा-वृंदावन-नई दिल्ली-हरिद्वार-वाराणसी-हावड़ा

(2)      मदुरै-वाराणसी-गया-पटना साहिब-इलाहाबाद-हरिद्वार-चण्डीगढ़-कुरूक्षेत्र-अमृतसर-दिल्ली-मदुरै

           मैं गढ़वाल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूं जहां प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं परन्तु समुचित यातायात के साधन न होने के कारण यह क्षेत्र आज भी पिछड़ेपन का शिकार है।  संपूर्ण प्रदेश में पर्यटन के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, इनका भी सदुपयोग यातायात एवं संचार साधनों की उपलब्धता से ही संभव है।  

          मैने पहले भी इस सदन को यह जानकारी दी थी कि जब मैं रेल राज्य मंत्री था, तब हम लोगों न  बायलोजिकल टायलेट्स का राष्ट्र हित में रिसर्च प्रारम्भ किया था।  इन टायलेट्स के रेल के साथ जुड़ जाने से किसी भी प्रकार की गंदगी रेलवे स्टेशनों पर नहीं फैलेगी और गंदगी एक टैंक के अंदर कंटेन हो जायेगी जिसे वैक्यूम के जरिए निकाला जा सकता है।  यदि यह बायलोजिकल टायलेट्स बन जाये तो रेलवे ट्रैक व स्टेशनों से गंदगी समाप्त हो जायेगी और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत आगे बढ़ेगा।

          आज विश्व के विभिन्न देशों में रेल बहुत तेज रफ्तार से दौड़ रही है।  चीन में 350 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी तेज दौड़ रही है।  परन्तु हमारी रेल अब भी इस विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा में बहुत पीछे है।  हमारे देश में भी ट्रेनों की रफ्तार बढ़नी चाहिए।  इस दिशा में भी माननीया रेल मंत्री जी को ध्यान देना होगा।  इससे समय की बचत हो होगी ही साथ ही दूर-दराज के इलाकों में किसी भी आपदा के समय पहुंचने में आसानी हो जायेगी तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय रेलवे का वर्चस्व बढ़ेगा।  मैं कुछ अन्य आवश्यक प्रस्तावों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं जो भविष्य में भारतीय रेलवे व भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विकास के अध्याय में एक नया सूत्रपात करेंगे।  एसएसबी प्रिशिक्षित गुरिल्लाओं का समायोजना होना चाहिए। मिनिस्ट्रियल कर्मचारियों एवं राजस्व पुलिस की हड़ताल लम्बे समय से उत्तराखंड में चली आ रही है जिसके कारण वहां कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर हो रही है।  केन्द्र सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि चीन व नेपाल का बार्डर उत्तराखंड से लगता है।  उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल की विकट समस्या है।  बजट में सरकार को इस ओर भी ध्यान देकर कोई ऐसी परियोजना बनानी चाहिए जिससे इस समस्या का निदान किया जा सके। उत्तराखंड सरकार वहां चल रहे निर्माण कार्यों के लिए ठेकेदारों को भुगतान नहीं कर रही है जिससे वहां निर्माण एवं विकास कार्य बिल्कुल ठप्प हो गऐ हैं।  देहरादून से लखनऊ तक एक सीधी ट्रेन चलाई जानी चाहिए तथा वहां से लखनऊ तक जाने वाली ट्रेनों में फर्स्ट एसी कोच भी लगवाएं जायें।  जिम कार्बेट नेशनल पार्क का रामनगर प्रवेश द्वार है।  वहां प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक आते हैं। अतः रामनगर से देहरादून तक भी सीधा रेल सम्पर्क होना चाहिए। मुम्बई से देहरादून, ऋषिकेश और कोटद्वार तक सीधी सुपर फास्ट ट्रेन चलाई जानी चाहिए।  उत्तराखंड की मनोहारी छटाओं को देखने के लिए पूरे भारत से ही नहीं अपित विश्व के विभिन्न देशों से बड़ी संख्या में पर्यटकों का आवागमन रहता है।  प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के एसी कोच दून एक्सप्रेस (3010), में जो देहरादून-हावड़ा तक चलती है, में लगवाएं जाएं।  प्रथम श्रेणी एसी कोच लिंक एक्सप्रेस (4114) में जो देहरादून से इलाहाबाद तक जाती है में लगवाया जाये।  प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी एसी कोच ट्रेन नं. 5013 में दिल्ली से रामनगर के बीच लगवाए जायें जिससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से गढ़वाल एवं कुमाऊ जाने वाले बहुसंख्यक यात्रियों को लाभ होगा।  देहरादून से कानपुर तक एक सीधी ट्रेन भी चलाई जानी चाहिए तथा कानपुर जाने वाली ट्रेनों की गति बढ़ाई जानी चाहिए ओर फर्स्ट एसी कोच की सुविधा उनमें देनी चाहिए। गोहाटी से हरिद्वार के लिए भी एक सीधी ट्रेन चलाई जानी चाहिए।  उत्तराखंड से बहुत लोग सेना में हैं। बार्डर पर तैनाती की वजह से छुट्टी पर आते-जाते समय उन्हें बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।  प्रसिद्ध कामाख्या देवी का मंदिर भी गोहाटी में ही स्थित है।  उत्तराखंड देवभूमि है जिसमें बहुत से तीर्थ हैं। गोहाटी से हरिद्वार तक ट्रेन चलने से तीर्थयात्रियों को सुविधा होगी।  कोटद्वार के लिए दोहरी रेल लाइन होनी चाहिए।  हरिद्वार से देहरादून तक भी डबल ट्रैक बनाया जाना चाहिए।  कोटद्वार, ऋषिकेश एवं  रामनगर में माल यातायात टर्मिनल बनने चाहिए।  व्यापार की दृष्टि से ये तीनों ही उत्तराखंड के प्रमुख शहर हैं।  आईआरसीटीसी एवं उत्तराखंड सरकार के मध्य टूरिज्म पैकेज होना चाहिए।  पर्यटकों एवं दूरदराज के क्षेत्रों की जनता की सुविधा के लिए उत्तराखंड में ज्यादा रेलवे आरक्षण केन्द्र खोलने की आवश्यकता है क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में पूरे वर्ष ही पर्यटकों का आवागमन बना रहता है।  देहरादून से ओखा (गुजरात) तक केवल रविवार को चलने वाली ट्रेन उत्तरांचल एक्सप्रेस (9566) को प्रतिदिन किया जाना चाहिए।  इससे गुजरात आने-जाने वाले यात्रियों को बहुत लाभ होगा।  साथ ही रेलवे की आय में भी वृद्धि होगी।

          नजीबाबाद जंक्शन रेल मार्ग उत्तराखंड का मुख्य द्वार है जहां से उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के भारतीय सेना में कार्यरत हजारों सैनिक, व्यापारी एवं अन्य लोग प्रतिदिन रेल द्वारा यात्रा करते हैं।  2331-2332 हिमगिरी एक्सप्रेस, 5653-5654 अमरनाथ एक्सप्रेस, 5651-5652 लोहित एक्सप्रेस, 2327-2328 उपासना एक्सप्रेस एवं 5097-5098 जम्मू बरौनी एक्सप्रेस गाड़ियों का नजीबाबाद जंक्शन जैसे मुख्य मार्ग पर स्टापेज न होने से यात्रियों को असुविधाओं का सामना करना पड़ता है।  इसलिए नजीबाबाद जंक्शन में इन गाड़ियों का भी स्टापेज बनाया जाए।  

          इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं और पुनः एक बार फिर यूपीए अध्यक्षा माननीया श्रीमती सोनिया गांधी जी, माननीया प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी, वित्त मंत्री माननीय श्री प्रणव मुखजी जी, रेल मंत्री माननीया कु. ममता बनर्जी जी एवं युवा सांसद श्री राहुल गांधी जी को हार्दिक धन्यवाद देता हूं जिन्होंने जनसाधारण की भावनाओं का ख्याल रखते हुए इतना अच्छा बजट दिया।

 

 

 

 

*DR. PRASANNA KUMR PATASANI (BHUBANESWAR) :

          The current Budget has little in the these important areas like :

          The centerpiece of the budget although emphasized on the concept of aam-admi, it has been highly disappointing in perspective of the common people.  It will further burden poor and middle-class.  This is not a budget for the common people.  This will only lead to more trouble for them.  The budget proposals contained special development schemes for various states, none was announced for the poor and backward regions of Orissa.  For these reasons, I express disappointment with the 2010-2011 Union Budget.  The budget is also anti-farmer commend him (Pranab Mukherjee) for giving priority to.  The Centre has also failed to come out with effective programmes to boost agriculture growth and to take  effective steps to control inflation.

          The Union Budget of 2009-2010 has ignored the interests of poor states like Orissa.  This budget has not announced anything to reduce the impact of the economic slowdown on states like Orissa.  The Budget is only a bland continuation of the existing schemes which does not satisfy the interests and requirements of the common man”.  Providing loan schemes for the rich and ignoring the poor in this context is really disappointing.  The Union Budget did not provide increased allocation for the backward KBK (Kalahandi, Bolangir and Keonjhar) region of Orissa.  The Union Budget has sparked off angry reaction for ignoring the interests of the State.  The Budget has also come in for criticisms for being anti-poor relating to prices of petrol and diesel and increase in excise duty will further  push up prices of essential commodities.

          While special packages have been  announced for mitigation of drought in Bundelkhand and flood in West Bengal, Orissa’s case has been ignored though it is affected by natural calamities every year.  The Budget also does not hold much hope for the farmers, adding that the inflationary trends will be strengthened following the announcement of the Budget provisions.  There is no scheme for generating jobs for the youths.  Moreover it also requires more investment in irrigation and development of agriculture infrastructure.  No push has been given to agriculture on which 70 per cent population of the country depends for their livelihood.

          The present budget has attracted foreign investment and opened the Loans to Big Industrial Sectors and not to the poor people. Whereas, at the time of loan recovery there is no record from big industrialists in large extend and millions of rupees have no record of their recovery either.  There is a mortal fear  from Big Industrial Sectors to take their name in the august house & their involvement with global companies.  We don’t mind, well connected Indian billionaires who get richer by getting government approvals, where as no ordinary person or poor farmers would even be able to get?  We don’t mind corrupt officials, who hoard crores, we don’t mind politicians who meddle with our PSU (Public Sector Undertaking) and destroy wealth & presented hell to poor individuals, even India’s most backward areas like Jharkhand Bihar Orissa even declared as potential to be the richest.  Global investors are awaiting, the government in its budget did not mention to control foreign investors or foreign banks as Indian promoters.  I observe that even the most insightful analysis, for the Budget is not an exercise by the government to bring order to the finances or  financial institutions for banking loans in either forms.  It is a meant to please the maximum number of people at that time so they remain voters.  Even if you have to  smile, you have to borrow to pay the interest.  At same time, the high inflation implies poor and middle class people can never get out of the basic hand to mouth.  The wealth erosion through inflation is a basic trait of the Indian Budget & millions of poor continue to suffer, because of it.

 

          In this budget, the present Government has itself admitted that there has been price rise.  An account of the programme and policies formulated for the constituency development for M.P. LAD Fund and Two crores rupees to  each M.P. for their constituency and each constituency has 7 MLAs and each MLA has been allotted 1 crores for development.  And further to that M.P. LAD Funds to be divided to all 7 MLA.  This distribution mentioned in the Budget in the year 2010 is malafied distribution.  An assurance was given that rising prices will be checked. However, of such M.P. LAD Funds, it is rather unfortunate that government contradicted itself for right distribution in an inflationary budget.  Let Government don’t give the M.P. LAD Fund and none of us rather take back either, and do direct investment & let the hungry people get food by their way.  The M.P. Land should be allotted 10 (Ten) crores minimum per year.

          Every year the budget arrives like a movie with an all Star-Cast.  In Television Pranab Mukherjee has perhaps received more than 18,000 current articles on Budget.  We, have analyzed professional global company but not even real story life of poor Indians living in villages are their concern.  This budget is framed & presented for broad based political consensus to consulting committee to look into issues but in reality all committees on budget discussion for poor individual has not been touched.  Only large financial corporations are indulged in such activities. the Government claims time and gain that they have waived off loans.  Instead poor farmers & individuals are committing suicides. The Government has to ascertain in the exact number of poor people in the country from state to state & constituency to constituency and their exact position of suicide out of starvation. This budget is not defined either in specified set of people of the Government lack unanimity on this account. The budget has failed to defined below poverty line.   Whatever work it has done does not correspond with the ground reality either in budget for the year.  If we have to make arrangement for  concern with the future of country, define the Budget for whom, where & how to be utilized.

 

 

DR. RATNA DE (HOOGHLY): Thank you, Madam, The Union Budget 2010-11 has serious challenges to tackle. To my mind, to a large extent, hon. Finance Minister could meet these challenges. First among the challenge, of course, was creating sufficient conditions for growth, While meeting the challenge of fiscal consolidation.  This balancing act has been done with sufficient proficiency. While the fiscal deficit has been reduced to 5.5 per cent of the GDP (as proposed last year) enough supply demand conditions have been created to spur the economic growth at 8.9 per cent in the next decade.

          First I come to the demand side. On demand side, of course substantial disposable income rise will take place in the hands of the middle and upper categories which would boost demand and thereby growth. This was made possible due to lowering of the Tax rates perceptively. This would also increase savings in the economy which was showing a declining trend in the last few years. The huge public investment in infrastructure plus additional expenditure in rural India would boost up the demand further.

          Now, I come to the supply bottleneck. Budget gives an overriding importance to infrastructure building both in the rural and urban India. More than  45 per cent of the plan outlay is allocated for infrastructure. This would certainly ease out the supply-demand constraints and thereby motivate both private and foreign investors in the productive sector.

          Now, I come to inclusiveness. We must not forget that the UPA II’s Government overriding commitment is towards inclusiveness. But what do we do with eight per cent growth if 80 per cent of our population do not benefit from the growth? This is becoming an increasing moral problem to all of us, let alone a political problem. Yes, it is true that just one Budget cannot change the situation overnight but genuine endeavour must be there. However, our hon. Finance Minister has not disappointed us altogether. I am mentioning a few. There has been an impressive rise in budget allocation for social sector and rural development.  (For example, NREGS   outlay has been increased by 2.5 per cent, that is, Rs.40,000 crore in 2010-11) the Plan outlay expenditure on rural development increased by 6.6 per cent; Plan and non-Plan expenditure on social services increased by 12 per cent; A quarter of Plan spending is on rural infrastructure. Allocations had increased substantially on health and school education. This is a welcome move.

Large part of health expenditure would go to the National Rural Health Mission for the BPL people. Moreover, there is introduction of Social Security Fund for unorganized workers like rickshaw pullers, weavers and bidi workers. This is certainly a welcome move. This year’s Budget allocates Rs. 1,000 crore for this purpose. Needless to say that substantial rise is expected in the coming Budget to make it really meaningful.

          We must not forget that 80 per cent of our workers are in the unorganized sector. Rs.100 crore had been allocated for women agriculturists, empowerment schemes and skill development programmes for textile and garment workers.

          I now come to agriculture. Agriculture needs special mention here. Fifty two per cent of our population earn its livelihood from agriculture. A severe drought in the last year had made this situation even worse. Our hon. Finance Minister has announced a four point strategy to revive agriculture.

 

12.57 hrs.                       

(Mr. Deputy-Speaker in the Chair)

 First is farm credit would grow up by 15 per cent while the rate of interest for farmers would go down by five per cent. Secondly, greater focus would be there on food processing and cold storage. Third is, to ease out food shortage, special area allocation had been announced in this Budget. An allocation of Rs.300 crore had been done for 60,000 pulses and oilseeds villages of rainfed areas. If implemented properly, it would solve the problem of sky rocketing pulse prices in near future, and rise in prices. We must not forget that pulses are the only source of protein in our food basket of poor persons. The most heartening of these announcements is extension of Green Revolution to the Eastern States like West Bengal, Bihar, Jharkhand and Orissa of course. Budget allocation of Rs.400 crore is certainly not sufficient. But this brings new hope to the farmers of the Eastern region. Allocation of large funds on this account would solve the problem of food shortage altogether. 

 

13.00 hrs.

          Now, I come to the conclusion.  Amidst all these good measures certain steps are disturbing.  First among them is the petrol and diesel price hike.  There was a widespread expectation that in this Budget the Hon. Minister would take some steps to control the sky-rocketing inflation in essential commodities and food items.  But what happened is just the opposite.  The decision to impose Excise Duty on petrol and diesel plus re-imposition of 50% Customs Duties on import of crude oil and reducing subsidy on food and fertilisers subsidy will have cascading effect on inflation.  The worst hit by this should be the poor and the middle-class people. This will also affect farmers who use diesel to run pump sets. We find it unacceptable.  I would urge the hon. Finance Minister to ponder over its withdrawal.

          Moreover, the neutral impact of Railway Budget presented by our Leader, hon. Railway Minister Kumari Mamata Banerjee has been nullified by imposing 10 per cent service tax on freight.  This would also create inflation.

I would request the hon. Finance Minister to consider the naxalite region more holistically and prepare a programme for these areas which would be supported by sufficient outlays.  

I would also request the hon. Finance Minister to give importance on the conditions of the Scheduled Castes, Scheduled Tribes and minorities, particularly in West Bengal.

I am happy that he has made allocation for the unorganised sector. I come from a constituency where there are a number of weavers.  Bengal is famous for the cotton sarees.  These weavers are in a very poor condition. Dhaniakhali sarees, Tangail sarees are famous in the whole of India.  I think they will be happy after this announcement.

At the end, I would like to say that under the able leadership of the hon. Prime Minister, under the dynamic leadership of Chairperson Shrimati Sonia Gandhi, our hon. Finance Minister, Shri Pranab Mukherjee and our favourite, most popular leader of Bengal, Kumari Mamata Banerjee, हम होंगे कामयाब, मन में है विश्वास।   We shall overcome difficulties to make our nation from a developing country to a developed one.

*SHRI PRAHLAD JOSHI (DHARWAD) : As I have already said when speaking on motion of thanks on President’s Address that there are two tormenting factors confronting our country today and they are the terrorism and steep price rise of essential commodities.

          If people of our country today turning anxiously towards Government, as the savior it is the earnest expectation that the Government, would do something to lift them from this predicament, it is only price and hence their expectation from the Budget was something much wishful.

          But, Budget presented by Shri. Pranab JI on 26th February contains nothing on the point.  There is nothing in the Budget, which tries to lift the Indian economy from the shackles of the meltdown.  There is nothing in the budget, which looks to the Indian agriculture with the new perspective either.

          India continues to remain a major  agriculture dependent economy despite the  claims of emerging as a global player.  About 65% of the population depends on agriculture despite the share of agriculture declining to 15% during 2008-2009 in the G.D.P., the 10th Plan target for  agriculture was of 4% growth.  But it was achieved only half.  With last year growth at less than 2% this year’s target will also be a dismal one it is anticipated.  The reason for this is not hard to find.  The public investment in agriculture has declined sharply since the onset of reforms in 1990’s from 16% of G.D.P. to 6% last year.  The  alternative strategy of  supplementing this decline by the engagement of private sector has not yielded, resulting in augmenting the overall production or productivity.

          The individual farmer is in the process of marginalization with increasing adverse terms of credit.  As an eminent commentator on the sector has brought out an interesting study.  In 1990 a cotton grower in Maharashtra could buy 15 grams of gold by producing quintal of cotton.  Today the same grower would need 15 Quintals of cottons but would get 8 grams of gold.

          It is here the Indian farmer had expected much from Budget and Pranab Ji.  Of course the  credit limit has been incrased to 3.75 Lakhs.  But the interest component is not interesting.

          Loan to Farmers at 5%: The Finance Minister has announced that loan at 7% interest and for those who repay in time will get 2% of incentive i.e., discount calling it loan at 5%, our demand was to reduce it to 3% because Indian farmer today is not in a position to pay high rate of interest and even principal in time.  Therefore, this 2% discount should not be dependent on prompt repayment conditionally. I urge the Government to lift this conditionality.

          The economic survey for 2009-2010 reveals that the total agriculture production and productivity has come down.  Production can be increased only if cultivable land area is increased.  But as per the statistics  this year area of cultivation had declined by 8% i.e. from 680.99 Lakh hectares in 2008-2009 to 626.47 Lakhs hectares in 2009-2010.  So, there is nothing in the budget constructively to increase the productivity.  I once again would like to remark that Government, should emulate the Gujarat model for increasing the productivity.

          Thus there is always mismatch  in the demand and supply of  food  grains. The year 2008-2009 the produce was 233.38 M.T.  But in 2009-2010 this comes down to 217 M.T. This is one of the factors that scaled the food prices. Government is much talking about food security.  But where is the food security.  The scheme remained on paper only.  The Economic Survey for 2010-2011 itself reveals about the Government failure to control the rising price.

          Excise on Petrol Diesel: The country already ravaged with spiraling prices rise and as a putting  salt on the wound, the Finance Minister has reintroduced 5% and 7.5% duty on Crude Oil which was lifted earlier.  This will add to the  already rising food prices and contributive to inflation to heighten further.

          Supply Price Mechanism: The whole country knows the main reason for spiraling price rise is the activities of Black Marketers and Illegal hoarders.  There are no measures to be seen in budget speech of Finance Minister in this regard. People had expected some strict measures against them and the measures like supply chain mechanism which would have hard hit the Black Marketers and hoarders.

          Income Tax limit not enhanced: There was pressing demand to enhance the taxable income limit up to Rs. 2.00 Lakhs but this demand is not  honoured nor even standard deduction is re-introduced either.  But the tax slab up to Rs. 5.00 Lakhs is increased which is going to benefit only higher income groups.  Hence once gain the middle and lower middle class people are letdown.

          Loan waiver period extended; The massive loan waiver scheme announced in 2008 by former Finance Minister had expired on 31.12.2009.  There was demand by big farmers who had only 25% waiver for extension upto June end.  What had prevented the Government to announce extension in December itself, so that many farmers who again taking another loan repaid 25% loan amount would have been benefited.  Hence this announcement and extension is not of much use to farmers.

          Finally the Finance Minister has talked much on withdrawal of Fiscal Stimulus.  This is going to impact in deep way the  economy of country, because already the country is much impacted by global slowdown. In this background the Finance Minister has to rethink on this rolling back of the Fiscal Stimulus to keep the economy on the present track.

          By this Budget the fiscal deficit is fixed at 5.5% of G.D.P. and total amount is Rs. 213298 Crores.  How this deficit will be adjusted there is no mention. The total expenditure has gone up to Rs. 1108749 Crores.  Which again will have its own impact on the market and prices.

          Hence, by presenting this Budget the Finance Minister has achieved neither Price Control nor the improvement in the economic growth.  In brief this is a Budget, which could not onset the growth nor succeed in controlling the rising prices and congress’s much adorned slogan of “Congress Ka Hath Am Adami Ka Sath” is not be seen and the country what is going to be seen in Congress Ka Haath will be only with Amir Logon Kay Saath.

 

*श्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़)ः भारत ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित देश है।  अतः उसके विकास की योजनाएं गांव को ध्यान में रखकर बनायी जानी चाहिए।  गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, रोजगार सृजन तथा पर्यावरण सरंक्षण आदि को प्राथमिकता मिलना चाहिए।

          राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के संबंध में बजट में काफी कुछ कहा गया है, किंतु वास्तविकता यह है कि इस योजना से मजदूरों का फायदा कम हुआ है, किंतु ग्राम प्रधानों को खूब कमायी हुई है।  देश के किसी भी क्षेत्र में किसी उच्च जांच कमेटी से जांच करायी जाए तो बहुत सी अनियमिततायें सामने आ जायेंगी।  फर्जी जॉब कार्ड बन रहे हैं तथा कार्डों को सरपंच के पास रखकर कुछ पैसे लेकर मजदूर दिल्ली, हरियाणा, पंजाब मजदूरी करने चले जाते हैं।  उनके नाम रजिस्टर में चढ़े रहते हैं तथा मजदूरी निकलती रहती है।

          प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बनने वाली सड़कें केन्द्र व राज्य सरकार के बीच तालमेल के अभाव में तथा भ्रष्टाचार के चलते निश्चित समय निकालने के बाद भी नहीं बन पा रही है तथा उखड़ने लगी हैं।  अनेक सड़कों के निर्माण कार्य को बीच में छोड़ दिया गया है।  कहीं-कहीं सड़कों में वन विभाग की अनुमति न मिलने तथा पुलों का निर्माण न होने से आधी-अधूरी सड़कें बेकार हो रही हैं, सड़कों के निर्माण में मध्य प्रदेश काफी आगे है, राज्य में 52457 कि.मी. लम्बाई की निर्माण की स्वीकृति के साथ 26956 कि.मी. सड़कों का निर्माण कर लगभग 8100 गांवों को मुख्य मार्गों से जोड़ा गया है।

          राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना अभी भी लक्ष्य से काफी पीछे चल रही है।  योजना 31 मार्च, 2010 को समाप्त होना है जबकि अभी भी गरीबी रेखा सूची से नीचे रहते बहुत से परिवार बिजली से वंचित हैं। 63000 से अधिक गांवों में विद्युतीकरण का कार्य बहुत बड़ी चुनौती है इसे प्राथमिकता से पूर्ण कराना चाहिए।  बजट में 5500 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी गई है जबकि 9000 करोड़ रुपयों की आवश्यकता है।

          देश में लगभग डेढ़ करोड़ रुपए की कई सिंचाई योजनाएं अधर में लटकी हैं, इनकी संख्या 250 से ज्यादा है इनमें से कई की आधारशिला तो पचास साल पहले दूसरी पंचवर्षीय योजना में रखी गयी थी।  भारत में सिंचाई की तमाम मूलभूत संरचनाओं में देखभाल में लगभग 17 हजार करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी, लेकिन दस प्रतिशत भी उपलब्ध नहीं है।  बड़ी व मझोल परियोजनाओं पर हर साल हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के स्थान पर सिंचाई का जो अपना मूलभूत संसाधन है उसे ठीक करना चाहिए।  बारिश के पानी की हारवेस्टिंग तथा भूमिगत जल संचय करने को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

          शिक्षा को बढ़ावा देने के किए जाने वाले प्रयासों में कमी साफ दिखायी पड़ रही है।  सभी बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा का कानून भी बन गया, लेकिन स्थिति यह है कि दसवीं तक पहुंचते-पहुंचते 60 प्रतिशत बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।  यह आंकड़ा लगभग 12 करोड़ बच्चों का बैठता है आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों के लिए इस वर्ष के बजट में पिछले वर्ष की तुलना में 200 करोड़ की कटौती की गई है।  दलित बच्चों के साथ होने वाले भेदभाव के कारण भी बढ़ी संख्या में दलित छात्र स्कूली शिक्षा से दूर हो जाते हैं।

          सर्व शिक्षा अभियान के लिए 1500 करोड़ रुपए का प्रावधान बजट में कियागया इससे भवन तो देश में बड़ी संख्या में बन गए परन्तु उनमें गुणवत्ता की मॉनीटरिंग नहीं की जा रही है तथा शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्तियों के अभाव में शिक्षा का स्तर ऊंचा नहीं उठ पा रहा है।  कई स्कूलों में 5वीं क्लास के बच्चे दूसरी क्लास की पुस्तक भी नहीं पढ़ पाते।  कारण एक ही शिक्षक पहली क्लास से पांचवीं तक पढ़ा रहा होता है।  अतः शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने शिक्षकों की नियुक्ति के लिए भी बजट में प्रावधान होना चाहिए।

          राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए 15440 करोड़ को बजट में स्थान दिया गया, किंतु आज भी देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा विशेषकर ग्रामीण भारत स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है।  किसी समय शहरी बीमारी समझे जाने वाले कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह अब ग्रामीणों को भी अपनी चपेट में ले चुके हैं।  ग्रामीण अस्पतालों में चिकित्सकों एवं चिकित्सा कर्मियों की काफी कमी है।  चिकित्सा के अभाव में गांवों में मृत्युदर का प्रतिशत बढ़ रहा है।  मेडिकल पाठय़क्रमों को ग्रामोन्मुखी बनाना चाहिए तथा गांव में पोस्टिंग होने पर डॉक्टर को विशेष वेतन एवं आवास सुविधा उपलब्ध कराना चाहिए।

          पल्स पोलियो टीकाकरण जैसे कार्यक्रम का बजट 35 करोड़ घटा दिया है।  प्रधानमंत्री सहायता कोष से गरीबों को सांसदों की अनुशंसा पर कैंसर, हृदय रोग, किडनी रोगों के इलाज हेतु मिलने वाली राशि में प्रधानमंत्री कार्यालय से पत्र आने लगे हैं कि आपके क्षेत्र में इतने लोगों को सहायता राशि दे दी गई।  आगे राशि की उपलब्धता पर दी जायेगी।  आशा का जो एक केन्द्र है उसमें कटौती नहीं होना चाहिए तथा सभी गरीबों को सहायता राशि इलाज हेतु मिलना चाहिए एवं दी जाने वाली राशि भी बढ़ाना चाहिए।

          असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को नवीन पेंशन योजना एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का उल्लेख किया गया, किंतु यह योजना ठीक से मजदूर के उन क्षेत्रों तक पहुंचे जहां वह कार्य करते हैं एवं इसका लाभ ले सकें।   इसके लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाना चाहिए।  देखने में यह आता है कि अशिक्षित होने के कारण यह बेचारे जानकारी से वंचित रहते हैं तथा दलाल टाइप के लोग इनसे पैसा खा जाते हैं। बीड़ी मजदूरों के लिए बनी बीड़ी मजदूर आवास योजना की राशि को बढ़ी हुई महंगाई के अनुसार बढ़ाना चाहिए।

          अनाथ बच्चों की परवरिश शिक्षा संस्कार रोजगार के लिए विशेष आवासीय विद्यालय बनाने की पहल होना चाहिए।  एन.जी.ओ. द्वारा संचालित संस्थाओं के बारे में अच्छे परिणाम देखने में नहीं आते।  फजी एन.जी.ओ. पूरे देश में बड़ी संख्या में चल रहे हैं उनकी जांच कर दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही होना चाहिए।  

          बुन्देलखंड में प्रस्तावित केन्द्रीय कृषित विश्वविद्यालय मेरे संसदीय क्षेत्र टीकमगढ़ में टीकमगढ़ अथवा नौगांव इन दोनों स्थानों में से एक स्थान पर खुलवाना चाहिए ताकि पिछले 4-5 वर्षों से सूखे की मार को झेल रहे बुन्देलखंड के विकास की दिशा में पहल हो सके।  टीकमगए छतरपुर दोनों ही जिलों में काफी पहाड़ियां हैं।  अतः इनका उपयोग पवन ऊर्जा को प्रोत्साहित करने, पवन चक्कियां लगाने को बढ़ावा मिलना चाहिए।  बुन्देलखंड में ओरछा खजुराहो भामकुंड सहित अनेक धार्मिक पर्यटक केन्द्र हैं जिनका समुचित रखरखाव होने से विदेशी पर्यटकों की संख्या में और भी अधिक वृद्धि कर राष्ट्रीय राजस्व आय को बढ़ाया जा सकता है।

          मध्य प्रदेश में छतरपुर टीकमगढ़ सागर सहित देश के कई राज्यों बिहार, बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु आदि में पान का उत्पादन काफी होता है, किंतु पान की खेती को कृषि में शामिल नहीं किया गया है।  अतः कृषि में शामिल कर फसल बीमा योजना का लाभ पान उत्पादकों को मिलना चाहिए।

          डीजल पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि होने से महंगाई ने आम आदमी का जीवन दूभर कर दिया है।  गरीब आदमी को परिवार के सदस्यों की शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, कपड़ा आदि आवश्यकताओं को पूरा करने में बहुत ही कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।  गरीब बच्चे को भोजन करायें या पढ़ायें, इलाज करायें या कपड़ा दिलायें, घोर निराशा के दौर से गुजर रहा है आम आदमी।

          दिल्ली, मुम्बई, बैंगलोर, कोलकाता की गगनचुंबी इमारतें इस देश के विकास का मॉडल नहीं होगी, विदेशों से आयातित कारें विकास का मॉडल नहीं, बढ़ते हुए एड्स के मरीज, निराश हताश रोजगार की तलाश में भटकते बेरोजगार, शासकीय संस्थानों में बढ़ते हुए ठेका मजदूर, अनुकंपा नियुक्ति की आशा में बूढे होने नौजवान विकास के मॉडल नहीं होंगे।

          भारत निर्माण तभी होगा जब गरीब को मकान मिलेगा, भूखे को भोजन मिलेगा, फटे कपड़े व्यक्ति को कपड़ा मिलेगा, किडनी, कैंसर, हृदय रोगी को नःशुल्क इलाज मिलेगा।  बेरोजगार नौजवान को रोजगार तथा मजदूर को काम मिलेगा।  सही मायने में भारत निर्माण तभी होगा।

 

SHRI T.R. BAALU (SRIPERUMBUDUR):   Thank you, hon. Deputy Speaker, Sir.  First of all, on behalf of my Party I would like to put on record our sincere thanks and congratulations to hon. Chairperson of the UPA, Madam Sonia Gandhi, the torch-bearer of the Indian civil society, hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Dr. Kalaignar Karunanidhi, the guiding light of the UPA and a social scientist, Dr. Manmohan Singh, the Prime Minister of India, the modern architect of Indian economy, Shri Pranab Mukherjee who is the kingpin of the present administration who are all responsible for the continuous success of the UPA.

          Sir, the hon. Finance Minister has presented a Budget before the House which envisages that the total expenditure for the next year will be of the order of Rs.11,08,749 crore which is plus 8.6 per cent over the previous year; the plan expenditure would be Rs.3,73,092 crore which is plus 15 per cent of the previous year; non-plan expenditure would be of the order of Rs.7,35,657 crore which is plus 6 per cent of the previous year.  The Minister expects the total fiscal deficit as Rs.3,81,408 crore which is 5.5 per cent, when compared to the last year it is more or less 1.2 per cent less.  The Minister has sacrificed about Rs.26,000 crore under direct tax and has mopped up Rs.46,500 crore in the indirect tax.  The net gain is only Rs. 20,000 crore.

One should understand that this Budget exercise is nothing but a tight rope walk for any Finance Minister.

In spite of continuous recession and economic meltdown in the developing countries for the past few years, sluggish export growth, slow financial flow in so many sectors, skyrocketing double-digit inflation along with delayed sub-normal rain which led to drought conditions in so many districts, our Finance Minister has done a tight rope walking and at the same time, he has given the best Budget to the nation.

          Last year, the GDP growth rate was of the order of 6.7 per cent.  This year, (2009-10) it is going to be not less than 7.2 per cent.  It would not be out of context if I could say that during 1990, probably, when a very good friend of mine, Mr. Yashwant Sinha was the Finance Minister – he is a good friend of mine but he is in bad company – he had gone around the world to see that the gold could be sold in the international market for discharging his domestic fiscal responsibility.  He took about 14 tonnes of gold from the reserves and sold it and discharged his duty. We should not forget it.  It is a history but at the same time a country which had sold 14 tonnes of gold in the international market just to serve the fiscal responsibility of the nation has gone to the International Monetary Fund to purchase 200 tonnes of gold to see that the country comes at the tenth rank in the gold holding countries of the entire world.  Is it not a good change?  Is it not an appreciable change?  The pride and prestige of Indian nation is kept fly high. 

The fiscal deficit of United States in the current year, namely, 2009-10, is of the order of 12.3 per cent of the GDP.  In spite of so many ordeals and in spite of global recession, India’s fiscal deficit in this year, i.e., 2009-10, is only 6.7 per cent.  This has happened because of the prudent management of fiscal responsibility by hon. Pranab Mukherjee.

          Some of my friends have made so many points referring to China.  China has reduced the poverty ratio from 73.5 per cent to 8.1 per cent from 1981 to 2005.    In the same period of 1981 to 2005, the Government of India could reduce from 42 per cent to 24 per cent. China has reduced it by 65 per cent but India could reduce only by 18 per cent.  It is a fact.  But at the same time my friends should understand India is not China and China is not India.  India is the largest democracy of the entire world.  It is one of the biggest democracies where you can oppose; you can debate; you can discuss; you can disrupt the House; you can obstruct the House; and you can prevent people from speaking.  You are in a luxury-democracy.  You cannot do these things in China.  So, China is not India and India is not China.  You cannot just compare China and India.  What was the inflation in China in January 2010?  It was 1.5 per cent only.

At the same time, in the year 2009-10, the GDP growth rate was at the level of 8.7 per cent. I would like to inform the House that in the year 2009-10 when the GDP growth rate of China was at 8.7 per cent, and Mr. Wen Jiabao went to Parliament and said that in the coming year it is going to be 8 per cent only; not double digit GDP. This growth rate which Mr. Wen is expecting is in spite of infusion of funds as stimulus package to the level of four per cent of their GDP of their nation.  One should appreciate the Finance Minister of India. In the year 2007-08 it was 9.2 per cent. The GDP next year, 2008-09 went down to 6.7 per cent. This year, 2009-10 it is going to be 7.2 per cent. In the year 2010-11, the Finance Minister is expecting it to be 9 per cent. In the years to come it is going to be in double digits. For this achievement at least one should appreciate the Finance Minister; one should appreciate the efforts of this Government.

          What has been the growth in the sectoral GDP? In the year 2004-05 it was 28 per cent in the industrial sector. This year also it is at 28 per cent. The growth in the service sector in the year 2004-05 was 53.2 per cent which has increased to 57.2 per cent. The only sector which has not flourished or has not come up to the mark is the agriculture sector. In 2004-05 the growth was 18.9 per cent but now it is 14.6 per cent only. This particular sector has to be developed. But at the same time, the growth rate of per capita income in 2005-06 was 7.6 per cent; in 2006-07 it was 7.9 per cent. So, it has been on the increase. The growth in per capita income has been increasing since 2005-06, the only exception was in the year 2008-09 when the entire international community had faced the pinch of global recession, the economic melt down, it was 3.7 per cent. But in the year 2009-10 it has increased to 5.3 per cent. The growth rate has improved. The Members from the Opposition have to appreciate this fact.

          Sir, seventy per cent of our masses belong to rural India. We talk about Green Revolution – the pre-Green Revolution period and the post Green Revolution period. The growth in both these periods has to be compared. The period from 1967-68  to 2008-09 is considered to be the post Green Revolution period and the period from 1949-50 to 1964-65 is considered to be the pre Green Revolution period. Production has fallen when compared post Green Revolution and pre Green Revolution. How? The production of rice fell from 3.5 per cent to 2.5 per cent; production of wheat fell from 3.98 per cent to 3.69 per cent; production of pulses fell from 1.4 per cent to 0.75 per cent; production of sugarcane fell from 4.26 per cent to 2.64 per cent; production of cotton miserably fell from 4.55 per cent to 3.06 per cent. So, in area of agriculture we have not developed much. The growth is not appreciable in one of the most important areas, namely, agriculture. Production has fallen. How to improve this particular sector? We cannot just expand the land area. Land area is constant. But the area under irrigation should be increased.

Irrigation should be developed.  I would not agree with the Finance Minister where he has said that he depends upon Lord Indra. We do not believe in Lord Indra.… (Interruptions) The most important thing is the linking of rivers.   You have forgotten it.  Be it any Government which comes to power, the administration forgets things.  They simply say that they are going to interlink rivers. But they are not putting it into action. Farmers from Tamil Nadu and elsewhere are starving.  They want more water.  We are thinking that the Government of India will interlink rivers. The Minister for Water Resources is present here.  The Ministry of Water Resources has a proposal of linking 30 rivers, that is, 14 rivers flowing from The Himalayas and 16 rivers are in the peninsular India. No action has been taken.  I do not know where that proposal is lying. It is in cold storage. I request the Government of India to come forward and see that interlinking of rivers is taken up at the earliest.  They should give top priority to it.

          It is all right if they are not able to interlink rivers. They may come forward at least for intralinking of rivers.… (Interruptions)

THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF WATER RESOURCES (SHRI PAWAN KUMAR BANSAL):   There is a good progress in the matter of DPRs.… (Interruptions)

SHRI T.R. BAALU : I have to thank the Minister for Water Resources for he has assured something. Let us see what is going to happen. But before you go for interlinking, I suggest to the Minister, Shri Bansal, on one thing.  Sir, they have got the AIBP.  You have agreed in the National Development Council wherein you have promised that any proposal that could be sent from the State Governments will be considered properly and that it will be taken up under the AIBP. Sir, what has happened now?

          The Government of Tamil has sent three proposals to the Government of India. The first proposal is upgradation of Kattalai Barrage across River Cauvery to make use of surplus water at an estimated cost of Rs. 189 crore.  The second proposal is linking of Tamiraparani-Nambiar-Karumeni rivers which would facilitate 23,000 hectares of Radhapuram, Sathankulam, Palayankottai, Nanganeri, etc. in the districts of Tirunelveli and Tuticorin at a cost of Rs. 452 crore.  The next proposal is linking of Pennaiyar and Cheyyar so as to facilitate the districts of Kancheepuram and Thiruvannamalai which would be at an estimated cost of Rs. 174 crore. All these three proposals have been sent to the Government of India. But they are lying in cold storage and in the cupboards of the Government of India. If you could not do interlinking of rivers, at least you can go in for intralinking of rivers.  You can facilitate the State Government in this regard.  You can assist the State Government.  Sir, with folded hands, I would request the Government of India to see that these proposals are considered as quickly as possible.

          The most important thing is food processing.  What is happening to the Ministry of Food Processing? It has to help the agriculturists. In the Annual Report of 2008-09, production in the whole of India is given.   The milk production is 105 million tones which is the highest in the world.  The production of fruits is 150 million tones which is the second largest in the world.  The production of food grains is 230 million tones which is the third largest in the world.  Fish production is 7 million tones which is also the third largest in the world.  Egg production is 45,200 millions.  But, Sir, you know what has happened! Let us take into account only fruits and vegetables.  Let us not take up other things.   About 35 per cent of fruits and vegetables perish and get wasted. 

          What is the value of 35 per cent of fruits and vegetables that is going waste? It is Rs. 50,000 crores.  Is it not a sheer waste?  Agriculturists and poor farmers are producing these products.  But the Government of India is not able to construct godowns, is not able to facilitate the farmers, and it is not able to construct proper cold storage facilities for the perishables.  This has to be attended to as quickly as possible.

         Yesterday, though I was not here in the House, I was watching television.  Shri Yashwant Sinha asked a pertinent and sharp question.  He asked: “Who is an aam aadmi? He was Finance Minister for two or three times.  It is understandable if I do not know who is aam aadmi because I do not know Hindi. But he knows who is an aam aadmi.   In spite of that, he asked that question.  Shri Yashwant Sinha, definitely you are not an aam aadmi, definitely not the voters who have voted for your party.  Definitely the voters who stood behind the UPA at the time of elections are the aam aadmi.

SHRI YASHWANT SINHA : This is a very dangerous definition that Shri T. R. Baalu has given for an aam aadmi.  He is trying to divide the country.

SHRI T.R. BAALU : Sir, an aam aadmi is nothing but common man of the country.  Common men are the poor farm workers and poor unskilled workers.

SHRI YASHWANT SINHA : Whoever they vote for!

SHRI T.R. BAALU : They are the poor wage earners of the informal sector.  The have-nots are the aam aadmi and not you Shri Yashwant Sinha. I am talking about have-nots and not about you.  The have-nots of this country, the common men of the country are the aam aadmi. 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

SHRI T.R. BAALU : Sir, I am the only person to speak on the Budget on behalf of my Party. You have been very kind.  I was so happy when I saw you in the Chair. Within ten minutes I will conclude.

          Yesterday, when Shri Yashwant Sinha asked who is an aam aadmi, I thought that he has not read the Budget documents completely. The aam aadmi are the poor farmers who are going to get Rs. 3,75,000 of farm credit. The beneficiaries are 23.40 crore families belonging to the BPL.  The aam aadmi are the ones who are going to be benefited by Rs. 66,100 crore of rural development schemes; the aam aadmi are the ones who are going to be benefited by the allotment of Rs. 40,100 crore for NREGS; the aam aadmi are the ones who are going to be benefited by the allotment of Rs. 48,000 crore for the Bharat Nirman; aam aadmi are the ones who are going to be benefited by the allotment of Rs. 10,000 crore for Indira Awas Yojana; aad aadmi are the ones who are going to be benefited by the allotment of Rs. 1,270 crore for RAY.  The fund earmarked for social development is Rs. 1,000 crore.  Who are the beneficiaries of this?  They are the weavers, rickshaw pullers, toddy tappers, and beedi workers among us.

          I think this definition holds good for you.  Its goal is inclusive growth.  Have-nots should be taken in the mainstream and haves should not be punished.  We have to include the have-nots in the Budget and haves should not be punished. This is inclusive growth.  The beneficiaries of inclusive growth should be identified and the intended benefits should go to the intended beneficiaries.

 If you correctly follow this method of inclusive growth, it could be done.  That is what the hon. Minister of Finance, Shri Pranab Mukherjee has done. For the social sector an amount of Rs. 1,37,674 crore has been identified, plus another 25 per cent of the Plan allocation has been devoted for that purpose.  In the Education Sector there is an increase, and from Rs. 26,800 crore to Rs. 31,036 crore has been identified. Over and above the 13th Finance Commission, the Government is going to provide Rs. 3,675 crore for each and every State. In the health sector, they have made a provision of Rs. 22,300 crore; in the rural development sector, they have provided Rs. 66,100 crore.  In the NREGA, the Government has provided Rs 40,000 crore, and for Bharat Nirman, the Government has provided Rs. 48,000 crore. … (Interruptions)

          Sir, I will conclude within five or six minutes. 

MR. DEPUTY-SPEAKER: You have taken a lot of time.

SHRI T.R. BAALU : Sir in the Ministry of Social Justice and Empowerment, the Government has increased the budget by 80 per cent to

Rs. 4,500 crore .  Sir, for what purposes, have these funds been utilized?  It is only for human capital formation. If you invest in the social sector, you are going to mop up human capital formation and because of human capital formation, you will flourish with physical infrastructures. The physical infrastructure is good and you can expand the economy.  The economy of the country will go.

          Sir, because to include the inclusive growth, my leader, Dr. Kalaignar Karunanidhi is implementing announced so many schemes like free clothing, free housing, etc.  He has announced to provide about three lakh housing units this year and a sum of Rs. 1,800 crore has been provided by the Tamil Nadu Government. He is having a vision to provide about 21 lakh housing units within six years to make Tamil Nadu as a slum free State and he was issued free land pattas to 6,99858 people for housing. He is providing free colour television, free gas connections, loan waiver of Rs. 7,000 crore, Kalaignar Health Scheme to avail medical treatment up to Rs. 1 lakh; a sum of Rs. 20,000 for marriage expenditure to girls; Rs. 6,000 for pre-natal and post- natal care of the women.  Hence, because of all these, the institutionalised delivery alone has increased by 264 per cent from 2006 to 2009. 

          Sir, while placing on record about the creation of Welfare Board for transgender – I am talking about people – who are hitherto a neglected community, my leader, Dr. Kalaignar Karunanidhi has provided Welfare Boards.  A total of 31 Boards have been identified for so many people who are all Aam Aadmi. 

          Now, I come to physically challenged people. The physically challenged people should not be called as physically challenged people. That is what Dr. Kalaignar Karunanidhi on 3rd March in Trichy said.  He has said that hereafter they should be called as `Differently-abled people.’   For the differently-abled people, there are a lot of Acts.  The Mental Health Act of 1987 is there, The Rehabilitation Council of India Act, 1992 is there, Persons with Disabilities Act, 1995 is there. There is a National Trust for the Welfare of Persons with Autism Cerebral Palsy. Mental Retardation and Multiple Disabilities Act, 1999.  There is a UN Protocol – The 1995 Act and the UN Protocol – say that there should be three per cent reservation for the persons who are differently-abled people education, employment and even in Parliament also.  These things should be taken care of.

          Sir, I will conclude very shortly.  Please bear with me.  Now, I come to the people who are living below the poverty line (BPL). There are two Committees expected –one by the Planning Commission and one by the Ministry of Rural Development.  The Planning Commission says that private household consumer expenditure should be taken into account.  That would not hold good.  Today, he will consume something and tomorrow he will consume something else.   

But, at the same time, the Rural Development Ministry’s Expert Group says that 2400 kilo calories could be taken into account. It further says that the norm of 1820 kilo calories would not help and hence it recommended 2400 kilo calories to identify the BPL people because if 2400 kilo calories are given, 50 per cent rural masses will be  included.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

SHRI T.R. BAALU : I will conclude quickly.

          Before I conclude, I would like to say that the 13th Finance Commission recommendation has come.  You know, Sir, we are always fighting for the State Autonomy..… (Interruptions) The State Autonomy is the most important principle as far as the DMK is concerned.  What has the 13th Finance commission said? The important point is that Tamil Nadu’s population share is 6 per cent whereas the 13th Finance Commission says that as far as devolution is concerned, it will get only 5 per cent. How is it correct? Our population share is 6 per cent whereas the devolution is 5 per cent! What went wrong? I do not know about it.

          Secondly, in   2008-09, the fiscal deficit of Tamil Nadu was of the order of 2.4 per cent. Taking that into account, the Finance Commission says that in the ensuing year, you should not borrow 3 per cent; you should borrow only 2.4 per cent. How is it fair? The State of Tamil Nadu is punished for better performance. It is not fair.  We can abide by the FRBM Act but not by the 13th Finance Commission. We are very sorry about it and the States will become just like the municipalities. Moreover,  everybody is objecting to the GST. All the States are objecting to the Goods and Services Tax. Whenever you go for the GST,  you should consult the States. The hon. Minister has said that from 1st of April, he will go in for that. Each and every Chief Minister is asking the Central Government not to bring the GST. If you want to do it, you have to have a full-fledged consultation.  Unless and otherwise you have a proper consultation, it should not be taken into account.

          My dear Sir, you have given me time but you have not given me sufficient time. With folded hands, I would thank you very much. At the same time, I would like to say that this Budget has been innovatively prepared. It has to be appreciated and it should not be opposed. Thank you. (ends)

                                                                               

SHRI YASHWANT SINHA :  Sir, I would like to congratulate my very good friend Shri T.R. Baalu for having defended this Budget with the same passion with which he used to defend my Budget!… (Interruptions)

SHRI T.R. BAALU : I have already said that he is a good friend of mine but he is in the bad company!… (Interruptions)

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Do not have cross-talk.

          Now, Papers to be laid on the Table by  Shri S.S. Palanimanickam.

श्री मनीष तिवारी (लुधियाना):महोदय मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे बजट पर अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया ।

          कोई भी बजट गंतव्य नहीं होता है। हर बजट एक प्रक्रिया होती है। वर्ष 2004 में जब यूपीए सरकार बनी थी, तब हमने एक सिलसिला शुरू किया था  कि आम आदमी को योजना के केंद्र पर रखकर, विकास के केंद्र पर रखकर, हम इस देश की उन्नति और तरक्की करेंगे। इस बजट को भी उस प्रक्रिया की एक कड़ी के रूप में देखना चाहिए। बजट को देखने के दो पहलू हो सकते हैं – एक पहलू, जिसका माननीय यशवंत सिन्हा ने जिक्र किया कि आंकड़ों का मायाजाल, अर्थशास्त्रियों के लिए विश्लेषण करने का मसौदा। लेकिन इसका एक अन्य पहलू भी है – हमारे आने वाले भविष्य, हम 21वीं सदी के दूसरे दशक की दहलीज पर खड़े हैं, की बुनियाद रखने की उद्घोषणा।

         इस बजट की बुनियादी बातों का जिक्र करने से पहले, मैं हमारे माननीय विपक्ष से कुछ सवाल करना चाहता हूं। इन्होंने बजट की आलोचना की, बजट की निंदा की। यह इनका मूलभूत अधिकार है। Consensual defence is the cornerstone of democracy. परन्तु मैं इनसे बहुत अदब और सत्कार से पूछना चाहता हूं कि अगर यूपीए की सरकार ने समर्थन मूल्य बढ़ाया तो क्या उससे किसानों का फायदा नहीं हुआ? अगर नरेगा में पैसा लगा तो जो भूमिहीन मजदूर हैं, क्या उनके जीवनयापन का स्तर ऊपर नहीं उठा? अगर कर्जा माफी की गयी, तो क्या उसका सीधा-सीधा असर भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति पर नहीं पड़ा? क्या ये इस बात से इन्कार कर सकते हैं कि वर्ष 2009 दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे मुश्किल वर्ष था। दूसरे महायुद्ध के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था 1.3 प्रतिशत से घटी होगी। क्या ये इस बात से इन्कार कर सकते हैं कि जो दक्षिणी-पश्चिमी मानसून था, वह नाकाम हुआ, उसका असर खरीफ की फसल पर पड़ा? वर्ष 2004 से लेकर 2008 तक कृषि के क्षेत्र में 3.55 प्रतिशत की दर से बढ़ता रहा, वर्ष 2009 पहला ऐसा वर्ष था जिसमें कृषि की वृद्धि दर नकारात्मक हुई। इसके बावजूद अगर भारत की अर्थव्यवस्था 7.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी, राजकोषीय घाटा कम हुआ तो उसका थोड़ा-बहुत श्रेय हमारे वित्त मंत्री जी को जाता है या नहीं? अगर खुशी से नहीं तो गमी से ही कह दीजिए कि इतनी  जटिल परिस्थिति के बावजूद जिस तरह से  संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने इस देश की नैया को पार लगाया है, उसके लिए हम आपका धन्यवाद और आभार व्यक्त करते हैं।

          महोदय, माननीय यशवंत सिन्हा जी की मैं बहुत इज्जत करता हूं। वह जब कल बोल रहे थे, स्पष्टीकरण दे रहे थे कि इन्होंने वित्त मंत्री जी के बजट भाषण का क्यों बहिष्कार किया। यह इनका मूलभूत अधिकार है कि अगर वह सुनना नहीं चाहते तो उठकर सदन से  बाहर जा सकते हैं। लेकिन मुद्दा कौना सा था? अगर वह अपने गिरेबान में झांककर देखते, जब उनकी सरकार थी – तीन जून, 2008 से लेकर 2004 तक – इन्होंने 21 बार पेट्रोल की कीमत बढ़ाई, 34 बार डीजल की कीमत बढ़ाई, जबकि अंतराष्ट्रीय बाजार में, क्योंकि भारत अपनी तेल आवश्यकता का 78 प्रतिशत तेल आयात करता है, कच्चे तेल की कीमत सिर्फ 22.5 डालर थी। मैं कुछ और आंकड़े देना चाहता हूं। मार्च, 1998 से लेकर वर्ष 2004 तक जब एनडीए की सरकार रही, अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 12 डालर से लेकर 36 डालर तक रही। पेट्रोल की कीमत बढ़ी 48 प्रतिशत, डीजल की कीमत बढ़ी 112 प्रतिशत, मिट्टी के तेल की कीमत बढ़ी 258 प्रतिशत, एलपीजी की कीमत बढ़ी 78 प्रतिशत और जब यूपीए की सरकार बनी, तो कच्चे तेल का दाम आसमान छू रहा था।

 कितनी हमने कीमत बढ़ाई – पेट्रोल की 41 प्रतिशत, डीजल की 63 प्रतिशत, मिट्टी के तेल की सिर्फ 2 प्रतिशत, वह भी टैक्स में इधर-उधर थोड़े-बहुत ऊपर नीचे था और एलपीजी 16 प्रतिशत। हमारे विपक्ष के साथ जब बोल रहे थे तो कह रहे थे कि जब चुनाव आते हैं तो हम कीमतें कम कर देते हैं और जब चुनाव चले जाते हैं तो कीमते बढ़ा देते हैं। मैं इनको याद कराना चाहता हूं कि जून 2008 में जिन रियायतों के ऊपर इन्होंने इतना एतराज किया है, कच्चे तेल की कीमत 133 डालर प्रति बैरल थी। महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के चुनाव थे, मगर हमने राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए उस समय तेल की कीमत बढ़ाई और वह समय था जब यह रियायतें दी गयी थीं कि आम आदमी के ऊपर इसका भार न पड़े। आज यदि कच्चे तेल की कीमत आधी हो गयी है और वित्त मंत्री ने वे रियायतें वापस ले लीं तो ऐसा कौनसा बड़ा गुनाह कर दिया कि आपने सारी संसदीय मर्यादाओं का उल्लंघन कर दिया। अभी माननीय यशवंत सिन्हा जी कह रहे थे कि Budget is possibly the most important thing which this House discusses. और उस बजट भाषण का बहिष्कार करके आप संसद से उठकर बाहर चले गये।  I would now like to, with your permission, Mr. Deputy-Speaker Sir, deal with some of the fundamental concepts or constructs in this Budget.  Of the UPA Government, every document has a philosophy.  I think, Para 12 of this Budget Document, Budget Speech, outlines the philosophy of this Government, that the Government is an enabler and the Government is an interventionist when it comes to providing succour to the most down-trodden and under privileged sections of the society; and to lay the economic foundations, to strengthen and consolidate the economic foundations of this country, what are the constructs which support this philosophy?

Yesterday, Shri Yashwant Sinha was talking about and I think, the hon. Finance Minister would reply to it and about the financial stability and developmental council.  I would just like to very humbly submit that I welcome this proposal of the hon. Finance Minister because all regulatory structures that we have in the country are vertical structures and one of the reasons why the global economic meltdown took place was because there was no horizontal body which was looking at the whole economy from a macro perspective.

          So, if the hon. Finance Minister has brought this proposal to have a financial stability and developmental council, I think, it is a very welcome proposal because in future it will not only strengthen the oversight mechanism, but also make our economic institutions and our regulatory institutions far more resilient. 

          The other construct, Mr. Deputy-Speaker Sir, is the Financial Sector Legislative Reforms Commission. It is high time that the laws which govern our companies, laws which govern our investments, laws which govern the entire gamut of the investment cycle need to be comprehensively overhauled so that we can be in tune with the world.  While it takes on an average between three weeks and three months to open or shut down a business in any of the paved investment destinations, in India that process can take anywhere from three to 13 years and that trend needs to be reversed.

          Similarly, आज माननीय निशिकांत दूबे जी बात कर रहे थे कि जो सरकार के फ्लैगशिप कार्यक्रम हैं, सरकार के जो आर्थिक सुधार के कार्यक्रम हैं, उनका कितना क्रियान्वयन हो रहा है। मैं कहना चाहूंगा कि माननीय वित्त मंत्री जी ने जो सिफारिश की है कि एक इंडिपेंडेंट इवेल्यूएशन ऑफिस डिप्टी चेयरमैन प्लानिंग कमीशन के तहत होना चाहिए, वह बहुत ही सराहनीय है, क्योंकि आज इस बात की जरूरत है कि जो पैसा केन्द्र से भेजा जाता है, वह राज्य सरकारें किस प्रकार खर्च रही हैं, क्या वह लोगों तक पहुंच रहा है, उसकी एक स्वतंत्र ऑडिट की सख्त आवश्यकता है। इसके साथ-साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि नेशनल मिशन फॉर डिलीवरी ऑफ जस्टिस एंड लीगल रिफोर्म की जो पहल सरकार ने की है जिसमें पांच हजार करोड़ रुपया प्लानिंग कमीशन ने दिया है, यह बहुत सराहनीय है।

          उपाध्यक्ष महोदय, कल मैं जीरो-आवर में कह रहा था, एक न्यायाधीश के हवाले से खबर छपी थी कि इस देश में जो बकाया मामले हैं, उन्हें निपटाने में 320 साल लगेंगे।

          महोदय, अगर ऐसी खबरें न्यायाधीश के माध्यम से अखबारों में छपें, तो मैं यही कह सकता हूं कि मुल्क का, कौम का इतना भी न मयार गिरे कि सुर्खियां देख कर हाथ से अखबार गिरे।  I welcome this initiative of the Government to give Rs. 5000 crore for speeding up the process of justice. मैं अपनी बात समाप्त करने से पहले सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि the Finance Minister has delivered on all counts.  If this Budget is evaluated on a paradigm of four ‘C’s that is consolidation of recovery, cushioning of social vulnerability, creating infrastructure, and collecting revenue, this Budget comes out absolutely at the top. इन शब्दों के साथ मैं इस बजट का समर्थन करता हूं।

 

*श्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण (साबरकांठा)ः माननीय वित्त मंत्री जी ने जो बजट पेश किया है वो महंगाई बढ़ाने वाले हैं।  गत सालों से महंगाई पर कोई काबू नहीं था इसके लिए सरकार ने अनेक बहाने बनायें हैं, परन्तु इस बजट में भी महंगाई को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किये हैं और ऊपर से महंगाई वाला बजट देश को दिया है जो देश की जनता की पीठ में कील ठोकने का काम किया है।  लोगों को 26000 करोड़ का फायदा देकर 46500 करोड़ का बोझ डालने का काम किया है।

Rome was burning, Nero was fidlling

          अध्यक्ष जी देश में सिंचाई एवं पेयजल के स्त्रोत में कई पारंपरिक जल स्त्रोत है जिस पर सरकार कोई विशेष ध्यान नहीं दे रही है।  देश में औसत वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 1869 बिलियन घन मीटर है और उसमें से हम केवल 1123 बिलियन घन मीटर का उपयोग कर रहे हैं क्योंकि हमारे कई पुराने डैम एवं जलाशय जर्जरित हालत में है।  सरकार ने ग्यारहवीं योजना में 10,000 करोड़ धनराशि का प्रावधान किया है परन्तु उस पर अभी तक केवल 25 प्रतिशत भी खर्च नहीं हुआ है जिससे यह पता लगता है कि हमारे डैम एवं जलाशय की मरम्मत कार्य सही ढंग से नहीं हो रहा है जिसके कारण जल संरक्षण की समस्या बढ़ती जा रही है।  यह बजट सिंचाई सुविधाएं दिलाने के मामले में खरा नहीं उतरा है।

          अध्यक्ष जी अभी भी देश के कई राज्यों में कई जगह पर इन वनवासियों को वन भूमि से खदेड़ने का सिलसिला चल रहा है।  वनवासियों की पिटाई, गिरफ्तारी उनके खिलाफ झूठे मुकदमें दर्ज करने एवं बिना बताये उनको बंदी बनाना के मामले आये दिन आते रहते हैं। उन पर आरोप लगाया जाता है कि वह वनों को काटते हैं, खानों से खनिजों की चोरी करते हैं।  परन्तु देश में आज का पर्यावरण आदिवासी के कारण कायम है।  वह लोग एक पेड़ काटते हैं तो दो पेड़ लगाते हैं और इन पेड़ों को अपने बच्चों से ज्यादा प्यार से पालते हैं एवं जंगलों की रक्षा करने का काम वन अधिकारियों से जयादा करते हैं, परन्तु आज तक वन अधिकारियों के गुमराह किए जाने के बाद पर्यावरण की रक्षा में आदिवासियों का कभी सहयोग नहीं लिया, यह बड़ा खेदजनक है।  विश्व आज ग्लोबल वार्मिंग से डरा हुआ है, अगर आदिवासी से प्राकृतिक प्रेम का पाठ सीखा होता तो आज ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति नहीं आती है।  पर्यावरण को कायम रखना एवं प्रकृति का अनुकूल स्थिति में लाभ उठाने की कला आदिवासी से ज्यादा कोई नहीं जानता।  इन बातों को ध्यान में नहीं रखा गया है और आदिवासी कल्याण के लिए सरकार ने कोई विशेष कदम नहीं उठाये हैं जिससे लगता है कि देश में आदिवासी लोग नहीं रहते हैं।  

          सरकारी आंकड़े देखने से पता चलता है कि किसानों एवं खेतीहर मजदूरों की संख्या बढ़ रही है यानि हमारी निर्भरता कृषि पर बढ़ रही है।  कृषि में गरीबी भी है, सरकार के पास इसके आंकड़े नहीं है, हमारी सिंचाई योजना बहुत देरी से चल रही है।  कृषि विकास सरकार कहती है 4 प्रतिशत करना, पर हो रहा है केवल डेढ़ प्रतिशत से कम।  कृषि निवेश पर धन खर्च कम हो रहा है तो कैसे कृषि विकास होगा।  भारत में कृषि विकास बहुत कुछ सिंचाई पर निर्भर है।  कृषि विकास के लिए कई प्रावधान किए गए हैं परन्तु किसानों तक यह पहुंचेंगे या नहीं यह तो समय ही बताएगा।

          देश में आज 20 प्रतिशत की आबादी आदिवासी लोगों की है जो जंगलों में वास करते हैं। वहां केन्द्र की कोई योजना पहुंचती नहीं है।  अगर पहुंच भी गई तो केवल लिखा-पढ़ी हो जाती है, फायदा लोगों को नहीं मिल पाता है।  आज भी यह नादान लोग केन्द्रीय योजना के लाभ से वंचित हैं। अनुसूचित जाति के लिए कई योजनाओं का जिक्र किया है।  हालांकि इन योजनाओं का लाभ उन्हें मिलेगा या नहीं यह तो समय ही बताएगा।

           शिक्षा को आदिवासी इलाकों में देखा जाये तो लगता है कि केवल पैसों की बर्बादी है।  आदिवासी क्षेत्रों में तकनीकी संस्थान एवं अन्य विश्वविद्यालय देखने को नहीं मिलते है जिसके कारण आदिवासी लोगों को अगर पढ़ना हो तो उन्हें शहरों में आना पड़ेगा।

          देश में कृषि विकास दर कम होती जा रही है।  आज यह दर 1.9 प्रतिशत है एवं देश के 64 से ज्यादा प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर है।  जब तक गांव एवं किसान का विकास नहीं होगा तब तक देश का विकास भी नहीं होगा। देश में कुछ उद्योगों को लाभ पहुंचाने के लिए उदारवादी नीति अपनायी जा रही है जिससे देश के छोटे उद्योग, कुटीर उद्योग, ग्रामीण उद्योग बन्द हो रहे हैं।

          देश में जो उद्योग बड़े तेजी के साथ बढ़े हैं एक रियेल इस्टेट, दूसरा खनिज उद्योग जिस पर माफिया का कब्जा है।  खनिज सम्पदा को जिस तरह से निचोड़ा जा रहा है और इन खनिज सम्पदा का अन्य देशों को निर्यात किया जा रहा है परन्तु इन खनिज सम्पदा के पास रहने वाले आदिवासी एवं जनजातियों के विकास पर गौर नहीं किया जा रहा है उनका भी शोषण हो रहा है। वहां पर सड़क बनाने की बातें की जाती है एवं सिंचाई साधन तैयार कर नहरों से आदिवासी के खेतों को सीचने की बात आती है तो देश का रिजर्व फोरेस्ट आगे आ जाता है और कहा जाता है कि इन कार्यों से वनों को क्षति होगी।  जब वनों में एवं रिजर्व फोरेस्ट में कोई कम्पनी स्थापित करने में वन कानूनों एवं फोरेस्ट रिजर्व कानूनों को परे कर दिया जाता है।  देश के उद्योग धंधे की क्या दशा है।  देश के परम्परागत उद्योग जिन पर भारत विश्व में नाज करता था वह लगभग समाप्त हो गय हैं।  गुजरात का पटोला, जयपूरी, बनारसी एवं गुजराती साडिया, भागलपुर का सिल्क कपड़ा, पंजाब के गर्म कपड़े, इत्यादि उद्योग बंद होते जा रहे हैं।  देश में जो पर वन सम्पदा है वहां पर कागज उद्योग की काफी संभावनाएं हैं फिर भी हम कागज विदेशों से मंगवा रहे हैं।

          देश के विकास के लिए जिन बुनियादी बातों की जरूरत है उन बातों को बजट में नजरंदाज किया गया है।  लगता है कि वित्त मंत्री जी को विश्व मंदी का डर लग रहा हो।  विदेशों में व्याप्त मंदी से जो भारतीय बेरोजगारी की चपेट में आ गये हैं और भारत में कई लाख बेरोजगार हो गये हैं उनके लिए मंत्री जी का बजट चुप है।  आज भी देश में कुपोषित महिलाओं का प्रतिशत बढ़कर 58 प्रतिशत हो गया है तथा कमजोर बच्चों की संख्या बढ़कर 40 प्रतिशत हो गयी है।

          देश में कितना निचोड़ा गया है, कितना भ्रष्टाचार हुआ है यह इस बात से पता लगता है कि अंतर्राष्ट्रीय कर मुक्त बैंकों में 72 लाख करोड़ रुपया पड़ा हुआ है, अगर देश विकास करना है तो इस 72 लाख करोड़ रुपए को लाकर देश विकास में लगाया जाए।  हमारी पार्टी लगातार मांग कर रही है यह पैसा किसका जमा है और कब से जमा है, पर सरकार इस पर चुप है।  कहीं न कहीं दाल में काला तो है तभी सरकार चुप है।

 कृषि विकास की उपेक्षा यू.पी.ए. सरकार द्वारा फिर की गयी है।  अगर कृषि का विकास होगा तो पूरे देश का सर्वांगीण विकास होगा।  सीरिज आफ चैकडेम या बोरीबंद जो करवाना पड़े एवं इसमें आने वाले खर्चे को आवश्यकता के हिसाब से खर्च करेगी तो बहुत सी समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा क्योंकि 62 प्रतिशत से ज्यादा लोग खेती पर निर्भर हैं।  इसलिए मेरा सुझाव है कि हर खेती को पानी इस सूत्र को महत्व दिया जाए।  सरकार नरेगा या मनरेगा में कितना भी खर्च करे कोई फायदा होने वाला नहीं है।  अगर इतना ही पैसा सिंचाई के लिए खर्च किया जाएगा तो देश के ज्यादातर प्रश्न हल हो जायेंगे।  किसान को उनके खेत में पानी उपलब्ध करवाय जाये।  इसके लिए नदियों को जोड़ने की आवश्यकता है।  अपने आप हर हाथ को काम मिल जाएगा।  फिर नरेगा की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।  फिर देश में खाद्यान्न की कमी भी नहीं होगी।  महंगाई और गरीबी के ऊपर काबू पाया जा सकेगा एवं देश का सर्वांगीण विकास भी होगा।

 

 

 

 

 

 

SHRIMATI HARSIMRAT KAUR BADAL (BHATINDA): Mr. Deputy-Speaker, Sir, in these liberating times, the present Budget also seems to have taken advantage of this liberation and liberated itself from this professed commitment towards the plight of the aam aadmi.  The Budget has not cared to address the important issues of price rise, of increasing the purchasing capacity of the poor.  It is silent on the food security of the country, and restoring the required balance between the Centre and the State relations. 

          Although the Finance Minister’s Budget has recognized the need for providing food security, more resources, education and health, the same does not seem to have translated into his Budget.  There are three goals mentioned in his speech; they are to restore the 9 per cent growth rate, to make development more inclusive, and to improve the weakness in Government systems.  I am sure if these goals were transformed into deeds with a compassionate view to the genuine problems faced by the States, these targets could easily be achieved.  But, unfortunately, the implementation to achieve the effectiveness is lost somewhere in the rigidity of the rules laid down. 

          If we talk about the growth rate, it is a fact that despite whatever the growth rate has been, the benefits of the growth are not reaching a large section of the poor in our country.  The divide between the rich and the poor is so massive that sixty years of planned development has not even managed to give all our people the basic needs of education, health, employment, and even drinking water. One-third of our country still lives below poverty line earning Rs. 20 a day.  The priority of the growth strategy needs to be the focus between reducing the disparity among States, rural and urban, rich and poor, and ensuring equal growth across the entire spectrum of the country.  This can only be done if we realize the different levels of development between the States, decentralize the rigid stand in the planning process, and allow the States who has a better understanding of their requirements and their specific needs to have more of a say in this planning process, rather than having the same thumb rule and imposing it from the top. 

          Before I go into the second and the third challenges mentioned by the hon. Finance Minister, I would like to mention the scenario of my State, Punjab.  Till 1986, Punjab was a revenue surplus State with a debt burden of 26 per cent of its GSDP.  We then went through a period of militancy and terrorism which saw thousands of innocent lives being lost and the longest President’s Rule in the entire country besides Jammu and Kashmir. In these nine long years of President’s Rule, the Central Government ran the Punjab administration with a policy of high expenditure and no raise in taxes.  They plugged this huge deficit by taking special term loans from the Centre. From then onwards, this road towards taking loans from the Centre spiraled into such a debt trap for the State that year after year the loan kept multiplying due to the unsustainability of the loan and no raise of taxes.  As a result the State which was revenue surplus, 26 per cent debt burden before the President’s Rule had within nine years reached to a debt burden of 40 per cent of the GSDP.  Today this debt burden has multiplied and reached a whopping figure of Rs. 62,000 crore.

          Just the interest liability on this debt is Rs. 5,500 crore.  The total taxes that my State collects is Rs.12,000 crore.  From our share of the Central taxes and against schemes of the Centre, we receive another Rs. 4,600 crore.  This only equals to an approximate amount of Rs.16,600 crore.  But, Sir, look at the expenses.  The interest on the loan alone is Rs.5,600 crore, and the salaries, according to the new Pay Commission, is another Rs.12,000 crore. So, just paying our salaries and the debt, the State does not have any more funds to do anything else. 

          To sustain ourselves for all other committed expenses, we have to borrow every year from the Central Government, and as the debt interest multiplies each year, even our borrowing has to consequently keep increasing every year.  This debt trap leaves the State with no money for any kind of development projects, leave alone hire thousands of teachers, doctors and police personnel needed for providing good governance or upgrading schools and hospitals or building new roads.  Everything is at a standstill because of our financial resources.  I would humbly submit to the Centre that the State is not in any kind of position to repay the loan.  Today, the interest level has become what the original debt was. Surely the Centre should either give a waiver of the loan or if nothing else, stop the interest payment and restructure the debt loan so that this crippled economy can be put into some kind of semblance before it collapses under the weight of its own debt, which will not only play havoc with the thousands of lives in Punjab but also with the entire food security of this whole country.

          Sir, as you know, the growth in food production, at present, is not parallel to what our population is.  Our population is growing at such a large pace that every seventh human being in the whole world is an Indian.  Punjab, which is only two per cent of the entire geographic area of the country, provides 50 per cent of the food security to this country. 

          If we take a scenario, in the last year of drought, if Punjab had not saved its crop and provided 50 per cent of food security, this country would have been facing a crisis today; we would have had to import food from abroad even at higher rates.  To feed this large Indian population if food was imported there would have been food crisis in the whole world, not just in our country.  So, we must not undermine the importance of what this State is providing in terms of food security to our country.

          Sir, last year when the entire country faced drought, Punjab faced the maximum 65 per cent less rainfall.  But despite the shortage of rain, the Punjab Government pulled out all its resources from its meagre financial resources and put in Rs.1420 crore to buy additional power to give to the agricultural sector.  The debt-ridden farmer took all kinds of loan against his crop and worked hard collectively with the Punjab Government. The farmer purchased gen-sets, deepened his tube wells, purchased diesel and put in all his resources to save his crop. I am proud to say, Sir, … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Madam, please conclude now.

SHRIMATI HARSIMRAT KAUR BADAL : I am the only person representing the Party.  This is very important for my State, and that is why I request you to give me five more minutes.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Every point is important.

SHRIMATI HARSIMRAT KAUR BADAL : Sir, this is for the first time we are pointing out about the Punjab’s financial crisis.  This is very important.  The Central Government should recognize this and help us out in this. So, I would request you to give me some more time.

          Sir, we have put in Rs.1460 crore.  The farmers took in loans and saved the crop. It is due to Punjab’s input today that we are still in a position that we do not have to import the food crop and we produced the same amount of food that we had produced the year before in spite of the maximum drought in Punjab. 

          Sir, in the bargain what has happened?  Our ground water became so less.  Experts are saying that what we have lost in this drought is, Punjab, after 50 years, might become a desert.  NASA is a great Mission in America. They say that the situation is critical in Punjab, according to their last year’s Report. But, Sir, producing of these crops year after year has depleted our natural resources of soil and water. Added to all this, Sir, as you know, in farming, all the costs of input are decided by the Centre.  MSP is also decided by the Centre.  The weather gods will decide the weather and the rain. So, the life of a farmer has become dependent on a whole lot of forces for his livelihood.

What is the result of that?  Today, there is a huge difference between the Minimum Support Price (MSP) and the Maximum Retail Price (MRP).  Sometimes, there is a 100 per cent to 500 per cent difference between the MSP and the MRP.  The farmer is not even getting  his due share  for his crop.  This is the reason that the farmers all over the country are coming into a debt trap.

          If I talk about the farmers of Punjab, in the last 10 years, the debt burden of the farmers of Punjab has risen by five times. Today, 72 per cent of the farmers in Punjab are under debt.  Out of this 72 per cent, 17 per cent  cannot even pay the interest according to the Annual, from the current income. Sixty per cent of all these farmers are small and marginal farmers.              

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude now.

SHRIMATI HARSIMRAT KAUR BADAL : Sir,  I ask for just five minutes more.

          The Central Government gave a relief package.  Ours is the State, which gives the maximum, 50 per cent to the food grain. Out of this relief package of Rs.71,000 crore, do you know as to how much Punjab got? Punjab got  just 1.5 per cent of Rs. 71,000 core. पंजाब को सिर्फ 1.5 प्रतिशत मिला। जो देश को पचास फीसदी अन्न देता है, देश का पेट भरता है, क्या उसका हक सिर्फ 1.5 परसैन्ट होता है? जब सबको सैंट्रल गवर्नमैन्ट के द्वारा रिलीफ फंड दिया गया, जहां सबसे कम बारिश हुई, उस स्टेट को ड्राउट हिट घोषित नहीं किया गया। हमें ड्राउट हिट घोषित नहीं किया गया। सरकार कहती है कि ड्राउट हिट वह होता है, जहां फसल बचती नहीं है। पंजाब सरकार ने अपनी बिजली खरीदकर, फार्मर्स ने अपने पैसे डालकर अपनी फसल को बचा लिया, देश का पेट भरने के लिए अन्न दिया तो आज हमें उसका नुकसान भुगतना पड़ रहा है just because we saved our crop.  What kind of reasoning is this? Look at the irony.  On the one side, the hon. Prime Minister also acknowledged our efforts and praised us; and the Agriculture Minister also lauded our efforts for what Punjab’s input was and on the other side, the Finance Minister said, something will be done for Punjab. Instead of being appreciated or given concessions for our losses हमें तो कुछ मिला नहीं, लेकिन हर एक चीज में हमारे साथ डिस्क्रिमिनेशन होता है। पंजाब की एग्रीकल्चर के बारे में मैंने आपको बता दिया। आज हमारे नेबरिंग स्टेट्स को टैक्स होलीडेज कंसैशंस दिये जा रहे हैं। आप यह देखें कि हमारी नेबरिंग स्टेट्स को टैक्स कंसैशंस मिल रहे हैं, यह जानकर पंजाब से 250 इंडस्ट्रीज उठकर दूसरी स्टेट्स में चली गई हैं। इस तरह से हमें 3600 करोड़ का नुकसान हुआ और हजारों लोगों की नौकरियां चली गई हैं। आप मुझे बतायें कि सैंट्रल टैक्सेज के डिवोल्यूशन में भी हमें नुकसान होता है, क्योंकि पंजाब को डैवलप्ड कहा जाता है। डैवलप्ड इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जितनी चीजें होती हैं, पंजाब में स्कूलों के लिए, अस्पतालों के लिए और सड़कों के लिए स्टेट ने अपने एफर्ट्स से पहले काम किया है। लेकिन इस चीज को नहीं देखा जाता कि आज हिंदुस्तान की सबसे ज्यादा शेडय़ूल्ड कास्ट्स पापुलेशन 29 परसैन्ट पंजाब में रहती है और इन गरीबों में इतनी गरीबी है कि इनके पास न रहने के लिए मकान है, न नौकरियां हैं, न उन्हें ठीक से खाना मिलता है। दो समय की सख्त मजदूरी करके आज इस सरकार की दी हुई महंगाई के कारण दो समय की रोटी के स्थान पर एक समय की रोटी अपने बच्चों को खिलाकर खुद खाली पेट सोते हैं और यह सरकार कहती है कि पंजाब डैवलप्ड स्टेट है। मैं कहना चाहती हूं कि सड़कों और स्कूलों आंकड़ों से डैवलपमैन्ट नहीं माना जाता, डैवलपमैन्ट वह होता है, जिस देश में, जिस स्टेट में कोई भूखे पेट न सोता हो। इस तरह से हर एक चीज में हमारे डिस्क्रिमिनेशन किया जाता है। केन्द्र सरकार की सारी फ्लैगशिप स्कीमों के बारे में मैं मैन्शन करना चाहूंगी, क्योंकि यहां पर जो लोग बैठे हुए हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि सैन्ट्रल गवर्नमैन्ट की जो भी फ्लैगशिप स्कीम्स हैं, आप सर्व शिक्षा अभियान को ले लीजिए, एजूकेशन में पंजाब ने अपने हर एक गांव में पहले से स्कूल बना लिया था। यह कहते हैं कि इस स्कीम का आप इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं, यह तो स्कूल बनाने के लिए है। हमारे स्कूलों में जब टीचर्स ही नहीं हैं तो वे स्कूल किसी काम के नहीं हैं। हम कहते हैं कि हमें टीचरों की सैलरी के लिए पैसे दे दो, वे कहते हैं कि यह नहीं हो सकता।

          महोदय, रूरल इर्रिगेशन के बारे में आरकेवीवाई स्कीम में पंजाब ने करीब डेढ़ सौ साल पहले अपना इर्रिगेशन नैटवर्क बनाया था। लेकिन वह इर्रिगेशन नैटवर्क आज इतना खराब हो चुका है कि इसके रीवैम्पिंग की सख्त जरूरत है। हम कहते हैं कि हमें इसमें पैसे डाल लेने दो, कहते हैं कि इसमें नहीं डाल सकते, यह सिर्फ नई बनाने के लिए है। प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना की यदि बात करें तो इसमें भी हमारे पास घाटा है. क्योंकि हमने अपनी सड़कें पहले से बनाई थीं। मेन्टिनेन्स के लिए …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : श्री प्रबोध पांडा, आप बोलिये।

श्रीमती हरसिमरत कौर बादल :  सर, केवल दो मिनट में मैं अपनी बात समाप्त कर रही हूं।

उपाध्यक्ष महोदय : आप दो मिनट बोल चुकी हैं, अब आपकी बात समाप्त हो गई है। दो मिनट इतने लम्बे नहीं होते हैं। I have given you enough time.

SHRIMATI HARSIMRAT KAUR BADAL :  Sir, I am just concluding. I will only conclude to say that our State is being discriminated on every sphere.  If efficient investment is not made in Agriculture, in rural areas and social development, ह्यूमैन रिसोर्स जो हमारा मेन असैट है, वह हमारी सबसे बड़ी लॉयबिलिटी बन जायेगी।

14.00 hrs.

          If States like Punjab are not taken care of यह डिसक्रिमिनेशन पंजाब के साथ जब तक बंद नहीं होती तो जिस थाली में आप खाते हैं, अगर उसमें छेद करेंगे, तो  अकेले पंजाब का नुकसान नहीं, इससे सारे देश का नुकसान होगा।  मैं उम्मीद करती हूं कि  सरकार इसकी तरफ ध्यान देगी।

                   

 

SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Sir, I am just coming from a huge rally where lakhs of people coming from all parts of the country joined the programme. Lakhs of people are coming and protesting this sort of anti-people Budget. They are demanding to have a proper control over price hike. They are demanding to solve the problem so far as the farmers’ plight is concerned. They are demanding to ensure job security in our country. These are the main problems but this Budget could not even touch upon or could not address properly the main problems of our country.

          It is rightly said by our Finance Minister that Budget cannot be a mere statement of Government accounts. It has to reflect the Government’s vision and signal the policy to come in future. So, the question of policy and vision is involved.

          So far as the UPA-I is concerned, there was one Common Minimum Programme. With the Left supported from outside, the UPA-I was ruling based on the Common Minimum Programme. That was the binding. When they wanted to step over this binding, to cross this lakshmanrekha, we withdrew our support to the UPA-I. But now the UPA-II is there. It is a combination but there is no Common Minimum Programme. The supporting parties are nothing but to toe the line of the Congress and the policy and vision of the Congress. They are hankering over the Ministerial berths, and nothing more than that. So, the question is, what is the policy and what is the vision of the UPA-II Government?

          It is clear that the policy is to owe the affluent sections of our country, the high salaried persons of our country, to give more relief to the corporate sector while rhetorically using some profound words like aam aadmi yojana and all those things but not addressing the basic problems of the 70 per cent of our population, the down strata of our country and not doing anything to save the peasants.

          What is the vision? It is clear that the vision is to lead the nation vigorously on the line of neo-liberalism. It is talked about to achieve a growth rate target of 7.2 per cent. They are assuming that it may rise to nine per cent in the last quarter of this year, and maybe, to the double digit next year.  But only increasing the figure does not feed the poor people of our country.

          What is the situation of our country? There is suicide by farmers. More than 20 lakh farmers are committing suicide. It has not yet been arrested. It is continuing, and it is mostly in the State where from our Agriculture Minister comes. In a State like Andhra Pradesh, what is situation now-a-days? About 50 lakh workers have been thrown out from their jobs. What is the situation of our country?

          Now, food inflation is touching 20 per cent and it is even more than that. But these problems have not been addressed so far. Stimulus package is talked about.

          To whom was this stimulus package meant? I am narrating some points mentioning about some points which are already there in the Budget itself. Firstly, you are broadening the tax slabs. Are you talking about the aam aadmi? Do those who are drawing more than Rs. 25,000 as monthly income and more than that belong to aam aadmi category? Are you addressing them? You are thinking of those who have a salary of more than Rs. 8 lakh per year. Your proposal of broadening the tax slabs is for them who save not less than Rs. 50,000 per year. This is your stimulus package. To whom it is meant for? More cannot be said on it.

          You said of deduction of tax on investment of Rs. 20,000. It is not investment by the panchayats, not by the State sectors but it is investment by the individuals, investment by the private parties. You are reducing surcharges from 10 to 5 per cent. You are giving one-time interim relief for real estate and it is extended from four years to five years. The exemption of audited accounts up to Rs. four lakh was there; now it is extended up to Rs. 60 lakh. There is no restriction for charitable functions. It was restricted to trade and business purposes earlier. Now it has been exempted up to Rs. 10 lakh. Not only that but what is going on in the other sectors?

          The proposal is that the Foreign Direct Investment (FDI) will be enhanced to 49 per cent. Are you going to build the nation by FDI? What about the investment? The main method or the main tendency of development of our country should be more investment and more production in both agriculture and in industry. But is it that it is depending on the Foreign Direct Investment? There is a proposal by you to enhance the Foreign Direct Investment up to 49 per cent.

          It is said about other sources so far as the receipts are concerned. It is proposed to get Rs. 40,000 crore from other sources. Which is this other source? The other source is the disinvestment. From the Congress Benches you were earlier criticising the NDA. It is correct, it was the NDA which has set up a Ministry for Disinvestment and they have clearly stood for the disinvestment. But you have demolished that Ministry of Disinvestment.  But even then you are encouraging the disinvestment policy vigorously and now you have proposed to gather Rs. 40,000 crore from that source.

          On the other hand, what are you doing for the have-nots, for the poor people? … (Interruptions) Sir, I am concluding. I will take three more minutes and not more than that.

          What is the attitude towards 70 per cent of the population? What is the attitude towards the have-nots? You have told about debt-waiver programme. You said about debt relief scheme of Rs. 71,000 crore. Who got the benefit? The farmers who did not get a single rupee for ten years, did not get a single paise or a single rupee under this programme. It helped to clear the bank balances and it helped to clear the NPA. Even some hon. Member in this House today has already mentioned it rightly that after the implementation of the debt waiver schemes the farmers are not getting the loans from the respected banks.

 

          Whatever is proposed to be given as compensation, that has been getting adjusted for the loans given in the subsequent days. We have been told about the Minimum Support Price also. What is the proposal of the National Commission on Farmers, which is popularly known as Dr. M.S. Swaminathan Commission? Its report says that the formula for arriving at the Minimum Support Price should be C2 plus 50 per cent, that is, total cost of production with 50 per cent profit. That is not being implemented so far. The proposal is that there should not be more than four per cent rate of interest for rural credit for agricultural produce. It is not being implemented so far.

          What is happening in the fertiliser sector? Already the price of urea has been enhanced by Rs. 10 per kilogram. Now a new formula has come about the nutrient-based fertiliser subsidy. How is it to be implemented? What is the mechanism for soil testing? How will the 65 per cent of the farmers, who are poor and marginal farmers, know the nutritional base of their soil and the nutritional substances lacking in the soil of their lands? This is not clear.

          Then, food subsidy is already reduced. The prices of petrol and diesel have already been hiked. Even there are hints that in the coming days, the recommendations of the Kirit Parekh Committee can be encouraged and followed. So, nothing has been said about the price rise, which is the most important thing now-a-days.  In regard to food distribution, nothing has been done about universalising the PDS. We request this Government to introduce universal PDS. Even the forward marketing is not yet stopped. So far as wheat is concerned, it is not being exempted from forward marketing.

          Let me conclude with these words that this Budget is nothing but a step towards following new policy of liberalisation in a vigorous manner. It is not addressing the credit problems of 70 per cent of our people, particularly, the poor and marginal farmers who are sharecroppers and work on large-scale. They did not bother to address their problems. So, this Budget is anti-people; this Budget is pro-corporate sector; and this Budget will not help to make our country progress. That is why, I strongly oppose this Budget.

          I conclude with these words.

 

 

*SHRI JOSE K. MANI (KOTTAYAM) : Madam Speaker, the Budget presented by the Hon. Finance Minister for 2010-2011 is really growth oriented and the Hon. Finance Minister has to be congratulated for the efficient management of the economy inspite of the challenges of the global economic crisis. It is gratifying to note that we have been able to achieve 7.2% of the GDP in this year and we will have an economic growth of 8.75% during 2010-2011 and 9% of the GDP in 2012.  This shows that a double digit growth is possible within the next 3 years.  The gross domestic savings of 32.5% of GDP & the gross domestic capital formation of 34.9% in the previous year shows that ours is a growing economy.  It is really marvelous that the Hon. Finance Minister has been able to and the current year with a gross fiscal deficit of 6.5% and the next year by 5.5% of the GDP.  This will be a wonderful performance to be acknowledged.

          The most important factor is the renewed momentums in the manufacturing sector.  The growth rate in manufacturing sector in December 2009 is reported as 18.5% the highest in the past 2 decades.

          It is remarkable that the Foreign Direct Investment (FDI) inflows to the country have been steady in spite of  the decline  in global capital flows as indicated in the budget speech.  This shows the confidence  reposed by the international business community in the strength of the Indian economy.

          After successful managing the effects of the global slowdown the efforts taken by the Government for fiscal consolidation is commendable.  The 13th Finance Commission has recommended to the gap of total debt of the center and the states at 68% of the GDP.  The statement of the Hon. Finance Minister that a road map will be presented with in 6 months  for curtailing the overall public debt as part of the fiscal consolidation is a welcome measure.

          The assurance of the Finance Minister that the old Security Bill will be introduced very soon is revolutionary step towards inclusive development.  The budgetary measure to expand the  availability of rural credit to the farmers by raising the target from 3,25,000 crores to 3,75,000 crores and the  extension of the period for  repayment of the  agricultural loans by farmers under the debt relief scheme and the interest subvention of 2% for timely repayment of the short  term crop loans are really commendable/

          However, it is regrettable to note that the agricultural growth has declined to (-) 0.2% in 2009-2010 as revealed by the Economic Survey of India inspite of the fact that public investment in Agriculture has registered an increase.  The Agricultural growth is negative.  We have to address this paradox otherwise the much clamored inclusive growth will remain as a fiction.  So also the share of agriculture and allied sectors in GDP at factor cost has declined gradually from 18.9% in 2004-2005 to 14.6% in 2009-2010.  This is really a matter of concern.  Special investment programs for modernization of agriculture by absorbing latest technology for improving the productivity and for value addition and diversification of an agricultural product have to be ensured.

Lack of access to low-cost funds

: At present, farmers get bank loans that carry interest rates of 7 to 8 per cent and above.  Though this Government  has announced a one per cent interest subvention and another one per cent more of interest subvention for those farmers paying their dues on time, the hard fact is that farmers  are unable to get cheap funds.  And unless these farmers are able to get cheap funds, they cannot hope to operate profitably and contribute to the economic growth.  As India faces a negative rate of growth in the agricultural sector, it becomes imminent for this government to firm up policies that will foster agricultural growth.  I request this government to extend loans that carry interest rates of 3 to 4 per cent per annum to the farmers to help them operate profitably.

          Integrate linkages between agriculture and industrial sectors :  The Hon. President has highlighted the need to integrate the linkages between agriculture and industrial sectors.  Unless the agricultural produce is brought to the market with minimum intermediary expenses and interference, farmers cannot be expected to make maximum gains.  Most of the gains are cornered by the intermediaries.  I urge this government to firm up policies that will encourage and streamline procedures to take the farm products directly to the industry and the end-consumers so that:

i.                Raw material costs for the industry are kept at the minimum possible, and

ii.              End-consumers are able to get agricultural produce at low rates.

This will have a significant benefit for the industry by way of keeping inflation under control. When raw material costs for industry are kept under control, it will keep the inflation of manufactured goods under control.  And when food prices are kept under control, it will keep food inflation under control. Food inflation is now  above the 17 per  cent rate and is a cause for worry for the government.  It is imperative that steps be taken to control this menace that could otherwise derail India’s economic growth.

          Madam Speaker,

          Let me cut short what the agricultural community wants is credit at a lower interest rate and an assured remunerative price for their commodities.  If these two needs can be satisfied they will  give you back greater return to the GDP.

 

 

*श्री नारनभाई कछाड़िया (अमरेली)ः  मैं आपके माध्यम से इस सदन के सभी सांसदों के समक्ष यह कहना चाहूंगा कि जो इस बात वित्तीय बजट पेश किया गया उसमें गुजरात समेत अन्य राज्यों के किसानों के साथ सीधा रुखा व्यवहार किया है।

          मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि हमारा देश जिसके नाम से प्रसिद्ध है जिसने हमारे देश की शान को बनाए रखा है, जिस पर हमारे देश कि तीन-चौथाई जनता का रोजी-रोटी चलता है, उसी को नजरअंदाज किया जाना या बेदखल किया जाना यह देश के हित के विरुद्ध है।

           यदि इस तरह से ऐसा चलता रहा तो एक दिन ऐसा आएगा की किसान धीरे-धीरे खेती को छोड़कर शहर की ओर पलायन करेंगे और जब शहर की ओर पलायन करेंगे तो देश में अनाज की उत्पादन क्षमता कम होगी और शहर में भी गरीबी की स्थिति होगी और जब लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिलेगी, जब देश में लोग भूखे मरेंगे तो उस समय सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित होगा और उस समय सरकार बजट का अधिकांश भाग अनाज को आयात करने में लगाना पड़ेगा।

           मैं इस बजट का विरोध करते हुए यह कहना चाहता हूं कि यह सरकार की नीति जन-विरोधी है, किसान-विरोधी है।  शायद सरकार यह नहीं चाहती कि हमारा देश निर्यातित देश बने।  यही कारण है कि एन.डी.ए. की सरकार जाने के बाद हमारे देश में खाद्य भंडारण में भारी मात्रा में कमी आयी है जिसका खामियाजा सारे देश की जनता को भुगतना पड़ रहा है और महंगाई की आग में लोग जल रहे हैं।  महोदया जी, जिस रफ्तार से चीनी की कीमत में वृद्धि की गयी है उस रफ्तार मे सरकार के आयातित चीनी के आने पर मूल्य में गिरावट क्यों नहीं हुआ?  और इस बार बजट के तुरन्त बाद में पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में वृद्धि भी हुई और यदि सिंचाई की बात करें जो पूरे देश की किसानों की निर्भरता है उस पर केवल 370 करोड़ आवंटित की गयी है।  महोदया जी, सरकार की इस जन-विराधी, किसान-विरोधी नीति से यह साफ स्पष्ट होता है कि हमारे छोटे-छोटे किसान भाईयों की भागीदारी को सरकार ने छीन लिया है और सरकार उन मंत्रालयों के पीछे ज्यादा धन आवंटित कर रही है जहां से वोट बैंक को सुरक्षित किया जा सके।

           यदि हम शिक्षा की बात करे जिनके माध्यम से देश को आगे ले जाना है उसमें भी देश के विद्यार्थियों को निराशा की ही झलक दिखायी दे रही है।  हमारे देश में पढ़ाई तो पहले से इतनी महंगी है और अब विद्यार्थियों को मिलने वाला कर्ज भी महंगा होने वाला है। आज हमारे देश की शिक्षा पद्धति इतनी गिर गयी है जो बच्चा अपने 15 साल का बहुमूल्य समय पढ़ाई में देता है पर उसे एक किरानी क्लर्क की नौकरी तक नहीं मिलती है और आज जो बच्चों की फीस स्कूलों में निश्चित की गयी है वह इतनी अधिक है कि आम आदमी का बच्चा सामान्य निजी विद्यालयों में पढ़ाई नहीं कर सकता और सरकार ने कभी आम आदमी के बच्चे को अच्छी शिक्षा के लिए कोई रियायत सब्सिडी सीधा-सीधा उन नन्हें बच्चों की शिक्षा में दी जाने वाली फीस पर क्यों नहीं दी है?

          शिक्षा पद्धति में आज के जरूरत के अनुसार से तकनीकी शिक्षा अथवा हमारी जरूरत के अनुसार बदलाव की आवश्यकता है।  हर विद्यार्थी कम से कम एक वर्ष की तकनीकी शिक्षा अथवा मैनेजमेंट से जुड़ा प्रशिक्षण मुहैया करायी जाए।

 

*श्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला)ः  इस वर्ष का सामान्य बजट देश के वित्त मंत्री, श्री प्रणब मुखर्जी ने पेश किया है जो कि काफी निराशाजनक है।  मैं हिमाचल प्रदेश के शिमला संसदीय क्षेत्र से लोक सभा में सांसद निर्वाचित होकर आया हूं।  पहाड़ी राज्यों के त्वरित विकास हेतु मैंने इसी लोक सभा के पिछले सत्र में अपने एक निजी संकल्प के माध्यम से  “एक विकास बोर्ड ”  गठित करने की बात जोर-शोर से उठायी थी ताकि देश के सभी पहाड़ी क्षेत्रों के 11राज्यों, जिनमें नॉर्थ-ईस्ट के 8 व हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा जम्मू-कश्मीर राज्य शामिल हैं, इनका तेज गति से विकास हो सके।  यह इसलिए भी आवश्यक है, ताकि विकास बोर्ड इन पहाड़ी क्षेत्रों के राज्यों के त्वरित विकास हेतु मैदानी भागों की तुलना में अलग मापदंड अपनाने का सुझाव दे सके, क्योंकि मेरा मानना है कि जब तक इन राज्यों के लिए योजनाकार अपने मापदंड नहीं बदलेंगे तब तक पहाड़ी क्षेत्रों के राज्यों का त्वरित विकास नहीं हो सकेगा।

           हिमाचल प्रदेश पहाड़ी एवं सीमावर्ती प्रदेश होने एवं ऊंची-ऊंची हिम श्रृंखलाएं होने के कारण औद्योगिक दृष्टि से बहुत पीछे है। इसे ध्यान में रखते हुए एन.डी.ए. सरकार के समय में हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक विकास हेतु 10 वर्ष के लिए एक इंडस्ट्रीयल पैकेज मिला था जिसकी अवधि वर्ष 2013 में समाप्त होनी थी।  इस औद्योगिक पैकेज के कारण हिमाचल प्रदेश एवं उत्तरांचल में लाखों बेरोजगार लोगों को रोजगार मिला था विभिन्न क्षेत्रों में अनेक उद्योगों के लगने से खरबों रुपए का निवेश हुआ, लेकिन जैसे ही यू.पी.ए. की सरकार बनी, वैसे ही औद्योगिक पैकेज की अवधि को घटाकर वर्ष 2010 तक कर दिया गया।  इस कारण इन पहाड़ी प्रांतों को बहुत नुकसान हुआ।  हमें उम्मीद थी कि इस वर्ष के बजट में औद्योगिक पैकेज की अवधि को पूर्व की तरह वर्ष 2013 तक कर दिया जाएगा, क्योंकि इस पैकेज की अवधि इस महीने की 31 तारीख को ही समाप्त हो रही है, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसके कारण हिमाचल प्रदेश के बेरोजगारों एवं आम जनता में बहुत रोष व्याप्त है।

           वर्ष 2004 में, जब से यू.पी.ए. की सरकार बनी है, तब से देश में महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है और आम आदमी का जीना दूभर हो गया है।  इस बजट के माध्यम से बढ़ती कीमतें अपना एक नया रिकॉर्ड स्थापित करेंगी, क्योंकि बजट में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ायी गयी हैं और एक रुपया प्रति लीटर के हिसाब से सैंट्रल एक्साइज डय़ूटी को बढ़ाया गया है।  इससे हर वस्तु के दाम बढ़ेंगे।  वर्ष 2008 में पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाली एक्साइज डय़ूटी, जो पहले वापस ले ली गयी थी, उसे पुनः लगाने से कीमतों में और बढ़ोत्तरी होगी।  सरकार रोजमर्रा की चीजों के दामों को बढ़ने से रोकने में पूरी तरह विफल रही है।  सरकार को इन बढ़ती हुई कीमतों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाने चाहिए, ताकि देश के करोड़ों गरीब लोग अपने लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर सकें।

           टैक्सपेयर को भी इस बजट में 1 लाख 60 हजार रुपए की आज पर कोई रिलीफ नहीं दी गयी है।  इस बजट से किसान, आम नागरिक तथा कर्मचारी वर्ग सीधे तौर से प्रभावित होगा।  किसानों को राहत प्रदान करने के लिए भी कोई विशेष प्रावधान इस बजट में नजर नहीं आ रहा है।  उनके द्वारा खेती के माण्यम से अपना उत्पादन बढ़ाने के लिए बजट में कोई खास योजना बनाकर उन्हें उत्साहित करने की बात भी नजर नहीं आ रही है।

           “नरेगा ” के माध्यम से यह बात तो निश्चित है कि लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध हो रहा है, परन्तु जिस प्रकार से इस कार्यक्रम के माध्यम से निचले स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है, उससे निपटने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने तथा फूलप्रूफ नीति बनानी चाहिए ताकि जो पैसा ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में लगाया जा रहा है उसका सदुपयोग पूरी तरह से हो सके।

           इंदिरा आवास योजना के माध्यम से गरीबों को अपना आवास बनाने के लिए पहले 38,500 रुपए दिए जाते थे, जिन्हें बढ़ाकर 45,000 रुपए कर दिया गया है और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए यह रकम बढ़ाकर 48,500 रुपए कर दी गयी है।  यह नाकाफी है।  इसे बढ़ाकर कम से कम 1 लाख रुपए करना चाहिए और पहाड़ी राज्यों में ज्यादा भाड़ा और ढुलाई की कीमत को ध्यान में रखते हुए 25 प्रतिशत अतिरिक्त सहायतादी जानी चाहिए, तभी उन्हें कंपैनसेट किया जा सकेगा और सही मायनों में गरीबों को आवास की सुविधा मिल सकेगी।

           अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के अंतर्गत आने वाले परिवारों के विद्यार्थियों को दसवीं कक्षा से अधिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए यानि हॉयर एजुकेशन के लिए स्कॉलरशिप में बढ़ोत्तरी का प्रावधान बजट में किया गया है।  मेरा सुझाव है कि वर्तमान महंगाई को दृष्टिगत रखते हुए इसमें समुचित वृद्धि किया जाना नितान्त आवश्यक है।

           सरकार ने गत दिनों किसानों के कर्जे माफ किए, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों के किसानों को इस कर्जा माफी का सीधा-सीधा लाभ नहीं मिला, क्योंकि इसके अंतर्गत एग्रीकल्चर लोन की राशि माफ की गई, किंतु छोड़ी गाड़ियों की खरीद हेतु लिए गए लोन पर कर्जे माफ नहीं हुए, जबकि पहाड़ी राज्यों में छोटे-छोटे संपर्क मार्गों पर इन्हीं छोटी गाड़ियों के द्वारा किसानों की उपज को मंडियों तक ले जाया जाता है। इसलिए पहाड़ी क्षेत्रों में किसानों द्वारा अपनी उपज को मंडी तक लाने-ले-जाने में इस्तेमाल की जाने वाली छोटी गाड़ियों की खरीद हेतु लिए गए ऋणों को भी एग्रीकल्चर लोन मानकर माफ किया जाना चाहिए, जो नहीं किया गया है।  अतः मेरा सुझाव है कि पहाड़ी क्षेत्रों के राज्यों में रह रहे किसानों द्वारा खरीदी गई जीपों एवं पिक-अप वैनों की खरीद हेतु लिए गए ऋणों को भी कृषि ऋण मानकर माफ किया जाना चाहिए, तभी सच्चे मायने में पहाड़ी क्षेत्रों के किसानों को राहत मिलेगी।

           सरकार द्वारा हायर एजुकेशन के लिए बैंकों से ऋण दिए जा रहे हैं, जिससे मध्यम एवं गरीब परिवारों के बच्चों को अपनी पढ़ाई आगे जारी रखने में बहुत सुविधा हो रही है, परन्तु एक तो इन ऋणों को देने में बैंकों द्वारा बहुत अड़ंगे लगाए जाते हैं और नाना प्रकार की कठिनाईयां पैदा की जाती हैं जिनसे विद्यार्थी शिक्षा ऋण लेने हेतु उत्साहित होने की बजाय हतोत्साहित होते हैं।  दूसरी बात इस प्रकार के एजुकेशन लोन पर ब्याज बहुत ऊंची दर से वसूल किया जाता है।  मेरा सुझाव है कि विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और गरीब परिवारों के विद्यार्थियों को इस प्रकार के एजुकेशन लोन ब्याज मुक्त होने चाहिए और यदि अपरिहार्य परिस्थितियों में ब्याज लिया भी जाए, तो वह नॉमीनल होना चाहिए।  तभी सही मायने में साक्षरता दर बढ़ने के साथ-साथ हायर एजुकेशन में जो ड्रॉप आउट रेट बढ़ रहा है, वह कम किया जा सकेगा।

 

 

श्री रामसिंह राठवा (छोटा उदयपुर): उपाध्यक्ष महोदय, मेरा एक व्यवस्था का प्रश्न है।

उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाइए।

श्री रामसिंह राठवा : एक ही मिनट में मैं अपनी बात खत्म करूँगा। उपाध्यक्ष महोदय, हम महत्वपूर्ण बजट के बारे में चर्चा कर रहे हैं। वैसे मैं कोरम की डिमांड नहीं करूँगा क्योंकि बजट चल रहा है, लेकिन देखा जा रहा है कि ट्रैज़री बैंचेज़ बिल्कुल ही खाली हैं। इससे हम क्या सोचें? …( व्यवधान) यहाँ क्यों बैठे हैं, सब मिनिस्टर घर पर जाकर टैलीविज़न पर देखें। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मंत्री लोग यहाँ बैठकर सुन रहे हैं।

श्री रामसिंह राठवा :  यह ठीक नहीं है। मैं आपसे कोरम की डिमांड नहीं कर रहा हूँ लेकिन  सरकार को इसके बारे में चिन्तित होना चाहिए।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Why are you disturbing?

… (Interruptions)

महिला और बाल विकास मंत्रालय की राज्य मंत्री (श्रीमती कृष्णा तीरथ): आपकी संख्या से ज्यादा हमारे मैम्बर प्रैज़ेन्ट हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : मंत्री महोदया, आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कोई क्रॉस टॉकिंग नहीं करें।

… (Interruptions)

 

SHRI M. VENUGOPALA REDDY (NARASARAOPET): Hon. Deputy-Speaker, Sir, I thank you for giving me this opportunity to participate in the discussion on Demands for Grants of the Union Budget 2010-11.

At the outset, I wish to say that the Union Budget presented by the UPA-II Government by its Finance Minister, Shri Pranab Mukherjee, appears to have been made against the price rise, farmers, dalits, minorities and weaker sections of the country.

          Overall, the Budget fails to give a strong and effective direction to food security, energy security and social security in the country. It has only created plans, which are supporting the capitalists and industrialists and keeping the interest of the common man of the country at stake. The Budget only has a strong objective of creating a gap between the rich and the poor, and urban and rural instead of reducing the gap between the poor and the rich and creating an effective society.

          I fail to understand why the economic surveys have been conducted in various places in the country and the recommendations made by the Economic Survey kept aside. I feel that they have not been taken into consideration in the Union Budget of 2010-2011. It appears that the whims and fancies of the Finance Minister are more important.

          I hail from a totally rural area of Andhra Pradesh. I represent the Narasaraopet Constituency of Guntur District, which totally depends on the agriculture sector. There has been no allocation in the agriculture sector. The UPA-II Government also very strongly said that we need food security. I am asking this question from the Finance Minister. How can you expect food security in the country without providing security to the farmers? I am saying this because subsidized seeds have to be provided to them; in-time crop loan as well as subsidized fertilizers has to be supplied to them; and also irrigation facility has to be enhanced by interlinking the rivers as well as giving the maximum support price for the produce of the farmers.

          In the olden days, that is, just after Independence, the Indians were proud to be called a farmer country, but nowadays people are shivering and scared to be a farmer. There is no doubt that if the same concept is derived by the UPA Government, then the farmers may migrate to the urban cities and they will get converted into construction labourers in the country. I feel that whatever Budget allocation is made for the agriculture sector is very trivial and minimal. So, I would request the hon. Finance Minister to retrospect the allocation for the agriculture sector. This should be reviewed and the agriculture sector in India should be rescued. Moreover, the enhancing of the excise duty on diesel and petrol also should be withdrawn because the agriculture sector solely depends on diesel and petrol.

          Further, allocations for the education and healthcare sectors is pegged at Rs. 31,000 crore and Rs. 20,000 crore respectively. I think that it is not sufficient because it cannot eradicate illiteracy and provide effective healthcare protection to the needy.

          The recommendations made by the National Education Mission as well as the National Knowledge Commission have been kept aside and those recommendations do not seem to have reached the heart of the Finance Minister who finds it appropriate to please the already pleased persons rather than the needy. So, I would request the UPA Government to consider enhancing the greenery and to enhance the watersheds. Issues like interlinking of Godavari and Krishna rivers in Andhra Pradesh is also there. I am mentioning this because the Nagarjuna Sagar dam is covering around 25 lakh acres, which it is feeding.

          Now, I request the Finance Minister to provide for interlinking of Godavari and Krishna Rivers from Polavaram to Pulichintala of Guntur District.

          Recently, in October, 2009, the States of Andhra Pradesh and Karnataka were severely affected by floods. But no provision has been made for helping the homeless, those who have lost their crops as well as their assets. I would request the Union Minister of Finance to give a Special Package to help all those who were affected in the recent floods in Karnataka and Andhra Pradesh.

          I am very thankful to you for giving me this opportunity to speak. I would request the hon. Finance Minister to please review his Budget and incorporate suitable welfare measures to help the common man of the country.

 

 

श्रीमती ज्योति धुर्वे (बेतूल):उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे प्रस्तुत बजट में हो रही चर्चा में बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपकी बहुत आभारी हूं। माननीय वित्त मंत्री जी ने वर्ष 2010 का यह जो बजट प्रस्तुत किया है, यदि एक वाक्य में कहना हो तो मैं यही कहूंगी कि यह बजट आम जनता के हितों पर सचमुच में कुठाराघात करने वाला बजट है। सरकार द्वारा अपनी बड़ी-बड़ी चुनौतियां और उत्तरदायित्व की कहानी आम जनता के बीच में बहुत आसानी से जाती तो है, लेकिन उस गरीब, आदिवासी और दलित, इस देश की इतनी बड़ी आबादी में रहने वाले उन गरीबों को निश्चित ही ये ध्यान में नहीं लेती है। मुझे आश्चर्य होता है कि यह बजट यूपीए सरकार ने जो प्रस्तुत किया है, वह चुनावी अवसर में यह कहते नहीं अघाती है कि कांग्रेस का हाथ एक आम आदमी के साथ है। जब इनकी सरकार बन जाती है तो ये अपनी प्राथमिकताओं को भी भूल जाती है। यह सरकार, खास लोगों के साथ हमेशा-हमेशा रहने वाला यह नारा सिद्ध होता है।

          उपाध्यक्ष महोदय, वर्तमान में देश की आम जनता का हाल देखें      – “आम आदमी का तो जीना मुहाल है, वित्त मंत्री जी के बजट से खास वर्ग मालामाल हो रहा है। गरीब हो, किसान हो, दलित हो या आम जन, महंगाई ने तो तोड़ डाली है सबकी कमर, सरकार ढिढोंरा तो पिटती है, चारों तरफ है खुशहाली, सच तो यही है, आम जनता की होली हो या दीवाली, अब मनती है काली, गांव-घर छोड़ कर पलायन कर रहा है मजदूर, किसान आत्महत्या के लिए हो रहे हैं मजबूर। दलितों की स्थिति तो है और भी दयनीय, न हाथ में है रोजी-रोटी और न पेट में है रोटी। बच्चों के मुंह से छिन गया है निवाला और महंगाई से आम जनता का निकल गया है दिवाला।”

          उपाध्यक्ष महोदय, आज देश की आबादी एक अरब सत्रह करोड़ अस्सी लाख चौदह हजार है। देश का बड़ा आबादी वाला हिस्सा, जो गरीब एवं मध्यम वर्ग है, सरकार ने सीधे-सीधे उस पर भार डाला है।  उत्पादक शुल्क बढ़ा कर और सेवा कर लगा कर भार डाला है। स्वास्थ्य जैसी सुविधा में सेवा को हम एक बहुत बड़ा नाम देते हैं, यदि वहां भी आप सेवा शुल्क को लगाते हैं तो निश्चित ही हम सोचते हैं कि स्वास्थ्य को सेवा से हटा कर, इस शब्द को हमेशा के लिए हटा देना चाहिए।  आय की छूट में भी माननीय वित्त मंत्री जी ने उन खास वर्गों पर ही नजर रखी है, लेकिन आम व्यक्ति पर किंचित भी सोचने का प्रयास नहीं किया है। देश की इतनी बड़ी आबादी में रहने वाले व्यक्ति का सपना होता है कि शायद यह बजट उसके लिए कोई खास सौगात लेकर आया होगा, परन्तु सौगात तो दूर, उसे ऐसा लगा कि उत्पाद शुल्क में बढ़ोत्तरी और  पेट्रोल डीजल जैसी जो आवश्यक वस्तुं हैं, उनके दामों में भी उन्होंने शुल्क लगा कर सचमुच में आम आदमी का जीना दुभर किया है। इससे निश्चित ही हर चीजों के दामों में बढ़ोत्तरी होगी। हर चीजों की आसमान को छूती हुई उस बढ़ोत्तरी को आपने बेलगाम किया है। देश को एक अंधे खाई की ओर धकेलने के सिवाय इस सरकार ने कुछ नहीं किया है। इस सरकार की सबसे बड़ी जो भावनाएं हैं, जो मुझे देखने में नजर आती हैं कि जनता को मात्र दो हिस्सों में इस सरकार ने बांट दिया है।

          उपाध्यक्ष महोदय, इस सरकार ने जनता की भावनाओं को दो हिस्सों में बांट दिया है। इन दोनों हिस्सों के बीच में जो बहुत बड़ी खाई है, उसे हम आज 62 वर्ष की आजादी के बाद भी पाटने में असमर्थ रहे हैं और न ही हम आगे इसे भर पाने की कोई क्षमता रखते हैं।

          महोदय, कहने के लिए मैंने इतनी सारी चीजों को इकट्ठा जरूर किया है, लेकिन सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत, जिसका दुनियां के हर कोने में अपना एक नाम होता था और अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध था, आज उसी भारत के ढांचे को कसावट देने वाला किसान कितना मजबूर और लाचार है। किसानों की मांगें हमेशा छोटी-छोटी आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए होती हैं, फिर चाहे वह बी.टी. फसलों पर रोक हो या फसल बोए जाने से पहले उसके दाम को तय करने की बात हो और चाहे बिजली और पानी जैसी छोटी-छोटी मांगों को पूरा करने के लिए वह सड़कों पर उतरता है। उन्नत फसलों की क्षमता को बढ़ाने के लिए वह सब्सिडी की मांग भी करता है। वह उन्नत फसलों के सफलतम न्यूनतम मूल्य निर्धारित करने की मांग भी हर पल करता रहता है। देश का किसान न जाने अपनी ऐसी कितनी मांगों को लेकर अभी और कितनी कुर्बानियां देगा, मुझे सोचकर भी यह दुख होता है। पूरे देश को जिन्दा रखने वाला किसान कितना मजबूर है और न जाने उसे कब तक अपनी जान हमेशा-हमेशा बलिदान करनी होगी?

          महोदय, आज पूरा देश आतंकवाद की गिरफ्त में है। देश के सीमावर्ती क्षेत्रों के दायरे घट रहे हैं और भारत की जमीन धीरे-धीरे कम हो रही है। सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले आम आदमी आज अपने आप को असुरक्षित समझ रहे हैं। सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले हर व्य़क्ति को चिन्ता है और वह हमेशा सोचता है कि उससे मुझे कब मुक्ति मिलेगी? उसे पता नहीं होता कि उसकी जमीन कब उससे छिन जाए। जब वह रात में सोता है तो वह महसूस करता है कि मैं कल की सुबह देखूंगा भी या नहीं। इन हालातों के बावजूद सरकार द्वारा अपने बजट में, देश की सुरक्षा को ध्यान में न रखने के कारण, मुझे बहुत ही दुख हो रहा है।           उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से पूछना चाहूंगी कि आज हमारा इतना बड़ा देश, जो दुनियां के विकसित देशों के बराबर खड़े होने की क्षमता रखता है, क्या उसकी सुरक्षा को देश के बजट में एक अभिन्न स्थान नहीं मिलना चाहिए?  मेरी आपके माध्यम से सरकार से विनती होगी कि देश की सुरक्षा हमारी सुरक्षा है और देश के हर आम व गरीब व्यक्ति की सुरक्षा करना, उसकी चिन्ता करना, इस सरकार का मौलिक दायित्व और प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए। सचमुच में इस देश की सुरक्षा के लिए, इस बजट में जितने प्रावधान की आवश्यकता होनी चाहिए, उतनी नहीं की गई है और जो प्रावधान किया गया है, वह केवल सपने के बराबर है।

          महोदय, आज हमारे देश के भविष्य का सबसे बड़ा स्तम्भ, सबसे बड़ी ताकत, सबसे अच्छी नींव रखने वाला जो नवयुवक है, वह भी हर जगह बेरोजगार खड़ा नजर आता है। इतनी सारी डिग्रियां उसके हाथों में होती हैं, लेकिन उसके बावजूद उसके हाथ में, दो समय के खाने और उसके परिवार के जीवन-यापन के लिए कोई रोजगार नहीं होता। मैं सुझाव देती हूं कि नवयुवकों के विश्वास को बनाए रखने एवं उन्हें आगे लाने की कोई योजना बनानी चाहिए। आज देश में रहने वाले युवक के हाथों में काम नहीं है। देश का नवयुवक अपने मजबूत हाथों द्वारा देश को स्वर्णिम भविष्य़ की ओर ले जाने की ताकत रखता है। माननीय वित्त मंत्री जी से विनती करती हूं कि इन बेरोजगार नौजवानों के लिए, इनके भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए और देश को आगे बढ़ाने के लिए निश्चित रूप से ऐसे कार्यक्रम आगामी बजट में लाने के प्रयास करने होंगे, जिससे देश की सबसे बड़ी ताकत और देश की सबसे बड़ी मजबूती का स्तम्भ न गिरने पाए। हर युवक का एक सपना होता है और वह हमेशा सोचता है कि –

“ सामने हो मंजिल तो रास्ता मत छोड़ना

जो मन में हो ख्वाब वो मत तोड़ना

हर कदम पर मिलेगी कामयाबी आपको

बस आसमां छूने को कभी मत छोड़ना।   ”

 

          महोदय, आज देश का हर निचला अविकसित कमजोर भाग, जिनमें आदिवासी दलित रहते हैं, उनके विकास की आज भी उतनी आवश्यकता है जितनी पहले थी। उनके विकास के लिए केन्द्र सरकार द्वारा जो राशि दी गई है, उसमें कटौती हुई है। 

          माननीय वित्त मंत्री जी के इस बजट में गरीब जनजाति के शैक्षणिक विकास, मानसिक विकास और शारीरिक विकास में जो बाधाएं आएंगी, निश्चित रूप से उनके लिए अधिक आवश्यकताओं की मांग थी।  आज भी यह वर्ग बिना किसी मूलभूत सुविधा के जिंदा है, जो केंद्र की राशि अपने थोड़े विकास मार्ग को मुकाम कर देता है और जिसे देखकर ऐसा लगता है कि इस वर्ग को केंद्र सरकार के सहयोग की आवश्यकता हमेशा रहेगी।  मैं सरकार से कहना चाहूंगी कि हर दलित समाज, आदिवासी समाज को आज भी हमारे केंद्र की आवश्यक योजनाओं के अच्छे क्रियान्वयन की आवश्यकता है।  

          महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगी, ” इतिहास उनके बनते हैं, जो संघर्षों से लड़ते हैं, अमर नाम करने की खातिर धूप-छांव नहीं गिनते हैं “।  महोदय, कहने के लिए बहुत कुछ है और करने के लिए भी बहुत कुछ है।  हमें केवल अपनी सोच को बदलना होगा।  आज ही मैंने देखा है कि यह बजट किसी गरीब, किसान, दलित और आदिवासी के लिए नजर नहीं आ रहा है।  मैं चाहूंगी कि महिलाओं को भी एक अच्छा योगदान मिले।  उसे मजबूत बनाया जाए।  आरक्षण तो हमें मिलना ही चाहिए, लेकिन महिलाओं को उसे मजबूती देने के लिए इस सरकार की अच्छी योजनाओं के द्वारा उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा उनके हालातों को, उनकी सोच, उनकी बिल्डिंग्स को इतनी अच्छी तरह से तैयार किया जाए ताकि वह इस देश की एक अच्छी नारी, शक्ति से भरपूर नारी अपने आप को साबित करे।  इस बजट में जो कमी है, उसे आगामी बजट में पूरा करने की कोशिश की जाए।  

          महोदय, आपने मुझे बोलने का समय दिया, मैं आपकी बहुत आभारी हूं,।

 

 

 

SHRI M.I. SHANAVAS (WAYANAD): Mr. Deputy-Speaker, Sir, the Budget 2010-11 was presented by a very confident Finance Minister. In the Budget Speech he reminded the House and the country of the challenges the country has been facing and they are going to be dealt with in this Budget.

          The first challenge faced by the country is mentioned in the sixth paragraph of the Budget Speech. The Finance Minister said, “The first challenge before us is to quickly revert to the high GDP growth rate”. When the whole world was shaken by the economic recession, when the great powerful nations were reeling under the pressure of the economic crisis, when banks and financial institutions were closing down, our country from 2003 to 2008 had an average growth rate of about nine per cent. The whole world looked at India in amazement. India is going forward at a fast pace, how is it possible? That was the question being asked by the world’s great economic powers.

          I am a little disturbed, Mr. Deputy-Speaker, when I heard some of the speeches made here. Look at our country! Our country has risen from the ashes. We had nothing in 1947. Even after this growth of 62 years, some political parties always paint a gloomy picture of India. They paint a picture to say that we are poor and we have nothing. They say, “Look at China, look at the United States of America, look at Britain and look at other countries!” They do not see the greatness of India. According to my understanding of the situation, I have numerous statistics to present before the House but time constrains me not to speak of them so much.

          We have grown at a very fast pace. This is Jawaharlal Nehru’s vision. In 1938, the All India Congress Committee appointed Pandit Jawaharlal Nehru as the Chairman of the Planning Commission of the Congress Party. In 1938, Jawaharlal Nehru’s Committee came to the conclusion that to alleviate poverty, the annual income of India should grow three-fold within fifteen years.

 

          Take for example, transferring  the idea in the growth rate statistics and theory into 10  to 11  per cent. If we get 10 to 11 per cent growth  as Jawaharlal Nehru had envisaged in 1938, the annual income of this country  will be three times  and poverty will  be alienated, and that is the way Shri Pranab Mukherjee has presented this Budget.  

          Let me invite the attention of this hon. House with respect to certain figures. Some of my friends are saying that India is finished, and India has got nothing. In 1950-51, the GDP of India was  Rs.9,719 crore and in 2008, it was Rs.52.28 lakh crore; the export which India had in 1951 was Rs.606 crore, it is now Rs.8.40 lakh crore; the foreign exchange reserves which India had  in 1950-51 was just Rs.911 crore, it is now Rs.12.30 lakh crore; our death rate per thousand was 27.4 in 1950-51 and it is now only 7 per thousand in 2008, life expectancy of an Indian in 1950 was 32 years and now it is 66; our literacy rate in 1950-51 was 18 per cent and now it is 67 per cent in 2005, and now this is almost 70 per cent. Poverty in India in 1947 was 85 per cent and now, according to the Planning Commission  statistics of the National Sample Survey, in 2004-05, our poverty has been reduced to 27.5 per cent.  After the effect of our inclusive growth programmes it should have been further reduced by now.  We do not see this growth. How was this greatness achieved?  We do not see it. We say, look India is in turmoil.

          I would like to draw the attention of the House towards the speech of Barack Obama. Recently, the President of the world’s strongest country, the most economically powerful country,  the United States of America.  Barack Obama, in his State of the Union speech,  in the last week of January, 2010, told the American Congress:

“China’s not waiting to revamp its economy. Germany’s not waiting. India’s not waiting… They are putting more emphasis on maths and science. They’re rebuilding their infrastructure…. Well, I do not expect second-place for the United States of America. As hard as it may be, as  uncomfortable and contentious as the debates maybe, it’s time  to get serious….”

           These are not the words of any Congress leader.

             The very next day, all the newspapers in the United States of America came out with headlines, `America cannot be second to India’.  Some of our  newspapers  had same headlines.  The United States which got Independence 230 years ago and its President, Barack Obama was speaking that they cannot be second to India which is only 62 years old. So, how far we have grown and Who is afraid of India?

                    At the time, when most respected, Shri Yashwant Sinha was speaking, he said that when he thinks of the progress of India, he was reminded of the balloon. It is a joke. But when we think of India, we think of India capturing the moon. The difference between the BJP and the Congress is that they think of balloon and we think of the moon. India is moving forward like anything.

            Now, let me put forward as to how the great revival happened.  This great revival has happened by a prudent approach, by a very systematic approach.  How the economy has grown like anything? Our economy was accelerated in 1991; it overcome the recession. Now, everyone is speaking about it. Look at China. So many speakers in this House have referred to China. Even on price rise or on any issue, they spoke about China. Shri Yashwant Sinha knows, hon. Pranab Mukherjee knows that democracy is an indicator of development. Take any country in the world, if democracy is an indicator of social development, the whole development scenario of a country should be taken as development into or plus democracy.

China’s growth rate is only 8.5 per cent.  It was 13 per cent in 2006.  India’s growth rate is almost 7 per cent.  I may tell the august House that when growth rate in a democracy is taken into consideration, Indian growth rate is greater.  I would say that 7 per cent growth rate of India, it being a democracy, is anyway greater than the 10 per cent growth rate of China.

          In this Budget the hon. Finance Minister has looked into all the aspects.    He has strengthened the treasury.   We know, there has been a sour medicine also in the form of an increase in the petrol price.  But, Rs.26,000 crore relief has also been given to the tax-payers.  We have to strengthen the treasury.  In future some challenges may come before the nation and only if we strengthen our treasury we will be able to overcome any eventuality that may come.

          India is marching forward.  Nobody can stop this country.  This country has got a vision.  This democratic country has got an ideology.  I would make just one point and conclude my speech.  The father of the nation, Shri Jawahar Lal Nehru laid the foundation of a strong democracy, a strong India.  Indira Ji and Rajiv ji shed their blood to further strengthen India.  What we mortals can do?  We can show our gratitude to the leaders who sacrificed their lives for this country by naming certain projects on their names.  I would like to make one quotation in this respect.  Since an unfortunate reference of naming certain projects in these leader’s name it was made during some other debate.  I would like to quote the Roman philosopher Cicero: He said:

“Gratitude is not only the greatest of virtues but the parent of all the others. ”

 

That is the Indian culture. 

 

श्री वी.नारायणसामी : उपाध्यक्ष महोदय,  इस समय बहुत सीरियस डिस्कशन चल रही है, लेकिन आप जरा बीजेपी बेंचेज की तरफ देखिये। …( व्यवधान)

श्री हरिन पाठक (अहमदाबाद पूर्व):  हमारी उपस्थिति काफी है। …( व्यवधान)

नारायणसामी जी, आपको जवाब देना है, देश को आपको बनाना है। आप ट्रेजरी बेंचेज में हैं। हम बोलेंगे, लेकिन उसका अमल आपको करना है। पहले इसमें आप …( व्यवधान) हम तो सुझाव देंगे।

उपाध्यक्ष महोदय :   आप बैठ जाइये।

 …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   आपने बोल दिया है, इसलिए अब आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री हरिन पाठक :   आपको इतना मालूम होना चाहिए कि सरकार हम नहीं चला रहे हैं। हम  सुनकर क्या करेंगे? आप हमारी बात सुनें, सबको बुलाएं और उस पर अमल करें। देश में जो महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी है, उसे दूर करें । हमारी उपस्थिति कम होगी, तो चलेगा।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  अब रिकार्ड में कुछ नहीं जायेगा।

…( व्यवधान)*

उपाध्यक्ष महोदय :   आप  लोग शांति से बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री मंगनी लाल मंडल (झंझारपुर): महोदय, मैं इस बजट का विरोध करने के लिए खड़ा हुआ हूं। हमारा दायित्व है, यह बात सही है, लेकिन यथार्थ भी यही है कि इस बजट का विरोध होना चाहिए। क्योंकि इस बजट में और इस बजट की कोख में महंगाई छिपी हुई है, असमानता छिपी हुई है, कुपोषण और कुशिक्षा छिपी हुई है और इस बजट की कोख में सबसे बड़ी बात, क्षेत्रीय असंतुलन छिपा हुआ है, इसीलिए इस बजट का मैं विरोध करता हूं।

          बजट के पहले सरकार ने दो प्रतिवेदन सदन में रखे – एक, आर्थिक सर्वेक्षण और दूसरा, 13वें वित्त आयोग की रिपोर्ट। यह जो 11वीं पंचवर्षीय योजना है, इसका तीसरा वर्ष समाप्त हो रहा है। सरकार ने वर्ष 2020 का एक आइना दिखाया था लोगों को कि जनसंख्या के अनुपात में खाद्य सुरक्षा के लिए हम कितना आत्मनिर्भर होंगे, उसकी दिशा में आगे कार्रवाई करेंगे। जब पहली हरित क्रंति हुई थी, तो हमें अमेरिका के पीएल-480 से हमको मुक्ति मिली थी। बड़ा अथक प्रयास हुआ था और हम आत्मनिर्भर एवं सरप्लस हो गए थे खाद्यान्न के मामले में। लेकिन यह सरकार तो आयात करना चाहती है, चाहे रक्षा के मामले में हो या खाद्य के मामले में। दूसरी हरित क्रंति से पहले, 13वें वित्त आयोग का जो प्रतिवेदन आया है, जैसे अभी 9 प्रतिशत का उल्लेख किया गया है। सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना की समाप्ति तक, जिस तरह संकल्प व्यक्त किया है कि हमारी ग्रोथ रेट 9 प्रतिशत हो जाएगी। ग्रोथ रेट तो बढ़ेगी, लेकिन गरीबी भी बढ़ेगी। गरीबी को मिटाने के लिए सरकार के इस बजट में न कोई प्रॉविजन है, न कोई दृष्टि है। राजस्व बढ़ेगा, यह बात 13वें वित्त आयोग ने कही है, लेकिन इस राजस्व का उपयोग किस गरीबी को मिटाने के लिए, कुशिक्षा को मिटाने के लिए, कुपोषण को मिटाने के लिए और खाद्यान्न के उत्पादन के लिए होगा, इसके बारे में सरकार ने अपनी दृष्टि नहीं रखी है। 13वें वित्त आयोग ने आकलन किया है कि आगामी पांच वर्षो अर्थात वर्ष 2010-11, क्योंकि वर्ष 2010-11 से इस वित्त आयोग का कार्यकाल प्रारंभ होगा, से वर्ष 2014-15 तक सुधार कार्यक्रमों के  द्वारा उच्चस्तर पर राजस्व प्राप्ति में उपलब्धि होगी एवं आगामी पांच वर्षों में सरकारी राजस्व में चक्रवृद्धि वार्षिक विकास दर, सीएजीआर की हिस्सेदारी 17.3 प्रतिशत रह सकती है। आगे कहा गया है कि राजस्व के अलावा आयोग ने आगामी पांच वर्षों के लिए सकल घरेलू उत्पाद 13.2 प्रतिशत रहने का अनुमान किया है। यह जो 13.2 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद है, उसे यह सरकार किस पर खर्च करेगी? खाद्यान्न का आयात न हो, आयात की नौबत न आए और सरकार ने वर्ष 2020 तक का जो विजन दिखाया है, उसमें हमें कितने खाद्यान्न की आवश्यकता होगी, उसके लिए क्या किया जा रहा है, यह सरकार को बताना होगा।

          संसदीय कार्यमंत्री जी यहां हैं, ये सिंचाई मंत्री भी हैं। हर साल बजट से पहले आर्थिक सर्वेक्षण सदन के पटल पर रखा जाता रहा है। वर्ष 2007-08 के इकोनॉमिक सर्वे मे यह बताया गया है कि दुनिया के मुकाबले में प्रति हेक्टेअर खाद्यान्न के उत्पादन में हम कितना पीछे हैं। अब सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण में इस जानकारी को देना बंद कर दिया है। सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण में यह बात नहीं डाली है अन्यथा भारत सरकार की पोल खुल जाएगी। चीन का नाम लिया जात है और ढिंढोरा पीटते हुए कहा जाता है कि दुनिया में चीन को छोड़कर, हम दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति हैं।  लेकिन स्थिति क्या है? भौगोलिक दृष्टि से चीन हमसे तीन गुना बड़ा है, लेकिन कृषि योग्य भूमि हमारे पास चीन से ज्यादा है।

भारत का भौगोलिक क्षेत्र 32,88,000 वर्ग किलोमीटर के मुकाबले चीन का भौगोलिक क्षेत्र 95,37,000 वर्ग किलोमीटर है। भारत में कृषि योग्य भूमि 50.5 प्रतिशत है, जबकि चीन के पास 9.6 प्रतिशत है। यह उसके पास टोटल भौगोलिक क्षेत्र की भूमि का हिस्सा है। सबसे बड़ा आश्चर्य है कि हम द्वितीय हरित क्रंति के लिए 400 करोड़ रुपए का प्रावधान अपने बजट में कर रहे हैं। लेकिन सरकार ने न तो अपने आर्थिक सर्वेक्षण में और न ही अपने बजट में यह कहा है कि कृषि की पैदावार प्रति हेक्टेयर बढ़ाएंगे, उन्नत बीजों के अनुसंधान के लिए इतना खर्च करेंगे और सिंचाई बढ़ाने के लिए क्या करेंगे। चीन में इरीगेशन लैंड का प्रतिशत हमसे कम है। भारत में जो टोटल कृषि योग्य भूमि है, उसमें 28.9 प्रतिशत सिंचित भूमि है। यह सरकार कहती है ultimate creation of potentiality of irrigation, यह टेक्नीकल शब्द है सिंचाई का । हमारा भूगोल कम है, चीन का ज्यादा है, करीब तिगुना है। हमारी सिंचित कृषि भूमि 28.9 प्रतिशत है, चीन की 53.6 प्रतिशत है। उसके पास जो कृषि भूमि है, उसने ज्यादा से ज्यादा उसे सिंचित भूमि बनाया है।

          उपाध्यक्ष महोदय, आपको जानकर ताज्जुब होगा कि कई मुल्क हमसे प्रति हेक्टेयर पैदावार में काफी आगे हैं। सरकार को बताना होगा कि हम क्यों पीछे हैं? कृषि मंत्री जी कहते हैं कि खाद्यान्न में आत्मनिर्भर होंगे। सदन को बताना होगा कि हम कैसे आत्मनिर्भर होंगे? इसके लिए पहली जरूरत है कि हम अपनी कृषि योग्य भूमि को सिंचित करें, लेकिन इसके लिए सरकार ने अपने बजट में कुछ नहीं कहा है। न ही सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में इस बारे में कुछ कहा गया है। फ्लड प्रोटेक्शन पर और इरीगेशन पर बजटरी एलोकेशन और प्रोविजन नगण्य है। इसलिए हम और देशों का मुकाबला नहीं कर सकते। सरकार को कहना चाहिए कि हम प्रति हेक्टेयर उत्पादन का जो वैश्विक स्तर है, उसका मुकाबला करेंगे। लेकिन सरकार यह नहीं कहती है। सरकार तो यह कहती है कि वह विश्व स्तरीय हवाई अड्डे बनाएगी, विश्व स्तरीय रेलवे स्टेशंस बनाएगी और विश्व स्तरीय सुविधाएं देगी। एग्रीकल्चर का प्रोडक्शन क्यों नहीं विश्व स्तरीय होगा, यह नहीं बताती है। हमारे यहां गेहूं और चावल का प्रति हेक्टेयर 2.9 मीट्रिक टन पैदा होता है। अमेरिका में गेहूं का उत्पादन 7.83, इजिप्ट में 9.8, जापान में 6.42, कोरिया में 6.73, थाइलैंड में 2.63 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पैदावार होती है। चीन जो गेहूं पैदा करता है, इस मामले में हमसे बहुत आगे है। वह प्रति हेक्टेयर में 4.25 मीट्रिक टन पैदा करता है। फ्रांस 7.58, इंग्लैंड 7.77 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पैदा करता है और भारत 2.71 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पैदा करता है। इससे जाहिर होता है कि हम इन देशों से खाद्यान्न के पैदावार के कितना पीछे हैं और बातें करते हैं फलां चीज विश्व स्तरीय करेंगे। मेरा कहना है कि जब तक एग्रीकल्चर में हम विश्व स्तरीय मुकाबला नहीं करेंगे, प्रति हेक्टेयर सिंचाई की सुविधा नहीं देंगे, तब तक खाद्यान्न के मामले में हम पीछे रहेंगे। सरकार अपने को इस मामले में काफी जागरूक बताती है और फूड सिक्योरिटी के लिए विधेयक भी लाना चाहती है। मैं समझता हूं कि अगर हम सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं करेंगे, तब तक इस मामले में सारी बातें निरर्थक होंगी, व्यर्थ होंगी। इसीलिए मैं कहना चाहता हूं कि सरकार इस बजट के द्वारा देश को गुमराह कर रही है, धोखा दे रही है। इसलिए हम कहते हैं कि बजट की कोख में सब कुछ निरर्थक छिपा हुआ है।

           दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि सरकार ने कहा है कि आरआरबी का हम पुनर्संगठन करेंगे, मजबूत करेंगे। आरआरबी का कितनी बार पुनर्संगठन किया गया है? देश में जो क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की संख्या थीं, जो कमेटियां रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और भारत सरकार ने गठित कीं, उनकी अनुशंसाओं के आलोक में आज आरआरबी की संख्या तो कम हुई है लेकिन आरआरबी मुनाफे में नहीं गयी है। इसका कारण सरकार ने बताया है कि   “Regional Rural Banks play an important role in providing credit to rural economy ” ।  यह बात गलत है। गलत इसीलिए है कि आरआरबी परतंत्र है। आरआरबी इसलिए परतंत्र है क्योंकि आरआरबी निर्भर है स्पोन्सर्ड बैंक्स पर। जो प्राइवेट बैंक्स हैं उन पर आरआरबी निर्भर है। आज भी आरआरबी के जो चेयरमैन होते हैं वे आरबीआई के द्वारा नहीं,सरकार के द्वारा नहीं, जो स्पोन्सर्ड बैंक होता है, उसके द्वारा नियुक्त किया जाता है और जो सबसे दब्बू किस्म का ऑफिसर होता है, उसे आरआरबी का चेयरमैन बनाया जाता है। इसलिए बनाया जाता है ताकि रुरल क्रेडिट को डिपोजिट के मुकाबले में कम करे और जितना डिपोजिट है वह स्पोन्सर्ड बैंक में जमा करे। आरआरबी पर दोहरी मार पड़ती है। सीआरआर के द्वारा पहली मार पड़ती है जो आरबीआई में जमा कराना पड़ता है और दूसरा जो डिपोजिट होता है वह स्पोन्सर्ड बैंक में जमा करना पड़ता है। इसलिए मैं सरकार से अनुरोध करना चाहूंगा कि उसके सर्विस एरिया को भी नियंत्रित किया गया है। सबसे पहले सरकार अगर आरआरबी को चाहती है कि माइक्रो-फाइनेंसिंग के लिए, रुरल क्रेडिट के लिए सक्षम बने तो उसे स्पोन्सर्ड बैंकों से उसे मुक्त कीजिए, स्पोन्सर्ड बैंकों के आदमी को चेयरमैन मत बनाइये और उसका डिपोजिट स्पोन्सर्ड बैंक में जमा होता है उस पर पाबंदी लगाइये।

          आपने कहा है कि दो हजार की आबादी पर हम ब्रांच खोलेंगे। नरसिंहन कमेटी ने रिक्मेंड किया था। सरकार ने कहा कि 13,000 की आबादी पर हमारा एक ब्रांच है। लेकिन जो रुरल एरिया में बैंक है, सैमी-अर्बन-एरिया में जो बैंक है, यह जो स्टेट लेबर्स बैंकर्स कमेटी की बात सरकार ने की है कि ब्रांचें खोलने के लिए एसएलवीसी रिक्मेंड करेगा तो एसएलवीसी के नीचे है डीएलसीसी, जो बैंकर्स के लिए होती है, उसमें बैंक होता है, लेकिन जो रुरल एरिया में कमर्शियल बैंक्स की शाखाएं हैं उसकी वन-मैन ब्रांच होती है। यह सही है कि उस पर आरआरबी का कोई नियंत्रण नहीं है। आरआरबी कहता है कि हम गाइडलाइन्स दे सकते हैं लेकिन सरकार कहती है कि आरआरबी के गाइडलाइन्स में कमर्शियल बैंक काम करेगा। नतीजा यह होता है कि जो क्रेडिट प्लान सरकार का होता है, जो फाइनेंसिंग प्रीओरिटी सेक्टर में और नॉन प्रीओरिटी सेक्टर में होनी चाहिए वह नहीं कर पाता है, वह क्रेडिट नहीं दे पाता है क्योंकि वन-मैन ब्रांच के बारे में सरकार ने इस पर चर्चा नहीं की है ध्यान नहीं दिया है। इसका मतलब है कि जो माइक्रो-फाइनेंसिंग है, जो रुरल क्रेडिट है, उसके बारे में या तो सरकार को जानकारी नहीं है या यह मान लिया जाए कि सरकार  इस बजट के द्वारा कहा है कि हम प्राइवेट बैंकों को  ब्रांचेज खोलने के लिए लाइसेंस देंगे। प्राइवेट बैंक को अगर लाइसेंस मिलता है या जो प्राइवेट बैंक का जाल फैल रहा है उस जाल के द्वारा न तो वह क्रेडिट रुरल एरिया में देता है न अर्बन एरिया में देता है, डिपोजिट करता है लेकिन उससे जनता को लाभ नहीं होता है। इसलिए महोदय, मैं इस बजट का भी विरोध करता हूं।

          मैंने कहा है कि यह जो बजट है यह गरीब विरोधी है, असमानता बढ़ाने वाला है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के मामले में एक प्रतिशत सालाना की दर से गरीबी घटी है और एक प्रतिशत सालाना की दर से साक्षरता घटी है। सरकार ने जो कहा है और जो संकल्प व्यक्त किया है कि हम वर्ष 2018 तक 80 प्रतिशत लोगों को साक्षर करेंगे, यह झूठ है। यह यथार्थ नहीं है, क्योंकि जो बिल पास किया गया है, उस विधेयक के मामले में ऐसा नहीं होगा। गरीबी के मामले में तेंदुलकर समिति की चर्चा हुई है। मैं वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट पढ़कर सुनाना चाहता हूं। वर्ल्ड बैंक ने इंडिया के बारे में कहा है –

 

 

 

 

 

15.00 hrs.

 

 “India has made steady progress against poverty.  A look at the 25-year period between 1981 and 2005 shows that India has moved from having 60 per cent of its people living on less than 1.25 dollar a day to 42 per cent.  The number of people living below a dollar a day, at 2005 prices, has also come down from 42 per cent to 24 per cent over the same period.  Both measures show that India has maintained even progress against poverty since the 1980s, with the poverty rate declining at a little under one percentage point per year.”

 

उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री मंगनी लाल मंडल : महोदय, मुझे कुछ बिंदू और उठाने हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : मेरे सामने घड़ी है।

श्री मंगनी लाल मंडल : हमारी पार्टी का समय अभी बचा है। बोलना हमारा अधिकार है, हम कैसे अपना अधिकार छोड़ दें।

उपाध्यक्ष महोदय : हम दोनों चीजें देख रहे हैं। आप अपनी बात जल्दी समाप्त कीजिए।

श्री मंगनी लाल मंडल : मेरा साग्रह निवेदन है कि मुझे दो-तीन मिनट और बोलने दिया जाए। इससे आगे वर्ल्ड बैंक ने लिखा है –

 “But there are still a huge number of people living just above this line of deprivation. This is most evident when we study absolute numbers.  The number of people living below a dollar a day is down from 296 million in 1981 to 267 million people in 2005.”

 

मतलब 29 मिलियन लोग घटे हैं –

“However, the number of poor below 1.25 dollar a day has increased from 421 million in 1981 to 456 million in 2005.  This is the biggest challenge facing India today. ”

 

          यह हमने नहीं कहा है। यह वर्ल्ड बैंक कह रहा है। गरीबी जो बढ़ रही है, गरीबी देश के सारे राज्यों में अलग-अलग है। इसीलिए मैंने बजट के बारे में कहा है कि यह गरीबी बढ़ाने वाला बजट है, यह बेकारी बढ़ाने वाला, कुशिक्षा बढ़ाने वाला और कुपोषण बढ़ाने वाला बजट है, इसलिए हम इस बजट का विरोध करते हैं।

          अंत में मैं एक बात रक्षा के मामले में कह कर अपना भाषण समाप्त करूंगा। सरकार ने डीआरडीओ को ताकत दी है और नए तरीके से संगठित किया है। इसमें रक्षा के मामले में सरकार ने पैसा बढ़ाया है और पिछले बजट में भी सरकार ने पैसा बढ़ाया था। यह जो पूंजीगत परिव्यय है, पूंजीगत परिव्यय के मामले में पैसा वापिस करना पड़ता है, सरेंडर करना पड़ता है, क्योंकि वह पैसा लैप्स हो जाता है। यह पैसा लैप्स क्यों होता है? हमारे आदरणीय नेता श्री आडवाणी जी ने अपने भाषण में कहा कि आप संकल्प कीजिए कि आपको रक्षा के मामले में स्वदेशीकरण करना है, पूर्ण रूप से भारतीयकरण करना है। आप निर्यात पर निर्भर हैं। आज भी भारत के लड़ाकू विमानों के 80 प्रतिशत पुर्जे खत्म हो गए हैं। बजट का उपबंध होता है, पैसा लैप्स कर जाता है और जो केपिटल एक्सपेंडिचर है, उसका पैसा आपको लौटाना पड़ता है। इस बार भी जो पैसा बढ़ाया गया है, पूंजीगत परिव्यय में पैसा वापिस लौटेगा, क्योंकि आपने खरीदारी करने के मामले में सरलीकरण नहीं किया है। दूसरा अनुसंधान पर जो पैसा लगाते हैं, वैज्ञानिकों को आपको आकर्षित करने के लिए डीआरडीओ में हमारा अनुसंधान, अणवेषण और ज्यादा पुख्ता हो, डीआरडीओ को मजबूत करना चाहिए।

 मैं चाहता हूं कि इस पर सरकार सफाई दे क्योंकि आडवाणी जी ने यह बात कही है। मैं भी इस बात को दोहराना चाहता हूं कि रक्षा के मामले में सरकार कब तक निर्यात पर निर्भर करेगी? स्वदेशीकरण होना चाहिए। बजट का एलोकेशन लैप्स करता है। लैप्स क्यों करता है, सरकार को जवाब देना होगा। इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है? कौन रिस्पांसिबल है? रिस्पांसिबिलिटी फिक्स करके सदन को बताना चाहिए। रक्षा मद में राशि का जो भी उपबंध किया गया है, उसका सदुपयोग होना। रक्षा अनुसंधान पर ज्यादा खर्च करना चाहिए।

उपाध्यक्ष महोदय : आपने रक्षा के बारे में एक ही बात बोलनी थी।

श्री मंगनी लाल मंडल :  महोदय, अब मैं दूसरी बात बोल रहा हूं।

उपाध्यक्ष महोदय : आप हर बार को एक बार ही बोलते हैं। अब यह अंतिम बिंदु है।

श्री मंगनी लाल मंडल : महोदय, अंतिम बिंदु कुपोषण का है। मैं कुपोषण और साक्षरता के बारे में एक बात कहना चाहता हूं। हमारे यहां कुपोषण की स्थिति दुनिया में सबसे ज्यादा भयावह है और शिक्षा के मामले में भी भयावह स्थिति है। वर्ल्ड बैंक ने जो रिपोर्ट दी है, मैं उस भयावह स्थिति को कोट करना चाहता हूं। चीन का बहुत नाम लिया जाता है और कहा जाता है कि हम चीन से आगे निकलेंगे। चीन तरक्की कर रहा है और हम मुम्बई को चीन के शंघाई से अच्छा शहर बनाएंगे। इंडिया की शिक्षा के बारे में वर्ल्ड बैंक ने एक किताब निकाली कि भारत में माध्यमिक शिक्षा की तस्वीर इतनी खराब और बदरंग है कि भारत में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 750 यूएस डॉलर है जबकि माध्यमिक शिक्षा क्षेत्र में सकल दाखिला दर, जिसे जीईआर कहा जाता है, सिर्फ 52 प्रतिशत है। चीन में प्रति व्यक्ति जीडीपी 1740 यूएस डॉलर है और माध्यमिक शिक्षा क्षेत्र में सकल दाखिला दर 51 प्रतिशत है। यह हमसे अलग है। राइट टू एजुकेशन बिल पास किया गया है और यह 1 अप्रैल से लागू होने वाला है। सरकार की इस बजट में कोई स्पष्ट स्थिति नहीं आई है कि 80 प्रतिशत कैसे साक्षर करेंगे। इसलिए मैं इस बजट को गरीबी बढ़ाने वाला, बेकारी बढ़ाने वाला, कुशिक्षा बढ़ाने वाला बजट मानता हूं। मैं इस बजट का विरोध करता हूं।

 

 

*श्री रामसिंह राठवा (छोटा उदयपुर)ः   मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।  देश में जमीनी वास्तविकता यह है कि पिछले 6 माह से महंगाई चरम सीमा पर पहुंची हुई है तथा पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में वृद्धि महंगाई को और अधिक बढ़ाएगी।  महंगाई जनता के जनजीवन से जुड़ा हुआ एक गंभीर मुद्दा है तथा सरकार को इससे उत्पन्न जनरोष की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।  खाद्यान्नों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है।  अमीरों और मध्यम वर्ग के लोगों को तो महंगाई से जूझने के लिए करों में ली गई कमी का लाभ मिलेगा, लेकिन जो आम आदमी आयकर नहीं देता है उसको इससे कोई लाभ नहीं मिलेगा बल्कि उसे तो खाद्यान्नों व अन्य जरूरी चीजों की कीमतों में वृद्धि से कष्ट ही उठाना पड़ेगा।  

          इन दिनों पूरे देश में नए बजट के बाद आम आदमी की रोटी महंगी होने पर हाहाकार मचा हुआ है।  प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री जी कह रहे हैं कि 2010-2011 के नए बजट में पेट्रोल और डीजल की बढ़ी कीमतों से आम आदमी की रोटी महंगी नहीं होगी और विकास के मद्देनजर में बजट में पेट्रोल और डीजल की बढ़ी कीमतों को वापस नहीं लिया जाएगा।

          सरकार ने आर्थिक समीक्षा 2010 में स्वीकार किया है कि देश में गरीबी 37.2 प्रतिशत है जो भारत जैसे तैजी से विकसित होते देश के लिए बहुत ज्यादा है।  देश में करीब 9 करोड़ परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं।  गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रहे परिवारों के अलावा समाज के कमजोर वर्ग भी भारी संकट और मुसीबत में पड़ जाने वाले परिवारों को भी साथ सुरक्षा के प्रावधान होने चाहिए।

          सरकार ने आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लिए बहुत कम राशि का प्रावधान किया है।  अनुसूचित जनजाति जनसंख्या को देखते हुए जो राशि दिया है वह सिर्फ 1200 करोड़ है।  गुजरात सरकार ने अनुसूचित जनजाति विभाग मंत्रालय को करीब 3000 करोड़ रुपए राज्य के विकास के लिए दिए हैं और केन्द्र सरकार पूरे देश के लिए सिर्फ 1200 करोड़ दिया है इससे आदिवासी समाज-गांव का भला होने वाला नहीं है। मेरी मांग है कि ज्यादा से ज्यादा अनुसूचित जनजाति मंत्रालय को आय का धनराशि का आयोजन करे।

          आदरणीय सभापति जी, भारत सरकार ने जो आंकड़ा दिया है उससे पता चलता है कि प्रति लाख जनसंख्या को देखते हुए सिर्फ 2005 के मुताबिक एक लाख जनसंख्या के सामने सिर्फ 70 डॉक्टर है जो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के लिए बहुत कम राशि है।

          देश में शिशु मृत्युदर 2005 के भारत के महारजिस्ट्रार का कार्यालय से जो आंकड़ें मिले हैं उन्हें देखने के बाद पता चलता है कि शिशु मृत्युदर 64 प्रतिशत बताया है।  सरकार महंगाई, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार, शिशु मृत्युदर और ऐसे कई बिन्दु हैं जहां सरकार फेल हो गयी है।  दलित आदिवासी पिछड़े हुए समाज, बेरोजगार और किसान तथा उभरते हुए युवाओं के बारे में कुछ नहीं किया है। ऐसी स्थिति में सरकार ने जो बजट पेश किया है मैं उसका विरोध करता हूं।  इसलिए मैं सरकार के इस बजट का विरोध करता हूं।

 

उपाध्यक्ष महोदय : श्री शैलेन्द्र कुमार। आपका समय सिर्फ दस मिनट है।

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):महोदय, दस मिनट नहीं है, कुल 17 मिनट है। मैं देखकर आया हूं। मैं अपने साथी के लिए भी समय छोड़ूंगा। महोदय, आपने मुझे सामान्य बजट पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। मुझे बोलना तो बहुत कुछ था लेकिन कम समय होने के कारण मैं कम शब्दों में बोलूंगा ताकिसभी को समझ में आए और वे अमेंडमेंट कर दें। यहां पक्ष-विपक्ष सदस्यों के बहुत अच्छे विचार सामने आए। सबने देश-विदेश, आयात-निर्यात और आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए अपनी बात कही। मैं इसमें ज्यादा नहीं जाना चाहूंगा लेकिन इतना कहा जा सकता है कि बजट आम आदमियों के लिए फायदेमंद बजट नहीं है।

 

15.09 hrs.

(Dr. Girija Vyas in the Chair)

जब लोकसभा सत्र चलता है, हम अपने निर्वाचन क्षेत्र के हर विधान सभा क्षेत्र के कम से कम 25-30 गांवों का दौरा करके आते हैं। यहां जो स्थिति पहले थी वही स्थिति आज भी है। आज भी गरीब आदमी खास तौर से रोज कमाने खाने वाले व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी दिक्कत है कि दो वक्त की रोटी परिजनों और बच्चों को कैसे मिले। यह सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। महंगाई के बारे में पिछले सत्र में भी चर्चा की गई थी और आज भी चर्चा कर रहे हैं। आज भी सदन के बाहर और जंतर-मंतर पर इस बारे में धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है कि महंगाई कम करने के बारे में वह कोई कारगर कदम उठाये। दूसरी तरफ यदि देखें तो आवश्यक खाद्य वस्तुओं के दाम करीब बीस प्रतिशत बढ़ गये हैं और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम 8.3 परसैन्ट बढ़े हैं। लेकिन मैं ज्यादा आंकड़ों में नहीं जाना चाहूंगा। आज हमारे बीपीएल कार्ड धारकों की पोजीशन बदतर से बदतर है। जब हम लोग गांवों में जाते हैं तो बीपीएल के तमाम लोग हमें घेरकर खड़े हो जाते हैं। वे कहते हैं कि हमें अनाज नहीं मिल रहा है, हमें तेल नहीं मिल रहा है, हमारे पास आवास नही है, हमें विधवा पेंशन नहीं मिल रही है, हमें वृद्धवस्था पेंशन नहीं मिल रही है, हमें सरकार की किसी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। हमें जॉब कार्ड नहीं मिला है। अगर जॉब कार्ड मिला है और हमने मजदूरी की है तो हमें उसका पैसा नहीं मिल रहा है। इस तरह की तमाम शिकायतें अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में सुनने को मिलती हैं।

          महोदया, सरकार ने पिछले बजट में सौ दिन में बहुत कुछ करने की बात कही थी। जैसे अलादीन का चिराग होता है या कोई जादुई छड़ी होती है कि सौ दिन में हम पूरे हिंदुस्तान की किस्मत बदल देंगे। सौ दिन के अंदर हम हिंदुस्तान की गरीबी दूर कर देंगे। लेकिन आज देखा जाए तो इस सरकार ने सदन को गुमराह करने के अलावा और कुछ नहीं किया है। सरकार ने यह भी कहा था कि दो रुपये में हम इतने किलो गेहूं और इतने किलो चावल देंगे। लेकिन उस पर भी कोई अमल नहीं हो पाया है। इस वक्त यह स्थिति है कि तमाम जगहों पर, मैं उत्तर प्रदेश की बात करना चाहूंगा, वहां चोरी, जमाखोरी और महंगाई चरमसीमा पर है। केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को दोष देती है और राज्य सरकारें केन्द्र सरकार को दोष देती हैं।

          आज यदि आम आदमी की बात की जाए तो उनमें खासकर जो हमारे बच्चे हैं, यदि उनकी स्थिति देखी जाए तो आज भी 45 परसैन्ट बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। उनके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था नहीं है। मिड डे मील योजना आपने लागू की है, लेकिन मिड डे मील के बारे में बराबर शिकायतें मिलती रहती हैं, हम लोग क्षेत्र का दौरा करते रहते हैं।

          आपने कुछ क्षेत्रों में प्रोत्साहन दिया है। सर्व शिक्षा अभियान को आगे बढ़ाने के लिए आपने तमाम बजट की व्यवस्था की है, लेकिन वह व्यवस्था आज भी पटरी पर नहीं पहुंच पाई है। प्रधान मंत्री राहत कोष से कभी-कभी गम्भीर बीमारियों के लिए कुछ पैसा दिया जाता है। हमारे पास हार्ट का बीमार, कैंसर का बीमार, किडनी का बीमार, ब्लड कैंसर, बोन कैंसर या अन्य गम्भीर बीमारियों के केसिज आते हैं। हम प्राइम मिनिस्टर को लिखते हैं। अब प्राइम मिनिस्टर फंड के तहत महीने में केवल दो केसिज तय किये हैं। जबकि महीने भर में हम लोगों के पास कम से कम दर्जनों केसिज आते हैं। हम लिखते हैं और बीमारी का बजट पांच लाख रुपये बनता है, परंतु कुल 50 हजार या 70 हजार रुपये दिये जाते हैं। इतने पैसों से उस गरीब आदमी का क्या भला होगा। इसलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहूंगा कि हैल्थ के मामले में, चाहे वह हैल्थ मिनिस्टर की तरफ से हो, प्राइम मिनिस्टर रिलीफ फंड को बढ़ाना चाहिए और जरूरतमंद लोगों के स्वास्थ्य के विषय में भी हमें ध्यान देना चाहिए। हमने देखा है कि विदेशों में हैल्थ इंश्योरेंस सिस्टम लागू है। लेकिन हमारे यहां यह व्यवस्था नहीं है। मैं समझता हूं कि इसे हमारे यहां भी लागू करने की जरूरत है।

          यहां किसानों के बारे में चर्चा की गई। अगर आज किसानों की स्थिति देखी जाए तो स्वामीनाथन रिपोर्ट में यह कहा गया है कि किसान किसी भी प्रकार के कृषि उपकरण के लिए यदि लोन लेना चाहे तो चार परसैन्ट की ब्याज दर पर उसे ऋण देना चाहिए। लेकिन हमने उसके लिए भी कोई व्यवस्था नहीं की है। आपने कुछ हजार करोड़ करोड़ रुपये की व्यवस्था करके शायद दक्षिण भारत या कुछ अन्य जगहों पर ऋण माफ किया है। इससे किसानों को थोड़ी बहुत सहूलियत तो मिली है, लेकिन आम किसान की माली हालत बहुत बदतर है, उसे अपने उत्पाद का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है। इसकी भी व्यवस्था हमें करनी चाहिए।

          इसके अलावा मैं दुधारू पशुओं की बात बताना चाहूंगा कि जो छोटा, लघु, सीमान्त कृषक है, यदि उसे चार परसैन्ट की ब्याज दर पर गाय, भैंस पालने के लिए आप ऋण उपलब्ध करा दें तो मेरे ख्याल से इससे उसे सामयिक फायदा मिलेगा और उसका जीवन स्तर ऊपर उठ सकता है। मैं समझता हूं कि सरकार को इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिए। हम गांवों में जाते हैं तो पांच सौ आदमी खड़े हो जाते हैं कि हम गरीब हैं। यह बात सही है कि केवल अनुसूचित जाति नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों में भी बहुत से लोग गरीब हैं। बीपीएल का कोटा एक गांव में अगर 40-50 है तो वहां पर पांच सौ बीपीएल खड़े मिलते हैं और हम कुछ कर नहीं पाते हैं। हम उन्हें देखकर केवल घड़ियाली आंसू बहाकर और कोरे आश्वासन देकर चले आते हैं।  

परन्तु उसके विषय में कुछ नहीं कर पाते हैं। आज बजट की व्यवस्था होनी चाहिये। इस प्रकार के गरीब बीपीएल धारकों के लिये कुछ न कुछ व्यवस्था करनी चाहिये। बीपीएल संसोधित कार्यक्रम चल रहा है, पता नहीं कितने लोगों का चल रहा है लेकिन आज तक चाहे श्री के.के. सक्सेना की रिपोर्ट हो या प्लानिंग कमीशन की रिपोर्ट हो,उसमें 35 प्रतिशत या 50 प्रतिशत संख्या बतायी जाती है। सरकार आज तक सही सूची उपलब्ध नहीं करा पायी है।  तेंदुलकर समिति रिपोर्ट कुछ कहती है?

          सभापति महोदया, अगर सर्व शिक्षा अभियान को देखा जाये तो हमने भवनों और अध्यापकों के लिये व्यवस्था की है लेकिन फिर भी अधिक भवनों और अध्यापकों की आवश्यकता है। कई जगह ऐसी हैं जहां बच्चों को दो-तीन किलोमीटर दूर स्कूल जाना पड़ता है जबकि सरकार ने एक मानक बनाया है कि यह एक से डेढ किलोमीटर होना चाहिये लेकिन हम व्यवस्था नहीं कर पाये हैं। आज जरूरत इस बात की है कि अध्यापकों की गुणवत्ता क्या है, क्या वह सही रूप से बच्चों को पढ़ा रहे हैं? आप विद्यालयों में चले जायें, समन्वय ही नही है। अगर 40 बच्चे हैं तो पांच अध्यापक हैं और कहीं कहीं पर 500 बच्चे हैं तो केवल एक अध्यापक है। इसका संतुलन बनाना होगा तभी सही मायने में हम सर्व शिक्षा अभियान के लक्ष्य को सफल बना पायेंगे। एक वित्त विहीन विद्यालय को मान्यता प्रदान कर उसे सर्व शिक्षा अभियान की सूची में शामिल कर के उसे प्रोत्साहन दें। मेरे ख्याल से शिक्षा की व्यवस्था से साक्षरता बढ़ेगी। हमें खासकर लड़कियों की शिक्षा की तरफ विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। एक बालिका मुश्किल से हाई स्कूल कर पाती है कि उसका बाल विवाह कर दिया जाता है। गरीब लोगों को चिन्ता सताती रहती है कि इसका विवाह कर दें। कानून एवं व्यवस्था की स्थिति खराब होने के कारण यह चिन्ता और बढ़ जाती है। अनेक सरकारें आती हैं लेकिन गांवों में दुश्मनी  ज्यादा रहती है, इसलिये बच्चों की शादी जल्द से जल्द कर दी जाती है। इस से बाल विवाह को प्रोत्साहन मिलता है। हम यहां महिला आरक्षण विधेयक की बात करते हैं लेकिन अगर जब से लड़की पैदा हो, उसकी पढ़ाई से लेकर रोजगार तक व्यवस्था कर दी जाये तो मेरे ख्याल से उसी दिन से महिला आरक्षण बिल की सार्थकता हो सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी हमारा लक्ष्य पूरा हो पायेगा। आज जरूरत नहीं है कि 181 सीटें महिलाओं के लिये यहां आरक्षित कर दी जायें तो देश में महिलाओं की स्थिति ठीक हो जायेगी, यह स्थिति ठीक होने वाली नहीं है। जब तक उसे पैदा होने से लेकर उसकी शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था नहीं कर दी जाती है, तब तक यह स्थिति ठीक होने वाली नहीं है। इसलिये मैं मांग करना चाहता हूं कि इस बजट में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये कि पंचायत स्तर पर आदर्श विद्यालय खुलें जिससे लड़कियों को अच्छी शिक्षा मिल सके।  जब तक शिक्षा में समानता नहीं लायेंगे, जब तक एक मजदूर या रिक्शा वाला का बेटा कलैक्टर के बेटे के साथ एक ही स्कूल में नहीं जायेंगे तब तक यह मकसद पूरा नहीं हो सकेगा।

          सभापति महोदया, मैं पेय जल और सिंचाई की व्यवस्था की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। आज हम पानी का इतना दोहन करते हैं कि भूगर्भ में जल की कमी हो गई है। डीप बोरिंग करके पहाड़ी इलाकों में  ब्लास्टिंग कूप लगाने की व्यवस्था करनी चाहिये।

          सभापति महोदय, अनुसूचित जाति और अनुसूचत जनजातियों के लिये बजट में पूरी व्यवस्था नहीं की गई है। उससे लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता है। उसका पैसा सरकार दूसरे विभाग में डाइवर्ट कर देती है। आज एस.सी.एस.टी. के लोगों की दशा खराब है। उनके कल्याण के लिये बजट बढ़ना चाहिये ताकि हमारा जो लक्ष्य है, वह पूरा हो सके। इसके लिये व्यवस्था होनी चाहिये।

          अंत में यही कहूंगा कि मेरे पास पाइंट्स तो बहुत हैं लेकिन समय की कमी के कारण नहीं जा पाऊंगा। एक पाइंट सांसद निधि के बारे में कहना चाहूंगा। जितने सांसद हैं, वे सब एक स्वर से कहते हैं कि या तो इस निधि को बढ़ाया जाये या इसे समाप्त किया जाये।

          महोदया, कल करीब पौने दौ सौ सांसदों से हस्ताक्षर कराकर हमने एक पत्र वित्त मंत्री जी को दिया है। या तो सांसद निधि को बढ़ाइए या फिर इसे बंद कर दीजिए, तभी हम लोगों की इज्जत बच पाएगी। आज हम बदनाम हैं, एक किलोमीटर सड़क पीडब्ल्यूडी बनाता है तो उस पर 40 लाख रूपया खर्च आता है।

सभापति महोदया : इसे सब माननीय सदस्य जानते हैं। आप अपनी बात समाप्त कीजिए।  

श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदया, मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि माननीय मंत्री जी इस पर विशेष तौर पर ध्यान दें। इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करते हुए इस बजट का मिला-जुला, केवल विरोध करते अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा। जब तक आम आदमियों के लिए, किसानों के लिए, गरीबों के लिए बजट न हो, तब तक हम उसका समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं हैं। धन्यवाद।

 

 

*SHRI P. LINGAM (TENKASI): When it was presented, the hon. Finance Minister claimed that our economy has seen growth, but the fact remains that starvation deaths are continuing, unemployment problem is on the increase and standard of living comes down. There are various estimates about the standard of living, but nobody can deny the fact that the majority of our people are living in a backward state. Claiming that we are a welfare state, the Government resorts to anti-people measures. This attitude has led us to the present state of affairs. I, for one, would like to urge upon this Government to ensure overall growth with a holistic view.

          There is a steep increase in the price of essential commodities. 19.57 per cent is the gross food price increase, but the sugar price increase touches 58.96 per cent, potato price increase touches 53.39 per cent, prices of pulses increased by 45.64 per cent. This is the finding of the Planning Commission. This only suggests that all the earnings of the people have to be spent on food articles. To meet expenses on education and health, people have to fend for themselves and go in for loans. Else, they deny themselves of education and health.

          Unemployment problem increases day by day. From being the problem of individuals, it has emerged as a social problem. That is why, youth are seen to be resorting to extremism. Serious efforts must be taken to contain rise in prices and unemployment problem. Public Distribution System must be strengthened to provide essential commodities at a cheaper rate by way of enhancing the subsidy.

          Though agriculture is the backbone of our economy, it is being neglected and being looked down upon. The agricultural sector is facing several problems now. Irrigation is the mainstay for agriculture. But proper water management is not there leading us to have a lurking fear that water sharing may lead to disintegration of the country affecting the unity and integrity of the country. In

 

 

 

order to ensure required water for agriculture, all the rivers must be nationalized. Subsidy for agricultural inputs must be enhanced and should be made available easily. Agricultural credit management must be streamlined and all banks must be asked to extend loans for agricultural purposes. We must ensure fair and remunerative price for agricultural produce. We must strengthen agriculture, the most important economic activity in the country. There must be a comprehensive social security legislation to give adequate protection to all the agricultural workers and industrial workers.

          Our national wealth is being taken away from the country in the form of black money by people who evade tax. It is learnt that huge amount of money that belongs to this country have been parked in Swiss Banks. Many political parties have emphasized the need to bring back our money from those banks. Serious efforts in this direction must be taken immediately.

          Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Programme is not being properly implemented though it emphasizes that job opportunity for 100 days in a year would be provided in an assured manner. This may lead to siphoning of funds. The path taken by the Government now shows that they are not very sure of the steps they are taking. When the US can trace and get back the money stacked in the Swiss Banks, why can we not do the same? Bilateral talks with Swiss authorities must be held in this regard and if need be, we should even snap our relations if they are not cooperative. I urge upon the Government to come clear on this and come before this House with a White Paper on it.

          India must take efforts to find a lasting solution to the vexing problem of Sri Lankan Tamils. Even at a time when the entire world was condemning the genocide and even when the UN was about to go in for sanctions against the Sri Lankan Government, India remained a mute spectator without condemning the regime there or stopping the genocide. Human rights violations, genocide and denial of equal status and treatment found in any neighbouring country must be unequivocally condemned. The Government of India must come forward to help them find a lasting political solution ensuring sovereign rights to the Tamils. In the last year’s Budget, we had allocated certain sum for the rehabilitation of internally displaced Tamils in Sri Lanka. The Government must find out whether that money was spent really on the needy Tamils. That fund ought to have been distributed either by our Ministers or our officials directly by visiting that country as a high level delegation. It is not enough to get a certificate from the Sri Lankan Government, our Government must supervise the rehabilitation measures directly.

          Katchativu, an integral part of India, was handed over to Sri Lanka and it must be rescinded. More than 400 fishermen from Tamil Nadu have been killed by the Sri Lankan Navy in the high seas. How can we claim that we are a sovereign country when we merely watch our own people being shot down by the military of a neighbouring country? Our fishing rights must be established. We must go in for getting back Katchativu and must stop the killings of Indian fishermen.

          Tamil has been accorded the classical language status, but attendant rights have not been conferred. Regional languages must not be ignored as it would violate the federal spirit enshrined in our Constitution. Hence, I urge upon the Government to see that all the facilities are provided to use Tamil in Parliament in all its proceedings.

          I would also like to know from the Government as to why the funds allocated for the Scheduled Castes have not been utilized fully. I would like to draw your attention that their living conditions are no better. We must take earnest steps to see that the benefits of all the Governmental schemes accrue to them. I urge upon the Government to pay special attention towards this.

Water resources for Tamil Nadu needs to have Centre’s care. The Supreme Court has permitted to store water in Mullaiperiyar Dam up to a height of 142 ft. Instead of implementing the Apex Court’s direction, the Government of Kerala is resorting to various dilatory moves. We must not remain a silent spectator. Similarly, the efforts on the part of the Government of Andhra Pradesh to construct a check dam across the river Palar must be checked. Even now, we are looking forward to an amicable settlement to the Cauvery River Water Dispute.

The Union Government must roll back the tax levied on diesel and petrol. Already people are suffering from price rise. The enormity has only increased. It is unfair. Hence, I urge upon the Government to go in for reducing prices of petrol and diesel.

The public sector units must be adequately protected for they remain as national assets. It is only because of privatization in the power sector the power cuts have become rampant. Electricity is also an essential one. Hence, it must be under the direct control of the Government. The power generation and distribution must vest with the Government.

We must rescind the Indo-US Civil Nuclear Cooperation Accord. We find many apprehensions about the take off of that agreement. When we have nuclear capability, why should we pledge ourselves to foreigners? The interest of Indian people must be safeguarded.

The Government must allocate more funds for education to ensure more support to educational institutions in the rural areas. Noon Day Nutritious Meal Scheme must be carried out ensuring quality and standard. The infrastructure development must get priority in the rural development schemes. MPLAD Scheme must get increased allocation so that health and drinking water schemes are also attended to by the Members of Parliament.

I would like to point out that the allocation for health is inadequate. It must be enhanced. I must also point out that the allocation for drinking water and health projects are coming down in all these consecutive years.

It needs no emphasis to stress that strengthening of PDS alone can help us to bring down price rise. But it is disheartening to note that the Government is reducing its allocation to PDS year after year. In order to ensure that all the needy people get the benefit, 5 per cent of GDP must be allocated for PDS which is less than 1 per cent as of now. Urban development schemes must also get priority.

More funds must be allocated to Bharat Nirman Programme, rural road construction and rural housing schemes. Poor people must get land for constructing their own dwelling units and the Government must come forward to acquire land and distribute it to the needy.

It must be ensured that all the districts in the country get a Navodaya School and a Kendriya Vidyalaya. Children from such districts which do not have these Central educational institutions must be admitted on a priority basis in the neighbouring districts in such schools.

With these words, I conclude.

 

 

*SHRI HARIBHAU JAWALE (RAVER) : As stated in General Budget that the budget 2010-2011 is facing grave uncertainties.  The overall prices in the market for the daily needs of common man have unusual price rise.  The prices of Fruits, Green Vegetables, Food grains, cereals and essential commodities have price rise ranging from 30% to 45%.

          There are injustice with the peoples of Maharashtra State and Mumbai, for no special provision has made in this budget for them. I want to draw the Hon. House attention towards the drastic changes in the climatic conditions at my district of Jalgaon, most of our Banana and other predominant crops has destroyed and on the other hands because of the hike in the prices farmers are in frustrated position. The lower and middle income group of families are being harassed by the Credit Societies, the other major problems common man are facing in the state of Maharashtra.  Because of the wrong adoption of the policy for issuing the licenses for such societies without evaluating the credentials of the promoters and no proper monitoring system has been adopted by the State Government, societies are landed in very bad situation and not able to recover the amount lends to the borrowers.  I had personally requested several time during my tenure as a member of Parliament to intervene through Central Ministry to at least minimize the situation of these societies but no positive approach has been initiated either from the Finance Ministry nor from Our Hon. Prime Minister.  In this budget Government had failed to provide any assistance to such societies in the State of Maharashtra.  Even no comments on this was made or discussed in the budget. I strongly recommend through Hon. House to at least provide some sort of First Aid scheme or package to resolve the liquidity problems for these societies.

 

          Hon. Finance Minister has announced in their last budget that the Agricultural Development will be taken on top priority but no such agricultural infrastructure development was observed. During my last budget speech I had requested to make some provision for the Agricultural Road Development and to bring these roads under the purview of planning so that it can be considered for the budget provisions.  On one side government is talking about strengthening the Food security and on the other side no provision has been discussed about for provision of good and enough approach for the farmers.  I request Hon. Finance Minister to reserve some funds to initialize these ktai ke raste and to provide separate head for these for boosting the youth farmers for developing the agricultural field work.  Because of this farmers can save at least some money out of the expenses incurred on local handling.  As mentioned in this budget the strategic aims to impetus to development of food processing sectors five more food parks has to be set up in this year.  Jalgaon District contributes the largest growers and suppliers of the total consumption of Banana to the country one such Mega Banana Food Park to be established at this place to promote the new generation youth farmers coming up in the field of agriculture.

          To enhance the agricultural products irrigation system plays very vital roll Government’s budgetary allocation towards financing towards irrigation has been far from satisfactory.  In the State of Maharashtra in particular in Jalgaon District there are many projects which are pending for fund allocation.  I request to send Central Government’s team to observe & take review of the status of pending projects and the provision for the required fund has to be allocated.

          The second and important demand is for making the availability of Seeds & Fertilizers with the reasonable prices.  I want to bring to kind notice of the Hon. House there are many of the seeds cultivator coming up in the field of Genetically Modified seeds development where there is no Guidelines has been established.  I request to establish the Guidelines to strictly control the fake market in the seeds and to provide sufficient quantity of subsidized fertilizers.

          As in the market prices of sugar has been increased for more than double the rate as compare to last year but on the same time sugar industries are not getting benefit of these increased prices and in turn no cash rise in the hands of farmers, the main cultivators of the sugar. At the same time government has increased the  quota of levy sugar from 10% last year to 20% this year.  How this will support to farmers?  There are many export subsidy claim pending with Government.  I request Hon. Minister to please expedite the timely disbursements of these claims.

          Maharashtra State are facing very crucial problem of security.  The Police Department personnel has to be trained for the new techniques and will have to be assured for the latest technology developed weapons and ammunitions.

          In the filed of education Government is lacking for providing and extending the higher education facilities.  For the Medical students there are only few seats available for Post Graduation purposes.  Looking at the higher rate of population growing in our country in the field of Professional studies new openings has to be established to accommodate more students for Post Graduation Studies in various Medical field.

          In the health programme announced through Rashtriya Swasthya Bima Yojana the benefit for the BPL card holders and their families are not properly extended, as there is no proper identification of the BPL card holders hence the real BPL families are surviving for not being covered under this scheme.  So I request to identify the BPL families through the State Ministry and issue them the smart Card to avail the benefit under RSBY scheme.

          All the self-employed professionals, Businessman, Industrialists and traders in various field have anxiously waiting for the budget, as they have thought in mind for the provision of simple and straightness in the filling of the various Tax Returns.  Day by day the complicated system has been introduced by the Government. For example VAT tax audit has introduced, in the initial stage it was very simple but  recently some new format has been established which are puzzling at traders to fill the form and run after to  complete the formalities hampering the time from business activity. All of them are in the mind that the limit of the audit will going to be increased and they will be exempted from the audit procedure which is very costly for them.  I request Hon. Finance Minister to increase the exemption Audit limit at least to 1 crore.

          In railway the definition of Senior Citizen is at the age of 60 years but for Income Tax the same is considered at the age of 65 years.  Railway Ministry and Finance Ministry are the part of Central Government then why there is different interpretation?  I request Hon. Finance Minister to change the definitions of Senior Citizen in the eyes of Income Tax department as it is there in Railway Department.

          With the recent elections for the House of Parliament the new areas has been defined in the delimitation based on the number of voters.  For every Member of Parliament the area of the constituency is increased though some part was deleted. As look at it for every Member he has to look after at least 6-8 constituencies of the legislative assembly. Even many of the constituency the parts of two districts are covered.  As per the recent high rising inclination of graph for the prices almost in every commodities the development fund provision is very short.  The Member can not honour real justice for the development of the constituency, hence I request Hon. House to enhance the limit of MPLAD at least 6 crore as against the provision of 2 crore.

          Hence I request through Hon. Speaker and through Hon. Finance Minister to provide the following demands in this budget.

To provide separate head for Agricultural Field approach roads (katai ke raste) and reserve funds in the initial stages for the fruit growing agricultural lands.

To provide the funds to complete the pending projects in the filed of irrigation on top priority.

To enhance the funds for higher professional education to increased intake capacity of Post Graduation Medical Seats in various discipline.

1.              To establish the guidelines for Genetically Modified Seeds and observe strict control on it which is affecting the human body very rapidly.

To reduce the compliances burden on small taxpayers the audit account exemption be increased from 40 lakh instead of 60 lakh and in case of professionals from 10 lakh to 25 lakh instead of 15 lakhs as provided in this budget.

Actually for common man the basic exemption limit of the tax should be at least 2 lakh with the exemption limit of 2 lakh on tax savings as against the specified limits suggested for 1.60 and 1.20 lakh in the current budget.  As now a days saving on account of insurance playing vital roll which is necessary also in the fast and unsecured life style and the funds so generated can be utilized for the infrastructure development.

To enhance the limit of MPLAD from 2 crore to 6 crore specially in the rural area constituency.

To carry out special drive to bring new BPL families under the benefits of Rashtriya Swasthay Bima Yojana.

To establish Mega Banana Food Park in Jalgaon District, the largest producers and suppliers of Banana to the country.

To provide special package for the Credit Societies in the state of Maharashtra.

To make special provision for up gradation of Security and Police force.

To amend the definition of Senior Citizen at the age of 60 years and allow the exemptions in Income Tax rates applicable accordingly.

 

 

*श्री प्रेमदास (इटावा)ः आज जो आम बजट पर चर्चा हो रही है।  इसमें 2010 में बिन्दुवार बजट किया गया है।  उसमें स्पेशन्स कम्पीटेन के अंतर्गत अनुसूचित जातियों के लिए पिछले वित्त वर्ष में अधिक बजट था इस बार कम कर दिया गया जबकि सीधा लाभ गरीबों को व अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों को मिला है।

          आज पर्यावरण की बहुत बड़ी समस्या है।  वनों की बड़ी तादाद में काटा जा रहा है।  वृक्षारोपणों के लिए सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही इसको बजट देकर अधिक प्रोत्साहन दिया जावे।

          वर्षा का पानी सीधा नदियों के माध्यम में समुन्दर में चला जाता है।  इसको रोकने के लिए हर नदी में 50 कि.मी. पर बांध बनाकर रोक कर निकाले जाने के लिए बजट दिया जाये जिससे कृषि का जलस्तर सही हो सके।

          प्रधानमंत्री सड़क योजना में आपने बजट कम कर दिया।  जबकि सड़क योजना सबसे अच्छी योजना है बजट अधिक दिया जाये

          प्रत्येक लोक सभा क्षेत्र के लिए 1000/- हैंड पम्प के लिए बजट दिया जाये जिससे पानी की समस्या हल हो सके।

          मंहगाई को रोकने के लिए लोगों को रोजगार के अवसर देने के लिए कृषि को बढ़ावा व भ्रष्टाचार को रोका जाये कम्पनी की बनी वस्तु के दाम लागत से डेढ़ गुना रहने के लिए बाध्य किया जाए। कम्पनी की बनी वस्तु के दाम लागत से डेढ़ गुना रहने के लिए बाध्य किया जाए।

*श्री राम सिंह कस्वां (चुरू)ः  मंत्री जी ने जो बजट पेश किया है, यह प्रगति विरोधी, विकास विरोधी, भीषण महंगाई बढ़ाने वाला बजट है।  यह आम आदमी का बजट नहीं है, इस बजट में भी सत्तर करोड़ गरीबों के बजाए चंद लाख उद्योगपतियों का ज्यादा ध्यान रखा गया है, क्या इसके बाद भी कुछ कहने की गुंजाइश है।  संसद में पेश बजट में किसानों के लिए कुछ भी नहीं है, यह बजट पूंजीपतियों का है।  ऐसा ही हर बार होता है, देश में लगभग 60 प्रतिशत किसान आबादी के बजाय कम आबादी वाले लोगों का खास ख्याल रखा जाता है।  आपने कहा है कि आम आदमी का बजट है लेकिन यह आम आदमी का बजट नहीं है।

          पूर्व की भांति इस बजट में भी कृषि की घोर उपेक्षा की गयी है, जहां 90 के दशक में योजना व्यय का 8 से 10 प्रतिशत कृषि पर खर्च किया जाता था वह घटकर 2.4 प्रतिशत के आस-पास पहुंच गया है। दलहन और तिलहन उगाने के लिए और अधिक सहायता देने की बात हो रही है, लेकिन यह कहने भर के लिए है।  देश के सामने खाद्यान्न संकट की जो समस्या है, वह प्रत्यक्ष रूप से कृषि की अनदेखी के कारण है।  हमारे देश की जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे हमारा अन्न उत्पादन घटा है।  कृषि क्षेत्र घटता जा रहा है प्रति हैक्टयर जितना अन्न का उत्पादन होना चाहिए था उतना नहीं हो रहा है।  कृषि भूमि निरंतर घट रही है, खेती के लिए बजट में जो आवंटन किया है, वह काफी कम है।  सरकार सिर्फ सस्ते कर्ज के भरोसे खेती का विकास दर बढ़ाना चाहती है।  आज किसान की हालत सबसे बुरी है, इतनी बुरी है कि वह जीने-मरने का भेद भूल गया है।  सरकार के पास एक ही रासता है, किसान को अधिक से अधिक कर्ज में लपेटे रखा जाए।  हालत बुरी हो तो थोड़ा सा कर्ज माफ कर दिया जाए।  किसान तभी जिन्दा रह सकता है जब उसे कृषि लागत का मूल्य मिल जाए।  इसके लिए यह भी जरूरी है कि खेती लागत कम से कम करने के उपाय किए जाने चाहिए।  बजट में कृषि उत्पादन बढ़ाने की सूझ पूरी तरह से गायब है।

          यूरिया के दाम पहले से ही बढ़ाए जा चुके हैं।  खेती की बुनियादी जरूरत सिंचाई मद में आवंटन नाम मात्र का बढ़ाया गया है।  खेती योग्य भूमि 60 फीसदी हिस्सा असिंचित है, जहां मानसून के भरोसे खेती होती है।  सिंचित क्षेत्र मे पानी की कमी से सिंचाई परियोजनाएं ठप्प होने लगी हैं।  बजट में नदियों को जोड़ने की कोई घोषणा नहीं की गयी, आप पानी के लिए क्या करने जा रहे हैं।  

          कृषि संबंधी स्थायी समिति व किसान आयोग ने 4 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण देने की सिफारिश की थी, लेकिन उसकी अनुपालना नहीं हुई।  फसल बीमा का विस्तार स्वागत योग्य है, लेकिन फसल बीमा योजना का किसानों को नाममात्र का भी फायदा नहीं हो पा रहा है।  इसमें इकाई तहसील को माना गया है, जबकि नुकसान का आंकलन ग्राम पंचायत वार किया जाना चाहिए।  सूखे की स्थिति के बाद भी दावों का भुगतान समय पर सही ढंग से नहीं हो रहा है।

          यह बजट भीषण मंहगाई बढ़ाने वाला बजट है, वित्त मंत्री जी पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाकर मंहगाई से त्रस्त किसान, मजदूर और आम आदमी के साथ अन्याय किया है।  स्टील व सीमेंट पर भी उत्पादन शुल्क बएकर मंहगाई का बोझ बढ़ा दिया है। वित्त मंत्री जी ने एक भी उपाय ऐसा नहीं किया है जिससे आम आदमी को राहत मिल सके।  बजट भाषण में वित्त मंत्री जी ने किरीट पारेख कमेटी की सिफारिशों का जी जिक्र किया है, तेल कंपनियों के घाटे  पर चिंता जतायी है, इसका मतलब साफ है कि बजट के बाद डीजल और पेट्रोल की कीमतों की फिर बढ़ोत्तरी संभव है।  मंत्री जी ने बीस हजार रुपए का टैक्स लगाकर आम आदमी पर बहुत भारी बोझ डालने का काम किया है।  सरकार को उत्पादन वे पेट्रोलियम पदार्थों के शुल्क वृद्धि से 40 हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय होगी, जबकि आयकर स्लैब बढ़ाने से सरकारी खजाने को 20,000 करोड़ का नुकसान होगा।  उससे भी 3 लाख से 8 लाख सालाना कमाने वाले को ही फायदा होगा।  फिर कहते हैं कि यह आम आदमी का बजट है।  आम आदमी की परिभाषा क्या है?  उम्मीद की जा रही थी कि वित्त मंत्री जी ऐसी घोषणा करेंगे जिससे खाद्य वस्तुओं के दामों में गिरावट आयेगी लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया।  मंहगाई की चुनौती और कृषि संकट को इतना महत्व नहीं दिया गया जितना महत्व बजट में दिया जाना चाहिए था। मेरी मांग है कि गेंहू का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया जाए।  आज गेंहू का बाजार भाव और समर्थन मूल्य में लगभग 900 रुपए प्रति क्विंटल का अंतर है।  यूरिया, सीमेंट, स्टील पर होने वली मूल्यवृद्धि को वापस लिया जाए।

          बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, बजट में इसके लिए कुछ भी नहीं किया गया है।  नरेगा को जो विकल्प बनाया गया था, वह अस्थायी समाधान है।  स्थायी समाधान के लिए जरूरी है कि रोजगार के नए साधन मुहैया कराए जाए।  श्रम प्रधान तकनीकी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए लेकिन सरकार द्वारा इस दिशा में कोई बड़े प्रावधान नहीं किए गए हैं।  बल्कि इस बार बजट में बेरोजगारों के मुद्दे लगभग अछूता छोड़ दिया गया है।  आज नरेगा भ्रष्टाचार का प्रतीक हो गयी है, अगर इस पर कंट्रोल नहीं किया गया तो ग्रामीण क्षेत्र में बहुत बड़ा संकट पैदा हो जाएगा। आज नरेगा में जो श्रम प्रधान कार्य करवाए जा रहे हैं उसकी क्या उपयोगिता है, स्थायी परिसम्पत्तियां तैयार हो ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए।  नरेगा को किसानों की खेती के साथ जोड़ने का कार्य किया जाना चाहिए।  नरेगा मजदूरों की वर्तमान हालत को देखते हुए बेरोजगारी भत्ता दिया जाना कहीं अधिक उपयोग सिद्ध हो सकता है।

          सांसद निधि 1998-99 से दो करोड़ रुपए चली आ रही है, जबकि पिछले दस वर्षों में वस्तुओं की कीमतों में काफी इजाफा हुआ है, इसलिए प्राथमिकता के आधार पर राशि बढ़ानी चाहिए।

          बजट में राजस्थान को कुछ भी नहीं दिया गया है, केन्द्र एवं राज्य में एक पार्टी की सरकार होने के बाद भी राजस्थान के साथ अन्याय किया गया है।  राजस्थान एक पिछड़ा प्रदेश है, राजस्थान सरकार स्पेशल पैकेज के लिए काफी समय से मांग कर रही है।  सूखे से जूझ रहे राजस्थान को विशेष दर्जा न देकर प्रदेशवासियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

          पानी की स्थिति राजस्थान में तो और भी विकट होने जा रही है।  सिंचाई के पानी की बात तो छोड़िए पीने के पानी की विकट समस्या पैदा होने जा रही है।  राजस्थान में पीने के पानी व सिंचाई के पानी का भयंकर संकट है।  “वाटर ईमरजेंसी ”  जैसे हालात हैं।  पानी पर विशेष दर्जा देना तो दूर की बात है, पानी के मामले पर बजट में चर्चा तक नहीं की गयी।  कोई दूर की बात है, पानी के मामले पर बजट में चर्चा तक नहीं की गयी।  कोई अतिरिक्त सहायता देना भी उचित नहीं समझा।  मेरे क्षेत्र में जर्मन के सहयोग से संचालित आपणी योजना के द्वितीय फेज़ की चर्चा तक नहीं की गयी।  चुरू जिले में सुजानगढ़-रतनगढ़ तहसील में पीने के पानी का विकट संकट है, इसके समाधान के लिए उक्त योजना तैयार की गयी थी जो कुछ समय से केन्द्र के पास विचाराधीन है।  मेरी गृह तहसील राजगढ़-चुरू में पीने के पानी का संकट हल करने के लिए पौने चार सौ करोड़ की बूंगी-राजगढ़ योजना बनायी थी।  तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे जी द्वारा उक्त योजना का शिलान्यास भी किया गया था, लेकिन पिछले पन्द्रह माह मे उस योजना मे एक पाइप भी लगाने का काम नहीं किया।

          आज दिल्ली व राजस्थान में आपकी सरकार है, स्वीकृतशुदा कार्यों को रोकने का काम किया जा रहा है। इंदिरा गांधी नहर परियोजना का कार्य वर्षों पूर्व पूर्ण हो जाना चाहिए था, लेकिन वित्तीय प्रावधान कम होने के कारण पंजाब द्वारा 1981 के समझौते के अनुसार 060 एम.ए.एफ. पानी नहीं देने के कारण आज तक नहर का काम पूर्ण नहीं हो रहा है।  यही हालात सिधमुख-नोहर फीडर का है, इसके लिए 017 एम.ए.एफ. पंजाब-हरियाणा पानी नहीं दे रहा है।  बी.बी.एम.बी. में बार-बार आग्रह के पश्चात् भी राजस्थान को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा रहा है।  हरियाणा यमुना जल समझौते की पालना नहीं कर रहा है।  इसी समझौते से चुरू जिले को पानी मिलना था, हरियाणा-दिल्ली दोनों में एक ही पार्टी की सरकार है।  वैश्विक मंदी के कारण हैंडीक्राफ्ट उद्योग बूरी तरह से प्रभावित हुआ है।  मेरे संसदीय क्षेत्र चुरू में काफी उद्योग हैं जो बंद है इन्हें चालू करने के लिए सहायता की आवश्यकता है।  सरकार को इसके लिए स्पेशल पैकेज देना चाहिए था लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया गया है।  बजट में राजस्थान में भयंकर सूखे के असर को कम करने व पशुधन को बचाने के लिए एक शब्द भी नहीं कहा गया है।

SHRI KALYAN BANERJEE (SREERAMPUR): Hon. Chairperson, I must thank you for giving me a chance to speak.  I heard the speech of the hon. Member, Shri Yashwant Sinha, yesterday. 

          Before entering into my main speech, I have some queries to put to the hon. Member, Shri Yashwant Sinha.  When he was the Finance Minister under the leadership of Shri Chandra Shekhar Ji, he deposited the gold in the World Bank.  What is the position today?  The present Finance Minister is purchasing the gold from the World Bank. 

          Today, much criticism is there with regard to the Public Distribution System.  As far as the Public Distribution System is concerned, under the Essential Commodities Act, all powers have been delegated to the State Governments.  All Statutory Control Orders are being  engrafted by the State Governments.  De-hoarding was the main subject of discussion yesterday. This de-hoarding has to be effected by the State Governments.  If a State Government does not effect de-hoarding, in that case it is impossible to carry out the Public Distribution System itself.  If there is an effective Public Distribution System, it automatically carries, and it automatically generates the scope of employment.  If the Public Distribution System is effectively done, people of this country get their due essential commodities.

          Hon. Chairperson, in our State, under the Public Distribution System in the list of BPL beneficiaries the names are not of the poor people, but the names of the persons belonging to the Party Cadres are there in the BPL list.   Under the name of the Public Distribution System, the food material and other things are being given only to the Party Cadres.  Poor people do not get any advantage on Public Distribution System and the System has been totally paralysed in the State of West Bengal. Whose fault it is?

          The rural development schemes which are there have to be implemented through State Governments.  In our State, even if there is a scheme or even a proposal has been made by an hon. Member of Parliament, because of a different Ruling Party in the State, there is no acceptability of the scheme which is proposed. There is nothing to take care of that. This is about the rural development itself which is there. 

          Fiscal deficit as a percentage of GDP has narrowed down to 6.9 per cent, including oil and fertilizer bonds in the current year in comparison to GDP which was 7.8 per cent.  Now, the projected figure is shown as 5.5 per cent.   We must say that the hike in Customs Duty of petrol and diesel to 7.5 per cent and increase Central Excise Duty on non-branded petrol and diesel by Re.1 per litre has got enormous problems in the daily life of people. The price hike affects almost in every sphere of life.  The petrol becomes costlier by Rs.2.83 more a litre and diesel by Rs. 2.66 more a litre in Kolkata itself.

          Although the Budget has not been passed, I do not understand why the increase of price has been effected with effect from the night of 26th February in the entire country.

I would like to request the hon. Finance Minister to reconsider imposition of the Central Excise Duty on the price of petrol and diesel products.  Imposition of service tax on the Railways is not appreciated from my end.  It would tremendously have the effect of rise in prices of essential commodities.  I would make a request to the hon. Finance Minister that there must be reconsideration and withdrawal of the service tax from the Railways. 

          Today in respect of agriculture sector, something has been said.  I would like to point out just one thing that during the six years from 1998 to 2004, there was an incentive given to farmers which was increased from 10 per cent to 60 per cent.  Today, in the last five years, this increase is 450 per cent to 500 per cent.  One must appreciate the flow of agricultural credit in our country itself.  As against the target of Rs. 2,80,000 crore (provisional) for agricultural credit in 2008-09, the banking system disbursed credit of Rs.2,92,437 crore to the agricultural sector thereby exceeding the target by around four per cent.  Commercial banks and regional rural ranks (RRBs) together extended credit to 81.02 lakh new farmers during 2008-09. In addition to this, cooperative banks provided loans to 13.88 lakh new farmers during the period, thus taking the total number of farmers financed by the banking system to 94.90 lakh.

          I would request the hon. Finance Minister, which I do not find in the Budget itself, that there is any serious thought in respect of education of the children of minorities, the Scheduled Castes, and the Scheduled Tribes up to the age of 18 years.  There must be social service; there must be amenities given to the women who are in the weaker section, minorities who are in the weaker section, Scheduled Castes who are in the weaker section, and Scheduled Tribes who are in the weaker section. With great respect to the hon. Finance Minister, I do not find in his speech itself that there is any special provision for the purpose of minorities, for the purpose of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes.   I do not find anything from the speech itself of the hon. Finance Minister, with great respect to him, that in our country we cannot forget about the minority institutions or madrasas.  As far as any help, any financial assistance to them is concerned, I have not seen if any provisional arrangement has been made to that extent.  Today, there is unemployment, there is a crisis.  There must be some arrangement.  Some heavy industries have to be set up by the Central Government itself.  It should not be dependent only on the private sector.

          I would like to highlight that one of the things which has a great help to the middle class people is the tax benefits given.  So far as the middle class people are concerned, the income tax has been brought down to a great extent.  Up to Rs. 3 lakh or below, there is no additional tax.  Up to Rs. 4 lakh, now there is a decrease in tax of Rs. 10,300.  Up to Rs. 5 lakh, there is a decrease in tax of Rs. 20,600.  Up to Rs.6 lakh, there is a decrease in tax of Rs. 30,900.  Up to Rs. 7 lakh, there is a decrease in tax of Rs. 41,200.  Up to Rs. 8 lakh, there is a decrease in tax of Rs. 51,500.  The statistics show today that by reason of decrease in the tax, 73 per cent serving employees, those who are in the employment, are getting the benefit of the decrease in tax.  The middle class people are also getting the benefit of the decrease in tax.  There is a chance, when these monies are saved, in the market itself the monies will come and there will be increase in production. We are having a great hope that there would be a scope for employment generation in the near future by reason of the decrease of the tax slab up to Rs. 8 lakh.  There are certain portions showing remarkable allocations. 

          If I do not say about that, then I will not be discharging my duties.  One of the remarkable allocations is one per cent interest subsidy for housing costs up to Rs.20 lakh.  It gives benefit to the persons who need to construct a house. It gives a real incentive from lower income group to middle income group. 

          As far as agricultural labourers are concerned, there are so many debates and so many things.  Since yesterday it has been said from Opposition that this Budget has not been for the farmers.  Farm loan repayment has been eased by six months, that is, 30th June, 2010. It is a great help to the farmers. 

          The allocation to Defence has also been increased. That is also an important part, so far as our country is concerned.  The allocation has been increased up to Rs. 1,47,344 crore. 

          One of the important things is that there has been a hike in the allocation for women and child development.  It has been hiked by 80 per cent. We appreciate this thinking about women and child, which is required in our country. 

          Another important part is this.  Many things have been said about rural development. I have pointed it out earlier. So far as rural development scheme is concerned, if it is not implemented, then the fault rests with the State Government.  Today, water projects are coming up.  We are giving our plans for the water projects but the State Government is not approving them.  People are interested to give their land for the purpose of setting up of the Primary Health Centre or for the water project. It is unfortunate that in our State the State Government is not giving its consent for the purpose of setting up of the water project or the Primary Health Centre in rural villages, which is a part of our rural development programmes.  This time, a sum of Rs. 66,100 crore has been allocted for rural development.

          There has been a proposal to set up a Coal Regulatory Authority, which is one of the remarkable things, and I appreciate that. One of the important parts is that this time allocation to power sector has been more than doubled, and it is Rs.5,130 crore. Today, the Power Regulatory Commission is identifying the cost of electricity.  It has gone up to a great extent.  It needs now a reconsideration of the statute itself.  Whatever money the power generating agency is spending, it comes ultimately to the consumer.  The power regulatory system is not giving the result. 

          In paragraph 111 of the hon. Finance Minister’s Budget speech, there has been a mention about strengthening of alternate dispute mechanisms – National Mission for Delivery of Justice and Legal Reforms. Madam, with great respect, I would like to say that this has not achieved any result in our country.  What is this alternate dispute forum? When the Tribunal judges sit; they go at 12 noon and come back at 3.30.  The retired persons are appointed there.  What is their accountability?  There is no accountability.  Rather I would propose to the extent to think over this.  You increase the strength of judges in the High Courts and in the Supreme Court but please do not think about this alternative dispute mechanism, which is not giving any result to us.  It may give result to the Government itself and whoever is there in the Government enjoy the same.  Justice has become delayed.  Maybe the Government is benefited but the litigant is not benefited.  Again I would like to say is about setting up of the Circuit Bench of the Supreme Court all over the country.  It has become very costly; today every litigation goes up to the Supreme Court in Delhi.  All the litigations have become prestigious.   How can the poor people come to Delhi from their place?  As far as litigation is concerned, Delhi has become very costly.  Madam, I would request the Government, through you, to think about setting up of the Circuit Benches of the Supreme Court all over the country.

With these words, I would like to extend my thanks to the hon. Chairperson.

 

*श्री रतन सिंह (भरतपुर)ः  यू.पी.ए. एवं माननीय प्रधानमंत्री के विवेकपूर्ण सलाह एवं प्रोत्साहन के अनुरूप माननीय वित्त मंत्री महोदय ने जन कल्याणकारी आम आदमी को लाभान्वित करने हेतु जो लोकप्रिय बजट प्रस्तुत किया है उसके लिए हम सब आपके आभारी हैं और अभिनन्दन करते हैं।  माननीय वितत मंत्री महोदय ने अपनी बहुमूल्य सूझ-बूझ से देश के प्रत्येक राज्य को, प्रत्येक नागरिक को अमीर-गरीब किसान व मजदूर सभी को लाभान्वित कर प्रगति के सूत्र में बांधने का उत्तरदायितव पूर्ण कार्य कर सामाजिक समरसता व उत्साह का वातावरण बनाया है।  माननीय मंत्री महोदय बजट प्रस्तुत करते समय सकारात्मक आशावादी, पारदर्शित एवं दृढ़निश्चय, देश के चहुंमुखी विकास को समर्पित रहे हैं जो बहुत सराहनीय एवं देशहित में है।

          वैश्विक मंदी के दौर में भी हमारी अर्थव्यवस्था का चीन के बाद सबसे तेजी से बढ़ना काबिले तारीफ तो है ही साथ ही सरकार द्वारा लायी गयी सही नीतियों व कार्यक्रमों की कारगरता का पुख्ता सबूत भी है।  लेकिन यह ……………. करना आवश्यक है कि क्या इसका सही व पूरा फायदा गांवों तथा आम आदमी को भी मिल रहा है या नहीं।

          खुशी की बात यह है कि 2010-11 के बजट में इस पर अच्छा खासा ध्यान दिया गया है।  यह कोशिश की गई है कि गांवों व शहरों के साथ-साथ गरीबों, पिछड़े तबकों तथा मध्यम वर्ग के लोगों को विकास का पर्याप्त लाभ मिल सके।  एक ओर उनकी बचतों को बढ़ाने तथा दूसरी ओर उनकी जरूरतों को पूरा करने पर जोर दिया गया है।

          कुल योजना व्यय का 37 प्रतिशत आधारभूत ढांचागत विकास, सामाजिक विकास के लिए खर्च का प्रावधान इसी की पुष्टि करता है।  गांवों खासकर खेती की तरक्की के लिए जोर साफ करता है कि उससे एक ओर कृषि उत्पादन में इजाफा होगा तो दूसरी बढ़ती कीमतों पर लगाम लगेगी।  किसानों को मिलने वाली उधार में 3 लाख 75 हजार करोड़ रुपए की बढ़ोत्तरी, उधार पर सब्सिडी, खाद सब्सिडी की नई नीति, नई हरी क्रंति की जरूरत पर जोर, दलहनों की उपज में वृद्धि के लिए अलग बजट, खेतीबाड़ी की मशीनों का सस्ता किया जाना, गोदामों की क्षमता को बढ़ाने की कोशिश, उपज के प्रसंस्करण आदिपर जोर बताता है कि वित्त मंत्री जनसंख्या के सबसे बड़े तथा सबसे पिछड़े तबके के प्रति कितने ख्याल पसन्द हैं।

          हर गांव में बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की पूंजी में वृद्धि, स्वयं सहायता समूहों पर ध्यान, ग्रामीण स्वास्थ्य बीमा योजना का विस्तार, महा नरेगा, भारत निर्माण, इंदिरा आवास कार्यक्रमों पर अधिक जोर बताते हैं कि श्रद्धेय राजीव गांधी के संदेश लागू करते हुए भारत निर्माण को विशेष तरजी दी गई है।

          एक बहुत अच्छी बात यह है कि शहरों, खासकर शहरों में रहनें को विवश लोगों को स्लमफ्री इंडिया, झुग्गी में रहने वालों पर ध्यान, शहरी आवास, गरीबी-बेरोजगारी दूर करने वाले कार्यक्रमों के खर्च में इजाफा साफ करता है कि गांव-शहर के मिलेजुले विकास द्वारा ही भारत निर्माण का स्वप्न पूरा हो जाएगा।  शहरों के विकास के खर्च में 75 प्रतिशत बढ़ोतरी की गई है।  

          असंगठित कामगारों के लिए अलग से फंड सामाजिक सुरक्षा कोष में वृद्धि, महिला व बाल कल्याण की  राश में इजाफा, महिला किसानों पर विशेष ध्यान बताता है कि सरकार सभी प्रकार के लोगों, विशेषकर उपेक्षितों के विकास के प्रति कितनी गंभीर है।  

          बुनियादी ढांचे के विकास पर 1 लाख 73 हजार करोड़ रुपए का प्रस्तावित खर्च पुष्टि करता है कि सरकार विकास दर को बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

          प्रस्तुत बजट में विकास, संतुलन, स्थिरता व समानता के साथ-साथ गरीबी व बेरोजगारी निवारण पर भी पूरा ध्यान दिया गया है।

          ग्रामीण विकास कार्यों में 69170 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 76100 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है जो 11 प्रतिशत अधिक है।  इससे गांवों के चहुंमुखी विकास एवं दलित, मजदूर, किसान, युवा एवं जरूरतमंदों को रोजगार के अवसर स्वतः ही सहज सुलभ होंगे।  एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्रों में आबादी का निष्क्रमण रुकेगा।  गरीब, जरूरतमंद एवं युवा सर्वत्र रोजगार पाकर लाभान्वित होगा।  विकास के सुअवसर प्राप्त कर सकेगा।

          ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल पर्याप्त मात्रा में सहज सुलभ हो इसके लिए 9300 करोड़ रुपए बढ़ाकर 10500 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है जो सराहनीय है। समूचे देश में पीने के स्वच्छ जल की उपलब्धता एक विकट समस्या है जिसका समाधान प्रस्तावित बजट प्रावधानों से हो सकेगा।

          माननीय, राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है। इसका क्षेत्रफल देश का 10 9प्रतिशत है।  जनसंख्या 5 प्रतिशत निवास करती है एवं 18.7 प्रतिशत पशुधन है।   अत्यधिक कम वर्षा के कारण भूजल मात्र 1 प्रतिशत ही है।  सभी को पीने का स्वच्छ पानी पर्याप्त मात्रा में मिले इसके लिए राजस्थान ने 49747.20 करोड़ रुपए की पेयजल  परियोजनाएं बनायी हैं।  राज्य सरकार के सीमित साधनों को देखते हुए विशेष केन्द्र सहायता प्रदान किया जाना नितांत जरूरी है इसके लिए 10000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की विशेष सहायता राशि जारी करने की कृपा करें एवं कुल 50000 करोड़ रुपए की राशि प्रदान कर राजस्थान वासियों को अनुग्रहित करें।

          मैं माननीय प्रधानमंत्री जी एवं माननीय वित्त मंत्री जी से विनम्र निवेदन करता हूं कि जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए तथा राज्य की सामाजिक आपदा को ध्यान में रखकर 50000 करोड़ रुपए की विशेष सहायता राशि उपलब्ध कराने की कृपा करें। 

 

*श्रीमती उषा वर्मा (हरदोई):,  2010-11 का जो बजट पेश किया गया है, यह पूरे तरीके से गरीब विरोधी व किसान विरोधी है। ऐसा प्रतीत होता है यह बजट पूंजीपतियों के हित में पूंजीपतियों द्वारा बनाया गया बजट है।

          हमारा देश जो कि 70औ कृषि पर निर्भर है, डीजल, पैट्रोल व खाद की कीमत बढ़ने से किसानों की हालत और बदतर होगी। इससे फसल का उत्पादन कम होगा और देश में गरीबी आयेगी।

          जहां एक ओर रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े हैं, वहीं दूसरी ओर गरीब लोगों की समस्यायें बढ़ गई हैं। सरकार कहती है, गरीबों के लिए मनरेगा योजना चल रही है, 100 रूपये मजदूरी मिल रही है, लेकिन गांवों में जहां पचास गरीब परिवार हैं, वहां केवल 25 बीपीएल कार्ड दिए जा रहे हैं। गरीबों को मनरेगा द्वारा काम नहीं मिल पा रहा है। बीडीओ, सीडीओ यह कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि इस गांव के लिए इतने ही कार्ड मिले हैं, क्यों नहीं सरकार को सभी गरीब परिवार दिखाई दे रहे हैं।

          गरीबों के लिए इंदिरा आवास की योजना है लेकिन यदि गरीब परिवार 100 हैं तो आवास 50 हैं। इससे आधे लोग वंचित रह जाते हैं और इंदिरा आवास भी उन्हीं लोगों को मिल पाते हैं, जिनके पास अधिकारियों को कमीशन देने के लिए पैसा है।

          अतः महोदया, कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए डीजल, पैट्रोल के दाम कम किये जायें। खाद, बीज पर सब्सिडी दी जाये और खेती की सिंचाई मुफ्त की जाये। मनरेगा के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया जाये, जिससे गरीब अपने परिवार का पालन पोषण कर सके। किसानों का लम्बी बीमारी में मुफ्त इलाज कराया जाये।

          यह बजट जो कि पूरी तरह से गरीब विरोधी  व किसान विरोधी है, इसका मैं विरोध करती हूं।

 

*श्रीमती सुशीला सरोज (मोहनलालगंज): वित्त बजट में बीपीएल धारकों के लिए भी कुछ नहीं है। खेती किसानों की पूरी तरह उपेक्षा की गई है। आंकड़ों में उलझाकर देशवासियों को झूठे सपने दिखाने की परम्परा की कड़ी में एक और बजट है। वित्त मंत्री ने एक ओर तो हरित क्रंति खाद्य भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए ग्रामीण विकास की बातें की हैं लेकिन दूसरी ओर क्षेत्र के विस्तार पैट्रोल-डीजल महंगा करने और किसानों के कर्ज पर ब्याज कम न करके जता दिया है कि इस प्रकार की प्राथमिकता खेती, किसान व गांव न होकर उच्च वर्ग के स्वार्थों का पोषण ही है।

          किसान को न तो सिंचाई के लिए पानी मिल रहा है न खाद और बीज और बिजली भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पैट्रोल, डीजल के दाम बढ़ाकर सरकार ने महंगाई को और बढ़ाने का रास्ता खोल दिया है। इसका फायदा मुनाफाखोर और सट्टेबाज ही उठायेंगे।

          महोदया, वर्ष 2010-11 का यह बजट मुद्रास्फीति बढ़ाने वाला है क्योंकि आर्थिक समीक्षा में खाद्यान्न के आयात निर्यात की बदतर तस्वीर पहले ही साफ हो गई है। हमारा थोक मूल्य सूचकांक अभी भी नव प्रतिशत के आसपास है। कुछ लोग कह रहे हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य के मद में बहुत कुछ किया गया है लेकिन सच्चाई यह है कि पिछली बार जितना आबंटन प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के मद में किया गया था वह पूरा खर्च भी नहीं किया गया। ऐसा कई क्षेत्रों के साथ आबंटन में किया गया है।

          वित्त मंत्री ने कहा है आने वाले दिनों में 10 प्रतिशत की विकास दर दूर की कौड़ी नहीं है। हमारी सरकार ने बुनियादी ढांचे के लिए विकास का खजाना खोल दिया है लेकिन उनके द्वारा पेश बजट के आंकड़े उलटी बात कह रहे हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना बड़ी जोरशोर के साथ की गई थी कि गांवों की सूरत बदलेगी लेकिन बजट में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। क्या गांवों की सभी सड़कें दूरस्त हो गई हैं? यदि नहीं तो सड़कों के बिना बुनियादी ढांचा कैसे मजबूत होगा?

          यही हाल नरेगा का है। पिछली बार सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के बजटीय आबंटन में लगभग 144 फीसदी की वृद्धि की थी। इस बार करीब ढाई प्रतिशत की रस्म अदायगी की गई है। बजट में तिलहन और दलहन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए विशेष योजना सामने रखी गई है। मुख्य रूप से 60 हजार गांवों को चिन्हित कर उसमें दलहन और तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास किया जायेगा तथा इसके लिए लगभग 300 करोड़ रूपये उपलब्ध कराये जाने की बात कही गई है। दलहन और तिलहन की उपलब्धता देश के सामने एक बड़ी समस्या रही है, यह अपने आप में एक अच्छा प्रयास है।

          मोटे तौर पर इस बजट ने अपना फोकस ग्रामोन्मुखी करने की कोशिश की है। 66 हजार करोड़ रूपये ग्रामीण विकास के लिए 48 हजार करोड़ रूपये भारत निर्माण के लिए तथा 40 हजार करोड़ रूपये नरेगा के लिए आबंटित किये गये हैं। यह एक अपूर्ण प्रयास है। वित्त मंत्री ने स्वयं यह बात कही है कि बजट एक एकाउन्टिग दस्तावेज न होकर एक नीतियों का भी दस्तावेज होता है लेकिन इस बजट में ग्रामीण क्षेत्र में एक रिफार्म का विजन सृजित करने जैसी कोई चीज दिखाई नहीं देती।

          इस बजट ने विकास को एक दिशा देने का प्रयास तो किया है लेकिन प्रयास एक तरफ अधूरा सा प्रतीत होता है। वहीं दूसरी तरफ यह आम आदमी को हाशिये पर धकेलता सा लगता है। अल्पकाल में यह कीमतों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। निश्चित तौर पर यह आम आदमी का खास बजट न होकर खास आदमी का आम बजट रह जाता है।

 

 

*श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर)ः मैं आपके माध्यम से 2010-11 के जनरल बजट के संबंध में वित्त मंत्री का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं तथा देश एवं प्रदेश से संबंधित प्रस्तावों को जनरल बजट में सम्मिलित करने की मांग आपके माध्यम से करता हूं।

          बजट के पैरा 125 के तहत आयकर में स्लेब वाईज छूट देने का प्रस्ताव किया गया है इस प्रस्ताव के माध्यम से 3 लाख रुपए तक सालाना आय वाले कर्मचारियों को कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ है।  इससे इस बजट के प्रस्तावों से आम कर्मचारी की परेशानी बढ़ी है तथा खास कर्मचारी जिसको प्रायः अधिकारी वर्ग से जाना जाता है को ही फायदा पहुंचाने का प्रयास किया है।  अतः मेरी यह मांग है कि 3 लाख रुपए सालान जिन कर्मचारियों की आय है उनके लिए भी वित्त मंत्रीजी बजट में  राहत देने की घोषणा करें।

          बजट के पैरा 143 में जून 2008 को कस्टम डय़ूटी में दी गई छूट को वापस लिया गया तथा पेट्रोल एवं डीजल एवं रिफाईण्ड प्रोडेक्ट पर एक रुपए प्रति लीटर उत्पाद कर बढ़ाने का प्रस्ताव किया है इससे आम आदमी अपने आप को बहुत परेशानी में महसूस कर रहा है।  डीजल की बढ़ोतरी से किसानों को अपनी उत्पादकता बढ़ाने में बहुत मुश्किलों का सामाना करना पड़ेगा और आम आदमी को महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी। बढ़ती हुई महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है।  अतः पेट्रोल एवं डीजल पर बढ़े हुए दामों को वापस लेने की मांग मैं वित्त मंत्री जी से करता हूं।

          वित्त मंत्री जी ने बजट भाषण के पैरा 14 से 19 तक में देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने के सम्बंध में जिक्र किया है।  निर्यात को बढ़ाने के संबंध में भी उल्लेख किया गया है, लेकिन मेरे बीकानेर संसदीय क्षेत्र के वूलन सेक्टर, जो गत दो-तीन सालों से मंदी की मार झेल रहे हैं।  वूलन इन्डस्ट्रीज एसोसिएशन द्वारा वूलन सेक्टर के पुनउर्द्धार के लिए 125 करोड़ के पैकेज की मांग की गई थी, जिसका बजट में उल्लेख नहीं होना, बीकानेर के वूलन सेक्टर के लिए चिन्ता का विषय है, क्योंकि बीकानेर वूलन मण्डी एशिया की सबसे बड़ी ऊन मण्डी है।  इस सेक्टर को मंदी से उबारने के लिए मैं आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी से 125 करोड़ रुपए के पैकेज की मांग करता हूं।

          बजट भाषण के पैरा 79 में महात्मा गांधी  राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी के तहत 48 हजार करोड़ का प्रावधान रखा गया है।  मैं वित्त मंत्री जी को आपके माध्यम से यह सुझाव देना चाहता हूं कि नरेगा के तहत राजस्थान राज्य की विशेष परिस्थितियों कोध्यान मे रखते हुए प्रत्येक किसान के लिए एक लाख लीटर क्षमता वाला वाटर टैंक बनाने की अनुमति किसान के स्वयं के खेत में दी जायें, जिससे ग्रामीण क्षेत्र मे पानी की उपलब्धता के लिए बेहतर आधारभूत ढांचा विकसित हो सके एवं किसान अपने स्वयं के खेत में खेती के साथ-साथ बागवानी के लिए अग्रसर हो सके एवं आय के अतिरिक्त स्रोत भी विकसित हो सके।  प्रथमतः राजस्थान के सभी 11 मरूस्थली जिलों में सभी 5 लाख लघु एवं सीमान्त कृषकों को इस कार्यक्रम में सम्मिलित किया जाए।  इसके लिए तकनीकी दृष्टि से 15 फुट व्यास एवं 20 फुट गहरा टांका बनाना आवश्यक है, जिसके चारों और प्रत्येक जिले की औसत वर्षा के आधार पर कम से कम 60 से 80 फुट व्यास का जलग्रहण क्षेत्र (आगौर) बनाया जाए।  इस योजना के क्रियान्वयन में हमारा यह भी सुझाव है कि जलग्रहण क्षेत्र स्थानीय मुरड़ या अन्य सामग्री से कुटाई कर पक्का बनाया जाए जिससे एक ही अच्छी वर्षा से टांका पूरा भर जाए।  इस माप के टांके एवं आगौर के निर्माण पर तकनीकी आंक्लन के आधार पर लगभग 80,000/- का खर्चा आएगा।  जिसमें लगभग 50 प्रतिशत श्रम पेटे एवं 50 प्रतिशत राशि सामग्री पेटे आवश्यक होगी।  टांको का निर्माण सभी की सहभागिता के सदस्य एवं गांव में उपलब्ध भूमिहीन श्रमिक एवं अन्य बेरोजगार श्रमिकों को भारी संख्या में श्रम रोजगार उपलब्ध हो सकेगा।

          बजट भाषण के पैरा 44 सं 54 तक में कृषि विकास के बारे में उल्लेख कयि गया है कि कृषि वकास का सीधा संबंध फसल बीमा योजना से है।  अतः फसल बीमा योजना के बारे में भी बजट में उल्लेख किया जाना चाहिए।  फसल बीमा योजना के बारे में मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी को सुझाव देना चाहता हूं कि वर्तमान में  फसल बीमा योजना में सम्पूर्ण तहसील को ईकाई माना गया है, जिससे किसानों को बहुत कम लाभ इस योजना का मिल रहा है।  यदि तहसील की जगह गांव को ईकाई मान लिया जाए, तो इस योजना का लाभ अधिक से अधिक किसान उठा सकेंगे एवं कृषि विकास में अपना सहयोग दे सकेंगे।  कृषि विकास में किसान क्रेडिट कार्ड की भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है।  किसान क्रेडिट कार्ड जारी करने की प्रक्रिया को सरलीकृत किया जाना चाहिए एवं नवीनीकरण के समय वर्तमान में बैंको द्वारा जो दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, उनकी आवश्यकता नहीं है। एक बार किसान क्रेडिट कार्ड जारी होने के बाद नवीनीकरण की प्रक्रिया सरलीकृत प्रक्रिया के माध्यम से किये जाने से किसानों को समय पर ऋण उपलब्ध हो सकेगा एवं किसान कृषि के विकास में अपना अपेक्षित योगदान दे सकेंगे।  

          बजट भाषण में राष्ट्रीय कृशि ऋण माफी एवं राहत योजना का उल्लेख किया गया है, लेकिन राज्य सरकारों द्वारा भेजे गए पुनर्भरण प्रस्तावों के बारे में इस संबंध में कोई उल्लेख नहीं किया गया है।  जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है एवं राजस्थान के सहकारी बैंकों की सामने तरलता की समस्या उत्पन्न हो गई है।  अतः पुनर्भरण के बारे में भी स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए।  भारत सरकार द्वारा बीकानेर जिले को ऋण माफी एवं राहत योजना में विशेष दर्जा देते हुए न्यूनतम रुपए 20000 तक की राहत समस्त कृषकों को देने का प्रावधान किया गया है जिसके अन्तर्गत बैंक द्वारा 1843.13 लाख रुपए की पूर्ण माफी दी गई है।  यानि इन कृषकों को लघु एवं सीमान्त कृषकों के अनुरूप कुछ भी राशि जमा नहीं करानी थी।  इससे स्पष्ट है कि यह राहत राशि वास्तविक रूप से ऋण माफी राशि है।  ये सभी अन्य कृषक श्रेणी के अन्तर्गत 20000 रुपए तक के ऋणी हैं।  अतः उक्त माफी की राशि भारत सरकार द्वारा तुरन्त दी जानी थी जो अभी तक नहीं  दी गई है।  इसके अतिरिक्त ऋण राहत पेटे 663.12 लाख रुपए के क्लेम भारत सरकार को भिजवाये गये थे जिनके विरुत्र भी अभी तक क्लेम प्राप्त नहीं हुआ है।  अतः मैं आपके माध्यम से मांग करता हूं कि इसे प्रस्तावों को बजट में सम्मिलित किया जाए, इससे न केवल बीकानेर जिले के किसानों बल्कि राजस्थान के सभी किसानों को राहत मिल सके।

          बजट भाषण में आधारभूत ढांचे के विकास की बात पीपीपी (निजी सहभागिता) मोड पर करने का उल्लेख किया गया है, लेकिन देश की प्रमुख नदियों को जोड़ने जैसी महत्वपूर्ण योजना का उल्लेख बजट में नहीं किया गया है।  मैं आपके माध्यम से मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि देश की नदियों को जोड़ने के प्रस्ताव को बजट में स्थान मिले एवं इस हेतु उचित बजट प्रावधान करके देश की प्रमुख नदियों को जोड़ने का प्रोजेक्ट हाथ में लिया जाना चाहिए।  जिससे राजस्थान जैसे रेगिस्तान प्रदेश को एवं देश के अन्य प्रदेशों जहां बाढ़ की परिस्थितियां बनी रहती हैं। नदियों के जुड़ने से देश में सूख तथा बाढ़ दोनो परिस्थितियों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।

          बजट में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बारे में भी उल्लेख किया गया है लेकिन गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों की सही संख्या का ही पता न हीं लगेगा तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सही ढंग से लागू कैसे किया जा सकता है।  अतः इस संबंध में मेरा ये सुझाव है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जिसका भी मकान कच्चा हो वो बीपीएल की श्रेणी में आना चाहिए और जो बीपीएल पक्का मकान रखता हो उसको बीपीएल की श्रेणी से बाहर किया जाना चाहिए और राज्य सरकारों से इस संबंध में सर्वेक्षण करवा कर सही संख्या ज्ञात कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बेहतर ढंग से लागू किए जाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

          बजट मे पैरा संख्या 80 में इन्दिरा आवास योजना में इकाई लागत की राशि बढ़ाई गई है ये राशि स्टेण्डिंग कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार मैदानी क्षेत्रों में 50 हजार एवं पहाड़ी तथा दुर्गम क्षेत्रों में 60 हजार की जानी चाहिए।  राजस्थान के पश्चिमी जिले जो अधिकांशतया रेगिस्तानी इलाके से संबंध रखते हैं और मकान बनाने के लिए परिवहन लागत ज्यादा आती है अतः राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों को भी दुर्गम क्षेत्र माना जाना चाहिए और इन्दिरा आवास की इकाई लागत 60 हजार की जानी चाहिए।  

1.    बजट में पैरा संख्या 85 में लघु, सूक्ष्म एवं मध्यम उद्योगों को राहत देने की बात कही गई है।  मैं इस संबंध में आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी को सुझाव देना चाहता हूं कि जिस हस्तशिल्पियों ने खादी ग्रामोद्योग बोर्ड एवं खादी ग्रामोद्योग आयोग से 1000 रुपए से 3000 रुपए तक के ऋण आज से 20-25 वर्ष पूर्व में लिए थे।  वर्तमान में इन छोटे कामगारों एवं बुनकरों हस्तशिल्पियों की ऋण राशि चुकाने की क्षमता भी  नहीं है और वे आत्महत्या भी कर रहे हैं अतः आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी से मांग है कि इनकी ऋण राशि को माफ करने की घोषणा इस बजट प्रस्ताव में करें जिससे सूक्ष्म, लघु कारीगरों, बुनकरों एवं हस्तशिल्पियों को वास्तविक रूप से राहत मिल सके।

पूरे देश मे वैट लागू होने पर सीएसटी प्रतिशत शून्य करने का प्रस्ताव था।  पूरे देश में वैट लागू है अतः सीएसटी शून्य किए जाने की घोषणा बजट में अविलंब की जानी चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

डॉ. संजीव गणेश नाईक (ठाणे): सभापति महोदया, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे इस बजट में बोलने का मौका दिया। मैं आदरणीय प्रधानमंत्री जी, यूपीए चेयर परसन आदरणीय सोनिया गांधी जी, वित्त मंत्री जी और आदरणीय नेता शरद पवार जी को धन्यवाद देता हूं। ऐसी नाजुक स्थिति में देश गुजर रहा है, उस वक्त देश को अखंडता की तरफ ले जाने की कोशिश यह सरकार कर रही है, मैं सरकार के समर्थन के लिए यहां खड़ा हूं। ऐसी स्थिति में दोनों तरफ से कोई हां और कोई न कह रहा है और मैं बीच में खड़ा हूं। मैं समझता हूं कि हमारे सदन के हर सदस्य ने अपनी बात रखी है, समय की कमी की वजह से मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा।

          सभापति महोदया, मुझे पता है कि पिछले साल से इस देश में किसानों को बहुत तकलीफों से गुज़रना पड़ रहा है, इसमें कोई न नहीं बोल सकता, लेकिन उससे बाहर निकलने की कोशिश यह सरकार कर रही है। मैं सरकार को धन्यवाद करूंगा कि पूरी कोशिश के साथ देश को आगे बढ़ाने की कोशिश यह सरकार कर रही है। मैं सदन में बहुत दिनों से देख रहा हूं कि कृषि मंत्री जी के पीछे बहुत दिनों से लगे हुए हैं, मैं अपने माननीय सदस्यों को एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि हमें ऐसे कृषि मंत्री जी मिले हैं, जिन्होंने हर राज्य को साथ लेकर इस देश को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। मेरे इस वक्तव्य से सभी माननीय सदस्य सहमत होंगे कि पिछले साल दोबारा जब ये सरकार बनी, पिछले साल के बजट में जो प्रावधान किया गया था, उसे पूरा करने की कोशिश इस सरकार ने की है। मैं समझता हूं कि इस बजट में भी ऐसी स्थिति में हमारा देश गुजर रहा है, जहां मंदी है, आना कम और जाना ज्यादा है। ऐसी स्थिति में देश के सभी क्षेत्र के लोगों को अपनेपन की भावना से कुछ देने की कोशिश सरकार के माध्यम से हो रही है।

          सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से दो-तीन बातें कहना चाहूंगा, मैं जिस क्षेत्र से हूं, ज्यादातर शहरी विकास क्षेत्र से हूं। मैं सरकार को, अर्थ मंत्री जी को धन्यवाद करूंगा। हमारे देश में ज्यादातर लोग गांवों में रहते हैं, लेकिन अब शहरों की ओर आबादी बढ़ रही है। मैं समझता हूं कि उसकी ओर सरकार ने ध्यान दिया है। पिछले साल हमने मांग की थी – जेएनएनयूआरएम, हमारे प्रधान मंत्री जी ने एक खास प्रावधान किया था कि सात साल के कार्यकाल में सब शहरों की अलग-अलग योजनाओं के द्वारा मदद की जाएगी। पिछले साल इसे बढ़ाने की मांग हमने की थी। हमारे जैसे नए-नए सदस्य जो यहां आए हैं, उनकी मांग थी कि हमारे क्षेत्र से नयी-नयी योजनाएं यहां भेजी गई हैं, लेकिन उन्हें कुछ कारणवश नगीं लिया जा रहगा है। मैं अर्थ मंत्री जी से विनती करूंगा कि उनके लिए कुछ प्रोविजन किया जाए, क्योंकि शहरों की तरफ भी ध्यान देने की जरूरत है। हम कहते हैं कि देश युवाओं का है, लेकिन हमारे बुजुर्ग भी बढ़ रहे हैं, उनकी तरफ भी ध्यान देने की जरूरत है। हमारे बजट में उसका प्रोविजन किया है, जैसे सीनियर सिटिजन, वेलफेयर सेंटर आदि। मैं जिस शहर से हूं, वहां हमने करीब 40 सेंटर बनाए हैं। जिनके माध्यम से, ऐसे जो बुजुर्ग लोग हैं, जैसे मुंबई जैसे शहर में हैं कि वहां उनका ध्यान करने वाला कोई नहीं है। वहां ऐसे लोग इकट्ठे होते हैं, किसी एक जगह पर रुकते हैं और आपस में अपना सुख-दुख बांटते रहते हैं। मैं समझता हूं कि ऐसे सेंटर बनाने की जरूत है। मैं अर्थ मंत्री जी से कहूंगा कि इस बारे में कुछ सोचें। मैं समझता हूं कि इसके बारे में राज्य शासन, केन्द्र शासन और स्थानीय, जो नगरपालिका और नगर पंचायतें हैं, उनके माध्यम से अगर करेंगे तो निश्चित रुप से आने वाले दिनों में बहुत ही अच्छा होगा। मैं समझता हूं कि पिछले कुछ वर्षों में हमारा देश नक्सलवादी और आतंकवादी गतिविधियों के दौर से गुजर रहा है। मुंबई ऐसा शहर है, हमारी आर्थिक राजधानी है। उसे ठेस पहुंचाने की कोशिश पिछले साल हुई। महाराष्ट्र सरकार बहुत आगे बढ़ रही है।

          महोदया, उसके लिए पिछले सालों में एन.एस.जी. टीम मुकर्रर की गई हैं। हमारे लिए कोस्टल बोट्स भी दी गई हैं। कोस्टल की निगरानी के लिए कहा गया था कि दो हैलीकौप्टर देंगे, लेकिन वे अभी तक नहीं दिए गए हैं। कुछ एडवांस इक्विपमेंट की खरीद का प्रॉवीजन भी इस बजट में नहीं किया गया है। मैं विनती करता हूं कि इनके लिए भी बजट में प्रॉवीजन करने की आवश्यकता है, जिससे न सिर्फ मुम्बई, बल्कि देश का जो पूरा तटीय इलाका है, उसकी रक्षा की जा सके। मुझे पूरी उम्मीद है कि सरकार इस बारे में ध्यान देगी। जैसा मैंने कहा कि हमारे शहर बढ़ रहे हैं, उसी तरह से शहरों में गरीबों की भी संख्या बढ़ रही है। मैं चाहूंगा कि जैसे हम राजीव गांधी योजना के अन्तर्गत घर बनाकर दे रहे हैं, उसके लिए इस साल के बजट में धन का प्रॉवीजन किया गया है, लेकिन मैं समझता हूं कि जो मायग्रेशन रेट है, वह इतना बढ़ रहा है कि हर आदमी शहर में जाना चाहता है, परन्तु उसकी रहने की व्यवस्था नहीं होने के कारण वह फुटपाथ पर रह रहा है। मुम्बई जैसे शहर में अगर आप देखेंगे, तो वहां बहुत से गांवों के लोग आकर बस रहे हैं। सरकार प्रयास कर रही है कि हमारा देश बिना झुग्गी-झोंपड़ी वाला बन सके। इसके लिए मैं सरकार की सराहना करना चाहता हूं। मैं चाहूंगा कि इस मद में जो प्रॉवीजन की गई है, उसे बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि वहां के लोगों को भी अच्छे घर और मकान मिल सकें।

          सभापति महोदया, मैं समझता हूं कि जितनी भी राज्य सरकारें हैं, उन सबकी इतनी आमदनी नहीं है कि लोगों को अपने हिसाब से सुख, शांति और चैन से रहने की सुविधाएं दे पाए। पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप की कई नई योजनाएं केन्द्र सरकार द्वारा लाई गई हैं। मैं समझता हूं कि राज्य सरकारों को साथ में लेकर, अलग-अलग नियमों और अलग-अलग कार्यों हेतु उन्हें कुछ और आगे जाने की आवश्यकता है, ताकि राज्य सरकारें खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और केन्द्र के ऊपर निर्भर नहीं रहें। इस प्रकार वे स्वयं आगे आकर अपने प्रदेश को चलाने की कोशिश कर सकें और वे सैल्फ-सफीशिएंट बन सकें। मैं समझता हूं कि इनके लिए जो भी पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप के नए-नए नियम बन रहे हैं, उनमें सांवैधानिक रूप से बहुत चर्चा और विचार-विनियम करने की आवश्यकता है। इस बारे में जो हमारे एक्सपर्ट्स हैं, उन्हें साथ में लेकर चलने की आवश्यकता है। अगर ऐसा होगा, तो देश और अच्छाई की ओर जाएगा।

          महोदया, बहुत सी चीजें बोलनी थीं, लेकिन समय कम है और आपका हाथ घंटी की तरफ जाए या आप मुझे अपना भाषण समाप्त करने की कहें, मैं समझता हूं कि उससे पहले मेरा जो शेष भाषण है, उसे मैं टेबल पर ले करना चाहूंगा। मैं सिर्फ एक बात और कहना चाहता हूं और आप तथा सदन के सभी माननीय सदस्य मेरी इस बात से सहमत होंगे कि सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एम.पी.एल.ए.डी.) का जो फंड है, वह बहुत कम है, उसे और बढ़ाने की आवश्यकता है। इस राशि को दो करोड़ से बढ़ाकर कोई 10 करोड़ और कोई 20 करोड़ रुपए करने की बात कह रहा है, लेकिन मैं मांग करता हूं कि कम से कम इसे 10 करोड़ रुपए प्रति वर्ष किया जाए। आपने मुझे यहां बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं।

                                                                                                   

*श्री तूफानी सरोज (मछलीशहर)ःमाननीय अध्यक्ष जी, माननीय वित्त मंत्री जी और यूपीए की सरकार दोनों संसद में पेश बजट के लिए अपनी पीठ थपथपा रही हैं पर यह बजट मात्र आंकड़ों की बाजीगरी है।  असल में बजट नीतियों और विकास के भावी सोच का दस्तावेज होता है।  इसमें देश और जनता के विकास भविष्य छिपा होता है। आखिर बजट में आमदनी और खर्च किया जाने वाला पैसा तो जनता ही देती है1 पर इस बजट में आम जनता पर कम और खास वर्ग पर अधिक ध्यान दिया गया है।

          यह देश गांवों में बसता है जहां 12 करोड़ से अधिक किसान रहते हैं।  यदि इस संख्या में उनके परिवार के पांच सदस्यों को जाड़ दिया जाए तो उनकी संख्या 60 करोड़ से ऊपर पहुंच जाती है जिसकी जिन्दगी पूरी तरह खेती पर निर्भर होती है।  खेती पर उसी की ही नहीं देश की संपूर्ण आबादी भी आश्रित रहती है और जब भी खेती में अनाज का उत्पादन कम होता है।  चारों तरफ हा-हाकार मच जाता है।  चूंकि कृषि पर इस देश की आबादी का बड़ा तबका आश्रित है इसलिए देखा जाए तो देश की बजट के बड़े हिस्से पर उसका हक भी बनता है।  पर आजादी के बाद से ही इस वर्ग की उपेक्षा होती आ रही है।  इस बजट में भी इसके लिए कुछ खास नहीं किया गया है।  उल्टे इस बजट में यूरिया जैसे उर्वरक को और महंगा कर दिया गया है जबकि आमतौर से किसान कृषि में इसी उर्वरक का उपयोग करता है।  बजट में सिंचाई और खेतों की जोताई के काम में आने वाले डीजल के मूल्य में वृद्धि करके भी किसानों की मुश्किलें बढ़ाने का कार्य किया गया है।  अभी पिछले दिनों सूखा पड़ गया तो चारों ओर हा-हाकार मच गया पर बजट में सिंचाइ के लिए मात्र 300 करोड़ रुपए खर्च किए जाने की बात कही गई।  चाहिए यह था कि सरकार सिंचाई के लिए व्यापक योजना बनाती ताकि सूखा जैसे दैविक आपदा का मुकाबला किया जाता और खेती को बचाया जाता।

           सरकार गांव के गरीबों को रोजगार देने के लिए महात्मागांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना (मनरेगा) का ढोल खूब पीट रही है।  पर इस बजट में उसके लिए मात्र 100 करेड़ रुपए की वृद्धि की गई है।  पिछले वर्ष इसके लिए 39,100 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था।  अब की बार उसे 40,100 करोड़ रुपए कर दिया गया है।  इस वृद्धि से कितना रोजगार बढ़ेगा? सरकार ने इस वर्ष मनरेगा में साढ़े चार करोड़ परिवारों को लेने और उन्हें सौ दिन का काम देने की बात की है।  लेकिन जो पैसा बजट में आवंटित किया गया है उसी में से 6 प्रतिशत प्राशासनिक खर्च के लिए काटे जाने का भी प्रावधान किया गया है।  फिर कितना पैसा बचेगा जिसके बल पर सरकार चार करोड़ परिवारों को इस योजना मे शामिल करने का ढोल पीट रही है।  मजेदार बात यह है कि वित्त मंत्री ने अपने भाषण में बड़े जोर-शोर से सामाजिक क्षेत्र 1,37,674 करोड़ रुपए आवंटित करने की बात कही है पर यह न हीं बताया है कि इसी सामाजिक खर्च में मनरेगा के लिए आवंटित 40,100 करोड़ रुपया भी शामिल है।

          सरकार शिक्षा को बढ़ावा देने व सबको समान शिक्षा देने की बात करती है पर आश्चर्य यह है कि सरकारी शिक्षा में स्तरीय मानदंड स्थापित करने वाले केन्द्रीय विद्यालय संगठन का आवंटन घटा दिया गया है।

          इसी तरह राष्ट्रीय साधन सह योग्यता छात्रवृत्ति योजना व शिक्षा के व्यवसायीकरण के लिए भी बजट में प्रावधान घटा दिया गया है।

          नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र को कम करने और आदिवासियों एवं जनजातियों के उत्थान का ढोल पीटने वाली सरकार ने जनजातीय कल्याण मंत्रालय के बजट में पिछली बार की तुलना में 200 करोड़  रुपए से ज्यादा की कटौती कर दी है।  फिर कैसे नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र को वह कम कर पाएगी।

          इसीतरह जनजातीया बच्चों के शैक्षिक विकास के लिए अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता के रूप में 500 करोड़ रुपए की कटौती का प्रस्ताव बजट में किया गया है।  

          बजट मे न तो गांव वालों के लिए और न ही शहर वालों के स्वास्थ्य के लिए कुछ दिया गया है। पिछले साल स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए 19534 करोड़ रुपए की राशि से मात्र 2766 करोड़ रुपए का आवंटन बढ़ाया गया है।  संभवतः इसी में नरेगा के कामगारों का बीमा होगा और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना को भी लागू किया जाएगा।  फिर स्वास्थ्य के लिए कितनी धनराशि बचेगी।

          सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) तथा भारत निर्माण योजना के तहत ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए ग्रामीण मंत्रालय को 12 हजार करोड़ रुपए का आवंटन किया है।  इस योजना के तहत 500 से अधिक आबादी वाले सभी मैदानी गांवों तथा 250 आबादी वाले पहाड़ी गांवों को बारामासी सड़कों से जोड़े जाने की बात है।  इसी धनराशि में मौजूदा सड़कों की मरम्मत किए जाने की भी बात कही गई है।  प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत राज्यों ने कुल मिलाकर 20 हजार करोड़ की सड़कों के निर्माण की वार्षिक क्षमता हासिल कर ली है और बजट में सिर्फ 12 हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है जबकि राज्यों से आई 55 हजार करोड़ रुपए की ग्रामीण सड़कों की योजनाएं पहले से ही केन्द्र के पास लम्बित पड़ी है।  ऐसी स्थिति में ग्रामीण सड़कों के जहां हैं वहीं थम जाने की पूरी संभावना बनती दिख रही है।

          गांवों में बढ़ती बेरोजगारी के चलते लोगों का शहरों की ओर पलायन लगातार बढ़ रहा है।  अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले दस वर्षों में 25 करोड़ लोगों का गांवों से शहरों की ओर पलायन हो जाएगा।  यदि ऐसा हुआ तो शहरों की जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि होगी।  पर बजट में जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूएबल मिशन का उल्लेख तक नहीं किया गया है जबकि यूपीए सरकार की यह महत्वपूर्ण योजना रही है फिर शहरों में बढ़ने वाली आबादी का प्रबंधन सरकार कैसे करेगी।

          महोदय, केन्द्र सरकार ने सूखा राहत कोष के लिए 4 हजार करोड़ रुपए दिए थे जिसमें से 17 करोड़ रुपए मेरे जनपद जौनपुर के लिए आवंटित किया गया था।  उक्त धनराशि सूखा पीड़ित किसानों को न देकर उत्तर प्रदेश सरकार  ने उसे वापस ले लिया। सरकार ने उक्त धनराशि को किस मद में खर्च किया, इसकी कोई जानकारी नहीं है।

          माननीय वित्त मंत्री एवं प्रधानमंत्री द्वारा जीडीपी वृद्धि की बात की जाती है, इसका मैं समर्थन करता हूं लेकिन गरीब की थाली में दो वक्त की रोटी की व्यवस्था भी तो की जानी चाहिए।  गांवों में जिनके पास नौकरी की व्यवस्था नहीं है उनकी हालत बदतर है।

          मेरी राय में कुल मिलाकर यह बजट बेहतर तस्वीर पेश करने के लिए आंकड़ों के साथ बाजीगरी करने वाला और आंकड़ों में तोड़-मरोड़ करने वाला है। यह बजट कॉरपरेट, शेयर बाजार और विदेशी फंडों को खुश करने करने वाला अधिक और आम लोगों के साथ भद्दा मजाक करने वाला अधिक दिखता है।    

श्री दारा सिंह चौहान (घोसी):  माननीय सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। इस बजट पर कल से सदन में चर्चा हो रही है। दोनों तरफ से जो चर्चा हुई, उसे मैं सुन रहा था, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि इस बजट से इस देश में रहने वाली जो आम जनता और गरीब हैं, वे निराश हैं। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी है कि देश में रहने वाले लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया कराए। स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन जहां तक मैंने बजट में देखा है, इसका अभाव है। देश में रहने वाले गरीबों को न रोटी, कपड़ा और मकान मिल पा रहा है, न स्वास्थ्य और सुरक्षा और न ही सम्मान मिल पा रहा है।

          महोदया, मैं कह सकता हूं कि इस सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण देश की आबादी का जो 70 फीसदी हिस्सा किसानों का है, वह तबाह और बर्बाद हो रहा है।

 उसकी तरफ माननीय वित्त मंत्री जी का ध्यान नहीं पहुंच पाया। आज चर्चा है, खाद की सब्सिडी खत्म करने की बात हो रही है, जो छोटे-छोटे किसान हैं, जिनको ऋण महंगे दामों पर, ज्यादा ब्याज पर मिलता है, उन्होंने उसे कम करने की कोई योजना नहीं बनायी।  बिजली के क्षेत्र में जितना काम करना चाहिए, उसका इस बजट में अभाव है।  जो सबसे बड़ी चीज है, रोटी-कपड़ा, जिसके बारे हमारे माननीय सदस्यों ने कहा है, इस देश का गरीब, इस देश की गलत आर्थिक नीतियों की वजह से गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है, जो अमीर है वह अमीर होता जा रहा है।  जब से देश में इस तरफ की सरकार रही है, मैं समझता हूं कि सबसे ज्यादा दिनों तक इस देश में यूपीए, कांग्रेस की सरकार रही है। इस देश में गरीब, गरीब होता जा रहा है, अमीर, अमीर होता जा रहा है।  इसका एक ही कारण है कि इस देश में ज्यादा दिनों तक बायें पक्ष के लोग इस देश की सत्ता में रहे हैं।   

          महोदया, गैर-बराबरी का सवाल कई बार पार्लियामेंट में आया।  मैं पिछले बजट को पढ़ रहा था, उसमें समतामूलक समाज की चर्चा हुयी।  जो संविधान की मूल भावना है, इस देश में जो गैर-बराबरी है, उसे खत्म किया जाए, लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के 63 सालों बाद सबसे ज्यादा दिनों तक इधर की सरकार होने के नाते इस देश में जो गैर-बराबरी है, वह बढ़ती जा रही है।   

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय (श्रावस्ती):  इसीलिए आपने अंबेडकर जी को छोड़ दिया।  …( व्यवधान)

सभापति महोदया :  कृपया शांत रहें।

…( व्यवधान)

श्री दारा सिंह चौहान : आपने बाबा साहब की चर्चा की, जिन्होंने संविधान का दस्तावेज हमें सौंपा, जिन्होंने इस देश में रहने वाले लोगों के लिए प्रावधान किया, इंसान और इंसानियत की बहाली के लिए, गैर बराबरी को खत्म करने के लिए, यह दुर्भाग्य है कि सरकार में आपके रहते उन बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को भारत रत्न की उपाधि नहीं मिल पायी।  यह दुर्भाग्य है।  जब आपकी सरकार इस मुल्क में नहीं रही, तब इस देश में बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को भारत रत्न की उपाधि मिली।  इसीलिए मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं और मैं कहना चाहता हूं कि जब बराबरी की चर्चा हो रही है, चाहे पुरूष हो या महिला हो, लेकिन उससे पहले जो संविधान की मूल भावना है, इस देश में गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए, सबसे पहले सरकार का ध्यान उधर जाना चाहिए।  महिला आरक्षण की चर्चा हो रही थी, मैं कहना चाहता हूं कि सबसे पहले हमारे कुछ साथियों ने संकेत किया है कि जो बालिका शिक्षा है, इस बजट में इस देश में रहने वाले गरीबों, चाहे वे बीपीएल की सूची में हों, चाहे किसी भी सूची में हों, जो गरीब हैं, उन गरीब बच्चियों की शिक्षा के लिए इस सरकार ने बजट में कोई प्रावधान नहीं किया है। 

          मैं कहना चाहता हूं, मुझे खुशी है और मैं बधाई भी देना चाहता हूं उत्तर प्रदेश की सरकार की मुख्यमंत्री बहन मायावती जी को, जिन्होंने इस पीड़ा को समझा, जो आप लोग 63 साल में नहीं समझ पाए कि गांव का गरीब जो झोपड़ियों में रहता है, जिसका बाप मजदूरी करने के बाद अपने बच्चों को दो जून की रोटी नहीं दे सकता, अपनी बेटी को बढ़िया शिक्षा नहीं दे सकता, उस बेटी की पढ़ाई के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार ने अगर वह इंटर में पढ़ने जाती है, अगर उच्च शिक्षा में जाना चाहती है, तो उसे 11वीं-12वीं में 25,000 रूपए दो किस्तों में मिलते हैं।    

उस बेटी की पढ़ाई के लिए इस गैर-बराबरी को खत्म किया जाए, क्योंकि इस सरकार के नाते देश की महिलाएं शिक्षा में पिछड़ गई हैं। इतना ही नहीं, वह गरीब बेटी, जिसका बाप मजदूरी करने के बाद किसी तरह दो वक्त की रोटी खुद खाता है और अपने बच्चों को भी खिलाता है, लेकिन उसके हाथ पीले नहीं कर पाता। उसके लिए भी उत्तर प्रदेश की सरकार ने कहा। उत्तर प्रदेश में गरीब परिवार, जो बिलो पावर्टी लाइन का है, वह चाहे किसी जाति, धर्म का हो, उस परिवार में जिस दिन बेटी पैदा होगी, उसी दिन उत्तर प्रदेश के खजाने से उसके लिए इतना पैसा जमा हो जाएगा कि 18 वर्ष के बाद उसकी शादी के लिए उसकी व्यवस्था हो जाएगी। लेकिन केन्द्र सरकार ने इस बजट में उनके लिए कुछ नहीं किया। वित्त मंत्री जी अपने उत्तर में इसे बताएं। मैं जिस सामाजिक गैर-बराबरी की बात करना चाहता हूं, उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है। आपने बिजली के क्षेत्र में 60 हजार करोड़ से ज्यादा का प्रावधान किया है, लेकिन उत्तर प्रदेश जहां बुनकर, किसान रहते हैं, उनके लिए आपने कुछ नहीं किया। इसके लिए व्यवस्था होनी चाहिए। मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहता, लेकिन आपने पिछले बजट और इस बजट में जिस सामाजिक गैर-बराबरी की बात की है, मैं उस पर ध्यान दिलाना चाहता हूं। देश में जो सामाजिक गैर-बराबरी है, उसे खत्म करने की जिम्मेदारी सरकार की है। हम गांव से आते हैं। अमीर खानदान के लोग शायद गांव की पीड़ा नहीं समझते। कल इस पक्ष के वक्ता साथी कह रहे थे कि गांवों में आज भी ऐसे लोग हैं जिन्होंने अभी तक रेल नहीं देखी। मैं कहना हूं कि देश में ऐसे तमाम इलाके हैं जहां लोगों ने आज तक बिजली के खम्बे नहीं देखे। जहां पेयजल की व्यवस्था नहीं है, उनके पास रहने के लिए मकान नहीं है।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : कृपया वाइंड-अप कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री दारा सिंह चौहान : मैं उस गैर-बराबरी की चर्चा करना चाहता हूं कि इस देश में हम जानवर जैसी जिंदगी जीने वाले को भी इंसान नहीं बना पाए।…( व्यवधान) इस देश का गरीब व्यक्ति आज भी जानवर जैसी जिंदगी जीने पर मजबूर है। मैं इसका उदाहरण देना चाहता हूं कि आज भी ऐसे ट्राइबल इलाके हैं, आप पता कर लीजिए,…( व्यवधान)

सभापति महोदया : मैं माननीय सदस्य से निवेदन कर दूं कि रिप्लाई का समय चार बजे था। चूंकि अभी 7-8 माननीय सदस्य और बोलने वाले हैं, इसलिए मेहरबानी करके आप अपनी बात संक्षेप में कहिए।

…( व्यवधान)

 

श्री दारा सिंह चौहान : इस देश के कई हिस्सों में मुसहर जाति के लोग रहते हैं। हम उनके द्वारा बनाए गए पत्तलों में खाना तो खाते हैं, लेकिन मुसहर का बेटा हमारी लाइन में बैठकर खाना नहीं खा सकता। इतना ही नहीं, उस पत्तल में खाते वक्त जिस बची हुई रोटी को हम फेंक देते हैं, जिस रोटी के टुकड़े को लेने के लिए कुत्ता दौड़ता है, उसी टुकड़े को लेने के लिए मुसहर का बेटा दौड़ता है। फिर हम गैर-बराबरी को कहां खत्म कर पाए। हम महिला आरक्षण की बात करते हैं। उस पर काफी चर्चा हो रही है।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : आप कृपया समाप्त कीजिए। मैं हुक्मदेव नारायण जी का नाम पुकार रही हूं।

…( व्यवधान)

श्री दारा सिंह चौहान : आपने जिस तरह देश के और प्रदेशों को देखा है, उत्तर प्रदेश आबादी के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण है। हमने कई बार उसके विकास के लिए, वहां की बिजली की समस्याओं के लिए, बुनकरों के हित के लिए, जो सब्सिडी खत्म हुई है, उसकी बहाली के लिए डिमांड भी की।…( व्यवधान)

आपने पांडिचेरी, पोर्ट ब्लेयर और दूसरे एयर पोर्ट्स की बेहतरी के लिए काम किया है, उत्तर प्रदेश में नोएडा, जहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हमने कई बार मांग की, उसके लिए आपने कुछ नहीं किया। मैं उसके लिए मांग करता हूं।…( व्यवधान) वित्त मंत्री जी, बहुत सारे सवाल थे, लेकिन वक्त की कमी के कारण मैं उन्हें नहीं उठा पा रहा हूं।…( व्यवधान) मैं आपसे अनुरोध करना चाहता हूं कि देश में किसानों की बेहतरी के लिए कार्य किया जाए। गांव के गरीब व्यक्तियों को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सम्मान मिले, इसके लिए व्यवस्था होनी चाहिए। धन्यवाद।

                                                                                                 

सभापति महोदया : मैं माननीय सदस्यों से निवेदन करती हूं कि अब जो सदस्य बोलेंगे, वे कृपया पांच मिनट में अपनी बात समाप्त करें।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी):हमारा समय अभी बाकी है।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : समय सबका है, लेकिन रिप्लाई का समय चार बजे था। आपके पास पांच मिनट का समय है। आप उसे चाहे अपनी बात कहने में गुजारें या ऐसे ही बोलकर गुजारें। यह आपकी च्वाइस है।

 

 

*श्रीमती जयश्रीबेन पटेल (महेसाणा)ःमाननीय वित्त मंत्री द्वारा पेश किया गया 2010-11 का बजट स्वराज को सुराज्य की ओर नहीं ले जाएगा। यह बजट गरीबों की हट और उनके हार्ट तक नहीं पहुंच पाएगा।  21वीं शदी के दूसरे दयके में कृषि क्षेत्र, सेवा क्षेत्र, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण क्षेत्र, सुरक्षा क्षेत्र, महिला और बाल कल्याण क्षेत्र, लघु, मध्यम दरजे के उद्योग के क्षेत्र को गुड गवर्न्स से ग्रेड गवर्न्स की ओर गति, प्रगति करने वाला बजट नहीं है लेकिन सारे क्षेत्रों में अधोगति करने वाला बजट है1

          मैं कुछ प्रश्न इस तरह उठा रही हूं-

1.   ओएनजीसी के संदर्भ में जो कुएं से तेल निकाला जाता है उसके लिए जो किसान की जमीन एक्वायर की जाती है उनका भाड़ा बढ़ाने की कोई योजना स्पष्ट नहीं है।  वो भाड़ा हेक्टर के बारे में बढ़ाना चाहिए।  कृषि को पुनर्जीवित करने के लिए कोई ठोस कदम दिखाई नहीं देते।  खराबे की बिन उपजाऊ भूमि के बारे में और सजीव खेती और हरित क्रान्ति के बारे में कोई प्रोत्साहन नहीं है।  कैसे दूसरी हरित कान्ति होगी।  किसानों के लिए 5 फीसदी बैंको से ऋण देने की बात सिर्फ दिखावा है कोई बैंक इनके लिए आगे नहीं आते।

2.   2000 से ज्यादा बस्ती वाले गांव में बैंक की शाखाएं खोलने की योजना कैसे कारगर होंगी?

3.   दादा और दादी दोनों ने गुजरात को निराश किया है।  सामान्य और रेल बजट में गुजरात के प्रति भेद-भाव वाला रवईया दिखाई देता है।

4.   इस बजट में असंगठित क्षेत्र के लोगों के साथ मजाक किया गया है।  12 लाख करोड़ के बजट में सोशल सिक्योरिटी फंड के लिए सिर्फ 1000 करोड़ रुपए दिए गए हैं।  

5.   महिलाओं के लिए इन्कम टैक्स के रिबेट में ज्यादा लाभ प्राप्त नहीं हुआ।  

6.   यह बजट गरीब और मध्यम वर्ग के विरोध में है क्योंकि महंगाई की मार झेलती प्रजा पर पेट्रोल और डीजल का टैक्स लादा गया है।  परोक्ष टैक्स से गरीब और मर जाएगा।  पेट्रोल, डीजल पर टैक्स का बढ़ावा आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य है ऐसी प्राधानमंत्री की बात सुन कर के आश्चय होता है।

7.   वेट के संदर्भ में राज्यों को केन्द्र की ओर से कोई प्रोत्साहन बजट में नहीं दिखाई देता है। गुजरात को वैट के बारे में डिफरेंस के मुताबिक 22 सौ करोड़ रुपए केन्द्र की ओर से लेना बाकि है।

8.   यह बजट अमीरों को राहत और गरीबों को आहत देने वाला है।

9.   अर्थशास्त्रीयों के मुताबिक जो सरकार बजट में सुचित योजनाओं को शुरू करेगी तो उससे वित्तीय घाटै को बढ़ावा मिलेगा।

10.नरेगा अब मनरेगा योजना का भ्रष्टाचार सरकार के गले की फांस बन के रहेगा।

11.कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ लेकिन यह बजट आम आदमी और अर्थव्यवस्था के लिए अत्यन्त निराशाजनक है।

12.विकास की चाह में गरीबों को मिली महंगाई की आह यह बजट में प्रतीत होता है।

13.इस बजट ने कर्मचारियों को हताशा में डाल दिया है।  आयकर के नाम पर लोलिपाप दिया गया है।  नीची और ऊंची तनख्वाह वाले कर्मचारियों में भेदभाव ज्यादा दिखाई देता है।

14.सोने-चांदी की आयात जकात में बढ़ावा करने से आयात की मात्रा घट जाएगी और दान चोरी को उत्तेजन मिलेगा।

15.कोर्पोअर सैक्टर को हवा मिली है और स्टॉक मार्किट के आंखले को भड़काया गया है।

16.ज्वैलरी, कपड़ा उद्योग बुरी तरह से पिट गया है।

17.सीमेंट पर टैक्स का बढ़ावा बांधकाम क्षेत्र को बर्बाद कर देगा।  मध्यम वर्ग का घर का सपना लुट जाएगा।  असंगठित मजदूरों की रोजगारी घट जाएगी और बेरोजगारी बढ़ेगी।

   18.  कौटिल्य की बात उत्पादन और उपभोक्ताओं को गंभीर नुकसान न हो जाए इसको देखते हुए टैक्स लादे जाते हैं।  वह बात दिखाई नहीं देती क्योंकि पैट्रोल और डीजल टैक्स का मुनाफ 40 हजार करोड़ से मिलने वाला है लेकिन उनके सामने उपभोक्ताओं के बारे में सुविधा में सरकार का ज्यादा उत्साह दिखाई नहीं देता।  

 

 

*DR. G. VIVEKANAND (PEDDAPALLY) : The budget presented by our Hon. Finance Minister Shri Pranab Mukherjee is extraordinary, very thoughtful and an apt one for the current state of our economy.  I consider this as a second ‘sixer’ after the previous years’ wonderful budget.

          This has been nothing new for our Congress Government.  Right from 1991 we have show the path to all the parties in this country.  Since 1991 while trying to deepen the Indian markets, the government have explored international markets and integrated the Indian economy into the world economy through its liberalization/globalization policies.

          All developed economies have been battling recessionary pressures and low growth during the last 2 years.  Due to the steps taken in the previous budget by our Government represented by our  beloved Finance Minister, we could weather the crises which other countries have gone through and posted a very healthy growth of 7.2% for 2009-2010 as per the advanced estimates.  This growth was achieved despite failed South-West monsoon which resulted in negative growth in agriculture.  I wonder what would have been the  momentum in the country had we not been unfortunate with the monsoon and the floods in some state.  It speaks volumes of the excellent manner in which our government has been managing our economy.  The international scenario is also showing signs of improvement.  Most economies are likely to come out of negative growth and post marginally positive rates in 2010.  As per the IMF estimates of Jan 26, 2010 the following are the estimates of percentage of growth of GDP.

 

Country

2009

2010

 

US

-2.5

2.7

UK

-4.8

1.3

Euro Area

-3.9

1.0

Japan

-5.3

1.7

China

8.7

10.

India

5.6

7.7

World

-0.8

3.9

 

 

          As can be seen above, India posted one of the highest growth rates in both the years due to the effective measures taken by our Government and the resilience of our economy.  The improvement in international scenario is good news for us. This should spur growth further by higher exports.  If may not be out of context to state that our Current Account Deficit continued to remain stable between 2.2% to 2.5% between 2008 and 2010 (as per IMF estimates) despite the turbulences the world economies have undergone.  In a world of low growth, India is one of the two large economies which not only withstood the storms of recession, but is emerging stronger in the next five years.

          The industrial production which slowed down during the IInd half of 2008-2009, exhibited strong  recovery during 2009-2010 especially from June, 2009. The  Index of Industrial Production (IIP) posted double digit growth during August, October and November 2009 suggesting acceleration in the recovery process.  During April to November, 2009 the industrial growth was at 7.6% significantly higher than the 4.1% during corresponding period of the previous year.

          As I see it, the only major concern is the food inflation which was exacerbated by the bleak monsoon and floods in some states. The agricultural production during 2008-2009 was 233.9 million tones of good grains and 28.2 million tones of oil seeds and the target set for 2009-2010 was 239 million tones and 31.6 million tones respectively.  However, the actual Kharif production is estimated to be less by 15.9%  which works out to 23 million tonnes due to the deficient south-west monsoon and the floods.  The south-West monsoon was deficient by 23% and is the  weakest in 2009 since 1972.  However, the South-East monsoon is estimated to be 8% above normal.  Hence, the rabi production is expected to be higher by  about 10 million tonees taking the overall deficit to 13 million tonnes. The procurement  of foodgrains of rice and wheat for 2009-2010 upto January 10 was higher by 7 million tones (50.7 million as against 43.7 last year). The total stock of foodgrains with FCI and other Government agencies reached a peak of 54.8 million tonnes as on June 1, 2009.  Since then, the stocks declined on account of increased off-take reducing the stocks as on January 1, 2010 to 47.7 million tonnes.  The Government had even allocated 1.5 million tones of wheat and 0.5 million tonnes of rice for  sale through the open market for the period October to December, 2009 keeping in view the sustained pressure of inflation in food articles.  Additional adhoc allocations of 1.1 million tones of rice and 2.5 million tones of wheat have been made for the Target Public distribution system  for the period January-Feburary, 2010.  As can be seen, South-west monsoon was the main villain in food management.  Buffer stocks of foodgrains have reached an all time high indicating the firm resolve of the Government to support the poor and needy in this hour of crisis.

          However, the steps our Government has been taking like the exemption of service tax on transport of food items provided in budget, the food security bill and effective coordination with the states will ensure deacceleration of food inflation in the coming  months.  The price index of food grains (cereals+pulse) have remained more or less static between October 2009 of 270 points to December 2009 of 280 points. Same is the case with edible oils. The index for oils was actually higher at 188.1 points in 2008-2009 which came down to 175.1 points in October, 2009 and remained at 179.9 points in December, 2009.  For the week ended February 20th, the food price index actually came down by 0.4% over the previous week with softening of prices of all key items like cereals, vegetables, fruits. This clearly shows that the food inflation is likely to come down steadily over the next few months on sequential basis though we will see high percentage of y-o-y inflation for sometime due to the low base effect of corresponding period of last year.  I am sure with the steps taken in the budget to increase supply substantially (which I shall deal with later in my speech) and a good winter crop which will be known in April coupled with a hopefully good monsoon, we will soon see single digit inflation in food items.

          All other factors like growth in manufacturing (which touched a high of 18.5% in December 2009), Signs of turn around in merchandise exports (with a positive growth in November and December after a decline for 12 consecutive months)  steady FDI inflows (USD 20.9 bn during April-Dec 2009 as against USD 21.1 bn for same period last year) are quite positive.  We have already seen the increasing flow of private and foreign investment which I am sure will help us drive our growth levels to above 9%. FII’s (net) increased from USD (-) 12.2 bn in April-January, 2009 to a positive USD 24.1 bn for the period April-January, 2010.  ADR’s, GDR’s, NRI deposits also showed improvement of about USD 3 bn over the previous year.  The forex resrves which fell from USD 310 bn in March 2008 to USD 251 bln in March 2009 (a fall of USD 60 bn) have risen by USD 34 bn to USD 285 bn by Jan 2010 thereby improving the stability of our external account. 

          From a situation where we were forced to mortgage Gold in 1991, we have in this year purchased 200 MT of gold from IMF on November 3, 2009 which is not only a matter of pride but also improves the healthy balance in our forex resrves.

          Our External Debit increased by USD 18.2 bn to USD 242.8 bn in Sep 09 over March 09 representing 8.1%.  Out of this increase, USD 8.3 bn represents valuation effect of depreciation of USD against major currencies.  Out of the above total increase of external debt, long term debt increased by 10.6% in Sept, 2009 over March, 2009 level, while the short term debt  declined by 2.3% which is a very favourable  situation. The ratio of short term debts to total debt declined to 17.5 as at end September, 2009 from 19.3% in March, 2009. The ration of short term debt to forex reserves also declined to 15.1% from 17.2% which shows the comfort in meeting the obligations.  The overall debt service also improved to 4.9% from 3.7%.  Thus, the balance of payments position remained comfortable to modest current account deficit, buoyant  capital inflows and net accretion to forex reserves.  The prices of crude oil which went upto USD 140/bl during April, 2008, dipped to a low  of USD 40/bl in Jan 09 and have stabilized around USD 70/bl currently. This had the beneficial impact on our POL imports which declined by 34.5% (to USD 50 bn from 76 bn) during April to November, 2009 over the previous year compared to decline in Non-POL imports of 23.9% (to USD 120 bn from 158 bn) and total imports of 27.4% (to USD 170 bn from 234 bn).  This coupled with the fact that merchandise exports turned positive in November, 2009 after a decline for 12 consecutive months and moderation in the pace of decline in imports (the decline in November, 2009 being 2.6% over the same period last year) provides credibility to our claim of double digit GDP growth soon. The Hon’ble Finance Minister showed his vision in identifying the 3 major challenges namely ‘reverting to a high GDP  growth path of 9%, making this growth more inclusive by improving the rural and social infrastructure, and removing the weaknesses in our public delivery systems’ facing our economy now. The Finance Minister has rightly described the changing role of the Government from that of a ‘giver’ to an ‘enabler’.

          The ability of our Governemnt in shifting gears and direction depending upon the circumstances and opportunities from time to time is already widely known and respected in the whole world.

          I would like to briefly highlight the strategic and growth oriented initiatives taken in this budget:

Fiscal consolidation : No country can allow its fiscal balance to go out of hand and still survive in the long term.  Last year, significant fiscal stimulus was rightly provided and correctly targeted in the right directions to meet the requirement.  Now that those efforts have yielded results, it is time to return to the path of fiscal consolidation.  Also despite the measures taken last year the fiscal deficit had reduced from 7.8% in 2008-2009 to 6% in 2009-2010 as per the advanced estimates.  The fact that no fertilizer of oil bonds have been issued in 2009-2010 is quite encouraging.  The target of fiscal deficit of 5.5% this year and progressively reducing it to 4.8% and 4.1% by 2011-2012 and 2012-2013 shows that we have not forgotten the goals set by ourselves in the past. This is all the more healthy considering the fact that our current account  deficit remained static at around 2.5% (IIMF estimates).

 

Tax Reforms : Lot of effort was already put in and arrangements are being made for the launch of the Direct Tax code and the GST.  The decision to implement both these by April 2011 with due care and total preparation is laudable.  This will, I am sure transform our economy by imparting simplicity, transparency, equity and tax buoyancy.  So also, the Companies’ bill 2009 which replaces the Companies’ Act, 1956 will ensure better Governance of our Corporate Sector.

 

Agriculture : The role of this sector cannot overemphasized.  it is one sector which is lagging and unfortunately bruised by bad monsoons and floods.  This has also led to increase in food inflation.  The 4-pronged strategy of agricultural production, reduction in wastage of produce, credit support to farmers and thrust to food processing sector are the result of considerable research and study.

          Provision of Rs. 400 crore for the extension of green revolution in the eastern region, provision of Rs. 300 crore for organizing 60,000 ‘pulse and oil seed villages’, integrated intervention of water harvesting, watershed management and soil health as part of the Rashtriya Krishi Vikas Yojana are expected to set the direction for increasing agricultural production and reduction in food inflation.

          Wastage of grain procured due to shortage of storage capacity is proposed to be reduced by hiring private godowns for a guaranteed period of 7 years.  There are also wastages in the supply chain.  Opening up of retail trade is expected to plug these wastages and also reduce the difference between farm gate prices, wholesale prices and retail prices. These steps are expected to reduce wastage which will also help increase the grains available for consumption and reduce food inflation.

          The extension of period of repayment of loan by farmers from Dec, 2009 to June, 2010 will give a reprieve to farmers who are affected by bad monsoons and floods.  The increase in interest subvention for timely repayment of loans by farmers from 1% to 2% will motivate the farmers to work hard and repay the loans on time.  This will help the government in providing fresh loans which help increase the food production.

          Food Processing has been given a much awaited thrust.  The Government has decided to add 5 mega food park projects to the existing 10.  External commercial borrowings are being made available for cold storage including farm-level pre-cooling, preservation or storage of agricultural and allied produce, marine products and meat by making changes in the defintion of infrastructure under the ECB guidelines.  This will ensure better storage and also value addition in the farm sector.  Significant investments in this sector will help reduce the food shortage in the country and reduce food inflation.  I urge the Finance Minister to make higher  allocations for capital expenditure in the agriculture sector especially for agricultural production.

 

Infrastructure : The initiatives  taken in the last budget are yielding results.  It is heartening to note that those initiatives are being continued with enhanced outlays.  The performance of the India Infrastructure Finance Company Ltd. (IIFCL) in providing finance to infrastructure projects is encouraging.  Its disbursement are estimated at Rs. 9000 crores by March 2010 and 20,000 crore by March 2011.  However, the significant initiative this time are in the energy sector and rightly so. Plans  for induction of super critical technology in power plants of NTPC, doubling of allocation for power sector from Rs. 2230 crore to Rs. 5130 crore in 2010-2011, introduction of a competitive bidding process for allocation of coal blocks, setting up of a coal regulatory authority etc. will definitely improve transparency in operations and reduce the cost of generation of power purchased by distribution utilities.  The vision to establish India as a global leader in solar energy is one of the highlights of the initiatives in the energy sector.  The strategy can be further extended to position India as the Solar energy Capital of the World.  Allocation for the New and Renewable energy  Ministry has been increased by 61%  from Rs. 620 crores to Rs. 1000 crores in 2010-2011 to meet the ultimate  target of 20,000 MW of solar power by 2022 as part of the Jawaharlal Nehru National solar mission. This will ensure that our country reduces carbon emission, generate clean energy and contribute to climate change. We need to take care of our living conditions and our environment and ensure reduction of pollution.  This should be so irrespective of any international protocols are there or not since it is in our interest as a developing economy with large industrialization needs.  Hence, the initiatives for setting up of a Clean energy Fund for research in clean energy technologies, the allocation for solar power (1000 crores), Effluent treatment plants for tirupur (Rs. 200 crores), Special golden jubilee package for Goa (Rs. 200 crores) for beaches, enhancement of allocation for National Ganga river Basin authority (Rs. 250 crores) are significant investments in the right direction to protect our lives and health.

 

Social and rural infrastructure : This forms the main basis of our strategy of inclusive development.  Our Government has already taken a lot of initiatives in these areas in the past.  The very fact that an allocation of 37% of total plan is made for social sector spending and another 25% of the total plan is made for rural infrastructure (totaling to 62% of plan) speaks amply about our intent and action for social inclusion.  Of these education, health and water are close to my heart and I am happy  to note that following initiatives in these areas.  I have also been doing significant work in these areas in my constituency during the last few years.

          The right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 gives a legal right for children in the age group of 6 to 14 to good quality education.  The allocation for  education has been stepped up from Rs. 26,800 crores to Rs, 31,036 crores in 2010-2011 in addition to states access to Rs. 3,675 crores for  elementary education through the 13th Finance Commission grants.  These measures will make our country fully literate in the near future.  The allocation for health is  increased from Rs. 19,534 crores to Rs. 22,300 crores in 2010-2011.  Availability of water is an issue which has to be addressed by the states and I plan to make all out efforts to provide ample drinking water in my constituency during my tenure.  I also appeal to all my fellow parliamentarians to make all out efforts in this area in their respective constituencies since unless all of us join in and put in our effort this cannot happen by just the Central government’s budget and other policy initiatives alone.  the target  of credit flow to agriculture has been increased from          Rs. 3,25,000 crores. to Rs. 3,75,000 crores in 2010-2011 which speaks of the commitment of the government to and the importance  accorded to agriculture.

          The NREGA scheme has covered more than 4.5 core households in the last 4 years.  the total number of houses targeted and  sanctioned during 2009-2010 under Indira Awaas Yojana are 40.52 lacs and 38.27 lacs respectively out of which 22.56  lacs have been completed upto Feb 2010.  The allocation to NREGA of Rs. 40,100 crores (last year 39,100 crores) and to Bharat Nirman of Rs. 48,000 crores will help consolidate the gains achieved last year and deepen and improve the same in the current year. However, there are  complaints that this scheme is not reaching all the panchayats and areas.  Hence, I suggest that all MP’s are given authority upto Rs. 1 crore under the scheme so that they can identify those areas which are not covered and ensure it is balanced.  I also welcome the initiative to conduct a social  audit of the expenditure on NREGA in certain districts.  Different groups of experts may be constituted both to showcase the scheme and also to benefit from their expertise.

          I am immensely pleasantly surprised to note that the Micro, small and medium enterprises contribute to 45% of the manufactured output and 40% of our exports.  Therefore this is a very important area to be concentrated upon since this also employs 6 crore people through 2.6 crore enterprise.   The increase in allocation from Rs. 1,794 crore to Rs. 2,400 crores in 2010-2011 though is good, a much higher allocation and thrust in my view, would have addressed growth, export and employment better.  The setting up of National Security fund for unorganized sector workers with an initial allocation of Rs. 1,000 crores and providing a pension scheme for these workers of Rs. 1000 each by the government ( who join with a minimum contribution of Rs.1000 and maximum of Rs. 12000 in a year) with an allocation of Rs. 100 crores for 2010-2011 are laudable.  The enhancement of outlay for Women and Child Development by 50% speaks of our government’s commitment to the Welfare of Women and children.  Another major allocation is the increase by 80% to Rs. 4,500 crores for the Ministry of Social Justice and Empowerment which covers the Schedules Castes, Tribes, other Backward Classes, Persons with Disabilities etc.

          Our government believes in transparency and accountability in all walks of life.  This is amply proved by the setting up of Financial Sector Legislative Reforms commission, Administrative Reforms commission, Unique Identification Authority of India, Technology Advisory Group for Unique Projects and Independent Evaluation Office.  I have a submission to make in this context.  Our Government set up the Unique Identification authority with an extremely laudable purpose of issuing ID cards to all our people especially people to whom subsidies and support are targeted.  This is expected to ensure that the Government is able to transfer the subsidies to the beneficiaries directly to their bank account from the Central exchequer.   As we all know, as per some studies and surveys, the leakages in the past through of subsidies ranges from 30 to 40%.   In a country like ours where subsidies are huge (rightly so in a large and developing economy like ours where there are many people below the poverty line and their welfare is our responsibility) this level of leakage is substantial. If this can be saved, we can get one year subsidy bill free for every three years of subsidy bills.  The performance of the UID is expected to play a crucial role in achieving this very important cause.  Hence, I felt that a much higher allocation to the UID project than Rs. 1900 crores made in this budget would have been a good idea. I am sure the Finance Minister and the Government under the leadership of Madam Soniaji and Shri  Manmohanji are looking into providing the necessary infrastructure and adequate number of professionals to this project so that this can be implemented expeditiously.  I think the objective of selecting a professional of the caliber of Shri Nandan Nilakeni is to ensure that this is implemented the way any project is implemented in the private sector.  It may be good idea to have a time frame for completing this project, say 2 to 3 years. I request the Hon. Finance Minister to kindly look into this humble suggestion of mine so that his laudable purpose of sociality inclusive high growth of the economy with low deficits becomes a reality sooner than expected.

Symbol for our currency : Formalizing a symbol for the Indian rupee on par with the USD, EURO, Pound Sterling, Yen etc. will be a matter of our National Pride and an important factor commensurate with the size and growth of our economy and our rightful place in economies of the world.  The government has supported the corporate sector with reduction of surcharge on corporate tax from 10% to 7.5%.  The middle class has also been supported by substantial revision of the income tax slabs which will result in a maximum benefit of about Rs. 51,500 per annum upto an income level of Rs. 8 lakhs which will benefit the large middle class of our country.

          There is an urgent need to set up a National Water Commission to accelerate the programmes on water resources and also to protect the rights of every citizen to access safe drinking water.

Due to the initiatives taken during the last many years and removing bottlenecks, the manufacturing and the service sectors have reached high growth levels and have been handsomely contributing to the overall GDP.  Now the enhanced focus of the government on agriculture, rural infrastructure and social infrastructure will ensure balanced growth, inclusive growth and high growth to double digits a reality very shortly.

          India’s youth and the Leadership of Shri Rahul Gandhiji: India is blessed with a huge young population.  One of the key advantages India has is its vast youth who will now be able to get quality education and other vocational skills due to the various initiatives of our Government in the last few years, this year’s budget included.  The elderly statesman and economists of our country are providing the right direction. But, as we all know the young will listen better and get motivated better by their peers than the elderly. Our Leaders of the Youth Shri Rahul Gandhiji is meeting this objective excellently.  He is a man of great  intellect, integrity and hard work and is a Wise  Man who can play the role of a wonderful bridge between the elderly and the young and  ensure that the policies are rightly implemented.  Unless, the youth joins in the movement, no government especially in a country like India can achieve successful implementation of its policies. The extensive work that our beloved leader Shri Rahulji’s is doing in uniting the youth from every nook and corner of the country, inspiring them and motivating them and involving them in the developmental process of this country is laudable.  He is a role model for me and all young people like me.  In him we see a visionary succession in the leadership of this country in the future.  The least we can do is to applaud him for the efforts that he is making for the inclusive development of our wonderful country.

          In the backward region of Telangana, Krishna and Godavari rivers flow 70% of their terrain in Telangana.  However, due to improper planning and proper projects on these rivers in Telangana, the water consumed is disproportionately lower at 22%. Pranahita Chevella a project envisaged by my father Shri G. Venkataswamy who is a 7 time member of this August House would ensure that the barren lands of Telangana upto about 17 lacs acres can be irrigated by this project.  I request that this project be declared a national project so that the barren lands of Telangana can be irrigated through this project.

          Under the dynamic leadership of Madam Sonia Gandhiji, Prime Minister ManmohanJi and Shri Rahulji supported by a number of highly knowledgeable, committed  and patriotic leaders and the vast pool of economists, I have a no doubt that the country is on the doorstep  of a glorious future.  I once again congratulate the Honourable Finance Minister for seizing the available opportunity and presenting such a wonderful and apt budget.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

*श्री के.डी. देशमुख (बालाघाट):   माननीय सभापति महोदया, मैं पहली बार सदन में बजट पर बोलने जा रहा हूं।  भारत गांवों का देश है। 80 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है। आजादी को 62 वर्ष हो जाने के बाद भी गांव की दशा सुधर नहीं पाई है। मजदूर, किसानों की हालत ही दयनीय है। किसानों को फसल उत्पादन का लागत मूल्य नहीं मिल रहा है। एक ओर मजदूरों की मजदूरी बढ़ा दी गई है। परन्तु किसानों को उनकी उपज का मूल्य नहीं मिल रहा है।  मध्य प्रदेश के बालाघाट सिवनी जिलों में धान का उत्पादन होता है। धान की इस वर्ष इतनी पैदावार हुई है कि धान रखने की जगह नहीं है। मध्य प्रदेश शासन द्वारा 5 मार्च तक धान पर बोनस देने तथा सरकारी समितियों के माध्यम से ऋणों कृषकों की ही फसल खरीदने हेतु निर्देश दिया गया है। परन्तु, सहकारी समितियां ऋणी कृषकों से धान खरीदने से इनकार कर रही है क्योंकि उनके पास बारदाना बोरे नहीं है। मध्य प्रदेश में सिवनी एवं बालाघाट जिले का धान उतपादक कृषक बहुत ही परेशान है। आज भी लाखों लाख क्विंटल धान किसानों के पास पड़ा है। यदि मध्य प्रदेश शासन द्वारा धान खरीदी की तारीख नहीं बढ़ाई गई तो कृषि उपज मंडी में किसान लुट जायेगा। माननीय कृषि मंत्री द्वारा इस समस्या पर त्वरित ध्यान दिया जाना चाहिये।       

           गांव में मात्र 4 घंटे बिजली मिलती है जिससे छात्र परेशान है। गांवों में छोटे छोटे उद्योग-धंधे बंद पड़े हैं। बिजली पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलने से खेती में उत्पादन नहीं हो पा रहा है। केन्द्र शासन द्वारा मध्य प्रदेश को पर्याप्त बिजली नहीं दी जा रही है। मध्य प्रदेश के साथ भेदभाव किया जा रहा है। पर्याप्त मात्रा में कोयला मध्य प्रदेश को नहीं दिया जा रहा है।

           मेरा जिला नक्सल प्रभावित जिला है। नक्सली गतिविधियां इतनी बए गई हैं कि नक्सली क्षेत्र में विकास की गति धीमी पड़ गई है। केन्द्र शासन करोड़ों की राशि नक्सल उन्मूलन हेतु खर्च कर रही है, परन्तु नक्सली समस्या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है।

           प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश किया गया बजट गरीब, किसान विरोधी है। इस बजट से आम जनता को कोई विशेष लाभ नहीं है। अतः मैं इस बजट का विरोध करता हूं।

 

 

 

 

श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी):  सभापति महोदय, जो बजट बनते हैं, उस बजट का काम  विषमता को मिटाना, समता को लाना, समाज के अंदर शांति और सुरक्षा स्थापित करना, सीमा की सुरक्षा करना, आतंरिक व्यवस्था को सुरक्षित करना और देश के नागरिकों को पूर्णरूपेण से, स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार देना है। इस मुद्दे पर विचार करके देखें, तो बजट को हम कह सकते हैं कि यह किसी भी मामले में इस कसौटी पर पूर्ण नहीं  उतरता है। मैं किसान हूं। मैं सबसे पहले आरोप लगाता हूं कि जब से देश आजाद हुआ है तब से बजट बनते चले गये, जो किसान को खाते चले गये हैं और यह …* जैसे किसान को खाया है, उसका उदाहरण है। …( व्यवधान)

सभापति महोदया    : जो शब्द माननीय सदस्य ने बोला है, उसे एक्सपंज कर दिया जाये।  

श्री हुक्मदेव नारायण यादव :    मैं सरकार के लिए कह रहा हूं, किसी व्यक्ति को नहीं कह रहा हूं। …( व्यवधान)

सभापति महोदय :  सरकार व्यक्तियों से ही बनती है। यह शब्द असंसदीय शब्द है, इसलिए इसे एक्सपंज कर दिया जाये।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव :   सन् 1951 में किसान 71.9 प्रतिशत थे और सन् 2001 में किसान 54.4 प्रतिशत है। अब 17.5 प्रतिशत किसान इस देश में कहां विलीन हो गया, इसे खोजना चाहिए। खेतीहर मजदूर 1951 में 28.1 प्रतिशत था, वह बढ़कर वर्ष 2001 में 45.6 प्रतिशत हुआ है। उसमें 17.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मैं यह कहना चाहता हूं कि आजादी के बाद से, यानी वर्ष 1951 से वर्ष 2001 के बीच 17.5 प्रतिशत किसान खेतीहर मजदूर बनने के लिए मजबूर हो गया है। जिस अर्थव्यवस्था में किसान खेतीहर मजदूर बनने के लिए मजबूर हो जाये, उस अर्थव्यवस्था को हम कभी भी किसान की समर्थक नहीं कह सकते हैं। यह बजट किसान विरोधी है। मैं आपसे प्रार्थना करना चाहूंगा कि हमारे पास जमीन कम हो रही है। वर्ष 1984 में कृषि योग्य भूमि  13.11 करोड़ हैक्टेयर थी, जो वर्ष 2008 में 11.7 करोड़ हैक्टेयर जमीन हो गयी। इस तरह 1.51 करोड़ हैक्टेयर जमीन कम हुई है। हमारे पशुधन वर्ष 1951 में एक हजार आदमी पर 432 थे, जबकि वर्ष 2001 में एक आदमी पर 232 पशुधन रह गये हैं।

           मैं इसलिए इन बातों को उठाना चाहता हूं कि हमारी खेती कम हुई है, जमीन कम हुई है। यह जमीन कारखाने में गयी, एसईजेड में गयी, आवासीय में गयी, शहर बसाने में गयी। हमारी खेती को उजाड़ने का काम हुआ है। अब जितनी खेती उजड़ती है, उतने हमारे पिछड़े, दलित, वनवासी, निर्धन और निर्बल उजड़ते हैं। निर्धन, निर्बल, गरीब किसान और मजदूर को उजाड़कर बड़ी-बड़ी गगनचुंबी अट्टालिकाएं बनाते हो, झोंपड़ी को उजाड़ते हो, पांचसितारा होटल में …* मनवाते हो। इस बजट का हम कभी समर्थन नहीं कर सकते हैं। इसलिए मेरी विनम्र प्रार्थना है कि आप इन बातों पर गौर से विचार करिये। …( व्यवधान)

श्री विलास मुत्तेमवार (नागपुर):  सभापति महोदया,  यहशब्द अनपार्लियामैंट्री है। …( व्यवधान)

सभापति महोदय :   आप ऐश्योर करें कि जो भी अनपार्लियामैंट्री शब्द होगा, उसे निकाल दिया जायेगा, देख लिया जायेगा।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव :   महोदया, मैं वित्त मंत्री जी की नीयत की प्रशंसा करता हूं। …( व्यवधान)

सभापति महोदय :   इस शब्द को निकाल दिया जाये।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव :   मैं उनकी व्यक्तित्व योग्यता की भी प्रशंसा करता हूं। लेकिन उनके नेता और नीति, जिस नेता की नीति पर बजट चल रहा है और अर्थव्यवस्था कोई और चलाता है, तो वह नेता, उसकी नीति और उसकी नीयत खराब है।

 

16.00 hrs.

 

जब नेता की नीति नहीं होगी, नीयत साफ नहीं होगी तो देश का रास्ता कैसे बनेगा? …( व्यवधान)मैं प्रार्थना करना चाहता हूं कि अगर आप चाहते हैं कि देश में बराबरी और समता लाएं, ऊंच-नीच का भेद मिटाएं तो मैं आपके सामने मोटे तौर पर पांच-छः बिंदुओं को उठाना चाहता हूं।…( व्यवधान)

सभापति महोदया :  आपका समय हो गया, अब समाप्त कीजिए। आपको बोलते हुए पांच मिनट हो गए हैं।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव : महोदया, खेती, नौकरी और व्यापार, एक आदमी एक रोजगार। इस योजना को आप लागू कीजिए। सरकारी नौकरी और सरकारी अनुदान पाने के लिए अन्तर्जातीय विवाह की अनिवार्यता कीजिए जिससे जाति का बंधन टूटे। चाहे राजा का बेटा हो या निर्धन की संतान, सभी के लिए एक जैसी शिक्षा की व्यवस्था कीजिए जिससे समान नागरिक देश में बनें। अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़े वर्ग, महिला और धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए सरकारी नौकरी, राजनीति और व्यापार में 60 प्रतिशत स्थान सुरक्षित करें।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : अब अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव : अधिकतम और न्यूनतम आय की सीमा निर्धारित कीजिए। आय एक रूपए से कम न रहे और 15 रूपए से ज्यादा न रहे। मैं आपसे प्रार्थना करूंगा कि ऐसे औद्योगिक घराने हैं जो एक दिन में आठ लाख रूपए खर्चा लेते हैं…( व्यवधान) एक दिन में 8 लाख रूपए और दूसरी तरफ एक मजदूर गांव में पांच रूपए रोज पर गुजारा करता है। यदि इस देश में कोई 8 लाख रूपए रोजाना लेगा और किसी को पांच रूपए पर गुजारा करना पड़ेगा तो इस देश में समता आएगी नहीं। आप इस विषमता को बढ़ाते हैं, अमीर को अमीर बनाते हैं, पूंजीपतियों को उठाते हैं, गरीबों का खून चूसते हैं।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : धन्यवाद। अब आपकी कोई बात रिकॉर्ड में नहीं जाएगी।

…( व्यवधान)*

 

 

DR. THOKCHOM MEINYA (INNER MANIPUR): Madam Chairperson, I rise to participate in the General Discussion on the Union Budget (General) for the year 2010-11, as presented by the hon. Finance Minister on the 26th of February. I wholeheartedly support the Budget.

          At the outset, I would like to state that the Budget on the whole is a good Budget. Despite various difficulties on hand, the Finance Minister has come out with flying colours in this year’s Budget exercise. I offer my sincere congratulations to the Finance Minister, the UPA Chairperson, and the hon. Prime Minister, under whose guidance such a good thing is happening. For a country of this size and population, enormous efforts are needed. I would like to say that the present UPA Government is just doing that.

 

16.02 hrs.

(Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair)

          Hon. Chairperson, our Finance Minister deserves kudos for his down to earth and a very frank approach while presenting this year’s Budget. Why I say so is because he tries to formulate the Budget by maintaining a very clear-cut concept of continuity.  The three challenges, and the medium term perspective that he had outlined in his last Budget Speech is shown their relevance till today. That is, “(1) to quickly revert to the high GDP growth path of nine per cent and then to find the means to cross the double-digit growth barrier; (2) to harness economic growth to consolidate our recent gains in making development more inclusive, and more thrust to the development of infrastructure in rural areas; and (3) to remove the bottleneck in public delivery mechanism relating to the weakness in Government systems, structures and institutions at different levels of governance.”

          Sir, the Finance Minister talks of an enabling Government, which is very good. Now, we have to look at the structure and the functioning of our Constitution. In such a great country like ours, unity in diversity is the reality. Nobody would deny the fact that the role of the Union Government and respective State Governments are equally important in dealing with the manifold issues of the country as a whole, like the case of price rise of essential commodities, internal security of the country, insurgency movement, naxalite activities, Maoist activities, repeal of the Armed Forces Special Powers Act, terrorism, climate change and international border issues. On all these issues, the Government would, in my humble opinion, require developing a mechanism of creating awareness among the masses. To make the awareness programme very successful, masses should be properly educated.

The right of children to Free and Compulsory Education Act, 2009 is one such instrument towards achieving this goal. The country is very rich in human resource and the proper development of this resource, I repeat, the development of human resource is a real key to general awareness programme. I do welcome the proposal of the Union Finance Minister to increase the Plan allocation of school education from Rs.26,800 crore in 2009-10 to Rs.31,086 crore in 2010-11 and also the State’s access to Rs.3,675 crore for elementary education under the Thirteenth Finance Commission grant of 2010-11. However, I would like to request the Finance Minister to consider providing more funds for education in terms of the higher, technical and elementary education. More money can be earmarked for research and development in the field of basic sciences, which is the paradise of our ancient scientists. This will go a long way to sustain our otherwise well-established traditions of scientific values and scientific temperament.

          The issues of climate change, energy security of the country, fight superstitions etc., can very well be addressed to. Let us work towards allocating a minimum of six per cent GDP for education.

Funds allocated for rural areas are no doubt good, but still… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Hon. Member, please wind up.

DR. THOKCHOM MEINYA : I will take half a minute. I would insist that more funds can be made available to this sector. According to our Father of the Nation and I quote, “India lives in the villages.” It, nevertheless is still true. Those living in rural areas are very much marginalized in almost all aspects. To improve their lot is a service to the God. The basic infrastructure in the rural areas is completely lacking in terms of safe drinking water, power supply, basic health care facilities, good schools, good roads and what not. We have to do many things in these areas. It means allocation of more funds for these areas.

         Coming to the international borders, there is a very peculiar case. I come from the State of Manipur.

MR. CHAIRMAN: Kindly wind up. There are other Members also.

DR. THOKCHOM MEINYA : Manipur along with its other six sister States and one brother State Sikkim, we have a long stretch of international border. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please wind up. I am going to call the next speaker.

DR. THOKCHOM MEINYA : All right. With these few words, I once again support the Budget and wish the Finance Minister well. I think, we will all pass the Budget unanimously.

 

*SHRI DILIPKUMAR MANSUKHLAL GANDHI (AHMADNAGAR) : At the outset let me congratulate you for your longstanding contribution in development of our Nation.

          May  I draw your kind attention to the provisions of Income Tax Act some of which are under consideration before current Parliament Session.  Following provisions may likely to cause a huge damage to a trade, commence and industry sector which is admired as a development partners of this country. Kindly consider following suggestions for the relaxation & relief to the common people & tax payers favourably.

1.             Section 44B- Under this provision audit is required compulsory to the turnover above Rs. 60/- lakhs.  Taking into consideration inflation in the prices since 1985 to 2010.  This limit may be extended to the tune of Rs. 3 crores.

2.             Section 194 H – The limit under the section may be extended to the tune of Rs. 1 Lakhs regarding payment of commission & brokerage.

3.             Section 194 D – Under this section limit of Insurance Commission is extended to the tune of Rs. 20,000/- This limit to be extended to Rs. 2 Lakhs. Taking into the consideration existing Income Tax Slab.

4.             Tax Refund – Special arrangement may be made available to the tax payers for payment of long outstanding refund.

5.             Section 269SS&T – Cash Limit for Withdrawal & Payment may be extended to the tune of Rs. 1 Lakhs taking into consideration the inflation.

6.       Under Section 80P(4) Exemption of Co-operative Bank from payment of Income Tax – Urban Co-operative Banks make submission to withdraw Income Tax on Urban Co-op. Banks and withdraw new Sub. sec.4 in sec 80 P so as to resotre the general deduction which was available to co-op.  banks. Depriving the sector of the cover of Sec. 80P of Income Tax Act, 1961 is a measure likely to cause a huge damage to a sector which is admired as peoples movement of this country.

          Kindly delete the section 80 (P)(4) that was introduced by Finance Act 2006 for co-operative banks.

          May I draw your attention to new provision of Service Tax to the building sector, Flat/Residential units buyer may face trouble of additional burden of Service Tax, which should be excluded atleast for residential units.

          I therefore, request your honour to kindly consider above mention issues in current parliament session favourably to provide some relief to common tax payer of this country.

 

 

 

*श्री महाबल मिश्रा (पश्चिम दिल्ली)ः  सर्वप्रथम, मैं हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, यू.पी.ए. चेयरमैन श्रीमती सोनिया गांधी और आदरणीय वित्त मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी द्वारा सदन में प्रस्तुत दूसरे जनरल बजट का समर्थन करता हूं।  मैं समझता हूं कि इस आर्थिक मंदी के बाजवूद माननीय मंत्री जी ने जो बजट प्रस्तुत किया है, वह देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने मं बहुत ही सहायक सिद्ध होगा।

          समय के अभाव के कारण मैं अपने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव संक्षिप्त में सदन में सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूं और आशा करता हूं कि मेरे इन सुझावों पर सरकार अवश्य ध्यान देगी।

          मेरा सबसे पहला सुझाव है कि मेट्रो रेल की सुविधा को ककरौला मोड़ से घासा गांव वाया नजफगढ़ किया जाए।  यह हमारे क्षेत्र के लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।  

          इसी तरह मेट्रो रेल को नांगलोई क्षेत्र से दिल्ली-जयपुर रूट तक बढ़ाया जाए, जिससे कि वहां आने-जाने वाले लोगों को अपने कार्य और व्यवसाय में बहुत सहायता मिलेगी।

          मेरा दूसरा सुझाव है कि छावला क्षेत्र में 1937 में एक ओ.पी.डी. डिस्पेंसरी चल रही है।  वहां बच्चों को नर्सिंग की ट्रेनिंग भी दी जा रही है।  मेरा सरकार से विनम्र अनुरोध है कि इसे अस्पताल की मान्यता प्रदान करने हेतु उचित कार्यवाही करे।

          नजफगढ़ में 20 एकड़ लैंड में एक डिस्पेंसरी कार्य कर रही है।  मैंने आदरणीय केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद से भी भेंट करके 150 बेड का अस्पताल बनाने का आग्रह किया था।  मैं आशा करता हूं कि इस विषय पर भी सरकार उचित कार्यवाही करेगी।

          अंत में, मैं सरकार से एक बहुत महत्वपूर्ण विषय की चर्चा करना चाहता हूं। अभी तक गैर नियमित कालोनियों की स्थिति अत्यंत दयनीय है, जिसका बहुत बड़ा क्षेत्र मेरे संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है।  अतः मेरा सरकार से विनम्र निवेदन है कि इन अनधिकृत कालोनियों के विकास और इन्हें नियमित करने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, जिससे कि वहां रहने वाले निवासियों को अच्छा जीवन निर्वाह करने का अवसर कांग्रेस सरकार की कृपा से प्राप्त हो सके।  मैं सरकार से यह भी विनती करता हूं कि इस कार्य के लिए शीघ्रतातिशीघ्र पांच हजार करोड़ रुपयों की स्वीकृति प्रदान करे।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं वित्त मंत्री जी द्वारा प्रस्तुत विकासशील बजट और देश को वर्तमान में आर्थिक मंदी से उबारने वाले बजट का समर्थन करते हुए अपनी बात को समाप्त करता हूं।

 

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):सभापति महोदय, माननीय वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कूटनीति के जानकार कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख किया है। यशवंत बाबू भी जब वित्त मंत्री थे, अपने बजट भाषण में कौटिल्य के उदाहरण देते थे। लेकिन हम राम जी की आर्थिक नीति बताते हैं, तो मैं कहना चाहता हूं कि वित्त मंत्री जी राम जी अर्थ नीति क्यों भूल जाते हैं। राम जी की अर्थ नीति है – मणि, माणिक महंगे किए, सहंगे तृण जल नाज, तुलसी ऐते जानिए राम गरीब निवाज। यह तुलसीदास जी का है। उनका कहना है कि मणि-माणिक महंगे किए अर्थात् हीरे-जवाहरात जो बड़े लोगों के इस्तेमाल की चीजें हैं, लक्ज़ूरियस आइटम्स हैं, उन्हें महंगा कर दिया जाए। गरीब आदमी, आम आदमी के इस्तेमाल की चीजों को सस्ता कर दिया जाए। सहंगे, तृण, जल, नाज। तृण मायने घास, भोजन, फिर अनाज और जल, इन सभी को जो आम आदमी की इस्तेमाल की चीजें हैं, उन्हें सस्ता कर दिया जाए और बड़े आदमियों के इस्तेमाल की चीजों को यानि लक्ज़ूरियस आइटम्स को महंगा कर दिया जाए। ये मोटी-मोटी चीजें हैं, स्मिथ, अमर्त्य सेन जी की जो अर्थ नीति, जो जीडीपी ग्रोथ है, ये सभी राम की अर्थ नीति में सब जाहिर हैं।  

  लेकिन मैं चुनौती देता हूं कि यह बजट रामजी की अर्थनीति के खिलाफ है या उसके अनुकूल है। महंगाई जैसी चीज जिसपर देश कोलाहल कर रहा है, जिसपर विपक्ष ने वॉक-आउट किया, उसके बाद भी डीजल, पेट्रोल और सभी चीजों के दाम बढ़े हैं, ऐसा सभी अर्थशास्त्री बताते हैं। कहते हैं कि बजट पर पार्लियामेंट में कुछ एटीकेट होता है लेकिन गांव में करोड़ों लोग जो ताक रहे हैं कि हमारे लिए संसद में क्या हो रहा है, असली एटीकेट वह है और हमें उसी को समझना चाहिए तथा इसी पर विपक्ष ने वॉक-आउट किया। जब सरकार की चिंता बढ़ गयी तो गर्दा उड़ाने के लिए महिला विधेयक आ गया और विपक्ष जिस देश में इस तरह से हो जाए कि सरकार से आगे बढ़कर सरकार में सहयोगी हो जाए तो इस देश का क्या होने वाला है, यह आप समझ सकते हैं।

          माननीया जयंती नटराजन जिस कमेटी की चेयरमैन थी उसकी रिपोर्ट में माइनोरिटी का, अल्पसंख्यकों का, पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों का सवाल है जिस पर कहा गया है कि सरकार उचित समय आने पर उसे देखेगी। यह उनकी रिपोर्ट में है। अब कौन सा समय आयेगा, जब एक सभा में 7 आदमियों को बाहर निकालकर विपक्ष तैयार हो गया कि हम बहस करेंगे। पार्लियामेंट के इतिहास में, जनतंत्र के इतिहास में यह एक काला अध्याय जुड़ गया है, क्या ऐसा विपक्ष होता है? सरकार के जाल में फंसकर विपक्ष रह गया है। …( व्यवधान) इसलिए महंगाई का समाधान नहीं हो रहा है। हमने रामजी की अर्थ-नीति बताई और अब डा. लोहिया की दाम नीति बताना चाहते हैं। “ अन्न दाम का घटना बढ़ना, आना सेर के अंदर हो, हर करखनिआ माल की कीमत लागत से डेढ़ गुनी हो” ।  किसान का जो माल है, जब किसान बेचेगा तो सरकार मूल्य तय कर देगी और जब वह बाजार में चला जाता है तो उसका मालिक बाजार हो जाता है और खरीदने वाला तिगुने-चौगुने दाम पर खरीदने के लिए मजबूर होता है। आलू 25 से 35 रुपये किलो और अब किसान के खेत में हो गया तो कोई 4 रुपये किलो पर पूछ नहीं रहा है। कोल्ड-स्टोरेज में, व्यापारी के घर में चला जाएगा तो 25 से 35 रुपये किलो हो जाएगा। इस पर कोई कानून क्यों नहीं बनाया जाता है, दाम बांधो नीति क्यों नहीं बनाई जाती है? आप न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करते हैं।, गन्ने का मूल्य, स्टेचुटरी-प्राइस भारत सरकार तय करेगी और चीनी का दाम कौन तय करेगा? एक क्विंटन गन्ने में साढ़े आठ किलो चीनी निकलती है और दाम 130 रुपये किलो तय किया गया है। चीनी का दाम 50 रुपये किलो है, इसका मतलब हुआ कि 400 रुपये की चीनी हुई, यानी 130 रुपये के गन्ने पर 400 रुपये की चीनी हुई। गन्ने का दाम तो आप तय करेंगे और चीनी का दाम कौन तय करेगा? चीनी मिल वाले या ट्रेडर्स तय करेंगे, यह दोहरा मापदंड क्यों है, इसीलिए उसके मूल्य का निर्धारण होना चाहिए।

          उसी तरह से कारखाने में कभी भी लोहे की छड़ के दाम बढ़ जाते हैं, जब मन में आता है सीमेंट के दाम बढ़ जाते हैं, कोई पूछने वाला नहीं है कि तुम्हारी लागत क्या है और इतने पर बेचने पर तुम्हें कितना लाभ होगा? यह सवाल हल क्यों नहीं हो रहा है? तर्क और कुतर्क से समस्या का समाधान नहीं होता है। मेरे इस तर्क का जवाब देने वाला कोई माई का लाल हिंदुस्तान में है कि इस्पात का दाम बांधा क्यों नहीं जा रहा है, क्यों नहीं मूल्य का निर्धारण किया जा रहा है  कि इतने में किसान बेचेगा और इतने में व्यापारी बेचेगा। जिधर देखो, मुनाफाखोरी है, कालाबाजारी है, गड़बड़ी है।   

क्या कारण है कि बाजार को लोगों ने छोड़ दिया? बाजार मालिक बन गया है और किसान के सामान पर सरकार मालिक है और व्यापारी के माल का बाजार मालिक है। लोग मर रहे हैं और यहां कुतर्क पर कुतर्क दिए जा रहे हैं। सरकार की तरफ से  रंग-बिरंगे सप्त स्वर सुन रहे हैं। हमारे देश में जब चीनी की पांच रुपए कीमत बढ़ी, तब ज्ञानचंद कमीशन बैठा। अब 50 रुपए चीनी का दाम पहुंच गया है और कोई देखने वाला नहीं है। सरकार ने गन्ना किस भाव में खरीदा है और किस भाव में चीनी दे रही है? इसका कोई रेशो नहीं है।

MR. CHAIRMAN : Please wind up.

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : रफी अहमद किदवई साहब का फार्मूला था कि किस भाव में गन्ना होगा और लोग किस भाव में चीनी खरीदेंगे। यह दाम नीति है। डॉ. लोहिया की दाम नीति के अलावा कोई दूसरा विकल्प हिंदुस्तान में नहीं है।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Please wind up. You made your point. The Finance Minister has to start his reply.

… (Interruptions)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : क्षेत्रीय असमानता है। सरकार दावा करती है कि नेशनल हाइवे 20 किलोमीटर रोज बनाएंगे। मैं कहता हूं कि बिहार में चार लेन का एक किलोमीटर नेशनल हाइवे बनाकर दिखाएं। एक साल में ही एक किलोमीटर बना कर दिखाएं। 890 किलोमीटर की सड़क मंजूर हुई। एक किलोमीटर सड़क भी चार लेन की नहीं बनी है।   

MR. CHAIRMAN: Now, wind up, I have given you enough time. You made your point.

… (Interruptions)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, मैं अपनी बात समाप्त करने जा रहा हूं। मैं बजट के बारे में कहना चाहता हूं। एक प्रधानमंत्री स्वास्थ्य अनुदान योजना है। उसमें एमपी लोग लिखते हैं और दस, बीस, तीस, पचास हजार गरीबों को सहायता मिलती है। लाल कार्ड मिलता है, आय प्रमाण पत्र है, डॉक्टर का एस्टीमेट जाता है। कहीं आधा और कहीं चौथाई मिलता है। चिट्ठियों का उत्तर आता है कि उसमें फंड ही नहीं है। यह बजट क्या पास होगा? गरीबों के इलाज के लिए प्रधानमंत्री कोष में फंड ही नहीं है। इस देश में क्या चल रहा है? हम उस गरीब को क्या उत्तर देंगे, जो हमारे पास आया कि हमारी सहायता कर दीजिए। यह सवाल है कि प्रधानमंत्री सहायता कोष में फंड खत्म हो गया है। किसके लिए यह बजट आया है।  

MR. CHAIRMAN: Just a minute more. Otherwise, I will put it off.

… (Interruptions)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से सभी माननीय सदस्य जुड़े हैं। बीस हजार करोड़ रुपया हर साल खर्च करने की राज्यों की केपेसिटी हो गई है। बजट 12 हजार करोड़ रुपयों का है। पांच हजार करोड़ राज्यों की मांग है, राज्यों में सड़क बननी बंद हो गई। हमारे माननीय सदस्य बेखबर हैं। मैं जानकारी दे रहा हूं कि पैसे के अभाव में सड़कों का काम बंद हो गया है।

MR. CHAIRMAN: Anything more, you can place it on the Table.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Nothing more should go on record.

(Interruptions) … *

MR. CHAIRMAN: Just one minute.

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : गांवों में शिक्षा मित्र बहाल होंगे, शिक्षक बहाल नहीं होंगे। वहां क्या पढ़ाई होगे? क्या आप दूसरी मैकाले शिक्षा ला रहे हैं। गांव को आप क्या समझते हैं, किस नज़र से देखते हैं। हुक्मदेव जी भाषण करते हैं और कहते हैं कि सबकी शिक्षा एक समान, राष्ट्रपति हो या….* की संतान, सबकी शिक्षा एक समान।

MR. CHAIRMAN: He has said unparliamentary word. Erase it from the record. 

… (Interruptions)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : यहां कोंवेंट स्कूलों में बेहतर शिक्षक और गांवों में शिक्षक नहीं। दोहरा मापदंड चल रहा है। दूसरी मैकाले शिक्षा नीति लाई जा रही है। गांवों में क्यों नहीं गुणवत्ता वाली शिक्षा होगी।

           प्रधानमंत्री स्वास्थ्य शिक्षा योजना, एम्स में मारामारी चल रही है।(Interruptions) …*

MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record.

(Interruptions) … *

                                                                                                   

 

MR. CHAIRMAN : You should respect the Chair. You can place your speech on the Table of the House.  Nothing should go on record.

(Interruptions) …*

 

*श्री किसनभाई वी. पटेल (बलसाड़)ः वित्त मंत्री जी ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ इस वर्ष सामान्य बजट तैयार कर राजनीतिक बुद्धिमता का परिचय दिया है।  वे सभी वर्गों का ख्याल रखते हुए उनके लिए लाभ प्रदत्त बजट पेश किया है, यह एक स्वागत योग्य है। वैसे तो हमारे प्रधानमंत्री जी खुद एक जाने माने अर्थशास्त्री हैं और उनके मार्गदर्शन में देश विकास की ओर लगातार अग्रसर है।  हमारे नेता माननीया सोनिया जी के कुशल नेतृत्व में देशवासियों को एक मजबूत सरकार और विकास के प्रति वचनबद्धता को सुनिश्चित करता है।

          बजट में वैसे तो किसानों के हित की बात की गई है किन्तु अभी भी कृषि क्षेत्र में जितना विकास होना चाहिए, नहीं हो रहा है।  इस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।  हमारा देश कृषि प्रदान देश है, देश की आत्मा किसानों में बसती है।  करीब 71 प्रतिशत लोग कृषि पर आधारित हैं और उनकी जीविका का मुख्य स्रोत कृषि ही है।  अगर देश का किसान खुशहाल होगा तब ही देश उन्नति की ओर बढ़ेगा।  अतः समर्थन मूल्य नीति संगत हो।  खाद का मूल्य नहीं बढ़े।  जन वितरण प्रणाली सुदृढ़ हो जिससे गरीबों को सीधा फायदा हो और जन वितरण प्रणाली सुदृढ़ हो जिससे गरीबों को सीधा फायदा हो और जन वितरण प्रणाली में शामियों की वजह से गरीब लोगों को पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता है।  सरकार कोशिश करती है किन्तु लाभ बीच वाले उठा ले जाते हैं।  अतः काफी सुधार की आवश्यकता है।  आज मैं माननीय वित्त मंत्री जी से अपने राज्य के किसानों के लिए कुछ राहत और विशेष सहायता की मांग करता हूं।  गुजरात में इस वर्ष वर्षा कम होने से किसानों को अच्छी फसल नहीं हो पायी है।  अतः गुजरात में किसानों को विशेष आर्थिक सहायता की घोषणा करें।  गुजरात के पहाड़ी क्षेत्र में बड़े तालाब बनवाकर सिंचाई की व्यवस्था करने का काम करें।  बजट पर जब चर्चा हो रही है तो मैं आज की ज्वलन्त समस्या की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं।  वह है बेकाबू होती महंगाई।  आज जनता आज महंगाई के चपेट में है और यह सरकार का उत्तरदायित्व है कि इस पर अविलम्ब और त्वरित कार्रवाई करे जिससे लोगों को राहत मिले, खास कर गरीब, मजदूर और खेतिहर किसान।

          मैं सरकार की जन कल्याणकारी योजना नरेगा में  दैनिक भत्ता बढ़ाकर 100 से 250 रुपया करने की गुजारिश करता हूं।  इससे करोड़ों मजदूर भाइयों को सीधा लाभ मिलेगा और उन्हें अपने रोजी-रोटी की चिन्ता कम होगी।  साथ ही साथ 100 दिनों के काम को बढ़ा कर कम से कम 200दिन कर दिया जाए।  नरेगा में गुजरात सरकार का अध्यादेश जो 100 रुपए से अधिक दैनिक भत्ता मजदूरों को नहीं मिलेगा वह गलत है।  पहले की तरह ही माप के अनुसार मजदूरों को दैनिक भत्ता मिले जिससे उन्हें फायदा हो।  केन्द सरकार इस पर ध्यान देकर अध्यादेश वापस लेने की आदेश दे।  आरटीआई आज आम लोगों के लिए एक हथियार साबित हो रही है इसकी सरहाहना सभी लोगों द्वारा की जा रही है। इसमें संशोधन कर सभी विभाग यहां तक की निजी संस्थानों को भी शामिल कर देना चाहिए।  इससे शोषण जो आज हो रही है।  उस पर पूर्णविराम लग जाएगा, ऐसा मेरा मानना है। देश में बेरोजगारी कम होने के बजाए बढ़ती ही जा रही है।

          अतः सरकार का ध्यान इस ओर होना चाहिए। अधिक से अधिक रोजगार के अवसर प्रदान करने होंगे नहीं तो आज के हमारे नौजवान बंधुओं में असंतोष फैलेगा।  आज पूरे देश में शुद्ध पेयजल की विकट समस्या है।  आजादी के 63 वर्षों के बाद भी हमें अगर शुद्ध पीने का पानी नहीं मिले यह तो खेद की ही बात होगी।  अतः सरकार का ध्यान इस ओर भी हो।  बिजली की कमी दिनों दिन बढ़ रही है।  यहां तक कि विकसित राज्य जो बिजली में सम्पन्न थे आज वे भी कमी के शिकार हो रहे हैं।

          अतः इस पर पूर्ण ध्यान देने की आवश्यकता है और आशा है 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक देश में बिजली की कमी दूर करने के लिए सरकार तत्पर होगी।  इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना वाक्य समाप्त करते हुए पुनः एक बार सामान्य बजट 2010-11 का पूरजोर समर्थन करता हूं।  

 

 

 

* श्री गणेश सिंह (सतना): मैं यूपीए सरकार के आम बजट पर अपनी बातें रखने जा रहा हूं। यह बजट पूर्णतः महंगाई बढ़ाने वाला तथा देश को अंधेरी गली में ले जाने वाला बजट है। वित्त मंत्री ने विश्व के पूंजीपति देशों की सलाह से बजट तैयार किया है। विश्व में आर्थिक मंदी का डर पैदा करके झूठी विकास दर दो अंशों में पहुंचाने का जो सपना दिखा रहे हैं वह पूर्णतः गलत है। लोग एक तरफ भूख से मर रहे हैं, दूसरी तरफ विकास दर में वृद्धि दिखाई जा रही है। महंगाई का कोटा पहले से वजनदार ऊपर से 20 हजार करोड़ का टैक्स की मार और साथ में महंगे पैट्रोल, डीजल की मार। वित्त मंत्री जी इतने बेदर्द होंगे, किसी को पता नहीं था।

          आम आदमी का साथ देने का वायदा करने वाली केन्द्र सरकार खाद्य वस्तु और दाम में लाचार दिख रही है। कभी दोष विश्व बाजार में बढ़ते हुए दामों की कहानी, तो प्रकृति का साथ न देना, कभी राज्य सरकारों पर दोष मढ़ना और अपने आपको जिम्मेवारी से बाहर बताना, इस सरकार की विशेषता रही है। राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में खाद्य वस्तुओं के बढ़ते दामों पर नियंत्रण का जिक्र किया गया था। लेकिन बजट में सीमेंट, डीजल, पैट्रोल, लोहे सहित सभी तरह के उपयोग की वस्तुओं के दामों में भारी इजाफा करके देश को महंगाई की मार में झोंकने का काम किया गया है।

          रिजर्व बैंक ने गत सप्ताह में जारी अपने डाटा में 18 सप्ताहों में खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति 18 से 20 प्रतिशत बताया है। यह सरकार की गलतियों का परिणाम है। इस नीति में 99औ सट्टा व्यापार होता है। चालू वर्ष में  कुल 4.5 लाख करोड़ का व्यापार हुआ जबकि वास्तविक वितरण मात्र 1औ 4500 करोड़ का ही मात्र दिखाया गया। शेष पैसा कहां से दिया, कहा गया, इसमें व्यापक भ्रष्टाचार हुआ है और सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है।

          सरकार कहती है कि हम खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं, दो तिहाई आबादी 20 रूपये प्रतिदिन में जी रही है। केन्द्र सरकार आज तक देश में कितने लोग बीपीएल में है, उसका पता नहीं लगा पाई। योजना आयोग 25.7औ कुल जनसंख्या का बीपीएल परिवार में होना बताता है जबकि नेशनल कमीशन 77औ, तेन्दुलेकर कमेटी 37.2औ तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित सक्सेना कमेटी कुल आबादी का 50औ मानता है। मध्य प्रदेश जैसे कई राज्य हैं, जहां 20-20 लाख बीपीएल परिवार को केन्द्र से दाना, अनाज नहीं मिलता। यह कैसी खाद्य सुरक्षा है?

          केन्द्र सरकार ने 100 दिनों में विदेशों में जमा काला धन की वापसी का वायदा किया था, अब उसका जिक्र भी नहीं हो रहा है। सरकार ने 2008-09 में उद्योगों में 4 लाख 18 हजार 95 करोड़ की राजस्व करों में छूट देकर हजारों करोड़ रूपया लेकर चुनाव में लगा दिया, देश में अब तक 28औ मात्र लिया है। मेरे प्रदेश की वरगी न्यायवर्तन सिंचाई परियोजना जो कि राष्ट्रीय सिंचाई योजना में शामिल करने का प्रस्ताव विचाराधीन है, जिससे प्रदेश के 5 लाख हैक्टेयर भूमि की सिंचाई होनी है, उस पैसों के अभाव में राष्ट्रीय योजना घोषित करने में आनाकानी कर रही है।

          कृषि का रकबा घटकर 12 करोड़ हैक्टेयर बचा है। 8औ कम हो गया। 1991 में प्रति व्यक्ति 510 ग्राम अनाज था, अब घटकर 440 ग्राम हो गया है।

 

          इस आम बजट में यूपीए सरकार ने उर्वरक सब्सिडी को कम करने का निर्णय लेकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसानों के प्रति गहरा उदासीन भाव रखती है जो पहले ही देश में गहरे कृषि संकट का सामना कर रहे थे। हालांकि सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण और केन्द्रीय बजट में स्वीकार किया है कि हमारे किसानों की हालत दयनीय है फिर भी सरकार कृषि क्षेत्र के प्रति मात्र मुंहजबानी सेवा की बात हांक रही है। किसानों को सस्ते ऋण और आसान किश्तों में इनके भुगतान की सुविधा की आवश्यकता थी, परन्तु सरकार ने केवल ऋण लक्ष्यों में वृद्धि मात्र की है जिन्हें बढ़ा कर 3.75 लाख करोड़ रूपए कर दिया गया है।

          इस बजट में दिखावे के बतौर कृषि, किसान, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा असंगठित क्षेत्र के लिए सामाजिक सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, दलितों-आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के कलयाण आदि की चाहे जितनी बातें की गई हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि बजट में खर्चों में कटौती पर जोर देने की वजह से सबसे अधिक कीमत इन्हीं मदों में और आम आदमी को चुकानी पड़ी है।

          वर्ष 2010-11 के आम बजट से यह साफ जाहिर होता है कि अब नए राजनीतिक परिदृश्य में यूपीए सरकार के लिए आम आदमी का बोझ ढोते रहने की मजबूरी खत्म हो गई है।

          बजट प्रावधान से ऐसा लगता है कि शिक्षा का अधिकार कानून बनाने के बावजूद सरकार उसे लागू करने को लेकर ईमानदार नहीं दिख रही है। इस कानून को इस साल 1 अप्रैल से लागू होना है और इसे अमली जामा पहनाने के लिए न्यूनतम प्रतिवर्ष 45,000 करोड़ रूपए की जरूरत पड़ेगी। स्वयं मानव संसाधन विकास मंत्रालय का आकलन हे कि इस कानून को लागू करने के लिए अगले पांच वर्षों में 1,71,000 करोड़ रूपए की जरूरत है, यानि हर साल औसतन 34 से 35 हजार करोड़ रूपए। लेकिन इस बजट में स्कूली शिक्षा के लिए कुल योजना बजट 31 हजार करोड़ रूपए का है।

          चालू वित्त वर्ष (2009-10) और उससे पहले के वर्ष (2008-09) में यूपीए सरकार ने चुनावी राजनीति की मजबूरियों के कारण आम आदमी को लुभाने के लिए बजट में थोड़ी अतिरिक्त उदारता बदलते हुए सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया था। परंतु वर्ष 2010-11 का आम बजट आम आदमी के प्रति यूपीए सरकारी की उपेक्षा एवं संवेदनहीनता की कलई खोलता है।

          पिछले एक वर्ष में जब बाकी उत्पादों के लिए महंगाई दर 1 से 2 प्रतिशत के बीच थी, उस दौरान खाद्यान्न की कीमतें 20 प्रतिशत बढ़ गई। ऐसे में आम आदमी की नजरें इस बात पर थी कि क्या सरकार आम लोगों को सस्ता खाद्यान्न मुहैया कराने के उद्देश्य से सार्वजनिक वितरण के लिए आबंटन बढ़ायेगी। लेकिन इसके उलट सरकार ने जिस तरह से पेट्रोलियम और डीजल की कीमतें बढ़ाई हैं उसका असर निश्चय ही खाद्यान्न की कीमतों पर पड़ेगा। दूसरी ओर बजट में खाद्य उत्पादों पर से सब्सिडी घटाने की बात की गई है। आम आदमी के लिए यह बजट का एक दर्दनाम पहलू है।

          राष्ट्रीय ग्रामीण योजना के लिए वित्त मंत्री ने इस बजट में 40,100 करोड़ रूपए का प्रावधान किया है, पर यह नहीं बताया है कि अगले वर्ष के लिए आबंटित यह राशि चालू वर्ष से कितना अधिक है।

          बजट में पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क में बढ़ोत्तरी की घोषणा कर आम आदमी के लिए सिर पर हथौड़ा मारने की कोशिश तो की ही गई है, साथ ही पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को पूरी तरह मुक्त करने का संकेत देकर आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ा दी गई हैं।

          देश में ढांचागत विकास आम आदमी के लिए बेहद आवश्यक है। लेकिन बड़ी संख्या में निजी-सार्वजनिक क्षेत्र की साझेदारी में परियोजनाओं के होने के बावजूद कुल घरेलू उत्पाद में ढांचागत क्षेत्र में मात्र 5 प्रतिशत का निवेश दुर्भाग्यपूर्ण है।

          इस बजट में सरकार ने वित्तीय घाटा कम कियाहै। इसे 6.5 प्रतिशत से घटाकर 5.5 प्रतिशत कर दिया गया है। लेकिन इस वित्तीय घाटा को कम करने से आम आदमी को क्या फायदा होगा।

          आम आदमी का सबसे ज्यादा सरोकार बेरोजगारी से है, लेकिन वर्ष 2010-11 के बजट में बेरोजगारी के मुद्दे को लगभग अदूता ही छोड़ दिया गया है।

स्वास्थ्य

          प्राचीन काल से ही भारत में शासन व्यवस्था का आधार कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना रहा है और इसका सबसे बेहतर उदाहरण गरीबों एवं निराश्रितों को सुसंगठित स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करना रहा है। चीनी यात्री फाह्यान जिसने भारत की यात्रा चंद्रगुप्त मौर्य के कार्यकाल में की थी, पाटलिपुत्र में चलाए जा रहे धर्मार्थ औषधालय का विस्तार से वर्णन किया है। फाह्यान के अनुसार, इस देश के भद्रजन और निवासी शहर में अस्पतालों का निर्माण कर रखा है, जहां इलाज के लिए सभी देश के लोग आते हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग जो हर्षवर्द्धन का समकालीन था, उसने उस समय के अस्पतालों का विस्तार से वर्णन किया है। उसके अनुसार, पूरे भारत में शहरों एवं गांवों के उच्चपथ पर शासन द्वारा संचालित अस्पताल (पुण शाला)  थे।

          स्वास्थ्य प्राथमिक मानव अधिकार है, तथा भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में इस बात को स्पष्टता एवं सबलता के साथ कही गई है। इस अनुच्छेद के अनुसार, लोगों के स्वास्थ्य सुरक्षा एवं पोषण राज्य सरकारों का कार्य है जबकि केन्द्र सरकार को इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।

          वर्तमान शासन व्यवस्था में (संविधान के अनुरूप)  स्वास्थ्य समवर्ती सूची में है। स्वास्थ्य क्षेत्र की जिम्मेदारी राज्य, स्थानीय एवं केन्द्र सरकार तीनों पर है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में होने वाले सरकारी व्यय का तीन-चौथाई हिस्सा राज्य एवं स्थानीय सरकार द्वारा वहन किया जाता है जबकि कुल सरकारी व्यय का एक चौथाई केन्द्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है। देश में स्वास्थ्य का राष्ट्रीय मानक निर्धारण करना एवं उसका नियमन एवं मॉनिटरिंग करना केन्द्र सरकार का उत्तरदायित्व है।

शिक्षा

          1 अप्रैल से शिक्षा का अधिकार कानून को लागू करने के लिए अधिसूचित किया जा चुका है। इसमें केन्द्र को 70 प्रतिशत हिस्सेदारी देनी हे। ऐसे में प्राथमिक शिक्षा के बजट में महज 8306 करोड़ की बढ़ोत्तरी नाकाफी है। इस कानून को उपयुक्त रूप से लागू करने में प्रतिवर्ष न्यूनतम 45,000 करोड़ रूपए की जरूरत पड़ेगी (मानव संसाधन मंत्रालय के अनुसार इसके लिए 34 से 35 हजार करोड़ रूपए की जरूरत होगी), लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि इस बजट में स्कूली शिक्षा के लिए कुल योजना बजट 31,000 करोड़ रूपए का है।

          वर्ष 2010-11 के बजट में मानव संसाधन मंत्रालय को कुल 42,036 करोड़ रूपए का आबंटन किया गया है, जबकि वर्ष 2009-10 के बजट में कुल 36400 करोड़ रूपए का आबंटन किया गया था। पिछले वर्ष की तुलना में मात्र 6,836 करोड़ रूपए की बढ़ोत्तरी शिक्षा के क्षेत्र में नई योजनाओं पर कुठाराघात है।

          बजट में यह मामूली वृद्धि, शिक्षा का अधिकार कानून के क्रियान्वयन और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उठाए गए कदमों को साकार करने हेतु नाकाफी है।

          ऐसी सूचना है कि मानव संसाधन मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से इस बजट में प्राथमिक शिक्षा के लिए 65000 करोड़ रूपए और उच्च शिक्षा के लिए 31,000 करोड़ रूपए मांगे थे। लेकिन बजट में प्राथमिक शिक्षा को 31,106 करोड़ रूपए और उच्च शिक्षा के लिए 11,000 करोड़ रूपए दिए गए हैं। जाहिर है मंत्रालय की योजनाएं (विशेषकर शिक्षा क्षेत्र की योजनाएं) अधर में लटक जायेगी।

          यूपीए सरकार देश के राष्ट्रीय प्रतिरक्षा खर्च के आबंटन को भी नहीं बढ़ा पाई है। सरकार ने 2010-11 के बजट में प्रतिरक्षा खर्च में 1,47,344 करोड़ रूपए का आबंटन किया है, जो पिछले वर्ष के 1,41,703 करोड़ रूपए के आबंटन में मात्र 4 प्रतिशत बैठता है। इस चार प्रतिशत की बढ़ोत्तरी से तो वर्तमान मुद्रास्फीति की दर भी पूरी नहीं हो पायेगी। प्रतिरक्षा आबंटन जीडीपी का 2.5 प्रतिशत के आसपास घूम रहा है और आज की वर्तमान सुरक्षा स्थिति को देखते हुए सरकार की प्रतिरक्षा को दिशा में पर्याप्त आबंटन करना चाहिए था।

          आज भारतीय अर्थव्यवस्था खाद्यान्न असुरक्षा और खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों के युग में पहुंच चुकी है। इससे चीनी, गेहूं, चावल और दूध तक की कीमतों पर प्रभाव पड़ा है। हमें तो उम्मीद थी कि सरकार कोई नीतिगत वक्तव्य देकर कोई बड़ी पहल करेगी कम बोई जाने वाली फसलों की खेती के विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित उपायों की घोषणा करेगी। परन्तु यहां तो बजट में मात्र खाद्यान्न खेती पर मामूली सा आबंटन बढ़ा कर इतिश्री कर दी गई है। खाद्यान्नों की पूर्ति संबंधी समस्या पर कोई विशेष ध्यान दिया गया है।

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भारत सरकार नई दिल्ली को भेजे गये प्रस्तावों की सूची

          ये प्रस्ताव अभी तक लंबित हैं और इनके लिए यूपीए सरकार की ओर से बजट में कोई उल्लेख नहीं किया गया है और न ही इन्हें पूरा करने के लिए किसी तरह की राशि स्वीकृत की गई है।

केन्द्रीय सड़क नीधि

          नागौदा रूहिकवारा सुरदहा मार्ग जिला सतना

                                        मध्य प्रदेश शासन का पत्र क्रमांक 3426, दिनांक 13.07.09

          सतना सेमरिया मार्ग जिला सतना

                                        भारत शासन को दि. 23.11.09 द्वारा प्रेषित

                                                  (संशोधित प्राक्कलन पुनः प्रस्तुत)

          झुकेही कैमोर हरया भतूरा बदनपुरा मार्ग जिला विजयराघौगढ़/सतना

                                                  भारत शासन को दि. 23.11.09 द्वारा प्रेषित

                                                   (संशोधित प्राक्कलन पुनः प्रस्तुत)

अन्तर्राज्यीय एवं आर्थिक महत्व की सड़कों के प्रस्ताव

          सतना से इलाहाबाद वाया सेमरिया, जमुआ, अतरैला, बदगड, इलाहाबाद

नर्मदा घाटी विकास

          सरदार सरोवर परियोजना के अंतर्गत डूब में आने वाली अतिरिक्त 77.235 हे. वन भूमि के व्यपवर्तन बावत।

                    अपर प्रधान मुख्य वन रक्षक (भू-प्रबंध) भोपाल (नोडल अधिकारी)

                    पत्र क्रमांक 3/27/07/10-11/एन वी डी ए / 204 दि. 24.01.08 द्वारा प्रस्ताव भारत सरकार पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजा गया।

          बरगी व्यपवर्तन परियोजना (बीडीपी) को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किये जाने बावत।

                    उपाध्यक्ष, नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा सचिव भारत सरकार जल संसाधन मंत्रालय को पत्र क्र. 359/व्ही.सी./नघाविप्रा/09, दिनांक 03.02.2009 द्वारा बरगी व्यपवर्तन परियोजना (बीडीपी)  को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किए जाने बावत प्रस्ताव प्रेषित किया गया है।

          इंदिरा सागर परियोजना के अंतर्गत मुख्य नहर हेतु व्यवपर्तित 159.397 हे. वन भूमि में से 94.228 हे. वन भूमि कर करते हुए मात्र 65.151 हे. वन भूमि को ही नेट परसेंट वैल्यु की परिधि में शामिल किये जाने बावत।

                    मुख्य वन संरक्षक (भू-प्रबंध) भोपाल द्वारा पत्र क्रमांक एफ – 9/10-11/1868 दिनांक 26.08.2006 के द्वारा प्रस्ताव सचिव, भारत सरकारी पर्यावरण एवं वन मंत्रालय नई दिल्ली को प्रेषित किया गया है।

          सरदार सरोवर परियोजना के बांध की ऊंचाई बढ़ाने बावत।

                              नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा पत्र क्र. 1970 दिनांक 23.12.2008 तथा अर्द्धशासकीय पत्र/174 दिनांक 21.10.2008 से भारत सरकार जल संसाधन मंत्रालय नई दिल्ली के द्वारा लेख किया गया है।

आवास एवं पर्यावरण

यू.आई.डी.एस.एस.एम.टी. योजना सतना (जल संवर्धन योजना)जो कि 73 करोड़ की है जो शहरी मंत्रालय में विचाराधीन है, उसकी स्वीकृति दी जाये।

          मध्य प्रदेश विकास प्राधिकरणा संघ के पत्र क्र. 749/वीपीएस/09 दिनांक 22.06.2009 द्वारा

 मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

जन भागीदारी,

          राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार

 

मध्य प्रदेश झील संरक्षण प्राधिकरण, भोपाल

    Study of rural catchment of Bhoj Wetland, Bhopal for development of conservation & management strategies & action plan

                    1.  पत्र क्र. 889/झी.स.प्रा./09 दिनांक 26.09.09

                    2.  स्मरण पत्र क्र. 200/झी.स.प्रा./09 दिनांक 13.05.09

 

          भोपाल के 10 तालाबों का विकास एवं संरक्षण

                    पत्र क्र. 1586/एलसी/07/िदनांक 12.02.07, 1584/एलसीए/07 दिनांक 12.02.07, आ. एवं पर्या. विभाग का पत्र क्र. 70/पीएस/एचएडउ/07 दिनांक 5.05.07, मा. मुख्यमंत्री जी का मान, वित्त मंत्री, भारत सरकार को प्रेषित पत्र क्र. 1278/सीएमओ/07 दिनांक 4.10.07 मुख्य सचिव, म.प्र. शासन का सचिव, वित्त मंत्रालय को प्रेषित पत्र क्र. 37/सीएस/पीएस/08 दिनांक 25.04.08

 

          गोविन्दगढ़ तालाब, रीवा की संरक्षण एवं प्रबंधन योजना

                              क्र. 1274/ढी.सं.प्रा./09 दिनांक 31.12.09

          मेरे लोक सभा क्षेत्र में कई पर्यटन क्षेत्र हैं, मैं चाहता हूं कि उन सभी को देश के टूरिस्ट सर्किट में जोड़ा जाये।

          राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. 75 पर सतना शहर में बाईपास रोड़ बनाई जाये तथा एन.एच 7 को चार लेन की सड़क बनाया जाये।

          सतना जिला एक औद्योगिक जिला है, तत्काल हवाई सेवा प्रारंभ कराई जाये तथा सतना जिले के सैंकड़ों खेल मैदान ऐसे है जिनमें स्टेडियम बनाने हेतु आर्थिक सहायता दी जाये।

          सतना जिले का इंदिरा आवास, कोटा बढ़ाया जाये। जल आवर्धन योजना के तहत सतना जिले का कोटा बढ़ाया जाये।

          अंत में मैं बजट का विरोध करता हूं।

 

 

DR. MIRZA MEHBOOB BEG (ANANTNAG): Sir, even without microphone he is more audible than me.  I cannot be so audible.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I would request the hon. Members to stick to the time.

DR. MIRZA MEHBOOB BEG : Sir, he is so audible… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I will give you time.

DR. MIRZA MEHBOOB BEG : Sir, I would very quickly make a couple of suggestions.  I would go straight to the State of Jammu and Kashmir.  My very capable Finance Minister, who presented the Budget, is present here and my former Finance Minister, Shri Yashwant Sinha is also here.  I would talk about the State of Jammu and Kashmir and both the experts will agree that the State has tremendous potential so far as our economy is concerned. 

          The God was so kind to the State of Jammu and Kashmir that it has endowed the State with tremendous water reservoirs.  We would have been quite self-sufficient so far as generation of electricity is concerned but unfortunately way back in 1962 all waters of the State of Jammu and Kashmir were handed over to the Government of Pakistan and the State of Jammu and Kashmir had no control over its own water resources.  Even very recently the Government of Pakistan has made objections and said that we cannot tamper with the famous international Water Treaty which deprives the State of Jammu and Kashmir and, therefore, the entire country from exploiting tremendous power potential.  So, I would request the Government of India, the hon. Finance Minister that that is an international treaty and perhaps we cannot scrap that but the State of Jammu and Kashmir should be compensated for the heavy loss which it is undergoing because of that Indus Water Treaty.

          We are very famous so far as horticulture or handicraft or Kashmiri carpet is concerned.  We could have attracted tourists from all over the world but unfortunately not much has been done on this front also.  If the Government of India could provide infrastructure, road connectivity, lodging and boarding, Kashmir could have been a spot which could attract not only domestic tourists but tourists from the entire world.  Unfortunately, not much has been done on this front.

          I heard Shri Sinha saying that they had every right to stage a walk out. The question is, they did not even hear the Finance Minister and staged a walk out.  They should have heard as to why there was a hike in fuel prices. It was because this was a concession given to us at a time when in the international market the fuel prices were at their peak.  This has softened now and, therefore, this concession has been withdrawn and hence there has been a hike in fuel price.  I do not think that it was actually a hike but the result of the concession being withdrawn. 

When we boast that when the entire world was overtaken by recession we faced it very well, we cannot compare ourselves with economic giants like the USA.  We should compare ourselves with China.  Unfortunately, China is moving ahead.  I heard the Finance Minister saying that because of the democracy we cannot move as ahead as China has but I think there is a vast section of the society which has not been covered.  There is still poverty and illiteracy.  We have to reach to the masses who are still suffering because of poverty and illiteracy and where our Budget, our economic policies have not reached so far.

          Therefore, I would request the Government of India to concentrate and to see how we can reach those poor masses who are yet to enjoy the fruits of our democracy, our policies and our schemes.

 

                                                                                         

 

 

 

श्री हसन खान (लद्दाख):सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं केवल एक ही आइटम के बारे में बोलूंगा। मैं सदन का ज्यादा समय नहीं लेना चाहता हूं। That is about Rs.500 crore which have been provided for Ladakh by the hon. Finance Minister in the present Budget to address the acute problem of extremely harsh climate and energy deficiency.  I would congratulate the Finance Minister and through him the UPA Government as it is for the first time that the Government has realised the difficulties of the people of Ladakh which remains cut off from the rest of the world for more than six months in a year with a temperature below 50 degrees.  I do not accuse BJP Member because it is his ignorance.  They are ignorant of the geography of the country.  They are ignorant of the people living in far off and remote areas.  That is why, they are making such criticism of the Finance Minister for giving concessions and for redressing the problems of the far off places, especially the border areas of China and Pakistan.  He said that it has been given for a district.  He must note that Ladakh is not only a district.  It can be a district because of less population. Otherwise, it is bigger than Jammu and Kashmir put together in area.  It is 70,000 square kilometres which is much more than many States in the country and people are spread in all those areas.  They have many problems, especially during winter season when they remain cut off.  It is the UPA Government which have realised the problems of the people.  How can he realise it?  He stated that Jharkhand has been given this much and Ladakh has been given that much.  There is a reality on the ground and they have realised  the problems of the people, wherever they are.  So, I am highly thankful to the hon. Finance Minister and his Government for redressing this problem of Ladakh for the first time. BJP also said that Rs.500 crore has been given because Dr. Farooq Abdullah is the Minister.  Dr. Farooq Abdullah has not given money to his Constituency.  फिर कश्मीर को देना चाहिए था, श्री गुलाम नबी आजाद जम्मू के हैं, उन्हें देना चाहिए था। It is because they do not need it and Ladakh needs it. लद्दाख में सोलर की पोटेंशियल है। He has given the money. So, we are highly thankful to him. 

          I would like to bring one more thing to the notice of the hon. Finance Minister since they have started realising the problems of the people living in all parts of the country.  All the central schemes which have been running in the country in a revolutionary manner, in Ladakh region they are not giving the targeted results.  It is again because of the harshness of the climate, because of remoteness  and because of remaining cut off for more than six months in a year.

जितने भी आपके अनइम्पलॉयड यूथ्स हैं, जितने लोन आप देते हैं, उस लोन से जो इंकम जनरेट हो रही है, वह छः महीने के लिए पूरी तरह स्टैंडस्टिल हो जाती है। Persons who have been given loans under those schemes, उनकी इंकम जनरेशन भी छः महीने के लिए कम्पलीटली बंद हो जाती है और उसके इंस्टालमैन्ट की रिकवरी वैसी ही है, जैसे मुल्क के बाकी हिस्सों में साल भर काम चलाने वालो की होती है। इस सिलसिले में कम से कम हम फाइनैन्स मिनिस्टर से रिक्वैस्ट करेंगे कि वह कोई न कोई स्कीम फॉर्मूलेट करें कि किस तरह से इनके इंटरैस्ट, इंस्टॉलमैन्ट की रिकवरी के बारे में सोचा जाए।

They will definitely think about these things because they know the problem. इसकी तरह नहीं कि लद्दाख एक डिस्ट्रिक्ट है, उसको पैसा क्यों दिया?  It is because they see only things in front of their eyes.

         

 

*श्री विक्रमभाई अर्जनभाई मादम (जामनगर)ःमाननीय वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए सामान्य बजट 2010-11 काफी सराहनीय है, परन्तु इसमें मेरे द्वारा सुझाए गए कुछ प्रस्ताव इस प्रकार हैं-

1.   गुजरात के पर्यटन स्थलों को आपस में जोड़ने एवं वहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नई योजनाएं लाई जाएं और इसके लिए बजट में अधिक धनराशि आवंटित की जाए।

2.   गुजरात में सभी पर्यटन एवं धार्मिक स्थलों को राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ा जाए और दुहरे राजमार्ग को फोर-लेन में परिवर्तित किया जाए।

3.   अंतर्राष्ट्रीय समुद्र तट की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई जाए एंव सुरक्षा व्यवस्था के लिए अधिक धनराशि आवंटित की जाए।

4.   ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए एमपीलैड की निधि को बढ़ाया जाए जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में विकास का कार्य और बेहतर हो सके।

5.   पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिए नई-नई योजनाएं लाई जाएं।

6.   बिजली की कमी को दूर करने के लिए सोलर ऊर्जा और इसी प्रकार की अन्य योजनाओं को बढ़ावा देने हेतु ब्याज मुक्त ऋण दिया जाए।

7.   गरीबी की रेखा से नीचे रह रहे परिवारों के लिए घरों की व्यवस्था की जाए।

8.   रसोई गैस की सप्लाई कम होने की वजह से इसकी कालाबाजारी हो रही है।  इसे रोका जाए।

9.     ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी प्राथमिक विद्यालय में बच्चे खुले स्थानों में पढ़ते हैं।  उनके विद्यालय-भवन हेतु धन आवंटित किया जाए।

 

 

डॉ. तरुण मंडल (जयनगर): चेयरमैन साहब, हमारे वित्त मंत्री ने इस बजट को जनता का बजट कहा है लेकिन मैं इस बजट को आम जनता का बजट नहीं कह सकता। यह आम जनता को खाना खिलाने वाला बजट नहीं है, यह आम जनता को खिलौने देने वाला बजट है। बजट के बाद खाने की चीजें महंगी हो गईं और खिलौने सस्ते हो गये।

This Budget is totally anti-people and it will result in increased inflation. The Budget has given concessions to the big business houses and monopoly capitalists of our country. This time a lot of people expected that this Budget at least will attempt to put a rein on the price line of essential commodities. But it has frustrated the people. On the contrary, it has announced certain measures which will result in further hiking the price line of these commodities.

          The hon. Finance Minister has announced that the Direct Taxes have been reduced. But the expectation of the people in the lower and middle income groups  that they will get some benefit out of that will vanish instantly whenever they visit the market. This will give, if any, benefit only to the richer sections of society, the capitalists and the corporate houses. Indirect Taxes also have been increased in many ways and that also will squarely put a burden on already burdened common people of our country.

          Ours is a Welfare State but the allocation in education sector, in health sector are very meagre. On the contrary allocation in a non-productive sector, like the military, the Budgetary allocation is to the tune of Rs. 1,47,344 crore, almost equal to our non-tax revenue and 13 per cent of our total Budget. A heinous attempt, I should say, has been made particularly by increasing the Customs Duty, the Excise Duty and taxes on petroleum products which will result in sharp increase of essential commodities, particularly of the food grains. De-regulation of and sustained petroleum products on the lines of the Parikh Committee recommendations will further deteriorate the situation in the country. Certain other anti-people policies include withdrawal of subsidy from the fertilizer sector, participation of private capital, particularly for storing of foodgrains,  increasing the number of Special Economic Zones, disinvestment of our public sector undertakings etc.  These measures will further squeeze the pockets of our common people. There has been no mention about unemployment and joblessness in this Budget. This Budget also does not particularly talk about the conditions of the vast masses of landless people. The policies pursued by the Government have practically resulted in indebtedness of the small farmers. The Government has not properly increased the remunerative prices of the produces of the farmers.

          I would like to quote a sentence of the hon. Finance Minister. He said:

 

“The focus of economic activity has shifted towards the non Governmental actors bringing into sharp focus the role of Government as an enabler and Government will now create an enabling ethos so that individual enterprise and creativity can flourish.”

 

          With these policies the UPA Government is serving only the interests of the capitalist class without any thought for the common and deprived people of our country.

         

श्री विष्णु पद राय (अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह):  सभापति महोदय, अंडमान और निकोबार का राजा केन्द्र सरकार है क्योंकि वहां कोई असैम्बली नहीं है, इसलिये केन्द्र को उसकी ओर ध्यान से देखना चाहिये।

अंडमान एंड निकोबार को चीन से खतरा है। डिग्लीपुर से 45 किलोमीटर पर छोटा और बड़ा कोको आईलैंड खड़े हैं।

ये दोनों द्वीप अभी चीन के कब्जे में हैं। ग्रेट कोको आइसलैंड में गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक एयर फील्ड बन गया है, रनवे, जेट्टी, रडार स्टेशन आदि इंफ्रास्ट्रक्चर बन चुका है। यह चाइना ने बनाया है। लिटिल कोको आइसलैंड में दो हैलीपैड, बीचिंग साइट, बैरक आदि बन चुका है। हमारी दूरी वहां से केवल 45 किलोमीटर है। हमारे द्वीपसमूह में 572 आइसलैंड्स हैं, 36 आइसलैंड्स में आबादी है और बाकी आइसलैंड्स खाली पड़े हैं। जिसमें थाइलैंड, मलेशिया, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, श्रीलंका के लोग घुसपैठ करके महीना भर जंगल में पड़े रहते हैं। इसलिए हमारी और पार्टी की तरफ से यह मांग है कि अंडमान-निकोबार को बचाने के लिए, जो चाइना ने इंडिया बार्डर में रोड बनाया है, उसी तरह अंडमान में जहां से घुसपैठ होती है, उसी द्वीपसमूह के बार्डर में एक रास्ता बनाया जाए, खासकर उत्तर अंडमान के डिगलीपुर में। जहां चाइना का खतरा है, बांग्लादेश का है, थाइलैंड का है, मलेशिया का है, वहां रोड बनायी जाए। कोस्टल सिक्युरिटी के नाम पर गृह मंत्रालय के पास चार हजार पुलिस की भर्ती के लिए फाइल पड़ी हैं, ये पोस्ट तुरन्त भरी जाएं। यह हमारी पहली मांग है।

          महोदय, हमारी दूसरी मांग सूनामी के ऊपर है। आप गोवा से आये हैं, आप खुद जानते हैं कि मछुआरे भाइयों की डूंगी सूनामी में तबाह हो गयी हैं। 686 मछुआरे भाईयों की डूंगी खत्म हो चुकी हैं। सरकार ने उन्हें लोन दिया, लेकिन डूंगी फ्री नहीं दीं। डूंगी दिया साथ में लोन दिया, लोन के नाम पर उनके ऊपर दो करोड़ 35 लाख का कर्ज आ गया। सूनामी के नाम पर पुर्नवास, रीहैब्लिटेशन के नाते निकोबार में मछुआरे भाईयों को फ्री डूंगी दी गईं और अंडमान में डूंगी के नाम पर मछुआरों को लोन दिया गया। इसलिए मैं मांग करूंगा कि 686 मछुआरे भाइयों को जो डूंगी का लोन दिया गया है, उसे माफ किया जाए।

          महोदय, अंडमान निकोबर द्वीपसमूह की बड़ी समस्या वन संरक्षण है। अंडमान निकोबार जो जंगल है, वह दुनिया के लिए सम्पदा है। 90 परसेंट अंडमान में जंगल है तो दिल्ली में बारिश होती है। अंडमान खतरे में है। नौ नेशनल पार्क, 96 वाइल्ड लाइफ सेंचुरीज, एक बाइस्फेअर रिजर्व अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में है, लेकिन वहां पर नाम भर के लिए फॉरेस्ट के आदमी हैं। वहां नाम के लिए फॉरेस्ट प्रोटेक्शन है, न हथियार हैं, न डूंगी है, न बोट है, न ऑर्म्स है। इस तरह से अंडमान फॉरेस्ट बीट भी है, इस तरह से एनआरए भी है। मैं मांग करूंगा कि अंडमान निकोबार नेशनल पार्क बाइस्फेयर जोन, नेशनल पार्क सेंचुरीज या फॉरेस्ट को प्रोटेक्शन करने के लिए पर्याप्त मात्रा में मैन पावर भर्ती की जाए। पर्याप्त मैन पावर, डूंगी, वीएचएफ सैट, आर्म्स आदि वन संरक्षण करने के लिए देंगे तो अंडमान निकोबार का फॉरेस्ट बचेगा, यह हमारी तीसरी मांग है।

          महोदय, मैं एक और मांग अंडमान निकोबार द्वीपसमूह को दिल्ली के साथ कम्पेयर करके करूंगा। दिल्ली में पुलिस डिपार्टमेंट के जो कर्मचारी काम करते हैं, उन्हें वर्ष 1979 से उन्हें 12 महीने काम और एक माह की तनख्वाह फ्री दी जाती है। उन्हें ओवर टाइम, कंप्नसेटरी ऑफ, वीकली ऑफ नहीं है, इस कारण से दिल्ली पुलिस को एक महीने की तनख्वाह अधिक मिलती है।  बिल्कुल ऐसा ही अंडमान पुलिस को दिया गया, लेकिन वन विभाग के कर्मचारियों, रेवेन्यू विभाग के कर्मचारियों को यह नहीं दिया गया। उन्हें छुट्टी भी नहीं, हॉलीडे भी नहीं, कोई वीकली ऑफ नहीं, इसलिए मैं मांग करूंगा कि दिल्ली में पुलिस को कंपंसेट्री पे, एक माह का बेसिक पे और साथ में डी.ए. और ए.डी.ए. मिलते हैं, वह अंडमान निकोबार के रेवेन्यू और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के कर्मचारियों को दिया जाए। यह हमारी मांग है।

          महोदय, हमारी एक और मांग है। दिल्ली पुलिस में काम करने वाले पुलिस कर्मचारी को मासिक राशन एलाउंस 1,144 रूपए मिलता है, वह अंडमान निकोबार में भी दिया जाए, यह भी हमारी मांग है।

          मैं वित्त मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करूंगा कि उन्होंने बंगाल में अच्छा काम किया है। नदी के प्रवाह से जमीन कट रही है, नाले के प्रवाह से भी जमीन कट रही है, उसे प्रोटेक्ट करने के लिए वॉल बनाएंगे, इसके लिए केंद्र सरकार अलग से फंड दे रही है। अंडमान निकोबार में हाइएस्ट रेन फॉल है, इस कारण अंडमान निकोबार में हमारी जमीन कट रही है।  उस जमीन पर भी केंद्र सरकार की तरफ से रूपया दिया जाए और रिटेनिंग वॉल बनाया जाए। इसी तरह से अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के स्टूडेन्टस को बाईसाईकिल दी जाए। निकोबार में स्टूडेंट्स को आठवीं कक्षा से बाईसाइकिल दी गयी है। कर्नाटक, तमिलनाडु, पांडिचेरी, झारखंड, लक्षद्वीप में बच्चों को फ्री बाइसिकल मिलीं, अंडमान के बच्चों को क्यों फ्री नहीं मिली? किशोर मन पर जनजाति और गैर जनजाति की भावना उत्पन्न न करें। अंडमान जिले के बच्चों को भी फ्री साइकिल दी जाए।

          महोदय, मैं ऐसी ही मांग यूनिफॉर्म, फ्री टेक्स्ट बुक और मिड-डे-मील के बारे में करूंगा। लक्षद्वीप में कक्षा 12 तक मिड डे मील दिया जाता है, उसे अंडमान में आठवीं कक्षा से बढ़ाकर बारहवीं कक्षा में भी शुरू करें। दिल्ली गवर्नमेंट जो फ्री यूनिफॉर्म और टेक्स्ट बुक देती है, उसे अंडमान निकोबार में भी लागू करें। अंत में मैं एक मांग करूंगा, खासकर स्कूल होस्टल के स्टाइपेंड के बारे में, स्कूल होस्टलर्स को स्टाइपेंड 300 रूपए मासिक से बढ़ाकर 1,000 रूपए किया जाए। सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना, रात का खाना रोजाना 10 रूपए में क्या संभव है? उसी तरह कालेज स्टूडेंट्स महीने में 650 मिलता है, इसे बढ़ाकर कम से कम 1,500 रूपए किया जाए।  

 

 

 डॉ. किरोड़ी लाल मीणा (दौसा):माननीय सभापति जी, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। माननीय वित्त मंत्री जी ने जो बजट पेश किया है, उसमें तीन चुनौतियाँ मानी हैं। 9 प्रतिशत के उच्च घरेलू उत्पाद की वृद्धि के रास्ते पर लौटना और फिर दोहरे अंक की वृद्धि अवरोध को पार करना। दूसरी चुनौती मानी है विकास को अधिक समावेशी बनाने में हालिया उपलब्धियों के समेकन हेतु आर्थिक वृद्धि को सही ढंग से काम में लाना। तीसरी चुनौती जो वित्त मंत्री जी ने मानी है, वह प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर सरकारी प्रणालियों, संरचनाओं और संस्थाओं की कमज़ोरी से संबंधित है। यह चुनौती तो सरकार ने मानी है लेकिन जो इतने दिनों से महंगाई की आग देश में धधक रही है और उसमें रोज़ महंगाई की चर्चा संसद में होती है, उसको सरकार ने चुनौती नहीं माना, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इसलिए मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहूँगा कि आपका बजट पेश होने के बाद जो स्थितियाँ बनी हैं, इस समय अर्थव्यवस्था के सामने चार बड़ी समस्याएँ हैं – महंगाई, बढ़ती बेरोज़गारी, सरकार का खाली होता खजाना और खेती में बढ़ता हुआ घाटा। खेती में बढ़ते हुए घाटे के लिए सरकार ने बजट में कोई उपाय नहीं सुझाए। बल्कि करीब 49.5 करोड़ की सबसिडी की कटौती कर डाली। सरकार द्वारा सिंचाई का जो क्षेत्र बढ़ाया जाना चाहिए था, जैसे गुजरात में किया गया है, उस ढंग का बजट में कोई परिलक्षण नहीं होता। इसलिए मैं वित्त मंत्री जी से मांग करूँगा कि इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर का जो प्रोजैक्ट चला हुआ है जिसकी बहुत पहले से देश में मांग चल रही है, उसको गति दी जाए। अकेले राजस्थान में बहुत लंबा एरिया रेगिस्तान का है, बेउपजाऊ भूमि बहुत पड़ी है, लेकिन बिना सिंचाई के कृषि का प्रोडक्शन नहीं हो रहा है। इसलिए मैं वित्त मंत्री जी से निवेदन करूँगा कि सिंचाई की सुविधाएँ बढ़ाई जाएँ, सिंचाई के प्रोजैक्ट्स को ज्यादा से ज्यादा पैसा दिया जाए, इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर किया जाए और एआईडीपी में धनराशि बढ़ाई जाए जिसस किसानों की भूमि सिंचित हो सके। वित्त मंत्री जी ने करीब 400 करोड़ रुपये हरित क्रंति के लिए बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा राज्यों को दिये हैं। बहुत अच्छा है, लेकिन राजस्थान को क्यों छोड़ा? राजस्थान की हालत तो और भी ज्यादा खराब है। जब हम इस स्टेट को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि निकट भविष्य में चुनाव आ रहे हैं, इसलिए दिल्ली की सरकार ने वोट लेने के लिए, राजनीतिक फायदा उठाने के लिए यहाँ तो मेहरबानी कर डाली, लेकिन  जिस राजस्थान में कांग्रेस को चुनाव में 20 सीट देकर भेजा है, उस राजस्थान की दिल्ली की सरकार को चिन्ता नहीं है। इसलिए मैं वित्त मंत्री जी से कहना चाहूँगा कि जैसे हरित क्रंति के लिए आपने राज्यों को पैसा दिया है, वैसे ही राजस्थान को भी पैसा देने की कृपा करें। स्थिति यह है कि जब तक खेती में कम से कम चार-पाँच परसेंट की विकास दर हम प्राप्त नहीं करेंगे, तब तक न तो बाकी क्षेत्रों में विकास होगा, न ही ग्रोथ छः परसेंट से ज्यादा जा पाएगी।

          माननीय सभापति महोदय, बुंदेलखंड को 1200 करोड़ रुपये दिये गये हैं। कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन महज इसलिए दे दिये कि वहाँ दिक्कत है। 21 बार राजस्थान में अकाल पड़ा। …( व्यवधान) आप बाड़मेर के सदस्य बैठे हैं। …( व्यवधान) हाँ, ज्यादा बार अकाल पडा, 27 बार अकाल पड़ा। …( व्यवधान) ज्यादा पड़ गए तो आप बैठे क्यों हैं?

सभापति महोदय :  आप कृपया चेयर को एड्रैस करें।

डॉ. किरोड़ी लाल मीणा : अगर आपने बुंदेलखंड को पैसा दिया है, तो मेरी मांग रहेगी कि राजस्थान को भी बुंदेलखंड के समान सहायता उपलब्ध कराई जाए।

          महोदय, सरकार कहती है कि हम एससी और एसटी के शुभचिंतक हैं। मैं आपको आंकड़ा बताना चाहता हूं, वर्ष 2010-11 के बजट का कुल सालाना योजना व्यय 2,84,284 करोड़ रूपये है। स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान के तहत दलितों को मिलने चाहिए 46 हजार 54 करोड़ रूपये, लेकिन सरकार ने 20 लाख 624 करोड़ रूपये दिए हैं। इसी ढंग से ट्राइबल सब-प्लान के तहत आदिवासियों को 23511.29 करोड़ रूपये मिलने चाहिए थे, लेकिन 11754 करोड़ रूपये ही मिले हैं। इसलिए मैं माननीय मंत्री जी का ध्यान आकर्­िात करना चाहूंगा कि एससी, एसटी और जहां नक्सलवादी गतिविधियां ज्यादा बढ़ रही हैं, वहां का बजट जितना पिछली बार था, उससे ज्यादा बढ़ाकर देना चाहिए, जिससे शिक्षा का विकास हो सके, वे आगे बढ़ सकें। आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद दिया।

 

*श्री कमल किशोर कमांडो (बहराइच)ःअध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे सामान्य बजट पर बोलने का मौका दिया। 

         मैं, कमांडो कमल किशोर, बहराइच, उत्तर प्रदेश से लोक सभा संसद सदस्य हूं।  यह इलाका अत्यंत पिछड़ा एवं गरीब हैं।  यहां पर बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति तथा जनजाति (थारू) निवास करते हैं तथा इस जिले में पचास प्रतिशत से अधिक आबादी अल्पसंख्यकों की है जो काफी गरीब एवं अशिक्षित हैं।  इस जिले का लगभग चालीस प्रतिशत भूभाग, वन क्षेत्र है जहां बहुत बड़ी संख्या में वन ग्राम में बनटानिया निवास करते हैं जिन्हें आज भी शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं प्राप्त हैं।  यहां तक की उन्हें वोट देने का भी अधिकार नहीं दिया है। बाढ़ के कारण प्रतिवर्ष होने वाले नुकसान से बड़ी जातियों तथा पिछड़ी जातियों के लोग भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे हैं।  अतः मेरा माननीय वित्त मंत्री से निवेदन है कि मेरे संसदीय क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया जाए।  साथ ही उत्तर प्रदेश तथा भारत के गरीबों के उत्थान के लिए सरकार जो व्यवस्था दे रही है उसे गरीबों तक पहुंचाने के लिए सही प्रावधान किए जाएं ताकि सरकार की योजनाओं का लाभ जनता को मिल सके।  निम्न बातों पर ध्यान देकर इसके संबंध में भी उचित प्रावधान किए जाएं-

       पिछले वित्तीय वर्ष में किसानों का कर्ज सरकार द्वारा माफ किया गया है।  उसमें उन किसानों का कर्ज नहीं माफ हुआ है जिन्होंने एक या दो किस्त कर्ज जमा किया है।  उन किसानों का भी कर्ज माफ करने का प्रावधान बजट में किया जाए।

       मनरेगा में मजदूरी न्यूनतम 150/- रुपए प्रतिदिन कराया जाए तथा वर्ष में 150 दिन कार्य उपलब्ध कराया जाए तथा मनरेगा में जो शकियतें आ रही हैं उन शिकायतों के लिए दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों के प्रति कड़े दंड के प्रावधान किए जाएं तथा अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

       जनपद, बहराइच (उत्तर प्रदेश) जो भारत-नेपाल सीमा पर है, नेपाल से आने वाले पानी से प्रतिवर्ष यह जिला भयंकर तबाही झेलता है।  बाढ़ से जनता को बचाने तथा जल संरक्षण की कार्य योजना बनाई जाए।

       बार्डर का जिला होने के नाते बार्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि मूलभूत सुविधाओं के लिए जनपद बहराइच, उत्तर प्रदेश के लिए धन आवंटित किया जाए।

       बाढ़ के कारण बहराइच, उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष क्षेत्र में संक्रमक रोग प्रदूषित पानी के कारण फैलता है।  पानी में आर्सेनिक की मात्रा बहुत है अतः जल शुद्धीकरण के लिए बजट में धन दिया जाए।

       बार्डर पर सुरक्षार्थ विद्युतीकरण की सख्त आवश्यकता है, अतः राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत जनपद बहराइच के इलाकों का विद्युतीकरण कराया जाए।  

       जनपद में पेयजल की दूषित होने के कारण अनेक प्रकार की बीमारियां फैलती हैं, अतः कम से कम 1000 इंडिया मार्का-2 हैंड पम्प लगाने के धन स्वीकार किया जाए।

       गोन्डा से बहराइच तक 60 किलोमीटर रेल मार्ग के आमान परिवर्तन की स्वीकृति इस वित्तीय वर्ष में दी गई है।  इसके लिए मैं माननीय वित्त मंत्री जी एवं माननीया रेल मंत्री जी को आभार व्यक्त करता हूं तथा बहराइच से नानपारा-रुपईडीहा-सीतापुर रेलमार्ग के आमान परिवर्तन के लिए धन आवंटित किया जाए तथा बुढवल-बहराइच रेलमार्ग जो कि इस वित्तीय वर्ष में सर्वेक्षण हेतु स्वीकृत किया गया है।  इस रेलमार्ग के निर्माण हेतु धन की स्वीकृति दी जाए।

       बहराइच जनपद काफी गरीब है, यहां पर केन्द्रीय विद्यालय मेडिकल कालेज, इंजिनियरिंग कालेज व विश्वविद्यालय खोलने के लिए धन दिया जाए।

बहराइच जनपद में काफी मात्रा में सरपल्स भूमि है, इस भूमि को आरक्षित करके औद्योगिक क्षेत्र घोषित करके उद्योगों की स्थापना कराने का प्रावधान किया जाए।

 

 

 

 

*श्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी)ः  मैं बजट में दिए गए आंकड़ों की बौछार नहीं करना चाहता, मेरे योग्य साथी के द्वारा बड़े विस्तार से उसमें चर्चा कर चुके हैं।  देश एक ऐसी विकट स्थिति से गुजर रहा है, जहां दुनिया में मंदी का दौर है और भारत कठिनाईयों के बावजूद विकास के रास्ते पर दृढ़ता से चल रहा है।  बजट पढ़ने के बाद स्पष्ट धारणा बनेगी कि ये एक और विकास परक और निरन्तरता का बजट है।  पिछले वर्ष का ही नहीं इसे यू.पी.ए. 1 के सभी वर्षों के बजट से इसे जोड़ा जा सकता है।  इस देश में दो विचारधाराएं हैं, एक का प्रतिनिधित्व इंडिया शाईनिंग के प्रेरक लोग और दूसरी तरफ भारत निर्माण के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र में किसान, मजदूर, अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलितों का विकास सभी वर्ग और धर्म के लोगों का विकास से जोड़कर सम्पूर्ण राष्ट्र के उत्थान का उसे माध्यम बनाया है।  यू.पी.ए. 1 के द्वारा भारत निर्माण योजना चलायी गयी और उनके सभी फ्लेगशिप प्रोग्रामों को अधिक से अधिक बजट उपलब्ध करवाया गया, जिसके क्रंतिकारी परिणाम सामने आये हैं।  किसानों को जहां यू.पी.ए. 1 के सहयोग द्वारा 72000 करोड़ रुपए ऋण माफ कर दिए वहीं कृषि ऋणी की ब्याज दर 7 प्रतिशत से घटाकर इस वर्ष 5 प्रतिशत कर दी गयी और वित्त मंत्री जी ने स्पष्ट संकेत दिये हैं कि अगले वर्ष ब्याज की धनराशि को 4 प्रतिशत कर दिया जाएगा।  जहां पिछले वर्ष किसानों को फसली ऋण 3,25,000 करोड़ रुपए रखा गया था, वहीं इस वर्ष इसे बढ़ाकर 3,75,000 करोड़ रुपए कर दिया गया है। कृषि उपकरण के कर कम करके उसको सस्ता किया गया है।  किसानों को फसलों के लाभकारी मूल्य उपलब्ध करवाने के लिए समर्थन मूल्यों में ऐतिहासिक वृद्धि की गयी है।  देश में तथा ग्रामीण क्षेत्र में अवस्थापना सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए 1,73,000 करोड़ से ज्यादा धनराशि का आवंटन किया गया है और सामाजिक अवस्थापना के लिए 1,37,000 करोड़ से अधिक की धनराशि उपलब्ध करवायी गयी र्है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला कल्याण, दलित उत्थान, अल्पसंख्यक कल्याण की मदों में ऐतिहासिक वृद्धि कर सरकार ने अपने दृष्टिकोण को अत्यंत स्पष्ट कर दिया है कि उपेक्षित वर्ग को हर प्रकार से समान अवसर उपलब्ध करवाते हुए देश के विकास में भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।  महिला आरक्षण बिल राज्य सभा में यू.पी.ए. सरकार की दृढ़ इच्छाश्क्ति के कारण ही पास हो सका है और मुझे उम्मीद है इसे शीघ्रातिशीघ्र लोक सभा में पारित कर राज्यों की सहमति के लिए भेजा जाए।  देश की 50 प्रतिशत जनसंख्या के लिए मात्र 33 प्रतिशत ही सीटों का आरक्षण किया गया है, जो विश्व में अपने में केवल अकेला उदाहरण है, जहां संविधान ने संशोधन कर भागीदारी सुनिश्चित करने का अधिकार दिया गया है।

          माननीय वित्त मंत्री जी ने गत वर्ष 10 लाख करोड़ से अधिक का बजट प्रस्तुत किया था और इस वर्ष 11 लाख करोड़ से अधिक का बजट पेश किया गया है, जो गत वर्ष की तुलना में 15औ अधिक है।  यह भी उल्लेखनीय है कि इस बजट में प्रशासनिक खर्चों में कटौती करके नॉन-प्लान खर्चों को गत वर्ष के 70 प्रतिशत से घटाकर 66 प्रतिशत रखा गया है।  प्लान खर्चों में बढ़ोत्तरी की गई है।  गत वर्ष के संशोधित अनुमान रूपए 3 लाख 15 हजार 176 करोड़ के मुकाबले इस बजट में 3,73,092 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया।  गत वर्ष के 6.7 प्रतिशत राजकोषीय घाटा के मुकाबले इस वर्ष उसे घटाकर 5.5 प्रतिशत, जो अर्थव्यवस्था के अत्यंत शुभ संकेत है, अगले दो वर्षों में इसे 4 प्रतिशत पर लाने की उम्मीद भी इस बजट में की गयी है।  अन्य स्त्रोतों से उधार 4,14,041 करोड़ के मुकाबले इस वर्ष 3,81,408 करोड़ रुपए का ही प्रावधान रखा गया है, जो कुल बजट का भी 34 प्रतिशत के मुकाबले इस वर्ष केवल 29 प्रतिशत है।

          उपरोक्त से स्पष्ट है कि बजट विकास पर है जहां पर धनराशि की आवश्यकता थी, वहां पर धनराशि देने में कोई कंजूसी नहीं की गयी है।  किसान, ग्रामीण एवं शहरी दलित एवं गरीब अल्पसंख्यक तथा ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए अधिक से अधिक धनराशि देने के लिए अतिरिक्त कर लगाना अनिवार्य था, लेकिन उसे भी इतने सुन्दर ढंग से करों को लगाया गया है, जिससे कोई भी वर्ग विशेष रूप से आहत नहीं है।  मैं इस शानदार बजट प्रस्तुत करने के लिए माननीय वित्त मंत्री जी को बधायी देना चाहता हूं।

          केन्द्र सरकार के द्वारा प्रदेशों को हजारों करोड़ रुपए की धनराशि उपलब्ध करवायी जाती है लेकिन अनेकों बार शिकायत आती है कि उस पैसे का सदुपयोग नहीं किया जाता है। अतः मेरा सुझाव है कि राज्य सरकारों में जाकर कठोर एवं गहन समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि गरीब लोगों को सही ढंग से राहत पहुंच सके।

          केन्द्र सरकार की अधिकांश योजनाओं के लिए बी.पी.एल. सूची का आधार लिया जाता है, लेकिन वर्ष 2002 के बाद क्योंकि सूची का संशोधन नहीं हुआ, अतः इसमें अनेक विसंगतियां आ गयी है।  मेरा सुझाव है तत्काल एक महा के अन्दर बी.पी.एल. सूची के पुनर्निधारण कर लिया जाए और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले उन सभी लोगों को बी.पी.एल. सूची में रखा जाए, जिनके पास रहने के लिए पक्का मकान नहीं है। केवल इसी को आधार मानकर सूची तैयार होती है, तो वास्तव में गरीब लोगों को राहत मिल सके।

          बी.पी.एल. सूची के आधार पर जारी कार्ड धारकों को गेंहू, चावल, चीनी तथा मिट्टी का तेल सस्ते दर पर उपलब्ध होता है और सबसे गरीब असहाय लोगों के लिए बनी अन्त्योदय योजना के अंतर्गत उन्हें 2 रुपए किलो गेंहू व 3 रुपए किलो चावल उपलब्ध करवाया जाता है क्योंकि बाजार दर से इन वस्तुओं की दरें बहुत कम होती है।  कोटेदार द्वारा उसे बाजार में बेच दिया जाता है और गरीब उससे वंचित रह जाता है।  राज्य में सत्ताधारी दल के लोग प्रत्येक कोटेदार से प्रतिमाह अवैध रूप से धनराशि की वसूली करते है, जिससे बाध्य होकर उन्हें सामग्री खुले बाजार में बेचकर घाटा पूरा किया जाता है।  इस भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए।

          दलितों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए “स्पेशन कम्पोनेंट प्लान ” के नाम से राज्य सरकारों को योजना आयोग से एक मोटी धनराशि उपलब्ध करवायी जाती है। इस धनराशि को दलितों के लिए व्यय न करके सामान्य प्रकृति के कार्यों में इसे व्यय कर दिया जाता है। इसके लिए योजना आयोग से स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किये जाने चाहिए और उसे कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए।  इस धनराशि का उपयोग केवल दलित लाभार्थियों को सीधे लाभ पहुंचाने तथा उनकी आबादी में अवस्थापना सुविधाएं पहुंचने पर ही खर्च किया जाए।  इसका भारत सरकार की तरफ से माननीय मंत्री जी तथा अधिकारियों के द्वारा हर प्रदेश में जाकर कड़ी समीक्षा की जानी चाहिए।

          मैं आपके माध्यम से एक और महत्वपूर्ण बिन्दु की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा।  भारत सरकार के अंतर्गत लाखों की संख्या में विभिन्न मंत्रालयों के अधीन विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों, बैंकों में अनुसूचित जाति की बैकलॉग की रिक्तियां हैं।  यह दलितों का संविधान के माध्यम से दिया गया अधिकार है।  मेरा पुरजोर अनुरोध है कि बैकलॉग को भरने के लिए विशेष भर्ती अभियान चलाया जाना चाहिए।

          इसी मुद्दे से जुडे हुए मुद्दे पर सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं, जब विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं का निजीकरण किया जा रहा है, तो निजी क्षेत्र में भी अनुसूचित जाति का आरक्षण लागू किया जाए।  अधिकांश विकासशील देशों के द्वारा जहां मुख्यतः निजी क्षेत्र ही है, वहां पर वंचित वर्गों को हर निजी क्षेत्र में आरक्षण की सुविधा प्रदान की गयी है।  मुझे पूरी उम्मीद है कि केन्द्र सरकार इसमें शीघ्र कार्यावाही सुनिश्चित करेगी।

          मेरे लोक सभा क्षेत्र बाराबंकी में घाघरा के किनारे, सूरतगंज, रामनगर व सिरोली गौसरपुर के गांव हर वर्ष बाढ़ की चपेट में आते हैं और लाखों लोग उससे प्रभावित होते हैं।  मेरे द्वारा माननीय जल संसाधन मंत्री जी से अनुरोध करने से राज्य सरकार को निर्देश दिये गये कि तत्काल क्षेत्र का सर्वेक्षण करवाकर गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग, पटना से रिपोर्ट लेकर केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजे।  मैं इसके लिए आदरणीय जल संसाधन मंत्री जी का आभार व्यक्त करता हूं और उनसे अनुरोध करता हूं कि वे कृपया इस मामले में मॉनिटरिंग करते हुए शीघ्रातिशीघ्र बांध निर्माण की कार्यवाही सम्पन्न करावें।

          बाराबंकी जनपद में विशेषकर बाढ़ क्षेत्र तथा अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों के लिए शिक्षा की विशेष व्यवस्था की जाए और वहां इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज खोले जाए।  मैं आभारी हूं कि बाराबंकी जनपद में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय के द्वारा बिल्हेरा, जैतपुर, अहमदपुर, सहावपुर में इंटर कॉलेज खोलने का निर्णय लिया गया है।  मेरा अनुरोध है कि बड्डुपूर, किन्तुर, सुबेहा, हसनपुर, डांडा, लालपुर करौटा, गणेशपुर, रामनगर में तत्काल इंटर कॉलेज खोलने की व्यवस्था की जाए।

          बाराबंकी जनपद में विश्व विख्यात देवा शरीफ की दरगाह है, जहां पर करोड़ों लोग हाजी वारिश अली शाह को अकिदत पेश करने के लिए आते है, लेकिन इस क्षेत्र को विशेष सुविधा केन्द्र सरकार से नहीं मिली है।  इसे पर्यटन क्षेत्र घोषित किया जाए तथा बाराबंकी में बेवा मार्ग पर दो रेलवे फाटक मौजूद है, जहां घंटों लोगों को इंतजार करना पड़ता है।  रेलवे ओवरब्रिज की स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है, केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि इसे शीघ्र पूरा करवाया जाए।

          मैं आपका ध्यान एक महत्वपूर्ण बिन्दु की तरफ आकर्षित करना चाहता हूं।  सीतापुर जनपद में नेमीसारन तीर्थस्थल है जहां पर हिन्दुस्तान के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं और यह मान्यता है कि पृथ्वी का मध्य बिन्दु यही पवित्र स्थल है।  बाराबंकी से नेमीसारन जाने का कोई सीधा रास्ता नहीं है।  बहुत से लोग अयोध्या, देवा शरीफ और नेमीसारन एक साथ यात्रा करना चाहते है, लेकिन रेल लाईन से ये स्थान आपस में जुड़े हुए नहीं है।  मेरा सुझाव है कि बाराबंकी से देवा होते हुए फतहपुर रेलवे स्टेशन तक 25 कि.मी. लम्बी नई रेलवे लाईन का निर्माण करा दिया जाए तो अयोध्या, देवा शरीफ और फतहपुर होते हुए नेमीसारन सीधे रेल लाईन से जुड जायेंगे और करोड़ों लोगों को सुगमता से तीनों स्थानों के दर्शन करने का लाभ होगा।  पूर्व में भी यह मांग रखी गयी है लेकिन यहां के जनप्रतिनिधियों के द्वारा इसे आगे बढ़ाने का प्रयास न करने के कारण प्रस्ताव फाईलों में बन्द होकर रह गए।  मेरा आपसे पुरजोर आग्रह है कि इस रेल लाईन निर्माण की घोषणा इसी वर्ष की जाए।

          मैं आपके समक्ष एक अत्यंत दुखद घटना का उल्लेख करना चाहूंगा।  25 जनवरी, 2009 को रायबरेली जनपद उत्तर प्रदेश ऊंचाहार रेलवे फाटक पर एक ट्रेक्टर ट्रोली से रेल दुर्घटना घटित हुई, जिसमें 12 व्यक्तियों की मौत हुई, जो सभी मेरे लोक सभा क्षेत्र बाराबंकी के निवासी थे।  दिनांक 27 जनवरी, 2009 को लालगंज रेलवे कोच फैक्ट्री के शिलान्यास के अवसर पर तत्कालीन रेल मंत्री जी के अतिरिक्त आदरणीय श्रीमती सोनिया गांधी एवं श्री राहलू गांधी इस आयोजन में उपस्थित थे और इनकी उपस्थिति में तत्कालीन रेल मंत्री श्री लालू प्रसाद यादव जी ने प्रत्येक मृत्तक परिवार को 1-1 लाख रुपए का चैक दिया गया तथा यह भी घोषणा की गयी कि प्रत्येक परिवार से 1-1 व्यक्ति को चतुर्थ श्रेणी में नौकरी दी जाएगी। स्पष्ट घोषणा के बावजूद आजतक किसी भी परिवार को नौकरी उपलब्ध नहीं करवायी गयी है।  मैंने सदन के माध्यम से यह प्रश्न पूछा था जिसके जवाब में रेल मंत्री जी ने यह तो स्वीकार किया कि नौकरी देने की घोषणा की गयी थी, लेकिन तकनीकी बहाना बनाकर नौकरी देने से मना कर दिया गया। मेरा आपसे विशेष अनुरोध है कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इन संतृप्त परिवार के मृत्तक आश्रित को चतुर्थ श्रेणी में नौकरी देने की घोषणा करें।  केन्द्र सरकार की सामुहिक जिम्मेदारी है।  सरकार के एक मंत्री द्वारा कोई घोषणा की जाती है तो उसे पूरा करना सरकार का दायित्व है।  मेरा अनुरोध है कि इस मामले में शीघ्रता से दुखी परिवारों को नौकरी देकर उनके आंसू पोछने का काम करेंगे।

          अन्त में, मैं आपका आभारी हूं कि मुझे बजट पर अपने विचार रखने का अवसर प्रदान किया गया।  यह एक क्रंतिकारी बजट है देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी और हम शीघ्र ही मंदी से बाहर निकल कर 9 प्रतिशत विकास दर प्राप्त कर सकेंगे, जिसके द्वारा ग्रामीण किसान, मजदूर, पिछड़े, अल्पसंख्यक तथा महिलाओं को सम्पूर्ण अवसर प्राप्त होंगे, जिससे देश की प्रगति और उत्थान में उनकी पूरी भागीदारी होगी।  इसी के साथ मैं बजट का पूर्ण समर्थन करता हूं।

 

*SHRI P.T. THOMAS (IDUKKI): I would like to appreciate Hon’ble Finance Minister for presenting such a promising budget. I thank him for the consistent efforts to ensure that banks meet the target set for agricultural credit flow. In this finance year the target has been enhanced to Rs.3,75,000 crores from Rs.3,25,000 crores.

          Debt driven farmers of our country are highly relieved as the budget proposes to extend by six months the repayment of the loan amount.

          I would like to invite the attention to certain specific issues in this regard. Most importantly, the thrust should be given to the agricultural sector in our country where large population depends upon farming for their livelihood. We hope that four pronged strategy suggested by the Finance Minister do yield short term and long term results.

          As our economy is facing severe inconsistencies what we need is inclusive growth. Agricultural sector can only spur integral and inclusive growth. The income generated form the agricultural sector may help out rural household to invest in education, health and other primary needs. In order to support the rural economy, the interest rate of agricultural loan should be substantially reduced.

          So is the case with education loans and loans extended to the sef help groups across the country. If the Government is willing to take a risk by reducing the interest rate from what it is now, more and more people and households will benefit from education loan and loans extend to self help groups. Madam I am requesting to reduce the education loan as well as self help groups loan interest form 10+13% in to 4%.

          Moreover, the capital extended to the Regional Rural Banks to be doubled to support increased lending to the rural economy. The unemployed youth of our

country will be the beneficiaries of this kind of empowerment through Regional Rural Banks. This will gear target of small scale industries and initiatives for self help groups.

          I may suggest a review of minimum supporting prize of essential food commodities and cash crops by the central Government. This is to enable our farmers to compete with and survive in the global prize market. Madam, the farmers are eagerly waiting for price stabilization fund for their agriculture as well as cash crops.

          I am very much disappointed when our Hon’ble former Finance Minister Yashwant Sinha’s speech. He asked what the ordinary people will do with growth rate? No Madam, such a personality like Yeshwant Sinahiji never say like that? He is well aware of the importance of growth rate. Is it so? Then why he is approaching in such a low profile? It is too much for the Former Finance Minister has never accessed the budget in such a manner.

          Kerala is famous for its handloom industry and other handicraft items. Today, almost all such cottage industries in very high financial crises. I am requesting to the Hon’ble Finance Minister to give some financial package for the revival of such units.

I was requesting to give much more attention to them. Whenever they are coming back, all support is to be given to the NRIs. In Kerala the NRIs are the backbone of our economy. I demand, more projects and financial support for the NRIs’ rehabilitation.

          In the case of NRI’s a realistic approach is needed. They are supporting in a big way the financial progress of our country. Government of Kerala is lapsing most of the central schemes that are farmer friendly. Either due to their ideological obscurantism or due to their absent mindedness in the office, the C.P.I(M) led Kerala Government turn its face away from central projects. Their biased attitude is detrimental to the progress of the State. They are changing the name of the centrally sponsored programme and again introducing the Central Project with their own name.

Central Government should take serious note of such anti-developmental stand. Measures should be taken for the compulsory implementation of all farmers friendly projects in each state despite the political and ideological differences with the centre.

         

EDUCATION

I am also welcoming the proposal of 15% higher allocations for school and higher education in 2010-11. In this budget Hon. Finance Minister allocated Rs.400 crores for setting up new IITs, 33% higher than the Rs. 300 crores in 2009-10. The plan outlay for school education in 2010-11 is Rs. 31,036 crore, up 36.5 per cent from Rs.22,729 crore in 2009-10. Madam considering higher education where Rs. 10,996 crore central plans was allocted for 2010-11 up 38.2 per cent from Rs.7,952 crore in 2009-10.

The Right to Education Act will be implemented from April 1, 2010 and states will get Rs.3,675 crore for elementary education as recommended by the 13th Finance Commission. The RMSA(Rashtriya Madhyamik Shiksha Abhiyan) which aims to complete the implementation of this Govt’s universal education programme. All schemes are for the betterment of our nation.

National Literacy Mission as ” Saakshar Bharat” with a target of 70 million non literate adults including 60 millions women is yet another revolutionary step in the education scenario.

To encourage research across all sectors, Hon. Finance Minister enhanced the amount considerably from 125 per cent to 175 per cent.

 

 

In the case of scholarships I am requesting to increase the number much more will enable the poor villagers access the benefits.

The benefits of education loan is increased from Rs.4500 crores to 24,260 crore is a real success. Due to this thousands of poor students are not continuing their studies. It is a real help to the poor. Some bank managers are not willing to give loans to the needy students.

Whenever a student is approaching for loans they are not ready to give even application forms. Madam-strict action is needed against those bank officials who are denying education loans to the needy students. Madam-Government, already declared interest waiver scheme for education loans, but it is not yet reached to the poor. Bank Managers are compelling the loanees to repay the interest and also denying the second and third installments. Madam, immediate intervention is needed.

AGRICULTURE

 It isa notable thing that a substantial amount of money is earmarked for the credit availability for the rural farmers. Rs.3,75000 crore. Also the rate of interest for farmers who repay this shot term crop loans as per schedule will be 5 per cent. Madam, I would like to call your attention regarding small farmers, they are suffering a lot. The local money lenders and vendors are looting them. A timely intervention is needed in the case of small and medium farmers. Even though government declared debt waiver scheme – the real benefits have not reached a great extent  to the real farmers. Madam, in Kerala immediately before the debt waiver announcement , our state government declared two schemes i.e. one was Navaratnam Keraleem” and the second is “Sathasathemanam Keraleem” in which government insist the small farmers to reschedule their loans with out any remittance due to this methodology more than 50% of the real farmers who had rescheduled their loans are thrown out from the eligible category of the Central Government norms. Madam, even one day before the debt waiver scheme of Central Government thousands of farmers lost their change to come under the debt waver scheme. I am requesting to do some thing for the helpless affected farmers.

My request is to make an enquiry about the debt waiver beneficiaries and also the loans which are consider under the said scheme by the Bank officials.

Number of irregularities are there. A pacca enquiry is essential. Madam consider to wave the entire interest of the small farmers and also allow them to repay the original amount in six equal installments.

Some bank official even converted the agricultural loans into other loans like business loan without the knowledge of the borrowers. A pillar to post conqury will reveal all such irregularities.

Some prominent journalist like P. Sainath is sharply criticized  this budget according to Sainath this is not a farmers oriented but it is a corporate farmer oriented. I am also requesting this will not go in the hands of corporative to farmers, but to the real farmers.

NABARD is giving agriculture loan in the rate of 4% to State co-operative banks and they are giving to district banks with 6 or 7%. From it, they are giving at 8-9% to Primary banks and lastly the primary banks are giving to farmers with an interest more than 10%.

My humble submission is that why not Nabard can release the loans directly to the primary Banks? If they do like that small farmers will get always 5% interest loan.

Health

The main aim of NRHM is to provide accessible, affordable accountable effective and reliable primary health care facilities especially to the poor and vulnerable section of the population. It also aims at birding the gap in Rural Health care service through creation of cadre of accredited social Health. Activist (ASHA) and improved hospital care, decentralization of programme to district level to improve intra and inter-sectoral conveyance and effective utilizations of reasons. What is the condition of the ASHAs? The Kerals health Minister declared they will provide Rs.500 to ASHA workers but so far as it is not reached into the hands of Asha workers. The Kerala Health Ministers offer was only to induce the poor `Asha’ workers to join their trade unions. Madam, in Kerala CPM led Government is every time making such gimmicks.

I am requesting to conduct an enquiry into the utilization of NRHM fund is Kerala a number of purchase including computer and other items must be enquired. The huge expenses spent for rented of vehicle also be enquired.

MALNUTRITION

 

Ordinary Indians are badly malnourished and calorie intake has fallen over time. An expert group appointed by the Planning commission has proposed 1800 calories per day as the norm of consumption by an adult for fixing the poverty line. Madam this norms is applicable only for light or sedimentary works. Madam how is a construction worker with heavy head loads or an agricultural worker driving buffaloes in the flooded paddy land going to do his work and lead a healthy life or survive long? Madam at least four alternative figures are available now in connection with poverty line? 28 per cent from the planning commission 50 per cent from the N.C. Saxena committee report 42 per cent from Tendulkar Committee report and 80 per cent or so from the national commission for enterprises in the unorganized sector ( NCEUS) and 27 per cent according to national sample survey. Our entire planning is based on this poverty line? If it is not biased in real picture what will  be the fate of our planning. Therefore I am requesting the Govt, to come out with correct figures. LIVE STOCKS AND DAIRY FARMERS

Live stock rearing is a key livelihood and risk mitigation strategy for small and marginal farmers of India. Madam 32 per cent of the total value of agriculture and allied activities. Madam most often we are seeing livestock as providers of essential food products. It is a very important factor that livestock wealth is much more equitably distributed.

A global analysis of the livestock sectors by the UN Food and agriculture organization ( FAO) was contained in the recently realized state of food and agriculture and it highlighted three our arching message that merit discussion in the context of India.

We are very proud of our prestigious Aam Admi project like Mahatma Gandhi Grami Rozgar Yojana – in which minimum wages are fixed. This project can be linked with live stock rearing. Madam, if we implement Mahatama Gandhigram in Rozgar Yojana to live stock rearing.  The milk filed productions will doubled with in a short while. My humble request is that this may be included into the Mahatama Gandhi Gramin Rozgar Yojana too.     

The most important characteristic of the 2010-11budget is the upward growth of plan expenditure and downward non-plan expenditure. 2009-10 budget the non palns expenditure was 70% whereas in 2010-11 it is 66%.

The total Government expenditure during 2010-11 would be 11,08749 crore in which non-plan is Rs.6.68082 crore The total Central Plan out lay is Rs.524484 crore during 2010-11 as against 425598 crore in the year 2009-10.

In our Kerala the ruling party is baselessly making allegations against the 13th Finance Commission.

What is the real picture? The 13th Finance Commission devolution of funds for the state was the highest. It had proposed devolution of higher tax share and grant in-aid for the state of had recommended Rs.33,954.3 crore as the state’s share of tax and Rs.6371.5 crore as grant in-aid as against the 12th Finance Commission Rs.16,353.23 crore and Rs.3254 crore respectively. The total devolution of funds as per 13th Finance Commission’s recommendations was 40,325.23 crore which was 107.6 percent higher than the previous panels. The state share for local bodies, special award, calamity relief, roads and bridges, elementary educations, water resources management and forestry was appreciably higher than that of the previous year. 

It is the first time that our Govt, is giving such high priority for conservation of ecology. The clean energy cess of Rs.50 per tonne on coal produced in India. (2) National Clean Energy Fund for research in Energy Technologies. (3) Concessional excise duty of 4% on CSIR’s Solar rickshaw (4) Excise duty on LED lights cut from 8% to 4%. (5) Excise duty of 4% on electric vehicle components. (6) Rs.200 crore to Goa for its beaches and green cover and Rs.200 crore to Tirupur for zero liquid effluent discharge. The central budgetary allocation for the Ministry of Environment and Forests has risen by about 10 per cent from Rs.2,129 crore in 2009-10 to Rs.2351 crore in 2010-11. The pollution control has seen substantial increase in allocation. The allocation for control of river pollution programme has also gone up. I am welcoming this.

 

Dalit and Minority Welfare

The allocation of SC’s has increased from Rs.2500 to Rs.4,500 in the year 2010-11 and minority welfare Rs. 1740 to 2600 is also a most important welfare measure. I would like to congratulate the Central Government.

Women and Child Welfare Schemes

          The total allocations for this is Rs.11,070 crore for 2010-11. The funds for the Rajiv Gandhi Scheme for Empowerment of Adolescent girls  have gone up from Rs.99 crore last year to Rs.99 crore last year to Rs.900 core(2) The integrated child protection scheme has also seen a huge increase from Rs.35 crore to Rs.270 crore.

Considering the budget allocation for the women and child are basically benefited to the women empowerment. I am concluding my speech with these words.        

 

SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM): Mr. Chairman, Sir thank you very much for giving me this opportunity.

          I rise to support this Budget.  My Party, the Sikkim Democratic Front, is a member of the UPA. I express to this House the greetings of the people of Sikkim.  

          The Budget has the potential of being inflationary. However, in view of the partial `roll back’ of the stimulus it may be argued that this is a pain we will have to live with.  I support this move.  Moreover, the hon. Prime Minister, Dr. Manmohan Singh has assured that the economy has the capability of absorbing this pressure and this is good news.  We all believe him.  The economy has already shown signs of good recovery.  I pray for a good monsoon along with all of you. I am sure if both these are true in 2010, then our nation can be on the path to double digit growth in GDP terms.

          We certainly could have done more for the education sector. I am keenly aware of the lakhs of people who do not have access to schools especially in the North Eastern Region.  I am, therefore, finding it a little puzzling as to why more allocation has not been followed up to the passing of the Right to Free and Compulsory Education Bill during an earlier sitting.  The Act is being notified in April, but I think we all will find it hard to get the necessary resources. I, therefore, request the hon. Minister of Finance to raise the level, right now at 3.32 per cent of GDP to the expected six per cent that we have all committed earlier.

          Similarly, the allocation to the health sector which is at about 1.06 per cent of GDP should also be increased so that the health sector gets more allocation.  However, I am aware that there are more pressing concerns and that all that we can do is flag the issues that we all think is important.

          I applaud loudly the spirit and backing given to the National Skill Development Corporation.  This is a unique opportunity for all citizens to get involved in the national mission of giving employability skills to the so many out of school children.  These children and grown-ups who have been failed by our education system need to be targeted and if we do not do that, then the demographic dividend that we all talk of may never happen.  This will have to work hand in hand with our thrust in the education sector.

          We do not see too much of extra emphasis given to the North Eastern Region. However, we need to press for early completion of many of the connectivity projects that have been started in that region. 

          Finally, Mr. Chairman, Sir I would like to draw the attention of the hon. Minister of Finance to the mountain issues.  One of them is the factoring in of mountain specificities to the whole process of planning.  All mountain States face this particular issue.  In this day and age, we need to rework the way plans are formulated.  Mountain eco-systems are different.  Therefore, it is natural that the way we need to design our cities and transportation and other areas is going to be different.  I would urge that this area be given greater focused attention in future.  The Budget also needs to bring into it the aspect of seeing that all greening ideas are incentivized.

Those that pollute or use obsolete technology should be penalised. Perhaps, later, this can also be a part of the overall reporting to Parliament.

          Apart from the inflationary part of the Budget, the Budget does address all the challenges being faced by our great nation.

          We must, however, make sure that every rupee spent  is done so with rigour and accountability. This, to my mind, will make a huge difference in the outcomes. We have to be more and more focussed on the outcomes.

          Sir, finally, I thank you for giving me this opportunity to participate in this debate.

                                                                                         

 

श्री आर.के.िंसह पटेल (बांदा): सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सन् 2010-11 के आम बजट पर चर्चा करने के लिए खड़ा हुआ हूं, इसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। यह जो बजट सरकार लाई है, यह किसान विरोधी, गरीब विरोधी, छात्र विरोधी और नौजवान विरोधी बजट है। …( व्यवधान) आम जनता से इसका कोई लेना-देना नहीं है।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Please do not disturb him.

श्री आर.के.िंसह पटेल : अगर मौका मिलेगा तो मैं आपको बता दूंगा। यह बजट मात्र देश के 50-60 पूंजीपतियों के फायदे के लिए बनाया गया है। इस बजट से आम जनता का कोई लेना-देना नहीं है।

          सभापति महोदय, मैं स्पष्ट कर देता हूं कि जब पूंजीपतियों के साथ मिल कर चुनाव लड़े जाएंगे, सरकारें बनाई जाएंगी तो सहारे के साथ इशारा आ ही जाता है, जो सहारा देता है, वह इशारा करता है।  उनके इशारे पर बनाया गया यह बजट है, इस बजट का आम जनता से कोई लेना-देना नहीं है।

          सभापति महोदय, आज इस देश में दोहरी व्यवस्था है। सन् 1967-68 में इस कुर्सी पर स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी जी बैठी थीं, उस समय कांग्रेस की सरकार थी। तब से लेकर आज तक देश का जो किसान है, वह गरीब होता गया और देश का जो उद्योगपति, पूंजिपती है, वह मालामाल होता गया। इसलिए कि पूंजीपतियों के द्वारा निर्मित सरकारें ज्यादातर इस कुर्सी पर आसीन रही हैं। यह बजट पूरी तरह से पूंजीपतियों के फायदे के लिए बनाया गया है। इस देश में दोहरी व्यवस्था खत्म होनी चाहिए। किसान जो माल पैदा करता है, उसका दाम सरकार निर्धारित करती है और दूसरी तरफ फैक्ट्री में जो माल बनता है, सुई से लेकर हवाई-जहाज तक, जो भी इस देश में बनता है, उसके मूल्य तय करने का जो मानक है, वह सरकार के पास नहीं है, उसके मूल्य का निर्धारण सरकार तय नहीं करती। इस दोहरी व्यवस्था को खत्म होना चाहिए।

16.53 hrs.

(Madam Speaker in the Chair)

 

          अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से कुछ बातें कहना चाहता हूं। …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: अब आप अपनी बात समाप्त करिए।

…( व्यवधान)

श्री आर.के.िंसह पटेल : अध्यक्ष महोदया, मैं बुंदेलखंड से चुन कर आता हूं और बुंदेलखंड के लिए सरकार ने पैकेज दिया है। मैं सरकार को धन्यवाद देता हूं, जो 7266 करोड़ का पैकेज आपने दिया और 1200 करोड़ पैकेज का बजट में उल्लेख किया है, लेकिन इस पैकेज के लिए ब्यूरोक्रेट, आईएएस नीति निर्धारित करता है। सरकार पैसा दे रही है, जनता से चुन कर जनप्रतिनिधि आता है, हम लोग वहां के सांसद जनता से चुन कर आए हैं। यहां से जो पैसा जा रहा है, इसकी कार्य योजना कैसे बनाई जाए।…( व्यवधान) उसमें हमारी भी सहमति ली जाए।

अध्यक्ष महोदया: अब आप समाप्त करिए।

श्री आर.के.िंसह पटेल : अध्यक्ष महोदया, एम.पी. लैड योजना में दो करोड़ रुपए है। मध्य प्रदेश में एक विधान सभा में आठ, एक लोक सभा क्षेत्र में मध्य प्रदेश में आठ विधान सभाएं आती हैं। हमारे उत्तर प्रदेश में पांच-छ: विधानसभाएं हैं और एक विधान सभा में एक साल में 40 लाख रुपए तथा मध्य प्रदेश में 25-30 लाख रुपए एक विधान सभा के विकास के लिए आते हैं। आज एक किलोमीटर सड़क के लिए पीडब्ल्यूडी के शेडय़ूल रेट से 40 लाख रुपए पर-किलोमीटर की कास्ट आती है। आप एक किलोमीटर सड़क नहीं बना पा रहे हैं और दुनियाभर के आरोप सांसदों के ऊपर लगाए जा रहे हैं। जनता की अपेक्षा है, जनभावनाएं हैं, जनता से हम चुन कर आए हैं।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: अब आप अपना स्थान ग्रहण कर लीजिए।

श्री आर.के.िंसह पटेल : अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि या तो एम.पी. लैड को खत्म कर दीजिए या फिर कम से कम एक विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से एक करोड़ रुपए कर दीजिए, यही कहते हुए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं और अपनी बाकी स्पीच ले कर रहा हूं।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: ऐसे हिस्सों में ले नहीं किया जाता है, पूरा किया जाता है।

 

                                                                                           

* DR. PRABHA KISHOR TAVIAD (DAHOD) :  I congratulate Hon’ble Finance Minister, Shri Pranab Mukharjee that in-spite of global bad inflation, he presented growth oriented budget and more grants are spared for Rural Development Scheme like, Agriculture, Mahatma Gandhi National Rural Employment Scheme, Education, Health etc. with the guidance of our Hon’ble Prime Minister Shri Manmohan Singhji and UPA chairperson Hon’ble Madam Soniaji.

         As everybody knows, Air, water and food are the essential things for life.  My constituency belongs to schedule area, which have main business of agriculture which mostly depends on rain water, which is irregularly irregular and we face drought off and on.  Though Kadana Dam and other dams are situated in my constituency but the water for irrigation is not provided to my tribal people and they have to migrate to other districts to earn their livelihood.  The tribal people are used to migrate with their wives  and Children leading to increase in dropout rate of tribal children from school and they remain uneducated.  So, I request Hon’ble Finance Minister to allocate more funds for irrigation water from Narmada, Kadana and to build other dam on Anas, tributary of Mahi river.

          As there is no provision for pure drinking water, people have to drink water from hand-pumps and bore-wells with high level of injurious chemical substance leading to kidney disease and kidney stones, malnutrition and water born diseases.  This is observed in area from Chota Udaipur, Jhambua-Banswada- Vijaynagar upto Ambaji- The tribal belt.

 

1.       Irrigation Projects:

a.             Kadana dam on Mahi river:-

Kadana dam is situated in my constituency but there is no provision made in it that this poor people get water for drinking and irrigation.  Later on, one Bhanasimal Yojna for drinking purposes was prepared for limited part i.e. one tehsil and few villages.  This project is having all the scope for expansion and it can solve the drinking water problem of whole Dahod district.

b.       Anas:-

          This tributary of Mahi river is passing through Jhambua (M.P.)- Dahod (Guj) – Banswada (Raj).  If the dam is constructed at Anas, we will solve the problem of lack of water of all these three districts.

C.            Narmada River/Sardar Sarovar Dam:-

If we plan give water for drinking and irrigation purpose from this project, it will benefit the Chhotaudepur and Dahod.

          So, I request Hon. Finance Minister to allocate more budget for irrigation project from Narmada/Kadana to villages of Dahod. If the water will be given to this area the people will get employment at their doorstep for whole year from agriculture and the dairy development will be effective, migration for earning livelihood to other districts will be reduced and the wives will remain at home with the kids and they will be going to schools, dropout rate will be reduced, thus the education of children will not suffer.

2.                                 Residential School in my area

I thank to Hon’ble Minister of Tribal Affairs for sanctioning Eklavya schools in my constituency.  But for maintenance we will be in need for more funds.  The budgetary provision for tribal affairs is not enough.

          So I request you to increase the allocation for tribal affairs Ministry so that they can give more residential schools to this area.

3.                                 Upgradation of Railway workshop at Dahod

 Railway loco carriage and wagon shade at Dahod, (W.R.) is having unutilized vacant land in Railway colony Dahod.  So I request you to give more funds for upgradation and modernization of workshop.

 

4.                                 New Coach Factory :

As  you know Sir, there are no industries in my constituency; Dahod is situated on the border of Madhya Pradesh and Rajasthan which are having most of the population of Tribal people.  If new coach factory will be established at Dahod then the tribal people of these three states will get employment facilities.  Earlier, the land was also earmarked for rail coach factory.  I request Hon. Finance Minister to allocate fund for New Rail Coach factory at Dahod through Railway Ministry.

5.       To establish an English Medium Central School from 1st Class to 12th Class at Dahod (Guj)

          Sir, there are more than 4000  railway staff members are working at Dahod from all the state of country.  So we wish that you please sanction an English medium Central School in Railway colony, Dahod.

 

6.       Medical college and Nursing school :-

          There are so many hospitals, Government, Railway, trust and private hospitals and Dahod is a district place in tribal area. So Sir you please sanction Nursing school and medical college at Dahod.

          I congratulate the Finance Minister to increase financial allocation for Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act Scheme and under this scheme, as suggested by the Finance Commission, the deepening of the well, cleaning and restoration of step wells and rain water harvesting, should be taken up positively which will yield more water with less expense.

          I also congratulate him for increasing the unit cost of Indira Awas Yojna, making provision for food security and the provision for right of children for free and compulsory Education.

          I congratulate the Hon’ble Finance Minister, as he has increased the tax on tobacco products, as it is injurious to health leading to cancer.

          I congratulate the Finance Minister for making 2% incentive to those farmers who repay their loans as per the scheduled so the farmers will get loan at 5% interest rate.  I also congratulate Hon. Finance Minister for increasing the six months period for repayment of agricultural loan of farmers.

          It is said “Give them a fish they will eat for a day, teach them to fish, they will eat for whole of their life.”

          Here we wish you will give us water for drinking and irrigation purpose.

 

 

 

*SHRI SARVEY SATYANARAYANA (MALKAJGIRI):  I am privileged to be invited to propose a vote of thanks to the Hon’ able Minister of Finance on the presentation of the Union Budget 2010-11.  I rise to support the Bill presented by the Finance Minister, Hon’ble Shri Pranab Mukherjee.

The Union Budget of 2010-11 assumes a special significance as it is against the back drop grave uncertainties which the economy was facing in the last year. Not only the Indian economy, which was under serious threat as any other economy of the world, has come out of the recession, but also has come out with flying colours due to the various steps taken in the budget of 2009-10 and other follow up measures taken by the UPA government. Today despite sub normal south west monsoon of 2009, the Indian economy is in a position where we can be proud of the timely initiatives of the UPA Government.

The Hon’ble Finance Minister, while preparing the Union Budget for 2010-11 had to keep in mind the additional problem of unabated inflation and the price rise of essential commodities. The challenge this year was in no way the challenge faced by the UPA Government which came in to power for the second term under the leadership of Mrs. Sonia Gandhi and the Prime Minister Shri Manmohan Singh. This year budget aims to cross the double digit growth barrier and simultaneously keep the inflation under reasonable check.

I would like to point out that to continue the economic growth and to achieve the targets set in a fixed time frame the budget provides for development of infrastructure in rural areas at a far greater pace than earlier years. The budget for 2010-11 provides a whopping 46% (Rs. 173552 crore) of the total plan allocation for the infrastructure development of the country. The UPA government proposes to construct 20 kms. of National Highways per day in this regard. The Infrastructure Finance Company Ltd (IIFCL) shall provide finance for about Rs 25000 crore in the next 3 years, which is step in the right direction and in the right earnest.

The vision of the Hon’ble Finance Minister to shift the focus of the budget from mere statement of Government accounts to reflect the Government’s vision lays more emphasis on the role of Government as an enabler. It was the vision of late Shri Rajiv Gandhi that the Role of the Government should be more to act as an Enabler for implementing the various scheme for the upliftment of the backward classes and poor people. This is a very progressive step and sends very positive signals to the government machinery.

The invitation of the Hon’ble finance minister to the people to participate in Government’s disinvestment programme is the timely step which shall give the people a chance to share the wealth and prosperity of the Central Public Sector Undertakings. This shall augment the resource availability of the Government and shall bring better corporate governance for the PSUs.

The Government’s objective to effectively manage the public expenditure is a part of fiscal consolidation process. In this
regard the proper targeting of subsidies is a must and with
this in mind the Hon’ble finance minister has announced
the so called Nutrient based subsidy policy for the fertilizer
sector with effect from 01-04-10. This shall lead to an
increase in the agricultural productivity and shall bring better
return for farmers. All along the interest of the farmers have
been duly watched by the Hon’ble finance minister. The
aim of the scheme is to move towards the direct transfer of
subsidies to the farmers.

 I would like to mention here in this context that the resolve of the UPA government is to promote inclusive growth, enhance rural incomes and sustain food security in the agricultural sector. This year’s budget lays specific emphasis on agriculture sector in this respect. The budget aims to increase agricultural production, to reduce the wastage of the produce, to provide adequate credit support to the farmers and to give thrust to the food processing sector. This shall greatly help the farmers in all parts of the country. In this direction many steps, like extending green revolution to the eastern India, organize pulses and oil seed villages, announced by the Hon’ able finance minister are really commendable. The raising of agriculture credit target to Rs. 375000 crore from Rs. 325000 crore in 2010-11 shall vastly improve the availability of credit to the farmers. The extension of 6 months provided by the budget to the farmers in Debt waiver and Debt Relief scheme is the timely gift for the farmers affected by the recent draught in some states of the country. To further support the farmers who pay back their short tern cop loan in time the Hon, able finance minister has increased the subvention from 1 % to 2 %. This is the best reward for hard working honest farmer.

As rightly pointed out by the Hon’ble Finance Minister double digit food inflation is a cause of concern for the people of India and in this regard the choice available with the government are limited as the development of the infrastructure, employment for the rural sector, rising oil prices and continuing fight with the world wide recession are the major challenges for the government which cannot be ignored at any cost. The development of infrastructure, employment generation schemes like, Mahatama Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme ( NREGA) have inflationary tendencies and for the development of the economy in the time of recession would have some element of inflation. The Hon’ able Finance Minister has a tight rope walking job in his hand and under the circumstances he has tried his best to tame the inflation and simultaneously the thrust on rural employment has not been hampered.

In line with the UPA’s commitment to inclusive development the government had earlier provided for Right to Information, followed by Right to Work and then Right to education. Now further extending its wings Government proposes to enact the Food Security Bill. In this regard 25% of the plan allocations are devoted to the development of the rural Infrastructure. The steps proposed by the Hon’ble Finance Minister in the budget are the perfect steps for Inclusive Development. The focus on rural health and Free and Compulsory education for the rural and poor people speaks about the commitment of the government towards the society as a whole.

NREGA, Indira Vikas Yojana for weaker sector of the society have already proved a boon for the rural poor and in this direction the steps taken to increase the allocation in this budget are very positive steps in the direction of the rural development.

In the end, while congratulating the Hon’ble Finance Minister Shri Pranab

Dada, I commend and support the Finance Bill and also request this august House to join me to facilitate passing of the Bill unanimously.

 

*SHRIMATI BOTCHA JHANSI LAKSHMI (VIZIANAGARAM): Madam, the general budget 2010-11 introduced by the Hon’ble Finance Minister. Sir Pranab Mukherjee, is unique on its own way. We need to evaluate each budget in the socio-economic political and international circumstances. After listening to the opposition party members. It is very clear that this is best ever budget presented by our Hon’ble Finance Minister Sir Pranab Mukherjee under the present circumstances.

Welfare of the people, especially the poor and the needy and Development of the country uniformally  are just like two eyes of my Government. Our Hon’ble Finance Minister did his delicate balancing act very effectively. I heartily congratulate for the fine balancing act.

     No doubt all this is made possible with the active support of the UPA Chairperson Smt. Sonia Gandhiji and Hon’ble Prime Minister Shri Manmohan Singhji.

     Thank you Hon’ble Chairman for announcing to laying the written speech on supporting the General Budget 2010-11 on the Table of the House to be treated as part of the business. Once again I whole-heartily support this general budget.

 

I congratulate the Finance Minister for presenting a good budget for the year 2010-11.

The Budget signals continuity of reforms and is very good in the medium to long term. This Budget has a lot of positives. The Government has focused on the disadvantaged sections of society while allowing private entrepreneurial spirits to flourish. The focus on fiscal discipline is a much-needed one and roadmap is very clear. There is a focus on infrastructure by way of an increase in refinancing for

 

infrastructure projects by IIFCL, doubling of allocation for the power sector, higher allocation for roads, and thrust on public-private partnerships. The allocation to infrastructure and effectiveness in implementation of the programmes on the ground will definitely decide India’s growth trajectory above 7 per cent. Increased spending on social sector and rural infrastructure suggests thrust on inclusive development. W hat one can ask for more? Under Bharat Nirman Rs.48,000 crore for the six fold action plan for rural infrastructure. The bulk of the increase is going to rural electrification, housing and roads. The umbrella scheme has a clutch of six different programmes under it. The main areas covered under it are roads, houses, drinking water, irrigation, telephony and electricity in rural areas. The budget for the first phase was Rs.l, 74,000 crore. But in the second phase, the road component alone is expected to cost Rs.1,32,000 crore.

The Pradhan Mantri Grameen Sadak Yojuana which targets to connect villages with  a population of 1,000, has got an allocation of Rs.9995 crore as against last year’s revised allocation of Rs.9475 crore. But today it also meets its expenses through loans from the Asian Development Bank and World Bank and NABARD. The Government has set a target to reach 1,67,000 habitations at a cost of Rs.1,32,000 crore by 2012.

The Bharat Nirman component on housing, called Indira Awas Yojana which was to build 6 million dwellings in the four years ending 2009, now has a target of 12 million houses in the coming four years. The funds for the scheme have gone up from Rs.7,918 crore last year to Rs.8,996 crore this year.

Another salient feature of the budget is funds for rural electrification have gone up this year with fund transfers to Rajiv Gandhi Grameen Vidyutikaran Yojana from Rs.3,100 crore to Rs.5,000 crore.

Support to the agriculture sector has been provided through a more holistic four-pronged strategy which includes increasing output, reduction in waste, credit support to farmers and incentives to the food processing sector. Thanks to the Government that the basic tax structure has not been modified.

The target of 5.5 per cent fiscal deficit looks achievable with PSU divestment to the tune of Rs.40,000 crore and Rs.30,000 crore from the 3G spectrum auction. The size of expenditure is galloping which is a matter of concern. I would have liked the Finance Minister to take some clear steps to reduce the size of expenditure. The increase in excise duty on crude oil and petroleum products is a cause for concern which could trigger inflation.

For the IT industry, investment in infrastructure and e-Governance could generate potential opportunities. IT employees will get higher take-home salary

The benefits to individual tax-payers will ensure that a slight increase in excise will not impact demand and thus growth will not get impacted. The FIVTs move to aggressively rationalize income tax slabs will put more money in the hands of middle class and provide a major boost to domestic consumption. With deficit in check, interest rates should not go up. We can look forward to higher growth.

The proposal to allow more private banks will contribute to financial inclusion.

We should also look at what the Government achieved with the money given out last year. A cursory look at any ministry website indicates that no one is really reporting the outcomes.

So far as my Andhra Pradesh State is concerned, they are implementing all schemes and programs that were started during, the tenure of the late Chief Minister, Dr.Y. S Rajasekhara Reddy, still they continue under our present Chief Minister Dr K..Rosaiah. Poverty alleviation schemes like Abhayahastam, free power to farmers, supply of rice at Rs.2 per kg, loans to Self Help Groups at one third per cent, Rajiv Aarogyasri, tuition fee reimbursement for post-Matric students, the flagship program Jalayagnam, ‘108’ambulance services, social welfare pensions for the aged, the loan waiver scheme, rural drinking water supply project and Andhra Pradesh Municipal Development Project projected the human face of the Government. The fall in foodgrain production is likely to be 40 lakh tonnes due to drought and floods. During 2004-2009, 19.96 lakh acres were provided irrigation facility and 3.08 lakh acres of ayacut stabilized. This will increase agricultural production and will help in checking rise in prices. As we all know, these social welfare programmes require huge budgetary support from the Government of India till we record 9 per cent GDP growth. . Therefore, I request the Finance Ministry to extend all financial support not only to the Government of Andhra Pradesh but to other States which are carrying forward these schemes for the welfare of the poor people in the country.

With these few words, I support the General Budget, 2010-11.

 

 

*SHRI S.S. RAMASUBBU (TIRUNELVELI):  It is an aam admi budget. It gives more importance to rural development and it helps to enhance the purchasing power of rural masses. Amidst of global recession, our government protected our economy with powerful financial system which is because of a strong and sustained effort of our able and experienced finance minister and a strong Prime Minister. The aim of the budget is to heighten the GDP growth to the level of 9 percent.

In the second half of 2009-10 it is a major concern that the emergence of double digit food inflation. Our Government has been taking various steps to bring down the inflation by making extensive consultation with state governments.

Financial stability is an inevitable factor to strengthen our economy.  Our budget specifies to establish apex level “financial stability and development council in order to institutionalize the mechanism for maintaining financial stability.  RBI, our apex bank is considering to give some additional banking licenses to private sector players, Non-banking financial companies to meet out the demand of the people.

It is a welcome step that the government is going to provide further capital to strengthen the regional rural banks so that they have adequate capital base to support increased lending to the rural economy.

Agriculture: Rs 400 crores provided to extend the green revolution to the eastern region of the country comprising Bihar, Chattisgarh, Jarkhand, Eastern UP, West Bengal and Orissa.

Credit support to farmers are given importance for the year 2010-11 the target has been set at Rs 3,75000/- crores.

Short production due to climate change establish a gap between demand and supply of agricultural commodities: to improve the food grain productivity, new method of cultivation and improved variety of seeds and high level storage facilities for vegetables and grains like wheat and rice is essential and inevitable.

National Water River:  I have already mentioned in the last year budget regarding to establish a national water river.  I am urging here to put an estimate to form a river from Kashmir to Kanyakumari.  The surplus water which acquired during heavy flood can be channelised through a supply channel to reach this river.  It can be utilized for dry area agriculture cultivation and drinking water purpose of various States.  It will also reduce the inter-state water dispute.  It will be a symbol of national integration.

Infrastructure facilities are given prominent importance in developmental allocation.  Rs 173552 crores have been earmarked. Road Transports are taking place very important in it. Four way lane of road facility from Kanyakumari to Kashmir is very important one.  In my Tirunelveli Constituency from Kanyakumari to Madurai still there are some pending works.  It must be completed with full facilities.

Tiirunelveli to Tuticorin road is pending for a long time.  I request you sir to give the proper order to start and fulfill the N. H. road work immediately.  Tirunelveli to Qulon through Alangalam and Shenkottai is an important road to make the link between Tamil Nadu and Kerala States.  It should be considered under N.H. Road and this road must also be formed in four ways.

 

The budget estimate of expenditure is increased 8.6% over and above the previous year budget.  About 66100 crores provided for Rural Development. Mahatama Gandhi NREGS get Rs 40100 crors for 2010-11.  The funds of rural developments should be utilized properly.  The power is given to rural panchayat presidents to implement this scheme.  The monitoring of fund of rural development is essential.  The members of parliament are appointed as chairman of the monitoring committee.  But most of the State Government authority and local bodies are not under the control of monitoring authority. The joint operation of Cheques which are used to distribute the money to the various development works must be provided both to Chairman of monitoring committee and the collector of concerned districts in all the States.  There only it will be easy to control the DRDA works.

Power Projects:  In the whole India, the wind mill projects are more prominent in my constituency area of Tiirunelveli in Tamil Nadu.  We are having the suitable infrastructure of wind to produce more current through wind mill project.  The government should encourage this project further by giving more assistance and subsidy.

Koodankulam Nuclear Project is an important project to generate power.  The work is very slow.  It is situated in my constituency.  It is announced 1000 M.W current will be generated within this July 2010.  If it is completed, the project will generate 5000 M.W current.  I request the Finance Minister and Hon. Prime Minister to expedite the work of above to generate the current and to rectify if any insufficiency is available in this process of the work.

Indian Space Research Organization in Mahendragiri of Tiirunelveli are doing a marvelous achievement in new technology and development in rocket launching phenomena. Most of the young scientists who are involving in new findings are from Tiirunelveli Constituency.  I am very proud of it.  Sir, I request in this occasion that the Mahendragiri ISRO must have a separate Division.  More than 500 peoples inclusive of talented scientists are working in this centre. In order to bring up this centre more effective both in administration and new findings, it is essential to bring in a separate Division (now it is under the control of Trivandrum Division).

Inclusive Development is given prominent interest in this budget.  The spending on social sector has been gradually increased to Rs 1,37,674 crores in 2010-2011 which is 37% of total plan outlay.

Industrial development is also given important in this inclusive budget.  I submit here sir, that special Economic zone is Nanguneri of my constituency in Tamil Nadu is a long pending project.  If this project is completed, it will be helpful to give more employment opportunities and also my constituency may have the possibility of getting the industrial development.  Since, it is industrially backward area; the government should give more preference and concentration in this Nanguneri Project.

Education – We need a Kendriya Vidyalaya School in Tiirunelveli constituency.

Water Facility: To fulfill the drinking water facilities in my constituency, our central government should allot more funds.  There is a papanasam river water scheme to meet out the demand of the drinking water facility to city dwellers from Tiirunelveli, Palayamkottai, Melapalayam, Thachanallur, which are coming under corporation area of Tiirunelveli.  The above Papamasam pipeline scheme is a needed scheme to solve the drinking water problem.  So, kindly provide fund for this major scheme.

Indirect Tax: Central excise duties are enhanced to 8% to 10%.  Match factories in Tiirunelveli, Tuticorin, Virudhnagar, Rameswaram, Madurai district in Tamil Nadu are suffering due to the hike in taxation. Due to scarcity in labour supply and awareness among the people to send their children to the schools and higher studies, the handmade match factory owners are transferred from hand made to semi-mechanized industries.  The Semi mechanized industries are giving more employment opportunities to rural people in this area.  But the excise duties are in the same rate of 10% for both semi mechanized and fully mechanized industries. This lead to bring the sufferings to semi mechanized group of industries. They feel if there is not any reduction in the taxation for semi mechanized factory of match factories; it is difficult to face the stiff completion of fully mechanized match industries.  So, I request honourable minister to reduce the tax from 10% to the level of 4% to the match box industries which are considered to be semi mechanized factories otherwise it is not possible to stop the heavy loss to match industries and also the loss of employment opportunity in this area.

I welcome this balanced, inclusive productive budget.  It gives more importance to rural development, agricultural enhancement and social welfare.

 

*SHRI BADRUDDIN AJMAL (DHUBRI) :  I am sorry to start with the comment that the General Budget 2010-2011 can be termed as “General Budget” in Dictionary Terms also.

          I express my deep regret to the fact there is no special announcements and specific direction to Check Price Rise, Unemployment, floods and erosion like national and Assam specific problems.

          In Parliament, the Government has succeeded in avoiding the issue of price rise by virtue of its numerical strength.  We had expected that there will be some strategies in budget as long term plan for controlling price rise.  But the fact that half of the populations are now forced to sleep without food has failed to move the heart of the Congress Government. The Budget has not indicated any strategies for tackling the price rise on long term basis.   There is no action against the hoarders and black marketers and more surprising is that the Congress Government is saying that low food production and increased income of people is responsible for price rise on the other hand Government is encouraging imports. It is disturbing that the number of poor people are increasing.  All these prove that the Government’s AAM AADMI BUGET IS ACTUALLY A KHAS AADMI BUDGET.

As usual, it is frustrating to note that the name of Assam and NE has not find any place in the Budget Speech of Shri Pranab Mukherjee.

         Out of the Rs. 6.82 lakh crore of total Plan Expenditure an amount of Rs. 2.48 lakhs will be spent on interest payment which was 2.19 lakh crore in 2009-2010 and Rs. 1.37 lakh crore will be spent on debt re-payment which was .95 lakh crore in 2009-2010.  Total amount for interest payment and re-payment of debt comes to Rs. 3.86 lakhs i.e. 57% of the total Plan expenditure is meant for interest payment and re-payment of debt.  If nearly 60% of the plan expenditure is spent for interest payment and re-payment of debt than 6.82 lakh of Plan expenditure for development work as announced in the FMs budget speech is a statistical lie.

          To increase agricultural production the strategy announced by FM is to extend the green revolution to the eastern Indian states viz. Bihar, Chattisgarh, Jharkhand, Eastern UP, West Bengal and Orissa. It is pained to note that it has become a norm than exception that for any mega project for Eastern India it ends at West Bengal as if India ends there.  The non-inclusion of Assam from majority of the mega projects of Eastern India gives us enough evidence for asking an enquiry to see that whether there are any deliberate attempts by specific interest  group/anti-Assamese lobby who ensure that Assam is exclude from the mega projects of eastern India as is the case of Green Revolution for eastern India announced in 2010 Budget. 

Last year I had pointed out about reduction of the budget of Bongaigaon Refinery Ltd. I am happy to see that this year it is spared from spade of finance gurus.  This year I am pointing out that the budget for Brahmaputra Valley Fertilizer Corporation has been reduced from 64.99 crores to 44.99 crores.  I hope next year this corporation will be spared.

          Last year I had pointed out that there is no increase in the budget of NEC.  I am happy to see that this year, there is a symbolic increase of only Rs. 285 crore (from 1455 crore to 1740 crore) for the Ministry of  Development for North Eastern Region.  I hope that next year there will be significant increase.

          For construction of improvements of Road of Economic Importance under Ministry of Development for North Eastern Region the already low budget of Rs. 15 crore has been further reduced to only Rs. 5 crores for the year 2010-2011.

          Last year I had pointed out that Rs. 15000 core of the due share of NE States have been provided by different departments. the trend continues this year also. One such examples is that the Department of Consumer Affairs Food and Public Distributinon has allocated only Rs. 20.55 crore as lumpsum provision for projects/schemes for the benefit of North Eastern States out of its total budget of 56133 crore.  As Non lapsable Central Pool of Resources the department is required to keep 10% of its total budget for the purpose, the due amount for NE should have been Rs. 5613.  There are many other important departments which have abstained from giving due share to North Eastern India.

          During last year’s Budget and prior to current year budget a number of submissions have been made by the before Hon’ble Prime Minister, Finance Minister and concerned Ministers.  Some of major demands which have not been included in the budget are as below:

Declaration of flood and erosion as a National Problem.

Issue of Photo ID Card and preparation of NRC based on 1971 electoral Roll through door to door  campaign

Rehabilitation of the erosion victims.

Rehabilitation and compensation of victims of ethnic violence of Kokrahhar, Bongaigaon, Darrang, Udalpuri, Neli @ of the compensation given to the victims of Sikh genocide 1984, Muslims in Bhagalpur, Gujrat etc.

Construction of Dhubri-Dulbari bridge over river Brahmaputra.

Establishment of Medical College, Engineering College, Agricultural College and Fishery College in the Muslim majority Districts of Assam.

Establishment of the special Campus of Aligarh Muslim University in Dhubri.

Re-opening of Rupshi Airport.

Re-opening of International River Port of Dhubri

Establishing of “The Grameen Bank Project” in all Char and Muslim majority Panchayat of Assam.

Immediate enforcement of “The Assam District wise population pattern Reflection in Services (Class III & Class IV posts) Act 1994” as existing in State of Kerala.

Reservation of Muslims in all Government, Semi-Government, Private Sector appointments and admission of Muslim Students in the IITs, Medical Colleges, Engineering Colleges, Agricultural Colleges, Polytechnics, ITIs of Assam as per population pattern.

Provide Patta for Char land.

Review and re-consideration of MSDP schemes sanctioned for Assam.

 

 

 

 

 

*श्री विजय बहुगुणा (टिहरी गढ़वाल)ः  

          प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व में यू.पी.ए. सरकार के पूर्व काल में भारत ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास किया और विकासदर 9औ तक पहुंचाया।  उद्योग, कृषि के क्षेत्र में उत्पादन बढा है और मुद्रास्फीति नियंत्रण में रही, किसानों का 72 हजार करोड़ का ऋण माफ हुआ और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे बी.पी.एल. परिवारों को सम्मान के साथ आर्थिक सहायता मिली है।

          वर्ष 2008 में विश्व को एक आर्थिक मन्दी और वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा।  केन्द्र की सरकार ने देश को इस संकट से बचाया और उद्योग एवं निर्यात के लिए विशेष आर्थिक सहायता प्रदान की और कोई भी वित्तीय संस्था दिवालिया नहीं हुई।

          यू.पी.ए. चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की योग्यता और सूझबूझ को सिर्फ हमारे देश ने ही नहीं बल्कि पूरे विश्व ने सराहना की और 2008 के लोक सभा चुनाव में देश की जनता ने अधिक बहुत के साथ केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यू.पी.ए. 2 का गठन किया।

          इस बजट में, मैं वित्तमंत्री जी को बधाई देता हूं कि उन्होंने ग्रामीण भारत के विकास पर विशेष ध्यान दिया है।  विकासदर को 5.8औ पर आ गयी थी वह बढ़कर 7.9औ हो गयी है और सरकार का यह लक्ष्य है कि आने वाले समय में विकासदर 10औ पर पहुंचे।

          किसानों को 5औ के सस्ते दर पर ऋण का प्रावधान कर किसानों को विशेष राहत दी गयी है।  सर्व शिक्षा अभियान के लिए 26,800/करोड़ रुपए से बढ़ाकर 31036/करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।  राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए 19 हजार करोड़ से बढ़ाकर 22 हजार करोड़ का प्रावधान किया है।  राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना में 40 हजार करोड़ से बढ़ाकर 48 हजार करोड़ का प्रावधान किया है।

          वर्तमान में वित्तीय घाटा कम हुआ है।  उद्योगों का उत्पादन बढ़कर 18.5औ हुआ है जो कई वर्षों की तुलना में अधिक है।

          राष्ट्रीय ग्रामीण योजना के लिए अधिक धन उपलब्ध कराया गया है और शहर में झुग्गी-झोंपड़ी में रह रहे लोगों के लिए मूलभूत सुविधाओं व पुनर्वास के लिए विशेष योजना बनायी गयी है।  13वें वित्तीय आयोग की सिफारिश को स्वीकार कर केन्द्र ने राज्यों को जी.डी.पी. का 68औ तक सहायता देने का 2014-2015 तक का लक्ष्य बनाया है।  सरकारी कम्पनियों के शेयर्स को बेचकर जो धन अर्जित हुआ है वह केन्द्र सरकार द्वारा चलायी जा रही भारत निर्माण योजना एवं अन्य जनकल्याण योजनाओं पर व्यय किया जायेगा।  विदेशों से आ रही पूंजी की शर्तों को और सरल बनाया गया है जिससे विदेशी पूंजी निवेश बढ़ रहा है।

          आयकर में मध्यम वर्ग के करधारकों को विशेष छूट दी गयी है।

          स्वतंत्र और निर्भीक न्यायपालिका लोकतंत्र में रीढ़ की हड्डी होती है।  खेद की बात है कि न्यायालयों में लम्बित मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है और लोग परेशान हैं।

          पश्चिमी देशों के मुकाबले हमारे देश में जनसंख्या और न्यायाधीशों का अनुपात बहत कम है।  हमारे यहां 10 लाख की आबादी पर मात्र 15 न्यायाधीश हैं, जबकि पश्चिम देशों में यह संख्या 150 से अधिक है।  सरकार को न्यायपालिका पर अधिक धन का आवंटन करना चाहिए और न्यायाधीशों की अधिक नियुक्ति कर न्याय को सरल बनाने का कदम उठाना चाहिए।

          पर्वतीय राज्यों में विकास दर पिछड़ रहा है और मूलभूत ढांचे का अभाव है।  पेयजल, स्वास्थ्य की गंभीर समस्या है और सड़कों का अत्यंत अभाव है।  घाटियों में नदियां बह रही हैं लेकिन अधिकांश गांवों में सिंचाई और पेयजल की व्यवस्था नहीं है।  श्रोत सूख रहे हैं और पेयजल के अभाव के कारण गांवों से पलायन हो रहा है।

          माननीय प्रधानमंत्री जी ने बुन्देलखंड क्षेत्र में पेयजल की समस्या का हल करने के लिए 1200 करोड़ रुपए की सहायता योजना बनायी है।  मेरा सरकार से अनुरोध है कि हिमालयी राज्यों के लिए विशेष तौर पर उत्तराखंड में पेयजल के लिए विशेष आर्थिक योजना बनाने की कृपा करें।

          हिमालयी राज्यों में विकास के लिए यह आवश्यक है कि हिमालयन हाईवे का निर्माण किया जाना चाहिए।

          पर्वतीय राज्यों में भूमि सीमित है जिसका अधिकांश भाग जंगलों/वनों से आच्छादित है।  पहाड़ी राज्य उत्तराखंड का 68 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है जिसमें गैर वन कार्यवाही नहीं हो सकती हैं।  ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में जंगलों को पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित रखना अनिवार्य है।  इस कारण केन्द्र सरकार को उत्तराखंड राज्य के वनों के रखरखाव के लिए विशेष आर्थिक सहायता देनी चाहिए ताकि विकास अवरूद्ध न हो सके।

          पर्वतीय राज्यों मे कृषि, उद्यानीकरण, पशु चिकित्सा, उद्योग, सिंचाई, पेयजल स्वास्थ्य और सड़क के क्षेत्र में पर्वतीय राज्यों को मैदानी राज्यों की अपेक्षा अलग से योजना तैयार करके क्रियान्वित करने की आवश्यकता है।

          यह भी एक गंभीर विषय है कि इन राज्यों के युवा वर्ग को रोजगारपरक शिक्षा उपलब्ध नहीं हो पाती है।  इन्हें सूचना प्रौद्योगिकी, उद्यानीकरण, उत्पादन, संरक्षण, पोस्ट प्रोडक्शन प्रौद्योगिकी व विपणन से जुड़ी शिक्षा उपलब्ध करायी जाये।  यदि हम पर्वतीय राज्यों के युवाओं को भटकने से रोकने में असमर्थ होते हैं और आर्थिक विकास देकर उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा में नहीं जोड़ पाते हैं तो हम अपने लिए भविष्य में गंभीर स्थितियां पैदा करेंगे।

          यह आवश्यक है कि बिजली उत्पादन, पर्यटन और सड़कों को जोड़ने में पर्वतीय राज्यों में परस्पर सहयोग कर विशेष योजना बनानी चाहिए।  जो जनपद अंतर्राष्ट्रीय सीमा से जुड़े हुए हैं वहां रोजगार पर विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है।

          मैंने पहले भी माननीय प्रधानमंत्री जी से इस सदन के माध्यम से निवेदन किया था कि हिमालयी राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक है कि पर्वतीय हिमालय विकास मंत्रालय की स्थापना की जाए।  मैं माननीय प्रधानमंत्री जी से अनुरोध करता हूं कि “हिमालयन विकास प्राधिकरण ” आवा अलग से “हिमालय पर्वतीय विकास मंत्रालय ” की स्थापना कर समस्त पर्वतीय राज्यों को उनमें सम्मिलित कर विशेष योजना बनायें ताकि इन राज्यों में आर्थिक पिछड़ापन दूर हो सके।

          उत्तराखंड राज्य के निर्माण को लगभग 10 वर्ष बीत चुके हैं किंतु अभी तक उत्तर प्रदेश राज्य के साथ परिसम्पत्तियों का बंटवारा नहीं हो पाया है जिससे उत्तराखंड राज्य का विकास अवरूद्ध हो रहा है।  मैं माननीय प्रधानमंत्री जी से अनुरोध करता हूं कि वे उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्रियों के साथ एक बैठक आहूत करें जिससे परिसम्पत्तियों का बंटवारा हो सके।

          उत्तराखंड राज्य का औद्योगिक पैकेज वर्ष 2013 तक स्वीकृत था किंतु इस पैकेज को मार्च, 2010 तक ही सीमित कर दिया गया है।  राज्य में 32 हजार करोड़ का औद्योगिक निवेश हुआ है। मेरा वित्तमंत्री जी से निवेदन है कि इस औद्योगिक पैकेज की सीमा बढ़ा दें ताकि राज्य का विकास अवरूद्ध न हो।

          मैं बजट प्रस्ताव का समर्थन करता हूं।

 

 

 

 

 

 

 

 

*श्री जगदीश ठाकोर (पाटन)ः वर्ष 2009-10 विश्वव्यापी मंदी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण साल रहा है।  वित्त मंत्री जी ऐसे समय में ये बजट लेकर आये हैं जबकि आवश्यक खाद्य पदार्थों के मूल्यों में 18 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है।  वर्ष 2008-09 की दूसरी छमाही में देश का सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर, पिछले 3 सालों के औसत 9 प्रतिशत से कम होकर सिर्फ 6.7 प्रतिशत रह गई।  ऐसे में वर्ष 2010-11 के बजट के सामने काफी चुनौती भरा माहौल है।

          इस बजट में वर्ष 2010-11 के लिए 11,08,749 करोड़ रुपए का बजट अनुमान प्रस्तुत किया गया है जो 2009-10 के कुल बजट व्यय से 6 प्रतिशत अधिक है।  इसका एक स्वागत योग्य पहलू यह भी है कि इसमें सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के बजट आवंटन में 80 प्रतिशत वृद्धि की गई है, किंतु दूसरी तरफ इसका दुखद पहलू यह है कि इसमें विशेष संघटक योजना (एस.सी.पी.) में तयशुदा राशि की तुलना में दलित वर्गों को 25,430 करोड़ रुपए और ट्राइबल सब प्लान के तहत आदिवासियों को 11,565 करोड़ रुपए के आवंटन से वंचित रखा गया है।  इसके सा ही एस.सी.पी. और आदिवासी विशेष योजना (टी.एस.पी.) के कार्यान्वयन में तेजी लाने का कोई संकेत नहीं दिया गया है।  इस तरह देखा जाये तो यू.पी.ए. के इस बजट से अनुसूचित जातियों/जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, दलितों और मुस्लिमों को जो स्पेशल कंपोनेंट प्लान के अंतर्गत अनुसूचित जातियों के लिए 2,84,284 करोड़ रुपए और ट्राइबल सब प्लान (टी.एस.पी.) के तरह आदिवासियों के लिए 23311.29 करोड़ रुपए नियत किए जाने थे।

          दो एजेंसियों, नामतः राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम (एन.एस.सी.एफ.डी.डी.) की योजनाओं के लिए औसतन 14393 रुपए और राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त विकास निगम की योजनाओं के लिए औसतन 12892 रुपए वितरित किए जाते हैं।  इससे यही लगता है कि ये योजनाएं बहुत पुरानी हैं और ठीक से नहीं बनायी गयी है।  शिक्षा विकास संबंधी योजनाएं भी एक प्रकार से दलितों का मजाक भर है।  प्रीमैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए 77 रुपए की छात्रवृत्ति है, पोस्ट मैट्रिक के लिए 160 रुपए और उच्च शिक्षा के लिए 1551 रुपए मासिक छात्रवृत्ति है।  इन सबकी राशियों को बढ़ाया जाना चाहिए।

          जिन 83 विभागों/मंत्रालयों के लिए योजना आवंटन हैं, उनमें से …………… वार्षिक योजना व्यय में से एस.सी.पी. और टी.एस.पी. के लिए निधि आवंटन किया…………. और रोजगार मंत्रालय, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, बायोटेक्नोलॉजी विभाग, कृषि और सहकारिता विभाग, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, संस्कृति विभाग, कपड़ा मंत्रालय और सार्वजनिक वितरण विभाग ने अपनी बजट राशि की 5 प्रतिशत से भी कम राशि एस.सी.पी. और टी.एस.पी. के लिए आवंटित की है। यदि कोई उच्च विकास वाले विभागों के आबंटनों का विश्लेषण करे तो इनमें एस.सी./एस.टी. के विकास के लिए नाममात्र की योजनाएं हैं।

          देश में बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए कुल योजनागत आबंटनों की 46 प्रतिशत से भी अधिक राशि का प्रावधान है।  किंतु अफसोस कि जिन मंत्रालय/िवभागों का मैंने जिक्र किया उनमें टी.एस.पी. या एस.पी.पी. के तहत दलितों के लिए कोई धनराशि आबंटित नहीं की गयी है।

          इसी तरह जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन का लक्ष्य 2022 तक 20000 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता तैयार करने का है।  इसके लिए नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के योजना परिव्यय को 2010-11 में 61 प्रतिशत बढ़ाकर 1000 करोड़ रुपए कर दिया गया है।  किंतु इसमें भी एस.सी./एस.टी. के लिए कोई राशि आवंटित नहीं की गयी है।  उनकी ऐसी उपेक्षा क्यों की जा रही है।

          सामाजिक क्षेत्र में भी 2010-11 के प्लान आउटले को बढ़ाकर 1,37,674 करोड़ रुपए कर दिया गया है, किंतु इसमें भी एस.सी./एस.टी. के 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को उनका शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए अलग से कोई बजट प्रावधान नहीं किया गया है।

          ग्रामीण क्षेत्र में अवसंरचना निर्माण और रोजगार सृजन के लिए बजट आवंटन को 4000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 66,100 करोड़ रुपए कर दिया गया है किंतु ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस राशि की केवल 7.5 प्रतिशत राशि एस.सी.पी. के लिए नियत की है।  दूसरी ओर नरेगा के लिए 2010-11 के लिए 40100 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।  किंतु नरेगा के भारत के सारे जिलों में विस्तार को देखते हुए और इसके दलित लाभार्थियों की विशाल तादात को देखते हुए यह राशि काफी नहीं है।  

          इसी प्रकार शहरी इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए स्वर्ण जयंती रोजगार योजना का एलोकेशन 75 प्रतिशत बढ़ाकर 5400 करोड़ रुपए कर दिया गया है और आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन विभाग का एलोकेशन 150 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 2010-11 के लिए 1000 करोड़ रुपए कर दिया गया है, किंतु इन दोनों के अंतर्गत भी एस.सी.पी. या टी.एस.पी. के लिए कोई धनराशि आवंटित नहीं की गयी है।

          इसी तरह 726 करोड़ रुपए की बजट राशि पाने वाले पर्यावरण और वन मंत्रालय ने अपने नेशनल क्लीन एनर्जी फण्ड के तहत एस.सी./एस.टी. समुदायों के लिए कोई वित्तीय प्रावधान नहीं किया है जबकि ये गरीब तबके ही पर्यावरणीय बदलावों और प्रदूषण के ज्यादा शिकार होते हैं।

          केन्द्रीय बजट से 15875 करोड़ रुपए पाने वाले रेल मंत्रालय ने, जिसमें नौकरियां देने और टेंडर जारी करने की अपार क्षमता है, एस.सी./एस.टी. कल्याण के लिए कोई धनराशि का प्रावधान नहीं किया गया है।

          इन सब हालातों को देखते हुए मेरा केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि वह योजना आयोग को यह निर्देश दे कि वह एस.सी.पी. और टी.एस.पी. को इनके दिशानिर्देशों के अनुसार धनराशि का आवंटन सुनिश्चित करे।  इसके साथ ही बजट प्लान करते समय दलित और आदिवासी संगठनों से सलाह मशविरा किया जाये।  एस.सी.पी./टी.ए.पी. को अधिनियम का रूप दिया जाये जिसमें दलितों के हकों को साफ-साफ परिभाषित किया जाये और उनकी इन योजनाओं से संबंधित शिकायतों के निवारण की व्यवस्था हो।  सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय और आदिवासी कार्य मंत्रालय विभिन्न योजनाओं के कार्य निष्पादन की समीक्षा करके ही अलग-अलग योजनावार आवंटन करें और टी.एस.पी./एस.पी.सी. के लिए एक लिंक बजट बुक बनायें।  इसके अलावा प्रत्येक मंत्रालय में सर्व समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए एस.सी.पी./टी.एस.पी. के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त जनशक्ति और वित्तीय संसाधन होने चाहिए।  सभी मंत्रालयों/िवभागों मं एस.सी.पी के लिए माइनर कोड 789 और टी.एस.पी. के लिए माइनर कोड 796 खोला जाए।  सभी मंत्रालयों/िवभागों में टी.एस.पी./एस.सी.पी. मॉनीटरिंग कमेटी बनायी जाये जिनमें शिक्षित एस.सी./एस.टी., ओ.बी.सी. और माईनोरिटी युवाओं को सदस्य बनाया जाये।  ऐसी समितियां जिला, राज्य और केन्द्रीय स्तर पर इन योजनाओं की आयोजना और कार्यान्वयन पर निगरानी रखे।

          मैं आशा करता हूं कि वित्त मंत्री जी मेरे इन सुझावों पर विचार करेंगे और समाज के ओ.बी.सी., माइनोरिटर दलित और उपेक्षित वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर बजट में स्पेशल कांपोनेन्ट प्लान और ट्राइबल सब प्लान के लिए समुचित वित्तीय व्यवस्था करेंगी।

 

1.       पूरे विश्व में तीन साल वैश्विक मंदी रही है।  सभी देशों में बैंकों और आर्थिक संकटों ने कई देशों की दशा बिगाड़ दी है।

2.       1972 के वर्षों में जो सूखा था।  उसके भारी सूखा का सामना हम कर रहे हैं।  धान-गन्ना दलहन की कम मात्रा में पैदावार हुई – कई जगहों पर भारी वर्षों के कारण जनजीवन प्रभावित रहा – खेती विमाल रण।  खेती पैदावार नष्ट हो गयी।  पूरे देश में बैंक के विफल न हो उसके लिए कदम उठायें – समय-समय पर चर्चा करके परिस्थितियों को सुधारा।

3.       खेती पेदसों के भाव किसान को ज्यादा दिया गेंहू-चावल-कपास सपोर्ट प्राइस काफी दिया किसान को लूटने नहीं दिया।

4.       किसानों के 7000 करोड़ के ऋण माफ किए खादों में सब्सिडी दी, महाराष्ट्र-आंध्रा-केरल में सहायता दी। 2008-09 में 2,80,000 करोड़ के ऋण अलग से दिय – अबकी बार – 3,18,000 करोड़ के किसानों को ऋण देने जा रहे हैं।  5औ से किसानों को ऋण देने का फैसला।  देश के रूप में बड़ी आबादी वाला फसल को और रोजगार देने वाले किसान की हमारी सरकार ने हर तरह से संभाला और किसान खुशहाल रहा – और दुबारा फिर हमारी सरकार बनी।

5.       अल्पसंख्यक समुदाय के लिए – सचर कमेटी के सिफारिशों को लागू किया – शिक्षा में उत्थान किया – छात्रवृत्ति में अल्पसंख्यक समुदाय के 40 लाख छात्रों को लाभ होगा।  15औ अल्पसंख्यक वस्तियों में स्कूल खोले गए या स्कूल के कमरे बनाये अल्पसंख्यक बस्तियों की सुविधाओं अच्छी करने का प्रबंध किया – बैंक ऋण का लक्ष्यांक 15 प्रतिशत रहा।  हमारी सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए 1700 करोड से बढ़ाकर 2600 करोड़ बजट में आवंटन किया है।  गुजरात में प्रीमैट्रिक छात्रों की स्कॉलरशिप का जो पार्टी है जो गुजरात सरकार नहीं देता है।  इसके हिसाब से काफी छात्रों को स्कॉलरशिप नहीं मिली है।  सुझाव या गुजरात सरकार पर हमारी सरकार करें।

– गंगा नदी हमारी भी है।  करोड़ों ऋद्धालुओं की आस्था है।  गंगा नदी मिशन में 500 करोड़ का बजट में आवंटन किया है।  कुल राशन का आवंटन का 12औ है।  सरकारी नौकरियों में तीन वर्षों के दौरान वृद्धि

 

          आज सारा देश आतंकवाद से ग्रस्त है विशेषकर ने प्रदेश ने बम धमाके, नरसंहार किये हैं।  इन सब बातों को ध्यान में रखकर समय-समय पर पुलिस आधुनिकीकरण इत्यादि पर विचार तथा चर्चा हुई किंतु मैं सदन को वास्तविक स्थिति से अवगत कराना चाहता हूं।

 

शस्त्र का नाम

शस्त्रों की आवश्यकता

वर्तमान शस्त्र

शस्त्र की कमी

प्रतिशत

1.

9 एम.एम. मशीनगन

7278

2320

4956

68औ

2.

एम.पी. मशीनगन

300

65

235

78औ

3.

7.62 एस.एल.आर.

11233

3672

7571

67औ

4.

7.62 ए.के. 47

1500

1033

463

31औ

 

          गुजरात पुलिस के पास वर्षों पुराने हैं।  इसके अतिरिक्त गोला बारूद, कारतुसों की कमी है।  राज्य के आठ जिलों में तो टियर गैस के गोले तक नहीं है जिन जिलों में है वह 7 वर्ष पुराने है।

          राज्य में ए.टी.एस. का गठन हुआ उसमें सेक्शन 64 पदों में मात्र 39 कर्मचारी कार्यरत है।  इन अधिकारियों एवं कर्मचारियों को कोई विशिष्ट प्रशिक्षण नहीं दिया गया।

          गुजरात पुलिस के पास संचार साधनों, वाहनों, आधुनिक शस्त्रों, फिंगर प्रिंट आइडेंटिफिकेट सुविधाओं का अभाव है।  राज्य सरकार ने जो कुछ नए वाहन खरीदे हैं उनका उपयोग उच्च अधिकारियों करते हैं।  दूर-दराज के गांव, ब्लॉक में टू-व्हीलर, फोर-व्हीलर आतंकवादियों से मुकाबला करने में सक्षम हैं।

 

THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Madam Speaker, at the outset I would like to express my gratitude and deep appreciation to all my colleagues to have participated in the General Discussion on the Budget. Today, after the decision of the august House, the first phase of the budgetary exercise will be over and the second part of the Session will take up the remaining part of the budgetary exercise.

          Madam Speaker, first of all I would like to point out that though the Budget is, as per the language of the Constitution, an Estimated Annual Statement of Receipts and Expenditure, but it is also a political document because it reflects the economic philosophy of the Ruling Party. It is also conditioned by various factors influencing the economy. Therefore, when the Finance Minister formulates the budgetary proposals, obviously he receives inputs from various sections of the society through the informal consultation process and also through the broad parameters about the availability of resources, priority sectors of spending as determined by the Planning Commission while formulating and finalizing the Five Year Plan. There was a time when normally the tenure of the Government and the Five Year Plan period used to synchronize, but now-a-days it is not possible. That is why, in this term, we started during the 11th Plan and it will be extending up to the 12th Plan. These issues are to be kept in mind while formulating the Budget, its relevance and its efficacy.

          Firstly I would like to deal with the concerns which the hon. Members have expressed in respect of certain areas, particularly inflation, agriculture, fuel prices and whether the Budget helps the Aam aadmi and it addresses the problems of infrastructure. A distinguished Member of the Opposition, the former Finance Minister Shri Yashwant Sinha raised some questions as to whether the fiscal deficit, which I have projected in my Budget, is realistic or not. In addition to that, certain other issues have been raised. I will try to cover those issues within the time at my disposal.

          I would like to start by making a general observation that the test of pudding is in eating. If I claim modestly that the situation of uncertainty which prevailed at the time of presentation of the Budget in last July is no longer relevant, perhaps, I am correct.

 

17.00 hrs.

 

With the humility at my command, I will say that I am correct, in the sense that I presented the Budget at the backdrop of the GDP growth of 5.8 per cent at the last quarter of the preceding year, the adverse impact of the international financial crisis; stimulus package which we had to inject in the systems in three instalments; and when I look at it despite the fact of deficient monsoon, drought like situation in large parts of the country, estimated shortfall of kharif crop to the extent of 15 million tonnes to 18 million tonnes, perhaps we can most humbly claim that there is a turn around.

          The 7.2 per cent is not my pipe dream, though I have given up smoking pipe.  But it is the reality.  It is the reality because today I have just received the index of industrial production. In January 2010, both IIP and manufacturing crossed the ten per cent barrier for the fifth time in the current financial year and transcended the 15 per cent mark for the second month consecutively.   The IIP grew at 16.7 per cent in January 2010 compared to one per cent in January 2009; cumulative growth in IIP during April-January 2009-10 stood at 9.6 per cent, close to double digit figure.  Therefore, Mr. Sinha may be assured that the growth is just not merely Government expenditure driven growth, but manufacturing and industrial production is also contributing in the growth.

          The problem of inflation is inflation is on the ground.  It is recognised.  When I formulated the Budget Proposals I knew it is there.  In January, it has reached 8.56 per cent; in March, it may be a little more.  We have discussed it. On the 25th, the day before presenting the Budget, we discussed it and I intervened.  But inflation is not detachable from the economy; it is an integral part of the system.  It is just not like a shirt that you take off, clean it and then again put it. 

We have taken steps to remove the supply bottlenecks.  We have kept the import cap open, reduced the import duties. We are trying to improve the supply of edible oil, pulses to protect the vulnerable sections of society. We have provided the subsidised scheme to have availability in the market.   About three million tonnes of wheat and one million tonnes of rice have been made available to the States for the open market sale.  These measures have already been taken.  These issues have been discussed in detail in the Conference of the State Chief Ministers taken by the Prime Minister.  Therefore, if somebody believes that merely expressing our intention or high decibel rhetoric would reduce prices, it is not correct.

 Corrective economic steps are to be taken, and we have taken those steps.  I would just like to point out a couple of things.  As I was mentioning, it is just not the detachable part of the economy, I cannot take a myopic view about the redressal to the problem of inflation. What happened?  I had the experiences.  That was during the regime of the NDA, in the five consecutive months from October 2000 to February 2001, the inflation of the fuel, power related products was above 30 per cent.  Such high fuel inflation was neither before, nor after.  And it is not as if, through this, we were getting higher growth. The growth rate remained at just a paltry four per cent.  I did not want to commit that mistake, and I hope I have not made that mistake.  I have taken a holistic view.  We have created incentives to boost the growth rate, increased productivity specially in agriculture on which I shall come in greater details later on, and rolled back deficit which will cause inflation to come down. 

For instance, it has been pointed out by Yashwant Sinha ji, that how you assume four per cent rate of inflation while projecting the numbers for the year 2010-11.  After all, when we formulate the proposals, we estimate.  These are estimations; these are not actuals.  Experts give the input; we discuss and we arrive at.  A knowledgeable Member like him is fully aware of it.  If you look at the full twelve-months’ cycle, you will find that in some months there has been less, in some months there has been more, and particularly this year.  Last year around this time, there was a negative rate of inflation so far as WPI is concerned.  When you take into account the twelve-months’ cycle, then you will find that it is possible and the twelve-monthly average would be much less than the part of the year.  That is the basis on which we have taken four per cent.  You need not consider that there has been some bungling.  

          You have suggested that the domestic savings rate is falling.  Perhaps, most respectfully, I would like to submit for the consideration of the House that we really made a breakthrough in the rate of domestic savings.  The spokespersons of the principal Opposition Party, former Finance Minister, jokingly told me that he had learnt from me the correlation between ICOR, domestic savings and growth.  I respectfully acknowledge his compliments given to me. But the short point which I am trying to drive at is that the rate of domestic savings we entered into was above 30 per cent from 2004-05 and there has been continuously upward movement. If you look at the figure, in 2008-09, it came down to 3.9 per cent, from 36 per cent above to 32.5 per cent. You were mentioning 390 basis; 390 basis sounds nice.  If you talk of 3.9 per cent, it sounds less dramatic; I have no problem.

          That is the politics which you can indulge in. But the fact of the matter is that it had not come down during these six years’ period below 30 per cent.  That is why, I have taken various steps, and I am confident that it would be possible to reach the target rate of 36 per cent of the domestic savings. 

          Now, you are saying, claiming that agriculture has been neglected.  Most respectfully I will like to submit that it is your choice; it is your option whether you will boycott, walk-out at the time of the Budget speech before the Finance Minister completes it.  It is your decision, and I have no comment on it.  But you should have listened to the last part of my observations wherein I have announced a series of measures to boost agriculture, agricultural productivity, preventing wastage, expanding the credit facilities and also helping the processing industries; series of excise duty concessions; series of customs duty concessions.  You weed out that portion of my speech.  You chose not to listen to that part, and it is your choice. 

I have devoted 11 paragraphs, three full pages, in my speech on agriculture – production; reduction in wastage of produce; credit support; and thrust to the processing sector.  Here I would like to make a small comparison because we have been accused that this is anti-farmer; we are against the peasants; and we are against agriculture. During your period of six years, the Central Plan outlay for Agriculture and Allied Sector increased from Rs.2,777 crore in 1998-99 to Rs.3,671 crore in 2003-04.  During our period of six years, it increased from Rs.4,799 crore in 2004-05 to Rs.12,308 crore in 2010-11.  I know that you will immediately get up and say: “Mr. Finance Minister, you are talking up absolute numbers”.  Size of the Plan had increased.  That is why, I will come to the percentage.  Percentage would be same. During that period, your Plan allocation in agriculture increased by six per cent, and during our six years’ period, Plan increase had gone up to 26 per cent.  Therefore, we have to be accused as anti-farmer!

I would also like to point out that the growth in agriculture during the NDA period was 3.2 per cent against 15.5 per cent during the UPA period. This is another important area. I do not say that I have made the provisions required and satisfied fully.  There is deficiency.  I should have done more but what I have done is a little bit. For irrigation and flood control, during your period between 1998-99 and 2003-04, actually your Plan outlay came down from Rs.345 crore in 1998-99 to Rs.275 crore in 2003-04.

It represented an average of negative growth of (-) 3.2 per cent.  We are accused that we are anti farmers, we are not making adequate provisions for agriculture when during our period, instead of (-) 3.2 per cent, it has increased by positive 7.4 per cent. We are accused that nothing has been done for aam admi; it is anti-aam admi; it is anti farmers.  Has nothing been done for aam admi? During these six years period, we have given the Right to Entitlement, which is not in words, not in commitment.  Backed by the legal rights, we have given the people Right to Know; we have given the people Right to Job; we have given the people Right to Education; and we are going to give the people Right to Food. Nothing has been done for the aam admi!

          I would request my friends, please show me one year Budget allocation on the Plan where Rs. 1, 37,000 crore, 37 per cent of the total Plan outlay has been spent on the social sector.  If you take into account the total expenditure of Rs. 3,73,000 crore of Annual Plan for this year, Rs. 1,37,000  odd crore is for the social sector, Rs. 1,74,000 crore is for infrastructure of which 25 per cent is for the rural areas.

          Some criticism has been made as to why we have not increased the allocation, why there is an increase in allocation for the NREGA from Rs. 39,000 crore last year to Rs. 40,000 crore this year.  Of course, I consulted my colleague, the Minister In-charge and I asked him, “how much will you require?”  He said, “This will meet my requirement.”  Moreover, it is the legal entitlement.  I am legally bound to give job.  As much money will be required to provide job seekers under the NREGA, Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme, the Government is obliged to give that money whether it is allocated in the Budget or not. Additional Supplementary Grants will be made because this is backed by the legal rights.  There is a 48 per cent increase for the Bharat Nirman Programme.  Are these not for aam admi?

          When we increase the agricultural credit from Rs. 2,80,000 crore to Rs. 3,75,000 crore, the farmers of this  country are not part of aam admi! I provide that those who are having short-term crop loan and paying in time, the interest subvention would be to the extent of two per cent. The normal interest rate is seven per cent but if he pays in time, it would be five per cent. What is the demand of the farming community?  It is to bring it down to four per cent.  Is it not nearer?  Is it not helping aam admi?

          Another aspect, Madam Speaker, where I would like to draw your attention is about the provisions, which we have made, which is also related to the social security, and which directly affects the common people, is the unorganised sectors. We have just now demonstrated on the streets that rights to the unorganised sectors are to be protected.  We have taken positive steps. I have created the Fund, which will help the unorganised sectors.

          Law has been passed. The fund has been created to implement the various schemes related to the unorganised sector

          I have taken another small step, to my mind, but it has immense potentialities. I am grateful to the Government of Karnataka and to the Government of Haryana. Before I reply to the debate on the General Discussion on Budget, they have responded to my call when I requested all the State Governments from this place that you also please make your contribution to the New Pension Scheme to which I have allocated Rs.100 crore. It will give benefit to 10 lakhs people this year. The Karnataka Government has agreed to provide Rs.1200 per year to each pensioner. The Haryana Government has also extended this scheme by contributing Rs.100 per month for each such person. I am confident that other State Governments will also follow this.

These are meant for the aam aadmi.  These are not meant for amirs. Therefore, we have made efforts. It is not that all the problems have been solved. Budget has been described as anti-inflationary. I do not rule out the possibility that when we increased the duties, there will be some impact on the prices. But is there any way, any carpet under which we can keep this? If the prices of imported energy, fuel, increased, is there any way in which we can keep in a basket where there will be no impact? I would love to have that.

          I made a little bit research work. I am not going back to the days of first world crisis in 1973, second world crisis in 1979 and third world crisis in 1989. I confined my research work to just between the preceding six years of our coming to office and the six years what we have done. I would like to share that piece of information with my distinguished colleagues.

Yes, I have admitted that I have enhanced the customs duty and excise duty on crude and petroleum products and it would have some impacts. We have calculated that all the taxation proposals, to which I shall come a little later on, have some impact on the prices. They are calculating at 0.4 per cent. Let us see how it goes. But the short point which I am trying to drive at is this. During the NDA regime from March, 1998 to May 2004, what was the average price of the Indian basket of crude? The average price varied from 12 dollars to 36 dollars. From March 1998 to May 2004, in six years, how much have you increased? The price increase was 48 per cent in respect of petrol. The increase in diesel price was 112 per cent. The increase in kerosene price was 258 per cent.… (Interruptions) From Rs.2, it was increased to Rs.9. I am accused.

          Even you resort to walk out the moment I mention about the enhancement of the customs duty on diesel and petrol. What is the average price of Indian crude today? It is varying from 36 dollars to 118-184 dollars per barrel. How much have I increased? The increase in petrol was nearer to you. You increased 48 per cent. I am short of that,  41 per cent but nearer to you.

          On diesel, you increased the price by 112 per cent and we have increased it by 63 per cent. On kerosene, you increased it by 258 per cent and we increased by only two per cent. The price was increased by Rs. 0.29 and you have increased from Rs. 2 to Rs. 9 per litre. It did not have any impact on the people.

          Similarly, during your period, the price of LPG was increased by 78 per cent and during our time we have increased it by 16 per cent. I have made all these calculations taking into account the enhanced price rise which I had to do and using the freight rate which I had to do. Hon. Member Shri Yashwant Sinha and many other distinguished Members of this House, who are knowledgeable Members, know what I did it in my taxation proposals. I did not impose, if I say so, not a single new tax. What did I do? Certain taxes were rolled out. Those taxes were imposed; they were in vogue. Five per cent customs duty on imported crude, one per cent excise duty per litre of diesel and petrol were in vogue. They were imposed and they were in operation. But it was withdrawn as a prelude to the stimulus package because when in June, 2008 the petrol prices rose as high as 127 dollars per barrel, we had to reduce it. 

          Take the excise duty. We have been criticised that we have increased it by two per cent. Yes, I have increased two per cent. But, what was the rate of excise duty? There are four slabs – 14 per cent, 12 per cent, eight per cent and four per cent. As a part of the stimulus package, I reduced the 14 per cent to 8 per cent; I have a duty concession of six per cent in February and July. It was reduced from 12 per cent to 8 per cent; I gave four per cent concession. From eight per cent it was reduced to four per cent on some items; I have four per cent concession. I have simply rolled back a part of it, not the entire amount – not 14 per cent, not 12 per cent; but it was just from 8 per cent to 10 per cent. I had to do this. I had to do this because, as I mentioned, I did not opt for any short-term, short-sighted policies.

          In my Budget speech I have stated, all of you have supported it that as a concept it is excellent, that tax reforms are required. Take the two major components of our tax reforms – direct tax and GST. Are you not aware of your running four-five-six States? Each of the Opposition parties who are participating in this House are running several State Governments. Are they not aware of their States’ finances? Do they not have interaction with their States’ Finance Ministers? Are they not talking on GST? What is their contention on the first point, if we want to achieve GST?

          I appreciate Shri Yashwant Sinha’s point that many of the hurdles are to be overcome and to overcome the hurdles I require your support; not only on the floor of this House but where you are running four-five important State Governments. Their supports are needed and we are constantly in touch with them through the Empowered State Finance Ministers’ Committee. 

          We are discussing with them what we are saying – the basic structure of the GST. If we want to really help the economy,  there are three essential ingredients. These are – the tax rate should be reduced, days of the tax should be expanded, exemption should be limited and as far as possible, there should be Goods and Services Tax at the same date. Surely, the former Finance Minister with his critical analytical mind has gone into this aspect of the problem that I have conveyed a message to the States that I come nearer to you, I want to bridge the gaps which are existing, to expand the area of convergence and to reduce the area of divergence so that the necessary Constitution Amendment can take place and 28 States can arrive at a consensus in respect of the excise duty, in respect of the Service Taxes so that the really revolutionary changes can take place in our indirect tax structures. These things cannot happen just by placing the Alladin’s magic lamp that some demon will come from the heaven and prepare everything for us. We have to prepare the ground. I wanted to convey this message.

          Service Tax is, as hon. Members know, if you exclude abetment, somewhere it is 70 per cent. In regard to housing, it has been stated that Service Tax will greatly affect. Yes, in the real estate sector, Service Taxes have been imposed, but 67 per cent is exempted abetment. Therefore, it remains 33 per cent. Tax is 10 per cent of that 33 per cent. That means it is 3.3 per cent tax that has been imposed. Should we not ponder over what the contribution of the Services today is in the basket of the GDP? GDP consists of Services also and substantially the contribution of Services has increased, has expanded. Therefore, if we want to achieve the real GDP growth, which I am confident that we shall be able to have, we have to do it.

It has been pointed out what we should do with the GDP. Somebody has gone to the extent of suggesting whether people would eat GDP. No, nobody is going to eat GDP, but GDP means more jobs, more income and more wealth. As India’s GDP increased, as tax-GDP ratio increased, it was possible for my predecessor, Shri Chidambaram, to take the decision of waiving the loan to the extent of Rs. 70,000 crore  to benefit more than four crores of people, the farmers of this country. GDP means that. GDP means NREGA.

If we did not have sustainable growth at the rate of nine per cent for three consecutive years and the overall 8.6 per cent growth for the period between 2004 and 2009, it would not have been possible to give three rights to the people which we have already legislated – the Right to Information, the Right to Education and the Right to Job. The next one which is going to be added is the Right to Food. But merely giving the right is not adequate and arrangements will have to be made for food production. We have done exactly that.

It has been pointed out what should be done with Rs. 450 crore for the Green Revolution in the eastern part.

Most respectfully, I would like to point out that this Rs. 450 crore is not the only amount available. This is just the beginning of the concept or the idea. There are so many schemes, and resources are available under so many heads. These are to be integrated. The initial allocation is much less when you begin a new scheme or a new idea. We gave just Rs. 10,000 crore when we started the NREGA. Last year, I gave Rajiv Gandhi Awas Yojana only Rs. 100 crore. The scheme was introduced, and the State Governments were asked whether they were ready to give proprietary right of a piece of land to the slum dwellers. The State Governments have responded, and they have come out. I have stepped-up the outlay from Rs. 100 crore to Rs. 1,270 crore as the scheme has taken off. As regards UID, I had allocated only Rs. 100 crore last year. It was at the stage of concept, and I have increased it from Rs. 100 crore to Rs. 1,900 crore when it is coming to be fruitful to be effectively implemented. This is quite natural in the Budget-making, and there is nothing new in it.

          I have identified 60,000 villages to synchronise with the 60th year of our Republic as pulse and oilseed districts to bridge the gap between the availability and the requirement of edible oil and pulses. The allocation is mere Rs. 300 crore, but the allocations will go on increasing as soon as the scheme will expand. This is the natural practice. I think that the hon. Members should know these things. These are all parts of the Green Revolution.

          I entirely agree, though not with the conclusion of my good old friend Shri Hukmadeo Narayan Yadav that it is anti-farmer, but three basic questions in respect of the agricultural issues, which he raised. He said that areas are shrinking. Shri Yadav, it is bound to happen. I am sorry, Madam. It is bound to happen because the population is increasing. We require land for infrastructure; we require land for housing; and we require land for industries. Therefore, we shall have to take a multi-pronged strategy. We shall have to protect good quality agricultural land and not use it for industries and other purposes. This is one aspect.

         The second aspect is that we shall also have to increase the productivity. What is the idea of this Green Revolution, and taking to the Eastern part of the country? Today, in Punjab, the average yield of wheat per hectare is 4,000 kgs. whereas in most of the States it is below 900 kgs. or 1,000 kgs. or 1,100 kgs. or 1,200 kgs. The technology is available. So, the extension services and the processing industries have to be attached. The agricultural experts of this country have well worked-out plans and schemes. If we put them into operation, then it would be possible to achieve these objectives. Therefore, we require a comprehensive plan and not a knee-jerk reaction.

          Another point that I would like to submit is in respect of the fiscal deficit. Perhaps, you have noticed and here again I would like to say that the taste of the pudding is in the eating. I said that I will keep the fiscal deficit for the year 2009-2010 at 6.7 per cent, and I have kept it at 6.8 per cent. Though, the 13th Finance Commission permitted me to have it at 5.7 per cent for the next year, but deliberately I chose it to be 5.5 per cent. Somebody has doubted about the possibilities of our revenue realisation. I am afraid that here again I may have to make a comparison about the actual performance and what we have been able to do.

Starting from 2004-05, except the most difficult year of 2008-09, these figures are available – they are not in my brain, these are printed figures – every year, we have been able to reduce the fiscal deficit even from our budgetary commitment. The year 2008-09 was an extremely difficult year. On the other hand, except in one year, that is, 2003-04, during the NDA regime, never it was possible to reach even the fiscal deficit target at the level of the BE.

Therefore, please believe us; if you do not believe us, believe our action: what we have been able to achieve. If we are in a position to produce 232 million tonnes of food grains, it is the reality. It is not somebody’s dream or imaginary figure. It is because we paid remunerative prices to the farmers. The farmers got satisfactory prices, and satisfaction is always relative – what appears to be satisfactory today, it will not be satisfactory tomorrow. We shall have to step up further. We shall have to do that.

I do feel that we cannot live on borrowed resources – either domestically or externally. You may describe me as too conservative. Most humbly, I will accept it. But surely, I would not like to have a scenario where to borrow just a few hundred million dollars, I shall have to pledge my gold to any foreign banker. I would not like my country to have that type of economy. Therefore, I shall have to take necessary steps for the fiscal consolidation. I shall have to take the necessary steps to reduce my expenditure and to cut it according to my capacity. I cannot indulge in fancy propositions. Therefore, these aspects are to be kept in view while formulating the budgetary proposals.

SHRI YASHWANT SINHA : You have given brief a number of comparisons. Your challenges are different; our challenges were different. But you are still comparing the two sets of periods? I would like to ask you, “Was there one year during the six years of the NDA when the fiscal deficit touched a high of 6.8 per cent?”  Was there one year? Your predecessor is sitting here. Tell me, was there one year in which the fiscal deficit touched 6.8 per cent.

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Of course, no, Mr. Yashwant Sinha. I am not making comparison in absolute terms. Can you show me a single year…

SHRI YASHWANT SINHA : You have compared absolute numbers, you have compared percentages, but you never once referred to the challenges we were facing. Kargil War did not take place in your time; the East Asian crisis did not take place in your time.

MADAM SPEAKER: Please address the Chair.

SHRI PRANAB MUKHERJEE: I hope the hon. Member has finished his point. Please allow me to respond. In one word, I will respond to you. Can you show me a single year after 1929 that the world had this type of financial crisis? Can you show me a single year in the Indian economy where the Indian Finance Minister had to provide Rs. 1,86,000 crore as a stimuli package to revive, to maintain the sizing down of growth? That is why, hon. Members, I am saying to please remember at the back of your mind from where I began and where I have come.

 

I have to start with a growth scenario as every month it is coming down, every quarter it is coming down. My first object was to arrest it and then to build it up slowly. I have been able most respectively, Madam Speaker, to comment that I have been able to do so. With these words, I thank you, Madam Speaker, once again. I would like to make one point that if in my observations I have hurt anybody’s sentiments and feelings, it is not my intention. I apologise for that. I have no intention of that. I wanted to place the facts, bare facts before the House. Thank you Madam Speaker.

MADAM SPEAKER: Thank you hon. Finance Minister.

SHRI YASHWANT SINHA : Madam, I started this debate. I have a request to the hon. Finance Minister. All of us sitting on this side of the House have made one demand. And that demand is, we do not mind if he has raised the Central Excise by two per cent or if he has raised the Service Tax in some areas. But the most dangerous proposal that he has made in the Budget and already implemented is the price rise of petroleum products especially of diesel, which will have a cascading effect on prices across the entire economy. We had demanded that he would withdraw that increase in petroleum prices. All of us have demanded that. And I would like to know specifically from the Finance Minister whether he has, he is and he will agree to withdraw the increase in diesel prices or not.

SHRI BASU DEB ACHARIA :  And the prices of fertilizers also… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Shri Basu Deb Achariaji, this is not done.

… (Interruptions)

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Madam, I would have loved to respond to the request of the hon. Members from the Opposition. But my financial condition does not permit me to do so. Therefore, kindly excuse me if I am unable to do so. … (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Please let us have order in the House. Nothing will go on record.

(Interruptions) … *

 

17.47 hrs.

 

At this stage Shrimati Sushma Swaraj and some

other Hon. Members left the House.

 

 

SHRI BASU DEB ACHARIA :  We had demanded roll back in the prices of petrol, diesel and fertilizers. As a protest, we are walking out.

 

17.48 hrs.

 

At this stage, Shri Basudeb Acharya, Dr. Raghuwansh Prasad Singh

and some other Hon. Members left the House.

MADAM SPEAKER: I shall now put the Demands for Grants on Account (General) for 2010-2011 to the vote of the House.

         

The question is:

 “That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the third column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, on account, for or towards defraying the charges during the year ending the 31st day of March, 2011, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 1 to 33, 35, 36, 38 to 62, 64 to 74, 76, 77 and 79 to 105.”

 

The motion was adopted.

 

… (Interruptions)

17.49 hrs.

 

At this stage, Shri Rewati Raman Singh

and some other Hon. Members left the House.

 

… (Interruptions)

 

 

 

MADAM SPEAKER: I shall now put the Supplementary Demands for Grants (General) for 2009-2010 to the vote of the House.

          The question is:

 “That the respective supplementary sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the third column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2010, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 1 to 4, 7, 9, 11 to 17, 19 to 21, 23 to 25, 28 to 33, 35, 39 to 41, 43 to 47, 49, 51, 53 to 55, 57 to 60, 65, 67, 71, 72, 74, 76, 80, 82, 83, 85, 86, 88, 92, 93, 95 to 101 and 103 to 105.”

 

The motion was adopted


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