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Lok Sabha Debates
Combined Discussion On The Budget (General) For 2009-2010 And … on 10 July, 2009

Title : Combined discussion on the Budget (General) for 2009-2010 and Demands for Excess Grants Nos. 16 and 22 in respect of Budget (General) for 2006-2007.

श्री सन्दीप दीक्षित (पूर्वी दिल्ली):   धन्यवाद स्पीकर महोदया जी, कल शाम मैंने बजट पर समर्थन भाषण की शुरूआत की थी। मुझे कुछ समय मिला था, मैं आपको धन्यवाद करता हूं कि आज उसे पूर्ण करने का आपने मुझे मौका दिया है। मैं तीन बातों पर अपने विचार रखना चाहूंगा। प्रथम, बजट पर माननीय वित्त मंत्री जी ने जो बातें पेश की है और जिस आर्थिक परिप्रेक्ष्य में यह बजट प्रस्तुत किया गया उस पर अपने विचार रखूंगा। दूसरा, कल माननीय लालू जी ने तथा बहुत से वक्ताओं ने बड़ी खूबी से कृषि पर अपनी टिप्पणियां कीं और एक वर्ग जो बहुत समय से इस बात को महसूस कर रहा है कि चाहे बजट हो या सरकार के सकारात्मक कार्यक्रम हों, ऐसे वर्ग अभी भी सरकार के सकारात्मक कार्यक्रमों से अपने को परे समझते हैं, उस पर टिप्पणी देना चाहूंगा। अंत में जो वित्त मंत्री जी ने प्रशासनिक सुधारों की बातें बताई और प्रशासनिक सुधारों से संबंधित अपने वक्तव्य बजट में दिये, उस पर संक्षिप्त में अपनी बात कहूंगा। [r4] 

            महोदया, मैंने यह बात जरूर कही कि आर्थिक मंदी के दौर में आज भी भारत ने 6.7 प्रतिशत की प्रगति प्राप्त की है। दूसरे देशों में कहीं एक प्रतिशत, कहीं दो प्रतिशत बदलाव आया, बल्कि कुछ देशों में नकारात्मक प्रगति हुई है, उससे बचा कर हमने अपने आपको रखा है। इसके लिए प्रधानमंत्री जी, भूतपूर्व वित्त मंत्री चिदम्बरम जी और वर्तमान वित्त मंत्री प्रणब जी का बहुत योगदान रहा है, इसके लिए मैं उनकी सराहना करना चाहता हूं। हमें मालूम है कि इस समय भी दुनिया में मंदी चल रही है और बहुत कठिन दौर से हमारी सरकार को हमें मंदी के दौर में से निकालना पड़ेगा। प्रणब साहब ने, सरकार ने इस बारे में जो भी प्रमुख कदम उठाए हैं, भले ही हम लोगों का वित्तीय घाटा, चाहे फिसकल डेफिसिट हो, रेवेन्यु डेफिसिट हो जो एक, दो, तीन या साढ़े तीन परसेंट रहा करता था, वह बढ़ कर 4.8, 6.2 और 6.8 हुआ है। इससे आगे आने वाले समय में हमें कुछ दिक्कत आएगी, लेकिन इस बात को सारे वित्तीय सलाहकार, सारे विशेषज्ञ जानते हैं कि जब विपदा आती है, तो उस समय साहसिक कदम उठाने की आवश्यकता होती है। हमारे वित्त मंत्री जी ने दो रूपों में साहसिक कदम रखे हैं, मैं उनका उल्लेख करना चाहूंगा। एक तो त्वरित कदम उन्होंने रखे, जिसमें तकरीबन 186000 करोड़ रुपयों का हमारी इंडस्ट्री को सहयोग दिया, एक तरफ पब्लिक स्पैंडिंग पर, ग्रामीण इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर पैसा देने की बात कही और दूसरी तरफ हमारे एक्सपोर्ट और दूसरे जगहों पर हमें सहयोग दिया, मेरे हिसाब से इन्होंने 186000 करोड़ रुपया जो खर्च किया था, बहुत हद तक हमारी 6.7 प्रतिशत ग्रोथ का राज है। इसके पीछे इन त्वरित कदमों का हाथ है। देखने में ऐसा प्रतीत नहीं होता है। देखने से ऐसा लगता है कि ये ऐसे दूरगामी कदम हैं, जो कहीं और किए जा रहे हैं, लेकिन इनका सीधा-सीधा प्रभाव जब हमें दिखाई देता है, तब लगता है कि हमारी प्रगति की जो नाव नीचे गिरेगी, वह नीचे गिरने की बजाय ठहरी है और देश की तरफ से समर्थन मिला है कि ऐसे कदम जरूर उठाए जाने चाहिए थे। बहुत से लोग इसमें मीन-मेख निकालेंगे। कुछ कहेंगे कि आपने चार लाख करोड़ रुपए के करीब बैंक से पैसा उठाया है, उसे हम कैसे वापिस करेंगे। हमारा इंटरेस्ट बिल करीब 170000 करोड़ के करीब था, अब 211000 करोड़ रुपए हो गया है, उसका पैसा कहां से आएगा। मैं कहता हूं कि जब वह समय आएगा, तब आएगा। आज के समय में सबसे पहले हमें देश को संभालना है, जिसे हमारे वित्त मंत्री जी ने बहुत बखूबी से संभाल रखा है। दूसरे उसके साथ-साथ दुनिया के दूसरे देशों में जो कदम उठाए जा रहे थे, जैसे इंडस्ट्री को सीधे पैसा दिया जा रहा था, कहीं बैंकों को उबार कर लाया जा रहा था, जिन देशों की प्रणालियां यह समझती थीं कि प्राइवेट सैक्टर ही एक निदान है, उसी सोच पर आज भी चल रही थीं, उन सबके विपरीत वित्त मंत्री जी ने इस सार्वजनिक पैसे का इस्तेमाल किया है, वह इनकी योग्यता दर्शाता है। एक तरफ सीधे-सीधे इंडस्ट्री को पैसा देने की बजाय उन सैक्टर्स में, एक इक्नोमिक मैसेज दिया है, चाहे अपनी वित्तीय प्रणाली को बदल कर, चाहे आरबीआई द्वारा इंटरेस्ट रेट्स को ऊपर-नीचे करके, चाहे टैक्सेशन को बदल कर, जो संकेत दिए और जब आर्थिक व्यवस्था में ये संकेत गए, उनके जाने से हमारे कई सैक्टर संभले, उसके लिए मैं वित्त मंत्री जी की सराहना करना चाहूंगा।

          वित्त मंत्री जी ने ज्यादा से ज्यादा पैसा ग्रामीण क्षेत्रों को आवंटित किया, उससे जो ऊर्जा उत्पन्न हुई है, उस ऊर्जा का आने वाले समय में जरूर प्रभाव पड़ेगा। मैंने कल अपनी बात समाप्त करते समय एक पिक्चर की प्रस्तुति की थी, आज चूंकि सदन में और भी सदस्य मौजूद हैं, इसलिए मैं उस पिक्चर की फिर प्रस्तुति करना चाहूंगा, जो दिखाएगी कि इस देश की वित्तीय प्रणाली को संभालने वाले लोगों का क्या रूप रहा है। अगर आप एक गली को देखें, जिसमें आठ-आठ, दस-दस मंजिलों की इमारतें खड़ी होती हैं और भूकम्प आता है तो आप देखते हैं कि अगल-बगल जितनी इमारतें हैं कोई सात प्रतिशत की इमारत है, कोई छह प्रतिशत की इमारत है, कोई चार प्रतिशत की है, वे गिरने के बाद कुछ में तो तहखाने तक ढह जाते हैं अगर उसमें एक बिल्डिंग जिसे हिंदुस्तान कहा जाता है, वह अभी भी पांच या छह इमारतों के साथ खड़ा रहता है। जिस व्यक्ति ने उस इमारत को बनाया था, जिसने उसकी संरक्षा की है, उस व्यक्ति की सराहना तो होनी ही चाहिए। इसके लिए मैं वित्त मंत्री जी की मैं बहुत सराहना करूंगा।

          कल लालू जी ने तकरीबन अपने आधे घंटे के वक्तव्य में अपना दर्द आपके सामने रखा था तथा कई दूसरे वक्ताओं ने भी रखा था। मुझे मालूम है कि पिछले 50-60 सालों के प्रयासों से तबदीली बहुत हुई है, लेकिन आज भी हमारा कृषि वर्ग, ग्रामीण वर्ग कई बार अपने आपको असहाय महसूस करता है। हमें मालूम है कि हमारी कृषि मानसून पर आधारित है। 70 से 80 प्रतिशत पानी तीन महीने के अंदर आ जाता है, इस कारण दूसरे महीनों में दिक्कत आती है। जिस तरह से दुनिया के दूसरे देशों को निरंतर साल भर पानी मिलता है, उसका संरक्षण अच्छी तरह से वे कर पाते हैं।[I5]         वे सब तर्क हैं लेकिन आज भी 9 प्रतिशत7 प्रतिशत की ग्रोथ दर के बाद आज भी दुनिया की 5-6 सबसे सशक्त अर्थव्यवस्थाओं में से होने के बावजूद भी अगर 15-20-25-30 दिन हमारी बरसात पीछे हो जाती है तो हम हिलने लगते हैं। हमारी अर्थ-व्यवस्था में थोड़ा-बहुत कम्पन आने लगता है। इस बात पर जरूर हमें ध्यान देना पड़ेगा। हमारे वित्त मंत्री जी उस समय भी शायद सरकार में थे, मुझे इस बात का पूरा ज्ञान नहीं है। लेकिन उस समय के बड़े अच्छे मंत्री रहे होंगे। सन् 1960 के दशक में भी ऐसी ही कुछ परिस्थतियां इस देश के सामने आई थीं। खाद्य के मामले में हम लोग दुनिया भर के सामने एक तरीके से घुटने टेक कर खड़े हो गये लेकिन तब की प्रधान मंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने, उनके साथ सुब्रहमणियम साहब थे, उनके साथ एम.एस.स्वामीनाथन साहब थे, विशेषज्ञों का एक गुण था जिन्होंने यह संकल्प लिया कि उस देश को जिसको अमरीका की तरफ लालायित नजरों से देखना पड़ता है कि अगर आपके यहां से धान या आपके यहां से खाद्य पदार्थ आएगा तब हम अपने गरीबों को खाना दे पाएंगे। उस परिस्थिति से निपटने के लिए उन्होंने कुछ ऐसे क्रांतिकारी कदम लिये, जिसे बाद में हरित क्रांति कहा गया। उसमें कुछ भी कमजोरियां या कमियां रही हों, वह अलग बात है लेकिन एक एमर्जेंसी के मैजर में और तीन या चार साल के अंदर इसी देश ने इसी देश की व्यवस्था ने, किसानों ने, वैज्ञानिकों ने, मजदूरों ने इस देश को एक फूड डैफिसिट स्टेट से तीन या चार साल के अंदर अगर फूड सरप्लस प्रदेश में बदला है तो क्या उस तरीके की पुन: व्यवस्था इस देश में कोई कर सकते हैं? इस बात का मुझे विश्वास है कि अगर हमारे पास इच्छा-शक्ति होगी तो दूसरी या तीसरी हरित क्रांति लाने में हमें समय नहीं लगेगा। प्रधान मंत्री जी ने कुछ समय से कहा है कि दूसरी हरित क्रांति की आवश्यकता है। लेकिन मुझे थोड़े से अफसोस के साथ इस बात को कहना पड़ रहा है कि वह दूसरी हरित क्रांति हमें दिखती नहीं है। आज भी जहां तक इरीगेशन की बात है, 30 से 40 प्रतिशत के बीच इरीगेटेड लाइन पर अभी भी फंसे पड़े हैं। अभी भी जहां-जहां मुश्किल से दो फसलें होती हैं, वहां हम तीसरी फसल नहीं ला पा रहे हैं। जहां एक फसल होती है, वहां दूसरी फसल नहीं ला पा रहे हैं। आज भी फर्टिलाइजर, पेस्टीसाइड्, और एचवाईवी सीड्स के भीष्म जाल के अंदर हम लोग फंसे हुए हैं। आज भी जबकि बार-बार उदाहरण दिया जाता है कि ऑरगेनिक फॉर्मिंग में भी वही जोर है, वही उत्पादकता है जो हमारी फर्टिलाइजर बेस्ड एग्रीकल्चर में होती है, हम उसकी तरफ बड़े रूप में नहीं जा पा रहे हैं। ऐसा क्यों है? इसी देश में जहां जगह-जगह हमारे विस्तार अधिकारी जा-जाकर हमारे एमएलएज, एमपीज जा-जाकर उस किसान को समझाते हैं कि आप फर्टिलाइजर, पेस्टीसाइड्स और एचवाईवी उन्नत सीड्स इस्तेमाल करिए और इस देश में तीन साल से क्रांति ला दी, क्या हम दोबारा ऐसा प्रभाव नहीं ला सकते? क्या अगर आज हमारी इंडस्ट्री जेगुआर खरीद सकती है और अगर आज हमारी इंडस्ट्री आर्सिलर खरीद सकती है तो क्या आज हमारा किसान अपने आप को दुनिया के सबसे अच्छे किसान के साथ सशक्त नहीं मान सकता? अभी शरद यादव जी ने या किसी ने यह मुझे याद नहीं है, लेकिन किसी ने कहा था कि क्या वह भी समय कभी आएगा जब हमारा किसान भी इंकम टैक्स देने कीडील पर होगा? क्या वह समय भी कभी आएगा जब हम जान पाएंगे कि सामान्य रूप से हमारा किसान भी डेढ़ से दो लाख रुपया प्रति साल कमा पाता है? इस दिशा में मेरा बहुत विनम्रता से निवेदन है कि वित्त मंत्री जी आपको जरूर ध्यान देना पड़ेगा।

          तीसरी बात पर मैं आखिर में आता हूं। वित्त मंत्री जी ने दो-तीन बातों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है। सबसे पहले प्रशासनिक सुधार की तरफ आकर्षित किया है। प्रशासनिक सुधार पर पिछले कई वर्षों से किसी भी सरकार ने सकारात्मक कदम नहीं रखे हैं। पहले पांचवां वेतन आयोग आया था, अब छठा वेतन आयोग आया है। हर बार सब व्यक्ति वेतन आयोगों पर पूरी तरह से चिल्लाते हैं कि यह देना चाहिए। बिल्कुल देना चाहिए लेकिन उसके साथ-साथ जितनी भी गैर-वित्तीय बातें कही जाती हैं, प्रशासनिक सुधार, एकाउंटेबिलिटी, ट्रांसपेरेंसी की बातें कही जाती हैं, उस पर कभी भी कदम आगे नहीं बढ़ाया जाता है। मेरे से बहुत वरिष्ठ यहां सांसद बैठे हुए हैं। मुझे बताएं कि5वें वित्त आयोग के बाद जब हमारे अधिकारियों की सैलरी बढ़ी थी, क्या फील्ड पर उनकी गुणवत्ता भी बढ़ी थी? शायद ही कोई होगा जो यह बात कहेगा कि बढ़ी थी। हम लोग तो फिर भी चाहे कितने भी अच्छे हों या खराब हों, हमें तो जनता हर पांच साल में बताती है कि हम कैसे हैं, नहीं अच्छे होते हैं तो घर बिठा देती है, कुछ काम किया होता है तो आशीर्वाद करके फिर यहां अपनी सेवा के लिए भेज देती है। लेकिन उन अधिकारियों का क्या है, जब भी आप किसी भी सांसद से या विधायक से कहेंगे, वह अपनी तरफ से कितना भी प्रयास कर ले, एक अधिकारी अगर किसी फाइल पर अटक जाता है तो पूरा का पूरा जिला लालायित होकर बैठा रहता है। हमारे कार्यक्रम नहीं बन पाते हैं, हम जो पैसा लगाना चाहते हैं, वह नहीं लगा पाते हैं। वहां कोई तो कदम आगे बढ़े। हमसे कहा जाता है कि हमारी एकाउंटेबिलिटी होनी चाहिए। हम भी कहते हैं कि होनी चाहिए। जितनी है, उससे भी आगे होनी चाहए। अगर हम एक साल में आज अपना इंकम टैक्स का बयान देते हैं, हम कहते हैं कि और करिए, हमारे पीछे सीबीआई लगा दीजिए। हम जनता की आस्था को यहां रखकर आते हैं, एक रुपये की भी गलती करने का हमारे पास अधिकार नहीं है। लेकिन उन लोगों के लिए कि जो अगर10 लाख करोड़ की आज वित्त मंत्री जी ने यहां वित्तीय व्यवस्था बनाई है, इस दस लाख करोड़ में से चार लाख करोड़ जो हमारा प्लान एक्सपेंडिचर है, उसे क्रियान्वित करने के लिए जो फौज खड़ी गई है, उसमें भी गुणवत्ता लाने की आवश्यकता है। 

          माननीय वित्त मंत्री जी ने बजट में इकनॉमिक रैगुलेटरी फ्रेमवर्क की बात कही है। मैं इस तरफ सदन का ध्यान सिर्फ दो मिनट की लिए दिलाना चाहूंगा क्योंकि यह बहुत आवश्यक बात है। आज हम हिन्दुस्तान में धीरे-धीरे कई सेवाएं प्राइवेट प्रणाली को दे रहे हैं। इसे दें, अगर राज्य सरकारों और सरकार को अलग-अलग लगता है कि वे हमारी सरकारी तंत्र से बेहतर काम कर सकती हैं, तो दें। लेकिन मैं दो चीजों के बारे में अपनी बात रखना चाहता हूं कि जब हम ये प्रणालियां प्राइवेट सैक्टर को देंगे तो जनता के हक का संरक्षण किस रूप में होगा? हमें इस बात पर महत्वपूर्ण रूप से ध्यान देना होगा। अगर हमारी बिजली व्यवस्था में वे बिजली वितरित करेंगे, अगर हमारी पानी व्यवस्था में वे पानी वितरित करेंगे तो हमारा संरक्षण कौन करेगा? अगर हमारे यहां किसी चीज की दिक्कत होती है तो सुबह छः बजे नागरिक हमारा दरवाजा खटखटा सकता है। वह विधायकों, मंत्रियों, कलक्टर और एसडीएम के पास जा सकता है। लेकिन अगर प्राइवेट प्रणाली अपना दरवाजा बंद करके टेलीफोन बंद कर देगी तो नागरिक किसके पास जाएगा? आज ममता जी इस हक से कह सकती हैं कि मैं सोशल एकाउंटिबिलिटी को इकनामी से ज्यादा बेहतर मानती हूं लेकिन कोई प्राइवेट सैक्टर का आदमी यह वाक्य नहीं कहेगा, न कहे। लेकिन तब हमारी सोशल वाएबिलिटी कौन देखेगा? जब हम रैगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाएं, तब उसे ऐसे सशक्त बनाएं कि अगर कोई चीज प्राइवेटाइज होती है तो हमारा नागरिक समझे कि हमारे इन्ट्रस्ट का संरक्षण पूर्ण रूप से हो रहा है।

          महोदया, अब मैं आखिरी बात कहूंगा। जब हम कई बार चीजों को प्राइवेटाइज करते हैं तब हम देखते हैं इसमें चेंज आ जाता है और वही चीज बेहतर रूप से काम करने लगती है। ऐसा क्यों है? हमें इसके पीछे कहीं न कहीं, कुछ न कुछ तो देखना पड़ेगा। वही व्यक्ति जब प्राइवेट सैक्टर में चला जाता है तो गुणवत्ता बढ़ा देता है और जब इस तरफ रहता है गुणवत्ता नहीं दिखा पाता है। यही बात दिल्ली एयरपोर्ट की है जब यह दिल्ली एयरपोर्ट अथॉरिटी के अंडर था तब ऐसा लगता था कि पता नहीं कौन से एयरपोर्ट में आ गए हैं, कौन से जहाज में बैठेंगे। लेकिन जब यह प्राइवेटाइज हुआ तब बेहतर सुविधाएं दिखने लगी। इसका मतलब है कि यह सिर्फ प्राइवेटाइज का असर नहीं है, हमारी प्रणालियां सरकार में ही कहीं ऐसी हैं। हमें अपने अधिकारियों को सशक्त करना पड़ेगा ताकि जो गुणवत्ता वे प्राइवेट सैक्टर में रहकर दे सकते हैं वह सरकार के अंडर रहकर भी दें। मैं इस बात को नहीं मानता कि केवल प्राइवेटाइज करने से ही बेहतर गुणवत्ता दे पाएंगे। आप इस बारे में भी थोड़ा विचार करें ताकि वे अधिकारी, जो पब्लिक सैक्टर में अच्छा काम करते हैं, वे भी इसी तरह की गुणवत्ता नागरिकों को दे सकें। अगर हम 51 परसेंट से 49 परसेंट सरकार की शेयर होल्डिंग बदल देते हैं तो वह व्यवस्था या संस्था बेहतर काम करने लगती है। अगर दो परसेंट के बदलाव से इतना बदलाव आ सकता है तो क्या हम अपनी प्रणालियां नहीं बदल सकते ताकि हम पब्लिक सैक्टर को पब्लिक सैक्टर रखकर अपने नागरिकों को वे सब सुविधाएं दे सकें जो एक सशक्त और शक्तिशाली हिन्दुस्तान को अपने नागरिकों को देनी चाहिए।

          मैं इन बातों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं। मैं वित्त मंत्री जी की बहुत सराहना करता हूं और इस बजट का पूरा समर्थन करता हूं। आपने मुझे बोलने का मौका दिया इसके लिए मैं आपका बहुत धन्यवाद करता हूं।

SHRI GURUDAS DASGUPTA (GHATAL): Madam, the Budget is, on one side, too ambitious; on the other side, it is too nominal. The Budget of 2009-10, I concede, has the largest ever outlay of nearly ten lakh crores of rupees, and naturally the credit goes to the present Finance Minister, I admit. But in my humble opinion, it is too inadequate to meet the challenge of economic recession, increasing slowdown, rising job loss, decline in the purchasing power, rising consumer price inflation, and gross agricultural crisis. In this background, therefore, Madam, I feel that the Budget, on one side, is too ambitious; on the other side, it is inconsequential. The 12-million jobs creation promise, I do not think can be realized considering the present economic scenario of the country. The agricultural growth reaching four per cent is unlikely. GDP rise to nine per cent may not be realized.

            Madam, for the first time, in free India, political donation has been made tax exempt in the name of the phraseology ‘transparency’.[r7]  But, I have an apprehension. I firmly believe that this is going to pollute the political environment and make the democratic system subservient to the corporate world because there will always be a demand for pound of flesh in exchange of that which is given to the political parties. It is natural in the society and the political system that we are living in.

            Madam, in my opinion, the tax system has again been proved to be regressive. The withdrawal of surcharge will benefit those who are comparatively affluent than the others. The most interesting fact is that the direct tax will not yield any additional revenue. The direct tax is not going to yield additional revenue whereas indirect tax is going to generate additionally Rs.2000 crore.

Going through the Budget, it appears that there is a possibility of de-regulating the pricing of petroleum products. If the regulation is done, it may lead to speculation as we have seen in this country and it will lead to further increase in an unregulated system. The withdrawal of the tax on commodity transaction, I deeply apprehend, will increase the price of essential goods and commodities. It will spur inflation and it will escalate unproductive, uneconomic speculation in the country. We have seen the way in which the transactions in goods and commodities lead to hoarding and manipulating the market. I am sorry to say that in the Budget, the hon. Minister of Finance has not taken into consideration the impending threat of drought throughout the country arising out of the shortfall of rainfall and its probable impact on the price of essential goods and commodities particularly food grains. I have never heard about this throughout the speech. If I am wrong, I may be corrected.  The Finance Minister is one of the senior most politicians of the country and he had not taken note of inadequate rainfall in the country and its likely imprint and impact on the price level of the food grains. It is a serious omission and I feel that the Government will come to this House with a contingency plan to take care of the drought, the impending danger of the drought.

If you permit me to say, irregularity in the supply of power or serious gap in the generation and supply has led further to obstructing the artificial irrigation in the country. On the one hand, there is less rainfall and on the other, there is serious power cut. What we have seen in Delhi is power cut for 12 hours in a location which is away from the VIP area. We are the privileged few who enjoy the fruit of power. This is the result of the privatisation that this Government has been carrying forward for so many years.

Madam, there is a gap in the Budget. There is 4.6 per cent revenue deficit and 6.2 per cent fiscal deficit. Therefore, there is a dreadful possibility of reckless disinvestment for raising additional revenue. [NR8] 

            The Economic Survey says that nearly Rs.25,000 crore may be raised by sale of shares. It is a sale of family silver to meet the grocer’s bill. It is uneconomic, unethical, not equitable and, therefore, it is an act of injustice. Seen in the background of the Economic Survey there is talk of labour reforms, the pet subject of the Government. There is talk of increasing weekly work hours from 48 to 60. There is talk of liberalisation of laws to empower the corporate lords to reduce the manpower as they wish and also to employ contract labour at a minimum cost. What is the social significance of all this? In a situation of joblessness, in a situation of decline of purchasing power of the people, the free hand that is sought to be given to the captains of industry will further compound the social contradictions.

            In the background of the decline of GDP, in the background of fall in agricultural production to 1.2 per cent, in the background of the index of industrial production coming down to 2.4, in the background of deceleration affecting manufacturing, electricity and construction sectors along with the fall in exports and contraction of the domestic purchasing power, it is unlikely that the budget presented by hon. Pranab Mukherjee will show any ray of light. He has been too timid. He should have been aggressive in his allocation. If he had a perspective, it has no proper direction. If his allocation has been large, I would concede. There has been minimality in the provision of outlay.

            Madam, the budget speaks of food security. It is a good move, if it is done. While it speaks of supply of 25 kilograms of rice and wheat at Rs.3 a kilogram to the people below the poverty line, the question arises as to what is the poverty line. What is the poverty line? According to Planning Commission it is 28 per cent. According to a Committee set up by the Ministry of Rural Development the poverty is nearly 50 per cent. There is another report of Sengupta Commission which says 77 per cent of the people in the country are living below the consumption level of Rs.20 per day. It is good that you have decided to supply 25 kilograms of rice and wheat. But to whom? What is the line? What is the minimum? How do you decide? That remains a question. In order to make the scheme fruitful we must identify the total quantity and quantum that is needed.

            Madam, crisis in agriculture has intensified. Private capital formation has declined. Productivity has not improved. Employment generation has decelerated. Therefore, in my humble view, the guaranteed supply of credit of Rs.38,000, that too at an interest of seven per cent, is not going to bring the dividend that is necessary.

            Madam, only Rs.1,000 has been allotted for Accelerated  Irrigation Scheme. Only a little more than Rs.2,000 crore has been allotted for the Accelerated Power Generation.[KMR9] 

13.00 hrs.

Is it that amount which can bring about necessary change to retrieve the agriculture, which is in the grip of deepening crisis? The Government says, it has the policy of aam aadmi  – whether I agree or disagree is not the question.

MADAM SPEAKER: Please conclude. We have to break for lunch.

SHRI GURUDAS DASGUPTA(GHATAL): Yes, Madam. I would take just two minutes.

            After Sachar Committee, the Government had allotted only Rs.780 crore additionally.  Is that amount sufficient? Does it do justification to the findings of the Sachar Committee? You have tears for the Scheduled Castes.  I agree. But are the tears genuine or synthetic because you are allocating only Rs.100 crore as a pilot project?  Something more should have been done considering that this section of the community has been denied the benefit of economic development for so many years.            Madam, therefore, I feel that this Budget will not do justice, social or economic.  

            I feel the parliamentary control over Government expenditure is shockingly becoming insignificant. How?  We pass a Budget, Budgeted Estimates; then, we go to the Revised Estimates.  Then, we find the Actuals.  And there is always a divergence.  Divergence is never explained.  Therefore, I feel genuinely that the parliamentary control over the spending of Government funds is becoming shockingly insignificant. 

            Lastly, I come to inflation.  Today newspapers carried a news – inflation has become more negative.  But will the Pranab Babu take the trouble of visiting `Mother Dairy’ outlets and find out the price at which tomato is being sold, potato is being sold; fish is being sold, which are the daily necessities? On the one hand, the Government is in glee  that inflation has become negative, and on the other hand, people are grievously hurt of the abnormal increase in the price of essential goods and commodities.

MADAM SPEAKER: You must conclude now.

SHRI GURUDAS DASGUPTA:  This is not a paradox;  it is a statistical jugglery.  If this statistical jugglery becomes a yardstick in formulating the policy of the Government, we shall land the Government in a mess.  I would like the Government to respond to the question of abnormal increase in the Consumer  Price Index of the country, and take immediate corrective measures as soon as possible.

MADAM SPEAKER: Thank you so much.

            Now, the House stands adjourned to meet again at 2 p.m.

13.04 hrs The Lok Sabha then adjourned  for Lunch till Fourteen of the Clock.

 

14.04 hrs.

The Lok Sabha reassembled after Lunch at Four Minutes past

Fourteen of the Clock.

 

(Mr. Deputy Speaker in the Chair)

…( व्यवधान)

श्री अनंत कुमार (बंगलौर दक्षिण): कोरम जुटाने का आपका काम है और हम जुटा रहे हैं।

योजना मंत्रालय में राज्य मंत्री और संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री वी.नारायणसामी): हम दोनों का काम है। …( व्यवधान)[b10] 

 

*SHRI N. KRISTAPPA (HINDUPUR): Hon. Deputy Speaker Sir, I thank you for giving me this opportunity to speak on General Budget. In the name of agricultural development subsidy on interest rates has been announced in this Budget.  Earlier, when the interest rate was 7%, farmers who repay their loans on time were given a subsidy of 1% on interest rate.  While we are facing food crisis on one hand and spiraling prices of food commodities on other hand, in these circumstances, simply giving subsidy of 1% on interest rates would not help the farming community. If the intention of the government is to give more benefits our farmers, then, 1% of subsidy on interest rates would not justify the intention. 

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*English Translation of the Speech originally delivered in Telugu.

 

 

Andhra Pradesh is the second largest producer of groundnuts, next to Gujarat.  There was a crop yield of 1225 kg per acre, two years ago.  But, now it drastically fell to 67 kg per acre.  If farmers could not repay their loans on time due to natural calamities or inadequate rainfall or crop diseases, then, they won’t be in a position to claim even this 1% subsidy on interest.  Is this the subsidy you give to them in your Budget? Sir, in this context, I request the government to kindly review this budget. This subsidy is perhaps to benefit the banking sector so that they get their repayments in time and it does not help farmers in any manner.

            Earlier, this government announced a waiver of agricultural loans to the tune of Rs.70,000 crores.  It is not known who got those benefits.  Whether the benefit of loan waiver has gone to real farmer or to those persons who took loans in the name of farmers is not known.  When farmers were expecting announcement on loan waiver in this budget, the 1% subsidy on the interest rate seems to benefit only banking sector.  I request the government to ponder, whether 1% subsidy will do any good to farmers. And, I feel that this measure does not help farming community.  This government introduced Employment Guarantee Scheme (NREGA).  Hon. Prime Minister Manmohan Singh and Smt. Sonia Gandhi introduced this scheme with lot of pomp in my district.  This scheme is very much beneficial to farmers and daily labourers.  This is a good scheme if implemented properly.  But there is no proper implementation of this scheme and for the last five years, we voiced our concern over proper implementation of this scheme.  The fruits of this scheme are not reaching the real beneficiaries.  Due to rampant corruption in the implementation of the scheme, middlemen are coming between these benefits and labourers.  Even 10-15% of the funds are not reaching the poor.  You brought this scheme for the livelihood of poor people, but it emerged as a scheme for livelihood of political leaders.  And this scheme is in no way beneficial to poor people and farmers.  I request the government to check middle men and corruption in this scheme, so that the benefits reach the poor labourers.  Similarly, if you look at Indira Awaas Yojana, which is allocated with some more funds in this budget, is being implemented in Andhra Pradesh by linking it with other Housing Schemes.  By taking every village as a unit, all villages will be covered under various phases, for the implementation of this scheme.  In reality, poor people are not the beneficiaries of this scheme.  Only followers of local leaders are getting benefits under this Housing Scheme.  When a village is taken up as a unit, why all the beneficiaries are not provided with housing? This government is responsible and it should reply to this question.  When we enquire with district collectors, they say that there are some leftovers and those proposals will be sent to the government.  When a village is taken as a unit, why the government could not provide this scheme to all beneficiaries and why this scheme is not being completed on time? The government should look into these aspects.  There are large number of weavers in Andhra Pradesh compared to West Bengal and Tamil Nadu.  In Andhra Pradesh, around 600 weavers committed suicides in the last 5 years.  When such a large number of weavers commit suicides, there is a need to provide for handloom mega cluster.  Whether this government proposes any such plan to the weaving community?  While weavers are committing suicides and handloom sector is in crisis, onus is on this government to protect these weavers and save the handloom sector from ongoing crisis.  I would like to know whether this government is thinking on these lines? No steps are being taken to save the weaver community from this crisis in Andhra Pradesh.  Recently, Smt. Panabaka Lakshmi, who is MoS Textiles told me that she talked to the Prime Minister and requested him to waive off loans of weavers, to which he responded positively.  And she made an announcement to this effect that there will be loan waiver package for weavers.  But in this budget I don’t find any mention of it.  I don’t know what she had explained to the Prime Minister. Weavers were expecting some relief.  One more minute sir, I will conclude.  I demand that there should be a relief package to weavers and their loans should be waived off. In Andhra Pradesh, we have reserves of natural gas in Krishna-Godavari Basin. There used to be tax exemption on LNG gas produced from mineral oil, which was done away with recently.  Due to which common people who are using LNG gas will have to bear additional burden.  I request that the earlier tax exemption may be continued with.  With these words, I conclude.

उपाध्यक्ष महोदय: जो भी माननीय सदस्य लिखित भाषण देना चाहते हैं, वह अपना भाषण सभा पटल पर ले कर सकते हैं।

श्री रामकिशुन (चन्दौली): माननीय उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे सन् 2009-10 के आम बजट पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका हृदय से धन्यवाद करता हूं। माननीय वित्त मंत्री जी ने सन् 2009-10 के बजट को प्रस्तुत किया है। मंत्री जी ने इस बजट में अपनी बहुत ही बारीकियों का परिचय देते हुए बजट पेश किया है।[S11] 

          उपाध्यक्ष महोदय, माननीय[RPM12] वित्त मंत्री जी ने बहुत ही बारीकी से बजट पेश किया है। एक तरफ तो वित्त मंत्री जी ने रक्षा विभाग का बजट बढ़ाया है। देश की सुरक्षा के लिए यह जरूरी भी है। वे जितने और दूसरे कार्यक्रम लेकर आए हैं, उनसे लगता है कि देश के विकास की दर और उसकी आर्थिक स्थिति मजबूती के साथ आगे बढ़ेगी। आजादी के बाद से अब तक, हमें समझ में नहीं आया कि जो भी सरकारें आती हैं, वे अपने बजट को पेश करती हैं और जन कल्याणकारी योजनाओं को लाती हैं, लेकिन आजादी के बाद से आज तक गरीबी दूर करने का जो नारा दिया गया, वह गरीबी अभी तक दूर नहीं हो पाई है। कांग्रेस पार्टी की उस समय की प्रधान मंत्री, श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने पहली बार वर्ष 1970-71 में गरीबी हटाओ का नारा दिया था और उसके बाद बार-बार उस नारे का उपयोग किया जाता रहा है, लेकिन अभी तक गरीबी दूर नहीं हुई है।

          महोदय, आजादी के बाद देश के लिए बहुत अच्छे कार्यक्रम बने। बैंको का राष्ट्रीयकरण हुआ और बहुत सारी ऐसी योजनाएं आईं जिनसे देश की गरीबी मिटाने का प्रयास किया गया। आज भी बहुत सी योजनाएं, वित्त मंत्री जी लेकर आए हैं, लेकिन एक बात मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि देश का विकास तभी होगा और आर्थिक मजबूती तभी आएगी, जब गांव, गरीब किसान की मजबूती और खेती की मजबूती के ऊपर ध्यान देकर हम मजबूत करेंगे और तभी निश्चित तौर से यह देश मजबूत होगा।

          महोदय, हमने बजट में जो प्रावधान किया है, उसके बावजूद आज भी हम किसानों को अल्पकाल के लिए 7 परसेंट ब्याज पर लोन देते हैं। आज किसानों को खेती का कार्य करने के लिए ट्रैक्टर और अन्य बड़े-बड़े कृषि यंत्र खरीदने की जरूरत है, लेकिन उसे केवल 3 लाख रुपए तक का ही लोन दिया जाता है। मेरी समझ में नहीं आता कि 3 लाख रुपए में वह कौन सा ट्रैक्टर और कौन सी मशीन खरीदेगा। दुनिया के दूसरे देश किसानों को 4 परसेंट ब्याज पर लम्बी अवधि के ऋण दे रहे हैं। मैं सरकार से निवेदन करना चाहूंगा कि अगर किसानों की भलाई की बात आप कर रहे हैं, तो जो 7 परसेंट पर आप लोन दे रहे हैं, उसे 4 परसेंट करिए। आपने बड़े पैमाने पर किसानों का ऋण माफ किया। मैं वित्त मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहता हूं कि किसानों का ऋण माफ हुआ, लेकिन उनकी जेब गरम नहीं हुई, क्योंकि उनके ऊपर जो ऋण था, वह तो बैंकों का था और आपने उनका जो ऋण माफ किया, वह धन बैंकों को चला गया, किसान को कुछ नहीं मिला। उनके लिए जिन यंत्रों पर छूट दी गई थी, उसमें भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई। मैं चाहूंगा कि किसानों की जो कर्ज माफी योजना है, उसके अन्तर्गत सीधे किसानों को लाभ मिले, ऐसे कार्यक्रम और ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है। मैं आपके माध्यम से सरकार से कहूंगा कि बिना खेती को मजबूत बनाए, हम कोई कार्यक्रम सफलता पूर्वक नहीं कर पाएंगे।          

          महोदय, आपका नरेगा का कार्यक्रम है, जिसमें हम मजदूर तबके के लोगों को, जो हाथ से काम कर रहे हैं, उन्हें रोजगार देने की गारंटी देते हैं, लेकिन उसका व्यावहारिक पहलू क्या है, उसे भी देखिए। उसी गांव में, उसी शहर के आसपास गरीब तबके का कारीगर, कामगार, कुम्हार, जो बढ़ई का काम करने वाला खाती और जो लोग दूसरे छोटे-छोटे कार्य मशीनों से करते हैं, उनके रोजगार के लिए हमने कोई योजना इसमें नहीं बनाई है। मैं चाहूंगा कि नरेगा पर व्यापक रूप में विचार करें और उसके कार्यक्रम में इन सभी लोगों को अवसर दिया जाए। नरेगा में आपने बहुत ज्यादा पैसा दिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस सरकार ने अच्छा कार्यक्रम दिया है। इसके लिए हम सरकार को धन्यवाद देते हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि सिंचाई के लिए जो परियोजनाएं बननी चाहिए, जिससे खेतों में ठीक प्रकार से सिंचाई हो सके। इसके लिए जिस प्रकार की प्लानिंग की जरूरत है, वह अभी तक नहीं बनी है। मैं यदि गुजरात की बात कहूं, तो मुझे बी.जे.पी. का समर्थक नहीं माना जाना चाहिए। मैं वहां की बी.जे.पी. सरकार की तारीफ नहीं कर रहा हूं, लेकिन सत्तापक्ष के लोगों का ध्यान गुजरात की तरफ आकर्षित करते हुए कहना चाहता हूं कि गुजरात में दलगत भावनाओं से ऊपर उठ कर के एक-एक बूंद पानी का सदुपयोग किया गया है। वहां बिजली अच्छी मात्रा में मिल जाती है। मैं चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश में जो उपजाऊ भूमि है, जो अच्छी भूमि है, जहां पानी बहुत है, लेकिन हम उस भूमि की सिंचाई का इंतजाम आजादी के इतने वर्षों के बाद, आज तक भी नहीं कर पाए हैं। वहां सूखा पड़ा हुआ है। वहां परेशानियां बढ़ रही हैं। अगर हम वहां के लिए बढ़िया योजनाएं बनाते, तो आज वे परेशानियां नहीं आतीं। …( व्यवधान) गुजरात में भले ही किसी की भी सरकार रही हो, लेकिन वहां अच्छा काम हो रहा है। आप की भी सरकार रही है। उसमें भी अच्छे काम हुए हैं। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया माननीय सदस्य को बोलने दीजिए।

श्री रामकिशुन :  उपाध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य मुझे बीच में टोक कर, मेरे समय को नष्ट कर रहे हैं। इसलिए मेरा आग्रह है कि जितना मेरा समय माननीय सदस्य नष्ट करें, उतना समय मुझे बोलने के लिए और दिया जाए।

          महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि मैंने गुजरात का नाम इसलिए लिया, क्योंकि मैं गुजरात गया था और मैंने वहां किसानों को देखा है और वहां पानी का इंतजाम देखा है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप कृपया चेयर को सम्बोधित कर के बोलिए। उधर मत देखिए और उनकी बातों का उत्तर मत दीजिए। आप अपनी बात बोलिए और चेयर की ओर देखकर बोलिए।

श्री रामकिशुन :   उपाध्यक्ष महोदय, गुजरात में भले ही किसी भी दल की सरकार हो। मैं सरकार के बारे में नहीं, बल्कि वहां के किसानों की खेती के लिए जिस प्रकार से सिंचाई की व्यवस्था की गई है, उसके बारे में बता रहा हूं। [RPM13] 

             उपाध्यक्ष महोदय, गुजरात में दंगा भी हुआ था। मानवता का, दरिद्रता का नंगा तांडव हुआ था। जब यह हुआ था, तब किस की सरकार थी। आपकी नहीं थी।

          महोदय, उत्तर प्रदेश में सूखा पड़ा हुआ है। मैं चाहूंगा कि पानी की त्वरित सिंचाई की जो योजनाएं आप लाए हैं, उन्हें जरा बेहतर बनाइए। हमारे गांव का बरसात का पानी बेकार बह जाता है। हमारी जो नहरें जर्जर हैं, जो हमारी लिफ्ट कैनाल कच्ची और कमजोर हैं, उन्हें हम ठीक करें, उनके एक-एक बूंद पानी को हम किसानों के खेतों तक पहुंचा दें, ऐसी व्यवस्था करें। मैं जिस क्षेत्र से चुनकर आता हूं, उस क्षेत्र चन्दौली का इलाका आदिवासी और गरीब तबके का इलाका है। वहां एशिया की सबसे बड़ी पम्प कैनाल भोपौली पम्प कैनाल और नारायणपुर पम्प कैनाल हैं, लेकिन बिजली न मिलने से वहां की नहरों का ठीक प्रकार से इंतजाम नहीं हो पा रहा है और उनका सारा पानी बहकर गड़ई नदी में चला जाता है और वहां से गंगा में जाता है। मैं आपसे दो मिनट बोलने के लिए समय और चाहूंगा।

          महोदय, शिक्षा के बारे में आप कहते हैं कि हम अनिवार्य और समान शिक्षा लाना चाहते हैं। यह अच्छा बिल है। इसे आप लाइए। हम इसका स्वागत करते हैं। आप अनिवार्य शिक्षा अवश्य कीजिए। अनिवार्य शिक्षा में कलैक्टर का बेटा और एम.पी. का बेटा, उसी प्राइमरी स्कूल में पढ़ें, जिसमें गरीब का बेटा पढ़ता है। जिस मिडिल और इंटरमीडिएट स्कूल में एक गरीब का, चपरासी का बेटा पढ़ता है, उसी में कलैक्टर का और एम.पी. का बेटा भी पढ़े। अगर आप इस तरह की शिक्षा व्यवस्था करते हैं, तो देश की गरीबी को मिटाने का काम करेंगे।

          महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि आज कुपोषण के कारण गरीब और दलितों के बच्चों को गम्भीर बीमारियां हो रही हैं। आप उन्हें पौष्टिक आहार नहीं दे पाए। हमें इस संबंध में विश्व बैंक से बहुत पैसा मिला है। आपने इस हेतु विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनेक योजनाएं बनाईं। आप राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन यहां चला रहे हैं, लेकिन आज भी गरीबों के बच्चे कुपोषण के चलते कमजोर और विकलांग पैदा हो रहे हैं। हमारे आदिवासी इलाकों में गर्भवती महिलाएं बच्चे के जन्म के समय ही दम तोड़ देती हैं। आप कहां और किस प्रकार की स्वास्थ्य सुविधाओं की बात कर रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, कृपया अब आप अपना भाषण समाप्त कीजिए।

श्री रामकिशुन :  उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि उन क्षेत्रों में आप अच्छे प्रकार के अस्पताल बनाइए। प्राइवेट सैक्टर की बात यहां कई माननीय सदस्यों ने कही। दीक्षित जी ने ठीक ही कहा था। मैं भी कहना चाहता हूं कि आपके जो सरकारी संसाधन हैं, जो सार्वजनिक संसाधन हैं, अगर उन पर आपका वित्तीय नियंत्रण हो, तो आप ठीक प्रकार से काम कर सकते हैं, लेकिन आपका उनके ऊपर नियंत्रण नहीं है।

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, कृपया अब आप अपना भाषण समाप्त कीजिए।

श्री रामकिशुन :   उपाध्यक्ष महोदय, मैं समाप्त कर रहा हूं। वित्तीय नियंत्रण नहीं है। आपने नरेगा में पैसा दिया, लेकिन वह गरीब के पास नहीं गया। श्री राजीव गांधी जी ने कहा था कि हम अगर केन्द्र की ओर से एक रुपया देते हैं, तो उसमें से 10 पैसे भी गरीब के पास नहीं पहुंचते हैं। आदरणीय राहुल गांधी जी भी इसी बात को कहते हैं कि हमारा पैसा गरीब के पास नहीं जाता है। अफसरशाही और दलाल किस्म के जो लोग हैं, वे इस पैसे की बंदरबांट कर लेते हैं। हमारी आंगनवाड़ी जैसी संस्थाएं हैं। उन्हें भी आप मजबूत कीजिए और उनकी विसंगतियों को दूर कर के आप एक अच्छा कार्यक्रम बनाइए। आपने अपने कर्मचारियों के लिए छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू किया है, लेकिन आपने इन्कम टैक्स में उन्हें क्या लाभ दिया, मात्र 1000-1200 रुपए का लाभ मिला है। राज्य कर्मचारियों की स्थिति ठीक नहीं होगी, तो निश्चित रूप से उनकी कार्य-क्षमता घटेगी। मैं चाहता हूं कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद उन्हें इन्कम टैक्स में जो छूट और सुविधाएं मिलनी चाहिए थीं, वे नहीं मिली हैं। इन्कम छूट में उन्हें कुछ लाभ दीजिए, ताकि उनकी कार्य-क्षमता बढ़े। ढाई लाख रुपए या उससे ऊपर उनकी आमदनी की छूट की सीमा रखिए। इस बारे में परीक्षण करा लें और इस काम को करें।         

 

          महोदय, अन्त में, मैं अपनी एक-दो बातें कह कर, अपना भाषण समाप्त करूंगा। वाराणसी और चन्दौली, जो सांस्कृतिक और धार्मिक नगरी है, जो पूर्वान्चल की हृदयस्थली है, मैं उस क्षेत्र के विकास के लिए वित्त मंत्री जी और इस सरकार से कहूंगा कि वहां पर्यटकों की बहुत जरूरत है। वहां सिंचाई की जरूरत है। वहां ऐसे बहुत से विदेशी पर्यटक आते हैं। गांगा को आपने राष्ट्रीय नदी घोषित किया, लेकिन वहां गंगा आज बहुत प्रदूषित है।

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, धन्यवाद। आप बैठ जाइए। अब आपका भाषण रिकॉर्ड पर नहीं जा रहा है। आप यदि कुछ और कहना चाहते हैं, तो सदन के पटल पर लिखित में दे दीजिए, वह आपके भाषण का हिस्सा मान लिया जाएगा।

(Interruptions) … *

 

[RPM14] 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

      

* Not recorded.

ओश्री प्रेमदास (इटावा): मैं वित्त बजट पर माननीय मंत्री जी का ध्यान आकर्षित कराता हूँ। मैंने आपका बजट भाषण बहुत ध्यान से पढ़ा और समझा आपने किसानों के लिए गाँवों के लिए उतना अच्छा जनहित में बजट नहीं दिया है जो होना चाहिए आज पूरे देश एवं खास कर उत्तर प्रदेश में सूखा पड़ा हुआ है। इस सूखे से निपटने के लिए कोई खास उपाय इस बजट में नहीं किया गया है जबकि किसानों की स्थिति ठीक नहीं है। इस सूखे से किसान और बदहाल हो जाएगा। महोदय, मैं एक और समस्या की ओर माननीय मंत्री जी का ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूँ। इस समय डीजल तथा पेट्रोल के दाम बढ़ाने की आवश्यता नहीं थी परन्तु सरकार द्वारा किसानों की स्थिति तथा सूखे की स्थिति का सही आकलन न करते हुए दोनों पेट्रो पदार्थों के दाम बढ़ा दिए है जिससे किसान और बदहाल हो जाएगा। यदि सूखें से निपटने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तथा बजट में प्रावधान नहीं किया गया तो स्थिति अत्यंत भयंकर हो जाएगी।

          मैं माननीय मंत्री जी के सामने एक सुझाव रखना चाहता हूं। अगर इस सुझाव पर अमल किया गया तो काफी हद तक किसानों को फायदा पहुंचाया जा सकता है। प्रत्येक नदीयों का पानी 50-50 किलो मीटर की दूरी पर पानी रोक-रोक कर निकाला जाए, जिससे जल स्तर के लिए बजट में अलग से प्रावधान किया जाए। इससे काफी हद तक सूखे की स्थिति से निपटा जा सकता है तथा सभी क्षेत्रों को बराबर पानी का उपयोग करने का मौका मिलेगा।

          मैं माननीय मंत्री जी का ध्यान राष्ट्रीय रोजगार योजना के अंतर्गत आने वाली समस्याओं की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। इस योजना को चालू करने का उदेश्य बहुत अच्छा था परन्तु भ्रष्ट अधिकारियों के कारण इस पर सही से अमल नहीं किया जा रहा है यह स्थिति विशेषकर उत्तर प्रदेश में है जिसके कारण जरूरतमंद लोगों को रोजगार प्राप्त नहीं हो रहा है। इस योजना के लिए केंद्र सरकार द्वारा जो धनराशि जारी की जा रही है उसका राज्य सरकार द्वारा सही प्रयोग नहीं किया जा रहा है इसमें भेदभाव बरता जा रहा है। यदि यही स्थिति रही तो यह योजना जिस उदेश्य के लिए बनी उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

            अंत में मैं माननीय मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने इस योजना के लिए धनराशि का पूरा प्रबंध किया है। यदि इसका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए। मैं चाहता हूं कि इसके लिए केंद्र स्तर पर एक निगरानी तंत्र की स्थापना की जाए जिससे केंद्र द्वारा आबंटित धनराशि का राज्य सरकारें दुरूपयोग न कर सकें। इन्ही शब्दों के साथ मैं अपना भाषण समाप्त करता हूं तथा आशा करता हूं कि माननीय मंत्री जी मेरे द्वारा दिए गए सुझावों का बजट में प्रावधान करेंगे।

                                                                                                         

* Speech was laid on the Table

SHRI RAJEN GOHAIN (NAWGONG): Mr. Deputy-Speaker, Sir, thank you.  I rise to speak on the General Budget.  I come from a State and a region which is facing turmoil due to decades of insurgency which has virtually created lots of damage to the economic development.  The root cause of this insurgency has been the economic disparity, besides other reasons. Therefore, one of the major ways to bring an end to this insurgency activity is to develop the State in all fronts and create job opportunities for the unemployed youths.  I feel sad to say that this Budget has not come out with any solution towards the agony of the people of Assam.  Since Independence Assam has been neglected except during the NDA Government under the leadership  of Shri Atal Bihari Vajpayee, when the Central Government started thinking for the welfare of the North-Eastern region.  But today I am sorry to say that, though we are proud to have the hon. Prime Minister from my State, nothing remarkable is done for the upliftment of the State or towards solving the problem of insurgency or the infiltration problem. 

            The demography of the State of Assam has changed and the fate of people of Assam is in the hands of illegal Bangladeshi migrants. The issue of illegal Bangladeshi migrants is also a stumbling block in the economic development.  Since they managed to get their names enrolled in the voters list and finally manipulate to get their citizenship, they eat into our Budget.  These migrants are a threat to the national security.  It is necessary that the entire border fencing with Bangladesh be completed on a war-footing. But any such thing is not mentioned in the General Budget. 

            In Assam, flood is a perennial problem. Every year there is a tremendous loss of  life and property. Kilometres after kilometres of land gets eroded due to floods in the river Brahmaputra and its tributaries. About 60 square kms. of land was washed away from the Kaziranga National Park, which has reduced the habitable area of wild life, especially the one-horned rhino. Important townships like Dibrugarh have lost major areas. Districts of Moregaon, Dibrugarh, Jorhat, Lakhimpur, etc. stand threatened.  Even the State Capital, Guwahati, is facing the great problem of erosion. A major road on the river bank was washed away.  But the Government has not considered it seriously.  The Central Government should announce a package of at least Rs. 10,000 to Rs. 15,000 crore to systematically and scientifically control the erosion in a time-bound and phased manner.

The climate change has an effect in the North-Eastern region too.  Due to late monsoon, there is a drought like situation in many areas, which has badly affected the farmers.  The farm loan waiver has not benefited the farmers of Assam much.  Emphasis should be laid on better irrigation system. The food subsidy bill has been rising year after year. But it has not brought much relief to the BPL families in my State.  There is still dearth of food for poor people.  It is a matter of worry that children go to bed without having food. 

Malnutrition has remained high and is currently affecting 45.9 per cent of children below the age of three. The hon. Finance Minister has mentioned that the National Food Security Act would be brought, which will benefit every family living below the poverty line. It is a positive step.  But it should ensure that no discrimination is done amongst the BPL families due to political reasons.[r15] 

Since, in my State, the benefits for the BPL families are provided on the basis of which  political party he or she belongs to, this attitude has deprived lakhs of innocent poor families, poor people of enlisting themselves in the list of BPL. Therefore, a judicious system has to be developed to enlist all the poor people as belonging to BPL without any sort of a discrimination.

            Sir, I am happy to say that the allocation under the National Rural Employment Guarantee Scheme is increased by 144 per cent. The proposed allocation is Rs. 39,100 crore. To increase the productivity of assets and resources under NREGA, convergence with other schemes relating to agriculture etc. is being initiated. In the first stage, 115 pilot districts have been selected for such convergence.     Now, I would like to put forward my demand to include as many districts of Assam for convergence as possible. I would also like to say that fool-proof mechanisms should be adopted in the disbursement of funds under such schemes since there is ample scope of misappropriation of funds under such schemes.

            Recently, on 17th June, 2009, thousands of farmers in the district of Nowgong took to the streets to highlight the plight of misappropriation of funds under NREGA. I am happy to say that Shri Atal Bihari Vajpayee’s dream project, the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana has seen an increased allocation of 59 per cent by the hon. Finance Minister. But it has been noticed that  during the last five years, the quality of construction of such roads has deteriorated and a newly constructed road gets damaged in a short span of six months. The contractor responsible for the construction of such a road should give guarantee for the road built for five years and should maintain it accordingly. For this, security money should be kept with the Department for maintenance as the case used to be earlier.

            I would like to conclude by saying that the so-called inclusive growth and equitable development Budget of the UPA Government has only excluded the far North-East India and has deprived its people.     

                                                                                                                       

SHRI M.I. SHANAVAS (WAYANAD): Respected Mr. Deputy-Speaker, Sir, first of all, I would like to thank you very much for giving me the opportunity to express my humble views on this Budget. I stand before this august House to speak on the General Budget.

            Sir, from yesterday onwards, I have been closely following the speeches which, especially were attacking the Budget provisions. I scrutinized each and every sentence of the hon. Members who were speaking against the Budget and I am of the humble opinion  that anybody who follows that will reach the irresistible conclusion that this Budget is excellent and unique in all respects. When growth and fiscal responsibility move in divergent directions, opposite direction, the job of the Finance Minister is very difficult, especially to present a Budget. Shri Pranab Mukherjee, our hon. Finance Minister, has presented the best possible Budget in the worst global economic situation. I have been following the speeches. Everybody is speaking inside the House and outside the House also about the aam aadmi or the poor people and inclusive growth. This is not a new phenomenon. According to me, the great visionary Pandit Jawaharlal Nehru, the builder of modern India, should be called the father of inclusive growth. He had two options: either to catch hold of the Stalinistic Communist mode of economic planning or the capitalist way. But then he thought of the mixed economy. He saw the poorest of the poor in India and so he brought into existence the mixed economy. It was he who started the foundation of inclusive growth. That was built upon by Shrimati Indira Gandhi, Shri Rajiv Gandhi. And, no doubt, now under the able, scientific leadership of Dr. Manmohan Singh, under the able political leadership of Shrimati Sonia Gandhi and under such a great brain like Shri Pranab Mukherjee, this net of inclusive growth has widened.[R16] 

             

 

 

            Even the World Health Organisation and every section of the society are applauding this Budget. This forenoon, I heard the Communist leader speaking that we are very poor. We should see the growth of India. Pranabji was telling about the first Budget. On 26th November, 1947, Shri Shanmugam Chetty presented the first Budget for about Rs. 193 crore. Now it has come to Rs. One million crore. In 1951, our foreign exchange reserves of India were below Rs. 1,000 crore. Now it has grown upto Rs. 12 lakh crore. How has this happened?

            When the world economy was reeling under pressure and was coming down, the greatest economic countries were trembling under the global recession, but India pulled on. How has it happened? It is because we went to the Aam Aadmi, we went for inclusive growth, we saw the plight of the people and the stimulus package announced in 2008-09 which amounts to Rs. 1,86,000 crore has boosted our economy. Our economy can withstand any kind of pressure. Now the world is telling that there are two economies that are going to conquer the world and they are China and India.

            Some of my friends who have gone to China tell us, “Look, what a great country. China is progressing like anything, but India is not progressing so much.” According to me, the humble progress of India is greater than that of China because in China nobody can think aloud. China’s progress is under the barrel of the gun. Nobody can think there and nobody can express his opinion. That is China. But China is also reeling under pressure now. China is also suffering from the global recession.

My friend in the CPI (M) circle was telling that in India we are losing jobs. Yes, a few lakh jobs have been lost. But what about China?  News from China is a magazine published by the Chinese Embassy. It is an official organ of the Chinese Embassy in India. In the February Edition of News from China, it is said:

“Up to now in China alone at least 20 million migration workers have lost their jobs. The crisis is real, deep, dire and devastating. The pain and suffering are acute and may be protracted. Without a doubt, it is a killer crisis of unprecedented proportions.”

 

            Sir, two crore workers have lost their jobs in China. This is what China is undergoing now and we have withstood this crisis. We have achieved 6.7 per cent growth. In spite of all the havocs playing in the global economic field, India has grown to such an extent. As I told you, the stimulus package to the tune of Rs. 1,86,000 crore was announced about 140 days ago. Now we have attained this growth of 6.7 growth even when 60 billion dollars of foreign money has been flowed away from this country. Even then India is standing. You see the progress. Yet some people say that we are poor. Take the NREGP, the farmers’ loan waiver scheme etc., no Government in the world can do it. Our Government announced a loan relief of Rs. 71,000 crore to our farmers. It was disbursed within one year. Usually political parties go on saying something or the other about such schemes. But under the leadership of Shrimati Sonia Gandhi and Dr. Manmohan Singh we implemented it effectively and showed it to the world.

            Sir, I come to the Budget now.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please try to conclude now.

SHRI M.I. SHANAVAS : Sir, I am speaking for the first time in this Parliament. Please give me some more time.[KS17] 

            [RS18] The biggest stimulus in this Budget is the plan expenditure of Rs.3,25,149 crore and Rs.2,39,840 crore for the growth budget support of the Central Plan. So, what has Mr. Pranab Mukherjee done? He has taken the cause of the down-trodden people.  We are pulling them up. 

I have been reading newspapers where the industrialists, the corporates, the common man, say that they are all satisfied.  Now, we see a resurgent India, an India which is to grow like anything, and an India which is coming up like anything.  In these circumstances, what should the Opposition and the Ruling Party do?  We all should unite and see that this good sense of love for the poor people prevail.  Now, it has come up like anything. 

When the Indo-US nuclear Treaty was discussed in this House, I watched it from outside the Parliament.  The discussion went on for hours and hours and I watched the whole discussion.  Our young leader Mr. Rahul Gandhi was speaking about one Kalavati.  I saw smiles on the faces of some Members and in the discussion on the TV channels some people were laughing.  Some of them who laughed have not returned to this House.  Now, everybody speaks about Kalavatis, about the poorest of poor people.   The poorest of the poor people should be rescued and that is the main attempt of Mr. Pranab Mukherjee.

I do not want to speak much because you have curtailed my time, but I want to bring one or two proposals before the hon. Finance Minister.  The farmers’ loans worth Rs.71 crore have been waived. It is a gigantic leap forward for the farming community.  But there is a little anomaly.  The anomaly is that the cut off date for overdue loan is 28.2.2008.  Some farmers have sold their houses and have taken loans from the private money lenders.  They remitted some amount, but now their cases are pending.  I would request the hon. Finance Minister to look into it.

The hon. Finance Minister has announced concessions for the students. Now, I want to emphasise that the concessions of the students may be extended to the students who are still pursuing their studies.

Last but not least, this is the august House where history sleeps, this is a great tradition, we, the Members of Parliament, are torch bearers of a great democracy inherited from Gandhi Ji, Pandit Jawaharlal Nehru and the galaxy of leaders.  We are working; we are going into the villages where thousands of petitions confront us.  We do not know what to do.   I want to bring to the notice of the hon. Finance Minister the fact about the MPLAD Fund.  The MLA Fund in my State for each MLA is Rs.75 lakh.  In my Municipality, the fund given to the Municipal Councillor is Rs.45 lakh.  We, the Members of Parliament, are the custodians of the tradition of this country.  We are the torch bearers of the traditions of this country.  I respectfully request the hon. Finance Minister to raise this MPLAD Fund from Rs.2 crore to Rs.7 crore per year.  That is the only way we can do a lot in the country.  If that is given, we can spend more time in the law making process.

I thank you so much for giving me some extra time.

 

डॉ. बलीराम ( लालगंज): महोदय, सामान्य बजट पर चर्चा में मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं।

          महोदय भी यूपीए की सरकार बनी, उसे एक जनादेश मिला। जनता को बड़ी उम्मीदें-आशाएं थीं कि हमने अच्छा ज, अनादेश दिया है, तो हमारे हित में योजनाएं बनेंगी। माननीय मंत्री जी ने जो बजट पेश किया है, उस बजट में गरीबों के हित में ऐसी कोई चीज नहीं दिखाई दे रही है जो उनके लिए कल्याणकारी हो। यह जो बजट है, इसके बारे में आज चारों तरफ यह चर्चा चल रही है कि यह बजट पूंजीपतियों और धन्नासेठों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। बजट में आपने टीवी सस्ता कर दिया है, फ्रिज सस्ता कर दिया है जिनको गरीब कभी यूज ही नहीं करता है और जैसे टेलिविजन की बात कही गयी है, उस तरह का टेलीविजन तो गरीब रखता ही नहीं है, उसकी इतनी क्षमता ही नहीं है। उसे आपने सस्ता कर दिया है, लेकिन जो गरीबों के दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुएं हैं, उनको महंगा कर दिया है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह बजट गरीबों के हित वाला बजट नहीं है। वित्त मंत्री जी ने अपने भाषण में यह कहा कि इस देश में लगभग 44,000 ऐसे गांव हैं, जिनमें अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है। वित्त मंत्री जी ने, सरकार ने चिन्ता की है कि अनुसूचित जाति के लोगों को सुविधा मुहैया कराई जाए। देर से ही सही, आपको उनका ख्याल तो आया। अपने बजट में उन्होंने 1,000 ऐसे गांवों को चुना है, जिनके लिए प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना में बनाई गयी है। यह संकल्प लिया है कि हम देश के ऐसे 1,000 गांवों को विकसित करेंगे और 100 करोड़ रूपए उसके लिए आपने बजट में दिए हैं। उत्तर प्रदेश में इसी तरह से बहन कुमारी मायावती जी ने डा0अम्बेडकर ग्राम विकास योजना बनाई थी। आज भी यह योजना चल रही है। वह योजना सिर्फ अनुसूचित जाति के लिए ही नहीं है, चाहे वह जिस समाज का व्यक्ति हो, हर गांव तक वह सुविधाएं पहुंचनी चाहिए। कोई भी ऐसा अम्बेडकर ग्राम नहीं है जिस पर 80 लाख रूपए से कम खर्च हो रहा है, कहीं-कहीं पर जो बड़े गांव हैं, उन पर एक-एक दो-दो करोड़ रूपए तक खर्च करके, वहां जो गरीब लोग हैं जिनके पास घास-फूस की मंडइयां हैं, उनको इन्दिरा आवास और निर्बल आवास दिए जा रहे हैं। वित्त मंत्री जी ने जो योजना बनाई है, जो बजट दिया है, उसमें एक गांव पर लगभग दस लाख रूपए खर्च करने का अनुमान है। इससे उस गांव का विकास नहीं हो सकता है। नकल तो जरूर की है, उत्तर प्रदेश में डा0 अम्बेडकर गांव बनाकर गरीबों का विकास किया जा रहा है।…( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल : कहां हो रहा है? विकास नहीं हो रहा है।…( व्यवधान)

डॉ. बलीराम : विकास हो रहा है। आप वहां जाकर अंबेडकर ग्राम देखिए।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप चेयर की ओर देखकर बोलिए। चेयर को संबोधित करें।

…( व्यवधान)

डॉ. बलीराम : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि यह दस लाख रुपए की राशि गांव के विकास के लिए बहुत कम है। इसे बढ़ा कर 1 लाख रुपए या कम से कम 80 लाख रुपए करना चाहिए। अगर आप इस तरह से इस योजना को बनाते हैं, तो सही मायनो में आप गांवों को विकसित कर पाएंगे। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय:बलीराम जी की स्पीच के अलावा और कुछ रिकार्ड में नहीं जाएगा।

…( व्यवधान) *

डॉ. बलीराम : वित्त मंत्री जी ने देश की खाद्य स्थिति के बारे में चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम सम्बन्धी कार्य ईमानदारीपूर्वक शुरू किए गए हैं। उन्होंने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए तीन रुपए प्रति किलोग्राम चावल या गेहूं देने की बात भी अपने बजट भाषण में कही है और इस बारे में संकल्प भी जाहिर किया है। मैं कहना चाहूंगा कि देश में गरीबों की संख्या बहुत ज्यादा है। सन् 2002 में बीपीएल की जो सूची तैयार की गई थी, उसमें बहुत से गरीब छूट गए थे। मैं सरकार से चाहूंगा कि वह पुनः बीपीएल के तहत आने वाले लोगों की जांच कराए और जो लोग छूट गए हैं, इस सूची में शामिल कर उन्हें भी इसका लाभ दिया जाए। इस तरह की व्यवस्था वित्त मंत्री जी को करनी चाहिए।

          आज नरेगा की चारों तरफ चर्चा हो रही है। बीपीएल के तहत आने वाले लोगों को इस योजना के तहत सरकार रोजगार उपलब्ध कराने की बात कहती है। लेकिन आप गांवों में जाकर देखें, तो आपको वास्तविकता का पता चलेगा। वहां जीसीबी मशीनों द्वारा खुदाई का काम किया जा रहा है।

उपाध्यक्ष महोदय:माननीय सदस्य कृपया अपनी बात समाप्त करें।

डॉ. बलीराम : केन्द्र सरकार इस योजना के तहत राज्यों को जो पैसा देती है, उसे इसकी मानिटरिंग करने की भी जरूरत है कि वह पैसा सही लोगों के पास जा रहा है या नहीं। अगर ऐसा होगा, तब जाकर सही अर्थों में गरीबों को लाभ पहुंचेगा।

          यूपीए सरकार के समय पहले भी काफी महंगाई बढ़ी थी और दोबारा सत्ता में आते ही इस सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा दिए, जिससे महंगाई को आगे बढ़ाने का संकेत इन्होंने दिया है। मैं कहना चाहूंगा कि इसमें सुधार करने की जरूरत है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।

* Not recorded.

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं यह भी कहना चाहता हूं कि वित्त मंत्री जी ने अपने बजट भाषण में जो घोषणाएं की हैं, वे सिर्फ घोषणा ही न रह जाएं, उन पर अमल भी किया जाना चाहिए।

उपाध्यक्ष महोदय:बलीराम जी, अब आप समाप्त करें। मैं महाबली सिंह जी को अपनी बात कहने के लिए मौका दे रहा हूं।

डॉ. बलीराम : जिस तरह से रेल मंत्री जी ने कहा है कि हम रेलवे में अनुसूचित जाति के आरक्षण कोटे को पूरा करेंगे, ऐसा वित्त मंत्री जी ने अपने बजट भाषण में कुछ नहीं कहा है।

उपाध्यक्ष महोदय:अब आप बैठ जाएं। आपका भाषण अब रिकार्ड में नहीं जाएगा।

…( व्यवधान) *

                                                                                                         

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

* Not recorded.

श्री महाबली सिंह (काराकाट): उपाध्यक्ष महोदय, मुझे पहली बार इस सदन में आने का मौका मिला है और पहली बार आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। सदन में आम बजट पेश हुआ है और उस पर चर्चा हो रही है। पहले रेल बजट पेश हुआ, दूसरा आम बजट पेश हुआ है, जिस पर मैं बोल रहा हूं। हमने चर्चा के दौरान देखा कि सत्ता पक्ष के लोग, इस बजट को देश-हित में, दलित, पिछड़े और अक्लियत समाज के हित में बताकर मेजें थपथपा रहे हैं और विपक्ष के सदस्य इस बजट की आलोचना कर रहे हैं, हम भी विपक्ष में हैं, हम भी आपकी आलोचना करेंगे। लोकतंत्र में यह परिपाटी चली आ रही है कि सत्ता पक्ष कितना ही अच्छा कार्य क्यों न करे, उसके कार्यों की सराहना विपक्ष कभी नहीं करता, लेकिन देश की जनता आपके अच्छे कार्यों की सराहना करती है। जो सरकारें वादा करके मुकर जाती हैं, अपने वादों पर खरा नहीं उतरती हैं तो जब सरकार आम चुनाव में जाती है तो वैसी घोषणा करने वाली सरकार को, वादा न निभाने वाली सरकार को जनता जवाब देती है और उस सरकार को उखाड़ फैंकती है।

          हमने देखा कि देश में जितनी भी सरकारें बनीं, उन्होंने जब भी बजट बनाया, दलित, गरीब और पिछड़े लोगों के हित में बनाया, गरीबों के हितों को देखते हुए बनाया, लेकिन गरीब का, दलित का आज तक क्या हुआ – यह आपके और देश के सामने है।

          देश में जितनी भी पार्टियां हैं, उनकी सभी नीतियां और सिद्धांत गरीब, दलित और पिछड़े लोगों के हित में बनें। जितनी भी सरकारें बनीं, सभी सरकारों ने अपना बजट दलित, गरीब, अक्लियत और पिछड़ों के हित में बनाया। पार्टियां तो बनती-बिगड़ती रहीं, सरकारें बनती-बिगड़ती रहीं, बजट बनते और बिगड़ते रहे, साल और मौसम बदलते रहे लेकिन इस देश के करोड़ों लोगों की तकदीर नहीं बदली। आज भी इस देश के करोड़ों लोगों के पास रहने के लिए घर नहीं, पीने के लिए पानी नहीं, वे पेड़ों के नीचे, गंदे नालों के किनारे अपना जीवन-बसर करते हैं। सदन में जब बजट रखा गया, चाहे रेल बजट हो चाहे आम बजट हो, हमने उसे पढ़ा तो खुशी हुई। पढ़ने पर मुझे लगा कि मौजूदा सरकार समाज के नीचे गिरे लोगों के जीवन-स्तर को ऊपर उठाने का प्रयास कर रही है।

 15.00 hrs.[r19] 

          इस देश को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में लाने का प्रयास कर रही है, लेकिन मुझे दुःख इस बात का है कि इन दोनों बजटों में बिहार की बड़े पैमाने पर उपेक्षा हुई है। हम बिहार की उपेक्षा करके यह सोचें कि देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जा सकते हैं, तो यह हमारी गलती होगी। बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां महावीर, गौतम बुद्ध जैसे लोग पैदा हुए, जिन्होंने भारत में ही नहीं, विश्व में भी प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया। जिनके उपदेशों को मानने वाले कई देश आज तरक्की कर रहे हैं। विश्व के कई देशों के लोग बिहार में लाखों की तादाद में पयर्टक बन कर आते हैं। श्रीलंका, चीन, जापान, थाईलैंड आदि कई देशों के लोग बिहार में बहुत संख्या में आते हैं। अगर आप बिहार की आधारभूत संरचनाएं ठीक नहीं करेंगे, वहां रेल, सड़क, बिजली की व्यवस्था ठीक नहीं करेंगे, तो जब विदेशी पर्यटक बिहार से वापिस अपने देश जाएंगे, तो बिहार की आलोचना करेंगे। जब विदेश में बिहार की आलोचना होगी, तो यह सिर्फ बिहार की ही नहीं, बल्कि देश की आलोचना होगी। जब भारत की आलोचना होगी, तो आप कैसे विश्व के विकसित देशों के साथ भारत की तुलना कर सकते हैं?

          महोदय, बिहार के विकास के मार्ग को अवरुद्ध करने से, बिहार की उपेक्षा करने से देश आगे नहीं बढ़ सकता है। यूपीए की सरकार अगर सोचती है कि उसने पिछले पांच सालों में बिहार में बहुत कुछ काम कराए हैं, ऐसा कुछ नहीं है। पिछले पांच सालों में रेल के मामले में भी बिहार की उपेक्षा हुई है। वर्तमान बिहार के मुख्यमंत्री, जो एनडीए की सरकार में रेल मंत्री थे, जिन्होंने लकीर खींची थी, अभी तक वही काम पूर्ण नहीं हो सका, तो हम कैसे नए कामों की चर्चा कर सकते हैं?

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री महाबली सिंह : महोदय, मैं बहुत थोड़ा समय लूंगा। बिहार में मेन रोड, नेशनल हाईवे को छोड़ कर कोई ऐसी रोड नहीं है, जो ठीक हो। पांच साल में यूपीए की सरकार ने क्या काम किया है? अगर बिहार में यूपीए सरकार ने कोई काम किया होता, तो बिहार में यूपीए की दुर्गति न होती।

उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री महाबली सिंह : बिहार की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। बिहार की बनावट इस तरह की है कि एक तरफ उत्तरी बिहार बाढ़ से बरबाद होता है

उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए, नहीं तो हमें कहना पड़ेगा कि रिकार्ड में कुछ नहीं जाएगा।

श्री महाबली सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, हमें पहली बार बोलने का मौका मिला है।

उपाध्यक्ष महोदय : समय में पहली-दूसरी बार की बात नहीं होती है। समय तो समय है। दूसरे माननीय सदस्यों को भी अपनी बात कहने का मौका मिलना चाहिए।

श्री महाबली सिंह : महोदय, हमने बजट में अर्थशास्त्री कौटिल्य के शब्दों को वित्त मंत्री के भाषण में सुना है। हम आपके माध्यम से सरकार से जानना चाहते हैं कि क्या इस सरकार को मालूम नहीं है कि बिहार में हर साल नेपाल में बारिश होने के कारण कोसी और गंडक नदी में हर साल बाढ़ आती है। इस कारण बिहार और उत्तर प्रदेश के आधे से ज्यादा जिले प्रभावित होते हैं। सरकार को मालूम है कि हर साल बाढ़ आती है, लेकिन सरकार ने आज तक इस बारे में क्या कदम उठाए हैं?

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य की कोई बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।

 

…( व्यवधान) *

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 * Not recorded.

* m10

SHRI UDAYANRAJE BHONSLE (SATARA): Hon. Deputy-Speaker, Sir, I would like to firstly thank you for giving me time to air my views before this august House.

            I would like to point out the uniqueness of the constituency that I represent. The name of the constituency is Satara. It is in the State of Maharashtra[m20] .

            Sir, if you see the premises of this Parliament House, out of all the statues that are erected of the legendary figures, five statues are of the legendary people who are from the constituency, the area from which I have got elected namely – Chhatrapati Shivaji Maharaj, Chhatrapati Sahu Maharaj, Dr.Babasaheb Ambedkar, Mahatma Jyotiba Phule and the former Deputy Prime Minister of India Shri Yashwantraoji Chavan. All these legendary figures have been a driving force and all of us get our inspiration from the deeds that they had done. I know none of us can reach those heights. But I must bring to the notice of this august House that by serving the aam aadmi we can strive towards perfection and the thoughts and the vision that they had and this way we will be following them. The State of Maharashtra has a peculiar shape or you can say location because if you see the map of India you can call the State of Maharashtra as a ‘mini-India’.

Through you, hon. Deputy-Speaker, I would like to congratulate the hon. Minister of Finance for the Budget that he has presented. In a situation of global economic slowdown he has rightly targeted the rural population which constitutes about 65 to 70 per cent of India. By targeting and providing extra funds in this Budget, not only will the farmers and the poor people benefit but also in return there will be an increase in the agricultural produce and there will be an increase in the upliftment of the downtrodden and the farmers who live in the villages. Also, this will create a larger customer base for the goods which are produced by 30 per cent of the population which lives in the urban area. I feel that this Budget has a rural face. But, apart from that, the hon. Minister of Finance has not forgotten the urban poor also. Through the Rajiv Awas Yojana the people living in the slums are also going to be benefited and we will, in future, have a slum-free India.

            In fact, I would like to point out that by doing so the hon. Minister of Finance, by prioritising agriculture, he has seen to it that India strives towards becoming a super power. Like there is the Great Wall of China, even if we build a Great Wall of India, not only can India survive in isolation but it can also cater to the demands, the needs of the rest of the world. By prioritising agriculture, India will, in future, become a super power.

            In the late eighties, hon. Deputy-Speaker, Sir, the then dynamic Prime Minister, late Rajiv Gandhiji rightly said that only 15 per cent of the fund trickles down to the end user who lives in the villages and the reason for this is the inefficiency in the bureaucracy. [k21] 

            Our hon. Finance Minister has said “…to convert words into deeds”. By this, it is his intention to fulfil Rajiv Gandhi’s dream. He has rightly done this by transferring fertiliser subsidy directly to the farmers. In fact, this was the dream of the Father of the Nation, Mahatma Gandhi, because indirectly we are striving for deepening and widening panchayati raj by decentralisation.

            Mr. Deputy-Speaker, Sir, now I would like to draw your attention to the State of Maharashtra. In fact, there is a Corporation for handling irrigation projects which, I think, must be the largest or the biggest ever formed by any State in India. It is worth over Rs. 10,000 crore. And, I was the Vice-Chairman of the Maharashtra Krishna Valley Development Corporation. Seventy per cent of the irrigation work has been completed, but at the same time, since many of the projects under this Corporation were not included in the Kendriya Jal Ayog, funds could not be allocated. Therefore, through you Mr. Deputy-Speaker, I would like to request the hon. Finance Minister to include the remaining projects not only of the Maharashtra Krishna Valley Development Corporation but also other corporations in the State of Maharashtra in the Kendriya Jal Ayog so that it is beneficial to the farmers, which has many effects because there will be upliftment of the people. There will be rise in the agricultural produce which in turn will create employment which will result in increase in the purchasing power. This will add indirectly to the increase in the Central Government’s revenues. Thus, I would like to request, through you, to the Finance Minister that the necessary funds should be allocated at the earliest.

I think that this will be a great tribute in the real sense to all the legendary figures not only from my area but also those from all over India, whose statues are erected in the Parliament House premises, which have been and will be a driving force for all parliamentarians belonging to the august House.

            Hon. Deputy-Speaker, Sir, through you, I would like to thank the Finance Minister for presenting an aam admi Budget.

Thank you hon. Deputy-Speaker, and all the hon. Members of the august House, for giving me the opportunity to air my views.

 

श्री शिवराज भैया (दमोह):  माननीय उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे आम बजट के संबंध में बोलने का समय दिया है, इसके लिए मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। मैंने माननीय वित्त मंत्री जी का भाषण बहुत गंभीरता से सुना है। इसमें कृषि विकास के संबंध में कॉलम27 में वर्ष 2009-2010 के लिए 3,32,000 रुपए का प्रावधान किया है और ऋण प्राप्त करने के लिए सात परसेंट की चर्चा की है लेकिन यह अल्पावधि ऋण की बात कही गई है। किसानों के लिए अल्पावधि में तीन लाख तक का ऋण कितना लाभकारी होगा, ये आप समझ सकते हैं।[r22] 

          अंत में माननीय वित्त मंत्री जी ने यह भी कहा है कि मुझे मालूम है देश की साठ प्रतिशत जनसंख्या अर्थात भारत की साठ प्रतिशत जनता अपना आहार कृषि से प्राप्त करती है। लेकिन भारत की साठ प्रतिशत किसानों की जनसंख्या की आज क्या हालत है, यह बहुत चिंता का विषय है और इस पर चिंतन होना चाहिए। यदि इन किसानों की चिंता भारत का यह सर्वोच्च सदन नहीं करेगा तो शायद कोई नहीं कर सकेगा।

          माननीय उपाध्यक्ष महोदय, मेरा विचार है कि भारत में दो संविधान काम करते हैं। एक सिर्फ किसानों के लिए काम करता है और दूसरा अन्य काम करता है। सदन को मालूम है कि जब भी कोई उत्पादन करता है तो उसमें अपनी लगी हुई पूंजी और लाभ को जोड़कर उसका मूल्य निर्धारित करता है और फिर पूरे भारत मे उसका वितरण होता है। परंतु किसान को यह अधिकार नहीं है। किसान अपने उत्पाद का मूल्य निर्धारित नहीं कर सकता। आश्चर्य की बात यह है कि किसान जब अपना माल मंडी में ले जाता है तो या तो उसके माल का मूल्य निर्धारण सरकार करती है अथवा व्यापारी उसका मूल्य निर्धारित करता है। यहां इस बात पर चिंता करने की आवश्यकता है कि वास्तव में जब उस किसान को खाने के लिए, बोने के लिए अनाज की आवश्यकता पड़ती है और जब वह अनाज लेने के लिए व्यापारी के पास जाता है तो उसकी कीमत भी व्यापारी बतलाता है। किसान से किसान का माल लेना हो तो व्यापारी मूल्य निर्धारित करेगा और यदि किसान को माल लेना हो तो भी व्यापारी मूल्य निर्धारित करेगा। यह कैसी विसंगति है। आज एक माचिस बनाने वाला कारखाना माचिस की पूरी लागत और उस पर अपना लाभ जोड़कर पचास पैसे में अपनी माचिस बेचता है। इन्हीं कारणों से किसान आज तक तरक्की नहीं कर सका बल्कि किसान कर्जदार होता गया और आज स्थिति यह है कि वह आत्महत्या करने के लिए मजबूर है।

          महोदय, यदि वास्तव में आज के किसान की माली हालत का, उसकी चिंता का, उसके दुख का यदि हम वर्णन करें तो हमारे पास शब्द नहीं होते। परंतु मैं एक किसान हूं और मैं जानता हूं, इसलिए किसान के इस दुख को इन शब्दों में मैं आपके सामने व्यक्त करता हूं –

          “दिन रात किया श्रम है हमने, पल एक भी चैन न पाया प्रभु।

 ढंकने को शरीर न वस्त्र मिले, भरपेट कभी नहीं खाया प्रभु।।

 हमको सुख हाय मिला न कभी, दुख नर्क से ज्यादा सताया प्रभु।

 वह कौन से पाप किये हमने, जो हमें दीन किसान बनाया प्रभु।।”

          उपाध्यक्ष महोदय, हमारा किसान रोता है, भगवान से प्रार्थना करता है कि भगवान हमने ऐसी कौन सी गलती कर दी, जो आपने मुझे दीन किसान बनाया। मैं यह जानता हूं कि किसान आज संतुष्ट नहीं हैं। पहले भारत में 85 प्रतिशत किसान हुआ करते थे, जो आज साठ प्रतिशत पर आ गये। 25 प्रतिशत किसान कहां चले गये, उनकी जमीन कहां चली गई, यह बहुत चिंता का विषय है। इसके अलावा मैं कहना चाहता हूं कि एक बार माननीय अटल बिहारी वाजपेयी, जब वह भारत के प्रधान मंत्री थे तो उन्होंने किसान के दुख को समझते हुए किसान क्रेडिट कार्ड बनाकर उन्हें साहूकारों के चंगुल से बचाने का प्रयास किया और उसके बाद मध्य प्रदेश के माननीय मुख्य मंत्री जी ने पांच प्रतिशत की ब्याज दर को घटाकर 1 जुलाई, 2009 से तीन प्रतिशत कर दिया है[BS23] ।

            किसानों को बचाने के लिये उन्हें सहयोग प्रदान किया। मेरा आपके माध्यम से सरकार से निवेदन है कि पूरे भारत में किसानों को 3 प्रतिशत के आधार पर ब्याज दर पर कर्जा मुहैया कराया जाये।

          उपाध्यक्ष जी, मध्य प्रदेश देश का सब से बड़ा पिछड़ा हुआ राज्य है। इसमें बुन्देलखंड का इलाका बहुत ही पिछड़ा हुआ है। मेरा संसदीय क्षेत्र दमोह इसमें आता है। यहां दो लाख गरीब परिवार हैं जिनके पास छत की व्यवस्था नहीं है। मजदूरी करके अपना जीवन-यापन करते हैं। उन्हें कुटीर उद्योगों के लिये धन मुहैया कराया जाये ताकि बुन्देलखंड में विकास कार्य को गति मिल सके और यह क्षेत्र आगे बढ़े।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया।

                                                                                     

SHRI KALYAN BANERJEE (SREERAMPUR): Hon. Deputy-Speaker, Sir, first of all, I fully support the Budget introduced by the Finance Minister Shri Pranab Mukherjee. However, I have some observations to make in respect of some provisions in the Speech of the hon. Finance Minister.

            First of all, I want to place before you, hon. Deputy-Speaker, Sir, that BPL cards are not really being given to the deserving persons. I would like to suggest to the hon. Finance Minister that let there be a statutory scheme in respect of distribution of BPL cards so that deserving persons, who are really the poor people of this country, can get the BPL cards.

Really, a great endeavour was made when the National Rural Employment Guarantee Act, 2005 was introduced in this august House, but unfortunately, in the Act itself, the Scheme was made in such a fashion that even if I have any complaint regarding non-extension of works to deserving persons, I have to lodge a complaint with the officer who is designated as the Programme Officer. Incidentally, that Programme Officer is also the Executive Officer of a Gram Panchayat. How the Secretary of a King can decide the complaint against the King? Let the Act be amended so that if any aggrieved person really lodges a complaint against the Gram Panchayat for non-distribution of works to a deserving person, that complaint may be heard by an independent authority, and the benefits should be given to the deserving persons, that is, the poor people of this country.

            Sir, I now come to a very important aspect, according to me, which was mentioned at para 133 of the Speech. The hon. Finance Minister, no doubt, is having the discretion or the power to disagree with the view of his predecessor. With great respect, although disagreement can be there, I do not find any reason as to why the disagreement has arisen. At least, on two occasions, the Apex Court of our country held that the Legal Services do not come within the purview of ‘commercial establishment’, nor do they come within the purview of ‘industrial establishment’. In our State, the Calcutta High Court held that Legal Services do not come even within the purview of ‘Shops and Establishment Act’. I do not know why it has been brought within the purview of the ‘Services’ category and, therefore, to be taxed. Today, most of the litigants’ cases are against Government’s functioning. Most of the poor people file their complaints against Government’s functioning before the Constitutional Courts. It is not that only arbitration cases or commercial cases are filed before the courts.[r24] 

Today, even in the Supreme Court it has gone up to more than one lakh cases. Now the service tax has been increased. I request the hon. Finance Minister to review it. I just point out about a vague thing. It has been said, “I propose to extend the service tax on advice, consultancy or technical assistance provided in the field of law.” What does it mean – technical assistance provided in the field of law? If a lawyer argues before a court of law, he comes within this category. Then in the next sentence it has been said, “This tax would not be applicable in case the service provider or the service receiver is an individual.” Sir, I have great respect for the hon. Finance Minister. I know that he is a pride of our country as a parliamentarian vis-à-vis a pride of our country as a Minister. But a service provider, means a lawyer also. If you go to a senior advocate, designated as the senior advocate under the Advocates Act, a senior advocate cannot function without having any assistance of a lawyer who is called an advocate on record. Therefore, the moment a person goes to a senior advocate, he has to pay the service tax. Now the expression used is ‘service individual’. What does the ‘service individual’ mean? If two workers go to a lawyer, they have to pay the tax. I can understand that in a commercial establishment or the corporate sector, taxes have been provided. Today in our country, there are maximum numbers of service matters, industrial dispute matters and constitutional matters that are coming. If two persons or two prisoners or two labourers go to a court of law, then they have to pay the tax. The moment it has become plural, they have been brought at the corporate level. Therefore, I request the hon. Finance Minister to kindly make a review of it. It would be a tremendous service. To get a justice is also a constitutional right. One goes either before a court of law or before a Minister or before the Government or the executive authority to get a justice. They are going for getting the justice. When one is fighting before a court of law for getting the justice, it would be my most humble submission before the hon. Finance Minister that this would be really unreasonable. I have fought such cases in the last three years. I had to fight out for the prisoners of Singur; I had to fight out for the Nandigram persons; I had to fight out for the poor people of West Bengal. If service tax is provided for two prisons, then it would be really unreasonable. If two women are raped and if they go to a lawyer, a senior advocate for consultation, in that case they have to pay the service tax. I would request the hon. Finance Minister to consider this aspect of the matter.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

SHRI KALYAN BANERJEE : I will conclude in two minutes.

            Now I come to another point. The Central Government has given extension to the fast track court up to 2010. After 2010, there is no scheme to extend it. I would request the hon. Finance Minister to extend the benefits of the fast track courts beyond 2010. A number of cases have been disposed of through the fast track courts in the last five to seven years. Therefore, I would make a request to the Finance Minister to extend the fast track courts even beyond 2010 so that the people of this country get the justice.

            I now come to para 88 of the Budget speech. There has been an increase of only Rs.10,000 in the income-tax limit. The exemption on the income-tax has been increased from Rs.1.80 lakhs to Rs.1.90 lakhs. I would request the Finance Minister that the exemption on income-tax should be at least increased up to Rs.2.50 lakhs so that the people really get the benefit of the income-tax.

            One of our friends from the other side was telling – I have come for the first time and I have forgotten the name – that the money for the MPLAD scheme should be increased. It should be increased from Rs.2.00 crore to at least Rs.5.00 crore.… (Interruptions)

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): Members will support it. [NR25] 

SHRI KALYAN BANERJEE : Kindly see, Sir, the Minister also agrees with my view. Let it be recorded that one of the Ministers also agrees with my suggestion. 

SHRI V. NARAYANASAMY: I made an observation that hon. Members also support it that is all. Do not put words in my mouth.

SHRI KALYAN BANERJEE: Le that also go on the record.

            Sir, I would once again request the hon. Finance Minister to review the paragraph which I have referred to.

श्री मुकेश भैरवदानजी गढ़वी (बनासकांठा):उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके ज़रिये सदन के ध्यान में यह बात लाना चाहता हूँ …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : यह रिकार्ड में नहीं जाएगा।

(Interruptions) …*

उपाध्यक्ष महोदय : यह रिकार्ड में नहीं जाएगा। यह प्राइवेट मैम्बर्स बिज़नैस का टाइम है।

(Interruptions) …*

उपाध्यक्ष महोदय : सिर्फ मैन्या जी की बात रिकार्ड में जाएगी।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कुछ भी रिकार्ड नहीं हो रहा है। टी. मैन्या जी, आप बोलिये। आप बोलना चाहते हैं?

…( व्यवधान)

 

 

 

* Not  recorded.

*श्री घनश्याम अनुरागी (जालौन): आपने आम बजट 2009-10 पर मुझे बोलने का अवसर दिया इसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं । मैं कुछ महत्वपूर्ण सुझाव इस बजट पर आपके माध्यम से माननीय वित्त मंत्री जी के संज्ञान में लाना चाहता हूं ।

        विडम्बना यह है कि इतने महत्वाकांक्षी बजट के बावजूद सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों जैसे कृषि, लघु उद्यम और सबसे बढ़कर गरीब आम आदमी की तरफ ध्यान नहीं दिया गया है । 10लाख 20 हजार करोड़ रूपए से भी अधिक के सरकारी खर्च में से कृषि सिंचाई और ग्रामीण विकास को मात्र 62, 837करोड़ ही मिले हैं जो कुल खर्च का मात्र 6औ ही है । ऐसे में माननीय वित्त मंत्री जी किस दम पर कृषि विकास को चार प्रतिशत तक ले जायेंगे । यह समझ से परे है । आज देश की कृषि व किसान संकट के दौर से गुजर रहे हैं । हम दालों, तिलहन और अनाज के लिए विदेशों पर निर्भर होते जा रहे हैं । हमारा किसान कृषि में हो रहे नुकसान के कारण या तो कृषि से विमुख हो रहा है या आत्महत्या कर रहा है । कृषि जो 1970-71में कुल राष्ट्रीय आय का 45औ से भी अधिक अर्जित करती थी, आज मात्र 18औ पर आ चुकी

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*Speech was laid on the Table

 

 

 

है। इसका अभिप्राय यह है कि कृषि क्षेत्र में कमाई घटती जा रही है । एक क्षेत्र जो 60औ से जयादा लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा हो, उसकी ऐसी दयनीय हालत के प्रति सरकार की संवेदनहीनतादेश के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं है । माननीय वित्त मंत्री जी यदि कृषि के विकास के लिए कोई महत्वाकांक्षी योजना प्रस्तुत करते तो बेहतर होता । माननीयमंत्री जी का यह कहना है कि वे प्रतिवर्ष 1 लाख लोगों को रोजगार दिलायेगें वास्तविकता के धरातल पर ठहरता नहीं हे । यह बात ठीक है कि सरकार बजट प्रावधानों के द्वारा राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत लोगों को तुरन्त रोजगार तो दे सकती है लेकिन यह कोई स्थायी व्यवस्था नहीं मानी जा सकती हे । रोजगार की स्थाई व्यवस्था के लिए ऐसी उत्पादन पद्धति की आवश्यकता होती है जिसमें रोजगार के अवसर स्वयमेव पैदा हों । ऐसी उत्पादन की पद्धति पिछले दो दशकों से जानबूझकर समाप्त की जा रही है । अगर सरकार रोजगार सृजन के बारे में ईमानदार है तो उसे लघु और कुटीर उद्यमों का सरकारी सहायता से विकास में आ रहे अवरोधों को दूर करना होगा । लेकिन अगर आर्थिक समीक्षा 2008-09 में कोई संकेत हो तो कहा जा सकता है तो सरकार आने वाले कुछ महीनों में ही खुदरा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए और अधिक खोलने जा रही है । ऐसे में बड़ी संख्या में छोटे-छोटे दुकानदार बेरोजगार हो सकते हैं ।

        यह चिंता का विषय है कि पिछले कई वर्षों से सामाजिक सेवाओं पर कुल सरकारी खर्च का अनुपात लगातार घटता जा रहा है । कुछ समय पूर्व तक जो 25औ तक पहुंच गया था वह आज 12औ तक आ गया है ।

        अति महत्वपूर्ण विषय में मैं आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि बुनकरों और शिल्पकारों की घोर उपेक्षा की गई है । बुनकर वह समाज है जिसने मनुष्य को सभ्यता देने का काम किया है । बच्चे के जन्म से ही कपड़े की आवश्यकता पड़ती है जो कि उसके जीवनपर्यन्त उपयोगी रहता है । यहां तक कि मृत्यु पर भी वही कपड़ा मृतक को उसकी अंतिम यात्रा तक साथ जाता है । जिस बुनकर समाज ने मनुष्य के तन को ढ़कने का काम किया वही बुनकर समाज आज भुखमरी के कगार पर है और कोई सरकार उसके बारे में सोच नहीं रही है । मैं अध्यक्ष महोदया आपके माध्यम से केन्द्र सरकार और विशेषकर वित्त मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि बुनकर समाज के लिए ऐसी रियायतें दी जाएं जिससे कि वह अपना जीवनयापन सुगमता से कर सकें तथा इस सम्पूर्ण समाज को कपड़े से संबंधित सभी सरकारी विभागों में नौकरियों में कम से कम 25औ का आरक्षण सुनिश्चित किया जाए ।

        कृषि के क्षेत्र में आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा । यदि फर्टिलाईजर की बात करें तो सरकार ने फर्टिलाईजर पर सबसिडी देने की तो बात कही है लेकिन यूरिया से सबसिटी हटा ली गई है और नाइट्रोजन पर बढ़ा दी गई है । ऐसा तो है नहीं कि यूरिया की खपत कम हो गई हो । यह तो वही बात हुई कि एक तरफ से कान को एक हाथ से छोड़कर दूसरे हाथ से पकड़ लिया ।

        सरकार ने काम करने के उपाय तो कम किए हैं लेकिन उम्मीदें ज्यादा हैं । आर्थिक सर्वेक्षण में तो बातें कही गई हैं, बजट में उसकी छाया मात्र भी नहीं है ।

        देश में बिजली की कमी को देखते हुए सरकार को बड़ी-बड़ी विद्युतीकरण की परियोजनाओं का निर्माण कराने की तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि किसानों को, लघु उद्योगों को बिजली मिल सके क्योंकि मशीनरी बिजली पर आधारित हो गई है । कृषि और उद्योग तो बिजली पर आधारित हो गई है । कृषि और उद्योग तो बिजली के बिना एकदम पंगू हो गए हैं ।

        पानी की बहुत बड़ी समस्या से आज देश गुजर रहा है । सावन का महीना चल रहा है लेकिन सूखे की कगार पर देश पहुंच गया है । धान की रोपाई नहीं हो पा रही है। विशेषकर खरीफ की फसल नहीं बोई जा पा रही है । सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि देश में जब बाढ़ आए तो उसके पानी का उपयोग किए जाने की आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए । ताकि यह पानी झीलों, तालाबों और कुंओं इत्यादि में वाटर हारवेस्टिंक के उपयोग में लाया जा सके । यह एक कृषि प्रधान देश है । हमें कृषि और कृषक दोनों पर ध्यान देने की आवश्यकता है । हमारे देश का मजदूर एवं नौजवान खाली बैठा है इनके लिए नौकरी की व्यवस्था की जानी अति आवश्यक है ।

        यह बजट ऊपरी तौर पर ही ऐसा लगता है कि यह बड़े पूंजीपतियों, बड़े व्यवसायियों के हित को ध्यान में रखकर बनाया गया है । जबकि किसान, मजदूर, बेरोजगार नौजवान, शिक्षा, कृषि, लघु उद्योग, बुनकरों, काश्तकारों आदि की घोर उपेक्षा या ऐसा कहा जाए कि अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है ।

        इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देते हुए इस बजट का समर्थन इस अपेक्षा से करता हूं कि मेरे द्वारा इस बजट पर तो महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं, उन पर माननीय वित्त मंत्री जी अवश्य ही ध्यान देंगे ।

       

           

           

           

 

           


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