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Discussion On National Rural Employment Guarantee Bill, 2004. on 18 August, 2005

Lok Sabha Debates
Discussion On National Rural Employment Guarantee Bill, 2004. on 18 August, 2005


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Title : Discussion on National Rural Employment Guarantee Bill, 2004.

14.10 hrs.

The Lok Sabha re-assembled after Lunch at ten minutes past

Fourteen of the Clock.

 

                                                (Mr. Speaker in the Chair)

14.11 hrs.s

NATIONAL RURAL EMPLOYMENT GUARANTEE BILL, 2004

 

MR. SPEAKER:  The House shall now take up item No. 15, namely, National Rural Employment Guarantee Bill.  Dr. Raghuvansh Prasad Singh.

            Where is Dr. Raghuvansh Prasad Singh?  I hope he is not unemployed!

ग्रामीण विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्रीमती सूर्यकान्ता पाटील) : माननीय मंत्री जी आ गए हैं।

MR. SPEAKER: He is coming fully fortified … (Interruptions)

ग्रामीण विकास मंत्री (डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह) : अध्यक्ष महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं:

“ कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धन गृहस्थियों की आजीविका की सुरक्षा को, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में, प्रत्येक गृहस्थी को जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक कार्य करने के लिए स्वेच्छा से आगे आते हैं, कम से कम सौ दिनों का गारंटीकृत मज़दूरी नियोजन उपलब्ध कराकर, वर्द्धित करने तथा उससे संसक्त या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए। ”

श्री थावरचंद गेहलोत (शाजापुर) : अध्यक्ष महोदय, आज की कार्यसूची में भी ‘अवयस्क’  शब्द लिखा है जबकि ‘वयस्क’ होना चाहिए। मैं इसकी ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं।

MR. SPEAKER: Do you want to say something on this?

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : अध्यक्ष महोदय, सबसे पहले हम आपके प्रति आभार व्यक्त करते हैं और धन्यवाद देते हैं कि इस तरह के ऐतिहासिक बिल को इस सदन में इंट्रोडयूस करने, स्टैंडिंग कमेटी में भेजने के बाद प्रतिवेदन प्राप्त करने और इस सदन में विचार तथा पारित करने के लिए आपने कृपा कर अनुमति दी। इसके बाद मैं हिन्दुस्तान की करोड़ों जनता खासकर गांव-देहातों के ७२ करोड़ गरीब लोगों की ओर से माननीय प्रधान मंत्री जी को तथा माननीय श्रीमती सोनिया गांधी जी को धन्यवाद देना चाहता हूं, कोटि-कोटि ज़िन्दाबाद बोलना चाहता हूं कि इस तरह के ऐतिहासिक, ग्रामोन्मुखी, गरीबोन्मुखी तथा इतिहास का निर्माण करने वाले विधेयक को लाने के लिए प्रेरित किया, मंजूरी दी और हमें प्रोत्साहन दिया। हम स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन श्री कल्याण सिंह जी और उस समति के सभी सदस्यों के प्रति भी आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने गहन छानबीन करके अनुशंसा की जिससे हमें इस विधेयक को लाने और मंज़ूर कराने में बल मिला। महोदय, हम इस सदन के नेता श्री प्रणव मुखर्जी जो इस विधेयक से संबंधित ग्रुप ऑफ मनिस्टर्स के अध्यक्ष थे, उनके प्रति और उनके ग्रुप ऑफ मनिस्टर्स के सदस्यों के प्रति भी आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने गंभीर चिन्तन, बहस, मंथन और विचार-विमर्श के बाद इस विधेयक को और सबल तथा मज़बूत बनाने का प्रयत्न किया, सहायता की और प्रोत्साहन दिया। हिन्दुस्तान के वामपंथ के सभी नेता, कॉमरेड और दोस्तों के प्रति भी हम आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने बड़ी मुस्तैदी से इस विधेयक को लाने में मदद की और मार्गदर्शन किय्ाा[h29] । हमारे यूपीए के सहयोगी सदस्य समाजवादी पार्टी और बीएसपी के सभी सदस्यों के प्रति आभार प्रकट करता हूं।

श्री मोहन सिंह (देवरिया) : आपको हमारी याद भी आ ही गई।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : आप सभी ने इंतजार किया कि कब विधेयक आ रहा है और जल्दी से इस विधेयक को पारित करना चाहिए। इसके लिए मैं पूरे सदन के प्रति आभार प्रकट करता हूं। सभी माननीय सदस्यों ने इसे पारित करने के लिए विशेष रूचि ली है। लोगों ने जागरूकता से प्रयत्न किया है कि यह विधेयक आए और मंजूर हो।

महोदय, मई २००४ में यूपीए सरकार बनी, तो नेशनल कॉमन मनिमम प्रोग्राम हिन्दुस्तान की जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बनाया गया और हिन्दुस्तान में जो समस्यायें हैं, उनका समाधान करने के लिए नेशनल कॉमन मनिमम प्रोग्राम तय किया गया। उसके प्रति हम वचनबद्ध हैं और उस प्रोग्राम की यूएनओ के लोगों ने भी प्रशंसा की है और देशव्यापी और विश्वव्यापी स्तर पर उसकी प्रशंसा हुई है। उसके तहत नंबर एक पर हमारा कमिटमेंट हिंदुस्तान की दो प्रमुख समस्याओं का समाधान करना था, जो हिंदुस्तान के माथे पर कलंक हैं- बेरोजगारी और गरीबी। इन दोनों समस्याओं के खिलाफ किस तरह हमला किया जाए, इसके बारे में नेशनल कॉमन मनिमम प्रोग्राम के जरिए प्रयास किया गया और बेरोजगारी को हटाने के लिए गावों से जो व्यक्ति काम की खोज में शहरों की ओर पलायन करते हैं, उनके पलायन को रोकने के लिए और गांवों में लोगों को रोजगार देने के लिए एक परिवार में कम से कम सौ दिनों के रोजगार की गारंटी निश्चित करने का प्रयास किया है। उन्हें रोजगार का कानूनी अधिकार दिया जाए। काम के अधिकार के प्रति यह सबसे बड़ा कदम है और गरीबी और बेकारी के खिलाफ युद्ध और महायुद्ध में सबसे बड़े हथियार के रूप में ऐतिहासिक नेशनल रूरल एम्प्लायमेंट गारंटी कानून काम आएगा। गांव-गांव में इस बात की चर्चा है कि अब गांव से बाहर नहीं जाना पड़ेगा। अब यहीं हमें काम मिलेगा। यूपीए की सरकार ने इसे कानून बनाने का काम किया है, जिस कानून के तहत हमें अधिकार होगा कि एक परिवार में कम से कम सौ दिनों के काम की गारंटी हो। इसका विवरण हम दे रहे हैं। हिंदुस्तान की समस्याएं क्या हैं, श्री गोपाल सिंह नेपाली की कविता की कुछ पंक्तियों को मैं सदन को बताना चाहता हूं :

दिन गए बरस गए यातना गई नहीं, रोटियां गरीब की प्रार्थना बनी रहीं,

श्याम की बंसी बजी राम का धनुष चढ़ा,

बुद्ध का भी ज्ञान बढ़ा

निर्धनता गई नहीं, निर्धनता गई नहीं।

महोदय, हिंदुस्तान की क्या परिस्थिति है? एक से एक महान लोग आए, लेकिन निर्धनता, गरीबी, बेकारी अभी भी हमारे देश में मौजूद हैं। इसका एक कारण है, श्री मल्होत्रा जी यहां बैठे हुए हैं, राजकवि श्री दिनकर जी ने कहा है कि –

“स्वानों को मिलता दूध दही, भूखे बच्चे इठलाते हैं,

मां की छाती से चिपक-चिपक, बच्चे जाड़े में अकुलाते हैं।

इसकी अगली पंक्ति इस प्रकार है –

“दूध ही दूध हो, तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं,

हटो व्योम से मेघ पंथ, स्वर्ग लूटने हम आते हैं।”

महोदय, जब तक गैर-बराबरी नहीं मिटेगी और गरीबों की तरफ हम ध्यान नहीं देंगे, तब तक गांव से गरीबी और बेरोजगारी कैसे हट सकती है? इसलिए इस तरह का विधेयक लाने का काम किया गया है। हमारे कामन मनिमम प्रोग्राम में पुअर हाउस होल्ड था अब पुअर को हमने हटा दिया है। लोगों की मांग से, नेशनल एडवाजरी काउंसिल और स्टैंडिंग कमेटी आदि तमाम लोगों के सुझाव से हम सहमत हुए हैं[i30] ।

 

  अध्यक्ष महोदय, इसमें हमने कहा कि नहीं पूअर हाउसहोल्ड ही नहीं बल्कि एवरी हाउसहोल्ड। किसी परिवार का कोई भी आदमी जो काम मांगने आएगा, उसे १०० दिनों के रोजगार की गारंटी दी जाएगी। हमारे कॉमन मिनीमम प्रोग्राम के तहत फूड फॉर वर्क कार्यक्रम की शुरूआत राजसत्ता में आने के बाद सातवें महीने में, १४ नवम्बर, २००४ को पं. जवाहर लाल नेहरू जी के जन्म दिवस पर आंध्राप्रदेश के रंगा जिले से प्रधान मंत्री जी द्वारा की जा चुकी है। उसके बाद यह ऐतिहासिक विधेयक आया है। मैं इस विधेयक को ऐतिहासिक इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आज से १४-१५ वर्ष पहले जब स्व. राजीव गांधी प्रधान मंत्री थे, तब उनके समय में वह मशहूर विधेयक, ७३वें संविधान संशोधन के माध्यम से, पंचायतीराज का आया था। उसके माध्यम से पंचायतीराज को मुकम्मल करने, पांच वर्ष के अंदर अनिवार्य रूप से वोट के द्वारा पंचायत का चुनाव करने का नियम बनाया गया था। उसके तहत देश भर में ३० लाख चुने हुए प्रतनधि पंचायतराज के हैं। इसमें एक-तिहाई महिलाएं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोग भी हैं। पंचायतीराज की मजबूती के लिए देश भर में संविधान की धारा २४३ में संशोधन कर के मुकम्मल किया गया कि हिन्दुस्तान में पंचायतीराज को बल दिया जाए। स्व. राजीव गांधी जी का सपना था, जिसके तहत ७३वां संविधान संशोधन विधेयक आया, पारित हुआ और लागू हुआ।

महोदय, मैंने इसलिए इसे ऐतिहासिक विधेयक कहा है क्योंकि जब से ग्रामीण विकास मंत्रालय का निर्माण हुआ है, तब से यह दूसरा विधेयक है। पहला विधेयक पंचायतीराज का था और दूसरा रष्ट्रीय ग्रामीण निजोयन गारंटी विधेयक, २००४ है, जो आज आपके सामने विचार हेतु प्रस्तुत है। ग्रामीण विकास विभाग, गरीबों का विभाग है। इसमें कानून बनाने की अधिक गुंजाइश नहीं है। इसलिए इस विभाग का जो भी विधेयक बन रहा है, वह गांव के भले के लिए, गरीबों की सहायता के लिए, गरीब को छूने के लिए, गरीबी को हटाने के लिए बन रहा है। इसीलिए हमने इसे ऐतिहासिक विधेयक कहा है।

महोदय, लोगों ने मांग की है कि इसे पूरे देश में लागू किया जाए। मैं बताना चाहता हूं कि फूड फॉर वर्क कार्यक्रम देश के १५० जिलों में चल रहा है। इसमें ५० जिले और जोड़कर इसे २०० जिलों में चलाया जाएगा। देश भर में ६०० जिले हैं। पूरे देश में इसे पांच साल के अंदर चलाया जाएगा। इसके अंदर जो प्रावधान किया गया है, उसके जरिए गरीबों को रोजगार की गारंटी पूरे देश भर में दी जाएगी। ऐसा मौका नहीं आने दिया जाएगा कि बेरोजगारी भत्ता देना पड़े, लेकिन यदि खुदा-न-खास्ता ऐसा मौका आ भी जाए, जब किसी परिवार का कोई आदमी काम मांगने आए और उसे १५ दिन रोजगार उपलब्ध न कराया जा सके, तो उसे बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। बेरोजगारी भत्ते की मात्रा कितनी होगी, अब मैं वह बताना चाहता हूं। एक साल में १०० दिन के रोजगार की जो मजदूरी होगी, उतना बेकारी भत्ता उसे बैठे-बैठे दिया जाएगा। इसलिए इसके कार्यान्वयन में पंचायतीराज की प्रखंड स्तर और जिला स्तर पर अहम भूमिका होगी। जो पंचायत के चुने हुए प्रतनधि होंगे, उन्हें मजदूरों का रजिस्ट्रेशन करने, योजनाओं का चयन करने, काम को मंजूरी देने का काम सौंपा गया है। उन्हें असिस्ट करने के लिए एक प्रोग्राम आफीसर बहाल होगा[rpm31] ।

[i32] 

जिसके चलते उसका कार्यान्वयन किया जायेगा। यह हुआ कि इसमें मजदूरी क्या मिलेगी। मजदूरी देश भर में भिन्न-भिन्न है, ४० रुपये भी है, ५० रुपये भी है, ६० रुपये भी है और १३४ रुपये भी है, सभी तरह की मजदूरी है। हमने ओरिजनल बिल में कहा था कि स्टेट में जो मनिमम वेज है, उसी को हम लागू रखेंगे, लेकिन सभी लोगों से विचार-विमर्श के बाद हुआ कि नहीं, देश भर में एक तरह का मनिमम वेज ६० रुपये एक दिन की मजदूरी को लागू किया जाये, वह हम संशोधन में लाय हैं और न्यूनतम मजदूरी ६० रुपये होगी, उससे कम नहीं होगा। देश भर में हम एक मजदूरी देंगे, इसका प्रावधान संशोधन में किया गया है।

आगे हुआ कि कौन-कौन से काम इसमें लिए जाएंगे। अध्यक्ष महोदय, आपकी अध्यक्षता में पानी के सवाल पर कमेटी का गठन हुआ है। उस दिन प्रधानमंत्री जी लाल किले से भाषण कर रहे थे कि पानी के सवाल पर देश में जबरदस्त संकट आने वाला है, इसलिए टॉप प्रायरटी वाटर कंजर्वेशन को, ड्राउट प्रूफिंग को, फ्लड प्रूफिंग को, फोरेस्ट्री को, इर्रीगेशन को, नहर बनाने को दी गई है, यह सभी उसमें हैं, इसमें सभी तरह का काम होगा। इससे भी अधिक काम छूट जाये तो राज्य सरकार के परामर्श से और नया काम भी उसमें जोड़ा जा सकता है, लेकिन गांवों को रोजगार मिलना है, गांव के गरीबों को रोजगार मिलना है, किसी भी हालत में देना है, इस तरह का प्रावधान इसमें किया गया है।

फिर सवाल हुआ कि उसमें स्टेट के कंसलटेशन से केन्द्र सरकार उसमें नये काम को भी जोड़ने का काम है। किस जमीन में काम होगा, सरकारी जमीन में काम होगा। कहा कि नहीं, केवल सरकारी जमीन में ही नहीं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की जमीन में भी काम हो सकता है। कहा कि नहीं, इतने से काम नहीं चलेगा, फिर लैंड रिफाम्र्स के अधीन जो लाभार्थी हैं, जिनको १-२ एकड़ जमीन मिलती है, उसमें भी काम होगा। इस तरह से इन्दिरा आवास योजना के लोग, जो गरीबी रेखा के नीचे हैं, जो उसके हकदार हैं, उनकी जमीन में भी काम का प्रावधान किया गया है। किसी व्यक्ति को किसी भी हालत में काम की कमी नहीं होने पाये, लोगों को मजदूरी भी मिले, साथ ही साथ परमानेंट असेट, स्थायी सम्पत्ति की भी सृजन हो, जिससे ससटेनेबल एम्पलायमेंट जनरेशन हो, उसके लिए इसमें प्रावदान किया गया है।

इसके आगे इसमें नियंत्रण, निगरानी की बात है। कहा गया कि फंड की कमी हो जायेगी। फंड की कमी नहीं होने दी जायेगी। इसमें स्टेट गारण्टी फंड का प्रावधान किया गया है, उसमें फंड नहीं घटने देंगे। राज्य सरकारों को आशंका थी कि फंड घट जायेगा, कहीं काम में देर हो जायेगी, अनएम्पलायमेंट एलाउंस हमको देना है तो फिर राज्य सरकार को पैसा देने में विलम्ब के चलते हमको अनएम्पलायमेंट एलाउंस देना पड़ेगा। कहा गया कि नहीं, हम एटार्नी फंड का एडवांस पैसा भुगतान करेंगे, राज्य में जमा रखेंगे, पैसे की कमी नहीं होने दी जायेगी और यदि हो जायेगी, यदि कहीं किसी भी हालत में कमी हो जाये तो रूल में हम प्रावधान करेंगे कि हम उसका राज्य को दण्ड नहीं लगने देंगे, उसका कम्पेंसेशन भी हम देंगे। राज्य सरकार को हम घाटा उसमें नहीं लगने देंगे, उन पर बोझ नहीं बढ़ने देंगे, इसलिए कि यह जो ऐतिहासिक कानून गरीबों के लिए बनने जा रहा है, इस कानून को लागू करने में हमें राज्य सरकारों का सहयोग चाहिए, पंचायती राज इंस्टीटयूशंस का, देश के तमाम बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री लोगों का, एन.जी.ओज़. का, जितने लोग हैं, सभी के सहयोग और समर्थन की जरूरत है, क्योंकि यह गांव और गरीब का विषय है। बिना सब के सहयोग के यह काम नहीं होगा। निगरानी के लिए तमाम माननीय सदस्यों का सहयोग चाहिए। इसमें प्रावधान किया गया है, जब गांव में जाने का सवाल उठता है, जाने का बराबर सवाल उठता है, पैसा कहां से आयेगा। नम्बर एक यह सवाल उठता है कि पैसा कहां से आयेगा। कुछ लोगों का प्राण छूट रहा है कि पैसा कहां से आयेगा। देश कहां के पैसे से कैसे चलता है, ७०-७२ करोड़ लोग ६ लाख गांवों में बसे हुए हैं।[i33] 

उनकी हिस्सेदारी हिन्दुस्तान के खजाने में है। लेकिन लोग कहते हैं कि पैसा कहां से आएगा। यह चौड़ी छाती और बड़े दिमाग का काम है। इंडिया शाइनिंग से हिन्दुस्तान आगे नहीं बढ़ेगा। प्रधानमंत्री जी ने लाल किले से तीन-चार दिन पहले ऐलान किया था कि रोजगार बढ़ाओ, गरीबी हटाओ। केवल नारे से ही रूरल इंडिया का विकास नहीं होगा। जबानी जमा खर्च से नहीं होगा। प्रधानमंत्री जी ने १५ अगस्त को ऐलान किया और आज आपके सामने रोजगार गारंटी विधेयक आ गया है। पिछले वर्षों का बजट मैंने देखा है दो हजार करोड़ रूपये, चार हजार करोड़ रूपये। यूपीए की सरकार आयी और ग्रामीण विकास मंत्रालय का बजट पिछले साल १६ हजार करोड़ रूपये था, इस साल १६ से बढ़ाकर २४ हजार करोड़ रूपये हो गया है। लोग कहते थे कि रोजगार गारण्टी विधेयक के लिए बजट कहां से आएगा, पैसा कहां से आएगा? दूसरा सवाल है, पैसा गांव में जाता है, लेकिन खर्च नहीं होता है, उसमें हेरा-फेरी होती है। इस विधेयक में भ्रष्टाचार और हेराफेरी की कोई गुंजाइश नहीं होगी। स्ट्रीक्ट वजिलेंस, लोगों की भागीदारी और पारदर्शिता तीन सूत्री फार्मूले को इसमें अपनाया गया है। इसके साथ ही तमाम माननीय सदस्यों का सहयोग भी इसमें चाहिए, उनके दिशा-निर्देश चाहिए, सब की सक्रिय भागीदारी चाहिए। जो पैसा यहां से जाएगा, उसकी पाई-पाई गांव के गरीब के हाथ में जाएगी। इसमें ऐसा प्रावधान किया गया है। इसमें पंचायतों की भी जिम्मेदारी होगी। ग्राम सभा को भी इसमें अधिकार दिया गया है, क्योंकि यह एक कंस्टिटयूश्नल बॉडी है। धारा ३४३ में ग्राम सभा के बारे में कहा गया है। लाख दुखों की एक दवा ग्राम सभा। ग्राम सभा भंग नहीं की जा सकती है। लोक सभा और विधान सभा भंग हो सकती है, लेकिन ग्राम सभा को भंग करने का प्रावधान नहीं है। वह अजय-अमर संस्था है। ग्राम सभा गांव की असेम्बली है। उसमें सामाजिक भागीदारी का प्रावधान है। इसमें कोई हेराफेरी न हो सके, गांव में सही ढंग से पैसा गरीब के पास पहुंच सके। परमानेन्ट एसट्स का सृजन हो। उसकी गुणवत्ता में कोई खराबी न आए। महात्मा गांधी जी का कहना था कि जब तक गांव का विकास नहीं होगा तब तक देश का विकास नहीं हो सकता है। हिन्दुस्तान गांवों में बसता है। जब तक गांव में समृद्धि नहीं आएगी तब तक वर्ष २०२० का सपना पूरा नहीं हो सकता है। वर्ष २०२० तक हिन्दुस्तान दुनिया के देशों की अगली पंक्ति में आने का सपना देखता है। जब तक हमारे गांवों का विकास नहीं होगा तब तक हम दुनिया के अगले देशों की पंक्ति में नहीं आ सकते हैं। बेरोजगारी और गरीबी के खिलाफ जंग नहीं महाजंग की जरूरत है और यह उसकी तरफ एक ठोस कदम है। इसमें एक प्रोग्राम अफसर भी होगा। जिला पंचायत के लोग उसकी देखभाल और निगरानी के लिए रहेंगे। जो ५० मजदूर छूटेंगे, उन्हें अनिवार्य रूप से काम दिया जाएगा। गांव के सवार्ंगीण विकास की एक योजना बनी हुई है, एक पर्सपेक्टिव प्लान बना हुआ है। फूड फार वर्क के तहत जो एक्शन प्लान बना हुआ है, उसके आधार पर काम की कमी नहीं होने दी जाएगी[MSOffice34] । उसमें पैसे की कमी नहीं होने दी जाएगी और इम्प्लॉयमैंट गारंटी कानून लागू किया जाएगा। इसमें सबके सहयोग की जरूरत है।…( व्यवधान) 

[R35] 

अध्यक्ष महोदय : आप माननीय सदस्यों की बात तो सुनिए।

…( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हम सदन से प्रार्थना करते हैं कि इस ऐतिहासिक विधेयक पर सदन में गंभीर बहस करके इसे सर्वसम्मति से पारित किया जाए। गांवों में यह संदेश चला जाए कि रोजगार गारंटी कानून आ गया और यूपीए सरकार की कॉमन मनिमम प्रोग्राम में जो वचनबद्ध है, हमने उसे कार्यान्वित किया। इससे गांवों का विकास नहीं रुकेगा, गांवों की समृद्धि नहीं रुकेगी, देश में बेकारी, बेरोजगारी और गरीबी नहीं टिकेगी। इसमें बहुत विघ्न आ सकती हैं और आती हैं।

राष्ट्रकवि दिनकर ने कहा है –

वसुधा का नेता कौन हुआ

भूखंड विजेता कौन हुआ

अतुलित यशक्रेता कौन हुआ

नवधर्म प्रणेता कौन हुआ

जिसने न कभी आराम किया

विघ्नों में रहकर काम किया

गरीबों के लिए संग्राम किया

रोजगार कानून को अंजाम दिया।

इम्प्लॉयमैंट गारंटी कानून जिन्दाबाद, ग्रामीण विकास और ग्रामीण समृद्धि जिन्दाबाद, जिन्दाबाद।

MR. SPEAKER: Motion moved:

 

“That the Bill to provide for the enhancement of livelihood security of the poor households in rural areas of the country by providing at least one hundred days of guaranteed wage employment in every financial year to every household whose adult members volunteer to do unskilled manual work and for matters connected therewith or incidental thereto, be taken into consideration. ”

 

 

 

श्री कल्याण सिंह (बुलन्दशहर) : अध्यक्ष महोदय, मैं बड़े सम्मान के साथ आपके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं कि आपने बहुत महत्वपूर्ण विधेयक पर मुझे चर्चा करने का अवसर प्रदान किया। वैसे मैं इस लोक सभा में पहली बार कुछ बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। मुझे ऐसा लग रहा है कि यूपीए की चेयरपर्सन माननीय श्रीमती सोनिया गांधी भी आज पहली बार लोक सभा में बोलेंगी। यह संयोग ही है।

मैं स्वीकार करता हूं कि सरकार की ओर से बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रामीण रोजगार गारंटी विधेयक प्रस्तुत हुआ है। मैं मंत्री जी को दो बातों के लिए बधाई देना चाहता हूं। करीब पचास वर्षों के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि जब तक गांवों का विकास नहीं होगा, तब तक देश का विकास नहीं होगा। मैं केवल आलोचना करने के लिए खड़ा नहीं हुआ हूं, केवल अपनी बात कहना चाहता हूं। पिछले ५८ वर्षों में से शायद ४५-५० वर्षों तक कांग्रेस का ही शासन रहा है । आज जो देश की स्थिति है, गांव आज उजडे हैं, पिछड़े हुए हैं, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह सही बात पहले से क्यों नहीं स्वीकार की गई कि जब तक देश के गांवों में रहने वाली तीन-चौथाई आबादी का उत्थान नहीं होगा, तब तक इस देश का विकास नहीं हो सकता।…( व्यवधान) 

अध्यक्ष महोदय : आप चेयर को ऐड्रैस कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री कल्याण सिंह (बुलन्दशहर) : मैं इसलिए बधाई देना चाहता हूं कि ४५-५० वर्ष के बाद ही सही, लेकिन सही द्ृष्टिकोण अपनाया है। दूसरी बधाई इस बात के लिए देना चाहता हूं कि अभी तक कांग्रेस ने गरीबी हटाओ के नारे से देश को भ्रम में डाल रखा था। इसके आधार पर चुनाव लड़ा और जीता भी गया। आम पब्लिक समझ ही नहीं पाई कि इस नारे का अर्थ क्या है। मुझे खुशी है कि मंत्री जी ने आज स्वीकार किया है कि गरीबी हटाओ का नारा लगाने से गरीबी नहीं हट स्ाकती[R36] ।

[r37] 

 वह चीज हटती है, जो होती है। गरीबी अपने में कुछ नहीं है। गरीबी तो किसी चीज का नतीजा है। गरीबी बेरोजगारी का नतीजा है। जिस हाथ को काम मिल जायेगा, उसकी जेब में दाम आ जायेगा, और उसके आंगन में खुशहाली आ जायेगी। जो हाथ खाली रह जायेगा, उसकी जेब खाली रह जायेगी, और उसके आंगन में कंगाली आ जायेगी। इसलिए यदि गरीबी मिटानी है, तो इस देश में जो भयंकर बेरोजगारी है, वह मिटानी होगी ।

        अध्यक्ष महोदय, यह जो ग्रामीण रोजगार गारंटी बिल आया है, वह उस दिशा में एक कदम है, इसे मैं स्वीकार करता हूं। आपने कहा कि यह बिल बड़ा ऐतिहासिक है। मैं मानता हूं कि यह बिल ऐतिहासिक है क्योंकि यह पहली बार आ रहा है। आपने कहा कि यह बड़ा महत्वपूर्ण है। इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है। यह बिल महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन इसको ऐतिहासिक बनाने, महत्वपूर्ण बनाने, कारगर बनाने, बेहद प्रभावी बनाने और बेरोजगारी की इस विकराल समस्या का निदान करने के लिए इस बिल में जो कुछ आना चाहिए था. उसमें कुछ न कुछ खामियां, कुछ न कुछ कमजोरियां रह गयी हैं।

अध्यक्ष महोदय, आपकी कृपा से यह बिल हमारी स्थायी कमेटी के सामने आया था। इस पर स्टैंडिंग कमेटी ने पब्लिक, विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और राज्य सरकारों से इंटरैक्शन किया और उसके आधार पर हमने ३३ मुद्दों पर विचार करके ५३ संस्तुतियां दीं। मुझे इस बात का फ़ख्र है कि उस कमेटी की सारी संस्तुतियां और पूरी रिपोर्ट सर्वसम्मत है। किसी भी मुद्दे पर दो राय नहीं है। मैं आशा करता था कि कमेटी की इस सर्वसम्मत रिपोर्ट को सरकार महत्व देगी। लेकिन मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि चंद छोटी-छोटी चीजों के अलावा जो संस्तुतियां आर्थिक नीति पर विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र की आर्थिक नीतियों में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सकती हैं, मेजर चेंजिस ला सकती हैं, उनकी उपेक्षा कर दी गयी।

अध्यक्ष महोदय, पहली बात यह है कि यह बिल बिना पूर्व तैयारियों के साथ पेश हुआ है। इसके लिए तैयारियाँ चाहिए थी ।  मेरी जानकारी के अऩुसार सरकार के पास इस बिल से संबंधित कोई डाटा ही नहीं है कि बेरोजगारी कितनी है। भारत सरकार की तरफ से मोटे तौर पर जो छ: योजनाएं चालू की गयी थीं, अगर तैयारी होती तो उन योजनाओं से भी यह सबक सीख सकते थे। मैं पूछना चाहता हूं कि ये योजनाएं क्यों फेल हो गयीं ?  क्या डिलवरी मैकेनिज्म में कोई कमी थी ?   क्यों अरबों रुपया हमारा बेकार चला गया और लोगों को राहत नहीं मिल पायी ? 

अध्यक्ष महोदय, पहली जवाहर रोजगार योजना थी, जो फेल हो गयी। दूसरी,इम्प्लायमैंट ऐश्योरेंस स्कीम थी, वह भी फेल हो गयी। तीसरी, जवाहर ग्राम समृद्धि योजना थी, वह भी फेल हो गयी। चौथी, सुनिश्चित रोजगार योजना थी, वह भी फेल हो गयी। पांचवीं, काम के बदले अनाज की योजना थी, वह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी। इसके बाद सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना आई। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या इन योजनाओं के ऊपर कोई विचार हुआ ?  क्या उन योजनाओं की समीक्षा हुई ?  क्या मूल्यांकन किया और समय-समय पर उस मूल्यांकन की पृष्ठभूमि में सरकार ने इस बिल को तैयार करने में उन बिन्दुओं से कुछ सीखा है ?  मेरा इतना ही कहना है कि यह बिल बिना पूर्व तैयारी के लाया गया है क्योंकि गत योजनाओं के कटु अनुभवों से सरकार ने कुछ नहीं सीखा ।

अध्यक्ष महोदय, ये योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन करने के लिए बनायी गयी थीं, लेकिन रोजगार सृजन कहां हो रहा है ?  अगर इन योजनाओं से ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सृजन होता तो हमें खुशी होती। आज रोजगार सृजन नहीं हो सका इसलिए सरकार को यह ग्रामीण रोजगार गारंटी बिल लाना पड़ा है। मैं इस बिल का स्वागत करता हूं, यह मैंने पहले कह दिया [r38]है।cc

श्रीमन, न तो इनकी विफलताओं का मूल्यांकन हुआ है, न दोषपूर्ण डिलीवरी मैकेनिज्म पर कोई विचार व्यक्त हुआ है, कितने लोगों को रोजगार मिला है, कितनी धनराशि खर्च की गई है, इसकी विफलता के लिए क्या कहीं केन्द्र सरकार दोषी है या क्या कहीं कोई संबंधित राज्य सरकारें दोषी है या क्या कहीं ब्यूरोक्रेसी दोषी है या इम्पलीमेंटेशन जिनके जिम्म् था, वहां उनका कहीं कोई दोष रह गया है ?  ग्रामीण क्षेत्रों को रोजगार देने के लिए अनेक योजनाएं बनायी जाती रही हैं और सब धीरे-धीरे करके फेल हो गई हैं। मैंने सारे बिल को पढ़ा है, इसमें इन योजनाओं की विफलता से कोई सबक सरकार ने नहीं सीखा है और बिना तैयारी के बिल पेश हो गया है।

महाराष्ट्र में महाराष्ट्र रोजगार योजना १९७८ में बनी थी और शायद जो बिल आया है, इसके मूल रुाोत में कोई चीज है।महाराष्ट्र की रोजगार योजना जो १९७८ में बनी थी, लेकिन उसका क्या हाल है ? समति ने अधिकारियों से पूछा कि महाराष्ट्र के बारे में क्या आकलन है ? इस पर बताया गया कि महाराष्ट्र को कई बार लिख चुके हैं लेकिन वहां से कोई जानकारी हमें नहीं मिलती है। मेरी जानकारी के अनुसार १९७८ की इस योजना की समीक्षा या मूल्यांकन वहां के ऑडीटर जनरल ने केवल १९८० में एक बार की है। १९८० के बाद आज हम २००५ में चल रहे हैं यानी लगभग २४ साल तक उस योजना का न कोई मूल्यांकन हो पाया है, न कोई समीक्षा हो पाई है, योजना कितनी कारगर हुई है, कितने लोगों को उस योजना से काम मिला है, कितना पैसा खर्च हुआ है, सारे परिणाम या उसकी उपलब्धियां संतोषजनक थीं या नहीं थीं, ये पूरे २४ साल बीत जाने के बाद भी उसकी कोई समीक्षा मेरी जानकारी के अनुसार नहीं की गई है। आप करैक्शन कर दीजिए।…( व्यवधान) 

गृह मंत्री (श्री शिवराज वि. पाटील) : अध्यक्ष महोदय, अगर आप अनुमति दें।

MR. SPEAKER: He has yielded.

श्री शिवराज वि. पाटील : यह योजना १९७४ से लागू है, १९७८ से लागू नहीं है और वह आज तक चलती आ रही है। इस योजना में कितने लोगों को काम मिला है, इसके पूरे मालूमात हैं। इतना ही नहीं, वहां की लेजिस्लेटिव असेम्बली की एक समति है जो हर साल वहां जाकर मालूमात लेती है तथा हर साल रिपोर्ट लेकर असेम्बली के पटल पर रखती है।…( व्यवधान) 

श्री प्रकाश परांजपे (ठाणे) : मजदूरों को कुछ नहीं मिलता है।…( व्यवधान) 

अध्यक्ष महोदय : कल्याण सिंह जी, बोलिए।

…( व्यवधान)

MR. SPEAKER: Please do not interrupt his maiden speech.  A very senior leader is speaking.  Let us listen to him carefully.

श्री कल्याण सिंह : महोदय, महाराष्ट्र की उस योजना को थोड़ा-बहुत मैंने देखा है और मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि महाराष्ट्र की वह योजना जिस उद्देश्य से बनाई गई है, उस उद्देश्य में पूरी तरह से विफल हुई है। माननीय शिवराज पाटील जी उसकी तरफदारी कर रहे हैं। अगर यही गलत तरफदारी न की होती तो ५५ साल में देश की यह हालत न होती। …( व्यवधान)   एक बहुत ही क्रांतिकारी सुझाव हम दे रहे हैं। आपने पहला जो बिल था, उसमें बीपीएल का चक्कर था। उसमें पूअर हाउस होल्ड था। आपने उसमें से पूअर शब्द निकाल दिया है। धन्यवाद, अच्छा किया है। लेकिन अब जो एक परिवार है, वह चाहे एपीएल वाला है या बीपीएल वाला है, उसके सक्षम व्यस्क को, एक को काम देंगे। मैं पिछले दिनों माननीया सोनिया गांधी जी ने जो कांग्रेस की रैली संबोधित की थी, उस भाषण को अखबार में मैंने पढ़ा था और उनके उस भाषण से यह ध्वनि निकल रही थी, अगर मेरा निष्कर्ष गलत है तो माननीय सोनिया गांधी जी मुझे करैक्ट कर दें। उससे यह ध्वनि निकल रही थी कि रोजगार गारंटी योजना यूनिवर्सल तरीके से एप्लाई की जाएगी। अर्थात् जो भी सक्षम व्यक्ति है, मैं ग्रामीण क्षेत्रों की बात कर रहा हूं, जो भी काम के लिए आए, काम मांगे, उसे काम दिया जाएगा[R40] ।

 

अब आपने इसका यूनिवर्सल एप्लीकेशन नहीं किया है। एक परिवार का केवल एक व्यक्ति होगा। इससे जो बड़े परिवार होंगे, वे घाटे में रहेंगे कि नहीं रहेंगे?भारतवर्ष में संयुक्त परिवार की परम्परा है, लेकिन ऐसे परिवार घाटे में रहेंगे।आपने परिवार की जो परिभाषा दी है, वह यह है :

“Further, even after the amendment, the intended beneficiary is the family. ”

 

इसमें परिवार बेनफिशरी है, व्यक्ति नहीं। हम सोचते थे कि शायद आप व्यक्ति को इकाई मानेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। Clause 2 (f) of this Bill says:

 

“ ‘Household’ means the members of a family related to each other by blood, marriage or adoption and normally residing together and sharing meals or holding a common ration card. ”

 

यह तो बहुत बड़ा परिवार हो गया और दूसरी बात यह है कि हमारे यहां जो संयुक्त परिवार की व्यवस्था है, वह तो पहले से ही बहुत बड़ा है और आप उस परिवार में से केवल एक व्यक्ति को रोजगार देंगे। इसमें आपने जो मनिमम वेज रखा है, वह ६० रूपए प्रतदिन है। १०० दिन में यह ६,००० रूपए होता है अर्थात ५०० रूपए मासिक। हमारे प्रधानमंत्री जी वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ हैं और उनकी बगल में श्री प्रणव मुखर्जी जी बैठे हुए हैं, वे भी आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। आप दोनों, जो वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ महान व्यक्ति यहां बैठे हुए हैं, क्या आप इस बात से कंविन्स्ड हैं कि आज के इस घोर महंगाई के युग में ६,००० रूपए सालाना या ५०० रूपए मासिक के वेतन में, जिस परिवार की आप परिभाषा दे रहे हैं, उसका भरण-पोषण हो सकता है? क्या उसकी जिन्दगी में कोई बदलाव आ सकता है? क्या उसके बच्चों को अच्छे कपड़े मिल सकते हैं? क्या उनके बीमार होने पर दवा मिल सकती है? क्या उन बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सकती है? अगर हाँ, तो मुझे कुछ नहीं कहना है। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन मैं मोटे तौर पर यह जानता हूँ कि आज के इस घोर महंगाई के युग को देखते हुए इतने पैसे में एक परिवार का भरण-पोषण नहीं हो सकता है। माननीय रघुवंश प्रसाद सिंह जी, फिर यह ऐतिहासिक कहां हुआ? …( व्यवधान)   हमें बोल लेने दीजिए,उसके बाद जवाब दे दीजिएगा। मैं पुरजोर शब्दों में मांग करता हूॅ कि सरकार इस पर विचार करे कि इसको यूनिवर्सली एप्लाई किया, यूनिवर्सल एप्लीकेशन किया जाए।

दूसरी बात यह है कि इस स्कीम के तहत क्या किसी महिला को काम मिल पाएगा? परिवार में भी इस बात को लेकर झगड़ा होगा कि कौन एक व्यक्ति काम के लिए चयनित किया जाए, परिवार में किसका चयन किया जाए, जिसे काम मिले? जिस किसी व्यक्ति को चयनित किया जाएगा, क्या यह जरूरी है कि उसे जो पैसा मिलेगा, वह उसे पूरे परिवार पर खर्च करेगा? ऐसी स्थिति में महिलाओं को तो कोई भी काम पाने के लिए नहीं चुनेगा।इसी तरह परिवार में जो विकलांग व्यक्ति है, उसे भी कोई नहीं चुनेगा। तब यह ऐतिहासिक कैसे है? जब विकलांगों ने काम नहीं मिलेगा, महिलाओं को नहीं मिल सकेगा, तो आप कैसे कहते हैं कि यह ऐतिहासिक है?[r41] 

 

[R42] 

परिवार में टूटन पैदा होगी, परिवार में कलह पैदा होगी। परिवार में जो शांति बनी हुई है, वह नहीं हो पाएगी। एक बात और है। इस बिल के जरिए आप यह अधिकार लेना चाहते हैं कि सरकार जब चाहे इसमें परिवर्तन कर सकती है, जब चाहे किसी क्षेत्र से इसे समाप्त कर सकती है। अगर ऐसा होता है, तो यह अधिकार हम एक्जीक्यूटिव को देने को तैयार नहीं हैं। अगर इसमें कोई परिवर्तन होता है, कोई संशोधन होता है, तो उसके लिए प्रॉपर फोरम है,संसद। चूंकि संसद एक्ट पास कर रही है, संसद ही कोई परिवर्तन कर सकती है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : यह मान लिया है।

श्री कल्याण सिंह : मान लिया है तो धन्यवाद, लेकिन हमें वह नहीं मिला है, तो हम क्या करें पहले कोई समय सीमा नहीं थी कि पूरे भारतवर्ष में यह कितने दिनों में लागू किया जाएगा। आपने कहा कि पांच साल, तो चार साल क्यों नहीं भविष्य के बारे में न मैं जानता हूं और न शायद आप जानते होंगे। सब अंदाजा लगा रहे हैं इसलिए मैं पिन पाइंट कर रहा हूं कि आपने अभी शायद २०० जिलों में लागू करने की बात कही है। बाकी जो जिले बचेंगे, उनमें भी आगामी चार वर्ष में शत-प्रतिशत इस योजना को लागू करना चाहिए। पहले तो कोई मियाद नहीं रखी थी। अब पांच साल तय किया है। हमारा सुझाव है कि इसे चार साल कर दें।…( व्यवधान) हम तो कहते हैं कि दो साल में कर दें। लेकिन ज्यादा से ज्यादा सबको इस योजना में लाना चाहते हैं तो वर्तमान सदन का जो कार्यकाल है, चार साल बाकी हैं, वह कर दें, इससे किसी को दुविधा नहीं रहेगी।

हमने एक बात का और संशोधन दिया था, जिसे आपने आंशिक रूप से स्वीकार किया है कि पंचायत राज को इसमें जो महत्व मिलना चाहिए था, वह नहीं था। अब आपने पंचायत राज को महत्व दिया है। ग्राम पंचायत को काम के चयन के बारे में, योजना के इम्प्लीमेंटन के बारे में कहा है। यह अच्छी बात है। लेकिन आपने ग्राम पंचायत के ऊपर एक प्रोग्राम अधिकारी, एक नौकरशाह और बिठा दिया। ५० फीसदी काम का अलाटमेंट वह अधिकारी करेगा। ग्राम पंचायत के कौन-कौन से काम आवश्यक हैं, किन-किन कामों पर लोगों को रोजगार दिया जाना चाहिए, कामों का चयन और उनके इम्प्लीमेंटेशन, सुपरविजन, मानिटरिंग, इन सबका अधिकार ग्राम पंचायतों को होना चाहिए। आपने जो प्रोग्राम अधिकारी बिठा दिया है, नोट कर लीजिए कि किसी भी सिस्टम में जिसका ज्यादा ब्यूरोक्रैटाइजेशन होगा, वह सिस्टम फेल होकर रहेगा। ब्यूरोक्रेसी के चंगुल से इसे मुक्त कीजिए। भरोसा कीजिए ग्राम पंचायतों में चुने हुए सदस्यों पर, इसलिए यह उन पर छोड़ दीजिए। फिर आपने ग्राम सभा का जिक्र निकाल दिया है। इसमें उसका जिक्र नहीं है। हमारा कहना है कि जो सोशल ऑडिट करना होगा, उसके लिए ग्राम सभा को अधिकार देना

चाहिए। हम सब लोग जानते हैं कि ग्राम पंचायत और ग्राम सभा में अंतर होता है। ग्राम पंचायत में चुने हुए सदस्य होते हैं और ग्राम सभा में वोटर लिस्ट में जिनका नाम है, उसे ग्राम सभा कहते हैं। पंचायतें अपने सारे कार्यों का चयन करें, मानिटरिंग करें, इम्प्लीमेंटेशन को देखें कि क्या काम हुआ, क्या उपलब्धियां हुईं, कितना पैसा खर्च हुआ और कितने लोगों को काम मिला। वह काम समय के अंदर पूरा हुआ है या नहीं, इसका पूरा लेखाजोखा ग्राम पंचायत ग्राम सभा के सामने रखे[R43] ।

15.00 hrs.

इसी प्रकार से जब सोशल ऑडिट की बात हम करेंगे तो यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सब बेईमान हैं। ग्राम सभा बैठेगी तो ईमानदारी सामने आ जाएगी। लेकिन इसमें ग्राम सभा आपने निकाल दी है। अत: ऑडिट के लिए आवश्यक है कि ग्राम सभा को इसमें अधिकार दिये जाएं तभी यह स्कीम पूरी तरह से होगी – “The Scheme of the people, by the people and for the people.”  ग्राम सभा एक महत्वपूर्ण ईकाई है।

श्रीमान जी, व्यय-भार का जहां तक प्रश्न है और अगर आप इस योजना के क्रियान्वयन के लिए सच्चाई के साथ गंभीर हैं तो चूंकि यह योजना केन्द्र सरकार की है, इसलिए इस योजना का शत-प्रतिशत व्यय-भार केन्द्र सरकार को अपने ऊपर लेना होगा। आपने १० प्रतिशत व्यय-भार राज्य सरकारों पर डाल दिया है। हम सभी जानते हैं कि राज्य सरकारों की हालत क्या है? कुछ राज्य सरकारें तो ऐसी हैं कि अपने कर्मचारियों और अधिकारियों का वेतन भी नहीं दे पा रही हैं और उनके यहां विकास के काम ठप्प पड़े हुए हैं और ऊपर से आपने उनके ऊपर १० प्रतिशत व्यय-भार और डाल दिया, तो यह स्कीम कैसे सफल होगी? नतीजा यह होगा कि वे सरकारें इस स्कीम को इम्प्लीमेंट नहीं कर पाएंगी। यह अच्छी स्कीम है और केन्द्र द्वारा लाई जा रही है, इसलिए इसके उचित इम्प्लीमेंटेशन के लिए, इसका सारा व्यय-भार केन्द्र सरकार को अपने ऊपर लेना चाहिए और इस व्यय-भार से राज्य सरकारों को मुक्त कर देना चाहिए।

जो बेकारी का भत्ता है, उसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाली जानी चाहिए। य़ोजना इम्प्लीमेंट नहीं हो रही है या काम नहीं मिल रहा है तो जो बेकारी भत्ता होगा, उसकी अदायगी का भार राज्य सरकारों पर इसलिए डाला जाना चाहिए जिससे राज्य सरकारें उस योजना को क्रियान्वित करें, अन्यथा उसे भत्ता देना होगा।

मुझे यह नहीं पता कि आपने यह बता दिया है कि अगर १५ दिन भी काम नहीं मिलेगा तो उसे पूरा भत्ता मिलेगा। अगर १५ दिन तक काम नहीं मिलेगा तो जो वेतन निर्धारित हुआ है, उसका २५ प्रतिशत भत्ता दिया जाएगा और शेष जो १०० दिन में समय बचेगा, उसके लिए जो वेतनमान नियत किया जा रहा है उसका ५० प्रतिशत भत्ता दिया जाएगा। आपने तो कह दिया कि पूरे का पूरा भत्ता दिया जाएगा।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : यह तब है, जब साल भर काम नहीं मिलेगा।

श्री कल्याण सिंह : अगर लगातार तीस दिन तक काम नहीं मिलता है तो मूल वेतन का आधा भत्ता दिया जाए और शेष समय में काम नहीं मिलता है तो ७५ प्रतिशत भत्ता उसको दिया जाना चाहिए।

आपने कह दिया कि नया काम शुरू करने के लिए ५० लोग चाहिए। यह संख्या किस ज्योतिषी से पूछकर निश्चित कर दी गयी है। गांव में ऐसे भी कितने ही काम होंगे जिसमें १० लोगों की जरुरत होगी, ५० के लिए काम नहीं होगा, तो योजना तो शुरू ही नहीं होगी। इसको आप लचीला क्यों नहीं बना देते हो। ऐसा क्यों नहीं कर देते हो कि १० लोगों के लिए भी काम है तो योजना शुरू हो जाएगी।

रेल मंत्री (श्री लालू प्रसाद) : नियमावली में आ जाएगा।

श्री कल्याण सिंह : जिस किसी नियमावली में लाओ, हमें अपनी बात को कहने दीजिएगा[r44] ।

 

महोदय, जब पचास लोग होंगे, तभी काम शुरू होगा, तभी कोई प्रोजेक्ट शुरू होगा, जब पचास लोग तैयार हो जाएं। महोदय, ऐसा कौन सा प्रोजेक्ट हो, जिसमें पचास आदमी खप जाएं?इसके मायने यह है कि न पचास लोगों के लायक प्रोजेक्ट होगा और न वह प्रोजेक्ट लागू किया जाएगा। आप यह पचास की संख्या घटाइए और प्रैक्टिकल संख्या लाइए।महोदय, मेरा सुझाव यह है कि यदि कोई प्रोजेक्ट छोटा है और दस लोगों द्वारा उसका काम हो सकता है, तो पचास की जगह दस लोग हों तब भी वह प्रोजेक्ट रोका न जाए। इसमें कुछ ऐसी व्यवस्था कर दीजिए जिससे महिलाओं को काम मिल सके। बड़ी चर्चा हो रही थी कि रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण किया जा रहा है। फ्रंट पेज पर समाचार छप रहे थे।…( व्यवधान)   अभी तक तो अमेंडमेंट नहीं किया गया, यही हम कह रहे हैं, Please do it.   यदि आप कर रहे हैं, तो ठीक है। नबी साहब, जो आपने नहीं किया है, उसी ओर तो हम इंगित कर रहे हैं। अगर आप उसे करने जा रहे हैं, तो हम आपको बधाई दे देंगे। आपने कहा है कि यदि कहीं यह परियोजना लागू नहीं होगी, तो आप उस राज्य का पैसा रोक देंगे। जिस राज्य में कहीं पर योजना नहीं लागू होंगी, एक जिले में लागू हो जाए, लेकिन दो जिलों में न हो पाए, तो आप का कहना है कि फिर उस प्रदेश के लिए जो पैसा दिया जा रहा है, उसे आप रोक देंगे और इस स्कीम में पैसा नहीं देंगे -इसका क्या मतलब है?यदि इम्प्लीमेंटेशन नहीं हो रहा है, तो किसी अधिकारी के कारण इम्प्लीमेंटेशन नहीं हो रहा है, किसी राज्य सरकार की कमी की वजह से इम्प्लीमेंट नहीं हो रहा है या जो डिलीवरी मैकेनिज्म है, उसकी कमी की वजह से इम्प्लीमेंटेशन नहीं हो रहा है, केंद्र सरकार समय पर पैसा नहीं भेज रही है इसकी वजह से इम्प्लीमेंटेशन नहीं हो रहा है – लेकिन इसकी सजा किसे मिल रही है? सजा उस गरीब आदमी को मिलती है, जिसका कोई कसूर नहीं है। वह फावड़ा लेकर तैयार खड़ा है। हां, यदि वह कहे कि मैं काम नहीं करूंगा, तो यह उसकी जिम्मेदारी है। मैं पूछता हूं कि फिर जवाबदेह कौन है? जवाब देह या तो अफसर होंगे या राज्य सरकार होगी या जो डिलेवरी मैकेनिज्म है, उसमें कोई कमी होगी, केंद्र से पैसा नहीं गया होगा, पर इसकी सजा गरीब मजदूर को क्यों दी जाए? मैं चाहता हूं कि आप बिल में इस संबंध में कुछ संशोधन कीजिएगा।

मेरा एक सुझाव यह भी है कि योजना के इंप्लीमेंटेशन में कोई अधिकारी, कोई ब्यूरोक्रेट दोषी है और जांच के बाद उसका दोष सिद्ध हो जाता है, तो उस पर पांच हजार रूपए का जुर्माना और कम से कम तीन महीने की कैद की सजा का प्रावधान कीजिए, अगर आप इसे इंप्लीमेंट करवाना चाहते हैं, अन्यथा जैसा हश्र आज तक योजनाओं का हुआ है, उससे अलग हश्र इस योजना का नहीं होगा।यदि पंचायत के जिम्मे कोई काम दिया और अगर पंचायत दोषी है तो आप ऐसा कर सकते हैं कि जिनका दोष है, उन्हें पांच वर्षों तक के लिए किसी पद पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाए।जब तक ऐसे कड़े प्रतिबंध नहीं लगाए जाएंगे, तब तक इंप्लीमेंटेशन को शतप्रतिशत सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, तब तक योजना का जो लाभ मिलना चाहिए, वह मिलना कठिन हो जाएगा।

श्रीमन, मैं अपना अंतिम वाक्य कहकर अपनी बात समाप्त कर दूंगा। ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों की चिंता की जा रही है, लेकिन गरीब शहरों में भी हैं। शहरों में सभी संपन्न नहीं है। जब हमने सवाल उठाया था, उस समय बताया गया था कि सरकार शायद शहरी क्षेत्र के लिए इसी प्रकार की कोई और रोजगार गारंटी योजना अलग से लाने वाली है। [R45] 

अच्छा रहता अगर ग्रामीण रोजगार की गारंटी के साथ, शहरी क्षेत्रों में गरीबों के लिए भी रोजगार की गारंटी की स्कीम भी सरकार ले आती । यदि आप ऐसा नहीं कर पाए हैं तो हमारी आपसे प्रार्थना है कि शहरी क्षेत्रों के गरीबों के साथ अन्याय न किया जाए। उनके लिए भी ऐसी योजना लायी जाए।

श्रीमन्, इस बिल को वास्तव में ऐतिहासिक बनाने के लिए, प्रभावी बनाने के लिए, कॉम्प्रीहैंसिव बनाने के लिए और सही अर्थों में ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक और सामाजिक सुधार लाने के लिए जो आवश्यक कदम उठाए जो सकते हैं, मैंने उन सब को संक्षेप में अपनी ओर से रखने का प्रयास किया है।

इन शब्दों के साथ मैं आपका आभार प्रकट करता हूं।

MR. SPEAKER: I compliment on your maiden speech.

… (Interruptions)

श्रीमती सोनिया गांधी (रायबरेली) : अध्यक्ष महोदय, मैं नेशनल रूरल एम्पलॉयमैंट गारंटी बिल का समर्थन करने के लिए खड़ी हुई हूं।

श्री मोहन सिंह :  हिन्दी में बोलने के लिए धन्यवाद।

श्रीमती सोनिया गांधी : मैं पूरा भाषण हिन्दी में नही दूंगी।

प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा (दक्षिण दिल्ली) : हिन्दी में ‘माइनर’ लिख दिया है। किसी भी हाउसहोल्ड्स में ‘मेजर”” को काम दिया जाए लेकिन ‘माइनर’ लिख दिया है। हिन्दी का कम से कम इतना ध्यान ऱखें।

अध्यक्ष महोदय: आप इसे देख लीजिए।

श्री थावरचंद गेहलोत (शाजापुर) : अध्यक्ष महोदय, मैंने भी शुरू में यह बात उठायी थी। …( व्यवधान) 

MR. SPEAKER: You should look into it.

                                                … (Interruptions)

MR. SPEAKER: This is a very important Bill.   Everyone heard Shri Kalyan Singh very patiently.

… (Interruptions)

श्रीमती सोनिया गांधी : अध्यक्ष महोदय, मैं समझती हूं कि यह एक ऐतिहासिक अवसर है। आज हम २००४ के कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र का सबसे महत्वपूर्ण वायदा पूरा कर रहे हैं। आज हम अपने यूपीए सरकार के नेशनल कॉमन मीनिमम प्रोग्राम का सबसे महत्वपूर्ण संकल्प पूरा कर रहे हैं। जो लोग देश के ग्रामीण इलाकों में रहते हैं या फिर उन क्षेत्रों का खूब दौरा करते हैं, उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि वहां ऐसे लोगों की कितनी बड़ी संख्या है जिन्हें रोजगार की जरूरत है और वे सार्थक काम की खोज में किस तरह से भटक रहे हैं? इनफ्रास्ट्रक्चर की कितनी कमी है और वह कमी बिल्कुल साफ दिखायी देती है। नेशनल रूरल एम्पलायमैंट गारंटी के इस महत्वपूर्ण विधेयक के जरिए, हम इन दोनों मुद्दों का समाधान खोज रहे हैं और अपने गांवों में एक बुनियादी परिवर्तन लाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि हम सब जानते हैं, हमें एहसास है कि हमारी दो तिहाई बहनें और भाई उन्हीं गांवों में रहते हैं। इस विधेयक के जरिए हम उन्हें उनका अधिकार, उनका जायज हक देने की शुरूआत कर रहे हैं जिससे वे भविष्य में एक बेहतर जिन्दगी जी सकें।

        हमने नेशनल रूरल एम्पलॉयमैंट गारंटी प्रोग्राम के मौजूदा स्वरूप पर पहली बार २००२ में गुवाहटी के कांग्रेस मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में विचार-विमर्श किया था। इसके बाद माउंट आबू में और २००४ में श्रीनगर के सम्मेलन में इस पर दोबारा चर्चा हुई। हम सब ने महसूस किया कि रोजगार की सुरक्षा देना और ग्रामीण इलाकों में मूलभूत ढांचे को बढ़ाना बहुत ही अनिवार्य है। इस तरह से ऐसा विधेयक हमारी पार्टी के २००४ के घोषणा पत्र का एक केन्द्रीय मुद्दा ब्ाना[R46] ।

[p47] 

  अध्यक्ष महोदय, १९७० के दशक में जब महाराष्ट्र में सूखे का संकट आया था, उस समय मुख्यमंत्री श्री वी.पी. नायक और गांधीवादी श्री वी.एस. पागनी ने इंदिरा जी के समर्थन से महाराष्ट्र में एक एम्पलाएमेंट गारंटी स्कीम लागू की थी। आने वाले वर्षों में इस योजना को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का प्रयास हुआ लेकिन किसी न किसी वजह से यह संभव नहीं हो सका। मुझे याद है कि वर्ष १९८० में इंदिरा जी ने रूरल लैंडलेस एम्पलाएमेंट गारंटी प्रोग्राम शुरू किया था और वर्ष १९८७ में राजीव गांधी जी ने जवाहर रोजगार योजना का आरंभ किया था। उसके बाद वर्ष १९९३ में डॉ. मनमोहन सिंह जी श्री पी.वी. नरसिंहराव जी के मंत्रिमण्डल में वित्त मंत्री थेे, उस समय १२० पिछड़े जिलों में एम्पलाएमेंट एश्योरेंस स्कीम शुरू हुई थी। इतने सारे कार्यक्रमों में बुनियादी सिद्धांत रोजगार की एक्जीक्यूटिव गारंटी तक सीमित था लेकिन हमारा नेशनल रूरल एम्पलाएमेंट गारंटी प्रोग्राम महाराष्ट्र की एम्पलाएमेंट गारंटी स्कीम की तरह लीगल गारंटी के सिद्धांत पर आधारित है, यानी यह कानून की तरह लागू होगा।

अध्यक्ष महोदय, यह बिल, जैसे कि रघुवंश जी ने कहा और कल्याण सिंह जी ने भी कहा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी संस्थाओं, अनुभवी प्रशासकों और खुद ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार हुआ है। एनएसी को इसकी मुख्य बातों को विस्तार से देखने और समझने का मौका मिला है। स्टैंडिंग कमेटी और रघुवंश जी के मंत्रालय और बाकी अन्य मंत्रालयों ने भी इस पर गंभीरता से विचार किया है, इस पर बारीकी से पब्लिक डिबेट भी हुई थी। राजनीतिक भेदभाव के बगैर समाज और सरकार के बीच आपस में किस तरह सहयोग के साथ काम हो सकता है। मैं समझती हूं कि यह विधेयक उसका एक जीवंत उदाहरण और जीवंत मिसाल है। यह ठीक है कि इसे सदन में पेश होने में १४ महीने लगे लेकिन मैं समझती हूं कि इस समय का पूरा और सही इस्तेमाल हुआ है। एक तरह से नेशनल रूरल एम्पलाएमेंट गारंटी प्रोग्राम की शुरूआत के तौर पर यूपीए सरकार ने “काम के बदले अनाज” का राष्ट्रीय कार्यक्रम देश के १५० सबसे पिछड़े जिलों में लागू किया था। “काम के बदले अनाज” कार्यक्रम की चर्चा करते हुए मैं सदन को याद दिलाए बगैर नहीं रह सकती कि आज से तीन साल पहले हमारा अनाज का भंडार ६० मिलीयन टन से भी ज्यादा था। उस समय अनेक राज्य, खास तौर से वे राज्य जहां कांग्रेस की सरकारें थीं, लगातार सूखे की मार झेल रहे थे। उस समय हमारी पार्टी ने, कांग्रेस पार्टी ने एनडीए सरकार से बार-बार आग्रह किया था कि नेशनल एम्पलाएमेंट गारंटी स्कीम के वादे के तौर पर देश में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम “काम के बदले अनाज” शुरू किया जाए जिससे लाखों लोगों की जिंदगी बचाई जा स्ाके[p48] ।

[RB49] 

हमारे गोदाम अनाज से भरे हुये थे मगर लोग भूख से बेहाल थे। एन.डी.ए. सरकार ने हमारे बार बार आग्रह को अनसुना कर दिया …( व्यवधान) 

प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : अध्यक्ष जी, यह क्या पौलटिक्स है?…( व्यवधान) 

अध्यक्ष महोदय : आप लोग बैठिये। मल्होत्रा जी, जब आपका वक्तव्य होगा, तब जवाब दीजियेगा, टिप्पणी करियेगा।

श्रीमती सोनिया गांधी : मल्होत्रा जी, आप बाद में जवाब दें।…( व्यवधान) कोई प्राब्लम नहीं है।

अध्यक्ष महोदय : मल्होत्रा जी, जब आपका मौका आयेगा, आप बोलियेगा, तब कोई हर्ज नहीं।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : यह सही नहीं है। इस तरह इंटरप्शन ठीक नहीं। आप लोग बैठ जायें।

श्रीमती सोनिया गांधी : अध्यक्ष महोदय, इसलिये हम सब लोग जो कांग्रेस और यू.पी.ए. में हैं, उन्हें इस बात पर गर्व है और इस बात का संतोष है कि इस विधेयक के जरिये हम उन करोड़ो-करोड़ लोगों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें इसकी सचमुच जरूरत है।

अध्यक्ष महोदय, मै बहुत संक्षेप में महाराष्ट्र की एम्पलायमेंट गारंटी स्कीम के कुछ फायदे गिनाना चाहती हूं। मेरे पास आंकड़ों के साथ एक रिपोर्ट है। इसके लागू होने से खेत-मज़दूरों को ज्यादा वेतन मिला। उनकी जिन्दगी में, खासकर महिलाओं की जिन्दगी में काफी सुधार हुआ। मैं कुछ और आंकड़े बताती हूं कि वहां एम्पलायमेंट गारंटी स्कीम में काम करने वाले लोगों में ४०-५० प्रतिशत तक महिलायें हैं। जहां सिंचाई के साधन नहीं हैं, वहां भी उत्पादन बढ़ा है। शायद इस बात की जानकारी काफी लोगों को नहीं है कि १९९० के दशक में इस एम्पलायमेंट गारंटी स्कीम के ज़रिये करीब १० लाख हैक्टेयरज़मीन को बाग़बानी के लायक बनाया गया था।

            Mr. Speaker, Sir, there are numerous significant features in this Bill, but to my mind, there are three vital ones, which I would like to highlight. First, elected panchayat institutions have been given a pivotal role. This programme would, therefore, lead to the financial and administrative empowerment of panchayat bodies as well. Second, the Bill goes beyond traditional civil work. It includes watershed development, renovation of water bodies, desilting of tanks, afforestation and wasteland restoration and, for the first time, irrigation works can be taken up on lands owned by members of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes and also the women labourers will be given priority. Third, the Bill clearly prohibits, and I think this is a very important aspect of this Bill, the engagement of contractors for the execution of works.

            These significant features apart, a most important thing to keep in mind is that this Act is coming into force against the background of the UPA’s Right to Information Act passed in this House three months ago. Now, this is an Act far more progressive than the previous one. The new Right to Information Act will, therefore, enable social audit and greater public scrutiny of the programme. It will ensure greater accountability of panchayat bodies and district administrations as well[reporter50] .

[ak51] 

For example, the muster-rolls will no longer be kept secret, and budgets and works will have to be made public. All these measures together would ensure that only those who really need work would be employed, and only those schemes required by the community would be taken up.

            Mr. Speaker, Sir, the employment guarantee programmes are no substitute for sustained economic growth, and we see economic growth and employment guarantee — with the help of such programmes — going hand in hand. We also do not see — like some do — such programme as a handout, as a dole, or as a populist give-away. We see this Act as the human face of economic reforms making the process of economic growth more inclusive, more equitable.

This programme is part of the Congress Party’s and the UPA’s agenda for social transformation. It is part of an agenda, which in the last 14 months has seen unprecedented increases in public expenditure, in elementary education, mid-day meals, public health, and women and child development. It is an agenda to which all of us in the UPA Government are firmly committed.

Mr. Speaker, Sir, our country is full of success stories, which inspire us. But there is still widespread destitution, which pains and challenges us. Our country has touched great heights of endeavour, which, we, of course, acclaim. Yet, there is still vast deprivation, which we must all strive to eliminate.

            We all know only too well how inequitable and how unjust the lives of the poor are, especially, when we compare them to the excesses and the waste that we see all around these days. This National Rural Employment Guarantee Act is a response to the needs of crores of Indians whose right it is to a better life for themselves and for their children.

            A time will come, and, I hope, not too far in the future when there will be no need for such an extensive programme. But till such a time, I believe that we cannot just sit idle and hope that economic reforms alone will create adequate employment opportunities in rural India.

            Sir, I would just like to say two words on the financial implications of this legislation because there have been some critical comments. I believe that an economy, which is growing at 7 per cent per year, can and should find the resources for such a crucial intervention. Though it is for the Central Government to find the bulk of the resources, yet the States too have a key and critical role to play in its monitoring and implementation.

I also do feel that we must use this momentous occasion to effect fundamental changes in Government expenditure to better support the larger social goals. I believe that we also need to consolidate many of our schemes and programmes. For instance, we now have an opportunity for using employment guarantee for irrigation and rural roads, which are very much part of the UPA Government’s ‘Bharat Nirman’.

            Mr. Speaker, Sir, as someone who has implicit faith in this Bill, I also acknowledge that there has been some cynicism and concern about it. These doubts, I feel, cannot just simply be dismissed, and they have to be addressed[ak52] .

 

            Let us be frank with ourselves. Our programmes do not always work out the way they are planned or they are intended to be. The benefits do not always reach the poor. Delivery systems claim too large a share of the outlays. While the Central and State Governments must bring about innovations in delivery systems, political parties cutting across party lines, all of us, must play a more proactive role in monitoring and mobilisation. I believe, above all, we need to rid ourselves of the “sub chalta hai” attitude.

            Mr. Speaker, Sir, before I conclude, I want to personally thank our Prime Minister under whose leadership this Bill is being introduced for his steadfast support to it and to its objectives. He has had to balance various considerations; but in standing firmly behind this Bill, he is standing up for crores and crores of our people whose lives depend on its successes.

            Mr. Speaker, Sir, we are passing, maybe, on Monday, a truly radical law, a law which has far-reaching and profound consequences. But the real challenge begins now in making sure that the legislation works in the manner it is meant to, in a manner that will tangibly impact the lives of crores of our brothers and sisters in rural India.

            To this I am personally committed. To this the Congress Party is committed. To this the UPA Government is committed. Thank you.

 

श्री हन्नान मोल्लाह (उलूबेरिया) : माननीय अध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने इतने महत्वपूर्ण नेशनल रूरल इंप्लायमैंट गारंटी बिल पर मुझे बोलने का मौका दिया। मैं अपनी पार्टी माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से इस बिल के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। इस बिल को सदन में लाने के लिए मैं यूपीए सरकार को बधाई देता हूं।

MR. SPEAKER: Please keep silence.

श्री हन्नान मोल्लाह : इस बिल की चर्चा से पहले मैं कुछ बातें बताना चाहता हूँ। हमारे वामपंथी राजनीतिक दलों के द्ृष्टिकोण और इस बिल में कुछ समानता है। जब आज़ादी का संघर्ष हमारे देश में चल रहा था, तब हमारी वामपंथी ताकतें धीरे-धीरे नेशनल मूवमैंट में शामिल हुईं। वामपंथी ताकतें उस समय एक कंसैप्ट लाईं कि सिर्फ राजनैतिक आज़ादी से हमें पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती, जब तक उसके अंदर आर्थिक आजादी शामिल न हो। आर्थिक आज़ादी मिलने के बाद ही राजनैतिक आजादी पूर्णता को प्राप्त हो सकती है। इस कंसैप्ट को लेकर आज़ादी के संघर्ष में वामपंथी दलों ने हिस्सा लिया था। जब आज़ादी के बाद संविधान बना, तब भी हमने इस सवाल को उठाया था कि हमें सिर्फ जीने का हक नहीं होना चाहिए बल्कि उसके साथ-साथ खाने का हक भी होना चाहिए, क्योंकि जब तक खाना नहीं मिलेगा, हम जी नहीं सकते। खाने का हक नहीं होगा तो जीने का हक भी पूरा नहीं हो सकता। कांस्टीटयूएंट असैम्बली में हमने आवाज़ उठाई थी कि देश के नागरिकों को खाने की गारंटी मिलनी चाहिए और उसके लिए संविधान में रोज़गार की गारंटी होनी चाहिए। संविधान सभा के नेताओं ने इस पर चर्चा तो की मगर इसको लागू नहीं कर पाए। दूसरे तरीकों से इसको आगे बढ़ाने का काम चलता रहा[h53] ।

[i54] 

आजादी के बाद हम लोग लगातार इस मांग को उठाते रहे हैं कि काम के अधिकार को संवैधानिक स्वीकृति मिलनी चाहिए। पूरे देश के गरीब, मजदूर, किसान, बेरोजगार, नौजवान सभी लोग बार-बार इस आवाज को उठाते रहे हैं कि काम के अधिकार को संवैधानिक स्वीकृति मिलनी चाहिए, मगर आज तक ऐसा नहीं हुआ है। यह संघर्ष जारी रहेगा, यह मांग हमेशा हमारे सामने रहेगी, लेकिन फिर भी खुशी की बात है कि आज जो कानून लाया गया है, उससे काम के अधिकार को चाहे संवैधानिक स्वीकृति न भी मिले, कम से कम कानून की स्वीकृति तो मिलनी शुरू हो गई है। यह एक शुरूआत है, इसलिए हम इस बिल का समर्थन करते हैं। यह बिल काम के अधिकार को कानूनी स्वीकृति देने की तरफ पहला कदम है।

        दूसरी बात यह है कि यह कानून पूरे देश के बेरोजगारों के लिए नहीं है। यह सिर्फ गांव में रहने वाले गरीब और पिछड़े लोगों के लिए है। उन्हीं लोगों के लिए यह बिल लाया गया है। हमारे जो शहर के लोग बेरोजगार हैं, पढ़े-लिखे लोग बेरोजगार हैं, उन लोगों के लिए यह बिल नहीं लाया गया है। इसमेंसाफ लिखा है कि यह बिल ग्रामीण बेरोजगार लोगों के लिए लाया गया है। यह बिल ग्रामीण विकास मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया गया है इसलिए हम उनसे मांग नहीं कर सकते कि इसी तरह का बिल शहर के बेरोजगारों के लिए भी लाएं। शहरी विकास मंत्री को भी शहर में रहने वाले बेरोजगार लोगों के लिए इसी तरह का विधेयक लाने के बारे में सोचना चाहिए और सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए – यह हमारी मांग है। जब यह बिल आया है और हम मानते हैं कि यह बहुत अच्छा कदम है क्योंकि काम के अधिकार को पहली बार कानूनी स्वीकृति प्राप्त हुई है, हम इसका समर्थन करते हैं। पिछले ३०-४० सालों से जनता के बीच में जो खेतिहर मजदूर, बेरोजगार, ग्रामीण बेरोजगार हैं, जिनके पास किसी तरह का करने के लिए कोई काम नहीं है, जो गरीबी और दुख-दर्द के साथ अपना जीवन व्यतीत करते हैं, ऐसे लोगों के लिए काम की गारंटी देना, यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। आज से कुछ वर्ष पहले जब रास्ते में हम गरीब लोगों के बारे मे बातें करते थे, तो कई लोग उस चर्चा में योगदान करते थे। आज रास्ते में या प्लेटफार्म पर या किसी अन्य सार्वजनिक जगह पर जब हम गरीबों के बारे में बात करते हैं, तो दूसरे लोग हम पर अजीब तरह की निगाह डालते हैं कि हम लोग कौन हैं या किस ग्रह से आए हैं जो गरीबों के बारे में बात कर रहे हैं -यह कैसी अजीब सी बात है?यह एक संकुचित मानसिकता लोगों में घर कर गई है। उदारीकरण का प्रभाव हमारे ऊपर है। यह हमें सिखाता है कि अपने बारे में सोचो, विदेशी पूंजी के बारे में सोचो, व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए काम करो और हिन्दुस्तान जैसे देश में, जहां साठ-सत्तर प्रतिशत लोग गरीबी में रहते हैं, ऐसी एक साइक्लॉजी तैयार हो रही है।हमारा देश् इसका शिकार हो रहा है। उदारीकरण एक बीमारी है, जिसमें इंसान चेहरे से तो इंसान दिखाई देता है, लेकिन उसके अंदर की इंसानियत को मार देती है।लोग गरीब की तरफ नहीं देखते हैं बल्कि अमीर और ऊपर के तबके के लोगों के बारे में सोचते हैं। यह रवैया बदलना चाहिए। इस बारे में चिंतन होना चाहिए। हमारे जज भी जब जजमेंट देते हैं, तो वे गरीबों को नजरंदाज करते हैं। उदारीकरण का जो असर आर्थिक जीवन और सामाजिक जीवन पर पड़ रहा है, उसका प्रतिफल जल्द ही दिखाई देने लग जाएगा। गरीबी को दूर करने वालों पर अलग तरह की नजर डाली जाती है, इसलिए मैं इस कानून का समर्थन करता हूं।

आप देखिए कि पिछले चार-पांच सालों से मीडिया भी सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित कर रहा है।सरकार को बहुत से अपशब्द कहे जा रहे हैं। उदारीकरण ऐसी बीमारी है, जिस बीमारी का राजनीतिक और सांस्कृतिक असर बहुत खराब है। इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि यह बिल एक उपलब्धि है, एक शुरूआत है। अगर हमें दस मील जाना है, तो आगे बढ़ने का यह पहला कदम है, इसलिए मैं इस बिल का समर्थन करता हूं[i55] ।

[rpm56] 

  महोदय, जैसा मैंने शुरू में कहा कि यह गांव के बेरोजगारों के लिए रोजगार के साधन मुहैया कराएगा, लेकिन जैसा यू.पी.ए. सरकार ने बेरोजगारों को काम देने और काम न देने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही, उसके अनुसार शहरी बेरोजगारों को इस विधेयक से कोई फायदा होने वाला नहीं है। इसलिए मंत्री जी को इस बारे में भी सोचना पड़ेगा कि जो एजूकेटेड लोग या जो मडिल क्लास के लोग हैं, उनकी बेरोजगारी कैसे दूर होगी। जो नीचे के तबके के लोग हैं, जो मजदूर हैं, जो श्रमिक हैं, उन्हें तो इस विधेयक के पास होने से फायदा होगा, लेकिन बीच के तबके को इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है। उनके लिए हमारे जो सरकारी कार्यक्रम हैं, औद्योगिक विकास, मॉडर्नाइजेशन, एग्रीकल्चर, इंडस्ट्रीज आद हैं, वे आगे बढ़ाने पड़ेंगे, तब उन्हें फायदा होगा। हमारे देश में उन्हें भी रोजगार मिलेगा, तो उससे नया चिन्तन पैदा होगा और एक नया बल लोगों को मिलेगा। इसलिए हम इस विधेयक का स्वागत करते हैं, लेकिन शहरी बेरोजगारों के लिए भी व्यवस्था करने की मांग हम करते हैं।

महोदय, दूसरी बात मैं श्रीमती सोनिया गांधी जी के ध्यान में यह लाना चाहता हूं कि जो रूरल डैवलपमेंट, कृषि, स्पेशल एरिया प्रोग्राम, इर्रीगेशन और फ्लड कंट्रोल विभाग हैं, इन पांचों का कुल खर्चा, स्व. श्री राजीव गांधी जी के समय में एन.एन.पी. का ४ प्रतिशत था, लेकिन पिछले साल के बजट को यदि यू.प.ए. सरकार की चेयरपर्सन के नाते आप देखेंगी, तो मालूम होगा कि इन पांचों विभागों का कुल व्यय एन.एन.पी. का ०.६ प्रतिशत है। मात्रा अधिक हो सकती है, लेकिन प्रतिशत पहले से बहुत कम हो गया है। उस समय एन.एन.पी. का कुल ४ प्रतिशत व्यय इन पांचों विभागों के द्वारा होता था, लेकिन अब इन पांचों विभागों पर एन.एन.पी. का केवल ०.६ प्रतिशत व्यय हो रहा है। इसे भी आप देखिए। यह बहुत ही कम है। इऩ पांचों विभागों पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत है। इसीलिए मिड टर्म एप्रेजल जब किया गया, तो उसमें बेरोजगारी का प्रतिशत ज्यादा आया था। बेरोजगारी का प्रतिशत बढ़ने के कारण हीएन.डी.ए. को उधर जाना पड़ा। शहरों के साथ-साथ गांवों में भी पिछले ७-८ सालों में बेरोजगारी ज्यादा बढ़ी। इसी कारण इन वर्षों में अब तक ९ हजार लोग खुदकुशी कर चुके हैं। यह सिलसिला सबसे पहले आंध्रा प्रदेश में शुरू हुआ और बाद में कर्नाटक तथा महाराष्ट्र तक फैल गया।

महोदय, गांवों में बेरोजगारी के कारण, पिछले २० सालों में हमारा पर कैपीटा ग्रेन कंजम्पशन घट गया है। छ: साल पहले यह १७४ किलो ग्राम था जो अब १५५ किलो ग्राम पर आ गया है। ग्रामीणों की परचेजिंग पावर नहीं है। उसकी ज्यादा खर्च करने की क्षमता नहीं है। यदि ज्यादा खर्च करने की क्षमता होती, तो वह ज्यादा अन्न का कंजम्पशन कर सकता था। गांवों में किसानों की अन्न उत्पादन और बेचने की शक्ति भी कम हो गई है। पहले के मुकाबले उसकी अन्न उत्पादन और बेचने की क्षमता में २६ मलियन टन की कमी आई है। यही कारण है कि एन.डी.ए. सरकार के समय गोदामों में ६० मलियन टन खाद्यान्न भरा पड़ा था, लेकिन देश के ग्रामीणों की परचेजिंग पावर नहीं थी। उस समय उस सरकार ने अपने स्टॉक में से १७ मलियन टन अन्न विदेशों को बेचा। विदेशियों ने कोई अपने खाने के लिए थोड़े ही खरीदा, उन्होंने अपने सुअरों को खिलाने के लिए खरीदा और हमारी सरकार ने उसे बहुत कम दाम पर, बिलो पावर्टी लाइन के नीचे रहने वालों को जिस दाम पर हम अन्न देते हैं, उस दाम पर बेचा। यह उस सरकार का एटीटयूड था[rpm57] ।

 

यह एटीटयूड का सवाल है, मैं कुछ अलग नहीं बोल रहा हूं, यह फिलोसोफी का सवाल है, यह पोलटिकल सवाल है। तब सरकार के नज़र में इंडिया शाइनिंग की चमक थी, हिन्दुस्तान चमक रहा था। उस चमक में गरीब का दुख-दर्द, मौत और गरीब का गुस्सा एन.डी.ए. सरकार ने नजरअंदाज किया था, उसकी वजह से आज उनको उधर बैठना पड़ा। इसलिए मैं यही कहकर सरकार का समर्थन करता हूं। फिर भी मैं चेतावनी देना चाहूंगा कि ऐसी गलती न करें। हमको समझना पड़ेगा कि आज की जरूरत है को जो इनडिस्क्रिमिनेट उदारीकरण के समर्थक हैं, वे ज्यादा बोल रहे हैं कि सिर्फ एफ.डी.आई. के हिसाब से चलो, सिर्फ रिफॉम्र्स के एक हिस्से में बल देते हैं और गांव के गरीब के लिए खर्च नहीं करें, इसके लिए दबाव डालते हैं। यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि गांव के विकास के दूसरे पहलू भी हैं। आज समझो ७० करोड़ लोग, जो गांवों में हैं, इसके अन्दर यह काम लागू होगा तो हजारों करोड़ रुपया लोगों के घर में पहुंचेगा। वे गरीब लोग बाजार में जाएंगे, सारी चीजें खरीद करेंगे। जब सारी चीजें गांव के लोग इस पैसे से खरीद करेंगे तो हमारे जो उद्योग बन्द हो रहे हैं, उसके दरवाजे फिर ज्यादा खुल जाएंगे। यह तो आर्थिक नीति है, चांसलर हेनरिक ब्रूनिंग ने जर्मनी में जिस तरह से अपर लेवल की इनकम बढ़ाकर जर्मनी की इकोनोमी को बर्बाद किया था, उसके पैर पकड़कर फासीवाद आया था। मगर अमेरिका केंसियन पॉलिसी के अनुसार न्यू डील शुरू किया था । इसके द्वारा ग्रामीण एरिया में ज्यादा पैसा सरकार की ओर से खर्च करे तो गांव के लोगों के पास पैसा जायेगा तो वे उस पैसे से खरीद करेंगे। खरीद करेंगे तो हमारी इण्डस्ट्री बढ़ेगी और ग्रामीण स्टेगनेशन टूटेगा, इस पॉलिसी को आज हमारे देश में अपनाने की जरूरत है।

हमारा इसमें कहना है कि जिस तरह से बिल को लाया गया है, इसके लिए हम इसका समर्थन करते हैं, इसका वैलकम करते हैं। आप २०० जिलों में इसे लागू कर रहे हैं। इसे धीरे-धीरे पूरे हिन्दुस्तान में जहां ग्रामीण क्षेत्र में हर जगह ४-५ साल में जो लागू करने की बात है, इस बात को माना है, इसलिए मैं सरकार को बधाई देता हूं। यह बिल जब आया था तो इसमें काफी कमियां थीं, मगर जब स्टेंडिंग कमेटी में गया तो हमने इसमें विस्तार से चर्चा की। १०६ मेमोरैण्डम कमेटी के पास आये, सारे बड़े-बड़े पंडित लोग हमारे सामने आये और जैसा कल्याण सिंह जी ने बताया, वह सब बात सुनने के बाद हमने जो ५३ सुझाव दिये थे, मेजर सुझाव इसमें एक्सैप्ट किये गये हैं, इसलिए भी मैं सरकार को बधाई देता हूं। इसमें जो अच्छाई है, इसमें हमने जो यूनिवर्सल एप्लीकेशन की बात कही थी, उस पर सरकार को सोचना पड़ेगा। यूनिवर्सल फैमिली को लिया है, लेकिन यूनिवर्सल इण्डीविजुअल को नहीं ले रहे हैं। शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राइब्स, ओ.बी.सी., अपर कास्ट सब फैमिलीज़ चुनने की बात पहले थी, मगर इन सब फैमिलीज़ को लिया जायेगा, सिर्फ गरीब फैमिलीज़ नहीं हैं। इन फैमिलीज़ की जगह यूनिवर्सलिटी एप्लाई किया, लेकिन फैमिली मैम्बर्स जो आएंगे, डिमांड डि्रवन जॉब होना चाहिए। आज गांव में जो बेरोजगार हैं, इस बात को देखने के लिए आज न हो, लेकिन कल इस बात को यू.पी.ए. को ध्यान में रखकर सोचना पड़ेगा।

इसके साथ-साथ जो हमारा एक्सपेंडीचर है, ठीक है कि यह प्रोग्राम देश का है, सैण्ट्रल गवर्नमेंट का भी मेन प्रोग्राम है, मगर राज्य सरकार की इसमें बहुत बड़ी भूमिका है, इसलिए राज्य सरकार का पहले २५ परसेंट खर्चा देने की बात हुई थी, मगर आखिर में घटाकर १० परसेंट किया। राज्य सरकार को कुछ तो जुटाना पड़ेगा, क्योंकि उस राज्य के अन्दर बेरोजगारी है, इसलिए उसकी भी कुछ जिम्मेदारी रहनी चाहिए, इसलिए यह भी ठीक है।

इसके साथ-साथ अभी जो अनएम्पलायमेंट एलाउंस की बात है, यह भी इस बिल के अन्दर एक अच्छाई है। इस बिल के अन्दर जो नोटफिकेशन होगा, उसमें काम की जो लिस्ट है, इस लिस्ट के अन्दर जो हमारी रिक्वैस्ट से एमेंडमेंट एक्सैप्ट किया है कि जब सैण्ट्रल गवर्नमेंट काम को नोटीफाई करेगी, in consultation with State Government, यह बहुत जरूरी है, इसलिए कि समुद्र है, रेगिस्तान है और पहाड़ है, जंगल है, अलग-अलग स्टेट में अलग तरीका है। एक फार्मूले से पूरे हिन्दुस्तान का काम नहीं चलता है, इसलिए १-१ जगह के मुताबिक उसका फैसला करना पड़ेगा। इसलिए in consultation with State Government, आपने एक्सैप्ट किया, इसलिए भी मैं सरकार को बधाई देता हूं।

इसके अलावा पहले बिल में पंचायत की भूमिका ऑलमोस्ट जीरो थी, बहुत ही कम थी, मगर बहुत चर्चा हुई और सरकार ने भी समझा और जिस सरकार ने पूरे हिन्दुस्तान में पंचायती राज चालू किया और वे पंचायतों को निकालकर ऐसा ग्रामीण प्रोग्राम लागू नहीं कर सकते, इसे सरकार ने समझा है। यह भी सही है, इसलिए भी बधाई देता हूं कि अब सारा काम पंचायत के जरिये होगा, प्लानिंग, इम्प्लीमेंटेशन, इवेल्यूएशन, उसका हिसाब देना, उसका पब्लिकली हिसाब डिस्प्ले करना, ये सारे काम पंचायतों को दिये गये हैं, इसको मानना बहुत अच्छी बात है, यह सही बात है, पोजटिव है, मैं इसका समर्थन करता हूं।[i58] 

 

[MSOffice59]  

औरतों की भागीदारी के लिए महिलाओं का चुनाव करना होगा। मैंने देखा है उड़ीसा और बिहार में ५५ प्रतिशत महिलाएं काम करती हैं। यह कहना कि महिलाएं नहीं मिलेंगी, यह एक एटिटयूड की बात है। हमें यह देखना होगा कि महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा काम मिले। इसके अलावा राष्ट्रीय काउंसिल और स्टेट काउंसिल इसकी मॉनिटरिंग करेगी। उसमें सबका प्रतनधित्व होगा। अनुसूचित जाति, जनजाति, महिला, अल्पसंख्यक और ओबीसी का भी इसमें प्रतनधित्व होगा। पहले इसमें ओबीसी को शामिल नहीं किया गया था, अब उनको भी शामिल कर लिया गया है। इन सबको यह देखना होगा कि किसी के साथ अन्याय न हो। इसलिए काउंसिल में सब तरह के लोगों को शामिल किया गया है, यह भी एक अच्छा कदम है। इसके अलावा सरकार द्वारा प्रोग्राम आफिसर की नियुक्ति भी की गई है। इसमें कंपनसेशन के बारे में भी कहा गया है कि यदि काम करते समय किसी की मौत हो जाती है तो उसे २५ हजार रुपए दिए जाएंगे। पहले यह दस हजार रुपए था। हमने सुझाव दिया कि इसे २५ हजार कर दिया जाए, जिसे सरकार ने मान लिया है क्योंकि एक जिंदगी के लिए २५ हजार की रकम कम है। गरीब की जिंदगी को पैसे से नहीं देखना चाहिए। भविष्य में इसके बारे में और सोचना पड़ेगा। इसके साथ-साथ सुविधाओं के बारे में जैसा कि श्री कल्याण सिंह ने कहा कि पचास लोगों की टीम होने के बाद ही काम शुरू होगा। हमने सुझाव दिया था कि दस लोगों की टीम होनी चाहिए और इस सुझाव को भी संशोधन में लाया गया है। इससे लोकल एरिया में काम करने में सुविधा होगी। इसके अलावा इम्प्लीमेंटेशन की समस्या भी हमारी नजर में आई थी। इस पर हम लोगों ने चर्चा की थी। इसे सरकार की नजर में लाया गया। केंद्र सरकार राज्य सरकारों को साल के अंत में फंड मुहैया कराती है। साल के शुरू में पैसा राज्य सरकारों को न देने से काम शुरू नहीं हो पाता है। हमने सुझाव दिया था कि सरकार साल के शुरू में वह फंड मुहैया कराए, जिसे केंद्र सरकार ने मान लिया है, इसके लिए मैं धन्यवाद देता हूं।

दूसरी बात जो मेरी नजर में आई कि इसका कोई टाइम फ्रेम नहीं था। हमने कहा था कि इसे पांच साल के लिए कर दिया जाए, जिसे सरकार ने संशोधन में मान लिया है। इसके अलावा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की जमीन में काम किया जाएगा, लेकिन बहुत सी जगहें हैं, जहां काम किया जा सकता है। यदि प्राइवेट भूमि में करेंगे तो अमीर लोगों की बिल्डिगें बन जाएंगी। इसलिए अनुसूचित जाति, जनजाति व सरकारी जमीन पर काम होगा तो वह सही रहेगा। इसके साथ मैंने निवेदन किया था कि जहां सरकारी वेस्ट लैंड है, जिसको लेने के बाद एक बीघे, आठ बीघे, दस या पन्द्रह बीघे, छोटे-छोटे हिस्सों में गरीब के बीच बांट दिया गया था, उनकी जमीन के विकास के काम को भी इसमें शामिल किया गया है। इंदिरा आवास योजना के तहत रहने वालों की जमीन पर काम करने के प्रस्ताव को भी सरकार ने स्वीकार कर लिया है। इस प्रोग्राम को छह महीनों के अंदर लागू किया जाएगा, लेकिन इसमें हमारी कुछ चिंताएं हैं, उन पर मैं सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। जब सरकार ने यह बिल बनाया था, उससे पहले राज्य सरकारों से बात नहीं की थी। अगर बात कर लेते तो आसानी होती। बिल पास होने के बाद भी यदि सलाह-मश्विरा करेंगे तो इसे बेहतर ढंग से लागू किया जा सकेगा क्योंकि राज्य सरकारें ही इसकी इम्प्लीमेंटेशन एजेंसीज हैं। इसमें एक कमी थी कि इवेल्यूएशन का प्रावधान नहीं है। इस बिल को विड्रा करने का अधिकार सरकार के पास नहीं होना चाहिए। इसे सरकार किसी आर्डर से विड्रा नहीं कर सके, केवल संसद द्वारा ही इसे विड्रा किया जा सके। ऐसा हमारा सोचना है। श्री राजीव गांधी जी ने कहा था कि इतना भ्रष्टाचार है कि यदि सौ रुपया देते हैं तो केवल १५ रुपए ही गांव में पहुंचते हैं[MSOffice60] ।

[R61] 

इसे हमें बहुत मजबूती से देखना पड़ेगा। यदि कोई व्यक्ति करप्शन करे. तो उसे कठिन से कठिन सजा देनी चाहिए। इसीलिए हमने कोआर्डीनेटिंग ऑफिसर की सजा बढ़ाने का सुझाव दिया था। अगर पोलीटिकल लोग ऐसा करें, तो उन्हें किसी भी तरह के इलैक्शन से पांच साल के लिए डिबार करने का सुझाव हमने दिया था। यह जरूरी है, क्योंकि हिन्दुस्तान के समाज में करप्शन बहुत दूर तक पहुंच गया है। लोग करप्शन को आज अन्याय नहीं मानते। ऐसी परिस्थिति में कठिन सजा ही उसे रोक सकती है। इस सुझाव पर भी हमें विचार करना पड़ेगा। पंचायत, जिला परिषद आदि में जो पोलीटिकल लोग हैं, यदि इम्प्लीमैंटेशन में कोई गलत कार्य करे तो उसे पांच साल के लिए चुनाव लड़ने से रोक देना चाहिए – भविष्य में इस प्रोवीजन के बारे में भी सोचना चाहिए, यह हमारा सुझाव था।

मैंने शुरू में इस बिल का समर्थन इन्हीं कारणों से किया। मैं समझता हूं कि इस बिल के जरिएएक शुरुआत हुई है। काम की गारंटी – क्या गारंटी शब्द का कोई मतलब इस बिल के अंदर है। जिसे मिला, मिला, नहीं मिला, नहीं मिला, कोई गारंटी नहीं है। लेकिन इस बिल के अनुसार कम से कम सौ दिन में काम देना ही पड़ेगा, इस गारंटी के एलीमेंट को हम शुरुआत मानते हैं। आने वाले दिनों में पूरे देश के बेरोजगार लोगों को काम के अधिकार की गारंटी देने की हमारी जो मांग है, सरकार उसी रास्ते पर चलेगी, यह बात कहते हुए मैं पुन: सरकार और मंत्री जी को बधाई देता हूं और अपनी बात समाप्त करता हूं। धन्यवाद।

श्री मोहन सिंह (देवरिया) : अध्यक्ष महोदय,कभी-कभी संसद में ऐसा ऐतिहासिक दिन आता है, जब पूरा सदन किसी विषय पर एकमत होकर पूरे देश को कि हम जनता के सही प्रतनधि हैं, ऐसा संदेश संसद की ओर से जाता है। दसवीं लोक सभा में एक समय था, जब पंचायती राज के संबंध में हमने संवैधानिक संशोधन किया और पूरे देश को यह विश्वास हुआ कि भारत की संसद गरीब आदमी और गांव के बारे में सोचती है। पंचायती राज कानून को मुकम्मल स्थान देने का काम दसवीं लोक सभा ने किया। उसके बाद आज का दिन संसदीय इतिहास में ऐतिहासिक लिखा जाएगा, जिस दिन भारत की संसद भारत के गरीब व्यक्ति के लिए भी कोई मजबूत कानून बनाने की दिशा में पहल कर रही है।

15.57 hrs. ( Shri Arjun Sethi in the Chair)

इसलिए मैं इस विधेयक का स्वागत करता हूं, खास तौर से जिस धूम-धड़ाके के साथ रघुवंश बाबू ने इस विधेयक को प्रस्तुत किया है, संभवत: कोई मुर्दा मन का सदस्य ही इसका विरोध करेगा, समर्थन करना सबकी अपनी अनिवार्यता और मजबूरी है। इसलिए उनके धूम-धड़ाके वाले भाषण के लिए मैं उन्हें बधाई देता हूं। लेकिन उसी के साथ-साथ, यूपीए के चेयरपर्सन ने कहा है कि यह शुरुआत है, इसलिए हम इसे ऐतिहासिक न कहें। यदि यह शुरूआत अपने अंजाम में सही दिशा में पहुंचेगी, तो उस स्थिति को हम ऐतिहासिक और इस देश के लिए महत्वपूर्ण कह सकते हैं।

भारत में गरीबी लगातार बढ़ रही है। यह दुर्भाग्य है कि हमारे देश के प्रधान मंत्री जी लाल किले से इस देश को कहते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था सात फीसदी के हिसाब से हर साल बढ़ रही है और इस साल भी सात फीसदी की तरक्की होगी, लेकिन हमारे देश की गरीबी और बेरोजगारी बढ़ने की रफ्तार सन् २००१-२००३ में ८.८७ फीसदी थी, जो २००४-२००५ में बढ़कर ९.११ फीसदी हो गई, यानी हमारी अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार से बेरोजगारी बढ़ने की रफ्तार कुछ अधिक है।

कल्याण सिंह जी ने बहुत सही बात कही कि बेरोजगारी के पेट से ही गरीबी पैदा होती है। इसमें गरीबी हटाओ का नारा अधूरा था, यदि उसे बेरोजगारी हटाओ से जोड़कर न देखा जाए, आगे न बढ़ाया जाए। रोजगार मंत्रालय के आंकड़े कहते हैं कि इस देश में १८ वर्ष से लेकर ६४ वर्ष की उम्र के बीच, यानी काम करने वाली शक्ति की आबादी ३९ करोड़ है[R62] ।

16.00 hrs. [r63] 

 उनकी संख्या ३८ और ३९ करोड़ के बीच में है। इन ३८ और ३९ करोड़ के बीच में रहने वाले लोगों में से, जिनको काम की आवश्यकता है, दस करोड़ लोग बेरोजगार हैं। इन दस करोड़ में से ९५ लाख लोग ऐसे हैं जिनको पूरे वर्ष में एक दिन भी रोजगार नहीं मिलता, यानी मृत्यु के मुंह पर वे रोजाना पहुंचते हैं और कहीं से अतरिक्त संसाधन जुटाकर अपनी जीविका को चलाते हैं। ऐसी हालत में इस देश का परम पुनीत कर्त्तव्य है कि ऐसे लोगों के लिए हम सारी चीजों को छोड़कर रोजगार का इंतजाम करें।

मुझे खुशी है कि पिछले साल जब पहले रूप में यह विधेयक पेश हुआ और आज जब हम उसे पेश करने जा रहे हैं, तो उसका पूरा स्वरूप बदल गया है। हमारे देश की लोकतांत्रिक और संसदीय व्यवस्था में कमेटी सिस्टम कितना महत्वपूर्ण और मजबूत है, हम इस विधेयक के स्वरूप से समझ सकते हैं। जिस ढांचे में यह विधेयक प्रस्तुत हुआ था, संसदीय समति के प्रभाव से या उसके प्रयास से इसके ढांचे में ही मूलभूत परिवर्तन हो गया और उस मूलभूत परिवर्तन से यह संभावना पैदा होती है कि इस देश की संसद, सरकार इस देश की सामान्य गरीब, कमजोर और बेरोजगार लोगों के लिए कुछ संसाधन जुटा सकती है। उनके लिए भी कुछ इंतजाम कर सकती है।

यदि २०० जिलों में इसे लागू किया जाये, तो ३८ और ३९ हजार करोड लोगों के लिए हम कुछ इंतजाम करने की बात सोच रहे हैं। अभी जो आंकड़े आये हैं, उनके अनुसार इस देश के नागरिक अपना काम कराने के लिए रिश्वत के रूप में २१ हजार करोड़ रुपये हर साल खर्च करते हैं। जिस देश में रिश्वत के रूप में अपना काम कराने के लिए २१ हजार करोड़ रुपये आदमी खर्च करता है, उसी देश में गरीब घरों के बच्चों के लिए मिड डे मील पर हम संसद से १५ करोड़ रुपये से लेकर १८ करोड़ रुपये का बजट पास करते हैं। इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है ?

यदि हम इस देश को समुचित रूप से चलाना चाहते हैं, तो हमें अंतिम रूप से, समाज के अंतिम आदमी की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। मुझे एक कथानक इस देश का याद आता है। जब भारत आजाद हुआ तो आजादी के बाद इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी, उस जमाने के राष्ट्रपिता, जो उस समय जीवित थे, उनसे मिलने गये। उन्होंने उनसे प्रश्न किया कि बापू जी, हम इस देश को किस तरह चलायें। तब बापू जी ने कहा कि जवाहर लाल जी, हम आपको कोई मंत्र नहीं देते लेकिन एक जंतर जरूर देते हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने पूछा कि वह जंतर कौन सा है, तो गांधी जी ने कहा कि जब कोई भी पत्रावली मंत्रालय से हस्ताक्षर के लिए आये तो एक क्षण के लिए प्रभु का ध्यान करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि जो आदेश निकलने जा रहा है, उस आदेश से इस देश के सबसे अंतिम आदमी का कितना कल्याण होता है। यदि आदेश में उसका कल्याण नहित नहीं है तो ऐसी किसी भी पत्रावली पर तुम हस्ताक्षर नहीं करना। इस देश के राष्ट्रपिता का इस देश के पहले प्रधान मंत्री को दिया हुआ यह अंतिम आदेश और संदेश था।

मैं ऐसा समझता हूं कि इस विधेयक से बापू जी के उस आदेश की शुरुआत हम पूर्णरूप से नहीं, लेकिन आरंभिक रूप से करने जा रहे हैं। इसलिए हम इस सरकार को कुछ चेतावनियों के साथ धन्यवाद देना चाहते हैं, जिनकी ओर श्री कल्याण सिंह जी ने इशारा किया है। उनके इशारे को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। साफ तौर पर इस बात को आकलन के जरिये, इस देश की सरकार ने जो रोजगार गारंटी स्कीम, फूड फॉर वर्क, अन्त्योदय योजना और जवाहर रोजगार आदि दूसरी वृहत्तर योजनाएं थीं, उऩ सबकी समीक्षा के बाद ये आंकड़े दिये कि उनका केवल २० फीसदी भाग ही इम्प्लीमैंट हो सका। यह बात सही है कि आज जो विधेयक हमारे सामने विचार के लिए आया है, उसकी माता के रूप में हम महाराष्ट्र में बहुत दिनों से जो रोजगार गारंटी स्कीम लागू है, उसे जानते हैं। उस ओर श्री शिवराज पाटिल और यूपीए की चेयरपर्सन ने अपने भाषण में इशारा किया है, लेकिन उस में कुछ बातें हैं। जब संसदीय समति ने अपनी रिपोर्ट पेश की, तब उस रिपोर्ट में वहां की सरकार से पूछकर इस सदन में जो रिपोर्ट रखी, उसके कुछ अंश मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत करना चाहता हूं[r64] ।

[R65] 

उसमें उपलब्धियां हुई हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उसमें जो कमियां थीं, योजना के अन्तर्गत अकुशल मजदूरों के कार्य की मांग में किसी गिरावट के बगैर तीस वर्ष के बाद भी यह कार्यक्रम जारी है, जो खुशी की बात है लेकिन राज्य में गरीबी घटाने या बेरोजगारी कम करने में इस योजना का बहुत कम असर पड़ा क्योंकि रोजगार गारंटी के कुछ मामलों में, वास्तव में, उसे कार्यान्वित ही नहीं किया गया। सामाजिक सुरक्षा उपाय मात्र लाभों व कार्य-स्थलों पर सुविधाओं का कार्यान्वयन अच्छे ढंग से बिल्कुल नहीं किया गया। दक्षता प्रशिक्षण यदि दिया भी जाता है तो नगण्य ही होता है। अभी तक किसी को भी बेरोजगारी भत्ता नहीं दिया जाता। मैं इस बात को इसलिए सुना रहा हूं कि जिस भरोसे से हम इस अधनियम को यहां पास करना चाहते हैं, पूरे देश में लागू करना चाहते हैं, प्रयोग के तौर पर जिस राज्य में यह लागू हुआ, उसमें बहुत सारी अच्छाइयां थीं लेकिन प्रयोग के बाद उसकी बहुत सारी कमियां भी सामने उजागर हुई हैं। उन कमियों को ध्यान में रखते हुए हम भविष्य की दिशा इस तरह की बनाएं कि जो कमियां थीं, उस रोजगार गारंटी कानून में, हम उन कमियों को दूर कर सकें। यह हमारी द्ृष्टि, यह व्यापक प्रभाव हमारे मन में होना चाहिए। इसलिए सुझाव के तौर पर मैं कहना चाहता हूं कि इस रोजगार गारंटी स्कीम की निगरानी के लिए, जैसे अनेक संसदीय समतियां बनी हैं, इसकी भी निगरानी के लिए एक अलग से संसदीय समति बननी चाहिए।

दूसरे,उसे लागू करने में यदि राज्यों में केन्द्र से हस्तक्षेप करना पड़े, जैसे पूरे १५० जिलों में आज की तारीख में फूड फॉर वर्क स्कीम जारी है, यदि उस स्कीम के लिए भी, जैसे रघुवंश बाबू ने एक निगरानी कमेटी बना दी थी और उस निगरानी कमेटी के अध्यक्ष की हैसियत से हमने देखा कि गांवों में पहले जो सड़कें बन गई थीं, उन्हीं सड़कों पर, जिन पर डामर रोड बनी हुई है, कागज में फिर उसी सड़क पर मिट्टी का काम दिखाकर ठेकेदारों और उस विभाग के अफसरों ने इस काम की इतिश्री कर ली और उस पैसे का, उस खाद्यान्न का आपस में निपटारा कर लिया। उसमें भी इस बात की गारंटी दी थी कि कोई भी काम मशीन और ट्रैक्टर से नहीं होगा, केवल व्यक्तियों के श्रम से होगा लेकिन अनुभव से हमने देखा कि व्यक्तियों के श्रम को नजरअंदाज करके ठेकेदारों के जरिए ट्रैक्टर से उस काम को करा लिया गया और जब हम पहल करने के लिए गये तो उसमें बहुत से प्रभावशाली लोग सामने आए जिन्होंने कोई कार्रवाई करने से उस काम को रोका। इसलिए जो कटु अनुभव है, ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्यान्न योजना के कार्यान्वयन में उस कटु अनुभव का हम अपने ऊपर असर लेते हुए, उसकी जो कमियां हैं, उन्हें दूर करने का प्रयास होना चाहिए औऱ इसकीफूल प्रुफ ऑडिटिंग का परमानेंट सिलसिला बनाना चाहिए जिससे हम सही मायने में जो चाहते हैं कि इस देश के गरीब आदमी को रोजगार मिल सके और इस देश की तरक्की में, इस देश के सम्यक विकास में उसकी सांझेदारी हो सके।

इन सुझावों के बाद दूसरी बात कहना चाहता हूं कि जो यूपीए का घोषणा-पत्र है, यह बात सही है कि यूपीए सरकार की उपलब्धि के खाते में एक बात जोड़ ली गई लेकिन सम्पूर्ण रूप से यूपीए के कार्यक्रम का यह कार्यान्वयन नहीं है। उसमें दिया गया है कि हमारी सरकार बनने पर, यानी यूपीए की सरकार समान रूप से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के वयस्क नागरिकों के लिए रोजगार का इन्तजाम करेगी और जब आपने यह कहा है कि इसी तरह का विधेयक जो शहरी क्षेत्र में बेरोजगार हैं, उनकी बेरोजगारी दूर करने के लिए भी लाया जाना चाहिए जिससे इस देश के सभी बेरोजगारों के बीच में यह भावना न जाए कि पक्षपात हो रहा है।

इन्हीं शब्दों के साथ, सभापति जी, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं और इस विधेयक का समर्थन इस विश्वास के साथ करता हूं कि सभी वर्ग इसका समान रूप से समर्थन करके पूरे देश को इस संसद की ओर से अनुकूल संदेश देंगे। धन्यवाद।

[R66] 

[r67] 

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (झंझारपुर) : सभापति महोदय, इस ग्रामीण रोजगार गारण्टी विधेयक को सदन में प्रस्तुत करने में यूपीए सरकार ने जो इच्छाशक्ति दिखाई है और खासकर माननीय प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह जी, नेशनल एडवाइजरी कौंसिल की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी जी, हमारे ग्रामीण विकास मंत्री श्री रघुवंश प्रसाद सिंह जी और हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद जी ने जो समर्थन, सहयोग, तत्परता और प्राथमिकता इस विधेयक को दी है, उसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। मैं समझता हूं कि हम लोग शुरू से ही इसकी मांग कर रहे थे क्योंकि हमारी पार्टी ग्रामीण अंचल से आती है। गांव के गरीब, खेतिहर मजदूर, दबे-कुचले लोगों, जो गिट्टी-मिट्टी, खेत-खलिहान से सालों से जुड़े हुए हैं, उनका उन्नयन, उनका आर्थिक विकास, उनके जीवन में तब्दीली कैसे आए, कैसे उनका जीवनस्तर ऊंचा उठे, यही हमारा सपना था, हम इसके लिए कृत संकल्पित थे।इसलिए हमारे सपने को साकार करने की दिशा में यह विधेयक एक बड़ा प्रयास है। यह न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि ऐतिहासिक भी है। मैं इस सर्वोच्च सदन में इस बात को इसलिए कहना चाहता हूँ क्योंकि आज गांव का मतलब गरीबी, बेरोजगारी और बदहाली हो गया है। गांव शब्द गरीबी, बेरोजगारी और फटेहाली का पर्यायवाची बन गया है। गांव शब्द आते ही गरीब कहने की जरूरत नहीं होती है।गांव शब्द का उच्चारण करते ही बेरोजगारी और गरीबी झलकने लगती है कि गांव के गरीब लोगों के पेट की ज्वाला किस तरह से जलती है।आज भी गरीब, जो समाज का अन्तिम व्यक्ति है, किस तरह भूख से तड़पता है। आज इस रोजगार गारन्टी विधेयक के जरिए मैं समझता हूँ कि उस गरीब को राहत देने का, उनके जीवन में उन्नयन करने का, आर्थिक और सामाजिक रूपए से सुरक्षा देने का काम होगा। इसके माध्यम से सामाजिक सुरक्षा देते हुए एक सामाजिक सुरक्षा तंत्र, एक नेटवर्क स्थापित करने का प्रयास किया गया है, इसीलिए मैं इसका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूँ।

महोदय, यहां कुछ ऐसी चर्चा चली है कि इस विधेयक में ग्रामीण क्षेत्र के करोड़ों गरीबों को ऊपर उठाने की बात है, लेकिन मैं समझता हूँ कि गरीबी का इस बिल में भी जिक्र किया गया है और माननीय मंत्री जी ने भी इसका जिक्र किया है कि गांवों में रहने वाले जो ७२ करोड़ गरीब लोग हैं, उन्हें ऊपर उठाने का इसमें प्रयास किया गया है। आज यह एक अद्भुत संयोग है कि सर्वसम्मति से यह सदन इस पर विचार कर रहा है। इसी से यह पता चलता है कि यह विधेयक कितना महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। मैं यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि आज हमारे देश का सबसे बड़ा एचीवमेंट क्या है? वह एचीवमेंट है अन्न का भण्डार।

        सभापति महोदय, आज अगर सबसे बड़ा कोई एचीवमेंट हमारे देश मे है, तो वह है अन्न का भण्डार। इस अन्न के भण्डार को कौन पैदा करता है?हमारे कामगार, कर्मकार, मजदूर और खेतिहर मजदूर अर्थात समाज के यही अन्तिम लोग इसे पैदा करते हैं। आज हमारा देश जिस चीज, अन्न के भण्डार पर गर्व करता है, आज हमें जिसका गौरव है, जो उसे पैदा करते हैं हमारे समाज के यही गरीब मजदूर लोग। ये लोग दौलत पैदा करते हैं। आज हम इन पर फख्र और गर्व करते हैं। यही श्रमिक और खेतिहर मजदूर हैं, जिन पर हम गर्व कर सकते हैं। इनमें कृषि महिलाकर्मी भी आती हैं, जो कृषि कार्य में लगी हुई हैं और जो परिश्रम करती हैं। आज हम उन पर गर्व करते हैं।

हमारे लिए आज यदि गौरव की कोई सबसे बड़ी बात है, सबसे बड़ी उपलब्धि है तो वह अन्न का भण्डार है। यह जिन हाथों से पैदा होता है, दौलत पैदा करने वालों के जीवन को सुधारने के लिए ही यह बिल आया है। उनके लिए आया है ग्रामीण रोजगार गारण्टी बिल, जो अधनियमित होकर कानून बनेगा और इसके तहत १०० दिन का रोजगार देने की गारण्टी होगी। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी विधेयक में यह अनुमान लगाया गया है, माननीय मंत्री जी करेक्ट कर लेंगे, कि कुल ग्रामीण आबादी ७४.२ प्रतिशत है।[r68] 

[R69] 

कुल ग्रामीण आबादी जिसे राहत मिलने की सम्भावना है, उसमें परिवार की परिभाषा को भी परिभाषित किया गया है। गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले जो गरीब लोग हैं, उनके अलावा जो आखिर में सबसे गरीब हैं, उन्हें इसमें समाहित किया गया है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का आंकलन योजना आयोग करता है। योजना आयोग के हिसाब से २६.८ प्रतिशत उनका आंकलन किया गया है। लेकिन जो सबसे गरीब हैं, जो अभी तक किसी योजना के लाभ से छूट रहे थे, उन्हें भी इस योजना के तहत रोजगार से जोड़ने का काम किया जाएगा। एक पैरामीटर के तहत पंचायतें चिन्हित करेंगी और उन्हें इस योजना का लाभ दिया जाएगा। इसके अलावा जिन लोगों को साल भर कोई काम नहीं मिल पाएगा, उन्हें न्यूनतम मजदूरी जो ६० रुपए प्रतदिन है, जो मेनडेज है, वह भत्ते के रूप में दिया जाएगा। यह एक सकारात्मक और सार्थक संकेत है।

इस योजना को चरणबद्ध ढंग से पूरे देश में लागू करने की बात कही गई है। चरणबद्ध ढंग से जरूर यह योजना लागू होगी, लेकिन उसमें कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां भी आएंगी। मेरा कहना है कि चरणबद्ध ढंग से लागू करने सम्बन्धी बात की प्राथमिकता तय होनी चाहिए। जैसे प्राकृतिक आपदा से प्रभावित पूरे देश में जो जिले हैं,

श्री नीतीश कुमार (नालंदा) : क्या उसमें आपका भी जिला है?

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : मैं सभी जिलों की बात कर रहा हूं। मैं वाटर लॉगिंग एरिया वाले जिले, फ्लड प्रोन एरिया या ड्राउट प्रोन एरिया वाले सभी जिलों की बात कर रहा हूं। आपका जिला भी उसमें आता है। अगर इन सभी चीजों को देखा जाए तो पूरा बिहार इस योजना के अंतर्गत आना चाहिए, क्योंकि बिहार में कहीं बाढ़, तो कहीं सुखाड़ हर साल रहता है और जो दक्षिण का आखिरी छोर है, वहां उग्रवाद की समस्या है। इसलिए उग्रवाद से प्रभावित जिले भी इस योजना में लिए जाने चाहिए। पिछड़े राज्य इसमें शामिल होने चाहिए इसलिए इस योजना में शामिल करने वाले जिलों के लिए प्राथमिकता तय होनी चाहिए। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की यही सोच है और उसके कामन मिनीमम प्रोग्राम में इस बात का उल्लेख है कि इसे चरणबद्ध ढंग से पूरे देश में लागू किया जाएगा। मैं पूरे बिहार को इस योजना के अंतर्गत लाने की बात इसलिए करता हूं, क्योंकि पूरे बिहार में बाढ़, सुखाड़ और उग्रवाद की समस्या है इसलिए वह हर तरह से उपयुक्त लगता है। इसलिए जो क्राइटेरिया है इस योजना में अन्य जिलों को जोड़ने का, तो उसमें पूरा बिहार इस योजना में समाहित होने योग्य है।

कल्याण सिंह जी ने ठीक कहा था कि गरीबी बेरोजगारी के कारण है और बेरोजगारी के पेट से गरीबी पैदा होती है। यह सही बात है। मोहन सिंह जी ने भी उसका अनुमोदन किया था। बेरोजगारी इसीलिए है, क्योंकि रोजगार नहीं है। जब रोजगार नहीं है, तो बेरोजगारी होगी ही और गरीबी भी होगी। ये सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। गरीबी उन्मूलन की दिशा में जो कुछ भी प्रयास हुए हैं, यदि पूरी तरह से वे धरती पर उतर जाते, तो ग्रामीण लोगों की आज यह स्थिति नहीं होती। योजना का ३५ प्रतिशत मात्र ही धरती पर उतरता है, यह एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है।

अभी हाल ही में टाटा कंसलटेंसी ने पूरे देश में एक सर्वे कराया था कि बजट द्वारा केन्द्र से जो फूड सब्सिडी दी जाती है आम लोगों के लिए, गरीब लोगों के लिए, उसका कितना प्रतिशत वास्तव में उन तक पहुंचता है। उस सर्वे में ३५ प्रतिशत का अनुमान दिया गया है। यह किसी एक सरकार की बात नहीं है। यह नौकरशाही की व्यवस्था है, जिसके चलते मात्र ३५ प्रतिशत फूड सब्सिडी ही धरती पर पहुंचती है, आम आदमी तक पहुंचती है। इसलिए मेरा सुझाव है कि इसे पूरी तरह धरती पर उतारने की गारंटी होनी चाहिए।…( व्यवधान) मैं साफ-साफ बात कह रहा हूं। यह विधेयक पास होकर कानून बनेगा इसलिए अपनी बात कहनी चाहिए। मेरा कहना है कि जो ३५ प्रतिशत वाला सर्वे आया है, इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, गम्भीरता से सोचना चाहिए कि कैसे यह शत-प्रतिशत लागू हो। उसके लिए जो भी नेटवर्क लागू करना हो, वह करना चाहिए, वैसे इसमें प्रावधान किया गया है और जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक और राज्य स्तर से केन्द्रीय स्तर तक कौंसिल बनाने की बात कही गई है[R70] ।

[r71] 

 इस तरह की चिंता रहती है। लेकिन यह स्कीम पूरी तरह से धरती पर कैसे लागू हो, इसे लागू करने के लिए जिस इच्छा-शक्ति से लाया गया है, उसी इच्छा-शक्ति से, ठोस कदम उठाकर, इस पर अमल किया जाना चाहिए और साथ ही जनप्रतनधियों की भागीदारी भी इसमें होनी चाहिए ताकि इस योजना को धरती पर उतारने में उनका भी सहयोग हो।

सभापति जी, एक आशंका इसमें जताई गयी है। मैं कहना चाहता हूं कि इससे गांव के गरीब की क्रय-शक्ति बढ़ेगी, क्योंकि जब तक गांव के गरीब आदमी की परचेजिंग पावर नहीं बढ़ेगी, गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम सफल नहीं होगा। गरीब की परचेजिंग पावर बढ़ेगी, तो गरीब के जीवन-स्तर में परिवर्तन होगा। सौ दिन का काम देने से गरीब की परचेजिंग पावर बढ़ेगी। गांधी जी ने कहा था क “ सही आजादी का सबूत, गांव हमारा हो मजबूत” । हमारा आजादी का जो मतलब है, लक्ष्य है, उसे हम तब तक नहीं छू सकते हैं जब तक कि गांव मजबूत नहीं होगा।

शहरी गरीब की बात की गयी। शहरी गरीब कहां से आते हैं? ये गांव से पलायन करने वाले गरीब लोग ही हैं जो रोजगार की तलाश में शहर में पहुंच जाते हैं। इसलिए गरीबों को बांटने की जरुरत नहीं है। अगर गांव से गरीबों का पलायन रुक जाएगा तो शहर में गरीबी रुक जाएगी। आज शहर में जो भीड़-भाड़, कंजैशन बढ़ रहा है उसका कारण लोगों का गांव से पलायन ही है। आप एक साल का प्लॉन बनाते हैं लेकिन आबादी १० गुना बढ़ जाती है जिससे कोई भी योजना सफलतापूर्वक लागू नहीं हो सकती है।

आज बिहार से २० लाख खेतीहर मजदूर दूसरे प्रदेशों में पलायन कर गये हैं जिसका असर बिहार की फसलों पर पड़ रहा है। वहां श्रम का अभाव हो गया है और बिहार के श्रम का शोषण दूसरे प्रदेश कर रहे हैं। श्रम के अभाव के कारण खेती पर इसका कुप्रभाव पड़ा है। चावल, गेहूं और अरहर के उत्पादन पर इसका सीधा प्रभाव देखा जा सकता है। इस रोजगार गारंटी योजना से, इस विधेयक से इस पर असर पड़ेगा और पलायन रुकेगा। अगर आप इस योजना के तहत श्रमिक को बिहार में ही रोजगार दे देते हैं तो पलायन रुकेगा, हम उत्पादन ज्यादा कर पाएंगे और इससे राष्ट्रीय उत्पादन भी बढ़ेगा। इसलिए राष्ट्रीय हित में पलायन का रुकना जरूरी है।

जो रोजगार गारंटी विधेयक है यह निश्चित रूप से अपने मकसद को प्राप्त करेगा। खेतीहर मजदूरों का पलायन रोकना अपने आप में एक समस्या है लेकिन यह विधेयक पलायन को रोकने में सहायक होगा।

सभापति महोदय, मैं अपने दिल के दर्द की बात बताना चाहता हूं। हम लोग गांव से आते हैं। माननीय गुरुदास दासगुप्त जी और माननीय मोहन सिंह जी बराबर गरीबों की बात उठाते हैं और सही उठाते हैं। मैं आपको सही आकलन बताना चाहता हूं। जब हम गांव में बूढ़ी मां को या किसी गरीब आदमी को देखते हैं तो क्या देखते हैं। उनके तन पर कपड़ा नहीं होता और वे सुथनी, कौदो और घोंघा खाते हैं। उन्हें अपने शरीर के लिए जितना कलौरीयुक्त भोजन मिलना चाहिए, उससे आधा कैलौरीयुक्त भोजन भी उन्हें नहीं मिलता है। इसका नतीजा यह होता है कि अगर उनकी औसत उम्र ८० या ९० साल होनी चाहिए तो वे ६० साल की उम्र में ही मर जाते हैं। इसलिए यह विधेयक एक क्रांतिकारी कदम है, एक क्रांतिकारी पहल है। मैं कहना चाहता हूं कि कम कैलौरीयुक्त भोजन के कारण जो हमारे गांव के लोगों की उम्र कम हो जाती है और वे ६० साल में मर जाते है[r72] ,

भोजन में, जो कम से कम कैलोरी को तापक्रम रहना चाहिए, वह नहीं मिल पाता है, इसके चलते क्या होता है? हर्मेारे देश में कैपिटल या पूंजी नहीं है। हमारे देश की पूंजी है- श्रम, मेहनत, डिग्निटी ऑफ लेबर।इस बिल में डिग्निटी ऑफ लेबर का संकेत मिलता है। इस बिल में जरूर ऐसा संकेत है कि लेबर को महत्व दिया जाना चाहिए। मैं इसीलिए व्यावहारिक रूप से कहना चाहता था कि अभी उदारीकरण, भूमण्डलीकरण का युग है, ग्लोबलाइजेशन में, प्राइवेटाइजेशन के अंतर्गत जो सुधार की नीति चल रही है, इस विशाल नीति के तहत, खासकर बुनियादी सुविधाओं को ध्यान में रखने की जरूरत है और गांव के गरीब और खेतिहर मजदूरों का विशेष ध्यान रखना पड़ेगा, क्योंकि जिस तरह सेग्लोबलाइजेशन, निजीकरण और भूमण्डलीकरण का दौर चल रहा है,उससे गरीबों में एक गुस्सा पैदा हुआ है। इससे आर्थिक विषमता ज्यादा बढ़ेगी।

गावों में प्राचीनकाल में जो गरीब होता था, यदि वह बहुत अमीर हो जाता था तो मात्र हाथी पर चढ़ता था। हाथी पर चढ़ने का मतलब १२-१५ फुट की ऊंचाई होती थी यानी पांच फुट के इंसान से उसकी उंचाई १५ फुट हो गयी, लेकिन आज दो प्रतिशत लोग ३५ हजार फुट पर उड़ रहे हैं। यह जो आर्थिक विषमता है, इसकी वजह से हिंसा का जन्म हो रहा है। इसी के चलते ए.के.४७ के प्रयोग की स्थिति बन रही हैं । …( व्यवधान)  

Mr. CHAIRMAN : Please conclude.

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : महोदय, मैं इस बिल के बारे में कुछ बेसिक बातें भी कहना चाहता हूं। इस विधेयक से जो लाभ गरीबों को होगा, उसके सन्दर्भ में मैं बोल रहा था। मैं कहना चाहता हूँ कि हर माननीय सदस्य इस पर अपने-अपने तरीके से बोलेंगे। माननीय सदस्य श्री कल्याण सिंह जी ने बीपीएल और एपीएल लोगों के लिए सवाल उठाया, मैं कहता हूं कि बीपीएल हो या एपीएल, परिवारों की परिभाषाओं में सभी के लिए गुजाइश है। मैं कहना चाहता हूँ कि चाहे बीपीएल हो या एपीएल, जो आबादी है, उनके लिए देश में अभी २५,१६० करोड़ रूपए की फूड सब्सिडी का प्रावधान है। यूपीए सरकार द्वारा २५,१६० करोड़ रूपए का इसके लिए प्रावधान है। इस बारे में विभागीय मंत्री जी बताएंगे। उन्होंने इसके लिए वित्तमंत्री जी से बात की होगी। मेरे अनुमान से यह राशि ४०,००० करोड़ रूपए से कम नहीं होगी, एक्जैक्ट फिगर्स मेरे पास उपलब्ध नहीं हैं।…( व्यवधान)   मैं इसे करेक्ट कर लेता हूँ कि यह ३८,००० करोड़ रूपए है। अब आप ३८,००० करोड़ और २५,१६० करोड़ रूपए को जोड़ लीजिए। मैं गरीबों के हित की बात कह रहा हूँ। उनके व्यापक हितों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जिनके हितों की उपेक्षा आज तक हुई है, जिनके हितों पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया है। यदि राशि के आवंटन का सवाल है, तो इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। दोनों को यदि जोड़ दिया जाए, क्योंकि दोनों धनराशि इसी सैक्टर में खर्च हो रही हैं – जीवन स्तर को उठाने के लिए, यह ३८,००० करोड़ रूपया, जो रोजगार गारन्टी विधेयक है, वह भी उसी में जाएगा। दूसरे शब्दों मे लगभग ६३,००० करोड़ रूपए गरीबों को दिए जा रहे हैं। चाहे बीपीएल हो या एपीएल, आज तक १५ प्रतिशत, २० प्रतिशत जनसंख्या पर सारी पूंजी का निवेश होता था, सारा खर्च होता था, आज तक विकास का मुंह उन लोगों के लिए खुला होता था जिनकी चर्चा मैंने की, जो ३५ हजार फुट पर उड़ते हैं, जो आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग हैं। यह पहली बार है कि गरीबी रेखा के नीचे ओर समाज के अंतिम लोगों के हित में और उनके जीवन सुधार के लिए आज ६३ हजार करोड़ रूपए का बजटरी प्रोग्राम लाया गया है। यह कोई लिट्रेचर की बात नहीं है।

श्री अन्नासाहेब एम.के. पाटील (इरन्दोल) : अभी तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : आपको पता नहीं है, ऐसा प्रावधान है, ।

MR. CHAIRMAN:  Mr. Devendra Prasad Yadav, please address the Chair.

 

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : मेरे कहने का मतलब है कि फूड फॉर वर्क प्रोग्राम चलाया गया। ग्रामीण भारत के निर्माण की कल्पना की गई थी और सपना देखा गया था। ये लोग इंडिया शाइनिंग देख रहे थे लेकिन अपनी शाइनिंग खराब कर ली। इंडिया शाइनिंग नहीं हुआ। कल्याण सिंह जी, मुझे माफ करना, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जब तक गरीब समाज के अंतिम आदमी के चेहरे पर चमक नहीं होगी तब तक भारत चमक नहीं सकता है। भारत तभी विकसित हो सकता है जब समाज के अंतिम आदमी के चेहरे पर मुस्कान होगी। गरीबों के विकास से ही भारत का विकास हो सकता है क्योंकि हमारा देश गरीब और कृषि प्रधान देश है। कृषकों, कामगारों, खेतिहर मजदूरों, गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए हमें सिंचाई का प्रबन्ध और वाटर शैड का इंतजाम करना होगा। गांवों की उन्नति और विकास के लिए जो भी काम हैं, उन्हें करना होगा। यदि गरीबों को ज्यादा से ज्यादा काम मुहैया होंगे तो गरीबों के जीवन में परिवर्तन होगा और उनमें आर्थिक बदलाव आएगा। आप उनके जीवन स्तर में परिवर्तन करें। इंडिया शाइनिंग केवल लिट्रेचर से नहीं हो सकता है। गरीबों को गरीब और गरीब के बीच में न बांटा जाए।

माननीय रघुवंश प्रसाद सिंह जी ग्रामीण विकास मंत्री हैं। वह शहर में रहने वाले गरीब लोगों के लिए रोजगार गारंटी विधेयक कैसे ला सकते हैं? इसमें तकनीकी दिक्कत है। कल्याण सिंह जी, आप मुख्यमंत्री रह चुके हैं और विद्वान हैं। शहर में रहने वाले गरीबों को रोजगार देने के लिए बिल अलग मनिस्ट्री लाएगी या दोनों मनिस्ट्रीज को मर्ज करना होगा। एक साथ ये बिल नहीं आ सकते हैं। ग्रामीण विकास मंत्री ग्रामीण रोजगार गारंटी बिल ही ला सकते हैं। शहरी विकास मंत्री जो श्री गुलाम नबी आजाद है, वे ही शहरों के गरीबों के लिए रोजगार गारंटी बिल ला सकते हैं। अलग-अलग विभागों के अलग-अलग विधेयक कैबिनेट के थ्रू पास होते हैं और उन्हें कैबिनेट में ले जाना पड़ता है। इसलिए मैं कह रहा हूं कि इसमें तकनीकी दिक्कत है। मैं इस बिल के खिलाफ नहीं हूं। गांवों के गरीब लोग पलायन होकर शहरों में आ गए हैं। मैं आपकी इस राय से सहमत हूं कि शहरी गरीबों के लिए भी ऐसा विधेयक लाया जाए।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं क्रांतिकारी, ऐतिहासिक और गरीबों के व्यापक हित वाले बिल का भरपूर समर्थन करता हूं।

श्री नीतीश कुमार (नालन्दा) : सभापति महोदय, आपने इस चर्चा में हिस्सा लेने के लिए मुझे अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको सबसे पहले धन्यवाद देना चाहता हूं। आज राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी विधेयक पर चर्चा हो रही है। इसके बारे में स्टैडिंग कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट दी। विधेयक को चर्चा के लिए और पारित किए जाने के लिए जो प्रस्ताव रखा, उसके बाद विभागीय मंत्री ने परम्परागत स्टाइल में खूब जोर-जोर से अपने गले का जबर्दस्त इस्तेमाल करते हुए, क्योंकि इनका गला फाड़ भाषण होता ही है जबकि उससे कम जोर से बोलने पर वह ज्यादा प्रभावी हो सकता था। इन्होंने समझा शायद कुछ नई बात हो लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा। कल्याण सिंह जी ने सभापति के नाते कमेटी की तरफ से जो सुझाव थे, वे यहां प्रकट किए। हमने उनकी बात को सुना, उसके बाद यूपीए की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी की भी बात सुनी लेकिन जब हम श्रीमती सोनिया गांधी का भाषण सुन रहे थे, उनका ज्यादा जोर इस बात पर था कि यह विधेयक कांग्रेस पार्टी के दिमाग की उत्पत्ति है और उनकी नीतियों पर अमल करने के लिए यह विधेयक लाया गया है। बाद में उन्होंने यूपीए की चर्चा कर दी कि यूपीए के प्रोग्राम में भी यह है लेकिन उन्होंने यूपीए के एलाइस की कोई चर्चा नहीं की जैसे समाजवादी पार्टी समर्थन कर रही है, माक्र्सवादी पार्टी ने समर्थन किया है। इन लोगों का भी कोई श्रेय है, उनके भाषण से ऐसा कुछ दिखायी नहीं दिय्ाा[R73] ।

 

  दूसरी बात, मुझे लगता है कि गांधी जी के नाम से पूरे संदर्भ में गरीबों के लिए कोई काम हो रहा है, इस संदर्भ में गांधी जी का नाम भी अगर याद किसी ने कराया तो समाजवादी पार्टी के श्री मोहन सिंह और आरजेडी के श्री डी.पी. यादव ने कराया, बाकी आप सबके लिए गांधी जी का मतलब दूसरा है। हम लोग महात्मा गांधी जी की बात कर रहे हैं नये गांधी की बात नहीं कर रहे हैं। हम महात्मा गांधी की बात कर रहे हैं, जो इस देश केराष्ट्रपिता हैं…( व्यवधान)  उनकी भी कोई चर्चा नहीं है, ऐसे ही हम लोगों को याद दिला रहे हैं। इतने वर्षों से लोकसभा में…( व्यवधान)  सभापति महोदय, आप देखिए कि कितनी दिलचस्पी इन लोगों को है…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बैठिए।

…( व्यवधान)

श्री नीतीश कुमार : सभापति जी, कोई हर्ज नहीं है, इतना तो चलता है। इतनी देर तक बैठे हैं, सोनिया जी के जाने के बाद भी बैठे हैं। जबकि कुछ ही लोग बैठे हैं, इसके लिए उनका सम्मान करना चाहिए। आम तौर पर जब सोनिया जी को बोलना था तब कितनी संख्या में लोग बैठे हुए थे…( व्यवधान)  यह इधर की बात नहीं है, हम थोड़े ही क्रेडिट ले रहे हैं, सरकार का क्रेडिट है। आप इधर से देख लीजिए कि कितनी दिलचस्पी विधेयक में है…( व्यवधान)   बिल इधर का नहीं है, मेरे मित्र, बिल आपने रखा है और इधर से समर्थन किया जा रहा है। लेकिन आपने जब बिल रखा…( व्यवधान) 

MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record except what Shri Nitish Kumar says.

(Interruptions) … *

श्री नीतीश कुमार : मैं तो सिर्फ यही आपको दिखलाना चाहता हूं कि कितनी रुचि आपको गरीब को रोजगार देने में है और कितनी दिलचस्पी आपको अपने अध्यक्ष का भाषण सुनने में है। उनका भाषण खत्म हो गया, घंटी बज गई, लोग चल दिए। जैसे स्कूल में क्लास खत्म होती है, घंटी बजती है और लोग घर की तरफ दौड़ते हैं, वही द्ृश्य हमें दिखाई दिया। रघुवंश जी मजबूरी में बैठे हुए हैं, उनका विधेयक है तो वे बैठे हुए हैं। अब इसमें नया क्या है…( व्यवधान)   लालू जी का संसद में मन लगता है इसलिए संसद में बैठे रहते हैं, इसलिए वे बैठे हुए हैं। अगर वह बैठते हैं तो इधर से बोलने वालों को भी बोरियत नहीं होती। इसलिए ठीक है कि वे बैठे हैं।…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद :लालू यादव की नकल भी आप करना चाहते हैं।…( व्यवधान) 

श्री नीतीश कुमार : सभापति महोदय, अब इसमें नया क्या है? रोजगार देने के लिए कई प्रकार की योजनाएं पहले से चल रही हैं जिनका उल्लेख इन लोगों ने खुद किया है, अब सबको मिलाकर एक बना रहे हैं। अब अलग से उसके लिए विधेयक आ गया है। अच्छी बात है कि विधेयक आप बना रहे हैं, कोई भी रोजगार की योजना होगी तो उसका स्वागत किया जाएगा। लेकिन जब इतने धूमधड़ाके के साथ आप कर रहे हैं तो आधे-अधूरे मन से क्यों कर रहे हैं? १५० जिलों में “फूड फार वर्क” लागू किया, उन जिलों में इसको लागू किया, वामपंथियों का दबाव विकसित हुआ, जिन्हें आप श्रेय नहीं दे रहे हैं। उसके बाद २०० जिलों तक पहुंचा दिया। यह हम नहीं कह रहे, हम जान गए हैं कि २०० तक आ गया है, मंत्री जी ने अपने वकतव्य में कह दिया है कि हम इसे २०० जिलों तक ले जाएंगे और खुद कहा कि ६०० जिले हैं। अब २०० जिलों में कौन होंगे? हम ज्यादा तो जानते नहीं हैं लेकिन हम बिहार से आते हैं। बिहार की स्थिति का वर्णन श्री देवेन्द्र जी ने किया है, मैं उसे दोहराना नहीं चाहता हूं। आप यहां बैठते थे तो बोलते रहते थे, आजकल आप भूल गए हैं। बिहार में रोजगार की उपलब्धता नहीं है, लोगों के पास काम नहीं है इसलिए वहां से रेलगाड़ी भरकर बिहार के लोग बाहर जाते हैं, काम की तलाश में जाते हैं, दर-दर की ठोकरें खाते हैं, वहां स्थिति तो यही है, चाहे बिहार के किसी हिस्से में चले जाइए। आज वहां गरीब नौजवान की शादी होती है

* Not Recorded
तो वह अगली दिन कोई न कोई ट्रेन पकड़कर पंजाब, हरियाणा या कहीं और नौकरी की तलाश में जाता है। अगर इस प्रकार से योजना सीमित क्षेत्रों में लागू होगी, इस संबंध में उन्होंने अपने ढंग से तर्क दिया है कि बाढ़ प्रभावित है, सूखा प्रभावित है, उग्रवाद प्रभावित है, किसी न किसी प्रकार से प्रभावित है, मूल बात यही है कि वहां रोजगार नहीं है और रोजगार न होने के कारण गरीबीहै। पहली बार माननीय प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं क “गरीबी हटाओ” का नारा बगैर रोजगार के पूरा हो ही नहीं स्ाकता[p74] ।

[RB75] 

यह अनुसंधान करने में कितना समय लगा? सन् १९७० के दशक से गरीबी हटाओ का नारा दिया जा रहा है लेकिन सरकार को अनुसंधान करने में३५ साल लग गये कि तब तक गरीबी नहीं हटेगी, जब तक बेरोज़गारी नहीं हटेगी। कांग्रेस गरीबी हटाओ का नारा देकर चुनाव जीतती रही और आज सरकार कह रही है कि बेरोज़गारी हटाओ। सरकार ने ३५ साल मे एडमिट किया कि गरीबी हटाने का नारा खोखला था। आज पहली बार इस प्रकार की पहल हुई है। सरकार ने १५० जिलो में इस योजना को लागू करने की बात कही है लेकिन मेरी सरकार से मांग है कि अगर इसे करना है तो पूरे मन से करिये। पैसे की बात आ गई लेकिन रिफाम्र्स का हयुमन फेस होगा और भाषण से लग गया कि रिफाम्र्स जारी रहेंगे। सिर्फ लीपा-पोती करने के लिये कहा गया और इस इरादे से सरकार यह विधेयक लाई है। अगर यह इरादा नहीं है तो गरीबी, चाहे जिस किसी भी इलाके में हो, आपने २०० जिले बताये हैं, जहां बेरोजगारी है लेकिन देश के बाकी ४०० जिलों के लिये बेरोजगारी, आपके लिये चिन्ता का विषय नहीं है?इस योजना को सरकार ५ साल में करेगी क्योंकि काम बहुत लम्बा है। श्री कल्याण सिंह जी ने तो इस योजना के लिये ४ साल की मांग की है लेकिन मैं इसका समर्थन नहीं कर रहा हूं। मैं तो यही कहूंगा कि इसे तत्काल लागू कीजिये। सरकार कहती है कि पैसे की दिक्कत नहीं है, मंत्री महोदय का गला-फाड़ भाषण सुना। अगर पैसे की दिक्कत नहीं है तो इसे पूरे देश में लागू करिये। फिर, पैसे की दिक्कत क्यों होगी? सरकार किसलिये है? सरकार का नारा था – ‘ कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ।’  आप पैसे निकालिये, कहीं से भी लाइये, पैसे तो अटा पड़ा है। आपके बैंक हैं, हर जगह पैसा ही पैसा पड़ा है। गरीबों को रोजगार देने के लिये आपके पास पैसा नहीं है और इसे ४ साल में करेंगे या ऐसा प्रचार करते रहेंगे या देश के हर कोने में गरीब लोगों को रोज़गार पाने के लिये ४ साल इंतजार करना पड़ेगा। सभापति महोदय, इसलिये, मैं तो यही कहूंगा क कि आधे-धूरे मन से लाया गया यह विधेयक है। पूरे देश के हर इच्छुक व्यक्ति को रोज़गार मिलना चाहिये।

        सभापति महोदय, बेरोज़गारी परिवार की नहीं, व्यक्ति की होती है। पता नहीं सरकार परिवार को यूनिट मानेगी। श्री कल्याण सिंह जी ने जो बताया, उसे मुझे बताने की जरूरत नहीं है मैं जितना बताऊंगा, उससे ज्यादा मंत्री महोदय समझते होंगे। ऐसा तो नहीं कि मंत्री जी गांव में नहीं रह रहे हैं या परिवार में बेरोजगारी नहीं देख रहे हों। यह बात सब को मालूम है कि परिवार पर कितना बोझ है? यदि एक परिवार को मिल जायेगा तो क्या बाकी परिवार के लोग संतुष्ट हो जायेंगे या एक भाई को मिलेगा, दूसरा भाई संतुष्ट हो जायेगा? प्रतदिन १७ रुपये मिलेगें। यदि एक परिवार में ५ व्यक्ति हैं तो १७ रुपये बंटकर एक के हिस्से में क्या आयेगा? अगर सरकार १०० दिन रोज़गार देगी तो एक महीने में ५०० रुपये होंगे, एक साल में ६००० रुपये होंगे य़ा प्रति व्यक्ति १०० रुपये प्रति माह और एक दिन के लिये ३ रुपये होंगे। उस व्यक्ति को ३ रुपये में खाना कहां से मिलेगा? आप जिसको टारगेट कर रहे हैं, इसलिये परिवार का कोई मतलब नहीं है? यदि है, तो हर इच्छुक व्यक्त को, जो भी ऑफर करता है …( व्यवधान) 

SHRI K.S. RAO (ELURU): They will not be idle… (Interruptions)

श्री नीतीश कुमार : लेकिन सरकार १०० दिन का रोज़गार दे रही है। कहीं एग्रीकल्चर सैक्टर में लोगों को काम नहीं मिलता। अगर एग्रीकल्चर सैक्टर में मिलता होता तो माननीय मंत्री जी जानते हैं कि न जाने कितने लोग इसमें खप जाते। हम देख रहे हैं कि हमारे बिहार में काम नहीं है, इसलिये लोग बाहर जा रहे हैं। कोई आदमी बाहर जाना नहीं चाहता था लेकिन जब घर में काम नहीं मिलेगा तो वह बाहर जायेगा। इसका मतलब यह है कि लोगों को गांव में एग्रीकल्चर का काम नही मिल रहा है। क्या वह १०० दिन बेरोज़गार है या २६५ दिन तक उसे खेती का काम मिल रहा है? मुझे ऐसा नहीं लगता। सरकार चाहे कितने फर्जी आंकड़े बना ले लेकिन देश के किसी हिस्से में किसी गरीब मजदूर को २६५ दिन काम नहीं मिल रहा है, खासकर गांवों में रोज़गार नहीं मिल रहा है। देश का ऐसा कम से कम औसत चित्र नहीं हो सकता है। इसलिये १०० दिन अपने आप में अपर्याप्त है। एक परिवार का कांसैप्ट नाकाफी है और फिर कुछ जिलों तक इस योजना को सीमित रखना, यह इस विधेयक का उद्देश्य पूरा नहीं करेगा। इसलिये मैं चाहूंगा कि इस योजना को एक बार में ही और पूरे देश में लागू कीजिये। जितने दिन उन्हें रोज़गार चाहिये, उन्हें दिया जाये। केवल १०० दिन ही क्यों? देश के कुछ इलाके विकसित हैं, वहां १०० दिन देने की जरूरत पड़ेगी, कहीं २५० दिन रोज़गार देने की जरूरत पड़ेगी[RB76] ।

[R77] 

कहीं एक फसला इलाका है तो वहां ज्यादा दिन की जरूरत पड़ेगी। जहां दो फसल हो रही हैं, वहां उससे कम दिनों की जरूरत पड़ेगी और जहां इससे भी ज्यादा इन्टैन्सिव फार्मिंग हो रही है, वहां उससे कम जरूरत पड़ेगी। लेकिन सौ दिन से काम नहीं चलेगा, इससे ज्यादा दिन उन्हें रोजगार मिलना चाहिए।

दूसरी बात मैं कहना चाहता हूं कि हम इसके शेडयूल को देख रहे थे, उसमें हमें थोड़ा अंदेशा है, जो मैं आपके सामने रखना चाहता हूं। इसके शेडयूल-२ में उल्लेख है कि आप सबका एक रजिस्टर बना देंगे, उन्हें कार्ड दे देंगे, ये सब बातें उसमें दी गई हैं। लेकिन उसके बाद उसमें एप्लीकेशन देने की बात आती है। रघुवंश बाबू, गांवों में कितने गरीब हैं, जिन्हें एप्लीकेशन लिखनी आती है। यहीं से उनका शोषण शुरू होगा। उसका एप्लीकेशन फार्म भरवाने के लिए गांव का चालाक और होशियार आदमी वहीं से पैसा लेना शुरू करेगा। हम कहते हैं कि इतनी फॉर्मेलिटी की क्या जरूरत है। आप लिस्ट बना रहे हैं। आपके पास एक-एक हाउसहोल्ड की पिक्चर है। आप ग्राम सभा की बात करते हैं। ग्राम पंचायत के पास उनकी तस्वीर है। आप ढिंढोरा पिटवा दीजिए, जो भी विलिंग हैं, जिसे काम की जरूरत है, वह आ जाए। इतनी लम्बी-चौड़ी क्लैरिकल फॉर्मेलिटी जो आप इसमें लगवा रहे हैं, यह गरीबों के हक में नहीं है। आप इसमें जितना लिखा-पढ़ी का काम डालेंगे, उतनी ही गरीबों को मुश्किल होगी। इसमें बिचौलियें और दलाल आयेंगे, जो उसकी दरखास्त लिखेगा, वहीं दरखास्त जमा करेगा। वही मुखिया के यहां जायेगा। कहीं ये लोग सरपंच कहलाते हैं, कहीं प्रधान कहलाते हैं। हमारे यहां मुखिया कहलाते हैं। वह उसके यहां जायेगा या जो प्रोग्राम ऑफिसर है, उसके पास जायेग। यानी कि हर लैवल पर उसका शोषण होगा और इसमें जो ६० रुपये का उल्लेख किया गया है, उसका एक हिस्सा दलाल की भेंट चढ़ जायेगा। यह व्यावहारिक बात है। आप इसे देखिये। जब आप गांव सभा तक जा रहे हैं, डीसैन्ट्रलाइजेशन की बात कर रहे हैं, यह अच्छी बात है। पंचायतों में भी कई तरीके की त्रुटियां रहेंगी, उनमें धीरे-धीरे सुधार होगा। लेकिन इसमें ज्यादा से ज्यादा जगहों से अगर इसे खत्म किया जाए तो वह बेहतर होगा। आप लिखा-पढ़ी के काम का रजिस्टर मेनटेन करिये। उनकी अकाउन्टेबलिटी होनी चाहिए, एक जांच तंत्र होना चाहिए, निगरानी तंत्र होना चाहिए। यह सब आपको बताने की आवश्यकता नहीं है, आप स्वयं भी समझेंगे और दूसरे माननीय सदस्य भी आपसे कहेंगे।

इसके अलावा मुझे आपको एक सुझाव यह देना है कि आपको अनइम्पलायमैन्ट अलाउंस देना है, जहां आप काम नहीं करा पाये, वहां आप अनइम्पलायमैन्ट अलाउंस देंगे और कहीं-कहीं राज्यों को उसका एक हिस्सा देना पड़ेगा, माननीय कल्याण सिंह जी ने उसका समर्थन किया है तथा उसके आधार पर जो राज्य इसे लागू न करे, उसे पैनलाइज किया जाना चाहिए। यह कोई जरूरी नहीं है कि कोई राज्य बदनीयती से यह स्कीम लागू नहीं कर पा रहा है। इसलिए जब आप यह स्कीम बना रहे हैं तो होलिस्टिक स्कीम बनाइये। आपको बेरोजगारी भत्ता भी देना है, जब यह केन्द्र की योजना है तो उन्हीं से दिलवाइये। राज्यों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होगी कि उन पर आप निर्भर कर सकें। फिर आप यह लगा रहे हैं, जिसमें पक्का काम होगा, मैन और मैटीरियल रेश्यो है, उसमें ४० परसेन्ट मैटीरियल का रेश्यो होगा। वहां पर आप राज्य सरकारों को कह रहे हैं कि २५ परसेन्ट आप दीजिए।…( व्यवधान) 

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : वह दस परसेन्ट है।

श्री नीतीश कुमार : दस परसेन्ट जनरल है। लेकिन यह २५ परसेन्ट है, जिसमें पक्का वाला काम है, जिसमें मैटीरियल कम्पोनैन्ट ४० परसेन्ट है और लेबर कम्पोनैन्ट ६० परसेन्ट है। उसमें राज्य सरकारों को २५ परसेन्ट देना पड़ेगा। वह राज्य सरकारें कहां से लायेंगी। आप यह स्कीम बना रहे हैं, ठीक है, लेकिन इसमें कोई भी दायिता राज्यों की नहीं होनी चाहिए। राज्यों को इसे इम्पलीमैन्ट करना चाहिए और आप उसकी मॉनिटरिंग करें, तब माना जायेगा कि कुछ हद तक आपने इसे विमर्श करके लागू किया है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं। धन्यवाद।

श्री सुबोध मोहिते (रामटेक) : माननीय सभापति जी, राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन गारंटी विधेयक, २००४ माननीय मंत्री जी ने संसद में पेश किया है, मैं उनका स्वागत करता हूं। यह बहुत अच्छा बिल है। लेकिन जो अलग-अलग पार्टियों के लोग यहां बोल रहे हैं, उनकी भावना एक ही है। उनके भाषण से यह स्पष्ट हो रहा है कि रोजगार आज गरीब की कमजोरी है[R78] ।

[h79] 

एक आशा के भरोसे गरीब आदमी इस देश में जी रहा है। उसकी कमजोरी को कैपिटलाइज़ करके राजनैतिक फायदा उठाने की बात भी यहां पर हो रही है। माननीय मंत्री जी ने जो भाषण दिया, जिस आवेश में भाषण दिया और उसके बाद कल्याण सिंह जी ने जो बिल की सच्चाइयां सामने रखीं, उन पर मैं ज्यादा नहीं कहना चाहता। जिस तरीके से सोनिया गांधी जी ने संसद चालू होने के बाद पहली बार इस विधेयक पर बात की, वह क्यों की, इसको भी अलग से बताने की जरूरत नहीं है। उसकी गहराई और विश्लेषण में मैं नहीं जाना चाहता। एक नया नारा भी संसद में आया है – ‘ रोज़गार बढ़ाओ गरीबी हटाओ,’  उसकी गहराई में भी मैं नहीं जाना चाहता क्योंकि इस देश की जनता बहुत सैंसटविटी से पब्लिक रिप्रजैंटेटिव्ज की तरफ देखती है। कांग्रेस ने पहले भी ‘गरीबी हटाओ’  का नारा दिया था। गरीबी तो नहीं हटी मगर गरीब हट गए। एक दूसरा नारा ‘जय जवान जय किसान’  का भी दिया था। उससे भी न किसान का भला हुआ और न जवानों का भला हुआ। For the sake of criticism, I will not criticize.  कल्याण सिंह जी ने अच्छी बातें कहीं। उन्होंने बताया कि पांच योजनाएं भारत सरकार ने ली थीं और पांचों फेल हो गईं। पांचों योजनाएं फेल हो गईं तो यह योजना फेल नहीं होगी, इसकी क्या गारंटी है? मुझे संदेह है कि जिस उद्देश्य से यह योजना लाई जा रही है, वह फेल हो जाएगा। जब मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि यह योजना फेल हो जाएगी तो मेरा उत्तरदायित्व है कि मैं उसको जस्टिफाइ कर सकूं, नहीं तो मेरे बोलने का कोई अर्थ नहीं है।

सभापति महोदय, मैं कोई ऐसी बात नहीं बोलूंगा जो पहले कही जा चुकी है। इस बिल में एक परिवार को एक यूनिट माना गया, उस पर मुझे कुछ नहीं बोलना है। परिवार में से कौन चुना गया, उस पर भी मुझे कुछ नहीं बोलना है। इसका परिणाम क्या होगा, उस पर भी मुझे कुछ नहीं बोलना है। ३६५ दिनों में से १०० दिन काम मिलेगा और २६५ दिन खाली रहेंगे, इस पर भी मुझे कुछ नहीं बोलना है। बिल के जो प्रोविजन्स हैं और उनमें जो कमियां हैं, मैं बहुत कम समय में उनको आपके सामने रखना चाहता हूं।

सभापति जी, यह बिल मैंने शब्दश: पढ़ा है। इसके पेज नं. ३ की तरफ मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। बात दिखने में छोटी सी लगती है, लेकिन छोटी नहीं है।

Please see page 3, Chapter II.  Clause 3 (2) says:

“Every person who has done the work given to him …. ”

 

सभापति जी, बिल तो बिल ही होता है और पास होने के बाद एक्ट बन जाता है। एक बिल को लाने में पूरी भारत सरकार काम करती है, मंत्रालय काम करता है। मैं मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि जब बिल में he or she ही नहीं लिखा है और him or her  भी नहीं लिखा है, सिर्फ him  लिखा है तो महिलाओं को आप काम कैसे देंगे?

             इसके बाद एक और बड़ी हैरानी की बात है। जिन भी आईएएस अधिकारियों ने यह बिल ड्राफ्ट किया है, वे शायद जानते ही नहीं कि रूरल एरियाज़ में गरीब बसते हैं। Please see page 3.  Clause 4(2) says that a summary of the Scheme should be published in the local newspapers. नीतीश कुमार जी ने जो बात उठाई, वही मैं बता रहा हूं कि यह स्कीम सरकार गरीब, बीपीएल तथा ट्राइबल लोगों के लिए ला रही है। मुझे बताइए कि हिन्दुस्तान में कितने प्रतिशत गांव ऐसे हैं जहां न्यूज़पेपर जाता है और जहां गरीब, बीपीएल और ट्राइबल्स को न्यूज़पेपर पढ़कर पता चलेगा कि यह स्कीम आई है और वे जाकर उसका फायदा उठाएंगे। इसमें ऐसा कोई भी प्रोविज़न नहीं है कि गांव में जाकर ढिंढोरा पीटा जाए या ग्राम पंचायत में जाकर योजना की लिस्ट लगाई जाए। इस विषय पर मंत्री जी को जरूर सोचना पड़ेगा।

तीसरी कमी जो मैंने बिल में पाई है, वह पेज नं. १३ के पैरा १४ पर है। मैं पहले ही बता चुका हूं कि जो कहूंगा उसको जस्टिफाइ करूंगा। यह भी बड़ी अजीब बात है क्योंकि सच्चाई शायद कोई जानता नहीं है[h80] ।

[i81] 

            Please see page 13. Schedule I-14 says that wages paid should be commensurate with the quality and quantity of work done. मैं माननीय मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि अगर एक गरीब आदमी किसी गांव में एक नाली बनाता है और उसका क्वालिटी चैकअप किया गया और उस नाली का क्वालिटी स्टैंडर्ड नहीं निकला, तो क्या उस गरीब मजदूर को मजदूरी नहीं मिलेगी? इस बिल में इस बारे में कोई प्रोविजन नहीं है कि अगर वह क्वालिटी और क्वांटिटी नहीं दे सकेगा तो उसके लिए पिनल एक्शन का कोई प्रावधान इसमें नहीं है और न ही कोई कानून है कि उसे पेमेंट कैसे देंगे, इस बारे में कोई प्रोविजन नहीं है।

पेज १६ और पैरा २८ में एक वक्तव्य है कि जो छोटे बच्चे हैं उनके लिए फीमेल-आया के रूप में महिलाओं को भेजेंगे। जब एक्ट बनता है तो हर शब्द की अपनी वैल्यू होती है। इसमें कोई प्रोविजन नहीं है कि कितने बच्चों के लिए कितनी फीमेल आया रखी जाएंगी, यहां भी आपको संशोधन करना पड़ेगा। पेज ४ सैक्शन-७ में बहुत महत्वपूर्ण बात अलाउंस के बारे में है। मेरा कहना यह है कि हम लोग इम्प्लायमेंट गारंटी स्कीम के तहत इसे ला रहे हैं तो अनइम्प्लायमेंट का सवाल कहां से आता है। जब मैं किसी आदमी को आश्वस्त कर रहा हूं कि आपको सौ दिन काम करने के लिए मिलेगा, तो अनइम्प्लायमेंट अलाउंस का सवाल कहां से आता है।

एक बात और मैं कहना चाहता हूं कि आज मुझे काम चाहिए। मैंने काम के लिए आवेदन किया। आपने मुझे अनइम्प्लायमेंट अलाउंस देना शुरू कर दिया लेकिन उसकी टाइम लमिट नहीं है कि मुझे कितना समय इंतजार करना होगा या कितने महीने के बाद या कितने सालों के बाद मुझे फुल रेट पर काम मिलेगा, इसलिए बिल में वेटिंग पीरियड को दिखाना पड़ेगा। इसके बिना उसे फुल वेजिज नहीं मिलेगा। अगर मुझे सौ दिन पर सरकार काम दने वाली नहीं है, अगर मुझे अनइम्प्लायमेंट अलाउंस ५० दिन का दिया गया है तो क्या मेरा क्लेम सिर्फ ५० दिन के लिए रहेगा या ५० दिन अनइम्प्लायमेंट अलाउंस मिला है उसके अलावा सौ दिन के लिए अलाउंस दिया जाएगा, यह भी इस बिल में स्पष्ट नहीं है।

इतनी सारी कमियां इस बिल में दिखाई दे रही हैं। जो स्कीम्स फेल होती आई हैं उनके पीछे यही कारण रहे हैं। मैं माननीय मंत्री जी से सात बातों का जिक्र करना चाहता हूं। पहली बात यह है कि आपने एक दिन की न्यूनतम मजदूरी ६० रुपए तय कर दी है। केरल में खेत में काम करने वाला मजदूर १४५ रुपए से नीचे नहीं मिलता है। अगर एक आदमी ६० रुपए में आपके यहां आ गया तो जो १४५ रुपए में काम कर रहा है, उन के बीच में जो मुश्किल पैदा होगी, लटिगेशन क्रियेट होगी, उसका क्या समाधान आपके पास है?

मेरा दूसरा सवाल यह है कि यहां किसी की अकाउंटेबिलीटी नहीं है। न प्रशासन अकाउंटेबल है न पंचायत अकाउंटेबल है। कोई पैनल एक्शन इसमें परपोज नहीं है कि किस पर पैनल एक्शन लिया जाएगा। कोई प्रोविजन नहीं है।

तीसरी बात यह है कि जो काम आप कर रहे हैं वह नीड बेस है या नहीं, प्रोडक्टिव है या नहीं या किसी को रोजगार देना है तो कहीं से भी मिट्टी उठा कर कहीं भी फेंक दो[i82] ।

17.00 hrs. [rpm83] 

 वर्क नीड बेस नहीं है, प्रोडक्टिविटी नहीं है। ऐसे कोई भी नॉम्र्स इस बिल में नहीं रखे गए हैं। इसलिए जो भी इस प्रकार के प्रावधान इसमें हैं, उन्हें तुरन्त हटा देना चाहिए।

सभापति जी, मंत्री जी ने इस बिल में कहा है कि इसे लागू करते समय यह देखा जाएगा कि स्टेट की फायनेंश्यल कंडीशन कैसी है और उसके बाद हम इस बिल को वहां लागू करने के बारे में सोचेंगे। जब इतना पॉलटिकल माइलेज लेने के लिए आप यहां बैठे हैं और ढिंढोरा पीट रहे हैं कि इस योजना में जितनी भी धनराशि खर्च की जाएगी वह १०० प्रतिशत केन्द्र सरकार की ओर से दी जाएगी, तो फिर स्टेट की इकनौमिक कंडीशन देखने की शर्त इसमें क्यों रखी गई है ? यदि किसी स्टेट की इकनौमिक कंडीशन ठीक नहीं है, तो क्या उसे एलाउंस नहीं देंगे, क्या इस स्कीम को उस स्टेट में लागू नहीं करेंगे ? It is the responsibility of the Central Government. इसलिए इस बिल में स्टेट की इकनौमिक कंडीशन के बारे में आपने जो बोला है, वह ठीक नहीं है। इसे तुरन्त हटा देना चाहिए।

सभापति जी, मेरी छठवीं बात यह है, जिसे कल्याण सिंह जी ने भी कहा-इस योजना को पूरे देश में चार साल में लागू करेंगे, ऐसा नहीं होना चाहिए। मेरा सुझाव है कि देश के हर राज्य में एक यूनीफॉर्म मैसेज जाना चाहिए कि यह स्कीम एक डेट और एक डे, पूरे देश में इम्पलीमेंट और लांच होगी। किसी को भी यह बोलने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए कि हमारे यहां यह स्कीम लागू क्यों नहीं की गई है। सेम डे एंड सेम डेट को पूरे कंट्री में यह स्कीम लांच होनी चाहिए, ताकि गलत संदेश न जाए।

महोदय, अभी तक जो भी स्कीमें लागू हुई हैं, वे सब फेल हो चुकी हैं। महाराष्ट्र में हम बेरोजगार गारंटी योजना को काफी पहले से लागू कर रहे हैं। यदि आप इसका क्रटिकल एनैलेसिस नहीं करेंगे, तो इसका नुकसान होगा और गरीबों को फायदा नहीं होगा। इसलिए मुझे आशा है कि आप मेरी बातों पर ध्यान देंगे। मैं इतनी बात कहते हुए सभापति जी आपको धन्यवाद देकर अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री इलियास आज़मी (शाहाबाद) : सभापति जी, मैं बहुजन समाज पार्टी की तरफ से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी विधेयक, २००४ का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। यह एक ऐसा खूबसूरत ख्वाब है जिसे देश में, बहुत जमाने से बहुत से नेता देखते रहे हैं, लेकिन इस ख्वाब की कोई ताबीर अभी तक नहीं हुई है। बहुत सारी योजनाएं भारत सरकार चला रही है और उन्हें चलाने में जब सरकार को दिलचस्पी नहीं है, तो वे योजनाएं कामयाब कैसे होंगी, यही हाल इसका भी होने वाला है। अभी थोड़ी देर बाद, हाउस में, इस बिल को पास कराने के लिए केवल ग्रामीण विकास मंत्री ही अकेले रह जाएंगे। जब इस बिल के पास करने के समय दिलचस्पी का हाल यह है, तो मुझे शक है कि इस बिल के पास होने के बाद इसे लागू करने का हाल भी यही होगा। इस बिल का हरुा भी वही होगा, जो दिन में सपना देखने वालों का होता है।

सभापति जी, इस बिल को लागू करने के बाद अगर पी. चिदम्बरम साहब को दिखेगा कि उनकी बैलेंसशीट गड़बड़ा रही है, तो गरीबों पर बोझ लदेगा और कुछ मुट्ठीभर करप्ट और भ्रष्ट अधिकारियों को लाभ होगा, जैसा कि अभी तक चल रही योजनाओं का होता रहा है। यहां रूलिंग पार्टी के अनेक सांसद बैठे हैं। मैं असली रूलिंग पार्टी की बात कर रहा हूं, यू.पी.ए. की बात नहीं कर रहा हूं। यू.पी.ए. के अनेक सदस्य यहां बैठे हैं, लेकिन असली रूलिंग पार्टी कांग्रेस है, जिसके मुश्किल से एक-दो मैम्बर नजर आ रहे हैं, बाकी कांग्रेस का कोई मैम्बर नजर नहीं आ रहा है। यदि अभी से कांग्रेस के मैम्बर्स की इस बिल के प्रति दिलचस्पी का यह आलम है, तो इस योजना का, जब यह देश के २०० जिलों में लागू होगी, तो हरुा क्या होगा, यह आप खुद जान सकते हैं।

सभापति जी, मुझे ऐसा लगता है कि भारत सरकार में बैठे किसी बड़े अधिकारी के कंप्यूटर में १००-१५० जिले ऐसे भरे हुए हैं, जिन्हें पिछड़ा मान लिया जाता है और बाकी जिलों को अगड़ा मान लिया जाता है। देख लीजिए इस स्कीम में भी वही जिले आएंगे, जो फूड फॉर वर्क प्रोग्राम के अंदर हैं या जो इसी प्रकार की अन्य केन्द्रीय योजनाओं के अंदर हैं। इससे एक फायदा होगा कि राज्य सरकारों के उन २०० जिलों के डी.एम., सी.डी.ओ. और पी.डी. की पोस्टों की अहमियत ज्यादा बढ़ जाएगी[rpm84] ।

[i85] 

पहले से उन जिलों में बढ़ी हुई है, वहां फूड ऑफ वर्क योजना लागू है, सम विकास योजना लागू है, एक और योजना हो जायेगी तो इन पोस्टों की वैल्यू बहुत ज्यादा बढ़ जायेगी और इस पोस्ट को हासिल करने वालों की सलाहियत रखने वालों में राज्य सरकारों में एक होड़ लगेगी कि यह पोस्ट हमको इस जिले में मिल जाये, जहां यह योजना लागू है।

        उसके अलावा कितना फायदा होगा, इसके बारे में मुझे शक है, इसलिए कि वही एक लुटेरों की टीम है, जिसे सारी योजनाओं का पैसा दिया जाता है। इतना पैसा ग्रामीण विकास में जा रहा है कि उसका अगर २० परसेंट भी ईमानदारी के साथ खर्च हुआ होता तो अब तक ग्राम विकास का सपना जमीन पर नजर आने लगा होता। उसका हिसाब-किताब मेरे जैसा आदमी नहीं जोड़ सकता कि कितना पैसा ग्राम विकास पर खर्च हो रहा है, लेकिन विकास भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों का हो रहा है। मैं जब से लोक सभा में आया हूं, तब से मैं यह कोशिश कर रहा हूं कि एक बार भ्रष्टाचार के ऊपर भी यहां पर १-२ दिन की बहस हो जाये, लेकिन पता नहीं, क्या बात है कि ऐसा नहीं हो पाया। मालूम होता है कि भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है, उस पर बहस के लिए लोक सभा के पास टाइम नहीं है।

अब ये कह रहे हैं कि राज्य सरकारों के जरिये यह योजना लागू होगी। आप बताइये, राज्य सरकारों के जरिये कौन सी योजना ऐसी है, जो आप खुद लागू कर रहे हैं, सारी योजनाएं, चाहे ग्राम विकास की हों, चाहे नगर विकास की हों, चाहे और कोई हों, सभी तो राज्य सरकारों के जरिये ही लागू हो रही हैं तो कौन सी इसमें आपने नई बात कह दी है। हां, बस वही पुराना ढर्रा कि राज्य सरकारों को पैसा दे दिया, पैसा भ्रष्टाचारी अधिकारियों और कर्मचारियों में बंट गया और जिस विभाग की योजना है, उस विभाग के मंत्री जी ने लोक सभा में खड़े होकर अपने हाथ से अपनी पीठ ठोक ली कि हां, हमने इतने हजार करोड़ रुपया जनता की भलाई के लिए खर्च कर दिया। वह खर्च जनता की भलाई के लिए हुआ है या कुछ नौकरों की भलाई के लिए हुआ है, इस बात के लिए जब तक २-३ दिन की बहस पार्लियामेंट में नहीं होगी, तब तक यह बात खुलकर सामने नहीं आयेगी। मैं कहता हूं, अगर भारत सरकार के पास अपनी कोई मशीनरी नहीं है, किसी योजना को लागू करने के लिए तो ऐसी योजना केन्द्र बनाता है, जिसके लिए गरीबों का खून चूसकर पैसा जमा करके दिया जाता है और गरीबों के खून की नहर, बल्कि खून का दरिया, जो भारत सरकार चूसती है और विकास के नाम पर भ्रष्टाचारियों के पास जा रहा है, इसको रोकने का जब तक आप उपाय नहीं करेंगे, आप इस तरह की एक हजार योजनाएं लागू कर दें, जनता का, गरीबों का कभी कोई भला नहीं हुआ है, यह मैं अपनी नौजवानी के दिनों से सुन रहा हूं। उस जमाने से मैं सुन रहा हूं कि गरीबी हटाओ से लेकर आज तक पता नहीं, कितनी योजनाएं बनीं, लेकिन जो गरीबी थी, वह अपनी जगह मुंह बाये खड़ी है। ग्रामीण विकास मंत्री जी कम से कम मौजूद हैं, मैं उनसे कहूंगा कि जब तक आपकी अपनी कोई मशीनरी न हो, जिलों में अगर पूरी मशीन न सही, जिलों में उसकी निगरानी करने वाली मशीनरी, जिसकी गरदन पकड़ सकने की ताकत आपके पास हो तो आप योजनाएं लागू कीजिए, वरना गरीबों से पैसा चूसकर भ्रष्टाचारियों की जेब में डालने से कोई फायदा नहीं होगा।…( व्यवधान) भ्रष्टाचार के बारे में मैंने १० बार नोटिस दिया है, कोई ऐसा नियम नहीं है, जिसमें मैंने नोटिस नहीं दिया हो कि उस पर एक बहस हो जाये, लेकिन मेरी बदकिस्मती है, बल्कि मेरी नहीं, देशी की बदकिस्मती है कि लोक सभा के पास भ्रष्टाचार पर बहस करने के लिए समय नहीं मिलता। मैं इसमें क्या कर सकता हूं कि मेरी ताकत इतनी ही है कि मैं लिखकर मांगू कि भ्रष्टाचार पर बहस करा दीजिए, लेकिन अगर चेयर की तरफ से मंजूरी नहीं मिलती तो मैं क्या कर सकता हूं।…( व्यवधान)

मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं। मैं चेयर पर काेई आरोप नहीं लगा रहा हूं। [i86] 

 

SHRI TATHAGATA SATPATHY (DHENKANAL): Mr. Chairman, Sir thank you very much for giving me this opportunity to speak today.

            I, on behalf of my Party, BJD and our beloved leader, Shri Naveen Patnaikji, in principle, support this Bill.  However, it is very sad that this Bill, as has been pointed out by a few Members who have spoken earlier, has many flaws that need to be amended immediately before it can be implemented.

We all know that the Government of India had many such employment schemes like RLEGP, NREP, SGRY, JRY and even indirect schemes like `million wells scheme’ where Rs. 12,500/- were given to a farmer to dig a well in his own land and irrigate it and create work for himself.    But, unfortunately, today, though very belated, the Government discovered that all these programmes have failed and, therefore, they have brought out the National Rural Employment Guarantee Bill, probably putting all the monies together to make this law.   That is all.   That means, in a simpler term, that it is the old wine in a new bottle.   There is nothing new.  All those schemes were spread throughout the country, in all districts for a long period of time, and there were no limitations on those schemes.

Today by making this law, you have limited it, first of all, to 150 districts, then under pressure from some of your allies, you have extended it to 200 districts.   Then, again, you have brought in a limitation of maximum 100 days of assured employment per family and that too at a paltry sum of Rs. 60/- per day.   In a State like Orissa — as all of us are aware in other States, it is much more — a female construction worker fetches nothing less than Rs. 80/- to Rs. 100 per day, depending on where she is working.   So, the amount of Rs. 60/-, as it is, is a joke.   Let us accept that this guarantee of work for 100 days out of 365 days – we do not know how those people will survive for the rest 265 days – is a good beginning and we should not criticise something right at the beginning, just to be inimical or to be negative.   

But the hon. Minister, Dr. Raghuvansh Singh, who has a socialist background, in his introduction, has not shed any light on what actually drives this Bill.  Is this Bill driven with a motive to create employment, give labour to people or is it money driven?   With proponents of globalisation in economy as Dr. Manmohan Singh, Shri P. Chidambaram and such other people, I do not believe that this is a Bill that is driven by the desire to create employment for rural people.   It is a Bill which, in my mind, convinces me that it is a Bill which is driven by considerations of money.  You are trying to pump in huge sums of money to the rural areas.   What is the purpose?     It is not to lift the poor people of this country but to give them the power to purchase.   In other words, you are trying to create a situation where your rural areas become a market for MNCs to sell their product.   You want the likes of Coke and Pepsi to go deeper into the rural areas of India to sell their produc[R87] ts[R88] .

 

It is not with the consideration to give more employment. You have put in clauses where you expect the State Governments to invest something from 10 per cent to 25 per cent of the funds. Have you, at any point of time during the preparation of this Bill or after the preparation of the Bill, consulted any of the State Governments? Have you put it up in the National Development Council or the Chief Ministers’ meetings? As far as I know, the hon. Minister did not mention it in his speech. As far as all of us know, this has not been discussed with the States at any level.

            The hon. Minister has said : कृष्ण की बांसुरी बजे, राम का धनुष उठे, बुद्ध का ज्ञान बढ़े, लेकिन निर्धन को धन नहीं मिला। A situation arises where a great man like Dr. Raghuvansh Prasad Singh, a socialist of his standing, forgot his socialist poetry and Mohan Singhji had to prompt him. That probably happened because he has been mixing with the Congress types for too long. He does not belong there. The company he keeps is probably not suitable. But the situation has forced him. We all feel for him and our sympathies are with him.

            When the question of huge investment in the rural areas of India comes into consideration, then you have to consider what the Chairperson of the UPA, Shrimati Sonia Gandhi said in her speech. She admitted in her speech that she had doubts about the sustainability of the projects that will be taken over. She has also admitted that the delivery machinery is so ineffective, so bad that a major portion of the funds does not reach the desired level that the Government or the people in this House would like it to reach.

            When you come back to the hon. Minister’s poetry, if कृष्ण की बांसुरी बजे, राम का धनुष उठे, बुद्ध का ज्ञान बढ़े, लेकिन निर्धन को धन नहीं मिला, that is the sign of true, free democracy where the individual is allowed to grow according to his ability and his skills. Therefore, we have to consider whether we truly want the poor of this nation to be self-reliant and independent or we want to make them MNC-able. All of us know and the hon. Minister himself admitted that the Central Government has sufficient funds. That is a very happy news. All of us who are conversant with rural economy and with rural lifestyle are also aware of the efficacy of the panchayats, of the way the panchayats are functioning. It is not that the panchayats do not have enough funds. The question is how they are investing those funds.

17.19  hrs.                             (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair)

            So, when we are aware of that, we also have to consider that when you are pumping in more funds to the same machinery, how efficiently will the money be invested. We support decentralisation of power. That is the sign of a good democracy. But when you talk about decentralisation of power, you also have to think that when you create assets, what are these assets that you are going to create. Eventually as what one of my colleagues, an earlier speaker also pointed out, how far will the assets that you are creating be useful in the rural life? Unless you create assets that can be sustainable, those assets will have no meaning and the funds spent to create those assets or to create employment for those assets will be totally wasted.

            It is time that the leaders of this nation, that the people of this House realise that poverty has many faces. There are many reasons for poverty[krr89] .

 

            Some are historic and some are situational, but in my opinion, there is one very vital aspect which also contributes to poverty and that is efficiency. When we are inefficient, when we are are not able, we are poor. So, this money has to be spent to uplift ability in the rural poor. You have to train them for things. You cannot say for ever and ever ‘Unskilled workers, come ahead.     We will give you work and take some money’. This is like doling out benefits to incapable people who will not be able to utilise even those few sixty rupees that they will get in their hands in a proper fashion so that the whole family can benefit. Therefore, it is essential that this money has to be spent in such a way that directly agriculture benefits from this investment. Agriculture is the only field in which the rural poor are efficient. They are at home with that technology, with that kind of work. If you can invest this money aiming to develop agriculture, water, ability to store water and to use water properly, then only this project can be sustainable and it can have any meaning on a longer term.

            There is a mention of a State Council in the Bill. The question is who will head it, who will be the deciding factor. Will it be the Gram Sabhas? Will it be panchayats who receive the applications from Gram Sabhas? Or, will it again be the State Council which will be headed by the Secretary, by an IAS officer or by a Project Officer of the State Cadre? Once that happens, then again you are going back to square one where you are going to bureaucratise the whole process of assuring employment to the rural poor.

            You are saying that contractors will not be engaged and machines will not be used. Today, the same law applies to grain for work projects also. We have Food for Work Scheme in Orissa. Invariably in all the States, we have noticed that it is done through contractors. The bureaucracy prefers to deal with one man. So, invariably they are contractors. All these contractors go in for machines and eventually what happens is that very little employment is created and the money goes to contractors.

            Another point which I would like to bring out here is that this Bill has a small aspect which can work out to be a very big social evil. You are going to decide on the household. Who is a major? According to the Bill, anybody who is 18 years and above is a major. If there are three or four people in a household above the age of 18, they will all become majors. So, everybody will want that he should split from the rest of the family. Thereby, you will create smaller families. Smaller family means it has to be recognised by the Sarpanches or the Project Officers who will register these people. As said by one of the earlier speakers, these are the loopholes which will create corruption because to register themselves, they will give money by which in a family consisting of four or five majors, you will have smaller families numbering four or five. Eventually, that will have a social impact in the sense that land holding will also get divided and will become smaller, by which in the long run, the total gramin face, the face of rural India is at a risk of being strife torn and being divided very drastically.

            I come from the State of Orissa. So, I will conclude speaking about the State of Orissa within one minute. First of all, I would like that the whole State of Orissa is covered under this scheme. It cannot be piecemeal. We have the largest number of rural poor[reporter90] .

[ak91] 
I would like to specifically mention that the whole State of Orissa has to be covered in the very first year of its implementation as we have the largest number of rural poor, which is more than 47 per cent. Therefore, it should not to be implemented in five years or two years, but it has to be done right now.

            In the end, I would also like to refer to support Shri Kalyan Singh’s speech in which he mentioned that one cannot divide this country on the basis of rural and urban poor. A poor person is a poor person. He has no caste, no religion and he does not involve himself in these issues. He is only concerned about his ‘paapi pet’. Therefore, this Government has to consider the aspect of the urban poor, and an appropriate Bill has to be prepared at the earliest possible time, so that the problems of the urban poor are also addressed. Thank you.

 

 

 

SHRI SURAVARAM SUDHAKAR REDDY (NALGONDA): Mr. Chairman, Sir, I thank you very much for giving me this opportunity. I stand to support the Bill on behalf of the CPI in the Parliament. I am happy and take pride in supporting this historical Bill. It is a very important Act, which we are making in the 14th Lok Sabha after passing the Right to Information Bill.

            Sir, our forefathers and elders have made immense sacrifice to achieve Independence and to liberate this country from the British colonialism. We attained political freedom from them, and chose the democratic form of Government. We also pledged to give food, clothing, shelter and employment that are the primary necessities for our people. But no person with self-respect would like to live on charity of the Government alone. Therefore, we need to provide employment to the people of our country as they are ready to work and earn their bread.            In the last six decades we could not provide them these basic necessities, and this Act would provide the work that is needed to several crores of rural people.

Shrimati Sonia Gandhi while addressing the House on this issue had tried to explain how the Congress Party is committed to providing employment. I think, the UPA and the Congress can take the credit for it, but at the same time it is the Left and other political parties in the UPA who contributed their mite in bringing this Bill. Definitely, the credit for this will, ultimately, go to the 14th Lok Sabha for giving this historical Act to the people of India.

I would like to remind that even before Independence, the All India Congress Committee formed a Planning Committee for it. If I am not mistaken, Pandit Jawarharlal Nehru was the Chairman of the Committee and the hero of the nation Shri Subhash Chandra Bose was also a Member of that Committee. The Committee suggested many reforms, and the essence of the recommendations of the Committee was ‘economic growth with social justice’. It took us almost six decades to bring that slogan of ‘economic growth with social justice’ in this country.

I do not think that poverty is going to be eliminated totally by providing employment to the rural poor, but this Bill is historical because the rural poor in this country could not be given enough attention in the last six decades after Independence.

I was born in a very backward district of Andhra Pradesh. Several lakhs of people every year go out to far-off places, even 1,000 kms. away from the State in search of employment[ak92] .

 

            Unfortunately, at least, two or three per cent of them will not come back because they die with several diseases in far off places. There is this type of people going from one place to another for working all over the country. This migration is taking place even in Punjab. While the Punjabis go out of the country for better employment, lakhs and lakhs of Biharis go to Punjab as agricultural labourers. We have seen their plight when they became the victims of violence during the Khalistan movement. Several lakhs of Malayalis go to Gulf in search of employment. Recently, I was told that a very large number of people from Bengal and Tamil Nadu have started going to Kerala in search of work. This type of migration is there because the rural poor are under-employed for more than 100 to 150 days. That is the reason why such a Bill has become necessary.

            I am surprised that some friends from the NDA side are complaining that we are providing employment only for 100 days. It is true that if we could have provided employment for all the days, it would have been much better. However, unfortunately, during the period of NDA, they could not provide even 20 days of work. I would like to remind them, according to the statistics which were given by the NDA Government in 2002-03, that 21 lakh people lost their employment potential during 2002 and 2003, that is, for two years, in the organised as well as unorganised sectors. They promised to create one crore jobs, but they removed two million people from employment. Now, this Bill is being attacked from the point of view that there are some lacunae. Definitely, this Bill can be improved further. We all should try to further enrich this Bill. With our experience this year, we should certainly try to find more important amendments that are necessary to be made next year or so.

            Sir, I would like to say that it is true that poverty is poverty, whether it is in rural areas or urban areas. The first priority should be given to rural areas and we support it. At the same time, I would like to say that all the amendments that are being proposed are very good amendments. Discussions between the Left and the UPA enriched this Bill. This five-year term for the enactment of the Bill all over the country and for its implementation is a very good amendment. The minimum wage of Rs. 60 is definitely not enough. However, the minimum wage is less in many other parts of the country. This is definitely going to provide better employment guarantee. I do not believe that this is going to create problems in rural India because the work is to be distributed among the rural people. This is not the same old Bill or the same old schemes that are being brought together. There is a difference: 100 days of employment is guaranteed; a minimum wage of Rs. 60 is guaranteed; in five years, this legislation is going to be enacted throughout the country; and, ninety per cent of the amount that is necessary for expenditure is going to come from the Centre. These are the most important things. I appeal to the Minister that there are certain States which are very weak and may not be able to provide even 10 per cent of the amount as their share. Maybe, special funds should be provided to them so that this type of scheme can be implemented properly all over the country[R93] .

[KMR94] 

Sir, while we support the Bill, I appeal that the minimum wage should be increased as early as possible, and the urban areas also should be taken into consideration and included in the purview of the scheme.

            The last point I would like to make is about certain remarks that appeared in one of the newspapers like ‘Sonia Cess is Coming’. This is most unfortunate. People who are frustrated because of this Bill being brought forward are trying to project it as a vote bank scheme. It is, of course, necessary to mobilise funds. It is not a question of imposing cess on everybody all over the country. We appeal to the Government to tax those people more who benefited after the Independence of the country. The corporate houses, those who can pay, those who became multi-millionaires after Independence, should be justifiably taxed and the necessary money should be provided for this scheme.

            With these words, I support the Bill. Thank you very much.

श्री बची सिंह रावत ‘बचदा’  (अल्मोड़ा) : माननीय सभापति जी, आपने अवसर दिया, उसके लिए धन्यवाद। सबसे पहले मैं मंत्री जी को बधाई देता हूं कि काफी समय से आप प्रयास कर रहे थे कि इस विधेयक पर चर्चा हो और इस विधेयक का पारण हो। मंत्री जी को बधाई देने के साथ-साथ मैं रूरल डवलमपेंट की स्टेंडिंग कमेटी और उसके चेयरमैन कल्याण सिंह जी, जो हमारे नेता हैं, को भी बधाई देना चाहता हूं, जिसमें इस बिल पर व्यापक चर्चा हुई। उस कमेटी ने सिर्फ छ: महीने में दस सींटिंग्स में इस बिल पर विचार किया और कई अच्छे सुझाव दिए। उन सुझावों में से कुछ को मान लिया गया है, जैसे महिलाओं को अधिकतम अवसर देने की बात है। लेकिन आज इस पर चर्चा के दौरान कई सुझाव आ रहे हैं। मैं मंत्री जी से कहूंगा कि आपको उन पर भी विचार करने के लिए तीन दिन का समय मिल रहा है। सोमवार तक आप उन सुझावों पर, संशोधनों पर पूरी तरह से विचार कर सकते हैं, क्योंकि पुन: विधेयक को कुछ टयूनिंग करने की आवश्यकता है, ऐसा पूरे विधेयक को देखने से लगता है। विधेयक देखने में ठीक-ठाक है, लेकिन उसका जो संदेश जाना चाहिए, वह कैसे उस पूरे राष्ट्रीय स्तर पर जाए, यह देखने की बात है। कहीं ऐसा न हो कि इसका भी हश्र अन्य योजनाओं की तरह न हो, जिसका उल्लेख कई माननीय सदस्यों आजमी जी ने और स्वयं सोनिया गांधी जी ने भी किया है।

मुझे याद आता है कि सुनिश्चित रोजगार योजना देश के कुछ जिलों में लागू की गई थी। उसमें हमारा जिला भी था। उसमें रजिस्ट्रेशन के लिए पीला और गुलाबी कार्ड दिए जाने की बात थी और स्थानीय निवासियों को १०० दिन का रोजगार देने की बात कही गई थी। लेकिन इन सारे प्रावधानों और रेग्युलेशंस के होते हुए भी उसमें एक चीज नहीं थी, वह यह कि तब वह योजना अधनियमित नहीं थी। आज हम इसे लेजिस्लेशन के जरिए अधनियमित करने जा रहे हैं। सामान्य स्कीम और लेजिस्लेशन में जो अंतर रहता है, वह इतना ही रहता है कि जहां स्कीम का कोई उल्लंघन हो, वहां प्रत्यक्ष रूप से दंड की व्यवस्था नहीं होती। लेकिन हम इस बारे में लेजिस्लेशन लाकर इसे कानूनी रूप देने जा रहे हैं। यह एक राष्ट्रीय जनहित का विषय है। इस बात का उल्लेख किया गया है कि प्रारम्भिक स्तर पर इस योजना के तहत ३८,००० करोड़ रुपए का व्यय होगा।

जब हम इसमें नहित दंड व्यवस्था की ओर जाते हैं, तो मैं खंड २५ प्रकीर्ण मिसलेनियस का उल्लेख करना चाहूंगा। उसमें यह है क

“जो कोई भी अधनियम के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह दोष सिद्धी पर जुर्माने का, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दाई होगा। ”

 

इसके अलावा फर्ज कीजिए एक हजार रुपए का जुर्माना प्रधान पर, पंचायत सेवक पर, बीडीओ पर या समन्वित कार्यक्रम अधिकारी के ऊपर होता है, वह तब होगा, जब दोष सिद्ध होगा। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में उसके लिए कोई प्रावधान नहीं है।

पूरे विधेयक को देखने के बाद हमें जो कमियां नजर आ रही हैं, मैं चाहता हूं कि आपके पास तीन दिन का समय है, आप इसका सदुपयोग करें और तय करें कि यह दंड, यह अपराध संज्ञेय होगा, काग्नीजेबल होगा या नॉनकाग्नीजेबल होगा। सवाल यह है कि जुर्माना अदा नहीं करने पर क्या उसके लिए कन्फाइन्मेंट होगा, इसका इसमें उल्लेख नहीं किया गया है। इसके अलावा उसके लिए कम्पीटेंट कोर्ट कौन सा होगा, कौन सी अदालत में यह मामला जाएगा, किस रूप में केस रजिस्टर्ड होगा, क्योंकि जुर्माने का मामला है, इसका भी जिक्र नहीं है। इसके अलावा इसमें रिवीजनल या एपेलेट का प्रावधान नहीं है। जो नेचुरल जस्टिस है, जिसे दंड की व्यवस्था करेंगे, जो नेचुरल जस्टिस का तकाजा है कि उसे यह अधिकार मिलना चाहिए कि उसके रिवीजन के लिए कम से कम एक अपील का तो उसे अधिकार हो, इसका भी इसके भीतर कोई उल्लेख नहीं है[R95] ।

[r96] 

 सबसे बड़ा, जो पब्लिक सर्वेंट है जिसको एक प्रकार से इंडियन पीनल कोड के सैक्शन २१ में प्रीवलेज मिला हुआ है कि गुड फेथ में कोई भी काम किया, उसके खिलाफ मुकदमा ही दर्ज नहीं होगा, तो उसका भी उल्लेख इसके भीतर नहीं दिया है और अधिकांश जो इसके अंदर मामले आयेंगे, वे पब्लिक सर्वेंट्स के ही आयेंगे। इसलिए यह जो खंड २५ है इसको पुन: देखे जाने की आवश्यकता है। मैं समझता हूं कि माननीय मंत्री जी इस दिशा में विचार करके, अगर कोई संशोधन की आवश्यकता होगी, तो अवश्य लेकर आयेंगे। हम इसका समर्थन कर रहे हैं।

इसमें एक विषय का उल्लेख आया है। स्कीम की धारा खंड २२(२) के ख क्लॉज में आया है कि स्कीम की सामग्री लागत का एक-चौथाई, जिसके अधीन रहते हुए कुशल और अर्ध-कुशल कर्मकारों की मजदूरी का संज्ञान भी है, इसको राज्य सरकार अदा करेगी। लेकिन रजिस्ट्रेशन जो हो रहा है वह केवल अकुशल लेबर का हो रहा है। लेकिन हर गांव के अंदर मिस्त्री भी है, बढ़ई भी है और लुहार भी है, वह जो कुशल लेबर है उसी गांव में वह भी बेकार बैठा हुआ है। जिसने थोड़ा-बहुत काम सीख लिया या सैमी-कुशल लेबर है तो उसके लिए भी कोई व्यवस्था की जा सकती है और हम उसको भी विश्वास दिलाएं कि उनको भी रोजगार मिलेगा और उसके लिए मजदूरी, जो भी राज्य सरकार तय करे, वह होनी चाहिए। अब बारगेनिंग से होगा या किससे होगा – इस विषय को भी देखे जाने की आवश्यकता है।

एक उल्लेख यहां आया था और मैं भी उस बात को दोहराना चाहूंगा क “ नयी बोतल में पुरानी शराब है,”  तो लगभग वही योजनाएं हैं। लेकिन बधाई इस बात की है कि आज जो कोडिफाइड नहीं था वह कोडिफाइड हुआ है। मॉनटिरिंग के लिए व्यवस्थाएं आपने रखी हैं। आपने पूरे देश के संसद सदस्यों की अध्यक्षता में निगरानी समति और बहुत सारी समतियां बनाई हैं। उसमें ग्रामीण विकास के जितने कार्यक्रम सम्मिलित हैं, मेरा अनुरोध रहेगा कि कालांतर में, इस विषय को भी किसी स्टेज पर, उसके भीतर शामिल करना चाहिए।

अब चयन कैसे करेंगे, इसका मानक क्या होगा? माननीय इलियास आजमी जी ने बात बहुत अच्छी कही कि हमारे कुमाऊ मंडल में मात्र एक जिला है और वही श्रम विकास योजना में है, फूड फॉर वर्क में है और वही इसमें आना है। जबकि वह जिला दूसरे जिले से टूटकर बना है। बड़ा भेदभाव वहां हो रहा है। एक तरफ तो लोगों को काम मिल रहा है और दूसरे लोग वहां काम से भी वंचित हैं, और देश के पर्वतीय क्षेत्र में देश के उद्योग-धंधे नहीं हैं, खेती नहीं है, बेरोजगारी पूरी तरह से फैली हुई है। हम चाहते हैं कि पूरे देश का हिमालय क्षेत्र इसमें शामिल हो जाए तो अच्छा हो – इस पर भी आपको विचार करना चाहिए।

सर्व-शिक्षा-अभियान की योजना गांव में चल रही है। ए.आई.बी.पी. कार्यक्रम भी गांव के अंदर चल रहा है, डीपीएपी चल रही है, हरियाली है, वानिकी है, स्वजल धारा है, सम-विकास की योजना है और हरेक में जो पैसा रिलीज होता है वह किश्तों में होता है। यहां जो प्रावधान है कि हफ्ते में पेमेंट दे देना या १५ दिन के अंदर पेमेंट दे देना, अब इसमें वे कैसे इसे कंट्रोल करेंगे, यह फाइनेंशियल मैटर जो आयेगा, इसको भी पुन: सही तरीके से परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है।

थोड़ा सा उल्लेख आ गया कि ६० मलियन मीटि्रक टन खाद्यान्न तीन साल पहले उपलब्ध था और उस समय लोग भूख से मर रहे थे लेकिन लोगों को दिया नहीं गया, जबकि भंडार भरे थे। ऐसा आरोप हमारी एनडीए सरकार पर आया था। मैं उसको पुरजोर तरीके से खंडन करता हूं और अपने प्रधान मंत्री जी को बधाई देना चाहता हूं, वह योजना आज भी चल रही है। अंत्योदय का उल्लेख माननीय सभापति जी ने किया था कि २५ हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी से, पहले तो मोर्चा सरकार ने शुरू किया था टीपीडीएस १० किलो प्रति परिवार था, लेकिन अंत्योदय में ३५ किलो प्रति परिवार की व्यवस्था की गई और उसमें भी दो रुपये किलो गेहूं, तीन रुपये किलो चावल, फिर अन्नपूर्णा, योजना में जो निराश्रित हैं उनको नि:शुल्क दिया गया, तो ये आरोप पूर्ण रूप से निराधार हैं। अब देश के भीतर कहीं अव्यवस्था रहती है, कहीं पर अन्य घटनाएं होती हैं[r97] ।

[r98] 

 लिहाजा यह आरोप पूरी तरह से आधारहीन है। मैं उसका खण्डन करता हूँ। यह जो मल्टीप्लीसिटी ऑफ प्रोग्राम्स होगा, गांवों में प्रधानमंत्री सड़क योजना पर काम हो रहा है, कहीं ग्रामोदय योजना पर काम हो रहा है, उनमें मजदूरी भिन्न हैं।इसमें मजदूरी भिन्न होगी।इससे जो व्यक्ति की काम करने की क्षमता है, उस पर जरूर असर पड़ेगा। इसमें कैसे तालमेल हो सकता है, इस दिशा में भी मंत्री जी को विचार करने की आवश्यकता है। इसी के साथ मैं पूरी उम्मीद करता हूँ कि मंत्री जी इस पर ध्यान देते हुए जो मुख्य सुझाव आए हैं, उन्हें जरूर शामिल करेंगे और एक मैकेनिज्म के बारे में भी जरूर विचार करेंगे क्योंकि मैकेनिज्म वही है, जिलों में सीडीओ है, वहीं बीडीओ है, वहीं व्यक्ति हैं, इसलिए मैं कहना चाहता हूँ कि मैकेनिज्म को कैसे दुरूस्त किया जाए, इस पर विचार करने की आवयकता है। धन्यवाद।

 

SHRI  JYOTIRADITYA M. SCINDIA (GUNA): Mr. Chairman, Sir, I stand here today in support of the National Rural Employment Guarantee Bill. This Bill is a historic step that will go down in the annals of our country as one that will illuminate the lives of millions of our impoverished and needy.

            This Bill will finally bring justice to the poor people across our country and integrate them into the national mainstream. I have no qualms in stating that the credit for this single-minded, dogged pursuit, dedication and vision for this Bill goes to none other than Shrimati Sonia Gandhi. Aristotle once said and I quote: “Hope is a waking dream.” In today’s world, we have many leaders that dare dream but the ability to transform lies in the commitment and the courage to be able to transform those dreams into reality, to be able to implement and to be able to deliver that promise. We are very fortunate today, Mr. Chairman, Sir, because within the UPA Government, we have that team of our Prime Minister Dr. Manmohan Singhji and the Chairperson of the UPA Shrimati Sonia Gandhiji.

This Bill is a Congress initiative. I have no qualms in stating that. The National Rural Employment Guarantee Bill is, and I quote the Prime Minister, “an idea whose time has come.” It was first promised, the seed, the germination of this idea came in the Congress Chief Ministers’ Conclave in 2002 in Guwahati. It then became a key pledge of the Congress Manifesto and a pledge also of the UPA Manifesto in May 2004. As soon as the UPA Government took office in the Centre, the National Food for Work Programme was launched only as a pre-cursor to the Employment Guarantee Bill. It was tabled in Parliament on 21st of December, 2004 and was referred  to the Standing Committee which took six long months, 14 months since tabling until our Prime Minister and the Leader of the UPA Government Shrimati Sonia Gandhiji pestered them to table it in this Monsoon Session of Parliament so that the poor could get the much needed succour that they have been waiting for so long. इससे स्पष्ट हो जाता है कि हमारी यूपीए सरकार की नीति और नीयत में कोई फर्क नहीं हैहमारी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है। अगर हम कांग्रेस का इतिहास देखे, The Congress Party’s tradition has been to focus on the rural poor and the economically backward. From the days of Pandit Jawaharlal Nehru, when he brought about Five Year Plans, which centred on employment, to Indiraji’s Garibi Hatao, the direct attack on poverty, her plans of Rural Landless Employment Guarantee Programme were appreciated not only within the country but by economists world-wide, such as Mahbub-Ul-Haq and Paul P. Streeten. The EGS was introduced in Maharashtra again by the Congress Government in 1972. Rajivji first introduced the Rural EGS Programme – Jawahar Rozgar Yojana. अभी कुछ समय पहले श्री नीतीश कुमार जी ने टिप्पणी की थी कि हमारी यूपीए सरकार की क्या प्राथमिकता है?हमारी प्राथमिकता है जैसा कि रघुवंश प्रसाद जी ने कहा, श्रीमती सोनिया गांधी जी ने कहा, ग्रामीण विकास हमारी प्राथमिकता है, जो बेरोजगारी की बीमारी है, उसे सदैव के लिए हटा दें यही हमारा संकल्प है, यही हमारी प्राथमिकता है।[r99] 

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  उन्होंने टिप्पणी की। कई लोग यहां अनुपस्थित हैं जिस का मुझे बहुत खेद है। वे अपना भाषण देने के बाद स्वयं अनुपस्थित हो गए। वास्तविकता यह है कि हमारी यूपीए सरकार जो सम्भव कार्य हैं, उनके बारे में चर्चा करती है। वह मायाजाल और भ्रम नहीं फैलाती। पिछले चुनावों में जो देश की जनता ने निर्णय लिया था, मुझे लगता है कि वह संदेश आज भी एनडीए गठबंधन को समझने में थोड़ा समय लगा है। अगर हम एनडीए गठबंधन सरकार के कीर्तिमान के रिकॉर्ड को देखें तो

The average employment growth in the last NDA Government has been negative 0.075 per cent, which means that there was no net job creation.  In the last four years of their rule, we added 2.8 to 3 million people to the category of educated unemployed.  When the Congress was in the Government, Mr. Chairman, Sir, the live register of unemployment was constant at 36.8 million people, which means that every person who entered the labour force got a job.  In the last four years, the live register of unemployment has grown to 41 million people.  Today, seven per cent of our labour force of 400 million people is still unemployed.

Of all the sordid melodies that affect man, unemployment is the most degrading. It robs a man of dignity, of self-confidence of the esteem of his fellow friends and of the loyalty and respect of his loved ones.  Unemployment undermines motivation, undermines ideals, and undermines beliefs. It results in frustration and anger; it results in turmoil and instability.

This Bill, Mr. Chairman, Sir, is an extension of the Congress Party’s understanding that we need to bring dignity to the life of Indians.  That can only come through employment and job guarantee.  Jobless growth is the major issue here.  The country is growing at seven per cent but we need to provide employment.

रोजगार और प्रगति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रजातंत्र में एक के बिना दूसरा नहीं चल सकता है।

The rural poor, who will receive this guarantee of 100 working days, today have no food, no school, and no drinking water.  Forty per cent of our population still lives below one dollar a day.  Today, Mr. Chairman, Sir, 65 per cent of our workforce is agrarian, and the agrarian pie in the GDP is shrinking.  That is something that we need to worry about.

Therefore, the National Rural Employment Guarantee Bill will provide 100 days of employment in 200 districts. It will be a relief to the rural poor, because   9,000 of whom committed suicide during the NDA rule.  This Bill will result in better self-targeting. Only those who need the jobs will volunteer. It will result in better self-liquidating.  When the requirement for these jobs are not there, they will not require them.  It will result in better self-adjusting.  The expenditure will be much higher during times of drought and famine and much lower in better times.  It will result in the creation of national durable assets, the assets which bring back employment as well as generation in harnessing of irrigation resources and infrastructure.  It will provide income to the poorest of the poor and reduce seasonal migration and urban-rural migration.  It will provide families who can then send their children to school, bring about better health and better education.  It will also give  — the most important point, Mr. Chairman, Sir  — greater economic bargaining power to traditionally disadvantageous groups, which will change the power equations in rural society and hopefully foster much more equitable social order.

Sir, there is a criticism that this Act will result in corruption in execution of the schemes.  There is no doubt that there is corruption in our system, there is corruption in our public distribution system, and there is corruption in our anti-poverty programme.  Rajivji himself stated that only 15 paise out of every rupee reached the masses.  But what is the answer?  Is this the answer that we do not take succour to the poor, we do not take much-needed programmes to the poor?  No[k101] [k102] .

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The answer is that we must remove this malice of corruption by bringing about transparency, by bringing about accountability. My friend Shri Satpathy talked about the issue of corruption. The Right to Information Act will remedy this issue.  When empowerment goes right down the chain and when people in gram sabhas and panchayats will be able to monitor programmes, execute programmes, and will be able to evaluate and do the auditing of these programmes, it can be done. This combination of this RTI Act along with this Bill will make the most potent tool that will deliver on the tenuous relationship, the relationship between the outlays and the outcomes. This is the real problem that our country is facing today.

            It will deliver on the notion that bureaucrats and we, the politicians, are servants of the people and not their masters. The opponents of this Bill also talked about the fact that this will result in wasteful expenditure. This is one side of the story; but the other side is that that will provide economic support to millions of people across our country; this Bill will provide not only drought relief, but also relief against drought. If this scheme is extended across the country, it will cost us close to Rs.38,600 crore. If you look at only 200 districts, we are talking about Rs.12,800 crore. Can we not support half to one per cent of our GDP for economically backward areas? Are we going to forsake the weak? Have we forgotten the words of Pandit Nehru on the eve of Independence, the 15th August, 1947? I would like to quote him.

“Future is not one of ease or rest, but of incessant striving so that we may fulfil the pledges that we have taken and the one that we shall take today. That service of India means the service of the millions who suffer; it means the ending of poverty and ignorance and disease and inequality of opportunity.”

 

We must never forget the simple fact about economics of poverty, the share of the poor in total GDP is so minute that even if we move just a small percentage of GDP to serve the poor, it will transform their lives. The US spends one per cent of GDP on social assistance. France and UK spend 3-4 per cent; can we not spend half to one per cent of our GDP?

            This Bill has outlined the new implementation mechanism which will decentralise administration and take power to the grassroots level; it will take power to the grassroots level, to the dream of Mahatma Gandhi.  उनका जो सपना था वह ग्राम स्वराज का सपना था, एक पूर्ण स्वराज का सपना था। Rajiv Gandhi institutionalised that vision and today with this move, the panchayats will no longer be at the periphery of economic reform; they will be at the centre of economic reform.  हमारी यूपीए सरकार ने हर वक्त महिला सशक्तिकरण के बारे में चर्चा की, उनका बीड़ा उठाया है और संकल्प लिया है। माननीय कल्याण सिंह जी ने महिलाओं के बारे में चिंता व्यक्त की, मैं उन्हें आश्वासन दूंगा कि महाराष्ट्र में जो ईजीएस प्रोग्राम है, वह महिलाओं के कार्यक्रम की तरह जाना जाता है जिसमें पचास प्रतिशत बेनफिशरीज़ महिलाएं हैं। मैं आश्वासन देना चाहता हूं कि इस प्रोग्राम के अन्तर्गत भी ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को इस कार्यक्रम से सबसे ज्यादा लाभ मिलेगा। केन्द्र और राज्य रोजगार प्रतिभूति परिषद् में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण रखा गया है और महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण रखा गया है। आज मुझे बड़ी खुशी है और मैं श्री रघुवंश प्रसाद जी और श्री कल्याण सिंह जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि आखिर हमारे देश के पिछड़े वर्ग को भी सम्मान दिया गया है, उनको भी सम्मिलित किया गया है। मुझे आज भी याद है कि मेरे पूज्य पिताजी ने २५ वर्ष पूर्व वर्ष १९८० में इसी सदन में एक ऐसी योजना की मांग रखी थी, उस समय मध्य प्रदेश में ग्वालियर, चंबल क्षेत्र एक दस्यु पीड़ित क्षेत्र था। आज मुझे खुशी है कि इस योजना के आधार पर केवल हमारे क्षेत्र में रोजगार के साधन ही नहीं बल्कि उसके अतरिक्त स्थाई साधन उत्पन्न होंगे और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में भी बहुत सुधार अ्ााएगा[p104] ।

18.00 hrs.[R105] 

            In conclusion, Mr. Chairman, Sir, I would like to state that neither high growth nor sound public finance coupled with the booming stock market is the requirement today.  What we need is a stable livelihood for the vast majority of our citizens, which must be given the highest priority.  In four to five years, if this programme does work and I am sure it will, it will give close to four crore families an income increase of close to Rs.10,000 per annum.  For them, Mr. Chairman, Sir, this will make a difference between the anxious days and secure lives.  The reality of the economic scene, Mr. Chairman, Sir, is that it is India Awakening and not India Shining or Feel Good.  By emphasising the latter, the NDA Government played a cruel joke on the poor, the socially deprived and the cruelly indebted. The UPA Government stands here today to right those wrongs, to re-define the priorities of growth, to remove the burden of yoke from the poor and to lead India once again into a determined and proud future.

            I now end in my father’s words, Shri Madhavrao Scindia’s words, that still rings through:

 

“The country must be told that there is a plan of action and that there is light at the end of the tunnel. They must be assured of a bright future, especially our economically weaker sections and the millions that still live below the poverty line.  They must never be lost sight of. ”

 

            This Bill, Mr. Chairman, Sir, is one of the most – I repeat, this is one of the most – significant legislation to be passed in this country after Independence which will go a long way.  It will go a long way in bridging the gap between the political equality and economic equality.   राजनैतिक और आर्थिक समानता के बीच में यह बिल समन्वय लायेगा। अंत में यही कहूंगा :

                        ‘ कि दूर करना है हर घर से हमें अभावों का अंधेरा,

देकर रोजगार वहां हम लायेंगे उम्मीद और अमन का सवेरा’

 

SHRI KHARABELA SWAIN (BALASORE): Thank you very much for your highly political speech.

सभापति महोदय : इस महत्वपूर्ण विधेयक पर सदन करीब ४ घंटे चर्चा पूरी करने जा रहा है। यदि सदन आगे चर्चा के लिये तैयार है या सहमत है तो सदन का एक घंटा समय बढ़ाया जाये।

कुछ माननीय सदस्य :  सभापति महोदय, कोई सदस्य राज़ी नहीं है। कल रक्षा बंधन का त्यौहार है, सब को जाना है। हाउस खत्म किया जाये।

श्री रवि प्रकाश वर्मा (खीरी) : सभापति महोदय, अभी ज़ीरो ऑवर बाकी है।

सभापति महोदय : ३७ माननीय सदस्यों ने स्पेशल मैंशन के लिये महत्वपूर्ण विषयों पर सूचना दी हुई है।

SHRI KHARABELA SWAIN : Sir, we can have it on Monday.… (Interruptions)

SHRI BRAJA KISHORE TRIPATHY (PURI): Let us conclude, Sir.… (Interruptions)

सभापति महोदय : अगर सदन सहमत नहीं होगा तो जीरो ऑवर शुरु किया जाये।

कई माननीय सदस्य :  हां, शून्यकाल लिया जाये।

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF DEFENCE AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI BIJOY HANDIQUE): Sir, there are so many speakers.  It will not be possible to finish it on Monday.  So, let us extend the time for this discussion by one hour.

श्री रवि प्रकाश वर्मा : सभापति जी, बिल पर डिसकशन सोमवार को आधी रात तक करा लीजिये। अब जीरो ऑवर ले लें।

सभापति महोदय : सदन की सैंस से लग रहा है कि बिल पर चर्चा के लिये सदस्य तैयार नहीं हैं। इसलिये जीरो ऑवर लिया जाये। सदन तो सैंस से चलता है। इसलिये अब हम जीरो ऑवर लेंगे।

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सभापति महोदय : श्री रामजी लाल सुमन – अनुपस्थित

श्री ब्रजेश पाठक -अनुपस्थित

चौधरी विजेन्द्र सिंह -अनुपस्थत[RB106] 

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (चायल) :  सभापति महोदय, आपने मुझे स्पेशल मैन्शन में बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

सभापति महोदय : केवल दो मिनट में समाप्त करें।

श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदय, दो मिनट में कहां समाप्त हो पायेगा, यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है। जब हम बोलते हैं तो आप समय की पाबन्दी लगा देते हैं, कम से कम हमें पूरी बात कहने दीजिए।

सभापति महोदय : अभी आपको जाने की जल्दबाजी थी, क्या वह जल्दबाजी अब खत्म हो गई है।