Title: Discussion on points arising out of the answer given by the Minister of State in the Ministry of Consumer Affairs, Food and Public Distribution on 3-8-2001 to Starred Question No. 184 regarding losses suffered by Super Bazars. (Concluded).
(महाराजगंज, बिहार) : सभापति महोदय, मैं सुपर बाजार में हो रही गड़बड़ी के सम्बन्ध में आधे घंटे की चर्चा में हिस्सा लेने के लिए खड़ा हुआ हूं।
नरेश पुगलिया जी द्वारा विगत तीन तारीख को सदन में एक प्रश्न पूछा गया था, जिसमें सरकार की तरफ से जो उत्तर आया, उससे न तो सदस्य संतुष्ट हुए और न ही सदन संतुष्ट हुआ। इस कारण आसन द्वारा इस प्रश्न पर आधे घंटे की चर्चा का निदेश दिया गया। सुपर बाजार वर्ष १९७६ से शुरू हुआ था। उस समय देश की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी थीं। जब यह शुरू किया गया तो उस समय सरकार की यह नीयत थी कि कोआपरेटिव बनाकर कुछ पैसा सरकार दे और कुछ जनता का पैसा लगाकर आम लोगों को इसके माध्यम से सुविधा दी जाए। इसी क्रम में दिल्ली और नोएडा में लगभग ११२ शाखाएं सुपर बाजार की कार्यरत हैं और १६ मोबाइल वैन भी इसकी चलती हैं।
भारत सरकार ने भी इसमें अपना हिस्सा दिया है। हमारी जानकारी के अनुसार भारत सरकार द्वारा १५७.५ लाख रुपये अनुदान के रूप में एक बार दिया गया था और सरकार द्वारा ऋण के रूप में १५३.३१ लाख रुपया दिया गया था। सब्सिडी भी लगभग एक करोड़ रुपये दी गई थी और यह संस्था काफी मुनाफे में चल रही थी। वर्ष १९८९ में इसमें स्टेशनरी सामान बेचने की इजाजत दी गई। जो हमारी जानकारी है, उसके अनुसार १९९०-९१ में २१.८४ लाख रुपये का मुनाफा हुआ। १९९१-९२ में ९.३३ लाख रुपये का मुनाफा हुआ था। १९९२-९३ में १०.८३ लाख रुपये का मुनाफा हुआ था। १९९५-९६ में २७.६१ लाख रुपये का मुनाफा हुआ था लेकिन इसके बाद अचानक यह मुनाफा घाटे में बदल गया। १९९६-९७ में ६७.६५ लाख रुपये का घाटा हो गया। १९९७-९८ में ३२१.३३ लाख रुपये का घाटा हुआ था। १९९८-९९ में ७०६.८० लाख रुपये का घाटा हुआ। १९९९-२००० में १६४३.५० लाख रुपये का घाटा हुआ। इस घाटे को देखते हुए अभी जैसा कि माननीय मंत्री जी का बयान भी आया, हमारे टी.वी. और प्रैस इंटरव्यू में कहा है कि आटा और शक्कर बेचने का सरकार का काम नहीं है लेकिन इसका मतलब है कि आटा और शक्कर बेचने की बात भी सरकार की तरफ से सोची जा रही है। जो सहकारी संस्था इतना मुनाफा दे रही थी, उसमें अचानक घाटा आने का कारण क्या हुआ, कौन सी परिस्थिति आई और क्या कमी हुई जिसके चलते यह घाटे में बदल गई? मैं आपसे बताना चाहता हूं कि जो इसके चेयरमैन होते हैं, और जो मंत्री जी के पहले एनडीए की ही सरकार थी, उसमें एक मंत्री जी हुए थे, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता और अनावश्यक विवाद खड़ा नहीं करना चाहता, जिस समय धूरी नाम के व्यक्ति को चेयरमैन बनाया गया था तो सारे नियम कानून को ताक पर रखकर उन्हें चेयरमैन बनाया गया और वह धूरी साहब जिस मकान में रहते थे, १८६०० रुपया प्रतिमाह किराया देते थे और लगभग ९ लाख रुपये का भुगतान इस संस्था द्वारा उस मकान के किराये के रूप में किया गया। जो संस्था इतने घाटे में चल रही हो और उसके चेयरमैन को ९ लाख रुपये किराये के नाम पर छूट दी जाती हो तो मुनाफे की उम्मीद हम कैसे कर सकते हैं? पूर्व में टेंडर के नाम से सामानों की आपूर्ति करायी जाती थी, कम्पीटिशन होता था। उसमें उचित मूल्य पर, कम मूल्य पर सामान मिलता था और जनता को अच्छी क्वालिटी के साथ सामान मुहैया कराया जाता था लेकिन उन्हीं चेयरमैन के जमाने में गर्म मसाला वगैरह का तीन महीने तक बिना टेंडर कराये हुए एक व्यक्ति को उन्होंने दे दिया था। किन परिस्थितियों में रेट तय हुआ होगा, यह आप और हम दोनों समझ सकते हैं और माननीय मंत्री जी भी इस बात को समझ सकते हैं। हमें बताया गया कि तीन महीने में ३.९० लाख रुपये का घाटा हुआ। जब इस तरह की गड़बड़ी शुरू हुई कि बिना टेंडर किये सामान की आपूर्ति शुरू हो गई तो सरकार को उसी समय इस पर ध्यान देना चाहिए था। इसी तरह दाल नवम्बर १९९८ में ६ पार्टीज द्वारा ऑफर की गई थी। पहले १५ दिन पर उनका टेंडर लिया जाता था। अखबार में निकलता था, प्रतदिन उसके भाव गिर रहे थे और भाव चढ़ रहे थे लेकिन उस समय भी ६ लोगों से एक रेट तय करके ६ लोगों से टेंडर लेना शुरू कर दिया।
सामान बिना टैंडर के लेना शुरु कर दिया। इसमें ४८५ बैंग दलहन के सीज किए गए और मुकद्दमा दर्ज किया गया। इसमें कई लोग गिरफ्तार भी हुए। इसमे करीब ४ लाख रुपए का नुकसान हुआ। एक-एक आइटम को देखें, तो सरकार को लगातार नुकसान होता गया है, लेकिन सरकार मौन बैठी रही। सरकार की तरफ से कोई कार्यवाही नही की गई और घाटा दिनप्रतदिन बढ़ता गया।
महोदय, १९९८ में पंजाब से प्याज, टमाटर और आलू मंगाए गए। पाच टन प्याज १० रुपए किलों के हिसाब से मंगाए गए, ४.०३ टन टमाटर २५ रुपए किलो के हिसाब से मंगाए गए और १०० टन आलू ८ रुपए किलो के हिसाब से मंगाए गए। सारा सामान स्टोर करते हुए, खराब हो गया। उस वक्त बाजार में कीमत कम थी, कोई ग्राहक भी खरीदने वाला नहीं था। बाहर से मंगाया हुआ सामान नष्ट हो गया। इसमें करीब ५ लाख २९ हजार रुपए का नुकसान हुआ। स्थिति यह हो गई कि सुपर बाजार में झाड़ू देने वाले और सफाई का काम करने वाले कर्मचारी टैंडर सप्लाई का काम करने लगे। इस तरह से घाटे की शुरुआत हुई और शुरुआत में ही यदि सरकार की तरफ से कार्रवाई होती, तो हमको लगता है कि इतना बड़ा नुकसान सुपर बाजार को नहीं होता। इसी प्रकार से स्वराज ट्रक बिना निदेशक मंडल की स्वीकृति हुए, खरीद लिया गया, जिस पर ७३ लाख ९४ हजार रुपए की लागत आई। ट्रक का कोई उपयोग नहीं है, वैसे ही खड़ा सड़ रहा है। इसके अलावा इस पर जो ऋण लिया गया, उस पर सूद बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में आप कैसे मुनाफे की उम्मीद करते हैं। हम जानना चाहता हूं, सरकार ऐसी स्थिति में चुप क्यों बैठी रही, उसने समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की?
सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिए।
श्री प्रभुनाथ सिंह : महोदय, मेरे साथ अन्याय हो जाएगा ।
सभापति महोदय : आधे घन्टे की चर्चा है, आप मूवर है, इसलिए आपको दस मिनट का समय दे दिया गया है।
श्री प्रभुनाथ सिंह : महोदय, जब आप आसन पर बैठे हैं, तो थोड़ा समय और दीजिए।
सभापति महोदय : नियम के अनुसार चलिए।
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम और आप दोनों ही तो नियम को मानने वाले हैं।
सभापति महोदय : नियम का पालन होना चाहिए।
श्री प्रभुनाथ सिंह : महोदय, हम आपको बताना चाहते हैं, १८.११.९९ से २६.११.९९ के दौरान विधान सभाओं के चुनाव हो रहे थे। राजनीतिक लाभ लेने के लिए रेट गिरा दिए गए, जिसके चलते १.६० करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। मैं आपको बताना चाहता हूं, संगरूर, पंजाब, में सुपर बाजार की एक शाखा खोली गई, भवन किराए पर ले लिया गया और कर्मचारियों की बहाली कर दी गई, लेकिन सुपर बाजार शुरु नहीं किया गया। जिसके चलते करीब ४३ हजार रुपए का नुकसान हुआ। इसमें कृषि एवं सहकारिता विभाग के संयुक्त सचिव ने जांच की, जो कुछ आरोप बनाए, उनके आधार पर २५ जनवरी, २००१ को इन लोगों से एक स्पष्टीकरण मांगा गया। उसमें यह लिखा गया – जो घाटा हुआ है, वह घाटा आप लोगों से वसूल क्यों न किया जाए। भूरि के अलावा अन्य पांच लोग और शामिल हैं। भूरि से ७.५९ करोड़ रुपए वसूलने की बात कही गई, श्री सुरेन्द्र गांधी, जो उस समय उपाध्यक्ष थे, उनसे ४.०५ करोड़ रुपए वसूलने की बात कही गई, श्री एसएस जोस से २.४७ करोड़ रुपए वसूलने की बात कही गई, श्री राम महेश्वरी से २.४७ करोड़ रुपए वसूलने की बात कही गई, श्री अजीत सिंह से ०.८९ करोड़ रुपए वसूलने की बात कही गई, श्री विजय कुमार से ०.८९ करोड़ रुपए वसूलने की बात कही गई – यदि इन सबका टोटल किया जाए, तो यह राशि लगभग १८ करोड़ रुपए आती है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि इस संबंध में सीबीआई द्वारा जांच की बात कही गई थी, जिसमें कुछ लोग गिरफतार भी हुए हैं।
एक आईएएस का नाम भी आया था। उनमें छोटे लोग गिरफ्तार हो गए लेकिन बड़े लोग गिरफ्तार नहीं हो सके। उनकी गिरफ्तारी नहीं होने का क्या कारण है। हम मंत्री जी से जानना चाहेंगे कि जब छोटे कर्मचारी गिरफ्तार हो गए और दो आईएएस पर इस तरह का आरोप प्रमाणित हो चुका तो वे आज तक क्यों नहीं गिरफ्तार हुए। हमने जिनका नाम बताया, जो हमें दिए गए, क्या इन लोगों के वसूली के लिए नोटिस जारी किया गया। अगर नोटिस जारी किया गया तो अब तक वसूली क्यों नहीं की गई। अगर वसूली नहीं की गई तो इसके पीछे क्या कारण है। क्या इस संबंध में राजनीतिक हस्तक्षेप हो रहा है, राजनीतिक दबाव पड़ रहा है। सुपर बाजार को बर्बाद करने की कोई साजिश चल रही है?
महोदय, पहले जो सेल होता था, उसमें काफी गिरावट आई हुई है। उसमें लोग बताते हैं कि प्रति माह १.४० करोड़ रुपए सेल में गिरावट हुई है और सुपर बाजार पर अलग से मार्केट का जो लोन है, लगभग आपूर्ति कर दी है, जिसका पैसा बकाया है। लोग बताते हैं कि अभी ३५ करोड़ बकाया है। १९९३-९४ में बच्चों को जो विद्यालयों में देने के लिए बिस्कुट दिए गए थे, उसमें काफी गड़बड़ी की गई थी। इस तरह जो आपूर्ति की गई थी उस व्यक्ति का कोई कारखाना नहीं था। माल बिल्कुल घटिया किस्म का था। सेंट्रल एक्साइज़ ने उसमें छापा मारा। उसके बाद सारी बातें खुल कर सामने आईं। हम चाहते हैं कि इतनी बड़ी गड़बड़ियां हुईं और सरकार इसमें क्यों मौन बैठी रहती है। इस संबंध में एक प्रश्न हमने और रघुनाथ जी ने बहुत पहले किया था। जिसमें मंत्री जी का लखित उत्तर भी आया था। उसमें उन्होंने कहा था कि इसका ऑडिट कराया जाएगा। उन्होंने लिखा है कि १९९५-९६ से पांच वर्षों की अवधि का लेखा-परीक्षा और दिल्ली का सुपर बाजार १९९४-९५ का पांच वर्षों की अवधि का लेखा-परीक्षा कराने का सुझाव दिया है, उस पर सहमति हुई। जब सरकार की सहमति हुई कि लेखा-परीक्षा कराया जाएगा तो क्यों नहीं कराया गया। इसके पीछे क्या कारण है। क्या सरकार जान-बूझ कर सुपर बाजार को नुकसान पहुंचाना चाहती है। अगर नहीं तो सरकार ने इस पर कार्यवाही क्यों की।
महोदय, सुपर बाजार के बोर्ड को तत्काल भंग कर देना चाहिए। उसके बाद उसमें प्रशासक की नियुक्ति कीजिए। उसके माध्यम से उसे चलाइए। सी ए जी से इसका लेखा-परीक्षा जल्दी से जल्दी कराएं तो खुल कर हकीकत सामने आएगी। इसमें सरकार की पूंजी नहीं लगी हुई है, जनता की भी लगी हुई है। इसलिए हम चाहेंगे कि दोनों की पूंजी को ध्यान में रखते हुए इसमें सुधार के उपाय निकालें। सुपर बाजार
ही नहीं, जितनी भी आपकी संस्थाएं हैं- जैसे केन्द्रीय भंडार है तथा अन्य जगह हैं। आपके यहां कई पत्र हमने लिखे हैं। आपने बुला कर भी हमसे बात की थी। हालांकि इस सवाल पर अभी चर्चा नहीं हो रही है, हम आपसे कहेंगे कि जितनी आपकी संस्थाएं हैं उनमें भारी गड़बड़ी हो रही है, उन पर आप निगरानी रखिए। ये संस्थाएं सुचारु रुप से कैसे चलें, इनके घाटे कैसे समाप्त हों, इसके लिए आप कार्यवाही कीजिए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
(अजमेर):सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से जानना चाहूंगा कि सहकारिता के क्षेत्र में देश का सबसे बड़ा उपक्रम दिल्ली का सुपर बाजार था। इसमें सरकार की कितनी पूंजी लगी हुई थी। आज की तारीख में कितने अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ प्रशासनिक कार्यवाही चल रही थी और कुछ के खिलाफ मेजर और कुछ के खिलाफ माइनर पेनल्टी की बात चल रही थी,
उनसे कितनी बकाया राशि की वसूली हुई। क्या दिल्ली सरकार से राष्ट्रीय सहकारी भंडार ने सुपर बाजार को लेने की इच्छा प्रकट की है। अगर हां, तो इस पर सरकार की क्या प्रतक्रिया है? साथ ही क्या प्लॉनिंग कमीशन ने कोई सब-कमेटी बनाकर इसके रिवाइवल के लिए सरकार के सामने सुझाव दिया है जिसमें कहा गया है कि २० करोड़ का लोन देकर इसकी स्थिति सुधार करके, जो इसका डिरेलमेंट हुआ है उसे सही करके, इसे सही रास्ते पर ले जाए और सुपर बाजार को प्रौफिट में लाने का प्रयास करें। इसके बारे में सरकार की क्या योजना है?
(CHIRAYINKIL): Mr. Chairman, Sir, I rise to seek a clarification from the hon. Minister.
Sir, there have been Press reports about storage of foodgrains in the godowns of Food Corporation of India and it has been stated that the godowns are overflowing. It has also come out in the Press that foodgrains are being sold at a throw-away price. At the same time, it has been reported that there were several cases of starvation death in four or five States in India and the Government did not take any action in this regard. The matter went up to the Supreme Court through a Public Interest Litigation. The Supreme Court heard the matter and they ordered that the Public Distribution System should be strengthened to avoid starvation deaths in the country. They ordered like this not once, but twice. So, the Government was given a direction in this respect by the Supreme Court. Then, the matter came up again before the hon. Supreme Court. It took a serious view on the subsequent occasion and gave a direction to the Government to take immediate steps to strengthen the Public Distribution System. It is an irony of fate that after 54 years of Independence, the Supreme Court had to give a direction like this. So, I request the Government that the Public Distribution System must be strengthened, by all means, throughout the country.
I now come to the aspect regarding losses suffered by Super Bazar. These losses could have been prevented if the Government was cautious enough to take preventive measures in time. The losses were due to callous negligence on the part of the Ministry of Consumer Affairs. If they had taken necessary steps by way of abundant caution, the losses could have been prevented. So, I would request the hon. Minister to explain sufficiently as to what has transpired in this case, because of which the Super Bazar has suffered these losses.