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Lok Sabha Debates
Discussion On The Demands For Grants No. 81, 82 And 83 Under The Control … on 22 April, 2010


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Title: Discussion on the Demands for Grants No. 81, 82 and 83 under the control of the Ministry of Rural Development for 2010-11. (The cut motion moved was negatived and Demands for Grants were voted in full).

 

MADAM SPEAKER: The House will now take up discussion and voting on Demand Nos. 81 to 83 relating to the Ministry of Rural Development.

          Hon. Members present in the House whose cut motions to the Demands for Grants have been circulated may, if they desire to move their cut motions, send slips to the Table within 15 minutes indicating the serial numbers of the cut motions they would like to move.  Only those cut motions, slips in respect of which are received at the Table within the stipulated time, will be treated as moved.

          A list showing the serial numbers of cut motions treated as moved will be put up on the Notice Board shortly thereafter.  In case any member finds any discrepancy in the list, he may kindly bring it to the notice of the Officer at the Table immediately.

            Motion moved:  

“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the fourth column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2011, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 81 to 83 relating to the Ministry of Rural Development.”

 

 

श्री गोपीनाथ मुंडे (बीड): अध्यक्षमहोदया, इस मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर चर्चा की शुरूआत समाजवादी पार्टी ने करनी है, लेकिन यदि आप अनुमति देंगी, तो मैं इस पर चर्चा की शुरूआत कर सकता हूं।

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):महोदया, बीएसी में यह तय हुआ था कि इस मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर समाजवादी पार्टी चर्चा की शुरूआत करेगी।

अध्यक्ष महोदया : तुफानी सरोज जी शुरूआत करेंगे।

श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदया, तुफानी सरोज जी अभी नहीं आए हैं, लेकिन मुंडे जी बड़े दल से हैं, इसलिए वे शुरू करना चाहें, तो शुरू कर सकते हैं, मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

अध्यक्ष महोदया : ठीक है।

श्री गोपीनाथ मुंडे : अध्यक्ष महोदया, मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। आज देश में हमारी पापुलेशन सौ करोड़ से ज्यादा होने के बावजूद भी 70 प्रतिशत हमारी जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में गांवों में रहती है। मेरी और मेरी पार्टी की मान्यता है कि जब तक 70 प्रतिशत गांवों में रहने वाले लोगों का विकास नहीं होता, तब तक भारत का विकास हुआ, ऐसा मानना गलत है। 63 साल की आजादी के बाद भी गांव की जो मूलभूत समस्या है, वह हल नहीं हुई है। पीने का पानी, गांवों को रास्ता और बिजली, इंसान को जिन्दा रहने के लिए जैसे रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए, वैसे गांवों को गांव कहने के लिए, वहां पीने का पानी, रास्ता और बिजली के बिना गांव को गांव कहना ठीक नहीं होगा। आज ऐसी हालत है कि गांव अंधेरे में हैं और शहर उजाले में हैं।     

          अध्यक्ष महोदया, जो यूपीए की सरकार आई है, वैसे तो श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने भी गरीबी हटाओ का नारा लगाया था। राजीव गांधी जी ने भी गरीबी के बारे में बातें कीं और यह सरकार तो आम आदमी की बात करती है, लेकिन आम आदमी गांवों में रहता है, इसे आप भूल जाते हैं। इसलिए जिस 70 प्रतिशत जनता का जीवन ग्रामीण मंत्रालय पर निर्भर है, उसके लिए बजट में जितनी राशि देनी चाहिए, उतनी नहीं है। जब तक बजट में प्रोविजन नहीं होगा, सरकार की जो प्राथमिकता है, भाषा आदमी की है, लेकिन अगर बजट को देखेंगे तो पता चलेगा कि इसमें आम आदमी के लिए कुछ भी नहीं है। बहुत बड़ी काफी योजनाएं हैं, लेकिन वे गांव तक पहुंचती नहीं हैं।

          अध्यक्ष महोदया, मैं सबसे पहले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की चर्चा करना चाहता हूं। जब अटल जी प्रधान मंत्री बने तब तक चार लाख गांवों में सड़क नहीं थी। अगर इस देश में कभी गांवों का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें अटल बिहारी वाजपेयी जी का नाम लिखा जाएगा कि उन्होंने गांवों को रास्ता दिया। …( व्यवधान) आपको क्यों बुरा लग रहा है? उनके छ: साल के काल में 60 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का प्रोविजन किया था, उसमें से दो लाख तीस हजार गांव रास्ते से जोड़े गए हैं। जब तक गांवों में इफ्रास्ट्रक्चर नहीं जाएगा, तब तक गांवों का विकास होना संभव नहीं है। आज प्रधानमंत्री सड़क योजना की हालत क्या है, उसकी जो प्रायरटी प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के समय थी, वह आज नहीं रही है। उसमें यह तय किया था कि पांच सौ आबादी का गांव मैन रोड से कनेक्ट किया जाएगा और तीन सौ जो पहाड़ों एवं जंगलों में गांव हैं, उनके लिए ढाई सौ का किया था, लेकिन आज भी लगभग डेढ़ लाख गांव ऐसे हैं, यूपीए के पांच साल कार्य करने के बावजूद भी डेढ़ लाख गांवों को रास्ता नहीं है। जोशी जी मेरी बात से सहमत होंगे, उनके प्रयासों को मैं नकार नहीं रहा हूं, लेकिन मैं उनसे एक सवाल पूछना चाहता हूं कि पांच सौ से भी छोटे गांव हैं – चार सौ, तीन सौ, दो सौ, इस संख्या से हमें गांवों को जोड़ना है या नहीं?

          अध्यक्ष महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि अब हमें अगला कदम उठाना होगा, क्या सरकार इसके लिए तैयार है कि ढाई सौ बस्ती के गांवों को भी मैन रोड से जोड़ा जाएगा। इस योजना का दूसरा कदम उठाना चाहिए, अन्यथा ये गांव कभी रास्ते से नहीं जोड़े जाएंगे। पहाड़ों एवं जंगलों में जो गांव हैं, जहां काफी आबादी है, वहां भी रास्ता पहुंचना चाहिए।

           अध्यक्ष महोदया, हमें अपनी प्लानिंग में, अपने प्रॉवीजन में और अपनी सोच में परिवर्तन लाना पड़ेगा, क्योंकि 100 और 250 की आबादी  वाले गांवों में देश की 20 प्रतिशत आबादी रहती है, जिनके लिए आज तक रास्ता नहीं बनाया गया है। क्या वे हमारे देश में रहकर भी देश के विकास से दूर रहेंगे, क्या उन्हें रैवेन्यू विलेज माना गया? मैं सरकार का स्वागत करता हूं कि सरकार ने एक कदम अच्छा उटाया है कि जंगलों में जो गांव हैं, उन्हें पहले रैवेन्यू विलेज नहीं माना जाता था, लेकिन अब आपने उन्हें रैवेन्यू विलेज मानने का फैसला किया है, इसलिए मैं आपके इस फैसले का स्वागत करता हूं। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जंगलों में जो रैवेन्यू विलेज हैं उनकी पापुलेशन 200 और 250 से ज्यादा नहीं है। इसलिए वे आपकी वर्तमान नीति के अनुसार प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना का हिस्सा नहीं बन सकते हैं। आप फैसले तो करते हैं, लेकिन उन्हें क्रियान्वित करने के लिए योजना नहीं बनाते हैं। इसीलिए पहाड़ों और जंगलों में पड़ने वाले गांवों को अभी तक सड़कों से नहीं जोड़ा गया है। मैं, मंत्री जी से अपेक्षा करता हूं कि जब वे मंत्रालय के ऊपर सदन में हुई बहस का उत्तर दें, तब मेरे इस प्रश्न का जवाब दें और घोषणा करें कि 500 से 250 और पहाड़ों तथा जंगलों में 150 या 100 की आबादी वाले गांवों को भी रास्ता उपलब्ध कराया जाएगा। जंगलों में जो रैवेन्यू विलेज डिक्लेयर किए गए हैं, उन्हें अगर आपने रैवेन्यू विलेज माना है, तो सरकार की जिम्मेदारी है कि उन्हें रास्ता, बिजली और पानी देना चाहिए। जब तक आपके प्रोग्राम में 500 और 300 की आबादी वाले गांवों को ही जोड़ने की योजना होगी, तब तक इन्हें न्याय मिलने वाला नहीं है। प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के बारे में एक और समस्या है कि उन्हें मैन रोड से कनैक्ट करने की योजना थी, लेकिन उन गांवों में जो 15 या 20 किलोमीटर की पुरानी सड़कें बनी हुई हैं, उन्हें ही इस योजना के अन्तर्गत पुनः बनाया जा रहा है और उनके ऊपर ही यह धनराशि खर्च हो रही है।   

          महोदया, मैं मंत्री जी का इस बात के लिए स्वागत करता हूं कि नक्सलिस्ट एरिया में सड़कों की कमी है, इसलिए प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना का सारा पैसा आपने देश के 100 नक्सलिस्ट जिलों में ट्रंसफर किया है। मैं मानता हूं कि नक्सलिस्ट समस्या, बहुत बड़ी समस्या है और वहां रास्ता प्रायर्टी पर देना चाहिए, लेकिन इन गांवों का फंड नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ट्रंसफर करना उचित नहीं है। मुझे मालूम है कि आठ राज्यों और 100 जिलों में नक्सली मूमेंट चल रहा है। वहां रास्ता अथवा विकास का कार्य पहले होना चाहिए, इससे मैं सहमत हूं, लेकिन पूरे देश के गांवों में सड़कें बिछाने हेतु बजट का जो पैसा था, उसे नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में डायवर्ट करना, ठीक नहीं है। इससे क्या होगा कि देश के जिन अन्य स्थानों के गांवों के रास्ते बनने वाले थे, वे नहीं बनेंगे। इसलिए मेरी मांग है कि नक्सली एरिया और नक्सल प्रभावित डिस्ट्रिक्ट्स में अलग फंड दीजिए। वहां के लिए अलग से धनराशि का प्रॉवीजन कीजिए। आप फायनेंस मिनिस्टर से इस हेतु अलग से मांग कीजिए। अभी जो घटना दंतेवाड़ा में हुई, उससे भी हमें सावधान होना चाहिए। यह सही है कि हम ऑपरेशन कर के उनसे संघर्ष करें और बन्दूक का जवाब बन्दूक से दें, लेकिन विकास के बिना यह काम रुकेगा नहीं, क्योंकि गांव में रहने वाला बन्दूक क्यों उठा रहा है, इस बारे में भी सोचना चाहिए। यदि हमें नक्सली समस्या को समाप्त करना है, तो आदिवासी जिलों में जहां मुख्यतः नक्सली मूमेंट प्रभावी हो रहे हैं, वहां विकास होना चाहिए। वहां विकास कर के ही समस्या का समाधान किया जा सकता है। विकास का वहां कोई पर्याय नहीं है। मेरा सवाल है कि क्या सरकार इसके लिए कदम उठाएगी? मुझे विश्वास है कि जब आप डिबेट का जवाब दें, तो मेरे इस सवाल का उत्तर आप जरूर दें।

          महोदया, ग्रामों के विकास के लिए दूसरी महत्वपूर्ण योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण योजना है। इसके लिए मैं निश्चित रूप से सरकार को बधाई दूंगा, क्योंकि यह योजना महाराष्ट्र में चल रही ई.जी.एस. योजना के अनुसार बनाई गई है। यह योजना महाराष्ट्र में 25 साल तक चली, लेकिन गांवों में जिनके पास जमीन नहीं है, जिनके पास जीने का कोई साधन नहीं है, उन्हें रोजगार देने के लिए केन्द्र सरकार ने   ‘नरेगा’ योजना चलाई, जिसका अब नाम बदलकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण योजना रख दिया गया है। यह नरेगा योजना अच्छी है। मैं इस योजना का स्वागत करता हूं और इस योजना के लिए 40 हजार करोड़ रुपए दिए गए हैं। यह एक अच्छा कदम है, ऐसा मैं मानता हूं, लेकिन इस योजना में जो प्रावधान है, उसके अनुसार यह पैसा वहां खर्च नहीं होता है। गत साल में 35 हजार करोड़ रुपए का प्रॉवीजन था, लेकिन अब तक 20-22 हजार करोड़ रुपए ही खर्च हुए हैं। इसका कारण क्या है, क्या सरकार इसका आत्म-परीक्षण करेगी, इसकी वजह क्या है, क्या वह इस पर सोचेगी? पहले इस योजना को 100 जिलों में  प्रारम्भ किया गया था, फिर 200 जिलों में किया गया। मैं चाहता हूं कि इसे सारे जिलों में लागू किया जाए।    आप पैसे का प्रोवीजन रखेंगे और वह खर्च नहीं होगा, तो इससे विकास गांव तक नहीं पहुंचेगा।  ..( व्यवधान)मैं सुझाव दे रहा हूं।  यह आपको अच्छा नहीं लगता, आप तो गांव के बारे में सोचते नहीं हैं, संसदीय कामकाज के मंत्री हैं।  …( व्यवधान) नरेगा की योजना में सबसे बड़ी कंडीशन है, मजदूरों को रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है।  यह कई राज्यों में नहीं हो रहा है।  मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहता हूं।  राज्यों में बहुत असमानता है।  कुछ राज्यों में पांच हजार करोड़ रूपए खर्च हुए, जैसे कि राजस्थान है।  वसुंधरा जी के राज में यह खर्च हुआ है, लेकिन आप इसे नहीं मानेंगे। जैसे कि मध्य प्रदेश है, इस योजना का अच्छा लाभ कुछ राज्य उठा रहे हैं, लेकिन कई राज्य हैं, जिनमें इसका पैसा खर्च नहीं हो रहा है और इसलिए हमें इस योजना के बारे में सोचना चाहिए।

          मेरे राज्य महाराष्ट्र में ईजीएस की योजना होने के कारण नरेगा की योजना वहां नहीं चल रही है।  जहां राजस्थान में पांच हजार करोड़ रूपए खर्च हुए, वहीं मेरे महाराष्ट्र में केवल गतवर्ष साढ़े तीन सौ करोड़ रूपए खर्च हुए और उसके पहले के वर्ष में दो सौ करोड़ रूपए खर्च हुए।  पांच साल में महाराष्ट्र में केवल छः सौ करोड़ रूपए इस पर खर्च हुए, जबकि चार राज्यों में दस-दस हजार करोड़ रूपए खर्च हुए।  यह असमानता है।  यह असमानता इसलिए दूर नहीं हो रही है।  नरेगा के जो रूल्स हैं, उसी प्रकार की योजना पच्चीस साल हमारे यहां चली, इसके लिए आपको उस राज्य के लिए कुछ नजरियाबदलना पड़ेगा।  आपने सौ रूपए मजदूरी बढ़ाकर कर दी है, पहले यह 65 रूपए ही थी।  अभी वहां हर एक आदमी को खेतों में 150-200 रूपए मिलते हैं, तो वह 100 रूपए में काम कैसे करेगा?  इसीलिए वहां आज मजदूर नहीं मिल रहा है।  रोजगार योजना में हमने डैम, चेक्स, रोड्स, आदि सारी चीजें बनायीं, कैंटिलीवर बनाए, जमीन का सुधार किया।  अब हमारे पास काम बचा नहीं है।  यह पैसा ही गांव के रोजगार के लिए अन्य रूप में कैसे खर्च किया जाए, इसके बारे में निश्चित रूप से सोचना चाहिए।  

          महाराष्ट्र में यह योजना आने के कारण ईजीएस योजना बंद हो गयी।  उसके जो आधे काम शेष हैं, उन्हें कौन पूरा करेगा?  आधे काम हुए, जिसमें महाराष्ट्र सरकार का दो हजार करोड़ रूपए खर्च हुए।  जो आधे काम गांव में बचे हैं, ईजीएस योजना बंद हो गयी और नरेगा के नार्म्स में वे नहीं बैठते हैं।  क्या आप महाराष्ट्र सरकार से चर्चा करेंगे या महाराष्ट्र सरकार से प्रस्ताव मांगेंगे कि आधे कामों को पूरा कैसे करना है? यह बात तो छोड़िए, दो साल से मजदूरों को मजदूरी भी नहीं मिली है। उनको राशनिंग पर अनाज के कूपन्स मिलते थे, लेकिन उनको अनाज भी नहीं मिला है। सरकार कहती है कि यह योजना बंद है, नरेगा योजना में इसका प्रावधान नहीं है।  यह समस्या है।  इसके कारण लाखों मजदूरों की मजदूरी अभी तक नहीं मिल पायी है।  सरकार इतना ही जवाब देती है कि नरेगा में इसका कोई प्रावधान नहीं है।  कांग्रेस सरकार, महाराष्ट्र को भारत में ही मानती है या नहीं? अगर नरेगा का पैसा वहां खर्च नहीं होगा, तो वहां निश्चित रूप से समस्या आने वाली है।

          प्रधानमंत्री सड़क योजना में भी वहां इसके तहत खर्च नहीं कर सकते। वर्ष 1970 में अकाल आया था और ईजीएस योजना बनायी थी।  यह बहुत अच्छी योजना थी।  ईजीएस योजना में आज तक वहां 15 से 20 हजार करोड़ रूपए खर्च हुए हैं और उससे एसेट्स बने हैं।  हमने वर्ष 1970 में मिट्टी की सड़क बनायी है।  वह सड़क पक्की नहीं है।  उस सड़क को भी आपने कनेक्शन माना है।  प्रधानमंत्री सड़क योजना में पक्की सड़क होना आवश्यक है।  वे कच्ची सड़कें हैं।  उनको पक्की सड़क मानकर महाराष्ट्र के साथ निश्चित रूप से अन्याय हुआ है।  क्या महाराष्ट्र को आप एक अवसर देंगे?  जो कोर योजना है, उसमें तय हुआ कि आप नया रास्ता बनाएंगे।  अगर हमारा पक्का रास्ता हो, तो उसको मत दीजिए, लेकिन एक अवसर दीजिए जिसके कारण नरेगा का काम महाराष्ट्र में भी शुरू हो सके।

          गांव के विकास की एक योजना और भी है।  इस योजना को मैं महत्वपूर्ण मानता हूं।  यह गरीब आदमी की योजना है।  जिसके पास गांव में खेती नहीं है, जिसके पास जमीन नहीं है, उसके लिए इंदिरा आवास योजना अच्छी है।  इंदिरा आवास योजना में आपने 35 हजार रूपए कर दिया है और पहाड़ों के लिए 38 हजार रूपए कर दिया है, मैं इसका स्वागत करता हूं।    लेकिन इसका काम होने वाला नहीं है। इंदिरा आवास का पैसा खर्च नहीं होता। उसका कारण है, आप समझ लीजिए कि पैसा क्यों खर्च नहीं होता। सरकार बजट देती है। हमारी अपेक्षा है कि बजट ज्यादा देना चाहिए। जो बजट है, वह भी खर्च नहीं होता। इसका कारण है कि हम घर बनाने के लिए पैसे देते हैं। उसमें केन्द्र सरकार अनुदान देती है, राज्य सरकार अपना पैसा लगाती है। जैसे महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने 35 हजार रुपये लगाए और 70 हजार रुपये का घर दे दिया। लेकिन जगह उसकी होनी चाहिए या गांव को जगह देनी चाहिए, यह कंडीशन है। आप घर बनाने के लिए पैसा देते हैं लेकिन जगह के लिए क्यों नहीं देते। इंदिरा आवास के लिए एक हजार गज जमीन चाहिए। आप इंदिरा आवास के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं, लेकिन इंदिरा आवास बनाने के लिए जो जगह चाहिए, उसके लिए इस स्कीम में कोई व्यवस्था नहीं है। ये घर मुख्यत: दलित और आदिवासी लोगों के लिए हैं। दलित लोगों के पास पैसा कहां है जो वे अपने घर के लिए जगह लें। पट्टे की रिक्वायरमैंट है लेकिन सरकार पट्टे के लिए पैसे नहीं देती। आज आप घोषणा कीजिए कि गरीबों को घर देंगे, लेकिन घर बनाने के लिए जो जगह चाहिए, उसके लिए केन्द्र सरकार 50 प्रतिशत और राज्य सरकार 50 प्रतिशेत अनुदान दे। तब उनके लिए घर बनेंगे। जिन लोगों के पास नीचे जमीन है और ऊपर आकाश है, वे अपना खुद का घर बनाने के लिए पैसे कहां से लाएंगे।

          शहरों के लिए बहुत सी योजनाएं बनीं। जवाहरलाल नेहरू पुनरुत्थान योजना भी बनी। आज शहरों में आबादी बढ़ती जा रही है। शहरों में आबादी बढ़ने का कारण क्या है। जब हम आजाद हुए थे और 1951 में पहला सैन्सस हुआ था, तब शहरों की संख्या 31 प्रतिशत थी। आज अर्बनाइजेशन हुआ है। सन् 2001 का जो सर्वे आया था, उसमें अर्बन पौपुलेशन 46 प्रतिशत थी। अब हम अंदाजा लगाते हैं कि 48 प्रतिशत पौपुलेशन शहरों में आ गई है। आप जानते हैं कि हम चुनकर आए हैं तो हमारी कौन्सटीटूंसी बदल गई है क्योंकि पौपुलेशन के आधार पर शहरों के लोक सभा सदस्यों की संख्या बढ़ी है और गांवों के लोक सभा सदस्यों की संख्या कम हुई है। ऐसा क्यों हो रहा है? गांव का आदमी गरीबी और बेरोजगारी के कारण गांव को छोड़कर शहरों की तरफ भाग रहा है। गांवों के बेरोजगार लोग और गांवों की गरीबी का शहरों में होता हुआ स्थानान्तरण, क्या आप इसे रोकना नहीं चाहेंगे? आप आम आदमी की, गांवों की बात करते हैं। लेकिन गांव का आदमी गांव में रहे, क्या इसके लिए हमारे पास कोई कार्यक्रम है। उसे घर देने से, सड़क देने से नहीं होगा। यदि हमें गांवों का सही विकास करना है तो जब तक गांवों की गरीबी हटाने और गांवों के बेरोजगार लोगों को रोजगार देने के लिए योजना नहीं लाएंगे, तब तक गांवों का विकास नहीं होगा। नरेगा उन लोगों की योजना है जो रोज मेहनत करके कमाई करते हैं। लेकिन आज गांवों में भी हजारों बेरोजगार लोग ऐसे हैं जो ग्रेजुएट हैं। इस देश के युवा लोगों के हाथ काम करना चाहते हैं, उनके ह्रदय में काम करने की इच्छा है, लेकिन उनके पास रोजगार नहीं है। क्या हम गांवों में रहने वाले बेरोजगार लोगों के लिए कोई योजना लाएंगे? ऐसा नहीं होगा तो एक दिन वे भी हाथ में बंदूक लेंगे। यदि आप गांवों में बेरोजगार लोगों को रोजगार देंगे तो वह रोजगार के लिए शहर में नहीं जाएंगे। गरीब आदमी की गरीबी गांव में हटेगी तो वह शहर में नहीं जाएगा और गरीबी का स्थानान्तरण शहरों में नहीं होगा।

          शहरों में मोनो रेल, मैट्रो रेल, ओवर ब्रिजेस, रिंग रोड, पीने के पानी के लिए तालाब के लिए कितना पैसा खर्च करते हैं। यदि उस पैसे को गांवों में खर्च करते तो शहरों में ब्रिज पर ब्रिज बनाने की नौबत नहीं आती। अर्बनाइजेशन को रोकिए। आज 48 प्रतिशत हुआ है और एक्सपर्ट्स कहते हैं कि आने वाले 10-12 सालों में गांवों की पौपुलेशन कम होगी और शहरों की पौपुलेशन 55 प्रतिशत तक हो जाएगी। हम अमरीका आदि दूसरे देशों की बात करते हैं। उनके यहां जो इफ्रास्ट्रक्चर शहरों में है वही इफ्रास्ट्रक्चर गांवों में भी है। हमारी गांवों की जनता इफ्रास्ट्रक्चर से दूर है। यह सड़क और पानी की बात हुई। बिजली कहां है? हम राजीव गांधी बिजली योजना लाए। वह योजना भी बड़े गांवों के लिए है, पांच सौ लोगों के गांवों के लिए है, लेकिन छोटे गांव अंधेरे में हैं। उनके लिए हम क्या कर रहे हैं।

           अध्यक्ष महोदया, मैं एक बहुत महत्वपूर्ण बात इस सदन के ध्यान में लाना चाहता हूं। हर कोई प्रदेश बिजली के क्षेत्र में स्वयं पूर्ण नहीं है। हर प्रदेश में लोड शैडिंग है। हम दिल्ली को बिजली देते हैं, मुम्बई को बिजली देते हैं। गांवों में लोड शैडिंग है। वहां अठारह-अठारह घंटे बिजली नहीं है। इस कारण गांव वाले डीजल का इंजन लेकर अपनी जमीन को पानी देते हैं। अब डीजल के दाम भी बढ़ाये हुए हैं, तो वह कहां जायेगा? गांव में बिजली की लोड शैडिंग अठारह-अठारह घंटे है जबकि शहरों में चौबीस घंटे बिजली मिल रही है। क्या आप ग्रामीण भारत को देखेंगे या नहीं? जब बिजली नहीं मिल रही, तो मेरा उस संबंध में एक सुझाव है।

          हमने सौर ऊर्जा के बारे में सुना है।  सरकार सोलर एनर्जी से बिजली खरीदने वाली है। सरकार 10 रुपये प्रति यूनिट की सब्सिडी देने की योजना लायी है। आप ऐसा क्यों नहीं करते, कि गांव के घर में जो बिजली लगती है, उसके लिए आप सोलर बिजली से हर गांव पूर्ण कीजिए। …( व्यवधान) यह हो सकता है, उसमें क्या प्रौब्लम है? …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : किसी की कोई बात रिकार्ड में नहीं जायेगी।

                              …( व्यवधान)*

अध्यक्ष महोदया :  मुंडे जी, आप इधर एड्रैस कीजिए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : लाल सिंह जी, आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री गोपीनाथ मुंडे :   मैं गांव की बात कर रहा हूं। …( व्यवधान) ग्रामीण विकास मंत्री श्री जोशी जी ने बिजली का उल्लेख किया है। …( व्यवधान) आप बिजली नहीं चाहते, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : मुंडे जी, आप इधर देखकर संबोधित कीजिए।  आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री गोपीनाथ मुंडे :   मैंने कहा कि सरकार सौर ऊर्जा का जो प्रयोग कर रही है,  वह गांव में करे। मैं यह  सुझाव दे रहा हूं।  आप गांवों के विकास का सुझाव भी नहीं मानना चाहते। आप उसे करो या न करो, लेकिन  उसे आप सुनो तो सही। गांवों के बारे में सुनने के लिए भी कांग्रेस तैयार नहीं है। …( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :   लाल सिंह जी, आप शांत हो जाइये।

…( व्यवधान)

श्री गोपीनाथ मुंडे :  अध्यक्ष महोदया, मैं यह कहना चाहता हूं कि आप सौर ऊर्जा से बिजली दो या किसी भी प्रकार से दो। किसी भी प्रदेश में आज बिजली नहीं है। आज सबसे पहले गांवों में बिजली कटौती होती है। अब बिजली बिना विकास होगा, ऐसा मानना ठीक नहीं है। आज सारे गांव अंधेरे में हैं। उनको उजाले में लाने के लिए निश्चित रूप से प्रयास होना चाहिए।

          अध्यक्ष महोदया,  मैं एक बात  और कहना चाहूंगा कि शहरों का विस्तार बढ़ता जा रहा है। लेकिन गांवों में भी लोग रहते हैं। हम गरीबों के लिए इंदिरा आवास योजना कर रहे हैं, लेकिन गांवों का एक्सटेंशन होना चाहिए। आजादी के बाद से हमारे जो गांव हैं, वे वैसे के वैसे ही हैं। उनकी तस्वीर और तकदीर नहीं बदली है। मेरा यह सवाल है कि क्या आप गांवों की तस्वीर और तकदीर बदलना चाहते हैं या नहीं ? यदि आप गांवों की तस्वीर और तकदीर बदलना चाहते हैं, तो  आप गांवों का एक्सटेंशन कीजिए। आज शहरों की सीमा बढ़ती जा रही है। शहरों की नगर पालिका, महानगरपालिका बनती जा रही है, महानगर बनते जा रहे हैं जबकि गांव जैसे के तैसे हैं। क्या हम सारे गांवों के लिए प्लान नहीं करेंगे कि वर्ष 1951 में कितनी आबादी थी और आज कितनी है, उसका एक्सटेंशन कितना होना चाहिए, उस बारे में कोई योजना होनी चाहिए। जो किसान खुद का घर बांधना चाहते हैं, उसे क्या हम दो परसेंट पर लोन देंगे? क्या वह एक से पांच लाख रुपये तक का लोन खुद का घर बांधने के लिए लेगा?  वह उसे वापिस करेगा। आज हम बड़े-बड़े जंगल शहरों में खड़े कर रहे हैं। उसके लिए हमें कितना भी पैसा मिल जायेगा।  क्या हम गांव में अपना घर बांधने के लिए कोई योजना लायेंगे? सरकार अनुदान न दे, लेकिन गांव में अपना घर बांधने, गांवों के एक्सटेंशन और गांव की सीमा को बढ़ाने के लिए सरकार को कोई योजना लानी चाहिए। आज गांवों की आबादी दुगुनी हो गयी है। एक ही घर में दो-दो, चार-चार भाई रह रहे हैं, क्योंकि वे अपना नया घर बसा नहीं सकते, नया घर बांध नहीं सकते। मुझे लगता है कि यह एक बहुत बड़ी समस्या है।  

           राजीव गांधी जी ने हैदराबाद की एक संस्था मे कहा था कि यहां से रूपया निकलता है, तो वहां तक केवल 16 पैसे ही पहुंचते हैं। लेकिन आज 16 पैसे तो छोड़िये, दस पैसे भी नहीं पहुंचते। यह भ्रष्टाचार बंद करना चाहिए। यह जो इंडीविजुअल बेनिफिशरी योजना है, उसमें पूरा भ्रष्टाचार होता है। जोशी जी, आप इसका अंदाजा लगाइये और उसका अध्ययन कीजिए। इन योजनाओं का पैसा दिसम्बर तक खर्च नहीं होता। आखिरी महीनों यानी जनवरी, फरवरी और मार्च में टारगेट पूरा करने के लिए खर्चा होता है। आप दस साल का अंदाजा लगाइये, तो वे योजनाएं उन तक पहुंचती ही नहीं हैं। अब बीपीएल की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। गांव की जो उपेक्षा है, वह उपेक्षा आप निश्चित रूप से कम करने वाले हैं या नहीं? इसके अलावा और भी समस्याएं हैं।  –         

          गांवों में शौचालय नहीं हैं। अब भी 60 प्रतिशत लोग हैं जो शौचालय का उपयोग नहीं करते हैं। आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारी महिलाओं को शौचालय के लिए जगह नहीं है, शौच के लिए अंधेरे में जाना पड़ता है। यह हम सभी की विफलता है। मैं किसी को दोष नहीं दे रहा हूं। क्या हम इसके लिए भी कोई योजना बनाएंगे कि हर घर में शौचालय हो? अगर हम इसके लिए योजना बनाएंगे तो मुझे लगता है कि हम गांवों के लिए कुछ मदद करेंगे।  मेरी मांग है कि जो बजट आए, उसमें 70 प्रतिशत बजट ग्राम विकास के लिए होना चाहिए। जोशी जी, मैं आपकी मदद कर रहा हूं। अगर 70 प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं, तो 70 प्रतिशत बजट भी गांवों में खर्च होना चाहिए, लेकिन यह नहीं हो रहा है।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठ जाइए।

          आप मुझे संबोधित करते हुए बोलिए।

श्री गोपीनाथ मुंडे : महोदया, बीपीएल की सूची कहां बनी? सरपंच के घर में बैठकर बनी है। यह कानून है कि गांव की जनरल बॉडी मीटिंग में सारा गांव इकट्ठा होकर यह सूची बनाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। इंदिरा आवास सहित सारी योजनाएं बीपीएल से मिलती हैं और बीपीएल सूची में गड़बड़ी बहुत है। क्या हम फिर इसको लेकर गांव की जनरल बॉडी में जाएंगे? वास्तव में गरीबों की संख्या ज्यादा है, लेकिन यह सूची कब बनी है, कैसे बनी है? सरपंच और ग्राम सेवक ने जो लिखकर दी, यह वही सूची है। गांव की जनरल बॉडी में, जहां गांव की आम जनता बैठी हो, उसमें यह सूची तय होनी चाहिए। हमें यह प्रयास करना चाहिए। पुरानी सूची से हम काम करेंगे तो ठीक नहीं होगा क्योंकि ऐसे लोग हैं जिनका नाम गरीब होते हुए भी बीपीएल की सूची में नहीं है। हम जैसे जनगणना करते हैं क्या उसी तरह बीपीएल के बारे में भी, बीडीओ या एक्सटेंशन ऑफिसर जाकर गांव में मीटिंग करेगा? जो लोग बीपीएल से ऊपर उठ गए हैं, उनको बीपीएल की लिस्ट से निकाल दो और जो सही गरीब हैं उनके नाम बीपीएल लिस्ट में होने चाहिए। उसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए। जब प्रधानमंत्री जी ने जनरल बजट के बारे में उत्तर दिया था, राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में और ग्राम विकास की योजना में अनेक बातें कही गयी हैं। हम गरीब की बात कर रहे हैं, गरीबी के बारे में बोल रहे हैं, लेकिन इस देश की आत्मा गांव में रहने वाले 70 प्रतिशत गरीब हैं और उसके लिए आप बात करेंगे तो वह निराशा में जाएगा। उसके लिए अपनी योजनाओं का अध्ययन करें, योजनाओं में परिवर्तन करके और नई योजना लाकर टाइमबाउण्ड तरीके से काम करें। ये बातें चलती रहेंगी, लेकिन क्या आज ग्रामीण विकास मंत्री जी हमें पांच साल में तीन बातों का आश्वासन दे सकते हैं – पानी, बिजली और सड़क?  आपकी सरकार के चार साल बचे हैं, चार साल में ये चीजें हर गांव में पहुंच जाएंगी, क्या आप ऐसा वादा कर सकते हैं? अगर नहीं करते, तो इन बातों में कोई दम नहीं है। अगर आप यह नहीं करेंगे तो लोगों का गुस्सा आएगा और वे निश्चित रूप से अपना गुस्सा निकालेंगे। आपको फिर से एक बार सत्ता चलाने का अवसर मिला है, हमें उसमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन  उस सत्ता का उपयोग आम आदमी के बारे में बातें करने का, आम आदमी की आशा-आकांक्षाओं को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि सही कदम उठाकर उनका विकास करने के लिए आपकी सरकार करेगी, तो हम उनका स्वागत करेंगे। अगर नहीं करेगी तो हम सड़कों पर उतरकर विरोध करेंगे।

          इसी के साथ मैं अपनी बात को समाप्त करता हूं।

 

 CUT MOTION

SHRI RAJU SHETTI (HATKANANGLE) : I beg to move:

THAT THE DEMAND UNDER THE HEAD DEPARTMENT OF RURAL DEVELOPMENT (PAGE 194) BE REDUCED BY RS. 100

 

Need to construct roads in hilly Teshils like Sahuwadi and Panhala in Kolhapur district of Maharashtra under the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana (26)

श्री तूफ़ानी सरोज (मछलीशहर): महोदया, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

          मेरा यह स्पष्ट मानना है कि जितनी भी सरकारें आईं, सभी ने गांवों की उपेक्षा की है। आजादी के बाद ज्यादा दिनों तक सत्ता में रहने का सुअवसर कांग्रेस पार्टी को मिला है।

 

12.59 hrs.

(Dr. M. Thambidurai in the Chair)

          लेकिन इनकी नीतियों से, इन्होंने जो नीतियां बनाईं, उनकी वजह से शहरों का विकास तो हुआ लेकिन गांवों में रहने वाला गरीब गरीब होता गया। सरकार ने जो भी नीतियां बनाईं, वे शहरोन्मुखी नीतियां रहीं और गांवों को अनदेखा किया गया ।

 

13.00 hrs.

देश की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन कृषि जोत की भूमि जनसंख्या के हिसाब से घटती जा रही है। सरकार इस बात की चिंता नहीं कर रही है। हमारे देश में जितनी जमीन उपलब्ध है, उसमें एक तिहाई भूमि बंजर है। इस समय देश में 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर भूमि में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। उत्तर प्रदेश में ही 80 लाख 61 हजार हेक्टेयर बंजर भूमि है। वहां कृषि योग्य समतल जमीन 3 करोड़ 70 लाख हेक्टेयर मौजूद है। उस जमीन को कृषि योग्य बनाया जा सकता है, लेकिन सरकार उस पर ध्यान नहीं दे रही है। यदि प्रति हेक्टेयर 2500 रुपए अर्थात कुल 9250 करोड़ रुपए खर्च कर दिए जाएं तो उस बंजर भूमि को खेती लायक बनाया जा सकता है।

          हमारे देश में कम से कम 12 करोड़ किसान हैं। अगर एक किसान के पीछ पांच व्यक्ति मान लिए जाएं तो कुल मिलाकर 60 करोड़ लोग शुद्ध रूप से कृषि पर निर्भर हैं। अगर सरकार चाहे तो देश में पड़ी तमाम बंजर भूमि को उपजाऊ भूमि बनाया जा सकता है। कहीं पर ऐसी जमीन है जो बरसात के पानी पर निर्भर रहती है। अगर बरसात होगी तो वहां खेती होगी और अगर बरसात नहीं होगी, तो खेती नहीं होगी। इस पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है।

          मैं स्वास्थ्य के बारे में भी बताना चाहूंगा। आज आप देखें तो गांवों में रात को कोई डाक्टर या नर्स नहीं मिलती है। सरकार द्वारा जो व्यवस्थाएं की गई हैं वे सारी शहरों में ही की गई हैं। शहरों की अपेक्षा गांवों में 15 प्रतिशत भी स्वास्थ्य की, बच्चों के इलाज की व्यवस्था नहीं है। आज भी हमारे देश में दस लाख बच्चे अपना पहला जन्म दिन नहीं मना पाते हैं, जबकि 25 साल से टीकाकरण की व्यवस्था है। लेकिन आज भी हर रोज टीबी से लगभग 1000 लोग और डायरिया से 16500 लोगों की मौत होती है। यह ठीक है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना की मद में थोड़ा इजाफा किया गया है और इस बार 22,300 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है। लेकिन यह धनराशि न के बराबर है।

          पिछले दिनों हमने अखबार में पढ़ा कि सरकार किडनी ट्रंसप्लांट, हृदय रोग और कैंसर जैसे गम्भीर रोगों के इलाज की मुफ्त व्यवस्था करेगी। लेकिन यह सिर्फ सपने दिखाने जैसी बात है। हकीकत यह है कि हृदय रोग, किडनी ट्रंसप्लांट और कैंसर जैसी बीमारियों से ग्रस्त मरीज जो स्वयं इलाज नहीं करा सकते, वे अगर क्षेत्रीय सांसद से प्रधान मंत्री राहत कोष के द्वारा मदद मांगते हैं तो सांसद को लिखित में जवाब मिलता है कि आपका दो का कोटा पूरा हो गया है। मेरे यहां भी एक महीने पहले लिखकर आ गया कि आपके द्वारा जो रिकमंडेशन की गई थी, वह 24 का कोटा पूरा हो गया है, अब आगे आपकी रिकमंडेशन पर कोई पैसा नहीं दिया जाएगा। एक तरफ सरकार कहती है कि हम किडनी ट्रंसप्लांट, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों का मुफ्त में इलाज कराएंगे और दूसरी तरफ हमें इस तरह का जवाब मिलता है।

          इस सदन में जितने भी सांसद बैठे हुए हैं, उनमें से 80 प्रतिशत गांवों से चुनकर आते हैं। उनकी जिम्मेदारी बनती है कि गांव के लोगों की मदद करें। गांवों के लोगों को भी आशा रहती है कि हमारा सांसद हमारी मदद करेगा। गांव में अगर किसी व्यक्ति का बच्चा गम्भीर रूप से बीमार हो जाए तो वह अपने क्षेत्र के सांसद को इलाज के एस्टीमेट  की कापी देता है कि यह पैसा दिलाएं। अगर सांसद पैसा नहीं दिला पाता है और गरीब का बेटा बीमारी से मर जाता है, लोग उसका दुआर करने जाते हैं, उस समय वह यही कहता है कि हमारे सांसद ने हम लोगों के साथ क्या किया, उन्हें क्या दिया। यह हालत इस सरकार की है, पिछली सरकार की भी थी और एनडीए सरकार की भी थी। उसके पहले कोई सांसद जितनी रिकमंडेशन्स करता था, उन पर विचार होता था।

 महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि जहां आप 1 लाख रुपये दे रहे हैं, वहां आप 80 हजार रुपये दीजिए। माननीय बंसल जी आप सुनिये। जहां एक लाख रुपये इलाज के लिए दे रहे हैं, आप वहां 80 हजार 70 हजार रुपये ही दीजिए, लेकिन सांसद जो रिक्मेंडेशन करते हैं, हर रिक्मेंडेशन पर मरीज को पैसा मिलना चाहिए। यह बहुत ही महत्वपूर्ण मसला है, क्यों आप अपने सांसदों की फजीहत उनके क्षेत्रों में करवा रहे हैं। मैं कहना चाहूंगा कि स्वास्थ्य के नाम पर पेपरों में जो बयानबाजी होती है, उसे बंद करके आप हकीकत में आइये, हकीकत में मदद करने की बात करिये।

          शिक्षा का भी वही हाल है। गरीब बच्चों को खिचड़ी खिलाकर शिक्षित बनाया जा रहा है। बच्चे स्कूल जाते हैं लेकिन उनका दिमाग खिचड़ी की हंडिया पर रहता है। क्या आप खिचड़ी खिलाकर गांव के बच्चों को शहरी बच्चों के बराबर ले आयेंगे? किसी को आपने मेल-ट्रेन में बैठा दिया है, किसी को आपने पैसेंजर में बैठा दिया है, फिर आप बराबरी की बात करते हैं? जो एक्सप्रेस ट्रेन में बैठा हुआ है वह पहले पहुंचेगा, जो पैसेंजर ट्रेन में बैठा हुआ है, वह बाद में पहुंचेगा। शिक्षा के बारे में मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि खिचड़ी खिलाना बंद करके, गांव की मूलभूत समस्याओं को देखिये। आज भी गांव में बच्चों को दो-तीन किलोमीटर की दूरी तय करके स्कूल जाना पड़ता है। विद्यालयों की कमी है, शौचालयों की कमी है, अध्यापकों की कमी है, दवाओं की कमी है, इसलिए यह खिचड़ी खिलाना बंद करके अध्यापकों की व्यवस्था कीजिए, अस्पतालों की व्यवस्था कीजिए। इस देश में 24 लाख मंदिर हैं और शिक्षा के मंदिर केवल 14 लाख हैं। जिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार है, मिड-डे मील में लूटपाट है, रोज बच्चे बीमार हो रहे हैं, यह सब आप बंद कीजिए और उस पैसे से गांव में शिक्षा पर ध्यान दीजिए।

          हमारे देश के प्रधान मंत्री जी कहते हैं कि हम 11वीं योजना के अंत तक 9 फीसदी, 12वीं पंचवर्षीय योजना में 10 फीसदी विकास दर दर्ज कर लेना चाहते हैं। कितना ही प्रतिशत विकास दर कर लीजिए लेकिन जब तक गांव के गरीब की थाली में आप रोटी नहीं देंगे, सब्जी नहीं देंगे, तब तक आपकी  9 प्रतिशत या 10 प्रतिशत विकास दर का कोई मतलब नहीं है। योजना आयोग द्वारा गठित विशेषज्ञ समूह जिसे तेंदुलकर रिपोर्ट कहते हैं, इस रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में 37. 2 प्रतिशत गरीब हैं, लेकिन राज्य सरकार का आंकड़ा लेंगे तो इससे दुगने लोग गरीब हैं। तेंदुलकर रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार भी 41.80 प्रतिशत गांव में लोग गरीब हैं और 25.7 प्रतिशत शहरों में लोग गरीब हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो 83 फीसदी लोग गरीब हैं। देश के कुल 110 करोड़ लोगों में से 62 करोड़ लोग ऐसे राज्यों में रह रहे हैं जो विकास में सबसे नीचे हैं। इन पिछड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड जहां देश की एक-तिहाई आबादी रहती है। आज चारों तरफ सूखा पड़ा हुआ, जलस्तर एकदम नीचे चला गया है। हम पूर्वी उत्तर प्रदेश से आते हैं, तीन-चार साल से वहां बारिश नहीं हो रही है। बिहार का पश्चिमी इलाका, उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाका, वाराणासी, गाजीपुर, बलिया, बहराइच जनपदों में पानी की बहुत किल्लत है। मैं आपसे कहना चाहूंगा कि अगर आप रुरल डिवेलपमेंट के प्रति चिंतित हैं तो आप गांवों में पानी लाने का काम करेंगे। मैं कहना चाहता हूं कि झारखंड, पश्चिमी बंगाल, बिहार, उड़ीसा और महाराष्ट्र में नक्सलवाद क्यों आया? जो नीतियां बनाई गयीं, उससे असमानता बढ़ती गयी और उसी का नतीजा है, नक्सलवाद। दिल्ली में नक्सलवाद क्यों नहीं आया? क्यों इन्हीं क्षेत्रों में, इन्हीं प्रांतों में नक्सलवाद आया? जब दिल्ली में अमीर का बेटा खाना खाकर  इंडिया-गेट पर आइसक्रीम खाकर भोजन पचाने आता है ।

 

उसी वक्त पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, बिहार में कलावती जैसी लाखों महिलाओं के बच्चे भूखे पेट पर हाथ रख कर सो जाते हैं, तब निश्चित तौर पर इस देश में नक्सलवाद, आतंकवाद और भय बढ़ेगा। मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि यह असमानता दूर कीजिए। जीडीपी बढ़ाने के बजाय आर्थिक विकास गांवों में करके दिखाइए। गरीबों के खाने की व्यवस्था कीजिए।

 MR. CHAIRMAN : Please conclude.

… (Interruptions)

श्री तूफ़ानी सरोज :गांव के लोगों के लिए शिक्षा की व्यवस्था कीजिए, सड़क की व्यवस्था कीजिए। जो सांसद दोबारा चुनकर आने की इच्छा रखता है, वह गांव के विकास की चिंता करता है। गांवों में छोटी-छोटी सड़कें बनाने की चिंता करता है। आप उसे साल में दो किलोमीटर का काम करने का मौका देते हैं और तमाम दूसरी योजनाओं जैसे नरेगा, मनरेगा आदि में फिजूलबाजी का काम करते हैं।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Shri Sanjay Singh to speak. Nothing else will go on record.

(Interruptions) … *

 

डॉ. संजय सिंह (सुल्तानपुर):सभापति महोदय, मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं कि आपने मुझे ग्रामीण विकास विभाग की अनुपूरक मांगों के पक्ष में बोलने का मौका दिया है। अभी माननीय मुंडे जी ने, जो दुर्भाग्य से अभी सदन में मौजूद नहीं हैं, बहुत-सी ऐसी बातें कही हैं, जो सत्यता से परे थीं। स्वर्गीय श्री राजीव गांधी ने 21वीं शताब्दी के भारत का सपना देखा था। दो-तीन दशक पहले हमारे देश में आटोमोबाइल सेक्टर में जहां केवल फिएट, अम्बेस्डर और महिन्द्रा जीप हुआ करती थी, आज एक लाख रुपए से ले कर करोड़ों रुपयों की गाड़ियां देश की सड़कों पर दौड़ रही हैं। आईटी और दूर संचार सेक्टर में जहां दिन भर काल बुक कर, बातचीत करने के लिए इंतजार करके अपनी दिनचर्या को पूरा करते थे, तब भी काल नहीं लगती थी, लेकिन आज हमारे देश में करोडों की तादाद में एक मजदूर से ले कर बड़े आदमी तक अपनी जेब में मोबाइल ले कर घूमता है। आज आईटी सेक्टर में हिंदुस्तान के अंदर सबसे ज्यादा आमदनी है।

                                                                                                                      ग्रामीण विकास के बारे में बोलने से पूर्व मैं माननीय प्रधानमंत्री और श्रीमती सोनिया गांधी जी का आभार व्यक्त करना चाहता हूं कि उन्होंने ग्रामीण अंचल और ग्रामीण भारत के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है। लाखों, करोड़ों रुपया हमारे ग्रामीण विकास के लिए खर्च हो रहा है। निश्चित तौर पर हम कह सकते हैं कि भारत का विकास गांवों की गलियों से गुजर कर ही सम्भव है। ग्रामीण कृषि प्रधान देश भारत अपने ग्रामीण अंचल को विकसित करने के लिए तमाम योजनाएं बनाई हैं। आज उन योजनाओं के तहत प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, इंदिरा आवास योजना और पेयजल के लिए बहुत सी योजनाएं लागू हैं। भारत सरकार योजना बना सकती है, बजट एलोकेट कर सकती है, लेकिन हम सभी जानते हैं कि इन योजनाओं को लागू करने का काम हमारी अपनी प्रदेश सरकारों का है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के बारे में मैं एक सुझाव माननीय मंत्री जी को देना चाहता हूं। आज एक हजार की जनसंख्या की बस्ती को जोड़ने के लिए, पांच सौ जनसंख्या की बस्ती को जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना है। इस योजना का लाभ वास्तव में अगर हम देश को दिलाना चाहते हैं, तो नदियों के किनारे बहुत से गांव हैं, जो छेटे-छोटे मोहल्लों में, 50-50 या 100-100 घरों की बस्तियां हैं, जो नदियों के किनारे होने की वजह से उबड़-खाबड़ इलाकों में हैं।  वहां और कनेक्टिविटी के लिए सड़कों की आवश्यकता है। माननीय मंत्री जी इस बारे में विचार करें। आज प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में सड़क को पांच साल ही मेन्टेन करने की व्यवस्था है लेकिन मुझे लगता है कि जिस गुणवत्ता से सड़क बन रही है पांच साल बाद इसे मेन्टेन करने की आवश्यकता होगी। इस बारे में विचार कर आप व्यवस्था बनाएं, तो मैं समझता हूं बहुत अच्छा होगा। अभी हमारे एक साथी और श्री मुंडे जी ने भाजपा के बारे में और तमाम बातें कही।

                        नेक ने तो नेक जाना, बद ने बद जाना मुझे,

                        हर किसी ने अपने ही रुतबे में पहचाना मुझे’

आज हर योजना में अच्छाइयां भी हैं और खामियां भी हैं। अगर हम वास्तविकता देख कर चलें और ग्राउंड रिएल्टीज को नजरअंदाज न करें तो मैं समझता हूं आज जो भारत की तस्वीर बदल रही है, निश्चित तौर से यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकार की देन है कि गांव में चमत्कारिक बदलाव आ रहा है। यह सही है कि धन का दुरुपयोग हो रहा है। मैंने अखबारों में  पढ़ा है कि नॉर्थ-ईस्ट से लेकर जम्मू-कश्मीर, साउथ से लेकर असम और गुजरात तक, हर जगह इन योजनाओं के प्रति बहुत बुराइयां भी हैं। इनके बारे में चर्चाएं भी हैं। माननीय मुंडे जी कह रहे थे कि मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, वहां के मुख्यमंत्री ने अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप खोले हैं और उन्हें दंडित किया है जिन्होंने ग्रामीण विकास योजनाओं में घपले किए हैं। मेरा कहना यह नहीं है कि ये घपले पार्टी आधारित हैं। ये घपले वहां हो रहे हैं जहां हम इसे संजीदा तौर से इम्पलीमेंट करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। मैं उत्तर प्रदेश के बारे में थोड़ी देर बाद कहूं तभी अच्छा होगा, नहीं तो सारा समय उसी में जाया हो जाएगा। मैं बताना चाहता हूं कि आज ग्रामीण विकास के लिए 66,000 करोड़ से ज्यादा यूपीए सरकार ने धन आबंटित किया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय गारंटी योजना में 46,000 करोड़ से ज्यादा धन आबंटित हुआ है। भारत निर्माण के तहत ग्रामीण संरचना कार्यक्रम के लिए 48,000 करोड़ रुपए आबंटित हुए हैं। इंदिरा विकास योजना में पहले एक मकान के लिए 25,000 से 30,000 रुपए आबंटित होते थे जबकि आज 45,000 रुपए आबंटित हो रहे हैं और पहाड़ी स्थानों के लिए 48,000 रुपए आबंटित हो रहे हैं। इसमें 10,000 करोड़ रुपए आबंटित हुए हैं। पिछड़े क्षेत्रों की अनुदान निधि लिए 26 प्रतिशत की पहले बजट से बढ़ोत्तरी है और आज 7300 करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं। बुंदेलखंड के बारे में राज्य मंत्री जी ने शुरू से आज तक आवाज उठाई है, इसके लिए भी भारत सरकार ने 1200 करोड़ रुपए आबंटित करके सूखे से राहत दिलाने का काम किया है। मेरे कहने का तात्पर्य है कि आज यूपीए सरकार बहुत संवेदनशील और ग्रामीण विकासोन्मुख कार्यक्रम से हर तरह का प्रयास कर रही है। मैं उत्तर प्रदेश में इंदिरा आवास के बारे में एक बात कहना चाहता हूं, दुर्भाग्य से उत्तर प्रदेश में इन योजनाओं को लागू करने में केवल पार्टी लाइन पर भ्रष्टाचार ही मकसद रह गया है। वहां इंदिरा आवास के लिए जो भी पैसा जा रहा है, वह विकलांगों, दैवी आपदा के लिए पैसा लगाने का प्रावधान  है लेकिन सारा पैसा केवल अम्बेडकर ग्राम योजना में जा रहा है। यह दुर्भाग्य है कि सारे लोग अपनी तकदीर पर विचार करें कि अगर दलितों, पिछड़ों के लिए इंदिरा आवास चाहिए तो उन्हें केवल भगवान भरोसे बैठना होगा, कि काश हमारा गांव अम्बेडकर ग्राम योजना की लिस्ट में आ जाए, तभी कुछ संभावना बनेगी। आज 202 सूची में विकलांगों को लाभ मिला है लेकिन वर्ष 2002 के बाद किसी एक भी विकलांगों को इंदिरा आवास योजना के तहत एक पैसे का भी लाभ नहीं मिला है। दुर्भाग्य है कि अम्बेडकर ग्राम योजना के लाभार्थियों के लिए इंदिरा आवास से वंचित लोगों की विडंबना यह है कि हम इस पैसे का दुरुपयोग अपनी आंखों से देख रहे हैं लेकिन कुछ कर नहीं सकते हैं।

          आज जहां तक पेयजल की व्यवस्था का सवाल है, वहां ‘मनरेगा’ और इंदिरा आवास योजना में यह व्यवस्था है कि सांसदों के सुझाव लिये जाएं और उनसे भी पेयजल के बारे में प्रस्ताव लिये जाएं। लेकिन आज तक केवल बसपा के विधायक और बसपा के सांसद ही इसके जिम्मेदार हैं, इसके अधिकारी हैं। इसके अलावा और किसी भी पार्टी के किसी सांसद को एक भी हैंडपम्प का प्रस्ताव नहीं मिला है।

          मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगा कि …( व्यवधान)

 MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record.

(Interruptions) … *

डॉ. संजय सिंह : जहां तक मेरे लोक सभा क्षेत्र सुलतानपुर का प्रश्न है।…( व्यवधान) मैं माननीय मंत्री जी से विनम्र निवेदन करना चाहता हूं और यह खासकर मेरा दुर्भाग्य है कि हमारे क्षेत्र में गोमती नदी करीब 90 किलोमीटर बहती है और गोमती नदी के तीन-चार किलोमीटर दोनों तरफ आज पानी का स्ट्रेटा दो सौ फीट से भी अधिक नीचे चला गया है। आज वहां पानी की इतनी समस्या और किल्लत है कि जिसके बारे में मैं बयान नहीं कर सकता। मैं मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि सभी सांसदों को, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, उनको अपने यहां पेयजल के लिए कम से कम एक हजार हैंडपम्प हर साल देने की व्यवस्था करें। इसके लिए मैं आपका बहुत आभारी रहूंगा।

          महोदय, हमारे देश में ग्रामीण स्वास्थ्य सुरक्षा मिशन है। मैं दोबारा यह कहना चाहूंगा कि हमारे दारासिंह चौहान और उनके साथियों को कोई तकलीफ न हो, आज ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का जितना पैसा है, वह सारा का सारा पैसा या तो पी.डब्ल्यू.डी. में खर्च हो रहा है या अन्य किसी चीज में खर्च में हो रहा है। इसलिए मैं चाहता हूं कि …( व्यवधान) मैं आग्रह करना चाहूंगा कि आज उत्तर प्रदेश में ग्रामीण विकास की जितनी भी योजनाएं हैं, इनके लिए आप अपने ग्रामीण विकास विभाग से विशेष निर्देश जारी करें, चूंकि उनके और अधिक मानिटरिंग और सुपरविजन की आवश्यकता है।

          मैं अपना सौभाग्य मानता हूं कि एक ऐसी योजना के बारे में बोलने जा रहा हूं, जो आज दुनिया में सबसे बड़े प्रजातंत्र की सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षी योजना है, यह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोगजार गारंटी योजना है। इसके माध्यम से आज देश का बहुत विकास हुआ है। देश में बहुत सारे अशिक्षित और गरीब मजदूरों के लिए योजना में जो हजारों करोड़ रुपया लगा है, इससे निश्चित तौर पर हमारे गांवों की तस्वीर बदलेगी। इससे निश्चित तौर पर हमारे गांवों में इन नागिरकों को अपने आर्थिक अधिकार के लिए, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार के लिए आज हमारे ग्रामीण समाज की तस्वीर अवश्य बदलेगी।

          महोदय, 7 सितम्बर, 2005 को ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम पारित हुआ था। जिसमें उस समय कुछ दिन बाद दो सौ जिले लिये गये। लेकिन सौभाग्य से आज पूरे देश के हर जिले में यह योजना लागू है, जो सामाजिक सुरक्षा को एक अधिकार के रूप में मान्यता देती है। अधिकार सामाजिक सुरक्षा का, अधिकार रोजगार का, अधिकार गांव के आर्थिक चेहरे को बदलने का और इन सबके साथ-साथ अधिकार गांव की सामाजिक संरचना को मजबूत करने का, निश्चित तौर से आंकड़े बताते हैं कि आज इस योजना के लागू होने से अब तक दस करोड़ से अधिक परिवार इससे लाभान्वित हुए हैं। आज बहुत सारे लोग यह कहते हैं कि ये सारे कच्चे काम होते हैं, इनसे जो परिसम्पत्तियां निर्मित हो रही हैं, वे एकदम टैम्पोरेरी हैं। लेकिन इसके लिए मैं माननीय मंत्री जी से चाहूंगा कि जो भी ऐसे काम हो रहे हैं, चाहे तालाबों के या अन्य जो भी काम हो रहे हैं, भविष्य में इन सारे लोगों को उस योजना से जोड़ने की ऐसी कुछ व्यवस्था करें कि वह परमानैन्ट शेप में हों, उनके रख-रखाव की व्यवस्था हो और आज जो हमारा ग्रामीण मजदूर कमजोर है, अनपढ़ है, अनट्रेन्ड है, उसे भी किसी तरह से ऐसी योजना से जोड़ने का प्रयास हो।उ   जिससे कि वह अपने जीवनयापन के लिए कोई परमानेंट व्यवस्था बना सके।

          महोदय, यह पक्की बात है कि यह योजना बहुत प्रभावशाली, महत्वाकांक्षी और पवित्र है, लेकिन निश्चित तौर से आज इसे और भी ज्यादा मजबूत करने का, ट्रंसपेरेंट करने का, इसमें कहीं कोई भ्रष्टाचार की गुंजाइश न हो ऐसी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है। आज हर समय मनरेगा के बारे में तरह-तरह की टिप्पणियां अखबारों, मैगजीनों, टेलीविजन पर आती हैं। आज यह जरूरी है कि भ्रष्ट अधिकारियों और भ्रष्ट कर्मचारियों का इसमें कम से कम दखल हो सके। हमारी ग्राम पंचायतों, जनपदीय स्तर पर ग्रामीण विकास से सम्बन्धित कमेटियों के माध्यम से ही इसे इम्प्लीमेंट कराया जाय तभी हम समझते हैं कि जिस कॉन्सेप्ट और जिस वसूल और सिद्धांत से भारत सरकार ने इस योजना का सृजन किया है, उसे सही रूप में हम जमीन पर इम्प्लीमेंट कर सकेंगे। मैं ज्यादा क्या कहूं, मैं अपने जनपद की ही चर्चा करता हूं, मेरे अपने जनपद सुल्तानपुर में मनरेगा के तहत 5853 कार्य आबंटित हुए। इनमें से 2516 कार्य ही पूरे हुए यानी जो काम आबंटित हुआ, उसमें से 43 प्रतिशत ही पूरा हुआ जबकि इन कामों के लिए 9 दिसम्बर 2009 के आंकड़ों के अनुसार 73.7 करोड़ रूपये आबंटित हुए, 62.64 करोड़ रूपये खर्च हुए यानी 43 प्रतिशत काम हुआ और पैसा 85 प्रतिशत आबंटित हुआ। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि हमारे अपने सुल्तानपुर कांस्टीटय़ूंसी में एक एनजीओ को दो करोड़ से भी ज्यादा रूपये का काम दिया गया। प्रदेश सरकार ने उस पर तीन साल से उस पर जांच बिठायी हुई है। अभी हाल ही में सुल्तानपुर में, माननीय राहुल जी हमारे यहां जिला कमेटी के चेयरमैन हैं, जब केंद्र सरकार से इसकी जांच कराने के लिए दबाव पड़ा तो पता चला कि अगले दिन कुछ अधिकारी और कर्मचारी सस्पेंड कर दिये गये और प्रकाश में आया कि वह एनजीओ प्रदेश के दस-बारह जिलों में करोड़ों रूपये का काम कर चुकी है। ना तो वह एनजीओ रजिस्टर्ड है और ना ही उस एनजीओ का कोई पता-ठिकाना है। खोजने पर पता चला कि उस एड्रेस पर कोई नहीं रहता है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आज आवश्यकता है, आज हजारों, लाखों, करोड़ों रूपया खर्च हो रहा है और आगे यह आबंटन बढ़ता ही जायेगा, घटेगा नहीं, लेकिन कोई ऐसा ट्रंसपेरेंट सिस्टम बनाया जाये जिससे वास्तव में, मैं तो यहां तक कहूंगा, मेरा सुझाव है कि हम जिसे साल में 100 दिन गारंटीशुदा काम देने की जिम्मेदारी लेते हैं, उसे यह विधिक अधिकार है तो क्यों नहीं उसके एकाउन्ट में सीधे पैसा चला जाया करे और उसे बता दिया जाये कि यह काम कर लो। अगर इस तरह का कुछ हो जाये तो बहुत अच्छा होगा। अगर हम मस्टर रोल फर्जी बनाएंगे, हमसे कई लोगों ने, सैकड़ों मजदूरों आकर बात की कि साहब मैंने 10 दिन काम किया और मुझसे 25 दिन के दस्तखत करवा लिये। उसके बाद हमें 5 दिन का एक्सट्रा पैसा दे दिया और 10 दिन का पैसा अधिकारियों और कर्मचारियों ने ले लिया।

          महोदय, मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि कृपया इसके बारे में ध्यान दें। आप पूरे सदन से, हर पार्टी के सांसदों से, देश के हर राज्यों से, नॉर्थ ईस्ट से मंत्री जी, कुमारी अगाथा संगमा जी का स्टेटमेंट मैंने अखबार में पढ़ा कि हमारे इलाके में मनरेगा का कार्य संतोषजनक है। इस तरह से हर जगह होना चाहिए। राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा आदि की खबरें हमने अखबारों में पढ़ी है, हर जगह इसके बारे में क्रिटिसिज्म है। अगर आज हमारे सदन ने, हमारी सरकार ने इस देश की ग्रामीण जनता के लिए, महिलाओं के लिए, तमाम ऐसे मजदूरों के लिए, जिनका कोई ऑर्गनाइज सेक्टर नहीं है, उनका कोई पुरसाहाल नहीं है, कान्सेप्ट और सिद्धांत बनाया है। इसके बारे में इतना फीड बैक जानने के बावजूद भी अगर हम कुछ न करें तो मैं समझता हूं कि हमारे ग्रामीण अंचल के लिए यह बहुत दुखःद बात होगी।

          महोदय, मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि ग्रामीण विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत बहुत सारी महिलाओं के सशक्तिकरण का कार्य हो रहा है।    मेरे अपने जिले रायबरेली और उसके आसपास उत्तर प्रदेश के जिलों में यह काम बहुत संतोषजनक है। मैं मंत्री जी को इस संबंध में मुबारकबाद देना चाहता हूँ कि यह बहुत ही अच्छा काम हुआ। वास्तव में महिलाएँ इतनी समझदार हो रही हैं, इतना उनको ट्रेनिंग दी जा रही है, इतना वे अपनी दिनचर्या और अपना रूटीन इस प्रकार बना रही हैं कि अपने सभी मामले वे स्वयं निपटा रही हैं। वे स्वयं बैंक जा सकती हैं, स्वयं पुलिस स्टेशन जा सकती हैं और स्वयं अपने विकास की योजना बनाकर एसएचजीज़ के माध्यम से अपना सुधार और विकास कर रही हैं। मैं मंत्री जी से कहना चाहूँगा कि उस योजना के बारे में और भी विस्तार करें तथा धन का आबंटन करें जिससे अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो सके।

          महोदय, मैं चाहता हूँ कि आज मनरेगा के बारे में, पेयजल योजना के बारे में, इंदिरा आवास और तमाम जो महिला वृद्धावस्था पेंशन है, विकलांग पेंशन है, इन सब के बारे में आज गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है और यह आवश्यकता है कि इस पैसे का सदुपयोग हो, ज्यादा से ज्यादा लोगों का लाभ हो, उनके द्वारा हमारा ग्रामीण विकास अच्छी तरह से हो सके। मैं समझता हूँ कि आज इसकी महती आवश्यकता है। मैं समझता हूँ कि मंत्री जी इस पर विशेष ध्यान देंगे, यह मेरी प्रार्थना है।

MR. CHAIRMAN : There are about 50 more hon. Members to speak on this subject.  Therefore, it is requested that kindly be brief so that we can call all the hon. Members.  Those hon. Members who want to lay their speeches, kindly place them on the Table of the House.

श्री नीरज शेखर (बलिया):सभापति जी, इतना गंभीर  विषय है और अभी सदन में पक्ष-विपक्ष की ओर से सदस्यों की संख्या ज्यादा नहीं है।  फिर फायदा क्या है? सब लोग अपना साइन करके यहाँ से चले जाते हैं। सब लोगों को हज़ार रुपये चाहिए और साइन करके चले जाते हैं। …( व्यवधान)

श्री दारा सिंह चौहान : ट्रैज़री बैंच के लोग इस मामले पर गंभीर नहीं हैं।…( व्यवधान)

डॉ. बलीराम (लालगंज):सभापति महोदय, आपने मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर चर्चा करने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। हमारा भारत देश गांवों में बसता है। भारत की लगभग 72 प्रतिशत जनता गांवों में रहती है। आज़ादी के 63 साल बीतने के बाद भी आज गांवों की हालत ठीक नहीं है। जो विकास होना चाहिए, आज तक नहीं हो पाया है। मैं आपके माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि उत्तर प्रदेश में जब 1995 में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी तो उन्होंने गाँव के विकास की तरफ ध्यान दिया और एक सर्वेक्षण कराया कि उत्तर प्रदेश में कौन कौन से ऐसे गाँव हैं जिन गाँवों का विकास नहीं हो पाया है। उस समय उत्तर प्रदेश में 1 लाख 30 हज़ार गाँव थे। सर्वे में पाया गया कि 1लाख 30हज़ार गांवों में से 50 हजार गांव ऐसे हैं जिनका कुछ विकास हुआ है लेकिन 80 हजार गांव ऐसे पाए गए जिन गांवों में विकास की कोई किरण नहीं पहुँची थी। उन गांवों में विकास की किरण पहुँच सके, इसके लिए उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री बहन कुमारी मायावती जी ने एक योजना चलाई। उस योजना का नाम उन्होंने रखा डॉ. अंबेडकर ग्राम विकास योजना।

श्री प्रेमदास (इटावा):वह योजना मुलायम सिंह जी ने चलाई थी। …( व्यवधान)

डॉ. बलीराम : अब आपको पता नहीं है, आप बैठ जाइए। …( व्यवधान) अभी आप चुप रहिये, हमें बोलने दीजिए। पांच साल की योजना बनी। प्रत्येक साल 16 हजार गांवों को डॉ. अम्बेडकर गांव के तहत चयनित करना था, पांच साल में 80 हजार गांव इस योजना के तहत चयनित कर लिए जाएंगे। जिस गांव को डॉ. अम्बेडकर गांव के रूप में चयनित किया जाएगा, उस गांव तक पक्की सड़क बनेगी, उस गांव का विद्युतीकरण होगा, उस गांव में विद्यालय बनेंगे, वहां निर्बल और गरीब लोगों को आवास दिए जाएंगे, विधवाओं, वृद्धों और विकलांगों को पेंशन दी जाएगी। इस प्रकार की 24 योजनाएं चलाई गईं। आज जो यह कह रहे हैं कि माननीय मुलायम सिंह जी ने यह योजना चलाई, मैं उन्हें कहना चाहता हूं कि जिस समय डॉ. अम्बेडकर योजना चल रही थी, तो जो लोग आज इस तरह की बात कर रहे हैं, उन लोगों ने कहा कि कुमारी मायावती डॉ. अम्बेडकर योजना के तहत सिर्फ दलितों को लाभ देना चाहती है। उस योजना को बंद करने के लिए इस तरह का कार्यक्रम चलाया।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Other Members cannot interefere now. Only the speech of Shri Baliram will go on record.

(Interruptions) … *

MR. CHAIRMAN: You have already raised your point, now you allow him to speak and whatever is being said by other Members than Shri Baliram is not going on record.

(Interruptions) … *

डॉ. बलीराम : महोदय, मैं आपको बताना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश के गांवों के विकास के लिए उत्तर प्रदेश के कुल बजट का 22 प्रतिशत केवल ग्राम विकास के लिए दिया था। लेकिन केन्द्र सरकार ने गांवों के विकास के लिए जो बजट दिया है, वह पर्याप्त नहीं है, इसलिए मैं माननीय मंत्री जी कहना चाहता हूं कि यदि आप गांवों का सर्वांगीण विकास करना चाहते हैं तो सरकार से ज्यादा से ज्यादा बजट की मांग कीजिए।

          महोदय, आज गांवों में तमाम समसस्याएं हैं, लेकिन आने वाले समय में सबसे बड़ा संकट पेयजल का होगा। सभी लोग इस बात को मान रहे हैं कि यदि तीसरा विश्व युद्ध होगा, तो वह पानी के लिए होगा। इसलिए मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से मांग करता हूं कि सभी सांसदों को कम से कम एक हजार हेण्डपम्प दिया जाए, ताकि वह अपने क्षेत्र में विकास कर सके।

          महोदय, मैं सरकार की उस चिंता से सहमत हूं कि देश में गरीबी और भुखमरी बढ़ी है। गरीबी और भुखमरी दूर करने के लिए उन्होंने महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना चलाई है। इस योजना के तहत एक मानक तय किया गया है जिसके आधार पर सौ रूपये मजदूरी मिलेगी। लेकिन इस मानक के आधार पर कोई भी आदमी मिट्टी नहीं फेंक सकता है। इस कारण से मनरेगा के तहत मजदूरों को पचास रूपये से ज्यादा दिहाड़ी नहीं मिल पा रही है। मेरी मांग है कि इस सौ रूपये की मजदूरी को बढ़ाया जाना चाहिए। क्योंकि दूसरी जगह पर काम करने पर उन्हें सौ रूपये से ज्यादा मिल रहा है। इसलिए इस योजना की तरफ उनका झुकाव नहीं है।

          महोदय, प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना की चर्चा बजट पेश करते समय मंत्री जी ने की थी और उन्होंने कहा था कि ऐसे गांवों पर हम दस लाख रूपये खर्च करेंगे। आप उसे आदर्श गांव बनाना चाहते हैं, क्या आप दस लाख रुपए में आदर्श गांव बना सकेंगे, ये कतई नहीं बना सकेंगे। मंत्री जी, मैं आपसे चाहूंगा कि अगर आप ग्रामीण विकास के मंत्री हैं तो गांवों के विकास की तरफ आपको ध्यान देना चाहिए। उसका जो लागत मूल्य है, दस लाख में कोई विकास नहीं होगा, आपको इसके लिए जनसंख्या के आधार पर कम से कम एक-दो करोड़ रुपए रखने होंगे, तब वह आदर्श गांव बन पाएंगे।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि जो प्रधान मंत्री सड़क योजना है, आपकी गाइडलाइन जरूर यह दी जाती है, लेकिन तमाम राज्यों में जो गाइडलाइन दी जाती है, उसके हिसाब से काम नहीं होता है, सड़कों का चयन नहीं होता है। हमारे जो स्थानीय सांसद हैं, उनसे परामर्श भी नहीं लिया जाता है। इसलिए सख्ती से हर राज्यों को आपको इस तरह का इंस्ट्रक्शन देना होगा कि आप बिना सांसद के परामर्श से कोई भी ऐसी सड़क का चयन करके यहां नहीं भेजेंगे, इस तरफ भी आपको ध्यान देना पड़ेगा।

          सभापति महोदय, हम आपके माध्यम से कहना चाहेंगे कि यह जो गांवों के विकास का मामला है, इसमें सरकार को भी यह चयनीत करना चाहिए। उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश के तमाम राज्य में गरीबी एवं भुखमरी है। उनका कैसे आवास बन सके, इंदिरा आवास बन सके, कैसे वहां सड़कें बन सकें और बिजली लग सके, इसका पूरा प्रबंध करना होगा। अभी हमारे एक माननीय सदस्य कह रहे थे कि जो इंदिरा आवास योजना है, यह सिर्फ अम्बेडकर गांव में हो रही है। उत्तर प्रदेश में बहन कुमारी मायावती जी ने इंदिरा आवास योजना के साथ ही साथ महामाया आवास योजना भी शुरु की है। गांव में बड़े पैमान पर इसे दिया जा रहा है।…( व्यवधान) यह तथागत गौतम बुद्ध की पत्नी का नाम है।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMANlease do not interfere in the speech of the hon. Member.  I would request the hon. Members to take their seats. Let Dr. Baliram speak.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Let him speak. Let him conclude. Dr. Baliram, please try to conclude.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: There should be no discussion amongst Members. I do not want other Members to comment on the speech being made by Dr. Baliram.

डॉ. बलीराम : बहन मायावती जी महामाया आवास योजना के तहत गरीबों को आवास देना चाहती हैं।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि जो केन्द्र सरकार की योजनाएं हैं, वे पर्याप्त योजनाएं नहीं हैं। आपको आवास की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। विधवा, वृद्धा, विकलांग की जो पेंशन है, उसे भी आपको समय से पैसा देना चाहिए ताकि राज्य सरकारें अपना शेयर देकर उसे जनता तक पहुंचा सकें। धन्यवाद।                                                                  

 

 

श्री अर्जुन राय (सीतामढ़ी):सभापति महोदय, ग्रामीण विकास विभाग की अनुदान मांगों पर बोलने के लिए आपने मुझे जो मौका दिया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। मैं मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं, ये बड़े ही रचनात्मक विचार के मंत्री हैं। मंत्री जी ने खास कर इस देश के ग्रामीण इलाकों में विकास के लिए बड़ा ही प्रयास किया है। यह देश दुनिया का सबसे बड़ा डेमोक्रेटिक कंट्री है। गांवो में इस देश की आबादी के 65 से 70 प्रतिशत लोग रहते हैं। सरकार की जो विकास की योजनाएं हैं, दो-तिहाई लोग मेक्सिमम योजनाओं से मेहरुम हैं। मंत्री जी, मैं समझता हूं कि इस बार बजट एलोकेशन में ग्रामीण विकास विभाग को 66 हजार   100 करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध कराई गई। यूपीए का अभी एक साल का समय हुआ है।

          सभापति महोदय, मैं समझता हूं कि सरकार एक-तिहाई धनराशि भी विभिन्न योजनाओं में खर्च करने में सक्षम नहीं हो सकी है। यह देश के लिए बड़ा ही दुर्भाग्य है। 100 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में, केवल 100 लोगों के पास, देश की कुल सम्पदा का एक-चौथाई भाग है और वहीं दूसरी ओर 80 प्रतिशत आबादी की आय 20 रुपए प्रति दिन से भी कम है। गांवों में रहने वाले गरीब, मजदूर और किसान आज भी सरकार की विकास योजनाओं से महरूम हैं। हम आपको बताना चाहते हैं कि ग्रामीण विकास के जो महत्वपूर्ण कार्य हैं, जिनके माध्यम से ग्रामीण इलाकों का विकास करना है। इस देश के जनतंत्र के जो असली रखवाले किसान, मजदूर और गरीब हैं, जिनके बल पर गणतंत्र मजबूत है, उनके विकास के लिए जो योजनाएं ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से आरम्भ की गई हैं, उनमें प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना अत्यन्त महत्वपूर्ण योजना है।

          सभापति जी, आरम्भ में, श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के समय, जब उनके प्रधानमंत्रित्व काल में इस योजना का आरम्भ किया गया, अटल जी के जन्म दिन पर मैं, उन्हें साधुवाद देता हूं और आभार व्यक्त करता हूं, लेकिन इस योजना की जो स्थिति है उसके अनुसार प्रथम फेज में 1000 की आबादी वाले गांवों को सड़कों से जोड़ा जाएगा, फिर 500 की आबादी वाले गांवों को द्वितीय फेज में और पहाड़ी क्षेत्रों के 250 की आबादी वाले गांवों को जोड़ा जाना है। हम आपको बताना चाहते मंत्री जी कि इस योजना को पूरे देश में लागू करने में भले ही आपको सफलता मिली हो, लेकिन बिहार में ऐसा नहीं हुआ। बिहार इस देश का कमजोर और पिछड़ा इलाका रहा है। बिहार की स्थिति आज भी अन्य विकसित राज्यों की तुलना में खराब है। इफ्रास्ट्रक्चर और खासकर सड़कों के क्षेत्र में बिहार की स्थिति आज भी बहुत अच्छी नहीं है, लेकिन जब से वहां श्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार चल रही है, हम लोगों ने बिहार में बेहतर काम करने का प्रयास किया है।

          महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहता हूं कि बिहार में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के अन्तर्गत बनने वाली सड़कों के निर्माण में बड़े पैमाने पर भेदभाव करने का काम किया गया है। मैं समझता हूं कि आप बड़े अच्छे और सज्जन व्यक्ति हैं, आप भेदभाव करने वाले नहीं हैं, क्योंकि मैं आपको व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और आपसे मेरा वार्तालाप भी होता रहता है। मैं भी बिहार सरकार में नीतीश जी के नेतृत्व में ढाई साल तक राज्य मंत्री रहा हूं। इसलिए मैं आंकड़ों की जो सरकारी कलाकारी होती है, जो आंकड़ों का खेल होता है, उससे थोड़ा सा अवगत हूं। मैं आपके ध्यान में लाना चाहता हूं कि बिहार में इस योजना के अन्तर्गत जो सड़कें बन रही हैं, उनमें से बहुत सारी सड़कों का काम रुक गया है। जब भी बिहार सरकार की ओर से केन्द्र सरकार से पत्राचार किया जाता है, तो माननीय मंत्री जी, बड़ी आसानी और सहजता से कह देते हैं कि बिहार सरकार को हमने जो राशि उपलब्ध कराई, उसके अनुकूल उन्होंने खर्च नहीं किया। मैं आपको बताना चाहता हूं कि आपने वहां सड़कें बनाने के लिए भारत सरकार की पांच एजेंसी नियुक्त की हैं जिनमें एन.बी.सी.सी., एन.पी.सी.सी. एन.एच.पी.सी. सी.पी.डब्ल्यू.डी. और इरकॉनं हैं। ये सभी केन्द्र सरकार की एजेंसियां हैं। अगर आप जानकर भी अनजान बनते हैं, तब तो कोई बात नहीं, अन्यथा आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आपकी ये जो एजेंसियां हैं, इन्हें बिहार सरकार, यानी राज्य सरकार से कुछ लेना-देना नहीं है, बावजूद इसके इन सभी एजेंसियों ने काम करना बन्द कर दिया है, क्योंकि आपने उन्हें धनराशि भेजने का काम नहीं किया। आज आपके मन में कहीं इस तरह का भाव है, लेकिन हम आपको बताना चाहते हैं कि बिहार की एक ही एजेंसी सड़क बनाने का काम कर रही है और वह है बी.आर.आर.डी.ए., जिसे 7,500 करोड़ रुपए की लागत से सड़क बनाने की जिम्मेदारी आपने  दी है।     

 बीआरआरडीए ने आपको पत्र लिखकर बताया कि जो सड़कों की स्थिति है और आज जो कार्य आरंभ है, उसमें प्रत्येक माह पांच सौ करोड़ रूपए की जरूरत है।  माननीय मंत्री जी, इसकी जानकारी बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य विभाग ने आपको देने का काम किया कि जो सड़कें बन रही हैं, उनमें प्रत्येक महीने पांच सौ करोड़ रूपए का खर्च है।  अक्टूबर, 2009 में आपसे याचना की गयी कि आप एक हजार करोड़ रूपए उपलब्ध करायें।  महोदय, आपके माध्यम से बड़े दुख के साथ माननीय मंत्री जी से आग्रह करना पड़ता है और बिहार के नौ करोड़ लोगों की आवाज को मैं बताना चाहता हूं कि आपने जनवरी में दो सौ तीस करोड़ रूपए देने का काम किया, पुनः गुजरने वाले मार्च में 120 या 130 करोड़ देने का काम किया।  जब तीन हजार करोड़ रूपए की जरूरत थी, तब आपने मात्र तीन सौ कुछ करोड़ रूपए देने का काम किया।  हम समझते हैं कि यह बिहार और बिहार के नौ करोड़ लोगों के साथ यूपीए सरकार की और आपके विभाग की नाइंसाफी है।  इससे जनतंत्र मजबूत होने वाला नहीं है। 

          हम बिहार में काम कर रहे हैं।  जो केंद्रीय एनएच की सड़कें हैं और अन्य सड़कें हैं, उन सड़कों पर भी बिहार सरकार ने अपने पैसे से, स्टेट के पैसों से काम करने का प्रयास किया है।  हम निवेदन करना चाहते हैं कि बिहार बड़ी ही ऊर्जावान जगह है।  बिहार ने दुनिया को शिक्षा देने का काम किया।  बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय था ।  …( व्यवधान) आपने घंटी बजा दी, क्या मुझे दिया गया समय समाप्त हो गया है?  अभी तो मैंने एक ही विषय पर शुरू किया है। …( व्यवधान) महोदय।

          मैं कहना चाहता हूं कि माननीय मंत्री जी इस पर विचार करें और सरकार को जो भी औपचारिकता पूरी करनी है, सरकार ने वह औपचारिकता पूरी कर दी है।  आज आपके भाषण में हम आश्वासन चाहते हैं।  जिन भी सड़कों का निर्माण कार्य रूका हुआ है, बिहार विकास की ओर बढ़ रहा है, हमारा ग्रोथ रेट फ्रॉम बाटम अपटू-टॉप के नजदीक पहुंच रहा है।  यह आप अच्छी तरह से जानते हैं।  यही कारण रहा कि चालीस सीटों में से एनडीए ने पार्लियामेंट की 32 सीटें जीतने का काम किया है।  माननीय मंत्री जी आपसे निवेदन है कि बिहार की धारा को रोकने का काम न करें।  

          दूसरा महत्वपूर्ण विषय मनरेगा है।  नरेगा योजना बहुत ही महत्वपूर्ण योजना है।  इस योजना के माध्यम से माननीय मंत्री जी आपने ग्रामीण क्षेत्र के अशिक्षित-असंगठित किसान और मजदूरों को रोजगार देने की बात सोची है।  रघुवंश बाबू बिहार के थे, जो पूर्व में मंत्री थे, मैं उनके प्रति भी आभार व्यक्त करता हूं और आपके प्रति भी आभार व्यक्त करता हूं कि आपकी सोच बड़ी ही पोजीटिव है।  मैं आपको बताना चाहता हूं कि भ्रष्टाचार में आंकठ डूबी हुयी इस योजना की दुनिया में भ्रष्टाचार के मामले में भारत को ऊपर उठाने में भारी भूमिका है।  माननीय मंत्री जी आप राजस्थान से आते हैं, जो बुकलेट हमने पढ़ी है, उसके मुताबिक नरेगा योजना में राजस्थान में, जो वर्तमान मुख्यमंत्री हैं, राजस्थान में जितने भी भ्रष्टाचार के मामले आए हैं, उसमें माननीय मुख्यमंत्री जी का जिला, जोधपुर में 48 मामले जांच में पकड़े गए।  आईएएस अफसर से नीचे के तमाम पदाधिकारी उसमें पकड़े गए।  आप उस राज्य के अच्छे मंत्री हैं।  आप अच्छे व्यक्ति हैं।  आप सुलझे हुए व्यक्ति हैं।  आपकी सरकार वहां है और मुख्यमंत्री के जिले में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है, तो फिर पूरे देश में इसको भ्रष्टाचार से मुक्त कैसे कर सकते हैं? …( व्यवधान)

          सभापति जी, दो मिनट में मैं अपनी बात समाप्त करूंगा। जो National हेल्थ मिशन योजना है, उस क्षेत्र में भारत सरकार के प्रयास से मात्र तीस प्रतिशत लोगों को ही स्वास्थ्य सुविधा सरकारी स्तर से प्राप्त हुयी है।

13.54 hrs.

(Mr. Deputy- Speaker in the Chair)

 

इसमें जितने भी इक्विपमेंट्स खरीदे जाते हैं, जो दवाइयां खरीदी जाती हैं, उसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की बात सामने आयी है।  समाचार-पत्रों में छपी खबरों के मुताबिक उत्तर प्रदेश हो या छत्तीसगढ़ हो, सभी राज्यों में इस तरह की गड़बड़ी की बात सामने आयी है।  मैं आपको बताना चाहता हूं कि बिहार में यह योजना इतने बड़े पैमाने पर सफल हुयी है कि माननीय मुख्यमंत्री जी ने बिहार में हेल्थ मिशन के क्षेत्र में एक संचालन समिति का गठन किया।  इसका गठन राज्य स्तर पर और जिला स्तर पर किया गया।  प्रत्येक स्वास्थ्य केंद्र में, सरकार आने से पहले जहां 30 से 40 व्यक्ति एक महीने में इलाज कराने के लिए आते थे, वहां आज हजारों लोग आ रहे हैं।  इनडोर और आउटडोर में बड़े पैमाने पर दवाइयां दी जा रही हैं।  गरीबों को सहूलियत पहुंचायी जा रही है।   आज बिहार विकास की ओर है। हम आपसे आग्रह करना चाहते हैं कि बिहार के विकास को गति देने का काम करेंगे।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।

श्री अर्जुन राय : महोदय, मैं एक मिनट में समाप्त कर दूंगा।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आपने पहले भी एक मिनट के लिए बोला था, अब फिर एक मिनट बोल रहे हैं। जब-जब आपको रोकते हैं, तब-तब आप एक मिनट मांगते हैं। इस तरह पूरा दिन हो जाएगा।

…( व्यवधान)

श्री अर्जुन राय : आपने महात्मा गांधी जी के नाम पर मनरेगा योजना शुरू की है। महात्मा गांधी जी ने बिहार के चम्पारन से ही सत्याग्रह शुरू करने का काम किया था। वह महात्मा गांधी की धरती है, आप उस धरती को इग्नोर करके इस देश को विकसित नहीं बना सकते। यह देश तभी विकसित बन सकता है जब देश के सभी राज्य, सभी इलाके विकसित होंगे।

          समय का अभाव है, इसलिए मैं स्वच्छता के क्षेत्र में कुछ कहना चाहता हूं।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आपका समय समाप्त हो गया है। कृपया अपनी बात समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री अर्जुन राय : बिहार में आज भी 97 लाख परिवार शौचालय से वंचित हैं।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय, थोड़ा और समय दे दीजिए।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अभी आपकी पार्टी के दो सदस्य और बोलने वाले हैं। उन्हें समय नहीं मिलेगा।

…( व्यवधान)

श्री अर्जुन राय : मंत्री जी बड़े ही भले व्यक्ति हैं।  मैं विभाग को आगाह करना चाहता हूं कि निर्मल ग्राम उसे कहा जाता है जिस गांव में लोगों को शौच के लिए  घर से बाहर नहीं जाना पड़े। लेकिन बिहार में गरीबी, लाचारी और बेबसी है। 38 जिलों में से 30 जिले बाढ़ के प्रकोप से प्रभावित रहते हैं। वहां आज भी एक करोड़ के आस-पास परिवार न केवल बीपीएल परिवार बल्कि एपीएल परिवार में भी शौचालयों से वंचित हैं। हम बिहार के मुख्य मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहते हैं कि लोहिया स्वास्थ्य अभियान के तहत, आपने बीपीएल वाले लोगों को 1700 रुपये देने की व्यवस्था की, मुख्य मंत्री जी ने 500 रुपये और देकर बीपीएल के सभी परिवारों को शौचालय बनाने की व्यवस्था दी है। यही नहीं, एपीएल परिवार के लोगों को भी बिहार सरकार ने शौचालय बनाने में 1500 रुपये के सहयोग की व्यवस्था की है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अब आपकी कोई भी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है।

                    …( व्यवधान)*

 

 

SHRI GOBINDA CHANDRA NASKAR (BANGAON): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I rise to support the Demands for Grants relating to the Ministry of Rural Development for the years 2009-10 and 2010-11. The Ministry of Rural Development is consisting of three Departments, namely, the Department of Rural Development, the Department of Drinking Water Supply, and the Department of Land Resources. 

          The Department of Rural Development has played a very important role in this country for the overall development of the rural area of India.  In the most important ways, it may be said that the visions and the objectives of this Department is to implement the various welfare schemes and to correct the developmental imbalances.  

          During 2009-10, the development and welfare activities in our rural areas were continued with unmatched vigour and zeal and taken to new heights with better employment opportunities like Mahatma Gandhi NREGA for a large number of people.

          Regarding connectivity of the rural areas through roads, the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana (PMGSY) has been introduced.  For the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana, crores and crores of rupees are given to the State Governments for better connectivity of the rural areas. But, Sir, in the case of West Bengal, hundreds and crores of rupees have been … (Not recorded)  So, there must be some inquiry held so that the money is used properly for the implementation of the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana.

 

14.00 hrs.

          Sir, for the development of rural people, NREGA has been introduced but in most of the places, this Scheme is a total failure. In most cases, the money provided under this Scheme has been diverted.  Employment has been provided to people for less than 15 days; 22,49,329 households have been provided less than 15 days of employment. 

          As regards unemployment allowance, 2,16,000 man-days in respect of unemployment allowance are due, and only two days of unemployment allowance has been paid in the Burdwan district as reported under MIS. Unemployment allowance is due for all the districts except Darjeeling.

          Now, I come to Muster Roll without payment date. Out of total 33,191 Muster Rolls used, 7,911 Muster Rolls do not have the date of payment. 

          Now, I come to job cards with photographs. Only 0.19 per cent job cards have been photographed under MIS in the State of West Bengal.

          There are several locations with no approved work. More than 500 Gram Panchayats of 91 Blocks, and in 16 districts of the State, no approved work has been entered under MIS.

          Benefit has not been given to the poor people under the Old Age Pension Scheme in West Bengal.  In most of the cases, this benefit has not been given to the poor people in West Bengal, and the people have suffered on account of this.

          The funds of the Scheduled Caste and Scheduled Tribe Department have been diverted to several other Departments for Fixed Deposit Scheme.  The funds provided for the Rural Development have not been properly utilised. 

          Sir, in the last year, 13 Blocks of Sundarbans area have been badly affected by Aila.  For the people affected by Aila, a sum of Rs.1,000 crore has been given by the Central Government but the money has not yet reached the people affected by Aila.  So, I would request the hon. Minister to look into this matter. 

… *

          No Central Government funds have been utilized properly for the rural development of the country. 

          The Scheme for providing 100 days’ job to the rural people is a total failure.  Only jobs have been provided for less than 15 days. 

          The BPL Card Census was first introduced in the year 1997.  A sum of Rs.1,00,062 crore had been allotted for the BPL Card Census.  But in the case of West Bengal, ‘BPL Card’ means ‘CPM Card’.  All the CPM cadres have been included in the BPL Card list.  Those who are actually poor and those who belong to the Opposition Parties have not been included in the BPL Card list.  So, this BPL Card list should be cancelled and a proper survey should be undertaken for the proper utilisation the BPL Cards.

          There is no transparency in the working of the Government.  There is no accountability; there is no audit on this.  South 24 Parganas and East Midnapore districts have been occupied by the TMC workers.  The two Zila Parishads – South 24 Parganas and East Midnapore districts – belong to TMC.  Due to this, the State Government is not giving a single rupee to these two Zila Parishads.  The people in these two Zila Parishads are suffering due to this, and they have been deprived of funds.  So, this has to be stopped.

          Sir, I will have to mention about the land reforms department.  After the implementation of the Land Reforms Policy, nearly about 10,15,000 acres of lands were covered.  During the period between 1967 and 1977, four lakh acres of lands had been distributed to the landless people, to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes, and to the minorities.

          But from 1977, after the Left Front Government came to power, no lands have been properly utilised, and the lands given to the poor people have forcibly been taken away, and this should be stopped. Lands are being given only to the CPI (M) people. The wastelands are given to the CPI (M) people, and there are no records. On the contrary, all the cultivators have been evicted by the CPI(M) people. There has been no proper distribution of land for the last 33 years. So, there is a serious complaint regarding this distribution of lands among the poor people, landless people in West Bengal.

          Next, the Demand for Grants of the Department of Rural Development has been presented to Parliament vide Demand No.81. In 2009-10 Budget Estimates, the allocation under Plan was Rs.1,066,13.13 crore. Recoveries from Plan Budget were Rs.43,943.13 crore. Net Plan Budget was Rs.62,670 crore. Non Plan Budget was Rs.26.95 crore. Net Budget Plan plus Non-Plan was Rs.62,706.95 crore. Percentage in Net Budget was plus 10.24.

          In the year 2009-10, the Revised Estimates were Rs.1,22,438.13 crore.  The recoveries from Plan Budget were Rs.60,293.13 crore. The Net Plan Budget was Rs.62,160 crore. Non-Plan Budget was Rs.41.40 crore only. Why? What is the reason for reduction of 0.81 per cent allocation in 2009-10 Revised Estimates over the 2009-10 Budget Estimates?

          Due to less collection of diesel cess during the current financial year, the Ministry of Finance reduced the Budget allocation of PMGSY by Rs.660 crore in the Revised Estimates for the year 2009-10. This reduction of Rs.150 crore for the BPL survey in the first supplementary demands has to be looked into.

          Sir, next there is so much unspent balance in different Departments.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

SHRI GOBINDA CHANDRA NASKAR: First one, in the SGSY the unspent balance was Rs.718 crore as on 31st December, 2007; the unspent balance was Rs.783.16 crore as on 31st March, 2009; and the unspent balance was Rs.1,142.22 crore as on 31st December, 2009.

          In the case of SGRY, the unspent balance in the year 2007 was Rs.623.40 crore. In the case of IAY, the unspent balance as on 31st December, 2007 was Rs.1,761.12 crore; the unspent balance as on 31st March, 2009 was Rs.6,246.17 crore; and the unspent balance as on 31st December, 2009 was Rs.3,759.84 crore.

           In the case of PMGSY, the unspent balance as on 31st December, 2007 was Rs.2,296.39 crore; the unspent balance as on 31st March, 2009 was Rs.1,264.56 crore; and the unspent balance as on 31st December, 2009 was Rs.2,546.55 crore.

          Sir, what are the reasons for the huge amount of funds lying unspent under all the major schemes of the Department? The Minister must say in his reply what are the reasons for this. Why the unspent balance as on 31st December, 2009 has increased by more than 50 per cent over that of 31st December, 2007? What was the total amount of fund released so far in the last quarter, January-March, 2009-10?

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude. Your time is over.

SHRI GOBINDA CHANDRA NASKAR: Next is, the setting up of Vigilance and Monitoring Committee is a good step. But in how many districts this committee has been functioning? It is reported that most of the District Magistrates are not convening the meeting. In most of the States, they have abolished this. If the Vigilance and Monitoring Committee functions properly, then all the corruption in the schemes for rural development, especially, PMGSY, NREGA would be corrected. So, proper step should be taken.

          The fertile lands should not be acquired. The acquisition of fertile land for any other plant should be stopped. This should be stopped in the case of Singur. They have forcibly occupied the fertile land.  In the case of Nandigram, they have forcibly acquired fertile land. We are opposed to this. We want industry, but not by destroying the fertile land.

          In conclusion of my speech, I support the Demands for Grants placed by the hon. Minister of Rural Development.

 

 

*DR. TARUN MANDAL (JAYNAGAR): Madam/Sir, Thank you for giving me chance to speak on the issues relating to Rural Development and the grants for the Department. First of all, I would like to draw the attention of the House that as development of villages progresses, the difference between villages and towns reduces  In the erstwhile USSR and other communist/socialist countries such examples we observed in the past, which begat to revert again as soon as capitalist economy were regained in those countries. In our country, due to policies followed by, Union and State Governments irrespective of the difference in terms of development parameters are increasing between villages and towns. Take the cases of life expectancy at birth, maternal and infant mortality rates, literacy especially of women literacy are horrible. Due to lack of round the year job of the poor people, they are migrating to cities and towns, causing much hardship to the municipal administration. If there would have been real implementation of 100 days work (NRGES) per BPL family in a year in all States, migration of low economy people did not happen. It is a failure on the part of UPA Government to implement its own scheme.

          On the contrary, beggars and paupers mainly produced from impoverishment of rural population, are thronging over big cities to continue with their mere livelihood, not better than animals. The Civil Government of Delhi State and many other metropolitan city administrations are exporting them, calling them as imported beggars.  Whatever they might be, who are they? Are they not our sons and daughters product of our so called progressive (!) and pro-people(!) policies? Where is your JNNUR mission or Indira Awas Yojna to give them a shelter? Where are the Andotaya Anpurna schemes to take care of their hunger? Where are Government’s different welfare schemes to look after these marginalised people?

          I understand, whatever schemes and yojnas you declare can never stop impoverishment of people, rise in the size of have nots and enhancement of gulf of difference between rich and poor people of the country – in this capitalist exploitative system. Only the relief measures adopted by the Ministries, are also being snatched away in the middle by rampant corruption from top to bottom – denying claims of the genuine we can not hope or dram that Rural Development will eradicate poverty and bring forth prosperity of the majority population, 77% as estimated by Dr.Arjun Sengupta Committee as BPL category, but at least expect that they will be categorised and certified as BPL population. In today’s welfare projects, without BPL identification to derive a single Government scheme is extremely difficult. In the State of West Bengal also and in my constituency area there is rampant corruption and irregularity regarding BPL identification and distribution by the CPI(M) led State Government and mainly benefiting the rich instead of poor people. Rural Development Department should take rectification of BPL list as a Number one task. Similarly Ration Card distribution has not been done to many genuine citizens of India in my area.

          West Bengal State Government under CPI(M) again is playing nasty politics and doing particularly in this regard. Rural Development of Union Government must take care of it also.

          Special Economic Zone (SEZ) should not be promulgated by UPA Government in favour of corporate sectors and multinationals causing displacement, desettlement and increasing BPL list. Those already developed exploiting agricultural lands and denying farmers’ right should compensate with double amount of wasteland development for farming and be distributed to the displaced and have nots.    

          Electricity under Rajiv Gandhi Gramin Vidutikaran Yojna is a soar and failure of the Department, funds allotted and infrastructure not developed to push forth the yojna. Not my constituency, but the whole of rural India will not be electrified even in coming 50 yrs if works run in such slow and irregular pace. Government must see that not only the BPL family areas but all the areas of a village and ultimately all villages be electrified by next two years.

          Indira Aaws Yojna, Pradhan Mantri Gram Sadak Yojna are not being able to keep pace with the target as promised. Due to political partiality and corruption of the ruing State Government, as in West Bengal, genuine people and areas are not getting benefit of it. Union Government should develop supervision mechanism towards implementation of its schemes including the two mentioned by me. I appeal for much more budget at least four times for this Department.

 

                                                                                                   

 

SHRI PULIN BIHARI BASKE (JHARGRAM): Mr. Deputy-Speaker Sir, thank you for giving the chance to take part in the discussion. I would like to speak in Bengali.

*Respected Deputy Speaker Sir, we are discussing the Demand for Grant for the Ministry of Rural Development 2010-11 and I rise to oppose it.  Here, we are talking about development of villages and rural areas.   More than 70% of the population in the country lives in villages.  Development of villages means development of the entire nation and the Ministry of Rural Development has a crucial role to play in this regard.  But this ministry has miserably failed to perform its job successfully even after 62 years of independence.  The Government of India has a policy for the common people, the ordinary man on paper. However it  is actually creating a wide fissure between the poor and the rich. The farmer is becoming poorer and the latter is steadily becoming wealthier.  This is solely due to the policies of the Central Government. What is the real picture of our country?  Even today we have not been able to chalk out a method for preparing an error-free BPL list.   By now a number of commissions has been set up. Prof. Suresh Tendulkar Committee says that 37.2% people are below poverty line whereas the Planning Commission says that the figure is 27.8%.  Again Dr.N.C.Saxena Committee puts up a different report.  Dr.Arjun Sengupta report maintains that 77% of the population earn less than Rs.20 per day. Naturally, this is all due to a faulty BPL criteria. The Government policies are responsible for the discrepancies. BPL list is the basis of various Government schemes such as SGSY, Indira Awas Yojana, old Age Pension Scheme, TSC programmes etc.  What does our Human Resource Development Report say? Regarding malnutrition and Low Birth Rate, Hon. Prime Ministry says that it is a matter of national shame. Infant and Maternal Mortality rates are extremely high.  

 

I was reading an article that says and I quote here –

“Hunger and deprivation affect about 260 million people of our country.  India has 40% of the world’s underweight children and rank 125th among 177 countries in the UNDP Human Development Index.  It is difficult to reduce hunger and poverty by 2015 target under UN’s millennium development goals for sustainable human security and peace.  In 2000 India alone accounted for nearly one fourth, 364 million of the world’s poor.  Infant and maternal mortality rates are worst than those in some countries of Sub-Saharan Africa.”

This is the real picture of our nation.  We also have a very low female literacy rate.  Hon. Finance Minister had said in his Budget speech that 6 crores of illiterate women will be made literate but there is no budgetary provision for this. So in what manner are we going to achieve this target?  There is no mention of this anywhere.

          MGNREGA is one of the most significant programmes of the Government.  Last year, we saw that only 51 days of work was provided.  In 2007-08, 42 days of work was there for the people whereas in 2008-09 only 48 days of work was given. So if there is an increase of only 5 days or 10 days each year then when and how can we provide 100 days of work to the villagers? In 2010-11, Rs.40,100 crores have been allocated but the amount is grossly inadequate.  With this paltry sum, it is impossible to provide 100 days job.  But this has been the policy adopted by the Central Government. So naturally, if we are to achieve our target, the fund allocation has to be raised.  Otherwise the law will have to be changed to declare that only 60 or 70 days of work will be given to the poor people.

          The funds that are released late, do not reach the states in time.  There is a great delay as a result of which the job card holders do not get their payments in due time and the banks also face difficulties.  Government should look into this.

          Issues of malpractices and corruption have been raised every now and then.  An impartial inquiry should be conducted in order to do away with these.  Two districts of West Bengal, Burdwan and North 24 Parganas have received awards from the Central Government.  So State of West Bengal is doing a good job in this regard.  The self-help groups must be entrusted with the work as their performance is always satisfactorily.  Hon. Members have mentioned here that in the newspaper ‘Bartamaan’, which is like gospel truth for my fellow colleagues, it is written that West Bengal has spend Rs.2110 crores for rural development; you can cross check.  This is the report of their ‘friendly’ newspaper.

          The Central Government is constantly changing the names of various schemes. IRDP is now known as National Rural Livelihood Mission.  This kind of rechristening won’t help us much.  The funds are never properly utilized and the targeted beneficiaries are not getting their due.  This is the failure of the Government.  The cost of Indira Awas Yojana has been raised to Rs.48,000 but that does not go with the current cost.  It should be minimum Rs. 1 lakh – this is our demand.  The same story is repeated in the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana. The projects that are sent from the State Government are rarely given priority.  We have to take care of the upgradation  and maintenance of the roads.  The responsibility of maintaining the roads is with the State Government.  But it is not possible for the states alone to undertake such colossal  tasks.  In many places the streets and roads which are more than ten years old are in miserable conditions.  The Central Government should assess the situation and do the needful.

          Regarding the old age pension, I want to say that the name of the scheme is now Indira Gandhi Old Age Pension Scheme under which Rs. 400 is paid.  Rs.200 is contributed by the State Government and Rs. 200 by the Centre.  But this is a meager sum which is not sufficient.  It should be increased.

          As far as land reforms are concerned, we have a law for it.  But the allocated sum of money is not spent in the right manner. Only West Bengal, Kerala and Tripura have been able to successfully undertake land reforms; other states have failed to do so.  We have only 40% land under irrigation.  This percentage has to be increased.  A holistic planning is absent on the part of the Government. Drinking Water scenario is too very bleak.  There is scarcity of potable water and the problem of arsenic contamination.  More investment is necessary for providing safe water to the people and fight the arsenic menace.  Underground water table is depleting day by day but it is being extensively exploited for various commercial, industrial and domestic purposes leading to scarcity of drinking water.  The Government should do something about it.

          There is also lack of monitoring in the panchayati raj institutions.  The Ministry of Panchayati Raj has failed miserably.  You should pay attention to various underdeveloped areas. Backward districts should be given their due share of Backward Region Funds.  The developmental work should be revised in a better manner through monitoring committees at various levels of panchayats.  If these activities are taken up in right earnest then I hope rural development will be possible in the true sense of the term.

          With these few words I thank you.

 

 

 

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर (मुरैना):उपाध्यक्ष महोदय, ग्रामीण विकास विभाग मांग संख्या 81,82,83 अनुदान मांगों पर चर्चा हो रही है। आपने मुझे इस विषय पर बोलने का अवसर प्रदान किया, इसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। देश को आजाद हुए लगभग 62 वर्ष हो गए हैं और निरंतर ग्रामीण विकास पर चिंतन चल रहा है। इस दौरान लम्बा समय देश में कांग्रेस पार्टी का शासन रहा है, लेकिन अगर हम विचार करेंगे, तो हमें लगेगा कि ग्रामीण विकास पर, ग्राम की समृद्धि पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए, उतना ध्यान नहीं दिया गया है। जब ग्रामीण विकास विभाग पर चर्चा होती है और उन योजनाओं के बारे में हम विचार करते हैं, तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि एक रस्म पूरी की जा रही है, क्योंकि गांव विकास की जो योजनाएं हैं, उनके लिए धन का आवंटन है, प्रांतों में धन जाएगा, उसका व्यय होगा, उस व्यय के लेखे यहां आएंगे और लेखे प्रस्तुत किए जाएंगे तथा उसकी समीक्षा हो कर रह जाएगी। मुझे लगता है कि अगर सरकार सचमुच गांव के विकास के लिए चिंतित है, तो ग्रामीण विकास विभाग के ढांचे और योजनाओं में आमूलचूल परिवर्तन की आज जरूरत प्रतीत होती है। जो योजनाएं आज बनी हैं, वे अपने आप में देखने में, कहने में सुन्दर लग सकती हैं, लेकिन उनका असर गांवों में उतना नहीं है, जितनी आवश्यकता गांवों में आज महसूस होती है। कभी-कभी हम उन वर्षों को याद करें, जब देश आजाद नहीं था। उस समय सुविधाएं कम थीं, आवागमन के साधन भी पर्याप्त नहीं थे, बहुत से सरकार के संसाधन भी नहीं थे, उस समय भी गांव का व्यक्ति अधिक सुखी दिखाई देता था, उनमें अधिक भाईचारा दिखाई देता था। उस समय गांव अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोजने में आत्मनिर्भर था। लेकिन 62 साल की आजादी के बाद वह अपनी समस्याओं का समाधान खोजने में सरकार के ऊपर निर्भर है। सरकार समाधान की तरफ ध्यान नहीं देती है और लगातार उसकी परेशानी बढ़ रही है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि धीरे-धीरे गांव से लोगों का पलायन बढ़ता जा रहा है। इसके दो दुष्परिणाम होने वाले हैं। अगर गांवों से पलायन बढ़ेगा, तो शहरों मं भीड़ बढ़ेगी। अगर शहरों में भीड़ बढ़ेगी, तो भीड़ अनियंत्रित होगी। भीड़ ज्यादा होगी, तो झुग्गियां ज्यादा बनेंगी। लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा, तो देश में अपराध बढ़ेगा। अगर ज्यादा मात्रा में लोगों का गांवों से शहरों की तरफ पलायन हो गया, तो हमारे भारतवर्ष की अर्थव्यवस्था जो पूरी की पूरी कृषि पर आधारित है, वह अर्थव्यवस्था भी आने वाले कल में चौपट हो जाएगी। एक व्यक्ति जब गांव से निकल कर शहर में आ कर बस जाता है, फिर वह खेती करने के मतलब का नहीं रहता है।    अगर खेती चौपट हो गई तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? हमें इस पर विचार करना चाहिए।

 

          आजादी के 62 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, आज भी कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार है, मुझे प्रसन्नता है कि रोजगार का अधिकार देने के लिए रोजगार गारंटी योजना यूपीए सरकार ने आरंभ की। रोजगार गारंटी योजना निश्चित रूप से बहुत महत्वाकांक्षी योजना है, रोजगार गारंटी होनी चाहिए, शिक्षा की गारंटी होनी चाहिए। देश में लोगों को रोजगार की गारंटी भी मिली लेकिन आज इस योजना का जितना प्रतिफल आना चाहिए वह नहीं आ रहा है। रोजगार गारंटी योजना भी अगर बाकी योजनाओं की तहर रस्म अदायगी पर चलेगी तो इसके परिणाम नहीं आ पाएंगे, पैसा व्यय होता जाएगा और आने वाले समय में हम जिस परिणाम की अपेक्षा कर रहे हैं, वह संभव नहीं हो पाएगा। मुझे प्रसन्नता है कि माननीय मंत्री जी और राज्य मंत्री जी, दोनों ऐसे प्रांतों से आते हैं, जो गरीब और पिछड़े हैं, जहां ग्रामीण आबादी ज्यादा है। वे विवादों और सदस्यों की भावनाओं को ठीक प्रकार से समझेंगे। आज भ्रष्टाचार की चर्चा हुई है। मुझे लगता है कि कई बार बहुत चर्चाएं राजनीति की सगल बनकर रह जाती हैं। हम अगर राज्य में सरकार में हैं तो हम भ्रष्टाचार की चर्चा कम करेंगे और अगर हम राज्य में नहीं हैं तो ज्यादा होगी, यह राजनीति का रिवाज बन गया है। रोजगार गारंटी योजना के लिए जो पैसा खर्च हो रहा है उसका अधिकाधिक सदुपयोग हो। जो प्रांत इसका ठीक प्रकार से क्रियान्वयन कर रहे हैं, उन प्रांतों में ठीक प्रकार से सरकार आबंटन दे और केंद्र सरकार उन्हें सहयोग दे तो निश्चित रूप से आने वाले समय में अच्छे परिणाम आएंगे। आज हम रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से एक मजदूर को सौ दिन का रोजगार देते हैं। हमने सौ दिन के रोजगार की गारंटी दे दी लेकिन 265 दिन मजदूर क्या करेगा? इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से हमने यह सुनिश्चित कर दिया कि उसे सौ दिन का रोजगार देंगे लेकिन सौ दिन के बाद उसे रोजगार नहीं मिलेगा। जो मजदूर सौ दिन के लिए मजदूर है वह 265 दिन के लिए भी मजदूर रहेगा। वह आगे 60 वर्ष भी जिएगा तो भी मजदूर ही रहेगा। हमने यह गारंटी भी इस योजना के माध्यम से दे दी है। मैं आपके माध्यम से अनुरोध करना चाहता हूं कि रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से व्यक्ति का स्तर बढ़े, समृद्धि बढ़े, क्रय शक्ति बढ़े ताकि वह उन्नत जीवनयापन करने की स्थिति में आए तब तो हम निश्चित रूप से सही मायने में ऐसा मान सकते हैं कि गांव में रहने वाले व्यक्ति के जीवन को उन्नत किया है। मैं चाहता हूं कि सौ दिन की मजदूरी को प्राथमिक रूप से दो सौ दिन की मजदूरी देने के लिए सरकार को प्रयत्न करना चाहिए। मैं जानता हूं कि जब दो सौ दिन मजदूरी की बात करेंगे तो पैसा लगेगा। यह आपके लिए कठिन काम हो सकता है। आपके सामने पैसे की कठिनाई हो सकती है लेकिन 62 साल बाद के मजदूर के जीवन के बारे में विचार कर रहे हैं इसलिए हमें कहीं से भी पैसा काटकर इस योजना में जोड़ना चाहिए तभी इसके परिणाम आएंगे।

          महोदय, मजदूरी के भुगतान के बारे में शिकायतें कई स्थानों पर आती हैं। आप देखेंगे कि जब हम कई क्षेत्रों के प्रवास पर जाते हैं, गांव के लोग कहते हैं कि दो महीने हो गए हैं लेकिन हमें मजदूरी नहीं मिली है। हम संबंधित अधिकारी को फोन करके कहते हैं कि इन्होंने काम किया है, दो महीने हो गए हैं, मजदूरी क्यों नहीं मिली? तो वह कहते हैं कि आबंटन नहीं है। इस तरह से हम किसी स्थिति में नहीं रहते हैं। दो महीने तक उसे आबंटन नहीं मिलता है तो उस पूरे क्षेत्र में इस बात की चर्चा चलती है कि अधिकारी पैसे खा रहे हैं इसलिए हमारा पेमेंट नहीं हो रहा है, फलां पैसे मांग रहा है, पैसे दे दिए जाएं तो पेमेंट हो जाएगा और जो पैसा नहीं देता है उसका पेमेंट नहीं होता।

          दूसरी तरफ आपने भी यह व्यवस्था की है कि बैंक के जरिये मजदूर को भुगतान किया जाए। यह बहुत अच्छी व्यवस्था है, मैं इसका स्वागत करता हूं। जब हम यह तय कर रहे हैं कि बैंकों के माध्यम से मजदूरों का भुगतान हो तो बैंकों की स्थिति भी हमें देखनी चाहिए। इस देश में लाखों गांव हैं और उन लाखों गांवों में रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से काम चल रहा है। लाखों मजदूर उसमें काम कर रहे हैं। परंतु वहां तक बैंक की पहुंच है या नहीं, यह भी देखना चाहिए। इस बात को भी दो-तीन साल हो गये। लेकिन लगातार यह परेशानी आ रही है। आप भी जब विभाग की बैठक करते होंगे, अन्य प्रांत के अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श करते होंगे तो यह परेशानी आपके सामने भी आती होगी। आज बैंकों की संख्या नहीं बढ़ी है। बैंकों का कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नीचे तक नहीं पहुंचा। बैंक आज भी उतने ही हैं और रोजगार गारंटी योजना का करोड़ों रुपया उनके माध्यम से पेमेन्ट होगा। यह हमने निर्णय कर लिया। इसके कारण लोग बैंकों में लाइनों में खड़े रहते हैं। बैंक गांवों से 20-25 किलोमीटर दूर है। पचास मजदूर आकर बैंक पर खड़े हैं। बैंक का आदमी अपना काम कर रहा है और वह बीस लोगों को पेमेन्ट करता है और बाकी लोगों से बोल देता है कि आज समय नहीं है, बाकी तीस लोग कल आइये। एक मजदूर गांव से चलकर किराया खर्च करके अपनी मजदूरी लेने गया और उसे तीन बार आना और जाना पड़ा तो उसके पास मजदूरी में से क्या पैसा बचा। यह भी सरकार के सामने एक विचारणीय प्रश्न है। इस दिशा में भी मुझे लगता है कि सरकार को विचार करना चाहिए। मुझे ऐसा लगता है कि मजदूर की मजदूरी एक सप्ताह के भीतर किसी भी कीमत पर उसे प्राप्त हो जाए। यह केन्द्र सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए।

          मेरा इस मामले में एक सुझाव है कि आज जब हम मजदूरो को रोजगार देते हैं तो हमने उनकी संख्या पचास तय कर रखी है। अब अगर किसी गांव में दस मजदूर हैं और वे सौ दिन का रोजगार मांग रहे हैं, हम उन्हें रोजगार दे सकते हैं। लेकिन पचास मजदूर का समूह नहीं है तो उन्हें रोजगार नहीं मिल पा रहा है। ऐसी स्थिति में जिन्हें रोजगार चाहिए, परंतु उन्हें रोजगार नहीं मिल पा रहा है। यदि उन्हें रोजगार देना है तो पचास मजदूर कहीं न कहीं से जनपद के सीईओ और बाकी लोगों को एकत्र करके वहां पचास का एक समूह बनाना पड़ेगा, फिर वह मामला फर्जी हो जायेगा और उसमें भ्रष्टाचार हो जायेगा। मुझे लगता है कि पचास के समूह के स्थान पर हमें यह तय करना चाहिए कि दस मजदूरों का समूह भी हो तो उन्हें रोजगार गारंटी योजना के तहत काम दिया जायेगा। मैं समझता हूं कि यदि इस दृष्टि से हम विचार करेंगे तो ठीक रहेगा।

         महोदय, महिलाओं के लिए भी हमने प्रावधान किया है, लेकिन आज रोजगार गारंटी योजना में वह व्यवस्था कहीं होती नहीं है। इसलिए अगर पांच महिलाएं जहां काम कर रही हैं तो उनके बच्चों के लिए जो व्यवस्था सरकार ने नियत की है, वह व्यवस्था यदि होगी तो ठीक रहेगा।

          दूसरी बात मैं कहना चाहता हूं कि इंदिरा आवास योजना हमारी बहुत अच्छी योजना है। लेकिन आप सब भी व्यवहार में यह महसूस करते होंगे कि जब हम उसका आबंटन देते हैं तो उस आबंटन के अंतर्गत प्रत्येक प्रदेश में एक ग्राम पंचायत में एक आवास आता है। आजादी के 62 सालों के बाद भी हम एक गांव को एक ही आवास दे पा रहे हैं और उस आवास के लिए भी अल्प राशि दे पा रहे हैं। आखिर वह दिन कौन सा होगा, जिस दिन इस हिंदुस्तान के आवासहीन व्यक्ति को केन्द्र सरकार छत उपलब्ध करायेगी। अगर हम लगातार इसी प्रकार से एक आवास देते रहेंगे तो मुझे लगता है अभी तक 62 साल व्यतीत हो गये और आगे 162 साल अभी और लगेंगे, जब हम हर आदमी को छत दे पायेंगे। लेकिन जब आखिरी आदमी को छत मिलेगी तो पहले आदमी का मकान टूट जायेगा और फिर वह आवासहीनों की संख्या में आ जायेगा।

          मैं मंत्री जी का ध्यान इस ओर भी आकर्षित करना चाहता हूं कि इंदिरा आवास की दृष्टि से एक तथ्य मैं आपके ध्यान में और लाना चाहता हूं कि मध्य प्रदेश में 23 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है, वहां 45 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं। लेकिन आपके विभाग ने जब मध्य प्रदेश के बारे में विचार किया तो कुछ लोगों ने यह लिखकर भेजा कि मध्य प्रदेश में गांवों में कवेलू वाले मकान बने और कवेलू को यहां अंग्रेजी में ट्रंसलेट कर दिया कि वहां टाइल्स वाले मकान बने और टाइल्स के कारण वे आवासहीन की श्रेणी से खत्म हो गये। अब यदि आज आप मध्य प्रदेश का कोटा देखेंगे,

 

आज हमारे मध्य प्रदेश का कोटा केरल से भी कम है। जैसे कुम्हार गांव में डबले बनाता है, उसी प्रकार से कबेलू भी कुम्हार बनाता है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : उस कबेलू के कारण मध्य प्रदेश के आवासहीन लोग बहुत चिन्तित और परेशान हैं। जब आप समीक्षा करें तो इसका ध्यान रखें कि मध्य प्रदेश के साथ अन्याय न हो। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की बात सभी लोगों ने की है। निश्चित रूप से आजादी के बाद से आज तक एकमात्र यह ऐसी योजना है जिसका असर आम गांव के विकास में दिखाई दे रहा है। इसमें भी आपने आबंटन कम कर दिया है, अपग्रेडेशन के काम बंद कर दिये हैं। अगर यह प्रभावित होगा तो निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा और जिस द्रुत गति से विकास चल रहा है, वह कम हो जायेगा। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में भी मुझे ध्यान आता है कि शुरूआती दौर में जब माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने इस योजना का आरम्भ किया, उस समय सामान्य क्षेत्र के हजार प्लस वाले गांव और आदिवासी क्षेत्र के पांच सौ प्लस के गांव थे। दूसरे चरण में सामान्य क्षेत्र के पांच सौ प्लस के गांव और आदिवासी क्षेत्र के ढ़ाई सौ प्लस के गांवों की व्यवस्था की थी। इस व्यवस्था को भी अभी बदला गया है। अगर आम गांव तक हम सड़क पहुंचाना चाहते हैं तो निश्चित रूप से हमें और नीचे तक जाने की आवश्यकता है।

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : महोदय, ऐसा मुझे लगता है। प्रधानमंत्री सड़क योजना में भी आबंटन पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे, जिससे जो प्रांत ठीक से काम कर रहे हैं, वे प्रांत ठीक से काम करते रहें। बुंदेलखंड के विकास के लिए…

उपाध्यक्ष महोदय : श्री पन्ना लाल पुनिया जी।

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : महोदय, मैं दो मिनट में समाप्त कर रहा हूं।

उपाध्यक्ष महोदय : आपने दो मिनट बोला है, लेकिन पांच मिनट हो गये हैं। आपके दो मिनट कितने लंबे होंगे?

श्री गणेश सिंह (सतना):महोदय, माननीय सदस्य ग्रामीण विकास मंत्री रह चुके हैं। इन्हें बहुत अनुभव है।

उपाध्यक्ष महोदय : यह बात ठीक है, लेकिन अन्य बहुत से लोगों को भी अनुभव है।

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर :  महोदय, मैं जल्दी ही समाप्त कर रहा हूं। बुन्देलखंड के विकास की बात को बहुत ही चिंता के साथ यूपीए सरकार ने लिया है। राहुल जी बुन्देलखंड गये, उनके अनेक प्रवास हुए और उसके बाद बुन्देलखंड के लिए पैकेज की घोषणा की गयी। यह घोषणा स्वागतयोग्य है और इसका कोई विरोध नहीं करता है, इसमें कोई आपत्ति नहीं है। जब बुन्देखंड के विकास के लिए आप पृथक से पैकेज दे रहे हैं तो उसमें नरेगा को शामिल कर रहे हैं, उसमें बीआरजीएफ को शामिल कर रहे हैं और आप कह रहे हैं कि बुन्देलखंड के विकास के लिए हम पैसा दे रहे हैं। इन योजनाओं के माध्यम से ही आपने उस पैकेज को बना दिया है। अप्रत्यक्ष रूप से अगर हम देखें तो मुझे ऐसा लगता है कि यह बुन्देलखंड के लोगों को गुमराह करने का प्रयत्न है। 

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर :  महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से यह अनुरोध करना चाहता हूं कि गांव के विकास की दृष्टि से ग्रामीण विकास विभाग को चिन्तन करना चाहिए। मेरा जितना अपना अनुभव है, जितना मैं देश को जानता हूं, उसके आधार पर यह कह सकता हूं कि देश के लिए जितना रक्षा मंत्रालय जरूरी है, जितना कृषि मंत्रालय जरूरी है, जितना गृह मंत्रालय जरूरी है…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर :  उससे कई गुणा ज्यादा ग्रामीण विकास मंत्रालय की भूमिका आवश्यक है।

उपाध्यक्ष महोदय : श्री पन्ना लाल पुनिया जी।

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर : ग्रामीण विकास मंत्री के नाते आपको एक ग्राम विकास की कल्पना करनी चाहिए।

उपाध्यक्ष महोदय : इनका रिकॉर्ड में नहीं जायेगा।

(Interruptions) … *

उपाध्यक्ष महोदय : आपका रिकॉर्ड में नहीं जा रहा है। आप बैठ जाइए।

… (Interruptions) … *

  

 

 

 

 

 

 

 

श्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी):महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर, मांगों पर समर्थन देने के लिए समय और अवसर प्रदान किया है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय अपनी योजनाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुँचता है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आपकी बात रिकार्ड पर नहीं जा रही है। आप बैठ जाइए।

(Interruptions) …*

उपाध्यक्ष महोदय : पुनिया जी, आप बोलिये।

श्री पन्ना लाल पुनिया : माननीय उपाध्यक्ष जी, मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझे समय दिया इस महत्वपूर्ण मंत्रालय की मांगों का समर्थन करने के लिए। ग्रामीण विकास मंत्रालय अपनी योजनाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुँचता है। पहले जब केन्द्रीय बजट पेश होता था तो केवल उद्योंगों में, व्यापारियों में ही हलचल होती थी लेकिन जब से यूपीए सरकार बनी है, पहली और अब दूसरी बार, तब से जन-जन में उसका संदेश पहुँचता है। जन-जन तक उनकी क्रंतिकारी योजनाएँ पहुँचती हैं। आप जानते हैं कि भारतवर्ष में 70 फीसदी जनसंख्या गांवों में रहती है। भारत में करीब 6,27,000 गांव हैं और इनका मुख्य पेशा कृषि है। असली भारत वही है। 70 फीसदी भारत वहीं रहता है। अगर उस 70 फीसदी भारत का विकास नहीं होता, अगर 70 फीसदी भारत आगे नहीं बढ़ता तो पूरा देश आगे नहीं बढ़ सकता यह अहसास यूपीए सरकार ने किया और इसी को लेकर अनेक ऐसी क्रंतिकारी योजनाएँ भारत निर्माण योजना के अंतर्गत अनेक फ्लैगशिप प्रोग्राम हमने शुरू किये। इंडिया शाइनिंग वाले लोग कभी इस बात को नहीं समझ सके। जब इनका प्रचार चरम सीमा पर था तो हिन्दुस्तान के लोग यह सोच रहे थे कि किस देश की बात कर रहे हैं। 70 फीसदी लोग जो गांवों में रहते हैं, वे पशोपेश में थे कि यह विज्ञापन जो चल रहे हैं ये किसके बारे में हैं और आप देख ही रहे हैं कि उसका नतीजा क्या हुआ। मैं मानता हूँ कि भारत ने बहुत तरक्की की है। स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने जो दर्शन दिया था उससे हमारा इनफॉर्मेशन टैक्नोलॉजी सैक्टर विश्व में ख्याति प्राप्त कर चुका है और देश अग्रणी श्रेणी में गया है। आटोमोबाइल सैक्टर हो, टैलीकम्यूनिकेशन सैक्टर हो, इंडस्ट्रीज़ हों, सबमें हम अग्रणी हैं। हमें इस बात का गर्व है कि हिन्दुस्तान ने यह तरक्की की है। लेकिन जो इंडिया और भारत में अंतर है, जो ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्रों में अंतर है, उसको पाटने का प्रयास पहले कभी नही हुआ जो इस समय हो रहा है। आज गांवों में सड़क नहीं हैं जो शहरों में हैं। आज गांवों में बिजली नहीं है जो शहरों में है। आज गांवों में अस्पताल नहीं हैं जो शहरों में हैं। आज अच्छे शिक्षण संस्थान नहीं हैं जो शहरों में हैं। उस दूरी को पाटने के लिए क्या किया जाए इस पर मंथन यूपीए सरकार ने किया और हमारा ग्रामीण विकास मंत्रालय उसमें सबसे अग्रणी है।   इस अंतर को मिटाने के लिए अनेक योजनाएं बनायी गईं। इसमें महात्मा गांधी नरेगा, स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, राष्ट्रीय पेयजल मिशन, इंदिरा आवास योजना आदि मुख्य हैं। इन योजनाओं के लिए 66,100 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। इंटरनल और एक्स्ट्रा बजटरी रिसोर्सिज़ को शामिल करने से यह धनराशि 76,100 करोड़ रूपये हो जाती हैं। इसमें मनरेगा को 40,100 करोड़ रूपये, एसजीएसवाई के लिए 2984 करोड़ रूपये, इंदिरा आवास योजना के लिए 10,000 करोड़ रूपये और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए 12,000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। मुझे इस बात की खुशी है कि जिस विषय पर बहुत दिनों से विवाद और चर्चा हो रही थी, इसलिए बीपीएल सूची के सर्वे के लिए भी बजट में 162 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।

          महोदय, बंजर भूमि के बारे में माननीय श्री तूफानी सरोज जी कह रहे थे कि ऐसी कोई योजना नहीं है जो बंजर भूमि को उपजाऊ बना सके। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि ऐसी योजना है, जिसमें इंटीग्रेटिड वॉटर शेड मैनेजमेंट प्रोग्राम है और इसके लिए 2660 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।

          महोदय, शुद्व पेयजल आपूर्ति कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज गरीब को शुद्व पेयजल भी गांव में नसीब नहीं है। अशुद्व जल अनेक बीमारियों की जड़ है। ग्रामीण पेयजल के लिए 8100 करोड़ रूपये और टोटल सैनीटेशन प्रोग्राम के लिए 1422 करोड़ रूपये का प्रावधान है। महात्मा गांधी नरेगा के बारे में काफी चर्चा हुई। यह वाकई बहुत महत्वपूर्ण तथा क्रंतिकारी योजना है। कुल 10580 करोड़ रुपए का प्रावधान है । मैं समझता हूं कि विश्व में ऐसी कोई योजना नहीं है, जो असंख्य नागरिकों को रोजगार का अधिकार देती हो। इसमें सौ दिन के रोजगार की बात कही गई है। सौ दिन का गारंटिड रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है। मेरा कहना है कि लगभग 160 दिन खेती के समय में किसान या मजदूर मजदूरी  उपलब्ध रहती है। इस तरह से कुल 260 दिन का रोजगार हर परिवार को मिलने की व्यवस्था है। मैं समझता हूं कि अगर आगे इन दिनों को बढ़ाने का औचित्य होगा, तो इन दिनों को और बढ़ाया जाना चाहिए। पांच करोड़ लोगों को रोजगार मिला और सौ दिन का रोजगार प्राप्त करने वालों की संख्या केवल साठ लाख है। यह चिंता का विषय है कि सभी कार्डधारक 100 दिन का रोजगार नहीं पाए हैं । इसका क्या कारण है? इस बारे में मैं आगे बात करना चाहूंगा। एससी और एसटी कामगारों की 51.40 प्रतिशत इसमें भागीदारी है और महिला कामगारों का प्रतिशत 47.81 है। मनरेगा द्वारा दिए जाने वाले प्रति परिवार रोजगार का औसत 52 दिनों का है। वेज कम्पोनेंट 67 परसेंट है और मैटीरियल कम्पोनेंट 27 प्रतिशत है। यह वाकई बहुत क्रंतिकारी योजना है। इसमें सौ दिन का रोजगार निर्धारित है। इसका विशेष प्रभाव यह भी पड़ा है कि मजदूरी कम से कम सौ रुपया करने से गांव में, शहर में मजदूरी की दर बढ़ गई है। अब मजदूर अपनी मजदूरी को नेगोशिएट कर सकता है। वह कह सकता है कि इससे कम मजदूरी पर मैं काम नहीं करूंगा। यह गरीब के लिए अच्छा प्रभाव पड़ा है। यह भी कहा गया कि इस योजना के अन्तर्गत केवल कच्ची मिट्टी का काम होता है, यह बात सही नहीं है। स्थायी सम्पतियों का सृजन भी इसके उद्देश्यों में अब सम्मिलित है। ग्रामीण सड़कों, फ्लड कंट्रोल, वॉटर कंर्जेवेशन, ड्राउट प्रूफिंग और लघु सिंचाई जैसी 43,61,000 नरेगा के माध्यम से योजनाओं में कार्य शुरू हुए हैं। उनमें से 19,52,000 काम पूरे किए जा चुके हैं।

          इनका काम केवल रोजगार देना नहीं है, बल्कि राष्ट्रनिर्माण में स्थाई सम्पत्तियों के निर्माण में भी इस योजना ने अपना योगदान दिया है । स्वर्ण जयन्ती रोजगार योजना, अभी हमारे माननीय श्री गोपीनाथ मुंडे जी कह रहे थे, ऐसा लगता है उन्हें गांवों की कोई जानकारी नहीं है। ये इंडिया शाइनिंग वाले लोग हैं।…( व्यवधान) मैं वैसे ही नहीं बोल रहा हूं। …( व्यवधान) अब आप बहुजन वालों की भाजपा से बहुत सांठ-गांठ है, ये हम सब जानते हैं। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: कृपया शांत रहें, पुनिया जी को बोलने दीजिए।

श्री पन्ना लाल पुनिया : मुंडे जी ने कहा कि इंदिरा आवास में बढ़कर 35 हजार रुपए कर दिए गए हैं और पहाड़ी क्षेत्र के लिए 38,500 रुपए कर दिए हैं हैं। मुंडे जी को जानकारी नहीं है । वास्तव में 45 हजार रुपए हैं और पहाड़ी क्षेत्र में 48,500 रुपए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आम आदमी गांव में रहता है। यह जानकारी होनी चाहिए। यह जानकारी वे खुद कर लें कि आम आदमी गांव में रहता है । हम तो ग्रामीण भारत का विकास चाहते हैं; तभी हमारे ग्रामीण विकास मंत्रालय के द्वारा इतनी क्रंतिकारी योजनाएं लाई गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पता नहीं पीएमजीएसवाई में अब प्रायरटी क्यों बदल गई है। उन्हें इसकी जानकारी नहीं है तो वे जानकारी प्राप्त कर लें। आप इंडिया शाइनिंग वाले लोग हैं। सन् 2002 में जब उन्हीं की सरकार थी तब कोर नेटवर्किंग की गई थी, उसी के आधार पर इस समय भी सड़कें बन रहीं हैं।…( व्यवधान)

उपाधयक्ष महोदय: कृपया समाप्त करें।

श्री पन्ना लाल पुनिया : आज हम इससे त्रस्त हैं और हमने बार-बार मांग की है कि जो पुरानी रूरल कोर नेटवर्किंग है, उसमें तब्दीली की जाए। सन् 2002 में क्या परिस्थितियां थीं और आज क्या परिस्थितियां हैं। आज बहुत सी सड़कें खराब हो चुकी हैं, बहुत से रास्ते नये बने हैं, कुछ मिट्टी के काम हुए हैं, उसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता है। हमने मंत्रालय से बराबर अनुरोध किया है कि कोर नेटवर्किंग में परिवर्तन किया जाए। यह आप ही की बनाई हुई है। वे कहते हैं कि उसमें कुछ प्रायरटी बदल दी गई है। मैं समझता हूं कि प्रायरटी नहीं बदली है, प्रायरटी बदलने की हमारी जो आवश्यकता है, उसके हिसाब से भी विचार करना जरूरी है। मुंडे जी ने यह भी कहा कि पढ़े-लिखे ग्रामीण बेरोजगारों के लिए कोई योजना ही नहीं है। स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना किस के लिए है, ये गांवों के लिए है। स्वर्ण सहायता समूह बना कर सहायता देने के लिए है। इसमें दस हजार करोड़ से ज्यादा अनुदान दिया जा चुका है, बीस हजार करोड़ से ज्यादा ऋण दिया जा चुका है, उनको भी इसकी जानकारी होनी चाहिए। इंडिया शाइनिंग वाले लोग ये जान लें कि ग्रामीण मंत्रालय के अंतर्गत कौन-कौन सी योजनाएं हैं और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को कैसे-कैसे सहायता पहुंचाई जा सकती है। पीएमजीएसवाई के बारे में सन् 2010-11 में 11 हजार आबादी, 35 हजार किलोमीटर सड़क बनाने का लक्ष्य रखा गया है। मैंने निवेदन  किया था कि रूरल कोर नेटवर्क में कहीं आवश्यकता हो, उसमें परिवर्तन करके, मेहरबानी करके जो स्थानीय आवश्यकताएं हैं, उनका भी लिहाज रखा जाए, उन सड़कों को बनाने पर भी विचार किया जाए। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि जो सड़कें प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत बन रही हैं, पता नहीं किस तरह से, कौन सी प्रक्रिया ठेकेदारों को नियुक्त करने की है, वे सड़कें टूटनी शुरू हो जाती हैं, आगे-आगे सड़क बन रही है और पीछे की सड़क टूटती जाती है। बहुत से ऐसे इलाके हैं, जिनमें विशेष प्रावधान किया जाना चाहिए। आरसीसी की रोड बननी चाहिए। जहां हर साल बाढ़ आती है वहां सड़कें टूट जाती हैं। इसलिए उस क्षेत्र में, खास तौर से मैं अपने बाराबंकी की बात कहना चाहूंगा, उसमें सूरतगंज ब्लॉक, रामनगर और सिरोली गौसपुर ब्लॉक है, वहां हर साल बाढ़ आती है। घाघरा की बाढ़ से वहां सड़कें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।   

उस एरिया में पूरी तरह से आर.सी.सी. रोड्स बननी चाहिए।

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।

श्री पन्ना लाल पुनिया : मान्यवर, ये मुझे डिस्टर्ब करते रहे, इसलिए मैं अपनी बात पूरी नहीं कह पाया।

उपाध्यक्ष महोदय : सामने घड़ी लगी हुई है। मैं ऐसे ही नहीं बोल रहा हूं। आपका समय हो गया है। कृपया बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री पन्ना लाल पुनिया : महोदय, मैं समाप्त ही कर रहा हूं। मुझे आपने अपना समय दे दिया, इसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद दे रहा हूं।

          महोदय, अब मैं महात्मा गांधी नरेगा योजना के बारे में बताना चाहूंगा कि यह योजना बहुत अच्छी है, लेकिन इसमें बहुत भ्रष्टाचार है। यह कहा जाता है कि यह योजना मांग पर आधारित है, लेकिन जो बहुत से लोग जॉब कार्ड चाहते हैं, उन्हें जॉब कार्ड नहीं मिले हैं और जिन्हें जॉब कार्ड मिले हैं, वे जॉब कार्ड प्रधान ने ही अपने घर पर रखे हुए हैं या पंचायत सैक्रेट्री ने अपने घर पर रखे हुए हैं। इसके ऊपर अंकुश लगना चाहिए और कोई व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके अनुसार जॉब कार्ड जिनके नाम दिए गए हैं, वे उनके पास ही रह सकें। इस बारे में लोगों को जानकारी भी नहीं है कि किस प्रकार से जाब कार्ड लेने का उनका अधिकार है, जॉब कार्ड मिलने के बाद वे किस प्रकार से काम ले सकते हैं, यदि काम न मिले, तो किस प्रकार से उन्हें भत्ता लेने का अधिकार है। ये सब बातें उन्हें पता नहीं है कि इन चीजों का क्या प्रॉसीजर है। हालांकि मैं उनका आभारी हूं कि मंत्रालय ने एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंसेस 4 परसेंट से बढ़ाकर 6 परसेंट कर दिए हैं, लेकिन फिर भी जो प्रचार होना चाहिए, जो जानकारी होनी चाहिए, जो जागरुकता लोगों में लाई जानी चाहिए, उसके बारे में कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, कृपया समाप्त करें।

श्री पन्ना लाल पुनिया : उपाध्यक्ष महोदय, बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु हैं जिनकी ओर मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित कर रहा हूं।

उपाध्यक्ष महोदय : सभी माननीय सदस्यों के सभी बिन्दु जो सदन में कहे जा रहे हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। मेरा आग्रह है कि कृपया अब आप अपना भाषण समाप्त करें।

श्री पन्ना लाल पुनिया : उपाध्यक्ष महोदय, बहुत जगह तालाब खोद दिए गए हैं, लेकिन वहां पर थोड़ा काम हुआ है और ज्यादा पैसे निकाल लिए गए हैं। चैकों के माध्यम से आपने भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराई है, लेकिन प्रधान लोगों को ले जाता है और कहता है कि चलिए चैक से पैसे निकलवा लाएं, वहां पर चैक से पैसे निकलवाने के बाद पैसे वह खुद ले लेता है और थोड़े से पैसे मजदूरों को दे देता है। इसके ऊपर भी कुछ न कुछ अंकुश लगना चाहिए।

          उपाध्यक्ष महोदय, हैंडपम्प योजना के बारे में, मैं बताना चाहता हूं कि जितने भी हैंडपम्प लग रहे हैं, वे बहुत कम गहराई पर लग रहे हैं। उन पर विशेष नजर रहनी चाहिए, क्योंकि वे कुछ ही दिनों में सूख जाएंगे। मंत्रालय की ओर से बताया गया है कि अब पाइप्ड वाटर सप्लाई पर जोर रहेगा। यह बड़ी अच्छी बात है। हम इसका स्वागत करते हैं, लेकिन गांवों में पाइप्ड वाटर सप्लाई के लिए बिजली कहां हैं?  इसलिए मेरा अनुरोध है कि ऐसी व्यवस्था करें कि सोलर पम्प उसके साथ लग जाएं, तो हमेशा-हमेशा के लिए समस्या का समाधान हो जाएगा।

          उपाध्यक्ष महोदय, अब मैं बी.पी.एल. सूची के बारे में बताना चाहूंगा कि इस साल के बजट में इसके लिए 162 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। पहले वर्ष 2002 में यह सूची बनी थी। आज बहुत से अपात्र लोग उस सूची में हैं और सुपात्र बाहर हैं। इसके बारे में दो कमेटियों की रिपोर्टें भी आई हैं। पहली सुरेश तेन्दुलकर कमेटी और दूसरी एन.सी. सक्सेना कमेटी क्या कह रही है, हम इस झंझट में न पड़ें। हम इन कमेटियों के चक्कर में पड़ें।

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य समाप्त करें।

 

 

15.00 hrs.

श्री पन्ना लाल पुनिया : महोदय, मैं समाप्त कर रहा हूं।

उपाध्यक्ष महोदय :आप बता दीजिए कि कितने मिनट में समाप्त करेंगे।

श्री पन्ना लाल पुनिया  : उपाध्यक्ष महोदय, मैं अपनी बात केवल ढाई मिनट में समाप्त करूंगा।

          योजना आयोग भी उनके झंझट में न पड़े, बल्कि मेरा अनुरोध है कि जिसका कच्चा घर है और जिसको इंदिरा आवास मिला है, उसे हटाते हुए, जिसका कच्चा घर है, सभी को बी.पी.एल. सूची में रखना चाहिए, नहीं तो यह झंझट चलता रहेगा। कोई कैलोरी की बात करता है और कोई सैलरी की बात करता है। इसी झंझट में समय निकल जाएगा और बी.पी.एल. सूची नहीं बनेगी। यहां फूड सिक्योरिटी की बात हो रही है। जितनी हमारी योजनाएं हैं, वे सभी बी.पी.एल. लिस्ट से जुड़ी हुई हैं। इसलिए बी.पी.एल. सूची सबसे महत्वपूर्ण है। अतः इसमें सबसे ज्यादा जोर देकर, जिनके कच्चे घर हैं, उन्हें बी.पी.एल. सूची में शामिल करना चाहिए। बुंदेलखंड में जो पैकेज दिया गया है, उसके लिए हम आभारी हैं। जितनी भी पूर्वान्चल निधि और बुंदेलखंड निधियां दी जाती हैं, उनका उपयोग छोटे-छोटी सड़कें, खड़ंजे और नालियां बनाने में किया गया है,, लेकिन जिस उद्देश्य के लिए वह पैसा यहां से गया, वह उद्देश्य पूरा नहीं हुआ है।

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि जो प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना है, जिसका उल्लेख अभी हमारे डॉ. बलिराम जी ने किया, यह सही है कि अम्बेडकर गांवों में काफी पैसा खर्च हुआ है, लेकिन आजकल अम्बेडकर गांवों में कोई काम नहीं हो रहा है। 10 लाख रुपए प्रति ग्राम दिया जाता है, यह बहुत कम है। मैं स्वयं कह रहा हूं कि यह धन बहुत कम है, लेकिन यदि 10 लाख रुपए दिए गए हैं, तो उनका इस्तेमाल हर गांव में किया जाए। उससे बहुत कुछ  काम हो सकता है।…( व्यवधान)  अगर कोई भी क्रिटिकल गैप डेवलपमेंट में है, तो उसको पूरा किया जा सकता है।  यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि हम इस योजना को लागू नहीं करेंगे। …( व्यवधान) 

उपाध्यक्ष महोदय : कुछ रिकार्ड में नहीं जाएगा।  

 (Interruptions) … *

 (Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair)

 

*SHRI PRATAPRAO GANPATRAO JADHAV (BULDHANA) : Mr. Deputy Speaker Sir, I thank you for giving me an opportunity to speak on the demands for grants pertaining to Ministry of Rural Development.  Many schemes for development of rural areas are implemented by this Ministry.  I would like to speak on a few points pertaining to these demands.  Many Hon. Members have spoken on these demands and made some points.  I will not take more time of the House.

          Sir, through Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana many villages with a population of 1000 to 2000 have been planned to be connected with main roads under the plan of core networking.  However, there are lots of deficiencies in this programme.  Approved proposals are received from the State Governments, which in turn are sanctioned by the Central Government.  But I would like to bring to the kind notice of Hon. Minister that the funds which were sanctioned by the Central Government under PMGSY during 2006-07 for Maharashtra, most of it was diverted by influential Ministers for schemes in their districts.  For example out of 650 crores of rupees sanctioned for Maharashtra during 2006-07 under PMGSY, 100 crores of rupees were spent on Baramati Constituency alone, which is the constituency of Hon. Agriculture Minster Shri Sharad Pawar. 100 crores of rupees were spent in Solapur Constituency of the then Revenue Minister of Government of Maharashtra, Shri Mohite Patil.  Another 100 crores of rupees went to

Wardha district to which the then Pradesh Congress President Smt. Prabha Rao belongs. 

­­­­­­­­­So this scheme PMGSY is meant to please the leaders.  But whether the scheme really helps in connecting the neglected villages to the main roads, I would like to request Hon. Minister to clarify in his reply.

          Sir, national drinking water supply scheme is implemented by this Ministry. I would like to know from Hon. Minister as to what is the success rate of various schemes like ‘Jal Swaraj’, ‘Mahajal’ and ‘Bharat Nirman’ which are meant for drinking water supply.  There is no farsight in planning there schemes. Wells are dug, water tanks are built. But the source of water evaporates quickly and villages have to clamour for drinking water and resort to agitations again.  It is expected that through these drinking water schemes, pure drinking water has to be supplied in the villages.  I would like to know from the Hon. Minster as to what is the availability of drinking water per head. There is acute water scarcity in villages.  Our farmers are reutilizing bath water for feeding the cattle as well due to water scarcity.  While this is the condition of acute water scarcity in villages, people in cities are lavishly using water for taking bath twice a day using at least 100 litres of water for bath.  People in cities use at least 10 litres of water for flushing toilets. But people in villages do not get even half litre water for cleaning toilets.  Have you considered this aspect in your planning?  If this is the gulf between urban and rural areas in the matter of water availability then on what basis are we saying that we are marching ahead towards development.  You have ruled this country and got the votes of people in the rural areas in the name of Mahatma Gandhi.  But it was Mahatma Gandhi who said that India is a country of villages and as long as villages do not develop we cannot claim that our country has developed. Today people in villages are migrating to cities but the Government is loudly claiming its success of NAREGA scheme. The Government is claiming that under rural development scheme it is providing employment to people where they are paying Rs. 100 per day.  Had it been so, why would people in large numbers would have migrated from villages to cities in search of unemployment.  I would like to know from Hon. Minster.  This employment guarantee scheme has proved to be a total failure.

          The Central Government is allocating huge funds to the State Governments for rural development schemes.  I would like to know from Hon. Minister whether he is satisfied with reports that are received from officers or have you made any assessment about is success by appointing various overseeing Committees to find out corruption and taking stock of the situation.  Today MPs do not have any kind of power to oversee these programmes.  Central funds to the tune of 75% or 100% are used in certain schemes.  But MPs are not even invited for inaugurating a foundation laying ceremonies of these projects/programmes.  I would like to point out that when 75% or 100% Central funds are allocated, Members of Parliament should be given due importance while implementing these schemes. If after 5 years an MP is asked about the work he has done, except the funds of 2 crores under MPLADS, he is unable to cite any other developmental work in which he has a role.  The Central Government is allocating funds but its credit is taken by Zilla Parishads or MLAs of that State.  So, I would like to request Hon. Minster to involve MPs in all overseeing Committees of development schemes.  MPs should be given due importance in inauguration of all these schemes.

          Hon. Minster is also representing a Constituency while he represents the whole country.  So I want to say that MPs should be fully involved in overseeing all development schemes.  They should have powers to complain wherever these is default.  Only then MPs will give a good account of themselves after they face electorate after 5 years.

          There was discussion about BPL cards in the House.  It was also pointed out that many self help groups have been granted assistance/loans to the tune of 10,000 or 20,000 cores.  I would like to ask a pointed question to Hon. Minster as to how many BPL families were converted into APL families by giving this assistance of 30,000 crores of rupees to these self help groups.  I would like the Hon. Minister to clarify this. Although there are schemes to remove poverty, poverty is not eliminated.  This is what I would like to point out.

 

 

 

 

 

MR. CHAIRMAN : Nothing should go on record.

(Interruptions) … *

MR. CHAIRMAN : Shri Jeyadurai, please start your speech. You can come in front and speak.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Nothing else should go on record. Shri Jeyadurai, you can start your speech.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN (SHRI FRANCISCO COSME SARDINHA): Hon. Member Shri Jadhao, nothing is going on record. Please sit down.

(Interruptions) … *

MR. CHAIRMAN : Hon. Member Shri Jeyadurai, please stick to time. There are other hon. Members also who want to speak.

                      

*SHRI S.R. JEYADURAI (THOOTHUKKUDI):  Mr. Chairman, Sir, first of all, I would like to express my heartfelt thanks for giving me an opportunity to speak in this discussion on the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development for the year 2010-11. For the first time now, I have got an opportunity in this 15th Lok Sabha to commence active participation with my maiden speech. I hail from a very remote hamlet with just 50 houses and I thank our party Dravida Munnetra Kazhagam to have picked me up from that rural background to the fore. I thank our leader Dr. Kalaignar Karunanidhi who is also the Chief Minister of Tamil Nadu which is setting a model in governance for other States in implementing several social welfare measures for the benefit of the people.

          Tamil Nadu is now leading every other State in the efficient implementation of Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Programme and it is being ably carried out by our Deputy Chief Minister hon. Thalapathi Thiru Mu. Ka. Stalin and I thank him for selecting me to represent Thoothukkudi constituency. I also thank our party’s Southern Region Organising Secretary and the hon. Union Minister of Chemicals and Fertilisers Anja Nenjar Thiru Mu. Ka. Azhagiri who has enabled me to romp home to victory. Let me also thank our esteemed Poetess Kanimozhi, MP at this juncture. I also express my deep gratitude to the people of my constituency and the cadre of my party and also the workers of alliance parties who have overwhelmingly elected me to represent them in this august House.

          I welcome and support the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development on behalf of our party and on my own behalf.

          India has thousands of villages. “India’s soul lives in its villages”, said Mahatma Gandhi. It is only the growth of villages that contribute to the growth of a country.

          My Lok Sabha constituency has got overwhelming number of villages. There are 408 Gram Panchayats with 1,903 remote village hamlets. I hail from one such remote hamlet and hence it is appropriate that I speak on this occasion about rural development.

          Rs. 65,084 crore has been allocated for MGNREGP, SJGSY, IAY and PMGSY. National Drinking Water and Total Sanitation Programme have been allocated with Rs. 10,580 crore. Rainwater Harvesting and Wasteland Development have got Rs. 2,658 crore. I would like to appreciate the Government for this allocation which seeks to transform our villages.

          MGNREGP has been received well by the rural population. The American Foreign Secretary referred to the implementation of this programme in India in the G-20 Summit. She has also exalted the other developing countries to follow the measure adopted by India.

          In Tamil Nadu, this 100-day job guarantee scheme is being successfully implemented. Even our Supreme Court has commented that other States must emulate the example set by Tamil Nadu in implementing this people-oriented scheme in which Tamil Nadu is way ahead of others.

          When our leader Dr. Kalaignar was in power in Tamil Nadu during 1971-76, he created a record that there is no village in Tamil Nadu without electricity. It was he who started in the South free distribution of power for agriculture. Between 1996 and 2001, during his 4th stint as Chief Minister, almost all villages got concrete roads. The Government of Tamil Nadu has been carrying out rural development programmes to ensure integrated growth of rural areas through Anna Marumalarchi Thittam and Namakku Naame Thittam.

          In this year, Tamil Nadu Government has taken up a massive scheme of constructing 21 lakh pucca houses replacing thatched hutments. Three lakh such houses will be constructed in the first phase of the programme this year. Hence I urge upon the Union Government to allocate adequate funds as per the recommendations of the 13th Finance Commission.

          At this juncture, I would like to put forth a demand on behalf the agriculturists and agricultural workers in the rural areas. In some places, the agriculturists have to walk more than 2 to 3 kilometres to reach their fields carrying on their heads the agricultural implements and inputs. In order to help them move easily their materials like seeds and fertilizers and also to help them move away from the fields the agricultural produce, link roads from the fields may also be contemplated. This will go a long way in helping the farmers expressing our deep concern for them and their well being.

          We must also ensure that all the villages get telecommunication link to maintain contact and communication with the outside world.

          Our country is competing with both the developed and developing countries. In order to add pace to the growth and to emerge as a power to reckon with, we must provide every village amenities and facilities on par with the towns and urban areas. This will help us to grow as a strong nation.

          On behalf of our party, Dravida Munnetra Kazhagam, I would like to thank the Union Government for allocating Rs. 89,340 crore towards rural development. Reiterating my demand to allocate more funds for Tamil Nadu, let me conclude my maiden speech. Thank you.

 

SHRI NITYANANDA PRADHAN (ASKA): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me an opportunity to speak on behalf of my party BJD.

          Rural development is a very vast subject and it covers almost every aspect of life in rural areas and, to some extent, in urban areas also. I was just going through the papers, specially the Reports of the Standing Committee on Rural Development and the Reports are sufficient to indicate that the Ministry is not functioning properly. There has been a lot of budgetary allocation, but it is not spent fully and at the end of the year it is surrendered. So, the Reports of the Standing Committee are quite sufficient and rather it is a warning to the Government to indicate that this Ministry should function properly. This is a Ministry just like a ‘monarch of all I survey’. This Ministry must be bifurcated into many smaller departments, according to me, so that the work can be facilitated.

          Now, as far as PMGSY is concerned, it is regulated from the Centre. There are checks and balances everywhere, but that is not the case in respect of water supply. So, I request the Minister that some monitoring mechanism must be evolved even in respect of drinking water supply which is most vital for the life of the rural people. Now, everywhere you see scarcity of drinking water. In my State of Orissa, scarcity of water is so acute that the people of my State sometimes have to travel 10 to 12 kilometres to fetch water and that too dirty water. So, I request that some mechanism must be evolved by the hon. Minister and the Ministry to arrest the drinking water problem. They should monitor it from the Centre so that just like PMGSY, the work will be facilitated and done properly.

I am not going to touch the other aspects, but I would humbly submit that in my State, the PMGY expenditure is more than what is given to the State of Orissa.  They have already spent whatever money was allotted to them and apart from that they have spent more from the interest portion of the amount.  So, I would request that sufficient funds must be given to my State.

          Yesterday, the hon. Chief Minister of Orissa, Mr. Naveen Patnaik, met the hon. Minister and he has also stated this fact that money must flow to Orissa, at least, keeping in view the problem of naxalism sufficient funds must be given to that State so that the road connectivity can be maintained.  It would be helpful for maintaining the law and order.  I hope the hon. Minister would look into the matter.

          Apart from that there are several other schemes, like Mahatma Gandhi Rozgar Yojana and all that.  They must be properly monitored because in many cases we see from the district level meetings that the funds are not being properly utilised.  I hope the hon. Minister would take necessary corrective steps.  I would again request the hon. Minister to do something for improvement of drinking water with a Centrally sponsored scheme or monitoring authority and pipe water supply and tube wells, both, must be taken together very seriously.

         

 

*SHRI K. SUGUMAR (POLLACHI): Mr. Chairman, Sir, on behalf of AIADMK, with the guidance of our incomparable leader Puratchi Thalaivi Amma, let me participate in this discussion on the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development for the year 2010-11. I thank you for giving this opportunity.

          As far as I am concerned, I have had enough of experience in the local body administration as the Chairman of Pollachi Panchayat Union and Coimbatore District Panchayat President apart from being Union Council Member.

          India is a country with hundreds of thousands of villages. The growth of the country must be inclusive of the growth of every village. Only when the rural areas develop, the country can really become a developed one.

          The Government has allocated Rs. 66,100 crore for rural development. Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme gets Rs. 40,100 crore. Another Rs. 48,000 crore has been set apart for Bharat Nirman schemes. Indira Awas Yojana gets Rs. 10,000 crore in this year’s Budget.

          I would like to recall the golden rule that was there when our leader Puratchi Thalaivi Amma was the Chief Minister of Tamil Nadu. It is only during her rule, several Women Self Help Groups were formed creating an awareness among the fairer sex. This was a milestone step that had contributed to women’s empowerment. But today, proper guidance is not available to the Women Self Help Groups. There is a great decline and fall.

          During the rule of our leader, Rainwater Harvesting was successfully carried out. All the panchayats were also involved due to which several tanks came about, old tanks were desilted and rain water was effectively harnessed increasing the ground water table. But the today’s rulers in Tamil Nadu have neglected the need to augment the ground water potential by way of harvesting rain water in a proper manner.

 

          It is more than 60 years now that we have won freedom. Even today, women are not getting adequate sanitation and toilet facilities in our villages. Most of them are still forced to go to the open. When our dynamic leader was there, she wanted to put an end to it and she constructed many public toilets in several places. Even private sector were encouraged to construct toilet complexes. But today, this is being neglected. Such toilet complexes go without water also defeating the very purpose of setting them up to ensure sanitation and indirectly the health of all, especially the women.

          MGNREGS has resulted in creating a situation witnessed in villages as problem for it has become very difficult to get agricultural labour. This has affected our agriculture in a big way. In order to protect agriculture and agriculturists, the Government must evolve a scheme to link agricultural activity with jobs that come under MGNREGS. This would help the Government to provide jobs to the needy poor not only for hundred days, but throughout the year.

          Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana needs to be streamlined and even the agricultural land must be extended with road connectivity. This would help the agriculturists to move easily the agricultural produce to the market to get effectively a remunerative price. At this juncture, I would like to thank the hon. Minister for involving the Members of Parliament too in monitoring the schemes under this plan. The Minister may also provide such opportunity to the MPs to monitor other Centrally sponsored schemes like MGNREGS.

          Under the Indira Awas Yojana, an allocation of Rs. 45,000 for constructing a pucca dwelling unit is made, but it is not sufficient. It must be enhanced to Rs. One lakh. Only then, the needy poor and the Scheduled Castes will be able to get the benefit. The Government must also ensure that all the needy poor Scheduled Caste people are fully benefited out of this housing scheme. This scheme must be extended to town panchayats also. All the panchayats must have Community Centres, especially to benefit the Scheduled Caste people. Steps must be taken on a war footing in this regard. Even town panchayats must get Community Centres and the Government must act positively in this regard.

          Scheduled Tribe people are deprived of voting during panchayat elections even at a time when they have voting rights to cast their vote in Assembly and Parliament elections. Hence I urge upon the Government to ensure that the Scheduled Tribe people get the right to vote in the local body elections.

          The three-tier panchayat raj system must be changed and it must be made two-tier as it used to be. The Panchayat Union Chairmen and the Town Panchayat Presidents must be elected directly by the people. The present indirect elections allowing the members of these local administrative bodies to elect the President or the Chairman must be done away with.

          When our Puratchi Thalaivi Amma was in power, she had permitted the MLAs to use their Local Area Development Fund to repair and renovate the houses constructed under NREGP and RLEGP. I urge upon the Government to allow and authorize the MPs to utilize the MPLADS fund to allocate for repairing and renovating such housing clusters built under NREGP and RLEGP.

          In Tamil Nadu, the funds apportioned for Centrally sponsored schemes are being diverted and spent on fancy schemes like distribution of free colour TV sets and free distribution of gas stoves. This comes in the way of developmental work. This has been pointed out by the C&AG also.

SHRI A.K.S. VIJAYAN (NAGAPATTINAM): What is wrong if these things are given to all the people?  It is for the benefit of the people.

 

* SHRI K. SUGUMAR: I urge upon the Union Government to monitor effectively and ensure that the Central funds are not diverted and properly spent on developmental work in the rural areas.

          As far as Tamil Nadu is concerned, Vigilance and Monitoring Committee meetings chaired by Members of Parliament are not convened every three months. Even after one year, the Committees have not met in many districts. For instance, in Coimbatore District, the Committee has not met even once during the last year. I urge upon the Government to take appropriate steps to ensure that local bodies function effectively.

          With these words, I conclude.

 

डॉ. ज्योति मिर्धा (नागौर):   सभापति महोदय, आज संसद में ग्रामीण विकास पर चर्चा हो रही है। यह विषय क्यों इतना महत्वपूर्ण है क्योंकि आज 70 प्रतिशत लोग गांवों में बसते हैं। गरीबी की बात जब आती है तो ग्रामीण विकास की बात आती है। शहरों में जो लोग बस गये हैं वे भी गांवों से ही आकर बसे हैं और शहरों में गरीब लोगों की हिस्सेदारी है वह ग्रामीण क्षेत्रों से उठकर आये लोगों की है। शायद हिंदुस्तान में हमेशा से ऐसा नहीं था। सन् 1812 की एक ऑफिशियल रिपोर्ट है जोकि ब्रिटिशर्स के टाइम पर हाउस ऑफ कॉमन्स में पेश की गयी थी। मैं उद्धृत करना चाहूंगी।

 

“A village geographically considered is a tract of country comprising some hundred or thousand acres.  Politically viewed, it resembles a corporation or township. Each village had a full complement of officers and civil servants including one boundary man who preserves the limits of the village, or gives evidence respecting them in case of dispute.  The superintendent of tanks and watercourses distributes the water for the purpose of agriculture.  Under this simple form of municipal Government, the inhabitants of the country have lived from time immemorial.  The boundaries of the village have been but seldom altered and though the villages themselves have been sometimes injured and even desolated by war, famine or disease, the same name, the same limits, the same interests have continued for ages.  The inhabitants gave themselves no trouble about the breaking up and divisions of kingdoms.”

 

 

यह हमारा टिपिकल गांव हुआ करता था, जब तक अंग्रेज नहीं थे। अंग्रेजों के आने के बाद उन्होंने देखा कि जो लैंड कोई भी टिल नहीं कर रहा है, फोरेस्ट लैंड थी, उसे उठाकर उन्होंने फोरेस्ट विभाग को दे दी। अंगौर और गोचर की जो भूमि थी, उसे उठाकर रेवेन्यु डिपार्टमेंट क्रिएट कर दिया। आजादी के बाद से हमारे नेताओं की क्या गलती रही होगी कि आज साठ साल बाद मैंने जो रिपोर्ट कोट की है, उसे सदन में कोट करने की जरूरत पड़ी। उसमें मैं पावर्टी एंड एनवायरमेंटल डिग्रेशन के बीच में रिलेशनशिप बताना चाहती हूं। एक ऐसा रिलेशन जो शायद हमारे नेताओं में से स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने जाना था। उन्होंने 27 स्टैंडिंग कमेटीज़ के सामने स्वर्गीय अनिल अग्रवाल, जो सैंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट के संस्थापक थे, उनकी प्रेजेंटेशन करवाई थी, ताकि लोग समझ सकें, कम से कम नेता समझ सकें कि एनवायरमेंट और पावर्टी के बीच में क्या संबंध है। मैं पालिसी मैटर पर ज्यादा बात करूंगी, क्योंकि इन चीजों के ऊपर हम अपनी सारी पालिसीज़ बना कर ग्रामीण विकास करने की कोशिश करते हैं। जिस दिन से गांव की जमीन का कब्जा लोगों के पास से छूट कर नौकरशाहों के पास आया है। नौकरशाह जमीन को कंट्रोल करते हैं, लेकिन उससे वह किसी भी तरीके से प्रभावित नहीं होते हैं। गांव वाले जो जमीन से प्रभावित होते हैं, वे किसी भी पालिसी मेकिंग में हिस्सेदार नहीं होते हैं। आप जानते होंगे कि वारेन बुफे, जिन्होंने इतना पैसा कमाया और वे अपनी कम्पनी में जो इनवेस्टमेंट करते थे, वे उसके अंदर दो-तीन गाइडिंग प्रिंसीपल्स बताते थे। एक प्रिंसीपल यह था कि जो कम्पनी को चला रहा है, अगर उसके स्टेक्स कम्पनी में नहीं हैं, तो मैं उसका शेयर नहीं खरीदता हूं। आज वही स्थिति हमारे सामने आ रही है कि जो गांव के लोग हैं, उनका जमीन में कोई हक रह ही नहीं गया है कि उनकी जमीन, उनका एनवायरमेंट, उसकी डिग्रेडेशन, उसकी ग्रोथ के बारे में कोई उनसे कुछ पूछे। ग्रामीण विकास की जो भी पालिसीज बनती हैं, वे मुख्यतः दो चीजों पर आधारित होती हैं। हम डवलपिंग इकोनोमी हैं और हमें लगता है कि हमें जीडीपी बढ़ानी है। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत हम चाहते हैं कि कम से कम नौ परसेंट की ग्रोथ होती रहे और इस प्रकार से यह ग्रोथ नौ परसेंट पर चलती रही, तो अगली पंचवर्षीय योजना तक यह दुगुनी हो जाएगी।  हम यह मानते हैं कि शायद इसे इन्क्लूसिव ग्रोथ करते हुए हम इसे डबल कर देंगे कि जो पर कैपिटा जीडीपी है, वह अपने आप डबल हो जाएगी। मतलब गांव के आदमी की ग्रोथ भी अपने आप डबल हो जाएगी। जबकि ऐसा नहीं है। जीडीपी में एक बहुत बड़ी खामी है। जीडीपी में किसी देश की प्रोग्रेस को नापने की क्षमता नहीं है। यह मानना हमारे लिए इसलिए भी जरूरी है क्योंकि दरअसल जीडीपी इनवेस्टमेंट और टोटल कन्जम्पशन होती है, प्लस एक्सपोर्ट माइनस इम्पोर्ट, आपने ऐसा कर दिया, तो आपका जीडीपी निकल कर आ गया। इस जीडीपी में कहीं भी आपके एसेसट्स की डेप्रिशिएशन नहीं है। एक गृहणी सुबह से शाम तक घर में काम करती है, उसकी सर्विसेज को कहीं पर भी एकाउंटेड-फार नहीं है। एनवायरमेंट की जो कॉस्ट आती है, आपके डिग्रेडेशन की जो कॉस्ट आती है, वह कहीं इसके अंदर रिफ्लेक्ट नहीं होती है। आज अगर आपको जीडीपी को डबल डीजिट्स में ले कर आना है, उदाहरण के लिए अगर आप आसान से समाधान पूछेंगे, तो मैं कहना चाहती हूं कि अगर आपके देश में दो आयला, तीन आयला और आ जाएं, तो आपकी जीडीपी अचानक बढ़ जाएगी। अगर सारी गाड़ियों का आज हिंदुस्तान में एक्सीडेंट हो जाता है, तो आपकी जीडीपी बढ़ जाएगी। जीडीपी के टर्म्स के अंदर ग्रोथ को नापना हमारी शायद सबसे बड़ी खामी आज की तारीख में है।

SHRI BISHNU PADA RAY (ANDAMAN & NICOBAR ISLANDS): It is a very good point.  One Tsunami will hit the GDP. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: There is no need for your interpretation.  Please sit down.  You can speak when you get a chance.

डॉ. ज्योति मिर्धा : अंडमान में यही मुश्किल है। मुझे से पहले बहुत से सदस्यों ने भी इस बात को कहा कि रह-रह कर बीपीएल की बात सामने आती है। अंग्रेजी में एक कहावत है कि “What is not measured is not managed”. हमारी जो गरीबी है, हम शायद उसे सही तरीके से नाप नहीं रहे हैं। दूसरा मुद्दा हमारे लिए है कि हम बीपीएल को किस तरीके से देखते हैं। अभी मीटिंग्स चल रही हैं और बीपीएल की नई परिभाषा में हम कुछ चीजें इनकोरपोरेट करना चाहते हैं।  पहले यह था कि मात्र 650 ग्राम अनाज एक आदमी को मिल जाता है, ग्रामीण आदमी को 2400 कैलोरी मिल जाती हैं तो पूर्ति हो जाती है। इसके हिसाब से रिवर्स कैलकुलेशन करके सारी योजनाएं बनाई जाती हैं। बीपीएल में आप बाकी चीजें इनकॉरपोरेट कर रहे हैं, मेरे ख्याल से तेंदुलकर कमेटी को लागू करके उनके सुझावों को इनकॉरपोरेट करके किया जा रहा है। मेरा सुझाव है कि पॉवर्टी को अब की बार डिफाइन करें तो इस हिसाब से डिफाइन करें कि इस तरह की कोई शार्टकमिंग्स न हो ताकि हमारी स्कीम्स बनाने का बेसिस गलत न हो सकें।

          महोदय, जीडीपी का सिम्पल मीनिंग है कि एक्सीलेटर दबाए जाओ ग्रोथ बढ़ाए जाओ। आज की तारीख में एन्वार्यनमेंट डिग्रेड हो जाए लेकिन फर्क नहीं पड़ता क्योंकि एन्वार्यनमेंट मुफ्त मिलता है,उसकी कोई कीमत नहीं है। जो चीज फ्री में मिलेगी उसके लिए सोचा जाएगा कि यह मुफ्त का चंदन है, आ जाओ घिस लो। आज आपको एन्वायर्नमेंट की कास्ट लगानी होगी जिससे किसी आदमी की जेब का हर्जाना होगा, उसे हर्ट होगा तभी इस तरह की तकनीक आएगी कि एन्वायर्नमेंट फ्रेंडली हो या ग्रीन टेक्नोलाजी आए। मेरा निवेदन और सुझाव है जो भी पॉलिसी बने उसमें जीडीपी के बजय जीपीआई इंडेक्स को लेना चाहिए। अब बात आती है कि जीपीआई में क्या फर्क है जबकि और भी इंडिसिस हो सकते हैं जिनके बारे में सोचा जा सकता है। मात्र यह कह देने से कि जीडीपी टर्म्स में ग्रोथ नापें, जीडीपी नौ परसेंट बढ़ाएंगे, 11वें प्लान में एग्रीकल्चर ग्रोथ चार परसेंट बढ़ाऐगे? यह डिसपेरिटी क्यों है? क्योंकि शायद चार परसेंट अचीवेबल है और रिएलिस्टिक टर्म्स में जीडीपी नौ परसेंट बताती है शायद एग्रीकल्चर सैक्टर के अंदर उतनी ग्रोथ नहीं कर पाएं। जीपीआई में अगर लेते हैं, 1990 से 2003 के आंकड़े समझ में आते हैं तो पर कैपिटा जीडीपी तकरीबन 3.9 परसेंट बढ़ी है। इसी को आप जीपीआई टर्म्स में निकालते हैं तो मात्र 1.2 परसेंट ग्रोथ हुई है जो ज्यादा रिएलिस्टिक लगती है। आज हम सब जानते हैं कि अमेरिका का आर्थिक ढांचा चरमरा रहा है। अगर आप उनकी जीडीपी देखें तो वह बढ़ती जा रही है, 17,000 डॉलर से 30,000 डॉलर पर-कैपिटा इनकम बढ़ रही है। आप कहते हैं कि आर्थिक ढांचा चरमरा रहा है, यह चीज जीपीआई में रिफलेक्ट होती है जो वास्तव में घटी है। कनाडा एक ऐसी कंट्री है जो डेवलप्ड है और हम उससे सीख सकते हैं। यह कंट्री जीपीआई को मेन इंडेक्स मानकर लेजिसलेशन उसके बेसिस पर करते हैं, उनकी पार्लियामेंट में पॉलिसी मेकिंग होती है वह जीपीआई इंडेक्स को लेकर होती है।

          महोदय, मैं ज्यादा इधर-उधर के आंकड़े नहीं गिनाऊंगी। योजनाओं के बारे में बहुत से सदस्य बता चुके हैं और माननीय मंत्री जी मुझसे ज्यादा जानते हैं। मेरे दो सुझाव है कि नरेगा पोटेंशियल रखने वाली स्कीम है, यह फ्लैगशिप प्रोग्राम है। यह पोटेंशियल रखती है, अगर यह सही डायरेक्शन में जाए तो हिन्दुस्तान में वह तरक्की पासिबल है जो शायद आज तक ग्रामीण विकास की किसी स्कीम के माध्यम से नहीं हो पाई है। इससे एसेट्स बिल्ड होंगे, डेवलपमेंट हो सकती है। मेरा निवेदन है कि ज्यादा फोकस इस चीज पर होनी चाहिए कि गांव में 70 परसेंट पापुलेशन को प्रोडक्टिव बनाएं। जब तक उन प्रोडक्टिविटी नहीं बढ़ेगी, वे हमारी इकनॉमी पर ड्रैग्स रहेंगे, जब ड्रैग्स रहेंगे तो हम कभी भी सुपर पावर बनने की कैपिसिटी नहीं रख सकेंगे। आप नरेगा में आज 40,000 करोड़ रुपए की एक योजना चला रहे हैं जो कानून से बैक्ड है और उसे कांट्रेक्चुअल स्टाफ से चलाना चाहते हैं। आपके पास ग्रामीण विकास में वाटर शैड डिपार्टमेंट, वेस्ट एंड मैनेजमेंट डिपार्टमेंट हैं, इनका काम नरेगा की गाईडलाईन से बहुत क्लोजली रिलेटिड है। सरकार इन्हीं डिपार्टमेंट को नरेगा में मर्ज कर दे ताकि उनके पास प्रापर मैन पावर हो। आप भी एडमिनिस्ट्रेशन पर कांट्रेक्चुअल स्टाफ की ट्रेनिंग पर बहुत पैसा खर्च कर रहे हैं, अगर डेडिकेटिड और रेगुलर स्टाफ होगा तो नरेगा की गतिविधियों को ढंग से मानिटर किया जा सकेगा।

          महोदय, मुझे नरेगा के मामले में एक चीज अखरती है और वह है हाउसहोल्ड की डेफिनेशन। इसमें कहा गया है – “Household means the members of a family related to each other by blood, marriage or adoption and normally residing together and sharing meals or holding a common ration card.” इसका मतलब यह है कि अगर आपके परिवार में एक बूढ़ा आदमी है जिसके चार बच्चे हैं और उनका सांझा चूल्हा है, उन्हें अलग जॉब कार्ड चाहिए तो आप परिवार का विघटन कराएं, न्यूक्लियर फैमिली बनाएं तब आप जॉब कार्ड देंगे। यह हमारी संस्कृति के खिलाफ है। मैं माननीय मंत्री से निवेदन करती हूं कि नरेगा की गाइडलाइन में हालांकि हो सकता है इसकी फाइनेंशियल डाउनसाइड हो कि बहुत बर्डन आएगा। लेकिन पेपर्स में बर्डन आना और हकीकत में बर्डन आना, दोनों अलग चीजें हैं।

 

 

इसको हम लैजिटिमेट तरीके से हर एक आदमी को बैनिफिट दे सकें। हम जो चाहते हैं कि एक परिवार को सौ दिन का रोजगार गारंटी से मिले और उसे सौ रुपये रोजाना मिल सकें। इस तरह से तकरीबन दस हजार रुपये साल के मिलेंगे और इसका मतलब हुआ कि 833 रुपया प्रति माह और यदि उसे पांच लोगों में डिवाइड कर रहे हो तो 166 रुपये प्रति आदमी आता है। परंतु यदि वही दस जनों का परिवार है और अगर उसे उन लोगों के बीच में डिवाइड कर देते हो, जिन्हें आप एक्चुअल में जॉब कार्ड्स दे रहे हो तो उससे नरेगा का बैनिफिट जिन लोगों तक पहुंचना है, वह पहुंच नहीं पा रहा है।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना वक्तव्य समाप्त करती हूं। आपने मुझे यहां बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देती हूं।

 

*SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): While participating in the debate on Demand for Grants under the control of Rural Development Ministry I am to make few some points.

70% of the population resides in rural India but it is revealed that budgetary allocation in rural is meager not even 2% of the GDP. Moreover, released funding remains unspent. It is noticed that out of last fiscal allocation Rs 258127 Crore remains unspent.

What is the character of allocation?  It is found that non-plan expenditure is increasing, not only that in RE non-plan got further enhanced.

Vital Sector of Rural India is drinking water supply and rural sanitation as well. This sector has not received adequate allocation as demanded by the nodal department.  The situation is such that 16% of the household do not have access to safe and clean drinking water.  Only 12% are getting piped water supply.  Sanitation coverage is only 63%.  How 100% sanitation target be achieved by 2012 on given public assurance? Out of 13.56 lakh Anganbadi Kendra, 1.23 lakh still do not have toilets.

About habitation?  It is revealed that there is huge back log in every year.  But amazing to see that all allocated fund have been utilized as reported.  So question of transparency is involved.

 ‘NREGA’ programme is a great remarkable achievement during UPA I regime.  By three phases it has been extended across the country to every rural district.  But during UPA II regime the allocation is getting reduced in terms of percentage?

Land reforms programme is almost ignored. Barring West Bengal, Kerala, Tripura this has not been carried out. How the Rural Development would make progress without carrying out Land Reforms.

 

Irrigation almost comes to a standstill.  Under Bharat Nirman AIBP no remarkable progress is made. While 60% cultivable land is rain fed.  So I express my serious concern in this matter.  Whatever is said by the Government is nothing but rhetoric. With these words, I conclude.

 

डॉ. राजन सुशान्त (कांगड़ा):आदरणीय सभापति जी, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। हमारे इस महान देश के महान नेता आदरणीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी कहा करते हैं कि यदि व्यक्ति को कोई बड़ा काम करना है तो उसे सपना भी बड़ा लेना पड़ता है। मैं समझता हूं कि जब इस देश की आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो सारा देश उस लड़ाई में नहीं आया था। चंद स्वतंत्रता सेनानी चाहे वे नरमपंथी थे या गरमपंथी थे, उन लोगों ने एक महान सपना देखा था और उसके लिए उन्होंने संघर्ष करने की कभी परवाह नहीं की और उन्होंने फांसी के फंदे को चूमने की भी कभी परवाह नहीं की।। हमारा देश बड़ी मुश्किल से आजाद हुआ। बहुत से हसीन सपने देश की सभी सरकारों ने, सभी नेताओं ने लिये। कल ही हमारे प्रधान मंत्री, डा.मनमोहन सिंह जी ने भी सिविल सर्विस डे पर अफसरों को सलाह दी कि विकास करो, ताकि नक्सलवाद न फैले। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों को कहा कि ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे सरकारी विकास योजनाओं का फायदा आम जनता तक पहुंच सके। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलवाद वहीं फैलता है, जहां विकास नहीं हुआ है।

          सभापति महोदय, पिछले दिनों दंतेवाड़ा में जो बहुत बड़ी त्रासदी हुई, उसमें भी सभी माननीय सांसदों ने यह जिक्र किया था कि बंदूक उठाने का बहुत बड़ा कारण तभी बनता है, जब विकास की रोशनी, विकास की लौ उन पहाड़ों, कन्दराओं और आदिवासी क्षेत्रों में नहीं पहुंचती है तो मजबूरन पेट की आग को बुझाने के लिए और विकास की गंगा बहाने के लिए मजबूरन देश की कुछ शक्तियां खड़ी होती हैं और कई बार वे गलत हाथों में खेल जाती हैं। मैं कहना चाहता हूं कि आज हम ग्रामीण विकास मंत्रालय पर चर्चा कर रहे हैं। चालीस हजार करोड़ रुपये हम मनरेगा में दे रहे हैं। प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना में हजारों करोड़ रुपये दे रहे हैं, स्वर्ण जयंती रोजगार योजना में हजारों करोड़ रुपये दे रहे हैं। मैं समझता हूं कि बजट में जो पैसा दर्शाया गया है, वह बहुत ज्यादा पैसा है। लेकिन सवाल यह है कि बजट प्रस्तुत करते हुए माननीय वित्त मंत्री जी और ग्रामीण विकास मंत्री ने सपने तो बड़े हसीन लिये हैं, लेकिन क्या वे 12 करोड़ लोगों के हिंदुस्तान की धरती पर सही मायने में उतर भी रहे हैं कि नहीं। इनका कार्यान्वयन हो रहा है या नहीं हो रहा है। मैं संसद में पहली बार इलैक्ट होकर आया हूं। माननीय वीरभद्र सिंह जी यहां बैठे हैं। वह हमारे प्रदेश में पांच साल मुख्य मंत्री रहे हैं। मैं उनकी बड़ी कद्र करता हूं। मैं भी 1982 से वहां विधायक रहा। 26 साल की छोटी सी उम्र में मुझे जनता ने एमएलए बनाया। मैं वहां मंत्री भी रहा। यहां आकर मैंने जो देखा, वह मैं आपको बताना चाहता हूं कि संसद में आकर मुझे बहुत सी बातें बहुत अच्छी लगती हैं। यहां संकीर्णता कम है, लोगों के विचार बड़े हैं।  आपस में राजनीति यहां कदम-कदम पर हाथ नहीं फैलाती। लेकिन मैं एक बात की ओर आपका और सारे माननीय सांसदों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। मुझे जब पता लगा कि इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए हर डिस्ट्रिक्ट में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मानिटरिंग एंड विजिलैंस कमेटी बनाई है और इन्हें सही मायने में धरती पर उतारने के लिए चुने हुए सांसद को वहां चेयरमैन बनाया है।  मैं बहुत प्रसन्न हुआ और मैंने गाइड लाइन्स को देखा और बाद में अपने माननीय सांसदों से चर्चा भी की।

          मैं अपनी बात नहीं कह रहा हूं, लेकिन यह अनुभव आया है कि अगर आज अलग-अलग दलों की सरकारें होंगी तो केंद्र सरकार के अंदर और राज्य सरकारों के अंदर टकरार की स्थिति आ रही है। विधायिका के अंदर भी और कार्यपालिका के अंदर भी आज स्थितियां ठीक नहीं हैं। मैं आज सुबह ग्रामीण विकास मंत्री जी से मिला भी था। आज समय आ गया है कि हम राजनीति से ऊपर उठकर तय करें कि हम देश को किधर ले जाना चाहते हैं? क्या एमपी का मतलब एक अर्नामेंटल संस्था है कि हम चुनकर आ जाऐंंगे और पांच साल के बाद जनता का मुंह देखेंगे? आज लाखों करोड़ रूपया इसी संसद में पास किया जाता है और राज्यों के अंदर भेजा जाता है, लेकिन आज राज्यों में हमारे माननीय सांसदों की स्थिति क्या है? जब सांसदों से बात होती है तो सारे मंत्रीगण कह देते हैं कि आप जाकर योजनाओं को चैक करो। हम बिजली के लिए राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना में इतना पैसा दे रहे हैं, आप चैक करो। हम मनरेगा में इतना पैसा दे रहे हैं, आप चैक करो। हम पीएमजीएसवाई में इतना पैसा दे रहे हैं, आप चैक करो। वहां स्थिति क्या होती है, मैं आज बहुत गंभीरता के साथ सदन को सचेत करना चाहता हूं कि अगर आज हम नहीं जागे तो इस संस्था का महत्व जैसे कम होता जा रहा है तो फिर इस ओर रूचि नहीं आयेगी। मेरी प्रार्थना यह है कि जो आपकी गाइड लाइन्स हैं, उन्हें सख्ती के साथ सारी राज्य सरकारों को कहें कि जो भी पैसा चाहे वह मनरेगा के अंदर जाये, चाहे पीएमजीएसवाई के अंदर जाये या अन्य दूसरी योजनाओं में जाये, अगर आपने एमपी को चेयरमैन बना रखा है तो एमपी के द्वारा ही योजनाएं बननी चाहिएं और एमपी के द्वारा ही उनका क्रियान्वयन होना चाहिए। इसके साथ मैं आपको सुझाव भी देना चाहता हूं कि पीएमजीएसवाई के अंदर 250 की जो आबादी है, इसे कम करके पहाड़ी क्षेत्रों के लिए 100 की संख्या को इसमें शामिल करना चाहिए। फेस वन में एडिशनल ग्रांट देनी चाहिए। ग्रामीण सड़कों को भी इसमें अपग्रेड करने के लिए जोड़ना चाहिए। जो फॉरेस्ट लैंड है, जहां पट्टे दे रहे हैं, वहां भी सड़कें बननी चाहिएं। इसके साथ बीपीएल का भी दोबारा चयन होना चाहिए। एमपीलैड की राशि दो करोड़ रूपये से बढ़ाकर कम से कम दस करोड़ रूपया करनी चाहिए। इसके साथ-साथ केन्द्रीय योजनाओं की स्वीकृति भी सम्बन्धित एमपी के बिना फाइनल नहीं होनी चाहिए। जैसे पहले भी संजय सिंह जी ने कहा कि एक एमपी को कम से कम एक हजार हैंडपम्प लगाने का कोटा आपको तय करना चाहिए। इसके साथ-साथ मैं आपसे प्रार्थना करना चाहता हूं कि बीपीएल का चयन करते समय, हम उसके आधार पर ही पेंशन देते हैं, वहां आयु 65 साल से कम करके 60 साल करनी चाहिए और विधवा आयु की शर्त भी हटानी चाहिए। बीपीएल का चयन करते समय फैमिली इनकम और लैंड की इनकम का जो नियम रखा है, उसे भी हटाना चाहिए। इसके साथ-साथ मैं कहना चाहता हूं कि मनरेगा के अंदर आज पिछले चार साल में सत्तर हजार करोड़ रूपया खर्च करके छह सौ करोड़ मैन डेज अर्जित किये गये हैं, लेकिन जो प्लानिंग कमीशन की रिपोर्ट आयी है, हमारे वाइस चेयरमैन आदरणीय मोंटेक सिंह अहलूवालिया जी का जो बयान आया है, वह बहुत चिंताजनक है। उन्होंने कहा है कि 50 परसेंट से भी कम कार्य पूरे हो रहे हैं। हम काम तो हाथ में ले लेते हैं, लेकिन वे पूरे नहीं हो रहे हैं। पिछले साल केवल 39 परसेंट कार्य पूरे हुए हैं। काम कैसे पूरे होंगे? आप गांव के गरीब लोगों से कह देते हैं कि यहां चैक डैम बना दीजिए, वे मिट्टी का बना देंगे, बरसात आयेगी और वह बह जायेगा। वह टैक्निकल काम है। इसके लिए मेरा सुझाव है कि आप एक साल का डिप्लोमा, मनरेगा के कार्यों के लिए, सभी राज्य सरकारें इसे करें, प्राइवेट सेक्टर में करें, प्राइवेट विश्वविद्यालय करें चाहे सरकारी विश्विद्यालय करें ताकि उनकी ट्रेनिंग हो जाये। इसके साथ-साथ लैंड लैबलिंग के लिए मैं चाहता हूं कि इसमें ड्रिप इरीगेशन शामिल की जाये, इसमें रूरल इलैक्ट्रिफिकेशन हो। दिहाड़ी भी सौ रूपये बढ़ाकर कम से कम एक सौ पचास रूपये होनी चाहिए क्योंकि महंगाई बहुत बढ़ गयी है। मैन डेज भी सौ के बजाय डेढ़ सौ करने चाहिए। इसके साथ-साथ इंदिरा आवास योजना में मेरा एक सुझाव है कि आज पचास हजार रूपये से गुजारा नहीं चलता है, इसे कम से कम डेढ़ लाख रूपया करना चाहिए। केंद्र सरकार 50 हजार रूपया दे, राज्य सरकार 50 हजार रूपया दे और बाकी 50 हजार प्रार्थी दो परसेंट ब्याज पर लोन ले ले।

उनको भूमि के पट्टे दे। चाहे राज्य सरकार और केन्द्र सरकार मिलकर उनको भूमि खरीदकर दे और कालोनियाँ बनाने का भी प्रबंध होना चाहिए। आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

                                                                                                   

श्री रमेश राठौर (आदिलाबाद):अध्यक्ष महोदय, आपने मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय की मांगों पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद करता हूँ। भारत् में जो प्रधान मंत्री सड़क रोज़गार योजना कार्य चालू किया गया, यह बहुत अच्छा कार्य है। लेकिन जो आदिवासी तथा दलित लोग ग्रामीण प्रांतों में होते हैं, उन लोगों को सौ से डेढ़ सौ की पॉपुलेशन वाले गाँवों की संख्या बहुत अधिक है। उन गाँवों में आज तक भी रोड का काम चालू नहीं किया गया। जहाँ पर फेज़ 1 से लेकर फेज़ 8 में काम हुआ है, वह सब-स्टैन्डर्ड काम होने से अभी जिस तरह पिछले दिनों में रोड वहाँ नहीं थी, उसी तरह रोड आज दिखाई दे रही है। जब प्राइम मिनिस्टर सड़क योजना में रोड का काम लिया गया तो उसको सिर्फ मिट्टी से बनाया गया, उसके ऊपर मैटल नहीं बनाया गया, उसके ऊपर बिटुमैन रोड भी नहीं बनाया गया। उसके लिए मेनटेनेन्स का पाँच साल का एग्रीमैंट लगाया लेकिन पाँच दिन भी उसके ऊपर मेनटेनेन्स नहीं किया गया। इस पर मंत्री जी को ध्यान देना चाहिए। आने वाले दिनों में आदिवासी और गिरिजन प्रांतों को 100-150 की पापुलेशन के गांवों में भी रोड बनाने की योजना लेने की मैं सरकार से मांग करता हूँ।

          महोदय, अभी सबसे अच्छा जो कार्य है महात्मा गांधी नेशनल रूरल इंप्लायमैंट गारंटी स्कीम – यह भारत सरकार ने बहुत अच्छा कार्य लिया है।  यह कार्य दिल्ली से सीधे गरीबों की गलियों में पहुँचने का कार्य है। इसमें जब जाब कार्ड प्रारंभ किया गया, तो जिसके पेट में बच्चा है, उनको भी दिया गया, स्कूल में जो बच्चे हैं, उनको भी दिया गया और जो मर गए उनको भी दिया गया। जो काम पर नहीं जाते हैं,  उनको पैसे मिलते हैं और जो काम करते हैं, उनको तीन-तीन महीने पैसे नहीं मिलते हैं। इसमें जो कानून बनाया गया, यह कानून है कि जितने भी रुपयों का एलोकेशन होता है, 75 प्रतिशत ग्राम पंचायत एलोकेशन, 15 प्रतिशत मंडल एलोकेशन और 10 परसेंट जिला परिषद् एलोकेशन होता है। हमारे आंध्र प्रदेश में जो 6000 करोड़ मंजूर किये गये, उसमें 4000 करोड़ रुपये खर्च किये गए। उसमें 40:60 में रोड का काम लिया गया, 60 परसेंट लेबर कंपोनैन्ट और 40 परसैंट मैटल कंपोनैन्ट। लेकिन आज की तारीख में 90 परसेंट जो सड़कों के लिए दिये गए हैं, वहाँ काम नहीं हो रहा है, सिर्फ मस्टर लिखकर पैसे लेने का काम हो रहा है। इस भ्रष्टाचार पर मैंने मुख्य मंत्री जी से निवेदन किया था। उन्होंने चीफ विजिलैन्स आफिसर  को वहाँ भेजा था। हमारे राष्ट्र में 1100 मंडल होते हैं और उसमें एक ही मंडल में जब इनक्वायरी ऑफिसर आए थे, तो पाँच करोड़ रुपये के काम में तीन करोड़ रुपये का घोटाला पाया गया। वे पैसे फील्ड ऑफिसर और हमारे वहाँ के नेताओं की जेब में सीधे चले गए। यह सीधे-सीधे 60-70 प्रतिशत खा रहे हैं लेकिन डकार लेने की परिस्थिति में भी नहीं हैं। वह हजम कैसे होगा उसके ऊपर मंत्री जी ध्यान दें। आज की तारीख में हमारे पास हर गाँव में फील्ड असिस्टैन्ट, टैक्निकल असिस्टैन्ट और पोस्टमास्टर जिसकी तनख्वाह 2000 होती है, वह मंत्री के साथ और नेता के साथ कार में फिर रहा है। इतना ही नहीं, जितना पैसा गरीब के पास पहुँचता है, उसमें वाटर टेबल बढ़ाने का वाटर कंज़म्प्शन प्रोग्राम नहीं लिया गया, पीने के पानी के लिए एक रुपया खर्च करने के लिए भी सरकार निर्णय नहीं ले रही है।

          पीने के पानी पर 40 हजार करोड़ रूपये खर्च हो रहे हैं, यदि इसका दस प्रतिशत भी वहां खर्च किया जाता है, तो वहां पीने के पानी की समस्या हल हो सकती है। मैं नहीं कह रहा हूं, बल्कि यह सरकारी ऑडिट रिपोर्ट में लिखा है कि उसमें 60 प्रतिशत भ्रष्टाचार हो रहा है। पिछले वर्ष से वहां सूखा पड़ा हुआ है। कुऐंं सूख चुके हैं। वहां पीने का पानी है। समचारों में इस बारे में रोज छपता है। खास तौर से आदिवासी और दलित प्रांतों में पीने के पानी की बहुत समस्या है। आंध्र प्रदेश के 52 मंडलों को नवम्बर-दिसम्बर में सूखाग्रस्त घोषित किया गया, लेकिन आज तक एक रूपया भी उससे निपटने के लिए नहीं दिया गया है। सूखे के कारण जानवरों के लिए चारे और पानी की समस्या हो रही है। इसके कारण जानवर मर रहे हैं। लेकिन सरकार हाथ पर हाथा रखकर बैठी हुई है। मैं मंत्री जी से निवेदन करता हूं कि वे इस पर ध्यान दें क्योंकि यह उनकी भी जिम्मेदारी है। आपने गरीबों को सीधे लाभ देने के लिए जो योजनाएं बनाई हैं, उसका पैसा उन तक पहुंचे, इसका प्रयास आप लोगों को करना है। आज महंगाई बढ़ गई है, दो रूपये का नमक दस रूपये हो गया है, तेल बीस रूपये प्रति किलो से 60 रूपये प्रति किलो पहुंच गया है, चीनी 12 रूपये से बढ़कर 40 रूपये हो गई है, लेकिन मनरेगा में काम करने वाले मजदूर को केवल सौ रूपये दिए जा रहे हैं। इसलिए मेरी मांग है कि इस राशि को सौ रूपये से बढ़ाकर ढाई सौ रूपये किया जाए। आपने जिला पंचायतों में एमपी को विजीलेंस और मॉनीटरिंग कमेटी का चेयरमेन बनाया है, लेकिन जो काम एमएलए सैंक्शन करता है, वह सरपंच, ताल्लुक और जिला परिषद को मालूम नहीं होता है। अभी 1600 करोड़ रूपये का सैंक्शन किया गया था, जिसमें से चार सौ करोड़ रूपये हमारे जिले में दिए गए थे, लेकिन उनके बारे में किसी को मालूम नहीं है। कांग्रेस के कार्यकर्ता और अधिकारी लोग मिलजुल कर इस काम को ले रहे हैं। इसके लिए विजीलेंस मॉनीटरिंग कमेटी को ऐसे कार्यों पर निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। जिस कार्य पर आप पैसा खर्च कर रहे हैं, वह लोगों को काम आना चाहिए। इसलिए आदिवासी और दलित लोगों के लिए पीने का पानी, जानवरों के लिए चारे का प्रबंध करने के लिए आप ठोस कदम उठाएंगे, इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

श्री जगदानंद सिंह (बक्सर):सभापति महोदय, ग्रामीण विकास विभाग जैसे विषय पर आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। यदि भारत का विकास करना है तो गांव का विकास आवश्यक है और गांव का विकास करने में ग्रामीण विकास मंत्रालय ही इस जिम्मेदारी का निर्वहन कर सकता है। ग्रामीण विकास विभाग, ड्रिन्किंग वॉटर विभाग, भूमि संसाधन विभाग महत्वपूर्ण कामों को अंजाम दे रहा है। जिस रा­ट्र की भूमि का संरक्षण सही तरीके से हो, वही रा­ट्र आगे बढ़ता है। लेण्ड रिसोर्सिज़ विभाग, इंटीग्रेटिड वॉटर शेड मैनेजमेंट तरीके से कार्य को चलाए, मैं इस बारे में माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं।

16.00 hrs.

 मैं ड्रिकिंग वाटर के बारे में एक-दो शब्द कहना चाहता हूं। भारत के गांव के लोगों को पानी कब मिलेगा और पानी का मतलब है क्वालिटी के साथ शुद्ध पानी। बिहार के बहुत से इलाके में जहरीला पानी है। पानी की मात्रा की चर्चा न करके, उसकी क्वालिटी की बात मैं इसलिए कर रहा हूं कि जो इस तरह के इलाके हैं, जहां जहरीला पानी है, वहां लूले, लंगड़े, विकलांग और कोढ़ी आदि पैदा हो रहे हैं तथा आम आदमी इसी पानी को पीकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि जहां की जनता जहरीला पानी पीने पर मजबूर हो, आप कम से कम वहां शुद्ध पानी देने की व्यवस्था करें। उसके बाद अन्य चीजों की चर्चा हम लोग करेंगे। ग्रामीण विकास विभाग के जो चार महत्वपूर्ण अंग हैं – इंदिरा आवास योजना, मनरेगा, प्रधानमंत्री सड़क योजना और स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना। यही इनके महत्वपूर्ण कार्य हैं। मैं सबसे पहले इंदिरा आवास योजना की चर्चा करना चाहता हूं।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सदन का ध्यान इस तरफ आकृष्ट करना चाहता हूं कि एक व्यक्ति को जीने के लिए, उसके स्वास्थ्य के लिए मिनिमम न्यूट्रीशन की आवश्यकता है। क्या उसके रहन-सहन का प्रभाव उसके स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता? इंदिरा आवास योजना पर कोई कदम आगे बढ़ाया जाए, उसके पहले उस पर विचार कर लिया जाए कि एक परिवार को न्यूनतम स्थान की कितनी आवश्यकता है। हम इस देश में आवास का निर्माण नहीं कर रहे हैं, बल्कि कमरे का निर्माण कर रहे हैं, जिस कमरे में पूरे परिवार को रहना है। उसी में उसका रसोई घर होगा, उसी में उसका शौचालय होगा और उसी में पूरे परिवार के साथ बेटे-बेटी-बहू सब को रहना पड़ेगा। ऐसे वातावरण में परिवार स्वस्थ नहीं रह सकता। इसलिए राष्ट्र के पैमाने पर कम से कम स्वास्थ्य विभाग से ग्रामीण विकास विभाग चर्चा करे कि पांच व्यक्ति के एक परिवार को न्यूनतम स्थान की क्या आवश्यकता होगी और वह न्यूनतम स्थान आप नहीं देंगे, तो आप भारत राष्ट्र का निर्माण कैसे कर रहे हैं। ये भारत-निर्माण की योजनाएं हैं। अगर इसी तरह से कमरे बनते रहे और ऐसे वातावरण में परिवारों को हमने रखा तो कल इसका नतीजा बहुत भयानक होगा। चाहे आप उसके लिए जितना भी इंतजाम कर लें, जो उसका हेबीटेशंस है, यह जो इंदिरा आवास कमरा है, वह उसके लिए कब्रगाह साबित होता चला जा रहा है। इसके बारे में निश्चित रूप से आप जब एक बार मिनिमम स्पेस को तय कर लेंगे तो क्या उसकी एक न्यूनतम कीमत होगी, इसकी भी चर्चा हो जाएगी।

          सभापति महोदय, मैं प्रधानमंत्री सड़क योजना के बारे में कुछ बातें कहना चाहता हूं। हम सभी को विजिलेंस एवं मोनिटरिंग कमेटी का अध्यक्ष जिले में बनाया गया है। मैं देख रहा हूं कि स्थिति बहुत ही जटिल है । सड़कों की गुणवत्ता की बात मैं अभी नहीं कर रहा हूं, मंत्री जी, आपकी थ्री टायर क्वालिटी कंट्रोल है। मैं कह सकता हूं कि ये तीनों टायर आपका जो कंट्रोल है, इनमें कोई काम नहीं कर रहा है। राष्ट्रीय पैमाने पर आपकी क्वालिटी कंट्रोल की संस्था है, लेकिन आपने कभी उस तरफ देखा है कि वह क्वालिटी कंट्रोल क्या कर रहा है और उनके निर्देशों को राज्य किस हद तक मान रहे हैं। मैं आगे कहना चाहता हूं कि जब-जब यहां प्रश्न उठा और बिहार में आंवटन की बात हुई, उसकी योजनाओं के लिए आवश्यक धनराशि की बात हुई, मंत्री जी ने बहुत पुरजोर शब्दों में कहा कि बिहार को इसलिए धनराशि नहीं मिल रही है, क्योंकि वहां का काम तेजी से, तरीके से नहीं चल रहा है। मैं मान सकता हूं कि वहां के मुख्य मंत्री जी ने हो सकता है कि आपकी इस राष्ट्रीय योजना की अपनी योजना बनाने का प्रयास किया हो और उससे कहीं आपको कष्ट हुआ होगा कि राष्ट्रीय योजना को बिहार का मुख्य मंत्री अपनी योजना कह रहा हो कि गांव की सड़कें मैं बना रहा हूं। क्या इसके साथ आपको यह नहीं सोचना होगा कि जिस बिहार में आपने 35,900 किलोमीटर की स्वीकृति दी। बिहार की जो संस्था है, वह 17 हजार किलोमीटर सड़क का निर्माण कर रही है।   

          सभापति जी, जो हमारे केन्द्रीय संस्थान और केन्द्रीय एजेंसिया हैं, वे 19 हजार किलोमीटर सड़क का निर्माण कर रही हैं। इसके लिए आपने कुल 16512 करोड़ रुपए की योजना स्वीकृत की है, लेकिन अब तक केवल 4 हजार करोड़ रुपए के आसपास आपने बिहार को दिए हैं। इस प्रकार से देखा जाए, तो 12 हजार करोड़ रुपए की योजनाएं लम्बित हैं। वे इसलिए लम्बित नहीं हैं कि वहां काम धीमा है, बल्कि इसलिए लम्बित हैं कि उन्हें पूरी करने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से धनराशि नहीं मिल रही है। मैं सामान्य ढंग से आपको बता रहा हूं कि जब 31 मार्च खत्म हुआ, तो बिहार की योजनाओं पर जो खर्च हुआ, उसका 1 हजार करोड़ रुपए बकाया के रूप में आपके विभाग में पड़े हुए हैं।

          महोदय, मैं उस बक्सर जिले की बात कर रहा हूं, जहां विजिलेन्स और मॉनिटरिंग कमेटी. का मैं अध्यक्ष हूं, जिसकी मॉनीटरिंग की जिम्मेदारी आपने दी है। जब वहां मैंने एन पी सी सी के हिसाब-किताब की देख-रेख की तो पता लगा कि वहां एक वर्ष में 83 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं और आपने वहां केवल मात्र 23 करोड़ रुपए दिए हैं। इस प्रकार से देखा जाए, तो लगभग 60 करोड़ रुपए अभी तक बाकी हैं। अप्रेल में आपने एक पैसा भी नहीं दिया, तो वहां की योजनाएं कैसे चलेंगी? इसलिए मैं निवेदन करना चाहता हूं कि यह कहने से काम नहीं चलेगा कि बिहार में योजनाएं ठीक तरीके से नहीं चल रही हैं या बिहार सरकार ने धन खर्च नहीं किया है, बल्कि सच यह है कि आप भी इस पूरे देश के लिए प्रधान मंत्री सड़क योजना में केवल 12 हजार करोड़ रुपए खर्च कर के इस योजना को नहीं चला सकते हैं। कुल मिलाकर के 7 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण करना है और अभी तक आप 40 फीसदी पर भी नहीं पहुंचे हैं। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि केवल 12 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष खर्च करने से काम नहीं चलेगा। अभी तक इस वर्ष इस पर केवल 12 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए हैं और इस योजना को चले हुए 10 साल हो गए हैं। यह योजना वर्ष 2001 में शुरू हुई थी और अब वित्त वर्ष 2009-2010 खत्म हो चुका है। कुल मिलाकर आप 12 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष खर्च कर रहे हैं। मैं केन्द्र सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि इसको ठीक प्रकार से देख लें, क्योंकि इस योजना के अन्तर्गत पूरे देश के रूरल क्षेत्र को वर्ष 2009-10 तक कनैक्टीविटी देनी थी। अब आपने उसे वर्ष 2012 तक बढ़ाया है। आपका सपना है कि देश के सभी रूरल क्षेत्र को वर्ष 2012 तक आप रोड से कनैक्टीविटी दे देंगे, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि यदि आप 50 हजार करोड़ रुपए भी प्रति वर्ष खर्च करेंगे, तो भी पूरे देश के रूरल क्षेत्र को रोड़ कनैक्टीविटी 2012 तक नहीं दे पाएंगे। यदि आपको पूरे देश के रूरल क्षेत्र को रोड कनैक्टीविटी पांच साल के अंदर भी देनी हो, तो भी उसके लिए आपको 25 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना में खर्च करने होंगे।

          सभापति जी, मैं थोड़ी सी बात नरेगा पर कहना चाहता हूं और मंत्री महोदय का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि नरेगा की राशि को सही समय पर दिया जाए। राज्यों को आप फरवरी और मार्च में 30 प्रतिशत राशि देते हैं। यदि केन्द्र की ओर से 30 प्रतिशत धन राज्यों को फरवरी और मार्च में जाएगा, तो कैसे काम चलेगा, क्योंकि आपका कानून कहता है कि जिस राज्य के पास ओपनिंग बैलेंस 10 फीसदी से ज्यादा होगा, उसे आगामी वर्ष की पहली किस्त नहीं दी जाएगी। इस प्रकार आप देखें, तो आप फरवरी और मार्च में 30 प्रतिशत राशि देते हैं, तो स्वाभाविक है कि वह 31 मार्च को, यानी ओपनिंग बैलेंस 10 की बजाय 30 प्रतिशत रहेगा। इस प्रकार आप उसे अक्तूबर और नवंबर तक कोई धनराशि नहीं देंगे और फिर दिसम्बर में यदि खर्च सही न हो, तो वहां राशि की कटौती हो जाती है। इसलिए मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि योजनाओं में साधनों की कटौती करने के तरीके न तलाशे जाएं। यह पैसा गरीबों का है। यह पैसा उन्हें रोजगार देने के लिए रखा गया है। उनके रोजगार देने के अवसरों को इस प्रकार से न काटा जाए। मैं सदन में एक बात कहना चाहता हूं कि जितनी आबादी है और जितने परिवार आज रोजगार मांग रहे हैं, यदि उन्हें 100 दिनों का काम देना पड़े, तो आपको 1 लाख करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। अभी आप इस वर्ष केवल 52 दिनों का ही काम दे पाए हैं और इसके लिए चालीस हजार करोड़ रूपए खर्च हुए हैं ।  यदि आप सौ दिन का काम देना चाहें तो उस आबादी के लिए एक लाख करोड़ रूपए प्रतिवर्ष चाहिए।  यह पैसा कहां है? कहां से आप लोगों को रोजगार की गारंटी दे रहे है?  सपना दिखाना और उस सपने को पूरा करने की बात है। संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों से लैस केंद्र सरकार ने इस राष्ट्र के सामने कोई गलत तस्वीर यदि दे दी, रोजगार का सपना दिखायेंगे और उसकी जगह पर एक तिहाई दिन काम भी नहीं देंगे, तो यही कारण है कि हमारे गांव के गरीब आज नक्सली बन रहे हैं।  उग्रवाद की तरफ गांव जा रहा है।  नक्सलिज्म और उग्रवाद से निपटने के मामले में गोली से काम नहीं चलेगा।  आप राशि मुहैय्या कीजिए और लोगों को रोजगार दीजिए। यदि आप रोजगार इस धरती पर कोई भी मां अपने बेटे को उग्रवादी के रूप में जन्म नहीं देती है, लेकिन समाज की ठोकरें उसे उग्रवादी बनाती हैं।  आप उन्हें रोजगार दीजिए।  आप गांव का विकास करिए।  अगर गांव का विकास होगा, तो राष्ट्र का विकास होगा, साथ ही उग्रवाद की भी समाप्ति होगी ।

          महोदय, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात को समाप्त करता हूं।

 

 

MR. CHAIRMAN : Hon. Members, there are 30 more speakers left. Please restrict your speech to five minutes each.

 

श्री मदन लाल शर्मा (जम्मू): मोहतरम चेयरमैन साहब, मैं आपका मशकुर हूं कि आपने मुझे ग्राम सुधार महकमे की मांगों पर बोलने का मौका दिया।  इसके साथ-साथ आपने यह पाबंदी भी आईद की, जो लाजिमी भी है कि पांच मिनट में अपनी बात खत्म करें।  पांच मिनट में मैं अपनी बात पूरी नहीं कर पाऊंगा। अपने आपसे भी ज्यादती करूंगा और रूरल डेवलपमेंट के मिनिस्टर साहब से भी बेइंसाफी करूंगा।  जो हमारी सरकार की उपलब्धियां हैं, जो कारगर्दिगी है, इस डिपार्टमेंट के जराए से देहात में रहने वाले लोगों को ऊपर उठाने के लिए बहुत ही इंकलाबी इकदामात उठाए जा रहे हैं।  मैं सब बातें गिन भी नहीं पाऊंगा, लेकिन मैं अपने आपको महदूद रखता हूं।  मैं मंत्री जी के नोटिस में दो-तीन बातें लाना चाहता हूं।

          यहां पीएमजीएसवाई की बात चली और उसके तहत कनेक्टिविटी में बहुत फर्क आया और सारे देश में मजमुई तौर पर, जम्मू-कश्मीर एक पहाड़ी रियासत है, जहां से मैं आता हूं, मैं मशकुर हूं मोहतरम ऑनरेबल मिनिस्टर साहब का और अपनी सरकार का कि वहां बहुत ज्यादा काम शुरू हैं।  उनमें दो-तीन कमियां जो मुझे लगती हैं, उन पर ध्यान देने की जरूरत है।

          एक तो हमारी रियासत जम्मू-कश्मीर मिलिटेंसी से अफेक्टेड है।  वहां उग्रवाद है और मरकज़ी सरकार और खासकर रूरल डेवलपमेंट की तरफ से ऐसी शरायत आईद हो जाती हैं कि अगर कहीं रोड पर दस करोड़, आठ करोड़ या पांच करोड़ रूपए खर्च करना है, तो कांट्रैक्टर कौन होगा, क्योंकि हमारे बहुत सारे लोकल कांट्रैक्टर क्वालिफाई नहीं करते हैं, जो इनकी शरायत हैं।  मैं समझता हूं कि उसमें नरमी लाने की जरूरत है और खासकर जो हमारी मिलिटेंसी अफेक्टेड स्टेट रियासत जम्मू-कश्मीर है, उसमें मरकज़ ने और इस महकमा ने, जब रघुवंश प्रसाद जी इस विभाग के मिनिस्टर थे, उन्होंने नरमी लायी, उससे कुछ फायदा हुआ।  लेकिन जो कहते हैं कि पैसा खर्च नहीं होता है, उसका कारण यह भी है कि टेंडर के लिए बहुत सारे लोग आगे नहीं आते।  बाहर से इसलिए नहीं जाते क्योंकि वे मिलिटेंसी से डरते हैं, जबकि लोकल लोग क्वालिफाई नहीं कर पाते। यह हमारी तरक्की में एक बहुत बड़ी बाधा है। टेंडर का एमाउंट ज्यादा होता है, इसलिए मैं चाहूंगा कि मंत्री जी इसको पहली फुर्सत में करें, क्योंकि वैसे भी हमारे यहां अनुच्छेद 370 है। जो कानून सारे देश पर लागू होते हैं, वे वहां लागू नहीं हैं।  इसलिए यह भी अपने विभाग में ऐसा प्रोवीजन रखेंगे और हमें इससे निजात दिलायेंगे और जो इनकी मंशा है और हमारी जो मरकज़ी सरकार है, माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी और हमारी यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी जी की मंशा है।  

 

हमारे मंत्री जी श्री सी.पी. जोशी साहब की मंशा है, वह वहां पूरी हो और रियासते जम्मू कश्मीर का विकास तेजी के साथ हो।

          दूसरा, यहां बहुत सारे मेरे मोहतरम साथियों ने बीपीएल की बात कही। यह महकमा यही है जो सर्वे करवाता है। मैं कहना चाहता हूं कि रूरल डैवलपमैंट सर्वे करता है। इनके बीएलडब्ल्यू सर्वे करते हैं। इनकी तरफ से क्या शरायत तय की गई हैं। उसमें कौन लोग आते हैं, कौन नहीं आते, लेकिन वहां भी पसंद, नापसंद की पॉलिसी इख्तियार की जाती है जिससे गरीब लोग महरूम रह जाते हैं। उन्हें उसका फायदा नहीं होता क्योंकि बीपीएल की लिस्ट में न केवल नाम होगा, बल्कि उसको मकान मिलेगा, उसे कर्जा मिलेगा। लेकिन उसे कोई दूसरी सुविधाएं मिलती हैं। मैं समझता हूं कि जो अति गरीब हैं जो बीएलडब्ल्यू के पास नहीं पहुंचते, वे किसी सरपंच के घर में बैठकर पूछ लेते हैं कि फलाना क्या है? यह आम शिकायत आज पूरे देश में है और रियासत जम्मू-कश्मीर में भी है।  जम्मू रीजन सारा पहाड़ी एरिया है. बैकवर्ड है और बॉर्डर के साथ लगा हुआ है। मैं समझता हूं कि मुलाजिम दूर-दराज के  एरिया में जाना पसंद नहीं करते। वे वहां नहीं जाते हैं इसलिए उन्हें पता नहीं रहता कि किसका कच्चा मकान है, कौन झोंपड़ी में रहता है। वे मरकज में बैठकर लिस्टें बनाते हैं जिससे बहुत सारे लोग छूट गये हैं। हम एक तरफ अपने देश के गरीब लोगों के लिए इतनी रियायतें, सहूलियतें, योजनाएं और प्रोग्राम बना रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ वे दूर पहाड़ियों में बैठे हुए रेडियो सुनते हैं, वहां टी.वी. की सुविधा हर जगह नहीं है। अखबार की तो बात ही छोड़िये। जब वे रेडियो में सुनते हैं कि हिन्दुस्तान की सरकार ने गरीबों के लिए प्रोग्राम बनाया है, तो वे मायूस हो जाते हैं। वे कहते हैं कि हमने प्रोग्राम सुना था, लेकिन वह हम तक नहीं पहुंचा क्योंकि कनेक्टिविटी नहीं है। बीडीओ आपस में आ जा नहीं सकते। उन्हें दो-तीन दिन लग जाते हैं। मंत्री जी, आप न सिर्फ अपने रूरल डिपार्टमैंट के ऊपर निर्भर रहें, जैसे हम सेंसस करवा रहे हैं, हमने हर डिपार्टमैंट को मुलाजमिन को एंगेज किया है। इसी तरह चाहे वह एजुकेशन डिपार्टमैंट की मदद ले लें, किसी दूसरे डिपार्टमैंट की मदद ले लें, अपने विभाग के लोगों को भी रखें, एक बार नये सिरे से सारे देश में सर्वे करवाकर, वे गरीब लोग जो आज तक सुविधाएं हासिल करने में महरूम रहे हैं, उन्हें भी इंसाफ मिले। इससे हमारी सरकार की मंशा पूरी होगी और उनकी जरूरत भी पूरी होगी।

           मैं अपनी सरकार और मंत्री जी को मुबारकबाद देना चाहता हूं क्योंकि इन्होंने पिछली बार दिहाड़ी 70-80 रुपये से बढ़ाकर सौ रुपये कर दी। लेकिन मैं समझता हूं कि सौ रुपये भी बहुत कम हैं।  इसे एकदम नहीं बढ़ा सकते। अभी हमारे साथी ढाई सौ रुपये तक बढ़ाने  की बात कर रहे थे, लेकिन मैं कहता हूं कि डेढ़ सौ रुपये जायज बनते हैं। हमने नरेगा का नाम बदला और महात्मा गांधी को उसके साथ रखा। जब 70 रुपये दिहाड़ी थी तब आपका प्रोग्राम देश भर में अच्छा नहीं चल रहा था। कोई काम नहीं करता था। …( व्यवधान) इसमें इजाफा हुआ है, अब लोग जाने लगे हैं, अपना काम भी करने लगे हैं और अपना पेट भी पाल रहे हैं। मैं कहता हूं कि मंत्री जी अपने जवाब में यह कर दें, आने वाले साल से ही कम से कम डेढ़ सौ रुपये  से शुरू कर दें तो मैं समझता हूं कि गरीब लोगों को बहुत बड़ी राहत होगी। विकास होगा, इफ्रास्ट्रक्चर बनेगा और लोगों का रोजगार भी चलेगा।

          मुझे बहुत सारी बातें कहनी थीं लेकिन वे रह गयीं। जो अच्छी बातें हमारी सरकार, रूरल डेवलपंमैंट विभाग और मंत्री जी जो जमीन से जुड़े हुए हैं, बहुत ही अनुभवी हैं, तजुर्बेकार हैं, उनके बारे में मैं कहना चाहता था। लेकिन  आपकी इजाजत न मिलने की वजह से वह मेरे पास रहीं। अगली बार जब मेन बजट होगा, उस समय मैं यह सब कहूंगा।

                                                                                         

* SHRI P. LINGAM (TENKASI): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me this opportunity to speak on the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development for the year 2010-11.

          The N.C. Saxena Committee which went into the identification of BPL families in the country, after having analyzed the rural poverty, has stated that more than 50 per cent of our poor are in the rural areas and hence our villages remain backward still. There are 6 ½ lakhs of villages in our country and majority of the people in our villages live in utter poverty. But only 66,137 crores of rupees have been set apart for rural development which is inadequate and insufficient an allocation to improve the lot of the villages and remove backwardness. About Rs. 40,000 crore has been taken away from that allocation for implementation of Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme. Here I would like to point out that only Rs. 26,000 crore is available for improving the infrastructure facilities in the villages, providing for the rural economic growth. This is much less an allocation considering the huge budget we handle. This is like a drop in the ocean.

          The Government must wake up to the reality that the basic infrastructural facilities are not there in many of our villages and hamlets especially in remote areas. Road connectivity is not there. Sanitation facilities and toilets are not there for our rural women. If this need is not met and if it is ignored further, there will be a negative growth in our rural areas taking us further back.

          Our economic measures and planning and its benefits must go to the rural poor also. I would like to point out that the fund allocation for constructing pucca houses to the rural poor is much less than the value of the land on which those houses will be constructed. This will only deprive the rural poor as they may not come forward to construct such houses at such a low cost with which no facility can be ensured. I urge upon the Government to enhance the allocation per dwelling unit to Rs. 1 ½ lakh.

          I would like to point out that the allocation for the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana is less as compared to the need. Vigilance and Monitoring Committees have been set up to oversee the implementation of rural development schemes as per the direction of the Union Rural Development Ministry. In Tamil Nadu, only the Ministers and Ruling Party MLAs have been included in such Committees. Every Minister and ruling party MPs can be seen as Chairmen of more than two or three committees each, one and the same time.  However, no MP from the Opposition party is made as Chairman of such Committee.  Public representatives from the Opposition parties have been ignored and neglected in such committees.

          Since the allocation for the enhancement of rural infrastructure has been cut down due to the diversion of it to MGNREGS, there is an urgent need for the Government to enhance the MPLADS fund so that MPs may be authorized to spend from their funds towards rural infrastructure. As such, the fund at the disposal of an MP is much less than such a fund available to MLAs in the States. This poses a big problem to Members of Parliament whenever they visit rural areas, because they are not able to contribute to the rural infrastructure works in a big way. The MPLADS fund available to every MP is very meagre considering the demand from the rural masses. We are not in a position to visit rural areas because of the criticism and the wrath we earn due to our inability to allocate funds for rural infrastructure development works. I urge upon the Government to authorize MPs and allocate adequate funds enhancing the funds at the disposal of the MPs.

          Rural life is entirely dependent on nature and hence the Government must not ignore hunger and death as natural things. We must strive to help the rural people to improve their living standards ensuring manageable livelihood for which the fund allocations should be more.

          When their lives become miserable, the people in the rural areas, driven to their wit’s end, flee towards urban areas as migrant labour. Do they get what they want is a million dollar question. There also, they meet with disappointment. They have to live in pathetic and unhygienic conditions as urban poor. Their status do not improve much. Yesterday, I had been to Jangpura in South Delhi where hundreds of people have lost their houses due to demolition drive undertaken by the Municipal Corporation of Delhi in order to beautify Delhi for the Commonwealth Games. They continue to be there with whatever belongings they could retrieve and stay in the open with sky as their roof. I learnt from those hapless people that they have been living there for more than 30 years ever after their coming to this Capital City as migrant people from Tamil Nadu and many other States. It is a pitiable scene to see the aged, the women and children find themselves thrown to the dust. I was very much saddened to find the plight of the migrant labour class from the rural areas who could not get justice in both the places, the place of their origin and the destination they have moved in.  Even wild animals do have sanctuaries. But our rural poor are thrown to the winds. It is condemnable that no viable alternative arrangements have been made.

          Reiterating the need to allocate more funds for rural development, while pointing out that whatever that has been allocated is inadequate and meagre, let me conclude my speech expressing my displeasure with the budgetary allocation for rural development this year. I strongly oppose this year’s Budget.

 

 

* SHRI SHER SINGH GHUBAYA (FEROZPUR): Madam Chairperson, I am grateful to you that you have given me the opportunity to speak on Demands for Grants pertaining to the Ministry of Rural Development (2010-11).

          Madam, almost 63 years have passed since we attained Independence. However, we have not been able to provide basic facilities to the teeming millions residing in the rural areas. The people are suffering.  Who is responsible for the miserable plight of the people residing in villages?  Why did successive Governments fail to address this important issue?  Surely,  the leadership has miserably failed to provide basic facilities to the rural people or to improve the infrastructure in the rural areas.  The Congress party has been at the helm of affairs for the maximum number of years at the centre.  It cannot shirk its responsibility.

          Over the years, things have come to such a pass that the poor have become poorer and the rich have become filthy rich.  A handful of people have reaped all the benefits of progress and development. We claim that ours is a great country and we have come a long way since we attained independence.  However, the fact of the matter is that hardly 5% to 10% people have reaped all the benefits over the years.

          The poor people of the country are bereft of two square meals a day.  They are finding it difficult to make both ends meet.  Education has remained a distant dream for the rural masses.  Housing facilities and medical assistance are non-existent in the rural areas. Surely,  over the years, our leadership has failed us.  Our priorities have been skewed and our development has been lop-sided.

          Schemes like NREGA and Indira Awas Yojna are being spoken of as flagship schemes. But their implementation has not been up to the mark.  Unemployment is on the rise.  Prices of essential commodities have sky-rocketed.  Inflation is increasing by leaps and bounds.  Corruption is rampant.  The attitude of the Central Government leaves much to be desired.  Opposition-ruled states have often been discriminated against by the centre as far as providing assistance, relief and succour is concerned.

          Punjab is often considered the granary or the food-bowl of India.  It contributes over 60% food grains to the Central Pool. However, central assistance is denied to Punjab on one pretext or another.  The irrigation – canal system in Punjab is in shambles.  Had it been renovated,  I am convinced,  there would have been no need for India to import food-grains. 

          The “Pradhan Mantri Gramin Sadak Yojana” was launched by the centre with much fanfare.  Road-connectivity is being provided to habitations with population of at least 1000 or 500 people. However, there are hundreds of habitations where only 100, 200, or 250 people reside.  They have not been brought under the purview of this scheme. These habitations should also be provided road- connectivity.

          Power – outages are frequent in rural areas.  In Punjab, there are power-cuts for 19 hours at a stretch.  The electricity – scenario is dismal.  It is the duty of the Central Government to meet the power related demands of Punjab.  The paddy season has set in.  Farmers need to run tube-wells for irrigating their fields.  The irrigation – canal system needs to be renovated at the earliest.

          There are several schemes that are hanging fire.  They have been left mid-way.  There are at least 200 to 250 over-bridges in the process of completion for years. They fall under the domain of the Railway Ministry.  The Punjab Government has already done its share of work.  This work should be expedited and completed at the earliest.

          There have been discrepancies in the BPL Card System.  Genuine people have been ignored whereas undeserving people have reaped the benefits.  A fresh survey should be conducted and all discrepancies should be removed.

          The industrial scenario in Punjab is dismal.  Most of the industries of Punjab have shifted to neighbouring states. Incentives have been provided to our neighbouring states whereas we have been denied all such facilities. Step-motherly  treatment has been meted out to Punjab. Punjab should not be discriminated against.

          I hail from an area that is near the Indo-Pak border.  The roads in our areas are full of pot- holes.  There roads should be repaired at the earliest.

The rural masses are suffering.  The education and health sector in the rural areas of Punjab needs upliftment.  The Central Government must provide relief and succour to the rural- poor.  This is the need of the hour. Thank you.  

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SHRI P.T. THOMAS (IDUKKI): Mr. Chairman, Sir, it gives me immense pleasure in speaking a few words about Rural Development.

          At the very outset, I am extremely glad to note that the Government of India has been implementing various employment generation programmes such as the Swarnajayanti Gram Rozgar Yojana (SGSY), PMGSY, IAY, Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act, the DRDA, PURA, NIRD, CAPART and other Rural Development Programmes. The Budget allocation this year, 2010-11, is Rs. 66,100 crore for rural development. This shows the commitment of the UPA to the rural poor, that is, the Aam Aadmi.

          The National Rural Employment Guarantee Act is  renamed as the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act. The prefix is very fitting and proper inasmuch as Mahatma Gandhi, the Father of our Nation, was the real architect of our rural employment programmes. It is Gandhi ji who visualized “Gram Swaraj’. He said that India lives in her villages.  Village self-sufficiency and village self-reliance were his twin cherished dreams through which he visualized “Ram Rajya, that is, the concept of an ideal nation. When we hear the prefix of this Act, memories crowd in upon our minds about our greater leader, the apostle of peace, non-violence and Ahimsa, Mahatma Gandhi. That is why, I am of the opinion that the prefix of this Act is very apt and appropriate.  Gandhi ji stood for the rural poor, their employment and for their empowerment. I make use of this opportunity to thank our hon. Prime Minister Dr. Manmohan Singh ji and the hon. UPA Chairperson, Shrimati Sonia ji  who are responsible for rechristening this Act as Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act.

          The Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act aims to achieve the twin objectives of rural development and employment. This Act has achieved unprecedented success all over the country. In Independent India’s history, no other employment guarantee  Act has managed to create such a buzz as the MGNREGA. After returning to power for the second time in a row, the UPA Government is leaving no stone unturned to make all these schemes a grand  success.

In the scheme of things of the present Government, the MGNREGA occupies the prime position. In fact, this revolutionary idea has become the flagship programme of the UPA Government which is monitoring and implementing the scheme with renewed verve and vigour. This scheme has energized, mobilized and empowered the most marginalized sections of the rural poor people of the country. It is the first national programme of consequence which merges transparency and accountability in the daily interaction of the common man with the Government.

          The annual  growth in our work opportunities increased from 4 million per annum  in the first period to 9.3 million per annum  in the second period. The MGNREGA is acting as a catalyst in increasing the employment growth rate. It has shown tangible results on a massive scale in this regard. By providing hundred days guaranteed wage employment for all adult employment seekers in the rural areas in a financial year, this Act has triggered a silent revolution altering the socio-economic status of the rural villages for good. Independent India has to acknowledge the critical role the MGNREGA has played in providing a measure of inclusive growth. It has even managed to almost put a stop to the mass migration of people belonging to rural areas to the metro cities. As the MGNREGA is used as a supplementary income source during non-agricultural seasons, farmers in rural areas found it very much beneficial.

          The Government’s decision to provide insurance coverage to the MGNREGA is a notable, welcome step. I congratulate the hon. Minister in this regard

          While participating in the discussion, the hon. Member from the other side Shri Gopinath Munde was asking: Is it an Aam Aadmi Programme? Hon. Member Shri Gopinath Munde, with all respect, I am challenging you. Are you ready to go and ask this question in your village?

          Tens of thousands of people of rural villages of our country is considering this as the real Aam Aadmi programme, but you people are not agreeing. Why? It is because of your blind politics.

          Sir, the implementation of PMGSY in our State is facing some difficulties. The parameters are not adequate to meet the geographical conditions of our State. The PMGSY grading formula is not in a position to implement the work. In Kerala, there is no proper supervision of this scheme. Surprisingly, almost all engineers are withdrawn by the State Government at the fag end of the financial year. I would request the hon. Minister to intervene in the matter and sort out such problems for proper implementation of PMGSY. I would submit that a high level meeting is needed for this purpose. The progress of the work under PMGSY is very slow in Kerala and the expenditure is below 50 per cent of the allocation. So I would request the Government to change the guideline and adopt a new guideline for Kerala.

          Sir, I would like to congratulate the hon. Minister for Rural Development to give strict instructions to the State Governments for the participation of MPs in this regard. I would also request the hon. Minister to give instructions to update the Core Network List of PMGSY in our State. The present list is very old. Then, the State Government is acting as if the entire project and the financing is their own. They are not even mentioning the name of the Central Government in every project.

          Sir, I would like to bring to the notice of the House some important issues pertaining to Kerala. The Government of Kerala is violating the provisions of the MGNREGA and trying to politicise. One main example is making the implementation in the Gram Panchayat through Kudumbashree, a Non-Governmental Organisation controlled by the CPI (M). As per the provisions of the MGNREGA, State Governments can evolve a system for each State under Chapter 11.4 of the Act. In Kerala, the scheme has been notified during July, 2006, wherein there is no provision to involve the Kudumbashree to implement the MGNREGA. By issuing executive orders, Kudumbashree has been made as an inevitable part in the planning and execution of the scheme which leads to favouritism and corruption thereby diluting the Act.

          The second thing is that the Kerala State Government has imposed a ban on the purchase of the materials by which no durable assets are created.  Thereby State Government can save there portion of money to be made part of the scheme.  As per Section 22c of the Act, the State has to meet the cost of unemployment allowance, and one-fourth of the materials’ cost including payment of wages to skilled and semi-skilled.

          As per Chapter II 3.3 of the Act, wages are to be paid on weekly basis, in any case not later than a fortnight.  If the State payment is delayed by 30 to 90 days, no amount is paid as compensation to any works whose wages is delayed as envisaged in Schedule II(30) of the Act.

As per Chapter III 15(1)A dedicated officer not below the rank of the BDO has to be posted as Block Programme officer to look after the implementation of the scheme. 

          Chapter III 16(1) of the Act Gram Panchayats shall be responsible for identification of the projects in the Gram Panchayat area as per the recommendation of the Gram Sabhas concerned.  Here the State Government is imposing the list of works which has to be taken up under the scheme.  The latest example is the cutting/excavation of foundation for the implementation of the EMS housing programme.  In the EMS housing programme the estimate is prepared by including the foundation work in the total cost of the amount which can be paid to the beneficiary. 

          As per the Schedule I(6) of the Act, wages shall be paid according to the schedule of rates fixed by the State Government…

MR. CHAIRMAN : Nothing more will go on record.

(Interruptions) … *

MR. CHAIRMAN: No, I have called the next speaker. Nothing is going on record. Please take your seat.

(Interruptions) … *

MR. CHAIRMAN: Please do not waste the time of the House.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Nothing is going on record. You should understand this. 

(Interruptions) … *

SHRI P.T. THOMAS : Sir, I am concluding.

MR. CHAIRMAN: You have concluded.  Please sit down.  Please do not waste the time of the House. Please cooperate with the Chair. Mr. Bishnu Pada Ray to speak now.

          Hon. Members, please cooperate with the Chair.  The time cannot be extended. 

                                                                                                   

*SHRI SAMEER BHUJBAL (NASHIK) : India has been a welfare state ever since her Independence and the primary objective of all governmental endeavours has been the welfare of its millions.  Planning has been one of the pillars of the Indian policy since Independence and the country’s strength is derived from the achievement of planning.  The policies and programmes have been designed with the aim of alleviation of rural poverty which has been one of the primary objectives of planned development in India.  It was realized that a sustainable strategy of poverty alleviation has to be based on increasing the productive employment opportunities in the process of growth itself. Elimination of poverty, ignorance, diseases and inequality of opportunities and providing a better and higher quality of life were the basic premises upon which all the plans and blue-prints of development were built.

          Rural development implies both the economic betterment of people as well as greater social transformation.  In order to provide the rural people with better prospects for economic development, increased participation of people in the rural development programmes, decentralization of planning, better enforcement of land reforms and greater access to credit are envisaged.

          Ministry of Rural Development has been acting as a catalyst effecting the change in rural areas through the implementation of wide spectrum of programmes which are aimed at poverty alleviation, employment generation, infrastructure development and social security.  Over the years, with the experience gained, in the implemenation of the programmes and in response to the felt needs of the poor, several programmes have been modified  and new programmes have been introduced.  This Ministry’s main objective is to alleviate rural poverty and ensure improved quality of life for the rural population especially and ensure improved quality of life for the rural population especially those below the poverty line.  These objectives are achieved through formulation, development and implementation of programmes relating to various spheres of rural life and activities, from income generation to environment replenishment through the three Departments i.e.

1.             Department of Rural Development.

2.             Department of Land Resources

3.             Department of Drinking Water Supply

The Department of Rural Development implements schemes for generation of self employment and wage employment, provision of housing and minor irrigation assets to rural poor, social assistance to the destitute and Rural Roads.  Apart from this, the Department provides the support services and other quality inputs such as assistance for strengthening of DRDA Administration, Panchayati Raj institutions, training & research, human resource development, development of voluntary action etc. for the proper implementation of the programmes.  The major programmes of the Department of Rural Development are Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana(PMGSY), Rural Housing (RH) Sampoorna Gramin Rozgar Yojana (SGRY) and Swaranjayanti Gram Swarozgar Yojana(SGSY).

Department of Land Resources implements schemes to increase the bio-mass production by developing wastelands in the country.  Department also provides the support services and other quality inputs such as land reforms, betterment of revenue system and land records.  It also undertakes development of desert areas and drought prone areas in the country.  The major programmes of the Department of Land Resources are Drought Prone Area Programme (DPAP),  the Desert Development Programme (DDP), the Integrated Wasteland Development Programme (IWDP) and Land Reforms (LR).  These aim at increasing the soil and moisture conservation and productivity of the wasteland of the degraded lands thereby increase the income of the people.

The provision of Drinking Water Supply and extension of Sanitation facilities to the rural poor are the main components of the activities of the Department of Drinking Water Supply.  The major programmes of the Drinking Water Supply Programme (ARWSP) are the Swajaldhara, the Accelerated Rural Water supply Programme (ARWSP) and the Total Sanitation Programme (TSP).

I would also like to make some suggestions for improvement and effective functioning of the Ministry.

(i)                                 Generally it is seen that at the end of the Financial year large amounts of unspent balances remain for every programmes.  In this connection, I would like to point out that till January 2010, the Ministry of Rural Development could only spend Rs.29,501.5 crore, which amounts to 69.5 per cent of the total available funds and the rest would have been utilized in the last quarter of the financial year.  Therefore, the Ministry must evenly spread the expenditure throughout the year to overcome the problem of accumulation of unspent balances.

(ii)                               Another area is the BPL Survey – wherein several states have ineligible list of persons under this category.  In fact, the BPL Survey should reflect the correct information about persons living below the poverty line and should exclude anyone who is found to be living above the poverty line.  The Ministry needs to re-examine the whole gamut of BPL families.

(iii)                              The most important problem being faced by the Ministry is the concurrent evaluation of large scale programmes being implemented simultaneously, therefore an independent and impartial concurrent evaluation of all the programmes/schemes being implemented by the Department should be made during the remaining period of the Eleventh Five Year Plan.  Central team of monitors to inform the Vigilance and Monitoring Committee at district levels about their visits to the district should be devised immediately.  This infact can be improved by identifying key resource persons who can visit the actual programme implementation site and spend some time with those who are involved with the programmes and then give the feedback to the ‘Monitoring Committee.’

(iv)                             It has also been observed and even it is mentioned that there remains a lot of ambiguity in providing a minimum of 100 days employment under MGNREGA vis-à-vis the budgetary allocation the Ministry should examine this aspect a fresh and remove this problem.  The provisions of the Operation guidelines of MGNREGA should be strictly adhered to for better results.

(v)                               Another area is to further substantially enhance the per unit assistance and definition of the dwelling unit under Indira Awas Yojana in consultation with the Ministry of Health suitable for a healthy living.

(vi)                             The Ministry of Rural Development should also construct rural under Roads Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana (PMGSY) with association of NABARD (National Bank for Agriculture & Rural Development) under RIDR as grants in aid to the various State Development Agencies for spreading the rural network.

Some of the issues which that I have highlighted requires a re-look for augmenting various programmes of Rural development Ministry.  Hence, I would request the Hon. Minister to bestow his attention to some of the issues which impinge upon the functioning of the Ministry.

 

*श्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला):  आज सदन में ग्रामीण विकास मंत्रालय पर चर्चा हो रही है। भारत जो गांव में बसता है और आज कुल आबादी का 80औ गांव में है, के बारे में चर्चा हो तो हम सभी सांसद उसे गंभीरता से लेकर उसके विकास की चिन्ता कर रहे हैं। चाहे वह प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना हो या महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना हो या इंदिरा आवास योजना हो या फिर राजीव गांधी विद्युतीकरण से संबंधित योजना हो। इसमें कोई दो राय नहीं कि ये सभी योजनायें ग्रामीण विकास  में आजन्म महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। परन्तु, मैं कुछ बिन्दुओं पर केन्द्रीय सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। जैसे इंदिरा आवास योजना की ही बात ले लें। योजना ठीक है। गरीब व गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का एक कमरा बनाने की योजना है। इस बारे में गत् जुलाई में मैंने इसी सदन में एक गैर सरकारी संकल्प पेश करते हुए सदन व सरकार का ध्यानाकर्षण किया था कि इसमें 38,500 रूपये की धनराशि से एक कमरा इस मंहगाई में नहीं बन सकता और पहाड़ी राज्यों में, जहां सड़कों का अभाव है तथा अन्य कई समस्यायें हैं। इसे बढ़ाना चाहिए। सरकार ने इसे बढ़ाया, इसका मैं स्वागत करता हूं, परन्तु इसे मैदानी क्षेत्र के लिए 45000 रूपये तथा पहाड़ी राज्यों के लिए 48,500 रूपये किया गया है, जो मैं समझता हूं कि वह बहुत ही कम है। इसे प्रति यूनिट एक लाख करना चाहिये तथा पहाड़ी राज्यों के लिए 25 प्रतिशत अधिक धनराशि देनी चाहिए ताकि वह गरीब लोग अपने आपको ठगा सा महसूस न करें। इस कम धनराशि के कारण बहुत से काम पूरे भी नहीं हो सकते। दूसरे, मैं सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि मनरेगा के माध्यम से आज गांवों में रोजगार तो मिल रहा है, योजना भी अच्छी न, परन्तु, इसमें कई खामियां हैं, इसे दूर करने में सरकार अवश्य ही अपनी ठीक योजना तैयार करे। मैं सुझाव देना चाहूंगा कि 100 दिनों को बढ़ाकर 200 दिन करना चाहिए ताकि रोजगार पाने वाला व्यक्ति कम से कम साल भर में आधा वर्ष तक तो रोजगार में रहे। मजदूरों को मजदूरी देने के लिए कोई ठीक योजना अपनाई जाये क्योंकि देखने में आया है कि जो पेमेंट बैंकों के द्वारा होती है उसे प्राप्त करने में कई स्थानों पर तीन-तीन दिन मजदूर अपनी दिहाड़ी को खराब करता है। सभी जगह बैंक नहीं है, डाकघरों द्वारा भी पेमेंट नहीं हो पा रही है।

          एक सुझाव मैं देना चाहता हूं कि इस योजना में जहां कहीं भी जानवरों के कारण किसानों की फसलें तबाह हो रही हैं और हम उन जानवरों को मार सकते नहीं। जैसे मैं हिमाचल प्रदेश की बात करूं तो वहां पर किसानों ने फसलें उगानी बंद कर दी हैं क्योंकि बंदरों, सुअरों व नीलगायों ने इतना आतंक मचा रखा है कि फसलों की रखवाली के लिए घर के सभी लोग इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें रोटी खाने का भी वक्त नहीं मिलता। इसलिए मैं चाहता हूं कि मनरेगा योजना में जानवरों की रखवाली हेतु भी सम्मिलित किया जाये ताकि गरीब लोगों को वहीं गांव में रोजगार भी मिले और किसानों की फसल भी बच सके। यही नहीं जंगलों को आग से बचाने के लिए भी फायद वॉचर के स्थान पर रोजगार उपलब्ध करवाया जाये यानि इस योजना में उसे भी सम्मिलित किया जाये। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत सभी गांवों को सम्पूर्ण विद्युतीकरण करने के साथ-साथ गरीब, अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग को पूरी तरह इस योजना का शत प्रतिशत लाभ दिया जाये।

          प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत सड़कों के लिए ग्राम की जनसंख्या को 100 तक निर्धारित किया जाये ताकि पहाड़ी क्षेत्रों को इसका लाभ मिल सके। फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट 1980 के अंतर्गत जो समस्यायें सड़कों को बनाने में आ रही है उसे और आसान करना चाहिए। नॉन कमर्शियल एक्टविटीज़ के लिए इस एक्ट को और डाईलयूट करना उचित होगा अन्यथा पहाड़ी क्षेत्रों में जो धनराशि केन्द्र से  pmgsy के अंतर्गत मिल रही है ,उसका उपयोग नहीं हो पा रहा है और कई कई वर्षों तक उसकी क्लियरेंस लेने में ही लग जाते हैं, जिससे इस महत्वपूर्ण योजना का लाभ पहाडी क्षेत्रों को नहीं मिल पा रहा है।

 

 

श्री विष्णु पद राय (अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह): सभापति महोदय, आज 62 साल बाद गांव के विकास के लिए ग्रामीण विकास मंत्री बैठे हैं, लेकिन रुपया कहां गया? मैं सुन रहा था कांग्रेस की युवा पीढ़ी की महिलाओं ने कहा कि रुपया कहां गया। लक्षद्वीप के माननीय सांसद चले गए, उदाहरण के लिए मैं आपको बताता हूं कि वर्ष 2010-11 में प्लान एलोकेशन में दिखाया गया है कि एक आदमी पर 46,000 रुपए खर्च होगा। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में इस साल प्लान में एक आदमी पर 20,000 रुपए खर्च होंगे। बढ़िया बात है, सुनने में फिगर अच्छी लगती है। अंडमान निकोबार के लिए नॉन प्लान फंड 1200 करोड़ मिलता है, उसमें पर कैपिटा एक्सपेंडिचर 30,000 रुपए होगा। इसका मतलब है अंडमान को एक साल में प्लान और नॉन प्लान में 2,000 करोड़ रुपए  मिलेंगे जबकि आबादी है 4,00,000 और एक आदमी पर 50,000 रुपया खर्च होगा। यह बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है। रुपया कहां गया? आज मैं क्यों कह रहा हूं और बोल रहा हूं कि हमें रुपया दो, हमें अंडमान बनाना है। यह बात सही है कि जितनी नैचुरल कैलमिटी होगी जैसे, आएला, सुनामी, बाढ़, सूखा आदि होगा और कुछ लोगों की जेब भरेगी, जीडीपी बढ़ेगी और इसका परिणाम है आईपीएल।

 

16.49 hrs.

(Dr. Girija Vyas in the Chair)

महोदय, मैं आपको अंडमान के बारे में बताता हूं, द्वीप समूह में रंग तहसील में पीने का पानी दो या तीन दिन बाद मिलता है। एक आदमी को 20 लीटर पानी मिलता है। पोर्ट ब्लेयर, अंडमान की राजधानी में पानी राशन में मिलता है। लिटल अंडमान में पीने के पानी की हालत खराब है। सुनामी, भूकम्प क्लाइमेट चेंज के कारण पानी का स्तर गिर रहा है। अब मैं आपको बताता हूं कि अंडमान में रुपया कैसे लीकेज हुआ? राजीव गांधी जी ने ठीक ही कहा था कि मैं एक रुपया दूंगा तो 15 पैसे पहुंचेगा। उन्होंने ठीक बोला, बढ़िया बोला।

राजीव गांधी जी ने ठीक ही कहा कि हम यहां से सौ रुपये देते हैं, लेकिन नीचे तक केवल 15 रुपये पहुंचते हैं। यह उन्होंने बिल्कुल ठीक बोला था। लेकिन मैं अनुरोध करना चाहता हूं कि आज भी सौ रुपये में से कितने रुपये नीचे तक पहुंचते हैं, यह आप सोचकर बताइये।

          मैं आपको एक उदाहरण बताता हूं कि अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में सुनामी के पश्चात मिट्टी के बांध बनाने के नाम पर साउथ अंडमान जिला परिषद ने करीब बीस करोड़ रुपये खर्च किये, लेकिन जो बांध बनाया गया, वह साइंटिफिकली नहीं बनाया गया, इंजीनियरिंग की एक्सपर्ट ओपिनियन लेकर नहीं बनाया गया। परिणामस्वरूप आज वह टूटने के कगार पर है। यदि मिट्टी के बांध स्ट्रैन्थनिंग करने के लिए रुपये नहीं दिये गये तो अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में अंडमान ट्रंक रोड, जो वहां की मेन नेशनल रोड है, उस रोड के साथ-साथ वहां के सारे गांव डूब जायेंगे, क्योंकि मिट्टी का बांध टूटना शुरू हो गया है। चूंकि जून-जुलाई में समुद्र में तूफान आते हैं। इसलिए मैं मांग करता हूं कि मिट्टी के बांध के नाम पर जो लोगों ने वहां घोटाला किया है, उनके खिलाफ सीबीआई इंक्वायरी कराई जाए।

          मेरी दूसरी मांग यह है, मैं इर्रिगेशन के बारे में सुन रहा था। खेत में पानी आयेगा, दूसरी फसलों की पैदावार बढ़ेगी और हरित क्रंति आयेगी।  अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में 62 सालों के बाद आज भी एक ही फसल है। चूंकि इर्रिगेशन का पानी आज तक खेतों में नहीं आया। इसलिए मैं सुझाव दूंगा कि वहां के लिए करोड़ों नहीं लाखों रूपये की जरूरत है, वह आप दीजिए। उत्तराखंड ने किया है, चैक डैम विद लॉक गेट। बारिश का पानी आयेगा, लॉक गेट खोल देंगे, पानी चला जायेगा। बारिश बंद होने के बाद लॉक गेट बंद कर दिया जायेगा और पानी रुक जायेगा। उस पानी से किसान अपने पम्प सैट्स से खेती करेगा और धान पैदा करेगा, सैकिन्ड क्राप पैदा करेगा। हम करोड़ों की प्रोजैक्ट नहीं मांगते, आप हमें लाखों रुपये चैक डैम विद लॉक गेट के लिए दे दीजिए।

          अभी प्रणव बाबू और अधीर बाबू बोल रहे थे कि पश्चिम बंगाल और बिहार में जमीन बारिश के कारण नदी और नालों के प्रवाह से खेती जमीन कटती है। आप उसे प्रोटैक्शन वाल देंगे। लेकिन अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में किसान के नाम पर पेपर्स हैं, रिकार्ड, पट्टा है, जमीन 15 बीघा दिखाते हैं, लेकिन हकीकत में जमीन 3 बीघा ही है। बाकी जमीन नाले, नदी में कट चुकी है। इसलिए मैं मांग करूंगा कि प्रोटैक्शन वाल के नाम पर हमें भी रुपया दिया जाए।

सभापति महोदया :  अब आप समाप्त कीजिए।

श्री विष्णु पद राय : मैंने अभी ज्यादा कहां बोला है। हमारा यहां कोई मुख्य मंत्री नहीं है, कोई और बोलने वाला नहीं है। …( व्यवधान)

सभापति महोदया : आपकी पार्टी से तीन-चार मैम्बर्स और बोलने वाले हैं।

श्री विष्णु पद राय : वर्ष 2001 में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना की 15 प्रोजैक्ट्स सैंक्शन हुई थीं और 28.95 करोड रुपये सैक्शन हुए थे और बीस करोड़ रुपये पहली किस्त के रूप में दिये थे। लेकिन वे प्रोजैक्ट्स पूरी नहीं हुई है। सितम्बर, 2009 तक 10.69 करोड़ रुपये खर्चा हुआ और एक संस्था साउथ अंडमान जिला परिषद ने पीएमजीएसवाई से रुपया लिया और उस रुपये से कंप्यूटर्स, प्रिंटर आदि सामान खरीदा। जबकि हमारे यहां पीएमजीएसवाई में कोई रास्ता नहीं बना। इसलिए मैं मांग करूंगा कि जो प्रोजैक्ट्स सैंक्शन हुई थीं और फाउंडेशन स्टोन ले किया गया था, उनके लिए रूपया दीजिए, ताकि वहां उक्त योजना में सड़क बन सके। यूपीए-1 सरकार के राज में पीएमजीएसवाई के नाम पर एक रास्ता भी नहीं बना। यूपीए-2 के राज में पीएमजीएसवाई में वहां रोड्स बने, इसके लिए मैं आपसे फंड मांग रहा हूं। इंदिरा आवास योजना में यूपीए-1 में पिछले पांच साल में अंडमान-निकोबार द्वीपसमूर में एक भी घर नहीं बना। इस साल फंड मिलना चाहिए। मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि इसमें घोटाला है, सरकार कहती है, ग्रामीण मंत्रालय कहता है, स्कीम कहती है – नो मिडिल मैन। रुपया बैनिफिशियरीज को सीधा मिलेगा। लेकिन अंडमान में क्या हो रहा है, सीमेंट, टीना, लोहा आदि के नाम पर घोटाला हो रहा है। इंदिरा आवास योजना में वहां रुपया सीधा लाभार्थियों को मिले, यही हमारा आपसे अनुरोध है।

          हमारी आखिरी मांग यह है कि साठ साल हो गये हैं, हमारे यहां बहुत से ऐसे गांव और नगर हैं, जहां आने-जाने के लिए रोड्स नहीं हैं, वहां बीचे में नदी-नाले आदि पड़ते हैं, जिनमें मगरमच्छ भी रहते हैं। ऐसे गांव पश्चिम सागर, रामनगर, राधानगर, सीतानगर, निश्चिंतपुर, खुदीरामपुर, मधुपुर, कमलापुर, प्रफुल्ल नगर, टोगापुर आदि -आदि गांवों के ऊपर जो नाले हैं।

उन पर ब्रिज बनाया जाये। आपको सुनकर दुखः होगा कि अंडमान में बीपीएल कुल आठ या नौ परसेंट बने। इस पर ध्यान देना चाहिए।…( व्यवधान)

सभापति महोदया :   आप इसे बिल्कुल संक्षेप में कर दीजिए।

श्री विष्णु पद राय : मैं एक मांग और करूंगा कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना जो पेपर और किताबों में है, उसे अंडमान में इम्प्लीमेंट करना चाहिए। मैं आखिर में मांग करूंगा कि गांव में शहर की तरह विकास के लिए जो स्कीम बनी उसका नाम पूरा है- (प्रोवाईडिंग अर्बन अमेनिटीज इन रूरल एरियाज़)। इसमें भारत सरकार बाकी राज्यों में जो कर रही है, वह अंडमान निकोबार में भी लागू करे। मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि मंत्री जी अंडमान पर ध्यान दें और उस पर चिंतन करें।…( व्यवधान)

 

 

* SHRI NRIPENDRA NATH ROY (COOCH BEHAR):    Respected Madam Chairperson, I am grateful to you for allowing me to say a few words in this august House today.  We are discussing the Demand for Grant of the Ministry of Rural Development 2010-11 and many honourable Members have already spoken on this subject. So, I will be very brief.  We have reached the 63rd year of our Independence and barring 10 to 12 years, most of the time it was the Congress Party which was at the helm of affairs.  Today, we are talking about the 100 days employment guarantee programme and a number of Members have expressed their views and suggestions on this. When the first UPA came to power with the support of the left parties, there was a demand for 100 days of work. During that time, the job guarantee law was framed.  Thereafter, the left have withdrawn their support and various lapses have creeped in. We talk about the poor people, we talk about rural development.  Now, we demand that instead of 100 days, the people should be provided with jobs for at least 200 days a year.

          क्योंकि ग्राम में काम नहीं मिल रहा है और गांव में काम नहीं मिलने के कारण लोग शहर में जाकर ये गरीब लोग और भूखे लोग निर्माण कार्य कर रहे हैं। ये निर्माण कार्य करने वाले लोग गांव से आये हुए गरीब लोग हैं। इसलिए इसे 200 दिन तक बढ़ाना चाहिए। हमारी एक और मांग है कि देश की आजादी के बाद आज 63 साल हो गये हैं। जो गरीब हैं उनके लिए घर बनने चाहिएं, हमारे गांव में अभी घर नहीं बने हैं। इंदिरा आवास की बहुत चर्चा हुआ। मैं बताता हूं कि इंदिरा आवास किसे मिलता है, जिसका बीपीएल में नाम है, उसे इंदिरा आवास मिलता है। जिस गरीब का नाम बीपीएल में है, उसे पीटी-1, पीटी-2, पीटी-3 इस तालिका के अनुसार इंदिरा आवास मिलता है। जिस गरीब का नाम नहीं है, उसे नहीं मिलता है। अभी हमारे देश में बीपीएल के लोगों की संख्या कितनी है? कौन सा दफ्तर बीपीएल की तालिका सलैक्ट करता है? पंचायत दफ्तर बोलता है कि जहां गांव में भूखे लोग 60-70 परसेंट है, जो भारत सरकार का योजना कमीशन है, वह बोलता है कि जहां 25-26 परसेंट है तो हम कौन सा प्रतिशत माने? इसलिए जिस तालिका से बीपीएल तालिका बननी चाहिए थी, सलैक्ट होनी चाहिए थी, वह अभी नहीं बनी है। यदि गांव को अच्छा बनाना है तो पहले बीपीएल तालिका को सही करना चाहिए। यह हमारी मांग है। एक मांग यह है कि जो प्रधानमंत्री सड़क योजना है, यह गांव के लिए ठीक है। इसमें यह कानून है कि जहां पन्द्रह सौ की आबादी है, हजार की आबादी है, इन्हें शहर से जोड़ने के लिए, बाजार से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना में रास्ता बने। मैं इसमें मंत्री जी को एक सुझाव देना चाहता हूं कि मैं वर्ष 2009 में पार्लियामेंट का मेंबर बना, मैं डीएम से बात करता हूं, पीडब्ल्यूडी के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर से बात करता हूं, यह सब इन एमपीज़ को मालूम है, लेकिन ये बोलते नहीं है। डेवलपमेंट के लिए प्लान वर्ष 2002-03 में बना, हमने कहा कि हम नया प्लान देंगे, पीडब्ल्यूडी वाले, डीएम बोलता है कि नहीं बनेगा। जो वर्ष 2003 में सीएनसी में, कोल फ्रिज प्लान में जो नाम दिया, वह कोल फ्रिज में है, पहले फेस वन, फेस टू, फेस थ्री, फेस फोर, फेस फाइव, फेस छह, और फेस सेवन, फेस आठ, आदि में काम होगा। इसके बाद आगे होगा। हम मेंबर वर्ष 2009 में बने और वर्ष 2003 में वह कोल फ्रिज हो गया, लोकेशन चेंज हो गया, उधर आबादी बढ़ गयी। जो प्लान वर्ष 2003 में बना, उसका नक्शा बदल गया और फिर वह कोल फ्रिज में आया, ऐसे बहुत रास्ते हुए हैं।

 

17.00 hrs.

उन्होंने बोला कि जहाँ एससी एसटी की पापुलेशन है, वहाँ कनैक्शन होगा। मेरे इलाके में दो-तिहाई एससी और एसटी वाले इलाके हैं। एक गाँव में 1000 एसटी के लोग हैं, ट्राइबल्स हैं, वे उस नक्शे में नहीं हैं। बीपीएल की तरफ से देखा कि जैसे हमारे इलाके में ऐसे गाँव हैं, इन तीन चार गांवों का बीपीएल तालिका में नाम ही नहीं है। एक ऐसा अंचल ब्लाक है जहां पीएमजी प्लान सही नहीं जा रहा है। हमारा इलाका 90 जीपी है। उसका 50 प्रतिशत जीपी पीएमजी प्लान के अंदर नहीं है। फेज़ 1 से लेकर फेज़ 9 तक कहीं भी नाम नहीं है। मंत्री जी से मेरी विनती है कि मैं 2009 से एमपी बना हूँ। 2009-10 के लिए जो प्लान बनेगा, सब एमपी लोग उसके लिए अपने सुझाव देंगे। हमारी मांग है कि जो पुराना कोलफील्ड्ज़ के लिए प्लान है उसे छोड़ दीजिए। उसे छोड़कर 2009-10 के लिए नया प्लान बने। …( व्यवधान)

सभापति महोदया :  आपकी बात हो गई है, अब कनक्लूड करें।

श्री नृपेन्द्र नाथ राय : हमारी मांग है कि आप डिस्ट्रिक्ट से नया प्लान मंगाइए। हमारी मांग है कि आज़ादी के 63 वर्ष बाद हमारे गाँवों का जितना विकास होना चाहिए और जितना उनको आपस में जुड़ना चाहिए उसके लिए नये सिरे से प्लान बनना चाहिए। जो जो इलाके और गांव प्लान में नहीं है, उसके लिए एम.पी. लोगों से सुझाव लेकर नया प्लान बनाना चाहिए। …( व्यवधान)

सभापति महोदया : उदय प्रताप सिंह जी, आप शुरू करें।

श्री नृपेन्द्र नाथ राय : सौ दिन के रोज़गार के बारे में सभी बोलते हैं, लेकिन हमारी मांग है कि 100 दिन के स्थान पर 200 दिन के रोज़गार की व्यवस्था होनी चाहिए। यही मांग करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।

                                                                                                   

*श्री गणेश सिंह (सतना): हमारा देश गांवों का देश है और इन गांवों में देश की 70 प्रतिशत आबादी निवास करती है ।  62 वर्षों की आजादी होने के बाद भी ग्रामीण विकास में भयंकर असंतुलन बना हुआ है ।  लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं हम दुनिया के मुकाबले में खड़ा होना चाहते हैं परंतु समस्याओं के निदान हेतु समयबद्ध कार्यक्रम नहीं चलाते इसीलिए राशि तो खर्च होती है परंतु उसका लाभ लोगों को नहीं मिल रहा है लोग सड़क, बिजली, पंयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए मुहताज है ।

          आजादी के बाद सर्वाधिक समय तक देश में कांग्रेस का राज रहा है लेकिन समयबद्ध कार्यक्रम नहीं बना पाये सिर्फ एनडीए शासनकाल में मा0 अटल बिहारी बाजपेयी जी ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, शुद्ध पेयजल, संचार क्रंति, सर्वशिक्षा अभियान, स्वास्थ्य सुविधाएं जैसी महत्वपूर्ण योजना चला कर देश के 6.5 लाख गांवों को विकसित विकास के साथ जोड़ने की योजना बनाई थी, इसलिए अब बड़ी तेज गति से गांवों में पक्की सड़कने बनना शुरू हुआ है ।  लोगों को पीने का पानी नहीं मिलता था लेकिन उसके लिए जल आवर्धन योजना बना कर एक प्रयास शुरू किया गया सबको शिक्षा मिले गांव के स्कूल पेड़ों के नीचे लगती थी लेकिन आज शत प्रतिशत पक्की स्कूलों के बनने का श्रेय अटल जी से दिया जा सकता है ।

           गांव की हालत ठीक नहीं है मैं उस कहावत की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं कि कोई तरस रहा अधिकारों को, कोई सूरज बांधे फिरता है ।  जिस देश के गांव में रहने वाले गरीबों की ठीक से पहचान न कर पायी हो उसके भावी योजना की क्या चर्चा की जाय प्रधानमंत्री ने कहा था कि 1 रूपये में मात्र नीचे 15 पैसे ही पहुंचता है ।

          यह हमारा अधिकारी वर्ग के लिए है क्या उसमें सुधार अभी नहीं हुआ गांव के विकास में जो राशि अभी तक दी गई है वह या तो कम थी या वहां तक पहुंचती नहीं।

          जब कि ग्रामीण क्षेत्र में उनके आबादी के अनुपात में राशि का आवंटन विकास के कार्यों में होना चाहिए ।  आबादी 70 प्रतिशत तो बजट भी 50 औ से अधिक होना चाहिए ।

          शहरो पुराने भवनों की जगह नये भवन बनते जा रहे हैं लेकिन गरीब का मिट्टी का मकान यदि गिर गया है तो पुनः वह गरीब आदमी अपना मकान नया नहीं बना पाया अभी राहुल जी गरीबों से मिलने गांव गये थ् उन्होंनं देखा कि टूटी खाट में पेड़ के नीचे गरीब आदमी अपना जीवन का बसर कर रहा है ।  यदि इतने वर्षों के बाद भी गरीब आदमी पेड़ के नीचे अथवा आसमान की छत के नीचे सोने के लिए मजबूर है तो इसकी सीधी गलती केन्द्र सरकार की रही है ।  आवास तो अभी गांव में दिया जा रहा है वह पंचायत को एक ही मिल रहा है जब कि गांवों में आबादी बिहीन परिवारों की लंबी सभी पंचायतों के पास दर्ज हे ।

          सरकार को चाहिए कि समयबद्ध कार्यक्रम चलाकर सभी आवास विहीन परिवारों को मकान उपलब्ध कराये तथा प्रत्येक गांव को पक्की सड़कों से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित करें ।

          आज गांव के लोगों के इलाज के लिए लंबी दूरी तय करना पड़ता है जो अस्पताल गांव में है भी वहां डाक्टर नहीं है , कंपाउंडर नहीं है, दवा नहीं है

          ग्रामीण क्षेत्र में लोग गंभीर बीमारियों से वे मौत कर रहे हैं ।  इलाज इतना महंगा है कि वो करा नहीं सकते ।

          सरकार कर्मचारियों के वेतन, सांसद, विधायकों के वेतन बढ़ाती जा रही है लेकिन गरीब को दी जानेवाली पेंशन नहीं बढ़ रही  है ।  आज की महंगाई में वह गरीब  क्या पानेवाली पेंशन की राशि से अपना पेट पाल सकता है कभी नहीं मेरी मांग है कि प्रत्येक वृद्ध, असहाय व्यक्ति को कम से कम 1000/. प्रति माह पेंशन मिलनी चाहिए ।

          प्रत्येक 10 किलोमीटर में 1 सामुदायिक अस्पताल । प्रति 3 कि.मी. में मा0 शा0 प्रति 5 किमी. में हाईस्कूल प्रति 7 किमी. में हायर सेकेंड्री स्कूल होनी चाहिए ।  प्रत्येक 1000 आबादी वाले गांव में नतजल योजना की स्थापना गांवों में पुरानी जल जल योजनाओं के रख रखाव हेतु केन्द्र सरकार द्वारा वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए ।  प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में बनने वाली सड़कों को जो गिटी 20 एम.एम. होता है वह अत्यंत कम है । उसे बढ़ाकर कम से कम 40 एम0एम0 किया जाना चाहिए ।  रोजगार गारंटी योजना में व्यापक सुधार की जरूरत है, सरकारी एजेंसी कार्य नहीं कर पा रही है, कार्य सिर्फ पंचायतें ही कर रही है ।

          गाँव में भ्रष्टाचार यदि बढ़ा है तो रोजगार गारंटी योजना जो प्रमुख रूप से सबसे आगे है, भारत के गांवों को आदर्श बनाना होगा, ऐसे गांव जहां आपसी विवाद न हो ।  ऐसे गांव जहां घरों में ताला न लगे ऐसे गांव जहां माह चारा सर्वोपरि हो ऐसे गांव जो आत्म निर्भर होवे, पूरी तरह विकसित होवे ऐसे गांव जहां गरीबी खत्म होवे, ऐसे गांव जहां स्वदेशी वस्तुओं पर आश्रित होवे तब नया भारत एक ऐतिहासिक भारत बनेगा मेरे लोक सभा क्षेत्र एक प्रतिष्ठित समाजसेवी माताजी देशमुख दीन दयाल शोधन संस्थान के माध्यम से 500 गांवों में ऐसा ही कार्य किया है जो एक उदाहरण है ।  इसी तरह के गांव बनाने की जरूरत है ।

          गांव की जिंदगी बनाने वाली मेरे प्रदेश के 5 जिलों के लाखों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करने हेतु करगी व्यापवर्तन सिंचाइ परियोजना  के नहरों के निर्माण का कार्य चल रहा है।

          उक्त परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना में शामिल किया जाए ।  मेरे लोक सभा क्षेत्र के अंदर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से निम्नलिखित सड़कों का निर्माण कराया जाय ।

 

1.       रामपुर ब्लॉक

          देश रहट दलदल देऊवरू गांजन मार्ग निर्माण

2.       वकिया गोलहटा टिकरी मार्ग,

3.       टिकुरी मगरबन्द्र, मिचवरिया मार्ग

4.       ओवर, अकौना खम्हरिया मार्ग

5.       अवेट बस स्टैण्ड से अवेट गांव होते हुए क्रेशर के पास तक की सड़क  निर्माण

6.       जमुना वैरिहा झाम्डर मार्ग का निर्माण ।

          प्रत्येक डिस्ट्रीक्ट हैडक्वार्टर में कोल्ड स्टोरजों का  निर्माण कराया जाए ।  

 

 

श्री उदय प्रताप सिंह (होशंगाबाद):माननीय सभापति महोदया, आपने मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदान मांगों के समर्थन में बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका बहुत आभारी हूँ। जैसा हम सब जानते हैं कि देश की प्रगति में ग्रामीण विकास मंत्रालय की भूमिका  सबसे महत्वपूर्ण है। मैं समझता हूँ कि यूपीए की सरकार दोबारा  इस देश में चुनकर आई, उसमें बहुत बड़ी भूमिका ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए कामों की है।          

          ग्रामीण विकास मंत्रालय ने लगातार गरीबों के हित में, गांवों की बेहतरी के लिए अनेक योजनाएँ इस देश में लागू की हैं। यूपीए की चेयरमैन आदरणीय सोनिया जी के नेतृत्व में जोशी जी पिछले एक वर्ष में इस मंत्रालय में जो कसावट लाए हैं, उससे हम देख रहे हैं कि निचले स्तर पर बहुत बदलाव आया है। मेरा मानना है कि इस देश का गाँव तरक्की करेगा तो देश अपने आप तरक्की करेगा। सरकार की भी मंशा है कि गाँवों में बेहतर विकास हो और ग्रामीण विकास मंत्रालय इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।

          माननीय सभापति महोदया, मैं इस अवसर पर कुछ सुझाव अपनी तरफ से देना चाहता हूँ। पीएमजीएसवाई और केन्द्र की अन्य योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य स्तर पर बेहतर हो, इसके लिए हमें यहाँ पर नियमों और निर्देशों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। फैडरल सिस्टम में केन्द्र में यूपीए की सरकार है और जिन राज्यों में यूपीए समर्थित सरकारें नहीं हैं, वहाँ केन्द्र की योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं हो रहा और उन पर सही काम नहीं हो रहा है। इसके लिए हमें यहाँ से नियमों में परिवर्तन करके कुछ दखलंदाज़ी करने की आवश्यकता है। आपने सतर्कता मूल्यांकन समिति जो बनाई है, उसका चेयरपरसन सांसद को बनाने के लिए निर्देश दिये हैं। उसके बाद सभी सांसद – चाहे वे सत्ता दल के हों या विपक्ष के हों, मेरी बात से सहमत होंगे कि नीचे की कार्य प्रणाली में हम परिवर्तन महसूस कर रहे हैं। मैं अपने राज्य मध्य प्रदेश में आपको बताना चाहूँगा जहाँ पर यूपीए समर्थित सरकार नहीं है, भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। अभी हमारे एक भाई बोल रहे थे कि हमारे यहाँ यह नहीं हो रहा, हमारे वहाँ वह नहीं हो रहा, हम अपना दर्द किसको बताएँ। राज्य के लोग बोलते हैं कि आप यूपीए की सरकार के सांसद हैं तो आपको यह काम कराना चाहिए। केन्द्र से पैसा भी बहुत आता है, ग्रामीण विकास मंत्रालय से बहुत पैसा मध्य प्रदेश गया है लेकिन वहाँ पर भाजपा की सरकार काम नहीं कर रही, गरीबों तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुँच रहा, इसके लिए हम कहाँ जाकर रोएँ। …( व्यवधान)

          महोदय, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में कई जगह आठ सौ तक की आबादी के गांव कवर हो गए हैं, लेकिन कई गांव ऐसे हैं, जहां आबादी 1400-1500 है, लेकिन आज भी वे सड़क के लिए मोहताज हैं। यह अंतर दूर होना चाहिए। हमारे नेता श्री राहुल गांधी महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के लिए बहुत सतर्क रहते हैं और इस योजना की तरफ अपना ध्यान भी देते हैं। मध्य प्रदेश में काली मिट्टी का क्षेत्र बहुत अधिक है, लेकिन काली मिट्टी का काम कराना वहां प्रतिबंधित है। मैं चाहूंगा कि वहां के लिए नियमों में कुछ लिबर्टी मिलनी चाहिए अथवा मजदूरों के लिए कोई अन्य लाभ यहां से जाना चाहिए। मध्य प्रदेश कृषि आधारित प्रदेश है। खेती के समय में जब रोजगार के काम चलते हैं तो किसानों को बहुत दिक्कत आती है। खेती के समय में रोजगार गारंटी के कामों में शिथिलता बरती जानी चाहिए ताकि खेती के काम निबटाएं जा सकें। इंदिरा आवास योजना, स्वजल धारा योजना और कपिल धारा योजना मॉनिटरिंग के अभाव में दम तोड़ रही हैं। मैं चाहूंगा कि मंत्री जी ऐसी कमेटी बनाकर वहां भेजें जो वहां जाकर जांच करे, सर्वे करवाए। मेरे संसदीय क्षेत्र का नरसीपुर, हौशंगाबाद और रायसेन जिला, जहां से प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज सांसद हैं, वहां केन्द्र सरकार की योजनाएं दम तोड़ रही हैं, कहीं कोई सुनने वाला नहीं है, कहीं कोई देखने वाला नहीं है।

          महोदया, वर्ष 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी ने हौशंगाबाद जिले में नहरों का निर्माण करवाया था, लेकिन आज वे नहरें सीमेंटीकरण के अभाव में दम तोड़ रही हैं। मैं आपके माध्यम से सरकार से निवेदन करूंगा कि उन नहरों के सीमेंटीकरण का काम हो। हमारी स्वर्गीय नेता ने वहां के किसानों के लिए जो कार्य किया था, उसका लाभ उन तक पहुंचा सकें। अंत में मैं कहना चाहता हूं कि रोजगार गारंटी योजना में सांसद निधि के कन्वर्जन के लिए मंत्री जी आदेश जारी करेंगे, तो इससे हम लोग और बेहतर विकास करवा पाएंगे।

 

 

* SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Long back Gandhiji had asserted that India lives in its villages.  But that is not the case now, today.  There are two fractured entities – one, Bharat and the other, India. While evaluating the trajectory of our economic growth or even our success as a nation we are not divided solely along rural-urban lines; even one’s facility with the English language is sufficiently sharp classification to stir the Bharat-India debate.  Human development indices and anecdotal evidence do suggest nevertheless that while urban India has benefited from economic liberalization rural India has not.

          Rural India does not in practice have an independent economy.  It depends primarily on the state.  Government of India has not liberalized its delivery systems.  Our planners and administrators have an urban policy and a rural policy.  What the country lacks is a policy in the middle to meet secondary needs.  That is why both our villages and cities are in the mess. We have heard of town plans, which unfortunately hardly ever exist in our towns and cities.  But do we have village plans?  Plans that will make our villages distinctly better than what they are today?  Apparently, we are so concerned about growth that we little time on money to invest on such issues of development.  We invest so much on individual villages, or individual families or even individuals that there is nothing to spare for villages as a whole.  We are looking at trees only forgetting the forest.

          The basic function of the Ministry of Rural Development is to realize the objective of alleviating rural poverty, ensuring improved quality of life for the rural population especially for those living below the poverty line.  The overall Demands for Grants of the Department is 2010-11 are for Rs.137887.98 crore.  However, after deducting the recoveries of Rs.71750.12 crore expected during the year, the net Budget of the Department during this fiscal is Rs.66137.86 crore both for Plan and non-Plan.

          Ministry of Rural Development has a Department of Drinking Water Supply.  Though rural water supply is a state subject, this Department supplements the efforts made by the States by providing financial and technical assistance under the Centrally Sponsored Schemes.  National Rural Drinking Water Programme is to assist the States to provide safe drinking water in the rural areas of the country and the Total Sanitation Campaign is aimed at achieving 100 percent rural sanitation coverage.  The Demands for Grants in respect of this Department is Rs.10583.78 crore with Plan component of Rs.10580 crore.

          The third Department is of Land Resources. Since land is a state subject, this Department gives financial support to states for the purpose of watershed development and land development activities in rural areas in the country. We have number of programme such as Integrated Wasteland Development Programme, Drought Prone Area Programme and Desert Development Programme. In addition, the Department administers two schemes of Computerization of land records and strengthening of Revenue Administration and updating of Land records.

          The overall Demands for Grants of the Department of Land Resources for the year 2010-11 is Rs.2665.80 crore out of which the lion share goes to IWMP (Rs.258 crore), NLRMP (Rs.200 crore).  One can presume that the total Demand for Grant of this Rural Development Ministry of Rs. 79397.44 crore leaving aside the Demand for Grant of Panchayati Raj which is Rs.5170.71 crores.

          When we are discussing on Demands for Grants of Rural Development, one has to fall back on the progress that has been made during last three years of the Eleventh Five Year Plan.  It is found that during 11th Five Year Plan 2007-08 upto 2011-12, the funds meant for planned schemes were fixed at Rs.3,28,579.72 crore.  One is dismayed to find that the expenditure is only of 42 percent. Only Rs.1,39,475.93 crore has been spent upto 18th March, 2010 which should have been above 60 percent.

          An important job to be done by Rural Development Ministry is to conduct Below Poverty line census every five years.  The last census was conducted in 2002 for the 10th Five Year Plan. For 11th Plan period, Ministry had constituted an Expert Group to advise the methodology under the Chairmanship of Dr. N.C. Saxena.  The Expert Group submitted its report on 21st August 2009.  But Planning Commission is the nodal agency for estimation of poverty ratio of persons living below the Poverty line.  Yet, Rural Development formulates the mythology for identification of BPL households in rural areas.  One is reminded that as per the Outcome Budget 2009-10 the Supreme Court of India on 14th February 2006 had directed that the Methodology for the next BPL survey should be finalized by the beginning of the 11th Five Year Plan.  Till date, there is no finality of the BPL list.  Only two years of the Eleventh Five Year are remaining.  Can the Minister tell us, when the latest BPL census will be applicable for 11th Five Year Plan.   Can the Minister appraise this House the rationale for applying latest BPL Census for the 12th Five Year Plan?  Will it be applicable for next five years?  Don’t you think a single BPL list is desirable for extending the benefits to the poor?  We are aware that the earlier BPL census conducted during 1992-97 and 2002 by the Ministry of Rural Development had reflected many irregularities and shortcomings.  Several ineligible beneficiaries were selected as people living below poverty line.  Can’t you exclude ineligible BPL card holders from the BPL list? If there is no provision, it should be built in.  The benefits of schemes meant for the BPL population should reach the deserving people only.  I also suggest BPL survey be carried out at the beginning of each Five Year Plan.  The Minister should explain why no BPL Survey was done during 11th Five Year Plan.  The Minister should explain why no BPL Survey was done during 11th Five Year Plan?  Don’t you have the funds?  I find Rs.312 crores has already been made available for conducting the latest BPL survey.  Why don’t you utilize it fully within the target time?

          One is surprised to find that as per instruction of Planning Commission, Statewise allocation Funds under various programmes of the Department including IAY and SGSY is made on the basis of adjusted share worked out in 1993-94 poverty ratios by the Planning Commission.  More than 17 years have elapsed.  How can you allocate funds on that calculation? Can’t the Minister impress upon the Planning Commission?

          I would also suggest that as there is no permanent office of the District Vigilance and Monitoring Committees the Ministry should find out ways and means to establish and functionalise a permanent office of the District Level Vigilance and Monitoring Committee in each district within this financial year.

          The Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act, it is said, provides for enhancement of livelihood security of the households in rural areas of the country by providing atleast one hundred days of guaranteed wage employment in every financial year to every household whose adult member volunteer to do unskilled manual work.  It is also said that this Act aims to provide a social safety net for the vulnerable groups and an opportunity to combine growth with equity. It is claimed that MGNREGA is a paradigm shift from the wage employment programme.  It is an Act, a right’s based framework, that provides legal guarantee.  It is demand driven, not supply driven approach as in earlier programmes.  I have gathered that during 2009-10 only 3.68 crore job card holder households could demand work out of 10.91 crore household job cards issued. Does not this indicate that two-third job card holders could not get jobs under MGNREGA during 2009-10?

          Even the one-third of the job card holders who actually, got job, could get only 51 days of employment.  Has it occurred to the Government to exclude those job card holders who are not  demanding jobs over a long period of time?  This MGNREGA has bee instrumental in increasing the minimum wages for agricultural labourer, the bargaining power of labour has increased, earnings per household had increased too.  But it has affected the availability of agricultural labour in the rural areas.

          In the year 2000 about 40% of India’s 825000 villages lacked all-weather roads.  The World Bank says, with access to roads, incomes have soared; household incomes rose by 50 to 100% on an average.  It has raised literacy rate by 10% and appreciated land prices by up to 80%. World Bank says ‘for every 1 million rupees spent on rural roads, 163 people were lifted out of poverty. Farmers  receive better prices for their produce by accessing markets. Yet, I would say the achievement of PMGSY is not at all satisfactory.  For example, till date 63 percent of the targets have only been achieved.  Regarding length of new connectivity only 69 percent target has been achieved.  With this pace how are you going to achieve the goal of Bharat Nirman? 

          I am told by not providing the last mile connectivity of around 7700 kms, around 8045 habitations in the country remain to be connected.  Can’t you provide priority to the last mile construction of PMGSY roads?  For roads, I must state here that till February 2010, under PMGSY 4955 habitations have been provided connectivity against the target of 13,000.  During this period 48,921 kms road works have been completed against a target of 55,000 km.  Can we boast of great achievement in this regard? 

          Rural Housing Scheme is one of the six components of Bharat Nirman Programme.  Under Bharat Nirman Phase-I, 60 lakh houses were envisaged to be constructed from 2005-06 to 2008-09.  As against this target, 71.76 lakh houses were constructed thereby exceeding the target. The physical target for Bharat Nirman, Phase II is for construction of 120 lakh houses over a period of five years starting from 2009-10.  The Government has revised the Unit Assistance from Rs.35,000 to Rs.45,000 for new constructions in plain areas and Rs.48,500 in hill areas as against Rs.38,500/-.  This is a welcome step no doubt but is too low as per the existing cost.  This Rural Housing Scheme IAY is being implemented since 1985-86. From 2005-06 onwards the allocation criteria for IAY has been modified to assign 75 percent weightage to housing shortage and 25 percent to poverty ratio for the state level allocation.

          There is a scheme for allotting homestead plots. Rs.10,000 or actual, which ever is less, on the basis of 50:50 funding by center and state.  But it is learnt proposals have been received from Karnataka, Kerala, Sikkam, Bihar, Rajasthan, Mizoram and Maharashtra and Gujarat only in  2009-10.  What about the other states?  They don’t need this money or they are not aware about it?

          While deliberating on the performance of Indira Awas Yojana one can clearly say that it is not satisfactory.  Physical achievement is less than 50 percent as only 18.16 lakh houses have been completed against the target of 40.52 lakh houses.  Another disturbing fact is that the number of houses “under construction” category is 27.21 lakh which means construction will spill over to this financial year.

          When Pudducherry is already providing Rs.1 lakh for construction of a dwelling unit in rural area, there is a need that a decent dwelling unit cannot be constructed even with the existing definition. There is need to enhance the per unit assistance substantially and define the dwelling unit under IAY suitable for a healthy living in consultation with the Ministry of Health.

          The Council for Advancement of People’s Action and Rural Technology (CAPART) came into existence in 1986 following the merger of two erstwhile societies, namely, People Action for Development India(PADI) and Council for Advancement of Rural Technology (CAPART).  It’s principal aim is to involve the people in the implementation of development programme and promote need-based projects through NGOs. The BE of CAPART has been doubled from Rs.50 crore in 2009-10 to Rs.100 crore in 2010-11. But the physical targets have not increased commensurate with the enhanced allocation this year. Physical target has been increased from 950 projects previous year to 1340 projects last year.  But you will be surprised to know that against a target of 950 projects the CAPART has an achievement of 54 projects only. Against the target of 50 Gram Shree Melas only 6 Melas has been arranged.  Financial achievement has come down to 47  percent during 2009-10.  What is happening in CAPART?  The Minister should take stock of things.

          Prime Minister is saying “his government gave priority to poverty alleviation and would work to improve the quality of public system and delivery of public service for employment generation and rural prosperity.  Though specific allocation of Rs.68,000 crore have been made to meet the challenges on various poverty alleviation programme, actual implementation of the fund is essential”.  These are not my words-these are Prime Minister’s words.  What I have stated earlier are the glaring examples of the functioning of this Ministry.

          I may mention about the case of Odissa.  Due to inadequate funding by the Government, it is becoming difficulty to sustain the pace of implementation of ongoing projects to provide connectivity to the habitations identified for the purpose. As against funds released to the time of Rs.5197.22 crore, Rs.5371.98 has been spent by untilizing the interest available.

          There is no provision under PMGSY to include escalation cost of the materials and excess spent towards tender premium.  It is worth mentioning here that projects costing Rs.9958.74 crore have been sanctioned in the very beginning and over a period of one decade, there is no merit in saying that Government of India share has been frozen and any additional cost, including for the delay in release of funds has to be paid by the State Government.

          The Central Government’s share under CSP, ARWSP was Rs.14,557.80 Lakhs for 2005-06.  Rs.11,904.16 lakhs for 2006-07, Rs.29,786.46 lakhs for 2007-08, Rs.30,214.08 lakhs for 2008-09, Rs.23,011.95 lakhs for 2009—10 and Rs. 20,488 lakhs for 2010-11.  Due to reduction of Central share during 2009-10, activities relating to supply of drinking water in Rural Areas is getting adversely affected.  There is an urgent need to provide Rs.400 crore more during 2010-11 to mitigate the hardship of the rural people.

          Experts agree Bharat Nirman which has completed four years, has indeed bought about significant improvements in the country’s infrastructure.  But most of us feel it’s time to take a step forward to see whether targets are being achieved without paying adequate importance to quality and sustainability. Economists call it the “U” with “Q” which is utilization without quality factor.  This is the progress by Bharat Nirman.  The drinking water scheme is a glaring example.  When the scheme began in 2005, areas which went back  to being dry constituted 63.36 percent of the target. Ironically that number has gone upto 88.21 percent in 2009. The situation is similar in the rural housing scheme where on paper, 100 percent targets have been met, but the reality may be different, as the scheme records only the number of projects sanctioned and does not take into account the actual work done.

          That is why Planning Commission Member Arun Maira said, pumping in more money through the pipes is not the solution, as it increases the risk for leakages.  The focus should be better utilization by minimizing the bottlenecks and thereby increasing the effectiveness of the targets achieved.

          With these words, I conclude.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

*श्री रमाशंकर राजभर (सलेमपुर):भारत की आत्मा गांवों में बसती है, जहां के उत्पाद सम्पूर्ण भारत को जीवन देते हैं। वर्ष 2009-10 वैश्विक आर्थिक मंदी का दौर रहा। भारत ने ही नहीं सम्पूर्ण विश्व ने इसे झेला है, जिसमें सर्वाधिक वृद्धि खाद्य तथा ऊर्जा संबंधी कीमतों की हुई। कम रोजगार अवसरों के कारण कम क्रय शक्ति, सामाजिक क्षेत्रों से सरकारी प्रोत्साहन वापस लने के फलस्वरूप भारत में निर्धनों एवं वंचितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। समावेशी आर्थिक विकास के सिद्धांत से सरकार पीठ थपथपा रही है और मान रही है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अप्रत्याशित उछाल आया जो मात्र आंकड़ों में है, धरातल पर नहीं, मनरेगा योजना जो मात्र साल में 100 दिन की मजदूरी गारंटी देता है, शेष दिन मजदूर क्या करेगा। यह योजना भी पंचायत, बैंकों व व्यवस्थापकों को मालामाल कर रही है। सरकार क्यों नहीं तुंत भुगतान का इंतजाम करती। मजदूर से कहा जाता है, दो दिन काम करो, 20 दिन का भुगतान निकाल कर दे दो, बिना काम किए ही 10 दिन का पैसा निकालो दो दिन का ले लो, शेष दे दो। प्रति ग्राम पंचायत 10 से 25 लाख धन प्राप्त हुआ, परन्तु काम दो लाख का भी नहीं दिखता जब तक ब्लाक व जिलों का अधिकारी 30औ कमीशन न ले ले तब तक गांव सभा एवं ब्लॉक को धन स्वीकृत नहीं करता है । 60औ कच्चा कार्य एवं 40औ पक्का कार्य का पेच समझ से परे है। सम्पर्क मार्ग कार्य व पोखरा खुदाई कार्य कुछ दिख भी गया, शेष विभाग का कार्य कहीं नहीं दिखता, इंदिरा आवास योजना में हालत यह है कि बीपीएल सूची के पात्र को देना है। बीपीएल सूची ही गलत है, 25औ ही उसमें पात्र है उसमें भी जो ही सुविधा शुल्क देता है पात्र हो जाता है । जब आवास ही बनाना है तो देश में व्यक्तियों की गणना क्यों, झोपड़ियों की ही गणना क्यों नहीं होती है। आखिर हर वर्ष आवास बनते हैं तो देश से झोपड़ियां क्यों नहीं खत्म हो रही है। हमारे क्षेत्र जनपद बलिया के तहसील- वासडीह, सिकन्दरपुर, वेल्व्यरा रोड, जनपद देवड़िया के तहसील- सलेमपुर माटपारा में मात्र फरवरी व मार्च में 2400 झोपड़ियां जली हैं। पांच बच्चे जल मरे, सैंकड़ों पशु मरे, प्रदेश सरकार ने पांच घंटे के अंदर उपलब्ध सहायता दिया, परन्तु बीपीएल में नाम न होने के कारण झोंपड़ी इंदिरा आवास योजना से नहीं बन पायेगी। गरीब फिर झोंपड़ी तैयार करेगा फिर उसका सब कुछ जलेगा। मैं मांग करता हूं आग लगी से जले झोंपड़ी शुदा परिवारों को बीपीएल से छूट दिया जाये। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम समेकित वाटर शेड प्रबंधन कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल मिशन, कहीं ग्रास रूट लेबल पर नहीं दिखता। राष्ट्रीय ग्रामीण

जीविकोपार्जन मिशन की रूपरेखा धरातल पर कब तक आयेगी, पता नहीं। 70औ से अधिक आबादी ग्रामीण है बजट का 70औ ग्रामीण हित में क्यों नहीं खर्च किया जाता। क्या यह सही नहीं कि ग्रामीण सुविधा वंचित है इसलिए शहर में भीड़ बढ़ाता है। सरकार वंचितों की बात करती है आलम यह है कि उनके मुहल्ले में स्कूल के लिए भूमि ही आरक्षित नहीं है। स्वास्थ्य केन्द्र पर एसडीओ जाना नहीं चाहता सरकार बताए क्या कारण है। बिजली लगनी शुरू होती है तो गरीबों का मुहल्ला आते ही तार पोल समाप्त हो जात हैं, सड़क बनती गरीबों के मुहल्ले आते ही समाप्त होती है। राशन कार्ड, राशन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, संरक्षण और इनके विकास के लिए संचालित योजना इन तक पहुंचाने के पहले समाप्त हो जाती। पहुंचाने वाले मालोंमाल हो जाते हैं। मैं सरकार से मांग करता हूं कि ग्रामीण विकास की संचालित योजनाएं गरीबों के मुहल्ले से प्रारंभ की जाये। पहुंचाने वाली एजेंसियों की कड़ी निगरानी की जाये। अंत में मैं मांगों पर बल देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं,

 

 

 

*SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT): Hon. Madam Chairperson, India lives in its villages.  If villages do not develop, the entire nation will remain underdeveloped.  70% of the population of the country is found in the villages out of which, 60% is poor.  Therefore after independence,  it was the Congress party which had decided that excess land with the big landlords and big cultivators would be distributed among the poor and marginal farmers through land reforms.  This would lead to their economic advancement, more income and better standard of living.  Also there would be increase in agricultural productivity that would result in reduction and stability in food prices.  It would also give a boost to the manufacturing sector.  But unfortunately this plan was not properly implemented by the Government resulting in under-development of the rural areas.  I can cite an example.  In this year’s Budget Rs.40,100 crores have been earmarked for NREGA whereas our population is of 110 crores.  Suppose we pay Rs.100 to each person, then how many families would be covered? Only a few.  Similary Bharat Nirman Scheme has been mooted under which the issue of housing is addressed.  In the first phase of this scheme only 71,000 dwelling units has been set up.  Do not forget the population figure, I repeat, it is 110 crores.  So if you calculate, very minimal progress would be visible in this sector.  Same is the story of PMGSY.  All the roads which have been constructed are unmetalled and in bad shape.  No one can possibly use these roads.  The scheme of carpeting the roads is a good scheme.  If roads are properly constructed then infrastructure will develop; the cultivators will be able to transport their produce to the towns and cities for marketing and will earn profits.  In turn the service sector will grow.  But when will all these happen? How long do we need to complete the projects?  To date only 1,18,719 km of roads have been built, according to the figures available with me.  Only 60,073 villages have been connected with roads. 

You can well imagine the quantum of work yet to be done.  If we move at this pace, we will definitely lag behind.  This should be kept in mind.

          Another issue is that, planning is good.  But implementation has to be better.  There is definite lack of transparency and honesty. When roads are constructed, the monitoring committees should assess the progress and keep a vigil on the work done by the contractors.  However, no such monitoring is ever done.  Contractors function whimsically as a result of which quality of work suffers. The longevity of the roads and other infrastructure is always compromised with in this manner.  They do not even remain useful for 5 years. The contractors and bureaucrats collude with each other to reap profits.  They infact pocket the funds which are earmarked for social sector development.  The Government should keep a keen eye on this kind of malpractice.  There is not an iota of transparency in the NREG Scheme. The law is merely on paper; nothing is to be seen at the grassroot level.  The master rolls are always absent at the site. What are the problems that crop up due to this?  Firstly, the sum of money is sent to the Local Post Office which is turn transfers it to the Head Post Office and from there on, it goes to the banks.  The banks then channelise the sum to the panchayats.  So there is a great delay in disbursement of payments.  The poor, hapless labourers expect that they would be paid immediately after their work is over.  But delay in payment inks them and makes them disinterested in their occupation.  Therefore they try to migrate from the villages.

          During the initial years, NREGA was working fine and there was much hype about this ambitious scheme.  But gradually the bubbles were bursted.  The workers do not feel enthusiastic about getting jobs under NREGA.  Lack of transparency is one of the reasons why the scheme is on the verge failure.  Until clarity and transparency are brought about, nothing much can be achieved.  Cutting across party lines we have to ensure proper, lucid implementation of the programmes that are undertaken, otherwise, no development will be possible in our country.

 

          I would like to wind up by mentioning that our BPL lists are extremely erroneous.  For patty political, religious, cultural,  socio-economic interests,  scores of fake names are included in the lists.  Therefore the actual beneficiaries are being deprived from their due share of social resources; they are at the receiving ends. The country is being run in such a manner that genuine prosperity and growth remain evasive.  Even with so many laws and schemes, India is not progressing much because there is dearth of proper implementation of plans.  So my request to the Government would be that kindly be a little more strict and have effective vigilance over the work that is being done.  Punitive action must be taken against the erring officials in order to regain the trust of the countrymen.

 

          With these words, I thank you for allowing me to participate in this debate and conclude my speech.

                                                                                                   

 

 

श्री हरीश चौधरी (बाड़मेर):सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं। भारत गांवों का देश है, भारत की आत्मा गांवों में बसती है। भारत का विकास तब तक नहीं हो पाएगा, जब तक गांवों का विकास नहीं होगा। अगर देश को खुशहाल बनाना है तो गांवों को खुशहाल करने की पहली शर्त पूरी करनी होगी। विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र देश को सफल बनाने का रास्ता गांव की गलियों से होकर जाता है। केन्द्रीय बजट सन् 2010-11 में ग्रामीण विकास मंत्रालय में तीनों विभागों का बजट आवंटन बढ़ा है, जिसके लिए मैं यूपीए चेयरपरसन सोनिया गांधी जी और मनमोहन सिंह जी को तहेदिल से धन्यवाद देना चाहता हूं। भू-सुधार विभाग में 31.5 प्रतिशत, पेयजल आपूर्ति विभाग में 15.1 प्रतिशत और ग्रामीण विकास विभाग में   6.3 प्रतिशत रहा है।

          सभापति महोदया, वर्ष 2009 और 10 के टारगेट और एचीवमेंट्स में, मैं उदाहरण के तौर पर एस.जी.एस.वाई योजना के बारे में बताना चाहता हूं कि इसमें टारगेट 1.5 लाख सैल्फ-हैल्प ग्रुप को सहायता देने का लक्ष्य था, परन्तु दिसम्बर 2009 तक, सिर्फ 65 लाख सैल्फ हैल्प ग्रुप को ही सहायता दी गई। इंदिरा आवास और पी.एम.जी.एस.वाई. में भी यही स्थिति है। जो लक्ष्य हम निर्धारित करते हैं, वे क्यों प्राप्त नहीं हो रहे हैं, इस बारे में हम सभी को सोचना चाहिए? 

          महोदया, केन्द्र सरकार योजना बना सकती है और धन उपलब्ध करा सकती है, परन्तु योजनाओं का क्रियान्वयन संघीय ढांचे के अनुसार सिर्फ राज्य सरकारें ही कर सकती हैं। मेरा राज्य सरकारों से निवेदन है कि ग्रामीण विकास की इन योजनाओं, जिनसे गांवों और गरीबों का विकास हो सकता है, प्राथमिकता से कार्यान्वित किया जाए।

          महोदया, इस मौके पर मैं राजस्थान सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि वह महानरेगा के उद्देश्य को प्राप्त करने में अव्वल रही है। मेरे लिए श्री गोपी नाथ मुंडे जी बहुत आदरणीय हैं। वे राजस्थान के प्रभारी भी थे। एम.पी. बनने से पहले से मैं उन्हें बहुत अच्छे ढंग से जानता हूं। सदन में इन्होंने बताया कि इंदिरा आवास योजना में गरीबों को कोई भी धन मुहैया नहीं कराया जा रहा है। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि राजस्थान में गरीबों को धन मुहैया कराया जा रहा है। इसलिए जब श्री मुंडे जी ने यह बात कही, तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। राजस्थान में केन्द्र सरकार की ओर से जो भूमिहीन और गरीब हैं, उन्हें 5,000 रुपए दिए जाते हैं और राज्य सरकार की ओर से 5000 रुपए और एडीशनल दिए जाते हैं।

          महोदया, इंडीविजुअल बैनीफीशियरी के बारे में बताया गया कि बहुत भ्रष्टाचार हो रहा है। मैं बताना चाहता हूं कि मेरे खुद के संसदीय क्षेत्र बाड़मेर और जैसलमेर के बारे में, नरेगा में अगर सबसे बेहतरीन कहीं काम हुआ है, तो वह इंडीविजुअल बैनीफीशियरी के लिए मेरे संसदीय क्षेत्र में हुआ है। 50 हजार टांके, टांके पौंड होते हैं, जिनके अंदर बरसात के पानी को इकट्ठा किया जाता है, बनाए गए हैं। इस प्रकार देखा जाए तो 50 हजार इंडीविजुअल परिवारों को सहायता मिली है। इससे अच्छे काम की हम किसी अन्य योजना के अंदर कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

          महोदया, इस अवसर पर मैं डॉ. सी.पी. जोशी जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने महानरेगा में राजीव गांधी सेवा केन्द्र के रूप में 2 लाख पंचायतों में मिनी सचिवालय बनाने का लक्ष्य रखा है। महानरेगा के कार्यों में एस.सी.एस.टी. और बी.पी.एल. के बाद लघु और सीमांत किसानों को शामिल किया गया है, इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देना चाहता हूं। इंदिरा आवास में जो सहायता धनराशि 22,500 रुपए थी, उसे बढ़ाकर 45,000 रुपए कर दिया गया है। इसके लिए भी मैं उन्हें धन्यवाद देना चाहता हूं। इसके अलावा और भी अनेक ऐसे कार्य किए गए हैं, जिनका उल्लेख मैं समय कम होने के कारण नहीं कर पा रहा हूं।

          महोदया, आज देश में अगर किसी चीज की जरूरत है, तो वह सबसे पहले और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है पेयजल की आवश्यकता। सुप्रीम कोर्ट ने भी Andhra Pradesh Pollution Control Board versus Prof. M.V. Naidu  केस में, वर्ष 2000 में अपने फैसले में लिखा था-

“The right to access to drinking water is fundamental to life. There is a duty on the State under Article 21 to provide clean drinking water to its citizens.”

 

          महोदया, 8 मार्च, 2010 में अनस्टार्ड क्वैश्चन नं. 1580 का रूरल डैवलपमेंट मिनिस्ट्री की ओर से जवाब दिया गया कि राइट टू वाटर अथवा उसे फंडामेंटल राइट मानने के बारे में अभी कोई प्रस्ताव मिनिस्ट्री में नहीं है। मैं केन्द्र सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि इंसान की सबसे पहली और सबसे बड़ी जरूरत पीने के पानी की है और उसके बिना वह जिन्दा भी नहीं रह सकता है। इसलिए राइट टू वाटर, भारत के नागरिकों की सबसे पहली आवश्यकता है। अतः मैं मंत्री महोदय से निवेदन करना चाहता हूं कि इस बारे में जल्दी ही कोई फैसला लिया जाए।

          महोदया, रूरल डैवलपमेंट में, डैजर्ट एरिया के लिए, जो पहले   70 लीटर, पर कैपीटा, पर डे के अनुसार 40 लीटर मानव के लिए और 30 लीटर पशुओं के लिए रिक्वायरमेंट मानी थी, उसे अब संशोधित कर के 10 लीटर पर कैपीटा, पर डे के अनुसार ड्रिंकिंग वाटर की स्कीम बनाने की योजना बनाई है और उसके अनुसार सोर्स उपलब्ध कराने का काम किया जा रहा है।

          सभापति महोदया, आप खुद अच्छी तरह से जानती हैं कि डैजर्ट के अंदर सरफेस वाटर के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। मेरे खुद के संसदीय क्षेत्र में एक भी नाला, नदी या बांध नहीं है। अगर हम लोग डिपैंडेंट हैं, तो सिर्फ सरफेस वाटर पर ही डिपैंडेंट हैं। मेरा आपके माध्यम से मंत्री महोदय से निवेदन है कि वे पहले की भांति   70 लीटर पर कैपीटा, पर डे के हिसाब से मानदंड निर्धारित कर के योजना बनाएं और उसके अनुसार पानी के सोर्स उपलब्ध कराएं। मेरा एक और सुझाव है कि जो फायनेंश्यल इंस्टीटय़ूट, जो नरेगा के अंदर पेमेंट करते हैं, वे छोटी-छोटी को-आपरेटिव सोसायटीज हैं, उनके लिए भी इसके अंदर अनुदान दिया जाना चाहिए। मेरा एक और सुझाव है कि नरेगा के अंदर जो निजी टांके और दूसरे काम हो रहे हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि निजी आवास को भी इस योजना में सम्मिलित किया जाए, ताकि देश के गरीबों को छत मुहैया कराने का जो एक सपना हमारे नेता श्री राहुल गांधी जी का था और जो उनका लक्ष्य था कि दो तरह का हिन्दुस्तान नहीं रहना चाहिए, वह पूरा हो सके।  लोगों के लिए चमकता हुआ हिंदुस्तान तो पांच-सात साल पहले वह दिखा चुके थे। राहुल गांधी जी का जो सपना है, इस सभी को उन्नति और विकास के अंदर सम्मिलित करना होगा।  वह सपना तभी साकार हो सकेगा, जब उन गरीबों को आवास मिल सकेगा।  मुझे आशा ही नहीं विश्वास है, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी व ग्रामीण विकास मंत्री सी.पी.जोशी जी के नेतृत्व में सरकार के कार्यक्रम और योजनाओं से भारत के गांवों और ग्रामीणों का भविष्य उज्जवल है।       

                                                                                                             

श्री आर.के.िंसह पटेल (बांदा): माननीय सभापति जी, आज आपने ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर चर्चा करने का मुझे मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।  ग्रामीण विकास की बहुत महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं और उसका बजट यहां पर रखा गया है।  मैं ज्यादा लंबी-चौड़ी बात नहीं करूंगा।  इस देश में चाहे ब्राह्मण हो, चाहे क्षत्रिय हो, चाहे वैश्य हो, चाहे पिछड़ा हो, चाहे अगड़ा हो या चाहे दलित हो, हर जाति में बीपीएल लोग हैं, गरीब लोग हैं।  बहुत सी ऐसी ग्रामीण विकास की योजनाएं, उनमें चाहे जो भी योजना हो, चाहे वह इंदिरा आवास हो, चाहे स्वर्ण जयंती रोजगार योजना हो, उन योजनाओं में मैं दलित कह लूं, अनुसूचित जाति के बीपीएल परिवारों को लाभ देने के लिए प्रावधान किया गया है।  माननीय मंत्री जी, मेरा आपसे अनुरोध है कि बीपीएल, बीपीएल होता है, चाहे वह जिस जाति का हो।  गरीब, गरीब ही होता है।

          स्वर्ण जयंती रोजगार योजना में आप स्वसमूह गठित कराते हैं।  उसमें फिफ्टी पर्सेंट अनुसूचित जाति और बाकी लोगों के अलग-अलग पर्सेंट निर्धारित किए गए हैं।  उसमें सभी जातियां, जो भी बीपीएल है, गांव में गरीब तबके के जो भी लोग रहते हैं, उन सभी जातियों के समूह बनाए जाने चाहिए।  सभी जातियों के गरीब तबके के लोगों को उसमें लाभ दिया जाना चाहिए।  मेरा आपसे अनुरोध है कि आप उनको इसमें शामिल करें।   

          माननीय मंत्री जी, इंदिरा आवास की बात है, इंदिरा आवास में अनुसूचित जाति के लोगों को लाभ दिया जा रहा है।  मेरा आपसे अनुरोध है कि यह योजना महत्वाकांक्षी योजना है।  भारत में उन तमाम गरीबों को छत मुहैय्या कराने का सपना स्वर्गीय राजीव गांधी जी का था।  मैं कहना चाहता हूं कि गरीब हर जाति में है।  इसलिए मेरा आपसे अनुरोध है कि चाहे पिछड़ी हो, चाहे अगड़ी हो, चाहे वैश्य हो, चाहे दलित हो, जो भी बीपीएल की सूची में है, उन सभी को लाभ प्राप्त हो।  आज गांव में हम लोग जाते हैं तो वे आवास के लिए हमसे कहते हैं कि हमें भी आवास मिलना चाहिए।  बहुत गए-गुजरे लोग, जो उच्च वर्ग में पैदा हुए हैं, जो बीच की जातियों में पैदा हुए हैं, जो पिछड़ी जातियों में पैदा हुए हैं, उन बेचारों को आज सड़कों के किनारे फुटपाथ पर सोना दुश्वार है।  आज उनको भी छत चाहिए।  उनको इंदिरा आवास योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।  मेरा आपसे अनुरोध है कि उन बीपीएल परिवारों के लोगों को भी इस योजना का लाभ मिले।  इसके लिए आप संशोधन करके इसमें सुधार करें।  यह मेरा आपसे अनुरोध है।

          मान्यवर, आपकी बहुत महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं।  आपने सौ दिन का रोजगार देने के लिए, रोजगार गारंटी योजना चलायी।  रोजगार गारंटी योजना के संबंध में मैं कहना चाहता हूं।  मैं उत्तर प्रदेश के बुंदलेखंड से चुनकर आया हूं। आज वहां की हालत यह है कि बुंदेलखंड और पूरे उत्तर प्रदेश में जो आपकी महत्वाकांक्षी रोजगार योजना है, मनरेगा आज पूरी तरह से फ्लाप हो चुकी है।  वहां जो सीडीओ है, डीएम है, पीडी है, वह पूरी तरह से कमीशनखोरी करते हैं।  अभी चित्रकूट जिले में उत्तर प्रदेश की सरकार ने वहां के डीएम, सीडीओ और पीडी, जो भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए थे, उनको सस्पेंड किया।  यह तो एक जिले का मैं उदाहरण दे रहा हूं।  उत्तर प्रदेश में एक जिले में ही नहीं, अनेकों जिले उस योजना को खाऊ-कमाऊ योजना के रूप में उसमें लिप्त हैं।  इसकी वृहद् जांच होनी चाहिए।  

          महोदया, पूरे बुंदेलखंड में पानी का संकट है।  पानी के संकट को देखते हुए इस महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा में वहां तालाब बनाने की योजना चलायी गयी।  आज जो आदर्श तालाब बने हैं, माननीय पुनिया जी यहां उपस्थित हैं, यह उत्तर प्रदेश से चुनकर आए हैं, मैं कहना चाहता हूं कि जो आदर्श तालाब बनाए गए हैं, वे पहाड़ों के ऊंचे भागों पर बनाए गए हैं।  जो गांव में पुराने, पुश्तैनी बड़े-बड़े तालाब हैं, उन तालाबों को आदर्श योजना में चयनित नहीं किया गया है।  छोटे-छोटे तलैयों के पानी का संचय कैसे होगा। यह योजना धन के बंटरबाट करने के उद्देश्य से की गई है। मंत्री जी, मेरा आपसे अनुरोध है कि इसकी जांच करवाई जानी चाहिए।…( व्यवधान)

सभापति महोदया :  पटेल साहब, आपकी पार्टी के और लोग भी बोलने वाले हैं।

                                                  …( व्यवधान)

श्री आर.के.िंसह पटेल :  मैं एक-दो मिनट में अपनी बात समाप्त करता हूं। मैं मंत्री जी से अनुरोध करना चाहता हूं कि आप सड़कें बनवा रहे हैं, गुणवत्ता अच्छी है, लेकिन उसमें सुधार लाने की आवश्यकता है। जो भी योजनाएं बनती हैं, उन्हें वहां के आईएएस अधिकारी बनाते हैं। जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं। चाहे जो भी योजनाएं हों, आपकी महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। मेरा अनुरोध है कि उस क्षेत्र में जो भी योजनाएं बनाई जाएं, भारत सरकार का पैसा जा रहा है, जो जनप्रतिनिधि चुनकर आए हैं, उनके प्रस्ताव  के अनुरूप वहां की कार्य योजनाएं बनाई जाए।…( व्यवधान) अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियां हैं, इसलिए वहां के माननीय सांसदों की राय से कार्य योजनाएं बनाई जाएं, वे चाहे पीएमजीएसवाई की हों या कोई और हों। आपने भूमि सुधार की योजनाएं चलाई हैं। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड, जहां से मैं चुनकर आया हूं, वहां भूमि सुधार के नाम पर 60 प्रतिशत कमीशन है। डीपीएपी, आईडब्ल्यूडीपी आदि जो योजनाएं चलाई गई हैं, मंत्री जी बैठे हुए हैं, ये झांसी से चुनकर आते हैं, वहां का जो भूमि संरक्षण विभाग एवं रामगंगा कमांड वहां जो विभाग तैनात किए गए हैं, 60 प्रतिशत कमीशन उनकी जाती है और 40 प्रतिशत जमीन में काम पर जाती है। पांच साल पूर्व जो काम करवाए गए हैं, उन्हीं कामों…( व्यवधान) को दुबारा अन्य योजनाओं में पुनः प्रस्तावित किया जा रहा है ।

सभापति महोदया : पटेल साहब, आप कनक्लूड कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री आर.के.िंसह पटेल : जो कार्य योजनाएं बनाई गई हैं, अभी आपने 7263 करोड़ रुपये का पैकेज बुंदेलखंड को देने की बात कही है, उसमें भी वही कार्य लिए गए हैं जो आज से पांच साल पहले आपके विभाग द्वारा कहीं न कहीं से करवाए गए हैं। मेरा आपसे अनुरोध है कि यहां से एक विशेष टीम भेजकर उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की एक-एक कार्य की जांच करवाने के बाद जो भी व्यक्ति दोषी पाए जाएं, उनके खिलाफ कार्यवाही की जाए।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : आपके दूसरे साथी भी बोलेंगे।

…( व्यवधान)

श्री आर.के.िंसह पटेल : बुंदेलखंड में पेयजल का बहुत संकट हो गया है। बुंदेलखंड पानी के लिए परेशान है।…( व्यवधान) मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से मांग करता हूं कि एक-एक हजार हैंड पम्प…( व्यवधान) सभी सांसदों के प्रस्तावों से लगने के निर्देश जारी करें ।

सभापति महोदया : आप अलग से लिखकर दे दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री आर.के.िंसह पटेल : अब आपकी बात रिकार्ड नहीं हो रही है।

                    …( व्यवधान)*

                                                                                                   

SHRI PRALHAD JOSHI (DHARWAD): Madam Chairman, thank you for giving me this opportunity to participate in this important discussion on the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development. I do not know when you are going to ring the bell, and that is why, I will first start with my State’s problems about PMGSY. Unfortunately, when I want to bring this to the notice of the hon. Minister, he is going out. Still, through you, Madam, I have to bring it to the notice of the Ministry.

SOME HON. MEMBERS: The Minister of State in the Ministry of Rural Development, Shri Pradeep Jain, is here.

SHRI PRALHAD JOSHI: Jain Saheb, through Madam Chairman, I would request you to kindly make a note of it.

         The Karnataka Government is implementing the PMGSY in its true spirit. It stood second in the entire country, as far as ranking is concerned and as far as implementation of the PMGSY is concerned. A proposal for the IX Phase under PMGSY was submitted to the Government of India on 18/02/2010 to upgrade around 4,300 kilometres at an estimated cost of Rs. 1,399 crore. Another proposal concerning 1,815 kilometres of road, amounting to around Rs. 635 crore, in 14 flood-affected areas/districts of Northern Karnataka, in which my constituency is also there, was submitted, but unfortunately, even after the hon. Chief Minister of Karnataka met the hon. Minister of Rural Development, it is yet to be cleared. Even the Minister of rural Development of the Karnataka Government has met the hon. Minister of Rural Development, Government of India, twice, but it is yet to be cleared. 

I have been given to understand that the rural network coverage has been completed in Karnataka but this is not being given approval. This is what the information that has been given to me. I would like to tell you that even in the second, third, fourth and fifth phase, we took up the upgradation of the rural roads. It was not networking. In those phases, they have already cleared our projects and payment is made. But unfortunately, only in this ninth phase, this objection is raised that since the village network is completed, that is why they are not approving the project. We have got this information orally. After the second phase, only the upgradation work has been taken up. I also tell my Tamil Nadu and Andhra Pradesh friends that this problem is going to come for them also. That is the information that I have gathered. If, in their States also the networking work is completed, the only important thing which is to be undertaken is upgradation. Some of the roads which were connected 15 or 20 years back by the State Government, they have all been spoiled. There is absolutely no connectivity. Through you, Madam, I urge upon the hon. Minister to kindly take this into consideration. Actually there is no connectivity. It has to be upgraded. I urge upon you to kindly make a note of it and immediately clear the ninth phase proposal of Karnataka as also the proposal of Rs.635 crore pertaining to the flood affected areas.

          Secondly, though NREGA is a good programme, yet there are so many shortcomings. I do not want to discuss much about the shortcomings because already many senior Members have discussed about that. One of them is corruption. Second important point is and at least I have observed in my constituency in Karantaka, that the small and marginal farmers are not getting the farm labour for the agricultural activity. I am not saying that because of that, this NREGA programme is a bad programme. It is a very good programme. I would like to tell you to kindly link this farming activity, the harvesting programme of the small and marginal farmers with the NREGA programme as 70 to 75 per cent farmers are the small and marginal farmers. I urge upon you to include this farming activity with the NREGA programme so that the labour problem is not there.

Even after 63 years of Independence many villages do not have proper drinking water facility. Recently there was a report which has indicated that more than 40 per cent of the ground water is not potable. It is reported even in one of the Planning Commission’s Report that more than 40 per cent water is non-potable. That is why, I urge upon you to compulsorily create one tank in each village under this programme. There are many suggestions but for want of time, I only suggest one more point.

Regarding MPLAD fund, a suggestion was made that it should be increased to Rs.8 or Rs.10 crore. Madam Sonia Gandhiji is also sitting here. Kindly make it either Rs.10 crore or he can discontinue it. We are not able to satisfy anybody with this. I urge upon Madam Soniaji to intervene in this and make it Rs.10 crore otherwise it can be discontinued.

                                                                                         

श्री भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी (संत कबीर नगर): सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। हम आपके जरिये अपनी पीड़ा माननीय मंत्री जी और यूपीए की चेयरपर्सन के सामने रखना चाहते हैं।

          महोदया, जब उत्तर प्रदेश का नाम आता है, उत्तर प्रदेश भारत का सर्वाधिक आबादी वाला राज्य है, सबसे ज्यादा बेराजगारी भी उत्तर प्रदेश के नौजवानों को देखने को मिलती है और सबसे ज्यादा पलायन भी उत्तर प्रदेश के और बिहार के नौजवानों का देखने को मिलता है। भारत सरकार की मनरेगा योजना के जरिए हमारी 60 फीसदी आबादी जो कृषि पर आधारित है, मजदूरों को 100 दिन काम देने की इसमें व्यवस्था है, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन कृषि के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी मजदूर हैं जैसे बुनकर हैं। अगर बुनकरों को पैसा देकर, सूत देकर बुनाई का कार्य कराया जाए और भारत सरकार उसकी खरीदारी कर ले, तो उनको भी एक रोजगार मिल जाएगा। इस योजना का उद्देश्य अगर रोजगार प्रदान करना है, तो इस योजना को इस तरह के अलग-अलग क्षेत्रों में भी लागू करना चाहिए। हर आदमी खेत में काम नहीं कर सकता है। खेत में काम करने वालों के लिए यह योजना ठीक है, लेकिन इस योजना के तहत अगर ट्रेनिंग दी जाए, समूह बनाकर गांवों में तमाम रोजगारों के अवसर प्रदान किए जा सकते हैं। मेरा आपके माध्यम से अनुरोध है कि इस पर विचार करके अलग-अलग क्षेत्रों में काम उपलब्ध कराए जाएं। अभी बुंदेलखंड के लिए केन्द्र सरकार ने स्पेशल पैकेज दिया है, लेकिन हम लोग बेचारे हैं। हमारे बेचारगी को दूर करने के लिए सरकार इस पर ध्यान दे। यहां मैडम सोनिया जी बैठी हैं, मैं उनसे निवेदन करूंगा कि पूर्वांचल के नौजवानों की बेचारगी दूर करने के लिए कोई पैकेज दिया जाना चाहिए जिससे वहां की बदहाली दूर हो सके। पूर्वांचल के नौजवान महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, बंगाल में जाकर मिलें चलाते हैं, बेरोजगारी है, उनकी व्यथा है क्योंकि वहां पर रोजी-रोजगार के संसाधन नहीं हैं। वहां सड़कों का अभाव है। जब बाढ़ आती है, फसलें पूरी तरह से खत्म हो जाती हैं। अभी जब कोसी नदी में बाढ़ आई थी, इंदिरा आवास के नाम पर 45,000 आवास दिए गए। राप्ती, घाघरा, बूढ़ी गंडक आदि नदियों मे जब बाढ़ आती है, यह बाढ़ भी एक बार नहीं आती है, पहली बार प्राकृतिक रूप से जब बारिश का पानी बढ़ता है, तब बाढ़ आती है। दूसरी बार जब नेपाल पानी छोड़ता है, तब किसानों की फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो जाती हैं। इसकी वजह से लड़कियों की शादियां तक टालनी पड़ती हैं। अगर कोई अपने बच्चे की शादी तय कर लेता है, तो बाढ़ आने पर, आगजनी हो जाने पर शादी नहीं हो पाती है। इससे आप समझ लीजिए कि वहां के लोगों को 63 साल की आबादी के बाद भी कितने पिछड़ेपन का जीवन जीना पड़ता है। एक बीआरजीएफ योजना है, मुझे याद है, जिसमें हमारे यहां उत्तर प्रदेश के तराई के कई जिले जैसे बस्ती, संत कबीर नगर, बलरामपुर, बहराइच, महराजगंज आते हैं, लेकिन भारत सरकार की योजनाओं का एक भी पैसा वहां पर अभी तक नहीं गया है। बीआरजीएफ के माध्यम से वहां पिछड़ापन दूर करने के लिए तो पैसा जाना चाहिए।…( व्यवधान)

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय (श्रावस्ती):महोदया, माननीय सदस्य सदन को गुमराह कर रहे हैं।…( व्यवधान)

सभापति महोदया :  माननीय सदस्य, प्लीज आप बैठिए।

योजना मंत्रालय में राज्य मंत्री और संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री वी.नारायणसामी):  मैडम, पूर्वांचल के बारे में विस्तार से कल हम लोग डिसकस कर चुके हैं।

श्री भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी : महोदया, यह हमारा विशेष रूप से पिछड़ा जनपद है। पिछड़े हुए जनपदों में करीब 40 जनपद हैं, लेकिन यह जनपद उनमें भी सबसे पिछड़ा हुआ है। इनमें से कई जनपदों में लोग एक टाइम खाना खाकर अपना जीवनयापन करते हैं। इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि पिछड़े जनपदों से पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार कोई विशेष पैकेज देने का कार्य करे।  …( व्यवधान)

श्रीमती अन्नू टण्डन (उन्नाव):मैडम, पैकेज के अलावा किसी को और बात करनी है या नहीं?

डॉ. विनय कुमार पाण्डेय : महोदया, माननीय सदस्य को जानकारी नहीं है, वह सदन को गुमराह कर रहे हैं।…( व्यवधान)

सभापति महोदया :  माननीय सदस्य कल इस विषय पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है और सरकार का जवाब भी आ गया है। मैं सदन से निवेदन करूंगी कि वह शांतिपूर्ण ढंग से आज की महत्पवपूर्ण अनुदान की मांग पर चर्चा करे और आसन से सहयोग करे। माननीय सदस्य, अब आप अपनी बात समाप्त करें।

श्री भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी  : सभापति महोदया, मैं मानवीय पहलू की बात कर रहा हूं। हर आदमी के दिल होता है और वह दिल धड़कता है। ईमानदारी से अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि पूर्वांचल के लोगों की क्या दशा है। मैं उनकी व्यथा को ही यहां रख रहा हूं।

सभापति महोदया: अब आप अपनी बात समाप्त करें।

श्री भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी  : मैं दो मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा।…( व्यवधान) पी एम जी एस वाई सड़क मार्गों में पड़ने वाले पुल के मानक को 50 मी. से बढ़ाकर 100 मीटर तक करना चाहिए और इसके साथ-साथ जिले की ODR  और MDR सड़कों को भी इस योजना में सुदृढ़ीकरण का कार्य करवाने हेतु ग्रामीण क्षेत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है ।

 

 

 

सभापति महोदया: अब आपकी बात रिकार्ड पर नहीं जाएगी। मैं नेक्स्ट मेम्बर श्री बैद्यनाथ महतो को मौका दे रही हूं।

…( व्यवधान)*

सभापति महोदया: मुझे दुख है कि आपकी बात रिकार्ड पर नहीं जा रही है इसलिए आप आसन ग्रहण करें और महतो जी को बोलने दें।

…( व्यवधान) *

सभापति महोदया:  माननीय सदस्य, आपकी कोई बात रिकार्ड में नहीं जा रही है। इसलिए आप मेहरबानी करके बैठ जाएं। श्री महतो की बात ही रिकार्ड में जाएगी।

…( व्यवधान) *

सभापति महोदया: महतो जी, आप अपनी बात कहना शुरू करें।

 

 

 

*SHRI A.K.S. VIJAYAN (NAGAPATTINAM): Let me put forth the views on behalf of my Party, the Dravida Munnetra Kazhagam, on my own behalf and on behalf of the people of my Parliamentary Constituency.

          The total budgetary allocation for the Ministry of Rural Development has been increased from Rs.79,879 crore in 2009-10 to Rs.89,340 crore in this year’s Budget.

          The UPA dream project, the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme has been a great success. Allocation under the scheme has been increased year after year and this year, it is RS.40,100 crore which shows that the UPA Government is sincere in development of rural people.  All the districts in the country have been covered under this Scheme.

          I would like to put on record the appreciation from the Hon’ble Supreme Court about the effective and efficient implementation of the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme in Tamil Nadu.  The Hon’ble Supreme Court has even observed that Tamil Nadu is setting a model and the other States needs to follow the way in which it is being implemented, ensuring that the benefits reach to the beneficiaries intended.  I would like to mention that full credit for the implementation of this scheme should go our Hon’ble Deputy Chief Minister, Shri M.K. Stalin, who is taking full care in implementation of this scheme very successfully in Tamil Nadu.

          The Prime Minister Gramin Sadak Yojana is an important scheme of the Government which has interconnected villages.  This has brought the economic development of the villages.  Villagers can now have access to pucca roads.  They have access to the markets.  But I would like to bring to an important issue in implementation of this PMGSY scheme. At present, no compensation is being given to the affected people whose land has been acquired for construction of these roads.  I request the Union Government to provide some compensation to such affected people by allocating more funds for this Yojana.

          The allocation of Rs.9521 crore for drinking and sanitation has been made in this year’s Budget.  Drinking water is an issue that needs to be given a serious thought by the Centre as well as the States.  Villagers are forced to drink highly contaminated water in the absence of safe drinking water.  Water table to most of the villages in the country is fast receding.  The Union Government should consider allocating more funds for drinking water and sanitation schemes.

          Health is one of the most important issues. Health facilities in rural India are insufficient. If the rural population has access to quality health faculties, we can be sure that the future of the country is bright.  I request that both the Ministry of Rural Development and the Ministry of Health and Family Welfare should have better coordination in ensuring setting up of the quality health infrastructure and quality health facilities in rural India covering each and every village in the country.

          The State of Tamil Nadu has given a definite thrust to Rural Development.  I am proud to announce that our State is spending 14.8 per cent of its Budget for the rural development.  Since more than half of the population in Tamil Nadu (56%) still live in rural areas spreading over 12,618 village Panchayats, it is but natural that it should earmark such a huge percentage for rural development.

          Tamil Nadu has launched a new system of wage disbursal through ATMs for beneficiaries of the National Rural Employment Guarantee Scheme (NREGS) at five places in Cuddalore District-Periyakanganakuppam, Thiruvahindrapuram, Panchanguppam, Padhirikuppam and Karaiyeravittakuppam. Other States should also follow this example of Tamil Nadu.  It will definitely route out corruption from this scheme.

          I would like to mention that our Hon’ble Deputy Chief Minister of Tamil Nadu has announced a scheme – “Annaithu Grama Anna Marumalarchi Thittam” in every Panchayat.  The Tamil Nadu Government has allocated a sum of Rs.20 lakh for each village for this scheme.  I urge upon the Union Government to introduce such schemes all over the country for development of each and every villages in India.

          I would like to mention that an amount of Rs.38,000/- is being allocated for construction of a house under Indira Awas Yojana (IAY), which is very less.  At this present day inflation scenario, with this amount it is not possible to construct a house for even a very small family and this amount should be increased to a minimum of Rs.1 lakh per house.  I urge upon the Union Government to take immediate steps in this regard.

          The Union Government are allocating a sum of Rs.2,500/- each for construction of toilet under Total Sanitation Programme, which is very much less and needs to be increased to minimum of Rs.10,000/- per toilet under this Programme.

          Our Leader Dr. Kalaingar M. Karunanidhi has announced a scheme of construction of 21 lakh houses in Tamil Nadu. The Chief Minister has given assurance that 3 lakhs houses would be constructed in the firs phase.  I request the Union Government to introduce such a scheme for all over the country for the benefit of the poor people. 

          Expressing my support to the Demands for Grants pertaining the Union Ministry  of Rural Development, on my behalf of my Party, let me conclude.

 

 

 

 

 

 

 

श्री बैद्यनाथ प्रसाद महतो (बाल्मीकिनगर): सभापति महोदया, मैं आपको हृदय से धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया। हम जहां से अपनी बात कह रहे हैं, वह न्याय का मंदिर है। इस न्याय के मंदिर में ईमानदारी से, दलीय भावना से ऊपर उठकर देश हित में, गांव के हित में, गरीब-गुरबे के हित में हमें अपनी बातें रखनी चाहिए। केन्द्रीय मंत्री डॉ. जोशी जी नजर नहीं आ रहे हैं।

सभापति महोदया: राज्य मंत्री जी सदन में मौजूद हैं और वह नोट कर रहे हैं। आप अपनी बात जारी रखें।

श्री बैद्यनाथ प्रसाद महतो :  सभापति जी, उन्होंने शून्यकाल में कहा था कि बिहार में प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना के लिए जो पैसे जा रहे हैं वे खर्च नहीं हो रहे हैं। हमें भी बड़ी चिंता हुई। हमने आज ही बिहार सरकार से एक रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट पढ़ने की स्थिति में हम यहां नहीं हैं क्योंकि समय कम है, लेकिन माननीय मंत्री जी को कल हम मिलकर अवगत कराना चाहेंगे कि ऐसा अनर्गल बयान नहीं देना चाहिए।

          सभापति महोदया, भारत गांव का देश है। महात्मा गांधी जी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांव में बसती है।  80 प्रतिशत लोग गांव में बसते हैं और जब तक गांवों सबल नहीं होंगे, यह देश सबल और सुंदर नहीं हो सकता है। आजादी के 63 वर्ष बाद भी बिहार कंगाल है, बिहार के गांव जर्जर हैं, देश के गांव जर्जर हैं और गांव की सरस्वती और लक्ष्मी भी शहर की ओर पलायन कर गयी हैं। अब जरूरत है कि जो गांव की लक्ष्मी और सरस्वती शहर में पलायन कर गयी है, उसे पुनः गांव में लाने की जरुरत है। जिस दिन गांव सबल हो जायेगा तो आपका पूरा देश सबल हो जाएगा और सुंदर भारत की कल्पना हम कर पायेंगे। गांव के विकास के लिए सारे दरवाजे खोलने होंगे। जोशी जी मैं आपसे अनुरोध करता हूं, माननीय स्टेट मिनिस्टर साहब बैठे हुए हैं, उनसे भी मेरा आग्रह है कि अगर आप गांव का विकास करना चाहते हैं तो विकास के सारे दरवाजे खोल दीजिए। समय कम है लेकिन हम एक बात बता देना चाहते हैं कि इस देश में गरीब कौन है और कितने गरीब हैं, इसके आंकड़े आपके पास नहीं हैं। कोई कहता है कि 37 प्रतिशत देश में गरीबी है, कोई कहता है कि देश में 40 प्रतिशत गरीबी है और कोई कहता है कि देश में 56 प्रतिशत गरीबी है। इसका मतलब है कि आपने जो पैमाना गरीबी का बनाया है वह दुरुस्त नहीं है। इसलिए नेशनल डिवेलप कौंसिल की बैठक बुलाकर निश्चित रूप से आपको गरीबी की पहचान का पैमाना बनाना होगा। बिहार में जब हम ग्रामीण विकास मंत्री थे तो बीपीएल की पहचान हो रही थी। हमने देखा कि बीपीएल का जो पैमाना बना, उसमें सुधार की आवश्यकता है। इसलिए वर्ष 2007 में बिहार के मुख्यमंत्री माननीय नीतीश कुमार जी ने एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन गरीबी के आंकलन पर बुलाया था, जिसमें देश-विदेश से विद्वान अर्थशास्त्री आये थे और सब लोगों ने कहा था कि देश में जो गरीबी रेखा मापने का पैमाना बना है, वह दोषपूर्ण है। हमें नेशनल डिवेलपमेंट कौंसिल की बैठक बुलाकर गरीबी रेखा का पैमाना बनाना होगा, नहीं तो गरीबों की पहचान सही नहीं हो पाएगी। बिहार में हम लोगो ने बीपीएल के लोगों के लिए संरक्षण किया। जो एक करोड़ तीस लाख बीपीएल परिवार गांव में हैं लेकिन भारत सरकार केवल 65 लाख, तेईस हजार लोगों के लिए ही खाद्यान्न दे रही है। बिहार में अभी 57 लाख लोग इससे वंचित हैं। मेरा सुझाव है कि आपने राष्ट्रीय रोजगार ग्रामीण अधिनियम वर्ष 2005 में बनाया था जिसका नाम बदलकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना हुआ है। यह अधिनियम जल्दबाजी में बना, इसलिए इसमें कतिपय त्रुटियां रह गई  हैं । इसमें कुछ संशोधन की जरूरत है । जैसे इस योजना में मशीन का प्रयोग नहीं करना है । यदि पोखरा का उड़ाही करना हो तो बिना पम्पसैट लगाए इसकी उड़ाही संभव नहीं है । इसलिए वहां मशीन का प्रयोग आवश्यक होगा । यहाँ संशोधन की प्रबल आवश्यकता है ।

सभापति महोदया : आप अपनी बात समाप्त कीजिए और बैठ जाएं।

…( व्यवधान)

श्री बैद्यनाथ प्रसाद महतो :  इस स्कीम में गन्दी नालियों की सफाई भी है । नालियों में मलमूत्र का प्रवाह होता है । इसमें मजदूर काम करना भी नहीं चाहता।  एक तरफ सिर पर मैला ढोना अपराध है, दूसरी तरफ देश के मजबूरों को मलमूत्र की सफाई के लिए मजबूर कर रहे हैं । इसलिए गन्दे नाले की सफाई के लिए मशीन लगाना अनिवार्य करने की आवश्यकता है ।

सभापति महोदया :  आप बहुत देर से बोल रहे हैं, कृपया बैठ जाएं।

…( व्यवधान)

श्री बैद्यनाथ प्रसाद महतो : गांवों के अंदर विकास करने की जरूरत है।

सभापति महोदया : आप बैठ जाएं, आपकी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है।

(Interruptions) … *

 सभापति महोदया : आपके सुझाव नोट हो गए हैं, अब आप बैठ जाएं।

…( व्यवधान)

 

DR. KAKOLI GHOSH DASTIDAR (BARASAT): Madam, Chairperson, I rise in support of the Demand for Grants for the Ministry of Rural Development.  We live on today dreaming for a better tomorrow.  But what do we dream on?  To quote the renowned statesman, we all know and we all have heard of, Winston Churchill, while he was encouraging the Allied Forces towards fighting the enemy, he said  “We shall fight them in the air; we shall fight them in the sea; and we shall fight them on land.”  Then, he covered the mouth piece of the microphone and said:

“Fight with what?  Empty beer cans! ”

 

          So that is the relevant question today.  What do we fight on?  Do we fight on empty stomachs?  Nearly 72 per cent of our population still is rural.  Even today, in spite of laudable efforts on the part of our Government which has brought forward schemes like Antyodaya Yojana, Annapoorna Yojana and Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act, millions of people are going hungry in the country.  This is proven by recent happenings that took place in Pratapgarh of Uttar Pradesh where there was some person who wanted to give food to the poor people and they thronged in hundreds and thousands and a stampede followed killing hundreds of people.  This is the state of affairs in the country today.  So, the requirement today is formation of a very correct below poverty line list by which we can identify those people who are living below the poverty line.  They require food today.

          Now what I would like to draw your attention to is that we need development in the form of science and technology.  We need development in the form of information technology and our great nation India is soaring ahead.  But I would like to point out that during the last few decades population of the country has been increasing at the exponential growth rate of more than two per cent but land surface has not been.  We have to take care of this very urgent issue.  People cannot thrive on cement and steel.  We have to give them food and because of that we have to take care of the fertile lands of our nation.  Like our beloved late Prime Minister Rajiv Gandhiji pointed out that for every rupee meant for the poor person only 15 paise reaches him. Today, I think, it is much less than that.  So, the monitoring system has to be stepped up and accountability has to be looked into.  Not only BIMARU States of Bihar, Madhya Pradesh, Rajasthan and Uttar Pradesh but now West Bengal, Andhra Pradesh and Arunachal Pradesh have also joined the fray where people are going hungry.  The hunger index is very high and we cannot attain anything on a hungry stomach.

So, we have to take proper care and look after our land area and also stop taking away land from the farmers by force. What I mean is that one of the young hon. Member of this august House had to go on fast indefinitely and withdraw on request of Hon’ble Prime Minister after 26 days in protest against the forceful acquisition of land in our State of West Bengal. What she tried to point out is the fact that land surface of our country and the world is not increasing, whereas the population is. So, we must take care of our land surface. We must have research so that we are able to produce high yielding crops and we also have to initiate irrigation programmes. We do not have any provision in the MPLADS to provide for any irrigation facilities and many parts of our country are lacking in irrigation and this issue has to be addressed with all seriousness. I would like to state that the hon. Minister should pay attention to this aspect of providing irrigation facilities in order to grow more crops, to feed more people and to satisfy more hungry mouths. Besides the laudable efforts of the Government to start the schemes of the PMGSY, the monitoring of the scheme has to be done more carefully. I do agree completely with what has been said by Hon’ble Speaker Shri Majumder that money being given is completely pilfered and laundered. He is coming from the State of West Bengal and his party is a part of the Coalition that is ruling the State which is taking the money from the Central Government and not giving it to the poor people to build the roads… (Interruptions)

 

 

सभापति महोदया :  कृपया आप बैठ जाएं।

…( व्यवधान)

सभापति महोदया : आप बैठ जाएं और माननीय सदस्या को बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

DR. KAKOLI GHOSH DASTIDAR: Madam, I would like to draw the attention of this august House to a new scheme that I have formulated in my constituency. Till now what we have is that people are given jobs for 100 days under the National Rural Employment Guarantee Act under which the people are just digging the mud and throwing it on the roadside. There are millions of villages without roads and because of poor connectivity, development is hampered. We have to look at it holistically, food is not reaching to the poor people in the last village. Medical facilities are not reaching them. In our country, every minute we are losing a person because of a disease called Tuberculosis; every five minutes we are losing a mother because of child birth related causes; another mother we lose in every 5 minute because of cancer of the cervix. This is happening because we are unable to reach the medical facilities to them when it is required.  It is not that the doctors do not want to go there. It is because they do not have proper connectivity, proper roads which will facilitate the doctors and ambulance to go there and bring the patients in order to save their lives. The Primary Health Centres are not well equipped to take care of a bleeding mother at a time when she is about to bring a life into this world. So, a holistic approach that I would like to suggest is that along with the laudable effort of having the Rajiv Gandhi Gramin Vidyutikaran Yojana, we have to build roads connecting the last man and women in the last house in the last village.

          Madam, I would like to bring to the notice of this august House that I have made a new scheme in which I have combined the National Rural Employment Guarantee Scheme with the MPLADS. The villagers themselves are building the roads. First they dig the mud and draw it up in the form of a mud road and once the mud road is completed, the money from the MPLADS is sanctioned to make it black top so that an ambulance can reach the village. I have already sanctioned quite a few mobile dispensaries equipped with operation tables, lights and the facility of a doctor so that it would help to take care of sick men, women and children in the last village.

          Sir, as far as education is concerned, a Report of the World Bank says that 25 per cent of the teachers are absent … (Interruptions)

 

18.00 hrs.

MADAM CHAIRMAN : Please sit down.  Good suggestions are coming.

DR. KAKOLI GHOSH DASTIDAR : Twenty-five per cent of the teachers are absent in rural schools.  So, monitoring and accountability will have to be implemented quickly so that the money that is going from the Centre to different States is properly utilized. 

          With these words, I support the Demands for Grants of this Ministry. … (Interruptions)

 

*DR. MANDA JAGANNATH (NAGARKURNOOL) : Rural Development Ministry is the nodal Ministry which plays vital role in the development of rural India.  As Father of Nation – Mahatma Gandhi said “Strong rural India makes strong urban India and in turn stronger nation India.”

Unless the initiatives taken by and schemes launched  by any Government  reaches the needy rural populace dream of Mahatma Gandhi making a strong India will not be cherished.

          In making a strong rural India, the schemes introduced and measures taken by the UPA Government under the Leadership of Prime Minister Dr. Manmohan Singh and under the able guidance of our beloved Leader and UPA Chairperson Mrs. Sonia Gandhi and under the vision of young leader Shri Rahul Gandhiji is shaping into strong India.

          The new doctrine of “inclusive economic grants” along with renewed focus on the social sector particularly on rural development in the last six years not only insulated our vast rural populance from the onslaught of global economic downside but also in actually put our rural economy in an unprecedented course of ascendancy.

          The development and welfare initiatives undertaken by the UPA Government in the rural areas in the last five years further strengthened  during 2009-2010.  This brought about perceptible change in the lives of the people in the villages.

          A convergence approach has been adopted for optimization of resources, initiatives and results.  The Government’s initiatives in modifying and including new elements in the some of the existing schemes and programmes like Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA) IAY, Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA) IAY, National Social Association Programme (NSAP), integrated Watershed Management Programme (IWMP), National Rural Drinking Water Mission (NRDWM) etc. are expected to yield good results in the poverty alleviation.

          To achieve above goals the UPA Government had made budgetary allocations never before had been made many a times over and above previous budgets.  Rs.66,100 crore provided for rural development.

          For MGNREGS allocations had been stepped up to Rs.40,100 crores for 2010-11.

          Rs.48,000 crores have been allocated for rural infrastructure programmes under Bharat Nirman.

          For IAY houses unit cost is increased to Rs. 45,000/- in the plane areas and to Rs.48,500/- in hilly areas. Allocations for this scheme increased to Rs.10,000 crores. MGNREGS

–                                     In 2009-10 upto December, 2009 Rs.18,950 crore has been utilized out of Rs.39,100 crore.

–                                     160 crore person days employment had been created during the same period of time across the country.

–                                     At the national average wage paid under MGNREGS  has increased from Rs.65 (FY 2006-07) to Rs.88.48 in FY 2009-10.

–                                     In Financial Year 2009-10, 36.51 lakhs works have been undertaken out of which 51% constituted water conservation, 16% rural connectivity, 14% land development.

–                                     17% constituted for provision of irrigation facilities to individuals.

But there are allegations of misuse of MGMREGS funds. I request the government of India to take all the steps to stop the misuse.

SGSY –           To supplement the wage employment and to augment the economic conditions of the rural poor, assisting them in self-employment by encouraging group and cluster activities.  But because it is linked to banks and other financial institutions, the expected goals are unable to be reached.  Government of India should take care of banks to liberalise the loaning procedures.

IAY – Indira Awas Yojana  –    is the Flagship Programme for rural housing since 1985-86, to help build or upgrade homes of house holds below the poverty line in phase-1 of Bharat Nirman.

–                        Starting from 2005-06 against the target of 60 lakh houses, 71.76 lakh houses were constructed at an expenditure of Rs.21720 crores.

–                        Under the Phase-II of Bharat Nirman Programme the target is doubled to 120 lakhs in the 5 year period starting from 2009-10.  Since inception 218.69 lakhs houses have been constructed.

In Andhra Pardesh along with (IAY) Indiramma housing scheme had been taken up to see that no. BPL person lives in hut which is yielding good results.  I request the Government of India to adopt the same policy like Andhra Pradesh Indiramma Housing Scheme to do away with the intention of that no BPL person lives in  a hut. PMGSY

          PMGSY roads have changed the system of connectivity and transport from the villages to the towns and nearby cities.  This had helped the farming community to transport their agricultural and allied activities products like dairy products to the cities and towns speedily and improved their financial position, after launching the programme and with the experience of the first three years, the cost of the programme was revised in 2003-04 to Rs.1,30,000 crore against the Rs.60,000 crore projected initially out of 1,66,938 habitations eligible for coverage under the Programme, out of which 31,502 habitations are connected to be reported in other schemes or not feasible.  Remaining 1,35,436 were targeted for providing road connectivity under PMGSY giving priority for PMGSY is appreciable which helps the rural population, tribal and desert areas through good-all-weather roads in the rural areas.

National Social Assistance Programme

Under NOAPS, Rs.75/- per month was being provided for beneficiary to destitutes who were 65 years of age or above.  The amount of pension was increased to Rs.200 per month with effect from 1.4.2006 and States were asked to provide another Rs.200/- per month from their own resources.

          During 2009-10 till December, 2009, 5.00 lakh beneficiaries have got benefited from the scheme.  This programme had changed the lifestyle of the beneficiaries apart from the family members not feeling of burden on them this pension beneficiaries.

·      National Rural Drinking Water Programme.

·      Central Rural Sanitation Programme

·      Rural Development Programmes in the NE Region

·      Integrated watershed Management Programme (IWMP)

·      Special Provision of Rs.1,200 Crores to Budelkhand under MGNREGA

are bringing sea-saw change in the life style of rural population more so SC/STs whose children able to persue good education have good food, good medication through NRHM.

          The above activities of UPA Government show the serious concern of the UPA Governments sincerity to lift the rural population from BPL and bring the poor into mainstream of the society.

          Finally, if steps are taken to plug the loopholes for siphoning of the funds by some unscrupulous elements and officers in some instances the UPA Governments  efforts to develop the rural India go long way in the history of UPA Governments Governance.

          I support the Demands for the Grants to Rural Development Ministry.

 

*श्री राम सिंह कस्वां (चुरू):  सभापति महोदय आपने मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदान मांगों पर अपनी बात रखने का अवसर दिया, मैं आपका आभारी हूं । गांवों की उपेक्षाकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया जा सकता, देश की खुशहाली के लिए गांवों को खुशहाल बनाना पहली शर्त है । यदि गांवो से गरीबी दूर करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए जाते हैं तो इसके गंभीर दुष्परिणामों को झेलना पडेगा, जो राष्ट्रहित में नहीं होगा । ग्रामीण विकास के भले ही तमाम दावों किए जावें लेकिन वास्तविक तस्वीर कुछ और ही है । अमीरों व गरीबों के बीच खाई बढ रही है । गांवों में निरंतर बढती गरीबी गंभीर चिंता का विषय है, इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा, कि गांवों में रहने वाली 42 प्रतिशत आबादी अत्यंत गरीब है । गरीबी की स्थिति वास्तव में भयावह है। गांवों में गरीबी का सबसे प्रमुख कारण किसानों और कृषि की बदत्तर स्थिति ही माना जा सकता है । गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है । गांवों की उपेक्षाकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया जा सकता ।

          भारत आज भी गरीबी की समस्या का कारगर उपाय ढूंढने में असफल रहा है, भारत में गरीबी को मापने के लिए, सही तरीका खोजने के लिए योजना आयोग ने अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में एक विशेष समूह की नियुक्ति की थी, समिति ने गरीबी के सरकारी आकलन 28.8 प्रतिशत को खारिज करते हुए बतलाया है कि भारत के गांवों में 42 प्रतिशत लोग गरीब हैं । नई बीपीएल सूची बनाने के लिए अविलंब सर्वे किया जाए, पात्र लोगों का चयन किया जावे ।

          महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना एक अच्छी योजना है । वित्त वर्ष 2010-11 के बजट में पिछले साल की अपेक्षा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के मद में एक हजार करोड ज्यादा रखे है । इस साल के लिए 40100 करोड़ रू. का प्रावधान किया गया है । ग्रामीण विकास मंत्रालय के लिए कुल 66100 करोड रू. आवंटित किए गए हैं । इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र के हर परिवार के एक वयस्क को वर्ष में 100 दिन का रोजगार दिया जाता है । रोजगार न दिए जाने पर उसे मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था है । मनरेगा में मानक दिया गया है, कोई भी मजदूर इस मानक के आधार पर कार्य नहीं कर सकता वास्तव में मजदूरी 50-60 रू. से भी कम ही मिल रही है । सरकार ने 100 रू. मजदूरी देने के लिए वचनबद होना होगा । कोई ऐसा सिस्टम तैयार होना चाहिए, जिसमें 100 दिन के लिए एक सौ रू. प्रतिदिन के हिसाब से परिवार के एक सदस्य की राशि दस हजार रूपया उनके खाते में जमा करवा दी जावे । वह अपनी कार्य योजना व आवश्यकता के अनुसार कार्य करवा सके, इससे प्रशासनिक खर्चों में भी बचत होगी ।

          आज मनरेगा के अंतर्गत परिसंपत्तियों का निर्माण नहीं हो रहा है, अधिकांश कच्चे कार्य हो रहे है जिसकी कोई उपयोगिता नहीं है । एक ही जोहड़, तालाब, बावड़ी को बार-बार खोदा जा रहा है । परिसंपत्तयों के रख रखाव की कोई व्यवस्था नहीं है । इस योजना को किसान व कृषि कार्यों व किसानों के साथ जोड़ा जावे । कृषि के लिए कुंड, जलाशय, भवन, पेड़ पौधे लगाना आदि कार्यों को भी इसमें शामिल किया जावे । इस योजना को भ्रष्टाचार विहीन बनाना अत्यंत आवश्यक है । प्रभावी मोनेटरिंग हो, ठेका प्रथा बंद हो ।

          ग्रामीण विकास मंत्रालय सभी ग्रामीण बसावटों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत पेयजल आपूर्ति विभाग द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के अभाव को दूर करने के लिए त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रम जैसे अनेक कार्यक्रम क्रियान्वित किए हैं, लेकिन वास्तव में हमारे यहां पीने के पानी की विकट समस्या है । सरकार द्वारा पीने के पानी पर विशेष दर्जा देना तो दूर की बात है, राजस्थान को कोई अतिरिक्त सहायता भी प्रदान नहीं की गयी है । मेरे संसदीय क्षेत्र चुरू में जर्मन के सहयोग से संचालित आपणी योजना को देश की सर्वोत्तम पेयजल योजना होने का गौरव प्राप्त है, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण आज इस योजना में भी पानी का संकट हो गया है इस योजना के द्वितीय चरण का कार्य स्वीकृति हेतु जल संसाधन मंत्रालय के पास विचाराधीन है, जिससे चुरू जिले के सुजानगढ-रतनगढ-राजगढ तहसिलों को लाभान्वित होना है । 375 करोड की लागत से बनने वाली बूंग्गी राजगढ पेयजल योजना का शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुधंरा राजे जी द्वारा किया गया था । पिछले 15 माह में राजस्थान की वर्तमान सरकार नेउक्त योजना पर एक भी पाइप लगाने का कार्य नहीं किया है । आपणी योजना का द्वितीय फेज व बुंग्गी -राजगढ (चुरू) योजना की स्वीकृति अवलिम्ब जारी करना आवश्यक है । पीने के पानी की विकट समस्या कोहल करने के लिए प्रत्येक सांसद को एक हजार हैंड पंप लगाने की अनुशंषा करने का अधिकार मिलना चाहिए । पीने के पानी के लिए चुरू जिले व नोहर तहसील (राजस्थान) को विशेष सहायता प्रदान की जाए । राजस्थान के तारानगर, सरदारशहर, सुजानगढ, चुरू, रतनगढ, राजगढ व नोहर तहसील के हिस्सों पर 1000 फीट की गहराई तक टेस्ट बोर करवाकर पानी की स्थिति का पता लगाना चाहिए ।

          प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना ने ग्रामीण क्षेत्र की तस्वीर बदलने का कार्य किया है, हाल ही में सरकार ने उन बस्तियों को जिनकी आबादी 250 है, जो राजस्व गांव नहीं है उन्हें भी जोड़ने का निर्णय लिया है, इसका आधार 2001 में जलदाय विभाग द्वारा किए गए सेर्वे को माना है, उक्त सर्वे सही नहीं है, आज भी मेरे क्षेत्र में ऐसी बस्तियां है, जिनकी आबादी 250 से से ऊपर है, जो राजस्व गांव नहीं है, उक्त सर्वे में शामिल नहीं है, ऐसी बस्तियों को ग्राम पंचायत विकास अधिकारी, तहसीलदार, उपखंउ अधिकारी आदि से सर्वे करवाकर सड़क से जोड़ने का कार्य किया जाना चाहिए। इससे ग्रामीण जनता को काफी राहत मिलेगी इसके अतिरिक्त थ्रूरूट के नाम से पूर्व के निर्मित 10 किलोमीटर से ज्यादा लंबी दूरी की सड़कों का नवनीकरण भी किया जा रहा है । मेरा इसमें आग्रह है कि इस तरह के मार्ग जिसमें 5-10 किलोमीटर नई सड़क बनाने से काफी लंबे क्षेत्र को जोड़ा जा सकता है, का निर्माण किया जावे ।

          प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना वह योजना है, जिसमें जिन गांवों में सड़क नहीं है उन गांवों को जोड़ा जावे, जिन स्थानों से रेल लाइन गुजरती है, वहां रेल समपार नहीं है, वह गांव कैसे जुड़ा हुआ माना जावेगा । आज मरे संपूर्ण क्षेत्र में लगभग 450 किलोंमीटर रेल लाईन है, रेलवे क्रोसिंग मानव सहित/मानव रहित मात्र 30-35 है । इस क्षेत्र के अधिकांश गांव उक्त योजना में जोड़े जा चुके हैं, लेकिन रेलवे क्रोसिंग के अभाव में ये गांव व्यवहारिक रूप से जुड़े नहीं है । ऊंट गाड़ा, ट्रेक्टर, जीप, भारी वाहन इन सड़कों पर रेलवे क्रोसिंग के अभाव में गांवों में नहीं जा सकते है । रेलवे यहां  रेलवे क्रोसिंग बना नहीं रहा है, राज्य सरकार के पास इतने संसाधन नहीं हे कि वे इसके निमाण पर होने वाला 1.50 करोड रू. वहन कर  सके । मेरा सरकार से आग्रह है कि रेलवे क्रोसिंग पर होने वाला व्यय भी उक्त योजना के अंतर्गत सरकार वहन करे । वर्तमान में इस योजना के अंतर्गत 25 मीटर के स्थान पर 50 मीटर तक लंबे पुल निर्माण करने का निर्णय सरकार ने लिया है, मेरी मांग है कि इस पुलों की लंबाई 100 मीटर की जानी चाहिए, जिससे रेल लाइन पर सिंगल लेन के पुलों का निर्माण भी हो सके ।

          राज्य सरकार रेलवे क्रोसिंग, ऊपरी व नीचे के पुलों के लिए वित्तीय मदद में आगे नहीं आ रही है, जिसके कारण हजारों किलोमीटर तैयार सड़कों का उपयोग नहीं हो रहा है ।

 

श्री पोन्नम प्रभाकर (करीमनगर):सभापति महोदया, मुझे पहली बार सदन में बोलने का मौका मिला है। 15वीं लोक सभा में इलैक्ट होने के बाद सप्लीमैन्ट्री क्वैश्चन, जीरो ऑवर या नियम 377 के अधीन मामलों पर मैं जरूर बोला हूं। लेकिन इस बार ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर मुझे पहली बार बोलने का मौका मिला है। मैं कांग्रेस पार्टी और यूपीए चेयरपर्सन को धन्यवाद देता हूं।

MADAM CHAIRMAN: Now, it is six o’clock.  I have a list of 13 more hon. Members.  If the House agrees, time of the House may be extended up to the completion of today’s business.

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

MADAM CHAIRMAN: Okay.  The time of the House is extended.

श्री पोन्नम प्रभाकर : मैं सबसे पहले कांग्रेस पार्टी को धन्यवाद देता हूं, क्योंकि उन्होंने मुझे एम.पी. का टिकट दिया, जिसके कारण मुझे यहां बोलने का मौका मिला है। मैं अपने क्षेत्र के वोटर्स को भी यहां से धन्यवाद करता हूं। आपने मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय की मांगों पर बोलने का मौका दिया। मैं कहना चाहता हूं कि यह स्कीम इस तरह की है कि अपनी जाति, पिता का नाम लगाकर…

THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Those hon. Members who want to lay their speeches may do so.

MADAM CHAIRMAN: As suggested by Shri Pranab Mukherjee, those hon. Members who want to lay their speeches may do so on the Table of the House.

श्री पोन्नम प्रभाकर : मैडम, मैं पहली बार बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं और आप स्पीच ले करने के लिए कह रही हैं।

सभापति महोदया : मैं अन्य मैम्बर्स को बोल रही हूं। आप बोलिये।

श्री पोन्नम प्रभाकर : हम एनएसए लीडर हैं, हम बहुत बोल सकते हैं, लेकिन अभी हमारी शुरूआत है। मैं कहना चाहता हूं कि सरकार ने महात्मा गांधी के नाम पर शुरू करके इस प्रोग्राम की बहुत इज्जत बढ़ाई है और इसे ग्रामीण क्षेत्रों तक ले जाने के लिए चाहे सैंट्रल गवर्नमैन्ट हो, यूपीए चेयरपर्सन हों, माननीय प्रधान मंत्री हों या ग्रामीण विकास मंत्री हों, ये सब इस प्रोग्राम के लिए जो प्रयास कर रहे हैं, उसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं।

          इसके अलावा मैं कहना चाहता हूं कि इसमें जो फंड्स का एलोकेशन किया गया है, यह मामूली बात नहीं है। हमारी अपोजीशन पार्टी के लोग इसका एप्रिशएशन नहीं कर सकते। क्योंकि आज से ही नहीं बल्कि साठ साल पहले जब देश स्वतंत्र हुआ, तभी से कांग्रेस पार्टी के किसी भी डिसीजन को ये लोग नहीं मानते हैं। चाहे बैंकों का नेशनलाइजेशन हो, बीस सूत्री कार्यक्रम हो या पंचवर्षीय योजनाएं हो, हर चीज का विरोध करना इनकी आदत हो गई है। यह इतना अच्छा प्रोग्राम है। जब ये यहां बोलते हैं तो कहते हैं कि प्रोग्राम अच्छा है, लेकिन बाद में कहते हैं कि प्रोग्राम अच्छा नहीं है। हमारे आंध्र प्रदेश के गांव-गांव में यह  प्रोग्राम पहुंच रहा है। इस प्रोग्राम के इतना सफल होने के बाद भी ये लोग इसका विरोध कर रहे हैं। मैं कहता हूं कि आप इसकी असलियत में जाइये और देखिये कि ग्रामीण क्षेत्रों में इससे क्या विकास हो रहा है। आपको इसके बारे में पहले पता लगाना चाहिए। इस प्रोग्राम के जरिये चाहे भारत निर्माण हो, इंदिरा आवास योजना हो, जो फंड्स एलोकेट किया गया है, वह पर्याप्त है और ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से जो काम चल रहा है, वह बहुत अच्छा चल रहा है। विशेष रुप से आंध्र प्रदेश में सैल्फ हैल्प ग्रुप जो काम कर रहे हैं और पूरे देश में 6500 करोड़ का जो लोन दिया गया है, उससे खुद इनमें बांटकर उनके पांच मजबूत करने का मौका मिला है। आंध्र प्रदेश में पहले श्री राजशेखर रेड्डी मुख्य मंत्री थे और अब श्री रोसैया जी वहां मुख्य मंत्री हैं। यूपीए चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश में ग्रामीण विकास का बहुत अच्छा काम चल रहा है। आंध्र प्रदेश में सोशल आडिट हो रहा है और वहां बहुत तेजी से काम चल रहा है।

          मैं माननीय मंत्री जी से एक रिक्वैस्ट करना चाहता हूं कि इससे पहले रूरल डैवलपमैन्ट की एक कांफ्रैन्स हुई थी। उसमें एक्जीक्यूशन करने के लिए हर गांव में एक गांव सचिवालय के लिए प्रोविजन करने का मंत्री जी ने वादा किया था। मैं आपके माध्यम से यह रिक्वेस्ट कर रहा हूं कि हर गांव में ग्राम सभा के द्वारा एक्जीक्यूशन का काम होना चाहिए था। वहां ग्राम सचिवालय आज भी नहीं है। वहां ग्राम सचिवालय देने के लिए मैं मंत्री जी से रिक्वेस्ट करता हूं। रूरल डेवलपमेंट में पीने के पानी की सुविधा करने के लिए और शिक्षा के लिए एसेट डेवलपमेंट का प्रोग्राम भी लागू कीजिए। केवल रोजगार के लिए ही नहीं, ड्रिंकिंग वाटर मिनिमम एमेनिटीज से परमानेंट एसेट बनाने के लिए भी अगर काम करें तो मैं यूपीए गवर्नमेंट और मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं। मैं पहली बार बोल रहा हूं और भविष्य में और ज्यादा बोलने की कोशिश करूंगा। गवर्नमेंट की तरफ से स्किल डेवलपमेंट का भी प्रोग्राम हो रहा है, उसे और अच्छी तरह से कीजिए। कंक्रीट बेस में स्किल डेवलपमेंट करके छोड़ने का नहीं, उसे थोड़ा रूरल बेस पर छोटा-छोटा इंडस्ट्री लगाकर, जो अपने पूरे देश में इस्तेमाल होती हैं, वैसी चीज बनाकर यूटिलाईज करने का मंत्री जी से रिक्वेस्ट करता हूं। मैं छात्र नेता होते हुए बहुत मीटिंगों में बोला मगर यहां मुझे पहली बार मौका मिला, इसके लिए मैं आपको और पार्टी को धन्यवाद देता हूं और सभी को नमस्कार करता हूं।

 

 

 

 

 

*श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल):आज ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुदानों पर चर्चा है जो हमेशा से ही काफी अच्छी होती है क्योंकि भारत की 70 प्रतिशत जनता गांवों में ही निवास करती है और यह मंत्रालय उनके उत्थान के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहता है। नई-नई योजनाएं बनाकर यह मंत्रालय गांवों में निवास करने वालों का जीवन स्तर ऊपर उठाने का प्रयास करता है । महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार एक्ट भी इसी मंत्रालय द्वारा लागू किया गया एक सर्वत्र सराहनीय कदम है । मैं इस सदन के माध्यम से यह कहना चाहूंगा कि मनरेगा न कहकर इसे पूरा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार एक्ट कहा जाए क्योंकि महात्मा गांधी हमारे राष्ट्र पिता हैं तथा उनके सम्मान में हमें उनका पूरा नाम लेना चाहिए । महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की पूरा भारत ही नहीं अपितु पूरा विश्व प्रशंसा करता है ।

          इस एक्ट के उद्देश्य को पूरा करने में कुछ अनियमित्ताएं सामने आ रही हैं जैसे इसमें कुछ राज्यों की सरकारें रूचि नही ले रही हैं । इसमें भुगतान समय पर न होने की काफी शिकायतें प्राप्त हो रही है ।

          अधिनियम के प्रावधान के अनुसार श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध नहीं करवाया जा है जिसमें उन्हें गावों से शहरों की ओर आजीविका के लिए पलायन करना पड़ रहा है । जिसके लिए कुछ दिशा निर्देश जारी किए जाने चाहिए । केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को निर्देश दिए जाने चाहिए कि वह जिला प्रशासन योजना के प्रति गंभीर होने के आदेश दे । जिले के वरिष्ठ अधिकारियों को भी अपने मुख्यालय से बाहर निकल गांवों का भ्रमण करना होगा जिससे योजना के क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाईयों का निवारण समय पर हो सके ।

          मेरे क्षेत्र भ्रमण के दौरान यह भी जानकारी में आया कि गत वर्ष इस योजना के तहत करवाए गए कार्यों का श्रमिकों को अभी तक भुगतान नहीं हुआ है । सरकार को भुगतान की समय सीमा सुनिश्चित करनी चाहिए जिससे गरीब श्रमिक को उसका अधिकार समय पर मिल सके ।

          उत्तराखंड में इस योजना के तहत जो पानी एकत्रित करने के लिए जो खाले बनायी गयी थी उनमें से अधिकांश स्लीप आने के कारण दब गयी जिससे उन्हें बनाने का उद्देश्य समाप्त हो गया तथा पैसो का भी अपव्यय हुआ । इस ओर भी ध्यान देना चाहिए ।

          पर्वतीय क्षेत्रों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए जो कार्य महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी एक्ट  में सम्मिलित किए गए हैं वह पर्वतीय जनपदों की विषम भौगोलिक स्थिति एवं यातायात की कठिनाईयों और वहां की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है । अतः वहां की विषम परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए इस योजना में निम्न प्रस्ताव सम्मिलित करने के लिए मैंने माननीय मंत्री जी से भी आग्रह किया है ।

1.       पैदल संपर्क मार्गों का निर्माण

2.       पैदल सीसी खड़ंजा मार्गों का निर्माण

3.       लघु पेयजल योजनाओं का निर्माण

4.       लघु सिंचाई योजनाओं का निर्माण

5.       पैदल पुलियों का निर्माण

6.       क्रीड़ा स्थलों का निर्माण

7.       सामुदायिक मिलन केंद्र/पंचायत भवन/बारात घर का निर्माण

8.       क्षतिग्रस्त पैदल मार्गो/पुलियों/नालियों/लघु सिंचाई योजनाओं/पेयजल योजनाओं      की मरम्मत

9.       सार्वजनिक सीलों/चौक आदि का निर्माण

10.     विद्यालयों के आगन/प्रांगण/क्रीड़ा स्थलों का निर्माण

          इसी के साथ में ज्यादा समय न लेते हुए अपनीबात को यही विश्राम देता हूं तथा एक बार पुनः आपको धन्यवाद देता हूं ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

*SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM): I rise to support the demands for grants for the Rural development ministry the centre piece of the UPA-II Government. It is indeed heartening to note that there is no let up in the emphasis in this sector in the Union Budget having been presented at a crucial juncture with an economy creeping out of slow down. The rural people of India constitute mainly those who have been denied access to many of the otherwise important steps that our country has already taken. One can always argue that more allocation could have been made available.

The need of the hour is to see that the implementation of all the schemes are done first with passion and second with consistent monitoring of the delivery elements in our system. Physical and financial targets have been missed in many States. The people who ought to have been the beneficiaries have also been left out. These are to be corrected forthwith.

Here I would like to point out that the increasing role of the Member of Parliament is not advisable. We would like to have a look at the projects when they are being implemented but we cannot be made mainline functionaries in the Monitoring and Vigilance. I disagree on this as it is not the work of an MP. We are foremost legislators. We have to spend more time in our legislative business and these kinds of responsibilities  distracts us from the core of our work. We have more important issues on hand.

I would request for having a relook at this part of the overall framework of monitoring that has been designed.

Perhaps, a greater synchronisation and coordination with the State Government is in order. After all the issue is important since Rural Development is a State subject. Every now and then we hear the blame game which tends to play out

 

 

in Parliament. Centre being blamed for taking on too much and centralising versus the States not fulfilling their part of the bargain. This is a perpetual issue but we must focus on the overall well being of our citizens. It is therefore imperative that the mechanisms must be made more robust via other innovative delivery designs.

The Ministry of Rural Development has three departments: (a) Department of Rural Development; (b) Department of Land Resources; and (c) Department of Drinking Water. Among the three departments, the highest increase in allocation is in Department of Land Resources, followed by Department of Drinking Water Supply and Department of Rural Development

The UPA in its first stint undertook a host of policy initiatives, landmark among which is the National Rural Employment Guarantee Act (NREGA) which promised at least 100 days of wage employment to a household seeking employment. Noteworthy also, was the UPA initiative on rural infrastructure development christened Bharat Nirman which encompasses rural housing, rural electricity connection, telephony, all-weather road connectivity, safe drinking water, sanitation and expansion of irrigation capacity. However, with the first full budget of the second run of UPA, the financial commitment on rural development seems less than forthcoming.

•       The allocation for the Department of Rural Development has increased from Rs.62,201 crores in 2009-10 (Revised Estimate) to Rs.66,138 crores in 2010-11 (Budget Estimate).

•       The allocation on Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme (MGNREGS) has gone up by only 2.5% from Rs.39,100 crores in 2009-10 (Revised Estimate) to Rs.40,100 in 2010-11 (Budget Estimate).

•       A major development for rural housing sector is a substantial increase in unit costs of housing provided under Indira Awaas Yojana (LAY). The unit cost has been increased by 30% to Rs.45,000 for plain areas and Rs.48,500 for hilly areas.

•       Quantum of allocation for IAY has, however, increased by only 13% from Rs.8,800 crores to Rs. 10,000 crores.

•       Allocation for Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana (PMGSY) has remained at the 2009-10 level at Rs. 12,000 crores.

•       The allocation for Backward Region Grant Fund (BRGF) has been increased by 26%, from Rs.5,800 crores in 2009-10 (Revised Estimate) to Rs.7,300 crores.

Before, venture to narrate some figures I would like to put another important aspect in front of this august house. The PMGSY is an important and integral part of Bharat Nirman. This flagship program is very popular since enables connectivity to far flung villages. I would be happy if for mountain states like mine, Sikkim, we were endowed with PMGRY or Prime Minister’s Gram Ropeway Yojana. This would facilitate easy connectivity without the cutting of hillsides and loss of precious mountain flat land and forest land: Flat land is a hugely destroyed due to road cutting. It is time to look at this alternative connectivity for mountain and hilly States.

Starting from 2004, when the UPA first took office, the total allocation on rural development as a whole took a quantum jump. From 2004-05 to 2008-09 the average annual growth rate of expenditure on rural development was around 37%. Superlative growth was attained in 2008-09 with an overall growth rate of 79% over the allocation in 2007-08.

However, increase in allocation in this sector did not hold the trend for years 2009-10 and 2010-11. Outlays in Union Budget 2010-11 have reduced by 8% over the previous year. Overall the allocation for rural development sector stood at 1.1 % of GDP for 2010-11 compared to 1.2% of GDP in 2009-10 (Budget Estimate).

Therefore, one can argue that the aam aadmi is not being held centre stage at this time. However, we also understand the circumstances of this.

My refrain is that the size is still large enough if we are able to implement is more judiciously and innovatively. I know the Minister of this Ministry does see things in alignment to what I am stating. I only hope that he will be able to execute the same with the same spirit.

With these words, I fully support the demands for grants.

 

                                                                                                             

 

 

श्रीमती कमला देवी पटले (जांजगीर-चम्पा):महोदया, मैं आपकी आभारी हूं कि आपने मुझे पंचायती राज एवं राष्ट्रीय ग्रामीण विकास के बारे में बोलने का समय दिया। भारत में पंचायतें प्राचीन काल से ही जीवन का अभिन्न भाग रही हैं। भारत के गांव का विकास एवं उसमें रहने वाले अंतिम छोर के अंतिम व्यक्ति का विकास पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के सपनों का भारत था। 73वें संविधान संशोधन के त्रिस्तरीय पंचायतों में आज राजनीतिक सशक्तिकरण प्रगति की ओर है। स्थानीय स्वशासन की प्रणाली के रूप में एक संवैधानिक दर्जा प्राप्त कर लिया है। देश की आधी आबादी को इन संस्थाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देकर नेतृत्व प्रदान किया है, इसके लिए मैं केंद्रीय सरकार को धन्यवाद देती हूं। मैं चाहती हूं कि सभी दलों को साथ लेकर, दलीय भावना से ऊपर उठकर आबादी एवं जनसंख्या के आधार पर विधान सभाओं और लोक सभा में भी जल्द से जल्द 33 प्रतिशत आरक्षण लागू कर महिलाओं को नेतृत्व प्रदान करने का अवसर दें। मैं छत्तीसगढ़ के संवेदनशील मुख्यमंत्री माननीय डा. रमन सिंह सहित मध्य प्रदेश सरकार, बिहार और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों को भी विशेष धन्यवाद ज्ञापित करना चाहूंगी। जिन्होंने अपने-अपने राज्यों में केंद्र सरकार से पहले इन संस्थाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया है। देश के राष्ट्रीय ग्रामीण विकास में पंचायत राज संस्थाएं, योजनाओं व कार्यों का निष्पादन कर विकास को गति प्रदान कर रही हैं। निर्वाचित प्रतिनिधियों और अधिकारियों की कार्य क्षमता निर्माण के लिए एक राष्ट्र स्तरीय प्रशिक्षण तथा संसाधन केंद्र की स्थापना की जानी चाहिए। पंचायतों को व्यापक शक्तियां, कार्य और जिम्मेदारी है, जिसका पूरी पारदर्शिता के साथ निर्वहन किया जा रहा है। इन्हें और अधिकार दिये जाने चाहिएं। वर्ष 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने देश के कस्बों को शहरों की तरह बुनियादी सुविधाएं प्रदान करके विकसित करने की घोषणा की थी।

          इससे मज़दूरों का शहरों की ओर पलायन रोककर शहरों को भी जनसंख्या के दबाव से मुक्त किया जा सकेगा और देश का समुचित विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा। ग्रामीण विकास बोर्ड ने 166 परियोजनाओं को मंज़ूरी दी है जिसमें छत्तीसगढ़ में नाममात्र की परियोजनाएं शामिल हैं। चूँकि छत्तीसगढ़ राज्य खनिज संपदा एवं पावर हब की दृष्टि से संपन्न है और केन्द्र सरकार को भी भारी राजस्व की प्राप्ति होती है। छत्तीसगढ़ की 80 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में निवास करती है किन्तु फिर भी केन्द्र सरकार द्वारा इस राज्य के विकास के लिए समुचित धनराशि मुहैया नहीं कराई जा रही है। आज भी बस्तर, दंतेवाड़ा सहित जांगीर चापा जिला विकास के नाम पर पिछड़ा हुआ है और वहाँ एक केन्द्रीय विद्यालय तक नहीं है। इसके परिणामस्वरूप दंतेवाड़ा जैसी परियोजनाएँ सामने आ रही हैं। यदि गांवों का समुचित विकास होगा तो जनसाधारण में जागरूकता आएगी और समस्याएँ अपने आप समाप्त होंगी। शासन अंतिम छोर के व्यक्ति तक विकास पहुँचाना चाहती है लेकिन अधिकांश अंतिम छोर के व्यक्ति बीपीएल सर्वे के समय अन्यत्र खाने कमाने गए रहते हैं। इससे उस परिवार का नाम सूची में नहीं जुड़ पाता। इससे सरकार की उनके लिए बनने वाली जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे व्यक्ति स्थानीय प्रतिनिधियों और अधिकारियों के पास आवेदन देते फिरते हैं। मेरे विचार से पूरे देश में जनगणना की भांति  एक साथ एक समय में राष्ट्रीय स्तर पर बीपीएल सूची बनवाई जाकर उन्हें ऊपर उठाया जाना चाहिए। महोदया, मुझे स्वयं त्रिस्तरीय पंचायती राज के तीनों स्तर पर चुनी हुई प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने का अवसर जनता द्वारा दिया गया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के सपनों का भारत इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से संपन्न हो रहा है, इन्हें और अधिक सशक्त करने की ज़रूरत है जिससे गाँवों में महात्मा गांधी के राम-राज्य की स्थापना का सपना पूरा हो सके।

                                                                                                   

 

श्री रामकिशुन (चन्दौली):माननीय सभापति महोदया, आपने मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय की अनुदानों की मांगों के समर्थन में चर्चा में भाग लेने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूँ। यह महत्वपूर्ण विभाग है। इसमें हम सबको राजनैतिक भावनाओं से ऊपर उठकर देश के विकास के लिए काम करना चाहिए। सभापति महोदय, जहाँ हमारे देश की आबादी एक अरब है, उसकी 75 प्रतिशत जनता गांवों में रहती है। आप 80 प्रतिशत भी कह सकते हैं कि इतनी जनता गांवों में रहती है। उन गांवों के विकास के लिए यह विभाग महत्वपूर्ण विभाग है। हम सब लोग इस सरकार के अच्छे कार्यक्रमों का समर्थन करते हैं। अपने सुझाव के रूप में मैं कुछ बातें कहना चाहता हूँ कि आज देश में ग्रामीणों की जो हालत है, उसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण गांवों में पेयजल की समस्या है। आज चारों तरफ पानी का स्तर नीचे जा रहा है और ग्रामीणों को शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है, जिससे बहुत सी गंभीर बीमारियाँ उत्पन्न हो रही हैं जिनके इलाज में भारी धन खर्च करना पड़ रहा है। दूसरा विभाग आपका है जो उसका महत्वपूर्ण अंग ग्रामीण स्वच्छता अभियान है। मैं खुलकर कहना चाहता हूँ कि आज गांवों में मोबाइल तो सबके घरों में आ गया है लेकिन ग्रामीणों के पास शौचालय बनवाने की क्षमता नहीं है। यह दुख की बात है कि इस देश की आधी आबादी मोबाइल का प्रयोग कर रही है और वहीं गांवों में ग्रामीण स्वच्छता के नाम पर शौचालय बनाने के लिए मात्र 1500-1700 रुपये दिये जा रहे हैं।  

                     मैं सरकार से मांग करूंगा कि इस ग्रामीण स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय बनाने के लिए कम से कम पांच से दस हजार रूपये देने का काम किया जाए। प्रधानमंत्री सड़क योजना गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ने की एक महत्वपूर्ण योजना है। लेकिन कई राज्य इस के धन का ठीक से उपयोग नहीं कर रहे हैं और पैसा लौटा रहे हैं। मैं कहना चाहता हूं कि आप इसके लिए नियमों में थोड़ी छूट दीजिए। ढाई-तीन सौ की आबादी के मजरे और पूर्वे के लिए भी मानकों में ढील देकर उन्हें जोड़ने का काम किया जाना चाहिए।

          महोदया, स्व-रोजगार योजना का लाभ पढ़े-लिखे नौजवानों को भी मिल सकता है। लेकिन इसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टचार है। इस प्रकार की योजना का ठीक प्रकार से उपयोग  बैंक के अधिकारियों द्वारा नहीं किया जाता है।

          महोदया, मनरेगा से रोजगार तो मिला है, लेकिन उसकी कुछ कमियों की ओर मैं सरकार का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। जब मैं इस बात को कहूंगा तो हमारे बसपा के साथी शोर-शराबा मचाएंगे। मैं आदरणीय और पूजनीय डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम लेना चाहता हूं। पहला सत्याग्रह डॉ. अम्बेडकर साहब ने पानी के सवाल पर मुम्बई में तालाब से सार्वजनिक रूप से पानी लेने के लिए किया था। बसपा के लोग चाहे जो कर रहे हों, लेकिन मैं सरकार से मांग करना चाहता हूं कि हर गांव में एक सुंदर और पक्का तालाब मनरेगा के माध्यम से किया जाएगा, तो कांग्रेस पार्टी ने डॉ. अम्बेडकर के नाम से जो यात्रा शुरू की है, उसके प्रति लोगों में एक सार्थक और अच्छी सोच पैदा होगी, क्योंकि डॉ. साहब ने पानी के सवाल पर पहली लड़ाई लड़ी थी। बसपा के लोग क्या कर रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है, मैं उसे कहना नहीं चाहता हूं।

          महोदया, सरकार को अधिक से अधिक हेण्ड पम्प लगाने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी का भारी संकट है। सूखा पड़ने से संकट और बढ़ गया है। जल स्तर नीचे जा रहा है। आपने पानी संच की बात कही है, छोटी-छोटी बरसाती नदियों और नालों पर चैक डेम बनाए जाएं, उन्हें ठीक किया जाए। बरसात खत्म होने पर यदि बैराज रहेगा तो इससे पानी समुद्र में जाने से बच जाएगा।…( व्यवधान)

सभापति महोदया :  कृपया आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री रामकिशुन : यदि पानी नदियों में रूका रहेगा तो इससे पानी का संकट समाप्त होगा। गांधी जी ने कहा था कि देश का विकास गांव से होता है। मैं एक रिपोर्ट पढ़ना चाहता हूं, आप मुझे एक मिनट का समय दे दीजिए। उस रिपोर्ट में एक माननीय मंत्री जी का भी जिक्र है। गावं में बढ़ती गरीबी- देश के विकास के मोर्चे पर भले ही तमाम दावे किए जाएं, लेकिन वास्तविक तस्वीर कुछ और ही है। अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ रही है। गांवों में निरंतर बढ़ती गरीबी गंभीर चिंता का विषय है। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि गांव में रहने वाले 85 प्रतिशत हैं। इस विषय में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व अध्यक्ष श्री सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में गठित योजना की रिपोर्ट है।…( व्यवधान)

सभापति महोदया :  बहुत-बहुत धन्यवाद।

          श्री एम.राजा मोहन रेड्डी।

श्री रामकिशुन : महोदया, इस रिपोर्ट में जो तथ्य उजागर किए गए हैं, वह राष्ट्रीय नीति नियोजकों के लिए बड़ी चुनौती है। बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र ऐसे छः राज्य हैं, जहां सबसे ज्यादा गरीबी है। अन्य राज्यों में भी गरीबी है, इसलिए इस रिपोर्ट के ऊपर भी, जो कि अर्थशास्त्रियों की रिपोर्ट है, जो इस देश के विशेषज्ञों की रिपोर्ट है, उनको ध्यान में रखकर गांव की गरीबी को दूर करने के लिए जितने भी कारगर उपाय हैं, वे करने चाहिए। स्वर्गीय श्री राजीव गांधी जी ने भी कहा था कि देश के गरीबों के लिए जो सौ रूपये जाता है, उसमें से केवल दस रूपया ही पहुंचता है। इसलिए वित्तीय अनुशासन की आवश्यकता है। आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।                                                                          

SHRI M. RAJA MOHAN REDDY (NELLORE): Madam Chairperson, I thank you for giving me an opportunity to speak on this important subject.  I rise to support the Demands for Grants in respect of the Ministry of Rural Development for 2010-11.

          The Father of the Nation has said: “India lives in villages.”  Even now, after rapid urbanization of the country, still it holds good; still more than 70 per cent of the people live in villages.  Mostly, the farmers and farm labourers live in villages.  They work day and night in the fields; not only they but their womenfolk, even at times, their children also work in the fields. They feed the country.  The irony of the situation is that they do not have food to eat.  That is the irony of the situation.  However, the UPA Government, under the Chairmanship of Shrimati Sonia Gandhi and the hon. Prime Minister, Dr. Manmohan Singh, undertook certain pro-farmer activities.  They have waived off around Rs.70,000 crore of farmers’ loan.  Not only that, but they also have raised credit facilities to the farmers. In 2003-04, it was only Rs. 70,000 crore. In this year, 2010-11, it has been increased to Rs.3,75,000 crore. Due to all these pro-farmer activities, our food production has raised from 174 million tonnes in 2002-03 to 233 million tonnes this year.  So, in that way, the farmers are happy.  They are happy because they have got remunerative price for their produce. The farmers have been encouraged to adopt agriculture as their activity.  In that way, the farmers in the rural areas are very happy.

          The allocation to all the rural developmental programmes is good.  However, I would like to mention that as regards PMGSY, I understand that a Circular has been issued by the Ministry to allot funds only for new connectivity of roads and not for upgradation of roads.  If it is followed, then the developed States, which have developed the road connectivity to rural habitations, will be deprived of this advantage.  If it is true, I would request the hon. Minister to withdraw that Circular.  Otherwise, most of the developed States which have spent their own money for connecting the rural habitations will be deprived of the benefit under this Scheme.  That is why, I would request the hon. Minister to take this into cognizance and try to rectify that thing. 

          Many hon. Members have said that after 63 years of our Independence, still in summer days we do not have pure drinking water in many villages.  When we go across our constituency, people in many villages say that still they do not have the drinking water facility, and they have to go miles together to fetch a pot of water; even that water is also not potable because of fluorine content. At the age of 30 years itself, if they have to see the sky, they will have to lie down on the cot and they have to look up, and only then they can see the sky. That is the situation now.

          I would request the Rural Development Minister to reach, at least saturation on two items. One thing is drinking water. Unless otherwise we achieve that, we cannot be called as a developed country. And the second thing is sanitation. Every house should have a toilet. Unless otherwise we achieve that, we cannot be called as a civilised country.

          With these two things, I would like to request the Minister to give priority to these two things and reach saturation points.

                                                                                                             

 श्री राजू शेट्टी (हातकंगले):सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं ग्रामीण विकास मंत्रालय की डिमांड्स पर बोल रहा हूं। आज सुबह से मैं ग्रामीण विकास की योजनाओं के बारे में सुन रहा हूं। हमारे देश में आज भी ऐसे अनेक गांव हैं, जहां सड़कें नहीं हैं और ग्रामवासियों को बहुत दूर तक पैदल चल कर सड़क तक आना पड़ता है। यही स्थिति बिजली की है। वहां बिजली भी नहीं पहुंची है, लेकिन फिर भी हम दावा कर रहे हैं कि हमारा देश बहुत आगे जा रहा है।

          सभापति महोदया, जो आर्थिक सर्वेक्षण किया गया है, उसमें कृषि क्षेत्र को मायनस 02 दिखाया गया है। इससे पता चलता है कि हमारे देश के ग्रामों की क्या स्थिति है। हमारी एवरेज इकनौमिक ग्रोथ बढ़ रही है, लेकिन हमारे देश का एग्रीकल्चर सैक्टर पिछड़ रहा है। खेती करने वाले सभी लोग गांवों में रहते हैं। आज भी गांवों में न सड़कें हैं, न बिजली है, न स्कूल हैं, न दवाखाने हैं और न ही गांवों के लोगों की सेहत की कोई देखभाल करने वाला है। इसके बावजूद हमारी सरकार दावा कर रही है कि हम महात्मा गांधी रोजगार गारंटी स्कीम के तहत रोजगार निर्माण कर रहे हैं, लेकिन यह सिर्फ रिकॉर्ड पर है, सिर्फ कागज के पन्नों पर लिखा हुआ है, क्योंकि असल में गावों में किसी को रोजगार नहीं मिल रहा है। इसी कारण आज शहर की ओर लोग आ रहे हैं।

          महोदया, मेरे चुनाव क्षेत्र में बहुत सारे गांव ऐसे हैं जहां सड़क तक पहुंचने के लिए 20-25 किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ता है। उस पहाड़ी एरिया में न बिजली पहुंची है और न सड़क पहुंची है। अगर हम जिला मजिस्ट्रेट और जिला परिषद् से पूछते हैं, तो वे कहते हैं कि प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के जो नियम हैं, उनमें ये गांव नहीं आते हैं, क्योंकि ये जंगल में बसी हुई छोटी-छोटी बस्तियां हैं। वहां पशुपालक लोग रहते हैं और कहीं 50, कहीं 100 अथवा 150 की आबादी वाले गांव हैं। इसलिए उन गांवों को जोड़ने के लिए कोई सड़क नहीं है। वहां के बच्चे स्कूल नहीं जा सकते हैं। वहां की महिलाओं को यदि अस्पताल जाना हो, तो दिन-दिन भर पैदल चल कर जाना पड़ता है। यह जो हालत है, इसे देखते हुए प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना में सड़कों की जो लिस्ट बनाई गई है, उस पर पुनर्विचार किया जाए और जंगलों और पहाड़ों में पड़ने वाले छोटे-छोटे गांवों को भी सड़कों से जोड़ा जाए। सीमान्त और छोटे किसानों के लिए महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में संशोधन करना बेहद जरूरी है। गांवों का यदि सुधार करना है, तो इसमें बहुत संशोधन होने चाहिए। इसके लिए सभी को मिलकर काम करने की जरूरत है। हम नक्सलवाद के खिलाफ लड़ने की तैयारी तो कर रहे हैं, लेकिन अगर हम ये सुविधाएं गांवों के लोगों को नहीं देंगे, तो वे ज्यादा दिन तक चुप नहीं बैठेंगे। इतना कहकर ही मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। धन्यवाद।

                                                                                                   

 श्री घनश्याम अनुरागी (जालौन): माननीय सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी व सदन को यह बताना चाहता हूं कि पूरे देश में, विशाल भारत में अस्सी फीसदी से ज्यादा आबादी गांवों, मजरों और डेरों में रहती है।  जहां उनके विकास के लिए न तो सड़क है, न स्कूल है, न अस्पताल है, न पेयजल की व्यवस्था है और न बिजली है।  यदि कहीं पर अस्पताल है तो डाक्टर नहीं है, डाक्टर है तो विशेषज्ञ नहीं है, विशेषज्ञ है तो दवा नहीं है।  इसी तरह गांवों में स्कूलों की दुर्दशा है।  गांवों में स्कूल नहीं हैं, यदि स्कूल हैं तो वहां अध्यापक नहीं है।  

          महोदया, आज पूरे देश में गंभीर परिस्थितियां हैं।  ये गंभीर परिस्थितियां इसलिए हैं, जब सरकार की काम करने की दिशा ठीक नहीं हुआ करती है, तो वहां के रहने वालों की दशा ठीक नहीं हो सकती है।  कहीं न कहीं सरकारों की दिशा खराब है, उसी के कारण इस देश के लोगों की दुर्दशा हो रही है।  जहां आज लोग कोठियों और बंगलों में ए.सी. में रहते हैं, लेकिन गरीब लोग गांवों में, मजरों में, खुले आसमान के नीचे गर्मी में तड़प रहे हैं।  वहां बिजली नहीं है।  उनके पीने के लिए पानी नहीं है। मैं बुंदेलखंड का रहने वाला हूं।  बुंदलेखंड में लोग लगातार पांच साल से सूखे एवं गर्मी से तड़प रहे हैं।  हो सकता है कि बहुत से लोग गर्मी के कारण मर चुके हों। …….( व्यवधान)

सभापति महोदया :  माननीय सदस्य, आप कंक्ल्यूड करें।

श्री घनश्याम अनुरागी :  महोदया, अभी तो एक मिनट हुआ है।

सभापति महोदया : आप जल्दी समाप्त करिए।

श्री घनश्याम अनुरागी :  वहां न तो पानी की कोई व्यवस्था है।  सरकार की तो कहने की स्थिति क्या है?  नरेगा जिसको कहा जाता है, उसके तहत पूरी तरह उत्तर प्रदेश में काम नहीं हो पा रहा है।  अब की बार जब मैंने निगरानी समिति की वहां मीटिंग ली, वहां आपस में अधिकारी कमीशन के बटवारे के नाम पर लड़ रहे थे और मेरे क्षेत्र में माननीय मंत्री जी गए थे, तो उन्होंने कहा कि मजदूरों से काम नहीं होता है, ट्रैक्टर से काम कराया जाता है।  एक तरफ लोग भूख से तड़प रहे हैं, तो दूसरी तरफ कुछ लोग काजू, किशमिश, फल व मलाई जैसे पौष्टिक भोजन खा रहे हैं।  मैं दुख के साथ कह रहा हूं कि देश की सरकार हो, चाहे उत्तर प्रदेश की सरकार हो, वह पूरी तरह संवेदनहीन है। मैं चाहूंगा कि इसकी जरूर गंभीरता से जांच होनी चाहिए और लोगों को काम मिलना चाहिए।  काम सौ दिन का नहीं, 365 दिन का मिलना चाहिए।  सौ दिन के काम से गरीबों का भला नहीं हो सकता है।  एक परिवार में ज्यादातर माता-पिता, दो पुत्र और पति-पत्नी होते हैं।  इन छः लोगों का सौ दिन के काम में, दस हजार रूपए में पूरा कल्याण नहीं हो सकता है।  दवाई, पढ़ाई, शिक्षा व भोजन नहीं हो सकता है।  माननीय मंत्री जी, मैं निवेदन करना चाहूंगा कि सौ दिन नहीं 365 दिन का काम गरीबों को मिलना चाहिए।  प्राथमिकता के आधार पर स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, बिजली, सड़क और पेयजल के लिए आप जरूर व्यवस्था करें और जहां ये नहीं हैं, वहां यह उपलब्ध करायें।  प्रत्येक जिले में कम से कम दो-दो हजार हैंडपंप तत्काल सरकार स्वीकृत करे।  बुंदेलखंड के लिए मैं प्रार्थना करता हूं कि वहां की गंभीर स्थिति को ध्यान में रखते हुए 75 मीटर के स्थान पर 40-50 मीटर की दूरी पर हैंड पंप लगवाने के आदेश जारी करें।  …( व्यवधान) 

सभापति महोदया : इस पर कल भी बहुत चर्चा हो चुकी है।

श्री घनश्याम अनुरागी :  यदि बजट में न हो सके तो बुंदेलखंड के पैकज में एक-एक जिले को दो-दो हजार हैंडपंप दीजिए। तो जो लोग प्यास से तड़पकर मर रहे हैं, वे कम से कम प्यास से तो बच जाएंगे। भूख से तो काम चला लेंगे, लेकिन पानी के बगैर नहीं चला पाएंगे।  इसी तरह सिंचाई की स्थिति बड़ी गंभीर है और इस सरकार को ध्यान देना चाहिए।  किसान व मजदूर परेशान हैं।  मैं प्रार्थना करता हूं कि सरकार इस मामले पर गंभीर हो, और उनके लिए काम करे।

 

SHRI S.S. RAMASUBBU (TIRUNELVELI): Madam Chairman, I thank you for this opportunity to participate in the discussions on the Demands for Grants of the Ministry of Rural Development.

          There is one song in Tamil “Enna Vazhan illai Instsa Thiru Nattil Yen Hia Entsa Vendum Velle Nattil” whose English translation is: 

When there are a lot of resources in our country, why should we stretch our hand to other countries?

 

          In India, most of the people are living in rural areas. They are depending on agriculture. Who will develop this country? It is the good governance. A good Government alone can develop the rural economy and rural people. Our UPA Government alone has brought about more rural development. Our able Finance Minister has given such a Budget which is giving more importance to rural development. Madam Soniaji is guiding this UPA Government.

          Our able and hon. Prime Minister is doing great development at the world level. Our hon. Minister of Home Affairs is strongly protecting our country. All our Cabinet Ministers in our UPA Government are doing good work. No other Government has done any rural development; it is only our Government which is doing it. We have allotted Rs. 1,13,000 crore for rural development alone. This is a very important Ministry.

          I would conclude by putting up three points. The first and the important one is this. Nowadays the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee scheme is being implemented by this Government. No BJP Government or no other Party’s Government has done this to the nation. It is only our Government which is doing this. So far, about Rs. 40,100 crore have been allotted for this scheme. In the previous year this amount was Rs. 39,100 crore. This figure has increased this year which is giving more employment opportunities to the rural people. Giving employment opportunity is a very important thing. We are seeing the rural people, the aam aadmi. We are seeing only them. If the rural poor are uplifted, if the women in the rural areas are able to get this opportunity it would be good and they are getting it now. Most of the agricultural labourers are getting this opportunity to get the employment. The purchasing power of the rural masses has increased. If their purchasing power has increased, they can bring up their children and they can give better education to the children. It is because of our Government, the work of the Ministry of Rural Development.

          Our active Minister of Rural Development is doing good work. Take the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana. Under this scheme, hundred per cent, we are giving funds to all the States because it is linking the roads. The village roads are being linked to the towns and if this is done it will be urbanisation and the villages will be urbanised. Then the development will automatically come in the rural areas also. So, it is a very important scheme.

          I have told the hon. Minister that sometimes these schemes are slow in implementation in some States. Our State, Tamil Nadu, has implemented the NREGA scheme properly. Our Chief Minister Dr. Kalaignar has implemented the scheme and ours is the first State to implement it. A number of States are not using these funds properly. There is very slow progress in this linking by roads. In this connection I want to give one suggestion. Because of some package system of Tender contractors are slowing this programme. I think some policy is there that there should not be such a “package system” for the contractors because they are doing many works and this scheme is a failure in this system. So, you have to change this policy.

          Madam, I have only one more point to mention. It is on Indira Awas Yojana, the housing scheme. It is very important for the people. Food, clothing and shelter are the three essential things and important for the poor people. Under this scheme, our Government is giving Rs. 48,500 for the hill area people and Rs. 45,000 for others. It is increased from Rs. 35,000 in the previous year. The people are getting loan at four per cent under DRI scheme also. These are all very important schemes that we are giving.

          Our UPA Government alone is developing all these things. Our Chairperson of the UPA, Shrimati Sonia Gandhi is developing our country. Our Congress Party is developing our country. It is true.

          Thank you for the opportunity given.

 

 

श्री धनंजय सिंह (जौनपुर): सभापति महोदया, आपने इस बहुत महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मुझे अवसर दिया, उसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं बहुत भाषण पर नहीं जाऊंगा, सिर्फ पांच महत्वपूर्ण मुद्दे जो ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत हैं, उस संदर्भ में आपके माध्यम से मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत, जहां तक मुझे जानकारी प्राप्त हुई है, उत्तर प्रदेश को इस वर्ष सम्मिलित नहीं किया जा रहा है। मैं आपसे आग्रह करूंगा कि उत्तर प्रदेश की बात बार-बार आती है कि वहाँ इसकी अभी जरूरत नहीं है ।  देश में  कई जगह प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत लक्ष्य प्राप्त नहीं हो रहे हैं फिर भी पैसा दिया जा रहा है । हमारे ख्याल से देश में उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा लक्ष्य प्राप्त करने वाला राज्य है। इसलिए मैं आपसे आग्रह करूंगा कि उत्तर प्रदेश को इस वर्ष प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत पैसा जरूर दिया जाये।

          इसके साथ-साथ मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आपकी योजना के अंदर दो प्रमुख मार्गों को जोड़ने के लिए पीएमजीएसवाई  की जो सड़कें ली जा रही हैं, उसकी चौड़ाई कम से कम साढ़े पांच मीटर की जाये। इस संबंध में सदन  में कई बार बात उठी है।  वह साढ़े पांच मीटर करने से सुविधाजनक होगी। दो प्रमुख सड़कों को जोड़ने वाली सड़क जिसकी लम्बाई लगभग दस किलोमीटर से ज्यादा हो, उसे अवश्य साढ़े पांच मीटर किया जाये। जो गांवों में जाने वाली सड़कें हैं, वे पौने चार मीटर यानी 3.75 मीटर रहती है। वे उतनी ही  रहे, तो ठीक है।

          अभी हमारे कई साथियों ने पेयजल की शुद्धता के बारे में कहा।  ग्रामीण क्षेत्रों में जहां  लगभग 70 से 80 प्रतिशत आबादी रहती है, उन्हें शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना ग्रामीण विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी है।  आप उस दिशा में गंभीरता से प्रयास करें जैसा कि हमारे कई सांसदों ने कहा । खासतौर से मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश से हूं और यूपीए की चेयरपर्सन भी पूर्वांचल से ही चुनकर आयी हुई हैं। मैं आपसे कहना चाहूंगा कि पूर्वांचल में पेयजल की समस्या बहुत गंभीर है। खासतौर से वहां भूजल भी खराब है। यह गंभीर विषय कल भी उठा था और जब तक समाधान नहीं हो जाता तब तक उठता रहेगा । इसके साथ-साथ इंदिरा आवास के लिए आपने 45 हजार रुपये किया, इसके लिए मैं आपका स्वागत करता हूं और धन्यवाद देता हूं। मैं चाहूंगा कि इंदिरा आवास योजना के तहत आप 45 हजार रुपये तो दे रहे हैं, लेकिन आपने अभी स्थायी पात्रता  सूची बनायी हुई है, वह वर्ष 2001-2002 की ही चली आ रही है जबकि इस समय वर्ष 2010 चल रहा है।   जब आप यह योजना लागू करें तो बीपीएल सूची नयी बनवा लें, तो बेहतर होगा ताकि  उचित लाभार्थी  को ही लाभ मिल सके। वर्ष 2001-2002 में जो सूची  बनी हुई थी, उसमें तमाम तरीके की अनिमियतताएं हैं, अपात्रों को इस सूची में शामिल किया गया है ।  सदन में बार-बार यह बात उठती रही है। जब आप पैसा दे रहे हैं, तो उस पैसे का सार्थक उपयोग हो, यह आपकी जिम्मेदारी भी बनती है।

          अभी हमारे साथी हैल्थ के विषय में कह रहे थे कि ग्रामीण क्षेत्रों में तमाम हॉस्पिटल्स बने हुए हैं परन्तु डॉक्टर नहीं है; किसी साथी ने उत्तर प्रदेश का भी जिक्र किया है । उत्तर प्रदेश के विषय में मैं  जरूर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा। उत्तर प्रदेश के प्रत्येक ब्लाकों में लगभग सीएचसी (कम्युनिटी हैल्थ सैंटर)  की स्थापना हो गयी है। पीएचसी भी लगभग प्रत्येक ब्लाकों में तीन-तीन, चार-चार हो चुके है।  यदि कुछ ब्लाक्स छूटे होंगे, तो वह भी अतिशीध्र पूर्ण हो जाएंगे । लेकिन वहां डॉक्टरों की समस्या हैं। हमारे यहां पांच मेडिकल कालेज बनकर खड़े हैं लेकिन एमसीआई के द्वारा उन्हें मान्यता नहीं मिल पायी है। …( व्यवधान) ग्रामीण विकास मंत्रालय  अपने सहयोग से मान्यता जल्द से जल्द दिलाने का प्रबंध करे ।  यहां पर नेता सदन भी उपस्थित हूं। मैं चाहूंगा कि हमारे उत्तर प्रदेश के मेडिकल कालेजों का जो मामला लंबित  है, उसे जल्द से जल्द मान्यता दी जाये, ताकि वहां से लोग डॉक्टर्स बन सकें और ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर नौकरी कर सकें तथा ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा दे सके ।

          इसके साथ-साथ एक बहुत महत्वपूर्ण विषय यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो बाजार हैं, वहां शौंच की बहुत असुविधा होती है। आप लोग भी सड़क से जाते होंगे, गुजरते होंगे और देखते होंगे। वहां सार्वजनिक शौचालय की बहुत असुविधा है। आजादी के 63 वर्ष बाद भी सड़कों पर शौच करते हुए देखने में बहुत बुरा लगता है।  आज हम दुनिया में विकसित देश के रूप में  हैं. लेकिन उसके बाद भी  सड़कों पर शौच करते हुए देखने में बड़ी पीड़ा होती है।  हमारे यहां ग्रामीण क्षेत्रों में जो भी ग्रामीण बाजार हैं, वहां सार्वजनिक  शौचालय बनाने पर प्राथमिकता  दी जाये और उस पर गंभीरता से प्रयास किया जाये। अब उत्तर प्रदेश सरकार की बात है, तो उत्तर प्रदेश सरकार  अगर बेहतर काम नहीं करती, तो पीएमजीएसवाई की सड़कों में बेहतर तरीके से रिजल्ट न आते। नरेगा का जो भी काम हुआ है, वह भी हमने बेहतर तरीके से किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने जो एचीवमैंट नरेगा में किया है, शायद देश में दूसरे नम्बर पर हमारी उपलब्धतता है। …( व्यवधान) मैं गलत न कहकर सही बात कह रहा हूं ये Planning Commission  के आंकड़े हैं। …( व्यवधान)

सभापति महोदया :     अब आपकी कोई भी बात रिकार्ड में नहीं जायेगी।

                    …( व्यवधान)*

                                                                                                   

 

श्री प्रदीप टम्टा (अल्मोड़ा):   सभापति महोदया, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने की इजाजत दी, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। ग्रामीण विकास मंत्रालय के तीन डिपार्टमैंट में से ग्रामीण विकास विभाग और भूमि संसाधन में दो विशेष संदर्भ में मैं बोलना चाहूंगा। हम सब एग्री हैं कि इस देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या  आज भी ग्रामीण भारत में रहती है।

ग्रामीण रोजगार योजना चलाई गयी है, यह बहुत ही महत्वाकांक्षी एवं क्रान्तिकारी योजना है। इसके लिए मैं सरकार को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। लेकिन इस संदर्भ में हमें बजट के अवसर पर इसका आकलन करने का अवसर मिलता है। मैं पिछले वर्ष के आंकड़े देख रहा था कि वर्ष 2008-09 में दस करोड़ लोगों के जॉब कार्ड बनाए गए थे, वर्ष 2009-10 में 10.91 करोड़ लोगों के जॉब कार्ड बने, लेकिन जितने लोगों को उसमें रोजगार मिला है, उनकी संख्या इसकी मात्र आधी है, मात्र 4.51 करोड़ परिवारों को लाभ मिल पाया। यह रोजगार देने की केन्द्र की बहुत महत्वाकांक्षी योजना है, यह राज्यों के माध्यम से लागू होती है, इसमें पूरे देश के अंदर बहुत गैप है।  लोग जॉब कार्ड बनवाने के लिए आगे आ रहे हैं। वे लोग काम करना चाहता हैं, हाथ से काम करना चाहते हैं, ग्रामीण स्तर पर अपनी आय को बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन उसके अनुरूप उनको रोजगार नहीं मिल पा रहा है। इसके कारणों को हमें मूल्यांकन करना होगा। मैं देख रहा था कि इसका बजट 40,100 करोड़ रूपए का है।…( व्यवधान) उसमें भी 10,000 करोड़ रूपए शेष हैं। क्या कारण है कि इतनी बड़ी महत्वाकांक्षी योजना, जो हाथ से काम करने वाले लोगों के लिए है, जो देश के गरीबों के लिए है, वह योजना राज्यों के द्वारा पूरी तरह से लागू नहीं की जा रही है। इसमें पैसे की कमी नही है, लेकिन जितना पैसा केन्द्र के द्वारा दिया जा रहा है, उसका पूरी तरह से यूटिलाइजेशन नहीं हो रहा है। यह हमारी चिन्ता का विषय है।  पिछले दो सालों से यह मजदूरी मात्र 100 रूपए पर अटक कर रह गयी है। जिस मजदूरी ने ग्रामीण भारत के मजदूरों को एक बारगेनिंग पावर दे दी थी, आखिर आज क्या कारण है कि यह मजदूरी 100 रूपए पर सीमित होकर रह गयी है। मैं मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि आज के दौर में जब सभी की मजदूरी नए सिरे से तय की जा रही है, इस 100 रूपए की मजदूरी को भी बढ़ाकर 150 रूपए या 200 रूपए किया जाए। भूमि संसाधन विभाग डायरेक्टली ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ा हुआ नहीं है। भूमि सुधार का कार्यक्रम राज्यों के द्वारा लागू होता है। आज अगर आप देखें जो ग्रामीण भारत का विभाग है, यही भारत के लोकतंत्र को जिन्दा रखे हुए है, लेकिन आज ग्रामीण भारत से इस लोकतंत्र को चुनौती मिल रही है। भूमि सुधार का जो कार्यक्रम था, जो लैण्ड सीलिंग का कार्यक्रम था, अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन लोगों में बांटने का कार्यक्रम था, उसके बारे में मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि पुनः नए सिरे से पूरे देश के अंदर इसे लागू किया जाए क्योंकि जो गरीब भूमिहीन हैं, दलित, आदिवासी हैं, जिनको आज भी भूमि की जरूरत है, उनके लिए भूमि सुधार को लागू करने की जरूरत है। सीलिंग की सरप्लस लैण्ड को उनमें बांटने की जरूरत है। इस संबंध में भी हम सभी को विचार करना चाहिए। इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

*SHRIMATI BOTCHA JHASI LAKSHMI (VIZIANAGARAM) : I start my speech with Mahatma Gandhi’s quotation, I quote “We must be the change, we wish to see  India lives in rural areas.”  For overall development of the country the rural areas must develop.  For this purpose resources must be allotted on a priority basis.  Our UPA Government is fulfilling the dreams of Mahatma Gandhi.  In order to fulfill the dreams, our UPA Chairperson, Smt. Sonia Gandhiji, our Prime Minister, Dr. Manmohan Singhji and our Rural Development Minister are planning, promoting and strengthen the rural development schemes.  

          By giving top most priority to the development of rural areas, our Government has made substantial provision for the budget. About Rs.66,100 crore has been provided for rural development.  For Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme, the allocation has been stepped to Rs.40,100 crore in 2010-11.  Not only that an amount of Rs.48,00 crore has been allocated for rural infrastructure programmes under Bharat Nirman, the unit cost under Indira Awas Yojana has been increased to Rs.45,000 in the plan areas and to Rs.48,500 in the hilly areas.  Allocation for this scheme has been increased to Rs.10,000 crore . Allocation to Backward Region Grant Fund enhanced by 26 per cent from Rs.5,800 crore in 2009-10 to Rs.7,300 crore in 2010-11.

          I congratulate the hon. Prime Minister, Dr. Manmohan Singh for strong fundamentals; Indian economy not only withstood this downward trend but continued to show impressive growth of the previous year even during 2009-10.  The concept of “inclusive economic growth” alongwith focus on the social sector, on rural development not only protect our vast rural population from the global economic downslide but also in putting our rural economy on the course of unprecedented upsurge.

          The developmental and welfare initiatives undertaken by the UPA Government in the rural areas has brought about a perceptible change in the lives of the people in the villages.  I thank the Government for working diligently towards translating visions into policies and programmes.  Based on the experience and performances, our Government have modified and included new elements in some of the existing schemes and programmes like the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA), Indira Awaas Yojana (IAY). National Social Association Programme (NSAP), Integrated Watershed Management Programme (IWMP), National Rural Drinking Water Mission (NRDWM) to make them more effective.  Not only that our Government have drawn up blueprints for new schemes like National Rural Livelihood Mission to bring about a paradigm shift towards poverty alleviation and achieve self reliance in rural areas. Regarding Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act, it is a flagship programme.  It is one of the unique programmes in the world.

         I thank the UPA Chairperson, Shrimati Sonia Gandhi, Prime Minister, Dr. Manmohan Singhji and the Rural Development Minister, Dr. Joshiji for nominating me as a Member of the Working Group on specific needs of specific category of workers under the Mahatma Gandhi NREGA.  The issues to be addressed are gender equality, needs of disabled persons and needs of old persons, special benefits to SC/ST/groups or families in LWE/drought affected area.

          The most significant achievement in Mahatma Gandhi NREGA is equal wages to men and women a dream coming to a reality perhaps for the first time in rural Indian unorganized and manual labour workers. Perhaps this is the first major step in realizing long term goal of achieving better purchasing power, major role in household decision making power and above all women empowerment. Equal wages to women also contributed to significant betterment in nutritional standards in women and children at home.

          Though this is a step forward in achieving gender equity, still a lot of grey areas are left in realizing the goal where men are dominating.

          A suggestion to achieve gender equity is to establish women mates concept in not only exclusive women working groups but also in mixed groups, this will empower the women in having effective control on the identification of the works and keeping sufficient works in shelf. Women mates also will prove as better managers as they can give quality time, can keep records up to date and perfect which is demonstrated in SHG movement in States like Andhra Pradesh.

          In the case of pregnant women reaching advanced stages of pregnancy or early stages of lactation, if she happens to solely depend on wage labour and if she is a regular MG NREGA worker with proven record, it should be mandated in the Act to provide her some advance equivalent to not more than 50 days of work to facilitate her to take adequate rest before pregnancy and early stages of lactation.  The amount so advanced could be recovered in 50 installments from her husband or family members wage or whenever she returns back to work.

          Secondly, 30 per cent wage hike can be recommended for women in the advanced stages of pregnancy and early stages of lactation as her nutritional demand during this period will be more.

          Thirdly, sick woman needs can be addressed if she is a single woman by providing seven days of her average wage as advance which will be recovered in her future wage.

          So far as providing jobs to the disabled persons under the Mahatma Gandhi NREGA is concerned, they can be provided works which is suitable to their disability and can earn decent wages.  Persons with disability should be mapped on the job cards.

          Under the Bharat Nirman Programme, PMGSY is one of the important programmes which aims to provide all weather roads to rural areas.  Habitations with a population of 500 in plain areas, 250 in sub plain areas are to be connected in a phased manner.  Every year, thousands of habitation and lakhs of kilometers have been covered under this programme; and also upgradation of the old roads with the help of the State Governments.  I congratulate the Government for focusing on road connectivity for better living for the rural people.  As a co-Chairman of the vigilance and monitoring committee, when we tour our districts, we found many gravel roads. During rainy season, these roads are unfit for utility.  Many villages are facing this problem.  In this connection, I humbly request the Minister to treat gravel roads as unconnected roads so that it becomes eligible under the coordinate programme.  For example, in Andhra Pradesh more than 7,931KMs are coming under the category of gravel roads are facing extinction. Overall under the Panchayati Raj, 32,000KMs are there.  We are able to cover only 3,300 KMs under the PMGSY.  Roads damaged due to floods, natural calamities are in large numbers. Such roads may be given special grant instead of population criterion, not only in Andhra Pradesh but across the country.  The policy needs to be changed.

          Under the Thirteenth Finance Commission, the allocation for Panchayati Raj Departments has to be stepped up.

          A proposal to construct 296  bridges costing about Rs.450 crores in Andhra Pradesh has been submitted to the 13th Finance Commission under the PMGSY.  The width of the road connecting bridges has to be extended from 5 ½ meters to

7 ½ metres, from single line to double line be sanctioned.

          Under the Rural Water Supply and Total Sanitation Programme, we are able to provide drinking water in villages.  At the same time, we are able to provide total sanitation in villages. The Government is spending a lot of money under this programme for providing drinking water and sanitation in villages.  Under the Programme, the unit cost for toilets is Rs.900, which is very less.  I suggest to the Government to increase it to Rs.5000 so that the beneficiary can construct the toilet as well as the bathroom.  The allocation for water is done on the basis of per capita/pro rata and on 2001 Census.  After 2001 the coast of the raw material has increased manifold.  The number of people has increased.  The allocation of water in the urban areas is 150 liters of water per day whereas in rural areas it is 40 liters of water per day. Keeping the requirement of water for the cattle, the water allocation for each person has to be enhanced.  The allocation for Andhra Pradesh under the scheme has to be enhanced from Rs.400 crores to Rs.1500 crores.  Already the Planning Commission has given its green signal.

          So far as maintenance of bore wells is concerned, Rs.600 per bore well is being given which is insufficient.  This should be increased to Rs.1200 per bore well.

          Due to insanitation, there is a lurking fear o spreading malaria and vector borne diseases.  There is a need to construct underground drainage system.  To check these diseases, in major panchayats, block level headquarters, there is a  need to implement the project on a pilot basis.

          I thank the Ministry for undertaking watershed management programme because land is critically an important thing.  It’s efficient management is vital for the economic growth and development of rural areas.  The per capita of land available and its yield is very low in India. This is one of the main factors behind low productivity and high cost of Indian agriculture.  Under this programme, crores of rupees are being spent and all BPL families, SCs, STs and BC minorities are being covered.  By converting waste land into fertile land, the economy of these people has improved a lot.  Their purchasing power has increased.

          Under the Indira Awas Yojana, the unit cost of a house has been increased to Rs.45,000.  I thank the Government for this.  If toilet and bathroom are included in the house, the unit cost may go up to Rs.60,000, this way be considered seriously by the Government to improve sanitation in the villages.

          Regarding old age pension, I thank the Government for providing the same to every eligible person in India.  In this connection, Government of Andhra Pradesh is providing special pension per month to every Self Help Group Woman after completion of 60 years name as Dr. YSR Abhaya Hastham- a co-contributory pension scheme for SHG Women after his demise.

          I request the Rural Development Minister to share the burden of the Government of Andhra Pradesh.  We all know that Self Help Group Members are poorest of the poor. They are either wage labourers or self-employed women.  All of them come under the ambit of the definition of unorganized workers. Their contribution to the pension is an additional savings, in addition to the regular savings they make for the purpose of internal lending.  Hence, each member could save Re.1 per day throughout 365 days.  Thus, each SHG members could save and contribute to the pension scheme Rs.365 per annum.  And therefore, I request the Government of India to examine the case of 109 crore rural SHG members and accept the proposal to make government of India’s co-contribution equal to that of the SHG member, that is, Rs.365 per annum, making this applicable to SHG members instead of Rs.1000 as member contribution.

          Finally, regarding the 13th Finance Commission recommendations, we welcome the concept of allocation of 50 per cent funds for each State in the country and rest of 50 per cent based on the performance of each State.

          I welcome the creation of Ombudsman post at the local level.  This will have transparency and will be able to solve any problem or grievance at the local level itself.

          By giving special incentives to scheduled areas for development of infrastructure, it will mitigate the problems for these people and above all it will discourage people in taking to extremism.

          I also welcome transfer of funds from the Central Government to the local bodies directly online.  This will definitely strengthen the panchayat raj institutions to undertake workers on time.  The State Finance Commission is doing very good job.  It consists of experts.  They are able to coordinate the works with panchayati raj institutions; and able to solve their problems on the spot.  Regarding Backward Region Grant Fund, only 13 districts in Andhra Pradesh are being covered.  As a result, the remaining districts which are inhabited by SCs and STs are languishing in backwardness due to non availability of funds.  I request the Government to allot funds to all the districts in Andhra Pradesh in order to create infrastructure and remove regional imbalance.

          I fully support the demand for grants for the Ministry of Rural Development as they are always working for the welfare of the people in the rural areas.  This will definitely bring them to the mainstream and we can achieve inclusive growth.

 

 

 

*श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): महोदय, ग्राम विकास भारत की आत्मा का बिकास है ।  महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत गांवों में बसता है । 80 औ जनता भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है ।  जब तक ग्रामीण क्षेत्र का चर्तुदिक विकास नहीं होगा तब तक भारत के वास्तविक स्वरूप को बदल नहीं सकते हैं । आज सौभाग्य है केन्द्र की कांग्रेस यू.पी.ए. की सरकार भारत निर्माण की योजनाओं के माध्यम से गांवों के बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत बजट आवंटित किया जा रहा है । पहली बार केन्द्र कांग्रेस यू.पी.ए. ने भारत की जनता के लिए रोजी एवं रोटी के लिए कानून बनाने का काम किया ।  भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों के गांवों में 18 वर्ष के लोगों द्वारा रोजगार के गारंटी का अधिकार कानून बनाकर के दिया गया ।  पहले वर्ष राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कानून (नरेगा)में भारत की कांग्रेस यू.पी.ए. सरकार ने 39,000 करोड़ रूपये आवंटित किया है यदि कोई व्यक्ति गांव का ग्राम प्रधान अथवा विकास खंड के बी.डी.ओ. से रोजगार की मांग करेगा । तो उसे 100 दिन के लिए 100 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से 18 वर्ष के व्यक्ति को रोजगार मिलेगा ।  इसमे यह भी प्रावधान है कि यदि किसी व्यक्ति को रोजगार देने में ग्राम सभा अथवा विकास खण्ड के द्वारा काम नहीं किया जायेगा तो उसे बेरोजगारी भत्ता मिलेगा ।  पहली बार रोगी के लिए केन्द्र की कांग्रेस एवं यू.पी.ए. ने रोगी  लिए कानून बनाने का काम किया ।  ग्रामीण क्षेत्र में सड़क के निर्माण के लिए अभी तक राज्यों की जिम्मेदारी होती थी लेकिन कांग्रेस की सरकार की सोच है कि भारत का वास्तविक विकास तभी हो सकता है जब तक कि गांव पक्की सड़कों से जुड़ न जाये ।  यदि सड़कों से गांव जुड़ जायेंगे तो किसानों को अपने खेतों के उत्पाद को मन्डियों तक पहुंचाने में आसानी हो जायेगी ।  उस हालत में किसानों को लाभप्रदा मूल्य भी उत्पाद का मिलेगा/अन्यथा किसानों को मजबूर होकर के बिचौलियों को सस्ते दाम में बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता है ।  आज रबी की फसल में किसानों के गेहूं का समर्थन मूल्य 1100 रूपया प्रति क्विंटल घोषित हुआ है । लेकिन आज वास्तविक रूप से किसानों को उत्तर प्रदेश में 875 से 900 रूपया तक गंहूं बेचने के लिए प्रति क्विंटल मजबूर होना पड़ रहा है ।  उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार की प्राथमिकता किसानों के हितों की रक्षा का नहीं बल्कि अनुत्पादक चीजों में पैसा खर्च किया जा रहा है  जिससे प्रदेश का बिकास अवरूद्ध हो गया है ।  आज केन्द्र से गांवों की सम्पर्क मार्ग के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना प्रारंभ किया है ।  इसमें भारत सरकार ने 12000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया है ।  10,000 करोड़ इन्दिरा आवास के लिए दिया है । 8000 करोड़ पानी के पेयजल हेतु आवंटित किया है । ग्राम विकास मंत्रालय के लिए लगभग 66,000

 

करोड़ रूपये का प्रावधान करके ग्रामीण क्षेत्र के गांवों में गुणात्मक परिवर्तन लाने का काम कर रही है ।  केन्द्र द्वारा गांवों के बुनियादी सुविधाओं के विकास हेतु भारत निर्माण योजना के अंतर्गत विभिन्न योजनाओं में कार्य योजना बना करके बिकास का कार्य कर रही है ।  प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अनतर्गत गांवों के सड़कों के रखरखाव के लिए पांच साल के लिए ठेकेदार से अनुबंध किया गया है ।  यदि पांच वर्ष के अन्दर सड़के खराब होगी तो उसको ठीक करने की जिम्मेदारी ठेकेदारों की होगी ।  इसी तरह केन्द्र ने गांव के अन्य योजनाओं के अन्तर्गत गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को इन्दिरा आवास की योजना लागू की जा रही है।  इस मद में 10,000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है ।  आज आवश्यकता है कि बी.पी.एल. की सूची का पुनरीक्षण होना चाहिये । क्योंकि वास्तविक रूप से बहुत ऐसे गरीब है जो अभी भी उन्हें गरीबी रेखा के नीचे की सूची मे चिन्हित न होने के कारण सुविधाओं से वंचित हो रहा है ।  उन्हें आवास की सुविधा नहीं मिल रही है । बीमारी के लिए भी बी.पी.एल. की सूची से नःशुल्क चिकित्सा मुफ्त मिल सकती थी वह उससे भी वंचित हो रहा है । आज ग्रामीण भारत में भूमि सुधार का कार्यक्रम राज्यों के द्वारा किया जाना चाहिये लेकिन उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार का काम ठप हो गया है । जबकि ग्रामीण विकास में आजादी के बाद जीवन परिवर्तन करने का काम कर रहे हैं । आम सूचना का अधिकार से ही आम जनता के समक्ष योजनाओं की पारदर्शिता हो चुकी है ।  और आज इस वर्ष प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत इस वर्ष 40100 करोड़ रूपये का प्रवधान किया  है ।  इस तरह आज सीधे ग्रामों में केन्द्र की कांग्रेस की यू.पी.ए. सरकार गांवों के बुनियादी क्षेत्रों में गुणात्मक सुधार कर रही है ।  मुझे विश्वास है कि दुनिया के वैश्विक मंदीकरण में भी भारत अपनी अर्थव्यवस्था को 6.7 औ विकास दर प्राप्त करने में सक्षम हो सके उस  समय दुनिया के प्रगतिशील मुल्कों के विकास दर में गिरावट 3 औ हो गयी थी ।  आज देश के निर्माण में ग्राम विकास की योजनाओं का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है ।  गांवों के पलायन को रोकने में मनरेगा के माध्यम से ही सक्षम हो सके क्योंकि पहली बार गांव के नौजवानों को गांव में ही रोजगार मिलेगा ।  आज इस कानून में संशोधन करके लघु एवं सीमान्त किसानों के लिए उनके खेतों में मनरेगा के द्वारा काम कर सकती है ।  आज किसानों के लिए राजीव सेवा केन्द्र की स्थापना गांव में हो ।  जिससे ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में गांव को सीधे आई.टी. से जोड़ने में सक्षम होंगे । नरेगा की योजना की चर्चा जी-20 के मुल्कों में चर्चा हो रही है ।  अमेरिका में भी मनरेगा की तारीफ हो रही है ।  मनरेगा ने गांवों मे रोजगार का अवसर पैदा किया है ।  लेकिन आज दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मनरेगा में उत्तरप्रदेश में पैसे का दुरूपयोग हो रहा हे ।  जो गांव के लोगों के रोजी के अंतर्गत उनके जेब में जाना चाहिये लेकिन आज उसमें भी कमीशन लेने का काम शुरू हो गया है ।  2.5 लाख चुनी हुयी पंचायते हैं ।  सारी व्यवस्था के बावजूद मजदूरों को मजदूरी के भुगतान में देरी हो रही है ।  लेकिन आज कही भी बेरोजगारी भत्ता नहीं मिल रही है ।  इसी क साथ में ग्राम विकास मंत्री द्वारा प्रस्तुत ग्राम विकास मंत्रालय के बजट का समर्थन करता हूं ।

 

 

ग्रामीण विकास मंत्री और पंचायती राज मंत्री (डॉ. सी.पी.जोशी): महोदया, मैं सदन के सभी माननीय सदस्यों को आभारी हूं जिन्होंने इस मांग के संबंध में अपने सुझाव दिए। जिन सदस्यों ने कट मोशन दिए हैं, उनको भी मैंने देखा है, लगभग 42 सदस्यों ने जो राय व्यक्त की है, मैंने उसे भी सुना है। सभी सदस्यों की बातों से लगा कि वे ग्रामीण विकास के बारे में बहुत चिंतित हैं। माननीय सदस्यों को जानकारी होगी कि मेरा विभाग स्कीम के बारे में डिसकस करता है, लेकिन मुझे खुशी हुई कि शिक्षा, स्वास्थ्य के बारे में बात की गयी। माननीय मुंडे साहब जैसे वरिष्ठ नेता ने कहा कि रूरल डेवलपमेंट में इलेक्ट्रिसिटी के संबंध में भी बात की जाए।  मुझे खुशी हुई कि सभी की चिंता होलिस्टिक डेवलपमेंट के बारे में है। यूपीए की नई सरकार बनने के बाद हमने एक परिवर्तन किया है कि आजादी के बाद हम केवल स्कीम बनाकर लोगों के जीवन में परिवर्तन लाने का काम कर रहे थे, हम ग्रामीण विकास के संबंध में कुछ योजनाएं बनाकर विकास की कल्पना कर रहे थे। यूपीए सरकार आने के बाद हमने इसमें परिवर्तन किया है कि हमने लोगों को अधिकार दिए हैं। पहली बार जब यूपीए की सरकार बनी, तब हमने राइट टू इनफार्मेशन की, राइट टू इंप्लायमेंट की बात की और राइट टू इंप्लायमेंट के कारण ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना की कल्पना को हम साकार कर सके। मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता है कि मूलतः इस योजना की कल्पना महाराष्ट्र की गारंटी योजना के रूप में आई, उसकी संरचना करने का काम भी कांग्रेस पार्टी ने किया और आज नई सदी में, नए तरीके से हम गांव के विकास की कल्पना करके रोजगार की गारंटी देने का काम कर रहे हैं। उसकी संरचना करने का काम हमारी नेता श्रीमती सोनिया गांधी जी ने किया। मैं कहना चाहता हूं कि यह काम कांग्रेस पार्टी ने किया, इस बात की मुझे बहुत खुशी है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, स्वर्ण जयंती ग्राम रोजगार योजना, इंदिरा आवास योजना, प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना, डीआरडीए एडमिनिस्ट्रेशन, नेशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर प्रोग्राम, टोटल सेनिटेशन कैम्पेन, इंटीग्रेटेड वाटर मेनेजमेंट प्रोग्राम, नेशनल रेन रिकार्ड माडर्नाइजेशन प्रोग्राम, ये सारी योजनाएं मूलतः मेरे विभाग की अनुदानों की मांगों से सम्बन्धित हैं।

          मैं सबसे पहले अपनी बात इस बात से शुरू करना चाहता हूं कि मुझे बहुत खुशी हुई, जब मुंडे साहब ने यह कहा कि पीएमजीवाई स्कीम हमने शुरू की थी। यह ठीक बात है कि पीएमजीवाई स्कीम की कंसीव उस समय की एनडीए सरकार ने की थी। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि स्कीम को कंसीव करना एक तरीका है और उसके लिए बजट की व्यवस्था करना दूसरा काम है। एनडीए सरकार ने जब यह स्कीम शुरू की तो सन् 2000-2001 में 2435 करोड़ रुपए की व्यवस्था की। सन् 2001-2002 में 500 करोड़ रुपए की व्यवस्था की, 2002-2003 में 2500 करोड़ रुपए की व्यवस्था की और 2003-2004 में 2325 करोड़ रुपए की व्यवस्था की। कुल मिलाकर एनडीए सरकार के समय 9,700 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई। उसके बाद जब यूपीए सरकार आई तो उसके मन में गांव का विकास करने की कल्पना थी कि गांव का विकास कनेक्टिविटी के आधार पर किया जा सकता है। इसलिए कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए हमने सन् 2004-2005 में 2460 करोड़ रुपए की व्यवस्था की, 2005-2006 में 4220 करोड़ रुपए की व्यवस्था की, 2006-2007 में 6974 करोड़ रुपए की व्यवस्था की, 2007-2008 में 11,000 करोड़ रुपए की व्यवस्था की, 2008-2009 में 15,280 करोड़ रुपए की व्यवस्था की, 2009-2010 में 17,840 करोड़ रुपए की व्यवस्था की। हमने हमारी सरकार बनने के बाद आज तक 57 हजार 74 करोड़ रुपए की व्यवस्था की, जिससे हम रूरल कनेक्टिविटी का काम कर सकें।

          मान्यवर, एनडीए सरकार के समय में हैबिटेशन कनेक्ट करने का जो काम हुआ, वह 13776 हुआ। हमने उस योजना में कंसीव किया था कि हम 1000 की हैबिटेशन, 500 की हैबिटेशन और 250 की हैबिटेशन को भी जोड़ेंगे। लेकिन एनडीए सरकार के समय में हैबिटेशन कनेक्ट की गईं 13776, लैंग्थ कम्प्लीट की गई 51511 किलोमीटर और कुल खर्चा 9700 करोड़ रुपए का खर्चा किया गया। लेकिन इसके अगेंस्ट में सन् 2004-2005 से लगाकर 2009-2010 तक यूपीए सरकार बनने के बाद हमने आज तक 52,458 हैबिटेशन्स को कनेक्ट किया है और लैंग्थ किलोमीटर 2,11,656 किलोमीटर की सड़क बनाई है और इसके लिए 57 हजार 74 करोड़ रुपए का अमाउंट रिलीज किया। यह इस बात का प्रतीक है कि जो हमारा कमिटमेंट है, ग्रामीण विकास करने का, उसके बारे में हमने हॉलैस्टिक व्यवस्था की। हमने सेज़ के आधार पर पीएमजीवाई स्कीम को लागू करने की व्यवस्था करने का काम नहीं किया। हमने यह नहीं किया कि कपार्ट से या नाबार्ड से लोन ले लें, उसके लिए पूरी व्यवस्था करके ही यह काम किया है कि कैसे हम 1000 की, 500 की पापुलेशन को पूरा कर सकें। यह काम करके हम आगे बढ़े हैं।

          मैं कहना चाहता हूं कि आपने आंकड़े दिए 4 लाख, 5 लाख गांवों की, मुझे जानकारी नहीं है, हो सकता है आपकी जानकारी करेक्ट होगी। मेरे पास जो सूचना उपलब्ध है, जब प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना को कंसीव किया गया, तब 1,68,268 हैबिटेशन एलीजिबल के बारे में जांच की गई। पता लगाया कि 1,36,464 हैबिटेशन ही एलीजिबल हैं, जिन्हें हमें कनेक्ट करना है। ये फिगर्स उस समय के हैं, जब पीएमजीवाई स्कीम को एनवीसीज किया गया। लगभग इसमें 31,400 हैबिटेशन को कनेक्ट करने का काम उसमें रखा गया कि ये एलीजिबल के क्राइटेरिया में फिट नहीं होते थे, क्योंकि यह उस समय का आधार था। इसलिए जो हैबिटेशन कनेक्ट करनी थीं, वे 1,36,464 करनी थीं, लैंग्थ जो करनी थी, वह 3,76,000 किलोमीटर करनी थी। उसके आधार पर मैंने आपको आंकड़ा देकर बताया कि किस तरह से इसे करने का काम हमने किया। आपको हमारी सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि हमारी सरकार ने, उस योजना को, जिसे आपने शुरू किया था, उसको हमने नेगलेक्ट नहीं किया, बल्कि उस योजना को कैसे ठीक ढंग से लागू किया जा सके, वह करके हमने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है कि अच्छा काम करने के सम्बन्ध में हमारे मन में राजनीति नहीं है।

          हम इस देश का निर्माण करना चाहते हैं। इस देश की जनता को वे सारी सुविधाएं उपलब्ध कराना चाहते हैं, जिनकी कल्पना लेकर हम देश का निर्माण लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं। जब हमारी यूपीए सरकार बनी, तो हमने राष्ट्रपति जी के माध्यम से क्या कहा था, मैं आपको रिमाइंड कराना चाहता हूं कि हमने कहा था,

 

 “The flagship programme which my Government introduced has moved the country towards inclusive development. It would be our endeavour to consolidate these programmes in the next five years. The National Rural Employment Guarantee Act has proved to be what it promised to be, an effective social protection measures and the largest programme in the world of rural reconstruction. Its transformational potential is unfolding before our eyes. My Government will enlarge the scope of work permitted under the National Rural Employment Guarantee Act presently limited to unskilled manual work. The opportunity for improving the land productivity through NREGA will be maximized through better convergence of NREGA with other programmes. To ensure transparency and public accountability, independent monitoring and grievance redressal mechanism will be set up at the district level.”

 

This was the commitment we have given to the people of the country.

 

          हम हमारी सरकार में इस ढंग से आगे बढ़ने का काम करेंगे। हमारी सरकार बनने के बाद हमने सबसे पहला काम यह किया कि जो शैडय़ूल्ड बना हुआ था, उस शैडय़ूल्ड में हमने एक एक्टिविटी एड की कि यदि इस देश में हमने एग्रीकल्चरल प्रोडक्टिविटी को नहीं बढ़ाया, तो हम जीडीपी ग्रोथ की कल्पना नहीं कर सकते, लोगों की आजीविका को बदलने का काम नहीं कर सकेंगे, इसलिए हमने अमेंडमेंट करके इसे जोड़ा कि जो स्मॉल और मार्जिनल फार्मर है, उसके खेत पर भी नरेगा का काम हो सकता है। यह काम हमने इसलिए किया कि हम एग्रीकल्चर प्रोडक्टिविटी को बढ़ाना चाहते हैं। मुझे कहते हुए तकलीफ है माननीय सभापति महोदय कि जब हमने एक्ट बनाया तो कल्पना की कि गांव का गरीब आदमी पंचायत घर में जाएगा और एप्लीकेशन देगा, उसकी एप्लीकेशन रजिस्टर्ड होगी, उसके बाद यदि 15 दिन में उसे काम नहीं मिलेगा तो राज्य सरकारों को उसे अन-एम्प्लाएमेंट भत्ता देना होगा, यह एक्ट के अंदर हमने प्रॉविजन किया। लेकिन आज हालत क्या बनी हुई है? उत्तर प्रदेश के हमारे माननीय सदस्य कहते हैं कि वहां की सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है, पीएमजी में काम कर रही है, नरेगा में काम कर रही है, इसका बहुत श्रेय वे ले रहे हैं, लेकिन क्या आपको जानकारी है कि यूपी के अंदर 50 हजार पंचायतें हैं, उन 50 हजार पंचायतों में केवल मात्र 6000 ग्राम-सेवक हैं। किस विकास की कल्पना आप कर रहे हैं? 50,000 ग्राम पंचायतें और 6000 ग्राम-सेवक और हम कल्पना करना चाहते हैं, पंचायत घर की, विकास की? आज हिंदुस्तान में 76 हजार पंचायत घर नहीं बने हुए हैं, 50,000 पंचायत घर ऐसे हैं जो कभी भी गिर सकते है। क्या हमारा फर्ज नहीं बनता है? हम गांव की जैसी कल्पना करना चाहते हैं,  कल्पना करने के बाद सबसे पहला काम जो करना चाहिए, वह काम हमने किया है। यह जानते हुए कि 60 सालों में गांव के विकास की जो हमारी कल्पना है उसमें क्वंटम जम्प हमें करना है। आईटी का जमाना आ गया है, आईटी के जमाने में आईटी-इनेबल्ड सर्विसेज हमें प्रोवाइड करनी है। इसलिए सबसे पहला काम हमने किया कि हर जगह पंचायत घर बनना चाहिए, यह हमारे मन में, हमारे नेता राजीव गांधी के मन में कल्पना थी, हमने सत्ता का विकेन्द्रीकरण किया और यह आशा पैदा की कि कैसे हम लोगों में गवर्नेंस पैदा करने का काम करें। हमने राजीव गांधी सेवा केन्द्र की स्थापना करने का काम किया और अब उसे आईटी-इनेबल्ड सर्विस के साथ जोड़ना चाहते हैं। आने वाले समय में आईटी-इनेबल्ड सर्विसेज यदि गांव में प्रोवाइड करनी है कि टिकट कैसे मिलेगा, लैंड-रिकार्ड अपडेट कैसे होगा, कम्पलेंड कैसे रजिस्टर्ड होगी, यह काम यदि 60 साल में नहीं कर सकें हैं तो अगले पांच सालों में हम करना चाहते हैं, इसलिए हमने राजीव गांधी सेवा केन्द्र की कल्पना की है। गांव-गांव में इसके केन्द्र बनने चाहिए और इनका आईटी से लिंक होना चाहिए और इनका सीधा संबंध आईटी-इनेबल्ड सर्विस से होना चाहिए। हम जो गांव के विकास की कल्पना कर रहे हैं, वह तब जाकर साकार होगी।

          गिलास में आधा गिलास पानी है, आप बहस के लिए बहस कर सकते हैं कि आधा गिलास खाली है और हम कहेंगे कि आधा गिलास पानी हमने भरा है और आधा गिलास भरने के लिए हम प्रयत्न कर रहे हैं। इसको आधार लेकर हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

          सभापति महोदय, मुझे प्रसन्नता है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में हमने कल्पना की थी कि हम लगभग 1, 94033.28 करोड़ रुपये इसमें खर्च करेंगे, लेकिन मुझे कहते हुए प्रसन्नता है कि जो 11वीं पंचवर्षीय योजना का आउट-ले था, जिसे हमें पांच वर्षों में खर्च करना था, उस आउट-ले को हमारे प्रधान मंत्री जी, हमारे वित्त मंत्री जी और सोनिया जी के कारण हम पहले ही खर्च कर चुके हैं। अब जो पैसा हम खर्च कर रहे हैं वह एडीशनल है। यह हमारा अचीवमेंट है, कमिटमेंट है कि पांच साल की जो हमने कल्पना की, उस फंड को हमने तीन सालों में उपयोग करने का काम किया और आगे इसे और बढ़ाकर एडीशनल काम करना चाहते हैं।

          माननीय सभापति महोदय, मैं नरेगा की सबसे पहले बात करना चाहता हूं क्योंकि आज ही जी-20 के अंदर, यूएसए में इसे संदर्भित किया गया है। हमें प्रसन्नता है कि दुनिया के लोग इस बात को देख रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में नरेगा जैसी योजना कैसे बनी है, जिससे गांव के लोगों के जीवन में परिवर्तन हो रहा है। यह इस बात का प्रतीक है कि हमारी सोच और हमारे आगे बढ़ने की जो कल्पना है, उसे सारी दुनिया देख रही है। यूपीए की सरकार ने राइट टू एजूकेशन की बात की है, आगे राइट टू फूड की बात कर रही है। आपको इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहिए कि 60 साल बाद गांव के गरीब आदमी को अधिकार देकर काम करने की बात कोई पार्टी कर रही है तो वह कांग्रेस पार्टी कर रही है, जिसके मन में कल्पना है कि गांव का विकास, देश का विकास किस ढंग से, समग्र रूप से हो सकता है। …( व्यवधान)

श्री रामकिशुन : 60 साल बाद आपको ग्रामीणों के विकास की याद आई…( व्यवधान)

सभापति महोदया :   माननीय सदस्यगण, कृपया आप मंत्री जी का रिप्लाई सुनें।…( व्यवधान)

डॉ. सी.पी.जोशी: न तो हम हल्ला करते हैं, न हम किसी का भवन बनाते हैं, न हम किसी की मूर्तियां बनाते हैं, हम तो नीतियां बनाकर लोगों का भला करते हैं। …( व्यवधान)आपको अपनी बात कहने का अधिकार है, आप कहिये। मैंने 42 सदस्यों की बात ध्यान से, चुपचाप सुनी है, आप भी मेरी बात सुनिये और फिऱ अपनी बात बोलिये।

19.00 hrs.

सभापति महोदया :  माननीय मंत्री जी के भाषण के अलावा कुछ भी रिकार्ड में नहीं जाएगा।

…( व्यवधान)*

डॉ. सी.पी.जोशी : सभापति महोदया, वर्ष 2009-10 में हमारे जितने एलोकेशन्स थे, हमने उन सभी में उपलब्धियां प्राप्त की हैं। मैं सदन में दो-तीन बातें कहना चाहता हूं, जिसके बारे में सभी माननीय सदस्यों को सोचना चाहिए। हम सभी सदस्यों ने नरेगा की चर्चा की, सभी ने पीएमजीएसवाई की चर्चा की, सभी ने एएवाई की चर्चा की। यूपीए की सरकार है, तो दूसरे दलों ने कहा कि भ्रष्टाचार है। किसी दूसरे दल की सरकार होगी, तो तीसरा दल कहेगा कि भ्रष्टाचार है। आज नरेगा योजना को हम किस प्रकार सफलतापूर्वक लागू करें, यह हम सभी का धर्म बनता है। हमारे मन में ग्रामीण विकास की कल्पना है। यह एक्ट है और इसमें चालीस हजार करोड़ रुपयों का प्रोविजन किया है। यह डिमांड ड्राइवन स्कीम है। माननीय वित्त मंत्री जी ने हमें एश्योर किया है कि यदि 50 हजार करोड़ रुपए या 60 हजार करोड़ रुपए की भी डिमांड होगी, तब भी डिमांड को पूरा करेंगे, मनी प्रोब्लम नहीं है। सबसे बड़ी समस्या इसे एक्जीक्यूट करना है। विजिलेंस, मोनिटरिंग करने की हमारी जिम्मेदारी है कि उसमें हम क्या काम कर सकते हैं। मुझे कहते हुए खुशी हो रही है, हमारी पार्टी के नेता माननीय प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ चर्चा करो। मैंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाया और उनके साथ चर्चा की। मैंने क्षेत्रीय पार्टी के नेताओं को बुलाकर उनके साथ भी चर्चा की कि हम सभी कैसे मिल-जुल कर नरेगा योजना को ठीक ढंग से लागू कर सकते हैं। हमने आपको अधिकार दिया डिस्ट्रिक्ट मोनिटरिंग विजिलेंस समिति का चेयरमैन बनाया। चेयरमैन बनाने के पीछे यही मंशा थी कि निचले लेवल पर इम्प्लिमेंटेशन में क्या कमी और खामी है। हिंदुस्तान में 2.50 लाख पंचायतें हैं और उन पंचायतों के इतने ही सरपंच हैं। उनके खिलाफ खड़े आदमी भी वहां हैं। वहां दूसरी पोलिटिकल पार्टीज के लोग भी हैं। मुझे जानकार आश्चर्य होता है कि सारी व्यवस्था होने के बाद भी, आपको डिस्ट्रिक्ट लेवल की विजिलेंस समिति का चेयरमैन बनाने के बाद भी यदि हमारे मन में कल्पना है कि भ्रष्टाचार हो रहा है, तो हमें किसी और बात को सोचने की जरूरत नहीं है। हमें सोचने की जरूरत है कि इस समस्या को कैसे हल किया जाए। हम भी मानते हैं कि पेमेन्ट में डिले हो रहा है। वह पेमेन्ट हम समय पर नहीं कर पा रहे हैं। हमें यह जानकारी है कि गांव का गरीब आदमी अपनी एप्लीकेशन को रजिस्टर कराने के बाद उसे जो काम मिलना चाहिए, जो उसका अधिकार है और राज्य की जिम्मेदारी बनती है कि उसे 15 दिनों में काम न मिले, तो उसे अनएम्पलॉयमेंट एलाउन्स मिलना चाहिए। मैं आप सबसे अपील करना चाहता हूं कि आप और हम सब मिलकर गांव के गरीब आदमी को अधिकार देने के लिए उसका रजिस्ट्रेशन कराने का काम करें, जिससे सरकार के ऊपर ओनस आए और वह उन्हें बेरोजगारी भत्ता दे। सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच रही है। हमें सबसे पहला यह काम करने की आवश्यकता है।

         हमें पेमेन्ट के डिले के बारे में भी जानकारी है, मैं माननीय वित्त मंत्री जी का धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने एक नया फैसला किया है कि जहां दो हजार की पॉपुलेशन है, वहां बैंक की शाखा खुलेगी। हमने आईटी विभाग के अधिकारियों से चर्चा की कि बिजनेस मॉडल कैसा हो सकता है? बिजनेस मॉडल के साथ-साथ आज की तारीख में बायोमिट्रिक का सिस्टम नए ढंग से डवलप हो गया है। बायोमिट्रिक के आधार पर हम लोगों की इमेजिज लें और सही लोगों को पेमेंट करें। जो क्षेत्र दूर हैं, जहां बैंक शाखाएं नहीं खुली हैं, वहां हम कोशिश कर रहे हैं कि आईटी के माध्यम से, बायोमिट्रिक के माध्यम से लोगों को पेमेंट कराया जाए। यह प्रयोग भी हमने अभी प्रारंभ किया है। आशा करते हैं कि बड़े लेवल पर आईटी का काम हो सकेगा। पेमेंट देने के लिए सही आदमी की पहचान हो सकेगी। फर्जी मस्टर रोल के नाम पर जो लोग जोब कार्ड का पैसा ले रहे हैं, वह रुक पाएगा और हम ईमानदारी से सही लोगों को पेमेंट कर सकेंगे। हमारा यह प्रयास है, जिसमें आप सभी लोगों का सहयोग हम चाहते हैं।

          हमने हर प्रदेश सरकार को कहा है कि आप अपने यहां लोकपाल की नियुक्ति कीजिए। लोकपाल की नियुक्ति करने के लिए हमने समिति बनाई और वहां के चीफ सैक्रेटरी और आरडी सैक्रेटरी तथा एनजीओ का प्रतिनिधि मिलकर लोकपाल नियुक्त करें। मुझे कहते हुए दुख हो रहा है कि बार-बार प्रयास करने के बावजूद भी प्रदेश सरकार आगे आकर यह काम नहीं करना चाहती है कि लोकपाल की नियुक्ति हो, जिससे निचले लेवल पर जो गलतियां हैं, उन्हें रिड्रेसल कर हम सही ढंग से काम कर सकें। मैं समझता हूं कि आज इस बात की आवश्यकता है कि हम सबसे पहले यह काम करें। मैं कुछ मूलभूत प्रश्न भी उठाना चाहता हूं, जो हम सभी के लिए चिंता का विषय हैं। नरेगा एक्ट के सैक्शन 13 से 17 तक कन्सीव किया गया है कि पंचायतों की भूमिका क्या होगी। इसमें यह भी कन्सीव किया गया है कि पीओ, जो प्रोजेक्ट आफिसर है और प्लानिंग आफिसर है, उनकी भूमिका क्या होगी। हमने भारत सरकार और राज्य सरकार की जिस प्रकार की स्थितियां बनी हैं, गांव के गरीब आदमी को यदि सही ढंग से योजना का लाभ न मिले, तो हमें आज यह प्रश्न पूछना पड़ेगा। मैं बहुत विनम्रता से कहना चाहता हूं कि यदि आज मेरे विभाग का बजट लाखों-करोड़ों रुपयों का है, लेकिन उसके अंदर यदि नॉन प्लान का खर्चा केवल 34 करोड़ रुपयों का है। आप कल्पना कीजिए कि 34 करोड़ रुपए के नॉन प्लान के बजट में हमारा विभाग 40 हजार करोड़ रुपए की नरेगा की योजना का पैसा भेज रहा है। हमें यह सोचना पड़ेगा कि यदि नॉन प्लान के अंदर यह पैसा इसलिए है क्योंकि कांस्टीटय़ूशन में हमने एनविसेज किया है।

          भारत सरकार की भूमिका क्या होगी, प्रदेश सरकार की भूमिका क्या होगी, कांस्टीटय़ूशन में एन्विसिज किया गया है कि कोन्करंट लिस्ट क्या होगी, फेडरल लिस्ट क्या होगी, स्टेट लिस्ट क्या होगी। यदि सभी प्रदेश सरकारें आगे आकर इन योजनाओं को ठीक ढंग से क्रियान्वयन नहीं करेंगी चाहे हम कितनी ही चर्चा करें, कितनी ही भ्रष्टाचार की बात करें, कुछ नहीं होगा। एक्ट में लिखा है कि सारी ग्रिवेंसिस को रिड्रेसल करने का काम राज्य सरकार को करना है। मैं आपका ध्यान इस ओर आकर्षित करूं और आप प्रदेश सरकारों को बाध्य करें कि किस तरह से ग्रिवेंसिस रिड्रेसल मेकेनिज्म को ठीक ढंग से खड़ा करें जिससे लोगों के साथ न्याय हो सके। Section 19 – The State Government Cell by rules determine appropriate grievances redressal mechanism at the block level, at the district level for dealing with any complaint by any person in respect of implementation of the scheme and laid down the procedure for disposal of theft/complaints. यह प्रोवीजन है राज्य सरकार चाहे किसी भी प्रदेश की हो या किसी भी पार्टी की हो, उसे आगे आकर यह मेकेनिज्म डेवलप करना है जिससे गरीब आदमी के साथ अन्याय नहीं हो, या मशीन से पैसा नहीं उठा सके, या मस्टर रोल को फेर्ज करके पैसा नहीं उठा सके, यह प्राइमरी डय़ूटी स्टेट की है। एम्पलाएमेंट सब्जेक्ट स्टेट का है, पंचायत सब्जेक्ट स्टेट का है। जब तक राज्य सरकार आगे आकर यह काम नहीं करेगी और  भारत सरकार में हम चर्चा नहीं करेंगे तो मैं समझता हूं कि हम इस स्कीम को ठीक ढंग से लागू नहीं कर सकेंगे। एक प्रोवीजन की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। Section 27 – The Central Government may give any such direction as it may consider necessary to the State Government for the effective implementation of the provisions of this Act. Further without prejudice to the provision of sub-section 1, the Central Government may on receipt of any complaint regarding the issue or improper utilisation of funds granted under this Act in respect of any scheme, if prima facie, satisfied that there is a case cause an investigation into complaint made by any agency designated by it, and if necessary order stoppage of reach of funds to the scheme and institute appropriate remedial measures for its proper implementation within a reasonable time. इसमें ऑलरेडी सैंट्रल गवर्नमेंट का प्रोवीजन है। हम नहीं चाहते हैं कि हम इस प्रोवीजन का उपयोग करके किसी जगह का पैसा रोकें जिससे गरीब आदमी के साथ अन्याय हो, जिसे काम करना है वह काम न करे और गरीब आदमी डिप्राइव हो। हम यह काम नहीं करना चाहते हैं। मैं विनम्रता से कहना चाहता हूं कि स्टेट गवर्नमेंट आगे आए। हमने एमआईएस का सिस्टम डेवलप किया है, हैल्थ प्लान का सिस्टम डेवलप किया, आइए हम और आप देखें कि कैसे इस सिस्टम को ठीक करें। मैं यह जिम्मेदारी आप पर छोड़ता हूं और मैं आशा करता हूं कि हमारी प्रतिबद्धता है, हम सब ग्रामीण स्वराज की कल्पना करते हैं, हम गांव के गरीब आदमी का भला करना चाहते हैं इसलिए हम अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें तभी इस योजना को ठीक ढंग से लागू कर सकेंगे। मेरा आपसे निवेदन है और मुझे आशा है कि आप इस भावना को समझेंगे।

          मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि हमारी सरकार ने इस बात को समझते हुए महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार योजना को महात्मा गांधी जी के नाम से इसे जोड़ा क्योंकि महात्मा गांधी जी की गांव के प्रति कल्पना थी, उनके मन में गरीब आदमी के लिए कल्पना थी। यह नाम इसलिए जोड़ा ताकि लोगों के मन में कल्पना हो सके और हम सब उन आदर्शों को लेकर आगे बढ़ सकें जिन आदर्शों की कल्पना लेकर महात्मा गांधी जी आगे बढ़े थे। हमने यह कल्पना लेकर इसका नाम आगे बढ़ाया है।

          पीएमजीएसवाई के अंतर्गत सभी माननीय सदस्यों ने अपनी बात कही है। हमने इस योजना के तहत 1000 और 500 हेबिटेशन को जोड़ने की योजना बनाई। …( व्यवधान) आप 250 क्या कह रहे हैं? पूरे यूपी के मन में आए उतना कीजिए, आप 250 क्यों रखते हैं? …( व्यवधान) पहले हम 1000 और 500 की कनेक्टिविटी थ्रू आउट इंडिया करना चाहते हैं। कुछ स्टेट ने काम नहीं किया और हमने मात्र 20 परसेंट अपग्रेडेशन का प्रोवीजन रखा है। यह बात सही है कि डेवलप स्टेट जो ऑलरेडी कनेक्टिड हैं, उनको इसका लाभ नहीं मिल रहा है क्योंकि यहां 1000 और 500 वाली हेबिटेशन जुड़ी हुई हैं। वहां अपग्रेडेशन का प्रोवीजन 20 परसेंट रखा है, यह उन स्टेट्स के लिए डिसएडवांटेज है लेकिन ऐसे प्रदेश जिनमें 1000 और 500 की कनेक्टिविटी करनी है। प्राथमिकता के आधार पर कनेक्टिविटी का काम नहीं हो रहा है और हम अपग्रेडेशन का काम करना चाहें तो भी काम नहीं कर सकते हैं। मुझे यह कहते हुए तकलीफ हो रही है कि बिहार के साथियों के मन में एजिटेशन है, लेकिन आज तक कोर नेटवर्क के बारे में बिहार सरकार ने फैसला ही नहीं किया। एक साथी कहना चाहते हैं कि कोर नेटवर्क को रिवाइज कीजिए क्योंकि पहले का कोर नेटवर्क आउटडेटिड हो गया है। वे नया कोर नेटवर्क बनाने की मांग कर रहे हैं जिससे कनेक्टिविटी बढ़ सके जबकि दूसरी तरफ जब से यह योजना लागू की गई है तब से आज तक बिहार सरकार ने कोर नेटवर्क के बारे में फैसला ही नहीं किया है। अगर हम काम करना चाहें तो सरकार को यह निर्णय करना पड़ता है ताकि सही पैसे का उपयोग हो सके। बिहार सरकार का सवाल नहीं है, उत्तर प्रदेश में भी यही है। हम सबसे ज्यादा पैसा उत्तर प्रदेश सरकार को दे रहे हैं।  अगर हमारे मन में राजनीतिक भेदभाव करने की इच्छा होती…( व्यवधान) यूपी प्रदेश से क्या संबंध है, हम पैसा दे रहे हैं। …( व्यवधान) वे भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं आप नहीं लगा रहे हैं। आपको पैसा मिल जाए तो भेदभाव नहीं होगा, उनको पैसा मिल जाए तो भेदभाव है। ऐसा नहीं होता है? उत्तर प्रदेश को पैसा मिल जाए तो भेदभाव नहीं है और बिहार को मिल जाए तो भेदभाव है। दो तरह की बातें हैं।…( व्यवधान) आपके समाजवादी साथी उत्तर प्रदेश के बैठे हैं, वे क्या कह रहे हैं कि यूपी में क्या हो रहा है? मैं तो नहीं बोल रहा हूं। आप ही फैसला कर लीजिए।…( व्यवधान)

 सभापति महोदया :  माननीय मंत्री जी के अतिरिक्त और किसी की बात रिकार्ड पर नहीं जायेगी। *

डॉ. सी.पी.जोशी : माननीय सभापति महोदया, मैं सदन का ज्यादा समय नहीं लूंगा, परंतु मैं दो-तीन बातें जरूर करना चाहता हूं कि हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता सैनिटेशन की है। सैनिटेशन के बारे में हम सबको चर्चा करने की आवश्यकता है। आज गांवों में सबसे बड़ी समस्या जिसके बारे में हम सबने चर्चा की है कि शौचालय जाने के लिए महिलाओं के सामने सबसे बड़ी तकलीफ है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि गांवों में जो गरीब आदमी हैं, उनके लिए टॉयलेट की व्यवस्था नहीं है। जैसे हमने निर्मल ग्राम को कैम्पेन बनाकर पापुलर करने की कोशिश की। मैं आपसे अपील करना चाहता हूं कि आज आप इस टोटल सैनिटेशन के प्रोग्राम में भागीदारी निभाएं, जिससे इस कार्यक्रम को बड़े लैवल पर हम कर सकें और लोगों की भावनाओं को पूरा कर सकें, यह मेरा आप सबसे निवेदन है।…( व्यवधान) मुझे जानकारी है कि वाटर…( व्यवधान) आप सुनने की आदत डालिये। 1500 का नहीं बन सकता तो यूपी सरकार 15000 का बनाये, हमें खुशी होगी, हमें क्या तकलीफ है। यदि 1500 का नहीं बन सकता है तो यूपी सरकार 15000 करके शुरू करे, हमें खुशी होगी। इसमें किसी को क्या प्रॉब्लम है, जहां से शुरू करना है, शुरू करे। …( व्यवधान) बाकी प्रदेश में प्रॉब्लम नहीं है…( व्यवधान)

सभापति महोदया : माननीय सदस्य कृपया बैठ जाएं।

…( व्यवधान)

डॉ. सी.पी.जोशी : बाकी प्रदेशों में काम हो रहा है, कोई तकलीफ नहीं है।

          महोदया, मैं आपका ध्यान इंदिरा आवास योजना की तरफ आकर्षित करना चाहता हूं। इंदिरा आवास योजना के लिए मैं माननीय वित्त मंत्री जी और माननीय प्रधान मंत्री जी का बहुत आभार व्यक्त करता हूं, उन्होंने यूनिट कोष को बढ़ाकर 45 हजार, 48 हजार रुपये किया है। यह बात सही है कि आज यह पैसा बढ़ाने के बाद भी हम यूनिट को पूरा नहीं कर सकते। जैसे एक माननीय सदस्य ने कहा कि हम मकान देना चाहते हैं या हम कमरा देना चाहते हैं। हम कमरा नहीं देना चाहते। हम मकान बनाना चाहते हैं। हम सोच रहे हैं और हम शीघ्र ही इस बारे में काम करेंगे कि बैंकिंग वॉयबल कोई स्कीम बन सके। उस स्कीम के बारे में हम सोचेंगे और हम माननीय वित्त मंत्री जी के पास आयेंगे और कहेंगे कि गरीब लोगों के मकान बनाने के लिए कम इंटरैस्ट पर यदि बैंक से पैसा मिल सके तो हम उस स्कीम को भी लागू करेंगे, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए मकान बनाने का काम कर सकें। अभी जो स्कीम है, वह केवल मात्र बीस हजार रुपये तक की है और चार परसैन्ट इंटरैस्ट की है। मेरा निवेदन है कि बैंकेबल वॉयबल स्कीम को डिस्कस करना चाहते हैं और चाहते हैं कि उसका इंटरैस्ट रेट कम हो, जिससे हमें ज्यादा पैसा मिल सके और ज्यादा सुविधा मिल सके। इसके आल्टरनेट प्रपोजल को डिस्कस करके मैं माननीय वित्त मंत्री जी से पास आऊंगा और मैं आशा करता हूं …( व्यवधान) मुझे पता है, लेकिन The amount of only Rs.20,000. I am aware of it. We are working on a different scheme. जहां हम ज्यादा पैसा बढ़ाकर कम इंटरैस्ट पर बात कर सकें, जिससे लोगों को ज्यादा सुविधा मिल सके। इस बारे में चर्चा करने के लिए हम वित्त मंत्री जी के पास आयेंगे और आशा करते हैं कि इस संबंध में ठीक ढंग से कोई निर्णय हो सकेगा।

          अंत में मैं बीपीएल परिवारों के संबंध में कहना चाहता हूं। हम और हमारी सरकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि गांवों के गरीब आदमी का नाम बीपीएल लिस्ट में होना चाहिए। जो लिस्ट बनी हुई है, उस लिस्ट में अभी उनका नाम नहीं है। हमें इस बात की जानकारी है कि गांव के गरीब आदमी का नाम उसमें जुड़ा हुआ नहीं है। इसलिए हम एक नये फार्मूले के बारे में डिस्कस कर रहे हैं। उस चर्चा करने के पीछे मतलब यह है कि हम एक पापुलेशन का क्राइटीरिया बनाना चाहते हैं, जिस पापुलेशन के क्राइटीरिया में जो गरीब आदमी है, गरीब आदमी कौन हो सकता है, जिसके पास जमीन नहीं है। गरीब आदमी कौन हो सकता है, गरीब आदमी शेडय़ूल्ड कास्ट का आदमी गरीब हो सकता है। गरीब आदमी कौन हो सकता है, गरीब आदमी ट्राइब्स का हो सकता है। गरीब आदमी कौन हो सकता है, गरीब आदमी माइनोरिटी का हो सकता है। इस तबके के लोग जिनके पास पक्का मकान बंधा हुआ है, जिनके पास जमीन है, ऐसे लोगों के बारे में हम चर्चा कर रहे हैं कि कैसे गरीब आदमी का नाम उसमें ठीक ढंग से जुड़ सके। …( व्यवधान) यह अधिकार न तो हम दारासिंह जी को देंगे और न उनकी पार्टी को देंगे कि मनमर्जी करके लोगों के नाम बाहर निकाल दें। यह वैरिफाई करने का अधिकार हम रखेंगे कि इन्हीं चीजों के आधार पर जांच करने के बाद यदि उनके पास ये चीजें हैं तो बाहर निकलें और यदि नहीं हैं तो गरीब आदमी का नाम उस तबके में होना चाहिए। इस बारे में हम चर्चा कर रहे हैं और शीघ्र ही जैसे ही हमारे पास प्लानिंग कमीशन के आंकड़े आ जायेंगे, स्टेट गवर्नमैन्ट्स के साथ हम चर्चा कर रहे हैं, स्टेट गवर्नमैन्ट्स से चर्चा करके उनकी राय समझकर आगे काम करेंगे। हमारा देश इतना बड़ा है। हमारे यहां अलग-अलग जगह अलग-अलग समस्याएं हैं। पायलट प्रोजैक्ट को हम उनके साथ इंट्राडय़ूस कर रहे हैं और पायलट सर्वे के बाद जो फीड बैक हमें मिलेगा, उसे अपडेट करके ऐसी मैथोडोलोजी बनायेंगे, जिससे गरीब आदमी का सही ढंग से सलैक्शन हो सके और गरीब आदमी के साथ न्याय हो सके। यह काम हम शीघ्र करेंगे, इसका मैं आपको भरोसा दिलाना चाहता हूं। यह बात मुझे कही गई है, मेरे साथी भी कह रहे हैं कि एक हजार हैंडपम्प दे दो, दो हजार हैंडपम्प दे दो। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि आप मेहरबानी करके पूरी गाइडलाइंस पढ़िये। चाहे ड्रिंकिंग वाटर की स्कीम हो, चाहे पीएमजीएसवाई की स्कीम हो या आईएवाई स्कीम हो, हमने यह मैनडेटरी कर रखा है। यदि आपको जानकारी नहीं हो तो हम सैक्रेटरी को दोबारा लिखेंगे कि बिना एम.पी. की राय के यदि कोई प्रोजैक्ट आयेगा तो हम उसे स्वीकृत नहीं करेंगे और उसमें सबकी व्यवस्था करने का काम करेंगे। यह काम करने की हम आपसे निवेदन करना चाहते हैं और यदि नहीं करे रहे हैं तो सरकारों से पूछो। यदि यूपी की सरकार नहीं कर रही है तो उनसे पूछो, यदि बीजेपी की सरकार नहीं कर रही है तो मध्य प्रदेश से पूछो। हम जो काम करना चाहते हैं, वे काम करेंगे और आपको भरोसा दिलाना चाहते हैं कि चाहे पीन के पानी की व्यवस्था हो, चाहे सड़क की व्यवस्था हो, चाहे रोजगार की व्यवस्था हो, इन कामों को हम इस ढंग से करेंगे जिससे देश में गरीब आदमी का भला हो सके, देश का नवनिर्माण हो सके। यह बात लेकर हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

          महोदया, मैं अंत में एक बात कहना चाहता हूं कि मैं, मेरी पार्टी और मेरी पार्टी के नेता खास तौर से इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं कि इस देश में दो तरह का भारत नहीं बनेगा। हमारी पहली प्राथमिकता है कि गांव के गरीब आदमी का विकास हो, पानी की व्यवस्था हो, उसके लिए सड़क की व्यवस्था हो, स्कूल की व्यवस्था हो। जो सपना राहुल गांधी का है, हम उसे पूरा करके जनता के बीच में जाएंगे और कहेंगे कि हम यह सपना लेकर चले हैं, इसे ठीक ढ़ंग से लागू करें। मैं आप सब से अपील करना चाहता हूं कि यदि आपके मन में गरीब के प्रति श्रद्धा है, आपके मन में गांव के विकास की कल्पना है तो आप सब मिलकर इन कार्यक्रमों में हमारा साथ दीजिए और भारत का निर्माण करने का काम कीजिए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं माननीया महोदया आपसे अपील करता हूं कि आप इन मांगों को पास कर दीजिए। धन्यवाद।…( व्यवधान)

सभापति महोदया :   माननीय सदस्यगण, कृपया विराज जायें।

…( व्यवधान)

श्री गोपीनाथ मुंडे : महोदया, आपने महाराष्ट्र की तारीफ की और ईजीएस के तहत ही यह नरेगा योजना लायी है। वह योजना बंद हो गयी है और नरेगा योजना को लागू नहीं कर सकते हैं। महाराष्ट्र के लिए, वहां और बेनीफिशरीज और किस प्रकार के कार्यक्रम ले सकते हैं, क्या सरकार इसके बारे में सोचेगी? महाराष्ट्र सरकार तो हमारी नहीं है, वह आपकी है। यह मेरा पहला प्रश्न है।

डॉ. सी.पी.जोशी :  इसके बारे में जो कुछ भी हो सकता है, हम जरूर सोचेंगे कि महाराष्ट्र की ईजीएस स्कीम को कैसे इंटीग्रेट करें? हम इसे करने का काम करेंगे।

श्री गोपीनाथ मुंडे : महोदया, बीपीएल कार्ड के बारे में आपने जो कहा है, मैं उसका स्वागत करता हूं, लेकिन बीपीएल कार्ड की लिस्ट को सरकार कब रिवाईज्ड करने का काम, टाइमबाउन्ड कब शुरू करेगी और कब खत्म करेगी?

डॉ. सी.पी.जोशी : पॉपुलेशन के आंकड़े हमें मिलेंगे तो उसके आधार पर हम शुरू करेंगे और पायलट प्रोजेक्ट जल्दी ही शुरू करेंगे।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : जिस पार्टी ने इनीशिएट किया था, एक प्रश्न वे करेंगे।

…( व्यवधान)

श्री भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी :  दैवीय आपदा से जो हानि होती है, उसके लिए हम पूछना चाहते हैं कि आवास की क्या व्यवस्था है?…( व्यवधान)

सभापति महोदया : माननीय सदस्य महोदय, कृपया विराज जायें।

…( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार :  महोदया, आपने मुझे समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। माननीय मंत्री जी ने बड़ा जोरदार कहा और लोगों ने मेज थपथपाकर स्वागत किया, लेकिन…( व्यवधान)

सभापति महोदया : आप केवल प्रश्न पूछिए।

…( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार :  महोदया, गांव की हकीकत यहां बैठे हुए दोनों पक्षों के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि वहां क्या स्थिति है। आज पूरे देश के अंदर भीषण गर्मी है और हाहाकार मचा हुआ है। गांव में चले जाइए, आपको पता लग जायेगा कि वहां क्या स्थिति है?…( व्यवधान)

सभापति महोदया : शैलेन्द्र जी, आप डायरेक्ट प्रश्न पर आइये।

…( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदया, वहां पर वाटर स्टेट्स डाउन है। खेत-खलिहानों में आग लगी हुई है। लोगों के घर जल रहे हैं, लेकिन दैवीय आपदा के बारे में आपने कोई जिक्र नहीं किया है। मैं पूछना चाहूंगा कि पेय जल के लिए आपके सम्मानित सदस्यों ने भी यह मांग की है कि आप हैंड पम्प की व्यवस्था करायें। कम से कम पेय जल के लिए स्पष्ट तौर पर हैंड पम्प के लिए व्यवस्था होनी चाहिए। हमें मिलाजुला गाइड लाइन न दिखाईये कि यह गाइड लाइन में लिखा हुआ है। हम लोग गाइड लाइन बहुत देखते हैं, मानीटरिंग कमेटी भी देखते हैं। आप इसे स्पष्ट कीजिए। …( व्यवधान)

सभापति महोदया : कोई प्रश्न नहीं होगा। सभी माननीय सदस्य, कृपया विराज जायें।

…( व्यवधान)

 

MADAM CHAIRMAN: A cut motion has been moved by Shri Raju Shetti to Demand No.81 relating to the Ministry of Rural Development. I shall now put the cut motion to the vote of the House.

          The question is:

“That cut motion No.26 moved by Shri Raju Shetti be adopted.”

 

The cut motion was negatived.

MADAM CHAIRMAN:  I shall now put the Demands for Grants relating to the Ministry of Rural Development to the vote of the House.

          The question is:

“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the fourth column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2011, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 81 to 83 relating to the Ministry of Rural Development.”

 

The motion was adopted.

 

MADAM CHAIRMAN : What is the opinion of the House regarding having the Zero Hour?

… (Interruptions)

SOME HON. MEMBERS: Not now.

 

MADAM CHAIRMAN: The House now stands adjourned to meet tomorrow at 11.00 am.

 

19.21 hrs.   The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on  Friday, April 23, 2010/Vaisakha 3, 1932 (Saka). 

 

 


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