Discussion On The Motion For Consideration Of The English And Foreign … on 12 December, 2006

Lok Sabha Debates
Discussion On The Motion For Consideration Of The English And Foreign … on 12 December, 2006


an>

Title: Discussion on the motion for consideration of the English and Foreign Languages University Bill, 2006, as passed by Rajya Sabha (Motion Adopted and Bill Passed) .

 

 

MR. SPEAKER: The House will now take up item no. 23.

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HUMAN RESOURCE DEVELOPMENT (SHRI M.A.A. FATMI): Sir, I beg to move:

“That the Bill to establish and incorporate a teaching University for promotion and development of English and other Foreign Languages and their Literature, and to provide for matters connected therewith or incidental thereto, as passed by Rajya Sabha, be taken into consideration.”

 

MR. SPEAKER: Motion moved:

“That the Bill to establish and incorporate a teaching University for promotion and development of English and other Foreign Languages and their Literature, and to provide for matters connected therewith or incidental thereto, as passed by Rajya Sabha, be taken into consideration.”

 

 

प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर): महोदय, मैं अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय विधेयक, २००६ का समर्थन करता हूं।

13.08 hrs.                           (Shri Varkala Radhakrishnan in the Chair)

जैसा मंत्री जी ने बताया कि अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं और उनके साहित्य की अभिवृद्धि और विकास के लिए एक अध्यापन विश्वविद्यालय की स्थापना और उसका निगमन करने के लिए तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए यह विधेयक प्रस्तुत किया गया है। आज जैसे-जैसे सारी दुनिया एक हो रही है, सारे विश्व के अंदर और भारत के अंदर भी अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है, महोदय, मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों को खोलने की संख्या तो बढ़ती जा रही है, लेकिन उनकी क्वालिटी आफ एजुकेशन और उच्च शिक्षा की जो स्थिति है, वह विश्वस्तरीय बने, इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। जैसे राज्य स्तर पर अनेक राज्य स्तरीय विद्यालय खोले जा रहे हैं, उसी तरह केंद्र के स्तर पर भी उत्तर पूर्वी राज्यों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए और अन्य स्थानों पर भी केंद्रीय विश्वविद्यालय खोले जाएं, लेकिन उनका जो शिक्षा का स्तरहै, वहां जो अनुसंधान की सुविधाएं प्राप्त होनी चाहिए और उच्च शिक्षा विश्व स्तरीय होनी चाहिए, इन सबका आज अभाव दिखाई पड़ रहा है। मैं आपके माध्यम से सरकार से मांग करता हूं कि वह इस ओर ध्यान दे। कम्प्यूटर और इंफोर्मेशन टेक्नॉलोजी आने के बाद, क्योंकि हमारे यहां अंग्रेजी शिक्षा का वर्चस्व रहा है, हमारे यहां चीन से भी अधिक रोजगार लोगों को प्राप्त हुए हैं और संसार के विकसित देशों में भी हमारे एक्सपट्र्स की मांग अंग्रेजी भाषा के कारण बढ़ी है। हैदराबाद में भाषा के लिए एक संस्थान था, जो वहां एक सोसायटी के रूप में, हैदराबाद रजिस्ट्रेशन अधनियम के तहत रजिस्टर्ड था। इस संस्थान में अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच भाषा पढ़ाई जाती हैं। मैं चाहूंगा कि इसके साथ ही रूसी, चीनी और हमारे पड़ोसी देशों की जो अन्य भाषाएं हैं, उनका भी अध्ययन इसके अंतर्गत हो, तो यह अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है। यह संस्था हैदराबाद के अंदर काम कर रही है और इसका कैम्पस लखनऊ में भी होगा, शिलांग में भी होगा। इसमें दूरवर्ती शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजी दी जाएगी। मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि इंदिरा गांधी मुक्त विद्यालय खुला हुआ है और वहां डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से शिक्षा दी जा रही है।[MSOffice21]  जो प्राइवेट नौकरी करने वाले लोग हैं, वे इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय के माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। डिस्टेंट एजुकेशन इसके माध्यम से दी जाएगी, लेकिन डुप्लीकेसी न हो, इसका ध्यान रखा जाए।

सभी राज्यों में केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। अभी कहा गया था कि केरल में होना चाहिए। राजस्थान क्षेत्रफल की द्ृष्टि से सबसे बड़ा राज्य है। वहां राज्य सरकार ने शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए क्रांतिकारी काम किया है, जिसके परिणामस्वरूप यूनेस्को ने सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत राजस्थान सरकार और वहां के शिक्षा विभाग को पुरुस्कृत किया है। जयपुर में राजस्थान विश्वविद्यालय को केंद्रीय स्तर के विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाए, इसे सैंट्रल यूनिवर्सिटी घोषित किया जाए क्योंकि यह सबसे पुराने और सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक है। राज्य सरकार ने इस बारे में केंद्र सरकार को कई बार लिखा है। माननीय राज्य शिक्षा मंत्री जी यहां विराजमान हैं और अन्य सदस्य भी यहां विराजमान हैं। मैं उनसे प्रार्थना करूंगा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय के मामले में राजस्थान के साथ होने वाले भेदभाव को दूर किया जाना चाहिए और राजस्थान विश्वविद्यालय को केंद्रीय यूनिवर्सिटी घोषित किया जाना चाहिए।

इस बिल के उद्देश्यों में बताया गया है यहां अंग्रेजी और विदेशी भाषा संस्थान काम करेगा। इसकी शक्तियां हैं, अधिकार हैं, महामहिम राष्ट्रपति जी इसके वजिटर होंगे, कुलपति, रैक्टर आदि हैं। मैं सरकार से यही कहना चाहता हूं कि आजादी के ५९ वर्षों के बाद भारतीय भाषा की तरफ और संविधान के अनुसार हिंदी राष्ट्रभाषा घोषित की गई है, उसकी शिक्षा की तरफ ध्यान दिया जाए और केंद्रीय विश्वविद्यालय में स्थान दिया जाए ।

आपने वर्धा में महात्मा गांधी केंद्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना की है, लेकिन आज तक गांधी जी के नाम पर स्थापित होने वाली सैंट्रल यूनिवर्सिटी, जिसे आप सारा पैसा यहां से दे रहे हैं, लेकिन वहां समस्या बनी हुई है। उसका विकास तीन चार वर्षों में होना चाहिए, वह हो नहीं रहा है। ऐसा मालूम पड़ता है कि सरकार राष्ट्रभाषा हिंदी और गांधी जी के सपनों के प्रति उदासीनता बरत रही है। मैं माननीय मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि वर्धा में जो महात्मा गांधी केंद्रीय हिंदी विश्वविद्यालय स्थापित किया गया है, उसकी तरफ भी ध्यान दें। मैं इसका समर्थन करता हूं। अंग्रेजी संस्थान में जो लोग सेवारत थे, उनकी सेवाएं अप्रभावित रहेंगी, उनको इसमें समाहित किया जाएगा। उनके राइट्स, डयूटीज़ और पावर्स भी इसमें समाहित होंगी और निश्चित रूप से अंग्रेजी भाषा और विदेशी भाषाओं की द्ृष्टि से यह विश्वविद्यालय सक्षम केंद्र बनेगा।

जैसा मैंने प्रारंभ में कहा कि हमारे यहां उच्च शिक्षक गुणवत्ता की द्ृष्टि से अन्य विकसित देशों से अपेक्षाकृत पीछे हैं। पहले हमारे यहां नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय थे और हजारों की संख्या में विदेशी विद्यार्थी यहां शिक्षा प्राप्त करने आते थे लेकिन केंद्रीय सरकार अब विदेशी भाषाओं का संस्थान खोल रही है ताकि विदेशों से विद्यार्थी यहां पढ़ने के लिए आएं और अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं का साहित्य व ज्ञान प्राप्त करके दक्षता प्राप्त करें और भारत फिर से विश्व का गुरु बने, ऐसी व्यवस्था विश्वविद्यालयों में होनी चाहिए।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस विधेयक का समर्थन करता हूं। आपने मुझे बोलने का समय दिया इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं।

श्री गिरधारी लाल भार्गव (जयपुर) : रासा सिंह रावत जी ने मांग की है कि जयपुर विश्वविद्यालय को केंद्रीय यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाए, मैं इसका समर्थन करता हूं। मैं उम्मीद करता हूं कि आप इस पर ध्यान देंगे। इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलना चाहिए, यह मेरी प्रार्थना है। मैं आशा करता हूं कि जब आप उत्तर देंगे तब इस बात का ध्यान रखेंगे।

gÉÉÒ £ÉÆ´É® É˺Éc bÉÆMÉÉ´Éɺɠ (xÉÉMÉÉè®)  :  महोदय, मैं भी इस विषय के साथ स्वयं को सम्बद्ध करता हूं। मेरा नाम भी सम्मिलित किया जाए।   

SHRI FRANCIS FANTHOME (NOMINATED): Thank you very much, Mr. Chairman Sir.  I rise to support the English and Foreign Languages University Bill, 2006.[r22] 

Sir, this Bill is unique in its structure as this would be  the only University in the entire country that has jurisdiction in terms of its addressal of resources and facilities to the entire country.  It will address the concerns to improve the standards of English and foreign languages.

            The Central Institute of English and Foreign Languages (CIEFL) was first established in Hyderabad in 1958.  Then the scope of this organization was exclusively for English.  In 1972, there was an expansion of its facilities and it included additional languages and the Institute was renamed as the Central Institute of English and Foreign Languages.  In the year 1973, CIEFL was declared as a Deemed University under the University Grants Commission Act, 1956.  Besides improving the standards of English and the teaching of languages like Arabic, French, German, Japanese, Russian and Spanish, through research and training of teachers, the main academic concerns of the CIEFL include producing innovative learning-teaching material in print and electronic media formats, evolving indigenous ways of testing language proficiency, providing expertise in language and teacher education to professionals, promoting interdisciplinary research in literary and cultural studies, and developing critical intercultural understanding of civilizations. 

            The academic programme of the CIEFL are undertaken through its five Schools of Studies, namely the School of English Language Education, the School of Language Sciences, the School of Critical Humanities, the School of Distance Education, and the School of Foreign Languages, with different Centres under each of them.  Apart from its main campus at Hyderabad, the CIEFL  campuses at Lucknow and Shillong also to carry out its major functions for the benefit of students and teachers from the northern and northeastern parts of the country.

            About 300 students are presently pursuing their studies for M.A., M. Phil. and Ph.D. degrees in the CIEFL institutions.  Besides, the CIEFL is also imparting education through distance education to nearly 700 students enrolled for the various Post-Graduate Certificate, Diploma and Degree courses as well as for research work leading to M.Phil. and Ph.D.  The CIEFL is also offering part-time certificate, diploma and advanced diploma courses to more than 650 students.

            Over the years, the CIEFL has grown in stature and has earned recognition even abroad as a centre of excellence in the study of English and major foreign languages.  It is one of the few institutions where the standards of its qualifications are recognized world-wide and it is widely respected for the quality of the work it imparts and the kind of facilities it provides to the students who come to this institution.

            With the advent of globalization and opening of world economies the mobility of people of all walks of life across international boundaries has phenomenally increased during the recent years.  This has resulted in added pressure on the institutions offering foreign language courses world over.  The responsibilities of the CIEFL have also increased manifold on this count and it will have to expand and diversify its activities in the imminent future.  It is in this context that the Government of India has decided to establish this University as an organization that will address the future challenges of a globalized economy.[r23] 

            The CIEFL would require greater autonomy for discharging its added responsibilities.  At the same time, it needs to be more accountable and transparent in its functioning.  Both these requirements can be met by conferring on it the status of a full-fledged Central University through an Act of Parliament.  The Central Institute of English and Foreign Languages University Bill, 2006 (since renamed as English and Foreign Languages University Bill, 2006) was, therefore, introduced in the Rajya Sabha for the establishment and incorporation of the CIEFL as a Central University.

            The salient features of the aforesaid Bill are as under:

(i)               The Bill seeks to dissolve the ‘Central Institute of English and Foreign Languages, Hyderabad”, a Society established under the Hyderabad Societies Registration Act and to establish and incorporate a teaching University in the State of Andhra Pradesh and to provide for matters connected therewith or incidental thereto.

(ii)            The headquarters of the University shall be at Hyderabad, campuses at Lucknow and Shillong, and it may establish campuses at such other places as it may deem fit.

(iii)          All the property, rights, powers and privileges, debts, liabilities and obligations of the CIEFL Society shall be transferred to the University.

(iv)           The employees of the CIEFL shall hold their employment in the University by the same tenure and on the same terms and conditions and with the same rights and privileges as to pension and gratuity, and all other conditions of service would continue to prevail.

(v)              The powers and functions of the Visitor, Authorities and Officers of the University are on the pattern of the existing Central Universities.  Likewise, the subject matters and mode of framing of the Statutes, Ordinances and Regulations of the University are broadly in accordance with the provisions existing in the Acts of other Central Universities.  The Bill also provides that all Statutes, Ordinances and Regulations shall be published in the Official Gazette and laid before both the Houses of Parliament.

(vi)           The annual accounts of the University shall be audited by the Comptroller and Auditor-General of India and shall be laid before both the Houses of Parliament along with the audit report.

(vii)         During the transitional period, the appointment of the first Officers and the constitution of the first Authorities of the University would be made by the Central Government on specified terms.

Presently, the financial requirement of the University is estimated as non-recurring expenditure of Rs. 4.75 crore and Rs. 11 crore as recurring expenditure.   As the CIEFL is also being fully funded by the UGC, no additional outlay would be required for funding of the proposed University.

The Chairman of the Rajya Sabha referred this Bill to the Department-related Parliamentary Standing Committee on Human Resource Development.  The Report has, now, been received and we have, now, been given this Bill to pass in the Lok Sabha.

I would only like to draw the attention of the Minister of Human Resource Development  to Clause 42 of the proposed Bill.  Clause 42 refers to barring all employees on Officer of the University from any matter related to legal action against them for any act that they think is performed in good faith. 

Looking at the present scenario of transparency and accountability, I feel that we need to be responsible for the kind of University we establish and the people responsible for the organization need to be accountable to the people they seem to address.[R24] 

            Therefore, there needs to be a little flexibility on this that  they need to be accountable to the  due process of law  and not be barred from being accountable  to the legal system.

            With these few words, Sir, it is my pleasure  to support the Central Institute of English and Foreign Languages University Bill, 2006. 

PROF. BASUDEB BARMAN (MATHURAPUR):  Sir, I rise to support the Central Institute of English and Foreign Languages University Bill, 2006.

            I would try not to repeat what my predecessor has stated in all details.  But I would like to draw the attention of this House regarding the growth of higher education in India, which has been guided by recommendations and suggestions made by various Committees, Boards and Commissions set up before and after Independence.

            We would recall that there were  Woods Despatch (1854), Hunter  Commission (1882), the Indian Universities Commission (1902), Central Advisory Board of Education (1923), Inter-University Board, now known as Association of Indian Universities (1924),  the University Education Commission (1948), the Education Commission (1964), Committee on Problems of University Administration (1969),  Committee on Governance of Universities (1969), Review Committee on UGC (1977), and Committee on the Working of Central Universities (1982).

            Sir, I hope, I shall not be disturbed during the few minutes when I speak. The University Education Commission (1948) headed by Dr. S. Radhakrishnan set out the aims of higher education in the following words:

“Democracy depends for its very existence on a higher standard of general, vocational and professional education.  Dissemination of learning incessant search for new knowledge, unceasing effort to plumb the meaning of life, provision for professional education to satisfy the occupational needs of our society  are the vital tasks of higher education. ”

 

The Education Commission (1964) headed by Dr. D. S. Kothari recommended inter alia,  and I shall be quoting only two from that, “…improvement in quality of teaching and learning; introduction of internal and continuous education in place of external examination.”

Based on the Report of the Education Commission (1964), the first National Policy on Education was formulated in 1968.  Making a fresh assessment of status of education in the country, the National Policy on Education was adopted in 1986, which reaffirmed that education was a unique investment in the present and the future.  The Policy urged that in the context of unprecedented  expansion of knowledge and data-base, higher education has to be dynamic, constantly covering uncharted and newer areas. It also proposed that a large number of universities and colleges in the country needed all round improvement and that the main emphasis  in the immediate future should be on their consolidation and expansion.

Against this backdrop, we are to consider the Central Institute of English and Foreign Languages University Bill, 2006.

Currently, the Central Institute of English and Foreign Languages, Hyderabad offers academic programmes in English, Arabic, French, German, Japanese, Russian and Spanish.  The Institute provides for the study of English and foreign languages and their literatures, organization of research, training of teachers, production of teaching materials, and  extension services to help improve the standards of the teaching of English and foreign languages in India.  It is the only University in India catering exclusively to the teaching and learning of foreign languages.

The main programmes proposed by the Institute now for expansion and diversification of its activities in the near future include introduction of a few more foreign languages like Chinese, Vietnamese, Korean, Burmese and Thai.[r25] 

            These also include strengthening of the existing Centres for European Studies, Cultural Studies, Japanese Studies, etc., and establishment of a new Centre for American Studies, starting ‘English Online’ programmes, and conversion of instructional material produced by the Institute into digital format.

            The Institute is presently a registered society and an institution declared to be a deemed university under Section 3 of the UGC Act and, therefore, its functional autonomy is susceptible to be affected by various authorities like Registrar of Societies, UGC and the Ministry of Human Resource Development. I hope and we will all agree that its incorporation as a Central University will ensure its governance in terms of statutory provisions made under established norms and procedure, without outside  interference; and its Vice-Chancellor will be appointed by the President of India in his capacity as the Visitor of the University, in accordance with the prescribed procedure. Further, it will have statutory powers to provide for instructions in the relevant branches of learning and to make provisions for the advancement and dissemination of knowledge for furtherance of its objects, without undue interference by outside agencies.

            Thus, it may be evident that the Institute on becoming a Central University will gain in terms of functional autonomy and freedom from Governmental control. Moreover, a Central University status is likely to help receiving  enhanced Central funding for its sustained all-round growth in the coming years, which would help the country in its academic pursuit in the sphere of teaching and  learning of English and foreign languages, and, which, I believe, we will all agree, is a crying need of any nation today.

            The objects of the proposed University shall be, inter alia, to disseminate and advance knowledge by providing instructional, research and extension facilities in the teaching of English and major foreign languages and literatures in India; to train language teachers in methods and approaches appropriate to the Indian context; to provide expertise in language and teacher education to foreign professionals; to evolve ways of testing of language proficiency; to make provisions for innovative teaching/learning materials in both print and electronic media; to take appropriate measures for inter-disciplinary studies and research in literary and cultural studies; and lastly to develop critical inter-cultural understanding of world civilizations.

            I believe and I hope that the House will agree that the incorporation of this Institute as a Central University will be enhancing our academic progress.

            With these words, I support the Bill and request all the hon. Members to pass the Bill today.

                                                                                                                                   

 

श्री मोहन सिंह (देवरिया): सभापति जी, मैं इस विधेयक का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। इसका टाइटल “फॉरेन लैंग्वेजेज इनक्लूडिंग इंगलिश” होता, तो बहुत अच्छा होता, लेकिन टाइटल ऐसा बनायागया है जैसे अंग्रेजी भारत की भाषा है, बाकी भाषाएं विदेशी भाषाएं हैं और उनके पठन-पाठन के लिए एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किया जा रहा है। फिर भी इसकी जो मंशा है उसका मैं स्वागत करता हूं क्योंकि इसकी एक शाखा उत्तर प्रदेश में भी स्थापित की जा रही है। दुनिया में भारत को छोड़कर अपनी भाषा के प्रति जितना स्वाभिमान है, उस स्वाभिमान के चलते, दुनिया की भाषाओं को सीखना इस भूमंडलीकरण के युग में सबसे बड़ी आवश्यकता है। दुनिया का एक बहुत ही संगठित राष्ट्र है जिसे हम कनाडा के नाम से जानते हैं। उसके संविधान के अनुसार उसकी राष्ट्राध्यक्ष ब्रिटेन की महारानी हैं, लेकिन उसमें एक छोटा सा प्रान्त क्यूबेक है, जो पिछले ३० वर्षों से संग्राम कर रहा है कि हमारे ऊपर फ्रांसीसी भाषा के अलावा अंग्रेजी भाषा जबरन लादी जा रही है।[r26]  तीन बार वहां जनमत संग्रह हो चुका और अब कनाडा सरकार ने घुटने टेककर फ्रांसीसी भाषा और क्यूबैक को कनाडा के भीतर ही स्वायत्तता देना स्वीकार कर लिया है। हमारे यूरोपियन कॉमनवैल्थ मार्केट कंट्रीज़ की जब बेल्जियम में कांफ्रेंस हुई, वहां फ्रांस के उप-राष्ट्रपति अंग्रेजी में बोलने लगे, तो खुद उनके ही देश के राष्ट्रपति यह कहकर कि अंग्रेजी में बोलना विशाल और शानदार फ्रांस राष्ट्र का सबसे बड़ा अपमान है, र अपने उप-राष्ट्रपति के भाषण के दौरान सदन से बहिर्गमन कर गये, वाक आउट कर दिया। मैं इस घटना को इसलिए कह रहा हूं कि दुनिया में हर राष्ट्र अपने भाषाई स्वाभिमान के प्रति कितना सावधान है, इस दिशा में भारत के बुद्धिजीवियों को सोचने की आवश्यकता है। अभी भारत का एक संसदीय शिष्टमंडल, श्री प्रियरंजन दासमुंशी जी के नेतृत्व में पुर्तगाल और स्पेन गया। एक छोटा सा देश पुर्तगाल, जिसने कई सौ वर्षों तक हिन्दुस्तान के एक राज्य पर अपने अधिकार रखा था, वह एक करोड़ की आबादी वाला दक्षिणी यूरोप का प्रमुख देश है, लेकिन वहां कोई अंग्रेजी बोलने वाला, एक भी इन्सान पढ़ा से लेकर बेपढ़ा तक नहीं है। हर आदमी को इस बात का अभिमान था कि वह पुर्तगीज़ भाषा बोलता है और यह उसकी अपनी राष्ट्रभाषा है। यही नहीं, जनभाषा है। एक देश है स्पेन, जिसकी आबादी कुल चार करोड़ है और जो दुनिया का प्रमुख व्यापारिक और व्यावसायिक देश है। स्पेनिश लैंग्वेज के अलावा उस देश में किसी भाषा को यूरोप का हिस्सा होने के बावजूद नहीं बोला जाता। यह केवल भारत है, जहां यह भ्रान्त धारणा चलती है कि अंग्रेजी विश्व भाषा है और इस भाषा को यदि हम नहीं सीखेंगे तो विश्व में अलग-थलग पड़ जाएंगे, बिल्कुल किनारे हो जाएंगे। अभी एक व्यापारिक पानी का जहाज, जो चीन से आया था, हमने उसमें प्रवेश किया और वहां के कैप्टन ने मुझे कोकाकोला सर्व किया और कहा कि यहां आने का यह सम्मान है, कोकाकोला आपको पीना ही पड़ेगा। कोकाकोला की बोतल पर पूरा चीनी भाषा में लिखा हुआ था, केवल एक छोटा सा जुमला अंग्रेजी में कोका कोला लिखा हुआ था। मैंने उनसे पूछा कि आप लोग किस भाषा का प्रयोग करते हैं, जब इस समुद्री भंवर में होते हैं, तो उसने कहा कि चीनी भाषा के अलावा हमको कुछ नहीं आता और इस भाषा के अलावा हम जानते भी नहीं। चीन के लोग यह समझते भी नहीं कि चीनी भाषा के अलावा दुनिया में और कोई भी भाषा बोली और सीखी जाती है।

यह बात ठीक है कि हम दुनिया की भाषाओं को सीखें, लेकिन दुनिया के देशों से सम्पर्क करने के लिए अब अंग्रेजी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यदि दुनिया की बहुत सारी भाषाओं को हम नहीं जानेंगे तो हम दुनिया में अलग-थलग हो जाएंगे, यह विश्वास भारत के बुद्धिजीवियों में पैदा होना चाहिए और इस द्ृष्टिकोण से यदि कोई विश्वविद्यालय स्थापित किया जा रहा है तो इसमें कुछ और भाषाएं भी जोड़ी जानी चाहिए। बहुत दिन भारत में राज-काज की भाषा फारसी भाषा थी। अरब के देशों से हमारे इतने गहरे रिश्ते हैं, बड़े व्यापक पैमाने पर हमारे देश के व्यापारिक और व्यावसायिक सम्बन्ध अरब देशों से हैं। यदि अरबी भाषा और फारसी भाषा भी इन विश्वविद्यालयों के जरिये हमारे देश के बुद्धिजीवियों को समझाई जायें, नये लड़कों को पढ़ाई जायें तो मैं ऐसा समझता हूं कि अनुवादक की हैसियत से उन सभी बच्चों को रोजगार मिल सकता है, इस देश से बाहर उनको काम मिल सकता है। हमको पुर्तगाल में एक लड़का मिला, जो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ा हुआ था। मैंने उससे पूछा कि किस खुशी में तुम यहां आये हो, तो उसने कहा कि मुझको भारत के दूतावास के जरिये रोजगार मिला है, चूंकि मैंने पुर्तगीज़ भाषा सीखी थी। स्पने में भी ऐसे बच्चे मिले, जिन्होंने कहा कि मैंने जवाहर लाल यूनिवर्सिटी से स्पनिश लैंग्वेज सीखी थी, इसलिए अनुवादक के रूप में उन्हें इन दोनों देशों में हमारे ही दूतावास के जरिये काम मिल गया।

भारत में जिस तरह बेरोजगारी बढ़ रही है, पढ़े-लिखे नौजवान सड़कों पर घूम रहे हैं, उन सभी नौजवानों को दुनिया के मुख्तलिफ मुल्कों में रोजगार मुहैया कराने के लिए विदेशी भाषाओं में कुछ विशेषज्ञ और संस्थान खोलने आवश्यक हैं, जिससे विद्यार्थी उन भाषाओं को सीख सकें। [R27] 

  दूसरी बात, हम कहना चाहते हैं कि इस बहाने जो भारत की भाषाओं का सम्मान और उनकी प्रतिष्ठा है, उसमें किसी तरह की कमी नहीं आनी चाहिए। भारत सरकार ने अपने अधनियम के तहत एक विश्वविद्यालय हिंदी की पढ़ाई-लिखाई के लिए खोला ह। जो महात्मा गांधी जी के नाम पर उनके अपने सेवा क्षेत्र वर्धा में स्थापित किया है। उसका हेडक्वार्टर वर्धा में बनाया गया, लेकिन वहां रोजाना लठ्ठ चल रहा है, आपस में मारपीट हो रही है। भारत सरकार ने वहां की परिस्थितियों की जांच के लिए एक कमीशन बनाया। उस कमीशन ने वहां की परिस्थितियों की जानकारी करने के बाद भारत सरकार को उसकी एक रिपोर्ट दी। वह रिपोर्ट छ: महीने से पड़ी है, चूंकि अर्जुन सिंह जी बीमार अवस्था में हैं इसलिए उस रिपोर्ट पर विचार करने का उनके पास समय नहीं है, अस्पताल में ही बैठकर वे थोड़ी-बहुत पत्रावली निस्तारित कर देते हैं। मैं अपील करना चाहूंगा और मुझे खुशी होगी यदि उनका कुछ काम …(व्यवधान) 

श्री मोहम्मद अली अशरफ़ फ़ातमी : महोदय,ªÉc ¤ÉÉiÉ MÉãÉiÉ cè,दुरस्त नहीं है। वह आफिस आते हैं। …(व्यवधान) 

श्री मोहन सिंह :  महोदय,हम चाहते हैं कि यह बात गलत हो, और उनका कुछ काम हमारे भाई फातमी जी को भी मिल जाए, कुछ पत्रावलियां भी उनके सुपुर्द हो जाएं। मैं उनकी पैरवी में यह बात कह रहा था। लेकिन यदि वे पत्रावली नहीं देखना चाहते हैं, तो मुझे बड़ी खुशी होगी।

श्री मोहम्मद अली अशरफ़ फ़ातमी :  महोदय,VÉ¤É iÉBÉE ¤ÉÖVÉÖMÉÇ càÉÉ®ä ºÉÉlÉ cé, =xÉBÉEä ºÉɪÉä àÉå càÉ SÉãÉå, càÉ AäºÉÉÒ nÖ+ÉÉ BÉE®åMÉä*

श्री सुरेश वाघमारे (वर्धा) : महोदय, हिंदी विश्वविद्यालय के बारे में आपने जो कहा, यह बात सही है। आपने जो कहा, इसका मुझे पूरा अनुभव है, क्योंकि मैं वर्धा से आता हूं। वहां की जो स्थिति है, मैं उसको जानता हूं और मैं आपकी बात से पूरी तरह से सहमत भी हूं।

श्री मोहन सिंह : आप समझते हैं, लेकिन फातमी भाई सहमत नहीं हैं। ये समझते हैं कि अर्जुनसिंह की इज्जत केवल यही करते हैं, मोहन सिंह नहीं करते हैं। हम आपसे अधिक और पहले से उनकी इज्जत करते हैं। मेरा सवाल यह है कि जब इस तरह की कोई बात आये, तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय को उस पर विचार करना चाहिए। यदि वहां की हालत को दुरूस्त करने के लिए सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो मैं ऐसा समझता हूं कि एक भारतीय भाषा का श्रेष्ठतम संस्थान, जिसको करोड़ों रूपये भारत सरकार अपने संसाधनों से देती है, वह बरबाद हो जाएगा। इस अपील के साथ कि एक संस्थान अंबेडकर साहब की स्मृति में लखनऊ में भी इन लोगों ने खोल रखा है, मैं नहीं जानता कि उसकी भी हालत ठीक रही है। किसलिए भारत सरकार विश्वविद्यालय खोल रही है? एक के बाद एक जितने शैक्षिक जगत के सेवानिवृत्त लोग हैं, उनको कुलपति बनाने में आसानी हो रही है, यह तो ठीक है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता का क्या होगा? यदि एक-एक अपने शैक्षिक पैरोकार को रोजगार देने के लिए विश्वविद्यालय खोलने हैं, तो मैं समझता हूं कि अच्छी स्थिति नहीं है। इसलिए भारत सरकार विश्वविद्यालय खोलने के साथ-साथ उन पर कड़ी निगरानी का भी इंतजाम करें, जिससे उनकी गुणवत्ता दुरूस्त हो सके। सही मायने में जब इस विश्वविद्यालय के पढ़े हुए विद्यार्थी फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड में जाएं, तो उनके बारे में लोगों की अच्छी राय हो। अमेरिका जैसा देश कह रहा है, वहां के राष्ट्रपति कह रहे हैं कि यदि अमेरिकी नौजवान हिंदी नहीं सीखेंगे तो दुनिया में पिछड़ जाएंगे। हिंदी के ऊपर अमेरिका की सरकार पन्द्रह मलियन डालर इस साल के बजट मे खर्च करेगी। अमेरिका हिंदी को प्रोत्साहित कर रहा है, आस्ट्रेलिया में हिंदी वालों की पूछ बढ़ रही है। इंग्लैंड की सरकार कह रही है कि हमारे देश के लड़के अंग्रेजी कम जान रहे हैं, जो भारत के लड़के आ रहे हैं, उनका अंग्रेजी का ज्ञान हमारे यहां के लड़कों से ज्यादा अच्छा है, लेकिन हम अपने देश में रहकर जो हमारी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा है, जो गांधीजी द्वारा प्रदत्त सर्वव्यापी भाषा है, उनके नाम से चलने वाले विश्वविद्यालय को ठीक से नहीं चला पा रहे हैं। हम समझते हैं कि यह एक दुर्भाग्यूपर्ण स्थिति है। इन शब्दों के साथ मैं इस विधेयक का पुरजोर समर्थन करता हूं।

 

श्री गणेश प्रसाद सिंह (जहानाबाद) : सभापति महोदय, जो माननीय संसाधन विकास मंत्री द्वारा अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय विधेयक २००६ प्रस्तुत किया गया है, मैं उसके समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। पूरे देश में इस नाम से एक विद्यालय चल रहा था, जो हैदराबाद में है । महोदय, इतना बड़ा देश और एक विश्वविद्यालय, एक कालेज, इसके बारे में भी मैंने जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की है। वह विश्वविद्यालय सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत किसी रजिस्टर्ड सोसाइटी द्वारा चलाया जा रहा था। उसमें अंग्रेजी और विदेशी भाष्षा सीखने वाले छात्रों की संख्या संतोषजनक न रहकर १००,१५० और २०० के अंदर ही रही। मैं कहना चाहता हूं कि आज वैश्वीकरण और व्यावसायीकरण का युग है। इसमें अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषाओं का ज्ञान भी आवश्यक है क्योंकि इससे रोजगार मिलने में आसानी होगी। साथ ही हमारी सीमा के आर-पार जो लोग हैं, वे एक दूसरे को समझने की कोशिश करेंगे। आप जानते हैं कि बेरोजगारी की समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, लेकिन आज जितने व्यापार बढ़े हैं, अन्य रोजगार बढ़े हैं, हमारे बहुत से छात्र दूसरी भाषाओं के ज्ञान के अभाव में पिछड़ जाते हैं। अभी मानव संसाधन विकास मंत्री एक विधेयक लाये हैं। पुरानी सोसायटी के अंतर्गत जो विश्वविद्यालय चल रहा था, उसको विघटित करते हुए, केन्द्रीय अंग्रेजी और विदेशी भाषा संस्थान विश्वविद्यावलय विधेयक, २००६ को यहां स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य बहुत अच्छा है कि हम अपने देश में दूसरी भाषाओं की शिक्षा देने के लिए अधिक से अधिक व्यवस्था करें।

मैं कहना चाहता हूं कि देश के जो लोग दूसरे देशों में जाकर व्यवसाय करना चाहते हैं, उनके लिए वे चाहे जर्मनी, चीनी, जापानी या अरेबियन भाषा सीखना चाहते हों, उनके लिए एक विश्वविद्यालय और एक कालेज पर्याप्त नहीं है। मेरा व्यक्तिगत सुझाव है कि हमारे भिन्न-भिन्न प्रदेशों में जो यूनीवर्सिटीज बनी हुई हैं, उनके अंतर्गत ही सरकार को विदेशी भाषा डिपार्टमैंट का इंतजाम करना चाहिए। उसके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर का इंतजाम करना चाहिए, टीचर्स की नियुक्ति करनी चाहिए तभी इसका प्रचार-प्रसार होगा।

अभी मेरे पूर्ववक्ता माननीय श्री मोहन सिंह जी बता रहे थे जो ठीक है कि दूसरी भाषाओं का ज्ञान जरूरी है, उन्हें सीखना जरूरी है, लेकिन हमारी जो राष्ट्रभाषा है, आखिर उसकी उपेक्षा क्यों की जा रही है? उसे सम्मानित करने के लिए, प्रतिस्थापित करने के लिए हमें व्यवस्था करने की जरूरत है। जो लोग विदेशों से हमारे देश में आते हैं, उन्हें भी हिन्दी की शिक्षा देने की आवश्यकता है। उसके लिए मानव संसाधन विकास विभाग को चाहिए कि भिन्न-भिन्न कालेजों में इसकी व्यवस्था करें जिससे दूसरे देश से आकर रोजगार पाने वाले लोग हिन्दी का ज्ञान प्राप्त कर सकें। इससे हिन्दी का प्रचार-प्रसार पूरे देश और दुनिया में होगा।

इसे ४६ खंड़ों में रखा गया है। इसमें भिन्न-भिन्न खंडों के माध्यम से, विश्वविद्यालय की स्थापना से लेकर उसके कुलपति, उपकुलपति और विश्वविद्यालय के अनुशासन के संबंध में बताया गया है। यह विधेयक बहुत अच्छा है। मैं इसका समर्थन करता हूं। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

MR. CHAIRMAN: Hon. Members, there are many speakers left to participate in this discussion. Therefore, I personally request you to conclude your speeches at the most in four minutes each. Otherwise, we would not be able to take up other important items.

SHRI BRAJA KISHORE TRIPATHY (PURI): Sir, we should be allowed to use more time as two hours were allotted for discussion on this issue. We have not even taken one hour to discuss this issue. Hence, we can take more time for this legislation.

MR. CHAIRMAN: Certainly, we will try to accommodate all of you, but I was only mentioning the fact that a number of speakers are still left to speak on this issue.[r28] 

 

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, Sir, I stand here to discuss the English and Foreign Languages University Bill, 2006, that has been proposed by the Minister of State for HRD.

Wanted educated, highly skilled professionals in the age group of 25 and 40, country of origin no bar, preferably English speaking – this reads like a classified advertisement. You may not find such an advertisement anywhere in our country. But over the last five years, developed countries such as the United States, the United Kingdom, Canada and Japan have been putting out such advertisements, and India with its population has been answering that call in droves. Recently, countries like Australia, New Zealand and Ireland have joined in. 

By 2010, the demand for Indians will be at its peak. Why this hunt for young, skilled English knowing workers? Health care has improved, life expectancy has lengthened. But while people are living longer, it does not necessarily mean that they are working longer years. The worst part of it is, there are not enough young people taking their place in the workforce, especially in developed countries. The number of people aged sixty and over is growing faster. It has happened in Japan.

The United Kingdom today requires a larger base of younger working people, around 500,000, over the next five years. Given this demographic situation, our country with its higher percentage of population below 40 years becomes the perfect source. Though only ten per cent of the eligible age group gets a college education, in numerical terms that size numbers 72,30,000. That is the size of the Indian population that gets a college education. Another 1,30,000 Indian students pursue higher education in foreign lands. Today the challenge is to make them employable. An opportunity is at hand to spread throughout the developed world.

This reminds me of what Lord Macaulay propounded on 2nd January, 1835. He said, “…to create a class of persons Indian in blood and colour but English in taste, in opinions, in morals, and in intellect.” In the next sentence Lord Macaulay had stated, and this is more important, “To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from the Western nomenclature and to render them by degrees for vehicles for conveying knowledge to the great mass of population.”

In the years since our attainment of freedom, we have regained our self-esteem. Importantly, we have used the very language inflicted on us to compete with those who imposed it on us. That is the ultimate victory of the vanquished. There are more Indians today, around 350 million, who are cognizant of English than the people of the United Kingdom, for that matter the inhabitants of the United States also.[r29] 

            We can reach even greater heights undreamt of in the past.  Language is commerce today.  It is a free trade agreement of ideas and feelings.  That is why, when Thomas L. Friedman in his book `The World is Flat’ compares his journey to India with that of Columbus and states that Columbus began an unplanned journey to India but landed in America.  Mr. Friedman embarked upon a well-planned journey to India but arrived in America.  This is the impression Bangalore created on him.

            The English and Foreign Languages University Bill seeks to confer on it the status of a full-fledged Central University.  The responsibilities of the Central Institute have increased manifold and there is a requirement of greater autonomy to discharge their responsibilities.  It will become more accountable and  I hope will be more transparent in its functioning too.  This Central Institute of English and Foreign Languages has two regional centres – one at Shillong and another at Lucknow.  Other than teaching in English, it also has brought about a substantial improvement in the standards of teaching English. Post Graduate Courses in Arabic/German/French/Russian/Spanish are also imparted.  Even Japanese is being taught.  I would suggest that there is a need to introduce academic programmes in Chinese in due course of time, adequate faculty members may also join as this is going to be the only university in India which will cater exclusively to the teaching and learning of foreign languages.   Other than learning the language, disciplines should also be there to study their sociology, their history, their anthropology and their literature, etc.

 English is a global language but economic and demographic drivers of language use and spread are throwing up other languages such as Mandarin, Spanish and Arabic as well.  This also should be taken note of. 

            I would like to only mention that in Section 6, Sub-Section 11 of the Bill, a provision also is there to establish, with the prior approval of the Central Government,  such campuses, centres and specialized laboratories  or other units for research and instruction, within or outside India,  as are in the opinion of the university necessary for the furtherance of its objects.  This gives scope to the proposed university to set up centres in different parts of the country.  I would suggest that Orissa does not have a Central University till date.  A large number of students who have been taking admission in this Institute in the last 15 years have gone abroad.  They have been employed in different parts.  I would suggest that whenever you are thinking of expanding different Centres, a Centre can be thought of in Orissa because faculties are there and a number of other States can also take advantage.  Orissa should get the priority and accordingly a Centre can also be opened in Orissa.       This also should be taken note of.  I support this Bill, as this Institute was first started as a centre was converted into a deemed university, and now it is going to be converted into a Central University. 

SHRI C.K. CHANDRAPPAN (TRICHUR):  Sir, I congratulate the Government for bringing forward this Bill. It was started as an Institute under the Societies Legislation Act.  But the responsibility discharged by that university contributed greatly to the development of our country.  Probably because of that, in 1973, it was made as a deemed university. [r30] 

14.00 hrs.

Now it is being made a Central University.  While supporting this Bill, I would like to bring to your attention that since we are expanding our knowledge to different new horizons, which is again our requirement, we have to think in terms of setting up Central Universities for different purposes.  It is good that language and various other areas of education are covered.

            India is one of the biggest practicing democracy that exits in the world.  We claim it and the world accepts it also.  We do not have an institute to train the cadres for democratic practices.  We were discussing about the Panchayati Raj institutions and experiences of that.  We know that there are 6 lakh of panchayats in the country and probably if you take 12 Members, you can imagine several millions of panchayat members are elected ; one-third of them are women, quite considerable numbers are harijans and tribals.  I think they require some meaningful training so that they can contribute a great deal to the cause for which they are dedicating themselves.

            Since the Government is now thinking in slightly different terms – for the promotion of language you are instituting a Central University – my request will be why not consider setting up a Central University for training cadre for democracy which is one of the prime tasks in our country today.

            Chairman, Sir, you have suggested at the beginning of the discussion that there should be a Central University in Kerala.  There is a very reputed institution – if you just glance through the Panchayati Raj Report – a unique institute for training people in democracy in Kerala, Trichur, called KILA, Kerala Institute of Local Administration.  Probably one of the reasons why Panchayati Raj Administration in Kerala became more democratic, more accountable to people, more successful, is due to the contributions of this institute.  It is very significant because it trains almost everybody who is elected to various Panchayati Raj Institutions there.

            In this context, while supporting this Bill, I would like to make a request to you to consider that the Kerala Institute of Local administration, which is known as KILA, should be transformed into a Central University.  I hope this idea might be considered by the Government since the Government is now thinking in terms of setting up Central Universities for different purposes rather than normal proclaimed purposes.

            Regarding this Central University, I appreciate its evolution and the contributions that it has made.  It is today probably one of the big requirements, especially in the context of globalization, that we come to know the world and the world come to know about us more; that we must have more organized cadre for doing translation, not only translation of literature but also translation of scientific materials.[R31] 

            So, the Central Institute of English at Hyderabad should think in terms of setting up a faculty, especially with eminent people for having good training to be imparted for professional translators so that they could bring in a lot of wisdom from the world over and add to the credit of our country and to the University.

            These are the two specific suggestions I would like to make.  So, I hope while replying, the Minister would please express his ideas about the proposals which we are making so that the discussion will have some meaning.  I support this Bill.

                                                                                                           

PROF. M. RAMADASS (PONDICHERRY): Sir, I rise to support the English and Foreign Languages University Bill, 2006.  I think that the UPA Government is adding one more feather to its cap by passing this momentous Bill.  I congratulate wholeheartedly the hon. Minister of Human Resources Development for bringing this legislation today in the august House.

            I support this Bill because this Bill seeks to establish a central university consistent with the requirements of India today.  As many speakers have underlined, today India has become an integral part of the world and the employment of the people of India have to be found elsewhere.  Without the knowledge of English, it becomes impossible for people to move from one place to another. 

Today, English has become a global language.  In fact, the competition in the global economy will be related to the competition in our understanding of English and learning of English.  Therefore, the requirements for learning and research in English and foreign languages have increased.  The existing Central Institute of Foreign Languages in Hyderabad is unable to cope with the responsibility that is showered upon it due to the growing importance of English.  Hence there is an imperative need to convert that Institute into a Central University.  This Bill does precisely that.  Therefore, I support this Bill.

            This University will be funded by the Ministry of Human Resource Development.  It will provide for distance education.  It will try to bring a homogenous standard in teaching and learning English all over the country.  In fact, this is unique in character because for the first time we are establishing a Central University at the national level for developing English as well as other foreign languages.  The objects of the University are well laid down.  They are consistent with the modern policy of education as well as modern teaching of English and learning of English. 

           While approving this Bill, I wish to point out one or two lacunae in the Bill.  Clause 5 says that the objects of the University shall be to disseminate and advance knowledge by providing instructional research and extension facilities.  It leaves out training aspect.  Training has now become one of the important aspects of every university.  Therefore, training should also be an important objective of the University.

            Coming to the officers of the University, it includes everybody who are mentioned in the statute.  It leaves out the Chief Rector of the University.  Therefore, it should also be included.  The third important omission is that the Bill says that the constitution of the court as well as the constitution of the academic council will be as per the statutes of the university.  But when we look into the statute of the university, it is only the constitution of the Finance Committee that has been given.  But the constitution of neither the court  nor the Executive Council nor the Academic Council is mentioned.  It is left to the discretion of the Vice Chancellor concerned and it would provide for more arbitrariness in the constitution.[R32] 

            Unlike in other Central University Acts, for example, in the Pondicherry University Act, there is a constitutional provision in the statutes itself as to who will be the members of these bodies.  But in this Bill there is a conspicuous omission about the constitution of these three important authorities of the University. This aspect should be taken care of.

            With regard to the appointment of Chancellor, I would like to submit that in all the other Central Universities, the Vice President happens to be the Chancellor. The Chancellor is the Vice President of India. But in this case, the Government says that the Chancellor shall be appointed from a panel of these names.

MR. CHAIRMAN : In this Bill, the President is the Visitor.

PROF. M. RAMADASS : That is what I am saying. The President is the visitor. But the Chancellor normally happens to be the Vice President, but in this Bill… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: The Vice President is the Chancellor.

PROF. M. RAMADASS : In other Central Universities it is so. That is what I am saying. The Bill here does not provide for the appointment of the Vice President as the Chancellor. It may be better if he is made so and in that case the status of the University would be greater.

MR. CHAIRMAN: In this Bill, the Chancellor would be appointed by the President.

PROF. M. RAMADASS : It is proposed to be done by the Visitor from a panel of not less than three persons. What I say is that the Chancellor should be the Vice President of India. One sentence will do.

MR. CHAIRMAN:  You are suggesting amendments. It is not possible now because the Rajya Sabha has already passed it. We cannot make amendments now, then it will again have to go back to Rajya Sabha.

PROF. M. RAMADASS : Sir, I am only giving suggestions to maintain impartiality, fairness and objectivity in appointment etc.

            Sir, with regard to Dean of schools, there is a provision in the Schedule which says that even a Reader can be appointed as a Dean. It is not there anywhere in the Central University Act. At the best, a professor should be there, the senior most professor should be the Dean, failing which one Professor of the Department, or a Professor from  amongst the three Departments must be there.

            The Finance Officer of this University should preferably be from the Indian Audit and Accounts Service to maintain the accounts of the University in a proper manner. He should not be selected through a Selection Committee as has been contemplated in the University Act.

14.13 hrs.                              (Shri Giridhar Gamang in the Chair)

            Sir, another suggestion about the Finance Committee is that the court has to be given every year the annual accounts, but in this Bill the Government says that the annual accounts and the financial estimates of the University prepared by the Finance Officer shall be laid before the Finance Committee for consideration and comments and thereafter submitted to the Executive for approval. This leaves out the submission of accounts to the court, which is a very important omission in this Bill. It is because one of the powers of the senate or the court is to look into and peruse the annual accounts of the University. But in this statute the Government is precluding the possibility of the court having a perusal at the accounts of the University. This should be included. These are some of the glaring gaps in this Bill while it  may be filled up.

            Sir, I also like to know as to what foreign languages that are going to be given importance in this University. The Government should make the position clear. I would feel that the University should pay more attention to functional English, communicative English. Like the other Central Universities it should emphasize on the relevance in its education, quality in education and access should be there for students belonging to the OBCs, the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes. This language should be within the reach of the people who are downtrodden. It should not made the domain of higher echelous of the society. It should be made accessible to everyone.

            Sir, before I conclude I would like to say that today is a historic day as far as the English language is concerned because we are converting a Central Institute of English into a Central University. [R33] 

But Sir, you know that there is a Central Institute of Indian Languages.  It is an Institute for 18 Indian languages of which Tamil is a language which is made as a classical language.  For the development of Tamil, after declaring it as a classical language, the Government has created a Centre of Excellence for Classical Tamil at Mysore, set up of a Tamil Language Promotion Board, it has also said honouring and giving awards including international awards for Tamil scholars and linguistics and giving fellowships for research scholars conducting research in the field of classical Tamil.   Therefore, when Tamil has become a classical language and it is included in the Central Institute of Indian Languages, my only fervent appeal to the Minister is, when you are converting a Foreign Language Central Institute into a Central University, this Central Institute of Indian Languages should also be made a Central University of Indian Languages which will take care of all the needs of regional languages and the regional languages also need to be developed.  Unless regional languages are developed, the development of the people especially at the lower level will not be possible.

            With these comments, I commend the Bill and the House will approve of it.

                                                                                                                       

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री सुरेश वाघमारे (वर्धा):ºÉ£ÉÉ{ÉÉÊiÉ àÉcÉänªÉ,मैं इस सीट से बोलने की अनुमति चाहता हूं। मैं इस विधेयक का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। हमारे देश में इससे पहले अनेक विश्वविद्यालय स्थापित किए गए हैं, उनकी आवश्यकता और महत्व भी है। किंतु मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि इन विश्वविद्यालयों के निर्माण से पहले जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है, उसकी ओर सरकार द्वारा गौर करना आवश्यक है। जैसा पहले कहा गया हमारे यहां हिंदी विश्वविद्यालय की भी स्थापना की गई है लेकिन इसकी स्थापना के बाद वहां की स्थिति बहुत बुरी है। दो साल तक इस विश्वविद्यालय का काम दिल्ली से हुआ और हमें एक और विश्वविद्यालय की स्थापना करते समय, जिनकी पहले स्थापना की गई है, उनकी स्थिति में सुधार करने की तरफ ध्यान देना चाहिए। यहां अंग्रेजी और अन्य भाषाओं का विश्वविद्यालय बहुत आवश्यक है इसकी वजह से बेरोजगारों को रोजगार मिल सकेगा और देश की तरक्की भी होगी। लेकिन इसके साथ हमारी राष्ट्रभाषा का जो महत्व है, वह कम नहीं होना चाहिए। इस तरफ ध्यान देना बहुत जरूरी है। विश्व के अन्य देश अपनी भाषाओं पर गर्व महसूस करते हैं जबकि वे दूसरी भाषाओं का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं। हमने भी अपने देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया है, सरकार ने कई स्थानों पर जैसे बैंकों, प्रशासकीय व्यवस्था आदि में भी हिंदी को अपनाना जरूरी समझा है लेकिन आज भी इतने सालों बाद हम सही मायने में हिंदी को नहीं अपना पाए हैं। हम एक तरफ विश्वविद्यालय का सपना देखते हैं और दूसरी तरफ हिंदी को इस तरह से देखते हैं, यह सही नहीं है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए इससे पहले के जो भाषा विश्वविद्यालय हैं, उन्हें जरा ठीक ढंग से देखें और अमल करें तब ही हम आगे कदम बढ़ाएं। सरकार अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के विश्वविद्यालय की तरफ अग्रसर होती जा रही है लेकिन राष्ट्रभाषा हिंदी विश्वविद्यालय, जो वर्धा में बना है, उसकी ओर भी ध्यान देना चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि सभी भाषाओं के अध्ययन के साथ हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी का महत्व कम न हो, हमें इस ढंग से कारगर कदम उठाना होगा।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। आपने मुझे बोलने का समय दिया इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं।

 

 

DR. BABU RAO MEDIYAM (BHADRACHALAM): Mr. Chairman, Sir thank you very much for giving me this opportunity to speak on the Central Institute of English and Foreign Languages University Bill, 2006. 

            Now, this Institute is a deemed University and it is rendering a very good service for the development of the English language as well as other foreign languages.    In the status of the deemed university, it is spreading its services not only in teaching the language skills but also the spoken language, the vocabulary through All India Radio and other audio-visual media. It is spreading its lessons and those lessons are very simplified to transmit the ideas of the English culture into other parts of the non-English culture. 

            As we all know, language exists in two forms.  One is a spoken language of every language and the other is the written script.  Because of the 26 alphabets in English, this language is very easy to learn and for the requirement of all people, this is spreading like anything.  Though we call Hindi as a national language, but its spread is very limited because its script is in Devanagri and the spoken form is in other language.  But as far as English language is concerned, it is a very simple one. 

If you go into the history of our freedom struggle, our leaders then opposed the English language because of its authoritarian culture which was imposed on us.  But now, as a language, English is a very good language which is playing a vital role in trade and commerce and politics and in knowing the all modes of lives around the world. That is why, though it is late, I appreciate that the Bill to incorporate the deemed university into a full Central University is a very good step.  Now, the days are fast growing.   In the globalization scenario, we must learn the language very fast and for this purpose, this Bill will provide a good basis.  In the post-Independent India, along with the English now Chinese, Japanese, German, French, Spanish, Arabic etc., are also taught in the deemed university now and if it becomes a Central University, this will be more useful throughout our country.   There are provisions in this Bill.  Along with Lucknow and Shillong every institute can be recognized as an institute affiliated to this University.  So, likewise, I propose every State should have an institute to be recognized, to be affiliated with this CIEFL University.

Sir, I would like to suggest two or three suggestions.   At page number 11, please see clauses 35 and 36. In case of dispute among the employees in conditions of service of the employees and arbitration and disciplinary cases against the students, these two paras are proposing the same disciplinary action.  Here, I want to propose a separate arbitration machinery to deal with the disputes among employees and disputes among the student community. 

            At page 27, while maintaining the discipline amongst the students of the university, it is proposed here that Vice-Chancellor can impose, expel, rusticate and fine with an amount specified and can also debar. Along with these punishments, it is proposed that the examination taken can be cancelled.  Here, I want to suggest  that in the last para the words “examination can be cancelled” may be omitted from this Bill.

                Clause 31 of the Bill talks of the Acting Chairman of meetings. There are so many Committees and Bodies.  Of all these, in the absence of the elected Chairman, any member can be elected as the acting Chairman. So, I would suggest that this sentence can be re-framed by saying “except the first meeting of its formation.”  I say this because this will lead to avoiding the elected Chairman. That is why, I suggest that we should re-frame it like “except the first meeting of its formation”

            In page 28, Clause 37 deals with Students Council. 20 students are to be nominated by the Academic Council on the basis of merit in studies, sports, activities and all-round development of personality.  Here, I want to add cultural and literary activities can also be taken as the virtues to be elected to the Council.   Hence I support the Bill. 

                                                                                                                       

DR. SEBASTIAN PAUL (ERNAKULAM):  Sir, I support this Bill. When the world is shrinking into the unique    position of a global village, the importance of learning foreign languages has become all the more important. India’s evolution into a democratic republic would not have been possible without the introduction of English as the medium of instruction and as a language of learning. We have to thank, in fact, Lord Macaulay, in this regard. Today,  we have to learn English and other foreign languages in a more functional and meaningful way.

            In the age of information technology, English has become the  global language, the lingua franca of the cyber world. There are more English speaking people in India than the English speaking people in the land of English, that is, Great Britain. We can hear good English,  east of Suez, in India.  Hinglish, that is our English is overtaking the Queen’s English. The Hyderabad Institute, which has rendered  commendable service in the teaching of quality English is best suited to become a Central University.  I foresee  great future for this University which may become the world’s most important and famous centre of English and other languages. I also suggest that among those foreign languages, Arabic can also be given prominence and importance because we have great connection, link with the Arabian countries and so many of our young people are going to the Arabian  countries for earning their livelihood and  foreign exchange. 

            With these words and recommendation, I once again support this Bill.

                                                                                                                       

SHRI KIREN RIJIJU (ARUNACHAL WEST):  Sir, I rise to support the Bill called the Central Institute of English and Foreign Languages University Bill, 2006.

            I agree to all the proposals being made in this Bill but I would like to give some suggestions which, I feel, are important. While passing this Bill, the Government should consider all these points also.

            The background of foreign languages in India is very long and I do not want to dwell upon that aspect. But, at the same time, it has not been satisfactory as far as English language and other foreign languages are concerned. We need language with quality. Speaking a language is one thing but knowing thoroughly a particular language is another thing.[R34] 

            The quality of English and other foreign languages in India is not up to the mark. When the Government of India is talking about ‘Look East’ Policy, I feel that language is going to play a very important role in the policy formulated by the Government of India. Today, in the age of globalization, Mandarin language is going to play a very important role in determining the economic growth of a nation.

            Sir, today India has a large work force, but that is limited to English language. Of course, English is a priority in terms of the number of people speaking that language and its importance. I am coming from North East India. When we talk about the ‘Look East’ Policy and going towards South East Asian countries, we must also look into the development of the languages spoken in East Asia and South East Asia and also the quality of speaking of those languages. For example, our hon. Finance Minster Shri P. Chidambaram speaks very high quality English and I wish everybody speaks like him.

            Then, we should also give importance to other foreign languages like French, German and Japanese in our country. I would like to stress on the development of Mandarin, which is one of the most important Chinese languages, in India. In the United States and Europe, the number of students learning the Chinese language Mandarin is growing very fast, but we are not catching up and we are going to pay a very heavy price for this shortcoming. I wish the Government takes a very strong step towards the development of Mandarin in our country.

            As far as opening of institutes in North East is concerned, we don’t  have institutes like Jawaharlal Nehru University and others in some cities of India, but I would request that these should also be opened in the North Eastern Region which is going to be a very important economic hub of our nation. When we are setting up this institute in Hyderabad, I would request that due importance must be extended to Eastern India and North East. For example, my State Arunachal Pradesh is the gateway to Myanmar and China and so our State is very important.

            Lastly, one of our colleagues said with the setting up of this institute, our rashtrabhasha Hindi will be undermined. I do not think that stressing the importance of foreign languages would, in any way, undermine the importance of our rashtrabhasha Hindi.

            With these few words, I support every word of this Bill.

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (चायल): माननीय सभापति महोदय, मैं अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय विधेयक २००६ का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। जैसे अभी पूर्व सम्मानित सदस्य ने कहा कि यह बात सत्य है कि पूर्व में आदिकाल में, चाहे वह नालंदा या तक्षशिला विश्वविद्यालय हमारे यहां रहा हो, जहां तमाम विश्व से, अन्य देशों से लोग पढ़ने आते थे, आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए या पिछले वाले में देखा जाए तो ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी का अपना एक अलग महत्व है। जहां पर १७००० वभिन्न देशों के छात्र आज भी पढ़ते हैं और वहां की प्रतिभा कितनी जबरदस्त है। वहां का एजुकेशन इतना अच्छा है कि आज पूरे विश्व को कम से कम २५ प्राइम मनिस्टर उस ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी ने दिए हैं। इस प्रकार से जिस मंशा को लेकर माननीय मंत्री जी इस विधेयक को यहां लेकर आए हैं, उसमें हमारी मंशा भी पूरी होनी चाहिए।[rep35] 

हमारी मंशा भी इसमें पूरी होनी चाहिए कि अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय विधेयक, २००६ की स्थापना हैदराबाद में कर के उसकी एक शाखा शिलांग एवं एक शाखा उत्तर प्रदेश में खोली जा रही है। इसका मैं स्वागत और समर्थन करता हूं। जहां तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बात है, अभी एक सम्मानित सदस्य ने कहा कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय को भी केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया है, यह बहुत अच्छी बात है। मुझे याद है कि पहले से ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तमाम भाषाओं का पठन-पाठन होता है और हमारे बहुत से ऐसे छात्र हैं जो वहां से आई.एफ.एस., आ.ए.एस. या आई.पी.एस. कर के निकले हैं और देश तथा विदेशों में नौकरियां कर रहे हैं। जैसे अभी कुछ सम्माननीय सदस्यों के विचार आए, इस विश्वविद्यालय के खुलने से देश के बहुत से छात्रों को विदेशी भाषाएं सीखने को मिलेंगी। हमारे छात्र क्षेत्रीय भाषाएं एवं अंग्रेजी जानते हैं, लेकिन इस विश्वविद्यालय के माध्यम से अन्य भाषाओं का ज्ञान भी प्राप्त कर सकेंगे और उसे प्राप्त करने के बाद विदेशों में अपने दूतावासों में अथवा अन्य दूतावासों में रोजगार प्राप्त कर सकेंगे। इसलिए सरकार के इस कदम का हमें स्वागत करना चाहिए।

महोदय, मैं निवेदन करना चाहता हूं कि सरकार को इस कदम को रोजगार-परक बनाना चाहिए। इस शिक्षा को रोजगार से जुड़ी हुई शिक्षा के रूप में दिया जाना चाहिए, जिससे छात्र पढ़कर निकलें और उन्हें विदेशों में अथवा अपने देश में तुरन्त रोजगार मिल जाए। अभी यहां अपने देश और विदेश की बात कही गई। यह बात सत्य है कि हिन्दुस्तान के लोग आज भी विदेशों में बड़ी तादाद में हैं। हमारे सम्माननीय सदस्य श्री कैलाश जोशी जी यहां उपस्थित हैं, उन्हें मालूम होगा कि जब हम विदेश यात्रा के दौरान बहरीन बेस पर थे, तब वहां पूवार्ंचल के बहुत लोग थे और वे भोजपुरी बोल रहे थे। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के भी बहुत लोग थे। विदेशों में बहुत अप्रवासी भारतीय हैं। हम ग्रीस गए थे। वहां भी करीब ३२ हजार की संख्या में भारतीय हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वे वहां की लोकल भाषा नहीं जानते हैं और उनमें ज्यादातर पंजाब के लोग हैं। वहां की लोकल भाषा नहीं जानना उनके लिए एक बड़ी समस्या है। यहां इस प्रकार की भाषाएं सीखने की सुविधा मिलेगी जिससे उन भाषाओं को लोग सीख सकेंगे तथा जिन देशों के साथ हमारे आपसी संबंध अच्छे हैं और उन देशों में रोजगार के अवसर प्राप्त कर सकेंगे। मैंने देखा है कि हमारे यहां के लोग जब विदेशों में जाते हैं, तो हिन्दी बोलने में शर्माते हैं।

            महोदय, जब १९८५ में मैं उ.प्र. विधान सभा का सदस्य था, तब मैंने देखा कि एक रशियन डेलीगेशन भारत आया था। उसमें वहां के कल्चरल एवं सांस्कृतिक मंत्री भी थे। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने एक भी शब्द अंग्रेजी में नहीं बोला। वैसे उनके साथ कई दुभाषिए थे और उनकी बातों का अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में इंटरप्रिटेशन हो रहा था, लेकिन उन्होंने सभी भाषण एवं बातें रूसी भाषा में कहीं, अंग्रेजी में एक शब्द भी वे नहीं बोले। अब सवाल यह है कि अगर हमारे यहां के लोग विदेशों में जाते हैं, तो वे अपनी भाषा हिन्दी बिलकुल नहीं बोलते। संपूर्ण बातचीत अंग्रेजी में ही करते हैं। हिन्दी बोलने में शर्माते हैं। जो लोग अंग्रेजी जानते हैं, वे अंग्रेजी में बोलकर अपने को सुपीरियर समझते हैं और अंग्रेजी बोलना अब एक फैशन जैसा हो गया है। अब जब हम अन्य भाषाओं को प्राथमिकता देने जा रहे हैं, तो जरूरत इस बात की है कि अपने देश में हिन्दी को प्राथमिकता देकर इसे देश की प्रथम भाषा घोषित करें और कड़ाई से लागू कराएं। हिन्दी बोलने वालों को हर क्षेत्र में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

महोदय, मैं अन्त में ज्यादा न कहते हुए सिर्फ इतना कहकर ही अपनी बात समाप्त करता हूं कि जो सुझाव मैंने दिए हैं, मैं चाहूंगा कि सरकार उन पर विचार करे और उन्हें लागू कराए। मैं इस बिल का पुरजोर समर्थन करता हूं।

SHRI TATHAGATA SATPATHY (DHENKANAL): Sir, I stand today to discuss the Central Institute of English and Foreign Languages University Bill, 2006. 

            As is evident from this Bill, it is already a fait  accompli, as it has already been passed in the Rajya Sabha. We cannot even bring amendments. It mostly goes into the administrative part of this Institute not outlining what vision has gone behind this move to change this Institute from a mere institute or a society into a Deemed University in 1973 and now a proper University in 2006.  It is very well known that our level of education is low.  It is not that English is not taught in our schools.  It is taught in our schools; it is taught in our colleges.  In most Universities and Colleges, the language of education is English.  Yet, we find today that our youths in this country are unable to express themselves in any language.  Forget English, if in their own mother tongue they write something, they are not able to read their own handwriting.  When English is taught, it is taught in such a bad manner, in such a haphazard manner that there is no comprehension between the language that is spoken and what is intended.  What this Bill does not project is this.  Although huge amounts of money will be spent for this University, it does not say what qualifications the teachers or the instructors need to have to become faculty in this University.  Will they be like the teachers of other schools and colleges or they will be teachers with special merit? What is required is to teach the teachers first how to teach a language.  We have the Language Committee of Parliament which goes around the country, goes around to all the Offices including establishments that do research in this country.  It forces them that they do everything in Hindi, and they make a joke out of it. There is a little blackboard in all these Offices and one single word in Hindi will be written in it, and it will be said: “Today’s word in Hindi…” and English will be given; like “Thank You” and below that it will be written: “Dhanyavad”.  What are we trying to say?  We are trying to say that everybody knows English and through English we learn Hindi.  These moves seem very irrelevant and childish to me because they do not seem to hold much water.

            Hyderabad will be the seat of this University and they will have branches in Shillong and Lucknow, which is welcomed.  But, I would like to draw attention to clause 6, sub-Section X and XI where it says that this University can expand.  Thought could be given to expand the horizon so that people from all parts of the nation could benefit from such Institutes of higher learning.

            Chairman, Sir, I would like to speak about your home State. I like your home State very much.  Orissa has consistently helped in augmenting the wealth of this country.  It has done so in the past. In the shape of freight rationalization, it is doing so right now whether it is the pet project of some very big and powerful people here setting up industries in Orissa exploiting our mines and mineral wealth, but per se if we see the State, nothing has been done for the State.  The Prime Minister when he visited Orissa recently said that instead of National Institute of Science (NIS), an IISER would be set up in Orissa which would definitely be an institute of higher learning, which would benefit the people of that State, not only that State – it would not only be limited to that geographical boundary – it would benefit that whole part of India.  But, alas, nothing of the sort has happened; no move has taken place as of now.  As a return gesture, I think, Orissa deserves to be counted in.  When you are thinking of such an Institute in Hyderabad, you should also think of an IISER or a Language Institute in Orissa which can help the people of that State. 

            Now, what this Government has to think is this.  With our huge population, we always say that we have the workforce which is predominant in number.  Everybody admits that our workforce is incapable.  It is no longer considered that setting up an industry in India will give you a cheaper workforce because of inefficiency and because of inability to work properly on time and to meet the deadlines.  Therefore, we have to train our workforce and we have to enable them.  Language will be one major way by which you can expect our workforce to become stronger, more able and more competitive at an international level.

            We have to recognize that although many Indians speak English, most of our teachers and accordingly students have no control over that language and thus deprived of this benefit, poor students in India remain non-competitive in the corporate sectors such as hospitality business.

            Sir, it is said that Hindi is important.  Of course, we respect Hindi but Hindi alone cannot solve all the problems of our country.  It is just one language.  All languages are equally important and have to be respected equally.  Sir, my language and your language, Oriya is not a derivative of Sanskrit as many would like to think.  It is a derivative of Pali.  Being an ancient language, you need to develop that language also as a source of communication.

            Sir, I come to my last point.  In conclusion, I can say that although English would be taught in this Institute, it is no where mentioned in this Bill as to what other languages are going to be taught in this Institute.  So, to enable the future generation of Indians, young boys and girls to be competitive in the international market, we have to teach them Spanish, French, Mandarin, and Japanese and Arabic also because our hon. Members from Kerala know that their voters go to Dubai, Bahrain and Qatar.  So, let us have Arabic also.  But these things have to be specified.  This is just an administrative piece of paper as to who will do what.  I think, this needs a re-think.

           

SHRI VIJAYENDRA PAL SINGH (BHILWARA): Sir, I stand here to support the English and Foreign Languages University Bill, 2006. It is a Bill to establish and incorporate a teaching University for promotion and development of English and other foreign languages and their literature and to provide for matters connected therewith or incidental thereto. 

            Sir, let me start by saying that if there was a divide in India, it was over a language.  The North South divide was definitely there.  It has really come in this age as that divide really has become minimal, and the reason is that if South was doing very well, South has come up because of English language, and this realisation has come to the North a little late. 

            There were always the public schools with English medium.  Now, I can say that even in the villages today in the North where it was predominantly taught in Hindi language.  Even in my small village, there are two English medium schools and they are preferred to the Government schools.  This is what India is all about.  If I can say so, the advantage that India has over China is this.  People always talk about the race between the dragon and the elephant. [R36] 

            The elephant is doing better than the dragon.  It is the English language.  May I also say that if there is a computer language so far in the world, is it due to the English language?  That advantage has definitely been with us.

            I  remember, when I was in Japan, I was fortunate to meet their Ex-Prime Minister.  When  he was talking about the Information Technology, he said that there is a definite advantage that India has.  I call IT not as ‘Information Technology’, but as ‘India Technology’.

            May I say that though this Bill has come belatedly, I feel that it is in the right direction?  This Bill has been brought  in, I would make it amply clear, is not at the cost of Hindi, at the cost of the regional languages.  It is how we can really promote India to become a Super Economic Power.  As very rightly put-forth by Goldman Sachs that ‘India is on its way to become an Economic Power in 2025;  and by 2050, India, China and America will be Super Economic Powers.’  This Bill will pave the way for this to happen.  It will give us a big boost.

सभापति महोदय :अब आप समाप्त कीजिए।

gÉÉÒ ÉÊ´ÉVɪÉäxp {ÉÉãÉ É˺Éc  :+ÉÉ{É ¤ÉÉÒSÉ àÉå <iÉxÉÉÒ ¤ÉÉ® ¤ÉÉäãÉåMÉä iÉÉä àÉé ÉÊcxnÉÒ àÉå ¤ÉÉäãÉxÉä ãÉMÉÚÆMÉÉ*…(व्यवधान) 

सभापति महोदय :  आप लम्बा भाषण मत कीजिए।          

gÉÉÒ ÉÊ´ÉVɪÉäxp {ÉÉãÉ É˺Éc  : आप मुझे थोड़ा सा समय दीजिए। अभी हमारी पार्टी के पांच मिनट बाकी हैं।…(व्यवधान) 

            Sir, I shall  also like to put-forth that the technology today has advanced so much that we need to really give a boost to this language. But as I say that in  this Bill, we have talked about the English language, not given importance to other foreign languages, which we must do in some way or the other. 

            In every European country, it is compulsory for their students  that they must learn two foreign languages. Therefore, Sir, if that is compulsory in all the European countries, I feel that it is very important that along with English, all other languages, which are also very important, greater stress and importance should be given.  That must also reflect in this Central Institute of English and Foreign Languages University Bill, 2006.  It should not be just English because we speak good English; we have been speaking good English; we speak better English than most of the European countries.  But at the same time, let us also learn Chinese and Japanese.    Those countries and their languages are also very important for us.

            With these few words, I conclude.

           

                                                                                                                       

 

gÉÉÒ ¥ÉVÉä¶É {ÉÉ~BÉE (=xxÉÉ´É) : सभापति महोदय, मैं आपको धन्यवाद ज्ञापित करना चाहता हूं कि अंग्रेजी और विदेशी भाषा के लिए जो अलग से विश्वविद्यालय बनाया जा रहा है, ऐसे बिल पर अपने विचार व्यक्त करने के लए आपने मुझे मौका दिया। मैं इस बिल का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं, लेकिन इसके साथ-साथ अपने विचार भी रखना चाहता हूं। वैसे तो सामान्यत: जब हमारा देश आजाद हुआ. हमारे देश के नौजवानों ने आजादी के लिए प्राणों की बाजी लगाकर हिन्दुस्तान को आजाद कराने का काम किया। भारतीय संविधान की रचना हुई, हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े विद्वानों ने सर्वसम्मति से तय किया कि हिन्दी भाषा हिन्दुस्तानभर की राष्ट्र भाषा होगी।  इसे राजभाषा का सम्मान दिया गया और हिन्दुस्तान के कोने-कोने में हिन्दी की आवाज बुलंद की गयी। लेकिन आज हमारे देश को आजाद हुए ५० वष्र्ष से अधिक हो चुके हैं। हिन्दी राजभाषा तो जरूर है, लेकिन वह कागज तक सीमित है। आज भारत सरकार और राज्य सरकारों में हिन्दी सप्ताह मनाया जाता है। हिन्दी को प्रमोट करने की बातें चलती हैं, लेकिन जब कानून बनाकर किसी चीज को लागू करने की बात आती है, तो यहां अंग्रेजी हमें पछाड़ने का काम करती है। हमारे देश में हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना पंडित मदन मालवीय जी ने वाराणसी में की, जो उत्तर प्रदेश में है। लेकिन दुर्भाग्य है कि हिन्दी को बढ़ावा देने वाले लोग, हिन्दुस्तान में हिन्दी को मजबूत देखने वाले कहां चले गये, कहां चली गयी उनकी विचारधारा? हमें तो ऐसा महसूस होता है कि हिन्दुस्तान की आजादी के बाद विदेशी लोगों का कर्जा खाते-खाते हमारी बुद्धि विदेशी लोगों की तरफ बढ़ती जा रही है।…(व्यवधान) 

माननीय मंत्री जी, यह हंसने का कतई बात नहीं है। आज वैश्वीकरण का युग है। संचार माध्यमों ने देश की सीमाएं बढ़ा दी हैं। पूरा विश्व एक पैमाने पर आ गया है। यह बात सही है कि अंग्रेजी भाषा पूरे विश्व के पैमाने पर बोली और समझी जाती है। लेकिन मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि क्या अंग्रेजी जाने बिना कोई देश प्रगति नहीं कर सकता? क्या जापान, कनाडा, चाइना ने प्रगति नहीं की? अभी हमारे साथी चर्चा कर रहे थे कि कई ऐसे देश हैं जो औद्योगिकरण के युग में लगातार कम्पीटिशन में आगे जाने का काम कर रहे हैं। चाइना ने पूरे विश्व में अपनी ताकत और लेबर की बदौलत अपनी धाक जमायी। हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े उद्योगपति भी चाइनीज प्रोडक्ट्स से थरथर्रा रहे हैं। इस संबंध में, मैं उत्तर प्रदेश का उदाहरण देना चाहता हूं कि कानपुर और उन्नाव के बाजारों में जब चाइना की चप्पल आयी, तो उन्नाव में चमड़े के कारीगर जो हैं, प्लास्टिक की चप्पल बनाने वाले कारीगर हैं, उनकी दुकानों के शटर गिरने का समय आ गया। चाइना में अंग्रेजी नहीं है। वहां केवल चाइनीज और लोकल लैंग्वेंज बोली जाती है।

हम माननीय मंत्री जी का ज्यादा समय नहीं लेना चाहते। वे हमारे साथी हैं। सदन का सम्मान करते हुए, अपने दिल की भावना को व्यक्त करते हुए मैं कहना चाहता हूं कि अंग्रेजी भाषा बढ़े, लेकिन हिन्दी की कीमत पर अंग्रेजी का बढ़ना कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अंग्रेजी हमारी मजबूरी है क्योंकि हमें विदेशों में अपनी बात को रखना है। विदेशों मंच पर अपनी संस्कृति को, अपने उद्योगों की प्रगति को मजबूती के साथ रखना है, इसलिए हमें अंग्रेजी भी सीखनी है। लेकिन अंग्रेजी ऐसी हो, जो गुणवत्ता के साथ हो। हमारे कई साथी अंग्रेजी बोलते हैं। मैं अंग्रेजी नहीं बोलता, लेकिन हम कहते हैं कि अगर अंग्रेजी बोलनी है, तो उसमें व्याकारण का ध्यान रखा जाना चाहिए । इसलिए विश्वविद्यालय की स्थापना हो रही है। टूटी-फूटी अंग्रेजी से बोलने से अपनी मातृभाषा बोलना ज्यादा अच्छा है। मातृभाष्षा में कोई बात कहने में बुराई नहीं है।

मैं माननीय मंत्री जी, संसदीय कार्य मंत्री और वित्त मंत्री को धन्यवाद ज्ञापित करना चाहता हूं क्योंकि उन्होंने बड़े गौर से मेरी बातें सुनीं। हिन्दी को सम्मान देते हुए, मैं इस बिल का समर्थन करता हूं।

 

श्री मोहम्मद अली अशरफ़ फ़ातमी : आज बड़ी खुशी का दिन है। मैं कोई चार मर्त्तबा से एमपी हूं। मैंने बहुत सारे बिल को सदन में पास होते हुए देखा है, लेकिन जितना समर्थन सभी तरफ से इस बिल को मिला है, वैसा बहुत कम देखने को मिला है। मैं समझता हूं कि तालीम के मामले में, शिक्षा के मामले में शायद पूरा हिन्दुस्तान एक है। जितनी शिक्षा हम ले सकें, वही दुनिया में तरक्की का रास्ता है। अगर तालीम की चाभी, शिक्षा की चाभी हमारे पास रहेगी, तो दुनिया की हरतरक्की का दरवाजा हम उससे खोल सकते हैं। आज की इस खास डिबेट में १६ सांसदों ने भाग लिया है। मैं उन सबका शुक्रिया अदा करता हूं। सभी ने इस बिल का समर्थन किया, इसके लिए भी हम उनका शुक्रिया अदा करते हैं।

जिस समय हिन्दुस्तान आजाद हुआ, उस समय सिर्फ २० यूनीवर्सिटीज हुआ करती थी। आज बड़ी खुशी की बात है कि हिन्दुस्तान में तकरीबन ३५७ यूनीवर्सिटीज हैं। जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ, उस समय पूरे हिन्दुस्तान मे स्टेट और सैंट्रल यूनीवर्सिटी मिलाकर २० यूनीवर्सिटीज हुआ करती थीं। लेकिन आज इस बिल से पहले २० सैंट्रल यूनीवर्सिटीज, उस जमाने में यानी १९४७ में ५०० कालेज थे, आज खुशी की बात है कि हिन्दुस्तान में १८००० कालेजेज हैं और तकरीबन १०५ लाख स्टूडैंट्स उसके अंदर तालीम हासिल करते हैं।

 15.00 hrs.

तकरीबन ४.७२ लाख हमारे टीचर्स वहां पढ़ाते हैं, लेकिन यह सब होने क बावजूद भी आज अगर आप हायर एजुकेशन में इन्वाल्वमेंट देखें तो यह मात्र ८.१४ प्रतिशत है। इसलिए अब हमें जो भी कदम हमें उठाना है, आगे की तरफ बढ़ना है ताकि हम जो दुनिया की जरूरते हैं, उनको पूरा कर सकें। यही वजह है कि अगर आप इतिहास में जाएं तो जब वर्ष १९५८ में यह इंस्टीटयुट खुला था, तो उसका नाम सेन्ट्रल इंस्टीटयुट ऑफ इंगलिश रखा गया था। हमारे साथी मोहन सिंह जी इस समय सदन में नहीं है, उन्होंने कहा कि इसमें इंगलिश शब्द क्यों रखा गया है। मैं बताना चाहूंगा कि अगर हम इसका इतिहास देखें तो यह एक इंगलिश इंस्टीटयुट के रूप में शुरू हुआ था। वर्ष १९७२ में इसे सेन्ट्रल इंस्टीटयुट ऑफ इंगलिश एण्ड फॉरेन लैंग्वेजेज नाम दिया गया, लेकिन तब भी यह इंस्टीटयुट की ही शक्ल में बना रहा। यूजीसी एक्ट, १९५६ के सेक्शन ३ के तहत वर्ष १९७३ में इसे डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया। बहुत से माननीय सदस्यों ने यह जानकारी चाही है कि आखिर इस संस्थान में केवल अंग्रजी ही क्यों पढ़ाई जाती है, इसके बारे में मैं कहना चाहता हूँ कि ऐसा नहीं है। वहां अभी भी अरेबिक, फ्रेंच, जर्मन, जैपेनीज, रशियन और स्पेनिश लैंग्वेजेज पढ़ाई जा रही हैं। जहां तक माननीय सदस्यों का यह प्रश्न है कि क्या इसमें लैंग्वेजेज की संख्या बढ़ाई जा सकती है या नहीं, उसके बारे में मैं कहना चाहता हूँ कि इस बिल में प्रावधान है कि यूनिवर्सिटी इस बात के लिए आजाद है कि वह किस तरह के कोर्सेज चलाना चाहती है, कौन-कौन सी लैंग्वेजेज पढ़ाना चाहती है। वह डिमाण्ड के हिसाब से इन लैंग्वेजेज की संख्या को बढ़ा सकती है। यहां पर कहा गया है कि क्या वहां ट्रेनिंग के लिए भी इंतजाम होगा, उसके बारे में मैं यह कहना चाहूंगा कि इसमें टीचर्स की ट्रेनिंग का प्रावधान किया गया है। दरअसल इस इंस्टीटयुट को यूनिवर्सिटी बनाने की जरूरत इसलिए हुई कि इसका दायरा बढ़ाया जा सके। आज हमारे पास इस इंस्टीटयुट के केवल दो कैम्पसेज, एक लखनऊ में और दूसरा शिलाँग में हैं। जैसा कि उड़ीसा से मांग आई और कई अन्य माननीय सदस्यों ने कहा है कि इसका एक्पैंशन होना चाहिए, तो अब यूनिवर्सिटी को यह अख्तियार होगा कि वह डिमाण्ड के हिसाब से हिन्दुस्तान के किसी भी हिस्से में अपने कैम्पसेज खोल सके। इसीलिए आज इसे ज्यादा ताकत देने की जरूरत महसूस की गयी। यूनिवर्सिटी बन जाने के बाद इस संस्था में पार्लियामेंट का दखल होगा। जब यह यूनिवर्सिटी बन जाएगी तो प्रेजिडेण्ट ऑफ इंडिया इसके वजिटर होंगे और आप में से कोई भी माननीय संसद सदस्य यहां खड़े होकर इस यूनिवर्सिटी के बारे में जानकारी मांग सकेंगे। यह बात सही है कि आज वहां विद्यार्थियों की जो संख्या है, उनमें सिर्फ ३०० छात्र मास्टर डिग्री और पीएचडी प्रोग्राम्स में हैं, सिर्फ ७०० स्टुडेंट्स डिस्टेंस मोड में है और ६५० स्टुडेंट्स मुख्तलिफ किस्म के सर्टफिकेट और डिप्लोमा कोर्सेज में पढ़ाई कर रहे हैं। मैं समझता हूँ कि जब यह यूनिवर्सिटी बन जाएगी तो इसका एक्सपैंशन बड़े पैमाने पर हो सकता है। आज जो रिक्वायरमेंट है, आज ग्लोबलाइजेशन का युग है, आज दुनिया में मुख्तलिफ जगहों से हमारा कारोबार होना है, खास तौर से आईटी के क्षेत्र में, तो हमें मुख्तलिफ जुबान जाननी चाहिए, उस पर हमारा अधिकार होना चाहिए। यह यूनविर्सिटी बन जाएगी तो उन सारी रिक्वायरमेंट्स को हम पूरा कर सकेंगे।

मैं यह बताना चाहूंगा कि इसमें स्टार्टिंग में ४.७ करोड़ रूपए नॉन-रिकरिंग एक्सपेंडिचर आएगा और ११ करोड़ रूपए पर-एनम रिकरिंग एक्सपेंडिचर आएगा। आप जानते हैं कि इस बिल को राज्यसभा ने पास कर दिया है और यहां मैं समझता हूँ कि एक तरह से यूनानमिटी है, कहीं कोई मुश्किल नहीं है। यहां पर माननीय सदस्यों द्वारा उठाए गए चन्द बिन्दुओं के बारे में मैं क्लियर करना चाहता हूँ। जैसा कि रामदास साहब ने कहा कि कोर्ट एवं एक्जीक्युटिव काउंसिल का इसमें जिक्र नहीं है। इसके लिए यूनिवर्सिटी को इसके लिए शक्ति दी गयी है कि वह फस्र्ट स्टैटयुट को अमेंड करके यह फैसला करे कि उसकी एक्जीक्युटिव काउंसिल किस तरह की होगी। [H37] 

इस वक्त यहां पर मोहन सिंह जी [R38] नहीं हैं, उन्होंने और रासा सिंह रावत जी ने वर्धा में हिन्दी की युनिवर्सिटी के बारे में जानकारी मांगी थी। मैं उसके बारे में जानकारी देना चाहता हूं कि प्रो. बपिन चन्द्र जी के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई थी। उस कमेटी ने अपनी फाइंडिंग्स मंत्रालय को दे दी हैं। हम यूजीसी से बात करके जो भी कदम उस सम्बन्ध में उठाने हैं, वे शीघ्र उठाने का काम करेंगे।

यहां पर चांसलर के बारे में भी कहा गया। मुखतलिफ जगहों पर मुखतलिफ इंतजाम हैं। इस युनिवर्सिटी के लिए जो दरकार होगी, उसे देखकर किया जाएगा। वजिटर तो प्रेजिडेंट ऑफ इंडिया ही होंगे।

जहां तक राजस्थान और केरल में सेंट्रल युनिवर्सिटी खोलने की मांग की गई है, मैं उसके बारे में कहना चाहूंगा। हम लोग चाहते हैं कि हर राज्य में सेंट्रल युनिवर्सिटी का दर्जा मिले, लेकिन अभी वह हमारे विचार में है। जितना पैसा मिलेगा, हम लोग उस हिसाब से काम करेंगे। यहां पर वित्त मंत्री जी मौजूद हैं, आप इनसे पैसा दिला दें, फिर कोई कमी नहीं रहेगी।

डिस्टेंस मोड में भी तालीम की व्यवस्था है। उसका आगे चलकर और एक्सपेंशन किया जाएगा। इसके अलावा मैं कहना चाहता हूं कि माननीय सदस्यों के दिलों में जो भी आशंकाएं इस बिल के बारे में हैं, वे बेफिक्र रहें। जब कभी आप महसूस करेंगे कि यह युनिवर्सिटी या अन्य कोई युनिवर्सिटी सही तौर पर काम नहीं कर रही है, तो आपको पूरी आजादी है कि आप संसद में उसे उठा सकते हैं। उनका जवाब देने के लिए सरकार बाध्य होगी और जो भी मुमकिन होगी, वह हम काम करेंगे।

इन चंद शब्दों के साथ मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि इस बिल का सदन में सभी पक्षों द्वारा समर्थन किया गया है इसलिए इसे अब पास किया जाए।

MR. CHAIRMAN: The question is:

“That the Bill to establish and incorporate a teaching University for promotion and development of English and other Foreign Languages and their Literature, and to provide for matters connected therewith or incidental thereto, as passed by Rajya Sabha, be taken into consideration.”

 

The motion was adopted.

MR. CHAIRMAN: The House will now take up clause-by-clause consideration of the Bill.

            The question is:

“That clauses 2 to 46 stand part of the Bill. ”

 

The motion was adopted.

Clauses 2 to 46 were added to the Bill.

The Schedule, Clause 1, the Enacting Formula, the Preamble and the Long Title were added to the Bill.

 

MR. CHAIRMAN: Now, the hon. Minister may move that the Bill be passed.

SHRI M.A.A. FATMI : I beg to move:

“That the Bill be passed.”

 

MR. CHAIRMAN: The question is:

“That the Bill be passed.”

 

The motion was adopted.

 

____________

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes:

<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *