Judgements

Further Discussion On Resolution Regarding Formulation And … on 16 March, 2007

Lok Sabha Debates
Further Discussion On Resolution Regarding Formulation And … on 16 March, 2007

Title: Further discussion on resolution regarding formulation and implementation of Comprehensive Food and Nutrition Security Scheme aiming at total eradication of hunger from the country moved by Shri Navin Jindal on the 15th December, 2006.

श्री नवीन जिन्दल (कुरूक्षेत्र): सभापति महोदया, मैं प्रस्ताव करता हॅँू कि यह सभा संकल्प करती है कि सरकार देश से पूरी तरह से भुखमरी व कुपोषण को मिटाने वे लिए एक व्यापक खाद्य और पोषण सुरक्षा योजना तैयार करे और उसे लागू करे।

महोदय, सबसे पहले १५ दिसंबर, २००६ को इस महत्वपूर्ण विषय पर प्रस्ताव लाया गया था, मगर कुछ कारणवश इस पर चर्चा स्थगित करने का निर्णय लिया गया। आज इस विषय पर यह चर्चा मैं फिर से आरंभ कर रहा हूँ। आजादी वे छ: दशक वे बाद जब देश वे कुछ चुनिंदा लोग नयी दूरसंचार क्रान्ित, कृषि क्रान्ति, औद्योगिकीकरण आदि की बातें कह रहे हैं, ऐसे में देश वे कुछ भागों में हमारे भाई-बहन भुखमरी का जीवन जी रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र और हमारी आर्थिक समृद्धि पर यह प्रश्न चिन्ह लगा देता है। पंचवर्षीय योजना और बीस सूत्री कार्यक्रमों के माध्यम से इससे निजात पाने का प्रयास शुरू से जारी है। आज भी यूपीए सरकार इस दिशा में प्रयत्नशील है। भारत के दूसरे प्रधान मंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी ने, जब देश अनाज की कमी से जूझ रहा था, तब उन्होंने एक दिन के उपवास का संकल्प देशवासियों के सामने रखा था। उसके उपरांत हमारी दूरदर्शी प्रधान मंत्री स्वर्गीय प्रियदर्शनी इन्दिरा गांधी जी ने अनाज में आत्मनिर्भरता के लिए जो कुछ किया, वह इस सदन से छिपा नहीं है। ठीक उसी तर्ज पर आज राजनैतिक द्ृढ़ इच्छाशक्ति से इस सदन को भूख और कुपोषण जैसे चिंतनीय विषय पर एकमत होकर उन सुझावों पर गौर फरमाना होगा, ताकि सोने की चड़िया कहलाने वाले मेरे भारत में कोई मेरा भाई-बहन भूखा न सोए और न ही कोई भूखा रहे। इस विषय पर श्रीमती विजया लक्ष्मी पण्डित जी ने जो शब्द यूएनओ में कहे थे, वे मुझे याद आ रहे हैं – Democracy means nothing to those who have nothing to eat.

आज यह सदन जिस विषय पर चर्चा करने जा रहा है, उसका सम्बन्ध देश के सबसे गरीब तबके से है। सभी माननीय सदस्य इस बात से सहमत होंगे कि आज के परिवेश में हर व्यक्ति की प्रमुख आवश्यकता रोटी, कपड़ा और मकान होती है। इन सबमें भी दो वक्त की रोटी सबसे जरूरी है। हमारा भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां करीब ६५ प्रतिशत लोग आज भी कृषि पर निर्भर हैं। यह भी एक कटु सत्य है कि हमारे देश में लाखों लोग भरपेट भोजन नहीं कर पाते। वास्तव में भूख कैंसर और एड्स से भी ज्यादा गम्भीर बीमारी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की रिपोर्ट के अनुसार विश्व की कुल जनसंख्या ७०० करोड़ में से करीब ८५ करोड़ लोग रोटी और पौष्टिक आहार से आज भी वंचित हैं। इसमें से २२ करोड़ से अधिक लोग भारत में कुपोषण का शिकार हैं, जबकि चीन में यह आंकड़ा करीब १४ करोड़ का है। विकासशील देशों में कुपोषण और भूख से मरने वालों की संख्या में, १९९० से १९९२ तक के मुकाबले, हालांकि आज गिरावट आई है, फिर भी भूख और कुपोषण दुनिया में सबसे अधिक लोगों की जान लेता है। श्री अमत्र्य सेन के अनुसार यदि भूख से निजात दिलानी है तो उसके लिए आवश्यक धन, ठोस राजनैतिक संकल्प और सही नीतियों की जरूरत है। आज हमारे देश के अंदर अन्न की कमी नहीं है, लेकिन गरीबी, त्रुटिपूर्ण वितरण प्रणाली तथा पौष्टिक आहार के बारे में लोगों की अज्ञानता के चलते अनेक लोग कुपोषण का शिकार होते हैं।

मैं आगे कुछ कहने से पहले सदन का ध्यान १२ मार्च, २००७ को सदन में हुई चर्चा पर दिलाना चाहूंगा, जिसमें यह बात कही गई थी कि इवेल्यूएशन स्टडी के अनुसार पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम व अन्त्योदय अन्न योजना में ५३ प्रतिशत गेहूं और ४० प्रतिशत चावल बेनफिशरीज तक नहीं पहुंचता, जो बहुत ही गम्भीर समस्या है। उसमें एक बात यह भी थी कि नार्थ-ईस्टर्न स्टेट्स में करीब १०० प्रतिशत गेहूं, यानी सारा का सारा गेहूं डाइवर्ट हो जाता है। मेरा सुझाव है कि इन दोनों योजनाओं के इम्प्लीमेंटेशन और मॉनिटरिंग में आमूल परिवर्तन किया जाए। साथ ही राज्य सरकारों को उचित दिशा निर्देश जारी किए जाएं।

राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वे नम्बर तीन से यह कटु सत्य उभरकर सामने आया है कि १९ प्रांतों के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार छ: से ३५ माह की उम्र के ७५ प्रतिशत बच्चों में रक्त की कमी पाई गई है। इसी तरह से एक तिहाई बच्चों का पूर्ण विकास नहीं हुआ है। वहीं १७ प्रतिशत बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से काफी दुर्बल पाए गए हैं। हर पांच में से दो बच्चों का वजन उनकी औसत आयु से कम पाया जाता है। हम सब जानते हैं कि बचपन में जो सेहत का नुकसान हो जाता है, उसकी जीवन भर कभी भी भरपाई नहीं हो सकती। यूनएओ की स्पेशल रिपोर्ट और राइट टू फूड के अनुसार हर साल २० लाख बच्चे गम्भीर कुपोषण के कारण मर जाते हैं। एक आश्चर्यचकित बात सामने आई है कि जहां ५४ प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी पाई गई, वहीं शादी-शुदा महिलाओं में भी खून का प्रतिशत कमोबेश यही रहा है।[R7] 

हम सभी सदस्यों को यह सोचना पड़ेगा कि किस तरह का भारत हम चाहते हैं? क्या हम एक कमजोर भारत चाहते हैं जिसमें हमारे बच्चे कमजोर हों या हम एक मजबूत भारत का सपना देखते हैं जिसमें सभी व्यक्ति समृद्ध और मजबूत हों। यद्यपि देश में अनेकों गरीबी उन्मूलन योजनाएं शुरू की गयीं, फिर भी भूख से अनेक लोग कालग्रस्त हुए। जैसा कि जनजाति बहुल महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में, ७१ बच्चों की कुपोषण से मृत्यु हुई। अखबारों में आये हुए कुछ आर्टिकल्स का मैं विवरण दे रहा हूं। राजस्थान के बैरन जिले में, सहारिया जनजाति के ७८ व्यक्ति भूख के कारण मौत के मुंह में समा गये। मध्य प्रदेश के शिवपुर जिले के, पतालपुर गांव में ६ बच्चे और एक महिला कुपोषण के कारण मर गये। पिछले वर्ष भी इसी गांव में १३ बच्चे कुपोषण से मर गये थे। उड़ीसा के देवगढ़ जिले में भी एक जनजातीय महिला की मृत्यु भूख के कारण हुई। हर हफ्ते अखबारों में जहां भूख के कारण मृत्यु और आत्महत्या के समाचार पढ़ने को मिलते हों वहां मन पीड़ा से कराह उठता है। जहां हमारे देश में एक तरफ समृद्धि है वहीं दूसरी तरफ आज भी हमारे भाई-बहन भूख के कारण मर रहे हैं।

एक्सप्रेस ग्रुप के साथ एक वार्तालाप के दौरान योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने भी यह स्वीकार किया कि देश में भूखमरी को रोकने के लिए और लोगों के खान-पान, रहन-सहन में बदलाव लाने के लिए बहुत से कदम उठाने पड़ेंगे। गरीबी और भूख की अंधेरी कालीरात को देश से मिटाने के लिए हमारे देश के संविधान-निर्माताओं ने भी संविधान की धारा ३९ और ४७ में कुछ प्रावधान किये हैं। यूपीए सरकार ने मई २००४ में सत्ता में आते ही अपने साझा-न्यूनतम-प्रोग्राम में अनेक बातों के अलावा विशेष तौर पर लोगों के लिए अनाज और पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाने तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को देश के सबसे गरीब और पिछड़े इलाकों में सशक्त बनाने का वायदा किया था। उसके लिए महिलाओं और भूतपूर्व सैनिकों की सहकारी संस्थाएं बनायी जाएंगी। लम्बी अवधि से देश के जिन क्षेत्रों में अनाज की उपलब्धता कम है, वहां अनाज बैंक बनाए जाएंगे। जिन लोगों के पास अनाज खरीदने का कोई भी साधन नहीं है उनके लिए तथा अपंग लोगों के लिए अनाज की उपलब्धता के लिए विशेष योजनाएं बनायी जाएंगी। जो लोग भूख के कगार पर हैं उनके लिए अंत्योदय काड्र्स उपलब्ध कराए जाएंगे, विशेष तौर पर कन्याओं के लिए पौष्टिक आहार की योजनाएं बनायी जाएगी।

गरीबी उन्मूलन की कई योजनाओं के कार्यान्वयन के बावजूद भी देश से, पूर्ण रूप से, भूखमरी, कुपोषण, गरीबी, पिछड़ापन और रोग दूर नहीं हो सके हैं। मेरा यह मानना है कि शीघ्र ही यूपीए सरकार की योजनाओं द्वारा व्यापक भूख व कुपोषण पर विजय प्राप्त करने में हम सभी लोग कामयाब होंगे। फिर भी मेरा मत है कि हमें एकजुट होकर इस दिशा में तत्परता से काम करना चाहिए जिससे देश में कोई भी व्यक्ति भूखे पेट न सोए। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों व लोगों को मिलकर काम करना पड़ेगा। हमारी सरकार ने आवास, रोजगार, सड़कों, शिक्षा व संचार के लिए अनेक योजनाएं चला रखी हैं। आवास के लिए इंदिरा आवास योजना, सड़कों के लिए प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना, रोजगार के लिए स्वर्ण-जयंती ग्राम-स्वरोजगार योजना, संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना।

हमारी सरकार ने जो ऐतिहासिक कदम उठाया है वह है राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, जिसके अंतर्गत लाखों बेरोजगार युवाओं को हर वर्ष १०० दिन का रोजगार मिलेगा तथा स्वर्ण-जयंती शहरी रोजगार योजना भी हमारी सरकार द्वारा चलायी जा रही है। पीने के पानी के लिए भी अनेक स्कीमें चलाई गयी हैं जैसे कि स्वजलधारा स्कीम, स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन बहुत तेजी से बढ़ रहा है।[r8] 

सिंचाई और संचार के लिए भारत निर्माण योजना के अंतर्गत बहुत सी योजनाएं बन रही हैं। इनके अतरिक्त फूड सब्सिडी के लिए भी बहुत सी योजनाएं चल रही हैं जैसे – Mid-day Meal Scheme; Wheat-based Nutrition Programme; Annapurna Scheme; Sampurna Gramin Rozgar Yojana (SGRY); Scheme for Supply of Food-grains to Hostels / Welfare Institutions; Scheme for Supply of Food grains to SC / ST / OBC Hostels; National Programme for Adolescent Girls; Emergency Feeding Programme; Village Grain-bank Scheme; National Food-for-Work Programme; National Iodine Deficiency Disorders Control Programme (NIDDCP); Iron and Folic Supplementation Programme; Targeted Public Distribution System; Antyodaya Anna Yojana (AAY).

इस वर्ष से ग्रामीण अनाज बैंक की भी स्थापना की जा रही है तथा इस मद में वर्ष २००७-०८ के लिए १९ करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है। हालांकि फूड सब्सिडी में पिछले वर्षों से निरंतर वृद्धि की जा रही है और इस वर्ष भी लगभग २६ हजार करोड़ रुपयों का इस मद में प्रावधान किया गया है, परंतु भुखमरी को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए एक व्यापक योजना को बनाने की आवश्यकता है।

महोदया, मैं आपके माध्यम से सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि हमारे देश में इस विषय से संबंधित योजनाएं बहुत है। हमारे राज्य मंत्री जी भी यहां उपस्थित हैं, वह भी इस बात को मानेंगे कि २६ हजार करोड़ रुपया हम खर्च कर रहे हैं, इसके बावजूद हमें हर वक्त, हर हफ्ते अखबारों में पढ़ने को मिलता है कि हमारे भाई-बहन भूख और कुपोषण का शिकार हैं, बच्चे कमजोर हो रहे हैं। इसे दूर करने के लिए एक व्यापक स्कीम की आवश्यकता है। मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा कि डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए जिस तरह यह सरकार बिल लेकर आई, डिजास्टर्स पहले भी मैनेज होते थे या जो कम्युनल वायलेंस के बारे में प्रिवेंशन ऑफ कम्युनल वायलेंस बिल हम लेकर आ रहे हैं, उसी तरह से इसके लिए भी प्रावधान होना चाहिए। इसके लिए एक व्यापक कंप्रिहेंसिव स्कीम बनाने की आवश्यकता है ताकि जो अलग-अलग स्कीम्स हैं, उनके अन्तर्गत अगर कोई कमी पाई जाती है तो लोगों के पास न्याय पाने का प्रावधान होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि एक जीरो हंगर एक्ट लाया जाए, जो मैं प्रस्तावित करता हूँ। इस पृष्ठभूमि में मेरा मानना है और खासकर माननीय राज्यमंत्री जी से मैं निवेदन करूंगा कि संसद में जीरो हंगर लेजिस्लेशन लाया जाए क्योंकि यूपीए सरकार देश से भुखमरी का उन्मूलन करने के लिए वचनबद्ध है। ऐसा कानून लाकर हम देश में अपनी प्रतिबद्धता का परिचय देंगे। इसे न केवल गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को बल मिलेगा, बल्कि लोगों में यूपीए सरकार की एक विशेष छवि बनेगी। प्रस्तावित जीरो हंगर लेजिस्लेशन में निम्नलखित बातों का विशेष तौर पर ध्यान रखना होगा। जिन लोगों के पास भोजन खरीदने के लिए आमदनी नहीं है, उन लागों के लिए प्राथमिकता के आधार पर भोजन उपलब्ध करवाना, ताकि भूख से पीड़ित किसी व्यक्ति की मृत्यु न हो; बाढ़, भूचाल, सूखा, सुनामी आदि प्राकृतिक आपदाओं तथा आतंकवाद से पीड़ित व्यक्तियों के लिए प्राथमिकता के आधार पर भोजन उपलब्ध करवाना; केंद्रीय सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय इकाइयों, निजी इकाइयों व जनता द्वारा दिए गए दान से खाद्य कोष का निर्माण करना; शिक्षा उपकर की भांति, खाद्य उपकर को लगाना; खाद्य कोष के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय कोष बनाया जाए तथा राज्य आयोगों को इस कानून के उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक धन उपलब्ध कराना। समय-समय पर इस कानून का पुनरीक्षण करना; लोगों में खाद्य उपलब्धता के बारे में प्रचार करना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का निरीक्षण करना और जो भी कमियां पाई जाएं, उन कमियों को दूर करना। हर प्रांत व संघ शासित प्रदेश में राष्ट्रीय आयोग की सहायतार्थ खाद्य आयोगों को बनाना ; हर जिले व ब्लॉक में फूड सेंटर का खोलना; इसके लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराना; कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए जल्दी न्याय दिलाने के लिए फूड कोर्टस का बनाया जाना।

किसी कवि ने कहा है- भूखे पेट भजन न होय गोपाला, ये पकड़ अपनी कंठी और माला। इसका मतलब है कि जब आदमी भूखा होता है तब उसका मन भजन में भी नहीं लगता है। इसलिए मैं समझता हूं कि अब समय आ गया है कि प्रत्येक भारतीय को भूख से निजात मिले और यह उसका मौलिक अधिकार हो। उसे हर रोज इस बात का डर न रहे कि उसे भूखे पेट सोना पड़ेगा। जब कोई व्यक्ति भूखा होता है तो उसे और कुछ नहीं सूझता। मैं अपने स्वयं के अनुभव से बताना चाहता हूं कि जब मैं इस स्पीच की तैयारी कर रहा था और लंच टाइम हो गया, तब सोचा कि पहले खाना खा लें बाद में इसे तैयार करेंगे। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि हम लोगों को इसकी सुरक्षा प्रदान करें ताकि हमारे देश में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए और न ही भूख के कारण किसी की मौत हो।

इस तरह का कानून ब्राजील ने लागू किया है और इसके बहुत अच्छे रिजल्ट भी मिले हैं। यहां माननीय मंत्री अखिलेश प्रसाद जी बैठे हैं। मैं यह भी जानता हूं कि सरकार और सरकारी अफसर इसका जरूर विरोध करेंगे क्योंकि इसे लागू करने के बाद उनकी जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। हमारे देश में आज जगह-जगह पर पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम है, माननीय मंत्री श्री शरद पवार जी ने भी स्टेटमेंट दी है कि कैसे डाइवर्जन हो रहा है और मैं समझता हूं कि इतने सालों बाद भी कोई कड़ी कार्यवाही नहीं हुई है। इस कानून के बनने के बाद लोग बहुत ज्यादा जागरुक हो जाएंगे। सरकार ने जिस तरह से राइट टू इन्फार्मेशन बिल पास किया है, उससे ज्यादा से ज्यादा पारदर्शिता हमारे सिस्टम में आ रही है। जीरो हंगर एक्ट बनने के बाद लोगों को और हक मिलेगा। इस एक्ट की सहायता से जहां गरीबों का हक मारा जाएगा, वहां वे इसके लिए संघष्र्ष कर सकेंगे, बचाव कर सकेंगे। यह कानून ब्राजील में भी लागू किया गया है, अन्य देश भी इसे लागू करने के लिए तैयार हैं और इसके लिए इंतजाम कर रहे हैं। हमारे देश की आजादी को साठ साल हो गए हैं, और साठ साल की आजादी के बाद हम इस काम पर हजारों करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं।

मैं उम्मीद करूंगा कि हम जीरो हंगर एक्ट के साथ ऐसी स्कीम्स बनाएं जिससे कि भुखमरी दूर हो सके। भुखमरी से ज्यादा बड़ी समस्या कुपोषण की है। जैसा मैंने पहले कहा कि जिस किसी का बचपन में कुपोषण हो जाता है, उसकी भरपाई कभी भी नहीं हो सकती है। एक स्वस्थ शरीर में एक स्वस्थ मस्तिष्ष्क का विकास होता है, इसलिए हमें इस बात को ध्यान में रखना है कि जब तक देश के लोगों को पौष्टिक आहार नहीं देंगे, तब तक उनसे उम्मीद नहीं कर सकते कि हमारा देश और हमारे देश के नौजवान मजबूत होंगे। यही बात खेलों के संबंध में भी लागू होती है। हमारे देश के बहुत से एथलीट्स और पहलवानों के साथ भी यह समस्या है कि उन्हें जिस तरह से भरपेट डाइट मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाती है।

मैं सदन के माननीय सदस्यों से आग्रह करूंगा कि जब हम जीरो हंगर एक्ट लेकर आएं तब इसका पुरजोर समर्थन करें। हम सब मिलकर इस तरह के किसी सब्जेक्ट में आम सहमति भी बना सकते हैं क्योंकि इस आम सहमति से देश के हर क्षेत्र के व्यक्ति को, प्रत्येक देशवासी को लाभ मिलेगा। तब हम यह सोचकर चैन की नींद सो सकेंगे कि हमारे देश में हमारा कोई भी भाई-बहन भूखा नहीं सो रहा है। मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करता हूं कि सरकार जल्दी ही ऐसा विधेयक लेकर आए जिसे जीरो हंगर लैजिस्लेशन नाम दिया जाए। जिस तरह से डिजास्टर मैनेंजमेंट और कम्यूनल वाएलेंस कानून बना है और इसके बनने से पहले इसे किसी तरह से टैकल किया जा रहा था और कानून बनने के बाद व्यापक रूप से इसे डील कर रहे हैं इसी तरह से जीरो हंगर लैजिस्लेशन के बाद हम व्यापक रूप से लोगों की रक्षा कर सकेंगे। इससे हम भारतीयों को हक दिला सकेंगे, प्रत्येक भारतीय को भूख से निजात मिलेगी, पौष्टिक आहार मिलेगा और सपनों के भारत में हर व्यक्ति को रोटी, कपड़ा और मकान मिलेगा। हर व्यक्ति खुशहाल होगा और हर व्यक्ति देश के लिए अपना योगदान दे सकेगा। आइए इस तरह से हम सब मिलकर ऐसे भारत की रचना करें।

आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं।

 

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (चायल) : माननीय सभापति महोदया, भाई नवीन जिंदल जी के संकल्प का समर्थन करते हुए मैं अपनी बात रखना चाहूंगा। उन्होंने भुखमरी मिटाने के लिए व्यापक खाद्य और पोषण सुरक्षा योजना तैयार करने से संबंधितबहुत महत्वपूर्ण विषय पर अपने विचार रखे हैं। यह बात सत्य है कि जब इस सब्जैक्ट पर लाठी पड़ी थी तो इसे मैंने ही निकाला था। इस पर बहस बहुत पहले हो जानी चाहिए थी, लेकिन संसद में व्यवधान के कारण हम इस पर चर्चा नहीं कर पाये हैं, जबकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। आज पूरे भारत की आबादी ११० करोड़ के लगभग है। भारत एक कृषि प्रधान देश है और आज भी यहां की करीब ७५ प्रतिशत जनता कृषि पर निर्भर करती है। यहां पर ऐसा कानून है कि यदि कोई व्यक्ति पेट भरने के लिए रोटी की चोरी करता है तो उसके लिए सजा का भी प्रावधान है। आंकड़ों के अनुसार देखा गया है, दुनिया में भूख से हर पांच सैकिंड में एक बच्चे की मौत हो रही है, जिनमें पांच साल से कम उम्र के मरने वाले लगभग साठ लाख बच्चे हैं। आंकड़े बताते हैं कि आज भी दुनिया में ८५.२ करोड़ लोग भूखे हैं और भूख से होने वाली मौतों के ज्यादातर मामले ग्रामीण क्षेत्रों से संबंधित हैं। समय-समय पर हम लोगों ने संसद में हमेशा इस बात की चर्चा की है कि बेरोजगारी की समस्या कैसे खत्म हो और सबको रोजगार मिले। देश के संविधान में भी इस बात को दर्शाया गया है कि हिन्दुस्तान में जितने भी लोग हैं, चाहे वे किसी भी वर्ग के हों, गरीब हों, मध्यम वर्ग के हों या उच्च वर्ग के हों, सबको शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार देने की व्यवस्था की गई है। यह देश के संविधान में उल्लिखित है। लेकिन दुख इस बात का है कि आजादी के साठ वर्ष के बाद भी हमें मूल्यांकन करना पड़ेगा कि हमने देश के अंदर क्या खोया है और क्या पाया है। इस बात पर हमें पूरी तरह से विचार करना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में एक विशेषज्ञ जीन जेगलेयर ने कहा है कि पूरे विश्व में इस समय ८५ करोड़ २० लाख लोग भूख से पीड़ित है। इसमें यदि देखा जाए तो चीन के बाद हिन्दुस्तान की आबादी सबसे अधिक है और हिन्दुस्तान में इनकी संख्या सबसे ज्यादा है। आज पूरे विश्व के सामने जो स्थिति है, वह मानवता के लिए एक शर्मनाक विषय है। हमें किस तरह से मानवता को बचाना है, इसके लिए हमें गहन अध्ययन करना होगा।

सभापति महोदया, भाई जिंदल जी ने अभी कहा कि यदि खाद्य वितरण के सही तरीके अपनाए जाएं तो मेरे ख्याल से इसका समाधान संभव है और भूख से मरने वालों की संख्या भी कम हो सकती है। खाद्य, फूड डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को सुद्ृढ़ बनाने के लिए हमारी सरकार को गंभीरता से सोचना होगा। यह देखा गया है कि भूख से होने वाली मौतों का मुख्य कारण निम्न भूमि, बढ़ता बंजरपन, ऊसर और बंजर जमीनें हैं। जिन्हें हम खेती योग्य बना सकते हैं। हमने इसी सदन में चर्चा की थी, उसके आंकड़े अभी मेरे पास उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन देखा गया है कि ऊसर, बंजर, बेकार और परती भूमि हिन्दुस्तान में इतनी ज्यादा है कि अगर उसे सही बनाकर गरीबों को दे दिया जाए तो मेरे ख्याल से हम भुखमरी को कंट्रोल कर सकते हैं।

इस तरह से हम भुखमरी को मिटा सकते हैं। इसके लिए हमारी सरकार ने प्रयास किया है। हमारे ग्रामीण विकास मंत्री जी बैठे हैं और वह बड़े गौर से सुन भी रहे हैं। इनकी बहुत महत्वपूर्ण योजना ग्रामीण विकास मंत्रालय से संबंधित है जिसके अन्तर्गत भूमि-संरक्षण से संबंधित बंजर या परती जमीनों को बनाने का काम है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के तहत जो सौ दिन का रोजगार देने की बात यूपीए सरकार ने लागू की है, उससे काफी हद तक हमने इस बीमारी से निजात पाया है। लेकिन जरुरत इस बात की है कि जो हमारे देश के मजदूर या किसान हैं जिन्हें हम सौ दिन के रोजगार की गारंटी देते हैं, लेकिन २६५ दिन का क्या होगा, इसके लिए भी हमें गंभीरता से विचार करना होगा।

आज देखा गया है कि ज्यादातर जो हमारे ग्रामीण क्षेत्र के कृषि मजदूर हैं या मजदूर हैं जो मजदूरी ही करते हैं जिनके पास कोई जमीन नहीं है, उनका गांवों से शहरों की ओर पलायन हो रहा है। मैं बाकी राज्यों के बारे में नहीं जानता लेकिन उत्तर प्रदेश में किसी भी बड़े शहर में आप देख लीजिए। कोई भी जो चौराहा होता है, रोजाना वहां ४००-५०० मजदूर इकट्ठा हो जाते हैं। उस इलाके को लेबर चौराहे का नाम दे दिया जाता है। वहां पर आपको अच्छे से अच्छे मिस्त्री, बढ़ई, राजगीर और तमाम तरीके के मजदूर मिल जाएंगे। ये लोग ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। आज उनके सामने भी समस्या है। अगर वे अच्छे तरीके से रोज न कमाएं तो अपने परिवार का पालन-पोषण नहीं कर सकते हैं। यहां तक कि जो हमारे रोजमर्रा के मजदूर हैं जो डेली कमाते हैं और डेली खाते हैं, किसी कारणवश चाहे वह दैवी आपदा से हो या मौसम की मार से हो, अगर एक दिन वह मजदूर नहीं कमाता है तो उसके बच्चे भूखे सो जाते हैं। ऐसे बहुत से परिवार आज भी देहात और ग्रामीण क्षेत्रों में हैं जहां पर एक समय लोग भोजन करते हैं। आज हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। यह देखा गया है कि ६० लाख बच्चे पांच वर्ष की उम्र तक पहुंचने से पहले ही कुपोषण और संबंधित बीमारियों के शिकार होकर मौत के मुंह में समा जाते हैं। हमारी सरकार समय-समय पर बहुत सारी योजनाएं- बाल सुधार तथा बाल मजदूर से संबंधित तमाम विधेयक यहां पर लाई है और उसमें सुधार भी किया है। बाल मजदूरों के समापन के लिए भी कानून लाई है लेकिन देखा गया है कि ज्यादातर कहीं भी आप देखिए, चाहे आप ढाबे पर देख लीजिए या शहरों में देख लीजिए कि घर में काम करने वाले या हर जगह देखिए तो ज्यादातर महिलाएं और बच्चे ही आपको मजदूरी करते हुए मिल जाएंगे। इसे दूर करने के लिए मेरा एक सुझाव होगा।

यहां ग्रामीण विकास मंत्री जी बैठे है। मैं कहना चाहता हूं कि हमें ग्रामीण स्तर पर लघु सिंचाई और कृषि परियोजनाओं में पर्याप्त रुप से निवेश करने की जरूरत है तब जाकर हम भुखमरी औऱ कुपोषण से निपट सकते हैं और निपटने में हमारी सरकार सक्षम हो सकती है। जहां तक देखा गया है कि आज भी अगर पूरी दुनिया की रिपोर्ट ली जाए तो भूख और कुपोषण से रोज १८,००० बच्चे मरते हैं। यह केवल बच्चों की संख्या है। हर रात अगर देखा जाए तो ८५ करोड़ लोग आज भी भूखे पेट सोने के लए मजबूर हैं। यह पूरी दुनिया की रिपोर्ट है जिसमें ज्यादातर संख्या जो देखी गई है, वह भारतवर्ष की है। दुनिया में सबसे ज्यादा दस करोड़ जो कुपोषित बच्चे हैं, वे भारत में पाये जाते हं। आज हमें इस पर गंभीरता से सोचना पड़ेगा। समय-समय पर चाहे वह शिक्षा को लेकर हो या ग्रामीण क्षेत्रों के विकास से संबंधित परियोजनाएं हों, बेरोजगारी पर भी हमने समय-समय पर सदन में बराबर चर्चा की है और घूम-फिरकर वे सारी समस्याएं इसी पहलू पर आकर निर्भर करती हैं कि ग्रामीण स्तर पर कैसे कृषि को मजबूत करें तथा वहां पर हम कैसे रोजगार देने की व्यवस्था करें? इसके लिए हमेशा हमने चर्चा की है और समय-समय पर जो भी सरकारें आई हैं, उन्होंने प्रयास किया है। आज सबसे ज्यादा जो कुपोषित बच्चे भारत में हैं, अगर दुनिया की रिपोर्ट ली जाए तो आज हमेशा इस बात को गंभीरता से सोचना पड़ेगा कि आज केन्द्र में यूपीए की सरकार है और खासकर यूपीए में बैठी हुई कांग्रेस की सरकार ने तो ४०-४५ साल शासन किया है।[r9] 

अगर आज भी ये सारी समस्यायें हमारे देश में हैं, तो मेरे ख्याल से यह गलत बात है। इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस सरकार पर है। इसलिये हमें मज़बूत कानून बनाकर सोचना पड़ेगा कि अगर दुनिया की रिपोर्ट के अनुसार भारत के आंकड़े सब से ज्यादा हैं तो इस बात की ज़रूरत है कि भारतवर्ष को आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा । अभी १०वीं पंचवर्षीय योजना समाप्त होने जा रही है और हम ११वीं पंचवर्षीय योजना की शुरुआत इसी वर्ष में कर रहे हैं। यह कोशिश करनी चाहिये कि हमें ग्रामीण स्तर पर, खासकर कृषि क्षेत्र में ज्यादा आर्थिक स्तर पर मदद देने की जरूरत है, तभी जाकर हम भुखमरी और कुपोषण के शिकार लोगों से अपने देश में निज़ात पा सकते हैं।

सभापति महोदया, मैं श्री नवीन जिन्दल द्वारा प्रस्तुत संकल्प का समर्थन करते हुये तथा उसे बल देते हुये अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

 

SHRI HANNAN MOLLAH (ULUBERIA): Madam Chairperson, I thank my young friend, Shri Navin Jindal, for bringing this Resolution before this House in his first appearance in the House.  I hope that young people will not forget the poor people of our country.  It is a good sign that he has raised this issue before the House. 

I remember, when I came first in 1880, I brought an important Bill, Youth Bill and Right to Work, before the House.  It was discussed but till today it has not been implemented in its true spirit.  Some right to work has been given by Shri Raghuvansh Prasad in the form of REGA but the dream of right to work as fundamental right is still unfulfilled for our younger generation.  Another Bill of mine regarding Agricultural Workers’ Rights, is going to come up for discussion next week.   We find that in spite of our raising many slogans like ‘Garibi hatao’ or taking up a number of projects for poor people, this section of our country is always neglected.  We have yet to achieve a lot.  Shri Navin Jindal has already explained it by quoting certain figures.

            Malnutrition and lack of food security are the main problems in our country as also in other third world countries.  It has been explained as to how 85 crore of the people of the world are suffering from starvation.  We hear about starvation deaths many a time but nobody agrees to it.  If we raise issue about starvation death in the House, the Government would try to cover up by saying that it was not starvation death but may be death due to malnutrition or some disease.  The Government never agrees that there are starvation deaths in the country.  We have seen it happening in many places.       

            Scarce availability of food grains is one of the main reasons for this.  In 1955 the population of our country was half of what it is today.  At that time, we used to get about 440 grams of food grains per person per day.  After ten years, that is, in 1965 we used to get about 480 grams of food grains per person per day and in 1988, it became 494.5 grams per person per day.    There was a marginal increase.  In 1995 it got reduced to 475 grams per person per day.  In 2002 there was a little increase and the figure went to 494 grams per person per day but in 2005, it has reached to 422 grams.  So, the availability of food grains per person is today less than what it was in 1955. So your proposal is correct that in 1955, we were getting more per capita food than today.  The production has increased and the population has increased.  But because of poor  distribution and other things, these things are happening. 

            As regard Public Distribution System, in 2002, in a whole year, the per capita distribution of foodgrains was 189.5 kilograms and in 2005, it has reduced to 170 kilograms.  In 1999, per head edible oil figure was nine kilograms which has reduced to 7.2 kilogram in 2003.  Similar is the case with sugar, vegetables, tea, coffee, etc.  So, there is a reduction in all these ingredients of foodgrains.  So, it is not the wholesome growth and this is a matter of concern, as has been mentioned in the Resolution. 

            There was a survey done in 29 States by the NFHS which has submitted an alarming report.  It says that 45.9 per cent children below three years of age are under weight or are suffering from malnutrition.  During 2005-06, 57.9 per cent pregnant women are suffering from anemia.  If the mother is suffering from anemia, as you know, the child cannot be stronger.  As regards married women between in the age group of 15 to 49, 56.1 per cent are suffering from anemia.  Seventy-nine per cent children in the age group of six months to 36 months, are suffering from anemia.  The figure is the lowest in Kerala and it is the highest in Madhya Pradesh and Jharkhand.  Kerala is doing better because they have created different situation through education and backwardness is more in Madhya Pradesh, Jharkhand and some other States.  This is a serious situation and the whole nation should be concerned about it.   Sometimes we waste three to four hours’ time of the House but we do not discuss such serious problems.  If we do not discuss, we cannot find a way out.  How can we help those who are suffering due to these problems?  As he has said, we need adequate funds, proper planning, sufficient foodgrains, etc.  The Public Distribution System is one of the major areas through which we can take food to the poor people.  But this system is not working properly and it is now in shambles.  The State of Kerala has said that they produce all cash crops for the country.  Therefore, the whole country is responsible to feed them because they were promised that sufficient foodgrains will be given for the PDS.  But now it has been reduced and they are not getting adequate foodgrains.  Now-a-days, we do not follow our own people, our intellectuals but we have become more and more dependent on the World Bank.  We follow what Americans  or Britishers say.  We obey them just like animals.  As we all know, one of the most important ingredients is the food security  but we have rejected that old idea and we have accepted the system of Targeted PDS only. Earlier, there was the universal rationing system. But now because of the Targeted Public Distribution System, a large number of people have been out of the ambit of this Public Distribution System. Any Member in his or her constituency would have found out that in a village a person who is presumably an economically solvent people owning, say, a bicycle or a radio and having an account in the post office, using his influence, would get his name included in the BPL list whereas a labourer not having a job would get excluded in the list of BPL. So, the principles of Targeted PDS are not being implemented in true letter and spirit. The influential people in the villages by taking their agents get their names included in the list of BPL, whereas people who do not have anyone to support their cause fail to get their names included in the BPL list. So, the people who really need the support of the Public Distribution System are left out of the system. How would these people get food?

            Again, the FCI has become a den of corruption. The hon. Minister, the other day, while stating the figures for 14 States mentioned that out of 28 states, in 14 States the food is getting diverted. This is the state of affairs in 14 States; we do not have the figures for the rest of the States. Some good quality food is sent from States like Punjab and Haryana to States like Bihar, West Bengal and such other States. It is a very strange experience that by some magic means the good food that is loaded at the starting point, at the Central Food Godown,  changes to very rotten quality food at the time of unloading at the local godowns. The good food is sold at the market. This is a very serious situation. All the concerned machinery should work in tandem to check such a malpractice. This is possible because of massive corruption at different levels. The food meant for the poor people get diverted to the black market and only rotten quality food is available for distribution to the poor people. Such quality food is bound to cause diseases amongst the people who consume such food, mostly the people belonging to the poorer sections of the society. How could we afford to allow such things to happen?

            Besides, we have come across reports of starvation deaths in different parts of the country. As has been mentioned, around 70 to 80 people ate roots of plants for about two to three years to survive and finally died. We all know what is happening in the KBK districts of Orissa. One would only find old men and women in those places. The men folk have left the place since there is no work and no food in the region. The situation is more acute amongst the tribal population. They are the most neglected lot. They suffer from malnutrition and non-availability of food.

            My friend was mentioning about the programmes meant for the poor people. There are many programmes; rather I should say there are too many programmes. I do not think that there is any necessity for those many programmes. I think, only two to three programmes should be taken up and implemented in right earnest. Too many programmes means, involvement of too many Ministries; different departments, different employees and different sections and different kinds of loot. Every section concerned with the programmes will have the opportunity of loot. In the event of having two to three programmes, the loot will remain restricted to only two to three sections, if one per cent goes in loot, the rest 99 per cent will reach the benefits for whom they are meant. If there are 100 channels, then there will be loot through every channel. The bureaucrats in a bid to please their Ministers would try and evolve a programme. It is the very nature of bureaucracy. They have to prove their worth since they are getting wages. They would come out with a new programme and convince the Minister about the utility and importance of the scheme and programme. The Ministers normally do not contest their intellect because they are considered intelligent people. They feel convinced about the worth of the programme as has been told by the bureaucrats and they approve the scheme and then on the 15th of August, every year, from the ramparts of the Red Fort such schemes are announced by the hon. Prime Minister. In order to immortalize the departed leaders of the various Parties, the schemes are named after them; but unfortunately, 90 per cent of such programmes that are announced are not successful. The late Rajiv Gandhi once mentioned that if a rupee is sent from Delhi, only 15 paisa reaches intended beneficiary. The middlemen take away the rest of it. So, the channels should be closed and there should only be one or two channels and only two to three major programmes should be taken up for implementation in right earnest. [R10] 

There are so many anti-poverty programmes which do not really eradicate poverty and they are only a gimmick to hoodwink the people.  Every Government announces dozens of programmes.  Those programmes are not helping the people. So, I think, we have to concentrate on these things and form two or three major programmes on nutrition, food supply and drinking water all these programmes should be merged.  We have to declare a war against poverty and malnutrition.

            Finally, I would say that we should have a legal backing which is necessary.  I am very happy that Shri Navin Jindal has proposed a comprehensive law.  If a zero-hunger legislation is thought of, it would be help the people.  He has made general suggestions.  But we should consult our Planning Commission, economists and other experts and based on their recommendations, we can prepare a comprehensive legislation based on zero-hunger.  We have targeted all our funds for anti-poverty funds.  Those funds should be mobilized and only then, we will have success in this field.  Even after 60 years of our Independence, we are lamenting that our people are not getting proper nutrition and food.  I think, The Government will seriously think of it, consult the experts and come up with a comprehensive zero-hunger Bill and implement it with some specific programme discarding all the unused and usless programmes so that we can achieve our target.  By this, we will succeed in eliminating hunger and poverty.

            Madam, I thank you for giving me an opportunity to speak.

                                                                                                           

 

श्री सुकदेव पासवान (अररिया) : सभापति महोदया, सबसे पहले मैं माननीय सांसद, श्री नवीन जिन्दल को बधाई देता हूं जिन्होंने इस सदन में ‘सरकार देश से पूरी तरह से भुखमरी को मिटाने के लिए एक व्यापक खाद्य और पोषण सुरक्षा योजना तैयार करने और उसे लागू करने के संबंध में’ संकल्प प्रस्तुत किया है। देश की आजादी के ६० वर्षों के बाद भी आज देश की ४० से ५० करोड़ की आबादी गरीबी की रेखा के नीचे अपना जीवन बसर कर रही है। देश में प्रारम्भ से कांग्रेस पार्टी की सरकार रही और अब तक लगभग ४५ वर्षों तक उसने ही देश पर राज किया है। यदि कांग्रेस पार्टी की सरकारों ने प्रारम्भ से ही ऐसी योजना बनाई होती, जिससे गांवों में रहने वालों को सही मायने में भोजन मिलता, तो आज ऐसी स्थिति नहीं होती।

महोदया, गांवों के लोग और उनके बच्चे ही अधिकांशत: गरीबी और कुपोषण के शिकार हैं। गांवों के बच्चों में कुपोषण के कारण अंधता का प्रतिशत शहरों के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। कुपोषण के कारण ही वे ज्यादातर विकलांग होते हैं। सबसे ज्यादा भुखमरी का शिकार उन्हीं लोगों को होना पड़ता है। गांवों में पिछड़े, दलित और अक्लियत के लोगों को भुखमरी तथा कुपोषण का शिकार सबसे ज्यादा होना पड़ता है। देश में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाला व्यक्ति चाहे फिर वह किसी भी वर्ग या समाज का हो, उसे न खाने को मिलता है, न दवाई मिलती है, न शिक्षा मिलती है और न रहने को घर मिलता है। बी.पी.एल. के लोगों को ही गरीबी और भुखमरी की सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ती है। इसलिए सरकार को देश के ४०-५० करोड़ गरीब लोगों की भुखमरी को दूर करने पर निश्चित रूप से गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

सभापति महोदया, देश में सबसे ज्यादा पिछड़ा राज्य बिहार है। माननीय ग्रामीण विकास मंत्री जी यहां नहीं हैं। मैंने उनसे पहले भी आग्रह किया था और आज फिर आग्रह करना चाहता हूं कि बिहार की गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करने के लिए विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है। मैं बताना चाहता हूं कि गरीबी के मामले में बिहार राज्य को १३ अंक दिए गए हैं, जबकि दिल्ली, हरियाणा और पंजाब आदि राज्यों को २० अंक दिए गए हैं। जब तक बिहार में बी.पी.एल. के अंक नहीं बढ़ाए जाएंगे, तब तक बिहार की गरीबी और भुखमरी दूर होने वाली नहीं है। इसलिए मेरा आग्रह है कि बिहार को बी.पी.एल. के अन्तर्गत २० से २५ अंक दिए जाएं, तब जाकर बिहार की गरीबी और भुखमरी की समस्या दूर होगी।

17.00 hrs.

सभापति महोदया, अंत्योदय और अन्नपूर्णा योजना के तहत सरकार से गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवारों को लाभ मिलता है। लेकिन असलियत में बड़े-बड़े सेठों, साहूकारों के गोदामों में गरीबों के हिस्से का अन्न चला जाता है। भारत सरकार हो या राज्य सरकार हो, वे पूरी तरह से इन योजनाओं पर अपना नियंत्रण रखने में असमर्थ हैं। इस कारण गरीब लोगों को अंत्योदय और अन्नपूर्णा योजना के तहत जो सामान मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पाता है। अभी हमारे कृषि मंत्री जी ने कहा कि गेहूं को विदेश से आयात किया जाता है। अगर किसान को फसल का उचित मूल्य मिले, तो निश्चित रूप से वह अधिक अन्न पैदा करने की कोशिश करेगा, लेकिन किसान को फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। हम जानते हैं कि गांव में किसान किस तरह से गेहूं और अन्य चीजों की खेती करते हैं। साहूकार से पैसा लेकर या बैंकों से ऋण लेकर किसान अपनी फसल उगाता है। ओलावृष्टि या अन्य प्राकृतिक आपदा से उसकी फसल नष्ट हो जाती है, तो वह अपने नुकसान की भरपाई नहीं कर पाता है। अगर फसल अच्छी भी होती है, तो भी उसे फसल की सही कीमत नहीं मिल पाती है। इस बजट में भी सरकार को निश्चित रूप से खाद की कीमत घटानी चाहिए थी। सिंचाई का प्रबंध करना चाहिए था। इस संबंध में किसी प्रकार का कोई प्रबंध नहीं किया गया है। जब तक देश का किसान खुशहाल नहीं होगा, तब तक देश में भुखमरी की समस्या निश्चित रूप से होगी। मंत्री जी चाहे जितना भी लुभावना बजट बना लें, जनता को जितना भी ठग लें, जब तक सही मायने में किसान के हित की बात नहीं होगी, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के हित की बात नहीं होगी, तब तक यह देश खुशहाल नहीं होगा।

सभापति महोदया, रोजगार गारंटी योजना पूरे देश में चल रही है, लेकिन जब हम अपने क्षेत्र में देखते हैं, तो पाते हैं कि यह योजना हमारे ज्यादातर जिलों में सही ढंग से क्रियान्वित नहीं हो रही है। इसके अंतर्गत गांव में रहने वाले प्रत्येक गरीब व्यक्ति को साल में सौ दिन गारंटिड रोजगार उपलब्ध करवाना है, लेकिन यह व्यवस्था अभी कई राज्यों में पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई है। एक संकल्प पारित हो कि अगर कोई व्यक्ति भूख से मरता है तो उसके लिए एक निश्चित राशि मुआवजे के तौर पर दी जाए।

सभापति महोदया, इंदिरा आवास योजना में भी लूट हो रही है। पहले जो राशि २० हजार रूपये थी, उसे बढ़ा कर २५ हजार कर दिया गया है। अगर कोई एक शौचालय भी बनाता है तो ४० से ५० हजार रुपया खर्च होता है। इंदिरा आवास में सिर्फ २५ हजार रुपया देने का प्रावधान किया है। मैं आपके माध्यम से मांग करता हूं कि सरकार कम से कम ५० हजार रुपया इंदिरा आवास योजना के माध्यम से दे क्योंकि इस २०-२५ हजार रूपये में से ८-१० हजार रूपये घूस ले लेते हैं। गरीब ऐसे में कैसे अपना आवास बना पाएगा? इसमें इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि लाभार्थी को सीधा इसका पैसा मिले जैसा कि वृद्धावस्था पेंशन योजना के तहत सीधे लाभार्थी के एकाउंट में चला जाता है, उसी तरह से इंदिरा आवास योजना में भी लाभार्थी के एकाउंट में ही पैसे जाने चाहिए ताकि उसे किसी को घूस न देनी पड़े।

महोदया, गरीब आदमी अपनी गरीबी के कारण कपड़ा नहीं ले पाता है, दवाई नहीं खरीद पाता है, अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दिला पाता है। सबसे ज्यादा गरीबी की मार बीपीएल के आदमी पर पड़ती है। इसलिए मैं आपके माध्यम से मांग करता हूं कि एक ऐसा कानून बनना चाहिए जिसमें कोई भी गरीब आदमी शिक्षा से वंचित न रहे। प्रत्येक आदमी के लिए अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए और प्रत्येक ब्लॉक में गरीब आदमी के लिए आवासीय विद्यालय खुलना चाहिए[R11]  जिसमें प्राथमिक से लेकर कम से कम मैटि्रक तक प्रत्येक बच्चे को अनिवार्य शिक्षा दी जाये।

इतना ही कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (झंझारपुर): सभापति महोदया, विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है, गम्भीर भी है और संवेदनशील विषय भी है। पहली बार सदन में मैं माननीय सदस्य नवीन जिन्दल जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि नये सदस्य होकर जो बेसिक नीड्स हैं, आज देश के सामने जो बुनियादी जरूरत है, उसमें भी जो लास्ट मैन ऑफ दि सोसायटी है, जो समाज का अन्तिम आदमी है, जो भूख से पीड़ित होता है, जो खासकर के कुपोषण का शिकार होता है। उस तबके के संबंध में सरकारी संकल्प लाए हैं।

आज देश में पता है, जो भी डाटा ये लोग लगा रहे हैं कि दो वक्त रोटी कितने लोग खाते हैं। कई बार एन.एस.एस. (नेशनल सैम्पल सर्वे) द्वारा प्लानिंग कमीशन का सर्वे हो चुका है। १९९३ में सर्वे हुआ, १९९९ में सर्वे हुआ और २००२ में सर्वे हुआ। सर्वे के मुताबिक एक बार तो बी.पी.एल. को १६ परसेंट कर दिया था कि जो बी.पी.एल. का एस्टीमेट है, गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का, वह १६ परसेंट है। आखिर भुखमरी से प्रभावित कौन होते हैं, इस पर ध्यान देना पड़ेगा, फोकस ऑन पुअर, इसका एक टार्गेटिड एरिया है, एक संवर्ग है, जिसको भुखमरी का शिकार होना पड़ता है। गरीबी की रेखा से जो लोग नीचे हैं, वे ही भुखमरी के शिकार होते हैं। इस गरीबी की रेखा का भी जो समय-समय पर प्लानिंग कमीशन के तहत एस्टीमेट बनाया जाता है, उसमें १९९३ से लेकर अभी तक डिफरेंट फीगर्स आई हैं। १९९३ में १६ परसेंट था। आपको आश्चर्य होगा कि जब १९९६-९७ में प्लानिंग कमीशन से इसका एस्टीमेट आया, उस समय में तत्कालीन वाइस चेयरमैन प्रो. मधु दण्डवते थे, जो स्वर्गवासी हो गये, जो इस देश के बहुत बड़े सोशलिस्ट लीडर थे। उन्होंने जब राज्यों में एनेलसिस कराया, यहां से अधिकारी गये, सैम्पल सर्वे लिया गया कि कितने लोगों को दो वक्त की रोटी दाल मिल पाता है, यह जो भुखमरी का सर्वे किया, मैं अभी जिन्दल जी को धन्यवाद दे रहा था और देख रहा था कि मूवर कहां हैं, मैं उनको खोज रहा था। मैं आज आपको फिर से धन्यवाद देना चाहता हूं कि बहुत अच्छा प्राइवेट संकल्प आपने सदन के सामने रखा है। मैं उनको धन्यवाद देते हुए आज भुखमरी का टार्गेटिड जो एक संवर्ग है, जो बी.पी.एल. में है, जो गरीबी की रेखा के नीचे हैं। मैं आपसे बता रहा था कि १९९६-९७ में जो बी.पी.एल. का एस्टीमेट बना, उसमें ३५.९५ हुआ, मतलब ३६ प्रतिशत लोग गरीबी के रेखा के नीचे आंके गये। सर्वे होकर एनेलसिस हुआ, क्योंकि प्लानिंग कमीशन बी.पी.एल. का एस्टीमेट देती है, फूड मनिस्ट्री नहीं देती है। हमारे राज्य मंत्री जी यहां बैठे हैं, फूड मनिस्ट्री का यह काम नहीं है, प्लानिंग कमीशन यह सर्वे कराता है, नेशनल सैम्पल सर्वे ऑन दि बेसिस ऑफ लकड़वाला एक्सपर्ट ग्रुप, यह एक फार्मूला है, उस फार्मूले के तहत पैरामीटर्स के तहत सर्वे किया गया। आपको ताज्जुब होगा कि १९९७ में गरीबी की रेखा के नीचे ३५.९७ प्रतिशत लोग इस देश के अन्दर थे, मतलब लगभग ३५ करोड़ लोग और जब २००२ में एनेलसिस हुआ तो माफ करेंगे, यहां हमारे एन.डी.ए. के दोस्त भी हैं, अभी माननीय सुखदेव पासवान जी बोले हैं तो उसे २००२ में घटाकर २६ परसेंट कर दिया, गरीबी नहीं घटी, पावर्टी नहीं घटी, पावर्टी उन्मूलन के चलते जो गरीबी की रेखा के नीचे लोग हैं, उनकी संख्या घटा दी गई, इतनी जगलरी इस देश में गरीबों के साथ होती है। एक बड़ा भारी अन्याय डाटा बनाने में भी हो रहा है, एक्सप्लायटेशन हो रहा है। उसमें गरीबों की संख्या कम कर दी गई। २००२ में संख्या कितनी घटा दी गई, कहा कि २६ परसेंट लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं और आज वही २६ परसेंट चल रहा है। प्लानिंग कमीशन में २००२ में जो सर्वे हुआ, वही २६ प्रतिशत का सर्वे अभी चल रहा है, लेकिन क्या यह हकीकत है, क्या यह सच्चाई है, क्या यह वास्तविकता है, नहीं। आप कह सकते हैं कि मोटे तौर पर एक तो एनेलसिस का जो फार्मूला है, उसमें रियल नहीं हो सकता है, उसमें एप्रोच टू दि रियल हो सकता है, लेकिन ३६ परसेंट से १० परसेंट गरीबी की रेखा घटाकर २६ परसेंट कर दिया और प्लानिंग कमीसन आज २६ प्रतिशत पर पूरे देश की योजना बना रहा है।

अभी मैं टी.वी. में नवीन जिन्दल जी को सुन रहा था कि बहुत से पावर्टी एलविएशन कार्यक्रम देश के अन्दर जो केन्द्र प्रायोजित योजनाएं हैं, सही मायने में योजना की इंटेंशन, नीयत यू.पी.ए. सरकार की तो है कि गरीब अपलिफ्ट हो। हमारे देश के गरीब भुखमरी से न मरे और कुपोषण का शिकार न हो। लेकिन प्रैक्टिकल में क्या हो रहा है? इसीलिए मैं इस बात का जिक्र यहां कर रहा हूं। नवीन जिंदल जी ने जीरो हंगर एक्ट लाने के सवाल का उठाया है। मैं इसके लिए उनका शुक्रगुजार हूं। इस महत्वपूर्ण मामले में महात्मा जी ने कहा था कि जो व्यक्ति भूख से पीड़ित हो, जिसका पेट भरने के अलावा और कोई उद्देश्य नहीं हो, उसका जो शासन, व्यक्ति या व्यवस्था पेट भर देगी, वही उसका ईश्वर है, खुदा है, भगवान है और उसके लिए ईश्वर का दर्शन उसी में है। जब पेट की ज्वाला अतृप्त होती है, तो आदमी सबसे ज्यादा जरूरी अपना पेट भरना समझता है। उस समय दुनिया में उसे और कोई काम नहीं सूझता है। इंसान के सामने उस समय अंधकार हो जाता है। आम-आदमी को कितना भोजन चाहिए? एक सर्वे के अनुसार २७०० कैलोरी तापक्रम का भोजन चाहिए। किस गरीब आदमी को २७०० कैलोरी का भोजन मिलता है? बड़े लोगों के पास तो कैलोरी ज्यादा भी हो जाती है। उन्हें शुगर, बीपी जैसी बहुत सारी बीमारियां हो जाती हैं। फिर डाक्टर उसे भी मना करता है कि दूध है लेकिन तुम आधा गिलास ही पियोगे, रोटी है, लेकिन सिर्फ एक सादी रोटी खाओगे, घी नहीं खाओगे। प्रकृति ने उनके लिए भी सजा उपलब्ध करा दी है। आज गरीब के पास रोटी है, तो नमक नहीं है। यह सजा बहुत ही गलत है। व्यवस्था को यह देखना है कि उन्हें नमक जरूर मिले। दाल जैसा पौष्टिक आहार उन्हें जरूर मिलना चाहिए। चना या अन्य पौष्टिक चीजें उसे जरूर मिलनी चाहिए, जिससे उसके शरीर में खून बने। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आजादी के इतने दिनों बाद भी इंसान के शरीर में खून नहीं बनता है, उस व्यवस्था के खिलाफ देश में गुस्सा नहीं है। यदि खून हो जाए या इंसान कहीं कट जाए, तो कोहराम मच जाता है। हमारे देश में कई ऐसी घटनाएं घटी हैं, जहां इंसान कट गया है। आज दो दिनों से हाउस स्टाल है, क्योंकि नंदीग्राम में इंसानों पर गोलियां चली हैं। इससे काफी चिंता है और लोगों को चिंता होनी भी चाहिए। मैं इसकी तारीफ करता हूं कि इसके लिए चिंता और गुस्सा होना चाहिए, लेकिन इसके समाधान के लिए उपाय भी खोजना चाहिए। आज छत्तीसगढ़ में ५५ पुलिसकर्मी मारे गए, जो व्यवस्था की सिक्योरिटी के लिए थे। वहां आदिवासी लोग भी थे। उनको ट्रेंड किया गया था और हथियार दिया गया था। उन्हें ट्रेंड करके नक्सल प्रभावित इलाकों में लगाया गया था, लेकिन उनको वहां मार दिया गया। जब सड़क पर खून बहता है और इंसान कट जाता है, तो काफी गुस्सा फैलता है। लेकिन आज जो व्यवस्था और कानून बनाने की मांग की जा रही है, क्या कारण है जिसकी वजह से इसको प्राथमिकता नहीं दी जाती है। खून बहे, तो कोहराम मच जाए, किंतु खून शरीर में नहीं बने, तो कुछ न हो। जब तक उस व्यवस्था पर भी गुस्सा नहीं होगा, तब तक जो यह कानून बनने वाला है, इसका कोई लाभ नहीं होगा, इसलिए इस बात को प्राथमिता देनी होगी। चाहे व्यवस्था हमारे हाथ में हो या उनके हाथ में हो। मैं एक बुनियादी सवाल सदन में उठा रहा हूं। यह ठीक है कि कानून के बारे में उनका सुझाव है। लेकिन गुस्सा कैसे आएगा? सारे भूखे लोग अनआर्गनाइज्ड हैं। उनका कोई संगठन नहीं है। यदि गरीब लोग, सीमांत किसान, असंगठित मजदूर संगठित होते, तो व्यवस्था झुकती। व्यवस्था इसीलिए नहीं झुकती है, क्योंकि पापुलेशन स्कैटर्ड है। जो भूख से पीड़ित लोग हैं, जो आज कुपोषण के शिकार है, वे असंगठित हैं। इनकी कोई जमात नहीं है, इनका कोई संगठन नहीं है। इसीलिए उनको ताकत नहीं माना जाता है। लोकतंत्र में जिसके पास समर्थन होता है, उसी के पास सच खड़ा हो जाता है। लोकतंत्र में हरिश्चंद्र का सच नहीं चलता है। मैं यह बात सदन के रिकार्ड में लाना चाहता हूं। हरिश्चंद्र का सच किताबों और लाइब्रेरी में चल सकता है, लेकिन व्यावहारिक रूप में, राजनीति में सच वही होगा, जिसके पक्ष में समर्थन होगा। आज गरीब के पक्ष में समर्थन नहीं है, न संगठन है और न ही गरीबों में एकता है। हमारे वामपंथी भाइयों ने बहुत से स्लोगन दिए कि दुनिया के गरीब एक हो जाओ, लेकिन अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ है। अगर ऐसा हो जाए, तो बहुत अच्छी बात है। Mao Tse-tung said: “Power flows from the barrel of the gun”.  वह एक जमाना था, यहां दोनों चीजों पर ध्यान देना पड़ेगा और उनमें बैलेंस करना होगा। भूख मिटाने की व्यवस्था में जो डेमोक्रेटिक सिस्टम है, उस संबंध में कानून बनाना होगा, उसे इंप्लीमेंट करना होगा और मॉनिटरिंग करनी होगी। हमारे यहां बहुत सी योजनाएं बनी हैं। [v12] 

राष्ट्रीय ग्रामीण योजना किन लोगों के लिए है? उन गरीब लोगों के लिए है जो भूमिहीन मजदूर हैं, ग्रामीण मजदूर हैं। एक अच्छा प्रोग्राम बनाया गया है। यूपीए सरकार में बहुत क्रान्तिकारी बिल पास हुआ और एक्ट बना। यदि इस एक्ट के अनुपालन का हिसाब लगाएं तो डेढ़ साल में किसी इलाके में १४-१५ प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है। इस बजट में २०० से ३३० जिलों के लिए प्रावधान किया गया है। यदि किसी जिले में परसैंटेज का एनालेसिस किया जाए तो १४ प्रतिशत, १५ प्रतिशत मिलेगा। इसका क्या मतलब है, ८५ प्रतिशत का क्या होगा? इसमें ८५ प्रतिशत मजदूर शामिल नहीं हो रहे हैं यानी इस कानून का लाभ ८५ प्रतिशत मजदूरों को नहीं मिल पा रहा है। वह कैसे मिलेगा? हन्नान मोल्लाह जी ने ठीक कहा था कि योजना का १५ प्रतिशत लाभ ही मिल पाता है। मैं यहां कह रहा हूं कि अभी जो एक्ट आया है, उसका लाभ भी १५ प्रतिशत से ऊपर नहीं मिल पाया। गरीब व्यक्ति औसत उम्र से पहले मर जाता है और इसका प्रभाव राष्ट्रीय उत्पादन पर पड़ रहा है। आज अनाज का ट्रेंड लो क्यों हुआ? ठीक है, मौसम ठीक हो जाता है तो ट्रेंड ठीक लगता है। हम मौसम पर डिपैंड करते हैं। यदि किसी व्यक्ति की औसत उम्र ६५ वर्ष है तो वह मजबूरी में, खाने के अभाव में, कुपोषण के चलते ४०-४५ की उम्र में मर जाता है। क्या इससे राष्ट्रीय उत्पादन पर कुप्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि व्यक्ति औसत उम्र से पहले मर जाता है?

हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी पूंजी श्रमशक्ति है। आज भी हम दुनिया में अपने हुनर के चलते जाने जाते हैं, क्योंकि हमारे जैसी काश्तकारी, हुनर दुनिया में और कहीं नहीं है। बड़े-बड़े ठेकेदार यहां से मजदूरों को विदेशों में ले जाते हैं। गांव में एक कहावत है – मन चंगा तो कटौती में गंगा। मन चंगा किसका होगा – रिक्शा, ठेला चलाने वाला व्यक्ति, निर्माण कार्य करने वाले मजदूर का, जो पूरे देश के महल बनाते हैं, दिल्ली में पुल आदि बनाने के कार्य में कंस्ट्रक्शन लेबर असंगठित मजदूर हैं। पूरे देश की दौलत कौन पैदा करता है? पूरे देश में असंगठित मजदूर दौलत पैदा करता है। वह कंस्ट्रक्शन का कार्य करता है, ईंट-भट्टे में कार्य करता है, रिक्शा चलाता है, पटरी पर फल बेचकर अस्पतालों में पहुंचाता है, अखबार बेचता है, अनाज पैदा करता है, मिट्टी, खेत-खलिहान में मेहनत करके इस देश में दौलत पैदा करता है। जो दौलत पैदा करने वाला व्यक्ति है वही दो वक्त की रोटी नहीं खा पाता। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है। इसीलिए पूरानी कहावत – मन चंगा तो कटौती में गंगा – जब तक पेट चंगा नहीं होगा तब तक इंसान का मन चंगा नहीं हो सकता। कहने में अच्छा लगता है लेकिन जब तक रिक्शा चलाने वाले, हल चलाने वाले व्यक्ति का पेट चंगा नहीं होगा, तब तक मन चंगा हो ही नहीं सकता, ऐसा मेरा मानना है।

मैं समझता हूं कि जो सोशल सिक्युरिटी है, आज अनआर्गनाइज्ड सैक्टर में ९३ प्रतिशत वर्कफोर्स है और मात्र ७ प्रतिशत वर्कफोर्स ऑर्गनाइज्ड सैक्टर में है, मतलब ३७ करोड़ लोग असंगठित मजदूर हैं जो भूख के शिकार होते हैं, जिन्हें कुपोषण है। ३७ करोड़ लोगों के लिए कोई सोशल सिक्य़ुरिटी नेटवर्क नहीं है। आज कानून की मांग क्या है? हमारे छोटे भाई ने बहुत अच्छा ईशू उठाया है। यूपीए के सीएमपी में ऐसा कानून बनाने के बारे में लिखा है और आज कहा जा रहा है कि वह विचाराधीन है। जब प्रश्न उठता है तो कहा जाता है कि विचाराधीन है, इस सैशन में लिया जाएगा।[N13] 

 आप देख लीजिए कि इस सैशन यानी २२ मई तक इसके लिए बिल आता है या नहीं? असंगठित मजदूर की सोशल सिक्योरिटी नेटवर्क और उसके वेल्फेयर के लिए अभी तक कितने कमीशन थे? वर्ष २००२ में अम्बरेला फॉर अनआर्गेनाइज्ड सैक्टर के लिए लेबर कमीशन बना। अभी श्री अर्जुन सेन गुप्ता की अध्यक्षता में एक लेबर कमीशन बना जिसने १६ मई २००६ को अपनी रिपोर्ट माननीय प्रधान मंत्री जी के सुपुर्द कर दी। अभी तक वह रिपोर्ट सदन में नहीं आई है और उसके लिए एक्ट भी नहीं बना है। इस संकल्प का ठीक प्रस्ताव है इसलिए इसको उससे जोड़ दिया जाये। कम से कम ३७ करोड़ अनआर्गेनाइज्ड सैक्टर के लोगों के लिए, ९३ परसेंट वर्क फोर्स जो इस देश में है, उसके लिए सैंट्रल लेजिस्लेशन बने। मैं समझता हूं कि माननीय सदस्य की जो मांग है, वह अनआर्गेनाइज्ड सैक्टर के लिए है। इस संकल्प की मंशा और उद्देश्य उसमें फलीभूत हो जाये क्योंकि बड़े पैमाने पर लोगों का जो पलायन हो रहा है, वह एक कारण है। आज आदमी को रोजगार नहीं मिल रहा है। देश में गरीबी बेरोजगारी के चलते है। आज पावर्टी ऐलीवेशन की बहुत चर्चा चलती है। इस सब के बारे में डिटेल से बताने का समय नहीं है क्योंकि इस पर अभी और भी माननीय सदस्य अपनी बात रखेंगे।

अंत में, मैं एक महत्वपूर्ण बात सदन में रखना चाहूंगा। आज सभी चीजों के दाम बढ़े हैं चाहे लोहा हो। …( व्यवधान) सुकदेव पासवान जी, जब बोल रहे थे, तब मैं टी.वी. पर उनकी बात सुन रहा था। आज समाज का जो अंतिम आदमी है चाहे वह आदिवासी, दलित, पिछड़ा वर्ग या हिली एरियाज अरुणाचल प्रदेश आदि का रहने वाला हो, उन दूर्गम क्षेत्रों में आज तक उनकी न्यूनतम मजदूरी नहीं बढ़ी है। दाल, सब्जी आदि सब चीजों के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन न्यूनतम मजदूरी नहीं बढ़ रही है। आज किसी राज्य में मनिमम वेजेज ६२ रुपये, किसी राज्य में ७२ रुपये और किसी राज्य में ७५ रुपये है। यह देश के सामने दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

आज जो लोग अनाज पैदा करके पूरे देश की जनता और देश की सरहद पर तैनात जवानों को खाना खिलाते हैं, उनकी न्यूनतम मजदूरी नहीं बढ़ रही है। लोहे, सीमेंट आदि कारखाने के माल के दाम दस गुणा बढ़ रहे हैं, लेकिन जो गरीब आदमी अपना खून और पसीना बहाकर देश की दौलत पैदा करता है, उस आदमी की आज न्यूनतम मजदूरी नहीं बढ़ रही है। यहां पर सरकार के लोग बैठे हुए हैं। हम भी सरकार में हैं। आप बताइये कि न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाने के लिए क्या प्रयास किये गये हैं? क्या इस बारे में कोई प्रयास हुआ है? हमारा कहना है कि आप राज्यों को इस बारे में सर्कुलर दीजिए। आप राज्यों को अनाज देना बंद करिये। आज फूड सिक्योरिटी बहुत बड़ा सवाल है। सभी राज्यों में इलैक्टेड चीफ मनिस्टर हैं। आप भी केन्द्र में इलैक्टेड होकर आए हैं। आप कह सकते हैं कि हमारे पास अनाज की कमी है इसलिए यदि आप न्यूनतम मजदूरी नहीं बढ़ाते तो हम अगले महीने से अनाज की सप्लाई कट कर देंगे। फिर देखिये कि कैसे न्यूनतम मजदूरी नहीं बढ़ती। आज हरियाणा के चीफ मनिस्टर ने मजदूर की न्यूनतम मजदूरी २४०० रुपये प्रति माह से बढ़ाकर ३५०० रुपये कर दी, तो इस बात पर बवाल मच गया। पूरे कारपोरेट जगत के लोग हड़ताल करने लगे यानी गरीबों की जब न्यूनतम मजदूरी बढ़ेगी, तो हड़ताल हो जायेगी। जब कारखानों के माल का दाम बढ़ेगा, तो उसका स्वागत होगा। बजट में भी वभिन्न वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं। मैं बड़े दर्द के साथ इस सवाल को उठा रहा हूं। मैं कोई भाषण नहीं दे रहा। मैं दिल से इस बात को बोल रहा हूं कि गरीबी उन्मूलन कैसे होगा? अभी जिंदल जी ने कहा कि जीरो हंगर एक्ट बने। गरीबी उन्मूलन के लिए हमने बहुत कार्यक्रम चलाये। आपने स्वर्ण जयंती योजना आदि कई केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के बारे में बताया। गरीबी उन्मूलन तभी हो सकता है जब लोगों को रोजगार मिले औंर क्रयशक्ति बढ़े। आज उनकी क्रयशक्ति घट रही है। यदि महंगाई बढ़ेगी, तो गरीबों की परचेजिंग कैपेसिटी घट जायेगी। यह गरीब पर एक तरह से टैक्स है। जब चीजें महंगी होंगी तो सब लोगों पर एक नये प्रकार का अघोषित टैक्स लग जायेगा क्योंकि जो सामान वह पहले १० रुपये में खरीदता था, उसे अब पन्द्रह रुपये में खरीदना पड़ेगा। इस तरह उसमें पांच रुपये का टैक्स हो गया। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि जब तक गरीबों की क्रयशक्ति नहीं बढ़ेगी, रोजगार के अवसर नहीं खुलेंगे तब तक पावर्टी ऐलीवेशन कहना बकवास है।[MSOffice14] 

पावर्टी एलविएशन तब होगा जब हर इंसान की ाय-शत्ति बढ़े। जब ाय शत्ति बढ़ेगी, किसी रोेजगारोन्मुखी योजना वे माध्यम से आदमी रोजगार में लगेंगे तभी गरीबी घटेगी। क्या आज रोजगार बढ़ा है, क्या लोगों की ाय शत्ति बढ़ी है? लेकिन कहते हैं कि गरीबी का उन्मूलन हो गया है, गरीबों की संख्या घट गयी है, इसे घटा कर २६ प्रतिशत कर दिया जाए। गरीबों वे मुंह में जुबान नहीं होती है। आज जो बदलता हुआ समय है, उसमें गरीब जो पसीने से दौलत पैदा करता है, जब बोलने लगेगा तो बड़ी से बड़ी सल्तनत भी हिल जाएगी। इसीलिए आज जो विकास हो रहा है, उसमें धीरे-धीरे गरीब अपने अधिकार को समझेगा। मुझे विश्वास है कि गरीब अपनी बात को बोलेगा। बच्चों और महिलाअों में जो कुपोषण की स्िथति है, मैं अभी उसवे बारे में नहीं बोलना चाहता हूँ क्योंकि समय की कमी है। मैं मूल बात कहना चाहता हॅॅू कि आज जो व्यवस्था है, उस व्यवस्था वे तहत कभी भुखमरी नहीं मिटेगी, न कभी कुपोषण दूर होगा। इसलिए नए सिरे से इस पर विचार करना होगा, इसवे लिए कानून लाना होगा और असंगठित मजदूरों वे लिए बिल लाना चाहिए। भुखमरी से जिस भी राज्य में मौत हो, वहां की राज्य सरकार की इसवे लिए जिम्मेदारी तय करनी चाहिए, उस राज्य सरकार को इनएफसिएंट घोषित कर देना चाहिए। जिस सरकार वे ज्युरिसडिक्शन में भुखमरी हो, उस पर जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। जब हम इसे प्राथमिकता क्षेत्र मानकर चलेंगे तभी हम भुखमरी और कुपोषण पर रोक लगा सकते हैं। ऐक्ट तो हम बनाते हैं लेकिन वह लागू नहीं हो पाता है। ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना में मात्र १५ प्रतिशत अमल हुआ है। जो डेमोव्रेटिक फार्म ऑफ गवर्नमेंट है, उसमें तो ऐक्ट बनाना ही तरीका है। सदन को इस पर चिन्तन करना चाहिए, यह एक संवेदनशील मामला है। भूख की चिन्ता सभी को होनी चाहिए। मैं समझता हूूं कि जितने भी दर्शन और जितने भी अर्थशााी हुए हैं, संत कबीर, संत रविदास से लेकर स्वामी विवेकानंद तक, सभी दार्शनिकों, हमारे सभी पूर्वजों नेे श्रम को प्रतिष्ठित किया। संत रविदास जी को पारसमणि मिली तो उन्होंने उसे छुआ भी नहीं और कहा कि हर इंसान के शरीर में पारसमणि है। इंसान के शरीर का पसीना जिससे वे दौलत कमाता है, वह हर इंसान के पास है। पारसमणि जो किसी महाराजा-महारानी के पास है उससे इस देश और विश्व का निर्माण नहीं हो सकता है। इसलिए जिस पसीने से आम आदमी दौलत पैदा करता है, वही असली पारसमणि है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं कहना चाहता हूँ कि भूख मिटाने के लिए निश्चित रूप से जो यह संकल्प आया है, उसे सरकार को मान लेना चाहिए और इसके बारे में एक केन्द्रीय विधेयक लेकर इस सदन में आना चाहिए और असंगठित क्षेत्र के बारे में जो बिल पेंडिंग पड़ा हुआ है, उसे भी लागू करना चाहिए क्योंकि यह इसी से जुड़ा हुआ मामला है। यह ३७ करोड़ लोगों से जुड़ा हुआ मामला है। तभी हम लोगों को रोजगार से जोड़ सकते हैं, क्रय शक्ति बढ़ा सकते हैं। हम जब लोगों को रोजगार से जोड़ेंगे तभी गरीबी उन्मूलन पर उसका असर होगा। जब भूख मिटेगी, तभी मन चंगा हो सकता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग हो सकता है और कंस्ट्रक्टिव विचार आ सकते हैं, नहीं तो नक्सलवाद और सल्वा जुडूम जैसी गतवधियों को रोकने के लिए आप चाहे जितनी फोर्स लगा दें, कोई लाभ नहीं होगा। मैं समझता हूं कि जब तक सामाजिक और आर्थिक विकास नहीं होगा, तब तक नक्सलवाद की समस्या से देश निजात नहीं पाएगा। इसलिए मैं कहना चाहता हूँ कि हम लोग जो आज मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट हैं, मनिस्टर हैं, वे ३५,००० फिट ऊपर उड़ते हैं।[r15] 

गरीबी और अमीरी का [R16] फर्क आज कितना हो गया है, यह मैं बताना चाहता हूं। जनता ने हमें मेनडेट दिया है, सुविधा दी है इसलिए हम सांसद लोग हवाईजहाज से भी सफर करते हैं, लेकिन वह पांच फीट का इनसान जो धरती पर है, उसके पेट में अनाज है या नहीं, इस पर कभी विचार नहीं किया। इसलिए यह एक मौजूं सवाल है जिस पर हमें विचार करना चाहिए। इस कारण हमारे और जनता के बीच में ३५,००० फीट का अंतर आ गया है, इकोनॉमिक डिसपैरिटी हो गई है, क्योंकि हम लोग हवाईजहाज से ३५,००० फीट ऊंचा उड़ते हैं और आम जनता से सम्पर्क स्थापित नहीं कर पाते। इसलिए आज गरीबी और अमीरी के बीच में इतना बड़ा अंतर आ गया है। पहले गरीबी और अमीरी में करीब १७-१८ फीट का ही अंतर था, क्योंकि जो धनी लोग थे, वे ज्यादा से ज्यादा हाथी रखते थे और उस पर सवारी करते थे। रावण जैसे लोग अपवाद स्वरूप थे, जिसके पास पुष्पक विमान था। आज के समय में गरीबी और अमीरी के बीच ३५,००० फीट का अंतर आने से आर्थिक विषमता बढ़ गई है। इसलिए मैं दावे से कहना चाहता हूं कि अगर इसे कम नहीं किया गया तो दुनिया की कोई ताकत गरीब और भूखे को ए.के.-४७ रखने से रोक नहीं सकते। इसलिए हिंसा तभी रुकेगी, जब आर्थिक असमानता दूर होगी।

डा. राम मनोहर लोहिया ने इसी लोक सभा में १९६२ में सम्भव बराबरी के ऊपर लम्बा भाषण दिया था। वे देश के सभी नागरिकों को समान भाव से रखने के पक्ष में थे, जिससे कोई भूखा न रहे। अगर हम चाहें तो गरीबों के लिए खाने का इंतजाम हो सकता है, हम चाहें तो भूख का निदान कर सकते हैं। भूख से इनसान मर जाए, यह व्यवस्था का दोष है, चाहे किसी का भी राज हो। इसलिए जिन लोगों के हाथ में व्यवस्था की बागडोर है, उन्हें कड़ा संकल्प लेना होगा कि आर्थिक विषमता की खाई को पाट दिया जाएगा। अभी देश के १४ राज्यों में ही नक्सलवाद की समस्या है, मैं रिकार्ड से कहना चाहता हूं कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश के सभी राज्यों में अराजकता और नक्सलवाद बढ़ेगा, जो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक संकेत होगा।

DR. PRASANNA KUMAR PATASANI (BHUBANESWAR): Madam, Chairperson, I am delighted to hear the viewpoints made by my hon. friends on this very important Resolution concerning formulation and implementation of comprehensive food and nutrition security scheme.  I am particularly grateful and thankful to the mover of this Resolution, Shri Navin Jindal, for making very valuable points and suggestions. Freedom from hunger is a must.  Each mouth is to be fed.  It is just the Right to Food. 

            As per our Constitution, it is the right. यह संवैधानिक अधिकार है, संविधान में उल्लिखित है कि हर आम आदमी को खाना मिलना चाहिए। Whichever party may be in power, be it the Congress party, be it the BJP, be it the Communist party, or for that matter any Alliance, if they do not know the art to feed food to the common citizens of the country, they have no right to continue in power.

17.33 hrs.                              (Shri Devendra Prasad Yadav  in the Chair)

            At a very right time, my hon. friend, Mr. Jindal has moved this beautiful Resolution on the floor of the House, that is, Right to Food.

            We call our country as BHARAT VARSH.  BHA  means alok khand main rut; BHA means sadhna main rut; BHA  means bhaat; bhaat means arna; arna means rice.  Do not waste arna. By wasting arna, we are wasting our own  blood. The scientists can create  anything and everything except blood.  Blood can be created only through food. So, Right to Food is the Right for the human being. यह संवैधानिक अधिकार है।

            आप लोगों ने अभी कहा, about naxalite problems. यह प्राब्लम क्यों होती है?

बुभूखीता किन: न: करोति पापम् । The person, who is hungry is leading a very unholy and painful life because of food. इसीलिए नक्सलवादियों को इतनी सुविधा हो जाती है कि वे इसका फायदा उठाते हैं, चाहे हरिजनों से या गरिजनों से उठाएं।

Even after 60 years of our Independence, poverty seems to be our property.  We are the proprietor of the property of hunger.[r17] 

 

धनी आदमी और गरीब आदमी को भारतवषर्ता में रहने का मौका संविधान के द्वारा मिला है। We are political animals. It is because one who does not know the art how to feed is a friend even. He is not a man. For a human being, it is art of living, that is, science of being. That is Brahma, Brahmana. Ana means Anand. He knows the art of how to attain the highest mind of being, that is, science of being and art of living. Our belly is being packed with dead bodies. Those who are eating non-vegetarian food, that is, are the store houses of the dead body. The natural tendency of that dead body is to lead you to the burning ghat, that is, Shamshan Ghat. Those who are eating vegetarian foods, fruits and flowers may go to the temple. It is your option. You either choose burning ghat or temple.

गॉड ने हमें माता की गोद में पैदा किया और माता के स्तन में दूध दिया। बच्चे के पैदा होने पर माता के स्तन दूध से भरे होते हैं। जो माता अपने स्तनों से बच्चे को दूध नहीं पिलाती है वह कुमाता कहलाती है। That is why, mother is not feeding the children. The rural mother is also not feeding, not the urban women only, after seeing, particularly in the media, the beautiful scenario that you people are enjoying and we all are enjoying everyday. It is also that the mother is protecting her beauty, maintaining her beauty. But beauty is the duty of every individual. If we know the art how to maintain the life, life is vibrating in the life. Mind is vibrating in the mind and we are always propagating in favour of the slogans ‘Vibrant India, Incredible India into India. But we have forgotten the rights, that is, the Right to Food. अर्नमय कोश: I know my State is a below the poverty line State. यह कहावत मेरी नहीं है यह किसी मनीषी की कहावत है कि जेल में रहने वाले एक कैदी को जितना फूड, पानी, कपड़ा और खाद्य पदार्थ मिलते हैं जेल से बाहर रहने वाले आम व्यक्ति को जब इतना खाना, पानी, कपड़ा और खाद्य पदार्थ नहीं मिलेगा तो उसका इरादा और इच्छा जेल में रहने की होगी। After 60 years of democracy, we are presiding over poverty. Sir, poverty is our property and we are the proprietor of boasting that we protect democracy. Democracy cannot be maintained. Demo means ‘people’, cracy means ‘rule’. डेमनक्रेसी हो जाता है। It is because we do not know how to control Naxalism. The people are dying everyday. Who is killing them? According to your analogy, I am telling you the same thing. Naxalism can be rooted out very easily if food is served to every citizen in right way and in right time. Mr. Jindal is raising a very vital point that is to be honoured. This Parliament is a law making body and we have to promulgate a law to encourage him. So truth is truth. Truth is simple. Truth is legible. Truth is natural.  Truth is life supporting. So, let us support the life to protect all the Indians, those who have the right to have food of life.

            My State, particularly, is below the poverty line State where the mother is selling her own baby or child to get only Rs.5 and not more than that. It happens to the country. The Alsatian dog is even getting, you know इतना मटन खाता है जितनी की आम आदमी, किसान और मजदूर की मजदूरी नहीं है। This is the fate of democracy. So, it is right time his right to food is a beautiful proposal that must be honoured and must be approved in this august House.

 

 

SHRI C.K. CHANDRAPPAN (TRICHUR): Thank you Mr. Chairman. Poverty has many expressions. Unemployment and hunger are both expressions of poverty. Malnutrition is another. I am very happy that we are getting an opportunity to discuss this problem in the House because my young friend Shri Naveen Jindal has brought a Resolution which gives us this opportunity to discuss this problem and find a solution.

            Now, I do not want to go into statistics. Enough statistics has been provided here. I read from an article :

“As many as 45.9 per cent of children are underweight, 38 per cent are stunted and 19.1 per cent wasted … this even before they turn three. Contrast this with China, where only eight per cent are underweight”.

 

            That shows that in a different economic system that China has, they have succeeded in bringing down the malnutrition problem. Here in India, I do not say that we are making no serious effort. “But India has the hunger levels of malnourished children than Sub-Saharan Africa despite the Asian giant having more funds and better infrastructure to tackle the problem” – the U.N. Children’s Fund said so.

            This is the Budget Session. We claim that the GDP growth is 9.2 per cent. It is a spectacular achievement, no doubt. But, at the same time, we see this spectacle that the country is having maximum unemployment, maximum poverty, and maximum hunger. How has this to be bridged? That is the problem. Shri Naveen Jindal in his speech said about a Zero-level Hunger Act. I am not against it. But I do not think one more legislation will bring a solution to this problem.

SHRI NAVEEN JINDAL (KURUKSHETRA): It can be a comprehensive legislation.

SHRI C.K. CHANDRAPPAN : Well, we have enough comprehensive legislations. The problem I look at is slightly different. Our hon. Minister for Food made a statement just before your speech. He said that : ‘We are doing certain good things for the farmers, a little improvement in a kind of bonus to overcome the natural calamity.” It is a good thing. But then, Shrimati Sumitra Mahajan was in Chair and she asked whether you will procure enough and you did not answer that. I want to know whether there will be procurement or not. The policy is there. But procurement, as it was before, is not there.

            When you speak of the problem of hunger and malnutrition, there should be in the Indian conditions, a very comprehensive Public Distribution System. Shri Hannan Mollah was pointing out that there was a good Public Distribution System in Kerala. Long before, when that Public Distribution System was established, Shrimati Indira Gandhi said in one of her speeches in Parliament – it was one of the best – that ‘I am writing to all the Chief Ministers in the country to have a system like that’.

            That was long back. She also said that legislation for providing job security and employment conditions to agricultural workers, as it was enacted in Kerala, should be enacted in other States. These were all her dreams 30 years before, but today, the Public Distribution System, one can say in a way, is in a shambles. The Minister in his Statement today also said that if there is difficulty, they will import. … (Interruptions) They have to import. They have reached that stage. That is the problem. The problem is that we were tom-toming about the food security that we had achieved. We really had achieved food security long ago, but what has happened to that? Why have we descended from that level to a level where we have to import? He said that they have to. Why? There, they have to look at the problem and see how to tackle the problems in relation to the peasantry. If the peasantry today is committing suicides, not in five States but many more, all over the country, the reason behind it is that the problems of the peasantry are not very well attended to. When remunerative price of their produce is not there, you tell them to sow and harvest more and more, but when a man, who is a peasant, produces more, he expects that he should have a condition under which his produce will be sold in the market at a remunerative price, but there is no such guarantee. When no guarantee is there, he will lose interest in agriculture and look for something else. Your food production is coming down because of that reason. So, until and unless you find solution to that, you cannot solve the problem of food security. Import is not the solution; it may provide an immediate help.

            I remember our great economist Prof. Amartya Sen, a Nobel Laureate.  He is one of the living Economists who is applauded by the world for his understanding of poverty and hunger. He is known as an Economist who has studied famine and the reasons of famine.  I would suggest you to read his study on West Bengal famine. What did he say? It was the biggest famine which shook the whole foundations of our understanding of the food security and everything in those days. He said that all the statistics of that time showed that there was enough food produced in India at that time, during the British Rule and if that had been distributed among the people, there would have been no starvation, no famine and no hunger. Then, he pointed out that the problem was that the system of distribution was such that it did not reach the hungry persons. Then, he asked: Where did it go? It went to the godowns of the hoarders. So, it was a manmade famine and manmade hunger. The toll of the famine was in millions.

            Here also the condition is not very much different. The Food Corporation of India was built in this country as one of the premier public sector undertakings with a view that it would enter the market, do the procurement and protect the interest of the farmers. Thereby, the hungry men will be provided food. But in the wake of liberalisation and globalisation, the Government thinks that when in the globe, Australia is producing rice and America is producing wheat, they can import it. That kind of an understanding of globalisation came. One of its first victims was procurement and another victim was Food Corporation of India.[s18]  

Hence, you did not answer when the Chair asked whether you will procure. Will you answer that issue when you answer to this discussion? If procurement is done properly and with a political will to feed people, then I think that we would have enough food, which can be procured and the interest of the people served. What can be done if that political will is not there?

            Let us take the other aspect of it. I will read one sentence from a political and Economic Review article. It says that :

“Some of the middle income States such as Kerala and Tamil Nadu have completely better nutritional achievements than higher income States like Maharashtra and Gujarat. North-Eastern States are comparatively better performing States, and some of them, for example Sikkim, have even outperformed Kerala.”

 

            Kerala is a poor State. If you take the parameters of employment-unemployment; the per capita income; the State’s GDP etc., then Kerala is one of the lowest in the ladder. On the other hand, it is one of the best in the social service sectors because of the political determination of that State, namely, to provide facilities for education; for better Public Distribution System; better health facility, etc. This is the decision taken irrespective of the Party being Congress, Communists, etc. We may change, but everybody continues with that determination, which is unfortunately lacking in you. Therefore, I say that this is not merely a question of whether you have good GDP level; good income, etc., but it is a question of whether you have the determination that you will do so, so that the people will not go hungry every night. This determination is lacking.

MR. CHAIRMAN: Mr. Chandrappan, how much more time will you take to conclude your speech?

SHRI C.K. CHANDRAPPAN : Sir, I will conclude in a couple of minutes, but I think that we will have to extend the time. We will have to extend it because there are many speakers to speak on this issue, and the subject, as you know, is also very important.

            I would like to highlight certain aspects of the problem. Nearly 80 per cent of the brain development of a child takes place between the age of 4 years and 6 years, but it is at this time that most of our children go hungry. This means that we are doing a dis-service for the future of our country, and for posterity.

            There are schemes like ICDS. I salute it as it is one of the biggest schemes in the world along with the Mid-day Meal Scheme, but the manner in which it is run is pathetic. The food that you are offering; the nutrition that you are providing to pregnant women and young children; the conditions under which they are kept in the Anganwadis, etc. are very bad. I do not know whether you go to the villages, and see it as many of them are sub-standard. Why should it be so? Why we cannot allow a little more money for it?

            I do not say that the Budget for defence sector is very big. The Minister is providing liberally for defence, and added another sentence that is not written. He said that : “If defence sector needs more money, then there is no problem about it”. Why we cannot take it this way? Why we cannot provide a little more money to them if our posterity has to be in a condition so that they will be healthy, intelligent and good and the future of the country will also be brighter?[r19] 

That is why, probably, the National Common Minimum Programme wanted six per cent allocation for education, but we are nowhere near it. The snail pace at which we are advancing in education, it looks we are not advancing, but we are going a little backward, if you take our GDP and the percentage of Budget allotment. If there is employment, only then there is money with which a poor man can feed his children.

            The Employment Guarantee Scheme, we salute it.  When the Minister brought it before the House, that was the only occasion when Shrimati Sonia Gandhi spoke in this House. She said that this was the Scheme that they were going to implement in 200 districts. Now, 130 more districts were added. Why can you not say that in one go you are going to do it in all the 600 districts? I know that money constraints will be there. For overcoming that, you must look at different means and change your taxation policy. You should tax the rich. We are living in a period of super-rich millionaires. They go scot-free because of soft taxation. You have to tax them more, taxes for the children, or impose a cess to strengthen Anganwadis and to qualitatively improve them. Anganwadis, I am only speaking of children and am not speaking about workers and helpers whose condition is really pathetic.

            There should be a new taxation policy to amass wealth, and while distributing that wealth, more priority should be given to health and education, and also for children and their nutritional demands should be met. Employment Guarantee Scheme should be implemented in every district, and you should not wait for another three to four years to be all over the country. Only then we will be able to see that the children do not go hungry.

            In conclusion, I would say that there are certain areas which require special attention. Agrarian sector where hunger, unemployment and poverty is more, the traditional industries where again unemployment, hunger and everything is more, the minorities, especially the Muslims – the Sachar Commission Report has come and how the poverty stricken poor people among that community are suffering – even those special areas are to be tackled with special care and special programmes are made. With political determination, if you implement it, then, probably, Sir, there will be better results. Once again, I support this Resolution.

श्री कीरेन रिजीजू (अरुणाचल पश्चिम):सभापति महोदय, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं नवीन जिन्दल जी का तहेदिल से समर्थन करते हुए कहना चाहूंगा। मुझे डर है कि सरकार अंत में यही कहेगी कि आप अपना संकल्प वापस ले लें। हम लोग इस मामले में कुछ कदम उठा रहे हैं लेकिन इस बार सारे दल मिलकर इसे बदलकर यह तय कर लें कि इस संकल्प को वापस न लिया जाए और साथ-साथ सरकार भी इसका समर्थन करे क्योंकि अभी-अभी आपने हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑप इंडिया में देखा होगा कि इंडिया में, एशिया में सबसे ज्यादा बलिनेअर्स हो गये हैं लेकिन साथ-साथ यह भी लिखना चाहिए कि सबसे ज्यादा गरीबी भी हिन्दुस्तान में है। [r20] 

18.00 hrs.

            इसका कहीं ज़िक्र नहीं हुआ है और इस बात का प्रकाशन नहीं हुआ है, वे लोग इस चीज को क्यों भूल जाते हैं? क्या वल्र्ड लैवल पर ३६-३७ लोग बिलनियर्स हो गये , उनका नाम सुन कर गरीब लोगों का पेट भर जायेगा? हमें यह सोचकर अफसोस होता है। हिन्दुस्तान तो अमीर हो रहा है , लेकिन हिन्दुस्तानी लोग गरीब हो रहे हैं…( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब छ: बज रहे हैं, यह संकल्प अगले सैशन में आयेगा और आपका भाषण अगले सत्र में जारी रहेगा। अब हम स्पेशल मैंशन लेंगे।

_______