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Title : Further discussion on the motion for consideration of the Bill moved by Shri P. Chidambaram on the 18th March, 2006.
MR. SPEAKER: Now, we will take up the Finance Bill first. Dr. Laxminarayan Pandeya.
SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU (SRIKAKULAM): Sir, what about ‘Zero Hour’? … (Interruptions)
MR. SPEAKER: Today’s Matters of Urgent Importance are of great importance. You will get longer time. It will take two hours or a little more time to pass the Finance Bill. There will be no Lunch Hour. We will take up around 1.30 p.m. the Matters of Urgent Importance. I want to give longer time for important matters. Everybody will get a chance to speak.
डॉ. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय (मंदसौर) : अध्यक्ष महोदय, कुछ दिन पहले हमने वर्ष २००६-२००७ के आय व्यय पर चर्चा की थी और अब हम वर्ष २००६-२००७ के लिए प्रस्तुत वित्त विधेयक पर चर्चा कर रहे हैं। कई माननीय सदस्यों ने इस पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मैं उन्हें दोहराना नहीं चाहूंगा, लेकिन दो-तीन बिंदुओं की तरफ आपके माध्यम से वित्त मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा।
जहां तक देश में समानान्तर अर्थव्यवस्था का सम्बन्ध है या जो पैरेलल इकोनॉमी हमारे देश में चल रही है, उस कालेधन को रोकने के लिए इस वित्त विधेयक में कहीं भी किसी प्रकार का कोई उपाय प्रदर्शित नहीं किया गया है कि किस प्रकार से इस समानान्तर अर्थव्यवस्था को रोकने का प्रयास किया जाएगा। ठीक इसी प्रकार से जो हमारी कर-संग्रहण की व्यवस्था है उसमें जो प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, उसमें जिस प्रकार से तेजी आनी चाहिए, वह नहीं आ रही है। आज भी हजारों करोड़ रुपये का कर बकाया है जिससे सरकार की असमर्थता, असक्षमता और उदासीनता प्रदर्शित होती है। अभी समाचार पत्रों में निकला कि काले धन को रोकने के लिए आप ५०० रुपये के नोट को एक अप्रैल से बंद करने जा रहे हैं, बदलने जा रहे हैं। आपको मालूम है कि पहले भी काले धन को रोकने के लिए एक हजार रुपये के नोट को बंद किया गया था और लोगों को एक हजार रुपये के बंडल सड़क पर पड़े मिले थे या उन नोटों को जलाकर लोगों ने चाय बनाई थी, फिर भी काला-धन रुका नहीं। आज भी हजारों-करोड़ रुपये की काले-धन की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है। नकली करंसी चल रही है। मेहरबानी करके कोई ऐसा उपाय कीजिए जिससे यह काले-धन की समानांतर व्यवस्था रुक सके।
आपकी कर-संग्रहण व्यवस्था ठीक नहीं है, उसको भी ठीक किया जाना चाहिए और जो बड़े-बड़े उद्योपतियों पर बकाया राशि है उसकी वसूली की दिशा में भी कोई प्रयत्न किया जाना चाहिए, कोई उपाय किया जाना चाहिए। इसमें कोई उपाय नहीं बताया गया है।
तीसरी बात मैं निवेदन करना चाहूंगा कि कर-आरोपण के बाद कर-अपवंचन की बात है कि किस प्रकार लोग कर-अपवंचन करते हैं, टैक्स को बचाते हैं, आप ऐसे उपाय करें जिससे टैक्स से कोई बच न सके। यद्यपि आपने अभी आयकर विवरणी सरल करने की बात कही है, आप उसे सरल कर देंगे लेकिन आपने जो करदाताओं की संख्या बढ़ाना चाहते थे वह आय कर देने वालों की संख्या नहीं पढ़ पाई है। आयकरदाताओं को किस प्रकार से जुड़ना चाहिए, उसके लिए आयकर दाताओं को और सुविधा देने की आवश्यकता है, विवरणी को सरल करने की आवश्यकता है।
जहां तक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर का संबंध है आपने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के बारे में अलग-अलग दिशा-निर्देश दिये हैं जो हमारे वित्त-विधेयक हैं। उसमें प्रत्यक्ष करों से भी कुछ वसूली आप बढ़ाना चाहते हैं और अप्रत्यक्ष करों में भी आपने कुछ सुविधाएं दी हैं लेकिन मैं निवेदन करना चाहूंगा कि कुछ सुविधाएं जो वास्तव में वांछित थीं जिसके लिए आम आदमी चाहता था कि वह सुविधाएं उनके लिए बढ़ सकें, वह नहीं हुआ है। जहां तक आयकर का संबंध है, आयकर की सीमा आपने यथावत रखी है जिसको आपने बजट में भी बताया है और वित्त-विधेयक में भी उसका विवरण रखा है। जिस प्रकार से हमारी आमदनी बढ़ी है जिस प्रकार से आर्थिक समृद्धि बढ़ी है और जिसको आप बढ़ाना चाहते हैं। जिस प्रकार से उपभोक्ता वस्तुओं की आवश्यकता और उपभोग बढ़ा है उस द्ृष्टि से इसको बढ़ाकर और अधिक किया जाना चाहिए। जो आपने सामान्यत: वर्तमान व्यवस्था रखी है वह ठीक नहीं है, इसे भी आपको देखना चाहिए। आयकर सीमा की वर्तमान स्थिति में परिवर्तन जरूरी है।
जहां तक महिलाओं का संबंध है, आप महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन देना चाहते हैं, उनको संरक्षण देना चाहते हैं तथा ऐसी महिलाओं को जो ज्यादा उम्र की हैं, उनको सुविधा देना चाहते हैं और उनकी आय के साधन बढ़ाना चाहते हैं तो निश्चित रूप से उनकी आय की सीमा को बढ़ाने की आवश्यकता है। वित्त विधेयक में इसे पूर्ववत रखा गया है इस पर पुनर्विचार करें।
ठीक इसी प्रकार सीनियर-सिटीजन की आय सीमा को भी १ लाख ८५ हजार रुपये से आगे बढ़ाया जाना चाहिए जिससे वे भी अनुभव कर सकें कि उन्हें भी सहूलियतें मिली हैं। उनके साथ भी न्याय हुआ है।
ये दो-तीन विशेष बिंदु मैंने कहे हैं और जिन बिंदुओं पर माननीय सदस्यों ने आपका ध्यान आकृष्ट किया है उन पर भी ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। एक बिंदु जो सभी माननीय सदस्यों ने कहा है वह सहकारी बैंकों के लाभ पर करारोपण का है। सहकारिता हमारी रीढ़ है। सहकारिता को सुद्ृढ़ करने के लिए सरकार को विचार करना चाहिए। सहकारिता बढ़े और सहकारी बैंकों पर लगाया गया जो आयकर है उसे भी हटाया जाना चाहिए, उसको वापस लिया जाना चाहिए ताकि सहकारी बैंकों का हम जिस प्रकार से विकास चाहते हैं वह हो सके और हर प्रकार से हम सहकारिता के आधार पर काम कर सकें। आज सहकारिता देश भर में फैली हुई है। सहकारिता के बारे में माननीय वित्त मंत्री जी का भाषण है जिसमें उन्होंने उद्धृत किया था कि किस प्रकार से वे सहकारिता के आधार पर काम करना चाहते हैं। इन्होंने लिखा है कि “ धारा ५४डग के दायरे को केवल दो संस्थाओं अर्थात भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और नाबार्ड इसको छोड़ना चाहते हैं और बाकी जो दूसरी संस्थाएं हैं, सहकारी बैंक ऋणदाता संस्थाएं हैं उन्हें लाभ पर कर अदा करना चाहिए। साथ ही कहा कि सभी सहकारी बैंकों को इस धारा के दायरे से बाहर करता हूं। मैं कहना चाहूंगा कि यह उपयुक्त नहीं है। पृष्ठ २७ पर बजट भाषण में माननीय वित्त मंत्री जी ने चैरिटेबल संस्थाओं के संबंध में कहा है कि कुछ अनाम पैसा आता है। कुछ ऐसा पैसा आता हे, जिसका कुछ पता ही नहीं लगता, लेकिन उनको छोड़कर, हमारी बहुत सारी धार्मिक संस्थायें ऐसी हैं, जो वास्तव में लोगों का हित कर रही हैं, जो चकित्सा क्षेत्र में बहुत बड़ा काम कर रही हैं, कुछ विकलांगों के लिए काम कर रही हैं, कुछ वभिन्न प्रकार के संरक्षण देकर विपन्न और असहाय लोगों को लाभान्वित कर रही हैं। इस प्रकार की हमारी जो धार्मिक संस्थायें हैं, वे भी इससे वंचित हो जाएंगी। धार्मिक संस्थाओं के बारे जो आपने बातें कही हैं, उनके बारे में आपको फिर से विचार करने की आवश्यकता है। कृपया इस पर ध्यान दें, ताकि धार्मिक संस्थाओं के द्वारा जो सामाजिक हित के कार्य संपादित किये जाते हैं, वे संपादित किए जा सकें।
एक बार पुन: मैं उत्पादन शुल्क और सीमा शुल्क के बारे में कहना चाहता हूं। जहां आपने उत्पादन शुल्क में कमी की हैं, वहां सीमा शुल्क में भी कमी की है। सीमा शुल्क में कमी करने पर मेरा मानना है कि इससे आयात बढ़ेगा और निर्यात कम होगा। अगर हमारा निर्यात कम होता है और आयात बढ़ता है, तो इस द्ृष्टि से असंतुलन होगा और हमारे घरेलू उद्योगों को नुकसान होगा। घरेलू उद्योग प्रभावित न हो, इस द्ृष्टि से आयात-निर्यात को संतुलित करने की कृपा करें। मैंने प्रारंभ में कहा कि हमारा एक आर्थिक दर्शन होना चाहिए, एक आर्थिक विचार होना चाहिए, एक आर्थिक फिलोसोफी होनी चाहिए। यदि हम उस द्ृष्टि से काम करेंगे, तो निश्चित रूप से तरक्की होगी। अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि आपने जो करारोपण किया है, इसके संबंध में कुछ बिंदुओं की तरफ आप ध्यान दें, सहकारी बैंकों के बारे में, धार्मिक संस्थाओं के बारे में, वृद्धजनों के बारे में पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है। जहां तक कर अपवंचन का सवाल है, उसको भी रोका जाना चाहिए और काले धन को निकालने के बारे में आपको विशेष प्रयत्न करना आवश्यक है।
<xcÉÓ ¶É¤nÉå BÉEä ºÉÉlÉ àÉé +É{ÉxÉÉÒ ¤ÉÉiÉ BÉEÉä ºÉàÉÉ{iÉ BÉE®iÉÉ cÚÆ +ÉÉè® ¶ÉäÉ £ÉÉMÉ ºÉ£ÉÉ{É]ãÉ {É® ®JÉiÉÉ cÚÆ* *पूर्व में बजट पर विचार व्यक्त करते हुए कतिपय विषयों की ओर ध्यान दिलाया था। माननीय वित्त मंत्री महोदय ने भारत निर्माण के संकल्प को दोहराया है और उसे समयबद्ध योजनानुसार मूर्त रूप देना चाहते हैं, किंतु बजट में वभिन्न प्रावधानों के अतरिक्त जब हम करारोपण या कर संग्रहण की तरफ आते हैं और वित्त विधेयक को देखते हैं तो निराशा होती है। जैसा कि माननीय वित्त मंत्री महोदय ने अपने बजट भाषण में आयकर तथा अन्य कतिपय करों को यथावत रखने की बात कही है तथा कई वस्तुओं पर सीमा शुल्क या उत्पाद शुल्क घटाने की बात कही है। प्रत्यक्ष करों से ४००० करोड़ तथा अप्रत्यक्ष करों से २००० करोड़ के लाभ या प्राप्ति की आशा व्यक्त की है। वित्तीय वर्ष की वृद्धि दर आठ प्रतिशत आंकी गयी है, किंतु अर्थशास्त्रियों के मतानुसार इसे प्राप्त करना कठिन होगा। इसी प्रकार कृषि वृद्धि दर जो २.३ प्रतिशत बढ़ाना जरूरी है। इस संदर्भ में कर प्रस्तावों को देखना होगा। जहां तक आयकर का सवाल है, यथावत रखा है। किंतु आम आदमी की आय जहां बढ़ी है तथा अनुपातिक व्यय भी बढ़ा है। अत: इस सीमा को जो एक लाख रूपए तक है, बढ़ाना जरूरी है। उसे बढ़ाया जाए। इसी क्रम में महिलाओं के लिए जो एक लाख पैंतीस हजार की सीमा रखी गयी, उसे भी महिलाओं को आगे लाने की द्ृष्टि से या उन्हें उपयुक्त मदद की दष्टि से बढ़ाना जरूरी है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए १.८५ लाख रूपए तक का प्रावधान यथावत है, इसे भी बढ़ाना आवश्यक है। वित्त मंत्री जी इस पर पुनर्विचार करें। वित्त विधेयक की पहली सूची में प्रस्तावित आयकर की दरों पर पुनर्विचार जरूरी है तथा आयकर विवरणियों का सरलीकरण भी। वित्त मंत्री जी ने कई अवसरों पर काले-धन को बाहर लाने की बातें की हैं, लेकिन इस हेतु कोई प्रभावी योजना नजर नहीं आयी। काले धन की एक समानांतर अर्थव्यवस्था देश में चल रही है, इसे रोका जाना जरूरी है। जैसा कि मैंने कहा है कि आयकर विवरणियां दाखिल करने वालों की संख्या या दायरा यदि बढ़ाना है, तो उनका सरलीकरण आवश्यक है। बड़े कृषकों के बारे में भी मंत्री जी ने कोई संकेत नहीं दिया है। जिनकी पर्याप्त
*…* This part of the Speech wasLaid on the Table.
कर योग्य आय है। इस बारे में चैंबर आफ कामर्स, एसोचेम आदि वित्तीय संस्थाओं ने भी कहा है। प्रत्यक्ष करों को सरलीकरण का या युक्तियुक्तकरण (रेशनालाइजेशन) का प्रश्न है, इस बारे में निराशा हुयी है। मुझे आश्चर्य है कि सहकारिता आंदोलन या सहकारिता को प्रोत्साहन की चर्चा तो करते हैं, लेकिन सहकारी बैंकों द्वारा अर्जित लाभ पर भी कर लगाया गया है। मूलत: ये बैंक कृषकों या लघु उद्यमियों को ऋण देते हैं, जो गांवों में कार्य करते हैं। खेती जिनका आधार है, इस पर पुन: विचार जरूरी है और सहकारी बैंकों का करदेयता से मुक्त रखा जाए। यहां यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि वर्ष २००७ से धारा १० (२३) के अंतर्गत मूलभूत ढांचे के विकास हेतु निवेश पर आय की छूट समाप्त की जा रही है। यह उचित नहीं है। इससे हमारी परियोजनाएं प्रभावित होंगी।
मान्यवर, वभिन्न कर प्रस्तावों के साथ आपने सेवाकर का दायरा भी विस्तृत कर दिया है और उसमें कई अन्य छोटी-छोटी सेवाओं को लिया है। १५०० सेवाओं को सम्मिलित किया गया है, जिनका व्यवसाय अत्यंत सीमित है, साथ ही आपने टैक्स रेट भी आठ प्रतिशत से बढ़ाकर १२.५ प्रतिशत कर दी है, जो पुनर्विचार योग्य है। मैं अनुरोध करूंगा कि इसे पूर्व की भांति आठ प्रतिशत ही रखा जाए। मान्यवर, मैं वभिन्न प्रस्तावों के विस्तार में नहीं जाना चाहता, किंतु यह अवश्य कहना चाहूंगा कि राजस्थान जो मेरे संसदीय क्षेत्र से लगा हुआ है, वहां कोकरोली, राजसमंद, वक्कमनगर, बासंवाड़ा में संगमरमर की माइनिंग होती है। उनको तराशने पालिश आदि का काम वभिन्न स्थनों पर होता है। राजस्थान का मारबल न केवल भारत में अपितु यह इटली के बाद यह विश्व भर में प्रसिद्ध है। इस मारबल माइनिंग को भी कर दायरे में लिया गया है। कृपया आप इस पर पुनर्विचार करें, इसमें हजारों की संख्या में गरीब, मजदूर कार्यरत हैं, उन पर जहां विपरीत प्रभाव होगा, वहीं मार्बल माइनिंग भी प्रभावित होगी।
चेरिटेबिल धार्मिक परमार्थिक, सामजिक व नि:शुल्क चकित्सा सेवा में जुटी संस्थाओं को वर्तमान व्यवस्था में दान में प्राप्त राशि कर मुक्त है, उस पर कर दर की व्यवस्था की जा रही है, इसे फिर से देखें अन्यथा नि:शुल्क सहायता करने वाली संस्थायें असहाय हो जायेंगी। वर्तमान में कर व्यवस्था में हजारों प्रकार के कर छूट हैं, इनमें अधिकांश सीमा शुल्क से संबंधित हैं, जिनसे केवल उद्योगों को लाभ है, कृषकों, खेतिहारों को कोई लाभ नहीं है। कृपया इस प्रकार की व्यवस्था करें कि सभी वर्गों को समान रूप से उसका लाभ मिले।
मूल्य वर्धित कर प्रणाली के बारे में संक्षेप में निवेदन करना चाहूंगा। इसे कुछ राज्यों ने लागू किया है। कई राज्य आज भी इसे लागू करने में हिचकिचा रहे हैं। कृपया उनकी शंकाओं का निर्मूलन करें, ताकि पूरे देश में यह वेट प्रणाली लागू हो सके।
वर्तमान में जो सब्सिडी की स्थिति है, उसे जारी रखा जाना चाहिए। वैसे विकसित देश भी अपने यहां बड़ी मात्रा में सब्सिडी देते हैं, जिससे कृषकों का हित हो, लघु उद्योगों का विकास हो और कुल मिलाकर देश के विकास और प्रगति में सहायक बने।
सरकारी कर्मचारी उपभोक्ता सामग्रियों के बढ़ते दामों या बढ़ती मंहगाई से दुखी है, परेशान है। उन्हें आशा है कि छठे वेतन आयोग का इस बारे में शीघ्र ही कोई निर्णय लिया जायेगा। संक्षेप में मैंने कुछ बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित किया है। समयाभाव के कारण अन्य बिंदुओं को नहीं ले सका। हम सभी चाहते हैं देश का सुनियोजित विकास हो, उस द्ृष्टि से हमारे अर्थ तंत्र को बनाना जरूरी है।
MR. SPEAKER : Hon. Members, we propose to finish the discussion on the Finance Bill by 1.30 p.m. Thereafter the hon. Minister will reply.
SHRI BRAHMANANDA PANDA (JAGATSINGHPUR): Sir, Just the tabling of the Union Budget-2006-07 before the Lok Sabha, experts opined that thin Budget gives prominence to both growth and development and accordingly, Government of India has fine-tuned its Finance Bill – 2006 to ensure growth with development across the State sand Union Territories. This may be due to the fact that the Indian economy is growing at a rate of 7.5% per annum and she has the potential to grow at a rate more than 10%.
While forecasting a rate of growth of 8 to 10% and taking various initiatives for facilitating the same, efforts should have been to give equal importance to the States of the country. The financial Bill has however not pronounced any special attention, which could have been taken for all-round development of backward States likes Orissa, Bihar, West Bengal. Even after 5 decades of our independence, States like Orissa are still reeling under poverty line and are struggling for their subsistence. The long term growth of Net State Domestic product (NSDP) over the period 1950-51 to 2004-05 at 1970-71 prices ahs been estimated to be below 3%. Looking at this figure, even a layman can say that the State’s growth is far from satisfactory. As far as the various individual economic sectors in the NSDP are concerned, it can be said the except mining and quarrying, the other sectors like manufacturing, trade, communication, hotels, restaurants, agriculture, and animal husbandry did not show a satisfactory progress during the above-mentioned periods. This clearly indicates that the benefit of national priority spending on infrastructure development and social sector development ahs not percolated down to the backward most States like Orissa.
Orissa is rich in Minerals like chromate, bauxite, coal, dolomite, graphite, manganese etc. But, Orissa’ share in all-India output is much less than her share I all India resource stock. This implies a relatively lower rate of exploitation of
*The Speech was Laid on the Table.
natural resources in Orissa as compared to other States. Thus the Budget 2006 should have put an emphasis on skilful and optimum utilization and exploitation of Orissa’s rich physical resources. A special strategy is a ‘must’ for development of Orissa’s inherent strength in handlooms and handicrafts industries as the same have the potential to provide gainful employment to the weaver and craft-workers. This will require very little financial investment. Considering the high percentage of poverty ratio and high rates of casualisation of labour prevalent in the State, the much hyped Rural Employment Guarantee Programme should be restructured and implemented in the State to ensure sustainable living condition to the millions of poor of Orissa.
Many a commendable steps are proposed to be initiated for facilitating road and energy infrastructure. The focus of the current finance bill has also been on rural agricultural development and on improving resource transfer to agriculture sector through interest subsidies, interest rate burden write-off and greater allocation of commercial bank credit. The Budget has also granted a 43% increase in funds allocation to the eight flagship programme of the Bharat Nirman Programme. Orissa has good potential for increasing its capacity in hydro and thermal energy and mineral based industries. At this juncture, efforts should be made to re-examine the financial transfer mechanisms towards execution of various plan and development oriented projects in backward States like Orissa.