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15.02 hrs
Title: Further discussion on the resolution regarding problems of sugarcane growers moved by Dr. Madan Prasad Jaiswal on 1 December, 2000 (Concluded).
MR. SPEAKER: Now, the House will take up further discussion on the following resolution moved by Dr. Madan Prasad Jaiswal on the 1st December, 2000:-
“This House urges upon the Government to ensure payment of reasonable price to sugarcane growers by sugar mills within a week after supply of sugarcane and to take immediate steps for reopening the closed sugar mills in Uttar Pradesh, Bihar and other major sugarcane producing States.”Now, Dr. Raghuvansh Prasad Singh.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):अध्यक्ष महोदय, डा. मदन प्रसाद जयसवाल द्वारा सदन में विचार करने के लिए प्रस्तुत संकल्प पर मेरा भाषण अपूर्ण था। उस संकल्प में कहा गया है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में गन्ना किसानों की समस्यायें हैं और चीनी मिलें बन्द हैं, उनके चलते हुए जो गन्ना किसानों की समस्यायें हैं, उनका समाधान हेतु विचार करने के लिए उन्होंने संकल्प प्रस्तुत किया है।
अध्यक्ष महोदय, इस बात को सभी जानते हैं, बिहार के विभाजन के पश्चात् जो बचा बिहार है, उसमें १९ चीनी मिलें हैं, जो बन्द हैं। प्राइवेट क्षेत्र में जो चीनी मिलें हैं, वे तो चालू हैं, लेकिन सरकारी चीनी मिलें बन्द हैं। स्थिति यह है कि उत्तर बिहार में इस उद्योग के अलावा दूसरा उद्योग नहीं है। जब देश में नौ लाख टन चीनी पैदा होती थी, तो बिहार में तीन लाख टन यानि एक-तिहाई, चीनी पैदा होती थी। अब देश में १६४ लाख टन चीनी पैदा होती है, लेकिन बिहार में वही तीन लाख टन चीनी ही पैदा हो रही है। इस बारे में हमने माननीय मंत्री जी से सलाह की। चीनी पैदा करने में बिहार राज्य का स्थान दूसरा था और अब नीचे जाने के बाद भी उसका स्थान चार या पांच होगा । बिहार की घोर उपेक्षा हो रही है। किसान के विषय पर सारे सदन के सदस्य खड़े थे। पंजाब, हरियाणा, आन्ध्रा प्रदेश और उत्तर प्रदेश के किसानों के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वही व्यवहार आज बिहार के साथ नहीं हो रहा है, भेदभाव हो रहा है। सदन में जब यह मामला उठा, तो माननीय मंत्री जी उस समय सदन में नहीं थे। अनाज प्रोक्योरमेंट का सवाल हो, धान हो या मक्का हो, लेकिन गन्ना किसान भी तबाह हुआ है। गन्ने का किसान दो कारणों से तबाह है। देश भर में ५०० करोड़ रुपया किसान का चीनी मिलों की तरफ बकाया है। चीनी मिलें बन्द हैं और किसानों द्वारा गन्ने के उत्पादन की खपत नहीं हो रही है। इस कारण सारे किसान तबाह हैं। जो सदस्य गन्ना उत्पादक क्षेत्रों से आते हैं, जैसे श्री राम नगीना मिश्र जी, उनको किसानों की स्थिति के बारे में पता है । हम देखते हैं कि सरकार इस मामले में उदासीन है। उदासीन ही नहीं, हम कहते हैं कि सरकार किसान विरोधी काम कर रही है।
यह देखना चाहिए कि अगर राज्य सरकार किसानों की मदद में पीछे हो तो केन्द्र सरकार को आगे आना चाहिए, लेकिन हम वैसा देख नहीं रहे हैं। माननीय मंत्री जी जब इस संकल्प का उत्तर देंगे तो हम उनसे प्रार्थना करते हैं, सरकार से आग्रह करते हैं कि किसानों की मदद के लिए आपको आगे आना चाहिए, क्योंकि राज्य सरकार की वैसी हैसियत नहीं। बिहार में ३००० करोड़ का घाटा हो रहा है, रेवेन्यू डेफसिट हो रहा है और ३००० करोड़ का घाटा होने से वहां के कर्मचारियों को वेतन मिलना दुर्लभ हो जाएगा, विकास कहां से होगा। फिर केवल खेती बचती है। खेती पर आधारित किसानों की तरक्की नहीं होगी तो फिर बिहार का भला नहीं हो सकता। १९ चीनी मिलों में से तीन चीनी मिलें बीआईएफआर में हैं और तीन चीनी मिलें निजी क्षेत्र में थीं, जिसे सरकार ने टेकओवर किया था। फिर उसे लौटाने की बात हुई है। जो १३ चीनी मिलें बची हैं उनके लिए कोई उपाय नहीं हुआ है।
महोदय, गन्ना किसानों के सवाल पर विधान सभा में भी बहस हुई। अब वहां की केबिनेट ने यह फैसला लिया है कि उन चीनी मिलों को आईएफसीआई के मार्फत प्राइवेटाइज़ कर दिया जाए, ज्वाइंट वेंचर में अथवा लीज पर कर दिया जाए। मतलब किसी भी हालत में चीनी मिलों को चालू कराया जाए। बिहार सरकार के मंत्री, पदाधिकारी और आईएफसीआई, सब को अपने यहां बुला कर आप बैठक कराएं ताकि किसी भी हालत में मिल चालू हो जाए। इसके लिए वे प्रबंध कराएं तो देश के लिए, बिहार के लिए और गन्ना उत्पादक किसानों के लिए बड़ी भारी मदद होगी। लोग कहते हैं कि १९३०-३२ की चीनी मिले हैं, जो पुरानी हो गई हैं। उनकी मशीनरी चौपट हो गई है। आधुनिकीकरण का, विस्तार का, गन्ना क्रशिंग की केपेसिटी के बारे में विशेषज्ञ बताते हैं कि जब तक ५००० टन क्रशिंग केपेसिटी प्रति दिन की नहीं होगी तब तक कोई फायदा नहीं होगा। निश्चित रूप से वह किसी भी हालत में चलाने में लाभदायक नहीं हैं। किसी-किसी चीनी मिल का हिसाब जोड़ा गया है तो पता चला है कि एक किलो चीनी तैयार करने में ४०० रुपए का खर्च लगता है। उस तरह की चीनी मिलें चलाने से, उसका इकनोमिक्स कहता है, सरकार कहती है कि कि उन्हें बंद रख करके मजदूरों को हम वेतन दें तो कम घाटा होगा, बशर्ते उसे चालू किया जाए। इस तरह की हालत है। इसलिए किसी भी हालत में भारत सरकार उसमें आगे आए। सरकार की तरफ से जब आफिसर का बनाया हुआ उत्तर आ जाता है, जैसे कोई कानून ब्रहमा जी का बनाया हुआ है, उसमें हेर-फेर नहीं होता, संविधान संशोधन होता है। एसटीएफसी को लोन देने का कानून है, इसके अलावा हमारे पास कोई उपाय नहीं है। इसलिए प्रधान मंत्री स्तर पर हो, वित्त मंत्री, प्लानिंग कमीशन के स्तर पर हो, एक स्पेशल पैकेज देकर भी हो, मतलब किसी भी हालत में मिलों का आधुनिकीकरण हो और उन्हें जल्दी से जल्दी चालू कराया जाए, जिससे किसानों को राहत हो। तीन चीनी मिलें बीआईसी के आधीन हैं और वे तीनों चीनी मिलें बंद हैं। किसानों का बकाया भी, जो टैक्सटाइल विभाग के आधीन है, कपड़ा विभाग के आधीन है, वह पहले से सारा जर्जर है और किसान त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। इसलिए वे सभी अधिकारी, संबंधित लोगों को, फूड और कंज्यूमर मनिस्टर का भी विभाग पड़ता है, यह उन्हीं के विभाग हैं, आईएफसीआई को, इन सब को बुला कर बैठक करें। १५ दिन पहले बहस हुई थी तो हमें लगता था कि मंत्री जी पर असर हुआ होगा, लेकिन हमें लगता है कि कोई असर नहीं हुआ है। आज भाषण पूरा होने के बाद इस पर ख्याल और अमल करेंगे, ऐसा हमें विश्वास है।
१५.१० बजे(श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव पीठासीन हुए)
इसलिए १०-१५ दिन के अंदर में यह किया जाए। माननीय मदन जायसवाल जी के क्षेत्र में भी कई चीनी मिलें हैं, और जो चीनी मिल एरियाज के सदस्यगण हैं, उनको भी बुला लें तो बड़ी कृपा होगी। अब बिहार की दस करोड़ की आबादी में से हम केवल आठ करोड़ बचे हैं लेकिन वह भी कम हिस्सा नहीं है। आप राज्यवार प्रयत्न करें तो एसटीएफ से लोन भी लिया जा सकता है। आईसीआई, आईएफसीआई आदि को लें और राज्य सरकार को भी कसने की जरूरत हो तो राज्य सरकार को भी कसें और आप लीड करें और ऐसा प्रयास करें जिससे वहां की चीनी मिलें चालू की जा सकें। इससे देश समाज और किसानों को भला होगा और एक बहुत भारी काम आप कर सकेंगे।
मेरा पहला सवाल यह है कि बंद चीनी मिलें किसी भी हालत में चालू हों और दूसरा सवाल यह है कि आप देश में एक कानून सब राज्यों के लिए रखिये। पंजाब के लोगों ने शोर मचाया, हरियाणा के लोगों ने शोर मचाया, उत्तर प्रदेश के लोगों ने शोर मचाया तो उन्हें कुछ मिला। आंध्रा प्रदेश के भाई मैदान में आये तो उन्हें भी कुछ मिला। लेकिन बिहार का किसान आज धान जला रहा है और बिहार में धान का प्रक्योरमेंट नहीं हो रहा है। उसमें भेदभाव की नीति हुई तो बिहार का किसान भी उठेगा और दिल्ली हिलेगी और उसके भयंकर परिणाम होंगे।…( व्यवधान )पटना तो हिला हुआ है अब दिल्ली की बारी है। सभापति जी, माननीय हुक्मदेव जी हमारे वरिष्ठ साथी हैं लेकिन आज सरकार में उनकी क्या दशा है इस पर भी आप गौर करें। कभी माननीय नीतीश जी के नीचे स्टेट मंत्री बना देते हैं तो उसी में खुश हो जाते हैं। इस सरकार में कभी मंत्रियों से डेयरी का महकमा छिनता है तो कभी एग्रीकल्चर का और कभी जहाज की जगह पानी का जहाज दे देते हैं। अब सरकार में ये लोग हैं और किसी प्रकार से अपनी जान बचा रहे हैं। लेकिन मेरा कहना है कि आज गरीबों के साथ, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के साथ, दबे-कुचले लोगों के साथ दुश्मन का सा व्यवहार यह सरकार कर रही है। इसलिए यह गंभीर मामला है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।
सभापति जी, मेरा कहना है कि सभी किसानों के हित में एक-सा व्यवहार किया जाना चाहिए। पंजाब में प्रक्योरमेंट हो रहा है लेकिन आज बिहार में भी किसान ने ७०-८० लाख टन अनाज पैदा किया है। अगर उसका प्रक्योरमेंट नहीं होगा, वह नहीं बिकेगा तो आप स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं और किसान की हालत का भी आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वहां के किसान की हालत क्या होगी?
आज गन्ना किसान की भी वही हालत है। चाहे गन्ना किसान हो, आलू, धान, मक्का का किसान हो, आज सब परेशान हैं। जो दो विभाग इससे संबंधित हैं उनके अधिकारियों को बुलाकर आप बात कीजिए और किसानों की मदद कीजिए।
बिहार की हालत पहले भी खराब थी और उसके विभाजन के बाद भी खराब है। जब से यह सरकार केन्द्र में आई है तब से ही बिहार विभाजन का काम शुरू हुआ।
पंचायत के चुनाव का ऐलान हुआ तो भाजपा के विपक्ष के नेता बहुत चिल्ला रहे हैं। मैं जो कहता था वहीं विपक्ष के लोग कह रहे हैं। भारत सरकार ने कहा कि वहां चुनाव हों, विपक्ष ने कहा कि चुनाव हो लेकिन वहां किस कानून के तहत चुनाव हों? वहां मुखिया का आरक्षण नहीं, प्रमुख का आरक्षण नहीं, महिलाओं का आरक्षण नहीं, अनुसूचित जातियों और जन जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। यह कभी कंटैम्प्ट ऑफ कोर्ट की बात करते है और कभी हाई कोर्ट विरोधी हो जाते हैं। हम हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार चलते हैं तो कहा जाता है कि यह संविधान विरोधी हैं। वहां पंचायतों के चुनाव नहीं हुए क्योंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है। कहा जाता है कि इसके लिए बिहार सरकार कसूरवार है। गरीब राज्य का ५०० करोड़ रुपया रोक कर बिहार की १० करोड़ आबादी के साथ क्रमिनल व्यवहार किया जा रहा है। इधर बिहार के जो लोग बैठे हैं वे बिहार के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे हैं और न्याय नहीं कर रहे हैं। इसमें बिहार सरकार का कोई कसूर नहीं है। यदि कुछ घड़ी के लिए उनका कसूर मान भी लिया जाए तो वहां की जनता के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए, उसका पैसा नहीं काटना चाहिए और जनद्रोह नहीं करना चाहिए।
सभापति महोदय, आपके एरिया में भी छोटी-मोटी चीनी मिलें हैं। वहां के किसान परेशान हैं। वे कहते हैं कि हम नौकरी नहीं मांग रहे हैं, आप हमारी मिल चालू करवा दें जिससे गन्ने की खपत हो जाए। इससे गन्ना किसानों को फायदा होगा। इस बारे में ठोस काम होने चाहिए। आप इस बारे में १०-१५ दिन में सभी संबंधित पक्षों की बैठक बुलाएं और सख्ती से कार्रवाई करें। इस बारे में केन्द्र सरकार मदद करके किसी भी हालत में बंद चीनी मिलों को चालू करवाए। आज बिहार के गन्ना किसान परेशान हैं। गन्ना किसानो का ५०० करोड़ रुपया जो बकाया है, उसका भुगतान हो। उत्तर प्रदेश में ३२ चीनी मिलें बंद हो गई हैं और भी बंद हो रही हैं। वे क्यों बंद हो रही हैं? आप इसे देखें। चीनी की रिकवरी बढ़े। ये सब काम हों जिससे शूगर इंडस्ट्री, गन्ना किसानों और देश को लाभ हो सके।
श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी (देवरिया) :सभापति महोदय, आज का विषय जितना अहम है उतना पुराना है। हमें याद है आप मंत्री थे और उस समय हम इस विषय को लेकर बार-बार आपसे मिले। इसके बाद रघुवंश बाबू इसी विभाग के मंत्री हुए। हमने उन्हे भी यही गाथा सुनाई। ग्रामीण उद्योग का यह सवाल है। ग्रामीण किसान इसके साथ बंधा है। चीनी मिलें चाहे निजी क्षेत्र में हों, चाहे कोआपरेटिव क्षेत्र में हों, चाहे सरकारी क्षेत्र में हों, हर चीज का कंट्रोल सरकार के ऊपर रहता है। किसान कब लाएगा, कैसे गन्ना बिकेगा, किस दिन लाएगा, चीनी मिलें कितनी लैवी शूगर देंगी, कितना फ्री शूगर देंगी, किस तरह चलेगा, सरकार इसे कंट्रोल करती है। यह बहुत पुरानी बीमारी हो गई है। गौरी बाजार हमारे संसदीय क्षेत्र में आता है । पहले वह मिल बंद हुई। हम उस समय से चिल्ला रहे हैं। इस संसद में बार-बार चिल्ला रहे हैं लेकिन इसका कोई हल नहीं निकाला गया।
जब बीमारी बढ़ जाती है तो कैंसर का रूप धारण कर लेती है। उस बीमारी को दूर करने के लिये बहुत बड़े आप्रेशन करने की जरूरत होती है। मैं उत्तर प्रदेश और खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों की बात करूंगा। यही हाल बिहार की चीनी मिलों की है। उनकी हालत दयनीय है। इसमें सोच तो बहुत हो चुकी है, अब कार्यवाही करने का समय आ गया है। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि पैसा कहां से आयेगा? उत्तर प्रदेश में १२८ चीनी मिलें हैं। १९९६ के आंकड़ों के अनुसार ९१० करोड़ रुपये का बकाया था और आज की स्थिति में यह बकाया १४० करोड़ रुपये है। इस समस्या से बहुत से किसान प्रभावित हो गये हैं.। इस कारण से पूर्वी उत्तर प्रदेश कंगाल होता जा रहा है। उन किसानों के पास रोज़ी-रोटी का कोई जरिया नहीं है।
सभापति महोदय, हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा २९ चीनी मिलें मेरे क्षेत्र देवरिया और कुशीनगर जनपद में थीं और धीरे धीरे ये बंद होती चली गईं। आज चीनी का व्यवसाय बीमार पड़ता जा रहा है और यही हालत बिहार की चीनी मिलों की है। हमारे संसदीय क्षेत्र में कठकुइंया, पडरौना, सरदार नगर, गौरी बाजार, देवरिया, भटनी और वैतालपुर में चीनी मिलें हैं । इनमें से पांच चीनी मिलें निजी क्षेत्र में हैं जो बंद हैं। यदि आकलन किया जाये तो मालूम होगा कि हमारे क्षेत्र में इस समय बकाया राशि ४५-५० करोड़ रुपये है। मैं नहीं समझ पा रहा कि किस तरह से हमारे संसदीय क्षेत्र ५० करोड़ रुपये का बकाया सह सकेगा? यह सोचने की बात है। सरदार नगर की चीनी मिल का २७ करोड़ रुपये बकाया है। यह चीनी मिल निजी क्षेत्र में है। किसानों का गन्ना सरकार के कहने पर चीनी मिल को दिया गया है लेकिन इनमें से तीन चीनी मिलें- कठकुइंया, पडरौना और गौरी बाजार राज्य सरकार की तरफ से संचालित नहीं होती थी, ये केन्द्र सराकार की ओर से संचालित की जा रही थी। इस कारण से प्रदेश सरकार का यह विषय नहीं है, यह केन्द्र सरकार का विषय है। अब ये निजी क्षेत्र मे चली गईं हैं और बी.आई.एफ.आर के पास हैं। चीनी उद्योग के मामले में यह बीआईएफआर के पास नहीं रही बल्कि ये ब््यूरो आफ फाइनेंशियल डैस्ट्रक्शन के पास हो गयी हैं। यह क्षेत्र कोर्ट हो गया, सामाजिक नहीं रह गया है। जनता से उसका कोई लगाव नहीं है। उसने आदेश दे दिया कि पहले आई.सी.आई.सी.आई. को और आई.डी.बी.आई. को पैसा दो लेकिन किसानों को पैसा नहीं दिया। इस कारण हम लोग बी.आई.एफ.आर. के पास गये। ये तीनो चीनी मिलें मैसर्स गंगोत्री इंटरप्राइसेज ने ले रखी हैं। हमने बात की लेकिन सुनी नहीं गई और कहा कि यह कोर्ट है। हमने कहा कि आप समाज को प्रभावित कर रहे हैं, इसलिये ये चीनी मिलें उनसे वापस ले लें। यह सब व्यवस्था की बात है। अब हमारे सामने यह सवाल है कि पिछले ४-५ साल का बकाया गन्ना किसानों को किस तरह से पहुंचाया जाये? इस सब के चलते हमारे क्षेत्र पडरौना में गोली कांड भी हो गया।
जब गोलीकांड हुआ तो हर पार्टी के नेता, पूर्व प्रधान मंत्री श्री देवेगौड़ा जी, हमारी नेता प्रतिपक्ष सोनिया गांधी जी आदि सब लोग वहां पहुंचे थे और इन सब लोगों ने वहां पहुंच कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की। पिछले पांच साल तक हम इसके लिए लड़ते रहे हैं और अब सब लोग पहुंच कर सरकार से कह रहे हैं कि फौरन पैसा दे दो, हम भी यहीं बात कह रहे हैं। लेकिन यह बात बहुत पुरानी है, यह हमें विरासत में मिली है। हमारी सरकार के समय में यह बात नहीं हुई है। लेकिन फिर भी हमारी सरकार का, हमारे शासन का यह दायित्व बनता है कि इस गिराव को रोके और यह गिराव दो मामले में है। पहला यह है कि किस तरह से १३७ करोड़ रुपया उत्तर प्रदेश के लिए और किस तरह से ४०-४५ करोड़ रुपया हमारे क्षेत्र के लिए पहुंचाया जाए, यह पुराना बकाया है, निजी मिलों का बकाया है, यह कैसे किसानों तक पहुंचाया जाए। दूसरा मामला यह है कि जो मिलें पुरानी हो गई है, साठ साल से लगी हुई हैं, यदि उन्हें बंद करना है तो उनमें से कुछ मिलें जो ठीक काम कर रही हैं, किस तरह से उनका आधुनिकीकरण हो, किस तरह से उनका विस्तारीकरण हो, ताकि वे मिलें घाटे में नहीं, मुनाफे में चल सकें और गन्ना किसानों का गन्ना पहुंच सके, गन्ना किसानों का भुगतान कैसे किया जाए।
सभापति महोदय. माननीय मंत्री जी यहां बैठे हुए हैं। इनके सामने कई बार यह बात आ चुकी है। उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री जी से भी बात हो चुकी है। प्रधान मंत्री जी के पास भी जा चुके हैं। हर स्तर पर बात हो चुकी है। लेकिन हमें यह दिखाई पङता है कि ये निजी क्षेत्र की मिले हैं, ये बी.आई.एफ. आर. की मिले हैं, मंत्री जी यही सब कहने वाले हैं। लेकिन किस माध्यम से किस तरह से उन्हें पैसा दिया जा, यह कोई नहीं सोचता। मैंने बार-बार यही कहा है कि सरकार मिलों को पैकेज देती है,उसमें किसी न किसी तरह से पैसा लगाती है। हमारे सरदारनगर की मिल निजी क्षेत्र में है, कठकुनिया और पडरौना की मिल निजी क्षेत्र की हैं। इन मिलों के प्रभावित किसानों को पैसा एक पैकेज के लिहाज से डायरेक्ट दिया जाए और उन्हें यह समझा दिया जाए कि मिल को बेचकर भी उनसे पैसा वापिस लिया जायेगा चाहे वह कोई और माध्यम इस्तेमाल करें। गन्ना किसान ने उस मिल को अपना गन्ना सरकार के हुक्म से दिया है। यह मैं मानता हूं कि मिल मालिक को फायदा हुआ है। लेकिन उसमें हुक्म सरकार का रहा है। इसमें सरकार का हाथ है इसलिए कोई न कोई तरीका निकालना पड़ेगा। मैं केवल आलोचना के लिए खड़ा नहीं हुआ हूं, मैं बार-बार यह सुझाव दे चुका हूं कि जितना पैसा है इसका पेमेन्ट गन्ना किसान को उन मिल मालिकों की तरफ से दिया जाए और मिल मालिकों से यह कहलवाया जाए कि इसका भुगतान वे करेंगे और इसके लिए एक समयबद्ध तरीका हो। अगर छ: महीने तक भुगतान नहीं करते हैं तो उस मिल को बेचकर सरकार अपना पैसा वापिस ले ले। यह एक कठोर तरीका है, इस पर काम करना है। हमारे ख्याल से किसी के दिमाग में यह बात नहीं है, रघुवंश बाबू वहां बैठे हुए हैं और भी लोग बैठे हुए हैं, लेकिन किसी के दिमाग में यह नहीं है कि चार-पांच साल से जो ज्यादती हमारे किसानों के साथ हुई है, उसमें किस तरह से हम सबको मिलकर उन्हें पैसा पहुंचाना है। आज क्या दर्दनाक हालत किसानों की हो गई है, मैं इसका वर्णन नहीं करना चाहता हूं। आज किसानों की बहुत दयनीय हालत हो गई है, उसका वर्णन करना बेकार है। उसका वर्णन करके हम केवल माननीय मंत्री जी को समझा सकते हैं कि इसकी फौरन जरूरत है। इसलिए निजी मिलों का पुराना भुगतान इस बात को लेकर कि कौन सी व्यवस्था बनाई जायेगी, इसके बारे में हमारे मंत्री महोदय आज स्पष्ट करें, यह हमारी मांग है।
सभापति महोदय, हमारी दूसरी मांग यह है गोकि यहां पर पैसा दिया गया है ६३ शुगर मिल उत्तर प्रदेश में हैं उनके आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए २२३ करोड़ रुपया दिया गया है।
मैं यह जानना चाहता हूं कि हमारे जनपद में और हमारे संसदीय क्षेत्र में जो मिलें हैं, क्या उनमें से किसी का भी विस्तारीकरण और आधुनिकीकरण किया जा रहा है? अगर किया जा रहा है तो उसमें कितना पैसा खर्च होगा, क्योंकि हमारे ख्याल में जितना पैसा जा रहा है, उसमें से एक करोड़ रुपया भी हमारे क्षेत्र में जिसमें सबसे ज्यादा मिलें हैं उसमें नहीं जा रहा है और उसका आधुनिकीकरण नहीं हो रहा है। हमें यह कहा जाएगा कि उत्तर प्रदेश सरकार अपने प्रपोज़ल भेजे, हम उसमें मदद करेंगे, ऐसी बात हमें बताई जाएगी। लेकिन दोबारा मैं कहना चाहता हूं कि क्या इसी तरह से प्रपोज़ल का इंतज़ार होता रहेगा जबकि कुछ क्षेत्र जलते रहें? क्या सांसदों को बुलाकर नहीं कहना चाहिए कि आपके क्षेत्र में किसका आधुनिकीकरण करवाना है और मैं देखूंगा कि जो मिल अच्छी तरह से चल रही है, जहां पर स्वयं मजदूर और किसान मेहनत कर रहे हैं, उनको किसी न किसी तरह से आगे बढ़ाया जाए, उसका आधुनिकीकरण किया जाए। यह काम एक समयबद्ध तरीके से १०-१५ दिन में करने की कृपा करें क्योंकि बहुत बड़ी जनसंख्या इससे प्रभावित है। वह जनसंख्या जो कि आज अच्छा धान पैदा कर रही है, उसका उचित दाम भी उसे नहीं मिल रहा है। गन्ने का भुगतान भी बाकी है। इस प्रकार से किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। वह किसलिए उत्साहित होकर कृषि क्षेत्र को आगे बढ़ाएगा यह हम जानना चाहते हैं और किसानों की उपेक्षा हो रही है यह हम बार-बार कहना चाहते हैं, लेकिन इसका समाधान क्या हो इसके बारे में मंत्री महोदय हमें बताएं।
*SHRI K.K. KALIAPPAN (GOBICHETTIPALAYAM): Hon’ble Chairman Sir, I would like to thank you for providing me an opportunity to participate in this discussion on the Resolution that seeks to highlight the plight of the sugarcane growers who are not getting remunerative prices in time. I would also like to thank our dynamic leader Dr Puratchi Thalaivi, the former Chief Minister of Tamil Nadu and the General Secretary of our party AIADMK who has provided me a golden opportunity choosing me a sugarcane growing farmer to represent the people of my constituency in this House. I am a farmer who produces sugarcane every year to the tune of about thousand tonnes per annum. I am now a member in this House which has taken up today for discussion the plight of sugarcane growers. Both the Union Government and the State Governments are ignoring the plight of sugarcane producers and are hitting hard the sugarcane growers. Sugarcane farmers are punished hard for no fault of theirs.
Apart from not ensuring suitable remunerative prices Government have also kept pending in arrears the payments that are due to them. Even one year after the procurement by sugar mills the payments are not forthcoming and remain long due. What would be the plight of the farmer to go for the subsequent year’s cultivation? They have no other go except to pledge and mortgage their properties and the jewellery of their wives and children. They are lying in the banks and farmers remain indebted and are a worried lot due to the debts and interest commitments. These Governments have allowed them to continue in the suffering of heavy indebtedness. When farmers’ plight are like this they are not lagging behind and contribute their mite in increasing the agricultural production especially sugarcane. But the Government which continues to ignore them seeks to import sugar from foreign countries that gives a serious blow to the sugarcane growers of the country. I would like to point out that this is a very wrong policy adopted by the Government. This needs to be corrected. Import of sugar must be curtailed. It should be discouraged to encourage the sugarcane growers of the country.
Today we find our farmers pushed hard to run from pillar to post because they do not get adequate support from the Government. I would like to reiterate again that it was a very wrong policy that was adopted by this Government. The condition of the farmers goes from bad to worse. Their condition is becoming pitiable. They are thrown to the verge of becoming poverty stricken. These cash crop growers would soon become paupers. All over India the sugarcane growers are meeting with the same kind of problem of not getting remunerative prices that too in time. This affects the chain of cultivation and would affect greatly the agro economy of this country.