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Issue Regarding Sex Workers During Commonwealth Games In The … on 26 August, 2010

Lok Sabha Debates
Issue Regarding Sex Workers During Commonwealth Games In The … on 26 August, 2010


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Title: Issue regarding sex workers during commonwealth games in the country.

डॉ. भोला सिंह (नवादा): सभापति महोदय, नगर-नगर बदनाम हो गए मेरे आंसू, आज मैं उनका हो गया, जिनका कोई पहरेदार नहीं था। देश में जिस्म बेच कर पेट पालने वाली औरतों की संख्या लाखों में है। अब संस्कृति के प्रहार ने भारत की सांस्कृतिक गरिमा को रौंदते हुए उनके जीवन को जीने के लिए जिस्म बेचना उनकी जीवन शैली बनती जा रही है। समाज ने उनके दर्द को कभी महसूस नहीं किया। कभी वह घर की चारदीवारी में प्रताड़ित होती है तो कभी जीवन का आधार ढूंढते-ढूंढते उसकी जीवन रेखा उसे कोठे पर ले जाती है। अब तो आठ-दस-बारह वर्ष की बालाएं भी इस कचरे में शामिल होने के लिए बाध्य हो रही हैं। सामन्ती समाज की कोख से जिस्म बेचने की यह दुखांत गाथा का जन्म सामन्ती सोच का ही परिणाम है। लाखों की संख्या में आज उनके बच्चे अपने पिता का नाम नहीं बता सकते और दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों के समय संपूर्ण विश्व की अपसंस्कृति से पैदा होने वाली औरतें रूप के बाजार में सजी-संवरी उपस्थित होने वाली हैं। इससे समाज में एक अलग विकृति प्रभाव डालने वाली है। इतना ही नहीं, अब तो पत्र-पत्रिकाओं, महिला साहित्यकारों पर भी विश्वविद्यालय के कुलपति तक ने मर्यादाओं का हनन करना शुरू कर दिया है। संपूर्ण मानवता में विकृत सैक्स की अवधारणाएं उपस्थित हो रही हैं। भाई-बहन, पुत्र-पुत्री आदि के सामाजिक रिश्ते कलंकित किए जा रहे हैं और सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय यह है कि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग जीवन जीने की सांस्कृतिक धरोहर को दफन कर रहा है। राजनेताओं का इस ओर आंख बंद करना घोर आपत्तिजनक है। समाज प्राकृतिक प्रदूषणों से कुछ समय तो जीवन जी सकता है, लेकिन इस सामाजिक प्रदूषण से उसका जीवन जीना असंभव है। भारत की आत्मा अगर दफन होती है तो शायद ही विश्व की सामाजिक संस्कृति बच पाएगी। भारत को बचाना केवल देश को ही बचाना नहीं है, बल्कि विश्व की संस्कृति को भी बचाना है।

          मैं इस ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहना चाहता हूं कि इस पनपती हुई विषैली फांस को उखाड़ फेंकें और जीवन की अमृत धारा की बहती नदी में डुबोकर उसे निर्मल चरित्र का स्वरूप प्रदान करें। …( व्यवधान)