Motion Of Consideration Of The Constitution (Amendment) Bill. … on 12 June, 1998

Lok Sabha Debates
Motion Of Consideration Of The Constitution (Amendment) Bill. … on 12 June, 1998


Title: Motion of consideration of the Constitution (Amendment) Bill. (Insertion of New Article 51 B). (Not concluded)

16.54 hrs.

MR. CHAIRMAN: The House will now take up the Constitution (Amendment) Bill, 1998. Before I call upon Shri Mohan Singh to move the motion for consideration of the Bill, we shall have to fix the time for discussion of this Bill.

SEVERAL HON. MEMBERS: Sir, two hours is all right.

MR. CHAIRMAN: So, two hours have been allotted for it.

  श्री मोहन सिंह (देवरिया): सभापति महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं:-

  ” िभारत के संविधान में और संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया त्

 

VÉɪÉä*”

  सभापति महोदय, मेरा संशोधन भारतीय संविधान की धारा ५१ में एक नयी उपधारा ५१ बी जोड़ने की है, जो इस प्रकार है:

“It shall be the duty of every political party and candidate, whether such candidate is set up by any political party or not, to ensure that votes are not sought in the name of any religion, religious symbol or by inciting religious feelings of the people in any election to the House of the People, or Legislative Assembly of a State or Union Territory or any local body.”

  मैने अपने इस विधेयक को प्रस्तुत करने के साथ इसके कारण और उद्देश्य लिखे हैं। मैंने लिखा है:

“It has been observed that during elections some political parties and candidates are seeking votes in the name of religion or by inciting religious feelings. It will have an adverse affect on the society if such trends continue. It is, therefore, necessary to check such moves by amending the Constitution. It is accordingly proposed to make it the fundamental duty of every political party and candidate to ensure that votes are not sought by them in any election in the name of religion or by inciting religious feelings. Although the violation of these duties is not punishable under the existing system of Constitution, the political parties and candidates will be morally bound by such a provision in the Constitution.”

  भारत के संविधान में फण्डामेंटल डयूटीज का जो अध्याय है, उसमें हमने एक धारा जोड़ने की कोशिश की है। भारतीय संविधान की १९७६ तक ऐसी मान्यता थी कि यह केवल अधिकार प्रधान संविधान है और इस संविधान में जनता के मौलिक अधिकार कया होंगे, केवल इसकी विवेचना थी। लेकिन १९७६ के बाद एक पूरा अध्याय जोड़ा गया जो नागरिकों के अधिकार से संबंधित है। मैं आपको बतलाना चाहता हूं कि धारा ५१ ए में सिटीजन के कर्ततव्य दिये हुए हैं। उसमें कहा गया है:-

“It shall be the duty of every citizen of India –

(a) to abide by the Constitution and respect its ideals and institutions, the National Flag and the National Anthem;

(b) to cherish and follow the noble ideals which inspired our national struggle for freedom;

(c) to uphold and protect the sovereignty, unity and integrity of India;

(d) to defend the country and render national service when called upon to do so;

(e) to promote harmony and the spirit of common brotherhood amongst all the people of India transcending religious, linguistic and regional or sectional diversities; to renounce practices derogatory to the dignity of women;

(f) to value and preserve the rich heritage of our composite culture;

(g) to protect and improve the natural environment including forests, lakes, rivers and wild life, and to have compassion for living creatures;

(h) to develop the scientific temper, humanism and the spirit of inquiry and reform;

(i) to safeguard public property and to abjure violence;

(j) to strive towards excellence in all spheres of individual and collective activity so that the nation constantly rises to higher levels of endeavour and achievement.”

  यह बात बिल्कुल ठीक है कि जो अधिकारों का अध्याय है उसमें थोड़ी सी कमी की गई कयोंकि कर्ततव्यों का अध्याय जोड़ने से पहले भारत के संविधान में एक धारा ३१ ए थी और इस धारा के अनुसार

an organisation or an association which is intended or which is a part of a scheme which is intended to threaten or disrupt harmony between different religious, racial, linguistic or regional groups, or castes or communities can be declared as anti-national and the Government can take action against such an organisation.

  ऐसा उस समय था और इस धारा के तहत बहुत से ऐसे संगठन जो उस जमाने में धार्िमक आधार पर सांप्रदायिक सदभाव और सौहार्द को बिगाड़ने का काम करते थे, उन संगठनों को प्रतिबंधित करने के अधिकार संविधान की धारा ३१ बी के तहत थी। लेकिन आपातकाल के बाद भारत की संसद ने इस धारा को भारत के संविधान से निकाल दिया। जब भारत के संविधान से इस धारा को निकाल दिया गया, सिर्फ इस नाम पर कि भारत के लोकतंत्र में सरकार को किसी भी संगठन को मनमाने ढंग से प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए और आपातकाल के सारे प्रावधानों का दुरुपयोग करते हुए उस जमाने की सरकार ने उन संगठनों को प्रतिबंधित किया था।

17.00 hrs.

  इस भावना को देखते हुए जो उस जमाने की सरकार और संसद आई, उस संसद ने संविधान से उस धारा को खत्म कर दिया। लेकिन धीरे-धीरे हम देखते हैं कि इस धारा के खत्म होने के बाद कुछ लोगों ने अपना यह अधिकार मान लिया, अपना यह कर्तव्य मान लिया कि साम्प्रदायिक सौहार्द को खराब करें, जातिगत और धार्िमक वैमनस्य को पैदा करें, जो राजनैतिक मुद्दे हैं, गरीबों के जो सवाल हैं, उन सवालों पर वोट मांगने के बजाए धार्िमक मुद्दों को ही उभारकर वोट मांगने का काम करते हैं। इससे सामाजिक सदभाव, भारत का भाईचारा, आपसी प्रेम-मोहब्बत और भारत की एकता को चुनौती मिलने लगी। ऐसी स्िथति में संविधान में एक नया प्रावधान किया जाना आवश्यक है और उसी भावना से मैंने इस अध्याय को जोड़ने का यह विधेयक इस सदन के समक्ष विचारार्थ रखा है। मैंने अपना संविधान संशोधन रखते हुए इस बात की अपेक्षा की है कि यह सरकार के लिए मैनडेटरी नहीं होगा, किसी भी संगठन को प्रतिबंधित करने का अधिकार देने का मेरा इरादा नहीं है। मैं केवल इसलिए कि जैसे हमने कर्तव्य पालन के लिए एक अध्याय जोड़ा है, कर्तव्य पालन का ही वह अध्याय, जिसमें लिखा जा रहा है कि हमारे देश की जो ऐतिहासिक धरोहर है, हमारे जो राष्ट्रीय आंदोलन के मुद्दे और मूल्य हैं, उसको चुनौती न मिले। उसको चुनौती तब नहीं मिलेगी जब इस बात का भी एक अध्याय हो, एक धारा हो कि हम ऐसे संगठन और ऐसे उम्मीदवार को यह कह सकें कि आप धार्िमक आधार पर, सामाजिक वैमनस्य पैदा करके, जातिगत दुर्भाव पैदा करके वोट मांगने का काम न करें। जब हमारा देश आजाद हुआ, भारत का नया संविधान लिखा जाने लगा। भारत के राष्ट्र नेताओं ने, हमारे संविधान बनाने वालों से, भारत की संसद से कुछ अपेक्षाएं कीं और अपेक्षा करते हुए भारत के महान् राष्ट्र नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा –

“The first task of this Assembly is to free India, frame a new Constitution, to feed the starving people, to clothe the naked masses, to give every Indian the fullest opportunity to develop himself according to his capacity.”

  भारत के महान् राष्ट्र पुरुष, जिन्होंने देश की आजादी में भारत का साहसिक ढंग से नेत्ृात्व किया, जिनका भारत के संविधान को बनाने में जबरदस्त मार्गदर्शन था, उन्होंने हमसे अपेक्षा की कि जो इस देश के भूखे-नंगे हैं, उनको वस्त्र पहनाने, उनक पेट में भोजन देने, इस तरह के कुछ काम हम करें जिससे इस देश की गरीब जनता को भरपेट भोजन मिल सके, मकान मिल सके, कपड़ा मिल सके। लेकिन हम अपने इस उद्देश्य को भूलकर अपना सारा योगदान, अपना सारा मनोयोग इस देश में धार्िमक और जातिगत आधार पर वोट लेने की ओर बढ़ रहा है। हम अपनी दिशा से भटक रहे हैं। हमारे संविधान बनाने वालों ने इसीलिए उस समय कहा था कि समय और परस्िथति के अनुसार, जब भी हमारे देश को आवश्यकता हो, भारत की आने वाली पीड़ी संविधान में आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन कर सके। इसका अधिकार हम भारत की जनता और संविधान बनाने वालों को देकर जाना चाहते हैं। उन्होंने कहा –

“We will frame a Constitution and I hope it will be a good Constitution but does anyone in this House imagine that when a free India emerges, it will be bound down by anything that even this House might lay down for it? A free India will see the bursting forth of the energy of a mighty nation. What it will do and what it will not do I do not know. Some people imagine that what we do now may not be touched for ten years or 20 years. If we do not do today, we will not be able to do it later. We are on the eve of revolutionary changes, revolutionary in every sense of the word because when the spirit of a nation breaks, it binds its functions in a peculiar way. It may be the Constitution, this House may frame which may not satisfy the free India. This House cannot bind down next generation or the people who will duly succeed us in this task.”

  उन्होंने कहा कि जिस काम को हम करना चाहते हैं, हमारी आने वाली पीढ़ी १०-२० वर्ष के बाद इसी चीज का निरंतर रूप से पालन करेगी, ऐसी गारंटी आज हम नहीं दे सकते। इसलिए हम अपने संविधान को ऐसा लचकदार बनाएं कि आने वाले समय और परस्िथति के अनुकूल उसमें परिवर्तन करने का अधिकार हमारी भावी पीढ़ी में रहे। आज उस परिवर्तन की घड़ी हमारे समाज के सामने आ गई कयोंकि जगह-जगह जो झगड़े हो रहे हैं, साम्प्रदायिक तनाव बढ़ रहे हैं, राजनैतिक लोगों की उसमें हिस्सेदारी बढ़ रही है, राजनैतिक पार्िटयां जो उन मुद्दों से अनन्तकाल से दूर रहती थीं, पिछले ७-८ वषर्ों से उनका यह मुद्दा होने लगा है। यह अफसोस की बात है कि भारत जैसे देश में, जहां गरीबों की इतनी लम्बी संख्या है, जिस देश के ऊपर दुनिया के सभी लोगों की, मजबूत राष्ट्रों की, महान् राष्ट्रो की बद-दृष्िट है, हम उस देश की तरककी की और से अपना ध्यान हटाकर मंदिर और मस्िजद जैसे मुद्दों की ओर ले जाते हैं। इसीलिए मैं कहना चाहता हूं कि जो धर्म का मामला है, वह नश्िचत तौर पर व्यकितगत साधना का सवाल है, निजी मान्यता का सवाल है। हम राजनीति के जरिए उसे समाज को थोपने का काम नहीं कर सकते। इस चीज को हमारे देश के महान् राष्ट्र नायक, इस सदी और इस सदी के बाद के हुए हैं, उन्होंने इस बात को कहा है। १८९३ में इस देश के एक महान् व्यकित स्वामी विवेकानन्द जी, जिनको शिकागो के होने वाले धर्म सम्मेलन में निमंत्रण नहीं मिला, लेकिन वे वहां पहुंच गए। वे मैले-कुचैले वस्त्र में थे। उनको वहां निमंत्रण नहीं था। लेकिन अमरीका के ही कुछ लोगों ने, जो सभी धमर्ों का दुनिया का महान् सम्मेलन हो रहा था, उन्हें निमंत्रित करने के लिए वहां ले गए। जब वे वहां बोलने के लिए खड़े हुए और ज्यों ही उन्होंने “अमरीका के भाइयो और बहनो” कहा तो उस पूरे सम्मेलन में सबसे अधिक किसी का स्वागत हुआ तो उस महान् विभूति का नाम स्वामी विवेकानन्द था। स्वामी जी ने उस समय धर्म की जो परिभाषा की, उसे मैं पढ़कर सुनाना चाहता हूं।

“Today, as always man seeks God and often without knowing his doing so. All human activity, good, bad or indifferent is actually the misapplied search for God.

The fact is that man in his true nature is already divine, but this divinity is covered. Life’s one purpose, the realisation of divinity.

Realisation of divinity is religion. At best, all religions teach the same truth, although assertions often obscure it. Vedantta emphasises that one objective of realisation but accepts diverse methods of reaching it. Realisation may be gained by the practice of Yoga of knowledge or of control of mind or of selfless work or of love of God or by a combination of Yogas.

The great Prophets of world afford lively examples of the realisation of divinity. As models they inspire man and as dispenses of grace, they assist him towards realisation…”

  उनके कहने का मतलब यह था कि दुनिया के सारे वशिष्ठ लोगों ने, जिस किसी भी धर्म के मानने वाले थे, गॉड को रियलाईजेशन का जो रास्ता बनाया, वही हयूमैनिटी का रास्ता है और वही असली धर्म है। उन्होंने कहा –

“…Each soul is potentially divine. The goal is to manifest this divinity within by controlling nature, external or internal. Do this either by work or worship or psychic control or philosophy by one or more or all of these and be free. This is the whole of religious doctrines or dogmas or rituals or books or temples or forms are but secondary details.”

  उन्होंने आगे फिर कहा “आई एम ही”

“Vedas say, `I am He’. The truth that there is that one in whom this whole universe of matter and mind finds it unity, whom they call God or Brahma or Allah or any other name, we cannot go beyond that. The grand principle has been already mapped out for us. Our work lies in filling it in, working it out, applying it to every part of our life. We have to work now so that everyone will become a Prophet.”

  उनके कहने का मतलब यह था कि एक ही आत्मा मनुष्य मात्र में विद्यमान है और इस मनुष्य मात्र को हम साम्प्रदायिक सदभाव बिगाड़कर मनुष्य मनुष्य को अलग करने की कोशिश करते हैं और मनुष्य की अनेकता ही समाज के विघटन का कारण बनती है। हमारे संविधान के अनुसार हमारा समाज एक सैकुलर समाज है। संविधान के प्रिएम्बल में हमने समाजवाद को स्वीकार किया, हमने धर्मनिरपेक्ष समाज बनाने की कल्पना की, उस संविधान की रक्षा के लिए जब हम लोग विधान सभा और लोक सभा में आयें तो लोक सभा और विधान सभा में समाज को बांटने वाले जो साम्प्रदायिक नारे हैं, व्यकित-व्यकित में झगड़ा पैदा करने वाले जो जातिगत नारे हैं, उन नारों को आधार बनाकर चुनाव लड़ें, यह एक दुर्भाग्य की बात है। इसलिए उसको खत्म करने के लिए पवित्र मंशा से इस सदन के विचारार्थ मैं अपने विधेयक को प्रस्तुत करता हूं। मैं अपेक्षा करता हूं कि सदन के सभी सदस्य अपनी दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर इस विधेयक का समर्थन करेंगे।

  इन्हीं शब्दों के साथ इस उम्मीद के साथ आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने इस सदन के सामने मेरे इस विधेयक को, जो १२वीं लोक सभा का पहला निजी विधेयक है, प्रस्तुत करने का मुझे अवसर दिया। कुछ दुर्भाग्यपूर्ण स्िथति हो गई, जिससे मेरा दिमाग कुछ विचलित हो गया, इसलिए जितनी बातें मुझे कहनी चाहिए, मैं नहीं कह पा रहा हूं।

  आपको पुनः धन्यवाद देते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

“> श्री सत्य पाल जैन (चंडीगढ़): माननीय सभापति जी, हमारे सम्माननीय सदस्य श्री मोहन सिंह जी ने अपना जो प्राइवेट मैम्बर्स बिल इस सदन में प्रस्तुत किया है, उसके सम्बन्ध में मुझे अपने विचार व्यकत करने के लिए आपने जो समय दिया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

  श्री मोहन सिंह जी ने जो संविधान संशोधन पेश किया है, मैं समझता हूं कि उस पर बहुत गम्भीर विचार किये जाने की आवश्यकता है। भारत के संविधान को जब बनाया गया तो नागरिकों के मूलभूत कर्तव्यों, फण्डामेंटल डयूटीज़ के सम्बन्ध में उसमें कोई चैप्टर नहीं था। १९७६ में जब हिन्दुस्तान में इमरजेंसी लगी तो १९७५ और १९७६ के पीरियड में संविधान के अन्दर कुछ संशोधन किये गये थे। उनमें से एक संशोधन यह भी था कि संविधान में जहां पहले फण्डामेंटल राइटस होते थे, उस समय मूलभूत कर्तव्यों का चैप्टर भी शामिल किया गया। मैं आपात स्िथति में छात्र जीवन में था। आपात स्िथति को और उस समय की प्रधान मंत्री श्रीमती इन्िदरा गांधी जी का हमने हर चीज के लिए विरोध किया था, परन्तु एक बात जिससे शायद सारा देश सहमत था और वह इस बात से सहमत था कि संविधान के अन्दर एक ऐसा चैप्टर जारी किया गया, लागू किया गया, शामिल किया गया, जो नागरिक के कर्तव्यों की भी व्याख्या करता था, उसका प्रावधान करता था। लेकिन इसके साथ-साथ जो दूसरी बात की गई कि नागरिकों के जो कर्तव्य हैं, उनका विवरण तो दिया गया, उसका चैप्टर तो शामिल किया गया, लेकिन उन विवरणों को, उन कर्तव्यों को कचहरी के माध्यम से कैसे लागू किया जाये, इस बात की ओर चिन्ता नहीं की गई और फण्डामेंटल डयूटीज़, मूलभूत कर्तव्य शामिल करने के बावजूद भी किसी ऐसी चीज का प्रावधान नहीं किया गया कि अगर कोई व्यकित अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा है तो इसका पालन कैसे किया जा सकता है। मैं समझता हूं कि धारा ५१ में बहुत सारी ऐसी फण्डामेंटल डयूटीज़ हैं, जो चैप्टर २(ॠ) धारा ५१(ॠ) के अन्दर आते हैं, जो बहुत आवश्यक थीं, आपने उसका जिक़ किया। बहुत सारी ऐसी संस्थाएं हैं, बहुत सारे ऐसे व्यकित हैं जो राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करना चाहते हैं, राष्ट्रीय गीत का अपमान करना चाहते हैं। उसके अन्दर इस बात की व्यवस्था की गई कि हर व्यकित राष्ट्रीय गान का सम्मान करेगा, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करेगा। मैं समझता हूं कि एक सबसे अच्छी फण्डामेंटल डयूटी इसमें शामिल की गई, वह प्रत्येक हिन्दुस्तान के नागरिक का एक परम कर्तव्य बनाया गया:

Now, I quote article 51A (j):

“It shall be the duty of every citizen of India to strive towards excellence in all spheres of individual and collective activity so that the nation constantly rises to higher levels of endeavour and achievement.”

I think, this was the most important fundamental duty which was cast on every citizen.

  आज हमें खुशी है कि मोहन सिंह जी उसके अन्दर एक और चैप्टर शामिल करना चाहते हैं, जिसमें किसी भी राजनैतिक दल पर, किसी भी व्यकित पर धर्म के नाम पर वोट मांगने पर प्रतिबन्ध लगाया गया है। मैं श्री मोहन सिंह जी के ध्यान में एक बात लाना चाहता हूं कि यह अच्छी बात आप संविधान के अन्दर लागू करना चाहते हैं। रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एकट, १९५१ की धारा १२३ और सब धारा सात के अन्दर पहले से ही इस बात का प्रावधान है कि यदि कोई व्यकित धर्म के नाम पर वोट मांगता है, यदि कोई व्यकित साम्प्रदायिकता के नाम पर वोट मांगता है, यदि कोई व्यकित धार्िमक सिंबल के नाम पर वोट मांगता है तो चुनौती देने पर उसका चुनाव रद्द हो जाता है। एक नहीं, सवर्ोच्च न्यायालय के अलग-अलग न्यायालयों के बहुत सारे ऐसे निर्णय हैं, जहां धर्म के नाम पर, साम्प्रदायिकता के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर वोट मांगने से आपका चुनाव अवैध हो जाता है, रद्द हो जाता है। यह प्रावधान सिर्फ रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एकट में ही नहीं है। यह प्रावधान म्युनसिपल एकट में है, कारपोरेशन एकट में है, ग्राम पंचायत एकट में है और जो बाकी सारे अन्य एकट हैं, उनके अन्दर भी पहले से ही प्रावधान हैं।

  मैं श्री मोहन सिंह जी से विनती करना चाहता हूं कि जहां हम आपकी भावना से सहमत हैं, यह बात सही है कि धर्म और जाति के नाम पर देश को नहीं बांटा जाना चाहिए। धर्म और जाति के नाम पर वोट नहीं मांगना चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ आपको भारत के संदर्भ में इन दोनों तीनों शब्दों की पहले पूरी व्याख्या करनी होगी। आप अगर प्रतिबन्ध लगाना चाहते हैं कि कोई भी व्यकित या कोई भी पोलटिकल पार्टी धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगेगी, यह उसकी फण्डामेंटल डयूटी होगी। सबसे पहले हमको इस बात पर विचार करना होगा कि अगर इसकी उल्लंघना होती है तो कया हम किसी कानून में इसको लागू कर सकते हैं और यदि हम किसी कानून में लागू नहीं कर सकते तो कया संविधान के अन्दर ऐसी व्यवस्था की जाये, जिसको हम लागू नहीं करवा सकते तो उससे स्िथति और खराब होती है। आपने धर्म के सम्बन्ध में कुछ बातें कहीं, मैं उनसे सहमत हूं, उसमें शायद कोई दो राय वाली बात नहीं होगी। रिलीजन अंग्रेजी का शब्द है, धर्म इसका सही अनुवाद नहीं है। हमारे यहां धर्म और रिलीजन दो अलग-अलग चीजें हैं। रिलीजन विदेशी, वैस्टर्न साइड से आया हुआ शब्द है। यहां जो धर्म का मतलब है वह आपके कर्तव्यों से है, आपकी मोरल डयूटी से है। हम बहुत बार कहते हैं कि राजा का धर्म है कि प्रजा के लिए वह किसी भी सीमा तक कुर्बानी करने को तैयार हो तो इसका मतलब यह नहीं है कि यह वाकय आप चुनाव के अन्दर नहीं कह सकते। पिता का धर्म है, पुत्र का धर्म है, माता का धर्म है, पति का धर्म है, हमारे यहां जो धर्म है, उसकी व्याख्या बिल्कुल अलग है। सबसे पहले आप किस चीज को रिलीजन के नाम पर वोट मांगना मानेंगे, इस बात की व्याख्या करनी पड़ेगी।

  इस मुल्क के अन्दर बहुत सारे धमर्ों के मानने वाले लोग हैं, बहुत सारी भाषाओं को बोलने वाले लोग हैं, बहुत सारी उप-जातियों के लोग हैं और उन उप-जातियों के लोगों की अपनी कुछ समस्याएं हो सकती हैं, अगर हम इसकी व्यवस्था बिना सोचे समझे कर देते हैं तो कया हम यह मानकर चलें कि मान लीजिए आदिवासी क्षेत्र के रहने वाले लोग हैं, जिनका अपना पूजा पद्धति का ढंग है। पंजाब के अन्दर रहने वाले हमारे सिख भाई हैं, जिनका अपना पूजा पद्धति का ढंग है, जिनकी अपनी पार्टी है। अन्य राज्यों के अन्दर ऐसी पार्िटयां हो सकती हैं, वे चाहे किसी किस्म की साम्प्रदायिक बात नहीं करतीं और चाहे किसी दूसरे व्यकित के खिलाफ नहीं बोलतीं, लेकिन अपने धर्म को, अपनी भाषा को, अपने सम्प्रदाय को, अपनी जाति को अगर वे आर्गेनाइज करना चाहते हैं तो कया हम उनको भी चुनाव लड़ने से रोक देंगे, इस बात पर हमको विचार करना पड़ेगा? अगर यह संशोधन हम बिना सोचे समझे स्वीकार कर लेते हैं, बिना गहराई में जाकर हम इसपर विचार करते हैं तो इसके साथ बहुत सारे लीगल काम्प्लीकेशंस हो सकते हैं। जो रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एकट है, उसके अन्दर भी जो प्रतिबन्ध है, वह व्यकित के अपने धर्म या जिनसे वोट मांग रहा है, उसके धर्म के नाम पर वोट मांगने पर प्रतिबन्ध है:

“A candidate cannot seek vote in the name of his religion and the courts have defined a number of times that `his religion’ will mean either the `candidate’s religion’ or the religion of the voters.”

  कई बार इसका नुकसान होने की जो संभावना हमें हो सकती है, अगर हम इसकी पूरी तरह से व्याख्या नहीं करते। कोई व्यकित अगर जैन्युइनली भी किसी धर्म के लोगों के साथ जो अन्याय हो रहा है, उसकी भी निन्दा करना चाहे तो वह उस परधि के अन्दर आ सकता है। मान लीजिए कि केंडीडेट मुसलमान है और वोटर मुसलमान नहीं है और मान लीजिए कि वोटर भी मुसलमान है और कोई व्यकित यह कहे कि नहीं, फलां प्रान्त के अन्दर सिखों के साथ ज्यादती हो रही है या फलां प्रान्त के अन्दर ईसाइयों के साथ ज्यादती हो रही है तो कया हम उसको भी प्रतिबन्िधत करना चाहेंगे? आज रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एकट इस बात की चिन्ता नहीं करता। हमारे बहुत सारे ऐसे हिन्दू भाई हैं, सदन के अन्दर बहुत सारे लोग बैठे हैं, जो इस बात का दावा करते हैं कि हम मुसलमानों के हकों के लिए लड़ रहे हैं। वोट मांगने वाला भी हिन्दू है, जिनसे वोट मांगा जा रहा है, वह भी हिन्दू है तो कया उनके सामने यह बात नहीं कह सकते कि वहां सिखों के साथ ज्यादती हो रही है या आप यह बात नहीं कह सकते कि मुसलमानों पर ज्यादती हो रही है या आप यह बात नहीं कह सकते कि ईसाइयों से ज्यादती हो रही है। कया महाराष्ट्र के अन्दर चुनाव लड़ते समय हमारे शिवसेना के भाई आन्ध्र प्रदेश का जिक़ नहीं कर सकते, पंजाब का जिक़ नहीं कर सकते, तमिलनाडू की जिक़ नहीं कर सकते? इसके जो गम्भीर परिणाम हैं, इनको समझने की कोशिश करिये। मेरा आपसे निवेदन है कि इस प्रस्ताव पर बहुत गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए। मोहन सिंह जी, आपकी भावना से हम सहमत हैं, पर इसके जो लीगल आस्पैकटस हैं, इसके जो लीगल कांसीकवेंसेज़ हैं, आप उनपर भी विचार करने की कोशिश करें।

  इसलिए मेरा मत यह है कि इस प्रस्ताव पर और गम्भीर विचार होना चाहिए, इसके लीगल आस्पेकट स्टडी किए जाने चाहिए। अच्छा रहेगा वधि मंत्रालय इस सम्बन्ध में और काम करे और मोहन सिंह जी इस पर विचार करने के बाद इसको और स्पैसफिक करने की कोशिश करें।

  अंत में मैं एक बात और कहना चाहूंगा। आप उम्मीदवार और राजनैतिक दल दोनों पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं। राजनैतिक दलों का रजिस्ट्रेशन है, वह अलग से गवर्न होता है। उसके लिए अलग से रिप्रजैंटेशन आफ पीपल एकट, १९५६ है, जो पोलटिकल पार्टीज की, इलैकटरोल्स की, वोटर्स की रजिस्ट्रेशन डील करता है। उसके अंदर किसी किस्म का ऐसा प्रतिबंध नहीं है। राजनैतिक दल अगर कोई ऐसी बात करता है तो जो कंडीशंस ले डाउन की हुई हैं, उनके अंदर इसको लाना मुश्िकल हो जाएगा, कयोंकि जब तक आप इसकी पूरी व्याख्या नहीं करेंगे, इसको इंफोर्स करने में, इस कलाज़ को लागू करने में व्यावहारिक कठिनाइयां आ सकती हैं। हम इसकी भावना से सहमत हैं, परंतु इस पर गम्भीरता से विचार करें। इसको राजनीति का मुद्दा न बनाएं। इसको सभी राजनैतिक दलों के लोग और मंथन करने के बाद किसी निर्णय पर पहुंचें ताकि इस सम्बन्ध में एक स्पष्ट नीति बनाई जा सके।

  इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

MR. CHAIRMAN : Shri K. Rosaiah.

1721 hours

SHRI KONIJETI ROSAIAH (NARASARAOPET): At the outset I would like to thank you for giving me an opportunity to say a few words on the Budget proposals for 1998-99.

MR. CHAIRMAN: This discussion is not on the Budget. It is a Private Member’s Bill. Shri Mohan Singh has introduced a Bill to amend the Constitution. (Interruptions)

SHRI K. ROSAIAH: My apologies to you and to the House. I have just now come. I thought that the Budget discussion was going on.

MR. CHAIRMAN: Shri V. Radhakrishnan.

“ऊ”ऊच्ङक्ष् ज्ॠङख़्ॠॠ ङॠक़्ॠख़्ङक्ष्च्ग़्ॠग़् (क्क्ष्ङॠक्ष्ग़्ख़्क्ष्): क्ष् द्वद्मद्य दद्ृ ढ़द्ृद्य द्यण्ड्ढ एत्थ्थ्. ण्त्द्म ण्ठ्ठद्म द्यद्ृ डड्ढ ठ्ठड्डड्ढ ठ्ठ ढद्वदड्डठ्ठड्ढदद्यठ्ठथ् ड्डद्वद्य द्वदड्डड्ढद्ध द्यण्ड्ढ द्रद्धद्ृध्त्द्मत्द्ृदद्म द्ृढ द्यण्ड्ढ क्द्ृदद्मद्यत्द्यद्वद्यत्द्ृद. ज़्त्द्यण् ड्डद्वड्ढ द्धड्ढद्मद्रड्ढड़द्य द्यद्ृ थ्ड्ढठ्ठद्धदड्ढड्ड ढद्धत्ड्ढदड्ड, क्ष् द्ृद्रद्रद्ृद्मड्ढ द्यण्त्द्म ठ्ठड्ढदड्डड्ढदद्य. ण्त्द्म ड़ठ्ठददद्ृद्य डड्ढ त्दड़थ्द्वड्डड्ढड्ड त्द द्यण्ड्ढ क्द्ृदद्मद्यत्द्यद्वद्यत्द्ृद. क्ष्द्य त्द्म ठ्ठत्दथ् ठ्ठ ठ्ठद्यद्यड्ढद्ध द्ृढ द्रद्धद्ृड़ड्ढड्डद्वद्धड्ढ ठ्ठदड्ड त्द्य ण्ठ्ठद्म द्यद्ृ डड्ढ ड्डड्ढठ्ठथ्द्य त्द्यण् ड ठ्ठ द्मद्यठ्ठद्यद्वद्यड्ढ.

Take for example, the Representation of the People Act wherein there are provisions for conducting elections, what are election authorities, what should be the procedure for the conduct of all elections throughout India. I agree with him and the Members involved in this Amendment. It is good. But this can be achieved by other means. It can be achieved by making suitable amendments in the Representation of the People Act. It is also enforceable. It is also having the same validity as the Constitution of India and our courts, the High Courts and the Supreme Court decided cases under the provisions of the Representation of the People Act. Even elections are set aside and even the fitness of a candidate is questioned and the courts stated that he is unfit to be a candidate.

Recently, if I remember correctly, there was a provision initiated by the Chief Election Commissioner that persons who are involved in criminal cases and persons who have been convicted in criminal cases are disqualified to be members of the State Legislature or Parliament as the case may be. That being the case, even the Election Commission had done it and it is giving directions to the people who are entrusted with the conduct of the elections regarding these matters. Everybody knows that religious feelings should not be the basic factor for conducting the elections.

I would submit to my learned friend that this should not be done in this way. After all in our Constitution there is nothing mentioned about political parties. If you go through the entire Constitution you will not find the word `political party’. There the matter is dealt with on the basic principles concerning the citizen.

If you go through the entire Constitution, you will not find any mention of any association or of any political party. It is not imperative to include the conduct of the political parties in the Constitution. Of course, a number of political parties are there. This is a matter of procedure. It can form part of the Representation of the People Act. The Election Commission has recently issued a notification without an amendment. If I remember correct, there are provisions in the said Act and they are enforceable like the articles of the Constitution. The High Courts and the Supreme Court pronounced decisions regarding the provisions of the Representation of the People Act. A candidate’s election can be set aside by the High Court under the provisions of the Representation of the People Act and the candidature can also found to be invalid by the courts. When such provisions are there, this can also find a place in the said statute. It will not be fair to add the present amendment along with the fundamental duties provided under article 51(A).

Now, in our Constitution, the founding fathers of the Constitution did not enunciate the fundamental duties. They only added the fundamental rights. There are two types of fundamental rights, justiciable and non-justiciable. Justiciable fundamental rights are enforceable in the court of law, in the form of writs whereas non-justiciable fundamental rights will form part of the Directive Principles of State Policy. For example, the controversial issue regarding the Uniform Civil Code is still an issue of non-justiciable fundamental right. It is still one of the Directive Principles of State Policy unenforceable through court. Our right to work is not a fundamental right. It is only a non-justiciable fundamental right and it can be in the Directive Principles to be followed by the State Governments as well as by the Central Government. It cannot be enunciated through a court of law. I cannot go to court and say that I am unemployed and I must get some job. The court will not entertain it. It is because it is not justiciable. Here, the Section 51(A) is a non-justiciable fundamental right. However, when we have decided the fundamental rights, there was no specific provision for providing the fundamental duties.

My friend, the mover of the Bill is asking us to include a later portion as Section 51(B). It is not a fundamental duty of the citizen. It may be a fundamental duty of a political party or an association. Here, Section 51(A) deals with the fundamental duties of an individual citizen. My hon. friend, through an amendment, is trying to bring a new Section which asks a political party or a body or an association, not to put up candidates who are propagating religious feelings and such other things.

So, it is a duty assigned to a group of persons or a political party or a political association. It has nothing to do with the Fundamental Duties provided in article 51A in Part IVA. So, it will be out of place not only because the words `political party’ and `body of association’ do not occur in the Constitution, it will be out of place if we add this article to that Part of the Constitution.

Therefore, with due respect to my learned friend, with due respect to the Mover of the Resolution, I am constrained to oppose the Bill. This cannot form part of the Constitution. It will be unfair, it is not legal and it is out of place, if I may put it correctly, to add such a provision after article 51A. Hence, I oppose it and I may be excused for that. This is what I have to submit on this Amendment Bill.

“ऊ”ऊ कुमारी ममता बनर्जी (कलकत्ता दक्षिण) : सभापति महोदय, मोहन सिंह जी द्वारा संविधान की धारा ५१बी में संशोधन करने के लिए जो विधेयक विचार करने के लिए सदन में प्रस्तुत किया है, मैं उसकी भावना के साथ सहमत हूं। भावना यह कि राजनीति में धर्म को नहीं जोड़ा जाना चाहिए और कोई कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। यह सच है कि कि हमारे देश में इसके बारे में बहुत सारे कानून है। लेकिन दुख की बात है कि उनका इस्तेमाल ठीक से नहीं हो रहा है। आजादी के बाद इस देश में बहुत सारी सरकारें आईं, लेकिन सवाल एक ही पैदा होता है, जो हमारे संविधान के अन्तर्गत है और इलैकट्रोरल रिफार्मस में भी इस बात को कहा गया है। इलैकट्रारल रिफार्मस के संबंध में एक कमेटी बनाई गई है, आशा है वह समति इस बारे में विचार करेगी और इस चीज को गम्भीरता से लेगी। इस विधेयक पर ज्यादा बोलने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन मोहन सिंह जी ने जो विधेयक सदन में प्रस्तुत किया है, मैं उससे सहमत हूं।

  बाबासाहब अम्बेडकर जी ने हमारे देश के संविधान को बहुत अच्छी तरीके से बनाया था। स्िथति बदल रही है और हमारे देश की आबादी बढ़ रही है। हमारे देश में विभान्न विचारों के लोग हैं। इन सब बातों को देखते हुए, संविधान में ७८वां संशोधन भी किया गया। मैं एक बात सदन में कहना चाहती हूं। अब से तीन साल पहले मैंने मानवी के बारे में लिखा था और कहा था कि अगर कोई महिला ७८ स्थानो से फटी साड़ी पहनती है, तो देखने में अच्छा नहीं लगता है, लेकिन साड़ी फटी नहीं होती है, तो देखने में अच्छा लगता है। इसलिए मैंने कहा था कि संविधान में संशोधन के संबंध में एकसपर्ट कमेटी विचार करे और धर्म को राजनीति के साथ नहीं जोड़ना चाहिए। मैं एक बात कहना चाहती हूं, पोलटिकल पार्टीज पोलटिकल विल है और वह ठीक से कामयाब होती है, तो इस तरह के बिल को लाने की जरूरत नहीं है। अगर पोलटिकल विल नहीं होगी, तो आप चाहे जितने ही संशोधन संविधान में करें, पीपल्स रिप्रजैंटेशन एकट में करें, इलैकट्रोरल रिफार्मस में करें, उनसे कुछ होने वाला नहीं है। अगर राजनीतिक लोगों को इस बारे में चिन्ता है, तो यह स्िथति पैदा ही नहीं होगी।

  महोदय, हिन्दुस्तान एक बड़ा देश है। हमारे देश में बहुत सारी भाषायें हैं, बहुत सारी रीतियां है और हमारे साउत की बात एक है और नार्थ की बात एक है।

South Indians have their own sentiments, North Indians have their own sentiments, Eastern people have their own sentiments and North-Eastern people have their own sentiments. But we all are together. We are happy that India is the biggest democratic country. हमारे देश में बहुत धर्म हैं, बहुत सारी जातियां हैं, इन सबके होने के बावजूद भी हम लोग एक साथ रहते हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था – युनिवर्िसटी इन डाइवर्िसटी। महात्मा गांधी ने कहा था – ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सब को सम्मति दे भगवान। इकबाल ने कहा था – सारे जहां से अच्छा, हिन्दुस्तान हमारा। राजीव जी ने कहा था – मेरा भारत महान। ये सब हमारे देश के नारे हैं। इतना होने पर भी हम देखते हैं, चुनावों के समय फतवा जारी होता है। कयों होता है? चाहे कोई भी धर्म हो, लेकिन फतवा जारी नहीं होना चाहिए। जो लोग चुनाव के समय फतवा निकालते हैं, वे लोग कमयुनिटी के लिए काम नहीं करते हैं, सोसायटी के लिए काम नहीं करते हैं, शिक्षा के लिए काम नहीं करते हैं, पीने के पानी के लिए काम नहीं करते हैं, लेकिन बैठे-बैठे फतवा जारी कर देते हैं। किसी भी जाति के लोग हों, चाहे हिन्दू हो, चाहे मुसलमान हो, चाहे सिकख हो और चाहे ईसाई हो, हम चाहते हैं कि हमारे देश में हिन्दू, मुस्िलम, सिकख,ईसाई, आपस में रहना भाई-भाई। हमारे देश का यह नारा होना चाहिए।

  मैं दुख के साथ एक बात कहना चाहती हूं। अभी हमारे राज्य में चुनाव हुए। मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहती हूं, नहीं तो झगड़ा हो जाएगा। हम लोगो को झगड़ा करने की आदत सी हो गई है। हमारा इतना इशारा ही काफी है कि मैं कया कहने जा रही हूं। हमारे क्षेत्र में जाकर लोगों से कहने लगे कि ममता बनर्जी को वोट न दो। कयों? कयोंकि वह कुरान को जला देगी। कुरान की तो मैं इज्जत करती हूं। हमारे देश में महिलाओं के बारे में कहा जाता है।

Is it fair on the part of political leader to give such type of a speech. यदि कोई दंगा फसाद होता है, तो हम लोग जाते हैं, कोई नहीं जाता है। हम लोग लड़ते हैं । कहा जाता है कि हिन्दू-मुस्िलम के टुकड़े-टुकड़े कर दो, सिख-ईसाई के टुकड़े-टुकड़े कर दो। कहते है कि हम लोग ज्यादा सैकयुलर हैं। जो लोग ज्यादा सैकयुलरिज्म की बात कहते हैं,

I am sorry to say that they do not behave like secular people. ये लोग छुपे रुस्तम हैं और इसी वजह से ये ज्यादा से ज्यादा सैकयुलरिज्म की बात कहते हैं। इसलिए मैं मोहनसिंह जी से कहना चाहती हूं कि खाली वोट के समय हिन्दू-मुस्िलम की बात नहीं होनी चाहिए और वोट के बाद फिर माइनोरिटी का मसला ले लेते हैं और कहते हैं कि उनके लिए एक परसेंट की व्यवस्था है। हमारे संविधान में लिखा है –

the majority is the protector of the minority. Everybody is in the minority in different areas. I stay in West Bengal, I may be in the majority there, but I am in the minority in Bihar, South India, Maharashtra, Delhi, Gujarat and Assam. But we respect that because हमारी ज़ियोग्राफिकल स्िथति ऐसी है कि हमें

  इन लोगों का ध्यान रखना होगा। यह सच है कि मुस्िलम को माइनोरिटी कहा जाता है, सिकख को माइनोरिटी कहा जाता है, ईसाई को माइनोरिटी कहा जाता है। मैं चाहती हूं कि उनके डवेलपमेंट के लिए चर्चा होनी चाहिए, लेकिन कुछ नहीं होता है। यह हम लोगों की गलती है और आप चाहे कितने की बिल ले आइए, जब तक पोलटिकल विल नहीं होगी, यह काम नहीं हो सकता है। हम लोग ३३ प्रतिशत आरक्षण की बात कहते हैं। यह व्यवस्ता पंचायतों में तो हुई है, म्युनसिपैलिटी में तो हुई है। जो महिलायें चुनाव में लड़ती हैं, उनकी कया स्िथति है, कया रिजर्वेशन उनकी प्रोटैकटर है? कया ३३ प्रतिशत उनकी प्रोटैकटर है। चुनावों में जो महिलायें चुनाव लड़ती है, उनका रेप करके मर्डर कर दिया जाता है।

  यह कया महिलाओं का प्रोटैकशन है, यह प्रोटैकशन नहीं है। हमारे देश में एस.सी.एस.टी. का तो रिजर्वेशन है लेकिन उनमें भी बहुत सारे ऐसे हैं जिनको मौका नहीं मिलता है। गांधी जी ने कहा था ”

Untouchability is a crime.”

  यह कहना कि वह राजनैतिक पार्टी अनटचैबल है या वह पार्टी अनटचैबल है ठीक नहीं है। जब आप एक को अनटचैबल नहीं मानते हैं तो राजनैतिक पार्टी को अनटचैबल कहना ठीक नहीं है। राजनैतिक पार्टी से राजनैतिक रूप से ही लड़ा जाना चाहिए। धर्म के नाम पर लड़ना ठीक नहीं है। इसमें खाली एक राजनैतिक पार्टी से कहना ठीक नहीं, सारी पार्िटयों का दिल ऐसा होना चाहिए कि हम किसी को अनटचैबल न समझें। बालागौड़ा जी मुस्िलम हो सकते हैं लेकिन कया उनको हिंदू वोट नहीं देते हैं। मैं हिंदू हूं लेकिन हमारे संसदीय क्षेत्र में बहुत सारे मुस्िलम हैं।

They vote for me because if they are in trouble I always go there. We always look into their problems. This is our tradition, this is our custom.

  मैंने हैदराबाद में जहां दंगा हुआ, देखा है कि कोई हिंदू या मुस्िलम दंगा नहीं कराता है, गुंडे दंगा-फसाद कराते हैं। वे गुंडे समाज के गद्दार हैं। कोई भी गुंडा राजनैतिक पार्टी के लिए असैट नहीं हो सकता है। आज धर्म के साथ जात का नाम भी जुड़ रहा है। पहले कभी जात का सवाल खड़ा नहीं होता था, लेकिन आज हो रहा है कि कौन किस कास्ट का लीडर है। मुलायम सिंह एक कास्ट का लीडर है, लालू प्रसाद एक कास्ट का लीडर है

There are some other parties. They are also champion of other castes.

  बालागौड़ा जी और मुलायम सिंह मुस्िलम कास्ट का लीडर है। यह सब कया है? हम समझते हैं कि आपस में मेल-मिलाप के साथ रहना बहुत अच्छा होता है। इसलिए राजनीति के लिए धर्म का इस्तेमाल करना ठीक नहीं है, इसको मानना भी ठीक नहीं है। इसलिए मेरी रिकवैस्ट है कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। जब इलैकशन रिफोर्म की चर्चा हो रही है तो हमें एक कमेटी बनानी चाहिए जो इन बातों पर अच्छी तरह से ध्यान दे। हमारे यहां पीपल्स ऑफ रिप्रैजेंटेशन अमेंडमेंट एकट है, उसमें हाई कोर्ट का कहना है कि जो व्यकित क़ीमनल है उसको टिकट नहीं मिलेगा। आप देखिये कि कितने क़ीमनल हैं जो एम.एल.ए., एम.पीज बन जाते हैं या नहीं बन पाते हैं, ऐसे बहुत सारे हैं। लेकिन उनके लिए हमारा कानून तो है, हम कानून का इस्तेमाल कयों नहीं करते हैं? इसके लिए एक शेर है,”मौसम बदले, बहार बदले, जमाने की हर चीज बदले, लेकिन राजनीति के लीडर लोगों की आदत कयों न बदले”। अगर उसकी आदत बदले तो इन सब बातों की कोई जरूरत नहीं है। यह सारी चीजें हम आपस में बैठकर हल कर सकते हैं।

If there is a will, there is a way. मैं यह भी सोचती हूं कि माइनोरिटीज को प्रोटेकशन देना हमारा रक्षा कवच है, दलितों को प्रोटेकशन देना हमारा रक्षा कवच है। यह हमारे संविधान में है क

The Scheduled Castes, the Scheduled Tribes and women should get proper respect. हिंदू, मुस्िलम, सिकख, ईसाई, या कोई और भी हो, हम किसी को बांटना नहीं चाहते हैं। बांटना आसान है लेकिन लोगों को आपस में जोड़ना मुश्िकल है। इसलिए आइये, इस हाउस में हम एक चीज पर तो विचार करें कि चुनाव के दौरान हम ऐसा कुछ न करें कि हमारा देश बंट जाए, राजनीति बंट जाए, हमारे दिल बंट जाएं। अगर ऐसा हो गया तो हमारा देश कभी तरककी नहीं कर सकता है, हम जैसा भारत बनाना चाहते हैं उसमें हम कामयाब नहीं हो सकते हैं।

  जो बात मोहन सिंह जी ने कही है वह हम लोगों के दिल की बात कही है। राजनीति के साथ धर्म का कोई संबंध नहीं होना चाहिए। राजनीति-राजनीति है, धर्म-धर्म है। लेकिन जो लोग धर्म की राजनीति करते हैं मैं उनको कंडम करती हूं। हमें यहां बैठकर आपस में ऐसा फैसला करना चाहिए जिसको मानकर चलना हर आदमी के लिए हकीकत हो। अगर हम मिलकर नहीं चलेंगे तो आने वाले दिनों में भी यह बिल पास करके, प्राइवेट मैम्बर बिल लाकर हम कुछ नहीं कर सकते हैं। जैसे हिंदुस्तान की आजादी के लिए किसी एक कम्युनिटी ने साथ नहीं दिया था बल्िक सब लोगों ने मिलकर साथ दिया था, सारे धर्म के लोगों ने, सारी कम्युनिटी के लोगों ने साथ दिया था।

We have every kind of regiment in our country. We are proud of our regiments. That is why, my request to all the leaders and Members – elders and yougsters – would be that we should not divide ourselves only because of elections.

  वोट की राजनीति में आर्िथक इश्यूज को कैसे हल किया जाए और कैसी हमारी सोसाइटी होनी चाहिए।

But we do not discuss economic and social issues. We only divide ourselves in the ballot box – who are Hindus, who are Muslims, who are Christians and who are Sikhs. After that, nobody thinks about the poor people, the weaker sections, the minorities, the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes, the OBCs and the women. That is why … (Interruptions)

SHRI T. GOVINDAN (KASARGOD): What is the fate of your Party in West Bengal?

MR. CHAIRMAN:

Please, first you listen. If you want to intervene, I will give you time.

KUMARI MAMATA BANERJEE (CALCUTTA SOUTH): Sir, he has asked some clarifications. I will tell him. Our fate is very good. Do you know that? We have broken so many Red Belts. We are a five-month old Party. This Party was set up on Ist of January. Do you know what has happened after that? We got 45 per cent votes this time in rural areas.

Sir, there were 95 deaths in Panchayat elections. It never happened even in Bihar elections and you say that Bihar is worse. Now, West Bengal is worse than Bihar. Please remember that there were 95 deaths till today in the elections. A minority woman was raped and paraded naked. Her name is Shabiran Bibi. Her village name is Parasar Bishnupur, District – South 24 Parganas, Saldat Begam Police Station, District Howarh. उसके बाल काटकर, उसको नंगा करके घुमाया।

A Scheduled Caste women was our candidate and she contested the election. Her name is Chapla Sardar. She was raped and she was hospitalised. Do you want to know anything more?

SHRI C.P. RADHAKRISHNAN (COIMBATORE): How many of them were from RSP and Forward Bloc?

KUMARI MAMATA BANERJEE: Sir, the most unfortunate part is that the cadres of the C.P.M. went like Chambal dacoits.

  घोड़े पर चढ़कर गया, जाकर उसके पांव काट दिये, उसके हाथ काट दिये, उसका मुंह बांध दिया और उसके बाद उसको जलाया।

The death toll comes to more than 95 persons — C.P.M. – 4, C.P.I. – 1, R.S.P. also 1, T.M.C. – 57 and B.J.P. – 40. Are you satisfied now? Sir, he asked me that is why I am giving these details.

They ask the villagers to pay rupee one lakh. Otherwise, they are not allowed to enter the village. There is no drinking water. We have started a lungar. Even your friends are being killed. You just go and see. That is why I say that politics and religion are two different things. Let us sit together, let us speak together and let us unite together.

Sir, I feel that the minorities should get protection. They are not getting any protection. I am in favour of reservation for minorities. If you ask me why I will tell you, it is because they have got only one per cent employment opportunities. They are not getting any advantage. I am in favour of reservation for minorities like OBCs. Of course, 11 per cent persons in India belong to minority. In my State the percentage is higher than that of India. It is 28 per cent. But their employment opportunity is only one per cent. That is why, मैं श्री मोहन सिंह के बिल में यह बात भी रिकोर्ड करना चाहती हूं

that there should be some reservation for the minorities. We should see the interest of the people and not mix politics with religion.

  वोट बैंक बांटने के लिए नहीं बल्िक हम लोग चाहते हैं कि हम आपस में भाई-बहन की तरह रहें, हम एक साथ काम करें, जिस काम की तरफ इशारा है। “खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तदवीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा कया है”।

“> श्री के.डी.सुल्तानपुरी (शिमला): माननीय सभापति जी, मोहन सिंह जी ने जो बिल रखा है, उसके प्रति उनका इरादा ठीक है। वे सभी पार्िटयों को इससे इकट्ठा करना चाहते हैं जिससे वे धार्िमक भावना भड़का कर चुनाव न लड़ें। वह ५१वें संविधान में संशोधन करना चाहते हैं। हमारे संविधान में ऐसी पार्िटयों का कोई जिक़ नहीं है जो धार्िमक भावनाएं भड़का कर वोट प्राप्त करते हैं। हमारे रिप्रेंजेंटेशन आफ दी पीपुल्स एकट में भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे कोई पॉलटिकल पार्टी धार्िमक भावना न भड़का सके। अभी हमने चुनाव लड़ा। उसमें इस बात की हिदायत दी गई कि ऐसी कोई धार्िमक भावना नहीं भड़कायी जाएगी जिससे राष्ट्र को कोई नुकसान हो। जब हम चुनाव सभाओं में जाते हैं तो उसके पहले हर कोई मंदिर, मस्िजद, गुरुद्वारे में जाकर मस्तक टेकता है। वे देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। हमारे लोग इस बात को अमूमन मानते हैं। वे धार्िमक स्थलों में मस्तक टेकने के लिए जाते हैं।

  जहां तक धार्िमक भावनाओं से इलैकशन लड़ने का सवाल है, मैं समझता हूं कि धार्िमक भावना नहीं भड़कानी चाहिए। जो रिस्पॉसिबल पार्िटयां हैं, वे सभी अपनी पार्िटयों में इस बात को रखें कि वह धार्िमक भावना न भड़काएं। चुनाव प्रक़िया और संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि हम ऐसी कोई बात न करें। यहां बहुत सी बातें कही गई। चुनावों में जात-पात का मसला खड़ा किया जाता है – चाहे पंचायत या नगरपालिका के चुनाव हों, असेम्बली के चुनाव हों या संसद के चुनाव हों, हर जगह यह कोशिश होती है कि हम लोगों को भड़का कर बांटने की कोशिश करें। वे अपने वोट पकके करने के लिए ऐसा करते हैं। मेरे विचार में हम ऐसा करके वोटों को डिवाइड करते हैं और साथ ही राष्ट्र को विभाजित करते हैं। हम सांसद इसको ठीक कर सकते हैं।

17.52 hrs. (Dr. Laxmi Narayan Pandey in the Chair)

  मोहन सिंह जी ने संविधान में संशोधन करने की जो बात कही है, मैं ऐसा समझता हूं कि इसमें संशोधन करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर कोई किसी की भावना को भड़काता है तो उसके खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए। उसके खिलाफ पैटिशन भी दायर की जा सकती है। इन चीजों को मद्देनजर रखना चाहिए।

  ममता जी ने कहा कि वभिन्न जातियों के जो लोग हैं, दूर-दराज के क्षेत्र में रहने वाले जो लोग हैं, उनका अपना-अपना धर्म है। उनके मुताबिक वे चुनाव लड़ते हैं। उनकी अलग-अलग जातियां होती हैं। उत्तर प्रदेश में जो टिहरी गढ़वाल का इलाका है जो कि देहरादून के पास है, उसके साथ मेरा चुनाव क्षेत्र लगता है। वह क्षेत्र ट्राइबल है लेकिन वहां ट्राइब्स नहीं रहते। हमारे यहां एक पत्नी प्रथा है। उस इलाके में खास करके ट्रांसगिरी के इलाके में एक पत्नी के पांच पति हैं। इस तरह का उनका कस्टम है। सब का अपना-अपना कस्टम होता है। अगर उनकी भावना को भड़काया जाएगा और कहा जाएगा कि उन्होंने उसूल के खिलाफ काम किया है तो यह ठीक नहीं होगा। वे लोग अपने रीति-रिवाजों से बहुत सुखी हैं। वे खुश रहते हैं। उत्तर प्रदेश का यह इलाका ट्राइबल इलाका है लेकिन हमारा ट्राइबल इलाका नहीं है। कई बार उनकी धार्िमक भावना को भड़काया जाता है। इसको रोकने के लिए मैं भारत सरकार को यह सुझाव देना चाहता हूं कि अगर इसमें कोई संशोधन हो सकता है तो वह किया जाए। अगर कोई किसी की जाति को भड़का कर राष्ट्र को मजबूत करना चाहता हूं तो मैं ऐसा समझता हूं कि कभी भी राष्ट्र इससे मजबूत नहीं होगा। हम सब एक हैं, भाई लोग हैं, हमें आपस में प्यार से रहना है और मजबूत राष्ट्र का निर्माण करना है। तभी हम आगे बढ़ सकते हैं।

  प्राइवेट मैम्बर्स जो प्रस्ताव लाते हैं, उसमें जो भावना होती है, वह उनकी आत्मा से निकलती है। इससे हमारा राष्ट्र आगे बढ़ सकता है। उनकी भावना बहुत शुद्ध होती है। मोहन सिंह जी ने बहुत अच्छे ढंग से अपनी बात को कहा है। मैं इनकी भावना की कद्र करता हूं। उन्होंने अच्छी भावना से कहा है कि इसमें संशोधन इस प्रकार होना चाहिए कि कोई राजनीतिक लाभ न उठाए। आज इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश हो रही है। हम इसको कैसे बंद करेंगे? भावना भड़काने वाली बात नहीं होनी चाहिए। हमारे यहां धार्िमक संस्थाएं अलग हैं और राजनैतिक मंच अलग है। आज अधिकतर लोग धार्िमक हैं – चाहे वह मुस्िलम हैं, ईसाई हैं, सिख हैं। जब हम ओथ लेते हैं तो कोई ईश्वर के नाम से ओथ लेता है कोई सत्य निष्ठा से प्रतिज्ञान करता है। हमें इलैकशन से पहले ओथ दिलायी जाती है। इस बिल में भड़काने की जो बात कही गई है, मैं समझता हूं कि भड़काने की कोई बात नहीं होनी चाहिए। इस पर लम्बा-चौड़ा बोलने वाली कोई बात नहीं है। आपने घंटी भी बजा दी है। मोहन सिंह जी अच्छी भावना से बिल लाए हैं। इसमें जहां तक हो सके, अमैंडमैंट करने की कोशिश हो। इस बिल की भावना अच्छी है। अच्छी भावना होने से ही आदमी का आगे काम बनता है। सरकार की तरफ से कोई ऐसा प्रस्ताव लाया जाए जिससे संविधान में संशोधन हो सके। इसी के साथ मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

*m06

“>SHRI SUDHIR GIRI (CONTAI): I thank you for giving me this opportunity to speak on the importance of this Bill.

Shri Mohan Singh has brought this Bill. This Bill is very important. It should be discussed thoroughly because its implications are very very important.

Our Constitution is secular. The founding fathers of our Constitution have stipulated that our State will be a Central State and the basic features of the Constitution are federalism, Republican form of Government, secularism, Parliamentary form of Government and the authority of the Constitution.

Regarding secularism, it has been given to understand by the Supreme Court that the State shall have no religion of its own and all persons shall be equally entitled to freedom of conscience and the right to practise and propagate religion.

Secularism is so important to us that whenever any political party or any individual practices communalism or try to get votes by propagating a particular religion, we condemn him because we think that such way of getting votes through religious propaganda is a crime which should be prevented.

What is religion? Religion is a faith in extra terrestrial object and a belief in the omnipotent. Those who have such a belief think that beyond Him, there is nothing.

18.00 hrs.

There are various religions. But we must know that religion is born out of the society. At a particular moment, during the evolution of the society, a particular religion has come out just as the Bhagavad Gita was written when there was a confrontation between the Buddhists and the Hindus. So, to protect the Hindus from the Buddhists, the Bhagavad Gita was evolved. In this way, we must know that outside society there is no religion. Those who are firm believers in the evolutionary theory say that in the primitive ages there was no religion at all. Subsequently, when the State was formed on the basis of some greedy people, religion came into being in the society. Every religion is, therefore, the manifestation of the social needs of a particular point of time.Religion pertains to an individual. It does not pertain to a group. One may be born in a particular family belonging to a particular religion, but he may be converted to another religion. Shri Ramakrishna Paramahamsa, the famous Guru of Swami Vivekananda practised Islam for a year or so. He had also practised Christianity for a year or so. After practising all these religions, he said that Allah, God and Ishwar are all one. We should condemn those who try to create division in the society among the individuals in the name of religion. There should be no scope for them to go to the people in the name of God or in the name of something else so that they can get votes.

 

Sir, now it is six of the clock. I shall take at least ten more minutes. May I be permitted to speak?…(Interruptions)

MR. CHAIRMAN: For this Bill, only two hours are allotted. There are so many Members who want to speak.

SHRI SUDHIR GIRI (CONTAI): It is six of the clock now. Private Members Bill will continue up to six of the clock only.

THE MINISTER OF LAW, JUSTICE AND COMPANY AFFAIRS AND MINISTER OF SURFACE

TRANSPORT (DR. M. THAMBI DURAI): He wants to know whether you extend the time of the House after six of the clock. You can take the sense of the House.

MR. CHAIRMAN: We started the discussion on this subject from 4.50 p.m. Two and a half hours are there for Private Members’ Business. So, it should go up to 7.20 p.m.

SHRI N.K. PREMCHANDRAN (QUILON): Earlier, it was decided to take up the matter of Maruti Udyog Limited at six p.m…(Interruptions)

SHRI SAMIK LAHIRI (DIAMOND HARBOUR): Earlier an assurance was given by the Chair that at six of the clock the issue relating to Maruti Udyog Limited would be taken up under Rule 193.

  सभापति महोदय: इसके लिए दो घंटे का समय दिया गया है, अभी छ: बजे हैं, यदि सभी माननीय सदस्य चाहते हैं तो इसे थोड़ा और बढ़ा दिया जाए। चूंकि इस विधेयक पर चर्चा थोड़ी देर से शुरू हुई थी, यह प्राइवेट मैम्बर विधेयक है, उसके लिए दो घंटे दिये हैं। यह ४.५० पर शुरू हुआ है, उसके पहले बजट डिस्कशन था और अभी दो घंटे इसको पूरे नहीं हुए हैं।

… (Interruptions)

SHRI AMAR ROY PRADHAN (COOCHBEHAR): Earlier, it was decided by the Chair that we will continue this Bill later on and at 6 o’clock, we will take up Discussion under rule 193… (Interruptions)

SHRI SAMIK LAHIRI: Sir, with the consent of the House, the Chair, at that time, announced that Discussion under Rule 193 would be taken up at 6 o’clock… (Interruptions)

SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, I am on a point of order… (Interruptions)…The ruling was given by the Chair that Discussion under Rule 193 would be taken up at 6 o’clock. So, we should start that discussion now… (Interruptions)

KUMARI MAMATA BANERJEE : It should be taken up after the Private Members’ Business is over… (Interruptions)

SHRI BASU DEB ACHARIA : That was the decision of the Chair… (Interruptions)

PROF. A.K. PREMAJAM (BADAGARA): The rights of the Members will be violated if chance is not given for raising Discussion under Rule 193 now… (Interruptions)

  सभापति महोदय : आचार्य जी, यदि गैर सरकारी विधेयक साढ़े तीन पर शुरू होता तो छ: बजे यह पूरा हो जाता। यदि छ: बजे प्राइवेट मैम्बर बिजनेस पूरा हो जाता तब तो ठीक था लेकिन यह ४.५० पर शुरू हुआ है। अत: माननीय सदस्यों के अधिकारों का हनन तो ठीक नहीं है। अगर कहें तो इसके बाद १९३ ले लेंगे।

  श्री आदित्यनाथ (गोरखपुर) : सभापति महोदय, अभी दो घंटे का समय पूरा नहीं हुआ है इसलिए इसको चलने दिया जाए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

MR. CHAIRMAN: Hon. Members, please sit down. Hon. Minister is on his legs. He wants to say something. Please allow him to speak.

  सभापति महोदय : आप एक-एक करके बोलिये, अगर सब एक साथ बोलेंगे तो कैसे चलेगा।

 

… (व्यवधान) उद्योग मंत्री (श्री सिकन्दर बख्त): सभापति महोदय, मैं जब से यहां बैठा हूं मैंने तीन हजरात को इस कुर्सी पर तशरीफ रखते देखा। आज की लिस्ट ऑफ बिजनेस के अनुसार यह इश्यू तीन बजे लिया जाना था या बजट रिप्लाई के इमीडिएट बाद में लिया जाना था। उस वकत चेयर की विसडम के अनुसार यह फैसला हुआ था या यह तय हुआ था कि जब फाइनेंस मनिस्टर अपना बयान खत्म कर लेंगे तो यह लिया जायेगा, वह बदल गया। उसके बाद दूसरे सभापति महोदय, ने तय किया कि यह छ: बजे लिया जायेगा। इस वकत आप तीसरी बात कर रहे हैं। आखिर बात कया है, कुछ पता तो चले, मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है, कुछ ठिकाने की बात तो पता चले।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  श्री चन्द्रशेखर साहू (महासुमन्द): माननीय सभापति महोदय, जब प्राइवेट मैम्बर बिजनेस का समय दो घंटे अलॉटेड है और यह पूरी तरह से वैधानिक तौर पर सही है, कयोंकि यह ४.५० पर शुरू हुआ है तो इस पर बहस पूरी होने दीजिए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

SHRI SAMIK LAHIRI : Sir, this Bill may be continued in the next Session. There is no problem about it. But Discussion under Rule 193 should be taken up now.

  सभापति महोदय : जो समय प्राइवेट मैम्बर के लिए अलॉटेड था, उस समय को पूरा होने के बाद अगर हम नियम १९३ पर डिस्कशन शुरू करें तो अच्छा रहेगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  बीच में कैसे होगा? अगर हम १९३ को अब शुरू करेंगे तो प्राइवेट मैम्बर बिजनेस को फिर से कैसे लेंगे, यह कैसे संभव है?

SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, this Bill relating to the Private Members can be continued in the next Session also… (Interruptions)… But it was the ruling given by the Chair that the Discussion under Rule 193 would be taken up at 6 o’clock.

  सभापति महोदय : अगर यह साढ़े तीन बजे शुरू होता तो छ: बजे प्राइवेट मैम्बर बिजनेस समाप्त हो चुका होता, लेकिन यह साढ़े तीन बजे शुरू नहीं हुआ इसलिए इसके समाप्त होने के बाद लिया जायेगा।

 

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

SHRI K. KARUNAKARAN (THIRUVANANTHAPURAM): I was present here. The hon. Minister was also present. Then the Chair decided after taking the views of the House – and the House unanimously agreed – that it would be taken up at 6 o’clock. Now it is 6 o’clock. If two and a half hours time were to be given to the Private Members’ Business, it should have been taken up at 3.30 p.m. So, let the Chair decide about the proceedings of the House.

  श्री आदित्यनाथ : सभापति महोदय, यदि गैर सरकारी सदस्यों का कार्य ठीक ३.३० बजे शुरू होता, तो नियम १९३ के अधीन चर्चा ठीक ६.०० बजे प्रारंभ हो सकती थी, किन्तु हमारे विपक्षी एवं कम्युनिस्ट सदस्यों ने ऐसा नहीं होने दिया और गैर सरकारी कार्य ४.५० बजे शुरू हुआ है तथा इसके लिए न्यूनतम दो घंटे निर्धारित किए गए हैं इसलिए नियम १९३ के अधीन सूचना पर ६.५० बजे विचार किया जा सकता है। उससे पहले नहीं। … (व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Why are you complicating this matter?

… (Interruptions)

  सभापति महोदय : कृपया आप बैठिए। चूंकि अशासकीय कार्य ३.३० बजे शुरू नहीं हुआ इसलिए १९३ के अधीन सूचना पर ६.०० बजे विचार नहीं किया जा सकता। पहले जो दो घंटे अशासकीय कार्य के लिए नियत हैं, उनको पूरा होने दीजिए। उसके बाद नियम १९३ के अधीन सूचना पर विचार किया जाएगा।

MR. CHAIRMAN: I am taking the sense of the House again. If the House agrees then we can take up the next business.

SEVERAL HON. MEMBERS: The House has not agreed.

MR. CHAIRMAN: The House is divided now.

… (Interruptions)

SHRI S. JAIPAL REDDY (MAHBUBNAGAR): I am on a point of order. Thank you for the opportunity.

SHRI K. BAPIRAJU (NARSAPUR): Why should you thank the Chair so many times!

PROF. A.K. PREMAJAM : That is the courtesy.

SHRI S. JAIPAL REDDY : Sense of the House on any given issue can be taken; but only once. Before you took over as Chairperson, your predecessor who was in the Chair took sense of the House and gave a decision that irrespective of the state of the debate on the Private Members’ Bill this issue would be taken up at 6 o’clock. It is not legally correct to take sense of the House a second time on the same issue in the course of the same day.

MR. CHAIRMAN: I am taking sense of the House to know what would be the fate of the Private Members’ Bill. So, I have to take sense of the House.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: The House is divided. Please sit down.

SHRI BASU DEB ACHARIA : We were allotted time but we are not allowed to speak. (Interruptions)

MR. CHARIMAN : Please take your seats.

SHRI BASU DEB ACHARIA : This was the decision taken by the Chair.

… (Interruptions)

SHRI N.K. PREMACHANDRAN : They are trying to stall this discussion because they want to hide the facts.

MR. CHAIRMAN: The hon. Minister is ready.

SHRI RUPCHAND PAL (HOOGHLY): This is a serious matter. (Interruptions)

SHRI SAMIK LAHIRI : This is not correct.

SHRI ANIL BASU : You are creating a very bad precedent. (Interruptions)

  श्री चन्द्रशेखर साहू : सभापति महोदय, इस पर हाउस एग्री नहीं करता है। … (व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: This is not proper.

18.16 hrs

(At this stage, Shri Basu Deb Acharia, Shri S. Jaipal Reddy and some other

hon. Members left the House.)

SHRI A.C. JOS (MUKUNDAPURAM): Sir, there is a ruling from the Chair. (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: You will be given time after completing the Private Members’ Business.

SHRI BHUBANESWAR KALITA (GUWAHATI): The ruling is on record.

SHRI A.C. JOS (MUKUNDAPURAM): Please look into the record. (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Let us hear Shri Karunakaran.

SHRI K. KARUNAKARAN : Sir, at present, you are the Chairman. We will treat a ruling given by the Chair as a ruling given by the hon. Speaker. Your predecessor gave a ruling that the discussion will take place at six o’clock. (Interruptions)

  श्री मदन लाल खुराना : सभापति महोदय, यह हम आपके ऊपर छोड़ते हैं जो आप डिसाइड करेंगे हमें वह मंजूर होगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

v श्री नरेन्द्र बुडानिया (चुरू) : सभापति महोदय, यह सरकार नियम १९३ में चर्चा कराने से डर रही है और महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कराने से बचना चाहती है। यह ठीक नहीं है। यह लोकतंत्र विरोधी कार्य है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  संसदीय कार्य मंत्री तथा पर्यटन मंत्री (श्री मदन लाल खुराना): देखिए, जैसा आप डिसकस करना चाहते हैं, हमारे माननीय मंत्री जी तब से बैठे हैं। वे भी अपनी कुछ बात कहना चाहते हैं

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति जी, मैंने कल भी कहा था कि तीन दिन से लगातार एक पक्ष आ रहा है और मंत्री जी जो कहना चाहते हैं, वह पक्ष भी आना चाहिए। इसके लिए मैंने मंत्री जी से रिकवैस्ट की थी और वह तैयार हो गये। लेकिन एक स्िथति पैदा हो गयी है और मेरी आपसे रिकवैस्ट है कि हमारे लोग प्राइवेट मैम्बर्स बिजनेस पर बोलना चाहते हैं इसलिए आप इस पर आधा घंटा और डिसकशन कर लीजिए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)=ºÉEòä ¤ÉÉnù ½þ¨É =ºÉä ±Éä ±ÉäÆMÉä*

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

SHRI BHUBANESWAR KALITA : There was a ruling from the Chair that it would be taken up at six o’clock. … (Interruptions) Why are you changing it all the time? … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : We are not changing the ruling. We are not departing from that. I am only saying that they may be given another half an hour to speak on the Private Members’ Bill. Then, we will take up discussion under Rule 193.

… (Interruptions)

SHRI A.C. JOS : Sir, I raised a point of order. At that time the Chairman gave a ruling that it would be taken up at six o’clock. … (Interruptions) You see the record. The Chair ruled that it would be taken up at six o’clock. That is why we are here. Now, it is past six o’clock. So, it should be taken up. Now, what is the difficulty in taking up this? … (Interruptions)

THE MINISTER OF LAW, JUSTICE AND COMPANY AFFAIRS AND MINISTER OF SURFACE TRANSPORT (DR. M. THAMBI DURAI): The hon. Members have every right to take a decision. We have no objection to that. But the Private Members’ Business has got its own sanctity. The system is that two and a half hours are allotted for discussing the Private Members’ Business. If we change that it will set a bad precedent. The Private Members may lose their rights.

Shri Basu Deb Acharia wanted that discussion under Rule 193 should be taken up at six o’clock. The Chair ruled that it will be taken up at six o’clock. … (Interruptions) You want to take up discussion under Rule 193. Do you want other hon. Members to give up their right to speak in Private Members Business? If we set a bad precedent, a time may come when every Friday the Members will lose their rights. This is my humble suggestion. … (Interruptions) It is left to them. … (Interruptions)

SHRI A.C. JOS : Sir, a week before last the same thing happened. We shifted the Private Members’ Business from Friday to Tuesday. … (Interruptions)

DR. M. THAMBI DURAI: That is what I am saying. Do not create that kind of a precedent. Then, we will lose that right. श्री मदन लाल खुराना: आप आधा घंटा इस पर और डिसकशन करा लीजिए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) आप हमारा यह कहना मान लीजिए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

DR. M. THAMBI DURAI: It is a rare opportunity given to Private Members. The Private Members should not lose that right. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: We are not departing from tradition. We will complete the Private Members’ Business within half an hour.

… (Interruptions)

SHRI P.C. CHACKO (IDUKKI): The Government is not willing for a discussion. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: The Government is willing for a discussion under Rule 193.

… (Interruptions)

SHRI P.C. CHACKO (IDUKKI): This was very much on the Agenda. The Government is evading the discussion … (Interruptions) I do not want to be interrupted. We want to say something to the Chair. Hon. Minister, please understand that. Hon. Minister is trying to evade the discussion. Unfortunately, we are at the receiving end. We are not getting the protection of the Chair.

So, a notice was given to raise a discussion under Rule 193. It was also listed to be taken up at 3 p.m. We gave a concession and said that let the hon. Minister complete his speech. We expected that the Government will also show the same generosity. Now they want to avoid the discussion.

… (Interruptions)

THE MINISTER OF INDUSTRY (SHRI SIKANDER BAKHT): Who is avoiding a discussion? I am sorry, we are not doing that. … (Interruptions)

SHRI P.C. CHACKO : We are also fighting for the privileges of the Private Members. We are not for interrupting their business. … (Interruptions) It is unfortunate that the Parliamentary Affairs Minister is doing like this. They wanted the discussion on the General Budget to be over; we supported them. Now that it is over, they think that their problem is also over and they are not willing to listen to us. … (Interruptions) श्री मदन लाल खुराना: १५ मिनट से आप बहस कर रहे हैं।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) अगर आप प्राइवेट मैम्बर बिजनेस पर डिसकशन शुरू कर लेते तो वह अब तक खत्म हो जाती।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

SHRI A.C. JOS : We wasted more than an hour in arguing this aspect . … (Interruptions)

SHRI P.C. CHACKO (IDUKKI): Why are you hesitant to have a discussion? … (Interruptions)

SHRI K. KARUNAKARAN: Initially, to take up this discussion, the time was fixed at 3 o’clock by the Chair. Unfortunately, to accommodate the Government business, we have agreed to postpone it. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN It is Private Members’ Business.

… (Interruptions)

SHRI K. KARUNAKARAN: The hon. Minister concerned also agreed to it and said that we would take it up at 6 o’clock. Now if we are not allowed to discuss this vital issue, it is unfortunate. This issue is not a small issue. This will put the Government at a spot with evidence. So, they are afraid. They are very much worried about it. … (Interruptions) So, they do not want to do it. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: No. They are also willing to take it up. They are asking you to wait for half-an-hour.

… (Interruptions)

SHRI K. KARUNAKARAN : The Government is selling the nation’s property to private party for nothing. We do not wish to associate with it. We would walk out.

18.28 hrs

(At this stage, Shri K. Karunakaran and some other

hon. Members left the House.) श्री मदन लाल खुराना: सभापति जी, मुझे जवाब देने दीजिए।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) सभापति जी, मैं रिकार्ड में लाना चाहता हूं। अभी करूणाकरन जी ने जो कहा, उसके बारे में मैं यह कहना चाहता हूं कि अगर आप एलाव करें तो मनिस्टर साहब बतायेंगे कि किस तरह से मारूति में भ्रष्टाचार हुआ है और कैसे-कैसे हुआ, १० परसेंट शेयर कैसे ट्रांसफर हुए और किस तरह से सुजूकी को मालिकाना हक दिया गया, सब नियमों को ताक पर रखकर जिस तरह से १० परसेंट शेयर इन्होंने सुजूकी के पक्ष में किये, वे सब चीजें आपके सामने आयेंगी। इसलिए मैं आपके माध्यम से सदस्यों से कहना चाहता हूं कि मंत्री जी तो सुबह से तैयार बैठे हुए हैं। मैंने यह कहा था कि आप प्राइवेट मैम्बर बिजनेस पर केवल आधा घंटा और बहस करा लीजिए। अगर वह मेरा कहना मान गये होते तो अब तक बहस शुरू हो सकती थी।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)<ºÉEòÉ ¨ÉiÉ±É¤É ªÉ½þ ½þè ÊEò ´É½þ ¤É½þºÉ SÉɽþiÉä ½þÒ xɽþÒÆ ½þèÆ* ´Éä Eòä´É±É ¤ÉnùxÉÉ¨É Eò®úxÉÉ SÉɽþiÉä ½þèÆ* ´Éä iÉlªÉMÉiÉ nùںɮúÉ {ÉIÉ ÊxÉEòɱÉxÉÉ SÉɽþiÉä ½þèÆ* ¨ÉèÆxÉä Eò±É JÉÖnù ¨ÉÉxÉÉ EªÉÉäÆÊEò Ê{ÉUô±Éä iÉÒxÉ ÊnùxÉ ºÉä BEò {ÉIÉ +É ®ú½þÉ lÉÉ VÉèºÉä <ºÉ¨ÉäÆ ¤É½þÖiÉ ¦ÉÉ®úÒ §É¹]õÉSÉÉ®ú ½þÉä MɪÉÉ, ºÉè±É+É=]õ ½þÉä MɪÉÉ*

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)nùںɮúÉ {ÉIÉ ±ÉÉäMÉÉäÆ Eòä ºÉɨÉxÉä xɽþÒÆ +É ®ú½þÉ lÉÉ <ºÉʱÉB ¨ÉèÆxÉä ¨ÉÆjÉÒ VÉÒ ºÉä |ÉÉlÉÇxÉÉ EòÒ ÊEò ´É½þ nùںɮúÉ {ÉIÉ ¦ÉÒ ºÉɨÉxÉä ®úJÉäÆ*

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)½þ¨É iÉÉä <Æ]õ®úʺ]õb÷ ½þèÆ ±ÉäÊEòxÉ |ÉÉ<´Éä]õ ¨É訤ɮú

बिजनेस का अपना महत्व है इसलिए आपने अपनी रूलिंग दी। मैंने अपने मैम्बर्स को समझाया हालांकि ये मान नहीं रहे थे लेकिन मैंने उनको मनाया कि आप इस पर आधे घंटे और बहस करा लीजिए। अगर वह उस बात को मान लेते तो बहस शुरू हो जाती कयोंकि साढ़े छ: हो गये हैं। इससे स्पष्ट है कि वह जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं। इनको यह लगता है कि अगर स्िथति साफ हो गयी, कुछ कहने के लिए रह नहीं जायेगा इसलिए आरोप लगा रहे हैं। यह इनकी राजनैतिक चाल है जिसके कारण इन्होंने वाक आउट किया है। मैंने यह बात इसलिए कही है कयोंकि अब यदि ये स्टेटमैंट देंगे तो कहा जाएगा कि औपोजीशन की ऐवसैंस में दी। इसलिए मुझे लगता है कि स्पीकर साहब से बात करके अगले सैशन में हम इसके लिए बिल्कुल तैयार है। जो उनका आरोप है कि हम बहस नहीं करना चाहते, आपने देखा कि मंत्री जी राज्य सभा के नेता हैं लेकिन सुबह से लोक सभा में इसलिए बैठे हुए हैं ताकि अपनी बात कह सकें।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ) कुमारी ममता बनर्जी (कलकत्ता दक्षिण) : लेकिन हम इनकी बात सुनना चाहते हैं। श्री मदन लाल खुराना: फिर यह आरोप आएगा कि उनको कुछ कहने का मौका नहीं दिया। इसलिए मैं यही रिकवैस्ट करूंगा, स्पीकर साहब ने पहले जो बात कही थी, इस ईशू को ऐलाइव रखा जाए और जब हाउस रीअसैम्बल हो, उस समय लाया जाए। हम इसके लिए तैयार हैं, हम डरते नहीं हैं कयोंकि हमारा दामन बिल्कुल साफ है। यह सरकार जवाबदेह है, यह सरकार पारदर्शक है, इसलिए कभी भी बहस कर सकती है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

MR. CHAIRMAN : Are we continuing with the Private Members’ Business?

THE MINISTER OF LAW, JUSTICE AND COMPANY AFFAIRS AND MINISTER OF SURFACE TRANSPORT (DR. M. THAMBI DURAI): Yes, up to 7.20 p.m. श्री मदन लाल खुराना: इस समय आप प्राईवेट मैम्बर्स बिजनस जारी रखिए और सदस्यों को इस ईशू को ऐलाइव रखकर पूरा समय दीजिए। जिस समय ३ जुलाई को हाउस फिर से रीअसैम्बल हो, उस समय इसे लिया जाए, हमें कोई ऐतराज नहीं है।

SHRI MADHUKAR SIRPOTDAR Sir, basically, the encroachment upon the Private Members’ Business was wrong. We should not have agreed to have this Discussion under Rule 193…. (Interruptions) That is the basic mistake we have committed. … (Interruptions) We should not have done it whatsoever may have been the reason. श्री मदन लाल खुराना: जो समय इसके लिए रखा गया था, वह तीन बजे का था। आशा थी कि ३.०० बजे फाईनैंस मनिस्टर बोलेंगे, तीन से साढ़े तीन तक का समय वे ले लेंगे और साढ़े तीन से छ: बजे पी.एम.बी. हो जाएगा। लेकिन सुबह से जिस तरह से मुलायम सिंह तथा और माननीय सदस्यों ने डेढ़ घंटा समय

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

MR. CHAIRMAN Now, we are continuing with the Private Members’ Business.

DR. M. THAMBI DURAI: Yes, up to 7.20 p.m.

MR. CHAIRMAN: Shri Sudhir Giri was on his legs. He is not present. Now, Shri Adityanath.

“> श्री आदित्यनाथ (गोरखपुर) : माननीय सभापति महोदय, माननीय सदस्य श्री मोहन सिंह द्वारा जो संविधान संशोधन विधेयक १९९८ के नए अनुच्छेद ५१ख का अंत:स्थापन का जो विधेयक यहां पर रखा गया है, में उसके समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। जिस प्रकार से इस विधेयक में प्रावधान है कि धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर या किसी भी प्रकार की भावनाओं को भड़काकर वोट मांगने वालों पर प्रतिबंध लगाया जाए, नश्िचत ही यह एक सराहनीय कदम है। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि यहां पर धर्म की जो व्याख्या हुई है और बराबर इस सदन के माध्यम से हो रही है, एक बहुत गलत संदेश आम जनता के बीच जा रहा है। हमारे ही एक सदस्य ने यहां पर धर्म की बहुत अच्छी व्याख्या की। मैं कहना चाहता हूं कि धर्म को एक परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता। अनेकता में एकता हमारे देश की विशेषता रही है। हमारे इस देश से यह मंत्र भी हुआ था –

  वेदा: वभिन्न स्म्ृातियो वभिन्न

  नासो मुनियरस्य: मतम् वभिन्नम्

  धर्मस्य तत्वम् नहतिम् गुहायाम्

  महाजन् एन गत् स: पन्था।

  लेकिन दुर्भाग्य है कि धर्म के उस तत्व को कभी हमने समझने की कोशिश नहीं की। ४२वें संविधान संशोधन के अंतर्गत भी सैकुलर का अर्थ हम बराबर धर्म ही लगाते रहे हैं और जिस धर्म ने पूरे समाज को नैतिकता के आधार पर, सदाचार के नाम पर, कर्तव्य के आधार पर समाज को नैतिकता का एक पाठ पढ़ाया है, उसे जोड़ने वाला जो नियम है, जब हम उस धर्म को ही समाज से अलग कर देंगे तो समाज की कया अवस्था होगी। नश्िचत ही मैं समझता हूं कि आज हम धर्म, जाति और अन्य भावनाओं को भड़काकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते हैं।

  यहां पर अल्पसंख्यकों की बात भी हुई थी। कया अल्पसंख्यक वही लोग हैं जहां हिन्दू बहुमत में हैं, वहां जो मुसलमान कम संख्या में हैं, कया कश्मीर का हिन्दू अल्पसंख्यक नहीं है? कया कश्मीर के उन अल्पसंख्यक हिन्दुओं के बारे में, जो आज तीन-साढ़े तीन लाख से अधिक की संख्या में शरणार्थी के रूप में जगह-जगह भटक रहे हैं, उनके बारे में सोचने की फुर्सत इस सदन में बैठे हुए माननीय सदस्यों को कभी आई है या पूवर्ोतर के राज्यों में जो कुछ हो रहा है, मिजोरम में रियांग जनजाति के ५१,००० से अधिक शरणार्िथयों को मिजोरम से निकाल दिया गया है, लेकिन कया कभी यहां बैठे हुए माननीय सदस्यों ने उस पर सोचने की कोशिश की। अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए केवल मुसलमानों को ही अल्पसंख्यक बना दिया गया है। पूवर्ोतर के राज्यों में जो अल्पसंख्यक हैं, उनके बारे में कयो नहीं चर्चा होती, कश्मीर में जो अल्पसंख्यक हैं, उनके बारे में यहां चर्चा कयों नहीं होती। यदि अल्पसंख्यकों की बात होनी है तो १९८४ मे इस देश में जो हुआ था, कया वे सिख अल्पसंख्यक इस देश में नहीं हैं? इस देश की जनता की भावनाओं के साथ हम तब खिलवाड़ नहीं करते जब सदन में इतनी उदंडता होती है।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)<ºÉ nùä¶É EòÒ VÉxÉiÉÉ EòÒ ¦ÉÉ´ÉxÉÉ+ÉäÆ Eòä ºÉÉlÉ EªÉÉ ½þ¨É iÉ¤É ÊJɱɴÉÉc÷ xɽþÒÆ Eò®úiÉä VÉ¤É ªÉ½þÉÆ EòÉä<Ç ºÉnùºªÉ ÊEòºÉÒ ºÉ¨ÉºªÉÉ EòÉä =`öÉxÉÉ SÉɽþiÉä ½þè ±ÉäÊEòxÉ =ºÉä ¤ÉÉä±ÉxÉä xɽþÒÆ ÊnùªÉÉ VÉÉiÉÉ, =ºÉ¨ÉäÆ ´ªÉ´ÉvÉÉxÉ =i{ÉxxÉ ÊEòªÉÉ VÉÉiÉÉ ½þè* EªÉÉ <ºÉ nùä¶É EòÒ Eò®úÉäc÷ÉäÆ VÉxÉiÉÉ EòÒ ¦ÉÉ´ÉxÉÉ+ÉäÆ Eòä ºÉÉlÉ ÊJɱɴÉÉc÷ xɽþÒÆ ½þÉäiÉÉ* ½þ¨ÉäÆ ÊxÉʶSÉiÉ ½þÒ <ºÉ ¤ÉÉ®úä ¨ÉäÆ ºÉÉäSÉxÉÉ {Éc÷äMÉÉ*

  (व्यवधान) …

  श्री आदित्यनाथ (गोरखपुर) : आज इस बात की आवश्यकता है कि जो कुछ हो रहा है, इस सदन के माध्यम से एक संदेश पूरे देश में जाना चाहिए था, करोड़ों की जनता के बीच जाना चाहिए था कि वास्तव में देश की संसद के माध्यम से जो कुछ भी पारित होकर जाएगा, वह उपयुकत होगा।

… (´ªÉ´ÉvÉÉxÉ)

  सभापति महोदय : कृपया अपने भाषण को संक्षिप्त कीजिए।

  श्री आदित्यनाथ (गोरखपुर) : सभापति महोदय, मुझे खुद देर हो रही है। मुझे जाना है, सात बजे मेरी गाड़ी है, मैं केवल इस पर बोलने के लिए खड़ा हुआ था।

  मैं कहना चाहता हूं कि नश्िचत ही इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए, होना चाहिए और यह प्रावधान बहुत पहले से है। धर्म कया है? यदि हम अपने देश की जनता के स्वाभिमान को जगाने का कार्य करते हैं तो हमें साम्प्रदायिक कह दिया जाता है, धार्िमक भावनाओं को भड़काने वाला कह दिया जाता है। लेकिन जिन लोगों का घोषणा पत्र ही केवल जातीयता के नाम पर होता है, जो लोग जातीय भावनाओं को भड़काते हैं, कया वे गलत नहीं करते, कया उन पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए? हम कहते हैं होना चाहिए, जो लोग भावनाएं भड़काने का कार्य करते हैं, उन राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगना चाहिए। लेकिन इसे लागू कौन करेगा? इस बारे में कौन सोचेगा? यहां देखा जाता है, वभिन्न राजनीतिक दलों के लोग जामा मस्िजद में फतवा जारी करवाने के लिए जाते हैं। कया वह गलत नहीं है, कया वह धर्म के आधार पर नहीं आ जाता? इस देश में

______________________________________________________________________

*Expunged as ordered by the chair.

  महिलाओं को समान अधिकार देने की बात है, शाह बानो वाले केस में संविधान कहां चला गया था। संविधान के ४४वें अनुच्छेद में इस बात की व्यवस्था भी है कि इस देश के हर नागरिक के लिए समान कानून बनना चाहिए, समान संहिता होनी चाहिए। आज इस देश में समान संहिता नहीं है। हम बात तो करते हैं लेकिन एक तरफ बात करते हैं। हमने कभी देश और समाज को सामने रखकर वास्तव में धर्म के उस तत्व को समझने की कोशिश नहीं की। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि इस पर विचार करते हुए नश्िचत ही इसका समावेश होना चाहिए लेकिन ईमानदारी से उस पर अमल भी होना चाहिए। इस देश में आज आजादी के पचास वषर्ों बाद भी धर्मांन्ध हो रहा है। इस देश का बटवारा किस आधार पर हुआ था, हम इस बात को भूल गए। केवल राजनीति की रोटियां सेकने के लिए हम कह देते हैं कि इस देश में अल्पसंख्यकों की रक्षा होनी चाहिए। लेकिन उन अल्पसंख्यकों की रक्षा की बात हमने नहीं की जो कश्मीर में हैं, पूवर्ोत्तर के शेष भारत में हैं या देश के किसी अन्य भाग में हैं। इस देश ने हमेशा “सर्वे भवन्तु सुखिन:” का संदेश दिया है। इस देश ने ही “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश पूरे विश्व को दिया है और यह संदेश हमारी संसद के माध्यम से, इस संसद में बैठने वाले हर सदस्य के माध्यम से गूंजना चाहिए लेकिन उसके लिए हमें सबसे पहले अपने अन्त:करण में झांकना होगा।

  हमें अपने आपमें सुधार करना होगा और राजनीति के ऊपर उठाकर कार्य करना होगा। नश्िचत ही जब हम इसको केवल दूसरों पर लागू करने के लिए नहीं, पहले अपने आप पर लागू करने की बात सोचेंगे, तभी हम कामयाब हो पाएंगे, तभी हमें इसमें सफलता मिलेगी, नहीं तो कानून बनते रहेंगे, लेकिन वे कानून केवल गरीब के लिए, केवल निरीह के लिए, किसी कमजोर तक ह सीमित रह जायेंगे, उन लोगों के लिए नहीं रह पायेंगे, जो लोग सड़कों से लेकर संसद तक इस संविधान के साथ खिलवाड़ करते हैं।

  आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देते हुए इस पर पूर्ण बहस कराने के लिए हर सदस्य की राय ली जानी चाहिए, एक व्यापक बहस इसपर हो, इस संशोधन के साथ इसमें धर्म के मूल तत्व पर सही विचार होना चाहिए, मैं इस बिल के समर्थन में अपनी वाणी को विराम देता हूं।

“> श्री प्रभुदयाल कठेरिया (फिरोजाबाद) : माननीय सभापति महोदय, माननीय मोहन सिंह जी जो प्राइवेट मैम्बर्स बिल लेकर आये हैं, उनको मैं धन्यवाद देता हूं।

  एक माननीय सदस्य : और खुद ही नदारद हो गये।

  श्री प्रभुदयाल कठेरिया विडम्बना इस बात की है कि उनको यहां रहना चाहिए था। उनके पक्ष में माननीय सदन की कया भावनाएं हैं, सदन के सदस्य कया कहना चाहते हैं, वह मेरे मित्र ने कह दिया।

  कोई बात नहीं, अपनी भावनाओं को मैं अवश्य व्यकत करूंगा। माननीय सदस्य ने अपनी बात रखी है। कुछ माननीय सदस्यों ने धर्म और राजनीति को अलग करने के लिए तो देखा है, लेकिन उन्होंने धर्म की परिभाषा को नहीं देखा। धर्म इस देश का प्राण है, इस समाज का प्राण है। जो व्यकित धर्म से अलग हो जाता है, मैं समझता हूं कि उसके पास कोई पूंजी नहीं रहती। मैंने इस बात का अनुभव किया है और यही मैं उनसे पूछना चाहता हूं। उनका समर्थन मैंने सिर्फ इस बात के लिए किया है कि इस देश की परम्परा पर वे बोले तो जरूर, पर जिस प्रकार से उन्होंने कहा है कि धर्म को राजनीति से अलग किया जाये, वह मेरी राय में ठीक नहीं है। आप धर्म की परिभाषा को देखिये कि धर्म कया चीज है। इस देश के अन्दर धर्म परम्परा से प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है, जब से राजनीति प्रारम्भ हुई है, उससे पहले से भी धर्म जुड़ा हुआ रहा है, अंग रहा है, प्राण रहा है। धर्म इस देश की ढाल है, धर्म हमारे समाज की ढाल है। मैं इस माननीय सदन के सदस्यों से पूछना चाहता हूं कि ज्यूडशियरी में जब कोर्ट की बात आती है तो सबसे बड़ा मजिस्ट्रेट भी गीता पर हाथ रखवाकर कसम लेता है कि जो कुछ भी मैं बोलूंगा, वह सत्य बोलूंगा, असत्य नहीं बोलूंगा। यह धर्म कहां बोलेंगे। संसद के जितने भी गलियारे हैं, जितने भी कर्व बने हुए हैं, जितने गेट बने हुए हैं, उन सब पर लिखा हुआ है, धर्म की परिभाषा लिखी हुई है: “जहां सुमति तहं सम्पत्ित नाना, जहां कुमति तहं विपति निदाना” अनेकों इस तरीके की इस तरीके की बातें लिखी हुई हैं। जिस चेयर पर आप बैठे हुए हैं, उसके ऊपर भी वही दोहे लिखे हुए हैं। संसद के इस पूरे प्रांगण में जहां से राजनीति प्रारम्भ हो रही है, हम सब तरीके की व्यवस्था करते हैं, कांस्टीटयूशन के प्रावधान करते हैं, राजनीति के कानून बनाते हैं, यहां भी धर्म की परिभाषा लिखी हुई है। धर्म हमसे अलग कैसे हो सकता है? मैं बड़ी रैस्पोंसबलिटी के साथ कह रहा हूं कि जिस व्यकित को अपने धर्म के प्रति बोध नहीं है, अपने कर्म के प्रति बोध नहीं है, वह आदमी कब, कहां, किस प्रकार से गलती कर सकता है, यह नहीं कहा जा सकता। मैं बड़ी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं, वह व्यकित अपने सिद्धान्त का पालन नहीं कर सकता, जिस व्यकित को धर्म का ज्ञान नहीं है। जिस व्यकित को धर्म का ज्ञान है, वह अपने समाज के प्रति, अपने परिवार के प्रति, अपने देश के प्रति, अपने राष्ट्र और समाज के प्रति रैस्पोंसबलिटी के साथ हर बात को कहेगा। धर्म की जो व्याख्या की गई है, इससे मैं काफी कुंठित हूं। इसकी व्याख्या इस सदन में माननीय सदस्य कर रहे थे कि जम्मू-कश्मीर को उठाकर देख लीजिए, उत्तर पूर्व में जो राज्य हैं, उनको उठाकर देख लीजिए, जहां हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, उसके साथ वहां कया व्यवहार होता है। हमारे देश के अन्दर ९० करोड़ की आबादी है और शीघ्र यह आबादी एक अरब की होने जा रही है। दुनिया के दूसरे बड़े देशों में जिन अल्पसंख्यकों की बात हम करते हैं, हम लोग मेहमान की तरह उनका पालन करते हैं, हर चीज की उनके लिए व्यवस्था करते हैं। आप दुनिया के दूसरे देशों को उठाकर देख लीजिए, वहां अल्पसंख्यकों की पोजीशन कया है और हिन्दुस्तान के अन्दर पोजीशन कया है?

  मोहन सिंह जी जो बिल लाये हैं, मैं राजनैकित पार्िटयों से बड़ी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि अगर आपको कुछ संशोधन करना है, मैं रूलिंग पार्टी का सदस्य हूं, अगर गवर्नमेंट कोई ऐसा बिल ले आये, जिसके ऊपर व्यापक चर्चा हो और तब अगर संशोधन कराना है तो संशोधन करवाना चाहिए। जिस देश के अन्दर राजनैतिक पार्िटयों में तमाम भ्रष्टाचारी करप्शन कर रहे हैं, जिन पर २०-२० मुकदमे चल रहे हैं, उन्हें पार्िटयां टिकट दे रही हैं और वे जीतकर लोक सभा के अन्दर आ रहे हैं, उनसे आप समाज के प्रति कया अपेक्षा करेंगे?

  उनके प्रति कया अपेक्षा करेंगे राज के प्रति, वे कया समाज को देंगे और कया राज को देंगे। ऐसे लोगों के लिए कानून में संशोधन की जरूरत है। कोई राजनैतिक दल ऐसे किसी व्यकित को टिकट देता है तो उस पार्टी के संविधान को, उसकी मान्यता को रद्द कर देना चाहिए। एक-एक सासंद दस-दस, बीस-बीस लाख लोगों का प्रतनधित्व करता है। लाखों-करोड़ लोग हमारी और देखते हैं। चाहे इस दल के लोग हों या उस दल के हों, अगर उनमें से कोई धार्िमक भावना भड़काकर, जातीय आधार पर विजयी होने का प्रयास करता है तो उसे नश्िचतरूप से सजा मिलनी चाहिए। अगर इस चीज पर आगे चलकर व्यापक चर्चा नहीं हुई तो यह देश जातीय आधार पर बंट जाएगा। आज जातीयता का जहर बहुत अधिक फैल रहा है, इसको खत्म किया जाना चाहिए, नहीं तो यह देश अलग-अलग कम्युनिटी में बंट जाएगा। अभी माननीय सदस्या बोल रही थीं। मैं उन्हीं की बात को हिन्दी में कहना चाहता हूं, कयोंकि वह अंग्रेजी में बोल रही थीं। उन्होंने कहा कि छुआछूत को खत्म करने का प्रयास होना चाहिए और इसके लिए संविधान में संशोधन लाना चाहिए।

  देश की जनता की आशाएं संसद के प्रति लगी हुई हैं, लेकिन उनको न्याय नहीं मिल पाता। मैजोरिटी के आधार पर सरकार चलती है, लेकिन देखने की बात है कि नार्थ ब्लाक और साउथ ब्लाक में कितने ही गरीबों की आहें दबी हुई हैं। गरीबों को आज भी न्याय नहीं मिल रहा है, अगर उनको न्याय नहीं मिलेगा तो यह देश जातीयता के आधार पर बंट जाएगा। जातीयता का जहर धार्िमक भावनाओं को भड़काने से भी ज्यादा खतरनाक है। मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश में जातीयता के आधार पर कुछ लोग रोटियां सेंक रहे हैं।

  धर्म हमारा प्राण है, हमारे देश की ढाल है। हमें धार्िमकता को कैसे बनाए रखना है, यह हमारी सबकी जिम्मेदारी है। मैं मोहन सिंह जी द्वारा लाए इस बिल का समर्थन करता हूं, लेकिन मैं उनसे भी निवेदन करना चाहता हूं कि आज जातीयता ज्यादा आक़ामक है, पहले हमें उसको देखना चाहिए। मैं इस सदन में तीसरी बार जीतकर आया हूं। दसवीं लोक सभा से देखता आ रहा हूं कि जो वास्तविक कमजोर व्यकित है, उसको ठीक से न्याय नहीं मिलता। इसलिए मैं अनुरोध करना चाहता हूं कि सरकार इस सम्बन्ध में एक व्यापक बिल लाए, जिसमें पूरे सदन की भावना को ध्यान में रखते हुए उसमें धर्म और संविधान को न जोड़कर सही व्यवस्था हो। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

“>SHRI A.F. GOLAM OSMANI (BARPETA): Hon. Chairman, Sir, it is unfortunate that we had to resume the discussion on this Bill after an unhappy episode. I feel that the problem arose because of the observations, I do not say rulings, made by the Chair from time to time. But essentially, in the present scheme of things, the Private Members’ rights as reserved for a day should never be trampled upon. If there are emergent circumstances to discuss some issue, arrangements should be made accordingly. To suspend the discussion on Private Members’ Bills without taking the consent of the House in specific should not be done through hasty pronouncements. Hon. Chairman, Sir, you should not set a precedent for the future. Once it is done, people go on saying that it was done on such and such occasion.

SHRI A.F. GOLAM OSMANI (BARPETA): Hon. Chairman, Sir, it is unfortunate that we had to resume the discussion on this Bill after an unhappy episode. I feel that the problem arose because of the observations, I do not say rulings, made by the Chair from time to time. But essentially, in the present scheme of things, the Private Members’ rights as reserved for a day should never be trampled upon. If there are emergent circumstances to discuss some issue, arrangements should be made accordingly. To suspend the discussion on Private Members’ Bills without taking the consent of the House in specific should not be done through hasty pronouncements. Hon. Chairman, Sir, you should not set a precedent for the future. Once it is done, people go on saying that it was done on such and such occasion.

Mr. Chairman, Sir, a very important issue has been raised today, namely, a proposal to amend the Constitution with specific reference to some terms used in it. Terms like secularism, democracy and republicanism have been discussed. But the Constitution that was adopted in its simple form could cover all the things that are being said in the House today.

Yet, the content of our approach has been democracy. No amount of change in the Statute or in the Constitution will change our determination. You can define what is secularism or you can define what is religion. But are you in a position to enforce it in our society so that it can be reflected in our political activities? Contrast between the content and the form has become express in many amendments in our Constitution. Now, a crisis has come in our country whether this form of parliamentary democracy, Cabinet system, and the parliamentary system can be run at all. How are we going to define religion? Now, so many speakers, including Kumari Mamta Banerjee have observed that there is no conflict in the religion. An hon. Member quoted the Saint Ramakrishna Paramahamsa Dev – Joto moth toto poth. This is true. It is a philosophical understanding of the religion. Every religion speaks of peace. We practice Islam, the very name of which means peace. Contradictions come in while practising the religion in social contracts. How are you going to do it or how are you going to confront it? It is the factual reflection of people practising a religion which comes into contradictions with other religions. It is said that in India when the religionists fight – I cannot say, religions fight – the law of nuisance should be applied strictly because sometimes in the pretext of religion, we practice such things which automatically hurt others.

We, in India, have been seeing for nearly hundred years that a right to hold procession in front of the mosque by beating the drums or sacrificing a cow disturbing the sanctity of a religious place by hurting the sentiments of other citizens became a lively issue in our day to day politics. But if law of nuisance had been applied, as understood by the jurists, nobody would have had the right to hurt another by doing a thing which hurts the society. Therefore, I would like to request the mover of this Bill to expand the scope of the amendment. There should be a fundamental amendment. We feel that this piecemeal amendment would add more amendments to the Constitution but the basic nature of the thing would not change.

At this moment, we are faced with a grave situation where the democracy expressed through our Constitution, based on parties can run the Executive Government of our land. I would like to request the mover of the Bill to reexamine the amendment as to whether we are in a position to run the Executive Government as things have developed.

They say that the age of coalition has come. But nobody has said it that surely the coalition will give continuity. I would like to remind the House of an observation made by Shri Vasant Sathe nearly two decades ago when he asked whether a time has come to bring a change in the constitutional structure of the Government.

Recently some pronouncements were made as to whether Presidential form of Government has become essential to run the Executive Government of our country. I, in a casual way, though, observed these things that it should also be discussed at greater length that in which form the constitutional Government of this country can be run.

Some observations were made by my friends in the Treasury Benches that religion cannot be divorced from the essence of the Statecraft. Nobody quarrels on this point that religion, as we understand it, and morality has no conflict with institutions which are run purely on moral basis. So my request to the mover of this Bill is to examine that aspect also.

MR. CHAIRMAN:

I If you want to speak on this subject, you can speak later.

  इसके लिए दो घंटे का समय निर्धारित किया गया था और वह समय पूरा होने जा रहा है। यदि सदन चाहता है कि इस पर एक घंटा और बढ़ा दिया जाए तो जो ७ बज कर २० मिनट तक का समय आज के लिए निर्धारित है वह आज दिया जाएगा और शेष इसके लिए जो अगला दिन निर्धारित होगा उस समय दिया जाएगा। हम जो निर्धारित समय है तब तक आज बैठेंगे। कया सदन इससे सहमत है?

  श्री सत्य पाल जैन (चंडीगढ़): आप समय बढ़ा दीजिए।

  सभापति महोदय : ठीक है।

SHRI A.F. GOLAM OSMANI (BARPETA): Sir, I conclude my speech with thanks and with an appeal to the House to think about the Bill in a wider context.

“> श्री चन्द्रशेखर साहू (महासुमन्द): सभापति महोदय, आज हमारे सदन के बहुत विद्वान सदस्य मोहन सिंह जी के गैर-सरकारी संविधान (संशोधन) विधेयक, संख्या ३२ पर चर्चा हो रही है। मैं इस विधेयक की चर्चा के दौरान जिन मुद्दों और बिन्दुओं की ओर आपका और माननीय प्रस्थापक सदस्य का ध्यान आकर्िषत करना चाहता हूं वह वास्तव में संसदीय लोकतंत्र के लिए, और जिस संविधान के तहत हम काम कर रहे हैं, उसके लिए महत्वपूर्ण हैं।

  सभापति महोदय, इस सदन में पवित्र आसंदी के ऊपर एक शब्द अंकित है-

  “धर्मचक़ प्रवर्तनाय:।” मैं जिस दिन जनता द्वारा चुन कर इस पवित्र माननीय सदन में आया था तो सबसे पहले मुझे इसी शब्द ने प्रेरित किया था। माननीय सदस्य को याद होगा कि इसी भारत में कुछ दिन पहले धर्म और राजनीति पर एक बहस छिड़ी थी, उस समय की सरकार ने, श्री नरसिंह राव के मंत्रिमंडल ने इस प्रकार का एक बिल इम्पोज़ करने का और एनएकटमेंट करने का फैसला किया था। उस समय पूरे देश में यह बात चली थी कि किसी एक दल विशेष को राजनीतिक कारणों से कैसे रोका जा सकता है, उसके लिए कोई न कोई बाधा उत्पन्न की जाए।

 

19.00 hrs.

  माननीय सभापति महोदय, जिस नये आर्िटकल की आपने इस संविधान संशोधन में बात की है उसकी ओर इस सदन का ध्यान इसी आर्िटकल के ५१(ए) में जो फंडामैंटल डयूटीज हैं, उसके सब-सैकशन (ई) की ओर आकर्िषत करना चाहता हूं। इसमें स्पष्ट है

I now quote article 51(A)(e):

“It shall be the duty of every citizen of India to promote harmony and the spirit of brotherhood amongst all the people of India transcending religious, linguistic and regional or sectional diversities; … ”

  उसी अनुच्छेद में यदि आप चाहते हैं कि इस प्रकार का अनुच्छेद न जोड़ा जाए तो उसका औचित्य तो देखना चाहिए और धर्म जो हमारे जीवन के एक-एक अंग से जुड़ा हुआ है, जिससे हम जुदा नहीं हो सकते। बार-बार यह कहा जाए कि धार्िमक रंग लग जाता है तो मैं समझता हूं कि उसको पब्िलसाईज करने का ही ही यह तरीका है। माननीय सभापति महोदय, आप सब जानते हैं कि इस स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर भारत के संविधान के विषय में एक रिव्यू हो जाए। हमारी नयी सरकार के लॉ-मनिस्टर यहां बैठे हुए हैं, जो स्वयं डिप्टी-स्पीकर रहे हैं। वह स्पष्ट करेंगे कि एक संविधान के लिए कया रिव्यू हो सकता है। इस बात को नेशनल एजेंडे में शामिल किया गया है। मैं आपका ध्यान एक शब्द की ओर दिलाना चाहता हूं। हम सब जानते हैं कि “धमर्ों-धर्मा-रक्षित:। जो धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उसकी रक्षा करेगा। जब हम धर्म और राजनीति की बात करते हैं तो हमें तय कर लेना चाहिए कि हम धर्म को किस रूप में देखते हैं। माननीय सभापति जी, यह जो हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद भारत के संविधान में रिलीजन शब्द का अनुवाद जो राजभाषा प्रकाशन की किताब है उसमें धर्म लिखा हुआ है। उसमें भी बारीकी से जाया जाए तो धर्म का अनुवाद रिलीजन नहीं हो सकता। यह बहुत व्यापक शब्द है। इस शब्द को यदि हम ठीक तरह से आत्मसात करें तो मैं समझता हूं कि इसको पोल्टीसाइज करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। माननीय सभापति महोदय, इस संशोधन विधेयक में माननीय सदस्य के द्वारा जो उद्देश्य और कारणों का जिक़ आया है, उसमें भी यह कहा गया है कि “प्रस्ताव किया जाता है कि प्रत्येक राजनैतिक दल और प्रत्याशी को यह मूल कर्तव्य बनाया जाए कि वे नश्िचत करें कि उनके द्वारा किसी भी चुनाव में धर्म के नाम पर धार्िमक भावनाओं को भड़का कर वोट न मांगे जाएं। हम वेस्ट-मनिस्टर प्रणाली में काम कर रहे हैं जिसमें मतों का नश्िचत ही महत्व है। इस प्रकार किसी पर और कभी भी आप आरोप लगा सकते हैं। यहां पर कई एक माननीय सदस्य हैं जो भगवा वस्त्र पहनकर आते हैं।आप कहेंगे कि यह तो धर्म विशेष का प्रतीक है। उसे तो जीवन से अलग होना पड़ेगा, दुनिया से अलग होना पड़ेगा। माननीय सभापति महोदय, आप इतने गंभीर सदस्य होकर भी इस तरीके से आधा-अधूरा संशोधन विधेयक लाए हैं जो मेरी समझ से परे है। इसलिए आपकी उपस्िथति में मैं अनुरोध करता हूं कि आप धर्म और राजनीति के लिए एक नया जनमत बनाएं कि आखिर उससे कैसे जुदा हो सकते हैं। महात्मा गांधी का उद्धरण इस सदन में हमेशा कोट किया जाता है। जो राजनीति धर्म-विहीन होगी, उस राजनीति की कोई दिशा नहीं होगी, जो राजनीति धर्म से विमुख होगी उस राजनीति का अंत कहां होगा, इसका अंदाजा किसी के द्वारा नहीं लगाया जा सकता। माननीय सभापति महोदय, इसलिए मैं अनुरोध करूंगा कि यदि आप इस विषय पर कोई संविधान संशोधन लाते हैं तो उसको उसी रूप में मैच्योरिटी के साथ लाएं। जो सरकार आज बैठी है, जो संविधान पर एक नये ढंग से, नये स्वरूप पर बात करना चाहती है, संविधान को बदलने की बात नहीं है। हम ५० वषर्ों में हुए बदलाव की समीक्षा करना चाहते हैं, उस पर अपने सुझाव दें।

  अंत में, मैं इस विधेयक का इस रूप में विरोध करते हुए कि इसका कोई औचित्य नहीं है अपनी बात समाप्त करता हूं।

“> श्री बासवराज पाटिल सेडाम (गुलबर्गा): माननीय सभापति जी, माननीय मोहन सिंह जी जो संविधान संशोधन संबंधी बिल लाए हैं, यह एक विडम्बना है। उनके दिल की सोच कुछ है और उसमें कुछ ऐसे शब्द प्रयोग किए गए हैं जो स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। जिस देश में हम जीते हैं, वहां धर्म की अपनी एक विशेषता है। पति-पत्नी के बीच धर्म का पालन होता है, बेटे और पिता के बीच धर्म का पालन होता है, व्यापारी का एक धर्म है, नौकर का एक धर्म है और राजनेता का एक धर्म है। धर्म अच्छे रास्ते पर चलने के लिए दिया जाने वाला मार्ग है। अगर धर्म से शासन चलेगा तो देश का बहुत जल्दी भला होगा। ऐसे क्षुद्र विचार कि धर्म जातीयता को बढ़ावा देता है और इसके कारण देश को बड़ी क्षति हो रही है, गलत हैं। हमारे पूर्वजों ने धर्म की बहुत अच्छी रूपरेखा बनाई है। उन्होंने केवल व्यकित और राजकीय क्षेत्र के लिए ही इसकी रूपरेखा नहीं बनायी है बल्िक प्राणी, पशु-पक्षी और अलग-अलग समाज के लोगों के बीच में कैसे एक प्रकार का संयम पैदा किया जाए, इसकी भी रूपरेखा बनायी है। हमारे देश की एक परम्परा है। कई लोग गलत राजनीति का रास्ता धारण कर चुके है। जातीयता करने वाले लोग धर्म को बदनाम करते हैं। इस घेरे में कई लोग फंस कर धर्म की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। इस संविधान संशोधन में सोच और शब्दों का प्रयोग एकदम विपरीत है। जिस दिन धर्म से शासन चलेगा, उस दिन देश में खुशहाली आएगी। जिस राजनीति को कुछ लोग थर्ड कलास की राजनीति कहते हैं, जातीयता की राजनीति कहते हैं, उनसे देश को बचाया जाए, इस दृष्िट से मैं माननीय सदस्य द्वारा लाए गए संविधान संशोधन विधेयक का विरोध करता हूं।

  आदरणीय ममता जी ने एक अच्छी बात कही है जो मुझे बहुत पसन्द आई। उन्होंने एक साड़ी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर एक साड़ी को ७८ बार फाड़ कर पहना जाए तो वह अच्छी नहीं लगेगी। इसलिए पिछले ५० सालों में जितने छोटे-मोटे संशोधन हुए हैं, उनके कारण राजनीतिक रूप बदल गया है।

  हमारे नेशनल एजेंडा में एक नई सोच है। उसमें कहा गया है कि संविधान पर चिंतन होगा। देश की भलाई के लिए जो अच्छी-अच्छी चीजें हैं, उनको एक बार फिर से जोड़ा जाए, रोज एक नया संशोधन न लाया जाए। नेशनल एजेंडा में नीति है, जिस पर हमें पहल करनी है। इसके लिए तुरन्त समति बनायी जाए। उसके पास आप अपने विचार भेजें। जिन चीजों के कारण आज की राजनीति घ्ृाणित हो रही है, उसे ठीक करने की कोशिश की जाए। इससे नश्िचत रूप से देश में एक नया परिवर्तन आएगा। आज के परिवेश में जब मैं बार-बार ठधर्म” शब्द का अपमान होते देखता हूं तो मेरा मन रो उठता है। धर्म एक वशिष्ट शब्द है। इसकी अपनी मर्यादा, मान और वशिष्टता है। यह इन्सान को महान बनाता है। इसी में देश की आत्मा छिपी है। धर्म से जीवन चलेगा तो देश का ही कल्याण नहीं होगा बल्िक मानव जाति का कल्याण होगा। स्ृाष्िट के वास्तविक समातोलन के साथ देश का विकास होगा। हमें यही दृष्िटकोण अपनाना है। माननीय सदस्य जो संविधान संशोधन लाए हैं, मैंने पहले कहा कि माननीय सदस्य की सोच कुछ है, और शब्द दूसरे उपयोग किए गए हैं। इस कारण इसकी धरती में उन शब्दों का जोड़ नहीं जमता।

  इसलिए मैं उनसे प्रार्थना करूंगा कि इस संशोधन के बारे में वह पुनर्िवचार करें और जो अपनी सरकारी नई नीति है उसको कमेटी के द्वारा देश के संविधान के बड़े-बड़े विद्वानों से उस पर विचार करायें। वहां हम अपने विचार भेजेंगे और निचोड़ के रूप में परिवर्तन करने के लायक जो भी चीजें कल संसद में आयेंगी और दो-तिहाई मत से पास होंगी तो वे बहुत दिनो तक हमारे लिए लाभदायक बन सकती हैं। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए मैं इस विधेयक का विरोध करना चाहता हूं कि धर्म इस देश की आत्मा है, धर्म से ही व्यकित चलना चाहिए, राजनीति चलनी चाहिए, समाज के हर व्यकित को इस दिशा में अपने आपको ढालना चाहिए। इसीलिए मैं यह चाहता हूं कि हमारे संविधान के ५१वें अनुच्छेद को और के साथ जो आपने जोड़ने की कोशिश की है, आज की परस्िथति में उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे यह कहने के बाद आपको भी अनुभव हुआ होगा कि आपके मन के सोच कुछ और हैं और इन शब्दों के प्रयोग के कारण उसके अर्थ कुछ और निकल रहे हैं। अभी मेरे मित्र ने बहुत सहज रूप से कहा कि इस संशोधन को धर्म और राजनीति से दूर रखना चाहिए। जब कांग्रेस की सत्ता इस देश में चल रही थी तो इसी शब्द को लेकर हड़बड़ी में उन्होंने एक बिल लाने की कोशिश की। सारे देश में यात्रा चली, यात्रा के समय सारे देश का जनमत एक हो गया। बाद में कया हुआ, जो लोग उस बिल का समर्थन करना चाहते थे, उनकी आंख खुल गई कि हम गलत चीज का समर्थन करने जा रहे हैं, यह तो कल हमें ही महंगा पड़ सकता है, तब कांग्रेस का यह बिल खटाई में पड़ गया। उसी के एक छोटे प्रतीक के रूप में आपने इसे लाने की कोशिश की है। इसीलिए मैं यह चाहूंगा कि अगर हम अपने देश की आत्मा पर इस धर्म शब्द को अलग ढंग से जोड़ते जायेंगे तो यह एक प्रकार का आघात होगा। भारतीय संस्कृति, भारतीय जीवन-पद्धति, भारतीय परम्परा, भारतीय मूल्य तथा यहां के विचारों को यह स्वीकार नहीं करता है। इसलिए मैं चाहूंगा कि आने वाले दिनों में राजनीति में जो घ्ृाणित विषय आ रहे हैं, कुछ लोग जाति के नाम पर, पिछड़े हुए लोगों के नाम पर या किसी और चीज को मुद्दा बनाकर अपने क्षुद्र राजनीतिक मतलब को पूरा करना चाहते हैं। जिसके विरोध में आपके मन में तीव्र भावनाएं हैं, इसलिए हमें अपने संशोधन को दूसरे ढंग से लाना होगा, दूसरे ढंग से ही अपने विचारों को प्रस्तुत करना होगा, तभी आपके मन की भावनाओं को साकार रूप दिया जा सकेगा। परंतु जिस स्वरूप में आपने इस संशोधन को लाने की कोशिश की है, मेरी दृष्िट में यह मानने लायक नहीं है, इसमें कही-कहीं कमियां है जिनका मैंने यहां उल्लेख किया है। इसलिए मैं इस संशोधन विधेयक का विरोध करता हूं। माननीय सदस्य इसके बारे में पूर्ण विचार करेंगे, यह अपेक्षा करते हुए मैं अपने विचारों को यही पर समाप्त करता हूं।

“>SHRI C.P. RADHAKRISHNAN (COIMBATORE):Respected Chairman, I first pay my respects to Bharat Mata and my apologies to this august House, that despite being a son of the Bharat Mata, I am not able to deliver my speech in the Rashtra Bhasha because of the appeasement policy of the Congress. There is no Hindi in my State from l967 onwards. Because I have completed my education without Hindi it is very difficult for me to learn that language.

Like that there is appeasement everywhere. Of course, the appeasement of Kashmir created a big problem for the country today.

The three wars of Pakistan were due to the Kashmir problem. Like that, wherever the appeasement is there, everywhere we are facing the problem. There is a lot of appeasement in the North-Eastern region. The problem never reduces there, instead of that it is always increasing.

I thank my respected friend, Shri Mohan Singh for giving me an opportunity to speak on the Constitution (Amendment) Bill, 1998. The very notion of Shri Mohan Singh looks like very generous and in a broad perspective, but in the real sense, I do not find it as generous. Politicians in the history of India always try to hide the facts to the youngsters so that the real history of the nation was never revealed to the young people. There is no political leader better than Mahatma Gandhi that the India has ever produced. Even Mahatma Gandhi could not prevent the partition of India. It shows that by appeasing somebody, always patting at the back, you will never get the real thing done. So, whenever there is a problem, there must be a determination to fight against it and whenever there is an adharma by anybody, we must determine to fight it out. My feeling is that India is a great nation. It has a very glorious culture and has a powerful heritage. The religion can never be isolated from the life of Indians. The religion is not at all a sin, it is a guiding factor in a person’s life. If a person is more religious, there is every chance for him to be a more honest and perfect person. I feel, the religion should be understood in a proper manner and it should be understood in the most generous and broad perspective.

I want Shri Mohan Singh to consult everybody so that the real notion of this Bill will be fulfilled. Moreover, he has not said about the casteism, which is dividing the society into so many small groups and based on that casteism, powerful people in high positions are politically looting the nation. They call themselves as the leaders of Kisans, as the leaders of Yadavs, but the same leaders are looting the money kept for the cow’s food. However, they call themselves as Yadavs’ leader.

To my knowledge about the history and the itihasa, even Kansa could not do this sin of looting the cow’s food and those who are looting the cow’s food are calling themselves as Yadavs’ leader. So, I personally feel, if anybody is doing a harm to a cow, he can never be called as a Yadav, but they are calling themselves as Yadavs’ leaders.

MR. CHAIRMAN : Shri Radhakrishnan, you can continue your speech next time.

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