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Title: Need to declare ‘Garhwali’ and ‘Kumaoni’ as national languages.
श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल):महोदया, मैं आपके माध्यम से इस सदन का ध्यान मध्य हिमालय के केदारखंड क्षेत्र में प्राचीन काल से बोली जाने वाली तथा देवगाथाओं, जागरों, भड़वार्ताओं, विभिन्न लोकगीतों, थड़िया चौंफुला, छूड़ा, बाजूबन्द, लामण, छोपती, तांदी, झुमैलो मांगल गीतों के आदिकालीन लोकगायकों / वाचकों के कंठों में रची बसी और श्रुति-अनुश्रुति परम्परा से आगे बढ़ती गढ़वाली लोकभाषा प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। गढ़वाली एवं कुमाऊनी भाषाओं ने कागज कलम पर कब उतरना शुरू किया इस प्रश्न का ठीक उत्तर तो भाषा विज्ञानी ही दे सकते हैं। मैं सिर्फ इतना स्मरण दिलाना चाहता हूं कि 13-14वीं शताब्दी से पहले सहारनपुर व हिमाचल तक फैले गढ़वाल राज्य का राजकाज गढ़वाली भाषा में ही चलता था। देवप्रयाग मंदिर में महाराजा जगतपाल का सन 1335 का दानपात्र लेख, देवलगढ़ में अजयपाल का 15वीं शताब्दी का लेख, बदरीनाथ एवं मालद्यूल आदि अनेक स्थानों में मिले शिलालेख, ताम्रपत्र गढ़वाली भाषा के प्राचीनतम होने के प्रमाण हैं। डॉ0 हरिदत्त भट्ट शैलेस के अनुसार 10वीं शताब्दी से गढ़वाली का लिखित साहित्य उपलब्ध है।
जैसा कि आप सभी जानते कि हमारा देश एक बहुभाषी देश है। यहां पर समय और परिस्थितियों की आवश्यकतानुसार अनेक भाषाओं का जन्म हुआ है। उनमें से कुछ भाषायें तो समय के साथ-साथ अपना वर्चस्व एवं सम्मान बनाये रखने में सफल रही हैं और कुछ भाषायें पर्याप्त सुविधाएं एवं प्रचार-प्रसार न मिलने के कारण अपने अस्तित्व एवं सम्मान के लिए संघर्ष कर रही हैं। जो उनका अधिकार है वह उन्हें अब तक नहीं मिल सका है। उनमें गढ़वाली एवं कुमाऊंनी भाषाएं मुख्य हैं। लगभग 50 लाख गढ़वाली एवं कुमाऊंनी बोलने वाले लोग अपनी मातृभाषा को अपने जीवनकाल में ही दम तोड़ते व विलुप्त होते कैसे देख सकते हैं?
महोदया, भाषा सर्वेक्षणों के द्वारा यह तथ्य सिद्ध हुआ है कि गढ़वाली एवं कुमाऊंनी भाषा भारत की प्राचीनतम भाषाओं में हैं। लेकिन अत्यंत खेद के साथ मैं यह कह सकता हूं कि गढ़वाली एवं कुमाऊंनी भाषा को आज तक वह सम्मान नहीं दिया गया जो दूसरी भारतीय भाषाओं को प्राप्त है और न ही इनके प्रचार एवं प्रसार के लिए आवश्यक प्रयास किए गए।
मैं आपसे उत्तराखंड की जनता ही नहीं अपितु उन सभी भाषा प्रेमियों की ओर से अनुरोध करता हूं कि गढ़वाली एवं कुमाऊंनी भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूचि में सम्मिलित कर इन्हें राज भाषा का दर्जा एवं सम्मान दिया जाए एवं इनके प्रचार-प्रसार के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। हिन्दी अकादमी, उर्दू अकादमी, पंजाबी अकादमी, सिंधी अकादमी आदि की तर्ज पर इन भाषाओं के लिए भी अकादमी स्थापित की जाए ताकि इन भाषाओं पर शोध कार्य किया जा सके तथा अन्य सम्पर्क माध्यमों जैसे मीडिया, फिल्म, नाटक, संगीत आदि के संस्थान स्थापित किए जाएं।
एक बार पुन: मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि भारत के वृहद् क्षेत्र उत्तराखंड में प्रयोग की जा रही गढ़वाली एवं कुमाऊंनी देव भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूचि में सम्मिलित कर इन्हें राज भाषा का सम्मान दिया जाए तथा इनके प्रचार-प्रसार के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं जिससे प्राचीन हिमालय संस्कृति एवं धरोहर की रक्षा कर इन्हें लुप्त होने से बचाया जा सके।…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : बहुत-बहुत धन्यवाद।
…( व्यवधान)
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):अध्यक्ष महोदया, मैं भी इस विषय के साथ अपने को सम्बद्ध करता हूं।