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Lok Sabha Debates
Regarding Discussion On Demands For Supplementary Grants In Respect … on 14 December, 2005


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Title : Regarding discussion on demands for supplementary grants in respect of Budget (General) for 2005-06 (not concluded).

MR. DEPUTY-SPEAKER: The House will now take up item no. 15.

            Motion moved:

“That the respective supplementary sums not exceeding the amounts shown in the third column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2006, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand Nos. 1, 5, 7, 8, 10 to 12, 18, 20, 23 to 25, 29 to 32, 34, 36, 41, 44, 47, 48, 50, 51, 54, 56 to 60, 63, 65, 67, 70 to 72, 75, 79, 80, 82, 83, 92, 100, 101 and 103 to 105.”

 

 

 

श्री कैलाश जोशी माननीय उपाध्यक्ष महोदय, आज सदन में माननीय वित्त मंत्री जी ने इस वर्ष की दूसरी अनुपूरक अनुदान मांगें प्रस्तुत की हैं। ये अनुपूरक अनुदान मांगें कुल मिलाकर ९०७९ करोड़ रुपये की हैं, जिसमें से १९६५ करोड़ रुपये की नकद राशि इसमें खर्च होगी। मंत्री जी ने कहा है कि बाकी राशि, यानी ७११४ करोड़ रुपये बचतों में से पूरे किये जायेंगे। मैंने उनका अवलोकन किया है। इसमें से कई मांगें ऐसी हैं जो सहायक अनुदान, मुआवजा देने या कुछ विभागों में जो अधिक व्यय हुआ है, उसे चुकाने के लिए है। किन्तु मैं समझता हूं कि कुछ मांगें ऐसी भी हैं जो विचारणीय है और जिन पर बड़ी गंभीरता के साथ विचार करने की आवश्यकता है।

16.23 hrs.                           (Shri Giridhar Gamang in the Chair)

सभापति महोदय, मांग संख्या एक कृषि से संबंधित है। इसमें कई प्रकार की मांगें की गयी हैं, लेकिन मुख्य रूप से जो राशि मांगी गयी है, वह ग्रामीण गोदामों को बनाने के लिए मांगी गयी है। पिछले कुछ वर्षों से ग्रामीण गोदाम बनाने का काम प्रारंभ हुआ है, लेकिन एक तो बहुत कम राशि रखने के कारण और दूसरा, समय पर उनके पूरा न होने के कारण ग्रामीण क्षेत्र के किसानों को इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है। सदन में कई बार इस प्रकार की मांग भी उठी है। किसान के सामने कई प्रकार की समस्याएं पैदा होती हैं। उन्हें अच्छा मूल्य प्राप्त करने के लिए अपनी फसल को गोदाम में रखने की जो सुविधाएं मिलनी चाहिए, वे सुविधाएं भी इतने वर्षों के बाद उन्हें नहीं मिल पाईं।

मैं वित्त मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि वे सम्बन्धित विभाग को इस बात का निर्देश दें कि वे लोग ऐसी व्यवस्था करें जिससे समय पर इनके गोदामों के निर्माण का काम पूरा हो जाय्ो[r58] ।

मैंने स्वयं देखा है कि राशि मंजूर हो जाती है किंतु उनका निर्माण कार्य समय पर पूरा नहीं होता है। मैं माननीय वित्त मंत्री जी का ध्यान इस ओर भी आकर्षित करना चाहूंगा कि उन्होंने अपने पिछले बजट भाषण में कृषि के बारे में बहुत महत्वाकांक्षी बातें कही थीं। हमें आशा थी कि बजट भाषण में वित्त मंत्री जी ने जो कुछ कहा है, उसके आधार पर किसानों की दशा को सुधारने के लिए तेजी से सरकार काम करेगी, किंतु वह काम पूरे वर्ष भर में दिखाई नहीं दिया। अब तो तीन महीने बाद वर्ष समाप्त होने वाला है। लोगों को कृषि के मूल्य प्राप्त नहीं हो रहे हैं और किसानों को अच्छे बीज नहीं मिल रहे हैं, समय पर उर्वरक नहीं मिल रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो पिछले दिनों किसानों की आत्महत्या का मामला कई बार हमने सुना है, कहीं उसकी पुनरावृत्ति नहीं हो, इस ओर मैं वित्त मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

दूसरी मांग संख्या ४ है, जो गैस त्रासदी के बारे में है। वित्त मंत्री जी ने इसमें राशि इसलिए मांगी है, जिससे गैस पीड़ितों के केसेज का शीघ्र निपटान हो और उनके कर्मचारियों को जो वेतन मिलना चाहिए, उस वेतन का भुगतान उन्हें मिले। मैं वित्त मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि आज पूरे २१ वर्ष भोपाल गैस त्रासदी को हो गये हैं और अभी भी हजारों प्रकरण पेंडिंग पड़े हुए हैं। गैस पीड़ित चक्कर काट रहे हैं और उनको सुविधाएं देने के लिए जो काम किये गये थे, वे लाभ उन्हें नहीं मिल रहे हैं। भोपाल में जो बड़े अस्पताल उनके लिए खोले गये थे, जो एक अस्पताल ट्रस्ट द्वारा चलाया जा रहा था, उसमें पिछले ६ महीनों से डॉक्टरों और नर्सेज की हड़ताल चल रही है, दो महीने से ताला भी बंद था। इस कारण जिन गैस पीड़ितों का उपचार होता था, उनको अस्पताल से भगा दिया गया, यानी उनका पूरा इलाज नही हो रहा है। इतना समय बीत जाने के बाद भी गैस पीड़ितों की दशा सुधारने की द्ृष्टि से केन्द्र सरकार की जो जिम्मेदारी होनी चाहिए थी, वह उसने ठीक तरह से पूरी नहीं की है। मैं माननीय वित्त मंत्री जी का ध्यान इस ओर भी आकर्षित करना चाहूंगा।

उसके बाद मांग संख्या ८ आती है। उसमें वित्त मंत्री जी ने सदन से इसलिए राशि मांगी है कि हमें रासायनिक उर्वरक बनाने वाली जो कंपनियां हैं, उन्हें सब्सिडी देनी है। सब्सिडी की राशि हम देंगे और उन्हें मिलेगी भी, लेकिन इस सदन में अनेक बार चर्चा उठी है जिसमें अनेक माननीय सदस्यों ने मांग की है कि सब्सिडी का लाभ उन किसानों तक पहुंचना चाहिए, जिनके लिए सरकार सब्सिडी दे रही है। इसलिए मेरा वित्त मंत्री जी से आग्रह होगा कि सब्सिडी का लाभ किसानों तक पहुंचे, इसकी व्यवस्था की जाए। किसान को तो मूल्य आज भी अधिक देना पड़ रहा है। सब्सिडी खाद निर्माता कंपनियों के पास जा रही है। किसान तक पैसा नहीं पहुंच रहा है। इस संबंध में अनेक दिनों से किसानों ने मांग भी की है। इस बारे में जितने प्रदर्शन दिल्ली में किसानों ने पिछले चार महीनों में किये हैं और जब-जब किसानों ने इसकी मांग की है, इस मामले को उन्होंने बड़ी प्रमुखता से उठाया है। इसलिए इस ओर भी वित्त मंत्री जी कृपया ध्यान दें कि जो सब्सिडी आप मांग रहे हैं, हम स्वीकार करेंगे लेकिन कम से कम उस सब्सिडी का लाभ किसान तक अवश्य पहुंचे जिनके लिए आपने यह सब्सिडी देने की योजना प्रारम्भ की है।

उसके बाद मैं मांग संख्या १८ की ओर जाता हूं। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इसमें वित्त मंत्री जी इसलिए राशि मांग रहे हैं कि उन्हें सुपर बाजार के अल्प वेतन स्टॉफ को बकाया वेतन और मजदूरियां देने के लिए पैसा चाहिए। वित्त मंत्री जी, आपको मालूम होना चाहिए कि सुपर बाजार लगातार घाटे में चल रहा है और अगर कहा जाए कि यह दिवालिया होने वाला है, तो इसमें अतिश्योक्ति नहीं होगी।[R59]  कम से कम आप विभाग को यह निर्देश दें कि उसकी जांच करें।बीच में हमने सुना था कि सुपर बाजार की जांच करके उसकी व्यवस्था बदली जा रही है या उसे समाप्त किया जा रहा है। अभी तक उपभोक्ता मामले विभाग से उसका निराकरण नहीं किया गया है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि कृपया आप सरकार को निर्देश दें कि सुपर बाजार में जो लगातार घाटा हो रहा है, उसकी ओर विभाग ध्यान दे और उसके घाटे को समाप्त करने की दिशा में क्या उपाय हो सकते हैं, उन पर विचार करे।

इसके बाद हम मांग संख्या ३२ की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। इसमें इन्होंने रिजर्व बैंक की राष्ट्रीय रक्षा स्वर्ण बॉण्ड योजना, जो वर्ष १९८० की है, के लिए धन की मांग की है। मुझे समझ में नहीं आया कि इतने वर्षों बाद राशि मांगने का क्या कारण है? यह वर्ष १९८० का मामला है। वर्ष १९८० में यह स्वर्ण बॉण्ड योजना बनी थी और इसकी योजना प्रारम्भ की गयी थी। उसके बाद आज वित्तमंत्री जी कह रहे हैं कि वर्ष १९८० के अन्तर्गत गलती से सरकारी खाते में किए गए ४९४.५० ग्राम सोने की अतरिक्त मात्रा के समतुल्य ६०,९५६ रूपए की क्षतिपूर्ति हेतु यह मांग की गयी है। मैं जानना चाहूंगा कि इसमें इतना विलम्ब क्यों हुआ? वर्ष १९८० के बाद, आज वर्ष २००५ तक लगभग २५ साल पूरे होने वाले हैं। इस बीच में किसी ने इसकी खोजबीन नहीं की? वित्त विभाग और रिजर्व बैंक ने इस ओर ध्यान नहीं दिया? रिजर्व बैंक ने आपसे कब यह मांग की कि यह क्षतिपूर्ति हमें दी जाए? मैं समझता हूँ कि यह विलम्ब क्षम्य नहीं है। इतना समय लगने का कारण मेरी समझ में नहीं आता है, इसलिए कृपया आप उत्तर देते समय स्थिति को स्पष्ट करने का कष्ट करें।

इसके बाद मैं आपका ध्यान मांग संख्या ४१ की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। इसमें आपने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए राशि की मांग की है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का आज पांचवा वर्ष समाप्त होने वाला है और चार वर्षों की योजनाएं लगभग सभी प्रदेशों में पूरी हो गयी हैं। इसकी रिपोर्ट ग्रामीण विकास विभाग से हमें मिल चुकी है। चार वर्षों के बाद सरकार को अब यह लग रहा है कि इसके बारे में फिर से सर्वे कराना चाहिए, फिर से यह पता लगाना चाहिए कि किस प्रकार सड़कें बन रही हैं? बीच में कितनी शिकायतें आईं थीं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में सड़क एक किलोमीटर बनती है, आगे बढ़ जाती है और पीछे की सड़क उखड़ जाती है। मॉनीटरिंग की व्यवस्था भी की गयी, लेकिन वह इतनी आधी-अधूरी है कि कहीं भी समय पर उनकी देखभाल नहीं की जाती है। मेरे निर्वाचन क्षेत्र में दो-तीन सड़कों के बारे में मैंने शिकायत की और उस चीफ इंजीनियर से इसकी शिकायत की जिसे यह काम सरकार की ओर से सौंपा गया था। महीनों तक उनके उत्तर प्राप्त नहीं होते और यदि सात-आठ महीने में उत्तर आता भी है तो यह कह दिया जाता है कि हमने उसे ठीक करवा दिया है। इसलिए मैं समझता हूँ कि इसमें अनावश्यक विलम्ब हुआ है।अभी तक यह व्यवस्था बन जानी चाहिए थी, पूरी व्यवस्था बनी भी थी, लेकिन अगर नयी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता पड़ी है तो कृप्या इसे देखिए कि यह व्यवस्था सुचारू रूप से चले और उसका लाभ ग्रामों में बनने वाली सड़कों के हितग्राहियों को प्राप्त हो सके। इस दिशा में आप विशेष ध्यान दें क्योंकि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कों की गुणवत्ता की जांच करने के लिएआपने इसमें लिखा है। पिछले चार वर्षों बाद अब सरकार को ध्यान आया कि इन सड़कों की गुणवत्ता देखनी चाहिए। यह व्यवस्था पहले भी की जा सकती थी। इसमें लिखा है कि उपभोक्ता संरक्षण अधनियम और केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान के अन्तर्गत सेवाएं प्रदान करने के सम्बन्ध में सर्वेक्षण करने के लिए धनराशि मांगी जा रही है। अभी इसका सर्वेक्षण हुआ है। इस सर्वेक्षण के लिए आप दो करोड़ ३४ लाख रुपए की मांग कर रहे हैं। मेरा अनुरोध होगा कि इस दिशा में त्वरित कार्यवाही होनी चाहिए। जो सड़कें बन रही हैं, अगर उनकी शिकायतें आएं, तो समय पर उनका निराकरण होना चाहिए। सड़कें गुणवत्ता वाली बनें, इस दिशा में केन्द्र सरकार अपने दायित्व का निर्वाह करेगी, ऐसी मुझे आशा है।

मैं अब मांग संख्या ४८ के विषय में कुछ कहना चाहता हूं। यह मांग “आयुष ” के बारे में है। आयुष में आयुर्वेदिक, यूनानी, योग, सिद्ध और होम्योपैथिक चकित्सा पद्धतियां आती हैं। इन्हें मिलाकर एक नया आयुष विभाग बना है। इस मांग में रखी गई राशि का मैं विरोध नहीं करना चाहता, लेकिन बड़ी नम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि आज हमारे यहां की चाहे आयुर्वेद हो, योग हो या यूनानी चकित्सा प्रणाली हो, विश्व के अनेक देशों में उनका प्रचार हो रहा है। मैं पिछले दिनों जर्मनी गया था। वहां आयुर्वेद का बहुत बड़ा अस्पताल है, जिसमें करीब २५० रोगियों को रखा जा सकता है। इसके अलावा यूरोप में भी अनेक आयुर्वेद के अस्पताल खुल रहे हैं और चल रहे हैं। हमारे वैद्यों को वे लोग बड़ी-बड़ी तनख्वाहें देकर अपने यहां बुला रहे हैं। हमारे यहां आयुर्वेद की प्रशंसा करने के लिए तो लोगों के पास बहुत समय है, लेकिन उसे आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं हो रहा है। इसी तरह से भारतीय चकित्सा प्रणाली के जो दूसरे अंग हैं, उनका सही प्रकार से विकास करने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं।

मैं खुद इतना भुक्तभोगी हूं कि आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं। करीब २० साल पहले मुझे एक साधु मिले थे। उन्होंने कहा कि मेरे पास ऐसा योग है, ऐसी पांच औषधियां हैं, जो हर गांव में ही मिल जाएंगी, उन जड़ी-बूटियों को लेने जंगल भी नहीं जाना पड़ेगा। मैंने उस बारे में दिल्ली में आयुर्वेद विभाग के एक बड़े अधिकारी को पत्र लिखा। इस पर उनका जवाब मुझे मिला कि आपने जिन पांच औषधियों के नाम लिखे हैं, वे चालू नाम हैं, कृपया इनके आयुर्वेदिक या संस्कृत में नाम लिख कर हमें दें। मैंने प्रयत्न करके, प्रदेश के वैद्यों से मिलकर उन औषधियों के संस्कृत और यूनानी नाम उन्हें भिजवाएं। उन्होंने कहा कि हम प्रयत्न करेंगे और फिर आपको जवाब देंगे। लेकिन आज २० साल हो गए, उनका कोई जवाब मुझे नहीं मिला कि इस सम्बन्ध में क्या प्रभावी कार्यवाही की गई। उस साधु ने मुझे ऐसा प्रयोग और दवा बताई थी कि जिस औरत को मासिक धर्म हो, उस समय वह तीन दिन तक इसे ले ले, तो परिवार नियोजन हो जाएगा। अगर वह संतान चाहती है तो उसका भी उपाय उन्होंने बताया था। यह स्थिति आज भारतीय चकित्सा पद्धतियों की है। हम अमेरिका, फ्रांस तथा अन्य देशों में जाकर देखते हैं कि वहां योग की कक्षाएं चल रही हैं और भारतीय लोग योग सिखा रहे हैं। प्राकृतिक चकित्सा के अंतर्गत विदेशों में प्रयोग हो रहे हैं, लेकिन हम यहां आज भी एलोपैथी पर निर्भर हैं।

मैं एक अधिकारी से मिला था और उससे कहा था कि क्या किया जाए, क्योंकि सुनवाई नहीं होती है। उसने कहा कि आप केवल केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जी से मिलें, तो कुछ होगा, विभाग के लोगों से मिलने पर कुछ नहीं होगा। इसलिए कि जो बड़ी-बड़ी एलोपैथी दवाओं की कम्पनीज हैं, वे सारे विभाग के बड़े-बड़े अधिकारियों को जमाकर रखती हैं, उन्हें पैसा देती हैं, इसीलिए देशी चकित्सा पद्धति का प्रचार नहीं हो पाता है। यह स्थिति आज भी देश में बनी हुई है।

इसलिए मैं वित्त मंत्री जी से प्रार्थना करूंगा कि आप जो राशि मांग रहे हैं, वह तो हम स्वीकृत करेंगे ही, अगर और राशि की मांग हो, तो उसके लिए भी प्रयास करेंगे, लेकिन सही मानो में भारतीय चकित्सा पद्धतियों का प्रचार-प्रसार हो, इस पर ध्यान दें।

सभापति महोदय, इन अनुपूरक अनुदानों की मांगों पर मेरे दल के अन्य साथी भी बोलेंगे। इसलिए मैं अपनी बात यहीं समाप्त करता हूं और आशा करता हूं कि मैंने जिन बिन्दुओं की ओर मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट किया है, वे उनका जवाब देंगे।

श्री सचिन पायलट सभापति महोदय, वित्त मंत्री जी द्वारा जो सप्लीमेंट्री डिमांड्स फार ग्रांट्स सदन में रखी गयी हैं, मैं उनका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मेरी द्ृष्टि में इस साल का बजट चर्चा में इसीलिए आया, क्योंकि इस बजट के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ी और वह इसलिए बढ़ी क्योंकि बहुत सालों के बाद, लगभग ७-८ सालों के बाद, पहली बार सरकार ने जब अपना बजट पेश किया, तो उसमें ग्रामीण क्षेत्र और किसान वर्ग की तरफ अपना ध्यान केंद्रित किया गया। पिछले ६-७-८ सालों में ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों के जो हालात थे, उनकी आवाज को दबाया गया था, जिस लाचारी से वे गुजर रहे थे, उनकी समस्याओं का निराकरण करने के लिए बहुत गंभीर कोशिश इस बजट के माध्यम से की गयी।इससे पहले की सरकार को मैं दोष नहीं देना चाहता हूं कि उन्होंने किसान वर्ग और कृषि क्षेत्र की तरफ कम ध्यान दिया, क्योंकि मैं समझता हूं कि पिछली सरकार को लग रहा था कि सब कुछ अच्छा है, बहुत बढि़या है, भारत उदय हो रहा है, लोगों को बहुत फील गुड हो रहा है, यात्राएं निकल रही थीं, बड़े-बड़े इश्तेहार छप रहे थे तथा लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की गयी थी। ऐसा नहीं है कि पिछली सरकार ने जानबूझकर कृषि क्षेत्र की अनदेखी की या किसान वर्ग की अनदेखी की, मेरी द्ृष्टि में सरकार के ब्रौडर स्क्रीन पर कहीं गांव और गरीब था ही नहीं। It is not an act of commission; it is an act of omission.  इस देश में ६३८००० गांव हैं और दो तिहाई जनता आज कृषि क्षेत्र पर अपने जीवन व्यवसाय के लिए निर्भर करती है। आज हम सब को सोचने की जरूरत है, चाहे सदन के अंदर हो या सदन के बाहर, कि हमारा जो कृषि प्रधान देश है जिसमें हर व्यक्ति, हर राजनीतिक दल, हर सरकार किसान की बात करते हैं, लेकिन आज ऐसा कौन सा किसान है, जो सार्वजनिक रूप से यह कह सकता है कि मैं अपने बच्चे को पढ़ा-लिखाकर, बड़ा करके एक किसान बनाऊंगा। किसान की आर्थिक स्थिति तो दयनीय है ही, लेकिन उसकी जो सामाजिक पोजीशन है, उसमें भी बहुत गिरावट आयी है। उसे सजाने, संवारने तथा बेहतर करने की चेष्टा इस सरकार ने अपने बजट के माध्यम से की है। कुछ ऐसे कार्यक्रम सरकार ने शुरू किए हैं, जो अभूतपूर्व हैं और जो राशि आवंटित की गयी, मैं समझता हूं कि पिछले कई दशकों में नहीं की गयी थी और जिसकी इस पक्ष से, सरकार की, सभी पार्टियों ने प्रशंसा की है। यह वधि की विडंबना है कि जो सरकार अपनी भूल के चलते सत्ता से दूर हुयी थी, आज जब नयी सरकार राष्ट्र निर्माण में, ग्रामीण क्षेत्र में अपनी तरफ से कुछ योगदान करना चाहती है, अगर वह ज्यादा पैसे मांगती है, तो उस पर भी कहीं न कहीं आपत्ति दिखायी जाती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

महोदय, पिछले ६ सालों में किसान और कृषि की क्या दशा रही, मैं कुछ आंकड़े आप को देकर, इस बात को उजागर करूंगा।

वर्ष १९९८ में प्रति टन यूरिया की कीमत ३६८० रूपए थी। वर्ष २००४ में यूरिया की कीमत ३१ प्रतिशत बढ़ गयी और ४८३० रूपए प्रति टन हो गयी। मैं उन चीजों का उल्लेख कर रहा हूं जो कृषि में लगती हैं, जिसमें किसान की लागत आती है। डीएपी की प्रति टन कीमत वर्ष १९९८ में ८३०० रूपए थी जो वर्ष २००१ में बढ़कर ९३५० रूपए प्रति टन हो गयी। मैं एक और आंकड़ा आपको दूंगा …( व्यवधान)   मैं सिर्फ आंकड़ों का उल्लेख कर रहा हूं, आपकी आलोचना नहीं कर रहा हूं।मान्यवर, किसान जो हल चलाता है, ट्रैक्टर चलाता है, जमीन में मेहनत करता है, धरती का पेट फाड़कर हमारा और आपका पेट भरता है, उसको टैक्टर की जरूरत होती है। एक विशेष आंकड़ा मैं आपके सामने देना चाहूंगा कि वर्ष १९९९ में इस देश में २७६१८१ ट्रैक्टर बेचे गए थे और वर्ष २००२ में, ३ तीन साल बाद, सिर्फ २२५२८० ट्रैक्टर बेचे गए। किसानों को ट्रैक्टर खरीदने की जरूरत इसलिए नहीं लगी, क्योंकि उन्हें लगा कि कृषि से हम अपना पालन-पोषण नहीं कर सकते। उसे सहयोग की जरूरत थी, सहायता की जरूरत थी और मैं समझता हूं कि जब से यह सरकार सत्ता में आयी है, उसने सच्चे मन से उनकी तरफ ध्यान केंद्रित किया है। उनको मदद करने का जो वायदा हमारी सरकार के द्वारा, हमारी पार्टी और सहयोगी पार्टियों ने किया था, उसे हम पूरा कर रहे हैं[c60] ।

             मैं कुछ और आंकड़े दूंगा। मान्यवर, जिस एग्रीकल्चर क्रैडिट की सब दुहाई देते हैं, लेकिन सब को इस बात का भी दुख है कि आज हिन्दुस्तान का ऊर्जावान और गौरवान्वित किसान आत्महत्या के मार्ग पर पहुंच गया है। ऐसे प्रदेश, जहां बहुत भुखमरी और बेकारी है और ऐसे प्रदेश जो ऐतिहासिक रूप से बहुत समृद्ध थे जैसे पंजाब या दूसरे कई प्रदेश हैं, वहां इस सरकार ने एग्रीकल्चरल क्रैडिट को व्यापक बनाने के लिए ४४ फीसदी की वृद्धि की है, यानी२००४-०५ में ८० हजार करोड़ रुपए से बढ़ा कर १,१५,२४२ करोड़ रुपए किए गए हैं। मार्किट इंटरवैंशन स्कीम, जो एनडीए के राज में मात्र ४५८ करोड़ रुपए की थी, इस सरकार ने उसे पिछले वर्ष आठ गुना करके ३६१२ करोड़ रुपए किया है। अगर सरकार पैसा मांगती है,माननीय वित्त मंत्री जी पैसा इसलिए मांगते हैं कि हमारा ध्यान गांवों और गरीब किसानों की तरफ है। उनकी सेवा करने के लिए हमने जो कार्यक्रम, नीति और नियम बनाए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए अधिक राशि मांगी है। कृषि क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र में बैंक ऋण देने का जो टारगेट है, वह ५० लाख नए लोगों को जोड़ने का था। देखने वाली बात यह है कि जब सरकार बदलती हैं तो अफसर, बाबू, कर्मचारी वही रहते हैं, लेकिन उनसे गांवों के लिए कैसे काम कराया जाता है, वह सरकार पर निर्भर करता है। सरकार का काम करने वाले कार्यकर्ता वही थे। हमारा टारगेट ५० लाख किसानों तक लोन पहुंचाने का था लेकिन हमने इस टारगेट को लांघ कर ८० लाख नए किसानों को ऋण दिया है।

नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन के लिए सरकार ने २३०० करोड़ रुपए की स्वीकृति की है। गेहूं और चावल की प्रोक्योरमैंट में पिछले वर्ष की तुलना में २० मीटि्रक टन की वृद्धि हुई है, यूरिया की खपत में ५ परसेंट की वृद्धि हुई, डीएपी की खपत में १० परसेंट की वृद्धि हुई है लेकिन खाद्य पदार्थों की कीमतों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। उनकी २००२-०३ में जो कीमतें थीं, वही सरकार ने कीमतें रखी हैं। मैं समझता हूं कि आने वाले वर्षों और बजट में हमें निश्चित रूप से कृषि के क्षेत्र में और बहुत कुछ करने की जरूरत है। हमने अब तक जो किया, वह प्रशंसनीय है, हम उसमें सहयोग करते हैं। पूरा देश और बाकी दुनिया इस बात को मानती है कि यह सरकार सचमुच में बहुत गम्भीर कदम किसानों की जिन्दगी को बेहतर करने के लिए उठा रही है लेकिन जब हम अपने देश के किसानों की बात करते हैं, हम सब जानते हैं, अगर चावल का उदाहरण लें, तो क्षेत्रफल के आधार पर सबसे ज्यादा पैदावार अगर कहीं चावल की होती है तो हिन्दुस्तान में होती है। अगर प्रोडक्शन का मापदंड मापें तो सबसे ज्यादा चावल अगर कहीं होता है तो हिन्दुस्तान दुनिया में नम्बर दो पर आता है लेकिन यील्ड की रैंकिंग में भारत का नम्बर ५२वां है। हम लोगों को आधुनिकीकरण करना है, कृषि के क्षेत्र में साइटफिक टैम्परामैंट को डैवलप करना है। गेहूं के उत्पादन के क्षेत्रफल में हम नम्बर वन पर हैं, प्रोडक्शन में दुनिया में नम्बर दो पर है लेकिन यील्ड के मापदंड में फिर से हमारा नम्बर ३८वां है। यहां हमें पैसों, रिसर्च ऐंड डैवलपमैंट का इनडयूसमैंट करना है ताकि नए आधुनिक उपकरणों का उपयोग हमारे किसान कर सकें और लाभान्वित हो सकें। सरकार ने किसानों को जागरूक करने की कोशिश की है। उसमें बढ़ावा देने की जरूरत है। कार्यक्रम बनाने से, बजट पास करने से यह पैसा और उसका लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच सकता है। हम समझते हैं कि व्यवस्था में बदलाव लाना है। जब से मनमोहन सिंह जी और यूपीए की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी के मन और जहन में यह बात थी कि पूरे देश को यह संदेश देना है और वह संदेश यह है कि हमें किसानों, गरीब मजदूरों और ऐसे हर समाज के वर्ग को, जिसे सहायता की जरूरत है, उसमें यह सरकार आगे बढ़ेगी और पीछे नहीं हटेगी।

मान्यवर, बीमा क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है। आज की तारीख में सिर्फ ११ प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो फसल बीमा का लाभ उठा पाते हैं। सरकार ने बहुत मेहनत की है और ऐसे बहुत से कार्यक्रम शुरू किए हैं ताकि इसमें वृद्धि हो। मेरा एक सुझाव मंत्री जी से है। जब बाढ़ आती है या सूखा पड़ता है तो केन्द्र सरकार की तरफ से सहायता पहुंचती है और राज्य सरकार भी सहायता देती है। अगर लोकलाइज इनस्ट्रक्शन्सतहसील, ब्लॉक, पंचायत लैवल पर होती है तो उसमें बीमा का लाभ छोटा और गरीब किसान नहीं उठा सकता है[R61] ।

मेरे संसदीय क्षेत्र दौसा, राजस्थान में ओलावृष्टि हुई थी। वहां ९० गांव ऐसे थे जहां गेहूं कि फसल बिल्कुल तबाह हो गई थी, तहस-नहस हो गई थी। उनमें बहुत कम लोग थे, जो बीमा योजना का फायदा उठा सके। जो छोटे किसान हैं, जो जागरूक नहीं है, जिनके पास कम जमीन है, जो रिस्क लेने से घबराते हैं, जिन्हें बीमा की जानकारी नहीं है, मेरा अनुरोध है कि उनके लिए कुछ कदम उठाए जाएं। जिन किसानों ने आत्महत्या की है, उनकी तरफ, उनके परिवारों की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित है और सरकार ने उनकी मदद भी की है, लेकिन ऐसे बहुत से किसान हैं, जिन्होंने आत्महत्या नहीं की है लेकिन आत्महत्या की कगार पर हैं। वे हमारी द्ृष्टि में नहीं आते हैं क्योंकि वहां ऐसा हादसा नहीं हुआ है। उनकी तरफ भी विशेष ध्यान हमें देना चाहिए।

नेशनल सैम्पल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन ने कहा है कि इस देश में जितने भी किसानों के घर हैं, उनमें ४८ प्रतिशत ऐसे हैं, जिन्होंने कहीं न कहीं से ऋण लिया हुआ है और कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। जब किसान को पैसा चाहिए, तो क्षेत्रीय, लोकल सेठ-साहूकार ऋण तो देते हैं लेकिन इन्टरस्ट का प्रतिशत चालीस, पचास या साठ तक चार्ज करते हैं। इसे रोकने के लिए सरकार ने और वित्त मंत्री महोदय ने कदम उठाए हैं और सरकार के इंस्टीटयूशन्स को गांव-गांव तक पहुंचाने की चेष्टा की है, लेकिन देखने वाली बात यह है कि बैंकों के माध्यम से सिर्फ ३६ प्रतिशत लोग ऋण लेते हैं। आज भी इन्फार्मल सैटअप, जहां से सेठ-साहूकार लोगो को शोषित करते हैं, उसका हिस्सा बीस प्रतिशत है। हमें इस बीस प्रतिशत को घटाना होगा। पिछले सौ साल से इस देश में सहकारिता विभाग स्थापित है, जिसकी बहुत अच्छी पहुंच गांव-गांव तक है। यह गांव-गावं तक पहुंचा है। लेकिन को-ओपरेटिव इंस्टीटयूशन की पहुंच आज कम है, हमें इसे भी बढ़ाना चाहिए।…( व्यवधान) 

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया सहकारिता विभाग में ऋण…( व्यवधान) 

सभापति महोदय :  पहले इन्हें बोलने दीजिए फिर आप बोलिए।

…( व्यवधान)

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया मैं आपकी मदद कर रहा हूं। सहकारिता में जो ऋण मिलता है उसका ब्याज बहुत ज्यादा है…( व्यवधान) 

सभापति महोदय   आप इन्टरप्ट कर रहे हैं।

…( व्यवधान)

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया मैं इन्टरप्ट नहीं कर रहा हूं। इसमें ऋण बहुत ज्यादा है। इसे कम कराने में मदद करें।…( व्यवधान) 

श्री सचिन पायलट मैं आपकी बात से सहमत हूं। हमारा कहना है कि शहरी क्षेत्रों में जो लोग हैं, उन्होंने अगर गाड़ी या मकान लेना हो तो ऋण का ब्याज छ:, सात या आठ परसेंट है लेकिन गरीब किसान को बारह, तेरह या चौदह परसेंट ब्याज देना पड़ता है। सरकार इस बात को जानती है और इस बारे में जागरूक है। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि अगर कोई सरकार किसानों के ऋण को कम करेगी तो मौजूदा सरकार करेगी। मैं इतना आपको विश्वास के साथ कह सकता हूं।

जहां तक सिंचाई का प्रश्न है, हमारे देश की कृषि भूमि का सिर्फ चालीस प्रतिशत भाग ऐसा है जो सिचिंत है। इसमें वृद्धि करने की आवश्यकता है। जहां तक मैक्रो इरीगेशन प्रोजेक्ट्स और मीडियम साइज इरीगेशन प्रोजेक्ट्स की बात है, उनमें सरकार अपना योगदान देती है। माइक्रो प्रोजेक्ट्स में सरकार ज्यादा सहयोग नहीं कर पाती है। यहां अगर प्राइवेट सैक्टर या पब्लिक-प्राइवेट पार्टनशिप के माध्यम से माइक्रो इरीगेशन प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा दिया जाए तो यह बहुत लाभदायक सिद्ध होगा।

अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि सरकार को, संसद को और हम सबको मिलकर किसानों को मार्किट एक्सेस प्रदान करनी होगी। फ्रैश फ्रूट्स आदि नष्ट हो जाते हैं इसलिए आज कोल्ड चेन स्टोरेज की आवश्यकता है ताकि इन्हें नष्ट होने से रोकने में सहायता मिले। कोल्ड स्टोरेज की और ज्यादा सुविधा सरकार मुहैया कराएगी। मैं यह आशा सरकार से करता हूं कि जो मांगे वित्त मंत्री महोदय ने रखी हैं उनका समर्थन विपक्षी भाइयों को भी करना चाहिए। आपने मुझे बोलने का समय दिया इसके लिए मैं आपका बहुत धन्यवाद करता हूं।

*m03

SHRI BANSAGOPAL CHOUDHURY Sir, I may be permitted to speak from this seat.

            Sir, the hon. Finance Minister has placed the Supplementary Demands for Grants in this House. I believe that to run the Government, sometimes – and probably all the times – it is necessary to place Supplementary Demands for Grants. First of all, I want to support the Supplementary Demands for Grants which the hon. Finance Minister has placed here[reporter62] .

I want to make some observations in this august House while supporting the Supplementary Grants. Initially, we have to see the Budget of 2005-2006. What was the indication of this Budget, and what was placed in the House by the hon. Finance Minister? The Budget for 2005-2006 initiated measures to achieve the social and economic objectives set out in the National Common Minimum Programme including reduction in poverty, unemployment and sustained economic growth of 7-8 per cent per annum.

The direction or strategy of the Government remained focused on greater investment for agriculture, and infrastructure development. The Government is also keen to maintain a supportive environment policy for the industry and service sectors for overall growth of the economy.

First of all, we have to discuss the Mid-Term Appraisal of the 10th Plan. What is the situation in the country with regard to agriculture? First of all, we have to discuss this issue. Un-utilised capacity and large-scale involuntary unemployment co-exist in our economy. All of us in this House know that we have some unemployment problems in the agriculture sector. This is disguised unemployment, and in the face of low-levels of Government investment, the unemployment situation continues to remain grim. Why is this so?

What is the problem in the present scenario for the economy? I can tell the exact figures that have been placed in the Mid-Term Appraisal of the 10th Plan, that is, 3.64 crore unemployed are there in 2004-2005. It further states that only 47.6 per cent of the total 10th Plan outlay could be spent in a key sector like agriculture, which is the main sector of our economy. So far as our knowledge goes, we know that this is the most important and vital sector of our economy. What was happening in this important social sector in the first two years? I must say that the low growth rate in agriculture also reflects the dwindling domestic demand. Even food articles are demanded less in the domestic market supply. It is only because of lack of purchasing power of a large section of our population, which is due to widespread unemployment and poverty. If we see the Mid-Term Appraisal, only 47.6 per cent investment could be made for agriculture during the first three years of the 10th plan. I hope that the hon. Finance Minister will take care of this issue also. I must say, before supporting this Supplementary Budget, that this should be a key factor for the economy of our country.

Secondly, distribution of income has left a large section of the population with inadequate purchasing capacity. Why is this happening? I feel that this should be taken into account. This should be seen from the point of view to develop the Indian economy, from the point of our Budget, and from the point of view of the hon. Finance Minister’s demand for this Supplementary Grant.

What does the 55th round of the National Sample Survey say? It says that only 2.8 crore workforce — out of the total workforce of 39.7 crore — were in the organised sector, that is, only 7 per cent of the total workforce[ak63] .

17.00 [R64]  hrs.

            Out of the total workforce, only seven per cent workforce is in the organised sector.  Reduction of manpower in the public sector and in the organised sector is now in question.  How can we match the situation when our total workforce in the organised sector is only seven per cent. ?

 

            More than 55 per cent of our total workforce is still dependent on agriculture,  and more than 64 per cent of the total unorganised workforce also belongs to agriculture and mining.  Probably, you have heard in this august House that the security of the unorganised workforce is equally important.  This matter has been discussed.  A Bill has already been demanded in the House for taking proper action.  Proper action is necessary to provide security to the unorganised sector workforce. This issue was discussed in this august House in the last week, as far as I can remember.  This House has also expressed its desire to combat the extremist forces Discussion on the naxalite forces was held  and the hon. Minister for Home Affairs replied to the debate.  Without the development of the economy, without changing the economic scenario, how can we combat the naxalites forces and the separatist forces?  This is posing a serious threat to the country.  Without the improvement in theper capita income of the people of our country, without the development of the younger generations, and without the development of the unemployed youth, we cannot think of development of this country.  We cannot combat the separatist and naxalite forces. 

            I want to discuss another issue, which is very important. And that is the basic issue of investment in the important sectors, namely, the social sector – education and health.  The utilization  of the first two years of the Tenth Plan was only 31 per cent and 29.5 per cent.  We want mass literacy in the country.  In the villages, the question of literacy is existing.  I believe, the hon. Finance Minister is taking care of it.  He has brought this issue in the Budget, and has expressed his desire for the Sarva Shiksha Abhiyan.  He has also placed the demand in the Supplementary Budget to take care of all these problems.  So, I believe that the Government should be very much careful during this year to combat the problem of illiteracy and the problem in  social sector in the fields of education and health.

            Our main problem lies in the villages and in the rural areas, where the primary health care is needed.  Poor people in the villages are demanding primary health care.  In this regard, I want to mention the report which has been placed in the Mid-Year Review at Page 35 – the Government has given the status of implementation of Budget proposals.  The summary statement of some of the major Budget announcements and their implementation status till date is indicated. In the 10th item, it has been indicated that all the drinking water schemes have now been brought under the Rajiv Gandhi Drinking Water Mission.  I think, it is a good Mission. During 2005-06, the emphasis will be on covering more habitations and on tackling water quality in about 2.16 lakh habitations.  The outlay for the Mission is enhanced.  What is the implementation status?  Action Plan has been drawn up and necessary sources of finances are being tied up. Sir, from the State of West Bengal, my view is that there are so many villages that is within the Arsenic problem. The main problem of the village people in the West Bengal is the Arsenic problem.  This Arsenic problem has been brought to the notice of the Central Government[R65] .

          The Government of India should take care of this. It is not for my State only. I am not talking about my State only. I am not talking about the State of West Bengal only. It is true also for other States. It is also true for other States which have similar type of problem. That should be taken care of.

            I want to mention here about the question of infrastructure development. The Government is now talking about the industries. We are also very much concerned about it in our State of West Bengal. We are now developing many projects; new industries are coming up in our State. We know the situation. The Government is trying to give more impetus to the urban development projects under the National Urban Renewal Mission. These projects are being implemented. This should be taken into consideration for the infrastructure development of the State. Industries can be developed when the road infrastructure, the railway network, water supply projects and other networks can be completed. Such projects will help the industries.

There are some projects for the development of National Highway. The Government should take care of the pending projects of the National Highways. I have gone through the Supplementary Budget. The Surface Transport Department is taking care of the projects of the National Highways Authority of India. I shall request the hon. Finance Minister to complete the projects of the National Highways Authority of India in our State and also in other States. I believe, this is the question of the whole country. The National Highways Authority of India should be more careful to complete the projects within the time frame for which the project is being implemented.

            I want to mention here about another problem of the development of small-scale industries, which is very much important in our country. The question of marketing and the question of credit link are very much for the small-scale industry. This is the sector where more employment can be generated. This is the sector where so many unemployed youth can go in for earning their own income. This is very unfortunate on the part of our country that the guidelines of the Reserve Bank of India are not being followed by the commercial banks. Hon. Finance Minister has desired to link up these commercial banks for the purpose of loan. He is trying also for the linkage of SIDBI for the development of small-scale industries. But, what is happening at the grassroot level? The tiny sector is facing the problem. Those who are going to the commercial banks for the purpose of credit, those commercial banks are not following the guidelines of the Reserve Bank of India. There should be a minimum guidelines issued from the Finance Ministry to the commercial banks about giving some impetus to the unemployed youths, to help the tiny sector, to help the small-scale industries in the country. I believe, there should be a policy to eradicate the regional imbalance. Why should there be a regional imbalance? The hon. Prime Minister has stated in his speech that we should try to eradicate the regional imbalance to develop our country. In fact, in some States, we have been facing that problem for the last 30 to 40 years.

            Some days back, I was hearing about the problem of the Tamil Nadu people. They were trying to raise the issue about the natural calamity. They are very much worried about the natural calamity that has hit Tamil Nadu. We all, from this august House, are also very much worried about it[p66] .

            One thing I have to mention here in the presence of the hon. Finance Minister. For the last 30-40 years, in the coal mining area of our State, particularly in my Constituency, lakhs of people who are living in the villages, are not getting proper attention to combat the problem of subsidence; they are under threat.

            Coal is the major national mineral of our country. It is giving more revenues and it helps in the total economy. Coal helps in the development of the economy. But in lieu of that, what are those people getting? They are under the threat of subsidence for so many years. So, my humble submission to the hon. Finance Minister is that there should be a provision to combat the problem of subsidence and earthquake in those areas. There should be some provision in the Budget – in the Budget of the Coal Department – which will mention that it is for combating the problem of subsidence.

I would request the Finance Minister to please look into the matter. This is a national issue. I believe that he will give some impetus to combat this problem and that the poor villagers who are giving their land for coal mining will be provided some money. I believe that he will open this chapter which is not being taken care of.

            Lastly, I want to mention one thing for the whole country; expeditious development work is needed. I believe that after the passage of the Supplementary Demands for Grants in this House, speedy development in the economy will take place in our country.

            With these words, I conclude my speech.  

                                                                                                               

MR. CHAIRMAN You have made a very good maiden speech!

 

श्री सीताराम सिंह सभापति महोदय, मैं अनुदानों की अनुपूरक मांगों के समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं किसान और खेती से अपनी बात शुरू कर रहा हूं। कई माननीय सदस्यों ने अपने-अपने सुझाव दिए हैं। किसान इस देश की रीढ़ है। किसानों के लिए बजट में जो व्यवस्था है, मैं समझता हूं कि वह काफी नहीं है। किसानों के बारे में मैं कहना चाहता हूं कि जो किसानों की आबादी है और उनकी जो हालत है और तब जबकि संसद में सबसे अधिक संख्या किसानों की है, मगर उनके सवालों पर, उनकी समस्याओं पर हम बहस करते हैं, इसके बावजूद उनकी भलाई और उनकी हालत को सुधारने के लिए बहुत अच्छा काम नहीं कर पा रहे हैं। यूपीए की सरकार ने कई ऐसे काम किए हैं जो सराहनीय हैं। माननीय वित्त मंत्री जी ने जो व्यवस्था की है, वह बहुत अच्छी है। फिर भी मैं किसानों के लिए एक बात कहना चाहता हूं। किसान जिस लागत पर, जिस खर्चे पर अपनी फसल या अनाज का उत्पादन कर रहे हैं, उस फसल का सपोर्टिंग प्राइस उन्हें नहीं मिलता है। फसलों का मूल्य कम मिलता है और दुर्भाग्य यह है कि अनाज पैदा किसान करता है और उस अनाज की कीमत सरकार और बाजार में बैठे पूंजीपति तय करते हैं[i67] ।

  सभापति जी, आज इस देश की हालत यह है कि यहां एक छोटा सा दुकानदार भी, एक पान बेचने वाला दुकानदार भी, अपने १० लोगों की मीटिंग कर के, एक बैठक कर के, अपने पान के दाम बढ़ा लेता है और वही रेट बाजार में लागू हो जाता है। मगर आज किसान की हालत इस देश में यह है कि वह ऐसा नहीं कर सकता। किसान आज न केवल देश का भरण-पोषण कर रहा है, बल्कि इतना अनाज पैदा कर रहा है जो बाहर भी भेजा जा रहा है, लेकिन उसके अनाज की कीमत किसान के सहयोग और उसकी राय से तय नहीं होती। सरकार और बाजार में बैठे बड़े व्यापारी तय कर देते हैं। मैं कहना चाहता हूं कि सरकार को इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए और अपनी कृषि नीति को किसान के हित की नीति बनाना चाहिए जिससे उसकी हालत सुधर सके और इस हेतु बजट में किसान के हित के लिए बेहतर व्यवस्था करनी चाहिए।

सभापति जी, यह ठीक है कि सरकार की, किसान को खाद पर सबसिडी और कम कीमत पर खाद व बीज देने की नीति है, लेकिन आप गांव में जाकर देखिए। जब किसान खाद खरीदता है, उससे साफ मालूम हो जाएगा कि उसे एक पैसे की भी सब्सिडी सरकार की ओर से नहीं दी जाती है। सरकार द्वारा किसान को जो राहत देने का फैसला है, उसके अनुसार उसे कोई राहत नहीं मिल रही है। सब्सिडी का जितना भी फायदा है, वह बड़ी-बड़ी खाद फैक्टि्रयों को मिल रहा है। सरकार की अनुदान की नीति का कोई फायदा किसान को नहीं मिल रहा है। इसलिए मेरा सरकार से निवेदन है कि वह इस बारे में साफ करे और यदि वह किसानों को अनुदान सहायता देना चाहती है, तो किसान को सीधे वह सहायता दे, व्हाया नहीं। किसी के माध्यम से नहीं बल्कि किसान को सब्सिडी का लाभ सीधे मिलना चाहिए। मैं सरकार से और माननीय वित्त मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि इस पर स्पष्ट निर्णय होना चाहिए।

महोदय, आज किसानों को सही खाद और बीज नहीं मिल रहा है। सरकार गांवों में विद्युत पहुंचाने के लिए बेचैन है, लेकिन किसान बहुत परेशान है। उसे बिलकुल विद्युत नहीं मिल रही है। किसान को अपनी सिंचाई के लिए किसी प्रदेश में एक घंटे बिजली मिल रही है, किसी प्रदेश में आधे घंटे बिजली मिल रही है और किसी-किसी प्रदेश में तो उसे बिलकुल बिजली नहीं मिलती है। यदि किसान डीजल पम्प सैट लगाकर सिंचाई करता है, तो आपको मालूम है कि डीजल के रेट बहुत ज्यादा हैं और पम्प सैट का खर्चा भी ज्यादा है। इतना खर्चा छोटा और मीडियम किसान तो बिलकुल नहीं उठा पाता है। यदि कोई किसान हिम्मत कर के डीजल पम्प सैट चलाकर सिंचाई कर के, खेती कर ले, अनाज या सब्जी पैदा कर भी ले, तो उसे बाजार में उसकी मुनासिब कीमत नहीं मिलती और उसे अपनी उपज औने-पौने दाम में बेचनी पड़ती है।

महोदय, किसान को सहायता देने और उसकी खुशहाली के लिए सदन में, हमेशा चर्चा होती है, लेकिन इससे किसान को कोई फायदा नहीं होता। किसान की फसल बर्बाद होती है, लेकिन उसे कुछ नहीं मिलता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारी आपदा हो जाती है, तूफान आ जाता है, बाढ़ आ जाती है, बर्सात हो जाती है, ओले गिर जाते हैं, तो जिनका नुकसान होता है, उन्हें मुआवजा मिलता है, लेकिन सिर्फ किसान ही ऐसा है, जिसे कोई मुआवजा नहीं मिलता। मैं कहता हूं कि आप किसान को उसकी फसल प्राकृतिक आपदा से बर्बाद होने पर मुआवजा नहीं देना चाहते हैं, तो मत दीजिए, लेकिन इतना ऋण तो दीजिए जिससे वह आगे अपनी फसल बो सके।

महोदय, मैं माननीय वित्त मंत्री जी का ध्यान किसान को ऋण उपलब्ध कराने की ओर दिलाना चाहूंगा। देश के बाकी प्रदेशों में क्या स्थिति है, वह तो मुझे मालूम नहीं, लेकिन बिहार में जो सिस्टम है, जिसे मैंने अपनी आंखों से देखा है, उसे मैं बताता हूं। बिहार में उद्योगपति को, दुकानदार को और बाकी सब लोगों को ऋण मिल जाता है, लेकिन सिर्फ किसान ही एक ऐसा है, जिसे ऋण नहीं मिलता। बाकी लोगों से ऋण वसूली के लिए कोई कड़ाई भी नहीं की जाती है, लेकिन किसानों से वसूली करने के लिए बहुत कड़ाई बरती जाती है। उद्योगपतियों को करोड़ों रुपए ऋण देने के बाद भी जेल में बन्द नहीं किया जाता, लेकिन यदि किसान ने ५००० रुपए का ऋण ले लिया और समय पर नहीं दिया, तो उसे जेल में बन्द कर दिया जाता है और जेल में उसके रहने का खर्च भी उसी से लिया जाता है। इसे देखते हुए मैं कहना चाहता हूं कि आपकी क्या नीति है, आप किसान को किस प्रकार से सहायता पहुंचाना चाहते हैं, उसे स्पष्ट कीजिए ?

महोदय, जहां तक नैशनलाइज्ड बैंकों से किसानों को बैंक ऋण देने की बात है, मैं बताना चाहता हूं कि व्यावसायिक बैंकों से बिहार में किसानों को ऋण नहीं मिलता है। सहकारी बैंक और ग्रामीण बैंक किसानों को ऋण देने के नाम पर उनके साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उसे ऋण देने के नाम पर उसका शोषण किया जा रहा है। वह सीधे कंट्रोल करते हैं, किसान की कोई सुनवाई नहीं होती है और कुल मिलाकर कहा जाए, तो बिहार में किसानों को किसी भी प्रकार बैंकों से ऋण नहीं मिल पाता है। आपने सहकारिता के माध्यम से किसानों की सहायता करने का प्रयास किया। आपने पूरे देश में किसानों के क्रैडिट कार्ड बनाए। बिहार में भी कार्ड बने, लेकिन किसान को बिहार में बैंकों से क्रैडिट नहीं मिल रहा है। मैं दूसरे राज्यों के बारे में तो नहीं जानता, लेकिन बिहार में जिस प्रकार से सहकारी बैंक चल रहे हैं, वे न चलने के बराबर हैं। गरीब किसानों को वे एक पैसा भी नहीं दे रहे हैं। गांवों में गोदाम बनाने की एक डिमांड आपने इन अनुदान की पूरक मांगों में रखी है, यह फैसला अच्छा है। आप गोदाम बना भी रहे हैं[rpm68] ।

हम जानना चाहते हैं कि आपकी व्यवस्था क्या है, आप उस गोदाम में कौन सी चीज रखेंगे और किस सिस्टम के तहत रखेंगे। वह गोदाम बन कर ऐसे ही पड़ा है, उसमें कुछ नहीं रखा जाता है। उसका ताला बंद है, गांव के एक आदमी के हाथ में उसकी चाबी है और वह वहां रह रहा है, उस गोदाम से कोई मतलब नहीं। आपने काम सही किया है, लेकिन उसे सिस्टम में लाइए, उसका रख-रखाव ठीक करिए ताकि किसानों को उस गोदाम से लाभ मिले। आपने जिस मंशा से काम किया है, उस काम को आप करिए।

महोदय, ग्रामीण सड़क के बारे में मैं कहना चाहता हूं, उस पर रोज बहस हो रही है। आपने व्यवस्था की है और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क पथ की चर्चा हुई। आप चाहते हैं कि गांवों में पंचायत के माध्यम से बेहतर रोड बनाएं। आपकी सारी बातें ठीक हैं, मगर हम आपसे जानना चाहते हैं कि आप किस सिस्टम के तहत करना चाहते हैं। आपकी समय-सीमा का कोई महत्व नहीं है, आप जिस पथ को एक साल के अंदर बनाना चाहते हैं, वह तीन वर्ष में भी नहीं बना। अगर पूछो तो कहते हैं कि वहां सर्वे हो रहा है, डीपीआर बन रहा है, इसमें रुपया कम मिला है, यह सिस्टम बिलकुल गलत है। आप जिस बारे में सोच रहे हैं, जिसकी व्यवस्था आप कर रहे हैं, जिसके लिए पैसे इकट्टे कर रहे हैं, जिस पैसे को आप बजट में पास कर रहे हैं, उसे समय-सीमा में सरज़मीन पर नहीं ले जा रहे हैं, तो यहां बैठ कर सारे फैसले करने बेकार हैं। जिसका लाभ आम जनता को नहीं मिल रहा है। मैं आपको इस पर सिर्फ इतना सुझाव देना चाहता हूं कि जो भी पैसे आप दे रहे हैं, आप एक लोकसभा क्षेत्र में एक किलोमीटर ही बनाइए, लेकिन समय-सीमा के अंदर फैसला लेकर बनाइए और उसे चालू कराइए ताकि जनता को उसका लाभ मिल सके। आप गांव में पंचायतों के द्वारा पैसा दे रहे हैं, खर्चा करवा रहे हैं, उसे कौन देख रहा है? स्टेट वाइस गवर्नमेंट को आपने अधिकार दिया है, लेकिन कुछ नहीं है, उसका कोई कंट्रोल नहीं है, पंचायत का प्रधान जो चाहता है, गलत या सही पास करके, उल्टा-पुलटा करके, वह जिस रूप में चाहता है वैसे खर्च कर रहा है। आप गांव में जाकर देखें, जो पैसा सरकार का है और जनता के लिए है उसका वहां बहुत अच्छा उपयोग नहीं हो रहा है। हम सुझाव देना चाहते हैं कि आप पैसा लीजिए और उस पैसे को खर्च कराइए, उसके रख-रखाव के लिए भारत सरकार का रुपया है। आप अपनी भी एक एजेंसी और सिस्टम में, आपके जो अधिकारी एवं पदाधिकारी हैं, उनसे भी आप देखभाल कराइए, कंट्रोल कराइए, उसकी निगरानी कराइए। उससे आप रिपोर्ट, प्रतिवेदन मंगाइए ताकि सही ढंग से गरीबों का, गांव पर खर्च होने वाला पैसा गांव तक पहुंच जाए। इसकी आप व्यवस्था कराएं।

महोदय, एनएच के मामले में मेरा बोलना मुनासिब है। मैं बिहार के बारे में कहना चाहता हूं, आप वहां जाकर देखें, वहां जितनी एनएच की सड़कें हैं, वे अच्छी नहीं हैं। वहां जो सड़क टूट गई है, उसके लिए क्या व्यवस्था है, बनी हुई सड़क टूट गई, उसका रिपेयर हो रहा है, लेकिन दो साल से वहां कुछ नहीं हो रहा है। मैं बताना चाहता हूं कि हमारे लोकसभा क्षेत्र में एनएच-१०४ बना, २२ किलोमीटर का टैंडर हुआ और वह तीन वर्ष से बन रहा है, लेकिन अभी तक उसमें मुश्किल से १६ किलोमीटर बन पाया और बाकी नहीं बना। उसके आगे जो एऩएच है, वहां २६ किलोमीटर से लेकर ३५ किलोमीटर तक बिलकुल कच्ची है, चलने लायक नहीं है। सरकार की द्ृष्टि उस तरफ नहीं जाती है। हमारे बिहार का मुजफ्फरपुर शहर कितना महत्वपूर्ण है, सीतामढ़ी तक एनएच-७७ जाती है, लेकिन वह वर्षों तक टूटी हुई है। वहां स्वयं सरफेस ट्रांसपोर्ट के मनिस्टर साहब गए थे, वे वहां देख कर आए हैं। डेढ़ साल हो चुका है, मगर आज तक वह रास्ता चालू नहीं हुआ है। वह रास्ता चार-चार महीने तक बंद हो जाता है, सड़क चलने लायक नहीं रहती।…( व्यवधान) 

सभापति महोदय   आपकी पार्टी का निर्धारित समय खत्म हो चुका है।

श्री सीताराम सिंह सभापति महोदय, मैं कम समय में कंक्लुड कर दूंगा। मैं यह कहना चाहता हूं कि एनएच के मामले में सरकार की द्ृष्टि ठीक दिखाई नहीं पड़ती। मेरा आग्रह है कि आपने जितने एनएच बनाए हैं या बनाने वाले हैं, उन्हें आप पहले ठीक से बनाइए, नये मत लीजिए। आपने जो काम हाथ में लिए हुए हैं, उन्हें आप दुरुस्त रखिए, चलने लायक बनाइए। आपने जो काम पहले अपने हाथ में लिए हुए हैं, उन्हें आप पहले पूरा करिए, यह मेरा सुझाव है[R69] ।

हमारे बिहार का उत्तर का पूरा इलाका बाढ़ से प्रभावित इलाका है। जितनी संरचनाएं हैं, जितनी परिसम्पत्तियां बनती हैं, प्रतिवर्ष बाढ़ से टूट जाती हैं। मैं समझता हूं कि आजादी के बाद से आज तक यही हाल है। कितनी ही सरकारें आईं और गईं, लेकिन बाढ़ से मुक्ति के लिए स्थाई निदान नहीं निकला। कई बार इस सदन में चर्चा की गई, बिहार के तमाम मंत्री सहित सभी सदस्य लोगों ने जाकर माननीय वित्त मंत्री जी से आग्रह किया। कुछ प्रयास जरूर हुआ है, लेकिन हमारा यह कहना है कि जब राज्यों की सम्पत्ति प्रतिवर्ष खत्म हो रही है, बर्बाद हो रही है तो क्यों बाढ़ के स्थाई निदान के लिए, बाढ़ को रोकने के लिए स्थाई निदान निकालने के लिए भारत सरकार इसमें ठोस कदम नहीं उठा रही है? भारत सरकार नेपाल से बात करके इस दिशा में कदम उठाये तो मैं समझता हूं कि बिहार के बंटवारे के बाद जब बिहार बंटा तो झारखण्ड अलग हो गया, अब बिहार के पास पूंजी सिर्फ खेती है, कुछ बचा हुआ ही नहीं है। हमारी आधी खेती हर वर्ष बाढ़ में चली जाती है और हमारी आधी खेती सूखे से सूख जाती है। एक तरफ बाढ़ की परेशानी है, मैं उसका स्थाई निदान चाहता हूं। दूसरी तरफ हमारी स्थिति यह है कि हमारा आधा बिहार सूखा रह जाता है। सिंचाई की सुविधा राज्यों के जिम्मे है तो बिना भारत सरकार के संसाधन दिये वह काम पूरा नहीं हो सकता है। मैं उस दिशा में आग्रह करना चाहता हूं कि विशेष पैकेज की बात लगातार चली, जिस दिन बिहार बंटा, हम सभी लोगों ने सर्वसम्मति से बिहार विधान सभा से प्रस्ताव भेजा था और पार्लियामेंट में उस समय के प्रधानमंत्री जी ने इस बात को कहा था कि इनको विशेष पैकेज दिया जायेगा, लेकिन एक पैसा नहीं मिला। आज हमारी यू.पी.ए. की सरकार जरूर बनी है, थोड़ा सा पैसा मिला है, पैकेज तो मैं उसे नहीं मानता, लेकिन थोड़ा बहुत जो मिल रहा है, अब उससे काम नहीं चल रहा है। मैं आपसे आग्रह करूंगा कि बाढ़ और सूखे से निदान के लिए विशेष पैकेज बिहार को मिलना चाहिए। आगे सिंचाई की व्यवस्था में सरकार का सहयोग होना चाहिए।

बिजली के सवाल पर मैं एक लाइन बोलना चाहता हूं। बिहार में बिजली की भी परेशानी है। देश के स्तर पर मैं कहना चाहता हूं कि बिजली गांवों को देनी है, बिजली सारी जगहों पर जानी है, सरकार का यह प्रपोजल है कि लाखों गांवों को बिजली से जोड़ना है। इस साल दस हजार गांवों को जोड़ना है। इसमें मेरा यह साफ कहना है कि आप बिजली पैदा करिये, तब गांवों को और देहातों को बिजली से जोड़िये। मेरा साफ कहना है कि प्रपोजल पहले बिजली पैदा करने का होना चाहिए, फिर गांवों को जोड़ने का होना चाहिए। …( व्यवधान) 

मैं एक मिनट में समाप्त करता हूं। मैं साफ कहना चाहता हूं कि पहले सरकार के नियम थे, कुछ कायदे थे, कुछ प्रावीजंस थे कि सभी स्टेट्स में स्वास्थ्य के लिए कुछ पैसा जाता था। पिछले कई वर्षों से वह बन्द हो गया, अब न तो रैफरल हॉस्पिटल के लिए पैसा भारत सरकार दे रही है और न प्राइमरी हैल्थ सैण्टर्स के लिए भारत सरकार से कोई मदद मिल रही है। राज्यों के पास उतने संसाधन नहीं हैं, कुछ स्टेट्स के पास हो सकते हैं, लेकिन बिहार जैसे राज्यों के पास तो नहीं हैं। मेरा आग्रह है कि बजट से इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। माननीय वित्त मंत्री जी से मेरा आग्रह है कि आप बिहार में स्वास्थ्य के सुधार के लिए प्राइमरी स्तर पर हैल्थ सैण्टर्स बनाने के लिए और रैफरल हॉस्पीटल बनाने के लिए भारत सरकार को विचार करना चाहिए। इसके लिए विशेष पैकेज बिहार को देना चाहिए।

SHRI SURESH PRABHAKAR PRABHU Sir, two months from now, we will be considering the Budget for the full year when we will be again looking at the financial situation of the country.  The Fiscal Responsibility Act which was passed by the Parliament obliges the Finance Minister to place before the House, I think once a quarter, the fiscal situation as it exists at the end of that quarter.  He is supposed to report to the House as to how the finances are faring as against what was projected in the Budget and whether the fiscal deficit as projected is going to remain at a level at which it was projected or it is going to be more or less than that.  He should also report the position of the public debt of the Government.  I think, alongwith the Supplementary Demands for Grants, it is really necessary that we should also discuss all these issues.

MR. CHAIRMAN Shri Prabhu, you may continue later. We are now going to take up Half-an-hour discussion.

SHRI KHARABELA SWAIN Sir, are we going to take up this debate again today or this is the end of it[bru70] ?

           Sir, after Half-an-Hour discussion, will you take up ‘Zero Hour’ or the debate will continue?

MR. CHAIRMAN  No 'Zero Hour'.  After Half-an-Hour discussion, the debate on Supplementary Demands for Grants (General) will continue.      -----------        
    
 

   

   

MR. CHAIRMAN: Now, we are again taking Discussion and Voting on Supplementary Demands for Grants (General). The discussion is to be completed today and the reply of the hon. Minister will be tomorrow.  

            Shri Suresh Prabhu was on his legs.  

… (Interruptions)  

श्री अविनाश राय खन्ना (होशियारपुर) हम सुबह से ज़ीरो आवर के लिए बैठे हैं।…( व्यवधान)    

MR. CHAIRMAN: We will take it after this discussion is over.  

… (Interruptions)  

श्री अविनाश राय खन्ना स्पीकर साहब ने छ: बजे ज़ीरो आवर लेने की बात कही थी। …( व्यवधान)    

MR. CHAIRMAN We are continuing discussion on the Demands for Grants (General). 

… (Interruptions)  

श्री अविनाश राय खन्ना : हम तो सुबह से बैठे हैं ज़ीरो आवर के लिए। पहले बता देते तो हम चले जाते। …( व्यवधान)   

SHRI N.N. KRISHNADAS (PALGHAT): Sir, what about 'Zero Hour'? … (Interruptions) 

MR. CHAIRMAN If you want, you can raise it after this discussion is over.   

   
 

 

SHRI SURESH PRABHAKAR PRABHU Sir, as I was saying, these Supplementary Demands for Grants should be considered along with the statement that the Finance Minister has made to the Parliament on the implementation of the Fiscal Responsibility Act because under the Fiscal Responsibility Act, the Government is obliged to reduce the revenue deficit to zero in a stipulated period of time. So, when we are considering Supplementary Demands for Grants and additional expenditure is going to be voted, I would like to know how it is going to affect the revenue deficit of the Government, which is supposed to be controlled under the Act which was passed by this very Parliament.

            In fact, the first thing he did when he was presenting the maiden Budget of this Government was that he notified the implementation of the Fiscal Responsibility Act. So, I would like to know the impact these Supplementary Demands for Grants will have on the overall fiscal deficit as well as revenue deficit[reporter71] .

            Sir, the quality of expenditure is extremely important. Normally, we keep voting for additional expenditure in this Parliament. It is always incremental expenditure, which is voted along with total expenditure, and the sanction for it is given in the last Session of Parliament itself.

I would request the hon. Finance Minister and the Government to come before the Parliament and tell whether there is a possibility of saving any expenditure for the schemes that are on for several years together. Either the previous Government had started it or the Government before it had started it. Such schemes are going on, and every time there is a temptation for the Government to start a new scheme. Therefore, the old schemes continue, and the new schemes also continue, which result in growing expenditure. Is there a possibility of the Government making a statement about the quality of expenditure that is incurred by the Government?  This would really help us to know more about this issue.

The Finance Minister had made a very interesting statement that he is interested in outcome rather than outlays. Who is going to estimate the outcome of the outlays that we are going to vote upon? Therefore, he should come out with a White Paper on this too. He has also come out with a White Paper on subsidy once upon a time. I think there is a need for a White Paper on how the outcome and the outlay are really going to work. Perhaps, you could take the Parliament into confidence, and this would really allow us to know how it is really going to perform.

            The growth rate in the last quarter was about 8 per cent. We are happy that the Indian economy has now entered a new trajectory of growth. We are probably growing at 8 per cent, but we should really target to grow at 10 per cent. The factor that is not going to allow us to grow from 8 per cent to 10 per cent is our poor State of infrastructure. As regards infrastructure, we are really not performing as well as we should be performing. In fact, people come to India despite availability of infrastructure. Now, imagine the amount of growth we could achieve if we had infrastructure in place.

            In my opinion, there are a few areas in infrastructure on which the Government should really focus. Firstly, there is the issue of policy. I think there are some grey areas about policy. The policy is not very clear and stable. I am saying this because when the new Government came to power, it said that they wanted to review the Electricity Act. As a result of this, there were so many investors who were taken off-guard. Otherwise, they would have invested there, but now they were thinking whether they should really make investments or not. Therefore, policy is an extremely important factor in it.

            The second point that I would like to mention is regulation. In fact, the hon. Prime Minister in one of his first public statements as the Prime Minister of India had said that : “Infrastructure is very critical, and in that the regulation is very critical.” Therefore, he had said that : “He is nominating the Planning Commission to do the job.” I really do not know what has happened after it. What type of work did the Planning Commission do? What type of new statement have they made? I am sure that the Finance Minister would like to enlighten us about the progress that has been made on regulation in infrastructure, which has been correctly identified as a weak area in implementation.

            Thirdly, I would like to talk about implementation of projects. We see that there is a huge cost and time overrun in all the projects that are implemented. There is a Standing Committee to fix responsibility under the Chairmanship of the Cabinet Secretary. But so far they have not been able to fix any responsibility to decide on the reasons for overruns that are taking place. We should either abolish this Committee or come out with a new structure wherein implementation of infrastructure projects take place in a stipulated timeframe without any cost overruns. I think this is a very weak area. I am mentioning this because it will have an impact on our State Public Financing.

            Financing of infrastructure is another very interesting area. The Deputy-Chairman of the Planning Commission had come out with a note saying that : “A part of the FOREX reserves of India should be utilised by creating a special purpose vehicle to finance it.” I would like to know about the implementation of this idea too from the hon. Finance Minister. I am asking this because this idea was, in theory, opposed by some of the economists. I would rather support such an idea to find out whether infrastructure can be financed from such an idea. I want to know from the hon. Finance Minister whether any new developments have taken place in this aspect also.

            Another area that is very critical to infrastructure project implementation is Public-Private Partnership. There is no policy in place for Public-Private Partnership in sectors like power, ports, airports, telecommunications, etc. How is it going to work? How is the model going to work? We would really like to know about this also from the hon. Finance Minister.

            Lastly, I would like to talk about the quality of infrastructure itself. It is not enough to assure supply of a particular service because the quality of service is also very critical. For example, electricity comes to the house of people, but quality of electricity is more important than just getting electricity. Therefore, in my opinion, quality of service is very important[ak72] .

            There is an important point which the Prime Minister had also raised in his first days as the Prime Minister and that is reform of bureaucracy. It is extremely important because any expenditure that we are now going to vote in is finally going to be spent on ideas that are going to be implemented through the same bureaucracy which the Prime Minister wanted to reform. What are the changes that are really taking place on that count? I would certainly like to know about that from the hon. Finance Minister.

            One of the schemes that are mentioned in the Supplementary Demands for Grants is called the Rural Employment Guarantee Programme. It is a laudable programme. We are now voting Rs.300 crore for that. However, it is not mentioned  on how many Districts this money of Rs.300 crore is going to be spent. How many Districts are going to have this scheme? How many man-days are going to be created in that? While supporting the passage of this Bill, some Members expressed a view that the final expenditure that would be incurred on this programme should result in the creation of concrete tangible assets. The Minister then assured us that he would take all steps that were necessary before implementing this programme.

During the days of former Prime Minister Rajiv Gandhi, it was stated that only 22 paise is finally spent out of one rupee that goes out from here. I do not know how many paise are really going to be spent now. We are voting in Rs.300 crore now. Unless we take precautionary measures, unless we take all the steps that are required to be taken, the Finance Minister’s desire that the outcome of this outlay of Rs.300 crore should be matching, will not come true. I would like to know how this particular amount of Rs.300 is going to be spent.

We recently passed another Bill, the Right to Information Bill, in Parliament. I was curious to see that in the Supplementary Demands for Grants under the head of Ministry of Information and Broadcasting no extra provision is made for implementing that. I am happy about it. If the Government can implement the idea without incurring any additional expenditure, it is a very good thing. However, while passing that Bill we had already stipulated a financial implication and said that such and such money would be required. I would like to know from the Minister whether he is really confident that that law would be implemented without incurring any additional expenditure.

A similar scheme for water was launched. It was said that about a million water bodies would be revitalised under that scheme. There are small water bodies which you need to revitalise because they will then become the storages from which water can be used for irrigation, drinking and other purposes. I would like know as to how many of these one million wells which were going to be revitalised have already been revitalised, and how much money has been spent on that task. That will also help us in determining the quality of expenditure that we really need to incur.

Another important point is, the Central Government has now a limited role to play in bringing about reforms in the entire country. There are many States which are refusing to move ahead as is required. Unless they also go hand in hand with the programmes of the Central Government, the real results of the change will not be seen by the common men and by the poor people who are really suffering because of lack of such an exercise. I would like to know as to what are the steps the Government is contemplating to make sure that all the States move in the manner in which the Central Government is thinking.

There is the National Development Council which approves the Five-Year Plans. After approving the Five-Year Plan, there is a Standing Committee of Chief Minister which actually goes through the implementation of that. Therefore, the States are onboard while Five-Year Plan is already approved. Unless we actually take them onboard, it would really not happen. Therefore, I would really be interested to know about it from the Minister.

In India, the number of people living below the poverty line may be something like 23 per cent. That definition is arrived at on the basis of those who earn less than a dollar a day. If you take those who earn less than two dollars a day to be below the poverty line, probably the number of such people could be as high as 50 per cent.

 

18.34 hrs.                              (Mr. Deputy Speaker in the Chair)

 

            So, there is a large number of people who need to be uplifted from poverty. For this, structural changes are required. Without addressing that if we tinker with changes here and there, it is not going to help.

            Therefore, while I support the Supplementary Demands for Grants, I would like to be assured that the Government will make sure that expenditure would be incurred on the lines of what the Finance Minister has been rightly saying, that the outlays and the outcomes should match. I would request the hon. Finance Minister to enlighten us on all those points that I raised.

           

[KMR73] 

 

श्री मित्रसेन यादव माननीय सभापति महोदय, सदन में अनुपूरक बजट पर आपने मुझे बोलने का समय दिया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं। मंत्री जी ने अनुपूरक बजट प्रस्तुत किया है,

MR. DEPUTY-SPEAKER: Discussion is on Demands for Supplementary Grants.The matter pertaining to Ordinance should be deleted.

श्री मित्रसेन यादव महोदय, अनुपूरक बजट के जरिए हमारे देश के संसाधनों को कैसे विकसित किया जाए, कैसे ढांचे को खड़ा किया जाए और अपने देश की आमदनी को कैसे बढ़ाया जाए। इन तमाम सवालों को लेकर ये डिमांड्स यहां की गई हैं। …( व्यवधान) 

उपाध्यक्ष महोदय, दरअसल वित्तीय अनुशासन और वित्तीय प्रबंधन जितना अच्छा होता है, उससे हमारे देश की योजनाओं के क्रियान्वयन में आसानी होती है और जनता पर बोझ भी नहीं बढ़ता है। हमारे देश में लगातार यह देखने में आता है कि हमारी जो योजनाएं बंद हैं, उनका समय से पूरा न होने के कारण, चाहे वह सड़क, बिजली या दूसरे संसाधनों की हो, उनका अनावश्यक बजट बढ़ जाता है। जिन राज्यों में वित्तीय घाटे हैं, उन पर किसी प्रकार का अनुशासन लागू नहीं होता है। राज्य अपने घाटे को केन्द्र सरकार पर डालते रहते हैं और केन्द्र सरकार को मजबूरन उस घाटे को पूरा करने के लिए वित्तीय सुविधाएं जुटानी पड़ती हैं। हमारे देश की कुल मिलाकर आठ प्रतिशत आमदनी हुई है। हमारा मुख्य आमदनी का रुाोत खेती है, जिससे मात्र दो प्रतिशत की ही आमदनी होती है, बाकी उद्योगों और वभिन्न क्षेत्रों से होती है। हमारे देश की गाड़ी के दो पहियों की तरह उद्योग और कृषि का संबंध है। अगर देश में आर्थिक विकास को बढ़ाना है तो इन दोनों के संतुलन को बनाए रखना पड़ेगा और जो प्राकृतिक संपदाएं हैं, उनके जरिए देश में जो आर्थिक रुाोत पैदा होते हैं, उन्हें भी हमें बहुत कुछ संतुलित करना पड़ेगा। हमें देखने में आता है कि पानी देश की बुनियादी आवश्यकता है, लेकिन पूरे देश में पानी का स्तर घटता जा रहा है। वर्षा के पानी को रोकने और उसके जरिए पानी के स्तर को उठाने के लिए देश के पास कोई योजना नहीं है। नतीजा यह हो रहा है कि पानी पर हमारा खर्च बढ़ता जाता है – चाहे कृषि क्षेत्र हो या दूसरे क्षेत्र हों। इसलिए बहुत से बुनियादी सवाल हैं, जिनके जरिए देश के दूसरे उत्पादनों और आमदनी के साधनों पर प्रभाव पड़ता है, जिनकी हम अनदेखी करते हैं। आदमी के शरीर में जैसे खून की आवश्यकता है, वैसे ही किसी देश के विकास के लिए बिजली की आवश्यकता है। बिजली का उत्पादन आवश्यकता के अनुसार न होने पर हमारे तमाम उत्पादनों पर उसका असर पड़ता है – चाहे वह औद्योगिक उत्पादन हो, कृषि उत्पादन

हो या अन्य किसी प्रकार के विकास के कार्य हों। बिजली के उत्पादन पर ध्यान न देने के कारण हमारे तमाम उत्पादन के रुाोतों पर असर पड़ता है, जिसके कारण आमदनी में ह्रस और वित्तीय घाटा हमारे देश के ऊपर आता है। माननीय मंत्री जी विद्वान और वित्तीय व्यवस्था के बहुत जानकार हैं। आज नहीं, पिछली कई सरकारों में आप वित्त मंत्री रह चुके हैं और आपने हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था की अच्छी जानकारी रखते हुए बहुत सी उपलब्धियां प्राप्त की हैं[R74]  ।लेकिन इतने बड़े देश में जिस प्रकार की अर्थव्यवस्था के जरिये हिन्दुस्तान को तरक्की के रास्ते पर ले जाना है, उसमें हमें बहुत सी चीजें अपने नियम और कानूनों के तहत प्रतिबन्धित करनी पड़ेंगी।

एक तो बेकारी बहुत तेजी से बढ़ रही है और इस बेकारी के समाधान के लिए अगर सरकार ने कोई वित्तीय व्यवस्था नहीं की तो देश के अन्दर बहुत से हाथ खाली हो जाएंगे, जिनके जरिये देश का बहुत बड़ा काम हो सकता है। हमारे उद्योगों को चालू करने के लिए हमें कच्चे माल की जरूरत होती है, मजदूर की जरूरत होती है। हमारे देश में भरपूर मजदूरों की उपलब्धता है, इसके बावजूद भी हमारे उद्योग बन्द होते जा रहे हैं, उनको कच्चा माल नहीं मिल रहा है। कहीं बिजली की कमी के कारण बन्द हो रहे हैं तो एक तरफ चीजों की अनुपलब्धता है, दूसरी तरफ उनकी उपलब्धता के होते हुए भी कारोबार आगे नहीं बढ़ रहा है। वित्तीय व्यवस्था को सुद्ृढ़ करने के लिए जो विसंगतियां हैं और जो असंतुलन है और जो उपलब्ध साधन हैं, उनका सदुपयोग, उनका सही तरीके से संचालन, वित्त व्यवस्था का सही तरीके से प्रबन्धन, वित्तीय अनुशासन न होने के कारण तरह-तरह से आमदनी को बढ़ाने में बाधा उत्पन्न हो रही है।…( व्यवधान) इसलिए माननीय मंत्री जी को बहुत गम्भीरता से इतने बड़े देश के पैमाने पर विचार करना होगा, क्योंक राज्यों में आपस में कई प्रकार से आमदनी के रुाोतों में फर्क है। अगर उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल और पश्चिम बंगाल, हरियाणा और पंजाब को देखा जाये तो लोगों की इन प्रदेशों में आमदनी के रुाोतों में काफी अन्तर है और इस असंतुलन को संतुलन में बदलने में हमें बहुत कुछ अर्थव्यवस्था पर सोचना पड़ेगा। इसलिए पूरे देश के अन्दर बढ़ती हुई गरीबी और बेरोजगारी को देखकर आपने जो ग्रामीण योजना चालू की है, जो रोजगार गारण्टी योजना चालू की है, उसके जरिये भी इस बेकारी का समाधान नहीं हो सकता है, इसलिए आपको कुछ औद्योगिक कारोबार की तरफ अपने आर्थिक रुाोतों को देना पड़ेगा, अर्थव्यवस्था के जरिये उनकी तरफ ध्यान देना पड़ेगा। इसलिए मैं आपसे कहना चाहूंगा कि अपने आर्थिक रुाोतों से अर्थव्यवस्था को, देश के वित्तीय ढांचे को इस तरीके से बनाया जाना चाहिए ताकि जो देश के सामने संकट है और वभिन्न समस्याओं के बारे में जो परेशानियां, दिक्कतें पैदा होने जा रही हैं, जो हमारी बेसिक आवश्यकताओं पर असर पड़ने जा रहा है, चाहे वह स्वास्थ्य का हो, चाहे वह पानी का हो, चाहे वह बिजली का हो, चाहे उद्योग का हो या कृषि का क्षेत्र हो, इन सभी रुाोतों से जो देश की आमदनी की आवश्यकता है, उसमें बहुत कुछ नये तरीके से सोचने और उसको संतुलित करने की आवश्यकता है।

इसलिए माननीय मंत्री जी ने जो सप्लीमेंटरी बजट पेश किया है, मैं उसका समर्थन करते हुए उनसे चाहूंगा कि अपनी योग्यता और क्षमता को और वित्तीय व्यवस्था के बारे में जो उनकी अपनी सोच है, वे इस तरीके से उसको अमली जामा दें कि जो राज्यों का वित्तीय घाटा है, उसे रोका जा सके और देश की आमदनी को बढ़ाकर देश के सामने तमाम उत्पन्न समस्याओं का निराकरण हो सके।

इन्हीं सुझावों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Hon. Members, I have got a very big list. Please give your suggestions in brief.

 

श्री शैलेन्द्र कुमार माननीय उपाध्यक्ष जी, आपने मुझे वर्ष २००५-२००६ के अनुदानों की अनुपूरक मांगों पर चर्चा में भाग लेने का अवसर दिया, मैं आपका आभारी हूं। इसमें ४८ अनुदान शामिल हैं जिनकी डिमांड यहां की गई है और कुल ९०७९.८ करोड़ रुपये के अनुमोदन की मांग की गई है। उनमें कई ऐसे महत्वपूर्ण मंत्रालय हैं, जैसे ग्रामीण विकास मंत्रालय है – जिसमें प्रधान मंत्री सड़क योजना, राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना शामिल है, अगर इसमें स्वजलधारा योजना भी सम्मिलित करें तो मेरे ख्याल से बेहतर होगा। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना में अभी बहुत कम जिलों को चयनित किया गया है। मैं कहता हूं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना को हर जिले में लागू किया जाए, चाहे थोड़ा-बहुत काम शुरू किया जाए, लेकिन सभी को लेना चाहिए।

जहां तक प्रधान मंत्री सड़क योजना की बात है, ५०० की आबादी के छोटे-छोटे कस्बों को टेक-अप करके इसे लिया जाए। ऊर्जा रुाोतों में जो व्यवस्था की गई है, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि ऊर्जा क्षेत्र में बहुत से ऐसे संयंत्र हैं, जो बहुत पुराने हो गए हैं। उनके नवीनीकरण की व्यवस्था भी इसमें होने की जरूरत है। गृह मंत्रालय से संबंधित केन्द्रीय सुरक्षा बल और सुरक्षा बलों की अधिक संख्या बढ़ाए जाने की बात एवं उनको नए-नए उपकरणों से सुसज्जित करने की भी व्यवस्था है। इसमें सुनामी को भी लिया गया है और कुछ योजना बनाई गई है। इसी तरह भूकम्प को भी इसमें लेने की जरूरत थी। स्वास्थ्य विभाग में आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चकित्सा, यूनानी, होम्योपेथी के लिए भी इसमें व्यवस्था की गई है। एम्स में बढ़े हुए शुल्क के बारे में मैं कहना चाहूंगा कि इस बजट में ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि एम्स में जो शुल्क बढ़ाए गए हैं, बजट में प्रावधान बढ़ाकर कम से कम उसे माफ करें, ताकि सामान्य जनता को उससे लाभ मिल सके।

पेट्रोलियम विभाग से संबंधित, मिट्टी के तेल हेतु व्यवस्था इसमें की गई है। मिट्टी के तेल की जरूरत के संबंध में मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि राज्यों की आवश्यकता के अनुसार, बहुत से राज्य पिछड़े हुए हैं, जहां वनों की संख्या ज्यादा है, आदिवासी बहुत ज्यादा हैं, यह व्यवस्था अधिक से अधिक होनी चाहिए।

सर्वशिक्षा अभियान को शिक्षा विभाग में लिया गया है। मेरे ख्याल से सर्वशिक्षा अभियान में जो बजटीकरण हुआ है, इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है। हम अपनी कौन्सटीटूएंसी में देखते हैं कि इससे कोई काम नहीं हो रहा है। इसलिए इस तरह के फिजूल बजटों पर रोक लगाने की आवश्यकता है।

महिला एवं बाल विकास परियोजना में आपने केएसवाई योजना ली है। इसी सदन में कल या परसों एक प्रश्न आया था, जिसमें तमाम सम्मानित सदस्यों ने अपनी बात रखी थी। आज इतना कम मानदेय उसमें दिया जाता है, चाहे कार्यकत्री हों, सहायिका हों या आया हो, जिससे वे पुष्ट आहार बेचने के लिए मजबूर होती हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि उन्हें कम से कम तृतीय या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मानकर उसके बराबर वेतन दिया जाए, तभी यह व्यवस्था सुद्ृढ़ हो सकती है।

आपने पंचायती राज व्यवस्था के बारे में कहा कि ग्रामीण स्तर पर सशक्तीकरण किया जाए।आपने राष्ट्रीय ग्राम स्वराज योजना को बढ़ावा देने की बात भी कही है। आज पंचायती राज व्यवस्था, क्योंकि लोकतंत्र की सबसे निचली कड़ी पंचायती राज है, अगर हम इसे मजबूत करेंगे तभी गांवों का विकास हो सकता है। अगर गांवों का विकास हो गया तो मेरे ख्याल से पूरे देश का विकास हो सकता है।

शहरी रोजगार के नाम पर इसमें व्यवस्था की गई है। शहरों में जो स्लम बस्तियां हैं, जहां अनुसूचित जाति के गरीब लोग बसते हैं, उन्हें चिन्हित करके जहां कम से कम २०,०००, २५,००० लोग स्लम बस्ती में रहते हैं, वहां उनके रोजगार, सफाई की व्यवस्था और दूसरी व्यवस्था, चाहे सड़क हो, नाली की व्यवस्था हो, सैनीटेशन की व्यवस्था हो, ये सारी व्यवस्था करनी चाहिए ताकि वे भी महसूस कर सकें कि हम समाज की मुख्य धारा से जुड़े हुए हैं।

युवा कार्य और खेल में आपने कुछ व्यवस्था की है। यह बात सत्य है। इससे पहले भी विश्वविद्यालय या कालेज स्तर पर, जिला स्तर या मंडल स्तर पर तमाम ऐसे खेल होते थे, जो आज बंद पड़े हैं, क्योंकि वहां बजट का प्रावधान बहुत कम है[R75] ।

  मैं चाहूंगा कि आप इस बारे में बजट में थोड़ा सा बढ़ाकर प्रावधान करें ताकि हमारे देश में अच्छी-अच्छी प्रतिभाएं आयें जिससे इस देश का नाम रोशन हो सके।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

SHRI KHARABELA SWAIN The fiscal indicators are good now.  There is a boom in the Sensex.  The hon. Finance Minister in his Mid-Year Review has said that the growth rate in the first half of the fiscal year is 8.1 per cent.  So was the case in 2002 when I remember, India Today magazine published a cover story mentioning, “Feel-Good Factor – How long will it last?”  In the same magazine, on last November 28 a story was published saying: “Indian economy – will the Party last?”  What I wish to say is, whatever good economic indicators this Government is projecting, they are the legacy of the earlier NDA Government and whatever achievement this Government is projecting has been bequeathed from the good financial measures taken up by the earlier Government.  I am saying so by comparing India with China. China is an investment-based economy but India is a consumer-based economy and that is why I have some of my apprehensions, fears, which I will just express before the hon. Finance Minister.

            For the fourth consecutive year the GDP growth has been seven per cent.  I must say it is a phenomenal growth rate for the fourth consecutive year.  The Mid-Year Review published by the hon. Minister says that there is a disappointment in the performance of mining, that is, 1.3 per cent; electricity sector, 4.8 per cent and though growth in manufacturing sector has not reduced, it has plateaued. This has been the another cause of concern.  Good industrial growth has to maintain its momentum because otherwise it will ultimately affect the overall GDP growth.  Take the example of fiscal deficit.

            Some of the Members have mentioned that in this Mid Year Review the hon. Minister has admitted that fiscal deficit has exceeded the 5 per cent limit set by the FRBM Act and the Government expenditure is still growing gradually.  Now, the Government is saying that it is going to introduce the Employment Guarantee Scheme.  You require money for that.  Similarly, Bharat Nirman Scheme also requires money. The fiscal deficit is already more than what was anticipated and if you include all these additional expenditure, it will put further pressure on the fiscal front.  It is also a matter of concern that the fiscal deficit might be beyond the limitations of this Government.

            There is rising inflation, of course, because of rise in petrol prices.  The interest rates are also forming up, not only here but globally also.  In USA the interest rate has gone from one per cent to four per cent.  It may go up further.  The same thing may happen in India also, which is not a good indicator for the booming economy.  This is already an area of concern, which has already been mentioned by the Reserve Bank of India in its Mid-Year Review.  It has mentioned that we may have to face such an eventuality.

            In the Mid-Year Review the hon. Minister has said that the growth projection for the first six month is 8 per cent.  This year the Rabi Crop is more than last year.  Last year it was 71 million tonnes and this year it has come to be 76 million tonnes.  Even though in the first six months, the GDP growth has been projected at 8.1 per cent, the hon. Minister predicts the overall GDP growth in this year to be 7 per cent[R76] .

So I think he himself indicates that there is going to be a slow down.  Actually, it is in the second half of the fiscal when the economy gathers momentum.  Whereas, the hon. Minister indicates that it is going to be slowed down.  I would like to know from the hon. Minister what is his prediction about the growth in the industrial sector and the service sector.

            Take the example of infrastructure.  Not a single new major infrastructure project has been taken up.  The work on the Golden Quadrilateral Four-Lane National Highway Project has slowed down considerably everywhere, even then the Minister says that it is progressing rapidly.  Everybody knows that it has slowed down considerably.

            Secondly, in 1997 when the hon. Minister was the Finance Minister, he had set up an Infrastructure Development Finance Corporation.  Now again this year, he is going to set up another non-banking finance corporation.  So my point is this.  What is the necessity of multiplying the financial institutions when there is no new infrastructure project coming up?  No new projects like airports, roads, etc. are coming up. So, what is the need of multiplying the financial institutions?

Take the example of Bharat Nirman.  We heard that the allocation for the Bharat Nirman for this year is going to be raised to Rs.6000 crore.  I would like to know from the hon. Minister what is the actual allocation.  The moot point is that there must not be any self-congratulatory posture by this Government because actually there is a lot of fear.  The moot point is that they require very rapid economic reforms if they want to attain eight per cent annual GDP growth.  But the economic reform record of this Government is totally dismal.  It is the international view that the momentum of economic reforms in India has slowed down.  It is happening only because of the pressure from the Left.  Such is the vice-like grip of the Left on this Congress-led Government that they are even incapable of taking very small decisions like divesting 10 per cent share of BHEL.  Now they compromised to bring it down to five per cent still they did not agree.  The hon. Minister is here. You take the example of Pension Fund Regulatory Authority Bill.  I am a Member of the Standing Committee on Finance.  The hon. Minister sent the message that it should be cleared as quickly as possible.  The Committee sat day-in and day-out before the Monsoon Session and it cleared it. But till now they are unable to table it in Parliament.  It is only because the Left is opposing it.  It is an insult to this House that only two-three Members of the Left Parties have objected to this and all other people supported it, still the Government is incapable of bringing it… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down.  When your turn will come, you can reply.

SHRI KHARABELA SWAIN : On many occasions dissenting notes have been given by many people but that does not mean that the Bill will not be tabled in this House.  Out of fear of the Left, the hon. Minister or the Congress-led Government is not tabling it.  They know pretty well that they will only bark and will not bite but still they are afraid of them.  I would just give the example of India Today and tell what impression this Government has given.  The India Today had an Economic Convention in which great economists of India like Shankar Acharia, Ajit Rana De, Subir Gokarno, Vivek Oberoi, who is associated with the Rajiv Gandhi Foundation and Siddharth Rai participated[r77] .

19.00 hrs.

What is their [bru78] conclusion?  Their conclusion is that Government is a non-performing asset.  That means, reforms are not taking place.  If no progress is taking place, then Government is the main bottleneck in India.  This is what they have said.  They have also said that Government has been the only disappointment.  Everything else has been appreciated except this Government.  Nothing is moving in the main economic Ministries in Delhi.  The momentum is frustratingly slow.  That is what is said by the largest circulated magazine of the country. 

            Consider the Electricity Act of 2003.  It was supposed to bring a new era in power reforms. The Finance Minister should see to it there are danger signals to economics in power sector in Orissa and Delhi.   It is because these are the two leading States which took up electricity reforms and they are not showing very good results.  I would appeal to the hon. Minister to see to it.

            Take the example of the labour sector reforms and the labour laws.  The hon. Prime Minister, the Finance Minister and others want that there should be huge inflow of FDI to India.  But that is not coming because not every labour law deals with retrenchment.  The labour laws do not necessarily say that people will be retrenched.  While the issue of lay-offs can await political consensus, other inimical provisions of law can be taken up.   Sir, they are so scared of the Left that they are not even touching them.  They should know pretty well that unless you have labour laws or labour reforms, you are not going to attract Foreign Direct Investment in India which is very much required for 8 per cent growth.  If the Government really takes quick steps in the direction of economic reforms, there could not only be 8 per cent growth, there will also be double digit growth in India.  This is my concern which I am expressing.

            Sir, as I am a Member of the Standing Committee on Finance, I will give some suggestions.  As regards RIDF, the banks are not very interested to lend their money through the RIDF.  They say that they are getting only 3 per cent interest out of it and if they lend it outside in the retail sector like for houses and cars, they would get nine per cent interest.  So, they are not very much interested in lending through RIDF.  The hon. Minister should see as to what can be done about it.

            Coming to priority sector lending, it should be redefined.  Now, 18 per cent to the total lending should go the agricultural sector.  But there is hardly any bank which is lending at 18 per cent.  They say that the intake of the corporate sector is much more and so, they are unable to give 18 per cent credit to the agriculture sector.  Let me tell you that the percentage of recovery in the agriculture sector is much more.  The hon. Minister knows it. It is much more than the recovery in the corporate sector lending.  Even the bankers told us that the rural areas are gold mines for them.  I would appeal to the Minister that he should redefine the priority sector lending and see to it as to why, in some areas, specifically the Prime Minister’s Rozgar Yojana is not working.  In this case, the selection of beneficiaries is the most important thing.  Training should be given to people.  Bankers say that training is the most important thing and only then beneficiaries should be selected[bru79] . Otherwise, people are being selected, but bankers do not disburse the money.  Even if they disburse the money, the rate of return is only 18 per cent of that money.  So, I would request the hon. Minister to look into this. 

            My next point is about Self Help Groups, where ladies form groups.  Here, sometimes the rate of return is even 90 per cent.   The most important thing is training.  They do not know what to do with the money.  In some cases in Orissa — I do not know about other States — ladies from the Self Help Groups take money from the banks and re-lend the money at a higher rate of interest to other people.  They become the second moneylenders in the villages.  They are not interested in doing that.  I would request the hon. Minister to see how they can be trained.  They should be trained as to what they should produce, how to produce them, how to market them and how to package them.  It is a very good idea and scheme.  I would request the hon. Minister to look into this.

            As far as micro financing is concerned, I would request the hon. Minister to reduce the interest rates.  The rate of interest in micro financing, in giving loans to the Self Help Groups, is much higher.  The industrialists take loan at five per cent rate of interest.  But in the case of micro financing, it is nine per cent or sometimes it is more than nine per cent.  The hon. Minister should see to it as to how it can be reduced.

In Kolkata Income Tax office, the staff strength is more, but the collection is less. But in other areas the staff strength is less, but the collection is more. I would request the hon. Minister to think over as to why in Kolkata Income Tax office they have deployed so much staff unnecessarily.

In the case of customs duty cases, in the Appellate Court, if a judge is transferred and when a new judge comes, the hearing on the cases start from the beginning.  They do not start the case from where the previous judge has left.  A complete re-trial takes place. It is a very surprising thing.  A complete re-hearing starts.  This is very surprising.  I would request the hon. Minister to look into it. 

As far as the Customs Department is concerned, there are only 10 CESTAT benches.  Out of which, three are lying vacant.  So, a lot of customs cases are pending.  Therefore, I would request the hon. Minister to look into it. 

SHRI M.M. PALLAM RAJU Mr. Deputy-Speaker, Sir, I rise to support the Supplementary Demands for Grants (General) for 2005-06 along with a few comments on some of the sectors which I still feel need to be addressed adequately.

            India today is an economy that is on the rise and is the fastest growing economy in the world, after China.  Our services sector now contributes the maximum percentage to our GDP.  So, rightly it is one sector that can be taxed but only to the extent that we do not kill the golden goose.  I feel that the Ministry of Finance’s strategy to gradually bring in more services under the tax net is a move in the right direction.  I would like to however caution that while we chase the big fish and identify the high volume centres, please allow breathing space to the smaller operators, especially those operating in some of the smaller towns and major panchayats.

            While we create the environment conducive to the growth of the services sector, I feel that as a nation we cannot ignore the competencies that we possess in the manufacturing sector also.  While we have more than adequately proven our capabilities in the automobile sector, I think the time has come for us to prove our manufacturing capabilities in the high tech sector too.  Specifically, I would like to plead for the cause of semiconductor fab. The country needs several such fabs. While our engineers are contributing to the value addition of hardware, which is inevitably the IP of some foreign company, through the creation of high-end software which is eventually ported onto this piece of hardware, I think the country is missing out on the true value addition that can be made to the national economy if we can manufacture these basic building blocks of high value electronics[r80] . I urge the Finance Minister to please accord priority to this sector which we have consistently neglected due to various factors over time. I also feel that as a nation we are not doing enough to add to the talent pool of high-end skills, so necessary in the IT marketplace today.  The rate at which the salaries are increasing in the high-end skills market, I am afraid, that we may be out-pricing ourselves as a destination of choice leading to the diversion of business to other attractive destinations worldwide.  A conscious thrust to create the environment to encourage the creation of this high-end skilled IT manpower is absolutely necessary if we are to sustain this pace of growth in our IT services sector.  Rapid application of our inherent skills for development and application of IT in our Governance and its increasing usage in general will also increase our competence in the Global economy.  We have to create the conditions for its increased usage.

            Commenting on the implementation of our social welfare schemes, I would like to urge you to make sure that there is enough grant for individual benefit schemes such as old age pensions, other disability schemes and housing schemes, etc., as otherwise, a shortage in such funds leads to corruption at the implementation level which this Government is trying to avoid.  We have to increase manifold the budget especially for schemes for the aged and the disabled.  India has 70 million disabled people today. 

            Finally, I would also like to comment on the most important activity of the country which is the lifeline of this country, that is, agriculture. Let us not forget that agriculture is the lifeline of the nation.  It is the main bloodstream which has to be protected, sustained for quality output so that the health of the nation is reflected in the genuine happiness of our rural population. Agriculture is one activity that leads to the joyful sustenance of villages and the life around it which is reflected in the local culture, the festivals and the entire atmosphere of a satisfied community.

            Bapuji rightly said that India lives in its villages. The lifeline of all villages, and hence the nation, is agriculture. Let us not forget that the resilience of the Indian economy lies in the health of its villages. Let us assess the conditions of our villages today.  I remember growing up as a child in my mother’s village that although the yield was not as much then, the people of the village, the farmers and the village community in particular, was one happy family.  Today, the situation is very different in spite of much greater yields, better living conditions and far greater money in the pocket.  Why is it so different now?  The answer partly lies in the fact that there are greater expectations and a far greater disparity in the living conditions, the lack of access to opportunity and lifestyle including the factor of the digital divide in our villages.

            The hon. Prime Minister has outlined his vision of improving the conditions of our villages, the infrastructure, the connectivity, the reliability of power, etc., by the year 2009.  This will definitely lead to a far greater improvement in the general conditions of rural India but I still feel, falls short of the root cause of the fundamental problem.  I still think that the soul of village-life will still remain un-addressed. What then is the issue that I am talking about?

            Today, India is a nation on the rise, a country on the move having earned its recognition as a ‘Services’ economy, a nation which is to be the world’s knowledge centre and the laboratory of the world.  India is a nation that is truly basking in the sun, a nation whose time has come, a nation which has the youngest workforce and which is going to work for the sustenance of the world’s economic health.

            Now, the real question is: “How does such a country, a civilization in resurgence, treat its farming community which is the backbone of its economic resilience?” Do they not deserve to enjoy the fruits of consumerism and globalization? Does this nation not share the responsibility of ensuring a decent living standards for its millions who are dependent on agriculture?  The answer is obvious for everybody to see when we look in shame at the suicide figures of our farmers and the statistics which say that 50 per cent of our farming community is convinced that agriculture is no longer viable and thinking of an alternative livelihood. I must thank the Finance Minister for easing the farm credit resources for our farmers in the last Budget but a lot more needs to be done. … (Interruptions) I am finishing, Sir.

I think, that this nation has to give a fresh look at its agriculture sector.  It has to look at it in pride, with a sense of ownership and with a renewed commitment to its healthful sustenance[mks81] .   Let us remember that the soul of this nation lives in its villages and only when the villages smile does the sun truly shine on the nation. Let us be sensitive to the fact that the farming community and those dependent on it are not a happy community. What are the reasons for it?

            The reality of the situation is that the input costs of the farmer have gone up several times while the compensation he receives has not kept pace! I think mainly the MSP has not kept pace. It is important that the MSP for all crops be maintained at a level that makes the activity sustainable. It is imperative to the healthful sustenance of agriculture.

            I am not arguing for a situation that subsidises agriculture but makes it an activity which sustains and supports the minimum lifestyle of farmers and those dependent on it. The farming community already suffers from numerous ills, the uncertainty of the crop yield, the vagaries of the weather and the numerous unforeseen incidents. So, the only thing that I feel that a responsible Government can do is to increase the MSP level to a degree that makes Agriculture worthwhile for our farmers.

            With these words, I conclude.                                             

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Tathagata Satpathy to speak now. You have only five minutes. You are the only Member and your party has only five minutes.

SHRI TATHAGATA SATPATHY Mr. Deputy-Speaker, Sir, I thank you very much for whatever little time you desired to give me to speak.

            We have, today, before us the Supplementary Demands for Grants of about Rs.9079 crore. As we see it, we have been watching for more than half a century plan after plan, Supplementary Demands after Supplementary Demands. Money is being spent. Thousands and thousands of crores of rupees have gone away. God knows where! But, if we see the country-side of this nation, we realise that actually what one of the former Prime Minister’s said is very true that not much of the resources trickle down to the people.

            Sir, you come from primarily a agricultural State. I also come from Orissa which is an agricultural State. We see that today one thing. I am not talking about the UPA Government or the NDA Government or any political ‘isms’ or thoughts. But today a scenario exists in India where the bureaucracy rules the roost. These Ministers, these political bigwigs only get bashed in the media taking a little bit of money here or a little bit of money there but the big bucks are made somewhere else. They decide what the Budget will be. They decide whether it is the Bombay Stock Exchange which will be pleased or some other foreign money investors who shall be taken care of. 

            Here, sitting in this House, we notice many amendments to laws coming up which limit themselves to “and” or “or” or to certain dates. Most of us do not realise the import of those few words. But if we go deep down, we could see one thing. I have seen in certain cases how these are specifically designed to help certain quarters, certain companies, certain interests only. Very limited, very directed benefits go to certain people. This happened in the previous Government. This is happening now also. So, it just proves one thing that the plan provisions in India have always been defective. Political thought has not played much of a role. It has constantly been a bureaucratic bungling which has created our Budgets so far.

            For instance, most of the Plan allocations make the States put in high percentage of money as their share. Many States like Orissa, in projects of the Rural Development Ministry, have to put in their share which is far beyond their reach. This  eventually culminates in those projects not being completed. So, we have before us a paradoxical situation where the Centre sends money and expects the States to share with their own funds and they are incapable of doing it. So, things do not actually reach the people. I wish to cite a few examples very briefly because you have already curtailed the timing[R82] . This is just to highlight how our planning and budgeting has been consistently warped in this country.  Take Orissa for example.  With a little more than 10 per cent of natural national water resources, mostly flow water resources, we have only a meager 30 per cent of our land which is perennially irrigated.  So, Sir, what happens is that we have no investment for irrigation and all our water resources go into the sea and the State is not benefited.  In this light, I would like to compare another State.  I am not trying to run down any other State but it is a comparative image which will clarify to you how we stand in the Eastern part of the country.  With half the population of Orissa, half the landmass of Orissa, in the annual plan allocations of 2005-06, Jharkhand has been blessed with Rs. 5000 crore whereas in the same period Orissa has got only Rs. 3000 crore.  Orissa has mines and minerals.  You exploit it.  You say in the Mineral Act that the land belongs to the State but the mineral that is in the land belongs to the Union.  Therefore, we do not get any benefit from that what you get under the earth.  We are only possessing the land but the State does not get benefit.  If the State Government levies any cess, any tax for the development on the mining activities, the courts reject that.  It has recently happened in Orissa also. 

The power is one subject which I would like to mention here.  Sir, Orissa is rich in coal.  NTPC and many private companies produce power within the State of Orissa using the coal from the State, polluting the rivers and causing immense collateral damage but the power is transferred to the States like Karnataka and many other States by specially made systems.  They collect power duty there, they get benefit.  As consumers they are consuming the power, they are benefiting from the money but we are only deprived of.  We have the collateral damage.  We are polluted, our State is polluted.  We do not benefit from anything that is found on our soil except a paltry royalty.  We are also deprived of institutes like National Insitute of Science (NIS) or whatever they have renamed it IISCR or AIIMS also because of certain political machinations.  In a minute I would finish, Sir. 

At 4.15 p.m. the Finance Minister said something very interesting.  I am just quoting him very loosely.  He said: “The concern of Members for exporters is understandable but please show some concern for revenue also.”  Sir, I would just like to highlight.  There are many such examples but I will just give one little example of how a warped system we have which is functioning in the Finance Ministry. This refers to no particular Government.  It was there in the last Government for a short time. This Government has again brought it in. It is something called Counterveiling Duty (CVD).  It is levied in place of excise duty on items that are imported from abroad. Sir on a simple thing like printing machines for newspapers, you have CVD exempted from printing machines which can print 70,000 copies impressions per hour (iph).  On 70,000 and above, there is no Counterveiling Duty on that but who benefits from those big machines?  It is only a select few newspapers.  Whereas you are talking about higher literacy in the State, you are talking about encouraging Indian languages.  Now, all Indian language newspapers need or they buy Indian made printing machines. There, they have to pay a 16 per cent excise duty for no reason at all.  So, what happens is that you encourage the big players to get CVD-free machines, second hand machines or any kind of machines from abroad, if they are registered as producing 70,000 impressions per hour but you are harming the smaller players within India[a83] . 

 

            But you are harming the smaller players within India. Like one of my colleagues said earlier, if you are catching a big fish, it is a welcome move, but you should also give some breathing space for the smaller players which we do not see in this country, because this country’s plans and programmes are dictated by unknown, unseen powers that sit in the corridors of power in the North Block and South Block.

            Sir, I belong to the State of Orissa. It is sad to note that nearly eight States are getting Special Economic Packages, but the Government has deprived Orissa. This Government and previous Governments have deprived Orissa from that list for far too long. It is because of lack of vision. As we have seen and as you have seen, Sir, in your State, how the previous Congress Governments’ lack of vision made Punjab a very disturbed State in the 1980s and 1990s and you know how much political efforts you had to make, how much humane efforts you had to make to bring that State on to an even keel. But let me also give a warning to this Government that people of Orissa are getting restless. Their anger is getting bottled up. It is not good to take people for granted and that is what is happening with Orissa. You are depriving us. Although you are looting our resources, you are depriving us of all the benefits. So, if their anger is bottled up, do not be surprised if, in the near future, Orissa also comes to a stage of boiling point where the fall out will be disastrous for this nation. Let us remember the Oriyas are meek, but if you remember the Bible, the Lord had said: “The meek shall inherit the earth.” When the meek become violent and when they become upset, God help this nation.

           

MR. DEPUTY-SPEAKER Hon. Members, those who would like to lay their speeches on the Table of the House can do so now. Their speeches will form part of the proceedings.

            Secondly, four hours are allotted to this discussion. हमने ८.२० बजे तक का टाइम रखा हुआ है, इसलिये मैं चाहूंगा कि आनरेबल मैम्बर्स बहुत ही ब्रीफ में बोलें। Shri C.K. Chandrappan.

SHRI C.K. CHANDRAPPAN (TRICHUR) Mr. Deputy-Speaker, Sir, I will try to be as brief as possible.

MR. DEPUTY-SPEAKER I am helpless.

SHRI C.K. CHANDRAPPAN  I understand your problem. Please understand my problem also.

THE MINISTER OF FINANCE (SHRI P. CHIDAMBARAM): I hope you understand my problem also.

SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU (SRIKAKULAM): Mr. Deputy-Speaker, Sir, if the Minister is going to reply tomorrow, it is better that you adjourn the House now and give opportunity to everybody tomorrow. Everyday, we are sitting up to 9 o’clock, but we are not getting opportunity to speak. Everyday, the Chair is calling the Members according to the strength of the parties. Our strength is five. We are waiting for our chance since 6 o’clock and this is happening in every debate. This is not correct. That is why, my humble submission is that it is better to adjourn the House now and continue this discussion tomorrow so that everybody who wants to participate can get the chance.

SHRI LALIT MOHAN SUKLABAIDYA Sir, I thank you very much for allowing me to participated in this debate on Demand for supplementary grants for 2005-06 placed by Hon’ble Finance Minister.

            Sir, As all of us know that our country is mainly dependent on agriculture – that is why the maximum thrust has been given on rural development and agriculture.  Agriculture is no longer legging behind the industry now – agriculture has become an equal partner of the industry.  With new innovation in agricultural technique and machinery as well as storage arrangements an agriculture enterprise – could become highly profitable. As 80% of our people depend of agriculture this benefit will accrue to them.

            India is very famous for its huge manpower and for improvement of quality of manpower special emphasis is given on education including expansion of Technicians Education.  For their employment expansion of IT Sector development of new technology for small and traditional industries etc. and various schemes of self-employment under Rural Development are made.  These justify the huge investment in this sector.

            The main realistic effort the government has made is the provision of 100 days guaranteed employment which will improve the condition of the people living under BPL.  And their joining in productive process will contribute to the growth GDP.

            In fact the picture of the economy seemed to be rosy in the first quarter of 2005-06.

            Despite global oil price hike and natural calamities, the GDP growth in the first quarter accelerated 8.1 from 7.6 per cent from the corresponding period of pervious year.  Industrial activities gather further momentum and accelerated to 8.8 per cent by the manufacturing sector.

* Speech was laid on the Table .

            Sir, prosperity of any country depends on its exports.  The merchandise export growth reported as 20.5% – were higher than the target of 16%.  There was modest decline in the external debt and on the other hand foreign reserve increased about $ 2 billion.

            The inflation rate declined from 5.1 per cent to 4.6 per cent.

            The electricity generation posted a lower 5.5 per cent growth in the first quarter is now increased and grew by 10.2 per cent in June.

            As the budget proposals are translated into reality there is also development in transport, communication, and health and other sectors.

            India, as a whole, we are getting more prosperity and this is evident from the facts I have pointed out.

            But, Sir, we belong to the North East of the India which is lagging behind the rest of India.

            Our projects like Bogibeel, Tipaimukh could be taken up. Our Rivers which create havoc during summer  could be tamed.

            If the potentials of our hydel power could be harnessed;

            If our communication system could be modernized.

            If our waterways to Kolkata could be reopened –

            We could also develop ourselves substantially.

            I thank the Government for making a special provision for North East but the schemes for development are yet to be implemented properly.

            Sir, North East is lagging behind the rest of India in all respects. I hope the Government would contribute in more projects in the next year for the faster growth of NE region and keep vigilance for their proper implementation.

            However, I wish to say something about North East States, particularly in Assam and my constituency in Bark Valley Karimganj district.  Till recent past our Tea was very famous in the world and it was earning huge revenue but now our gardens become sick and striving hard for survival. We requested for special package for the tea industry in Assam, and my humble request is to implement such package for the tea industry which can regain their previous glory.  Our agriculture is very backward as the implements are not modernized – we use traditional equipment only, people used to carry on one time agriculture in these area for the absence of infrastructure of electricity and irrigation.

            Even e-fertilizer supply also do not reach to the actual farmer. And farmers, fishermen are required to be educated in modern techniques of production which could improve their economic condition as well as the national productivity.

            One more point which I wish to point out, which I have done earlier also regarding a four thousands of teachers working without any salary.  Some of them are retired doing the same jobs as their counterparts in government schools.  Due to paucity of funds of the Government of Assam could not take over the services of these teachers. Only recently a very small number of them were granted a fixed pay.  My request was that the Government of India should provide a fund so that these people who are rendering the services in the field of education since long could be remunerated.

            Lastly, while supporting the Supplementary Demand placed by the Hon. Finance Minister I thank the government for taking over Badarpur-Lumding Komarghat railway as National project.  I hope the government would take all the action as needed to complete the project by the 2009 as declared which could contribute significantly towards the development of Barak Valley, Tripura and Mizoram.

 

           

           

 

SHRI C.K. CHANDRAPPAN Mr. Deputy-Speaker, Sir, while speaking on the Supplementary Demands for Grants, my friend Mr. Swain tried to depict a very dark image about the influence of the Left on the ruling United Progressive Alliance. His speech was quite alluring. But I must say what was the promise made by the UPA Government. The promise was that reforms would be carried out with a human face. But what was it that they were doing when they were in power? There was no Left to murmur, plead or do anything[k84] . They [r85] had done it to the hilt and said India was shining. The people rejected it.  It is better that you take that lesson from that.  Of course, to that side also, I would say, if reforms are not done with what is promised, with the human face, we will oppose it.  That is understandable. 

            It is not that we are against everything that Government, like inviting foreign investment, etc.  We are for that.  But it should be invited to sectors where it will generate more employment because unemployment is the biggest problem in the country.  If it is invited to sectors where agriculture will flourish, we will support it because our agriculture needs more money.  If it is invited to infrastructure, the promotion of which would enhance the economy of our country, we will support it.  It is not that we blindly oppose it.  I would like to inform the hon. Member, Shri Swain. We are not blindly opposing it. There are certain different approaches to it.

            Everybody said that agriculture is one sector of our economy that should be supported.  I also feel that way.  It is our hon. Prime Minister, who is an economist and who was the Finance Minister of this country before, who in a recent speech said that there is deceleration in the growth in the agrarian sector.  It is very alarming.  He also said that if we have to achieve the goal that we are attaining seven or eight or nine per cent of the growth in the GDP, then take care of agriculture where at least four per cent growth is ensured.  We are far away from that.  It is in that sector if you invite foreign investment and promote it in the interest of the country.

            In his Budget Speech, the Finance Minister or for that matter in all the statements of the Finance Ministers in the State Budgets, it is stated that the public spending, that is investment on agriculture is steadily coming down.  We have to enhance investment in agriculture and agriculture, again, Sir, you know it very well, is one sector that provides maximum employment in this country. This country’s number one problem is unemployment and that too rural unemployment.  If these realities are approached, we have no quarrel. To find a solution to that if you bring foreign investment, it is very good, you try that. 

            Coming to another aspect of the problem, I want to tell you how people are facing it.  We had a very unfortunate tsunami.  Fortunately, the western coast was not so badly affected, though affected quite badly. In Kerala, that was the biggest disaster in the recent past.  There are certain new problems that we are facing.  A new type of fish, which in our common parlance we say, that is, sea frog is found in plenty.  The fishermen go to the sea, catch fish and that is sea frog.  It is not that sea frog is edible or not.  The problem is different.  The net is all destroyed by that.  A net in a boat costs Rs.5 to Rs.6 lakh.  It provides employment to a minimum of 40 people and if the net is destroyed by the sea frog, to repair that it will take another 30 days — 30 days of starvation, 30 days of hunger and 30 days of unemployment.

            I would like to know whether there is any scheme with the Government to help those people.  The insurance companies are refusing to insure the net because they know that it is not a lucrative offer.  I have seen the plight of the people on the western coast from Kanyakumari to Kasargod. I do not know whether beyond that it is there.  You see, these people are affected[r86] . Something should be done about it.  Here, I must say had there been a Ministry for Fisheries at the Centre, we would have cried.  Do something to that Ministry.  We do not have a Ministry for Fisheries.  It is under the Ministry of Agriculture.  So, I would like to request the Finance Minister to look into this problem and do something.  It is because this is a problem being faced by marginalised population who are all the time unemployed and most of the time they are starving. They are now thrown to complete starvation and complete unemployment.  Will that problem be solved?  That is the thing they are asking.  You could make the proposal for a grant.  Something should be done about it.

            Now, coming to Shri Swain again, to foreign investment, on the Western Coast if we develop the Port Vizanjam, which is in Trivandrum, that will be one of the best Ports in this country where mother ships can safely come to the shore.  We do not have that facility anywhere in the country.  It does not require constant removal of the sand.  The land is such, the terrain is such that there is no problem. It is one of the nearest ports in the international shipping line.  If that Port is developed – it is not a problem of Kerala; we have only mother ships coming to Colombo, to Dubai or to Singapore – all the containers will have to permit transit to India.  If a mother ship comes to India, that will save a lot of foreign exchange that we are losing.  Our country will be immensely benefited. 

Shri Swain, we will support you if we can make that Port with sufficient foreign investment and technology. If it is developed as a Port, it will help tourism, and it will help to find a solution to unemployment.  Now our Minister was good enough to offer Sethusamudram to Tamil Nadu.  Sethusamudram was given to Tamil Nadu.  It is good but this Port, if developed, will do much more good to this country than Sethusamudram.

SHRI P. CHIDAMBARAM  Vallarpadam is also given.

SHRI C.K. CHANDRAPPAN   Vallarpadam is a transshipment Port where medium ships will come.  No mother ship will come to Vallarpadam.  I am speaking to go ahead – in your language if I use ‘graduate’ – to a mother Port where bigger ships will come and the country will be benefited. 

            Thank you for giving us Vallarpadam.  We will be very thankful if Vizanjam project is taken and is presented as a gift to the nation in the next Budget, at least.

           

श्री लक्ष्मण सिंह उपाध्यक्ष महोदय, वित्त मंत्री जी ९०७९.८१ करोड़ रुपये की मांगें लेकर सदन में आए हैं जिसमें ४८ मांग संख्याएं हैं। बजट भाषण में ऐसा लगा था कि देश की सारी समस्याएं हल कर देंगे, बहुत सुनहरी तस्वीर उन्होंने पेश की थी लेकिन सरकार की मंशा उस वक्त उजागर होती है और इनके कार्यकलापों से परत दर परत तब खुलती है जब ये अनुदान की मांगें लेकर आते हैं। उससे पता चलता है कि सरकार किस दिशा में जा रही है।

मैं चिदम्बरम जी को एक बहुक काबिल वित्त मंत्री मानता हूं। वे अकेले ही मोर्चा संभाले हुए हैं। बाकी सब साथी छोड़कर चले गए लेकिन वे यहां पर बैठे हुए हैं। मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं।

उपाध्यक्ष महोदय, जब मैंने मांगों का पहला पन्ना पढ़ा तो मनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की मांग संख्या १२ प्ाढ़ी[h87] ।उसमें बताया है कि १०३ करोड़ रुपया आपको स्टेट ट्रेडिंग कार्पोरेशन का घाटा पूरा करने के लिए देना है। यह घाटा क्यों हुआ, क्योंकि स्टेट ट्रेडिंग कार्पोरेशन ने ऐसे ज्वायंट वेंचर्स किए, जिनमें पूरा का पूरा पैसा डूब गया। एक उदाहरण मेरे सामने है। सदन में उस विषय पर अतारांकित प्रश्न श्री रंगनाथ जी ने १० मई को किया था। उसमें उन्होंने प्रश्न किया था कि एक्वा कल्चर प्रोजेक्ट के लिए एसटीसी ने तीन करोड़ रुपए दिए और वह पैसा तब दिया, जब उनके टेक्नीकल एडवाजरी बोर्ड के सदस्यों ने मना किया कि यह पैसा मत दीजिए। सारा पैसा डूब जाएगा, लेकिन वह पैसा दिया और वह पैसा डूब गया, क्योंकि जो प्रमोटर्स थे उन्होंने एक पैसा भी नहीं दिया। वह सारा पैसा खा गए। ऐसे कई घोटाले एसटीसी में हुए हैं। यह सिर्फ एक घोटाला है। उन घोटालों को ढकने के लिए १०३ करोड़ रुपया, देश के लोगों की गाढ़ी कमाई का रुपया दिया जा रहा है। यह देख कर मुझे बहुत दु:ख हो रहा है।

अब मांग संख्या ३४ पर चलते हैं। आपने २५० करोड़ रुपया स्ट्रेस्ड एसेट्स स्टैबिलाइजेशन फंड के लिए दिया है। आप ९ हजार करोड़ रुपया इसके लिए आईडीबीआई को बजट में दे चुके हैं। आईडीबीआई से लोगों ने पैसा लिया और वापिस नहीं किया। वित्त मंत्री जी की भाषा में इसे ‘स्टीकी फंड’ कहते हैं – “स्टीकी” यानी चिपकना और “फंड” मतलब पैसा। ऐसा पैसा जो बैंक से निकला और बाहर चिपक गया, वापिस बैंक में नहीं गया, वह “स्टीकी फंड” है। वित्त मंत्री जी सरल भाषा में इसे गबन कहा जाता है। ऐसे गबन को ढकने के लिए आप २५० करोड़ रुपए स्ट्रेस्ड एसेट्स स्टैबिलाइजेशन फंड में दे रहे हैं, उनकी मदद कर रहे हैं। मंत्री जी आपने आईडीबीआई का आईडीबीआई बैंक में समावेश किया है। आप विशेषज्ञ हैं, आप जानते होंगे कि यह सही है, लेकिन जिनके कारण, मैं उनका नाम नहीं लूंगा, आईडीबीआई को घाटा हुआ है, उनको आईडीबीआई का चेयरमैन बनाया गया, ऐसा क्यों किया गया है? इसका कारण है, मैं आपकी अनुमति से एक लेख, जो “दि हिन्दू” में छपा है, श्री जगन्ननाथ जी का लेख है, पढ़ रहा हूं-

“The Government should not be offering him a public sector bank on a platter till he has actually proved himself at IDBI. His KRAs (key result areas) must include superior performance in recovering the NPAs that have been happily transferred to the Stressed Assets Stabilisation Fund (SASF).”

            He writes, “the IDBI bailout—a thoroughly undeserved one—is the worst possible way of lending a helping hand to any financial institution.”

 

            This is what he says. Please look into it.

 

SHRI P. CHIDAMBARAM : The Bill was passed by your Government. The Bill was passed by the NDA Government.

श्री लक्ष्मण सिंह मैंने कहा है कि मैं वित्त विशेषज्ञ नहीं हूं। आप जब उत्तर दें, तो बता दीजिएगा।

SHRI P. CHIDAMBARAM: I will reply.

श्री लक्ष्मण सिंह अब मैं मांग संख्या ३६ पर आता हूं। आपने नेचुरल कलैमिटी फंड के लिए दो सौ करोड़ रुपया राज्यों को दिया है, लेकिन राज्यों की मांग बहुत ज्यादा थी। उसमें आपने शर्त यह रखी कि २५ प्रतिशत राज्य भुगतान करेगा और ७५ प्रतिशत केंद्रीय सरकार भुगतान करेगी, यह उचित नहीं है। जिस राज्य में बाढ़ आई हो, जिस राज्य में भूकंप आया हो, उनसे आप क्या अपेक्षा करेंगे कि २५ प्रतिशत राशि दें। इसलिए राज्यों का जो हिस्सा है, उसे कम किया जाए, विशेष कर उन राज्यों का जो इन परिस्थितियों से प्रभावित हैं। जब आपने आंध्राप्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, बिहार, गुजरात, हरियाणा कर्नाटक, केरल, उड़ीसा और आपके राज्य तमिलनाडु के मुख्यमंत्री आए और उन्होंने मांग रखी कि केवल दस प्रतिशत हिस्सा जमा करवाया जाए। लेकिन उन सब की मांग को अलग रख कर आपने अपने तीन-चार चुनिंदा अधिकारियों की बात मानी और यह कह दिया कि २५ प्रतिशत राशि राज्य जमा करेंगे और ७५ प्रतिशत राशि केंद्र देगा, यह उचित नहीं है। इस पर आपको ध्यान देने की आवश्यकता है।

अब मैं मांग संख्या ९२ पर आता हूं। महोदय, १०३ करोड़ रुपया और २०० करोड़ रुपया और जो भी आईडीबीआई को राशि दी है, वह राशि देने के बाद माननीय वित्त मंत्री जी का ध्यान हैंडलूम डव्लपमेंट सैक्टर की ओर गय्ाा[i88] ।

  उपाध्यक्ष महोदय, उन बुनकरों के लिए जो आज काम के अभाव में बैठे हुए हैं, उनके लिए वित्त मंत्री जी ने केवल ३५ करोड़ रुपए दिए हैं। यानी देश के हैंडलूम बनुकर जो करोड़ों की संख्या में हैं और जो आज पॉवरलूम इंडस्ट्री के आने से बेकार हो गए हैं और बुनकर से मजदूर बन गए हैं। उनके लिए आपने केवल ३५ करोड़ रुपए दिए हैं, यह उचित नहीं है। मेरा निवेदन है कि यह धनराशि बहुत कम है। उन्हें और देने की जरूरत है।

उपाध्यक्ष महोदय, वित्त मंत्री जी, चीन की बहुत तारीफ करते हैं और कहते हैं कि चीन ने ऐसा किया, वैसा किया। मैं बताना चाहता हूं कि चीन ने अपने गलीचों के एक्सपोर्ट को बढ़ाने के लिए गलीचों पर से डयूटी वापस ले ली। डयूटी ड्रॉ बैक कर ली। आज हमारा गलीचा उद्योग बहुत कठिनाई से गुजर रहा है। क्यों नहीं आप गलीचों पर लगने वाली डयूटी माफ कर देते ? गलीचा उद्योग में आज २० लाख बुनकर हैं जिनमें से आधे से ज्यादा फालतू बैठे हैं। उनके हैंडलूम बन्द हो गए हैं। वे आज मजदूरी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और जहां भी गलीचा उद्योग है, वहां के सारे लोग मांग कर रहे हैं कि हमारा जो गलीचा उद्योग है, उसे कॉटेज इंडस्ट्री का दर्जा दिया जाए और डयूटी माफ की जाए। उनकी न्यायोचित मांग आपने नहीं सुनी। आपने गलीचा उद्योग को अभी तक कॉटेज इंडस्ट्री का दर्जा नहीं दिया, जिसके कारण आज गलीचा बुनकर बेकार बैठे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय, मांग संख्या १०५, मनिस्ट्री ऑफ यूथ अफेयर्स एंड स्पोट्र्स की है। इसमें मंत्री जी ने ३ करोड़ रुपए दिए हैं और उनमें से २ करोड़ रुपए एक बड़े शहर में, एक बड़े स्टेडियम में, सिंथेटिक सर्फेस लगाने के लिए दिए हैं। हमें कोई ऐतराज नहीं है, आप सिंथेटिक सर्फेस लगाइए, लेकिन मनिस्ट्री ऑफ यूथ अफेयर्स एंड स्पोट्र्स को ज्यादा पैसा दें। अगर आप छोटे-छोटे शहरों में स्टेडियम बनाएंगे, तो उसके अच्छे परिणाम निकलेंगे। आप देखिए छोटे-छोटे शहरों से कैसे-कैसे खिलाड़ी निकल कर आए हैं। श्री मोहन सिंह धोनी, झारखंड से आए हैं। इरफान पठान हैं। एक लिम्बा राम हैं जो राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के आदिवासी क्षेत्र से हैं। उन्हें तीरंदाजी में एशियन मैडल मिला है। क्यों मिला, इसलिए कि उन्हें एशियन गेम्स में जाने का अवसर मिला। यदि हमें अच्छे टेलेंट ढूंढ़ने हैं, तो हमें बड़े-बड़े शहरों से निकल कर, छोटे-छोटे शहरों में जाना पड़ेगा, जहां हमारे बहुत सारे माने हुए खिलाड़ी हैं। ऐसा करने से उन्हें आने का अवसर मिलेगा और हमारे देश की मैडल संख्या बढ़ेगी।

उपाध्यक्ष महोदय, सबसे महत्वपूर्ण मांग संख्या कृषि की है। मैं सिर्फ इसके ऊपर बोलकर अपनी बात समाप्त कर दूंगा। बोलने के लिए तो बहुत है, लेकिन आप कह रहे हैं कि समय का अभाव है। इस मांग के ऊपर सदन के सारे सदस्यों ने चिन्ता जताई है। यह मांग है कृषि एवं सहकारिता की। श्री शरद पवार, हमारे कृषि मंत्री हैं। उन्होंने क्या कहा, वह मैं बताना चाहता हूं।

उनका कहना है कि-

“Forward Contract Regulation Act, 1952 needs to be amended as total volume of Commodity Future Trade increased from Rs. 1.29 lakh crore to Rs. 5.71 lakh crore in 2004-05. It stood at 20 per cent of GDP.”

 

 बहुत अच्छी बात है। वे जब कृषि मंत्री बने थे, तो सारे देश को बहुत उम्मीद थी कि अब कृषि क्षेत्र में विकास होगा, कृषि विकसित होगी, कृषि का निर्यात बढ़ेगा और कृषि क्षेत्र में प्रसंस्करण उद्योग लगेंगे। पूरे देश को उनसे बहुत उम्मीद थी, लेकिन मुझे बहुत दुख होता है यह कहते हुए कि कृषि मंत्री का ध्यान अब कृषि मंत्रालय से हटकर क्रिकेट मैच की तरफ चला गया है, बी.सी.सी.आई. की तरफ चला गया है। आज उन्हें यह चिन्ता है कि कल के टैस्ट मैच में युवराज सिंह खेलेगा या सौरव गांगुली। जब ऐसा है, तो कृषि विभाग और कृषि मंत्रालय कैसे चलेगा ?

उपाध्यक्ष महोदय, आपके अपने राज्य, पंजाब में कृषि की क्या हालत है, वह आप जानते ही हैं। वहां छोटे और मझोले किसान जमीन बेचने को मजबूर हैं और भूखों मरने के कगार पर पहुंच गए हैं। वहां लोग जान दे रहे हैं। वे अपना कर्जा नहीं पटा पा रहे हैं, लेकिन कृषि मंत्री जी को इसकी चिन्ता नहीं है। चूंकि समय का अभाव है, इसलिए मैं ज्यादा न कहते हुए, वित्त मंत्री जी से केवल इतना कहना चाहूंगा कि जब आपने बजट भाषण दिया था, तो कहा था क “ मैं हूं ना ” मैं कहना चाहूंगा कि अगर अब आपकी दिशा गलत हो गई और आप सही दिशा में नहीं गए, तो आपको सही दिशा दिखाने के लिए “ हम हैं ना ”यही मुझे कहना है।

श्रीमती प्रतिभा सिंह उपाध्यक्ष महोदय, सर्वप्रथम मैं आपको धन्यवाद देना चाहती हूं, जो आपने मुझे इतने महत्वपूर्ण विषय पर सदन में अपनी बात कहने का अवसर दिया। मैं केन्द्रीय सरकार के व्यय के लिए दूसरी अनुदानों की पूरक मांगों का समर्थन करने के लिए खड़ी हुई हूं।

महोदय, हमारा देश यू.पी.ए. की अध्यक्षा, माननीय श्रीमती सोनिया गांधी जी, प्रधान मंत्री, डॉ. मनमोहन सिंह जी के योग्य दिशा-निर्देश में दिनोंदिन प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहा है। किसी देश की तरक्की का आधार वहां के मनुष्यों के उच्च चरित्र के साथ-साथ उस देश की सुद्ृढ़ अर्थव्यवस्था होती है। हमारे देश के वित्त मंत्री, श्री पी. चिदम्बरम जी के कुशल आर्थिक नेतृत्व में हमारे देश की अर्थव्यवस्था नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है।

             महोदय, वर्ष २००५-०६ के लिए अनुदानों की पूरक मांगों के दूसरे बैच में ४८ अनुदान शामिल है। ९०७९.८१ करोड़ रुपए के सकल अतरिक्त व्यय को प्राधिकृत करने के लिए संसद का अनुमोदन मांगा गया है। इसमें से निबल नकद व्यय के प्रस्तावों की कुल राशि १९६५.१३ करोड़ रुपए है और मंत्रालयों तथा विभागों की बचतों द्वारा अथवा बड़ी हुई प्राप्तियों और वसूलियों द्वारा पूरे किए गए सकल व्यय की राशि ७११४.०८ करोड़ रुपए है। इसके अलावा ६० लाख रुपए के सांकेतिक प्रावधान की मांग की गई है, जिसमें व्यय की प्रत्येक मद के लिए एक लाख रुपए हैं, जिससे कि नयी सेवा अथवा सेवा के नये मामलों में बचतों का रीएप्रोप्रिएशन किया जा सके।

महोदय, मैं हिमाचल प्रदेश के मंडी संसदीय क्षेत्र से चुन कर आई हूं, इसलिए मैं आपके माध्यम से सदन का ध्यान हिमाचल प्रदेश की और आकर्षित करते हुए निवेदन करना चाहती हूं कि हिमाचल प्रदेश स्पेशल केटेगिरी स्टेट है और जहां तक प्रदेश के विकास का प्रश्न है. जितने साधन उपलब्ध होते हैं, उनके अनुरूप प्रदेश बराबर वांच्छित विकास कर रहा है। प्रदेश में ऐसे तो सभी जाति, धर्म एवं वर्गों के लोग रहते हैं, लेकिन देश के अन्य भागों की तरह हिमाचल प्रदेश में जाति-भेद एवं ऊंच-नीच का भेद दिखाई नहीं देता। वहां समान भाव से सभी धर्मों और वर्गों के लोग रहते हैं।

महोदय, हिमाचल प्रदेश पूर्व प्रधान मंत्री, स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी जी का सदैव ऋणी रहेगा, जिनकी प्रेरणा से २५ जनवरी, १९७१ को प्रदेश पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त कर सका। प्रदेश के सवार्ंगीण विकास हेतु केन्द्र सरकार की ओर से प्रदेश के पहाड़ी, शीत मरुस्थल, वनाच्छादित एवं न्यून वाणिज्यिक व कृषि गतवधियों को द्ृष्टिगत रखते हुए विशेष राज्य का दर्जा प्रदान कर सदैव सहयोग किया जाता रहा है। प्रदेश सरकार अपने पारम्परिक रुाोतों से जितनी आय हो सकती है, उसे प्रदेश के विकास में संलग्न करती रही है, जिसके कारण आज प्रदेश काफी तरक्की कर सका है, लेकिन प्रदेश की विकट भौगोलिक परिस्थितियां एवं अनूठी जलवायु है। प्रदेश की सरहदें एक तरफ तिब्बत से, दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर, तीसरी तरफ उत्तर प्रदेश और चौथी तरफ पंजाब से लगती हैं। प्रदेश के ट्रायबल जिले किन्नौर, लाहौल-स्पीति एवं चम्बा के पांगी व भरमौर मंडलों का सम्पर्क भारी बर्फबारी के कारण वर्ष में छ: महीने शेष देश से कटा रहता है। हिमाचल प्रदेश के ऊपरी पहाड़ों में जहां बर्फबारी से लोग परेशान रहते हैं, वहीं प्रदेश के मैदानी भागों में गर्मी से लोग बेहाल रहते हैं। यह हिमाचल प्रदेश का अनूठा मौसम है।

महोदय, प्रदेश सरकार प्रदेश के सभी क्षेत्रों में बराबर और समान रूप से विकास कार्यों में प्राणपन से जुटी हुई है, लेकिन प्रदेश की वचित्र एवं कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को द्ृष्टिगत रखते हुए मेरा भारत सरकार से निवेदन है कि वह प्रधान मंत्री, डा. मनमोहन सिंह जी के मई, २००५ में हुए प्रवास के समय प्रदेश के विशेष विकास हेतु और प्रदेश को देश का सच्चा आदर्श पहाड़ी प्रदेश बनाने हेतु की गई घोषणाओं और प्रदेश की आवश्यकताओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं। इनमें प्रमुख इस प्रकार है – प्रदेश के सभी पंचायत मुख्यालयों को सड़कों से जोड़ना, प्रदेश की ६००० छूटी हुई आबादियों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना, एक लाख हैक्टेयर भूमि को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराना, चल रही रेल परियोजनाओं हेतु अधिक धन आबंटित करना और सर्वेक्षण की गई नई रेल परियोजनाओं को प्रारम्भ करना। इन सभी कार्यों हेतु प्रदेश सरकार केन्द्र सरकार के वभिन्न मंत्रालयों से समय-समय पर बात करती रही है और समयबद्ध कार्यक्रम के अंतर्गत उक्त सभी कार्यों को पूरा करने की प्रार्थना करती रही है[r89] । लेकिन अभी तक वांछित परिणाम नहीं निकले हैं, इसलिए मैं केन्द्र सरकार से प्रार्थना करती हूं कि माननीय प्रधान मंत्री द्वारा की गई घोषणाओं के अनुरूप भारत सरकार हिमाचल प्रदेश सरकार को शीघ्र पूर्ण सहायता प्रदान करे।

उपर्युक्त के अलावा भी हिमाचल प्रदेश केन्द्र सरकार की ओर से कुछ क्षेत्रों में विशेष बजटीय एवं नीतिगत सपोर्ट एवं सहायता की उम्मीद रखता है। वे क्षेत्र हैं, नागर विमानन के अन्तरग्त कांगड़ा में गग्गल एवं कुल्लू में भुन्तर एयरपोर्ट की हवाई पटि्टयों के विस्तार हेतु नेशनल एयरपोर्ट एथॉरिटी द्वारा पूर्व में दिए गए ३० करोड़ रुपयों के अतरिक्त कम से कम २० करोड़ रुपये और तत्काल स्वीकृत किए जाने की आवश्यकता है, ताकि इन हवाई पटि्टयों पर ए.टी.आर. ५० विमान उतर सकें।

        हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक द्ृष्टि से पिछड़ेपन को देखते हुए उसे जम्मू-कश्मीर एवं पूर्वोत्तर राज्यों की तर्ज पर वर्ष २००७ से आगे भी एक्साइज कंसेशन जारी रखने की आवश्यकता है। बद्दी-चंडीगढ़ रेलवे लाइन का सर्वेक्षण पूर्ण हो चुका है, इसलिए इस पर आगे शीघ्र कार्य करने की आवश्यकता है, जिससे वर्ष २००८ तक यह रेलवे लाइन बनकर पूर्ण हो सके।

प्रधानमंत्री जी द्वारा ४०० करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता की घोषणा उनके प्रवास के समय मई, २००५ में की गई थी। उसे ५०० करोड़ रुपये तक बढ़ाने की आवश्यकता है, क्योंकि केन्द्र सरकार की तर्ज पर प्रदेश के कर्मचारियों के ५० प्रतिशत महंगाई भत्ते को मूल वेतन में शामिल करने के कारण प्रदेश वित्तीय संकट से गुजर रहा है।

अन्त में मैं रेलवे, पेयजल प्रदाय, रोड कनैक्टिविटी, सविल एविएशन, वित्त, मानव संसाधन, पर्यटन एवं संस्कृति, योजना, विद्युत, सूचना एवं प्रोद्यौगिकी, जल संसाधन आदि मंत्रालयों से सम्बन्दित जो अपेक्षाएं माननीय प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा प्रदेश सरकार से की गई थीं, उनके सम्बन्ध में प्रदेश सरकार की ओर से की गई कार्रवाई का एक संक्षिप्त विवरण सभा-पटल पर प्रस्तुत कर रही हूं। मेरा आग्रह है कि वांछित कार्रवाई वभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों की ओर से शीघ्रातिशीघ्र की जाए, ताकि प्रदेश उन्नति कर सके। इसे मेरे भाषण का हिस्सा माना जाए।

आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए आपके प्रति अपना आभार व्यक्त करती हूं और इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त करती हूं।

* महोदय, राज्य सरकार ने भनुपती-विलासपुर-वेरी रेलवे लाइन को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित करने का अनुरोध किया है तथा इस परियोजना का पूरा खर्चा केन्द्रीय सरकार को उठाना चाहिए। यह परियोजना प्रधान मंत्री जी के विशेष विकास पहल में शामिल है तथा चालू कीमत के अंतर्गत इस पर १२०० करोड़ रूपये कुल खर्चे का आकलन किया गया है। यह मुद्दा राज्यपाल महोदय ने केन्द्रीय रेल राज्य मंत्री के शिमला के दौरे के दौरान भी उठाया था तथा इस परियोजना को शुरू करने के लिए स्पेशल परपज व्हीक्ल के गठन का अनुरोध किया गया था।

नंगल-तलवाड़ा रेलवे लाइन के कार्य को गति प्रदान करने के लिए राज्य सरकार ने चूरड़ टकराला से अम्ब अन्दौरा के भूमि अधिग्रहण कार्य को तेज करके सभी १३ गांवों के लिए धारा ४ की अधिसूचना जारी कर दी है तथा कुल १३ गांवों में से ११ गांवों के लिए धारा ६/७ की अधिसूचना भी जारी कर दी गयी है। राज्य के महामहिम राज्यपाल ने केन्द्रीय रेलवे राज्य मंत्री श्री आर.वेलू से गत् २२ अक्तूबर, २००५ को शिमला में मीटिंग के दौरान अम्ब तथा तलवाड़ा के बीच बाकी बची सैक्शन को एकमुश्त स्वीकृति प्रदान करने का अनुरोध किया था जिससे भूमि अधिग्रहण की लागत को कम किया जा सके। रेलवे राज्य मंत्री ने यह संकेत दिया था कि रेलवे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को तेज करने के लिए एकमुश्त स्वीकृति प्रदान कर देगा।

कांग्रेस पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र के अनुरूप आगामी दो सालों में ६०३० आंशिक रूप से कवर की गयी बस्तियों को पेयजल सुविधा प्रदान की जानी है, जिसके लिए राज्य सरकार को अतरिक्त धनराशि मुहैय्या करवायी जानी चाहिए। इस समय सरकार के पास १८०० बस्तियों को वार्षिक पेयजल उपलब्ध करवाने की मशीनरी तथा प्रशासनिक ढांचा है तथा अतरिक्त बजट की अवस्था में प्रशासनिक ढांचे को सुद्ृढ़ किया जाना है।

राज्य सरकार ने प्रधान मंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह जी की घोषणा के अनुरूप राज्य की २५७ पंचायतों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए लगभग ३६६ करोड़ रूपये की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंपी है। यह ऐसी पंचायतें हैं जो कि प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना या किसी भी अन्य ग्रामीण विकास योजनाओं के दायरें में कवर नहीं होती।

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*—-* This part of the speech was laid on the Table.

        कांगड़ा हवाई अड्डे के रनवे को ४०० फुट तक बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने सड़क का रूख बदल दिया है तथा बाकी अन्य कठिनाइयों को भी सुलझा लिया गया है ताकि यहां ४५ सीट क्षमता का ए.टी.आर एयर क्राफ्ट उतर सके। भुंतर एयरपोर्ट के रनवे को बढ़ाने के लिए लगभग १०० करोड रूपये का खर्च आंका गया है तथा इसके लिए वैज्ञानिक शोध कार्य भी पूरे कर लिए गए हैं। राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हेलीकाप्टर सेवा शुरू करने की योजना बनायी जा रही है तथा संबंधित मंत्रालय को भेज दी जायेगी।

प्रधान मंत्री जी ने यह आश्वासन दिया है कि राज्य के वित्तीय घाटे को दूर करने के लिए केन्द्रीय मदद उपलब्ध करवायी जायेगी तथा इस पर विस्तृत योजना बनाने के लिए योजना आयोग ने सैद्धांतिक सहमति प्रदान कर दी है। राज्य सरकार ने रज्य के तीन विश्वविद्यालयों में ढांचागत सुविधाओं में बढ़ोत्तरी के लिए विस्तृत परियोजनायें मानक संसाधन विकास मंत्रालय को भेज दी हैं इनमें हिमाचल संसाधन विकास मंत्रालय को भेज दी है, डाक्टर वाइ.एस. परमार वागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय सोलन के लिए १३.२३ करोड़ रूपये एवं चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के लिए १३.१८ करोड़ रूपये की योजनायें तैयार की है।

राज्य सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ९७ करोड रूपये लागत की ९ परियोजनायें केन्द्र सरकार को भेजी हैं, जिनमें से तीन परियोजनायें केन्द्र सरकार ने स्वीकृत कर ली हैं।

सतलुज जल विद्युत निगम में राज्य सरकार की हिस्सेदारी को ३० प्रतिशत बढ़ाने की राज्य सरकार की मांग को केन्द्र सरकार ने सैद्धांतिक मंजूरी प्रदान कर दी है तथा सभी भावी परियोजनाओं में भी ३० प्रतिशत हिस्सेदारी को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है।

राज्य के जनजातीय लाहौल स्पीति तथा किन्नौर जिलों में दूरदर्शन सुविधा के लिए २०,००० डी.टी.एच. सैट बॉक्स प्रदान करने की केन्द्रीय स्वीकृति राज्य सरकार को प्राप्त हो गयी है। *

 

श्री मुन्शी राम महोदय, मैं वर्ष २००५-२००६ की अनुपूरक मागों का समर्थन करता हूं। माननीय मंत्री जी एवं हमारे देश के प्रधान मंत्री देश से भ्रष्टाचार एवं काला धन मिटाना चाहते हैं। मेरा सुझाव है कि हम जो भी अनुदान कृषि एवं मिट्टी के तेल के माध्यम से गरीब जनता को देना चाहते हैं, उसका ८० प्रतिशत धन अधिकारियों के माध्यम से काले धन के रूप में चला जाता है। यदि हम वास्तव में अपने देश की गरीब जनता की मदद करना चाहते हैं, तो हमें ऐसे गरीब लोगों को गरीबी भत्ता एवं बेरोजगारी भत्ते के रूप में सीधे गरीब व्यक्ति को बैंक के माध्यम से देना चाहिए जिससे हमारे देश का धन जो काले धन के रूप में जाना जाता है, वह सीधा सरकुलेशन में आ जायेगा क्योंकि गरीब व्यक्ति उस धन को खर्च करेगा। वह उसे बैंकों में नहीं रखेगा।

किसानों को अनुदान के लिए १००० करोड़ रुपये का धन जो इस अनुपूरक मांग में रखा गया है, इससे ज्यादा किसान को मजबूत यदि हम बनाना चाहते हैं तो हमें कम से कम ब्याज दर पर किसान को कर्ज देना चाहिए। उसको अपनी फसल बचाने के लिए जो खेती में बिजली का उपयोग किया जाता है, बिजली न मिलने के कारण ३५ रुपए प्रति लिटर डीजल के द्वारा किसान अपनी फसल को बचाता है। भारी उद्योग विभाग, ब्रिज एंड रूफ इंडिया लि. की पुनसर्ंरचना बकाया ऋण एवं ब्याज दंड सम्बन्धी ब्याज को ३१.९१+ ३०.७३ = ६२.६४ करोड़ रुपये माफ किया जा रहा है। इसी प्रकार बीबीजे कन्सट्रक्शन नि.लि. को पुनसर्ंरचना के परिणाम स्वरूप आप शून्य प्रतिशत पर ऋण के लिए १० करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। ऐसा क्यों है ?

             पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को मिट्टी का तेल जो मिलावट में जा रहा है, उसके लिए ५७५० करोड़ रुपये अनुदान में रखे गये हैं जिसका ८० प्रतिशत काला बाजारी एवं काले धन को उत्पन्न करने के लिए जा रहा है। पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास वित्त निगंम लि. को ब्याज रहित ऋण का प्रावधान रखा गया। यह योजना पूरे देश में क्यों नहीं रखी। पुन: मैं अनुपूरक मांगों का समर्थन करता हूं।

 

*Speech was laid on the Table.

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया अनुपूरक मांगों पर चर्चा हो रही है, किन्तु देश की हालत ठीक नहीं है। जब धन खर्च होना चाहिए, उसकी प्राथमिकताएं ठीक से तय नहीं की गयीं, उसके परिणाम को काव्य रूप में इस प्रकार व्यक्त किया गया है :

आवाम महंगाई से परेशान है, किसान अपनी लूट से हैरान है,

नवजवानों पर बेरोजगारी मेहरबान है।

व्यापारी पर कानून की तलवार लटकती है और

आपकी अर्थव्यवस्था दलालों की चौखट पर सिर पटकती है।

चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है और इमानदार का मुंह काला है,

बताइए चिदम्बरम जी, इनका कौन रखवाला है।

जिन्हें रोटी की जरूरत है, रोटी न मिली, जिन्हें बोटी की जरूरत है, बोटी न मिली।

तुम्हारी सियासी तकदीरों को चाटें, नंगे को लंगोटी न मिली।

जोर और जुल्म के होने से शुरू होती है, किसी गरीब के रोने से शुरू होती है,

भस्म होते तख्ते ताउस, जब आग किसी कोने से शुरू होती है।

किसान बीमा की इकाई खेत होना चाहिए जहां नुकसान हुआ है। पर्यटन पर ध्यान नहीं दिया गया है, खजुराहो में इण्डियन एयरलाइन्स की फ्लाइट बन्द है। सड़कें भी खराब हैं। बुन्देलखंड पिछड़ा हुआ और सूखाग्रस्त है। वहां पर विशेष पैकेज की आवश्यकता है। किसान को उसके फसल के लाभकारी मूल्य की व्यवस्था करना आवश्यक है। सब्सिडी फर्टिलाइजर कम्पनियों की जगह किसान को उपलब्ध कराएं तथा सहकारिता में कर्ज पर ब्याज घटायी जाए और राष्ट्रीय बैंकों की बहाली की जाए। १२वें वित्त आयोग की राशि ११वें वित्त आयोग की तरह दी जाए ताकि बड़े कार्य हो सकें।

*Speech was laid on the Table .

 

SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU Mr. Deputy-Speaker, Sir, I am supporting the Supplementary Demands for Grants (General) for the year 2005-06. I am giving suggestions on two or three areas. The first area is agriculture. Seventy per cent of the farming community depend on agriculture. It contributes 25 per cent to the GDP. Thirty per cent of the people depend upon the industry and service sectors and contribute 70 per cent to the GDP. So, agriculture sector needs more subsidy and also more budget. So, it constitutes 65 per cent of the work force. For the last two or three years, you will observe that everywhere in the country – even in Andhra Pradesh, Maharashtra and Orissa – thousands of farmers are committing suicide. The farmers have no respect in the village. They have no savings. There is no development in the villages. There is no infrastructure in the villages. Whenever a major occasion like education or marriage of their children takes place or a major disease occurs in their families, they have to sell their lands. This is the situation prevailing in our country. That is why, agricultural growth for the last three years is below 1.3 per cent. You can see that from the years 1980 to 1996, the growth rate of agriculture is 3.2 per cent. In the Ninth Plan, it declined to two per cent[reporter90] .

20.00 [ak91]  hrs.

In the 10th Plan our target was 4 per cent, but in the last three years we have not even achieved more than 1.5 per cent. This is a very alarming situation. The hon. Prime Minister has also expressed his dissatisfaction about this agricultural growth. How can we achieve this growth without proper funding or without providing subsidies to the agricultural farmers? I would like to know this from the hon. Minister.

Secondly, I would like to talk about the Minimum Support Price (MSP). The Government of India is fixing MSP for the agricultural commodities. Therefore, who is responsible if they are not getting the MSP? Is it not the responsibility of the State Government or the Central Government that the farmers are committing suicide? In Andhra Pradesh, in the last one year, the chili farmers, cotton farmers, tobacco farmers are not getting the MSP. We are giving representation on this issue to the hon. Commerce Minister, to the hon. Prime Minister, and to all the concerned Ministers, but still the farmers are not getting support from the Government of India. There is no MSP for the chili farmers too. There is the Market Intervention Scheme (MIS) and the Government of India can intervene in this issue, but that is also not happening in the State of Andhra Pradesh. Till yesterday, nearly 3,000 farmers have committed suicide.

 Thirdly, I would like to talk about an aspect that I have raised on many occasions earlier also. Since last year, the hon. Finance Minister is increasing the credit at 30 per cent every year. This is a good step, but more than 20 banks have not followed the Reserve Bank guidelines to implement 18 per cent of the credit, and the Finance Ministry has not taken any action against those bankers. We have to initiate action on any bank that unscrupulously violates those guidelines. This would make them implement it out of fear, but that also is not happening in this case. If we see the Standing Committee Reports on Agriculture or other Financial Standing Committee Reports, then we would observe that they have also clearly given bank-wise list of the banks who have not followed the guidelines of the Reserve Bank.

Fourthly, I would like to talk about the OBCs. In our country, OBC population constitutes more than 50 per cent of the population. What is the allocation in the National Backward Finance Corporation for their development, and for their financial support? It is below Rs. 100 crore only. This Government, and even the previous Government increased only Rs. 5 crore or Rs. 10 crore for it, that is, the budget allocation is only Rs. 100 crore for more than 50 crore population. How is it possible to develop the OBCs in this country like this? I am asking this because most of the people in the OBC community are below poverty line, and their educational level is also very poor. Therefore, the allocation for the National Backward Finance Corporation for OBCs should be increased to more than Rs. 1,000 crore, and it should be at par with SCs and STs. The allocation given for SCs and STs — a Constitutional status — is also according to their population, but for OBCs, it is not even according to their population. Even if Rs. 1,000 crore is given to them in the beginning itself, then it would mean that each State and Union Territory would not get more than Rs. 50 crore or Rs. 60 crore. Every year we are fighting to achieve this objective, but there is not much improvement in this regard.

We are constructing beautiful roads under the Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana (PMGSY) or the Golden Quadrilateral project, but since the last two years there is not much progress in the rural areas. In my district, and even in my neighbouring districts many road works have been stopped. Therefore, special attention should be given to the Golden Quadrilateral project and also to the PMGSY as these are good programmes. After independence, the NDA Government, for the first time, has launched this programme, and everybody is happy with it. The target was that they would implement it in villages where the population is more than 1,000 and in its second phase the villages that are having a population of more than 500 would be covered. This is a good scheme, and we have to provide more money for better rural infrastructure.

In this Budget, our hon. Finance Minister has brought all the drinking water schemes under the Rajiv Gandhi Drinking Water Mission, but that scheme has not been launched till date, and we are already in the month of December. The Government of India introduces a lot of schemes, but due to various procedural glitches the schemes are not taking off as expected. For example, in agriculture 10 schemes have been approved in the 10th Plan, but only three schemes are being implemented[ak92] .

Operationalisation of a new scheme involves preparation of detailed project report, approval from the Planning Commission, preparation and approval of EFC, approval of the competent authority before it goes to the Cabinet. Almost three years of the Tenth Plan are already over. We have only two years left. Out of ten schemes in the Ministry of Agriculture, only three schemes have been approved. It is happening in every Ministry. Schemes are being announced by the Government on the floor of the House, but they are not being launched and the money is not being spent. This is happening in every Ministry. The hon. Minister has to concentrate on simplification of procedure instead of the schemes having to go to EFC, Cabinet Committee on Economic Affairs and so on. When you subject the schemes to go to so many Committees for approval, it naturally gets delayed and the ultimate objective of the scheme is forfeited.

In every Ministry, the Minister himself has to involve in the entire scheme of things and see as to why schemes are not taking off. Once a scheme is announced on the floor of the House, the Government has to ensure that they are implemented properly.

With these words, I conclude.

PROF. M. RAMADASS Hon. Deputy-Speaker, Sir, I rise to support the Supplementary Demands for Grants moved by the hon. Finance Minister for the simple reason that these grants are required for giving a new momentum to the development of Indian economy.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Yerrannaidu has taken five minutes. You are also requested to take not more than five minutes.

SHRI KINJARAPU YERRANNAIDU : We are very disciplined Members, Sir.

PROF. M. RAMADASS : Many of the Hon. Members, including Mr. Swain, have raised a number of long-term issues and lamented that they have not been adequately addressed by the Supplementary Budget. Among the various questions Shri Swain raised, I am perplexed by one statement which he quoted from the magazine India Today. He said that five or six great economists of this country have said something and he reeled out the names. I am also a Professor of Economics but I have never heard the names of the persons he has mentioned.

They are quoted to have said that there is nothing happening in the Government. I do not know how a national magazine says that in the UPA Government nothing is happening when the Government is spending Rs.5,14,344 crores through the Budget. How can a Government remain idle after incurring this expenditure without taking up any activities? As he himself has agreed, the Indian economy in the first half of 2005-06 has grown at the rate of 8.1 per cent. Is it possible without any of these activities taking place?

            The second point that he made was that economic reforms were carried out by the previous Government and they are not carried out by the present Government. Governments may come and Governments may go but economic policies and reforms will have to continue forever. There is only one difference. During the NDA regime, we had economic reforms without a human face. A growthless process was initiated and it was only a nihilistic development that was brought by the NDA Government. But here is a Government which has not only

 completed the first generation reforms but it has also taken up the second generations reforms with a human face.

That is why the Government headed by Dr. Manmohan Singh has brought a number of social policies. The most important among them are the National Rural Employment Guarantee Bill; the Bharat Nirman Mission, the National Rural Health Scheme. These and so many other schemes were launched to bring about tangible benefits to the poor people. Therefore, the Government is taking a compromise between economic reforms and human face of the people.

            Another Member said that the budgetary process in this Government is a bureaucratic process.

MR. DEPUTY-SPEAKER: The reply to the debate will be given by the hon. Minister. You are not expected to give reply to the hon. Members. You have to speak on your own behalf.

PROF. M. RAMADASS : Yes, Sir.

            With regard to the budgetary reform he said that it is merely a bureaucratic exercise. I do not know how it is a mere bureaucratic exercise. Maybe during the NDA Government we had an IAS officer who was the Finance Minister who did it. But here is a Finance Minister who is excellent in professional management of finance. That is why he has brought a number of innovations in budget[KMR93]ing .

            Have you heard of a Finance Minister in the history of India who talks in terms of outcome Budget and not outlay Budget? Have you seen a Finance Minister who has given a comparison between what has been announced in the previous year’s Budget and what has been achieved?  In the last Budget, he has made 64 announcements, out of which 28 have been implemented; on 24, action has been taken; and only in the case of 10, action is being taken.  Many more achievements will come. 

Here is the Finance Minister who has presented a Mid-Term Economic Survey.  Normally, we get an Economic Survey when the full-fledged Budget is presented.  But here we have a Mid-Term Economic Survey also.  Therefore, what I wish to say is that the Supplementary Demands for Grants is not meant to discuss long-term measures.  Supplementary Demands for Grants comes only for seeking additional funds for incurring some of the expenditure or carrying out some of the activities which could not be anticipated at the time of budgeting.   That is the main purpose of it.  Viewed from this angle, the Supplementary Budget presented by the hon. Finance Minister deserves to be complimented because out of the total amount of Rs.9,079 crores, only Rs.1,965 crores will go in the form of cash flow, and the remaining amount will be matched by the savings by the Ministry itself, which shows that the Ministry of Finance is incurring more expenditure out of its own funds generated and deploying the funds and resources for various schemes.  Therefore, we should accept and appreciate this.

            At the same time, I would like to submit to the hon. Finance Minister  only two or three points which he should keep in mind.  Firstly, out of the total Supplementary  Budget, 90 per cent goes for Non-Plan expenditure unlike the previous year Supplementary Budget, where 60 per cent went for Plan expenditure and 40 per cent for Non-Plan expenditure.  This is not a desirable trend.  Out of Rs.9,080 crores, total subsidies and support constitute  81.5 per cent, which is Rs.7,403 crores, I do not know whether this will be consistent with the economic reforms which we are talking about. LPG and Kerosene alone will take Rs.5,750 crores; fertilizers – Rs.1,000 crores; PSUs revival and restructuring Rs.293 crores; State Trading Corporation – Rs. 104 crores; and Cotton Corporation of India – Rs.256 crores. Altogether, Rs.7,403 crores, that is, 81.5 per cent goes in the form of subsidies and support.  Delhi Metro Rail Corporation takes Rs.685 crores; IDBI for SASF – Rs.250 crores, and IMF valuation adjustments – Rs.243 crores. Therefore, the structure of the expenditure appears not to be consistent with the economic reforms which we are making. 

Therefore, the first issue is that subsidy on Kerosene this year will be around Rs.15,182 crores.  While the increase is likely owing to higher global oil prices, is the Government planning  any steps to lower the total subsidy bill for future years in the case of global oil prices being hiked? 

            Secondly, with this Supplementary Demands of Rs.293 crores towards revival, restructuring, accounting adjustments and waiver in convention interests, outstandings of public sector enterprises, the total support to these enterprises for the year is Rs.1,231 crore.  Is there a specific time-frame, out of which the Government expects these enterprises  to break even?  What steps the Government would be taking to achieve these objectives? 

Thirdly, the Government proposes to transfer Rs.200 crores to  State Governments from the National Calamity Contingency Fund for calamities of severe nature.  I do not think that this amount is sufficient.   Tamil Nadu has recently been affected by unprecedented rainfall, storm and other things.   Same is the case with Pondicherry. But how this Rs.200 crores transfer from the Fund will be able to meet it? What is the State-wise break-up of this?

Lastly, there is an additional amount of Rs.694 crores being demanded for providing additional equity and meeting additional expenditure of Delhi Metro Rail Corporation. What has changed since February that these requirements could not be envisaged at the time of original Budget?  These are my reflections on the Supplementary Budget.  With these words, I support the Supplementary Demands for Grants. 

 

SHRI KHARABELA SWAIN Shri Siddharta Ray, Chief Economists, Tata Group, Shri Vivek Debroy from Rajiv Gandhi Institute, Shri  Sunil Gokarna, Chief Economists, CRISIL.  I am surprised that he does not know them!

MR. DEPUTY-SPEAKER Shri P. Karunakaran , I would like to inform you that though no time is left  of your party, I would like to accommodate  you only with the condition to speak for only two minutes[R94] .

 

 

SHRI P. KARUNAKARAN Sir, I really congratulate our Finance Minister for his patience to hear the discussion. We have got the Mid-Term Economic Review and also the Mid-Term Appraisal of the Tenth Five Year Plan. I do not want to go into the details. In the Report given by the Finance Minister, the growth rate of this year is 8.1 per cent. It is really a progressive figure. But at the same time, when we go into the details of the different sectors, we see that performance of many of the sectors is not satisfactory and not up to the mark.

            In the Budget of 2005-06, we are aiming at a sustained growth rate of seven to eight per cent. We discussed these issues — Eradication of poverty, reduction of unemployment, industrial and agricultural growth – in detail. I agree that the export has increased to such an extent and also it is said that the inflation rate has declined. In some sectors, we have made a remarkable progress. When we say that the inflation rate is under control, it does not really reflect in the day-to-day life of the common people. The Finance Minister has said that the inflation rate has declined from 5.7 per cent to 3.7 per cent. At the same time, the price of petroleum products has resulted in an upward trend in retail and wholesale prices. The total outcome of the schemes or  projects and the administrative steps taken by the Government has not really translated as per the expectations and experiences of the  positive programmes of the people.

 We spoke much about agriculture. I think, almost all the Members have spoken about it. The rice production has decreased to 85.31 million tonnes from 88.28 million tonnes. This is a decrease. The same is the case of wheat also and in other agricultural products also.

            In Kerala and in many other States, this year we have witnessed the suicides of a large number of farmers. I do not think that it is merely because of the bad weather. The main reason is the import policy that we have adopted. I myself have placed before the House the position of farmers in Kerala who are engaged in the production of pepper, cardamum, rubber, tea and arecanut. Kerala alone has got about 1,300 farmers who have committed suicide. In Andhra, it comes to about 7000. It is true that in many of the States. This is the time to review the Government’s policy, how they have inflicted. What is the result of these policies in the day-to-day lives of the people?

One more thing is with regard to industrial side. I do not want to go into the details. In Kerala, the traditional industries are the main thing. The day-to-day lives of the people of Kerala are connected with the traditional industries. About 40 lakh people are working in these industries, like coir, cashew, handloom, Beedi and fisheries sectors. It is true that the State Government has to do much. But, at the same time, the incentives that have come and also the working capital the Centre has to take more appropriate steps. It is stated that there is much progess in the textile sector. It is true that there is progress in the export. But at the same time, hundreds of mills are closed in our country. Thousands are out of the mills. The policy that we have taken is to see how it affects the lives of the common people, that is, agricultural workers.

 One more point is that we have not taken up FDI in all the sectors. It should be in the selected sectors. We have to see that with regard to civil aviation, banking sector and insurance sector and also other core sectors that are there for the safety of the nation. I would like to say that the Government has to reconsider this issue. I would like to conclude with only two points.

            As far as the national survey is concerned, it is reported that the poverty line in Kerala is only 7 per cent. It is a very wrong assessment. But we see a number of other surveys in Kerala which states that it is 37 per cent. As a result of the national survey, Kerala is neglected and denied many of the schemes that other States get. For example, PURA scheme is not included in Kerala, National Rural Programme is not there in Kerala, PRY’s fund is very limited for Kerala. I request the Finance Minister to see the real situation in Kerala.

            In the last Budget speech, our Finance Minister said that no student in our country would be denied higher education because the nationalised banks and other banks are ready to give loans. I have my own experience. In my own constituency, even with the letter of the Chief Minister, written through the District Collector, banks deny loans to poor students, for one reason or the other. As a result of that, Rejeny in Trivandrum, Faseela in Calicut and Mamata in Karnataka and other students committed suicide.

            It is true in the case of agriculture sector. I appreciate the approach taken by the Finance Minister to give loans to the farmers. At the same time, when we approach the banks, the result is that they are not getting loans, for one reason or another.

            I have only two points to make.

MR. DEPUTY-SPEAKER: No. Please conclude your speech.

SHRI P. KARUNAKARAN : Okay; I will make only the last point. It is with regard to some legislation. As far as Kerala is concerned – this concerns not only Kerala, but all over the country – people go outside as NRIs. The Government should think of bringing forward a legislation to give voting power to these people. I request the Government to come up with a comprehensive legislation because they are contributing much to the nation. They should have the voice here. Our people go there because of acute unemployment. It is really an unfortunate and a sad story. They go there, even the women go there; and are compelled to go there for some livelihood. They go there even as housemaids. What is reported in the media is that these women workers were ill treated. I would like to reserve uttering words like ‘their modesty itself is questioned and challenged’.

            In this context, I would like to say that Philippines has made model legislation; it is the only nation that has given such legislation to their people staying outside. They have that sort of legislation; Sri Lanka has done it. I request the Government also – though not directly – to have such legislation so that the sponsor registers their names in the Embassies, and that the details of workers are available with them so that we could save our workers who are going outside. It is our duty; it is the duty of the Government to do it. I place this issue also before the Government. 

                                                                       

श्री किशन सिंह सांगवान उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे जनरल बजट की अनुपूरक अनुदानों की मांगों पर बोलने का मौका दिया। यहां पर कई माननीय सदस्यों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए हैं। वित्त मंत्री जी बैठे हुए हैं, जब इन्होंने पिछला बजट पेश किया था तो बड़े आत्मविश्वास से, बड़ी चतुराई से ऐसा बजट दिखाने की कोशिश की थी कि जैसे देश एक वर्ष में खुशहाल हो जाएगा। “भारत निर्माण ” नाम इतना बड़ा है और ऐसा नाम चुनकर दिया कि जैसे भारत का नव निर्माण हो जाएगा। पता नहीं अधिकारी लोग एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर आंकड़ें प्लस-माइनस करके, इधर से उधर करके किस प्रकार की तस्वीर पेश करते हैं[R95] ।लेकिन ग्राउंड लेवल पर बिल्कुल डिफरेंट पोजीशन है। यह ठीक है कि हमारा देश गांवों में बसता है। हमारी अर्थव्यवस्था गांवों पर निर्भर करती है। गांवों में ८० प्रतिशत लोग रहते हैं, जिनमें किसान भी हैं, मजदूर भी हैं और कारीगर भी हैं। मैं जानना चाहता हूं कि क्या उनकी स्थिति में खासतौर पर आर्थिक स्थित में कुछ सुधार हुआ है? पिछले वर्ष किसानों को जो भाव मिला और उसके पिछले साल यानी दो साल पहले जो भाव मिला, क्या मंत्री जो को उसकी जानकारी है? आज धान की फसल बाजार में है। पिछले साल धान ७००-८०० रूपए प्रति क्िंवटल बिका था, क्या आज ६००-७०० रूपए में नहीं बिक रहा है? पिछले साल कपास २७००-२८०० रूपए प्रति क्िंवटल बिका था, क्या आज वह १४०० रूपए नहीं बिक रहा है। एक-एक क्िंवटल पर एक-एक हजार-हजार रूपए का अंतर आ रहा है। किसान पिट रहा है और आप कह रहे हैं किसान बड़ा खुशहाल है। आप मनिमम सपोर्ट प्राइज की बात करते हैं कि पिछली बार की इस सरकार ने १५ रूपए प्रति क्िंवटल धान की कीमत में मनिमम सपोर्ट प्राइज बढ़ा दिया, गेंहूं पर १० रूपए प्रति क्िंवटल बढ़ा दिया। क्या १५ रूपए प्रति क्िंवटल बढ़ाकर बड़ा तीर मार लिया और वह भी परमल किस्म के धान की कीमत आपने बढ़ायी। देश में ९० प्रतिशत उत्पादन दूसरे किस्म के धान का होता है। १५ रूपए बढ़ाकर हजार रूपए क्िंवटल का नुकसान हो रहा है और यह सरकार वाहवाही लूट रही है। जब किसान खुशहाल नहीं होगा, किसान का जब तक भला नहीं होगा, जब तक किसान को न्यूनतम सपोर्ट मूल्य की बजाए उसका लाभकारी मूल्य नहीं मिलेगा, आपने नया न्यूनतम सपोर्ट प्राइज लिख दिया, वह भी बहुत लमिटेड है, जब तक न्यूनतम लाभकारी मूल्य किसानों को नहीं मिलेगा, किसानों की आर्थिक स्थिति नहीं सुधर सकती। यहां जितने माननीय सदस्य हाउस में हैं, उनमें से कोइ भी संसद सदस्य बगैर किसानों की मदद के चुनाव जीतकर इस हाउस में नहीं आ सकता। सब को किसानों से हमदर्दी है, सब अपनी-अपनी समस्याएं रखते हैं, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि ५०-६० सालों से हर आदमी, हर सरकार किसानों की बात करती है, लेकिन किसान पिसता जा रहा है। सुसाइड के केस बढ़ रहे हैं। बहुत से सदस्यों ने इस विषय में कहा है, मैं इसकी डिटेल में नहीं जाना चाहता। पंजाब जैसे प्रांत में कितने सुसाइड हो रहे हैं? किसान को क्या चाहिए? किसान को चाहिए – बिजली सस्ती मिले, किसान को पानी चाहिए, किसान को सस्ते बीज और पेस्टीसाइड चाहिए और बाजार में उसको अच्छा भाव चाहिए। इन चार चीजों को सरकार किसानों को नहीं दे सकी और यहां वाहवाही लूटते हैं कि हमने किसानों के लिए यह कर दिया। मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि जब पिछले वर्ष आपने बजट पेश किया और आज तक क्या मंहगाई नहीं बढ़ी है? क्या गैस, डीजल, ईंट, कोयला, दवाइयों के दाम नहीं बढ़े हैं।पिछले वर्ष की तुलना में ३० से ३५ प्रतिशत के लगभग हर वस्तु के दाम बढ़े हैं, तो आप कैसे कह सकते हैं कि यह गरीबों की सरकार है? गरीबों को नुकसान हो रहा है। मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि अटल जी की सरकार ने जो प्रधानमंत्री सड़क योजना, जिसके बारे में बहुत से माननीय सदस्यों ने कहा भी है, क्या उस पर काम कम नहीं हो गया है? सभी नदियों को जोड़ने का एक प्रोजेक्ट फ्लड के इलाज के लिए, सूखे के इलाज के लिए बनाया गया था, क्या उस योजना को ठंडे बस्ते में नहीं डाल दिया गया है? तो कैसे यह भारत का निर्माण करेंगे? क्या माननीय मंत्री जी बताएंगे कि गांवों में रहने वाले रूरल आर्टीजन जैसे- खाति, कुम्हार, लुहार, जुलाहे, चमार और धोबी आदि हैं, क्या वे बेरोजगार नहीं होते जा रहे हैं?उनके बारे में क्या किया जा रहा है? आंकड़ों का खेल चल रहा है। जमा, प्लस-माइनस कर देते हैं, लेकिन ग्राउंड रियलिटी को भूल जाते हैं।जब तक ग्राउंड रियलिटी पर नहीं जाएंगे, तब तक न किसान खुशहाल होगा, न गरीब खुशहाल होगा और न देश का विकास होगा और न भारत का निर्माण होगा। मैं एक बात और कहना चाहता हूं, किसानों के लिए, गांवों के लिए आमदनी का दूसरा साधन पशुधन का पालन होता है।माननीय मंत्री जी आंकड़े बता रहे हैं कि सन् १९५२ में एक हजार व्यक्ति के पीछे ४५२ पशुधन था और अब सन् २००० में एक हजार के पीछे केवल १८८ की संख्या रह गयी है[c96] ।साधारण लोगों की आमदनी कम हो गई है। पहले पशु धन से कुछ लोग गुजारा करते थे। आप किस द्ृष्टि से कह रहे हैं कि लोग खुशहाल हो रहे हैं? कृषि मूल्य आयोग में कितने किसानों के प्रतनधि हैं? अधिकारी वातानुकूलित कमरों में बैठ कर उनके भाव तय करते हैं? उनको मालूम नहीं होता कि किसानों को किस मजबूरी में काम करना पड़ता है। उनका सारा परिवार इस काम में लग जाता है। वे अपनी फसलों को रात में पानी देते हैं। उन्हें बिजली और खाद मंहगी मिलती है। वे जब बीज खरीदते हैं तो वह मंहगा मिलता है। उसकी फसल मार्किट में आने पर उसके भाव गिर जाते हैं। कृषि मूल्य आयोग में गांव के किसानों के प्रतनधि नहीं होंगे तो उन्हें इंसाफ मिलेगा? मेरा सुझाव है कि उसमें किसानों के प्रतनधि रखे जाएं।

आप जब सपोर्ट प्राइस तय करते हैं तो सब चीजों का ध्यान रखते हुए उसे तय करें। किसानों को उनकी फसल का लाभकारी मूल्य दिया जाए। सपोर्ट प्राइस से किसी का पेट नहीं भरता है। फसल बोने से पहले उसके भाव तय किए जाएं। इससे न अर्थव्यवस्था जुड़ी है और न ही बजट जुड़ा है। अगर आप सारा हिसाब लगा कर किसान की फसल के भाव तय करेंगे कि फला-फलां फसल का इतना रेट होगा तो किसान दिमागी तौर पर तैयार हो जाएगा। उसे पता लग जाएगा कि उसे भाव ठीक मिलेगा या नहीं, वह उसकी काश्त करे या नहीं? वह अपनी मर्जी से काश्त करेगा। उससे फसलों के डाइवर्सफिकेशन का परपज भी हल हो जाएगा। इसलिए फसल बोने से पहले उनके प्राइस तय हों ताकि किसान लूटा न जाए । वह अपनी मन-मर्जी से मानसिकता बना कर अमल कर सके। इतना कहते हुए, आपने बोलने का समय दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद।

                                               

श्री रतिलाल कालीदास वर्मा उपाध्यक्ष महोदय, २००५-२००६ की अनुदानों की पूरक मांगों पर मैं मेरे विचार व्यक्त करना चाहता हूं।

माननीय वित्त मंत्री जी जो धनराशि मांग रहे हैं, उसका उचित उपयोग होना चाहिए। परमाणु ऊर्जा के लिए, इंदिरा गांधी परमाधु अनुसंधान एवं भाभा परमाणु अनुसंधान के लिए १.१० करोड़ धनराशि की मांग की गयी है। हम सभी जानते हैं कि आज परमाणु ऊर्जा का महत्व अधिक बढ़ गया है। पहले से उत्पन्न हो रही ऊर्जा हो या अन्य रुाोत से ऊर्जा उत्पन्न की जाये वह अत्यधिक मंहगी पड़ती है, इसलिए भिन्न भिन्न खोजों के द्वारा ऊर्जा प्राप्त करना एक महत्व का काम रहा है और उसके लिए मंत्री जी ने जो मांग की है, वह सराहनीय है।

उसी तरह उर्वरक सब्सिडी के लिए भी अनुदान की मांग की गयी है। लेकिन इस सब्सिडी का लाभ किसानों को नहीं मिलता है। लेकिन थोक व्यापारी एवं उद्योगों के लोगों को ही इसका लाभ मिलता है। बड़े बड़े मुनाफाखोर इसका लाभ ले लेते हैं और किसान वहीं का वहीं रहता है। कभी कभी उचित दाम पर भी घटिया कक्षा का उर्वरक मिलता है। खेत भी बिगड़ता है, फसल भी बिगड़ती है और किसान का वर्ष भी बिगड़ता है। लेकिन आज तक किसी घटिया उर्वरक देने वाले को कोइ सजा नहीं हुयी है। मा० मंत्री जी स्वदेशी वनियंत्रित उर्वरकों पर सब्सिडी, आयातित वनियंत्रित उर्वरकों पर सब्सिडी, आयातित उर्वरक और नाइट्रोजन उर्वरक पर सब्सिडी देना चाहते हैं। मैं आशा करता हूं कि इसका लाभ सही रूप में किसानों को मिलेगा।

मा० मंत्री जी स्टेट ट्रेडिंग कार्पोरेशन प्रत्येक राज्य में महत्व का स्थान रखता है, उसको मजबकूत रखना होगा। उसके जो पेंडिंग केसिस हैं, उनको जल्दी निपटाकर जो धनराशि मांगी गयी है, उसके द्वारा राज्यों को भी दिया जायेगा, ऐसी मैं उम्मीद रखता हूं। मद ३१ में संयुक्त राष्ट्र की प्रजातंत्र नधि को अंशदान देने हेतु ४० करोड़ रूपये की मांग की गयी है। उपाध्यक्ष महोदय, मुझे अभी भारत सरकार की ओर से प्रतनधि के नात संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने का मौका मिला। भिन्न भिन्न उद्देश्य के लिए जैसे कि चाइल्ड डवेलपमेंट, वूमैन डवेलपमेंट, रिव्हिलेशन, हयूमेन राइट्स, यूनीसेफ इत्यादि एकम को आर्थिक सहयोग देने के लिए जो धनराशि भारत सरकार की ओर से यूएनओ को प्रदान करनी है उसकी घोषणा करने का सबसे पहले मुझे प्रतनधि के नाते मौका मिला। जब मैंने घोषणा पूरी की तब अन्य देशों के प्रतनधियों ने भारत को अभिनंदन दिया एवं सराहना की।

*Laid on the Table.

मद ३६ में राज्य सरकारों को कठोर किस्म की आपदाओं के लिए राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता नधि से सहायता के लिए २०० करोड़ की मांग मा० मंत्री जी ने की है। सभापति महोदय, पूरा देश जानता है कि अंतिम ५ साल में गुजरात में कुदरती आपदा की चपेट में आता रहा है। पहले दरियायी तूफान बाद में भूकंप फिर अतिवृष्टि और नदियों में बाढ़ आयी। अनेक लोग मौत के घाट उतर गये। लोग बेघर हो गये। कई बच्चे अनाथ हो गये। लोगों के लिए ऊपर आकाश और नीचे धरती रही। ऐसे समय में दुनिया से भी मदद मिली। उस समय भारत सरकार की ओर से आर्थिक सहायता की घोषणा की गयी। इतना ही नहीं मा० प्रधान मंत्री जी ने भी घोषणा की। लेकिन आज तक पूर्णरूपेण जो आर्थिक सहयोग करना था वह नहीं हुआ है। गुजरात सरकार ने अपनी जिम्मेदारी निभायी है। कच्छ के अंदर पुर्नवास का काम लगभग पूरा होने को आया है। एनजीओ ने अच्छा सहयोग दिया है और लोगों ने तन मन धन से सेवा की है। लेकिन भारत सरकार की ओर आज भी गुजरात के लोग उम्मीद करके बैठे हैं। मैं आशा करता हूं कि मा० वित्त मंत्री जी शीघ्र ही भारत सरकार का वादा पूरा करेंगे।

मद ७५ में संसद भवन परिसर की सुरक्षा व्यवस्था के पुन: सुधार पर हुए अतरिक्त व्यय को पूरा करने के लिए १९.४४ करोड़ की मांग की गयी है। यह ठीक काम हो रहा है। संसद भवन पूरे देश की शान है आन है और यहां सुरक्षा में कोई भी कमी रहेगी और दुर्भाग्यपूर्ण कोई घटना घटित होती है तो सभी के लिए यह शर्म की बात बन जाती है। इसलिए जितनी हो सके उतनी सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए और हर कदम पर निगरानी रखनी चाहिए। आज के दिन संसद भवन की सुरक्षा के लिए जिन कर्मचारियों ने अपनी आहूति दी है उन्हें भी नतमस्तक प्रणाम करता हूं।

उपाध्यक्ष महोदय, मद ९२ में एकीकृत हथकरघ समूह विकास योजना के अंतर्गत ५ करोड रूपये मांगे हैं। हथकरघा बुनकरों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना के लिए २७.६ करोड रूपये मांगे हैं, महात्मा गांधी बुनकर योजना के लिए ७.५० करोड़ योजना के कार्यान्वयन के लिए मांगा गया है। इतनी सारी धनराशि खर्च होने के बाद भी आज बुनकरों की क्या स्थिति है। उनको रहने के लिए मकान नहीं है, पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं हैं। अपने बालकों को ठीक तरह से पढाई नहीं करवा सकते। आज भी वे मजदूरी के लिए मारे मारे फिरते हैं। उनका जो बुनकर का व्यवसाय था, वह आज अन्य लोगों ने ले लिया है। बड़ी बड़ी इंडस्ट्रीज वाले हथकरघा चला रहे हैं। उनका बुनाइ के ठीक दाम भी नहीं दे रहे हैं। पूरे दिन अपने हाथों से हथकरघा चलाते चलाते वे थक जाते हैं फिर भी शाम को ५०-६० रूपये से ज्यादा रोजगारी नहीं मिलती। सरकार की ओर से अच्छी अच्छी योजनाएं तो बनती हैं लेकिन उनका लाभ उन तक सीधा नहीं पहुंचता। इसलिए मा० मंत्री जी से निवेदन है कि इन योजनाओं की मॉनीटरिंग की जाये और समय समय पर इसकी जांच की जाये कि इससे बुनकर ही लाभान्वित होते हैं या अन्य कोई और?

इसी मद में सीसीआइ की मूल्य समर्थन अभियान के कारण कपास की खरीदी पर हुयी हानियों की प्रतिपूर्ति करने के लिए धनराशि मांग गयी है। लेकिन सही समय पर सही स्थान पर सीसीआइ के द्वारा कॉटन की खरीदी नहीं होती। हम बार बार सीसीआइ को विनती करते हैं कि अमुख स्थान पर परचेज सेंटर खोले जाये लेकिन यह मांग बहुत आखिर में मान्य होती है। तब तक किसान मुनाफाखोर लोगों के हाथों बिक गया होता है। क्योंकि वे अपना कॉटन से भरा ट्रैक्टर लेकर दर-दर ठोकर खाकर उसे इन लोगों के हवाले जाना पड़ता है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि सीसीआइ के द्वारा उचित समय में उचित स्थानों पर परचेज सेंटर खोले जाये।

साबरमती आश्रम ट्रस्ट को सहायता अनुदान उपलब्ध कराने के लिए १० करोड़ की मांग की गयी है। सहायता दी जा रही है वह सराहनीय है लेकिन परम पू० महात्मा गांधी ने यह गांधी आश्रम जिन दलित और पिछड़े लोगों के लिए बनाया था, वो आज कहां हैं। आज उनका कोई स्थान नहीं रहा। लेकिन इन आश्रम पर अन्य लोगों ने अपना कब्जा जमा लिया है। इतना ही नहीं आश्रम की भूमि जो दलितों को देनी चाहिए पिछड़े वर्ग के लोगों को देनी चाहिए उसके स्थान पर बिल्डरों को दी जा रही है। कोऑपरेटिव सोसायटियों को दी जा रही है। लेकिन दलित कहीं नहीं हैं। यह भी जांच का विषय है।

मा० उपाध्यक्ष महोदय, आइसीडीएस के अंतर्गत किशोरी शक्ति योजना को दाखिल करने के लिए धनराशि की मांग की गयी है। मेरी द्ृष्टि से इसको ओर बढ़ाना चाहिए ताकि किशोरी को उचित न्याय मिल सके आज हम सब समाचारपत्रों में पढ़ते हैं कि लङकी की हत्या जन्म लेने के पहले माता के पेट में ही की जाती है। वह दुनिया का मुंह देखने से पहले ही दुनिया से विदा हो जाती है। इसलिए ऐसी योजना बनानी चाहिए ताकि मां हंसते हंसते बेटी को जन्म दे और पिता अपनी लाडली को बड़ा करके पढ़ाये लिखाये। इसके साथ साथ अनुसूचित जाति जनजाति के विद्यार्थियों को विदेश पढ़ाई के लिए विशेष सहायता देनी चाहिए। अन्य समाज के हजारों विद्यार्थी आज विदेश में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं। गुजरात ने अनुसूचित जाति जनजाति के विद्यार्थियों को विदेश भेजने का उचित कदम उठाया है। प्रत्येक वर्ष ४० से ५० विद्यार्थी विदेश जा रहे हैं। मेरी मांग है भारत सरकार की ओर से इन योजनाओं में गुजरात सरकार को अधिक आर्थिक सहायता दी जाये।

मा० मंत्री जी पंचायत सशक्तीकरण प्रोत्साहन योजना, राष्ट्रीय ग्राम स्वराज योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी रोजगार योजना, प्रधान मंत्री ग्राम सडक योजना, समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम के अंतर्गत धनराशि मांगी है। इन सब योजनाओं का सही रूप में कार्यान्वयन हो और रूपये का सही उपयोग हो, इसके लिए ब्लॉक लेबल पर कोइ कमेटी बननी चाहिए ऐसी मेरी मांग है। मा० उपाध्यक्ष महोदय, मा० मंत्री जी ने विश्विवद्यालय एवं कालेजों में खेल कूद को प्रोत्साहन देने हेतु १.५० करोड़ रूपये की मांग की है। इसके साथ साथ विद्यालयों में खेल आधारित ढांचा सृजन के लिए अनुदान मांगा है, जो सराहनीय है। लेकिन मैं सदन का ध्यान युवाओं की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। हमारा युवा वर्ग पढ़ा लिखा है। मजबूत है। सन्नकट एवं संस्कारी है१ लेकिन क्या उसे उचित मौका मिला है। वह भी खेद कूद में दुनिया की तरह देश को नंबर वन बनाना चाहता है। लेकिन स्कूल कालेज में खेल के लिए मैदान नहीं है। जिम्नास्टिक की व्यवस्था नहीं है। आधुनिक जो उपकरण निकले हैं वे संस्था स्थापित नहीं करती। परिणामस्वरूप युवाओं में जो प्रतिभा है वे उसे बाहर दिखा नहीं सकते। परिणामस्वरूप युवा निराश होकर परेशान होकर कभी कभी अपनी राह बदल देता है। जो इस देश की पूंजी थी वो इस देश के लिए कभी सिरदर्द बन जाती है। इसलिए मा० मंत्री जी से मेरा अनुरोध है कि खेल कूद और शिक्षा के बारे में स्कूल, विद्यालय, कालेज एवं यूनीवर्सिटी को अनुदान खुले हाथों से दिया जाये और उसे पूर्ण रूप से मदद की जाये।

उपाध्यक्ष महोदय, एनडीए के समय दिल्ली में एनआरआइ सम्मेलन हुआ। विदेश से आने वाले प्रतनधियों के चेहरे पर नूर था उत्साह था और वे खुशखुशाल थे क्योंकि उन सभी के मुंह से एक ही आवाज निकलती थी कि यदि इसी तरह भारत का विकास होता रहेगा तो रोड, पानी टेलीफोन रेलवे और दूसरी सुविधा बढ़ती रहेगी तो हमें जल्दी से जल्दी स्वदेश वापिस लौटना पड़ेगा। लेकिन आज एनडीए के समय में शुरू किये गये काम ठंडे बस्ते में डाल दिये गये हैं। और यूपीए में वामपंथी साथी कभी हां कभी ना कहते हैं और मा० मंत्री जी अपने वक्तव्य में कहते हैं हर काम के लिए, मैं हूं ना। देश की जनता के, दिल ने फिर याद किया, है और कहते हैं, एनडीए को मैं न भूलूंगा।

इसलिए अंत में मा० मंत्री जी को मैं यही कहूंगा क

किसानों को सब्सिडी, जवानों को रोजगार,

बालकों को पोष्टिक आहार, महिलाओं का रक्षण

दलितों को शिक्षा, विदेश में अभ्यास,

स्कूल कालेजों को खेलकूद, राज्यों को आपदा में हर तरह का सहयोग,

मुनाफाखोर और काला बाजार का हर तरह का विरोध

कॉटन की खरीद, फसल का उचित दाम, किसानों को ऋण मुक्त

भारत विकास के लिए उचित युक्ति, गांवों का हो विकास,

आतंकवादी और गद्दारों का हो विनाश

मा. मंत्री जी से रखता हूं इतनी आस,

मौका मिला है तो काम करके दिखाओ कुछ खास।

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now the discussion on Supplementary Demands for Grants (General) is over and the hon. Minister will reply tomorrow. 

            The House stands adjourned to meet tomorrow, the 15th December, 2005 at 11.00 a.m.

   


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