Title: Regarding misbehaviour with MP(s), layng of Reports of the Privilege Committee set up by a State Legislative Assembly in the House and subsequent procedure followed in the House.
(बालाघाट): अध्यक्ष महोदय, मैं जिस विषय को सदन के सामने उठा रहा हूं, उसका सीधा संबंध आसंदी से है और मैं आपसे संरक्षण चाहता हूं। इस विषय में मेरी सरकार से किसी प्रकार की मांग नहीं है। मैं एक घटना की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। २८ अप्रैल २००१ को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेरे साथ, लोक सभा के अन्य तीन सदस्यों, राज्य सभा के सदस्य और छत्तीसगढ़ विधान सभा के नेता प्रतिपक्ष के साथ निर्मम और अमानवीय मार-पीट की गई। मैंने इस मामले का नोटिस एक साल पहले इसी सदन में दिया था जिसे विशेषाधिकार समति को सौंप दिया गया। ठीक इसी प्रकार का विशेषाधिकार हनन का नोटिस प्रतिपक्ष के नेता ने छत्तीसगढ़ विधान सभा में दिया, जिस की एक समति बनी। उसमें श्री डोमेन्द्र भेंडिया, सभापति और छ: अन्य विधान सभा के माननीय सदस्य थे। २६ जुलाई २००१ को जब यह विषय आया तो २७ जुलाई को माननीय अध्यक्ष महोदय ने कुछ तथ्यों के साथ निर्देश दिए। लोक सभा के एक सदस्य ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया और बाद में अन्य सदस्यों ने भी दिया लेकिन आज तक छत्तीसगढ़ राज्य सरकार उससे अपनी किसी प्रकार की सूचना मुहैय्या नहीं करा सकी। केन्द्र सरकार मांग नहीं सकती लेकिन यह पूरी तरह सदन के सदस्यों और सदन की पूंजी का सवाल है। राज्य सरकार की विशेषाधिकार समति बनी और उसने अपनी रिपोर्ट भी प्रस्तुत की। रिपोर्ट का निर्णय कहता है –
“उपरोक्त विवेचना के परिप्रेक्ष्य में समति यद्यपि किसी को दोषी पाए जाने पर निरूद्ध करने की भी अनुशंसा कर सकती है किन्तु इस संदेश को देने के उद्देश्य से यह सभा जन-प्रतनधियों के साथ विद्वेष की भावना से किए गए किसी भी कृत्य को सहन नहीं करेगी। वह यह अनुशंसा करती है कि जिलाधीश श्री अमिताभ जैन एवं तत्कालीन पुलिस अधीक्षक श्री मुकेश गुप्ता को सदन में बुला कर उसकी भत्र्सना की जाए एवं उसकी सेवा पुस्तिका में भी इसको अंकित किया जाए।”
अध्यक्ष महोदय, बात यहीं खत्म नहीं होती है। इसे विधान सभा के पटल पर रखा गया और सदन ने इसे स्वीकार किया। इसके बाद दूसरे दिन छत्तीसगढ़ की विधान सभा में मुख्यमंत्री ने इसे वापस लेने की हिम्मत जुटा ली। यहां सवाल इस बात का नहीं है कि मेरे साथ मार-पीट हुई और मुझे संरक्षण नहीं मिला। मुझे आपसे केवल इस बात का संरक्षण चाहिए कि यहां एक विशेषाधिकार समति होगी, लेकिन प्रदेश सरकार उसे रिपोर्ट नहीं भेजेगी। अगर कोई रिपोर्ट प्रदेश सरकार के विधायक और सचिवालय के लोग, वहां के अधिकारियों के बयान के साथ स्वीकार कर लेते हैं और दोषी पाए जाते हैं, उसके बावजूद भी यहां की समति काम नहीं करेगी, निर्णय नहीं देगी तो किसी भी जन-प्रतनधि को कैसे अवसर मिलेगा।
मैं एक टिप्पणी पढ़ कर अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं जो वहां के एडिशनल एसपी का बयान लिया गया था। मेरा यह बयान भी अखबारों में आया कि हम पर पत्थर फेंकने की शुरुआत हुई थी। हमें केवल लाठियों से नहीं मारा गया, पत्थरों से भी मारा गया। एडिशनल एसपी का बयान देखिए जो उन्होंने समति के सामने दिया।
” पुलिस अधीक्षक श्री विवेकानन्द ने भी समति के समक्ष पहले तो क्लैक्ट्रेट में निर्मित हो रहे हॉल के पास पत्थर उपलब्ध होने की बात कही किन्तु समति द्वारा जब उनका ध्यान इस ओर दिलाया गया कि क्लेक्ट्रेट बैरिकेट्स के दूसरी ओर था, जहां पुलिस थी तब उन्होंने अपने कथन में यह भी जोड़ दिया कि वह स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कह सकते। ”
अध्यक्ष महोदय, इससे दो सवाल पैदा होते हैं। मुझे न्याय मिलना चाहिए और विधान सभा में जो रिपोर्ट चाहे किसी भी सदन में रखी जाए, यदि उसे सदस्य स्वीकार कर लें, क्या उसे वापस लिया जा सकता है? इस प्रश्न पर आसंदी को निर्णय करना चाहिए।
अध्यक्ष महोदय: माननीय पटेल जी, मैंने स्टेट गवर्नमैंट से रिपोर्ट मांगी थी और वह रिपोर्ट आई भी है। हम वह रिपोर्ट देखना चाहते हैं। हम रिपोर्ट देखेंगे। इस विषय में क्या हो रहा है, मैं बाद में आपको बताऊंगा।
श्री प्रहलाद सिंह पटेल : आपकी अनुमति हो तो विधान सभा की यह रिपोर्ट मैं सभा पटल पर रख सकता हूं।
अध्यक्ष महोदय: वह आप दे सकते हैं।