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Title : Shrimati Minati Sen called the attention of the Minister of Human Resource Development to the situation arising out of increase in incidents of trafficking in women in the country which is threating the social fabric of the country and steps taken by the Government in regard thereto.
SHRIMATI MINATI SEN Sir, I call the attention of the Minister of State in the Ministry of Human Resource Development to the following matter of urgent public importance and request that she may make a statement thereon:
“The situation arising out of increase in incidents of trafficking in women in the country which is threatening the social fabric of the country and steps taken by the Government in regard thereto. ”
मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्रीमती कान्ति सिंह)अध्यक्ष महोदय, मानवों, विशेषकर महिलाओं, लड़कियों और बच्चों का अवैध देह व्यापार राष्ट्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इन कमजोर महिलाओं और बच्चों का व्यावसायिक शोषण करना एक व्यापक संगठित अपराध है, जो लाखों डॉलर का व्यवसाय बन गया है। इस व्यापक समस्या के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने अनेक सम्मेलन आयोजित किए। भारत में भी विधायी, कार्यकारी, न्यायिक तथा सामाजिक कार्रवाई के माध्यम से मानव व्यापार की इस समस्या के समाधान के प्रयास किए जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन, २००० के अनुसार अवैध देह व्यापार की परिभाषा इस प्रकार है:
“शोषण के प्रयोजनार्थ व्यक्तियों की भर्ती, लाना-ले जाना, स्थानांतरण, शरण देना अथवा लेना – चाहे ऐसा बल प्रयोग अथवा धमकी देकर अथवा किसी प्रकार का दबाव डालकर या भगा ले जा कर, धोखे से, शक्तियों का दुरुपयोग करके या रकम अथवा फायदा ले-देकर नियंत्रणाधीन व्यक्ति की रजामंदी प्राप्त करना। शोषण में वेश्यावृत्ति कराना अथवा अन्य प्रकार का यौन-शोषण करना, बलपूर्वक श्रम सेवाएं लेना, गुलामी अथवा गुलामी की तरह के अन्य कार्य कराना अथवा शरीर के अंग काटना शामिल हैं।”
मानव संसाधन विकास मंत्रालय मानवों के अवैध व्यापार, जो उक्त सभी प्रयोजनों के लिए किया
* Placed in Library. See No. LT 3222/2005.
जाता है और जिसमें कमजोर लोगों की कमजोरी का फायदा उठाया जाता है, की कुप्रथा की निंदा करता है। अवैध देह व्यापार से उत्पन्न पहली समस्या इसकी शिकार महिलाओं और लड़कियों में एच.आई.वी. एड्स फैल जाना है। शोध से पता चला है कि एच.आई.वी. एड्स तथा अवैध देह व्यापार और यौन क्रियाओं के कारण होने वाली बीमारियों का परस्पर संबंध होता है। इस वर्ग को और उनके पूरे परिवारों को इस तरह की बीमारियों होने का खतरा होता है। इन बीमारियों के इलाज पर बहुत अधिक खर्च आता है और दवाएं भी आसानी से नहीं मिलती हैं। इसलिए ऐसे व्यक्तियों के पूरे परिवारों का जीवन प्रभावित होता है। इस महामारी के कारण अनाथ होने वाले बच्चों की बढ़ती हुई संख्या के कारण यह समस्या और अधिक गंभीर रूप ले लेती है। समाज भी ऐसे बच्चों को हेय द्ृष्टि से देखता है और अक्सर उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है। इसके परिणामस्वरूप समाज में परिवार प्रणाली का भी ह्रस हो रहा है।
शोध से पता चला है कि अवैध देह व्यापार की यह समस्या नए-नए क्षेत्रों में फैल रही है और इससे प्रभावित लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। अवैध देह व्यापार की शिकार महिलाओं और बच्चों के न केवल स्वास्थ्य को खतरा पैदा हो जाता है बल्कि उन्हें शिक्षा के अवसर भी नहीं मिलते और ऐसे लोग कष्टदायी जीवन व्यतीत करते हैं जो आत्मसम्मान और गरिमा रहित होता है।
अवैध देह व्यापार की मांग एवं आपूर्ति के अनेक कारण हैं। मांग के कारण हैं – बढ़ता हुआ पर्यटन और औद्योगीकरण, गांव से शहरों की ओर पलायन, संगठित आपराधिक नेटवर्क तथा व्यावसायिक यौन कर्मियों की बढ़ती मांग, सस्ते श्रम की मांग और पुरुष प्रधान मूल्य प्रणाली। आपूर्ति अथवा शोषण के मुख्य कारण हैं – सर्व प्रथम निर्धनता, परम्परागत पारिवारिक प्रणालियों और मूल्यों का ह्रस, महिला-पुरुष भेदभाव तथा निर्धनता का महिलाओं पर प्रभाव आदि।
भारत के संविधान के अनुच्छेद २३ के अन्तर्गत शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है तथा मानवों का अवैध देह व्यापार और बलात् श्रम नषिद्ध है। भारतीय दण्ड संहिता में अवैध देह व्यापार के बारे में २५ उपबंध हैं और अनैतिक व्यापार निवारण अधनियम, १९५६ व्यावसायिक यौन शोषण हेतु अवैध व्यापार के मुद्दे से ही संबंधित है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने व्यावसायिक यौन शोषण हेतु महिलाओं और बच्चों के अवैध देह व्यापार की रोकथाम पर एक राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की है और इस कार्य योजना के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने के लिए एक केन्द्रीय सलाहकार समति का गठन किया है[MSOffice15] ।
विभाग ने हाल ही में अवैध देह व्यापार के शिकार बच्चों के बचाव-पूर्व, बचाव और बचावोपरांत एक प्रोटोकोट प्रकाशित किया है। विभाग इस कुप्रथा के बारे में समाज में जागरूकता उत्पन्न करने के भी प्रयास कर रहा है और इस समस्या से पीड़ित महिलाओं और बच्चों के बचाव एवं पुनर्वास के लिये अनेक स्कीमें चला रहा है, जैसे अल्पावास गृह, स्वाधार तथा अवैध देह व्यापार की रोकथाम के लिये प्रोयोगिक परियोजना। यह विभाग महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिये भी अनेक स्कीमें चला रहा है, जैसे किशोरी शक्ति योजना, स्वशक्ति, स्वयंसिद्धा, स्वावलम्बन तथा स्टेप। तथापि, अवैध व्यापार से छुड़ाये व्यक्तियों का पुनर्वास और समाज की मुख्य धारा में उनकी वापसी बहुत कठिन प्रक्रिया है, क्योंकि समाज आमतौर पर ऐसे व्यक्तियों को स्वीकार नहीं करता है, जिसके फलस्वरूप ऐसी महिलाओं और बच्चों को दोहरी मार झेलनी पड़ती है। इस समस्या के समाधान के लिये मानव संसाधन विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय, राज्य सरकारों और नागरिक समाज द्वारा समन्वित प्रयास किया जाना जरूरी है[RB16] ।
SHRIMATI MINATI SEN Sir, I would like to thank you for giving me a chance to initiate a most important, serious and touchy discussion on the subject “women trafficking.” You know Sir, that trafficking in women is a global problem. But I shall keep my views within the limit of India.
The hon. Minister, in her statement, clarified the definition of trafficking according to the UN Convention against Transnational Organised Crime, 2000. Let me take the help of two reports from overseas first. The United States, in their report titled “Trafficking in Persons” classified all countries in three different tiers and India has been placed in Tier-II Watch List. But the United Nations, in their recent report, has said “India is a major centre of human trafficking. 20,000 women are forced into flesh trade every year.” In the Hindustan Times, dated 25th October, 2005, it was reported that 61 per cent of the victims are below the age of 18 years and 45 per cent of the victims are below the age of 16 years. Those involved in human trafficking make over Rs.1.5 crore a year and thus it becomes the second big organised crime after drugs and arms.
Another report, published in a national daily, says that girls are brought into Delhi, Mumbai, Bangalore from Nepal, Rajasthan, Andhra Pradesh, Tamil Nadu, Assam, Northwest and West Bengal. We become shocked when we further go through a recent study on trafficking in women and children made by the National Human Rights Commission. The report says that 39.6 per cent of the victims held family members responsible for their predicament. It is horrifying. The study establishes that 41.35 per cent of the victims had lost their puberty between the age of 7 to 15 years.
I agree with the hon. Minister that the Prevention of Immoral Traffic Act was enacted in 1956. The Central Advisory Committee Report, a national plan for action of the Department of Women and Child Development are there. Studies have been made. I also know that the Government of India has signed and ratified the SAARC Convention on Prevention and Combating Trafficking in Women and Children for Prostitution[R17] .
Sir, I wonder what are the net outcomes? How many girls and children could be saved from the clutches of the traffickers? On 26th April, 2005, the Union Minister for Human Resource Development in his reply against Starred Question No. 426 informed this House that “An action Research on Trafficking in Women and Children in India” has been undertaken by the National Human Rights Commission. The main recommendations of the study made so far are:
1) The main cause of vulnerability to trafficking are economic and gender disparity that limits women’s access to development process.
2) The community and the family should sensitise to issues of gender, women’s right and child rights.
3) There is need for minimum standards of care and attention in rescue and post rescue activities conforming to human rights.
Sir, may I know from the Government how far we have succeeded in making the women economically independent? Except in West Bengal and Tripura, where women’s access to development process have been ensured through reservation of 33 per cent seats in Panchayat, is there any access of women to development process? Is not the present state of affairs of Women Reservation Bill in Parliament and Assembly a glaring example of how serious we are to end gender disparity that limits women’s access to development process?
SHRI ARJUN SETHI (BHADRAK): In Orissa also we have 33 per cent reservation for women in Panchayats.
SHRIMATI MINATI SEN Sir, taking the advantage of the poverty-ridden conditions of local people, touts of so called placement agencies are luring women and children in particular to a luxurious life with hefty pay in metros, namely, Delhi, Chennai, Mumbai, Chandigarh, Bangalore and so on. A chunk of the recruits are virtually sold to brothel owners. The rest are forced to work as domestic helps. These poor children are to work for 16 – 18 hours a day, eat the leftovers of their masters, sleep in open space, kept under lock and key, and physically and sexually assaulted. Sir, strangely the Government has no control over these placement agencies. Nobody does know where these poor girls are working and what are the conditions of their service. In many cases, if the girl manages to get rid out of the slavery, she hardly gets any money from the masters for services rendered by her.
MR. SPEAKER: What are your questions?
SHRIMATI MINATI SEN : Sir, I want to know from the hon. Minister through you that during the last ten years how many traffickers have been put behind the bars?
Secondly, how many women and girls have gone back to their families? Thirdly, what actions the Government has so far taken to re-establish the poor girls, living in the dark rooms of brothels, into the main stream of life? Fourthly, what actions are being taken by the Government to stop female foeticide in India?
Trafficking leads to spread of HIV/AIDS and health hazards amongst trafficked women and girls. Sir, what actions are being taken by the Government to address and eradicate this socio-economic problem in our society?
MR. SPEAKER: Well, hon. Members, I have announced yesterday that those hon. Members whose names are not there, are not permitted because that is the rule[a18] .
But I make an exception because of the subject and because of the request that I have got from Shrimati Sumitra Mahajan. I call Shrimati Sumitra Mahajan to put her questions.
श्रीमती सुमित्रा महाजन माननीय अध्यक्ष जी, वैसे तो यह बहुत बड़ी चर्चा का विषय है मगर मैं केवल दो-तीन पॉइंटेड प्रश्न ही माननीय मंत्री महोदय से पूछना चाहूंगी।
यह मंत्रालय बहुत सालों से बहुत कुछ काम कर रहा है, लेकिन काम इस प्रकार का है कि एकदम इस पर कंट्रोल पाना कठिन है। महिला आयोग से भी इस संबंध में कुछ सुझाव आए थे और उसमें एक बात बहुत अच्छी थी कि छोटे गांवों के एक्ज़िट पॉइंट्स या बड़े शहरों के एंट्री पॉइंट्स, जैसे रेलवे स्टेशन और बस अड्डों आदि जगहों पर एंटी ट्रैफिकिंग मैसेजेज़ की द्ृष्टि से सोशल आर्गनाइजेशन्स की मदद लेते हुए कुछ काम किया जाए, जहां पर ऐसी लड़कियां लाई जाती हैं और फिर वे शहरों में फैल जाती हैं। इस संबंध में मंत्रालय की क्या सोच है?
दूसरा प्रश्न यह है कि विक्टिम रीहैबलिटेशन बोर्ड की द्ृष्टि से क्या आप कुछ सोच रहे हैं? तीसरा प्रश्न जो इसी से जुड़ा हुआ है, वह यह है कि इम्मॉरल ट्रैफिकिंग एक्ट में जिन रेस्क्यू ऑफिसर्स की बात कही गई है, वे कितने सक्रिय हैं? आज तक इन रैस्क्यू ऑफिसर्स द्वारा ऐसी कितनी लड़कियां छुड़ाई गईं या रीहैबलिटेशन की द्ृष्टि से उन्होंने इसके लिए कितने प्रयास किये?
महोदय, मुझे मालूम है कि प्रॉस्टीटयूशन को हम किसी भी हालत में कतई भी रिकॉग्नीशन नहीं दे सकते लेकिन यह हो रहा है। बंग्लादेश से छोटी-छोटी बच्चियां तक यहां लाई जाती हैं और समाज में इसका बहुत अलग तरह का प्रभाव होता है। गृह मंत्रालय को बार-बार यह निवेदन किया जाता है कि बॉर्डर पर चैकिंग की जाए और अब तो वहां बॉर्डर फैन्िंसग भी की जा रही है। इस मामले में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने गृह मंत्रालय से बात करके यदि कोई वशिष्ट योजना बनाने के लिए सुझाव दिये हैं तो उसके संबंध में भी मंत्री जी बताएं।
महोदय, डोमैस्टिक वॉइलैन्स बिल पर बात करते हुए भी मैंने कहा था कि छोटी-छोटी लड़कियां विशेषकर आदिवासी बहुल राज्यों से शहरों में काम करने के लिए भेजी जाती हैं। झारखंड में अभी अभी एक प्रयास के तहत करीब २०० ऐसी लड़कियों को रेलवे स्टेशनों और बस स्टेशनों से छुड़ाया गया और उनके रीहैबलिटेशन के लिए प्रयास किया गया। इस संबंध में क्या केन्द्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर कुछ योजना बनाने की सोच रही है? यह काम इस छोटे से मंत्रालय से होने वाला नहीं है, इसलिए इस पर व्यापक द्ृष्टिकोण की ज़रूरत है।
एक बात मैं और कहना चाहती हूं। जब इस प्रकार की क्रिया में महिलाएँ लिप्त रहती हैं तो यह भी सोशल आर्गनाइजेशन्स द्वारा देखने में आया है कि छोटे-छोटे बच्चे खटिया के नीचे सोये रहते हैं और उन पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है। उनके बच्चों की शिक्षा पर भी उसका प्रभाव होता है। उसके लिए भी कुछ सुझाव आए थे कि रात के समय छोटे बच्चों के लिए क्रैच तैयार की जाएं। उन बच्चों की शिक्षा और तरक्की के लिए क्या आपका मंत्रालय गृह मंत्रालय के साथ मिलकर कोई सर्वव्यापी योजना बना रहा है?
श्रीमती कान्ति सिंह अध्यक्ष महोदय, आज ट्रैफिकिंग एक गंभीर समस्या बना हुआ है चाहे वह लड़कों में हो या लड़कियों में हो। यह काफी संवेदनशील मामला है। आये दिन हम समाचार-पत्रों में और दूसरी जगह देखते हैं कि उन पर क्या गुज़र रही है। उसकी रोकथाम के लिए मैंने पहले भी इस सदन में बताया था। माननीय सदस्य मिनाती सेन जी ने भ्रूण हत्या के बारे में कहा है। उसके लिए भी एक पीएनडीटी एक्ट बना है। यह कानून हर जगह पहुंचे, डिस्टि्रक्ट हैडक्वार्टर तक पहुंचे, इसके लिए प्रचार किया जाता है कि यह कानून क्या है। बालिका समृद्धि योजना के तहत हमने बहुत सारे गांवों में जहां दो बच्चियां पैदा होती हैं, उनके लिए ५०० रुपये देने की योजना बनाई है ताकि भ्रूण हत्याओं से बचाव हो स्ाके[h19] ।समय-समय पर लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कीम में राशि देने का प्रावधान भी रखा गया है।
हम लोगों ने बालिका समृद्धि योजना को, चूंकि राज्य सरकार इस योजना को क्रियान्वित करती है, इसलिए राज्य सरकार को देने के लिए प्रयास जारी रखा है। इसके साथ ही इस संबंध में कितने केस दायर हुए हैं, कितनों का छुटकारा हुआ है, मैं माननीय सदस्य महोदया को इसकी डिटेल बाद में भिजवा दूंगी, क्योंकि यह होम डिपार्टमेंट से भी संबंधित है। कितनों को पकड़ा गया और कितनों को सजा दी गई, इसकी डिटेल भी भिजवा दूंगी।
आईटीपीए एक्ट में भी हम लोग काफी संशोधन करने जा रहे हैं। कैबिनेट से अप्रूवल लेने की बात है, इस संबंध में भी हमारे प्रयास जारी हैं। कैबिनेट से अप्रूवल आने के बाद सदन में भी डिस्कशन के लिए लाएंगे। जैसा कि महिलाओं के पुनर्वास के लिए हमने बताया कि बहुत-सी योजनाएं चल रही है। एक स्वधार स्कीम है, जिसके तहत परित्यक्ता महिलाएं और जो रेस्क्यू करके लाई जाती हैं, उन्हें रखा जाता है। फिर हमारा एक प्रोग्राम स्वशक्ति है, जिसके अंतर्गत सेल्फ हेल्प ग्रुप का निर्माण कर उन महिलाओं को आर्थिक रूप से भी सुद्ृढ़ करने के लिए राष्ट्रीय महिला कोष से भी धनराशि दिलाते हैं और राज्य सरकार के द्वारा बैंकों से लिंक करके उन लोगों की आर्थिक सशक्तीकरण की व्यवस्था की गई है।स्वयंसिद्धा स्कीम के तहत स्वावलंबी बनाने के लिए ट्रेनिंग देने की व्यवस्था है। और भी बहुत-से कार्यक्रम हैं।
माननीय पूर्व मंत्री महोदया जानती हैं, वह इस विभाग का दायित्व संभाल रही थीं, वह जानती हैं कि इसमें एक विभाग का नहीं, बल्कि बहुत-से विभागों को जोड़ कर जैसे स्वास्थ्य विभाग, होम डिपार्टमेंट आदि हैं, इन सारे विभागों का समन्वय करके इस विभाग को चलाया जाता है, इसलिए हम अकेले इस काम को नहीं कर सकते हैं। हमारी कोशिश होती है कि हर विभाग का समन्वय लेकर हम चलें।
माननीय सदस्या ने रेलवे स्टेशनों पर इस प्रकार की व्यवस्था के बारे में कहा है। इस तरह की व्यवस्था हमने अभी तक नहीं की है, लेकिन रेडियो और दूरदर्शन के माध्यम से हम उसका प्रचार-प्रसार कराने का काम करते हैं। इसके लिए हमें स्वयंसेवी संगठनों का और समाज का सहयोग चाहिए। हमें समाज की सोच में परिवर्तन करना पड़ेगा, तभी हम इस उद्देश्य में सफल हो सकते हैं। यह बात सही है कि इसके पीछे आर्थिक मजबूरी सबसे बड़ा कारण है। गरीबी के कारण ही आज इस पेशे में या जबरदस्ती भी लोग लाए जाते हैं। ट्रैफीकिंग में लोग न चाहते हुए भी फंस जाते हैं और उससे छुटकारा कैसे दिलाया जाए, इसके लिए बहुत-सी योजनाएं चल रही हैं। हमारी पूरी कोशिश रहती है कि राज्यों से तालमेल रखा जाए।
कुछ काम हम एनजीओज़ के द्वारा कराते हैं और राज्यों से कहते हैं कि आपकी एनजीओज़ जो इस काम को करना चाहती हैं, उनको यह काम दिया जाए। उनकी रिपोर्ट के आधार पर ही हम राज्यों को योजनाएं देते हैं। हम अलग से कोई योजना नहीं देते हैं, क्योंकि मानिटरिंग नहीं हो पाती है और पूरी जानकारी प्राप्त नहीं होती है। हमारी पूरी कोशिश है कि आईटीपीए बिल लाकर हम जो संशोधन करेंगे, निश्चित तौर पर उसमें हम कामयाबी हासिल कर सकते है। अगर कोई और विशेष बात है तो हम बैठकर, मीटिंग बुलाएंगे, महिलाओं के साथ कुछ पुरुष वर्ग को भी बुलाएंगे क्योंकि दोनों के सामंजस्य से ही कामयाबी हासिल कर सकते हैं।…( व्यवधान)
श्रीमती कान्ति सिंह मैंने केवल महिलाओं की बात नहीं कही है।
MR. SPEAKER You are right, in this male dominated world, men have to be treated properly. Some brainwashing of men is also needed.
श्रीमती कान्ति सिंह हम पुरुषों के सहयोग की भी कामना करते हैं। साथ-ही साथ मैं यह भी कहना चाहती हूं कि गृह मंत्री जी स्वयं डीजी के साथ मीटिंग करते हैं या हमारे मुख्य मंत्रियों की बैठक बुलाते हैं। ट्रैफीकिंग की कैसे रोकथाम की जाए, इस बारे में उनका ज्यादा ध्यान रहता है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूं[i20] ।
MR. SPEAKER: I think, it is a very very important issue. I am glad that it has come up. I am sure, the entire House agrees that this is a serious menace and a serious situation. We should all endeavour, each one of us should endeavour, to see that our country’s fair name is not spoiled and women are protected as they are entitled to be.
श्री रवि प्रकाश वर्मा (खीरी) अध्यक्ष महोदय, मेरा विषय भी है।
अध्यक्ष महोदय किस बारे में है ?
श्री रवि प्रकाश वर्मा इसी बारे में है।
MR. SPEAKER Sorry, your name is not listed.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Please accept it.
Now, we come to special mentions.
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