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Further Discussion On The Budget (General) For 2004-05 And Demand For … on 16 July, 2004

Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Budget (General) For 2004-05 And Demand For … on 16 July, 2004


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14.23 hrs.
 
 

GENERAL BUDGET 2004-05– GENERAL DISCUSSION

AND

DEMAND FOR GRANTS ON ACCOUNT – GENERAL – 2004-05

Title: Further discussion on the Budget (General) for 2004-05 and Demand for Grants on Account (No. 1 to 34, 36,37, 39 to 63, 65 to 73, 75, 76, 78 to 105) for the year 2004-05.(Not concluded).

MR. DEPUTY SPEAKER: The House will now take up further discussion on General Budget 2004-05. Item Nos. 14 and 15 to be taken up together.

श्री मोहन सिंह

(देवरिया) : उपाध्यक्ष महोदय, हमारे देश की गम्भीर चुनौती इस देश की गरीबी है। आज UNDPके दस्तावेज़ पूरी दुनिया के सामने प्रकाशित हुये हैं। क्वालिटी ऑफ लाइफ के हिसाब से हिन्दुस्तान अपनी पोज़ीशन पिछले साल वाली मेनटेन किये हुये है और दुनिया के देशों की श्रेंणी में हमारा १२७वां स्थान है। सरकार तथा योजना आयोग की ओर से जो गरीबी के आंकड़े दिये जाते हैं, वे वास्तविक आंकड़े नहीं हैं। अगर उन आंकड़ों पर यकीन किया जाये जाये तो आज देश में २७ करोड़ आदमी गरीबी रेखा के नीचे हैं और उन २७ करोड़ में से भी १० करोड़ दरिद्रतम से दरिद्रतम व्यक्ति हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि हमने अपनी आर्थिक समीक्षा में इस बात को स्वीकार किया है कि इस देश में ग्रामीण क्षेत्र के १००० आदमी में से १७ ऐसे आदमी हैं जो सालों-साल भूखे रहते हैं, उन्हें पेटभर भोजन नहीं मिलता है। शहरी क्षेत्र के १००० लोगों में से २ आदमी वर्षभर में आधा पेट भोजन करने के बाद जिन्दगी गुजर-बसर कर रहे हैं। गरीबी बेरोज़गारी से शुरु होती है। यदि देश से गरीबी दूर करने का प्रयास हम लोग नहीं चलायेंगे, जब बेरोज़गारी बढ़ती है तो गरीबी का फैलाव रोका नहीं जा सकता।

उपाध्यक्ष जी, हमारे देश में जो दस्तावेज़ सुरक्षित हैं, उसके अनुसार ४ करोड़ २७ लाख लोग बेरोज़गार हैं जो रोज़गार दफ्तरों में अपना नाम लिखाते हैं। यदि बेरोज़गारी की रफ्तार देखी जाये तो सब से ज्यादा पश्चिम बंगाल और केरल में क्रमश:१८ प्रतिशत और १४ प्रतिशत है। बेरोज़गारी की सब से कम वृद्धि बिहार और उत्तर प्रदेश में है लेकिन यह वास्तिवकता नहीं है। ऐसा केवल इसलिये है कि उन राज्यों में साक्षरता, जागरूकता है और नौजवान लोग अपनी बेकारी दूर करने के लिये सरकार का दरवाजा खटखटाते हैं लेकिन जहां अशिक्षा है, वहां के नौजवान लोग रोज़गार मांगने के लिये रोज़गार के दफ्तरों में नहीं जाते हैं।

लेकिन कुल मिलाकर रोजगार के मामले में पूरे देश की स्थिति भयावह है। भारत सरकार कृषि और उद्योग के क्षेत्र में जब तक भरपूर निवेश पर ध्यान नहीं देगी, ग्रामीण और शहरी स्तर की बेरोजगारी कभी खत्म नहीं होगी। इसके लिए हमें एक अभियान चलाना होगा। एक अभियान पुरानी सरकार ने चलाया है, जिसे हम सड़कों के नाम से जानते हैं। एक महत्वाकांक्षी योजना, जिसमें अधिकतम लोगों को रोजगार दिया जा सकता है, पिछली सरकार ने एक स्कीम के तहत पूरे हिन्दुस्तान को सड़कों से जोड़ने की एक स्कीम चलाई। उसमें १३१४७ किलोमीटर सड़कें देश में बननी थी और स्वर्ण चतुर्भजु योजना में लगभग पांच हजार किलोमीटर के आसपास सड़कें इस देश में बननी थी। लेकिन कुल एक-चौथाई काम इन सड़को के ऊपर हुआ। जिन कंपनियों ने उनका ठेका लिया, उन्होंने उस ठेके में सबलैटिंग की और सबलैटिंग वाली कंपनियों ने उन ठेकों को पूरा नहीं किया। निजी क्षेत्र में कुल एक-चौथाई सड़कें उस महत्वाकांक्षी योजना के तहत बननी थी। उन पर ५४००० करोड़ रुपये इस देश के खजाने का हमें खर्च करना पड़ा।

उपाध्यक्ष महोदय, इस देश में हर आदमी जो पेट्रोल और डीजल लेने जाता है या गरीब किसान अपना ट्रैक्टर चलाने के लिए डीजल या पेट्रोल लेने जब पेट्रोल पम्प पर जाता है तो उसे भी डेढ़ रुपया इन सड़कों के बनने के नाम पर भारत सरकार को अदा करना पड़ता है। लेकिन उसमें काम क्या हुआ। मैं माननीय वित्त मंत्री जी से इन सड़कों के बारे में जानना चाहता हूं कि कितने लोगों को इसमें रोजगार मिला, अभी तक कितनी सड़कें बनी और कितने वर्षों में कितनी सड़कें बनने वाली हैं, यह वित्त मंत्री जी बतायें। छ: लेन की सड़कें बनाने पर साढ़े आठ करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से खर्च होना है। वर्ष १९९९ से जो भाव थे, उसके हिसाब से प्रधान मंत्री सड़क योजना में चार लेन की एक किलोमीटर सड़क साढ़े चार करोड़ रुपये में बनती है। इसका विकल्प यह हो सकता है कि रेलवे के पास बहुत जमीन है। इससे आधे पैसों में स्वर्ण चतुर्भज रेल लाइन पूरे हिन्दुस्तान के बड़े शहरों को जोड़ने के लिए दो-तीन वर्षों के भीतर हम बना सकते हैं। देश में जो सड़कों की समस्या है उसका समाधान रेल के विस्तार से उसके विकल्प के रूप में हम शुरू कर सकते हैं। इसलिए हम वित्त मंत्री जी से आग्रह करना चाहते हैं कि सड़कों पर होने वाले निवेश को निकालकर वह पूंजी रेलों में निवेश की जाए। यह मेरा एक सुझाव है और इसे वित्त मंत्री जी को स्वीकार करना चाहिए।

दूसरी बात यह है कि हमारे देश में जो क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक हैं, वे आम जनता से जुड़े हुए बैंक हैं। वे बैंक बहुत दिनों से अपनी दशा सुधारने के लिए भारत सरकार से अपील कर रहे हैं, दर्खास्त दे रहे हैं। वित्त मंत्री जी ने पहले ही दिन प्रश्नोत्तर में कह दिया कि उनका खुद का विचार है कि राष्ट्रीय स्तर पर इन बैंकों को जोड़ने के लिए वह किसी एक को एपेक्स पार्टी बनाने का प्रस्ताव मानने के लिए तैयार नहीं है। उन्हें प्रायोजित करने वाले जो कमर्शियल बैंक्स हैं, उन्हीं के जिम्मे, उन्हीं के ऊपर उनके भविष्य को छोड़ दिया जाए। उसके पीछे तर्क यह दिया गया कि ५१-५२ बैंकों में जरूरत से ज्यादा घाटा है। वे कौन से बैंक हैं, जो पूर्वोत्तर राज्यों में काम कर रहे हैं, जो उड़ीसा के गरीब क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। वही क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक बुरी हालत में हैं जो जम्मू-कश्मीर में, आतंकवाद प्रभावित इलाकों में काम रहे हैं। वही बैंक घाटे से मर रहे हैं। लेकिन इन इलाकों में काम करने वाले व्यावसायिक बैंक क्या उस घाटे से जूझने का काम नहीं कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी को दूर करने का और ग्रामीण क्षेत्र में पूंजी निवेश करने का सबसे सशक्त माध्यम ये क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक हैं। लेकिन वे गरीब बेरोजगार नौजवानों को, कॉटेज इंडस्ट्रीज चलाने वालों और अपने हाथ से काम करने वाले छोटे किसानों को साढ़े बारह प्रतिशत की सूद दर के हिसाब ऋण देते हैं, क्योंकि उन्हें प्रायोजित करने वाले उनके अपने बैंक हैं, जो नौ प्रतिशत के हिसाब से उन्हें ऋण देते हैं। इसलिए जनता तक उसका कर्जा साढ़े बारह प्रतिशत के हिसाब से पहुंचता है। इसलिए मैं समझता हूं कि इसका सर्वे होना चाहिए। जितने किसान आज आत्महत्याएं कर रहे हैं, उनके ऊपर बैंकों का कर्जा है और सबसे अधिक उन बैंकों का कर्जा है, जो क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के रूप में काम कर रहे हैं। यदि आप उनकी पूरी फीगर पता लगायें तो इस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं।

व्यावसायिक बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी शाखाएं नहीं खोलते हैं। ग्रामीण स्तर पर क्षेत्रीय गतवधियां और व्यापारिक गतवधियाँ बढ़ी हैं, बैंकों का कारोबार बढ़ा है, लेकिन मेरा दावा है कि पिछले दस वर्षों में जितने व्यावसायिक बैंक हैं, उन्होंने गांवों की ओर जाने की कोशिश नहीं की है। इसलिए हम कहना चाहते हैं कि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की दशा सुधारने के बारे में भारत सरकार को विचार करना चाहिए।

तीसरी बात सुझाव के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ। वित्त मंत्री जी ने वनिवेश के बारे में बहुत अच्छी घोषणा की, लेकिन जो अति घाटे के सरकारी उद्यम और उपक्रम हैं, उनको बेचने के बारे में या नहीं चलाने के बारे में सरकार की नीति पर विचार करने के लिए एक संगठन बीआईएफआर बना हुआ है। वह एक तरह का कोल्ड स्टोरेज है। इनकी दशा सुधारने के बारे में बीआईएफआर जितनी अड़ंगेबाज़ी संभव है, करता रहता है और पांच-छ: साल से उसके सामने अनेक छोटे-छोटे उपक्रमों के मामले पैन्िंडग हैं, उन पर निर्णय नहीं होता। मेरा आग्रह है कि बीआईएफआर नाम की बला को खत्म करने का प्रयास किया जाए और जो घाटे के उपक्रम हैं, उनके वनिवेश या संचालन के बारे में त्वरित नीति कायम की जाए। लेकिन वनिवेश उस तरह का न हो जिस तरह का वनिवेश हमारे मित्रों ने गत चार वर्षों में किया। सैन्टूर होटल का जिस रूप में वनिवेश हुआ, जिस रूप में उसकी बिक्री हुई, आज वह व्यक्ति जो फस्र्ट पार्टी के रूप में है, उसे चलाने की स्थिति में नहीं है और डेढ़ सौ करोड़ रुपये मुनाफा लेकर किसी थर्ड पार्टी को बेचने की स्थिति में पहुँच गया है। उसकी जांच होनी चाहिए कि पिछले चार वर्षों में वनिवेश और सरकारी संपत्ति को बेचने का जो अभियान चला था, उसमें जनता की कितनी संपत्ति लूटी गई। इसकी समीक्षा होनी चाहिए और जांच होनी चाहिए। खास तौर से सैन्टूर होटल की बिक्री के मामले में जो लूट हुई है, उसका खुलासा देश के सामने किया जाना चाहिए, यह मैं वित्त मंत्री जी से खास तौर से आग्रह करना चाहता हूँ। उसी के साथ-साथ मेरे कुछ खास सुझाव हैं जिनको बहुत संक्षेप में मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ।

पहला सुझाव यह है कि वित्त मंत्री जी ने एक लाख रुपये तक की कर योग्य आय वाले लोगों को तो आयकर से मुक्त कर दिया, लेकिन सर्विस टैक्स बढ़ा दिया है। सर्विस टैक्स देने वाले कौन हैं? बैंकों में कारोबार करने के लिए जाइए, सर्विस टैक्स देना है। बीमा में कारोबार करने जाएँ तो सर्विस टैक्स देना है। तमाम बेरोजगारों के लिए जो सरकारी नौकरियों के लिए विज्ञापन छपते हैं, उनके फार्म भरने के लिए कभी २०० रुपये का ड्राफ्ट बनवाना पड़ता है तो कभी दाखिले के लिए १००० रुपये का ड्राफ्ट बनवाना पड़ता है। अब उस पर भी सर्विस टैक्स देना पड़ेगा। ये सब जीवन से जुड़ी हुई सेवाएँ हैं। एक लाख रुपये तक की आमदनी वाला जो आदमी हमारे समाज में है, उसे टेलीफोन की आवश्यकता होती है। जो दैनिक जीवन से जुड़ी हुई हमारी सेवा की उपलब्ध वस्तुएं हैं, मैं वित्त मंत्री जी से आग्रह करूँगा कि उनको सर्विस टैक्स में एक सीमा बांधकर छूट दी जानी चाहिए, अन्यथा जो एक लाख की सीमा है, इसका कोई लाभ आम आदमी को नहीं मिलेगा। इस देश में जो टैक्स देने वाला व्यक्ति है, टैक्स का बोझा उसी की पीठ पर और उसी के सिर पर लादने का हर साल प्रयास होता है जो ठीक नहीं है। एक लाख रुपये से ऊपर और दो लाख रुपये के बीच की आमदनी के जो लोग हैं, वे भी कोई बहुत बड़े लोग नहीं हैं। उनके लिए किसी तरह की छूट इस बजट में नहीं दी गई है। मैं आग्रह करना चाहता हूँ कि कम से कम दो लाख की आमदनी तक के जो लोग हैं, उनको भी टैक्स में थोड़ी बहुत सहूलियत दी जानी चाहिए। मैं उसके समापन की बात तो नहीं करता लेकिन उनको छूट देने और राहत देने की अपील वित्त मंत्री जी से करते हुए आपको धन्यवाद देता हूँ कि इस बजट पर मुझे अपने दल की ओर से कुछ बातें कहने का अवसर दिया।

SHRI K.C. PALANISAMY

(KARUR): Sir, today I have been given the rare privilege of making my maiden Parliamentary speech on the Budget proposals of 2004-05 by my most respected leader, Dr. Kalaignar.

In a House packed with senior Members, learned scholars and seasoned economists, I wish to give my humble views that tell the minds of the people of Tamil Nadu and that of my Party, the Dravida Munnetra Kazhagam.

Sir, the Budget proposals reflect the spirit and essence of the Common Minimum Programme. Shri Chidambaram has done true justice to the vision of Sonia ji, the President of the UPA.

The hon. Prime Minister Dr. Manmohan Singh ji’s keenness to strict fiscal management is evident in the passing of the FRBM Act, 2004, thus ensuring the nation’s economic health. This Budget, without doubt, is the result of the rich experience, deep knowledge and a clear vision of the hon. Prime Minister.

There is a saying in Tamil which says: “Sattiyil Ulladhu thaan Agappayil Varum”. This means “What is available in the pot only will come out in the spoon’. But our Finance Minister has disproved this saying by giving many a spoonful of incentives, relaxations, benefits and sops to almost every sector of economic activity in the nation.

Further, Shri Chidambaram has reached across to the rural India and touched the hearts of millions of farmers by this first Ever Green Budget. Let us not forget that 60 per cent of India still lives in the villages; and any thought of an economic change cannot be dreamed of without making the families living in the rural India prosperous. Therefore, the Finance Minister has quite rightly pressed the green button without compromising on the industrial development of the country.

The Budget document, without doubt, can be considered to be the road-map for the UPA Government for the next five years. Yes, this is a Budget that even Pandit Jawaharlal Nehru would have been proud of!

As a Member of Parliament from the DMK Party, I must thank the Finance Minister for fulfilling all the commitments that my leader Dr. Kalaignar has given to the voters of Tamil Nadu.

As an MP from Karur constituency in Tamil Nadu, I will be failing in my duty if I do not place on record my appreciation to the Finance Minister for his bold move of scrapping CENVAT and the removal of excise duty on pure cotton, wool and silk, thus giving the textile industry of our area the much-needed new lease of life.

The fifty-year-old textile industry will now start breathing afresh. The Manchester of South India will soon regain its past glory. Lakhs and lakhs of textile workers in the handloom and power-loom sector will now come out of their untold sufferings due to unemployment and poverty.

One more historic blunder of the NDA Government thus stands corrected by just one stroke of the pen. The Finance Minister has lived up to the Thirukkural that he quoted in his Budget speech and has indeed walked the path of honour and courage.