Further Discussion On The Resolution Regarding Identification Of … on 21 August, 2010

Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Resolution Regarding Identification Of … on 21 August, 2010


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Title: Further discussion on the Resolution regarding Identification of Families living below poverty line and Welfare measures for them (Resolution withdrawn).

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, we will take up Item No. 12.

… (Interruptions)

श्री रामकिशुन (चन्दौली): माननीय उपाध्य महोदय, एक मिनट के लिए मेरी बात सुन लीजिए। हम लोगों को ट्रेन पकड़नी है। इसलिए आप कृपया अब जीरो ऑवर को ले लीजिए।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : जीरो आवर सायंकाल छः बजे होगा। जो निर्णय हुआ है, उसी के अनुसार सदन की कार्यवाही चलेगी।

…( व्यवधान)

श्री रामकिशुन : उपाध्यक्ष महोदय, आप आसन पर बैठे हैं। निर्णय तो आपकी मर्जी पर आधारित है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : जो निर्णय हुआ है उसी के अनुसार सदन की कार्यवाही चल रही है।

…( व्यवधान)

श्री रामकिशुन : महोदय, मैं आपके साथ-साथ माननीय सदस्यों से भी निवेदन करता हूं कि हम लोग केवल दो-तीन हैं। अगर दो-दो मिनट सबको बोलने का मौका दे दिया जाए, तो शीघ्र ही जीरो आवर समाप्त हो जाएगा।

उपाध्यक्ष महोदय : अभी आप दो कह रहे थे। अब तीन कह रहे हैं। इस प्रकार जब बोलना शुरू करेंगे, तो धीरे-धीरे बढ़ते जाएंगे। 

…( व्यवधान)

श्री रामकिशुन : उपाध्यक्ष महोदय, आप सदन की सहमति ले लें। जो विषय आप ले रहे हैं, उस पर आज चर्चा पूरी भी नहीं करा पाएंगे। यह हम भी जानते हैं। मैं यह कह रहा हूं कि दो-दो मिनट का समय दे दीजिए। चार या पांच लोग हैं। उन्हें बोलने का मौका मिल जाएगा और हम अपनी ट्रेन पकड़ कर चले जाएंगे। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अभी आप चार कह रहे थे। अब आर चार-पांच कह रहे हैं। इस प्रकार चार और पांच मिलकर नौ हो गए।

…( व्यवधान)

श्री रामकिशुन : उपाध्यक्ष जी, बहुत इम्पौर्टेंट मैटर होते हैं, तभी तो उन्हें जीरो आवर में उठाया जाता है। मैं सदस्यों से भी निवेदन करना चाहता हूं। चूंकि जाना है, इसलिए हम आपसे प्रार्थना कर रहे हैं। अगर नहीं जाना होता, तो कोई दिक्कत नहीं थी। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मेरा माननीय सदस्यों से निवेदन है कि शून्य-काल सायंकाल 6.00 बजे ही प्रारम्भ होगा।

          अब श्री बी.महताब जी बोलेंगे।

…( व्यवधान)

श्री रामकिशुन : उपाध्यक्ष महोदय, चूंकि हमारा बहुत इम्पौर्टेंट इश्यू है। इसलिए यदि आप रात को 12.00 बजे भी लेंगे, तो भी हम बैठेंगे। लेकिन मेरा निवेदन केवल है कि …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, कृपया बैठ जाइए। रिकॉर्ड में कुछ भी नहीं जा रहा है।

…( व्यवधान)*

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, कुछ भी रिकॉर्ड पर नहीं जा रहा है। कृपया बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Mahtab, are you speaking?

श्री भर्तृहरि महताब (कटक): उपाध्यक्ष महोदय, मैं तो समझ रहा था कि अभी आप जीरो आवर ले रहे हैं।  

Sir, I will speak as the second speaker and not now.

MR. DEPUTY-SPEAKER: All right. The next speaker is Shri Adhir Chowdhury.

 

SHRI ADHIR CHOWDHURY (BAHARAMPUR): Sir, I must appreciate our hon. Member Dr. Raghuvansh Prasad Singh, who is very much dear to all of us, as he has initiated this Resolution in regard to the identification of people living below poverty line as well as the welfare measures that need to be taken for those poor and vulnerable sections of our society.

          जिस दिन से मैं इस सदन में आया हूं, उस दिन से लेकर आज तक मैं बी.पी.एल. की चर्चा सुनता आ रहा हूं। मुझे यह भी मालूम है कि यह चर्चा साल दर साल चलती रहेगी। मुझे यह नहीं मालूम कि कब इसका हल निकालने में हम लोग कामयाब होंगे? मुझे एक चीज़ अजीब लगती है कि जब हम लोग चन्द्रयान अभियान करते हैं, इन्फोर्मेशन टैक्नोलोजी के मामले मे सारे जहां में हम लोग अपनी लीडरशिप हासिल कर सकते हैं तो अब तक इस बी.पी.एल. आईडेंटीफिकेशन को हम लोग क्यों नहीं जमीनी हकीकत में तब्दील कर सके। यह मुझे बड़ी पीड़ा देता है। हिन्दुस्तान में it is a land of contrast. एक तरफ धनवान और दूसरी तरफ गरीबी से लड़ते हुए आम जनता को हम देख रहे हैं। कुछ दिन पहले यू.एन. की रिपोर्ट निकली, उसमें यह कहा गया कि हमारे देश में 65 मिलियन लोग हैं, जो मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हैं,

  15.37 hrs.                                (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair)

लेकिन उस हिसाब से हमारे देश में टायलेट नहीं हैं, यह मुझे बड़ा अजीब आंकड़ा लगता है। जब वर्ल्ड बैंक अपने आंकड़े देता है, तब यह कहता है कि हिन्दुस्तान में 420 मिलियन बी.पी.एल. हैं, जब सक्सैना कमेटी आंकड़े पेश करती है तो बताया जाता है कि बी.पी.एल. 500 मिलियन हैं। इकोनोमिक सर्वे कहता है कि 600 मिलियन हैं और अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी कहती है कि 770 मिलियन हैं तो मुझे यह पूछना है कि इसमें सही क्या है? What is the truth behind it? हम लोग आज तक ऐसा कोई पैरामीटर, ऐसा कोई क्राइटीरिया निकालने में कामयाब नहीं हुए, जिससे कि हम सही दिशा में जाकर हमारे देश में जो असली बी.पी.एल. पोपुलेशन है, उनका आंकड़ा तैयार कर सकें, क्योंकि हिन्दुस्तान जैसे देश में यह एक क्रिटिकल कम्पोनेंट है। Identification of BPL is recognised as a critical component specially for the delivery of welfare measures to the poor people. जैसे अभी यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से होता है, सूबे की सरकार की तरफ से भी होता है, लेकिन जहां भी हो, बी.पी.एल. लिस्ट होनी जरूरी है और यह बी.पी.एल. लिस्ट आज तक हम तैयार नहीं कर पाये हैं। हम लोगों को यह तो देखने को मिलता है कि कभी सुप्रीम कोर्ट इसमें हस्तक्षेप करता है। कभी-कभी लगता है कि हम लैजिस्लेटर क्यों बने, जब हर मुद्दे पर कोर्ट फैसला सुनाती है। बाद में यह पता चलता है कि यह हमारा खमियाजा है, जिसके लिए हम पर सुप्रीम कोर्ट से डायरैक्शन आता है।

          यह हम सबको सोचना चाहिए कि आज तक हम लोग बीपीएल आइडेंटिटीफिकेशन क्यों नहीं कर सके? इस बारे में सब को विचार करना चाहिए। एक के बाद एक कई सरकारें आयीं और हर सरकार के सामने यह सबसे बड़ा मसला, सबसे बड़ा मुद्दा होकर रह गया। रघुवंश बाबू जो इस resolution को लेकर आए हैं, उन्होंने कभी मिनिस्टर आफ रूरल डेवलपमेंट का पद संभाला, लेकिन फिर भी वे इसमें कामयाब नहीं हो सके, इसलिए उन्हें रिजोल्यूशन लाकर सरकार से यह मांग करनी पड़ी है कि आइडेंटीफिकेशन आफ बीपीएल की लिस्ट जल्द से जल्द तय की जाए। महोदय, मैं हिंदुस्तान की गंभीर हालत को पेश करना चाहता हूं।  कल ही अखबार स्टेट्समैन में छपा।  A front-page report in the Delhi Edition of the national daily dated 5th April stated that frail, malnourished children of Ganni village in Eastern Uttar Pradesh are eating moist lumps of mud laced with silica, a raw material for glass sheets and soap, because they are not officially classified as poor and so are ineligible for official help.

          This is the plight of the poor people of our country who by all parameters are eligible to get the benefit of welfare measures under the BPL category. But it is regrettable to say that we failed miserably to provide them the minimum mite of succour so that they can at least survive. There lies the most crucial and deplorable phenomenon of our country India.

          We came to know that this Government is going to bring a legislation for the food security of poor people of our country. Well in advance, I extend my warm and wholehearted congratulations to this Government and request the Government to bring this legislation as early as possible. इकॉनामिक सर्वे यह कहता है कि हमारे देश में एक तरफ प्लानिंग कमीशन है और दूसरी तरफ मिनिस्ट्री आफ रूरल डेवलपमेंट है और नेशनल सैंपल सर्वे बीच में आ गया। एक के साथ दूसरे का कोई तालमेल नहीं है। प्लानिंग कमीशन अपना रास्ता अपनाता है, वह नेशनल सैंपल सर्वे के ऊपर भरोसा करता है, दूसरी तरफ रूरल मिनिस्ट्री का काम इनको आइडेंटीफाई करना है।  रूरल मिनिस्ट्री हर सुबह states    यह डायरेक्शन देता है कि तुम भी आइडेंटीफाई करने में लग जाओ। जब कोई कट आफ लाइन तय कर देगा, जैसे प्लानिंग कमीशन कह दे कि यह कट आफ लाइन है और इसके ऊपर नहीं जा सकोगे, लेकिन जमीनी हकीकत दूसरी छवि प्रस्तुत करती है।  आज सबसे ज्यादा जरूरी है कि एक तरफ प्लानिंग कमीशन, बीच में एनएसएसओ और साथ में मिनिस्ट्री आफ रूरल डेवलपमेंट, तीनों को एक जगह बैठाकर इनसे पूछा जाए कि आपस में एस्टीमेट को लेकर आप विवाद बंद करो और सही ढंग से जो असली बीपीएल लिस्ट होनी चाहिए, उस लिस्ट को जल्द से जल्द निकालो।  

          सरकार ने इस बीच आइडैंटिटी कार्ड के बारे में इनीशिएटिव लिया। आप जानते हैं कि यूनिक आइडैंटिटी कार्ड आम जनता को उपलब्ध कराने के लिए सरकार बहुत राशि नियोग करती है जिससे बीपीएल परिवारों को सुविधा मुहैया कराने की जो मंशा है, वह उन्हें उपलब्ध हो। Estimation by the Planning Commission, on the basis of sample survey on household consumption expenditure based on NSSO 61st round says that poverty ratio is 28.3 per cent in rural areas, 25 per cent in urban areas, and 27.5 per cent in the country as a whole. The corresponding poverty ratio is 21.8 per cent in rural areas, 21.7 per cent in urban areas and 21.8 per cent in the country as a whole. कभी तीस दिन कभी पूरा साल (recalling period) अपना एस्टीमेशन करने में इस्तेमाल करते हैं। इस बीच प्लानिंग कमीशन ने एक एक्सपर्ट कमेटी भी सैट-अप की है। It was to examine the issue and suggest a new poverty line and estimates. While estimation of poverty had already been done by the Planning Commission – which I have already referred to – a census to identify the BPL households has been conducted by the Ministry of Rural Development. मिनिस्ट्री ऑफ रूरल डैवलपमैंट ने 1992, 1997 और 2002 में एक कमेटी बनाई और कोशिश की कि बीपीएल लिस्ट बन जाए, क्योंकि अगर किसी व्यक्ति का नाम बीपीएल लिस्ट में होगा तो वह PDS,RSBP, इंदिरा आवास योजना का लाभ उठा सकता है, ओल्ड एज पैंशन का लाभ उठा सकता है, स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्व रोजगार योजना का लाभ उठा सकता है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में आम जनता में बीपीएल कार्ड को लेकर काफी तनाव पैदा हुआ है। यह देखा जाता है कि जिनके पास धन है और पावर है, वे अपना नाम जबरदस्ती बीपीएल में इनक्लूड करवा लेते हैं, लेकिन जो पिछड़े वर्ग की जनता है, जिनके पास पावर नहीं है, दबदबा नहीं है, वे इससे एक्सक्लूड हो जाते हैं। आज पूरे हिन्दुस्तान में विशेषकर शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राइब्स, पिछड़ा वर्ग, माइनॉरिटी के लिए यह एक बहुत बड़ी समस्या है।

In 1979, the Government of India, the Planning Commission had constituted a task force on projection of minimum needs and effective consumption demand, which on the basis of a systematic study of nutritional requirement recommended a national norm of 2400 kilo calorie per day and 2100 kilo calorie per day for rural and urban areas. These figures were derived from age, sex, occupation-specific and nutritional norms, by using all India demographic data from the census 1971.

The national-level official poverty lines for the base year (1973-74) were expressed as monthly per capita consumption expenditure of Rs. 49 only in rural areas and Rs.57 in urban areas which correspond to a basket of goods and services that satisfy the calorie norms of per capital daily requirement of 2400 kcal in rural areas and 2100 kcal in urban areas, which was considered as the minimum required for healthy living. The cut-off line has been updated for price rise for the subsequent years.  However, the new poverty line does not correspond to the minimum calorie norm as according to the NSSO data, to reach the minimum calorie requirement the poor would need far more consumption expenditure than the monthly cut-off line so arrived at by just adjusting Rs.49 and Rs. 57 for inflation.

For instance, for the year 1999-2000 the monetary cut-off corresponding to the minimum calorie requirement norms should have been Rs.565 in rural areas and Rs.628 in urban areas. Whereas, as per the price updated methodology, as used by the Planning Commission, the poverty line was Rs.328 and Rs.454 respectively.  This is the chimera.  It is really a conundrum that has been haunting all of us.  No one here is satisfied with the BPL List that has been prepared either by the Planning Commission or by the Rural Development Ministry.

The national poverty line at 2004-05 prices was taken as Rs.356 per capita per month in the rural areas and Rs.539 per capital per month in the urban areas.  As is evident, the level of income would have permitted both the rural and urban people to consume just about 1820 kcal, whereas to consume the desired norm of 2400 kcal for rural and 2100 kcal for urban areas the cut-off line for determining BPL status should have been around Rs.700 in the rural areas and Rs.1000 for the urban areas.  Thus a large number of rural people with consumption in the range of Rs.360 to Rs.700 have been deprived of the BPL status.  What is more distressing is the fact that calorie consumption of the poor has been consistently declining since 1987-88

 इसका मतलब यह है कि आम जनता की कैलोरी कन्जम्पशन दिन-पर-दिन कम होती जा रही है। मेरा कहना है कि कभी यह कहा जाता है कि इनकम क्राइटेरिया होगा, कभी कन्जम्पशन क्राइटेरिया होगा, कभी कहते हैं कि मिक्स फार्मूला 13 Point Scoring Formula क्राइटेरिया होगा। सबसे पहले सरकार को यह ध्यान देना चाहिए कि जल्द से जल्द एक फूलप्रूफ बीपीएल लिस्ट तय हो जाये। अगर फूलप्रूफ बीपीएल लिस्ट तय हो जाये, तो सरकार जो वेल्फेयर मेजर्स ले रही है, उन वेल्फेयर मेजर्स को डिलीवर करने में ज्यादा सुविधा होगी। इस रेजोल्यूशन के पक्ष में हम सब हैं, हम इसका समर्थन करते हैं। इसके साथ-साथ मैं सरकार से निवेदन करना चाहूंगा कि जल्द से जल्द प्लानिंग कमीशन, एनएसएसओ, रूरल डेवलपमैंट आदि सब मिलकर अगर जरूरत पड़े, तो किसी एक्सपर्ट को लाकर एक कन्सेन्सस लिस्ट बनाकर हमें मुक्त करे।

                                                                     

 

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Sir, the Resolution which has been moved by our esteemed Member of this House, Dr. Raghuvansh Prasad Singh, relating to identification of families living below poverty line and welfare measures for them is a very important issue which is being discussed in this House.  This has been moved by an eminent Member of this House.  Being experienced in legislative practice and also being in charge of the Ministry of Rural Development for quite a long time, I think it is borne out of him that he has thought it fit to bring this Resolution for our consideration and for the consideration of this country.

          This issue, of course, was being discussed when he was manning this Ministry. The matter went to the Supreme Court of India and he was at a great difficulty because during his tenure this matter could not be settled.  He has categorized four specific points.  The points are: identify the families living below poverty line in all the States; provide vocational training and thereafter gainful employment to at least one member of every such family; to provide family pension at the rate of not less than Rs.3000 per month to every such family where gainful employment is not provided to any member of that family; and last is, provide quality education up to senior secondary level to all children belonging to such families free of cost.

          The first one is to identify the family and the other three are the provisions which should be made to empower them to come to a specific level.  I would say that Raghuvansh Babu through this Resolution urges the Government to take steps in a time-bound manner to eradicate poverty from the country by the year 2015.  That means he has put up a span of five years that within these five years, let us focus on these specific issue and that it should not be an open-ended situation where we will be  providing funds for the amelioration of poverty but ultimately it just goes down the drain and nothing tangible happens. 

I am reminded that this poverty amelioration programme was started 40 years ago.  The Government of India during Shrimati Gandhi’s tenure – I think it was the second term of Shrimati Indira Gandhi after that Garibi Hatao – 1971 slogan – specific programmes were made by the Central Government and by the Planning Commission that we have to target eradication of poverty. Later on that amelioration word came in. 

During Raghuvansh Babu’s tenure all sitting Members of Lok Sabha were told that you are heading the Vigilance and Monitoring Committee of your Districts and that you declare a list of genuine below poverty line people who have not got Indira Avas Yojana.  I am just giving one instance.  So, lists were prepared and I think every concerned Member must have prepared that list.  It was also sent to the Central Government and it was also on the website. It was displayed every year how many Indira Avas Yojana units are being allotted to us in specific districts and how many people are getting it so that we can deduct and find out that this much is the wait list.  I think everybody is being surprised that the list never ends.  It never comes down.  That list rather goes on increasing year after year.  It is not a mathematical calculation.  The answer is that it is not a mathematical calculation because many people who are either below the line or just above the line or on the verge of the line, just one drought or one failed monsoon drives a lot of people below poverty line. 

MR. CHAIRMAN:  Hon. Members, the time allotted for the discussion on this Resolution is over.  I have a list of six more speakers to speak on this Resolution.  If the House agrees, the time of the Discussion may be extended by one hour.  I think the House agrees to it.

SEVERAL HON. MEMBERS:  Yes.

 

16.00 hrs.

SHRI B. MAHTAB : The basic question which was raised by the previous speaker, namely, Shri Adhir Ranjan Chowdhury, is, why are there so many numbers coming up? The Planning Commission is coming up with one number, the Ministry of Rural Development is coming with out with another percentage; the UNDP is coming out with another percentage; the World Bank is coming with another percentage. Some say it is 79 per cent; some say it is 81 per cent; some say it is 80 per cent. The Saxena Committee as appointed by the Ministry of Rural Development has come out with another estimate; The Planning Commission says it was 27 per cent and now with the report of the Tendulkar Committee another 10 per cent has been added and so it is at 37 per cent. Why is this much of a confusion? Any policy planner would be confused. Any person who has certain interest in this programme is totally confused. What is the actual number? I think, being a professor of Mathematics, Dr. Raghuvans Prasad ji has an answer to this. It has nothing to do with statistics. It is pure mathematics.

          Sir, as far as I understand with my limited understanding of the Parliamentary practices, estimates of poverty is done by the Planning Commission through a sample survey on consumer expenditure conducted by the National Sample Survey Organization. The Planning Commission uses the poverty line based on per capita consumption expenditure as the criteria to determine the persons living below the poverty line. The per capita consumption norm has been fixed at Rs. 49.09 per month in the rural areas and at Rs. 56.64 per month in the urban areas at 1973-74 prices at national level. Can we get a correct picture if this is the method in which poverty is to be determined? But this is the method by which the Planning Commission is doing it.

16.03 hrs                         (Dr. Girija Vyas in the Chair)

          Madam, there is no gainsaying in mentioning it here that irrespective of party affiliations, respective Governments wanted to show to the society and the people at large that it was during their tenure that poverty actually had come down. Keeping that in mind actually everybody had been trying, I may be allowed to use this word, to fudge the numbers. That is the root of all problems. The State-specific poverty lines are derived from the national level poverty lines using the State-specific price indices and inter-State price differentials. The national poverty line in the year 2004-05 was Rs. 356.30 per person per month in rural areas and Rs. 538.60 per person per month in urban areas. But the identification of poor is done by the Ministry of Rural Development through a door to door survey with 100 per cent coverage. I am of the opinion that the survey which is done by the Ministry of Rural Development is very accurate in the sense that it is a door to door survey. But there is a flaw in that. Who does that survey? Is it not very subjective? The Ministry of Rural Development provides financial and technical assistance to the States and the Union Territories to conduct BPL census to identify BPL families who could be provided assistance under the various programmes of the Ministry. The BPL census is generally conducted at the beginning of every Five Year Plan. The Ministry of Rural Development has conducted three such BPL census so far, the first being in 1992 for the Eighth Five Year Plan. 

In 1997, it was conducted for the Ninth Five year Plan and in 2002, it was for the Tenth Five Year Plan.   The last BPL census – this is very interesting – which was conducted in 2002 was based on the methodology of score based ranking of rural households for which 13 socio-economic parameters were used, as recommended by the Expert Committee headed by Dr. P.L. Sanjeeva Reddy. These were land holdings, type of house, availability of clothing, food security, sanitation, ownership of consumer durables, literacy status, status of household labour, means of livelihood, status of children, type of indebtedness, reason for migration and preference for assistance.  These are the 13 parameters on which, in 2002, the BPL census was taken.  The income and expenditure criteria adopted during the BPL survey of 1992 and 1997 had their own limitations in  the sense both the approaches suffered from criticism of having subjectivity and with this scoring also, there is limitation.  So, a recent suggestion has come in and I would prefer that system. Scoring is one part.  But can you have a system or mechanism in place that automatically many well to do people also will come out of BPL list?  Can that be also brought in?  A person who is identified in the BPL category is there for life long until and unless someone strikes him out. But can you have a mechanism where, with this scoring system, you can also automatically remove a person from that list? And that is very much required. Otherwise, that list will only go on multiplying.

          One of the important features of the guideline issued for BPL census, 2002 was to put a ceiling on the number of BPL households to be identified in conformity with the poverty estimates of Planning Commission and there, the trouble arose.  That is why, many State Governments objected to it including the State Government of Orissa.  Subsequently, the ten per cent plus and minus was also added to that but I am not going into that aspects.

          We would like to understand from the Minister as to what they are going to do for the Eleventh Plan census. Already Dr. N.C. Saxena’s Report is before us. The terms of reference are also in the public domain but I would like to cite one instance out of five terms of reference which are given to the Expert Group.  It is to recommend institutional system for conducting survey, process for data validation and approval of BPL list at the various levels about which the hon. Member has mentioned.  This is the first part.    How are you dealing with this part out of the five issues? 

I would conclude my speech by referring to another aspect.  I think last month, there was a news headline in many newspapers and the media including the television channels.. The headlines said that new poverty index finds Indian States worse than Africa.  Another headline said that half of India’s population lives below the poverty line.

The anxiety was occasioned by a new study on global poverty released last month by the Oxford Poverty and Human Development Initiative.  There is nothing to be happy about it and there is nothing to talk about it in a big way.  That is the concern and that is the anxiety.  This study finds that eight poorest States in India contain more poor people than 26 poorest African countries combined together.  It also estimates India’s poverty rate at about 55 per cent.  What does this signify? We have travelled a long distance during the last 63 years.  As it is a democratic country concerned about the poor and their development, a lot of effort is being made.  The poor people of the country have a say in the administrative mechanism of our system.  But the poor of the country still remain poor for very many factors. 

          The suggestion which Dr. Raghuvansh Prasad Singh has made is to provide vocational training.  This is not the subject only of the Ministry of Rural Development. The Ministry of Human Resource Development has a greater role to play in it; the Ministry of Industries also has a greater role to play in it; The Ministry of Panchayati Raj also has a greater role to play in it, and above all the Planning Commission has to take a holistic view. 

          My question here is this: When the free market mechanism is determining our progress, does the Planning Commission, does the Five Year Planning have any significance to control poverty and to eliminate poverty? It does not.  That is the basic question which we should address. Doling out certain sums to the poor will not help to bring them up to a certain standard of living.

          While supporting the Resolution moved by Dr. Raghuvansh Prasad Singh, I would only say that unless we empower the poor through education, we cannot ameliorate and we cannot remove poverty in this country.

          With these words, I conclude. 

 

 

श्री निशिकांत दुबे (गोड्डा): सभापति महोदया, सबसे पहले मैं रघुवंश बाबू को धन्यवाद दूंगा, क्योंकि वे बहुत अच्छा रेज्योलूशन ले कर आए हैं। उनका इतने वर्षों का जो अनुभव है, सांसद और मंत्री होने के नाते उन्होंने अपने अनुभव को इसमें समेटने की कोशिश की है और गरीबों के दुख-दर्द को समझने की कोशिश की है। इसके लिए वे विशेष रूप से धन्यवाद के पात्र हैं।

          जब से मैं संसद में आया हूं, एक बात मैं बहुत जोर दे कर कहता हूं कि लोग प्वायंट स्कोर करने की कोशिश करते हैं। जितनी भी चर्चाएं होती हैं, वे एक-दूसरे पर आरोप लगाने में गायब हो जाती हैं। ऐसा भी लगता है कि यदि पार्लियामेंट सत्र नहीं चल रहा है, तो शायद देश में कोई समस्या ही नहीं है। संसद सत्र मुश्किल से वर्ष में 70-80 दिन चलता है, लेकिन रोज कहीं न कहीं गोली चल रही है, कोई न कोई मर रहा है। किसी का धर्म परिवर्तन हो रहा है, कहीं बाढ़ आ गई है, कहीं सूखा पड़ गया है। लगता है कि 70-80 दिनों को छोड़ कर जब संसद सत्र नहीं चल रहा होता है, तब इस देश में कहीं भी विपत्ति नहीं आती है। इसका कारण यह है कि हम केवल हैडलाइन्स बनाना चाहते हैं, मुद्दे पर चर्चा नहीं करना चाहते हैं और अपने आपको जन प्रतिनिधि बनाने की कोशिश करते हैं। इसलिए रघुवंश बाबू धन्यवाद के पात्र हैं, क्योंकि आज कोई भी स्कोर करने की कोशिश नहीं कर रहा है, नहीं तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस बीजेपी से, सीपीएम तृणमूल से, सपा बसपा से यहां लड़ाई करने के लिए आए हैं। इसीलिए ये धन्यवाद के पात्र नहीं हैं। मैंने बीजेपी और कांग्रेस की बात कही है. मैंने अपनी भी बात कही है। आज सुहाना मौसम है, बाहर बारिश हो रही है, हम गरीबी, बीपीएल की बात अच्छे माहौल में कर रहे हैं और यदि ये 10 आदमी ही पार्लियामेंट चलाते रहे तो ज्यादा अच्छा होगा क्योंकि देश के बारे में हम कुछ न  कुछ निर्णय निकाल पाएंगे। समुद्र मंथन होगा, उसमें से अमृत निकलेगा, ऐसा मैं मानता हूं। इसके लिए यह संसद धन्यवाद की पात्र है।

          दूसरे, दो तीन चीजें जो मैं बचपन से सुनता आया हूं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। हम गरीबी में पैदा होते हैं, उसी में पलते हैं और अपनी पीड़ियों को कर्ज देकर चले जाते हैं। आजादी के इन 63 वर्षों बाद भी आज की स्थिति यही है। हमारे यहां एक कहावत है- गरीब की लुगाई, सबकी भौजाई। पहले मुझे बचपन में समझ में नहीं आता था कि ये क्या बोलते हैं। बोलते सही हैं। जब आप गरीब हैं तो आपको गलत शब्द से बुलाया जाता है। कोई बड़ा आदमी या गरीब बच्चा है तो उसको बुलाया जाता है कि अरे, तुम इधर आओ। यदि वह कुर्सी पर बैठ गया तो पूछा जाता है कि तुम कुर्सी पर क्यों बैठ गये? इसमें जाति या धर्म का सवाल नहीं है।

          आज भी इस देश की स्थिति ऐसी ही है। पहले एक फैशन होता था कि गरीब आदमी सोचता था कि उसका बेटा पढ़े-लिखे और वह बड़ा आदमी बन जाए और हम बड़े लोगों की श्रेणी में आ जाएं। कुर्सी पर बैठ जाएं, हवाई जहाज से चलने लगें और रिक्शा छोड़कर मोटर साइकिल मिल जाए। लेकिन आज क्या हो गया है, पिछले 15 साल में यह फैशन बदल गया है। जब भी हम आप जैसे जनप्रतिनिधि जाते हैं तो सभी यह सोचते हैं कि हमारा नाम बीपीएल में है या नहीं है। आज वे गरीब बनना चाहते हैं। जैसे आज से 15-20 साल पहले यह फैशन था कि लोग अपने आप को गरीब कहलाना नहीं चाहते थे। लोग एससीएसटी नहीं होना चाहते थे। लेकिन उसका कारण क्या है? इसकी तह में जब तक यह देश यह सरकार नहीं जाएगी, बीपीएल की सूची कुछ भी बना लीजिए, इससे कुछ नहीं होने वाला है। उसकी तह में जाने की आवश्यकता है कि आप इसमें जो इंसेंटिव देने की बात करते हैं कि यह जो बीपीएल का लाल कार्ड है, यह वॉयबल है। यह वॉयबल आपके पास होगा, तभी अन्न आपको इससे मिलेगा। इसी से आपको इंदिरा आवास देंगे। क्या घर देते हैं, घर बनाने के लिए 40-45000 रुपये देते हैं। 45000 में क्या छत खड़ी हो सकती है? पैसा लेना है और उसमें भी कमीशनखोरी है। उसमें पंचायत सेवक 5000 ले लेगा और जो पोलीटिकल वर्कर घर दिलाने ले जाएगा, वह 5000 रुपये ले लेगा, बीडीओ पैसा ले लेगा।  बाद में आप कहते हैं कि आप एकाउंट में देते हैं। लेकिन एकाउंट में कितना पैसा मिलेगा? मुश्किल से 15-20000 देते हैं। उस 15-20000 में या तो घर बन सकता है या दीवार खड़ी हो सकती है। यह निर्णय करने का सवाल है।

श्री अर्जुन चरण सेठी : घर बनाने के लिए इच्छा नहीं है, इसलिए ऐसे करते हैं।

श्री निशिकांत दुबे : यही बात है। दूसरे, आप बीड़ी मजदूर के नाम पर, आप गरीबों के नाम पर जो भी इंसेंटिव दे रहे हैं, मनरेगा की बात हो रही थी। मनरेगा के तहत यही है कि जो गरीब आदमी है, उसे हम 100 दिन का रोजगार देंगे। बहुत बड़ी योजना है। मेरा उसमें विरोध नहीं है। रघुवंश बाबू जो रिजोल्यूशन लेकर आए हैं, उन्हीं का ये ब्रेन चाइल्ड था। उन्होंने किया है, आप धन्यवाद के पात्र हो सकते हैं। अभी मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र गया और निर्वाचन क्षेत्र मे कहा गया कि नरेगा की जो योजना है, आप विजिट करने चले जाइए। मैं कोशिश करता हूं कि मैं इस तरह की योजनाओं की विजिट नहीं करता। मनरेगा का मतलब जो मैं समझ पाता हूं कि एक राजा  था जिसे अपनी लेबर से काम कराने का कोई मौका नहीं होता था कि कहां से उसको पैसा देगा तो वह रोज वही दीवार खड़ा करता था और रोज दीवार तोड़ देता था। मैं समझता हूं कि मनरेगा भी यही है। कोई काम नहीं करना है, मिट्टी का काम करना है और उसे बारिश में बह जाना है। आप गरीबों को पैसा देना चाहते हैं तो आप उससे कोई काम कराकर पैसा देना चाहते हैं। आप दीजिए। इसलिए मैं मनरेगा की योजना की न आलोचना करता हूं औऱ न देखने जाता हूं। लेकिन चूंकि वह मेन रोड पर था तो मैंने सोचा कि मैं देख आऊं। 21 मार्च को यह कहा गया कि इस प्रोजेक्ट का एक्सटेंशन हो गया। मनरेगा का जो बोर्ड था, इसका बांध बन रहा है और उसमें 31 मार्च को यह काम एवार्ड हो गया।

30 जून को काम पूरा हो गया, यह सब बोर्ड में लिखा हुआ है। इसकी कुल लागत 1,90,000 रुपए है जिसमें लेबर की कॉस्ट 1,84,000 रुपए थी, वह हमने पेमेंट कर दी है। मैंने वहीं से अपने यहां के डीसी को फोन किया। मैंने बीडीओ को फोन किया और कहा – यह क्या किया है? तुमने बोर्ड लगाया है जबकि एक कुदाल मिट्टी नहीं काटी है, एक टोकरी मिट्टी नहीं बनी है, आप आकर देखो। यह क्यों लिखा है? उसने कहा – सर, 15 अक्टूबर के बाद जब बारिश खत्म हो जाएगी तब उसका काम शुरू करेंगे। मैंने उसके लिए कमेटी बनाई और सबको कहा। यह मेन रोड पर है। यह ऐसी मेन रोड है जो नेशनल हाई वे पर है, बगल में है। मनरेगा की यह स्थिति है। हम गरीबों के लिए क्या योजनाएं बना रहे हैं? क्या योजनाएं वहां पहुंच रही हैं?

          महोदय, मेरे दो-चार मोटे सवाल हैं। आजादी के 60 साल बाद वे आपसे क्या मांग रहे हैं? हम उसे क्या देने की कोशिश में हैं? मैं फाइनेंस कमेटी में हूं, मैंने प्लानिंग कमीशन सैक्रेट्री से ऑन रिकार्ड पूछा – देश में इतनी डेवलपमेंट हो रही है, हम डेवलपमेंट के लिए इतना पैसा दे रहे हैं और पूरी सरकार रूरल डेवलपमेंट के लिए लगी हुई है लेकिन 27 परसेंट से 37 परसेंट गरीबी क्यों हो गई है? गरीबी 10 परसेंट कैसे बढ़ गई? आप ऑन रिकॉर्ड बयान कोट कर सकते हैं। उन्होंने कहा – पहले हम तय कर लेते हैं कि कितने गरीब हैं। अब हमने क्या किया? तेंदुलकर कमेटी रिपोर्ट के बाद 37 परसेंट गरीब हैं, यह हमने मान लिया। अब तय होगा कि कौन गरीब है? इस क्राइटेरिया में कौन आएगा? इसके लिए घर-घर सर्वे होगा। प्रदीप जैन साहब यहां बैठे हैं, रूरल डेवलपमेंट मिनिस्ट्री यह तय करेगी। प्लानिंग कमीशन ने तय कर लिया कि 37 परसेंट गरीब हैं और रूरल मिनिस्ट्री तय करेगी कि किस गरीब को क्या देना है, कौन गरीब होगा? जैसे घर में एयर कंडीशन कमरे में तय कर लिया, इसका कोई सर्वे नहीं होना है। पांच साल बाद सर्वे करेंगे, अभी वर्ष 2002 के बाद वर्ष 2010 में शुरू हुआ, आठ साल हो गए हैं। इस तरह से पांच साल का क्राइटेरिया खत्म हो गया। इसके साथ एक बेसिक सवाल मेहताब जी पूछ रहे थे। मान लीजिए बाढ़ आ गई। जब बिहार, झारखंड या उड़ीसा में बाढ़ आती है तब गरीब का पूरी जिंदगी की कमाई खत्म हो जाती है। आप उसे गरीब मानेंगे या नहीं मानेंगे? हमारे यहां आग की घटनाएं बहुत होती हैं। प्रत्येक साल आग लगती है जिसमें सब कुछ स्वाह हो जाता है। उनकी फसल भी स्वाह हो जाती है और घर भी स्वाह हो जाता है। आपके क्राइटेरिया के अनुसार जिसके सिर पर छत नहीं होगी उसे बीपीएल मानेंगे। क्या आप उसे बीपीएल की कैटेगिरी में लाएंगे या नहीं लाएंगे? जैसी घटनाएं कच्छ, लेह या उत्तराखंड में होती हैं, लेह में इस तरह के लोगों को बीपीएल कैटेगिरी में मानेंगे या नहीं मानेंगे? मान लीजिए घर में एक आदमी कमाने वाला है और उसकी मृत्यु हो गई, यदि बेटे या बाप की मृत्यु हो गई, आप उसे बीपीएल मानेंगे या नहीं मानेंगे? अगर मानेंगे तो इसके लिए क्या फार्मूला है? मैंने करप्शन की बात कही। मैं पार्लियामेंट हाउस में भी लिखा हुआ देखता हूं –

अयं निजः परो वेत्ति गनना लघु चेतसाम

उदार चरिता नाम तुम वसुधैव कुटुम्बकम।

          महोदय, मैं कहीं और की बात नहीं कह रहा हूं। यह हमारे यहां की घटना है कि चार पंचायत सेवक और दो बीडीओ सस्पेंड हुए हैं क्योंकि पक्के मकान वालों को इंदिरा आवास दे दिया गया। जांच हुई और सस्पेंड हुए? यह क्या तरीका है? आप नियम और कानून बनाने वाले हैं, तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट आने वाली है।  क्या इन चीजों का इन्कलूड करने वाले हैं? जिसने भी गलत ढंग से नाम चढ़ाया है, क्या आप उसके लिए सजा का प्रावधान करेंगे? जैसा मेहताब जी बता रहे थे कि जब तक आप यह काम नहीं करेंगे गरीबों की लिस्ट बढ़ती रहेगी। इस तरह से ‘गरीबी हटाओ’ का नारा जिंदगी भर के लिए खत्म हो जाएगा। दो तरह के गरीब हैं – अर्बन पुअर और रूरल पुअर। रूरल पुअर के लिए तो रूरल डेवलपमेंट लिस्ट बना रही है। अर्बन पुअर कौन होगा, इसके लिए अभी कमेटी बनी है। हम कह रहे हैं कि वर्ष 2014-15 तक राजीव आवास योजना के अंतर्गत शहर के गरीबों को मकान दे देंगे। इसी तरह मुम्बई शहर में झुग्गी-झोंपड़ी हटाने का काम हुआ। मुम्बई शहर में जिन्हें नरीमन प्वाइंट और कोलाबा में जिस तरह की झुग्गी-झोंपड़ियां दी गईं, वहां कोई गरीब नहीं रहता है। सारे गरीबों ने वे मकान बेच दिये और क्यों बेचे, क्योंकि जब आप उन्हें गरीब मान रहे हैं तो आपने सोसाइटी बना दी, अब सोसाइटी का पैसा कौन देगा, उसकी सिक्युरिटी का पैसा कौन देगा, उसकी बिजली का पैसा कौन देगा, उसके पानी का पैसा कौन देगा? क्या सरकार ने कभी इसके बारे में निर्णय लिया है? आपको लगा कि हमने मकान बना दिये और आप निश्चिंत हो गये। सवाल यह है कि आप अपनी पालिसी में इस चीज को इनक्लूड नहीं कर रहे हैं।

सभापति महोदया :  दूबे जी, एक रिजोल्यूशऩ और है, अब आप समाप्त कीजिए।

श्री निशिकांत दुबे : मैं तीन-चार बातें कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा। चाहे वे किसी हिन्दू धर्म की बात कर लें, मुस्लिम धर्म की बात कर लें, बुद्ध की बात कर लें, महात्मा गांधी की बात कर लें, दीनदयाल उपाध्याय की बात कर लें, सभी एक ही चीज कहते हैं कि दरिद्र नारायण की सेवा करिये, नर सेवा ही नारायण सेवा है। “सुखानि चः दुखानि चः चक्रवत परिवर्तनते सुखानि चः दुखानि चः” सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख आता है। राजा रंक होता है और रंक राजा होता है। मेरा यह मानना है कि जब भगवान ने अपना पूरा विराट रूप दिखाया था तो एक ही श्लोक आया था – “त्वदीयं वस्तु गोविंदम तुभ्य मेव समर्पये।” यदि हम गरीबों के बारे में कुछ करना चाहते हैं, हम इस लोकतंत्र में आये हैं, इस प्रजातंत्र में आये हैं, मैम्बर ऑफ पार्लियामैन्ट होने के नाते हमारा भी कुछ उद्देश्य है तो पूरे देश को इकठ्ठा करिये, हम और आप साथ मिलिये, गरीबों के  प्रति न्याय करिये, उनके लिए जो भी योजनाएं हैं, साथ मिलकर आगे बढ़िये।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

डॉ. बलीराम (लालगंज): सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। डा. रघुवंश प्रसाद जी जो रिजोल्यूशन लाये हैं, वह उन गरीबों के लिए लाये हैं, जिन गरीबों के पास किसी भी प्रकार के साधन नहीं है। आजादी के 63 साल बीत गये हैं। इन 63 सालों में इन गरीबों के उत्थान के लिए, गरीबी उन्मूलन के लिए भारत सरकार ने और भारत सरकार के योजना आयोग ने तमाम प्लानिंग बनाई कि इनकी गरीबी को दूर किया जाए। लेकिन 63 साल बीतने के बाद भी ऐसे गरीबों की गरीबी दूर नही हो पाई। आज जिस तरह से सदन में चिंता व्यक्त की जा रही है, मैं कहता हूं कि अगर नीति अच्छी है, परंतु नीयत ठीक नहीं है तो ऐसी नीति का कोई फायदा होने वाला नहीं है। अगर नीयत सही होती तो गरीबों की गरीबी दूर करने की जो इतनी योजनाएं बन रही हैं, शायद आज उनकी सदन में चर्चा नहीं होती।

          महोदया, वर्ष 2002 में जो बीपीएल की सूची बनी, उस सूची के बारे में कमोबेश इस सदन में अधिकांश लोगों ने यह स्वीकार किया कि उसमें धांधली हुई है। वास्तविक रूप से जो गरीब हैं, जिन गरीबों को फायदा पहुंचाना है, उसमें ऐसे बहुत से लोगों के नाम छूट गये और ऐसे लोगों के नांम जुड़ गये या तो राजनीतिक प्रभाव से उनके नाम उसमें चले गये या पैसे के आधार पर उनके नाम उसमें चले गये। भारत सरकार की जो गाइडलाइंस हैं कि बीपीएल का लाभ उन्हीं लोगों को मिलेगा या गरीबों के हित में जो सरकारी योजनाएं बनती हैं, उनका लाभ उन्हीं लोगों को मिलेगा जो बीपीएल की सूची में हैं। परंतु तमाम ऐसे गरीब लोग, जो बीपीएल की सूची में आने से छूट गये हैं, उन्हें उसका लाभ नही मिल पाता है। अधिकारी मौके पर जाते हैं और देखते हैं कि सचमुच बीपीएल के लायक नहीं हैं लेकिन बीपीएल की सूची में होने के कारम उसे लाभ मिलता है। डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने ठीक कहा है कि घर-घर जाकर हमें सूची बनानी चाहिए। श्री महताब जी ने भी अपने पाइंट्स में कहा है कि हम किस आधार पर उन गरीबों की शिनाख्त करेंगे, कैसे सूची बनायेंगे? अगर इस आधार पर बनायेंगे तो सही रूप में बीपीएल सूची बन सकेगी। इसके अलावा तमाम जो कमेटियां बन रही हैं, सक्सेना कमेटी बनी, तेंडुलकर कमेटी बनी, भारत सरकार  का योजना आयोग है, ये तमाम अलग-अलग आंकड़े दे रहे हैं। देश की आजादी को 63 साल हो गये हैं लेकिन इस देश में गरीबों की संख्या कितनी है, कौन-कौन से लोग गरीबी रेखा के नीचे आ सकते हैं, मालूम नहीं कर पाये हैं। मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं और विशेषकर ग्रामीण विकास मंत्री जी का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूं कि आप सचमुच गांव में जाकर गरीबों की स्थिति देखिये जिनके बच्चे भूखे सो जाते हैं। आप झारखंड में, उत्तर प्रदेश  में, छत्तीसगढ़ में, उड़ीसा में चले जाइये और विशेषकर ऐसे प्रदेश जहां एस.सी.एस.टी.के लोगों की बस्तियां हैं, उनके बीच जाकर देखिये, उनका रहन-सहन देखिये, खान-पान देखिये तो आपको लगेगा कि ऐसे लोगों को बीपीएल की सूची में रखना चाहिये था लेकिन वे लोग बीपीएल की सूची में नहीं हैं।

          सभापति महोदया, डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने जो सुझाव दिये हैं कि उन लोगों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाये, उन लोगों को नौकरी  दी जाये, माध्यमिक शिक्षा तक निशुल्क पढ़ाई-लिखाई सरकार करवाये। ऐसे गरीबों को स्वास्थ्य सुविधा कैसे मिले? आजकल भंयकर बीमारियां चली हैं, उनके पास इलाज करवाने के लिये पैसा नहीं होता है, इसलिए दम तोड़ देते हैं। अभी श्री निशीकांत जी ने करप्शन की बात कही। गरीबों के नाम पर आवास बनाने के लिये पैसा मिल रहा है लेकिन हर स्तर पर लूट-खसोंट हो रही है। उत्तर प्रदेश में बहन मायावती ने कांशीराम शहरी आवास योजना बनायी है। हम भारत सरकार से चाहते हैं कि यह पैसा न देकर, जिन गरीबों को लाभ पहुंचाना है, उनकी देखरेख में अगर उनको मकान बनाकर दिया जाये तो लगता है कि शहरी को उसका लाभ मिल पायेगा नहीं तो मिलने वाला नहीं है। ऐसे परिवार जो बीपीएल से हैं, उनमें से किसी न किसी एक को नौकरी मिलनी चाहिये ताकि वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। जिस तरह की एजुकेशन है, उससे संबंधित लोगों को रोजगार दिया जा सकता है जिससे उनकी गरीबी और भुखमरी दूर हो सकती है।

 

 

चौधरी लाल सिंह (उधमपुर): महोदया, आपने मुझे बोलने की इजाजत दी, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मुझे बहुत अच्छा लगा कि रघुवंश प्रसाद जी ने गरीबों के लिए यह बात रखी है। जो लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, जो बीपीएल लोग हैं, उनकी हालत क्या है और उनके लिए क्या करना चाहिए। असली बात वह है, जिसे मैंने, आपने और हम सबने प्रैक्टिकली देखा है। हमारा पहाड़ी इलाका है। जब प्लेन इलाके वाले, मैदानी इलाके वालों की ही प्रॉपरली, ठीक तरह से बीपीएल लिस्ट नहीं बनती है तो कौन सा पटवारी, कौन सा विलेज लेबर वर्कर, जिसे ग्राम सेवक कहते हैं, ग्राम सेविका कहते हैं, ये वहां तक कैसे पहुंचते हैं। मैं आपसे कह सकता हूं कि अगर इन्हें गिरदावरी करनी हो तो ये किसी गांव में, किसी घर में बैठकर कर देते हैं। ये फसल देखने तक नहीं जाते हैं। फसल लगी या नहीं लगी, लेकिन गिरदावरी चढ़ा दो। इसी तरीके से जो बीपीएल की लिस्ट बनी है, काफी हद तक जो लिस्ट बनी है, वह ठीक है, लेकिन उसमें बहुत से लोग गलत भी हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो बीपीएल की लिस्ट में नहीं आ पाये हैं। जो गलत फायदा ले रहे हैं, उनके लिए कौन जिम्मेवार है और जो बीपीएल में आने से रह गये हैं, उनके लिए कौन जिम्मेवार है? मैं आपसे कहना चाहूंगा कि ये जो बीपीएल की सूची बनाने वाले लोग हैं, जब तक हम इनमें से दो-चार पर सख्ती नहीं करेंगे, तब तक कुछ सही नहीं बनेगा। आप यह कहें कि यह योजना, वह स्कीम, यह करें, वह करें, इससे कुछ नहीं होगा। जो आदमी जिस इलाके में गया, उसने वहां के लोगों को इग्नोर किया, उसने वहां रिलेशंस कायम कर लिये।

          महोदया, आजकल बीपीएल की सूची में नाम डलवाने के पैसे भी लिये जाते हैं। क्योंकि बीपीएल की सूची में आने के बाद सुविधाएं मिलती हैं। सिर्फ आई.ए.वाई. का मकान ही नहीं मिलेगा, सिर्फ राशन का सवाल नहीं है और भी सुविधाएं हैं, जो बहुत अच्छी हैं। सिर्फ एक कार्ड बनने से उसका फायदा दूसरे लोग ले जाते हैं। हमारे जो नवोदय स्कूल खुले हैं, केन्द्रीय विद्यालय खुले हैं, इन स्कूलों में जिनके पास बीपीएल का कार्ड है, उनके लिए कोटा रखा गया है। मैंने ऐसे एक-दो आदमी पकड़े, वे लोगों को राशन देते हैं। वे सप्लायर हैं, उन्होंने डिपो खोला हुआ है, उनकी बहुत बड़ी दुकान है। किसी गांव में, दूर-दराज के इलाके में उनकी दुकान चल रही है। उस बंदे ने अपना बीपीएल कार्ड फूड एंड सप्लाई वालों से मिलकर बनवाया। उसने बीपीएल का कार्ड बनवाकर अपने बच्चे को नवोदय स्कूल में दाखिल करवा दिया। यह मैं एक उदाहरण दे रहा हूं। इस ढ़ंग से एक बीपीएल वाले व्यक्ति का शोषण किया जा रहा है, बीपीएल के नाम को एक्सपाइड किया जा रहा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं कहना चाहूंगा कि हमारी सस्पैंड वाली जो धारणा है, जो सस्पैंशन हम किसी भी ऑफीसर की करते हैं, यह सबसे गलत काम है। वह सस्पैंड होता है और एक दुकान खोल लेता है या अगर उसे कोई और पेशा आता है तो वह उसे शुरू कर देता है। वह उस काम में लगा रहता है और एक वकील कर लेता है। बहुत सालों के बाद वह केस भी जीत जाता है और एक अच्छा बिजनेस मैन भी बन जाता है। यह कौन सा ड्रामा है? पहले लोग सस्पैंड होते थे तो उन्हें शर्म आती थी, उन्हें हया आती थी। आजकल सस्पैंड होने को वह ठाठ-बाट समझता है, बहुत अच्छा समझता है और लोग भी उसकी बेइज्जती नहीं करते हैं। आज जमाना बदल गया है। मैं कहना चाहता हूं, मेरी आपसे विनती है कि सस्पैंशन नहीं होना चाहिए, अगर किसी में दम है तो डिसमिस की बात करे। जब तक आप इन्हें सस्पैंड करेंगे, तब तक ये कारनामे करते रहेंगे और इन्हें कोई नहीं रोक पायेगा।

          महोदया, मुझे मौका मिला, मैं हैल्थ एवं मैडिकल एजुकेशन मिनिस्टर था, मैं यादव साहब को भी सुनाना चाहता हूं, मैंने 231 डाक्टरों को डिसमिस किया जो जम्मू-कश्मीर राज्य में काम नहीं करते थे। यह इस देश का रिकॉर्ड होगा। मैंने पूरे कायदे-कानून बनाकर उन्हें डिसमिस किया, उन्हें आज तक नौकरी नहीं मिली है और नये बच्चे जो खजल हो रहे थे, जो हॉस्पीटल खराब थे, वे सारे ठीक से चलने शुरू हो गये हैं। आपको सख्ती करनी है, कोई लाड-प्यार नहीं करना है, कोई रिश्तेदारी नहीं करनी है, किसी से कोई हमदर्दी नहीं करनी है। एडमिनिस्ट्रेशन, इंसाफ जब भी किसी ने करना है, उसको यह नहीं सोचना पड़ेगा कि जब मैं बेईमान हूँ, मैं मिला हुआ हूँ और 25 खा रहा हूँ तो नीचे वाला तो 75 तो सारा खा ही गया। बदनामी हो गई। मेरी जनाब से विनती है और हम नेशनल रूरल इंप्लायमैंट गारंटी एक्ट की बात कर रहे हैं। मेरे एक भाई ने क्रिटिसाइज़ किया। मैं उस क्रिटिसिज़्म में नहीं जाना चाहता हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि इससे हमारे इलाके में जो लेबर्स जो बिहार से और दूर-दराज इलाकों से चलकर हमारे इलाकों में आती थी जम्मू कश्मीर में, वह बंद हो गईं। इसका मतलब यह है कि काम मिला है। Do not criticise. हमारे इलाकों में गांवों का आदमी जहाँ आता था बंदरगाहों पर, जहाँ नीचे जाता था बड़े बड़े पोर्ट्स पर, बड़े बड़े मार्केट्स में काम करता था। आज मैं आपको बताना चाहता हूँ कि हमारे इलाके के लोग भी अपने घरों में रुक गए, काम चल रहा है। ऐसी बात नहीं है। सरकार की पालिसीज़ हैं लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि थोड़ी सख्ती से लागू करने की ज़रूरत है। It is a beautiful policy. जिसके पास मकान नहीं है, उसकी पहचान भी नहीं है। कौन कहेगा कि कहाँ का रहने वाला है। स्कीम का मकसद ही यही है कि कोई आदमी से पूछा जाए कि कहाँ के रहने वाले हो, तो वह कहे कि मैं फलां गाँव का रहने वाला हूँ। क्योंकि उसका गाँव वहाँ है। जिसका घर ही नहीं है, उसकी कहाँ की पहचान है, कौन जानेगा कि यह आदमी कहाँ का रहने वाला है? इसलिए यह स्कीम जो आई है, आपने छोटे लैवल की बनाई है। जितनी तादाद में बीपीएल हैं, जितनी तादाद में उस पंचायत में गरीब हैं, उस गाँव में हम क्या करते हैं कि दो घर दे दिये एक पंचायत में। अब दो घर और उन दो घरों की एक्सप्लाइटेशन। दो घरों से पैसा क्यों लिया जाता है कि पचास घर बीपीएल के वहाँ हैं। अगर पचास घर नहीं होते, सिर्फ दो घर होते तो शायद उनको सौ प्रतिशत पैसे मिलते। उनको सौ प्रतिशत पैसे इसलिए नहीं मिले क्योंकि वे दो नहीं थे पचासों थे। They are demanding for amount. उन्होंने करप्शन कर ली, पैसा खा लिया।

           हमने एक और बात सुनी क्रिकेट के स्कोर के बारे में। आज स्कोर बनाकर रखा है। क्या क्रिकेट खेल रहे हैं ग्राम सेवक और बीडीओ महकमा। इनका स्कोर कम था। जिसको निकालना है, उसकी एक बिंदी डालनी है थोड़ी सी, फिर कहेंगे कि उसका कोई स्कोर ही नहीं है। मेरा एक्सपीरियेन्स है, हम ज़मीन से जुड़े हुए लोग हैं, मैं पैदल चलने वाला इंसान हूँ। सारी दुनिया देखती है, हम लोग सारे एमपीज़ और आप भी देखते हैं। एक भाई ने अभी कहा कि पार्लियामैंट में एसी में बैठकर फैसला नहीं होता, क्या बात करते हो, एसी में आप कितने दिन बैठोगे? शाम को ट्रेन पकड़ेंगे और अपने अपने गाँव पहुँच जाएंगे। We are criticising ourselves. मैं कहना चाहता हूँ कि अगर लोक-लाज न होती, डैमोक्रेसी न होती, मैं जनाब को कहना चाहता हूँ कि एक मैम्बर ऑफ पार्लियामैंट है जिसका कुर्ता पकड़कर एक गरीब आदमी हिम्मत से बात करता है कि मेरी बात सुनो। कभी आईएएस के कुर्ते को हाथ लगाकर दिखाओ, किसी अधिकारी के कुर्ते को हाथ लगाकर दिखाओ, वह थाना दिखा देगा, अंदर घुसेड़ देगा, उसकी बीपीएल की ऐसी की तैसी हो जाएगी। लेकिन फटा कपड़ा पहने हुआ आदमी हमारे गले में चिपटा होता है, हम चिपटाते हैं। मैं कहता हूँ कि बीपीएल की जितनी रहनुमाई हम लोग जानते हैं, कोई नहीं जानता है। गलती कहीं होती है। अगर आपके पोलिटीशियन्स की इनवाल्वमैंट नहीं होती, बीपीएल की लिस्ट बनते समय वह बता सकता है क्योंकि he visited. He is visiting और हर इलाके में घूमने वाला इंसान – एक एमपी और एक एमएलए और वहाँ का रहने वाला इंसान बेहतर जानता है कि वह कौन आदमी है, उसे कोई नहीं पूछेगा, चाहे सरकार मायावती की होगी या चाहे सरकार मेरी होगी, चाहे सरकार किसी और की होगी, यह न सोचें कि मेरी सरकार ने ऐसा कर दिया, उसकी सरकार ने ऐसा कर दिया। 

MADAM CHAIRMAN: Please conclude.

CHAUDHARY LAL SINGH : I am going to conclude. सीन बिल्कुल एंड की तरफ जा रहा है। मेरी आपसे वितनी है कि गवर्नमैंट ने आठ-दस पॉलिसीज़ ऐसी बनाई हैं लेकिन हमें इसको कैसे मज़बूती से लागू करना है, वह सोचने की ज़रूरत है। एजुकेशन की बात करते हैं, फ्री देना चाहते हैं, मिड डे मील भी देते हैं, खिलाते भी हैं कि जाइए स्कूल पढ़िये और स्कालरशिप भी देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि वहाँ टीचर्स क्या देते हैं? वहाँ क्या क्या देते हैं? किस स्टेट की बात करें, किस राज्य की बात करें, और वह एजुकेशन लेने जाता है, उसके माँ-बाप का भी इंटरस्ट नहीं होता मैं आपको क्या सुनाऊँ। जो हालत हमारी बनी हुई है, मेरी आपसे एक विनती है कि आप मेहरबानी करें। यह मेरा लास्ट पॉइंट है।  जो आदमी मर जाता है, जिस फैमिली का सोर्स मर जाता है, जिस फैमिली में तुफान और भूचाल आ जाता है, जिस फैमिली में आगजनी हो जाती है, उस घर वाले का एक्सीडेंट हो जाता है, तो उसका सोर्स खत्म हो जाता है। मैंने बड़े-बड़े दुकानदार देखे हैं। जो लोग इम्पलायी हैं, वह मर जाएंगे  तो उनके घर वालों को ठीक-ठाक पेंशन मिल जाती है, लेकिन मिडल क्लास का व्यापारी जब मर जाता है, तो उसका सारा काफिला लुट जाता है। मेरी जनाब से विनती है कि हम जो पेंशन देते हैं which is not enough. The pension is very meagre. दो-ढाई, तीन सौ रूपये भी क्या कोई पेंशन है? मेरी जनाब से विनती है कि बीपीएल को आइडेंटिफाई करने का सिस्टम गलत है। इसके अलावा बीपीएल के लिए मिनीमम पेंशन पांच हजार रूपये होनी चाहिए, ताकि उसका घर चल सके। जब आप असल में बीपीएल ढूंढेंगे तो कम मिलेंगे और सही मिलेंगे, लेकिन जब आप गलत करोगे तो जितनी मर्जी स्कीमें बना लो, कुछ नहीं होगा।

 

 

SHRI S. SEMMALAI (SALEM): Thank you, Madam Chairman, for permitting me to participate in the discussion on the Resolution moved by our senior and experienced Member Dr. Raghuvansh Prasad Singh. I welcome the Resolution for estimation of people Below Poverty Line and for the eradication of poverty by means of providing employment, providing quality education, providing training, providing pension, etc.

MADAM CHAIRMAN : Because we have to conclude at 5 o’clock, please conclude in just five minutes. I am giving time to everyone who wants to speak, but just five minutes.

SHRI S. SEMMALAI : Various yardsticks were formulated for the estimation of Below Poverty Line. Poverty line estimates have not been scientifically done so far. The Planning Commission has adopted a methodology which has also been questioned by the critics. Suresh Tendulkar Committee estimates of poverty at 42 percent; Saxena Committee estimates are around 51 per cent. The Report of the National Commission states that 77 per cent of our people live on Rs.20 a day.

I feel that no scientific estimate has been evolved to define Below Poverty Line. The benchmark of the estimate made by the Planning Commission was fixed over four decades ago on the idea of calorie intake of male and female in urban and rural areas. I feel that it is the right time to constitute a committee of experts to look into the issue afresh for defining BPL, so that the benefits offered by the Government would reach the targeted people. Already two committees have been constituted – one by the Ministry of Rural Development and the other by the Planning Commission. They have given their recommendations which have to be taken into account.

My concern is that hundreds of crores of subsidy given by the Government should reach the real beneficiaries. According to the Budget documents 2010-11, major subsidies doled out by the Government are around Rs.1,24,786 crore as per the Revised Estimates of 2009-10. For the current year, major subsidy amounts to Rs.1,00,992 crore meant for the economic upliftment of the poor. However, I am sorry to say, even 50 per cent of the subsidy amount does not reach the poor. There are many leakages and slippages and inefficient delivery mechanism. I fear, if these obstacles are not removed, the development process will not reach the poor. I strongly suggest that a rational scientific estimate of Below Poverty Line should be evolved, so that the deserving people will get the benefit and duplicity is avoided. I hope the Government will act in the right earnest taking into account my views in this matter.

          The key to elimination of poverty is education, more particularly, women education. Our performance in this regard is very poor. I hope that the Right to Education Act will bring in a revolutionary change in the education scenario of women in particular as education of women leads to empowerment, limiting the family size and better health of the family.

          In China, there is a proverb that instead of giving a dried fish piece to a hungry man, give him a bait. Similarly, with the meaning of the proverb, please provide our people quality education, which will pave the way for gainful employment and also make them self-reliant. Till then, it is the duty of the Government to provide welfare measures to the families below the poverty line. I think that this is the objective of the Resolution moved by the hon. Member Dr. Raghuvansh Prasad Singh.

          So, I appeal to the Government to take note of the views aired by our Members during the discussion on the Resolution and implement them as far as possible.

                                                                                                   

श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): सभापति महोदया, आपने मुझे डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी द्वारा जो यह संकल्प लाया गया है कि सन् 2015 तक इस देश से गरीबी समाप्त होनी चाहिए, इस पर मुझे बोलने का अवसर दिया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं सीधे प्वाइंट्स पर बोलना चाहता हूं। 1997 में बीपीएल का चयन हुआ, सन् 2002 में दूसरी सूची बनी और एक सुओ मोटो राइट मिला। अगर चयन में गड़बड़ी हुई तो एक फर्स्ट और सैकिंड अपील का अधिकार मिला। यह सिस्टम चयन की प्रक्रिया में हुआ। चयन में गड़बड़ रही। मेरा इसमें सुझाव है कि एसडीएम के लेवल पर अपील सुनने का जो अधिकार है, उसे चेंज करना चाहिए, क्योंकि एसडीएम प्रभावित हो जाता है। वह पोलिटीकल कारणों से प्रभावित हो जाता है, उसका लेवल भी कुछ कम है, इसलिए भी वह प्रभावित हो जाता है। यह बात अलग-अलग स्टेट में उठी थी कि अगर बीपीएल सूची में गड़बड़ है तो किसे अपील करें। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को अपील करने के अधिकार की बात आई थी। मैं उसमें सुझाव देना चाहता हूं कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बहुत बिज़ी रहता है। डिविज़नल कमिश्नर नाम का एक अधिकारी जिले में रहता है, वह तीन-चार जिलों को कवर करता है, कई जगह पांच-छ: जिले होंगे। अगर अपील का यह अधिकार उसे दे दें तो वह कम प्रभावित होगा और अपील ढंग से सेटल हो जाएगी। अभी यह स्थिति है कि आपने अपील कर दी और उसमें आपने टाइम बाउंड प्रोग्राम नहीं दिया कि यह अपील उसने कब तक आपको सेटल करनी है। उसमें वह छ:- सात महीने भी लगा सकता है। म्युनिसिपेलिटी एवं बीडीओ से रिपोर्ट नहीं आई। इसलिए अपील सुनने का अधिकार बड़े अधिकारी को दिया जाए और उसमें एक टाइम बाउंड प्रोग्राम दे दिया जाए तो बीपीएल सूची में कुछ सुधार हो सकता है। सिस्टम में सुधार करने की जरूरत है।

          सभापति महोदया, दूसरा मैं यह कहना चाहता हूं कि बीपीएल सूची में ये नये-नये फार्मूले रोज लगाते हैं। मैं एक थंब रूल की बात करता हूं कि जिसका भी कच्चा मकान है, उसे क्यों नहीं बीपीएल में सम्मिलित कर लें। ऐसा एक रूल बनाया जा सकता है और उसके साथ कई अन्य पैरामीटर जोड़े जा सकते हैं। ऐसे बहुत से गांव हैं, जहां पर कच्चे मकानों में लोग रहते हैं। अगर कोई पांच फैमिली का परिवार है, उसका अगर एक मकान पक्का है और बाकी कच्चे हैं तो उसे भी हम कंसीडर कर सकते हैं। ये मोटे-मोटे फार्मूले हैं, जिसके कारण हम बीपीएल सूची को ठीक कर सकते हैं। उसमें अगर गड़बड़ होती है तो बड़े अधिकारी को अपील देकर, उसमें टाइम बाउंड निश्चित कर दें तो बीपीएल सूची में सुधार हो सकता है। सभापति महोदया, तीसरा मैं यह कहना चाहता हूं कि बीपीएल सूची के जो लोग हैं, वे अधिकतर हैंडीक्राफ्ट और हैंडलूम में लगे हुए हैं। उनके पास हाथ का हुनर है। कोई ब्लेकस्मिथ, गोल्ड और सिल्वर वर्क में लगा है तथा कोई ब्लू पोट्री, चूड़ी का काम करने में लगा है, कोई पेटिंग एवं प्रिंटिंग में लगा है, कोई जूट बैग बना रहा है, कोई यूटिलिटी आर्टीकल, कार्पेट, वूडन और ऑयरन फर्नीचर बना रहा है, वे हाथ का हुनर जानने वाले लोग हैं। इस प्रस्ताव में यह दिया है कि वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाए।

          सभापति महोदया, मैं इस प्रस्ताव का समर्थन करता हूं। आप जितनी ज्यादा बीपीएल के लोगों को वोकेशनल ट्रेनिंग देंगे, उनके हाथ के हुनर की केपेसिटी बढ़ेगी, स्कील डेवलपमेंट होगा और वे कमाने लायक बन सकते हैं। 

           सभापति महोदया, इस प्रस्ताव में जो छात्रवृत्ति देने की बात है, उसका भी मैं समर्थन करता हूं। एक बात और कहना चाहता हूं कि सरकार की जितनी भी योजनाएं हैं, उनमें से अगर ‘इफ्स’ और   ‘बट्स’ हटा दें , तो सभी योजनाएं ठीक प्रकार से चलेंगी। जैसे अभी पेंशन की बात आई और कहा गया कि यह योजना शुरू कर दी गई है, लेकिन इसमें लिख दिया है कि उसकी दो एकड़ जमीन नहीं होनी चाहिए। विधवा है, तो आपने उसमें लिख दिया कि उसके कोई कमाने वाला आदमी नहीं होना चाहिए। इस प्रकार के जो आपने इसमें लेकिन, किन्तु और परन्तु जैसे शब्द लिख दिए हैं, ये हटने चाहिए। बूढ़ा, बूढ़ा होता है और विधवा, विधवा होती है। उसे पेंशन मिलनी चाहिए।

          महोदया, अन्त में, मैं एक सुझाव देकर अपनी बात समाप्त करता हूं कि बहुत से ऐसे लोग हैं, जो विदेशों, मिडल ईस्ट या कहीं भी जाकर अपना काम कर सकते हैं। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि उन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग देकर उनके रोजगार के अवसर बढ़ाने का काम करें, तभी उनकी स्थिति में सुधार हो सकता है। बी.पी.एल. की सूची में भी सुधार हो सकता है और जब उन्हें रोजगार मिलेगा, तो बी.पी.एल. की संख्या भी कम हो सकती है और दरिद्रता भी मिट सकती है। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

                                                                                                             

श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल): सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव का समर्थन करता हूं, जिसमें कहा गया है कि वर्ष 2015 तक देश से गरीबी का उन्मूलन किया जाए और सीधे ही पाइंट पर आना चाहता हूं। हमारे देश के अंदर जो बायोमैट्रिक कार्ड बन रहा है, उसमें अगर आय चिन्हित हो जाए, तो बी.पी.एल. आदमी चिन्हित हो जाएंगे। गरीबी की कोई जात नहीं होती है। कोई भी व्यक्ति गरीब हो सकता है। गरीबी को हटाने के लिए हमें आर्थिक रूप से आरक्षण लाना होगा। इसके साथ-साथ बी.पी.एल. लोगों को चिन्हित करने हेतु नोडल ऑफीसर की जिम्मेदारी नियुक्त करनी होगी, ताकि बी.पी.एल. वाले चिन्हित हो जाएं।

          महोदया, हमारे उत्तराखंड के अन्दर इतनी गरीबी है कि लोग रोटी बनाते हैं और उसे नमक के साथ खाते हैं। वहां एक घास होती है, जिसे बिच्छू घास या कंडली कहा जाता है। जब लोगों के पास सब्जी नहीं होती, तो लोग बिच्छू घास अथवा कंडली को खाते हैं। इस प्रकार की गरीबी हमारे उत्तराखंड में व्याप्त है। इसलिए उन्हें चिन्हित किया जाए और यह सरकार की जिम्मेदारी हो। मैं इस संकल्प का समर्थन करते हुए कहूंगा कि –

          “पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, संकल्प से कोई गंगा निकलनी चाहिए

 मेरे सीने में न सही, तेरे सीने में ही सही, कहीं भी आग

 लेकिन आग जलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा करना मेरा मकसद नहीं

 मेरी यह कोशिश है यह सूरत बदलनी चाहिए।”

 

इस संकल्प से सूरत बदलेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

                                                                                         

 

श्री सुशील कुमार सिंह (औरंगाबाद): सभापति महोदया, डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने जो संकल्प प्रस्तुत किया है, मैं उसके समर्थन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं कहना चाहता हूं कि देश में 1971 में     ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया गया। उस समय उन गरीब लोगों के मन में एक आकांक्षा जगी थी और एक विश्वास उत्पन्न हुआ था कि अब सरकार ने हमारी तरफ रुख किया है और अब हमारी दशा-दिशा बदलने वाली है। मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि आजादी को 63 वर्ष हो गए, लेकिन हम लोग, गरीबी को क्या दूर भगाएंगे और क्या हटाएंगे, अभी तक हमने सही तरीके से इस देश के अंदर गरीबी और गरीबों की पहचान तक नहीं की है। गरीबी घटने के बजाय बढ़ रही है।

          महोदया, देश में व्याप्त गरीबी की जांच करने के संबंध में कई समितियां बनीं और उनकी रिपोर्ट्स आईं। सक्सेना कमेटी है, तेन्दुलकर कमेटी है और अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी है। सबकी रिपोर्ट अलग-अलग हैं। किसी ने गरीबी के प्रतिशत को कुछ आंका है और किसी ने कुछ आंका है। भारत सरकार की जो सबसे ताकतवर एजेंसी यानी योजना आयोग है, उसका कहना है कि देश के अंदर मात्र 23 प्रतिशत गरीबी है। जब तक हम गरीबों की पहचान नहीं करेंगे, तब तक हम गरीबी हटाने के बारे में किस प्रकार से सही कदम बढ़ा पाएंगे, यह मैं समझ नहीं पा रहा हूं?  

          महोदया, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि यदि सरकार की नीति और नीयत दोनों साफ हैं, तो इस देश में चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, उसे बिना किसी भेदभाव और राजनीति के गरीबों की पहचान करनी चाहिए।  अभी जैसे बी.पी.एल. का बोला है…( व्यवधान)

17.00 hrs.

सभापति महोदया : माननीय सदस्य, एक मिनट के लिए बैठें। चूंकि अभी दो सदस्यों का बोलना बाकी है और माननीय मंत्री जी का भी उत्तर बाकी है, इसलिए यदि सदन की इच्छा हो तो सदन का समय इस चर्चा के लिए आधा घण्टा बढ़ा दिया जाये।

          …( व्यवधान)

सभापति महोदया : इसीलिए कि दो सदस्य महोदय और मंत्री महोदय को बोलना बाकी है।

कई माननीय सदस्य: ठीक है।

सभापति महोदया : सदन का समय इस चर्चा पर आधे घण्टे के लिए बढ़ाया जाता है।

डॉ. भोला सिंह (नवादा): महोदया, मैं व्यवस्था के प्रश्न पर खड़ा हुआ हूं। मेरा व्यवस्था का प्रश्न यह है कि आप जो समय बढ़ा रही हैं, उससे दूसरे प्रस्ताव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। …( व्यवधान)

योजना मंत्रालय में राज्य मंत्री और संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री वी.नारायणसामी):भोला सिंह जी, हम आपका रैजोल्यूशन आज शुरू करेंगे।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : आप चिन्ता न करें, इसकी हमें भी चिन्ता है।

          अब आप जल्दी समाप्त करें, कन्क्लूड करें।

श्री सुशील कुमार सिंह : महोदया, मैं कह रहा था कि अभी तक हम लोगों ने देश के अन्दर गरीबों की पहचान नहीं की है। अब जहां तक बी.पी.एल. का सवाल है, गरीबी की रेखा के नीचे कौन है, इसके लिए योजना आयोग ने, भारत सरकार ने जो मानक तय किये हैं, उन मानकों के आधार पर, मैं जिस प्रदेश से चुनकर आता हूं, बिहार के औरंगाबाद से, उस प्रदेश की बात मैं कर रहा हूं…( व्यवधान)

सभापति महोदया : आपका समय समाप्त हो गया है।

श्री सुशील कुमार सिंह : मैं कन्क्लूड कर रहा हूं। मैं कह रहा था कि योजना आयोग के और भारत सरकार के मानक के आधार पर बिहार में गरीब परिवारों की संख्या सर्वे के आधार पर 1.5 करोड़ है, लेकिन भारत सरकार इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है और योजना आयोग का कहना है कि बिहार में मात्र 65 लाख परिवार ही गरीबी की रेखा के नीचे हैं। दोनों चुनी हुई सरकारें हैं, एक भारत सरकार है और दूसरी राज्य सरकार है, दोनों के बीच में यह किस तरह का कंट्राडिक्शन है? इसके बीच में गरीब मारे जा रहे हैं, गरीब दोनों के बीच में पिस रहे हैं। मैं आपके माध्यम से भारत सरकार से कहना चाहूंगा कि जो पहचान, जो सर्वे हुआ है, जिसके तहत बिहार में 1.5 करोड़ परिवार गरीबी की रेखा के नीचे चिन्हित किये गये हैं, उसके आधार पर बिहार में गरीबों को अनाज का वितरण किया जाना चाहिए। उसके आधार पर भारत सरकार को कोटा निर्धारित करना चाहिए।

          दूसरी बात मैं यह कह रहा था कि एक तरफ तो इस देश में अनाज सड़ रहा है और दूसरी तरफ बिहार जैसे गरीब प्रदेश में लोग भूखों मर रहे हैं। भारत सरकार को यह चाहिए, मैं सुझाव देना चाहता हूं…( व्यवधान) मैडम, मैं एक मिनट में कन्क्लूड करना चाहूंगा, कृपया मुझे मौका दें। मैं कह रहा था कि एक तरफ तो अनाज सड़ रहा है, दूसरी तरफ बिहार जैसे गरीब प्रदेश के लोग भूखों मर रहे हैं। भारत सरकार उनकी दशा-दिशा पर विचार करे और जो अनाज सड़ रहा है, उस अनाज में से प्रदेश सरकार को आबंटित करे और गरीबों को राहत दे।

          महोदया, अभी बिहार में भयंकर सूखा है। बिहार में पिछले कई वर्षों से बाढ़ और सूखे के कारण तबाही मची है। इस वर्ष भी स्थिति और खराब है, इसलिए भी मैं भारत सरकार को कहना चाहूंगा कि जो अनाज आपके गोदामों में और गोदामों के बाहर सड़ रहा है, बिहार में भयंकर सूखा है, केन्द्र सरकार की टीम भी वहां गई है और उसने भी माना है कि बिहार में इस वर्ष सूखा पड़ा है। मैं आपसे कहना चाहूंगा कि गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को जो अनाज वितरित किया जाता है, मैं कल की बात कह रहा हूं, मैं कल अपने निर्वाचन क्षेत्र में गया था…( व्यवधान)

सभापति महोदया : माननीय सदस्य, आपको मालूम है न कि एक मिनट क्या होता है?

श्री सुशील कुमार सिंह : मैडम, मैं क्षमा चाहूंगा-बस एक मिनट। यह गरीबों के पक्ष की बात है, गरीबी की बात है।…( व्यवधान)

सभापति महोदया : अगले माननीय सदस्य भी बिहार के ही बोलने वाले हैं।

श्री सुशील कुमार सिंह : मैं क्षमा चाहूंगा। मैं औरंगाबाद जिले के नवीनगर ब्लाक के सत्ता गांव में गया था, वहां पी.डी.एस. का डीलर अनाज वितरित कर रहा था। जब मैंने उस अनाज को अपने हाथ में उठाकर देखा तो न तो गेहूं खाने के लायक था और न चावल खाने लायक था। मैं उसके नमूने को उठाकर ले आया और जिला कलैक्टर को दे दिया। मैं कहना चाहता हूं कि वह अनाज आदमी तो क्या, जानवर नहीं खा सकता, इसलिए मेरा सुझाव होगा कि सरकार यदि उनकी स्थिति पर तरस खाती है तो उनको अनाज के बदले नकद राशि सब्सिडी के रूप में दे दें, उनको सहायता के रूप में दे दें तो वे उस पैसे से अच्छा अनाज बाजार से खरीद लेंगे, लेकिन घटिया अनाज उनको मिल रहा है।

          एक तरफ कहा जाता है कि हम यह उनको राहत के रूप में दे रहे हैं और दूसरी तरफ वह खाने के लायक नहीं है।

सभापति महोदया :  रामकिशुन जी, आपकी ट्रेन चूक गयी। …( व्यवधान) अभी पांच मिनट के लिए जगदीश ठाकोर जी का नाम लिया गया है। इनके बाद आपका नंबर है। 

श्री रामकिशुन (चन्दौली): आप जब मुझे समय देंगी, मैं तब बोलूंगा, लेकिन बोलूंगा जरूर।

 

श्री जगदीश ठाकोर (पाटन): माननीय सभापति महोदया, माननीय रघुवंश प्रसाद जी देश की मूलभूत समस्या के सवाल की चर्चा का संकल्प लेकर आए हैं।  मैं आपके द्वारा रघुवंश प्रसाद जी का धन्यवाद करता हूं। मैं सीधे मुद्दे पर आऊंगा।  हमारे यहां काफी फरियादें रहती हैं और सदन के सभी सदस्य इस बात को भली भांति जानते हैं कि बीपीएल की सूची सभी प्रदेशों में काफी गलत बनी हुयी है।  इस समस्या का समाधान क्या है? जो आवास योजना हम चलाते हैं, उसमें रेवेन्यू रिकार्ड हम सही करते हैं।  इसमें भी रेवेन्यू रिकार्ड देखा जाए, पंचायत का रिकार्ड देखा जाए और उसके पास नौकरी वगैरह की क्या सुविधायें हैं, वह देखनी चाहिए।

  17.06 hrs.                   (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair)

          सभापति जी, मैं यह बात इसीलिए बता रहा हूं कि गुजरात में जब गरीब मेले चल रहे थे, तब पता चला कि विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष भी बीपीएल यादी में थे। अहमदाबाद जैसे पचहत्तर लाख की आबादी वाले शहर के मेयर का नाम भी बीपीएल सूची में था। जो समारोह होते हैं, जिनमें बीपीएल के नाम पर सहायता दी जाती है, वह चाहे सहकारी बैंक का कर्मचारी हो, उसके पास बीस बीघा जमीन है, उसके पास पक्का मकान होने के बावजूद भी, बड़े समारोहों में उसे सहायता दी जाती है।  ऐसे लोगों पर कुछ रोक लगनी चाहिए।  बीपीएल सूची के जो नियम या प्रावधान बने हैं, उन प्रावधानों को तोड़कर जो उसका लाभ लेता है, उनको दंड दिया जाए और उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। 

          माननीय सभापति जी, हम जब भी विस्तार में दौरे पर जाते हैं, तो लोग एक ही बात कहते हैं कि सही लोग जिनको बीपीएल में होने चाहिए थे, वे नहीं हैं और पैसे वाले, जमीदारी वाले, पक्के मकान वाले लोगों के नाम बीपीएल सूची में हैं। इसीलिए मैं आपको बताना चाहता हूं कि बीपीएल सूची सही नहीं होगी और हमारे पैसे ऐसे ही जाते रहेंगे, तो देश से गरीबी नहीं हटेगी।  उसे हटाने के लिए हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। बीपीएल के जो प्रावधान बने हैं, उसमें अपील का जो कानून बनाया गया है, उसमें इसके लिए एक स्पेशल अधिकारी की डय़ूटी लगायी जाए।  इसके सिवाय उसके पास कुछ और काम नहीं होना चाहिए और वह सही तरह से काम करे, ऐसी व्यवस्था की जाए। 

          विश्व के सबसे लोकतंत्र देश की बात हम करते हैं।  क्या हम कोई ऐसा मैकेनिज्म नहीं बना पाते, जिससे सही बीपीएल की सूची बने और जो गलत लोग इसका लाभ ले रहे हैं, उनको दंड दिया जाए तथा गलत सूची बनाने वाले जो अधिकारीगण हैं, उन पर कुछ दबाव बनाया जाए?  ऐसा कुछ न कुछ मैकेनिज्म बना करके गरीब की बात को ध्यान में रखा जाए। महोदय, मैं आपके माध्यम अपनी यह बात कहकर, समाप्त करता हूं।

 

श्री रामकिशुन (चन्दौली):  माननीय सभपति जी, आपने गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को कैसे गरीबी रेखा के नीचे से वर्ष 2015 तक अलग किया जाए, उनकी आर्थिक स्थिति ठीक की जाए, उस संबंध में माननीय वरिष्ठ नेता और सांसद डा. रघुवंश प्रसाद जी के इस प्रस्ताव पर मुझे बोलने का अवसर दिया है, इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं।

          माननीय सभापति जी, दुनिया में भारत गरीब है, भारत में गांव गरीब है और गांव में रहने वाले लोग बीपीएल सूची की गरीबी रेखा के नीचे हैं।  उन लोगों को कैसे गरीबी रेखा से ऊपर उठाया जाए, इस चर्चा का मूल विषय यह है। मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि वर्ष 1971 में हम छोटे थे, तब हमने एक नारा सुना था – ” गरीबी हटाओ। ”    

          उस समय कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी ने पूरे देश से आह्वान किया था कि देश से गरीबी हटाओ, लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद भी गरीबी नहीं हटी। गरीबों की संख्या बढ़ गई। इसकी बार-बार गणना होती है। कई आयोग बने और उनकी रिपोर्ट्स भी भिन्न-भिन्न है। व्यावहारिक पहलू अलग हैं और आयोग में आईएएस रैंक के जो लोग बैठे हैं, उनके आंकड़े कुछ और बताते हैं। मै आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि अगर सही मायने में गरीबी मिटानी है, गरीबों की आर्थिक स्थिति सुधारनी है, तो आपको ठोस कार्यक्रम, ठोस नीति बनानी होगी। अगर आपकी नीयत और नेतृत्व सार्थक हो, अच्छा हो तो निश्चित रूप से गरीबी कम हो जाएगी।

          मैं कांग्रेस पार्टी के दो-तीन कार्यक्रमों के बारे में कहना चाहूंगा। बीपीएल कार्डधारी लोगों के लिए एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन योजना है। उस कार्ड द्वारा गरीब परिवार तीस हजार तक का इलाज करवा सकता है। लेकिन यह गरीब के नाम पर अमीर के लिए लाभ कमाने की योजना है। व्यक्ति तीस हजार का कार्ड लेकर जब डाक्टर के पास जाता है तो एक हजार-दो हजार रुपये की दवाई लेता है और बाकी पैसों का कुछ पता ही नहीं चलता। आप कहते हैं कि इससे गरीबी दूर करेंगे, गरीबों की बीमारी दूर करेंगे। आपको इस पर नियंत्रण लगाना पड़ेगा। इसके लिए सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों को मजबूत बनाना पड़ेगा।

          मैं शिक्षा के बारे में कहना चाहता हूं। रघुवंश प्रसाद जी ने कहा गरीबों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा, मिड डे मील आदि दिया जाता है। अगर इस देश से गरीबी मिटानी है तो आप शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत कीजिए, गरीब बच्चों को आवासीय विद्यालयों में पढ़ाने का इंतजाम कीजिए। उस गांव में आवासीय विद्यालय बनाइए जो बीपीएल के नीचे हैं। उसमें उन्हें 24 घंटे रखिए। उनके खाने का इंतजाम, कपड़ों का इंतजाम, उन्हें पढ़ाने का काम, अध्यापक रखने का इंतजाम कीजिए।…( व्यवधान) 14 साल बाद बच्चा जब पढ़ कर निकलेगा तो उसकी काबलियत अच्छी होगी।

          आप गरीबी मिटाने के लिए नरेगा में पैसा दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में पैसा दे रहे हैं। आजकल रोजगार के अवसर जैसे भैंस पालने, सूअर पालने का काम है। इसका कितना दुरुपयोग हो रहा है। पूरा पैसा सम्पन्न वर्ग के लोग, अभी एक साथी ने कहा कि आप आवास के लिए 40 हजार, 45 हजार रुपये देते हैं। बीडीओ पैसा खा जाता है, अधिकारी पैसा खा जाते हैं और उनका आवास भी नहीं बन पाता। मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि अगर उसकी नीयत ठीक है, नीति ठीक है तो गरीबी हट सकती है। गरीबों को मजबूत करने के लिए आपको यह काम करना पड़ेगा।

          रघुवंश बाबू ने छोटे-छोटे उद्योग धंधे, उनकी हाथ की कारीगरी के बारे में कहा. आज गरीबों की हालत यह है कि उनके धंधे धीरे-धीरे छिनते जा रहे हैं।…( व्यवधान) आज पुरवा बनाने का काम भी फैक्ट्री में होता है, दांत खोदने वाली जो सींक बनती है, वह भी मशीन से बनती है।…( व्यवधान) कभी गरीब व्यक्ति पत्तल अपने हाथ से बनाता था, आज वह पत्तल भी मशीन से बना रहे हैं। अब मशीन किसके पास है? जो पैसे वाले बड़े लोग हैं, उनके पास मशीन है। अब मेरे बोलने पर भी बीपीएल लागू हो जायेगा। मैं सबसे कमजोर नौगढ़ क्षेत्र और अन्य नक्सली जिलों से आता हूं। अभी हमारे उत्तराखंड के साथी सतपाल महाराज जी ने कहा कि लोग घास की रोटी खाते हैं। महाराणा प्रताप जी ने भी  इस देश में स्वाभिमान के लिए घास की रोटी खाई थी, लेकिन गरीब स्वाभिमान के चलते घास की रोटी नहीं खा रहा। वह उसे इसलिए खा रहा है, क्योंकि उसके पास खाने के लिए कोई संसाधन नहीं हैं। आज अनाज आपके गोदामों में सड़ रहा है। अनाज के बारे में जब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट कहती है, तो कृषि मंत्री जी कहते हैं कि हम बीपीएल लोगों को फ्री अनाज नहीं बांटेंगे।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि उन गरीबों को प्रशिक्षण देने की जरूरत है। उनके लिए जो इंदिरा आवास, निर्मल आवास बन रहे हैं, उसके लिए आप पैसा बढ़ाइये। जब महंगाई बढ़ रही है, तो उनके आवास 45 हजार रुपये में नहीं बन सकते। मैं एक बात कहना चाहता हूं कि अगर आप कालोनियां बसाते हैं, तो गांवों में बीपीएल परिवारों को चिन्हित करके उन्हीं के घरों को, चाहे वह झोंपड़ी है या कच्चा मकान है, उन पर पक्के मकान बनाकर देते हैं, तो निश्चित तौर से उनकी स्थिति अच्छी होगी। इसके साथ-साथ आपको उनके लिए रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराने पडेंगे।

          अंत में, मैं कहना चाहता हूं कि आज देश में गरीबों की जो हालत है, हम जो दावे पेश करते हैं, उन सबका असर गरीबों पर पड़ रहा है। हम खेल में पैसा खर्च कर रहे हैं, दूसरे मदों में या फिजूलखर्ची में पैसा खर्च कर रहे हैं। गरीबों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए हमें उनके प्रति संवेदनशील होकर कार्यक्रम बनाना चाहिए, लेकिन हम सिर्फ अपने लम्बे भाषणों के द्वारा आदर्शों को ही प्रस्तुत करते हैं। सबसे पहले हमें नये सिरे से उनकी पहचान कराने की जरूरत है।  अब आप कहेंगे कि बीपीएल लोग मोबाइल नहीं रख सकते। आज गांव-गांव में मोबाइल दे दिया गया है। …( व्यवधान) मैं आपको उनको मानक बता रहा हूं। आज कोई भी  ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके घर में मोबाइल नहीं है, चाहे वह गरीब ही हो। …( व्यवधान) आपने मोबाइल का बाजार तैयार कर दिया। अब हर गरीब से बड़े-बड़े उद्योगपति मोबाइल द्वारा अपना पैसा ले रहे हैं। अब आप कहेंगे कि उनके पास मोबाइल है, इसलिए वह गरीबी की रेखा से नीचे नहीं आता, तो यह भी उचित नहीं है।  आज छोटा पोर्टेबल टी.वी. गांव-गांव में पहुंच गया है। यह मानक भी आपको बदलना पड़ेगा। आप बीपीएल के लिए जो मानक रखते हैं, उन मानकों को आपको बदलना पड़ेगा, क्योंकि जितनी भी रिपोर्ट्स हैं चाहे सेनगुप्ता रिपोर्ट हो, तेंदुलकर रिपोर्ट हो, सिन्हा रिपोर्ट हो …( व्यवधान) योजना आयोग की रिपोर्ट हो।      …( व्यवधान) मैं अपनी बात एक मिनट में खत्म कर रहा हूं। उन सारी रिपोर्ट्स में गरीबों के आंकड़े ठीक ढंग से प्रस्तुत नहीं किये गये हैं। आज देश की आधी आबादी यानी 37 परसेंट से 40 परसेंट तक गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। उसकी आर्थिक स्थिति खराब है। उनके बच्चों के पास नौकरियां नहीं हैं। आप रोजगार दे रहे हैं, रोजगार की गारंटी दे रहे हैं, लेकिन वह रोजगार उन तक देने के लिए हजारों रुपया खर्च करते हैं। देश के पूर्व प्रधान मंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने कहा था कि हम गरीबों के लिए सौ रुपया भेजते हैं जबकि उन तक केवल दस रुपये ही जाते हैं। …( व्यवधान) आखिर यह क्यों हो रहा है, इस पर आपको विचार करना चाहिए, चिन्ता करनी चाहिए। आपको इस प्रस्ताव के पक्ष में होकर यह निर्णय लेना पड़ेगा कि अगर हम एक हजार रुपया गरीब को दे रहे हैं।…( व्यवधान)  अगर सौ दिन का काम गरीबों को देते हैं, तो एक हजार रुपये के हिसाब से उनका दस हजार रुपया हुआ।  अब 365 दिन में उनकी प्रतिदिन कितनी आय हुई, क्योंकि दस हजार रुपया उनको साल भर में मिलता है। …( व्यवधान) मैं एक मिनट में अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। …( व्यवधान)

सभापति महोदय :  अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए। आपने पहले ही पन्द्रह मिनट ले लिये हैं, इसलिए अब आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री रामकिशुन :    अब 365 दिनों में दस हजार रुपया कितना हुआ? …( व्यवधान)

 उनकी पर डे 30 रुपये से ज्यादा आमदनी नहीं है। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।                                                                                      

 

ग्रामीण विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री प्रदीप जैन):  महोदय, निश्चित रूप से हमारे देश में बहुत बड़े चिंतक और ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व मंत्री, सांसद सम्मानित डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने एक ऐसा संकल्प देश की सबसे बड़ी पंचायत में लाने का काम किया है जिस पर 18 माननीय सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। सभी माननीय सदस्य इस बात से सहमत हैं कि देश से गरीबी जानी चाहिए। जब तक हमारा देश गरीबी से मुक्त नहीं होगा, तब तक हम अपने अन्तिम लक्ष्य को नहीं छू सकते हैं। सभी माननीय सदस्यों की बातें मैंने सुनी हैं, सबके मन में यह बात है, हर वक्ता ने जहां एक सवाल खड़ा किया, वहीं उन्होंने उसका निदान भी दिया क्योंकि हमें इस समस्या से निदान पाना है। मैं बताना चाहता हूं कि मैंने एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लिया, मेरे पिताजी सरकारी विभाग में रेलवे ड्राइवर थे। वहां रनिंग स्टॉफ के लिए एक डायरी मिलती थी, वह जब भी डय़ूटी पर जाते थे, उस डायरी पर हमेशा मैंने उनको यह लिखते देखा कि हे ईश्वर, दीनता के बिना जीवन, कष्ट के बिना मृत्यु और मृत्यु के पश्चात् मुक्ति प्रदान करना। दीनता या गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप है। आज उस दीनता से हम कैसे देश को निजात दिलाएं, उसके लिए डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने एक दिशा दी और उस दिशा पर यह सरकार पहले से ही निरंतर कार्य करती आ रही है। उनको बहुत अनुभव है और जिस तरह से आज देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार हैं, उनका चिह्नांकन सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। इस सरकार में योजना आयोग गरीबी संख्या का निर्धारण करता है और गरीबी संख्या का निर्धारण करने के लिए पूरा एक वैज्ञानिक फार्मूला है जिसके आधार पर एनएसएसओ 1,25,000 घरों के अंदर, पूरे देश के हर राज्य में, चूंकि हमारे  देश में सात लाख से ज्यादा ग्राम हैं, 2,52,000 से ज्यादा ग्राम पंचायतें हैं, सैम्पल के आधार पर सर्वे करने के लिए उनका एक क्राइटेरिया है जिसमें 260 प्रश्न हर परिवार में जाकर वे पूछते हैं। इस आधार पर एक सर्वे होता है और इसके आधार पर गरीबी की संख्या का निर्धारण होता है। हमारे मत्रालय का कार्य उसके तरीके का निर्धारण है कि कौन से वे लोग हैं, राज्य के अंदर, उस गांव के अंदर, उस क्षेत्र के अंदर जो गरीबी की सीमा में आते हैं। निश्चित रूप से इसके लिए लगातार ग्रामीण विकास मंत्रालय के माध्यम से चाहे हम 9वीं पंचवर्षीय योजना देखें, 10वीं पंचवर्षीय योजना देखें या 11वीं पंचवर्षीय योजना देखें, प्रयास किया जाता है क्योंकि हमारे देश के अंदर दिनोंदिन जनसंख्या बढ़ रही है। आज हमारी आबाद 120 करोड़ के करीब होने वाली है और ऐसे में वह तरीका जिसके माध्यम से हम गरीब व्यक्ति की सही ढंग से पहचान करें, उसके लिए सतत प्रयास चलते रहते हैं। इस विषय पर सभी वक्ताओं ने लगभग चार घंटे चर्चा की है, इसके लिए आधे घंटे का समय आप और बढ़ाएं क्योंकि मैं चाहता हूं कि आज हम लोगों को मिलकर इस बात पर एक मन बनाना है कि किस ढंग से हम, किस तरीके से हम सही गरीब व्यक्ति की पहचान करें। सबसे पहला प्रश्न डा. रघुवंश बाबू ने जो किया, मैं उस पर आना चाहता हूं। मैं जानता हूं कि उसका जवाब भी उन्हें मालूम है। उन्होंने पूछा था कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की गणना या उनकी पहचान इतने विलम्ब से क्यों हुई है। सन् 2002 के बाद जब बीपीएल की सेंसेस हुई थी, तब कुछ गलत लोगों के नाम उस सूची में जुड़ गए थे। जब उनके नाम हटाए जाने लगे, तो एक पीआईएल सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई। सन् 2003 में सुप्रीम कोर्ट में लगातार उस पर बहस चली, पक्ष और विपक्ष को उन्होंने सुना और 2006 में वह रोक हटाई गई। उसके बाद ग्रामीण विकास मंत्रालय में इस पर काफी चिंतन और मंथन हुआ। उस समय डा. रघुवंश प्रसाद सिंह स्वयं मंत्री थे। उस समय एक विचार आया कि कैसे इनकी सही संख्या हो और कैसे सही व्यक्ति, जो गरीबी रेखा से नीचे रह रहा है, उसे लाभ पहुंचे। हमारे देश में यह व्यवस्था है कि संख्या का निर्धारण योजना आयोग करता है और परिवारों का निर्धारण घर-घर जाकर ग्रामीण विकास मंत्रालय करता है। इस बारे में उनसे काफी पत्राचार हुआ, जो 2007 तक चला। मंत्रालय में इस बारे में मंथन हुआ और उसके कई दौर चले।

          मंत्रालय की एक अवधारणा थी कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले व्यक्ति के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के अलावा अन्य मंत्रालय भी कई कल्याणकारी योजनाएं चलाते हैं। इसलिए योजना आयोग एक कमेटी बनाए। माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह निष्कर्ष निकला कि ग्रामीण विकास मंत्रालय को ही इसका निर्धारण करना है। इसलिए 12 अगस्त, 2008 को डा. एन.सी. सक्सेना की अध्यक्षता में एक 17 सदस्यीय समिति गठित की गई। उसे सारी टर्म्स एंड रेफरेंस दी गई थीं, जिनके आधार पर 21.8.2009 को मंत्रालय को प्रेषित किया।

          सभापति महोदय, हम जानते हैं कि गरीब व्यक्ति देश की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इस सरकार का प्रारम्भ से ही यह मानना है, चाहे हम आजादी के दिन को याद करें, जब लाल किले की प्राचीर से पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने देश को कहा था कि यह आजादी देश के आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्ति के लिए आशा की किरण साबित होगी। स्वर्गीय इंदिरा गांधी जी ने भी कहा था कि हमें गरीबी हटानी है। इस बार भी हमारी सरकार ने आम आदमी के लिए बजट में कई प्रावधान किए हैं। आम आदमी की सही ढंग से पहचान हो, उसके लिए मंत्रालय ने उस कमेटी की रिपोर्ट को वेबसाइट पर डाल दिया। सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और अधिकारियों से कहा गया कि कमेटी ने इनकी पहचान के लिए जो नीति बनाई है, जो इसकी रिकमंडेशंस हैं, उन पर आप सुझाव दें।

          सभापति जी, मैं कहना चाहता हूं कि इस सम्बन्ध में काफी सुझाव आ रहे हैं। आप सब जानते हैं कि हर राज्य की अलग-अलग भौगोलिक स्थिति है। इसलिए उसी राज्य के व्यक्ति बेहतर ढंग से जानते हैं कि उनके यहां जब गणना होगी, पहचान होगी, वह किस आधार पर होनी चाहिए। हमें 16 राज्यों से सुझाव प्राप्त हुए। उसके पश्चात् मंत्रालय ने उन सुझावों पर दो बार मीटिंग बुलाई और एक्सपर्ट्स के साथ बातचीत की। पहली मीटिंग 2 मार्च, 2010 को हुई और दूसरी मीटिंग एक्सपर्ट्स ग्रुप के साथ 21 जुलाई, 2010 को हुई। इन मीटिंग्स में सबका उद्देश्य यह था कि इस बार जो पहचान हो, वह बिल्कुल सही हो। हमें पूरे देश के अंदर वास्तविक गरीब का पता लगाना है, खास तौर से ग्रामीण क्षेत्रों में। हमारे मंत्रालय ने एनआईआरडीए के अंडर एक मीटिंग बुलाई, जिन्हें पहचान करनी है, जिन्हें घर-घर जाकर सर्वे करना है। अगर देश में इनकी पहचान करनी है।

 तो वह केवल योजना आयोग या भारत सरकार के मंत्रालय के माध्यम से हम हर गांव में नहीं पहुंच सकते हैं। उसके लिए हमें राज्यों का सहयोग आवश्यक है। हम लोगों ने एक मीटिंग पिछले महीने की थी और उस मीटिंग के बाद एनएसएसओ के माध्यम से देश के 260 गांव रेंडम आधार पर लिये कि इन गांवों के अंदर एक व्यक्ति जिसकी हम कैपेसिटी बिल्डिंग कर रहे हैं, उसे प्रशिक्षण दे रहे हैं, क्षमता दे रहे हैं, वह किस तरह से वास्तविक गरीब का पता लगाए? हमने ट्रेनिंग देने के पश्चात, उनके माध्यम से यह चाहा कि पूरे 260 गांवों में, देश के हर राज्य के लोगों की समयबद्ध सीमा में, गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की गणना हो जाए। हम लोगों ने 150 करोड़ रुपये की धनराशि भी राज्यों को अवमुक्त की।

          प्रो. एनसी सक्सेना की जो रिक्मेंडेशन थी और बहुत सारे हमारे माननीय सांसदों ने जो बात कही कि एक नजर में कौन व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे नहीं है, कौन व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे है, यह एक नजर में पहचान में आना चाहिए। आज जो हर जिले में धरना-प्रदर्शन होता है, जब भी हमारे माननीय सांसद जाते हैं, विधायक जाते हैं और लोग शिकायत करते हैं कि उस व्यक्ति के पास कार है, उस व्यक्ति के पास बंगला है, फिर भी वह गरीबी रेखा के नीचे की सूची में है। अभी हमारे माननीय सदस्य कह रहे थे कि एक जगह के महापौर और एक जगह के बहुत बड़े अधिकारी भी गरीबी रेखा से नीचे की सूची में थे। उसके लिए हम लोगों ने जो प्रो. एनसी. सक्सेना की रिक्मेंडेशन है, वह इतनी पारदर्शी हैं, इतनी अच्छी हैं कि अगर उनका अनुपालन हो जाए तो हम वास्तविक गरीब परिवार के सामने पहुंच जाएंगे।

          आज गरीब परिवार की सूची में कौन व्यक्ति नहीं आ सकता है, किसको हम उस सूची से निष्कासित करें, उसके लिए हम लोगों ने एक क्रीटेरिया बनाया है। वह व्यक्ति जो गांव में रहता है और उसकी जिले में भूमि का जो औसत है, सिंचित भूमि अगर दोगुनी है और असिंचित तीन गुनी है तो उसे हम गरीबी रेखा के नीचे की सूची में शामिल नहीं करेंगे। हम उस व्यक्ति को भी गरीबी रेखा के नीचे नहीं मानेंगे जो आयकर देता हो, जो सरकारी विभाग में काम करता हो। उस व्यक्ति को भी हम गरीबी की रेखा के नीचे नहीं मानेंगे जिसके पास कोई ट्रेक्टर है। हमारी मंशा यही है कि पहली नजर में वह व्यक्ति जो गलत पात्रता के आधार पर अभी तक लाभ उठाते रहे, वे लाभ उठाना बंद कर दें।

          हम इसमें किन लोगों को जोड़ेंगे? जिस परिवार की मुख्या एक महिला है, उसे पहली नजर में हम इस सूची में शामिल कर लेंगे। वह व्यक्ति जो पूर्व-निर्दिष्ट आदिम-जनजाति समूह का है या वह परिवार जो पूर्व-निर्दिष्ट महादलित समूह का है, जिसकी मुख्या एक महिला हो, जिसके परिवार के अंदर घर चलाने वाला व्यक्ति विकलांग हो, जिस परिवार के पास कोई आवास नहीं है, जिस परिवार के मैम्बर बंधुआ-मजदूर हों।

श्री शैलेन्द्र कुमार :  माननीय मंत्री जी, आप जो रिपोर्ट पढ़ रहे हैं, दलित शब्द पर मेरा एतराज है, इस दलित शब्द को हटाकर अनुसूचित जाति कर दीजिए।

श्री प्रदीप जैन:   जी, एक्चुअली वह रिपोर्ट के अंदर था…( व्यवधान) ठीक है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय :    शैलेन्द्र जी, आप बैठ जाइये। प्रदीप जी, आप कितना समय और लेंगे।

श्री प्रदीप जैन:  आधा घंटा और बोलेंगे। इससे कम में तो हम पूरा जवाब दे नहीं पायेंगे। बाबू जी के पाइंट तो कम से कम पूरा कर दें। …( व्यवधान) 25 मिनट दे दीजिए।

सभापति महोदय:   ठीक है।

श्री प्रदीप जैन:          महोदय, इसके अलावा हमारे 13 पैरामीटर थे, जिनके आधार पर हम बीपीएल फैमिली को जोड़ते थे, वह भी परिवर्तित करके, हम लागों ने एससी-एसटी के लिए तीन अंक, अधिसूचना से बाहर की गई जनजाति और पिछड़ी जाति के लिए दो अंक रखे हैं। हमारे मुस्लिम भाई और बैकवर्ड वर्ग के लिए एक अंक रखा है। भूमिहीन कृषि मजदूर के लिए चार अंक रखे हैं। वह कृषि मजदूर जिसके पास 30-40 डैसीमिल, उसके लिए तीन अंक हैं और जिसे कभी-कभी मजदूरी मिलती है, उसके लिए दो अंक रखे हैं। हम लोगों ने बहुत सारे क्राइटेरिया बनाए हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसकी उम्र 60 वर्ष से ज्यादा है, वह परिवार का मुखिया है, उसके लिए हमने एक अंक रखा है। इसका उद्देश्य यह है कि पहली नजर में ही उन व्यक्तियों को हटा दिया जाए और दूसरा, उनकी मार्किंग के आधार पर जिनके ज्यादा अंक हैं, उनको हम बीपीएल की सूची में जोड़ लें। इसमें हमने एक प्रावधान और किया है, चूंकि सभी सदस्यों की एक ही चिंता थी कि एक लिस्ट बनती, एक दबाव के आधार पर, यदि वहां कोई व्यक्ति प्रभावशाली है, वह प्रभावशाली व्यक्ति राजनीतिज्ञ है, वह प्रभावशाली व्यक्ति इतना सम्पन्न है कि लिस्ट को प्रभावित न कर सके, इसके लिए हम लोगों ने ग्राम पंचायत की मीटिंग में यह प्रयास किया है कि पहली लिस्ट वहां से बनेगी। जब ग्राम पंचायत में कोई लिस्ट बन जाएगी, उनका आइडैंटीफिकेशन हो जाएगा, तो हम उन्हें ब्लॉक लेवल पर भेज देंगे। ब्लॉक से दूसरे ग्राम के जो सरकारी अधिकारी हैं, किसी राज्य में पंचायत सैक्रेटरी हैं, किसी राज्य में दूसरे सरकारी कर्मचारी हैं, वह कर्मचारी उस लिस्ट का सत्यापन करेंगे। सत्यापन करने के बाद वह देखेंगे कि वह लिस्ट ठीक है या गलत है। उसके पश्चात ग्राम सभा की खुली बैठक में गांव के लोग रहेंगे, जहां लिस्ट को पढ़कर सुनाया जाएगा। यदि किसी व्यक्ति के पास ट्रैक्टर है, किसी परिवार का मुखिया 60 वर्ष से ज्यादा का व्यक्ति है या कोई विकलांग व्यक्ति है तो जब खुली मीटिंग होती है तो उसमें खड़े होकर लोग आपत्ति दर्ज करवाते हैं। इसके अलावा अपीलिंग के लिए हमने रखा है कि हर जिले में एसडीएम के स्तर पर अपील की जा सकती है। इन रिकमण्डैशन के आधार पर हम लोगों ने देश के हर राज्य से 260 गांव पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लिए हैं। उनमें भी हमारा प्रयास है कि गांव में जो आइडेंटीफिकेशन कर रहे हैं, उसके लिए हमारे पास एक सूची है, जिसके आधार पर उन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है कि आप किस ढंग से गांवों के लोगों से बातचीत करेंगे, किस ढंग से इसे फिल-अप करेंगे। वहीं एक दूसरा तरीका हम लोगों ने पीआरए सिस्टम अपनाया है कि उनके बीच जाएंगे। जब यह सारा सिस्टम हो जाएगा, उसके बाद जब हमारे 260 पायलट गांव हैं, जनगणना के बाद हम एक-एक व्यक्ति को आइडेंटीफाई कर सकेंगे। हमारी सरकार निश्चित रूप से इस बात के लिए कटिबद्ध है, क्योंकि आंकड़ों में बहुत-सी चीजों का पता नहीं चलता, अगर हम वास्तविक रूप से देखें, भारत सरकार, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, श्रीमती सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के आउटले को हर पंचवर्षीय योजना में बढ़ाया है। अगर हम 9वीं पंचवर्षीय योजना को देखें, तो ग्रामीण विकास मंत्रालय की अधिकांश योजनाएं हैं।

सभापति महोदय :  मंत्री जी, आप अपनी बात जल्दी समाप्त कीजिए। इसके बाद हमें दूसरा रेजयोलूशन भी लेना है।

श्री प्रदीप जैन : महोदय, 9वीं पंचवर्षीय योजना में हमने 32,869 करोड़ रुपयों का किया था, दसवीं पंचवर्षीय योजना में 56,798 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया और 11वीं पंचवर्षीय योजना में हमने 193503 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया। जितनी भी हमारी योजनाएं हैं क्योंकि अगर हमें अंधेरे से लड़ना है, गरीबी से लड़ना है जिससे गरीबी दूर हो तो हमें प्रकाश का दीपक जलाना पड़ेगा। अगर हम दीपावली की काली रात की परिकल्पना करें तो हम एक जले हुए दीपक से सारे दीपकों में जिनमें बाती है, तेल है, उनमें प्रकाश दे सकते हैं। जब हम गरीबों की पहचान कर लेंगे, हम पहले की लिस्ट के आधार पर ग्रामीण विकास योजना के अंदर प्रत्येक परिवार के एक व्यक्ति को रोजगार प्रदान कर रहे हैं और वह रोजगार ग्रामीण विकास मंत्रालय के माध्यम से 38 लाख स्वयं सहायता समूह इस देश के विभिन्न राज्यों में कार्यरत हैं और उसमें एक क्रान्तिकारी परिवर्तन हमारे कैबिनेट मंत्री डा. सी.पी.जोशी जी ने लिया और  एसजीएफवाई जो योजना थी, उसको हम लोगों ने एनआरएलएम में कैबिनेट से पास कराया, एक मिशन के रूप में कराया। गांवों के अंदर गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग, उनका समूह बनाना और समूह बनाने के साथ उनकी कैपेसिटी बिल्ट करना, उनके अंदर उन्हें एक काम प्रदान करना और उनकी तमाम कठिनाइयों को दूर करना है क्योंकि अगर हमें गरीबी दूर करनी है, वह गरीबी जो 28.3 प्रतिशत है, उसे भी हमें दूर करना है। वह गरीबी जो इस सरकार के माध्यम से लगातार कम होती गई है। अगर हम देखें कि गरीबी पहले कभी 55 प्रतिशत थी, 45 प्रतिशत रही और आज 28.3 प्रतिशत पिछले सेंसस के आधार पर है। जो गरीबी दूर करने के लिए जो संकल्प डा. रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने कहा, वह हम लोग पहले से ही कर रहे हैं औऱ उसमें हम लोगों ने एक मॉडल लिया है। उसके अन्तर्गत एक कमेटी मिशन मोड में प्रदेश से बनती है। एक निश्चित समय है, उस निश्चित समय में हम प्रत्येक परिवार को रोजगार से जोड़ेंगे। हमने सारे माननीय सदस्यों की बात सुनी।…( व्यवधान)

सभापतिमहोदय : आप सभी मेन प्वाइंट्स पर कह चुके हैं।

श्री प्रदीप जैन: मैं डा. रघुवंश प्रसाद सिंह जी से आग्रह करता हूं कि वे इस संकल्प को वापस लें ताकि यह सरकार जो गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले प्रत्येक परिवार को रोजगार देने के लिए प्रयासरत है, इससे प्रत्येक गरीब परिवार के आइडेंटिफिकेशन में मदद मिलेगी।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति जी, मंत्री जी ने जो अभी जवाब दिया है, सबसे पहले तो मैं सभी माननीय सदस्यों को धन्यवाद देना चाहूंगा। 17 माननीय सदस्यों ने इसमें भाग लिया और सभी ने इसका समर्थन किया है, चूंकि गरीब का सवाल है। श्री हुकुमदेव नारायण यादव जी, जगदम्बिका पाल जी, श्री शैलेन्द्र कुमार जी, श्री दारा सिंह चौहान जी, श्री मंगनी लाल मंडल जी, श्रीमती भावना गाविल पाटिल जी, श्री अधीर रंजन चौधरी जी, डा. बी.मेहताब जी, श्री निशिकांत दुबे जी, डा. बलिराम जी, चौधरी लाल सिंह जी, श्री एस सेम्मलई जी, श्री अर्जुन मेघवाल जी, श्री सत्यपाल महाराज जी, श्री सुशील सिंह जी, श्री जगदीश ठाकुर जी, श्री रामकिशन जी, सभी माननीय सदस्यों को मैं धन्यवाद करता हूं कि गरीबों के सवाल पर यह जो संकल्प है, इस संकल्प में है कि गरीबी हटाने के लिए संकल्प करो। अभी तक सरकार में संकल्प नहीं देखा गया कि हम गरीबी हटा देंगे। केवल नारा बताओ औऱ गरीबी के लिए जहां तहां इक्के-दुक्के कार्यक्रम भी हुए हैं।  गरीबी हटाने का संकल्प प्रथम खंड में है। हम चाहते हैं कि टाइम बाउंड कार्यक्रम 2015 तक गरीबी हटाने का संकल्प किया जाए। इससे पहले सदन गरीबी पर चिंता व्यक्त करे और इसके बाद संकल्प करे कि वर्ष 2015 तक गरीबी हटा देंगे। गरीबी हटाने के चार सूत्र हैं, ऐसा नहीं है कि निर्गुण रूप से कहा गया कि गरीबी हटा देंगे और गरीबी हट गई। इससे न गरीबी हटेगी, न घटेगी और न ही रुकेगी। हमें सरकार के लोग कहते हैं इसे वापिस लिया जाए। इसे किस हिसाब से वापिस लें, हम यह सदन पर छोड़ते हैं। सरकार गरीबी रेखा के लिए आइडेंटीफाई नहीं कर सकी है, मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि माननीय मंत्री जी ने स्पष्ट नहीं किया है। सक्सेना कमेटी कहती है कि इस देश में 50 फीसदी गरीब हैं। तेंदुलकर कमेटी कहती है कि इस देश में  37 फीसदी गरीब हैं। ये सब सरकार की कमेटी हैं, ये अर्थशास्त्री हैं। अर्जुन सेन गुप्ता के अनुसार 70-80 फीसदी लोग 20 रुपए से कम पर गुजारा करते हैं। इस तरह से उनके अनुसार 70-80 फीसदी हो जाएंगे। अभी तक निर्धारण नहीं हुआ है कि कितने प्रतिशत गरीब हैं। इसके बाद परिवारों को आइडेंटीफाई करेंगे। क्या करेंगे? इसका क्या उपाय है? ग्रामीण विकास मंत्री, जैन साहब के बस की बात है? योजना आयोग कहां है? नेशनल सैम्पल सर्वे कहां है? कैबिनेट कहां है? प्रधानमंत्री स्तर पर यह तय होना चाहिए। योजना आयोग तय करे कि किस रिपोर्ट को मानेंगे? उन्होंने कहां कहा कि किस रिपोर्ट को मानते हैं? 37 फीसदी को मानते हैं, 50 फीसदी वाले प्रतिशत को मानते हैं या अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी को मानते हैं? ये सब सरकार की कमेटी हैं, इसमें हमारी कोई नहीं है। सदन की भी कोई समिति नहीं है। सब सरकारी कमेटी हैं। सरकार ही अभी तक तय नहीं कर पाई है। क्यों तय नहीं कर पाई है? आपने कहा वर्ष 2009 के अगस्त महीने में रिपोर्ट दे दी है जबकि वर्ष 2010 का अगस्त महीना चल रहा है, साल भर हो गया। तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट उसके बाद आई। अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट भी उसके आसपास आई लेकिन अभी तक कोई निर्धारण नहीं हुआ है? हम किस आधार पर वापिस लें?  हम गरीब का गला कैसे कटने दें? हम गरीब के लिए यहां आकर बैठे हैं, सदन में बहस कर रहे हैं। आप तय कीजिए कि आपने किस कमेटी की रिपोर्ट को माना है? आइडेंटिफिकेशन कब तक पूरा हो जाएगा? 11वीं योजना का 2007-08, 2008-09, 2009-10 काल चल रहा है। 13 पैरामीटर 2002 में आए, सुप्रीम कोर्ट के चलते देरी हुई लेकिन यह लागू हुआ। इसमें राज्य सरकारों को कहा गया था इसे ग्राम सभा में ले जाइए। कुछ गलतियां रही होंगी और ग्राम सभा नहीं हुई। अतः ग्राम सभा की बैठक अनिवार्य रूप से हो। कौन परिवार बीपीएल हैं, यह बात ग्राम सभा में उजागर हो। यह भी सरकार ने नहीं कहा, माननीय मंत्री जी ने नहीं कहा। दो सवाल हैं-  बीपीएल की किस रिपोर्ट को मानते हैं और कब तक तय करेंगे? ग्राम सभा में अनिवार्य रूप से ले जाएंगे या नहीं ले जाएंगे? गरीबी हटाने का मूल उपाय दिया हुआ है, इसे सरकार को मानने में क्या एतराज है? इसमें कहा गया है कि पहले गरीब की पहचान कर लीजिए और एक बीपीएल परिवार के एक आदमी को, युवक या युवती को, देश और दुनिया में जिस तरह की ट्रेनिंग की जरूरत है, दो या चार महीने की ट्रेनिंग दी जाए। और ट्रेनिंग के बाद उनके प्लेसमैन्ट, उनकी नौकरी की व्यवस्था की जाए। इसमें यह सवाल है। सरकार अभी तक यही नहीं कर सकी है। हम जानना चाहते हैं कि गरीब का खजाने में हिस्सा है या नहीं? गरीब को या तो आप रोजगार दीजिए और यदि रोजगार नहीं दे सकते तो उसे तीन हजार रुपये महीना पेंशन दीजिए। गरीबी कैसे हटेगी। बेरोजगारी हटेगी तो गरीबी हटेगी। उस परिवार को या तो रोजगार दे दो और यदि रोजगार नहीं दे सकते हो तो उसे तीन हजार रुपये महीना पेंशन दो। गरीब का खजाने में हिस्सा है या नहीं।

सभापति महोदय :  अब आप खत्म करिये। आप इस बारे में पहले भी बोल चुके हैं।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : उसे गुणवत्ता वाली शिक्षा मिलनी चाहिए। स्कूलों में मास्टर नहीं हैं। इसलिए मेरे चार-पांच सवालों पर यदि मंत्री जी आश्वासन दें, नहीं तो हम वोटिंग के लिए तैयार हैं। गरीब के साथ सदन में अन्याय नहीं होगा, ऐसा मैं मानता हूं।

MR. CHAIRMAN :  Hon. Member, Raghuvansh Prasad ji, are you withdrawing the Resolution?

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हमें आश्वासन नहीं मिला है, इसलिए हम संकल्प विदड्रा नहीं करेंगे।

MR. CHAIRMAN: In view of the reply made by the hon. Minister, are you withdrawing the Resolution that you have moved?

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : अभी तक कोई आश्वासन नहीं मिला है।

सभापति महोदय : मिनिस्टर क्या बोल रहे हैं, आप वह सुनिये।

 

 

श्री प्रदीप जैन: माननीय सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय रघुवंश बाबू से कहना चाहता हूं कि वह एक सांसद नहीं, बल्कि एक संस्था हैं। हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वह क्वैश्चन भी कर रहे हैं और जवाब भी उनके पास है। जैसे उन्होंने गरीबों की संख्या के बारे में पूछा। सारे सदन को मालूम है कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या कितने प्रतिशत है। यह योजना आयोग द्वारा निर्धारित की जाती है। जो सक्सैना कमेटी बनी थी, उसकी टर्म्स ऑफ रेफरेन्स थी, उसे निर्धारण करने के लिए अधिकृत किया गया था। इसलिए जो गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की बात है, उसमें लगातार भारत सरकार के कार्यकाल के दौरान जो गिरावट हुई है, वह मैं बताना चाहता हूं कि 1973-74 में जहां कम्बाइंड शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में 54.88 प्रतिशत थी। 1993-94 में 35.97 प्रतिशत है।

सभापति महोदय : आप इतना इलाबोरेट मत कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री प्रदीप जैन : अब मैं निवेदन करना चाहता हूं कि स्वयं सहायता समूह के माध्यम से पहले भी लगातार ग्रामीण विकास मंत्रालय के माध्यम से गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले एक-एक परिवार को लक्षित किया गया, जिसमें 38 लाख एसएसजी बने हैं और इसके अलावा बहुत सारी योजनाओं को यदि हम देखें…

MR. CHAIRMAN: The hon. Minister has been saying that they are trying to implement your ideas. In view of the assurance given by the hon. Minister, are you withdrawing the Resolution?

श्री प्रदीप जैन : मैं माननीय सदस्य से आग्रह करूंगा कि वह इस संकल्प को विदड्रा करें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हम सब सपोर्टर्स लोगों से सलाह करेंगे, चूंकि उन्होंने समर्थन किया है।

योजना मंत्रालय में राज्य मंत्री और संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री वी.नारायणसामी):  आपकी इच्छा है।  …( व्यवधान) आप विदड्रा कीजिए। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Are you withdrawing the Resolution?

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : अब सदन की राय है तो मैं अपना संकल्प विदड्रा करता हूं। 

The Resolution was, by leave, withdrawn.

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